How the Bhagavad Gita is a message of love (Hindi)
Podcast:
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Lecture Summary
- गीता भगवान के प्रेम का संदेश है: Love is expressed through fulfilling the need at a particular time. अर्जुन की उस समय की तात्कालिक आवश्यकता को पूरा करके भगवान अपना प्रेम व्यक्त करते हैं।
- विकल्पों का विस्तार: भगवान ने अर्जुन के विकल्पों का विस्तार किया। केवल ‘युद्ध करना या न करना’ नहीं, बल्कि चार पर्याय हैं—आसक्त कर्म, अनासक्त कर्म, कृत्रिम वैराग्य और वास्तविक वैराग्य।
- समावेशी और निर्णायक शिक्षा (Inclusive & Conclusive): भगवान कर्मयोग, ज्ञानयोग, ध्यानयोग बताते हुए यह सिद्ध करते हैं कि सभी मार्ग अंततः भक्तियोग की ओर ले जाते हैं।
- गीता के 6 अंत (Endings): 18.63, 18.66, 18.71, 18.72, 18.73, और 18.78—इन सभी में भगवान का प्रेम दिखता है।
- 18.63 में भगवान जबरदस्ती नहीं करते, अर्जुन की स्वतंत्रता का आदर करते हैं (यथेच्छसि तथा कुरु)।
- 18.66 में स्पष्ट रूप से पूर्ण शरणागति की बात कहते हैं (सर्वधर्मान्परित्यज्य…)।
- 18.71 में जो गीता का संदेश श्रद्धा से सुनता है, उसके शुभ गंतव्य की बात करते हैं।
- 18.73 में अर्जुन का हृदय परिवर्तन (नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा) होता है।
- 18.78 में संजय की सार्वभौमिक भविष्यवाणी (यत्र योगेश्वरः कृष्णो…) आती है कि जहाँ कृष्ण और अर्जुन हैं, वहीं विजय और कल्याण निश्चित है।
Full Transcription
वक्ता एवं संस्था का परिचय
प्रज्ञाप ग्रुप और अपने प्रज्ञाप ग्रुप के लिए प्रचारक हैं, आध्यात्मिक टीचर हैं। 25 साल से ज्यादा यह भक्तियोग ट्रेडिशन का, आज के जमाने में किस प्रकार से भक्तियोग को अपने जीवन में ढालना है, इसके प्रचार में इस्कॉन (ISKCON) इस संस्था के साथ जुड़े हैं। 27 से ज्यादा पुस्तकें उन्होंने लिखी हैं जो वैदिक ग्रंथों पर आधारित हैं, जैसे भगवद गीता और रामायण। विशेषकर प्रभुजी की ‘गीता डेली डॉट कॉम’ (Gitadaily.com) बोलके वेबसाइट है जिस पर हर रोज वो 300 से ज्यादा शब्दों में भगवद गीता पर कुछ नया आर्टिकल लिखते हैं और ऐसे 4000 से ज्यादा आर्टिकल्स अभी तक पब्लिश हो चुके हैं। और ये ईमेल के द्वारा रोज (every day it is available to people around the world) दुनिया भर के लोगों के लिए उपलब्ध है।
मंगलाचरण
निर्विशेष-शून्यवादी-पाश्चात्य-देश-तारिणे।
वाञ्छा-कल्पतरुभ्यश्च कृपा-सिन्धुभ्य एव च।
पतितानां पावनेभ्यो वैष्णवेभ्यो नमो नमः॥
जय श्री कृष्ण चैतन्य प्रभु नित्यानन्द।
श्री अद्वैत गदाधर श्रीवासादि गौर भक्तवृन्द॥
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
भगवद गीता पर प्रवचन का आरंभ
हरे कृष्णा! आज शुरू कर देंगे। बात है, प्रश्न करेंगे, तब प्रश्न करो। मैंने एक किताब पुनर्जन्म पे लिखी हुई है और कैसे कुछ-कुछ बच्चे होते हैं उनको एक-एक उनके पूर्वजन्म की यादें आती हैं। तो उसी तरह से जब भी मैं पुणे में आता हूँ तो मुझे पूर्वजन्म जैसा याद आता है। 1996 से लगभग 2007-2008 तक मैं पुणे में ही था। इसके बाद काफी ट्रैवलिंग चालू हो गया। तो काफी समय से मैं आप सबको जानता हूँ।
जैसे हम कृष्ण को जितना जानते हैं, हम समझते हैं कि कृष्ण की महिमा कितनी बड़ी है। निताई ठाकुर जिस तरह से प्रचार कर रहे हैं भारत में अलग-अलग जगह पे, यहाँ पे विशाल नगर में उनके प्रचार की विशाल क्षमता आप सब देख रहे हैं और फिर पाश्चात्य देशों में जा रहे हैं। काफी समय बाद जब मैं आया था, तो आमंत्रण दे रहे थे। तो आप सब लगभग कई सालों से भगवद गीता का अध्ययन कर रहे हैं। मैं भगवद गीता पर आज चर्चा करूँगा।
भगवद गीता: एक जिगसॉ पज़ल (Jigsaw Puzzle) के समान
