Does God Exist Re-Answering the Questions In Hindi Chaitanya Charan
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हरे कृष्णा नमस्ते एंड वेलकम टू एवरीवन। सो मेरा नाम रमेश दवे है। मैं एक चार्टर्ड अकाउंटेंट हूं और यहां अबू धाबी यूएई में बेस्ट हूं। एक मल्टीीनेशनल बैंक में कार्यरत हूं। और आज हमारा बड़ा सौभाग्य है कि हमारे साथ इस पडकास्ट में इस ग्रे चैतन्य चरण प्रभु है। चैतन्य चरण प्रभु एक मंथ लाइफ कोच ट्रेवलिंग टीचर और ऑथर है और एक बड़े ही महत्वपूर्ण विषय पर आज हम चर्चा करने वाले हैं। जो बहुत ही डिबेट जिस पर चल रहा है और जहां पर हमारे जावेद अखर जी वो इस डिबेट में शामिल है और इस डिबेट का शीर्षक है डस गड एक्सिस्ट क्या भगवान का अस्तित्व है और इसमें बहुत ही अलग-अलग विषयों को उभारा गया है और इस पर बहुत सारे लोगों के प्रश्न है जिसका वो समाधान चाहते हैं। हमारे भी कई मित्र हैं जिन्होंने इस प्रश्न को पूछा है। तो हमने सोचा कि चैतन्य चरण प्रभु यहां पर विजिट कर रहे हैं। तो ये बहुत ही अच्छा सुनार अवसर हमारे पास में कि हम इनसे कुछ क्लेरिफिकेशन मांगे। सो स्वागत है प्रभु जी और आपकी परमिशन से मैं कुछ प्रश्न पूछना चाहता हूं। जैसे ये मुद्दा जो अभी चल रहा है कि क्या भगवान का अस्तित्व है या नहीं? तो इसमें सबसे महत्वपूर्ण बात यू नो बहुत सारे लोग जो पूछ रहे हैं और कुछ लोग जो इस इस बात की चर्चा कर रहे है वो कह रहे हैं कि क्या ईश्वर का अस्तित्व है? या ईश्वर जो है केवल एक कल्पना है और वो भी लगातार बदलती हुई क्योंकि अलग-अलग अवधारणाएं होती है ईश्वर के बारे में। और अलग-अलग लोग ईश्वर के बारे में अलग रूपों से सोचते हैं और मानते हैं कि केवल ये एक सोच है या एक कल्पना है या एक हकीकत है।
तो ये इस गॉड इवॉल्विंग मिथ ये जो सवाल है
जी
इसमें एक फंडामेंटल कैटेगरी कन्फ्यूजन है कि अगर कोई पहाड़ पे चढ़ने का प्रयास कर रहा है।
जी
और कुछ लोग पहुंच चुके हैं। बहुत लोग नहीं पहुंचे हैं।
जब वो जहां तक गए उसके आधार पर उन्होंने एक उसका नकाशा बनाया तो अभी नकाशा बदलते रहेगा।
हम
अभी काशा बदल रहा है। इससे सब साबित नहीं होता कि पहाड़ है ही नहीं।
तो जो भगवान है
जो अलग लोगों ने समझने का प्रयास किया है। समझा उसके अनुसार कुछ बताया उन्होंने
तो ये कह सकते हैं कि ये जो अलग-अलग कंसेप्शनंस है वो इवॉल्व हो रहे हैं। बट क्वेश्चन फंडामेंटली आता है कि नॉर्मल कंसेप्शन बदल रहे हैं।
विज्ञान में भी कंसेप्शन बदलते रहते हैं।
जी
बट द पॉइंट इज व्हाई आर द कंसेप्शन प्रेजेंट कि इतिहास गो टू हिस्ट्री और जग्राफी पूरे विश्व में इतिहास में
हर संस्कृति में मतलब किसी परम सत्य की कुछ संकल्पना लोगों ने करने का प्रयास किया है।
जी
सो से कर रहे हैं।
सो इज देयर समथिंग इन द ह्यूमन आर्ट
एंड द कोर ऑफ़ द ह्यूमन बीइंग दैट वांट्स टू एक्सप्लोर इस देयर सम अल्टीमेट रियलिटी। सो द वेरी यूनिवर्सिटी रादर देन द चेंजिंग ऑफ़ द कंसेप्शन द वेरी वाइड स्पिरिट ऑलमोस्ट यूनिवर्सल नेचर द कंसेप्शन। दैट इज अ क्वेश्चन मे बी देयर इज सम रियलिटी ओवर हियर दैट इज वर्क एक्सप्लोरिंग परफेक्ट परफेक्ट थैंक यू जी सो जैसे जब ये रियलिटी की हम बात करते हैं एंड व्हेन यू आर सेइंग दैट देयर इज़ सर्टेनली सम रियलिटी यू नो व्हिच इज़ देयर सो इज इट जस्ट बेस्ड ऑन सम फेथ ऑफ़ द पीपल और इट्स जस्ट लाइक बिलीव सो देयर इज़ ऑबवियसली डिफरेंस बिटवीन फेथ एंड बिलीफ एंड सम पीपल दे थिंक दैट यू नो डू यू इवन हैव एविडेंस फॉर दैट तो इसके लिए प्रमाण है की आप केवल आस्था रखे हो ईश्वर में और उसके लिए कोई प्रमाण नहीं है।
तो कैसे है कि एविडेंस जो होता है वो अलग-अलग चीजों के लिए अलग-अलग प्रकार के एविडेंस होते हैं।
ओके?
