Hindi – India on the moon Chandrayaan-3 success – A Bhagavad-gita perspective
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Lecture Summary
चंद्रयान-3 की सफलता और भगवद्गीता: सारांश
- प्रभुपाद जी के सिद्धांतों और भगवद्गीता के दृष्टिकोण से भारत के चंद्रयान-3 की ऐतिहासिक सफलता को निम्नलिखित तीन मुख्य बिंदुओं (POD एकॉर्निम) के माध्यम से समझा जा सकता है:
- गीता के अंत में बताए गए श्लोक के अनुसार—“यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः”—यदि भारतवासी अर्जुन की भांति अपने-अपने क्षेत्रों में निपुण होने के साथ-साथ भगवत चेतना से जुड़ जाएं, तो भारत न केवल विश्व कल्याण में योगदान देगा, बल्कि इतिहास में एक नया सुनहरा अध्याय शुरू करेगा।
- पर्सपेक्टिव (Perspective – दृष्टिकोण):
- जब शास्त्रों के किसी विधान को एक ‘हथौड़े’ की तरह हर चीज़ पर लागू करने का प्रयास किया जाता है, तो वह शास्त्रों की गूढ़ता के विपरीत हो जाता है।
- जिस प्रकार भूमि देवी का अस्तित्व भौतिक आँखों से न दिखने पर भी सत्य है, उसी प्रकार अंतरिक्ष और खगोलीय घटनाओं को भी केवल भौतिक सीमाओं में नहीं बांधा जा सकता।
- भौतिक जगत में दुःखालय होने के साथ-साथ सौंदर्य और ऐश्वर्य भी है, जिसके माध्यम से हम भगवान का स्मरण कर सकते हैं। जिस प्रकार अर्जुन ने भगवान की कृपा से स्वर्ग प्राप्ति का अनुभव किया और उसमें भगवान के हाथ को देखा, उसी तरह भक्तगण चंद्रयान की सफलता में भी भगवत प्रेरणा और भगवान की कृपा के दर्शन करते हैं।
- ऑपुलेंस (Opulence – ऐश्वर्य और विभूति):
- भगवद्गीता (10.41) के अनुसार, संसार में जो भी शक्ति, प्रज्ञा, एडवेंचर, और पराकर्षण दिखाई देता है, वह भगवान की विभूति का ही अंश है।
- चंद्रयान जब चंद्रमा पर उतर रहा था, तब वैज्ञानिकों और लाखों लोगों का उत्साह, चिंता, और अंततः मिलने वाली विजय साधारण नहीं, बल्कि भगवत अनुभव ही है।
- रामायण में हनुमान जी और भगवान राम की लीलाओं का उदाहरण देते हुए यह समझाया गया है कि एक सच्चे भक्त की दृष्टि हमेशा वही होती है जो हर परिस्थिति में भगवान की भक्ति और कल्याण के अनुकूल चीज़ों को देखे।
- दिशा और दृष्टिकोण (Direction):
- चंद्रयान की सफलता से भारत का आत्मविश्वास और दुनिया भर में भारत के प्रति सराहना बढ़ रही है।
- यह भौतिक यश भारत को उसकी प्राचीन संस्कृति, अध्यात्म और भगवद्गीता के ज्ञान की ओर पुनः जागृत करने का माध्यम बनना चाहिए।
- जिस प्रकार वैज्ञानिक तिरुपति बालाजी के दर्शन करने गए, उसी प्रकार यदि आधुनिक भारत भौतिक प्रगति के साथ-साथ आध्यात्मिक उन्नति भी करे, तो देश एक नया इतिहास रच सकता है।
Full Transcription
चंद्रयान-3 की सफलता और भगवद्गीता का दृष्टिकोण
प्रभु! भारत का विश्वविजयी चंद्र अभियान, उस पर एक भगवद्गीता परिप्रेक्ष्य। कुछ ही समय पहले भारत विश्व में पहला देश बना, जिसने चंद्रमा के साउथ पोल पर अपना रोवर लैंड किया है, चंद्रयान-3 की योजना के अनुसार, और चौथा देश बना है। यह सारे विश्व में एक अचरज और भारत में, भारतीयों में बहुत आनंद और गर्व का एक अवसर है। इसको हम भगवद्गीता की दृष्टि से किस तरह से देख सकते हैं?