भगवद गीता जो है इसको हम कह सकते हैं एक ‘जिगसॉ पज़ल’ (jigsaw puzzle) जैसे है। मैं यह शब्द है जो हिंदी में ट्रांसलेट नहीं कर पाऊंगा। कभी-कभी वो हिंदी में ट्रांसलेट कर लेते हैं, कभी वो हिंदी ट्रांसलेशन किसी को समझ में नहीं आता है क्योंकि वो शब्द कभी-कभी अनयूज़ुअल (unusual) होते हैं।
जिगसॉ पज़ल में क्या होता है? अलग-अलग चीज़ें होती हैं, उसको फिट करते हैं और फिर एक सुन्दर चित्र आता है। जो भगवद गीता है, ये एक ऐसा ही जिगसॉ पज़ल है, एक ऐसा ही रहस्यमय ग्रंथ है। पर ये ऐसा है कि नार्मली जो जिगसॉ पज़ल होता है, उसमें ये चीज़ यहाँ पर जानी चाहिए, ये पीस यहाँ पर जाना चाहिए, यहाँ पर जाना चाहिए और फिर वो चित्र आता है। पर गीता ऐसी है कि उसमें अलग-अलग चीज़ें अलग-अलग तरह से जा सकती हैं, फिर भी अंत में एक सुन्दर चित्र आता है।
तो गीता के जो श्लोक हैं, वो अलग-अलग आचार्यों ने अपने भाष्यों में, अपनी टिप्पणियों में उसको अलग-अलग तरह से फिट किये हैं और एक सुन्दर उससे एक वर्ल्ड व्यू (world view), जगत को देखने की दृष्टि हमें दी है। और वो कैसे भगवान पे केंद्रित है, भगवान की सेवा पे केंद्रित है, यह बताया है।
केवल तत्वज्ञान नहीं, भगवान के प्रेम का संदेश
तो अभी भगवद गीता जो है, वास्तव में यह तत्वज्ञान है, पर भगवद गीता केवल तत्वज्ञान नहीं है, यह वास्तव में एक प्रेम का संदेश है। मैं इस टैबलेट को एक वाइट-बोर्ड के समान यूज़ करूँगा और कुछ लिखूँगा यहाँ पे। लिखूँगा इंग्लिश में पर एक्सप्लेन हिंदी में करूँगा।
साधारणतः क्या होता है कि हम जब गीता को देखते हैं तो अधिकांश लोग सोचते हैं कि गीता जो है, यह केवल एक तत्वज्ञान है और हम सोचते हैं कि श्रीमद्भागवतम्, चैतन्य चरितामृत, उसमें लीला है, उसमें भक्ति है, और उसमें रस है। पर वास्तव में गीता में भी बहुत रस है। तो गीता क्या है? इसको फिलॉसफी कह सकते हैं, पर अधिकांश लोगों के लिए वह तत्वज्ञान जरूर है, पर उससे ज्यादा यह क्या है? भगवान का प्रेम का संदेश है।
तो आज हम क्या करने का प्रयास करेंगे? भगवद गीता के प्रवाह में कैसे भगवान का प्रेम है, वह दर्शाते हैं और कैसे उससे अर्जुन का परिवर्तन होता है, वह हम देखने का प्रयास करेंगे।
अर्जुन का धर्म-संकट और कर्तव्य का द्वंद्व
तो अभी अर्जुन की शुरुवात क्या होती है? अर्जुन एक डिलेमा (dilemma) में हैं, वो एक द्वंद्व में हैं कि क्या करना है मुझे।
पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः (भगवद गीता 2.7)
मैं आपसे पूछता हूँ कि धर्म क्या है? धर्म यहाँ पे रीति-रिवाज नहीं है, धर्म का मतलब है सही चीज़, कर्तव्य क्या है? ‘पृच्छामि त्वां धर्म?’ अब यह सवाल अर्जुन को क्यों आया है? क्योंकि अर्जुन जो हैं, गीता की शुरुवात में एक द्वंद्व में फँसे होते हैं कि उनका एक ओर है उनका कुल धर्म और दूसरी ओर है उनका क्षत्रिय धर्म। और ये दो चीज़ें जो हैं, उनको अलग-अलग दिशा में ले जा रही हैं।
कुल धर्म अगर वो पालन करते हैं, तो उनके कुल का संरक्षण करना है। मतलब ये कुल के बीच में युद्ध हो रहा है, वो युद्ध नहीं करना है। पर क्षत्रिय धर्म का पालन करना है, तो युद्ध करना ज़रूरी है। तो अभी साधारणतः ये दोनों कर्तव्य साथ भी चल सकते हैं। पर अर्जुन को वहाँ पे समस्या आती है कुरुक्षेत्र के युद्ध में, क्योंकि यहाँ पे वास्तव में वो कुल जो है, उसके ही कुल के सदस्य हैं। और ऐसा नहीं कि अर्जुन यह जानते नहीं थे, जानते थे कि वास्तव में उनसे ही युद्ध करना है।
महाभारत के 18 पर्व और विराट युद्ध का प्रसंग
भगवद गीता महाभारत के भीष्म पर्व में आती है। और भीष्म पर्व के पहले वाले पर्व को उद्योग पर्व कहते हैं। उद्योग पर्व में… (My tablet fell down yesterday. So since then it is not behaving very well.)
