When we feel left alone – Vritrasura pastime analysis – Hindi
Podcast:
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Lecture Summary
इस व्याख्यान में वृत्रासुर के प्रसंग और श्रील प्रभुपाद के जीवन संघर्षों के माध्यम से यह गहराई से समझाया गया है कि जब हम सही मार्ग पर चलते हुए बिल्कुल अकेले पड़ जाते हैं, तो हमें किस प्रकार का दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।
आपके वर्डप्रेस ब्लॉग के लिए इस पूरे विषय का मुख्य सारांश यहाँ दिया गया है:
- उद्देश्य भय से बड़ा होना चाहिए (Purpose Bigger Than Fear): साहस का अर्थ भय का पूरी तरह समाप्त होना नहीं है (जो व्यक्ति को लापरवाह बनाता है), बल्कि हमारे जीवन का ‘उद्देश्य’ हमारे भय से कहीं अधिक बड़ा और महत्वपूर्ण होना चाहिए।
- दूसरों को कोसने के बजाय अपना कार्य करें: जब आपके अपने लोग आपका साथ छोड़ दें या आपको न समझें (जैसे श्रील प्रभुपाद के साथ उनके शुरुआती दिनों में हुआ), तो निराश होकर उन्हें बुरा-भला न कहें। अपनी सेवा और कर्तव्य (धर्म) पर डटे रहें; समय (Time) अंततः सब कुछ सही सिद्ध कर देगा।
- धर्म यानी सामंजस्य (Harmony): धर्म का मूल अर्थ है उस संपूर्ण व्यवस्था के साथ सामंजस्य (harmony) बिठाना जिसके हम अंग हैं। परिस्थितियाँ चाहे जैसी भी हों, हमें अपने व्यक्तिगत धर्म, नैतिकता और खेल-भावना (Sportsmanship) का पालन नहीं छोड़ना चाहिए, ठीक वैसे ही जैसे वृत्रासुर ने अकेले रहकर भी अपना क्षत्रिय धर्म निभाया।
- भक्ति और दृढ़ संकल्प (Determined Devotion): शुरुआत में हमारी भक्ति एक छोटी मोमबत्ती की लौ जैसी होती है, जिसे विपरीत हवाओं (असहयोग या बुरे संग) से बुझने का डर रहता है। लेकिन जब यह भक्ति दृढ़ संकल्प से ‘दावाग्नि’ (Forest Fire) बन जाती है, तो यही विपरीत हवाएं उसे और भड़काती हैं, जिससे भगवान के साथ हमारा व्यक्तिगत संबंध और गहरा होता है।
- अपने हिस्से की रौशनी फैलाएं (Light your corner of the world): हमें बड़ी भूमिका, अधिक संसाधन या अनुकूल परिस्थितियों का इंतज़ार नहीं करना चाहिए। हमारी वर्तमान स्थिति, परिवार या समाज में जो भी भूमिका है, उसे पूरी ईमानदारी और सर्वोत्तम तरीके से निभाना ही हमारा सबसे बड़ा धर्म है।
निष्कर्ष:
जब आप सही काम कर रहे हों और दुनिया या आपके अपने लोग भी आपके खिलाफ खड़े हों, तो अकेले कार्य करने के लिए मानसिक रूप से तैयार रहें (Ready to do it alone)। अपनी प्रामाणिकता और दृढ़ संकल्प बनाए रखें, भगवान आपकी निष्ठा को देखकर आपकी सेवा को सफल बनाएंगे।
Full Transcriptions
सही कार्य करने में अकेले पड़ जाना
हरे कृष्णा। हरे कृष्णा। आवाज़ सुनाई दे रहा है सबको? हूँ? थैंक यू। हूँ? सो, यहाँ पे हम, मैं बहुत कृतज्ञ हूँ, आज यहाँ पे आने का मौका मिला है, राधा कुंजबिहारी के चरण कमलों में, और इस सारे मंदिर को परिवर्तित देखके, एक तरह से नॉस्टैल्जिया (nostalgia) आ रहा है। मैं जब यहाँ पे था, तो मंदिर काफ़ी छोटा था, और भगवान की कृपा बढ़ रही है, भगवान का प्रचार बढ़ रहा है। यह सब में आप सहभागी हैं, आप सब इसके निमित्त हैं, तो मैं आप सब की थोड़ी सेवा करने में आज सहभागी होने का प्रयास करूँगा।
यहाँ पे मैं इस विषय पर चर्चा करूँगा, कि when we are left alone in doing the right thing, कि जब हम सही कार्य करने में बिल्कुल अकेले पड़ जाते हैं, तो हमें क्या करना चाहिए? इस विषय पर मैं चर्चा करूँगा, इसको मैं थोड़ा व्हाइटबोर्ड (whiteboard) के रूप में यूज़ करूँगा, जो लिखूंगा मैं English में लिखूंगा, पर उसको Hindi में समझाने का प्रयास करूँगा।
देवताओं और असुरों का युद्ध
तो अभी यहाँ पर हुआ क्या है, कि जो देवताएं हैं, जो एक तरफ असुर हैं, और दूसरी ओर देवता हैं, उनमें युद्ध चल रहा है। जब युद्ध चल रहा है, तो देवताओं का जो पक्ष है, वो हावी हो रहा है, वो और शक्तिशाली हो रहा है। तो इसलिए अभी वृत्रासुर अकेला है यहाँ पे, और उसके सामने उसके सारे सैनिक हैं, वो भाग जा रहे हैं। तो अभी यह देखके पिछले, यहाँ पर सारे देवता हैं, आक्रमण कर रहे हैं, तो यह पिछले श्लोकों में बताया, कैसे उसने सारे अपने सैनिकों को प्रेरणा देने का प्रयास किया, उनको जोश देने का प्रयास किया, उनको उत्साह देने का प्रयास किया, हौसला बढ़ाने का प्रयास किया।
पर यह फल न मिला, वो एक तरह से पूरे भागने पे उनका मन पूरा आया था, विभ्रांत, विचलित हो गये थे, कि ऐसा सामना करना नामुमकिन है ऐसे देवताओं से, इतने शक्तिशाली हैं। और जब वो भाग रहे थे, तो एक तरह से क्या हो रहा है, जो असुर हैं, वो अधर्म कर रहे हैं। उनका अधर्म क्या है? रनिंग अवे (Running away), युद्धे चाप्यपलायनम् (Bhagavad Gita 18.43), इससे एक क्षत्रियों का धर्म बताया गया है, पर वह अधर्म कर रहे हैं, भागने का।
पर उस समय, अभी क्या हो रहा है, एक तरह से अधर्म हो रहा है, वृत्रासुर एक तरह से अभी अकेले पड़ रहे हैं। कोई और युद्ध करने के लिए है ही नहीं वहाँ पे। तभी जो देवता हैं, वो भी अधर्म कर रहे हैं। देवताओं का अधर्म क्या है? कि वो जो भाग रहे हैं, उनको आक्रमण कर रहे हैं। पीठ दिखाकर भागने वालों पर। जो भागने के लिए तैयार हैं, उनपे वो आक्रमण कर रहे हैं। तो सब जो ऐसे हो रहा है, पीछे से वो आक्रमण कर रहा है। तो जो लोग भाग रहे हैं, उनपे आक्रमण कर रहा है।
श्रील प्रभुपाद के जीवन का प्रसंग और गौड़ीय मठ
तो उस समय क्या करना है हमें, कैसे सामना करना है, कैसे प्रतिक्रिया रखनी है। तो वैसे ही हो गया है। एक तरह से प्रभुपाद जी के जीवन में भी ऐसे ही प्रसंग आ गया था। जब अगर हम प्रभुपाद जी के जीवन का एक तरह से प्रक्रिया, लाइफ बायोग्राफी (Life biography) देखते हैं, तो 1922 में वे भक्तिसिद्धांत ठाकुर से मिलें। 33 में उनका दीक्षा हुआ। और फिर लगभग 37 में उनके गुरु महाराज चले गए। तो भक्तिसिद्धांत ठाकुर disappeared। और उसके बाद में, प्रभुपाद जी अपनी आँखों के सामने देख रहे थे, कि पूरा जो गौड़ीय मठ था, वो उध्वस्त हो रहा था।