अगर मैं कहता हूं ये ग्लास भरा हुआ है
तो मैं इसको हाथ लगा के देख सकता हूं यहां पानी है कि नहीं मिल के देख सकता हूं।
जी
तो कुछ फिजिकल ऑब्जेक्ट्स है वो कम देख छू सकते हैं।
छू सकते हैं। टच कर सकते हैं। सेंस एक्सपीरियंस कर सकती है। पर अगर मैं आपको पूछूं क्या आपकी मां आपसे प्रेम करती है?
जी।
तो फिर उसके लिए क्या बोलोगे आप? फिजिकल एविडेंस दे सकते हैं। पर कोई और व्यक्ति है जो कार्य आपकी मां करती है।
वो कोई अगर व्यक्ति भी उसको पैसे देके वो करेगा तो वो भी कर सकता है
कुछ हद तक तो पर क्या है जो सेटल है प्रेजेंस ऑफ़ लव जो है उसके लिए फिजिकल एविडेंसेस होते हैं बट देयर आर मल्टीपल कन्वर्जिंग लाइंस मेरी मां ने ऐसे किया था मेरे लिए जब बचा था इस समय ये किया था इस समय ये किया था तो उससे हम एक इनफेंस निकालते है
वो जो एविडेंस है वो इससे हम पे थोड़ा सा हो जाता है तो जो गॉड है वो एक नॉन फिजिकल नॉन मटेरियल रियलिटी है या ये तत्वज्ञान जो है गॉड की जो डेफिनेशन है उसमें ही आता है। तो गॉड इस नॉट लाइक एन अनडिस्कवर्ड सेटेलाइट अराउंड जुपिटर। जुपिटर कोई सेटेलाइट है जिसको अभी हम ढूंढना नहीं है। बहुत टेक्नोलॉजी बैठ जाएगा तो हम ढूंढ लेंगे। ऐसे नहीं है।
गॉड इज अ स्पिरिचुअल कॉन्सप्ट
स्पिरिचुअल।
तो स्पिरिचुअल रियलिटी जो है स्पिरिचुअल स्पिरिचुअल रियलिटी जो हम कह सकते हैं उसको तो वो जो है उन उसका एविडेंस क्या होगा? उसको अगर एविडेंस चाहिए तो उसका एविडेंस जो होगा वो इनडायरेक्ट होगा।
जी।
तो इनडायरेक्ट इनडायरेक्ट एविडेंस होता है वो फोर डायरेक्शन में आता है। तो सबसे पहला डायरेक्शन ये है कि द प्रेजेंस ऑफ एक्सिस्टेंस इटसेल्फ कि व्हाई इज देयर समथिंग इंस्टेड ऑफ़ नथिंग
जी।
तो अगर हमारा सारे विश्व का विश्व का अस्तित्व है
जी।
तो अभी ये कहां से आया? तो अभी कोई कह सकता है कि ये अपने आप है।
ठीक है? कह सकते हैं पर हम देखेंगे तो मैटर जो है जो मटेरियल चीज़ होती है अगर कोई किसी घर में कोई वीट फ्लावर है।
जी
तो वीट फ्लावर से अपने आप चपाती नहीं बनती है।
बिल्कुल
वो जो कोई बनाने वाला लगता है।
तो मैटर डस नॉट स्टार्ट ऑर्गेनाइजिंग इटसेल्फ ऑन इट इट इज़ इनर्ट
इनर्ट है। मैटर को ऑर्गेनाइज करने के लिए कोई ऑर्गेनाइजिंग प्रिंसिपल कोई ऑ्गेनाइजिंग एजेंट लगता है।
जो ओरिजिन है इट हैज़ टू स्टार्ट फ्रॉम समवेयर। तो अगर000 के मारते है उसको कुछ तो भी एक फाउंडेशन एक बिल्डिंग होना चाहिए।
जी
तो तो वो जो है एक ओरिजिन की दृष्टि से जाते हैं तो वो एक आर्गुममेंट है की एवरीथिंग है टू बिगिन समवेयर बिगिनिंग इज गॉन ये ओरिजिन का दूसरा आर्गुमेंट है मोरालिटी का आर्गुमेंट है
मोरालिटी का क्या आर्गुमेंट है ये मोरल आर्गुमेंट फॉर गॉड कि जब हम देखते हैं सारे जानवर जो जीते हैं वो केवल क्या करते हैं और सर्वाइवल एंड रिप्रोडक्शन
वो चीज़ करते हैं पर जो मानव और सर्वाइवल रिप्रोडक्शन में रूल क्या होता है सर्वाइवल ऑफ़ द फिटेस्ट