तो अभी महाभारत में कितने पर्व हैं? किसी को पता है? ट्वेल्व (12), ओके। I think that will be a new महाभारत। महाभारत में वास्तव में अठारह पर्व हैं। और सही? नहीं। ट्वेल्व, ओके। Actually, there are 18 chapters in the Bhagavad Gita, there are 18 days in the Kurukshetra war, and there are 18 parvas in the Mahabharata. अब 18 सस्पीशियस (suspicious) लग रहा है, ओके, नो प्रॉब्लम।
तो उसमें जो है, उद्योग पर्व में जो अर्जुन बात कर रहे हैं, वो पहले उसमें बात हो चुकी है। पर वही सवाल अभी यहाँ पे भगवद गीता में आता है कि अब अर्जुन ने कौरवों से पहले युद्ध किया है। कब किया है? कुछ ही समय पहले। कब? विराट युद्ध में किया है। पर तभी वो हिचकिचाए नहीं। यहाँ पर हिचकिचाए। क्यों?
क्योंकि तभी विराट युद्ध में अर्जुन का कोई इरादा नहीं था कि किसी को मारना है वहाँ। उनको सबक सिखाना था कि आप, हिंदी भाषा में बोलते हैं, ‘हमसे पंगा मत लो आप। हमारी शक्ति बहुत है। ऐसा मत सोचो कि आपने हमको वनवास में कर दिया है, हमारे पास सेना नहीं है। अकेला ही मैं काफी हूँ।’ तो तभी अर्जुन की आशा थी कि शायद युद्ध नहीं होगा। वो दुर्योधन मान जाएगा और हमारा राज्य हमको वापस दे देगा।
युद्ध की अनिवार्यता और अर्जुन की आंतरिक ग्लानि
पर अभी जब अर्जुन आते हैं, तो देखते हैं कि अभी युद्ध करना ही है, अनिवार्य ही है। और तभी अर्जुन पूछते हैं कि क्या करना है मुझे—’पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः’ कि मेरा धर्म क्या है, कुलधर्म सही है या क्षत्रिय धर्म सही है, कौन सा धर्म मुझे करना है? और कोई कहते हैं कि आप क्षत्रिय धर्म करो। वही करने के लिए तो अर्जुन आये थे रणभूमि पे। पर अगले श्लोक में अर्जुन कहते हैं कि नहीं:
न हि प्रपश्यामि ममापनुद्याद्
यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम्।
अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धं
राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम्॥ (भगवद गीता 2.8)
क्षत्रिय धर्म पूरा करके, पूरा यश क्यों न प्राप्त कर लूँ, पृथ्वी को जीत सकता हूँ, स्वर्ग को प्राप्त कर सकता हूँ, पर उससे मेरे हृदय में जो सूखापन हो रहा है, जो ग्लानि हो रही है, वो नहीं जाने वाली है। भगवद गीता जो है, वो क्या है? जब हमारे पास ऐसी परिस्थितियाँ आती हैं कि दो पर्याय हैं, और दोनों पर्याय बहुत बुरे हैं, तो उस समय क्या करना है? तो उस समय बहुत मुश्किल होता है। उस समय सही कार्य क्या है? वह बताती है भगवद गीता।
आत्म-ज्ञान और स्थितप्रज्ञ का लक्षण
और जब भगवद गीता यह बताती है, सबसे पहले शुरुवात क्या करते हैं? भगवान कहते हैं, अगर भगवद गीता के अठारह अध्याय हैं, हम देखते हैं—मैं बहुत पास में आ रहा हूँ क्या? हम अठारह अध्याय जब आते हैं इसमें, तो उसमें… आपको सब स्पष्ट सुनाई दे रहा है वहाँ पे? थोड़ा सा इको (echo) हो रहा है। आप थोड़ा सा सत्य बोल रहे हैं। काफी इको हो रहा है वैसे, नो प्रॉब्लम।
तो अभी भगवद गीता में, सबसे पहले भगवान कहते हैं, तुम सोच रहे हो कि हमारी पहचान क्या है। और फिर उसके बाद में भगवान आगे बढ़ते हैं और जब दूसरे अध्याय का अंत होता है, तो तभी भगवान बता रहे हैं कि अगर समझोगे तुम आत्मा हो, तुम्हें इस जगत में कुछ प्राप्त नहीं करना है, तुम्हें जगत के परे सही में प्राप्त करना है। यहाँ पर तुम्हें सेवा करनी है, कर्तव्य करना है और तुम्हारी असली प्राप्ति जगत के परे है।
तो तभी अर्जुन सोचने लगते हैं, ठीक है, जो आप बोल रहे हैं, वो कार्य करने वाले कैसे लोग होते हैं? जो आप कह रहे हैं निष्काम भाव से कार्य करना है। तो तभी अर्जुन सवाल पूछते हैं कि:
स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव। (भगवद गीता 2.54)
क्या आप मुझे इनके लक्षण बता सकते हैं? ठीक है, भगवान कहते हैं, लक्षण बता सकते हैं। स्थितप्रज्ञ का भाव आता है कि कैसे व्यक्ति जो इस जगत में द्वंद्व आते हैं, उनसे विचलित नहीं होता है।
सहनशीलता (Tolerance) बनाम शिथिलता (Passivity)
अभी ये समझना महत्वपूर्ण है। भगवान कहते हैं कि आपको द्वंद्व को सहन करना है, पर ये नहीं कहते हैं कि ठीक है, द्वंद्व को सहन करना है, तो कौरवों ने तुम्हारे प्रति जो अत्याचार किया है वो भी एक द्वंद्व ही है, उसको भी सहन कर लो। नहीं! जो सहनशीलता है उसका महत्व समझना महत्वपूर्ण है।
Tolerance means to keep small things small so that we can focus on the big things. Tolerance does not mean to let big things become small.