वो गौड़ीय मठ में, उनके गुरु महाराज ने एक तरह से सेना बनाई थी। और वो सेना जो बनाई थी, प्रचार के लिए सेना बनी थी। पर यहां पर क्या हो गया था तभी? वहाँ बहुत सी प्रॉपर्टी (property) थी। एक तरह से, जब भक्तिसिद्धांत ठाकुर चले गए, तो उनके बाद में कौन उनका सक्सेसर (successor) होगा? कौन उनका आचार्य का पद लेगा? वो उसका कुछ फैसला नहीं हो पाया। तो अभी क्या हो गया था कि साधारणतया, जो कोई भी मठ होते थे, जो अगर कोई मठ होता था, तो ट्रेडिशन (tradition) था क्या? कि एक मठाधिपति से अगला मठाधिपति आएगा। तो जो एक आचार्य था तो उसके बाद में अगला आचार्य आएगा।
पर तभी भक्तिसिद्धांत ठाकुर ने पहली बार ऐसे कुछ कहा था, हम तभी के धार्मिक संस्थाओं के बारे में चर्चा करते हैं, तो चाहे वो ब्रह्मो समाज हो, रामकृष्ण मिशन हो, आर्य समाज हो, बंगाल में यह सब संस्थाएं थे, अभी उन सब में भी क्या प्रथा थी? कि एक आचार्य वो अगले आचार्य को नियुक्त करेगा, पर भक्तिसिद्धांत ठाकुर ने ऐसे नहीं किया, क्योंकि उनकी इच्छा थी कि उनके अनेक शिष्य जो हैं, वो सब जिम्मेदारी लें, सब प्रचार करें। पर ऐसा जो, अभी इस्कॉन (ISKCON) में जो जीबीसी (GBC) है, वैसे उस समय, उस प्रकार की उन्होंने कमिटी बनाई, तो उसका कोई प्रेसिडेंट (president) नहीं था।
जोनल सिस्टम (Zonal System) का उदाहरण
धार्मिक संस्थाओं में, कि उस समय जो एक भारत में अंग्रेजों का राज था, तो जो अंग्रेजों ने सारे भारत भर में, इंडियन रेलवेज़ (Indian Railways) बनाया था, और भारत इतना बड़ा था कि जो रेलवेज़ तभी बना था जो इंडियन रेलवे उस समय का एक विश्व के इतिहास में इंडियन रेलवे ये एक ऑर्गेनाइजेशनल मिराकल (organizational miracle) माना जाता है कि इतने बड़े देश को पूरी जगह पे उसको रेल बनाना। तो उसका जो मैनेजमेंट (management) था उसके लिए उन्होंने ऐसे जोनल लीडर्स (zonal leaders) बनाये थे कि साउथ ज़ोन (South zone) के लिए एक लीडर रहेगा, इस ज़ोन के लिए लीडर रहेगा, इस ज़ोन के लीडर रहेगा और इस तरह से सारा जो था उन्होंने सहयोग करके वो इंडियन रेलवे चल रहा था।
तो भक्तिसिद्धांत ठाकुर ने वही मॉडल (model) अपनाया मैंने कहा कि वैसे ही हम हमारी संस्था के ज़ोनल (zonal) बनायें पर एक तरह से उनका जो देहांत था वो थोड़ा अकस्मात हो गया तो पूरा सिस्टम (system) बना नहीं था। तो क्या हुआ यहाँ पे, तो कम से कम असुरों और देवताओं में युद्ध चल रहा है और यहाँ पे असुर भाग रहे हैं, पर जब प्रभुपाद जी देख रहे थे जो भक्तिसिद्धांत ठाकुर चले गए तो उसके बाद में यह जो ज़ोनल सिस्टम, एक सक्सेसर आचार्य नहीं है, एक बॉडी (body) है वो कैसे बनने वाला है, कैसे काम करने वाला है वो उनको कुछ समझा नहीं था और वो करने की उनमें दूरदृष्टि (दूरंदेशी) बोल नहीं रखा कि ये तो कुछ होगा नहीं तो उनमें से एक व्यक्ति को आचार्य बनाया गया।
श्रील प्रभुपाद की विकट परिस्थिति
असुरों और देवताओं में युद्ध चल रहा है पर वहाँ पे वो गौड़ीय मठ के एक सेक्ट (sect) और दूसरा सेक्ट (sect) उनमें युद्ध चालू हो गया उनमें फाइटिंग (fighting) हो गया। और तभी अभी प्रभुपाद जी ऐसे-ऐसे वृत्रासुर की परिस्थिति में नहीं थे, प्रभुपाद जी सेनापति नहीं थे प्रभुपाद जी उस समय गृहस्थ थे, प्रभुपाद जी एक प्रचारक थे उन्होंने बॉम्बे का मंदिर बनाने में मदद की थी पर प्रभुपाद जी देख रहे थे एक तरह से प्रभुपाद जी की परिस्थिति और विकट थी।
अगर कोई सेनापति है, कोई राजा है तो उसका तो अपनी सेना पे कुछ प्रभाव होता है पर एक तरह से प्रभुपाद जी तो एक गृहस्थ थे और भक्तिसिद्धांत ठाकुर के शिष्यों में वो एक जूनियर गॉड ब्रदर (junior godbrother) थे। उन्होंने दीक्षा भक्तिसिद्धांत ठाकुर से ली, प्रचार जो गया 1916 से जोरों से चालू किया और लगभग उनसे 16 साल सीनियर उनके गॉड ब्रदर थे जो 1916, 17, 18, 19 में जिन्होंने दीक्षा ली थी, किसी ने संन्यास लिया था और 16 साल नहीं, लगभग 6-7 साल जो थे, हाँ 1937 में प्रभुपाद जी ने दीक्षा लिया, तो 16-17 साल उनसे जूनियर थे, वो जूनियर थे।
तो अभी उनकी बात कोई सुनने को तैयार नहीं था। अब प्रभुपाद जी बोले, प्रभुपाद जी ने एक अपने गुरु महाराज के व्यास पूजा ऑफरिंग में कहा, जैसे वृत्रासुर यहां पे कह रहे हैं कि आपको युद्ध करना चाहिए, तो प्रभुपाद जी ने बोले कि हम, ये मंदिर किसका होगा, ये मंदिर किसका होगा, ये यहाँ आपस में झगड़ा क्यों कर रहे हैं, हमें तो प्रचार करना चाहिए, ये हमारे गुरु महाराज के चेले हैं। हाँ, हम इस तरह से, प्रॉपर्टी से क्या इकट्ठा होगा? अभी एक तरह से, वो जो गुरु भाई थे, वो अपनों में ही लड़ते हैं। अपनों ही के बारे में ऐसे कि बुराई के विचार से लड़ने की तरह करते हैं। मैं तो, कि मोहरा भी आचार्य खड़ा हो जाता है कि what is more important? community or properties? जैसे अब कैसे होता है जो मंदिर भक्तों के लिए है, भक्त मंदिर के लिए हैं।
कठिनाइयाँ और जीवन का अंधकारमय चरण
एक तो सब कहते हैं, दोनों भगवान के लिए हैं। मंदिर भगवान के लिए हैं, भक्त भगवान के लिए हैं। सब भगवान के सेवक ही हैं। पर प्रभुपाद जी, अमेरिका में उन्होंने क्या किया। उस समय प्रभुपाद जी के एक तरह से जीवन में एक बहुत डार्क फेस (dark phase) था। वो सबका जीवन अगर हम देखते हैं, तो सबका जीवन, सबके जीवन में कठिनाई आती है। No one’s life story is a happy story. सबके जीवन में एक बहुत डार्क फेस था। हर एक व्यक्ति के जीवन में कुछ न कुछ तो दुख होता ही है।
तो क्या होता है कि कुछ लोग जब दुखी होते हैं, वो दूसरे लोगों को दुखी करते हैं। मैं विचलित हूँ और मैं दूसरों को विचलित करता हूँ, और अगर दूसरे विचलित नहीं होते हैं, तो मैं दूसरों को और विचलित करता हूँ। तो वो बुरा कारण है, पर अगर कहीं कुछ गलत हो रहा है, कुछ गलत हो रहा है और हम उसको सही करने के लिए बता रहे हैं कि यह सब गलत हो रहा है यहाँ पर, अगर मान लीजिए हम सब किसी जगह पर बैठे हैं और वहाँ पर भी बाढ़ (flood) आने वाला है, तो हम सब लोगों को बोल रहे हैं पर कोई बात सुनता ही नहीं है, उससे क्या होगा हम और विचलित हो जाएंगे। यहाँ पर हम इरिटेट (irritate) नहीं कर रहे हैं पर लोगों को वार्न (warn) कर रहे हैं, पर वार्निंग मतलब क्या है उसको भी इतना डिस्टर्ब (disturb) कर रहे हैं, वो लोग आराम से बैठे हैं, “नहीं आप बेवकूफी कर रहे हैं।”