तो मैं तीन चीज़ों के बारे में चर्चा करूंगा इसमें, POD (पॉड) एकॉर्निम के अनुसार। इससे ‘स्पेस पॉड’ होता है, जिससे हम जा सकते हैं। तो पॉड में ‘P’ है पर्सपेक्टिव (Perpsective) इसमें—शास्त्र जो भगवद्गीता और भगवद्गीता की इस परंपरा से, जब कोई घटना घटती है, जब उसको हम देख रहे हैं शास्त्रों से, तो शास्त्रों के किस विधान से, किस शब्द से हम देख रहे हैं, यहां महत्वपूर्ण है।
कुछ लोगों के पास जब कोई हथौड़ा आ जाता है, तो हथौड़े से किसी कील को ठोकने में इतना आनंद आता है कि वो सारी दुनिया को कील ही बना देते हैं, हर चीज़ को ठोकना चाहते हैं। तो कभी-कभी शास्त्रों से हम एक विधान लेते हैं और वो विधान हमारे लिए हथौड़ा बन जाता है और फिर हम उससे हर चीज़ को ठोकने का प्रयास करें, तो ऐसा शास्त्रों को करना बिल्कुल ज़रूरी नहीं है, पर ऐसा शास्त्रों की जो गूढ़ता है, शास्त्रों का जो सखोल ज्ञान है, उसके भाव के विपरीत जाता है।
अभी शास्त्रों में हाँ, यह बताया गया है, प्रभुपाद जी ने विधहराया है कि चंद्र जो है, यह एक ऊंचा ग्रह है, स्वर्गीय ग्रहों में से एक है। तो उसमें हम मानव जाना संभव नहीं है हमें, क्योंकि हमें उसकी पात्रता नहीं है, पुण्य की पात्रता नहीं है। अभी प्रभुपाद जी ने ऐसा विधान किया है, पर ऐसा ही विधान नहीं किया है अगर हम शास्त्र का ध्यान, उसको लिटरली लेते हैं, हर विधान को हमारी धारणा से हम उसको समझते हैं, वैसी समझ उसको लेते हैं।
शास्त्र में बताया गया है कि यह जो पृथ्वी है, यह भूमि देवी है। तो हम पूरे पृथ्वी के धरातल पर घूम सकते हैं और कहीं हमको भूमि देवी नहीं मिलेगी, तो क्या उसका मतलब है कि हम पृथ्वी पर ही नहीं हैं? और क्या उसका मतलब है कि भूमि देवी का अस्तित्व नहीं है? नहीं, इसका मतलब है कि भूमि देवी, यह देवी है, वो अस्तित्व है, पर एक अलग स्तर पर अस्तित्व है और वहां हमें हमारी आंखों से दिखता नहीं है। इसलिए इस भौतिक जगत में जो भी घटना घटती है, इसलिए केवल इससे मेरे विश्वास की बुद्धि होती है और मेरे विश्वास का खंडन होता है। इस कॉन्फ्लिक्ट में फेथ है और इस चैलेंज में फेथ है, इसी दृष्टि से देखने की ज़रूरत नहीं है। शास्त्रों में बताया गया है कि अलग-अलग, उसी चीज़ को अलग-अलग दृष्टि से देखा गया है शास्त्रों में।
अभी भागवतम और भगवद्गीता में देखते हैं। भगवद्गीता में भी देखते हैं—भगवद्गीता में एक दृष्टि से बताया गया है कि जगत दुःखालयम् है। पर उसी भगवद्गीता में बताया गया है कि इस जगत में बहुत सौंदर्य है और सौंदर्य उसका बताने का उद्देश्य है कि इस जगत में भी हम भगवान का स्मरण कर सकते हैं, भगवान की महिमा को देख सकते हैं। तो उस तरह से स्वर्ग के बारे में देखते हैं हम, तो भगवद्गीता में बताया गया है कि स्वर्ग को भी प्राप्त कर लेता है कोई, तो भी क्या होता है? उसको पुनः इस जगत में आना पड़ता है—आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन—आठवें अध्याय के सोलहवें श्लोक में भगवान बताते हैं। उसके लिए नौवें अध्याय में बताते हैं—क्षीणे पुण्ये मर्चलोकं विशंति।