सहनशीलता का मतलब क्या है? जो छोटी चीज़ें हैं उनको छोटा रखो ताकि जो बड़ी चीज़ें हैं उन पर हम जोर दे सकें। अगर हम समझेंगे सहनशीलता का मतलब है कि बड़ी चीज़ों को छोटा कर दो… मैं एक बार सहनशीलता पर लेक्चर दे रहा था जब मैं ऑस्ट्रेलिया में था। तो एक भक्त हैं, वो मेरे लेक्चर काफी सुनते हैं, और उसके बाद वो कैंडिड फीडबैक (candid feedback) देते हैं कि ‘अच्छा यह पॉइंट अच्छा था, यह क्लियर नहीं था, यह ऐसे था।’ तो वो लेक्चर सुना उन्होंने, पूछा मैंने, ‘आपको कैसा लगा यह लेक्चर?’
उन्होंने कहा, ‘इस लेक्चर में आपने जो बताया उसको मुझे अमल करने का मौका मिल गया लेक्चर में ही।’
मैंने कहा, ‘अच्छा? मतलब तुम कह रहे हो कि मेरा लेक्चर इतना बुरा था कि तुम सहन कर रहे थे लेक्चर को?’
उन्होंने कहा, ‘नहीं नहीं, वो बात नहीं है। मैं थोड़ा लेट आया, पीछे बैठा था। तो जहाँ पे मैं बैठा था, बाजू में जो व्यक्ति थे वो पूरे क्लास में फोन पर बात कर रहे थे। तो मैं कुछ सुन नहीं पा रहा था, मुझे गुस्सा आ रहा था, पर मैं सोचा कि आप सहनशीलता पे लेक्चर दे रहे थे, तो मुझे सहन करना चाहिए।’
मैंने बोला, ‘यह सहनशीलता नहीं है। यह टॉलरेंस नहीं है, यह पैसिविटी (passivity) है, यह शिथिलता है। सहनशीलता और शिथिलता में फर्क है।’
तो, टॉलरेंस का मतलब क्या है? मान लीजिए हम इस रास्ते पे जा रहे हैं और इसके अंत में कोई बहुत महत्वपूर्ण चीज़ है, हमें पहुँचनी है, this is a big thing. तो इसकी ओर सीधा हमें जाना है। और जाते समय शायद रास्ते में कोई गड्ढा आ जाएगा या फिर इसके आजू-बाजू कोई अच्छा गार्डन दिख जाएगा, जहाँ जाके मैं थोड़ा साइट-सीइंग देखता हूँ। तो ये चीज़ें रास्ते में कोई अच्छी आएँगी, बुरी आएँगी।
तो वहाँ पर ‘बिग थिंग’ (big thing) क्या है? जो प्रवचन सुनना है, समझना है। और उसमें ‘स्मॉल थिंग’ (small thing), छोटी चीज़ क्या है? मान लीजिए हम प्रवचन के लिए बैठे हैं, हमको शायद कुर्सी पर बैठना कम्फर्टेबल है और कुर्सी है ही नहीं वहाँ पर, तो ज़मीन पर बैठना पड़ रहा है। तो थोड़ा हमको अनकम्फर्टेबल होगा वहाँ पर। ठीक है, अगर बैठना पड़ता है, तो प्रवचन तो 6 घंटे नहीं चलने वाला है, एक घंटा चलने वाला है, तो मैं बैठ सकता हूँ, वो सहन कर लूँगा मैं।
पर अगर वो प्रवचन ही हम सुन नहीं पा रहे हैं, तो क्या है? वो स्मॉल थिंग नहीं है, वो बिग थिंग है।
तो भगवान जब अर्जुन को कहते हैं कि ‘आप सहन करो’, उसका मतलब क्या है? क्या सहन करो आप? कि अभी आपको आपका कर्तव्य करना है और कर्तव्य करते समय अगर आपको अपने रिश्तेदारों से भी युद्ध करना पड़ रहा है, तो आप आत्मा हो, वे आत्मा हैं, और आत्मा के कल्याण के लिए जो भी आपको युद्ध करना पड़ रहा है वो सहन करना चाहिए।
तत्वज्ञान: चमकने वाली और मूल्यवान वस्तुओं में भेद
तत्वज्ञान से क्या होता है कि कौन सी चीज़ कितनी महत्वपूर्ण है, वो हमारे विचार में बदल जाती है।
See, there are two things: there are things that glitter and the things that matter.