प्रभुपाद जी अपना एक तरह से उसको, मैं अगर हम प्रभुपाद जी का जीवन देखते हैं, तो material dead-end आ गया था उनके जीवन में, कि जो अपना business करके अपने गुरु महाराज की संस्था को आगे बढ़ाना चाहते थे, गुरु महाराज को support करना चाहते थे, उनका business कुछ आगे बढ़ नहीं रहा था, और फिर वो क्या देख रहे थे, उसके साथ साथ spiritual भी dead-end आ रहे हैं, कि उनके सामने ही देख रहे हैं, कि वो सारी जो संस्था है, वो अभी टूट के बिखर रही है।
युक्रेन युद्ध का उदाहरण और उध्वस्त परिस्थितियां
अभी आप शायद जानते हैं, रशिया (Russia) और युक्रेन (Ukraine) में युद्ध चल रहा है, तो मेरे कई मित्र हैं, जो युक्रेन में हैं, तो बता रहे थे कि कभी कुछ कई भक्त हैं, जो युक्रेन साथ छोड़ के चले गए। तो अगर वो border में रहे थे, जहां पे आक्रमण हो रहा था, तो एक दिन वो नॉर्मल जी रहे, कुछ दिनों के बाद उनको साथ अपने घर छोड़ के, अपनी सारी प्रॉपर्टी छोड़ के, जितना वो पैक कर सकते हैं, लगेज में लेकर चले जाएंगे, और कभी वापस आएंगे यह भी पता नहीं।
तो अभी कुछ भक्त वो कैनेडा (Canada) में गए हैं, तो फिर कैनेडा में वो कहीं इमिग्रेशन (immigration) करके कुछ नौकरी करने का प्रयास कर रहे हैं, बड़ा मुश्किल होता है। तो अभी एक भक्त, परमपूज्य राधानाथ महाराज वापस अभी युक्रेन में गए हैं, युक्रेन के उस पार्ट में जाना जहां पे वो सेफ (safe) हैं, तो उनके साथ कुछ भक्त गए हैं वापस युक्रेन में। तो बता रहे थे मुझे, मैं पूना (Pune) भी बात कर रहा था, वो बता रहे थे कि अभी ऐसे है कि हमारे आँखों के सामने एक फ्लॉरिशिंग (flourishing) शहर था।
अभी हाँ, मैं पूना में कुछ महीनों के बाद आया हूँ। और मान लीजिये पूना है ही नहीं, पूना जो एक तरह से कब्रिस्तान बन गया है, पूरा उध्वस्त हो गया है, तो यहाँ यह प्रोसेस (process) करना ही बड़ा मुश्किल होता है। इसलिए हमारे आँखों के सामने जो कोई हमारे लिए महत्वपूर्ण चीज़ है, वो उध्वस्त हो जाती है, तो उसको सहन करना, उसको प्रोसेस करना, क्या करना है, क्या नहीं करना है, वो समझना बड़ा मुश्किल हो जाता है। तो अभी प्रभुपाद जी ने क्या किया, उसके बारे में हल करेंगे, उसके बारे में चर्चा करेंगे, हल के बारे में चर्चा करेंगे।
धर्म और हार्मनी (Harmony) का अर्थ
पर यहाँ पर वृत्रासुर की ऐसी परिस्थिति हो गई, वृत्रासुर देवताओं पर आक्रमण करने के लिए आया है, और जब देवताओं पर आक्रमण करने के लिए आया है, तो क्या हुआ है, वहाँ, उसकी सारी सेना बिखर गई है और दौड़ रही है। और यहाँ पर एक तरह से शब्द इस्तेमाल किया है, वह भी दिलचस्प शब्द है, कि ‘एवं शमसता धर्मं वचह’, धर्मं वचह, तो अभी कोई कहता, आप असुर हो तो असुर ही है, धर्मी है, तो यह धर्म वचह क्या करेगा?
पर ऐसे नहीं है, जो एक धर्म के अनेक अर्थ होते हैं, धर्म का अनेक अर्थ होता है हार्मनी (harmony)। हार्मनी मतलब, जो भी हम कार्य कर रहे हैं, वह एक तरह से सामंजस्य। हार्मनी क्या होता है, हार्मोनाइज़ (harmonize) के साथ, अच्छा आपको पता है हार्मनी क्या है? संतुलन is balance, not harmony. I can find faults with the translations you give, I can’t find the right translation. आप जो translation बताओगे, मैं गलत कैसे बताऊंगा, पर सही translation ढूंढना पड़ेगा हमको। हार्मनी आप समझ जाएंगे, आनंद, सद्भाव, मैं Google में fault निकालूंगा अभी, सद्भाव नहीं चाहिए, हार्मनी, तो मतलब समझ जाएंगे, समझ जाएंगे, आनंद, आपको पता होंगे, आपके बच्चे बताएंगे, आप समझ जाओगे क्या है।
तो जो हार्मनी था अभी क्या है, कि धर्म का अर्थ क्या है? कि अगर मान लीजिये कोई अभी गाड़ी चलाता है, कार चला रहा है, तो अभी ड्राइविंग (driving) में भी एक धर्म है। क्या धर्म है, धर्म का बेसिक मीनिंग (basic meaning) क्या है, कि हम, जब हमारा अस्तित्व होता है, तो हम अकेले नहीं जी रहे हैं, हम पार्ट (part) की परिभाषा हैं, हम हमसे बड़े कोई ऐसा समूह है, उसमें हम सहयोगी हैं। तो उस चीज के बड़े चीज हैं, उससे हम कुछ ले रहे हैं, और उसके लिए हमें कुछ देना पड़ेगा। तो हम जब रस्ते पर चलते हैं, तो हम क्या कर रहे हैं? वो रस्ते की सुविधा ले रहे हैं। तो अगर रस्ते की सुविधा ले रहे हैं, तो उसमें हमारा धर्म क्या है? कि जो नियम हैं वहाँ पे उनका पालन करना।
तो धर्म मतलब that activity, which keeps us in harmony with the whole that we’re belonging to. जिसमें हम सहभागी हो रहे हैं, उसमें हम किस तरह से सामंजस्य के साथ, समन्वय के साथ, सद्भावना के साथ रह सकते हैं, उसको धर्म कहते हैं।
नैतिक (Moral) और कानूनी (Legal) के बीच अंतर
तो अगर कोई गाड़ी चला रहा है और गाड़ी चलाते हुए, क्या होगा? वो व्यक्ति ट्रैफिक (traffic) के नियम का पालन नहीं कर रहा है, बहुत तेज़ चला रहा है, स्पीड लिमिट (speed limit) के ऊपर जा रहा है। तो क्या होगा? तो उससे डिसरप्शन (disruption) हो जाएगा, उससे लोग व्यथित हो जाएंगे। व्यक्ति अभी इसका मतलब क्या है कि लोग सोचते हैं कि कुछ गलत कार्य करना वो समस्या नहीं है, गलत कार्य करते समय पकड़ा जाना समस्या है। पर ऐसी बात नहीं है कि जो लोग हैं, यह अभी स्पीड लिमिट में चलना, यह हमारे लिए अच्छा है, दूसरों के लिए अच्छा है, सेफ और स्मूथ (safe and smooth) है, सीधा से ट्रेवल (travel) हो सकता है।
तो अभी ऐसे नहीं है कि जो असुर हैं, वो धर्म का पालन नहीं करते हैं। तो मैं पिछले कई सालों से अमेरिका प्रचार कर रहा हूं है, तो लगभग 6 महीने ही साल के अमेरिका में जाते हैं मैं विद्यार्थियों से विषय किए हैं (विद्यार्थियों से बात किये हैं), कि शराब पीके ड्राइविंग करना यह और बहुत बुरा है। तो कैसे है कि दो चीज़ें हैं, एक है मोरल (moral) और दूसरा है लीगल (legal).
मोरल मतलब क्या? नैतिक. लीगल मतलब कानून. तो ये दोनों हैं, ये इक्वल (equal) नहीं हैं.
तो ड्रिंकिंग (drinking), शराब पीना ये नैतिक दृष्टि से गलत हो सकता है. पर कानून दृष्टि से गलत नहीं है. आपको पीना हैं तो आप पी सकते हैं.
पर मतलब क्या है? व्यक्ति अगर खुद को हानी पहुँचाना चाहता है, तो सरकार उसमें हस्तक्षेप नहीं करेगी. ये गवर्नमेंट (government) का जॉब (job) नहीं है. लोगों खुद को विनाश करना हैं तो आप कर सकते हैं.
पर अगर लोग शराब पी के गाड़ी चलाते हैं, तो क्या है? वो खुद को खतरे में नहीं डाल रहे, तो दूसरों को भी खतरे में डाल रहे हैं. खुद की हानी नहीं कर रहे, दूसरों की भी हानी कर रहे हैं. तो तभी गवर्नमेंट आ जाएगी और हस्तक्षेप करेगी.
