Hindi-Is there a limit to tolerance? | Chaitanya Charan
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Lecture Summary
क्या सहनशीलता (Tolerance) की कोई सीमा है?
इस व्याख्यान में स्पष्ट किया गया है कि सहनशीलता असीमित या अंधी नहीं होनी चाहिए। इसके मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
- सही सहनशीलता क्या है: भगवद्गीता के अनुसार, सहनशीलता का अर्थ अन्याय (जैसे कौरवों का अत्याचार) सहना नहीं है, बल्कि अपने कर्तव्य और बड़े उद्देश्यों को पूरा करने में आने वाली कठिनाइयों को सहना है।
- सहनशीलता से पहले बुद्धि (Intelligence): सहनशील होने से पहले व्यक्ति में यह बुद्धि होनी चाहिए कि वह सही परिप्रेक्ष्य देख सके। हमें यह तय करना आना चाहिए कि जीवन में क्या बड़ा है और क्या छोटा है।
- छोटी चीज़ों को बड़ा न बनाना (असहिष्णुता): अगर हम छोटी-मोटी बाधाओं (जैसे किसी का फोन बजना या बच्चे का रोना) पर बहुत अधिक गुस्सा करते हैं, तो यह हमारी असहिष्णुता (intolerance) है। छोटी चीज़ों को नज़रअंदाज़ करना ही बेहतर है।
- बड़ी चीज़ों को छोटा न बनाना (शक्तिहीनता): यदि कोई गंभीर समस्या उत्पन्न हो रही है (जैसे जान का खतरा या मुख्य काम का पूरी तरह से बाधित होना) और हम फिर भी चुपचाप सब सह रहे हैं, तो वह सहनशीलता नहीं, बल्कि शक्तिहीनता (Impotence) है। ऐसी स्थिति में कदम उठाना आवश्यक है।
- सहनशीलता का अंतिम लक्ष्य – दिव्यता (Transcendence): सही चीज़ों को सहने और बुद्धिमान दृष्टिकोण अपनाने का अंतिम उद्देश्य स्वयं को आध्यात्मिकता और भगवान की सेवा की ओर ले जाना है।
Full Transcription
क्या टॉलरेंस (सहनशीलता) की कोई लिमिट है?
क्या टॉलरेंस के लिए कुछ बॉर्डरलाइन या लिमिट है? हाँ, बिल्कुल है। मैं आपके क्वेश्चन को टॉलरेट नहीं करूँगा अभी। नहीं, जरूर, देखिए हम देखते हैं भगवद्गीता के 2.14 में, “तांस्तितिक्षस्व भारत”, वो बोलते हैं टॉलरेट करो आप।
पर ये टॉलरेट क्या करो? क्या वो कह रहे हैं कि कौरवों ने आप पर जो अत्याचार किया है वो टॉलरेट कर लो आप? वो टॉलरेट करो, ये नहीं बोल रहे हैं। वो क्या बोल रहे हैं कि तुम्हें भीष्म से युद्ध करना पड़ रहा है, तुम्हें भीष्म और द्रोण से फाइटिंग करना पड़ रहा है, बड़ा मुश्किल है ये, पर ये तुम्हें टॉलरेट करना होगा।
टॉलरेंस से पहले इंटेलिजेंस (बुद्धि) की आवश्यकता
तो इसलिए इसके पहले जो आता है 2.13 में, भगवान बोलते हैं इंटेलिजेंस, “देहिनोऽस्मिन्यथा देहे”। जो है, हमें बुद्धि होनी चाहिए। और बुद्धि की एक सिंपल परिभाषा है, कि प्रभुपाद जी बोलते हैं, “सी थिंग्स इन देयर प्रॉपर परस्पेक्टिव” (See things in their proper perspective), सही परिप्रेक्ष्य में देखना है। कौनसी चीजें बड़ी हैं और कौनसी चीजें छोटी हैं? और क्या है, बड़ी चीजों को महत्व देना है, छोटी चीजों को महत्व नहीं देना है।
तो भगवान कहते हैं कि तुम भीष्म पर आक्रमण कर रहे हो, वो शरीर नहीं ये आत्मा है। शरीर का नाश होगा, ये छोटी चीज है, आत्मा का कल्याण जो है वो बड़ी चीज है, उस पर जोर दो।
टॉलरेंस का फल: ट्रांसेंडेंस (दिव्यता)
और फिर टॉलरेंस से फल क्या होता है? वो है ट्रांसेंडेंस (Transcendence)। “यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ । समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते ॥” इससे अमृतत्व प्राप्त होगा। “तृणादपि सुनीचेन तरोरपि सहिष्णुना”, ये है, और उसका फल क्या होना चाहिए? “कीर्तनीयः सदा हरिः”।