जो चीज़ें चमकती हैं और जो चीज़ें महत्वपूर्ण हैं, मूल्यवान हैं। In English we say, “All that glitters is not gold.” तो तत्वज्ञान जब नहीं होता है, जो भी चीज़ें चमकती हैं, उनकी ओर हम आकर्षित हो जाते हैं। पर तत्वज्ञान जब होता है, तो समझते हैं कि भले ये चमकती हैं, पर ये इतनी महत्वपूर्ण नहीं हैं। जो वास्तव में महत्वपूर्ण चीज़ें हैं, उन पे जोर देना है। तो भगवद गीता बताती है कि तुम्हारा कर्तव्य अगर तुम करोगे, तो तुम्हारी आत्मा की शुद्धि होगी, तुम भगवान की प्राप्ति कर सकते हो। यह जो है, यह गीता का संदेश है।
पाश्चात्य दृष्टिकोण और भगवान का सारथी बनना
अभी कुछ लोग कहते हैं कि हम भारत में भगवद गीता पढ़ते हैं, तो हम जानते हैं कि एक धार्मिक ग्रंथ है, इसमें कुछ तत्वज्ञान है। और साधारणतः हम एक रेवरेंस (reverence) के साथ आते हैं, थोड़े आदर के भाव के साथ आते हैं भगवद गीता में। पर जब पाश्चात्य देशों में हम जाते हैं, तो कई लोग खुले रूप से कहते हैं कि ‘कृष्ण में इतना अहंकार है, सारी भगवद गीता में वो तत्वज्ञान नहीं बता रहे हैं, खुद की महिमा बता रहे हैं। तो यह फिलॉसॉफिकल बुक नहीं है, यह एक सेल्फ-ग्लोरिफिकेशन (self-glorification) बुक है।’
पर वास्तव में अगर खुद की महिमा ही बढ़ानी थी, तो वो अर्जुन के सारथी क्यों बनते हैं? सारथी बनना तो एक बहुत ही नम्र सेवा है। पर उससे महत्वपूर्ण यह है कि वास्तव में भगवद गीता में भगवान केवल खुद की महिमा ही नहीं बता रहे हैं। अगर हम पूरा भगवद गीता का विश्लेषण देखते हैं, तो भगवद गीता में भगवान अपना प्रेम किस तरह से दर्शा रहे हैं, उस पे हम विश्लेषण कर रहे हैं।
पर उसके लिए हमने सबसे पहले देखा क्या है? कि अर्जुन एक बड़ी गंभीर समस्या में हैं। तत्वज्ञान जो भगवान बता रहे हैं, वो उनकी समस्या का हल करने के लिए बता रहे हैं। साधारणतः हमको लगेगा कि तत्वज्ञान और प्रेम का क्या संबंध है? पर क्या है कि प्रेम की अभिव्यक्ति अलग-अलग परिस्थिति में अलग-अलग व्यक्ति के लिए अलग तरीके से होती है। कोई व्यक्ति बीमार है, तो उसके लिए दवाई लाके हम प्रेम व्यक्त करते हैं। कोई बच्चा स्कूल से घर आता है, भूखा है, तो उसको खाना देते हैं। अर्जुन अभी द्वंद्व में हैं, तो अर्जुन के द्वंद्व का हल करने के लिए जो ज़रूरी है, वो भगवान बता रहे हैं। तो फिलॉसॉफी अर्जुन के प्रति कृष्ण के अपने प्रेम को व्यक्त करने का माध्यम है।
ज्ञान विकल्पों का विस्तार करता है: चार पर्याय
One of the characteristics of knowledge is that it increases the options before us.
अगर हमारे पास अज्ञान है, ‘मुझे ये करना है या ये करना है?’ और मान लीजिए मुझे दवाई के बारे में कुछ पता ही नहीं है, मुझे बीमारी है, तो ‘ये दवाई लेनी है या दवाई नहीं लेनी है? ये ट्रीटमेंट करनी है या नहीं ट्रीटमेंट करनी है?’ पर जब थोड़ा मेडिकल ज्ञान होता है, तब पता चलता है—’ये एलोपैथिक दवाई है, ये आयुर्वेदिक दवाई है, ये होम्योपैथिक है।’ अलग-अलग ऑप्शन्स आ जाते हैं।
तो जब ज्ञान नहीं होता, तो ऑप्शन्स बहुत कम हो जाते हैं। गीता के शुरुवात में अर्जुन के पास केवल दो ही ऑप्शन्स हैं: ‘फाइट’ (fight) और ‘नॉट फाइट’ (not fight)। जब अर्जुन को भय भी होता है, वो जो भय है, वो एक भी बार भगवद गीता के पहले अध्याय में खुद के मृत्यु के भय को व्यक्त नहीं करते हैं। तो उनका जो भय है, वो ऐसा नहीं कि कोई सैनिक रणभूमि में चला गया और दुश्मनों को देख लिया कि ‘बाप रे, ये तो बहुत खतरनाक लगते हैं, चलो भाग जाओ यहाँ से!’ वैसा भय नहीं था।
The fear is not of his own death, the fear is of doing the wrong thing. भय था कि ये युद्ध करना सही है या नहीं।
तो यहाँ पर अर्जुन सोचते हैं कि ‘एक्ट’ (act) करना है या ‘रीनाउंस’ (renounce) करना है—ये दो ऑप्शन्स अर्जुन के पास थे। पर भगवान अर्जुन को कहते हैं कि तुम्हारे पास दो ऑप्शन्स नहीं हैं वास्तव में, तुम्हारे पास चार ऑप्शन्स हैं। ये चार ऑप्शन्स क्या हैं?