असुरों का भी अपना धर्म होता है
तो सारी जो नैतिक चीज़ें हैं, उनको कानूनी तरह से नहीं किया जाता है. महाभारत में, अनुशासन पर्व में, इस पर बहुत विस्तार रूप से वर्णन आता है कि कौन कौन सी नैतिक चीज़ें हैं, उनको सही कार्य करना वो व्यक्तिक जिम्मेदारी है और कौन से नैतिक कार्य हैं, जिसको सही करना वो सरकार की जिम्मेदारी है. तो यहाँ पर कहने का उद्देश क्या है, मैं यह बात कर रहा हूँ, कि असुर जो प्रवृत्ति के लोग होते हैं, ऐसे नहीं कि वो सारे अधार्मिक होते हैं, उनका भी धर्म होता है.
मुझे एक भक्त अमेरिका में प्रचार कर रहे थे, बता रहे थे, कि जो लोग शराब पीते हैं, तो उनका भी एक ड्रिंकर कोड (drinker code) होता है, कि शराब पीने का कोड होता है वो. अगर छे लोग पार्टी को जा रहे हैं, छे बच्चे पार्टी को जा रहे हैं, एक कार में जा रहे हैं वो, और वो कार में जा रहे हैं, कि तुम ड्राइव (drive) करने वाले हो हमको, इसलिए तुम बिल्कुल शराब नहीं पियोगे, ये तुम्हारी तपस्या है, और अगली पार्टी होगी तभी मैं तपस्या करूँगा। कल के दिन आप शराब पी रहे हैं, तो शराब पी रहे हैं, पर व्यक्ति शराब भी पी रहा है, तभी क्या है, उसको थोड़ा तो सेंस (sense) है, कि शराब पी के ड्राइविंग नहीं करना चाहिए।
तो आप कह सकते हैं, शराब पीना बुरी चीज़ है, पर शराब पी के अगर ड्राइविंग कर रहा है, तो वो और बुरी चीज़ है। तो शराबी लोग होते हैं, ऐसे नहीं कि, all people who drink are the same, सब लोग शराब पीते हैं, वो एक समान नहीं होते हैं। बहुत से लोग शराब पीते हैं, उन में से बहुत कम लोग होते हैं, जो इतना शराब पिएंगे कि वो ड्राइविंग करेंगे, और दूसरों को भी मारेंगे। तो वैसे ही, अभी असुरों का, असुरों का यह कह सकते हैं, आप अधार्मिक हैं, वो क्या कर रहे हैं, वो हिंसा करते हैं, और यह धर्म जो है, वृत्रासुर याद दिला रहा है, अपने असुर सहयोगियों को, और वो बिल्कुल सुनने को तैयार नहीं हैं।
भय (Fear) और साहस (Courage) का सही अर्थ
तो कैसे हैं, जो कायरता होती है, और उसका विरुद्ध होता है, नॉर्मली हम करेज (courage) कहते हैं, साहस। पर इसमें एक फरक है, कि करेज, किसी में साहस कैसे आता है? साहस जब आता है, ऐसे नहीं है कि उसमें भय नहीं हो, एब्सेंस ऑफ फियर (absence of fear)। अगर किसी में केवल भय नहीं हो, तो उससे वो साहसी नहीं बनता है। क्यों क्या है, अभी भय ये बुरी चीज नहीं है, कभी-कभी भय होना भी ज़रूरी है।
मान लीजिये कोई दसवीं मंज़िल की एक खिड़की से, कोई छोटा बच्चा है, दस साल का बच्चा है, वो अपना पूरा सिर बाहर झुका के देख रहा है, अगर उसे कुछ डर नहीं लगता है, वहाँ देखके उसकी माँ को डर लगता है, “क्या कर रहा है, बाहर गिर जाएगा, दूर हो जा वहाँ से, खिड़की से आप।” तो क्या है, जो फियर (fear) है, जब कोई खतरा होता है, तो भय लगना ये स्वाभाविक है, ये भी ज़रूरी नहीं है, ये अच्छी बात है। अगर जब किसी को खतरा होता है, तो फियर जो जब कोई नहीं चाहता है, किसी को भय नहीं लग रहा है, तो वो जो है, हमेशा अच्छी बात नहीं है।
क्योंकि लोग कहते हैं, How to overcome your fears? How to become free from all fear? Actually, हमें कभी हमारे सारे भयों से मुक्त होना अच्छा नहीं है. अगर कोई व्यक्ति पूरा, free of all fear है, we should fear such a person. अगर कोई व्यक्ति को किसी भी चीज़ का भय नहीं है, तो हमें उस व्यक्ति का भय करना चाहिए. मान लीजिये कोई गाड़ी चलाता है, और वो कहता है कि मुझे एक्सीडेंट (accident) का भय नहीं है. उसको एक्सीडेंट का भय नहीं है, तो बाकी सब लोगों को एक्सीडेंट का भय हो जाएगा. क्योंकि क्या वो लापरवाही से ड्राइविंग करेगा.
उद्देश (Purpose) भय से बड़ा होना चाहिए
तो यहाँ पर दो चीज़ें हैं, अगर हम फियर मैनेजमेंट (fear management) कहते हैं, अगर हम हमारे भय का सामना करना चाहते हैं, तो एक है बीइंग फियरफुल (being fearful), जब हम पुरे भयभीत हो जाते हैं। इसमें क्या हो रहा है? टू मच फियर (Too much fear). यहाँ पर भय बहुत ज़्यादा हो गया है, पर इसके विपरीत, अगर फियरफुल का जो ऑपोज़िट (opposite) है, वो फियरलेस (fearless) नहीं है, वो क्या है? वो रेकलेस (reckless) है। रेकलेस मतलब लापरवाह, मतलब क्या है? टू लिटल फियर (Too little fear)।
ऐसी बहुत सी चीज़ें इस दुनिया में हैं, जो जिससे भय रखना ज़रूरी है, यहाँ फियरलेस नहीं है, प्रभुपाद जी कहा करते थे कि हमें माया का डर रहना चाहिए, तो इस दुनिया में ऐसी बहुत सी चीज़ें हैं, जिससे खतरा आ सकता है, और खतरे में सीधा भाग के जाना यह कोई साहस नहीं है, वो मूर्खता हो सकता है। तो इसमें बीच में क्या है, तो अगर हमको फियरलेस रहना है, तो हम फियरलेस प्लस केयरफुल (careful) होना चाहिए। तो ऐसे नहीं कि फियरलेस जो है, फियरलेस प्लस केयरफुल चाहिए, भय से मुक्त का मतलब नहीं है कि व्यक्ति लापरवाह बन गया है, हमें भय से मुक्त रहना है, पर हमें चौकन्ना भी रहना है।
और ये कैसे आता है? जब कोई युद्ध करने जाता है, तो जो कहा जाता है प्रेजेंस ऑफ पर्पस बिगर देन फियर (Presence of purpose bigger than fear)। कि हमारे जीवन में कोई उद्देश है, कुछ ध्येय है हमारा, और वो ध्येय इतना महत्वपूर्ण है कि भय लगेगा, पर भय से ज्यादा महत्वपूर्ण क्या है? नहीं, यह उद्देश है।
चेतना में उद्देश का महत्व
किसी को राष्ट्र से बहुत प्रेम है, राष्ट्र पे आक्रमण किया किसी शत्रुओं ने, तो अभी वो व्यक्ति रणभूमि में युद्ध करने जाता है, तो क्या उसको भय नहीं होगा कि मेरा हाथ पैर टूट जाएगा? मेरे एक मित्र हैं, वो मिलिट्री हॉस्पिटल (military hospital) में थे, तो वो मुझे मिलिट्री हॉस्पिटल के टूर में लेकर गए थे, वहाँ पे मुझे कुछ गेट टुगेदर (get together) क्लास हो रहे थे।
तो बता रहे थे कि जब हम युद्ध में जाते हैं, तो हमारी प्रार्थना होती है, कि बहुत सही लोग प्रार्थना करते हैं, तो अगर किसी शत्रु का कोई बुलेट (bullet) हो, वह मुझे मिस (miss) करे, कोई बुलेट मुझे न लगे। पर अगर वो प्रेयर फुलफिल (prayer fulfill) न हो, कि ये प्रार्थना फुलफिल ना हो कि कोई बुलेट मुझे लगे नहीं। तो दूसरी प्रार्थना करते हैं कि ये बुलेट मुझे या तो हृदय में लग जाये, पेट में लग जाये, क्लीन वूंड तो किल मी (clean wound to kill me) कि ऐसा वो बुलेट लगे कि ये व्यक्ति की मृत्यु हो जाये।