जब हम समस्याओं या डिफिकल्टी को फेस करते हैं, तो एक है कि हम छोटी चीज को बड़ा बना देते हैं, तो फिर उससे क्या होता है, हमारा इन-टॉलरेंस (intolerance) हो जाता है। कोई छोटी सी बात पर हमें कुछ बुरा बोल देता है, हम उस पर बहुत गुस्सा हो जाते हैं, आक्रमण करने लग जाते हैं, यह अच्छा नहीं है।
टॉलरेंस बनाम शक्तिहीनता (Impotence)
पर दूसरी भी समस्या हो सकती है। कभी हम बड़ी चीज को छोटी बना देते हैं, तो यह टॉलरेंस नहीं है, यह क्या हो जाएगा? यह इम्पोटेन्स (Impotence) हो जाएगा, यह शक्तिहीनता हो जाएगी। तो बड़ी चीज को छोटा नहीं करना है।
मतलब क्या है? कि अभी यह क्लास चल रहा है, तो अभी मान लीजिए यहां पर तो कोई नहीं है, पर मान लीजिए कोई माँ है, उसका छोटा बच्चा है, बच्चा रोने लग जाता है। तो अगर मान लीजिए बच्चा रोने लग जाता है तो मैं चिल्लाने लगता हूँ, माँ पर चिल्लाता हूँ, “क्या आप बच्चे को संभाल नहीं पाते तुम? किस प्रकार की माँ हो तुम? बच्चे को संभाल नहीं सकते, तो चले जाओ यहां से तुम!” तो अगर मैं इस तरह से चिल्लाऊंगा वो माँ पे तो क्या होगा? वो इन-टॉलरेंस हो जाएगा। मैं कितना भी अच्छा प्रवचन दूँगा, क्लास के बाद आप सबको क्या याद रहेगा? यह व्यक्ति कैसे इस पर चिल्लाया था? तो छोटी चीज़ को बड़ा नहीं बनाना है।
परिस्थिति के अनुसार सही दृष्टिकोण
पर कभी क्या हो जाता है? अगर वो बच्चा रो रहा है और कोई कुछ कर ही नहीं रहा है उसके लिए, रोते ही जा रहा है वो। मैं सिएटल (Seattle) में था, एक वेस्टर्न आउटरीच का प्रोग्राम था और वहाँ पर एक बच्चा था। तीन साल का बच्चा था, वो पूरे क्लास में इधर दौड़ रहा था और कोई भी कुछ नहीं कर रहा था। तो उसकी माँ भी बैठी थी वहाँ पर और वो भी कुछ नहीं कर रही थी। वो पाश्चात्य देश में ही था।
मैंने एक ऑर्गेनाइजर की ओर देखा, वो भी कुछ नहीं कर रहा था। तो फिर मैंने वैसे भी वो क्लास दे दिया, सब डिस्ट्रैक्टेड थे। फिर बाद में वहाँ का ऑर्गेनाइजर था, उसने बताया कि ये पहली बार हमारे क्लास में आए थे और ये जो स्त्री है, वो एक्चुअली वो जो एरिया है वेस्टर्न एरिया, थोड़ा वहाँ पे क्राइम काफी है, तो वहाँ का जो गैंग लीडर है उसकी गर्लफ्रेंड थी। तो कोई उसको कुछ बोलने की हिम्मत नहीं कर रहा था।
बड़ी और छोटी चीजों में अंतर समझना
तो पॉइंट यह है, ऑन दी अदर हैंड (on the other hand), अगर क्लास में कोई बार-बार रो रहा है, तो उसको थोड़ा हमें कुछ बोलना चाहिए क्योंकि यह एक बिग थिंग (big thing) है, हम सुन ही नहीं पा रहे हैं कुछ।
तो यहाँ पर एक स्मॉल थिंग (small thing) क्या है? क्योंकि थोड़ा आवाज़ आता है, इधर फोन बजता है, कोई उठ कर जाता है, वो स्मॉल थिंग है। पर हमेशा अगर कोई आवाज़ आ रहा है, जो काम करने आये हैं – तो बिग थिंग क्या है? क्लास सुनना है। तो स्मॉल थिंग को स्मॉल देखेंगे और फिर उससे हमारा जो बिग थिंग है उसको हमें बिग रखना है।
टॉलरेंस के लिए इंटेलिजेंस क्यों ज़रूरी है?
तो इसलिए हमें टॉलरेंस करने के पहले इंटेलिजेंस डेवलप करना चाहिए कि मेरे जीवन में बड़ी चीजे क्या हैं और छोटी चीजे क्या हैं। तो अगर किसी रिश्ते में जीवन का कोई बहुत खतरा आ रहा है, अगर हम किसी परिस्थिति में पागल होने जैसे लग रहे हैं, कोई बोलता है कि, “अगर मुझे इस परिस्थिति में रहना है, टॉलरेट कर जाओ, मैं आत्महत्या कर लूँगा।”
तो फिर इतना बड़ा चीज़ हो रहा है, तो हमें बुद्धि से समझना है क्या बड़ी चीज़ है, क्या छोटी चीज़ है। छोटी चीज़ को छोटा रखें और फिर बड़ी चीज़ को बड़ा रख सकें। टॉलरेंस से पहले इंटेलिजेंस चाहिए और टॉलरेंस से ट्रांसेंडेंस की ओर जाना चाहिए। जो बड़ी चीज़ है, भगवान बड़े हैं, भगवान की सेवा बड़ी है, वो और उससे बड़ी हो जाएगी। भगवान हमारे लिए और महत्वपूर्ण बन जाएँगे।
बहुत-बहुत धन्यवाद।