- अटैच्ड एक्शन (Attached action): आसक्त होकर कार्य करना।
- डिटैच्ड एक्शन (Detached action): अनासक्त होकर कार्य करना।
- आर्टिफिशियल रेनॉन्सिएशन (Artificial renunciation): कृत्रिम/अपरिपक्व वैराग्य।
- रियल रेनॉन्सिएशन (Real renunciation): सही वैराग्य।
अब इसमें से भगवान कौन सा रेकमेंड नहीं करते हैं? अटैच्ड एक्शन (आसक्त कार्य) नहीं करना है, और कृत्रिम वैराग्य नहीं करना है। गीता 3.6 में भगवान इसे ‘मिथ्याचारः स उच्यते’ कहते हैं।
बाकी दोनों में भगवान कौन सा रेकमेंड करते हैं अर्जुन को? ‘तयोस्तु कर्मसन्न्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते’ और ‘उभौ निःश्रेयसकरावुभौ’—दोनों अच्छे हैं, पर भगवद गीता में भगवान यह रेकमेंड करते हैं कि आप वैराग्य भी रख सकते हो, पर अनासक्त रूप से कार्य करना आपके लिए और भी अच्छा है। खास करके भगवद गीता के तीसरे और पांचवें अध्याय में यही बात आती है।
अर्जुन केवल दो पर्याय देख रहे हैं कि युद्ध करना है या युद्ध नहीं करना है; युद्ध करना मतलब क्षत्रिय धर्म का पालन और युद्ध नहीं करना मतलब कुल धर्म का पालन। और भगवान कहते हैं कि तुम्हारे पास चार पर्याय हैं। पर ये चार पर्याय अर्जुन के मन में तुरंत बैठते नहीं हैं। इसलिए अर्जुन पूछते हैं कि ‘आप कह रहे हैं शांति प्राप्त हो जाएगी (दूसरे अध्याय के अंत में ‘स शान्तिमाप्नोति न कामकामी’), और फिर आप मुझे युद्ध करने को भी बोल रहे हैं, तो शांति कैसे प्राप्त होगी?’
एक कुशल शिक्षक (Expert Teacher) के रूप में श्रीकृष्ण
गीता में कितने अध्याय हैं? अठारह अध्याय हैं। गीता में कितने सवाल पूछते हैं अर्जुन? अर्जुन वास्तव में 17 सवाल पूछते हैं, और गीता की शुरुवात में धृतराष्ट्र का 1 सवाल जोड़ लें, तो कुल 18 सवाल हो जाते हैं।
इसमें चैप्टर 2, चैप्टर 3, चैप्टर 5 और चैप्टर 18 में लगभग एक ही मूल सवाल अर्जुन पूछ रहे हैं। मैं पहले यहाँ पुणे में था, तो एक ‘Discover Yourself’ कोर्स था। वहाँ पर एक व्यक्ति वही सवाल हर एक प्रचारक से पूछता था। छह सेशंस के लिए छह प्रचारक होते थे। पाँचों दिन उसने वही सवाल सबसे पूछा। छठे दिन मेरा सेशन था, मुझसे भी वही सवाल पूछा, मैंने जवाब दिया। फिर मैंने पूछा, ‘तुम यही सवाल सबको क्यों पूछ रहे थे? क्या तुमको सैटिस्फैक्ट्री जवाब नहीं मिल रहा था?’ उसने कहा, ‘मैं जानना चाहता था कि कौन सा प्रचारक कितना जानता है।’
तो यहाँ अर्जुन वही सवाल बार-बार पूछ रहे हैं। दूसरे अध्याय में पूछ रहे थे कि धर्म क्या है, मुझे क्या करना चाहिए? तीसरे अध्याय की शुरुवात में पूछ रहे हैं कि ‘आप कहते हैं कि ज्ञान अच्छा है, शांति प्राप्त करनी चाहिए, पर आप मुझे घोर युद्ध करने को क्यों बोल रहे हैं?’ पांचवें अध्याय में वही सवाल पूछ रहे हैं और अठारहवें अध्याय में पूछ रहे हैं कि संन्यास क्या है और त्याग क्या है। संन्यास मतलब बाह्य रूप से वैराग्य और त्याग मतलब आंतरिक रूप से वैराग्य।
जब वही सवाल बार-बार आता है, तो इनएक्सपर्ट टीचर (inexpert teacher) के दो प्रकार के रिएक्शन हो सकते हैं: एक है गुस्सा हो जाना कि ‘पहले जवाब दिया था, समझ नहीं आया क्या?’ और दूसरा है वही रटा-रटाया जवाब वापस देना।
पर एक्सपर्ट टीचर (expert teacher) क्या करता है? Answer from different perspectives. अलग-अलग पहलुओं से जवाब देता है। और वही भगवान भगवद गीता में करते हैं:
- दूसरे अध्याय में: भगवान पहचान (स्वरूप) के स्तर पर जवाब देते हैं कि तुम आत्मा हो, आत्मा के स्तर पर तुम्हारा कर्तव्य क्या है।
- तीसरे अध्याय में: भगवान बताते हैं कि कार्य का परिणाम कैसे होता है—your position and your disposition (तुम्हारा अंतरंग भाव क्या है और तुम्हारी बाह्य ज़िम्मेदारी क्या है)।
- पांचवें अध्याय में: भगवान विश्लेषण करते हैं कि कर्म का बंधन क्यों होता है—Action causes bondage because of motivation.