पर वो बोलता है कि ये अस्पताल में ये वो लोग हैं जिनकी दोनों प्रार्थनाएं पूरी नहीं हुई, बुलेट मिस नहीं किया पर बुलेट डिड नॉट किल क्लीनली (bullet did not kill cleanly)। तो अभी कोई शक्तिशाली व्यक्ति है उसका हाथ टूट जाता है पैर टूट जाता है वो एक तरह से जिस पर काम करता था पहले वो काम नहीं कर पा रहा है तो वास्तव में उसको साधारण तरह से दुख होने ही वाला है। वो भयावह परिस्थिति है जो बहुत फिट व्यक्ति है एकदम पूरा अनफिट हो गया बेड रिडन (bed ridden) हो गया तो उसको बहुत भय होगा।
तो भय न होना ये मूर्खता है तो जब वो रणभूमि में जाते हैं तो भय तो होता है पर क्या है भय से ज़्यादा महत्वपूर्ण क्या है राष्ट्र का सरंक्षण, राष्ट्र प्रेम जो है। तो प्रेजेंस ऑफ पर्पस बिगर देन फियर (Presence of purpose bigger than fear)। तो मान लीजिये अगर हमारी चेतना है तो हमारी चेतना में भय होगा, अगर हमारी चेतना है तो उसमें भय भी होगा पर भय से बड़ा क्या होगा हमारा उद्देश है तो ये जो है इस तरह से हमारी चेतना है।
वृत्रासुर का असुरों और देवताओं को संदेश
अब आपकी चेतना में अलग चीज़ें हैं। आपकी चेतना में शायद एक क्लास सुन रहे हैं तो आपकी चेतना में समय जा रहा है मुझे दूसरे काम करने हैं मुझे भूख लग रही है मुझे ये करना है वो भी चेतना में है। अब हमारी चेतना में क्या ज्यादा महत्वपूर्ण होगा अगर आपको भूख ज्यादा लग गई है तो फिर जो क्लास सुन रहे हैं वो कम हो जाएगा, ध्यान नहीं रहेगा वो भूख पे ध्यान चला जाएगा।
तो हमारी चेतना में अनेक चीज़ें होती हैं पर कौन सी चीज़ बड़ी है कौन सी चीज़ छोटी है यह अलग-अलग व्यक्ति में अलग-अलग होता है। तो यह जो है जो फियर (fear) है वो सब में होता है पर उससे बड़ा क्या है पर्पस (purpose) है उद्देश है। तो अभी वृत्रासुर क्या कर रहे हैं वृत्रासुर इस तरह से डांट रहे हैं। वो पहले अपने ही असुरों को डांटते हैं फिर बाद में वो देवताओं को डांटते हैं। तो क्या कर रहे हैं वृत्रासुर, is trying to remind them of purpose that will, देवताओं को बोलेंगे तुम क्षत्रिय हो तुम अगर रणभूमि से भाग जाओगे, तो तुम क्या मुँह दिखाओगे? तुम क्या ऐसी बेइज्जती चाहते हो? तुम इस प्रकार से कार्य करके क्या जीवन जीओगे, उसका क्या मतलब है?
शेक्सपीयर (Shakespeare) ने कहा हीरोज डाई वन्स बट अ कॉवर्ड डाइज़ अ थाउजेंड टाइम्स (Heroes die once but a coward dies a thousand times)। कि जो भगवद्गीता में बताया गया है कि संभावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते (Bhagavad Gita 2.34) कि जो व्यक्ति को आदर मिला है उसका अगर अनादर होता है तो अनादर मिलना (मृत्यु से भी बुरा है)। कि कैसे किसी को आदर मिला है कि तुम इतने वीर हो तुम इतने साहसी हो और कायरता का कार्य करता है तो हर बार उसको कायरता की याद आती है। तो एक व्यक्ति को, a coward dies a thousand times, कायर व्यक्ति हजार बार मरता है।
प्रतिस्पर्धी (Rivals) और शत्रु (Enemies) में अंतर
तो इस तरह से वृत्रासुर बता रहे हैं कि तुम युद्ध करो युद्ध में मृत्यु बेहतर है आपको इस तरह से भाग जाने से और जब वो नहीं सुनते हैं तो फिर वो क्या देख रहे हैं? देवता हैं जो वो भाग रहे हैं असुर। उनको पीछे से आक्रमण कर रहे हैं। तुम भी अलग प्रकार के कायर हो। कैसे हैं? कायर क्या है कि दो चीज़ें हैं। एक है राइवल्स (rivals) और दूसरा है एनिमीज (enemies)।
तो राइवल्स मतलब प्रतिस्पर्धी और एनिमीज मतलब शत्रु। अभी इन दोनों में फरक है। कोई बोल सकते हैं इसमें फ़रक क्या है? राइवल्स और एनिमी समान नहीं हैं.
प्रतिस्पर्धी (Rival) और शत्रु (Enemy) में अंतर
अब कैसे एक डिफरेंस (difference) नहीं है? Ya, how many of you feel there is a difference? How many of you feel there is no difference? How many of you feel the difference doesn’t make any difference? जो कहा फरक है, उसमें क्या है सबसे महत्वपूर्ण बात। आप भाषांतर कर रहे हैं और अपने शब्दों का अर्थ चाहिए। जैसे कम्पटीशन (competition) जब होता है, तो उसमें हेल्दी कम्पटीशन (healthy competition) हो सकता है। There is no harm from the other party. There can be a healthy competition and it can be in a very jovial way.
Like you know there is a rival of Shrimati Radharani, Chandravali. Sorry? Rival of Shrimati Radharani is Chandravali. But here enemy means they want to destroy. So destroying nature is not in rival. Yes. Thank you.
जो राइवल (rival) होते हैं, अब आप दोनों राइवल थे। एक्सप्लेनेशन (explanation) देने के लिए, एनिमी (enemy) नहीं हैं आप। तो राइवल मतलब क्या है? They are fighting for some goal. अब दोनों चाहते हैं, राधारानी और चंद्रावली चाहते हैं कि दोनों, वो कृष्ण को और प्रसन्न करें, कृष्ण उनके साथ आ जाएं। दोनों कृष्ण की प्राप्ति का उद्देश्य रखते हैं।
पर एनिमीज़ (enemies) होते हैं, they are fighting, उनका जो गोल (goal) ही है to destroy the other person. कि दूसरा व्यक्ति है उसको मार डालना, उसका विनाश करना। अभी स्पोर्ट्स (sports) होता है, अभी कोई टेनिस मैच (tennis match) है, तो दोनों पार्टीज़ हैं, वो दूसरे को हराना चाहते हैं, वो राइवल्स (rivals) हैं। पर कोई टेनिस मैच में हारने लग गया, तो वो अपनी गन (gun) निकाल के दूसरे को शूट (shoot) नहीं करने वाला है, करना नहीं चाहिए।
खेल भावना और धर्म (Sportsmanship and Dharma)
तो आ गया एक जगह पर, अभी क्रिकेट (cricket) बहुत पॉपुलर (popular) है, पर क्रिकेट में ऐसे भी हॉरिबल (horrible), ट्रैजिक (tragic) चीजें होती हैं। तो एक जगह इंग्लैंड (England) में एक मैच चल रहा था, और एक बैट्समैन (batsman) बैटिंग (batting) करने आ गया, और वो बैट्समैन ने बॉल ऐसे मारा ऊपर, और विकेटकीपर (wicketkeeper) आ गया कैच (catch) लेने को। तो ये बैट्समैन इतना गुस्सा हो गया, कि उसने बैट ले के विकेटकीपर का सिर फोड़ दिया।