तो स्वर्ग में जाना कुछ बड़ी बात नहीं है, क्योंकि स्वर्ग में आते हैं तो पुनः पुण्य खत्म होने पर दिखा जाते हैं वापस। पर जिस अर्जुन को वो भगवद्गीता बताई गई है, वही अर्जुन बाद में भागवतम में प्रथम अध्याय के पंद्रहवें स्कंध के पंद्रहवें अध्याय में बताता है कि, “हे प्रभो! हे भगवान कृष्णा! आपकी कृपा से मैं स्वर्ग जा पाया, इसी शरीर में और न केवल इस शरीर में जा पाया मैं, पर वहां पर जा कर इंद्र के आसन पर, इंद्र के साथ बैठने का आदर मुझे मिला।” और यह उसे अभी अर्जुन माया नहीं कह रहे हैं, यह आपकी महिमा है, आपकी कृपा की महिमा है।
तो क्या स्वर्ग की प्राप्ति केवल एक माया का एक लक्षण है, कुछ क्षण के लिए प्राप्त होता है स्वर्ग प्राप्ति? भगवान की कृपा है वो दृष्टि से अस्थाई है, पर इस भौतिक जगत की दृष्टि से स्वर्ग की प्राप्ति यह बहुत अद्भुत है और उसमें भगवान का हाथ देखना, यह अर्जुन की भक्ति और अर्जुन की कृष्ण भावना का लक्षण है। तो उसी तरह से चंद्रयान को भी हम अलग-अलग दृष्टि से देख सकते हैं। तो उस दृष्टि से भक्त हमेशा देखना चाहते हैं, जिससे कि अपनी भक्ति में वृद्धि हो सके, हम भगवान का स्मरण हर जगह कर सकते हैं।
ऑपुलेंस (Opulence)
और उससे आता है दूसरा ‘ओ’ (O) पियोड़ी (POD) का—ऑपुलेंस। ऑपुलेंस मतलब कि भगवान का स्वर्ग नहीं है कि हम मंदिर में जा के कर सकते हैं, पर इस जगत में भी जो भी चीज़ आकर्षक होती है, उससे देखते हैं तो उसमें भी हम भगवान के पराकर्षण का एक अंश देख सकते हैं—यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा। तददेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसंभवम्॥
कि जब किसी व्यक्ति में कोई शक्ति होती है, कोई क्षमता होती है, कोई प्रज्ञा-प्रतिभा होती है, तो वो भगवान की उन पर कृपा है और फिर यशोऽस्मिव्यवसायानाम् कि अगर कोई प्रयास करता है, उसमें एडवेंचर होता है, उसका बहु अनुभव जो है, यह भगवान की कृपा है और उसमें भगवान की विभूति देख सकते हैं। जब एक्साइटमेंट और विक्ट्री होता है, यह बहुत शक्तिशाली भावनाएं और अनुभव होते हैं। जब चंद्रयान चंद्र की ओर उतर रहा था, तो लाखों लोग देख रहे थे और बड़े उत्साह से, बड़े चिंता से, उत्कंठा से देख रहे थे। तो तभी जो अनुभव है और बाद में यश जो हुआ, वह भगवान का है, भगवत अनुभव ही है वो।