- अठारहवें अध्याय में: भगवान चौदहवें अध्याय में बताए गए तीन गुणों के आधार पर कर्म और त्याग का विश्लेषण करते हैं।
गीता के तीन विभाग और भक्तियोग की सर्वोच्चता
भगवद गीता में कर्मयोग, ज्ञानयोग, ध्यानयोग और भक्तियोग बताए गए हैं। इन चार पर्यायों में से:
- कर्मयोग कहाँ आएगा? कर्मयोग ‘डिटैच्ड एक्शन’ (अनासक्त कार्य) में आता है।
- ज्ञानयोग और ध्यानयोग कहाँ आएँगे? ये वैराग्य के मार्ग में आते हैं।
- भक्तियोग कहाँ आएगा? भक्तियोग भी ‘डिटैच्ड एक्शन’ में आता है, पर यह उच्चतम स्तर है। अनासक्त कार्य के भी अलग-अलग स्तर होते हैं—एक स्तर है कि मुझे केवल कर्मफल से मुक्त होना है, और दूसरा सर्वोच्च स्तर है कि मुझे भगवान को प्रसन्न करने के लिए कर्म करना है।
भगवद गीता के तीन विभाग (6-6 अध्यायों के) हैं:
- पहले 6 अध्याय: कर्मयोग से भक्तियोग की ओर ले जाते हैं (5वें अध्याय के अंत में ‘भोक्तारं यज्ञतपसाम्’ और छठे अध्याय के अंत में ‘योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना’)।
- मध्य के 6 अध्याय: सीधे भक्तियोग का वर्णन करते हैं।
- आखरी के 6 अध्याय: ज्ञानयोग से भक्तियोग की ओर ले जाते हैं। अठारहवें अध्याय में भगवान कहते हैं:
ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति।
समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम्॥ (भगवद गीता 18.54)
यानी ज्ञानयोग की पराकाष्ठा ‘ब्रह्मभूत’ अवस्था प्राप्त करने के बाद भी अंततः परा-भक्ति ही प्राप्त होती है।
पहले 6 अध्यायों में और आखरी के 6 अध्यायों में भगवान अपनी महिमा बहुत कम बताते हैं। वे केवल 2.71, 3.22-24, 3.30 जैसे कुछ ही श्लोकों में अपना उल्लेख करते हैं। मध्य के अध्यायों में भगवान अपनी महिमा इसलिए बताते हैं क्योंकि वहाँ भक्तियोग सिखा रहे हैं। और भक्तियोग का उद्देश्य क्या है? भगवान में मन लगाना। तो भगवान में मन लगाने के लिए भगवान की महिमा जानना ज़रूरी है। भगवान अपनी महिमा इसलिए नहीं बता रहे कि खुद की बड़ाई करनी है, बल्कि इसलिए बता रहे हैं ताकि हम उनका स्मरण कर सकें और उनमें मन लगा सकें।
‘पाण्डवानां धनञ्जयः’ और अर्जुन की अनन्य भक्ति
दसवें अध्याय (विभूतियोग) में भगवान बताते हैं कि मेरे भक्त हमेशा मेरा स्मरण करते हैं, तो अर्जुन कहते हैं कि आप अपनी विभूतियाँ और बताइए। भगवान जब अपनी विभूतियाँ बताते हैं, तो अंत में कहते हैं:
पाण्डवानां धनञ्जयः — पांडवों में मैं धनंजय (अर्जुन) हूँ।
तभी कोई सोच सकता है कि युधिष्ठिर क्यों नहीं? युधिष्ठिर तो इतने धर्मनिष्ठ हैं। दसवें अध्याय में भगवान मायावाद नहीं बता रहे हैं कि ‘सब कुछ भगवान ही है।’ अगर सब कुछ भगवान ही होते, तो अर्जुन से कहते कि ‘तुम भी भगवान हो, मुझे गीता बोलने की ज़रूरत नहीं है, चुप बैठो।’ ऐसा नहीं है।
पांडवों में जब पुत्रों की उत्पत्ति का समय आया, तो कुंती देवी ने धर्मराज से युधिष्ठिर को प्राप्त किया क्योंकि राजा के लिए धर्मनिष्ठ होना ज़रूरी है। फिर सोचा कि केवल नीति से काम नहीं चलेगा, नीति के साथ शक्ति चाहिए, तो वायुदेव से भीम का जन्म हुआ। पर नीति और शक्ति से भी बढ़कर जो सबसे महत्वपूर्ण चीज़ है, वो है ‘भक्ति’। तो भक्ति के लिए इंद्रदेव के आह्वान से अर्जुन का जन्म हुआ। अर्जुन में विशेष भक्ति है।
जीव गोस्वामी ‘गोपाल चम्पू’ में बताते हैं कि हर व्यक्ति हर चीज़ को अपनी दृष्टि से देखता है। भूखा व्यक्ति खाने की चीज़ देखता है, क्रिकेट का शौकीन टीवी ढूँढता है। जीव गोस्वामी कृष्ण लीला को वृन्दावन की दृष्टि से देखते हैं। पांडवों में अर्जुन का नाम एक व्रजगोप से मिलता है, इसलिए अर्जुन का नाम सुनते ही भगवान बहुत प्रसन्न हो जाते हैं। यह व्रजरस है। तो ‘पाण्डवानां धनञ्जयः’ भगवान इसलिए बोलते हैं क्योंकि अर्जुन में विशेष भक्ति है, और भगवान अर्जुन की मदद करना चाहते हैं।