फिर उसको, फॉर्च्युनेटली (fortunately) विकेटकीपर सर्वाइव (survive) कर गया, बच गया, पर उसको लाइफ लॉन्ग (life long) बैन (ban) कर दिया, कि तुम कभी नहीं खेल सकते, तुममें स्पोर्ट्स स्पिरिट (sports spirit) है ही नहीं। आपको क्या है, कि आपको आपके परफॉरमेंस (performance) से जीतना है, आपको दूसरे का विनाश करके जीतना नहीं है।
तो यहाँ पे क्या है, जब पिछले प्राचीन समय में, जो वॉर (war) था, युद्ध था, वो एक तरह से स्पोर्ट्स के समान था। स्पोर्ट्स मतलब क्या है, it is a test of strength and skill, किसकी शक्ति अच्छी है, किसकी प्रतिभा अच्छी है। तो जैसे स्पोर्ट्स में कहते हैं, may the better player win, जो अच्छा प्लेयर (player) है, वो जीते, वो भाव होता है।
तो उसी तरह से यहां पे भाव क्या है, कि वृत्रासुर बता रहा है देवताओं को, ये तो भाग रहे हैं, तुम जीत रहे हो, तो तुम जीत रहे हो तभी, जब कोई युद्ध करने के लिए तैयार ही नहीं है, जो मैच में है ही नहीं। क्रिकेट मैच चल रहा है, और एक टीम बोलता है हम हार गए, और दूसरी टीम क्या करती है, बॉलर बॉल लेके बैट्समैन को पीट रहा है, या बैट्समैन बैट लेके बॉलर को पीट रहा है। मैच खत्म हो गया, मैं मैच खेलना ही नहीं चाहता हूँ, मैच खेल नहीं रहा है कोई, तो उसको जाकर पीटते हैं, तो वो क्रिकेट के धर्मों के खिलाफ है।
अब या क्रिकेट के धर्मों मतलब क्या, the rules that bring harmony, जिस तरह से हमें कार्य करना है, वो उचित कार्य अगर नहीं कर रहे हैं, तो फिर वो अधार्मिक है। तो एक तरह से असुर अधर्म कर रहे हैं, वो भाग रहे हैं, पर जो भाग रहे हैं, उन पे आक्रमण करना, यह भी अधर्म है।
उकसाने के लिए तीक्ष्ण शब्दों का प्रयोग
और वहाँ अभी वृत्रासुर देवताओं को बता रहे हैं, और यहां पे वह बड़े तीक्ष्ण शब्दों का इस्तेमाल कर रहे हैं। अब यह तीक्ष्ण शब्दों का इस्तेमाल क्यों ज़रूरी है, क्योंकि वो एक तरह से शब्दों के द्वारा उकसा कर व्यक्ति को लड़ने के लिए प्रेरित करते हैं। कभी खुद की शक्ति को बढ़ा चढ़ा के बोलना और दूसरों का अपमान करना, यह एक तरह से उसमें स्वाभाविक है।
अभी कुछ-कुछ स्पोर्ट्स हैं, अलग-अलग प्रकार के स्पोर्ट्स होते हैं, कुछ-कुछ स्पोर्ट्स में स्लेजिंग (sledging) होता है। मतलब स्लेजिंग मतलब क्या है, कि अगर बैट्समैन बैटिंग कर रहा है, तो विकेटकीपर पीछे से आके उसके परिवार के बारे में कुछ बुरा बोलेगा, उसको उकसाने का प्रयास करेगा।
तो अभी कुछ-कुछ गेम्स (games) का ऐसे होता है, उसमें स्लेजिंग चलता है, पर कुछ-कुछ गेम्स हैं, उसमें बिल्कुल नहीं चलता है। एक शब्द अगर आप चेस (chess) प्ले (play) कर रहे हैं, चेस खेल रहा है कोई, और उसमें एक प्लेयर दूसरे प्लेयर को स्लेज करने लगे, तो उसको तुरंत बैन कर देंगे।
तो क्या है, यहाँ पे जो वृत्रासुर जो है, वह एक तरह से, क्षत्रिय जो है, वॉर (war) जो है, फाइटिंग (fighting) जो है, ये स्पोर्ट है उसमें जोखिम है, मृत्यु भी हो सकती है। पर क्षत्रिय लोग जानते हैं कि हम आत्मा हैं, तो मृत्यु जोखिम है, मुझे आत्मा के रूप में स्वीकार हो रहा है। तो वहाँ पे तीक्ष्ण शब्द बोलके, वो उनको रोकने का प्रयास कर रहा है, पर वहाँ पर वो रुक नहीं रहे हैं।
तो उसके बाद में क्या होगा? असुरों को रोकने का प्रयास करता है वृत्रासुर, यश नहीं मिलता है। फिर देवताओं को रोकने का प्रयास करता है, उसमें भी यश नहीं मिलता है। तो फिर वृत्रासुर उनको रोकने का प्रयास करता है… प्रभुपाद जी ऐसे करते हैं, जब वो देखते हैं कि अभी गुरु महाराज का जो मिशन (mission) है, और उनकी तो इच्छा होती है कि वो अपने गुरु महाराज के मिशन में ही प्रचार करें।
अकेले सेवा करने का दृढ़ संकल्प
जब प्रभुपाद जी अमेरिका गए तो एक तरह से ऐसे नहीं था कि प्रभुपाद जी इस्कॉन (ISKCON) नाम की कोई नई संस्था चालू करने गए। प्रभुपाद जी गौड़ीय मठ के सदस्य थे और प्रभुपाद जी गौड़ीय मठ का ही प्रचार करना चाहते थे। प्रभुपाद जी अमेरिका में गए तो प्रभुपाद जी गौड़ीय मठ के सदस्य थे उनका वही भाव था। पर क्या हुआ, गौड़ीय मठ से उनको कोई सहयोग नहीं मिला, कोई सपोर्ट (support) नहीं मिला और एक तरह से विरोध मिलने लगा उनको। तो फिर प्रभुपाद जी ने बोला कि मुझे खुद ही अकेले करना है।
तो अभी हम कई बार कहते हैं कि हमें भक्तों का संग ज़रूरी है। हाँ बहुत ज़रूरी है, बहुत ज़रूरी है, भक्तों के संग के बिना हम कार्य नहीं कर सकते हैं। पर कभी-कभी ऐसे होता है कि भक्तों के संग में भी कभी-कभी हम अकेले पड़ जाएंगे। क्योंकि ऐसे होता है कि भक्त भी हमें शायद समझ नहीं पाएंगे कि अभी ऐसे होता है, तो हमें अपने साथ आत्मनिरीक्षण करना चाहिए। क्या मैं गलत हूँ क्या?
अगर बहुत से भक्त बोल रहे हैं कि मुझे समझ नहीं पा रहे हैं, तो अधिक संभावना ये है कि मैं कुछ गलत कर रहा हूँ। तो हमें थोड़ा नम्रता से जांच करनी चाहिए, अगर हम जो कार्य कर रहे हैं वो एक पद सही है, भगवान की सेवा करना चाहते हैं, तो हमें हमारी सेवा करते रहने के लिए तत्पर रहना चाहिए।
कैसे है कि यहां पे हमारे साथ कोई है नहीं। तो वो एक प्रकार का अकेलापन होता है। पर उससे बड़ा अकेलापन क्या होता है that he is surrounded by people who don’t understand us. कि ऐसे लोग हैं हमारे चारों ओर हैं, जो हमें समझ ही नहीं रहे। हम क्या कर रहे, क्या करना चाहते, वो समझ ही नहीं रहे हैं।
शिकायत न करें, अपना कार्य करते रहें
तो उस समय क्या करना है? उस समय साधारण भाव हो जाता है कि उनको कोसने लगते हैं कि तुम समझते क्यों नहीं मुझे? मैं तो अच्छा कार्य करना चाहता हूँ, तुम समझते नहीं हो। एक संभावना होती है कि उस समय जब हम अकेले पड़ जाते हैं, तो हम दूसरों का बुरा भला करने लगते हैं, कि तुम मुझे अकेला क्यों छोड़ रहे हो, तुम मुझे क्यों नहीं समझते, तुम मेरा सपोर्ट क्यों नहीं कर रहे हो?