अभी जो यश होता है, आसानी से नहीं मिलता है। कुछ सालों पहले भारत का चंद्रयान जो टू था, वो चंद्रमा के काफी करीब जाकर गिर गया और फिर अभी कुछ समय पर रशिया का मिशन भी जो है, वो अव्ययश भी हो गया। तो कोई अगर कह सकता है कि यह सब मोह ही है, यह सब एक रचाया हुआ नाटक है। तो अगर कोई नाटक रचा रहा है, लाखों रुपए खर्च करके नाटक रचा रहा है, तो फिर उसमें वो अपयश क्यों दिखाएगा? नहीं, यश दिखाएगा है।
तो इस तरह से भक्त कैसे देखता है? जैसे रामायण की कथा आती है। जब हनुमान जी लंका में गए, तो हनुमान जी ने सोचा कि अगर राम सच में भगवान हैं, तो इसमें इतनी शक्ति कैसे आ गई? नहीं, यह सोचा कि इसमें इतनी सारी शक्ति, अगर यह भगवान का भक्त होता, तो यह जगत के लिए कितना कल्याण कर पा रहा है! बाद में प्रभु श्री राम के शरण में आए, तो कई वानरों ने सोचा कि यह तो रावण का भाई है, उसके साथ यह सही होगा, उसको ठुकराने का, या उसको गिरफ्तार करने की बात हो रही थी। पर प्रभु श्री राम ने क्या देखा? उसमें भगवत भक्ति, भगवत सेवा की यह क्षमता थी, वो देखा, यह एक शरणागत भक्त है। तो सारग्राही, जो हर चीज़ में जो भगवान की भक्ति के अनुकूल है, उसे देखना, यह भक्ति का लक्षण है। तो यह है ‘Opulence’ दूसरा पॉइंट।
दिशा और दृष्टिकोण (Direction)
और तीसरा है ‘Direction’। तो अभी हर जगह पर जब भगवान का ‘Opulence’ ऐश्वर्य देखते हैं, तो वो भगवान की ओर जा रहा है, ज़रूरी नहीं है, पर हमें देखना है कि यह भगवत अनुभूति हम कर रहे हैं, उससे क्या लोग भगवान के करीब जा रहे हैं या भगवान से दूर जा रहे हैं?
तो अभी ज़रूरी नहीं है, भारत ने यशस्वी रूप से किया है, उसका मतलब क्या है? इससे भारत का आत्मविश्वास बढ़ रहा है कि हम भी यशस्वी हो रहे हैं। दुनिया की भारत के प्रति सराहना बढ़ रही है और भारत ऐसा देश है कि इसमें प्राचीन काल से आध्यात्म, भक्ति, इसके बारे में न केवल ज्ञान और इसकी संस्कृति भी एक प्राचीन समय से चली आ रही है और अभी भारत भी उसी धर्म और आध्यात्म के और पुनर्जागृत हो रहा है। सारे विश्व में भी योग, कीर्तन, इन चीज़ों के बारे में रुचि बढ़ रही है।
अभी इससे अगर आत्मविश्वास भारत का बढ़ जाता है, चंद्रयान के यशस्वी होने से, और उससे फिर भारत अपनी ही संस्कृति, अपने ही आध्यात्म, प्राचीन आध्यात्मिक ज्ञान को पुनः अन्वेषण करने में प्रवृत्त होता है, तो इस भौतिक, इस यश को हम कहिए भौतिक यश दे सकते हैं, पर यह भौतिक यश जिन्होंने किया है, जो वैज्ञानिक थे, वो तिरुपति बालाजी भी गए थे, भगवान का आशीर्वाद लेने के लिए। जो आज के भारत समाज है, वह अगर इस यश से प्रेरणा लेता है और उस से आध्यात्मिक एक्सप्लोरेशन, आध्यात्मिक खोज और आध्यात्मिक प्रगति करने में भी प्रेरित हो जाता है, प्रवृत्त हो जाता है, भारत महान है, पर भारत की महिमा क्या है? भारत की महानता क्यों रही है?