शरणागति, आत्मविश्वास और गीता के 6 अंत
गीता का अंत कहाँ होता है? पहले अध्याय में विषादग्रस्त होकर अर्जुन ने अपना गांडीव धनुष रख दिया था। पर अंत में वही अर्जुन धनुष उठा लेते हैं: यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः (18.78)।
गीता का उद्देश्य केवल भगवान की महिमा बताना नहीं है, बल्कि अर्जुन जो भयभीत थे, समझ नहीं पा रहे थे क्या करना है, उनकी विचारधारा को बदलना और उन्हें शरणागत करके भगवान की सेवा के लिए तैयार करना है।
गीता का संदेश यह है कि हमारे जीवन में ऐसी समस्याएँ आ सकती हैं जिनका कोई हल नहीं दिखेगा। पर अगर हम सेवा भाव रखते हैं और यह सोचते हैं कि ‘How can I serve Krishna in this situation?’ (इस परिस्थिति में मैं भगवान की सेवा कैसे कर सकता हूँ?), तो उस समस्या का हल हमें धीरे-धीरे मिल जाएगा।
अर्जुन की हताशा पूरी तरह चली गई और उत्साह आ गया, क्योंकि वो समझ गए कि कृष्ण मेरे साथ हैं।
सुहृदं सर्वभूतानाम् — कृष्ण सबके परम हितैषी हैं।
भगवान की योजना सबके कल्याण के लिए है, और जब मैं उसमें सहभागी बनूँगा, तो मेरा भी कल्याण होगा और मेरे द्वारा सबका भी कल्याण होगा। इससे वास्तविक आत्मविश्वास (spiritual confidence) आता है।
मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि। (भगवद गीता 18.58)
मेरी चेतना में रहकर तुम सारी कठिनाइयों को पार कर जाओगे।
व्याख्यान का सारांश (Summary of 4 Points)
आज हमने मुख्य रूप से चार विषयों पर चर्चा की:
- गीता भगवान के प्रेम का संदेश है: Love is expressed through fulfilling the need at a particular time. अर्जुन की उस समय की तात्कालिक आवश्यकता को पूरा करके भगवान अपना प्रेम व्यक्त करते हैं।
- विकल्पों का विस्तार: भगवान ने अर्जुन के विकल्पों का विस्तार किया। केवल ‘युद्ध करना या न करना’ नहीं, बल्कि चार पर्याय हैं—आसक्त कर्म, अनासक्त कर्म, कृत्रिम वैराग्य और वास्तविक वैराग्य।
- समावेशी और निर्णायक शिक्षा (Inclusive & Conclusive): भगवान कर्मयोग, ज्ञानयोग, ध्यानयोग बताते हुए यह सिद्ध करते हैं कि सभी मार्ग अंततः भक्तियोग की ओर ले जाते हैं।
- गीता के 6 अंत (Endings): 18.63, 18.66, 18.71, 18.72, 18.73, और 18.78—इन सभी में भगवान का प्रेम दिखता है।
- 18.63 में भगवान जबरदस्ती नहीं करते, अर्जुन की स्वतंत्रता का आदर करते हैं (यथेच्छसि तथा कुरु)।
- 18.66 में स्पष्ट रूप से पूर्ण शरणागति की बात कहते हैं (सर्वधर्मान्परित्यज्य…)।
- 18.71 में जो गीता का संदेश श्रद्धा से सुनता है, उसके शुभ गंतव्य की बात करते हैं।
- 18.73 में अर्जुन का हृदय परिवर्तन (नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा) होता है।
- 18.78 में संजय की सार्वभौमिक भविष्यवाणी (यत्र योगेश्वरः कृष्णो…) आती है कि जहाँ कृष्ण और अर्जुन हैं, वहीं विजय और कल्याण निश्चित है।
बहुत-बहुत धन्यवाद। हरे कृष्णा!
प्रश्नोत्तरी (Q&A)
श्रोता का प्रश्न: हरे कृष्ण प्रभुजी, शुरू में आपने बताया था कि भगवद गीता एक जिगसॉ पज़ल (jigsaw puzzle) के समान है और उसको अलग-अलग तरीके से अरेंज करके चित्र निकल सकता है। तो इसका अर्थ क्या हुआ? क्या संदेश एक ही है पर देखने का तरीका अलग हो सकता है?
प्रभुजी का उत्तर: दृष्टिकोण काफी अलग हो सकते हैं, पर अंत में जो भगवान का संदेश है, उससे वही कन्क्लूजन निकलता है। जैसे आप देखते हैं कि चैतन्य महाप्रभु ने ‘आत्माराम’ श्लोक (आत्मारामाश्च मुनयो…) के 64 अलग-अलग अर्थ (64 explanations) बताए हैं।
भगवान के वचनों में अनेक अर्थ समाहित होते हैं। लेकिन there are many meanings, doesn’t mean every meaning is a right meaning. यह समझना ज़रूरी है कि भले अनेक अर्थ हो सकते हैं, पर वे प्रामाणिक परंपरा और भगवान के प्रति भक्ति के अनुकूल होने चाहिए।