पर वृत्रासुर ऐसे नहीं करते हैं, प्रभुपाद जी भी ऐसे नहीं करते हैं। प्रभुपाद जी क्या करते हैं, खुद अपनी सेवा करते रहते हैं। वृत्रासुर खुद युद्ध करते रहते हैं। तो प्रभुपाद जी अमेरिका अकेले जाते हैं, प्रभुपाद जी अमेरिका में होते हैं, तो भी ऐसे नहीं कि सारे अपने शिष्यों को लेटर (letter) लिख रहे हैं, कि गुरुभाई कितने खराब हैं, कितने खराब हैं। नहीं, अगर हमें दूसरे भक्तों से, हमारे दूसरे आजूबाजू के लोग हैं, परिवार वाले हैं, भक्त हैं, उनसे सहयोग नहीं मिल रहा है, वो हमें समझ नहीं पा रहे हैं, तो ऐसे नहीं, अगर हम अच्छी सेवा करना चाहते हैं, तो उनको कोसना नहीं है।
हम अपना कार्य करते रहें, हम पहले समझाने का प्रयास कर सकते हैं, जैसे वृत्रासुर ने किया, पर नहीं समझे, तो खुद अपनी सेवा करते रहें। तो जब, when we focus on our purpose, प्रभुपाद जी अपनी सेवा करते रहे, तो पहले तो बहुत समस्या हुई। 1965-1966 एक साल जो था, वो प्रभुपाद जी अपनी सेवा करते थे, कि कितनी बार सोचा, कि मैं शायद बाहर चला जाना चाहिए वापस।
प्रभुपाद जी का दो महीने का पीरियड (period) था। जैसे आप किसी देश में जाते हैं, तो आपको कुछ समय के लिए वीज़ा (visa) मिलता है। तो प्रभुपाद जी को दो महीने का वीज़ा मिला था अमेरिका जाने के लिए। तो दो महीने के बाद प्रभुपाद जी को वापस जाना था। तो हर बार प्रभुपाद जी जब वीज़ा ऑफिस (office) में जाते थे, एक्सटेंशन (extension) लेने के लिए, प्रभुपाद जी ये नहीं चाहते थे कि एक्सटेंशन लेना है या नहीं, क्योंकि एक्सटेंशन वीज़ा को बढ़ाना इतना आसान भी नहीं था। तो उनको रिक्वेस्ट (request) करना पड़ता था, कि ये करना है, वो करना है, अलग-अलग फॉर्म (form) भरने पड़ते थे। तो प्रभुपाद जी सोचते थे कि एक्सटेंशन करना है या नहीं।
समय सबकुछ प्रकट करता है (Time Will Reveal)
प्रभुपाद जी अमेरिका से शिष्यों को लेकर आए पहली बार, फिर 1970 में बड़े बस भरके, कहीं 3-4 बस भरके, भक्त जो हैं, वृंदावन लेकर आए, दिल्ली से। और तभी तो एक सेंसेशन (sensation) हो गया वृंदावन में। और उसके बाद में, अभी, कि पाश्चात्य लोग भी भक्त बन सकते हैं, सारे विश्व भर में प्रचार हो सकता है।
अभी यह जो है, इसका जो प्रभुपाद जी ने, आत्मविश्वास, बहुत सारे जो गौड़ीय मठ के लोगों ने उनको दे दिया है। अभी पाश्चात्य लोगों में इस्कॉन प्रचार कर रहा है, बहुत सारे गौड़ीय मठ भी प्रचार कर रहे हैं। और क्या है कि, प्रभुपाद जी अपना धर्म करते रहे हैं। दूसरों की निंदा नहीं करेंगे उन्होंने, दूसरों को समझाने का प्रयास किया, नहीं समझे, तो अपना धर्म करते रहे।
तो उसी तरह से, जब हम कुछ सेवा कर रहे हैं, समझ में नहीं आ रही है दूसरों को, समझाने का प्रयास कर सकते हैं। पर अगर वह नहीं समझ रहे हैं, तो उनको बुरा भला नहीं कहना है, हम क्या करें? अपनी सेवा करते रहें, अपनी सेवा करते रहें। तो टाइम विल रिवील (time will reveal), जो समय है, वो बदलता है।
अकेलेपन में भगवान की स्मृति
वृत्रासुर को केवल असुर का शरीर नहीं मिला था, वो तो मिला ही था, पर उसके साथ जो भक्ति की स्मृति थी, वो चली गई थी। इसलिए वो एक तरह असुर के समान कार्य कर रहा था। पर जब वृत्रासुर ने इंद्र के हाथ में जो विष्णु की योजना से बनाया हुआ शस्त्र देखा, तो जब विष्णु याद आये, तो वहाँ देखकर, मृत्यु सामने देखकर, विष्णु का अस्त्र सामने देखकर, अचानक विष्णु की स्मृति एकाएक आ गई। और फिर अगले अध्याय में देखा, कैसे वो, तो हमें, अकेले भी क्यों न हों, हमें हमारी सेवा करते रहना चाहिए।
भक्ति: मोमबत्ती की ज्योति और दावाग्नि (Forest Fire)
तो एक उदाहरण के साथ मैं इसको अंत करूँगा। कैसे है, कि जो एसोसिएशन (association), जो संग है, और जो डिवोशन (devotion), जो भक्ति है, इनमें क्या संबंध है। एक डिवोशन, इज लाइक अ फ्लेम (is like a flame), फ्लेम मतलब, वो ज्योति है, कैंडल (candle) की ज्योति है। अब छोटा सा, अगर कैंडल होगा, छोटे से, अगर उसमें, कोई हवा आ जाएगी, तो क्या होगा, हवा से वो बुझ जाएगी।
तो तभी क्या है, तो जो एसोसिएशन क्या होगा, एनवायरनमेंट (environment) है। तो तभी क्या होगा, अगर हम एक छोटी ज्योति हैं, तो हमें हवा से दूर रखना है, कोई हवा आ जाएगी, तो सुरक्षित करना है। पर अगर वही डिवोशन, अगर मान लीजिए जो विंड (wind) है, यहाँ पर एसोसिएशन, मैं उल्टा एसोसिएशन बोल रहा हूँ, बैड एसोसिएशन (bad association), मतलब हमको अच्छा संग नहीं मिल रहा है। मतलब हमें प्रोत्साहन नहीं मिल रहा है, हमें, हम जो भक्ति करने का प्रयास कर रहे हैं, उसमें कोई उत्साह नहीं, कोई मार्गदर्शन नहीं दे रहा है।
तभी क्या होगा, अगर संग नहीं होगा, तो वो जो पहले पहले भक्ति में आ रहे, संग नहीं है, तो क्या होगा, हमारी भक्ति बुझ जाएगी। पर जब अगर हम सेवा करते रहे, कई सालों तक सेवा कर रहे, दृढ़ संकल्प बढ़ गया है, तो हमारी जो भक्ति है, वो दावाग्नि के समान होती है, फॉरेस्ट फायर (forest fire)। और जब विंड आता है, जब दावाग्नि है, उसमें हवा आती है, तो क्या होता है, वो दावाग्नि और बढ़ जाती है।
तो जो महान भक्त होते हैं, जो बड़े धर्मनिष्ठ होते हैं, जो भक्ति में दृढ़ संकल्प होता है, जब उनको सपोर्ट नहीं मिलता है, उनको सहयोग नहीं मिलता है, तो उनकी भक्ति बुझ नहीं जाती है। क्या होता है, उनकी भक्ति और बढ़ जाती है। कि अभी मुझे कोई मदद नहीं कर रहा है, तो ये मेरी जिम्मेदारी है, मुझे करना है। तो जब ऐसा भाव होता है, तो क्या होता है, हमारा, जो भगवान से संबंध है, वो और पर्सनल (personal) बन जाता है।
ऐसे नहीं कि हम दूसरे भक्तों से इम्पर्सनल (impersonal) हो रहे हैं, दूसरे भक्तों को महत्व नहीं दे रहे हैं, ऐसे नहीं है। पर यह सेवा, यह मेरी ऑफरिंग (offering) है भगवान के लिए, और मैं यह करने का पूरा प्रयास करूंगा। इस तरह से जब हम कार्य करेंगे, तो न केवल हमारी भक्ति में वृद्धि होगी, पर धीरे-धीरे, दूसरे लोग भी देखेंगे, दूसरे भक्त भी देखेंगे।
नहीं, हमें नम्रता रखनी है, और हमें पता नहीं हमारी भक्ति कैसी है, शायद हमारी भक्ति एक मोम की ज्योति के समान है, भक्तों का संग नहीं होगा, भक्तों का सपोर्ट नहीं होगा, तो बुझ जाएंगे। तो हमें नम्रता रखनी है, पर नम्रता के साथ-साथ दृढ़ संकल्प भी रखना है। दृढ़ संकल्प से जब हम सेवा करते रहेंगे, तो फिर क्या होगा, तो हमारा भगवान से संबंध बढ़ेगा।
तो डिटरमिंड डिवोशन (Determined devotion), जब हम भक्ति के साथ, दृढ़ संकल्प के साथ, जब हम सेवा करते रहेंगे, तो एक तरह से डिवोशन बढ़ जाएगा, हमारी भक्ति बढ़ेगी, हमारा व्यक्तिगत संबंध भगवान से बढ़ेगा। और उसके साथ-साथ दूसरी चीज़ भी क्या होगी, कि हमारा एसोसिएशन जो है, संग है, उसमें भी हमको एप्रिसिएशन (appreciation) मिलेगा। जो कोई देखते हैं, कि अच्छा, आप सेवा करते जा रहे हो, काफी समय से सेवा कर रहे हो, तो जो भी वक्त कुछ गलतफहमी है, या अलग उनकी संकल्पना है, वो संकल्पना चली जाएगी।