इसमें अगर हम भगवद्गीता के बारे में ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं, भगवद्गीता के बारे में बड़े-बड़े विचारवंतों ने और सारे विश्वभर से उसकी सराहना की है। पिछले भारत के प्रधानमंत्री ने कहा था कि प्रभुपाद जी ने क्या किया था? भगवद्गीता को ग्लोबलाइज किया था, इस ग्लोबलाइजेशन के जगत में, पेस्ट के समय में और आज के प्रधानमंत्री, जिन्होंने कई बार भगवद्गीता विदेशी राजा, विदेशी प्राइम मिनिस्टर, प्रेसिडेंट्स को दिया है, कि यहीं इससे बेहतर हम और कोई भारत से देख सकते हैं।
तो अगर इससे प्रेरणा मिलती है कि हम भगवद्गीता ऐसे आध्यात्मिक ग्रंथों के ज्ञान और उसमें जो बताई गई संस्कृति है, उसके और में और एक्सप्लोर करें, तो फिर भारत न केवल विश्व में प्रगति करेगा, पर विश्व में बहुत बड़ा योगदान भी कर सकता है। न केवल भौतिक, आध्यात्मिक नहीं। महाराज युधिष्ठिर के जब राजा थे वो भारत के, न केवल उसमें बहुत आध्यात्मिक प्रगति हुई थी, पर भौतिक दृष्टि से भी समृद्धि थी। सो हॉलिस्टिक, पूर्णतया जो प्रगति है, वो हो सकती है।
और हम आशा करते हैं, प्रार्थना करते हैं कि चंद्रयान के यश से जो आत्मविश्वास भारत का बढ़ रहा है, उससे भारत हॉलिस्टिक प्रोग्रेस करे, पूरी तरह से भौतिक और आध्यात्मिक दोनों में प्रोग्रेस करे। अगर भारत अर्जुन जैसे बन जाता है, भारतवासी अर्जुन का भाव करते हैं, अर्जुन अपने क्षेत्रों में बड़े निपुण थे और उसके साथ-साथ महान भक्त भी थे। वैज्ञानिक हो या अलग भारत में अलग नागरिक हो, वो अपने क्षेत्रों में निपुण होते हैं, उसके साथ-साथ अगर भारत में भगवान, भगवत चेतना काफी समय से है, जैसे भगवद्गीता के अंत में अर्जुन और कृष्णा मिल जाते हैं—यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः। तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम॥—वहाँ जरूर विजय होगा, वहाँ जरूर भूति होगी।
तो वैसे ही अगर भारत अर्जुन जैसे बन जाता है और भगवान के साथ जुड़ जाता है, तो फिर भारत न केवल विश्व के कल्याण के लिए योगदान कर सकता है, पर एक अद्वितीय योगदान करके विश्व के इतिहास में एक नया सुनहरा पन्ना शुरू कर सकता है। तो यही हमारी आशा और अपेक्षा है कि यह चंद्रयान से मिलने वाले आत्मविश्वास से एक नया अध्याय विश्व के इतिहास में भारत शुरू करने में…
सारांश में हमें देखता है कि भगवद्गीता की दृष्टि क्या है चंद्रयान के इतिहास में होने पर, कि अलग-अलग दृष्टि हो सकती है। तो हमें वो दृष्टि देखनी है, वो पर्सपेक्टिव जो भक्ति के अनुकूल है और उसको क्या है कि ‘Opulence’ इस जगत में कुछ अद्भुत होता है, तो उसमें हम भगवान की विभूति देखते हैं, हम भगवत चेतना में और भगवान के और करीब जा सकें।