सारांश: दृढ़ संकल्प के साथ आगे बढ़ें
तो हमें कभी भी कुछ भी हो जाए, भगवान की सेवा नहीं छोड़नी है, पलायनपरायण नहीं बनना है हमें। हमारी जो सेवा है, वह विद और विदाउट सपोर्ट (with or without support), हमें करते रहना है, पर ऐसे कार्य नहीं करना है, कि लोग हमसे नाराज़ हो जाएंगे। पर ऐसे हो जाता है, प्रभुपाद जी के जीवन में हुआ, कई प्रभुपाद जी के शिष्यों के जीवन में हुआ, और दृढ़ संकल्प से सेवा करते रहे, और फिर जो है, भगवान ने उनको दिखा दिया, भगवान ने उनकी प्रामाणिकता, भगवान ने उनकी भक्ति और बढ़ा दी, और फिर दुनिया में, इतने सारे भक्तों ने महान सेवा करके उसका प्रतीक जो है, वो प्रकट किया हुआ है।
सारांश में, आज मैं चर्चा की किस तरह से, टॉपिक था कि, जब हम अकेले पड़ जाते हैं, तो हमें क्या करना है? ऐसा कार्य जो हमें हारमनी (harmony) में रखता है। हारमनी क्या करता है। तो वृत्रासुर जो है, असुर लोगों का (धर्म), उससे धर्म के लिए है। क्या है, शराबी लोग भी होते हैं तो ऐसे नहीं कि ये सब शराबी लोग शराब पीके गाड़ी चलाएं, उनकी भी धर्म की कुछ संकल्पना होती है।
तो हमने देखा कैसे असुर भी हैं, पर अगर आप असुर भी हो पर आप युद्ध करते हो तो कायरता से भागो मत आप। आप क्या है कि आप साहस रखो और फिर उसके संबंध में देखा कि कैसे है फियर मैनेजमेंट (fear management) जो है कैसे है। कि अगर मृत्यु भय को, भय से सामना करना है तो उसमें टू मच (too much) नहीं चाहिए, उससे हम भयभीत हो जाएंगे पर टू लिटल (too little) भी नहीं चाहिए हमको, बहुत कम हो गए तो क्या होगा हम लापरवाह हो जाएंगे।
तो उससे क्या करना चाहिए, उसके बीच में आने के लिए पर्पस बिगर देन फियर (purpose bigger than fear) कि जो मुझे, मैं यहाँ पर क्यों आया हूँ वह देखना है। तो तुम भाग जाओगे इस तरह से, अब यह पर्पस जो था बिगर देन फियर था। तो फिर संबंध में देखा कि कैसे वॉर वॉज़ लाइक स्पोर्ट्स (war was like sports) कि मतलब क्या है, स्पोर्ट्स में दूसरों को, जो लोग अल्टीमेटली युद्ध कर रहे हैं वो जो हैं आइडियली, आइडियली मतलब किसी भी तरह शत्रु हैं तो क्या किसी भी तरह उसका, दूसरों का विनाश करते हैं?
जैसे क्रिकेट में ऐसे नहीं है कि बैट्समैन को नॉट आउट रहना है इसलिए जो फील्डर कैच कर रहा है उसका सिर फोड़ रहे हैं। तो उसी तरह से जो भाग रहे हैं उन पे पीछे से आक्रमण करना मतलब क्या है ये वॉरियर स्पिरिट (warrior spirit) नहीं है। तो वो पहले असुरों को धर्म की याद दिलाते हैं फिर वो देवताओं को धर्म की याद दिलाते हैं।
तो पर वो भी नहीं सुनते फिर आखिरी पॉइंट मैंने कहा, He fights alone. तो डिटरमिनेशन (determination) का मतलब क्या है कि रेडी टू डू इट अलोन (ready to do it alone)। इससे ज़रूरी नहीं है कि मुझे अकेला ही करना है और ऐसे नहीं है कि हम दूसरे लोगों को जान बूझ के उनको नाराज़ कर दें और फिर हमको खुद अकेला करना पड़े। पर कभी-कभी ऐसे होता है कि दूसरे लोग हमें समझ नहीं पाते, सहयोग नहीं देते हैं तो दृढ़ संकल्प मतलब हमें खुद अकेले करने के लिए तैयार होना चाहिए।
माता जी, कोई सवाल है? आस-पास में हम देख रहे हैं कि काफी अधर्म हो रहा है, काफी गलत चीजें हो रही हैं, हमारा व्यक्तिगत धर्म क्या है? (प्रश्नकर्ता का प्रश्न)
जहाँ हैं, वहीं से शुरुआत करें (Light your corner of the world)
कि जब हमारे हृदय में भगवान की सेवा करने की इच्छा जागेगी। तो, भगवान की सेवा करना मतलब क्या है? दुनिया का अंधकार भले नहीं हम मिटा सकें, पर हमारे दुनिया के छोटे से कोने में थोड़ी सी रौशनी ला सकते हैं। और हमारी क्षमता के अनुसार जो रौशनी लाना, वह हमारी जिम्मेदारी है। हमारा धर्म क्या है? To light our corner of the world. हमारे दुनिया के कोने में जहाँ पर जो हम चल रहे हैं, वो थोड़ी सी रौशनी और ला रहे हैं।
हम क्या सोचते हैं हमेशा, अगर मुझे धर्म करना है, तो मुझे, अभी इतना सारा अधर्म है, धर्म प्रस्थापना करनी है, तो हम क्या करते हैं, हम प्रस्थापना करते हैं, कि मुझे और बड़ी भूमिका मिलनी चाहिए। तो, अगर मेरे पास और पैसा आ जाएगा, मेरे पास और अनुयायी आ जाएंगे, मेरे पास और सामग्री आ जाएगी, तो फिर उससे मैं और धर्म की प्रस्थापना कर सकता हूँ। वो हो सकता है, भले ये होगा कि नहीं होय, तो प्रस्थापना करने के लिए, हमारे पास जो अभी की भूमिका है, मैं उसको, अभी कैसे और जो मेरी अभी की सेवा है, मेरी अभी की जो (सेवा) कर रहा हूँ, क्या मैं थोड़ा और अच्छा कर सकता हूँ? जरूर कर सकता हूँ।
जब हम चाहते हैं कि मुझे और बड़ी भूमिका मिल जाए, तो इससे क्या होता है? इससे एक तरह से, हम करते हैं कि मुझे बड़ी भूमिका चाहिए, मुझे और बड़ी भूमिका नहीं मिलेगी (तो) मैं क्या कर सकता हूँ? पर प्रभुपाद जी ये नहीं सोच रहे थे, कि मुझे, किसी गौड़ीय भाई, उनके एक मठ का, मठाधिपति बना दें, ताकि फिर मैं मठ को लीड (lead) करूँगा, और मैं वहाँ प्रचार करूँगा, नहीं! अगर नहीं हुआ, मैं क्या कर रहा हूँ, मैं प्रचार कर रहा था पहले, मैं प्रचार करते रहूँगा। और इसलिए मैं करने का प्रयास करूँगा, मैं जाकर प्रचार करूँगा।
तो हमारा जो परिस्थिति में है, जो हमारी भूमिका है, हमारी भूमिका परिवार में हो सकती है, हमारे भक्त समुदाय में हो सकती है, हमारी प्रचार की सेवा हो सकती है, जो हमारी सेवा है उसे अच्छी तरह से करने का प्रयास करें। और अच्छी तरह से, और अगर भगवान देख रहे हैं, और फिर क्या होगा, अभी हमारे जो अच्छी सेवा और करो, और भगवान गुरु जो हैं, तो हमारे एक भगवान देखेंगे, उनको देकर भविष्य में देखेंगे, पर अभी मैं उसके साथ भगवान (की सेवा) करता हूँ।
तो हम अभी कुछ नहीं करेंगे, और भविष्य में (भी) कुछ नहीं कर पाएंगे। तो सेवा भाव मतलब क्या है, कि जो भूमिका मुझे मिली है वह उसको स्वीकार करे और उसको जितना अच्छा कर सकते हैं उतना अच्छा करें। कि ये है सर्विस एटीट्यूड (service attitude)।
तो प्रभुपाद जी के पास कोई नहीं था, तो वो अकेले प्रचार कर रहे थे। कोई नहीं था तो खुद भगवद्दर्शन (Back to Godhead) पत्रिका वितरण करने का प्रयास करते थे। जब उनके शिष्य, अनुयायी आ गए, तो उनके द्वारा वो वितरण कर रहे थे। उनके द्वारा वो प्रचार करने गए। तो कृष्ण विल गिव इट (Krishna will give it), वो लेटर। तो वही भगवान हमारे साथ भी कर सकते हैं।
बहुत बहुत धन्यवाद।
ग्रंथराज श्रीमद्भागवतम की जय!
श्रील प्रभुपाद की जय!
हरे कृष्णा हरे कृष्णा।