जिसके हाथ में लाठी उसकी वजह जिसे हम कहते हैं कुछ जीवन का नियम होता है।
जी
पर जो मानव में होता है हम हम भी सर्वाइवल चाहते हैं। पर सर्वाइवल के अलावा हम मोरालिटी देखते हैं।
ये सही है कि गलत है।
कोई अगर अग्नि में जल रहा है फायर फाइटर जो होते है उसमें अपनी जान जोखिम में आके उसको बचाते हैं।
यहां पे मान लो अपने सर्वाइवल ऑफ़ द फिटेस्ट नहीं है। सैक्रिफाइस फिटेस्ट है।
तो हम में जो राइट और रोंग है ये एक ये एक डीप सेंस है। अलग-अलग लोगों की संकल्पना हो सकती है कि क्या राइट है क्या रोंग है। उसमें थोड़ा रिलेटिविटी हो सकता है बट देयर इज समथिंग राइट एंड समथिंग रोंग और वो जो है वो केवल एक फंक्शनल सर्वाइवल दृष्टि से नहीं है।
वो एक नैतिक दृष्टि से है।
ये जो प्रेजेंस है हम में दैट वो कहां से आया है? वो हमारी बायोलॉजी से बायोलॉजी को मोरालिटी से कुछ लेना नहीं है। वो कहां से आया है? वो दैट इसका एक एक्सप्लेनेशन ये है कि देयर इज अ हाई रियलिटी
फ्रॉम वेयर कम्स द सेंस ऑफ़ राइट एंड रोंग।
एंड हमारे अंदर वो प्लेस किया गया द मोरल आर्गुमेंट द थर्ड आर्गुममेंट व्हिच आई फाइंड द मोस्ट कन्वेंसिंग इज द आर्गुममेंट फ्रॉम
आर्गुममेंट फ्रॉम मीनिंग का मतलब क्या है कि अभी जितना विज्ञान ने विकास किया है विज्ञान ने क्या किया है ढूंढा है कि जो ब्रह्मांड है वो एक अर्थपूर्ण पद्धति से चल रहा है ऑर्डरली पद्धति से चल रहा है
तो अगर हम देखते हैं कि जो वैज्ञान है बेसिक लेवल में हम कह सकते हैं सुबह सन डे राइट सनराइज़ द सनसेट होता है मोर सोफेस्टिकेट लेवल जो है न्यूटन ग्रेविट रूल निकालेंगे मैथमेटिक्स का रूल है
जो अभी उसमें रूट स्क्वायर आता है फिर इमेजिन नंबर आता है तो अभी क्या है एक तरह से जो यूनिवर्स है इट वर्क्स अकॉर्डिंग टू मैथमेटिकल नॉट ओनली वर्क्स अबाउट ऑर्डर बट मैथमेटिकल नोट्स और जो हमारा मन है वो मैथमेटिक्स को सोच पाता है। जानवर मैथमेटिक्स सोच नहीं पाते हैं।
बिलकुल।
तो और मैथमेटिक्स से हम कुछ कांसेप्ट्स कंसीडर करते हैं। कैलकुलस है, इमेजिनरी नंबर है। तो अभी ये हम कह सकते हैं ये केवल हमारे मन के कांसेप्ट्स है। इमेजिन नंबर
पर जो हमारा मन का एक मेंटल कंस्ट्रक्ट है, मेंटल कांसेप्ट जो है मन ने बनाया हुआ वो हाउ इज इट एबल टू डिस्क्राइब हाउ नेचर वर्क्स?
तो इसका क्या है? एक लॉजिक बेसिक एक्सप्रेशन क्या? द देयर इज़ नेचर इज़ ऑर्गेनाइज्ड अकॉर्डिंग टू सम प्रिंसिपल
एंड दैट सेम प्रिंसिपल हैज़ ऑर्गेनाइज आवर माइंड।
बिल्कुल।
तो हम किसी आइलैंड में भटक गए हैं। हम पता नहीं कहां है और वहां पे हमको एक मैसेज मिल जाता है।
जी
और जो मैसेज है वो उसी भाषा में है जो हम बातें जानते हैं।
तो इसका मतलब क्या है? वो मैसेज दीवार पे लिखा हुआ है। कागज पे लिखा हुआ है। तो फिर वो जो जिस जो जो जानता है कि हम ये भाषा जानते हैं उसने ही वो मैसेज दिया है।
जी
अदरवाइज हाउ डिड दैट मैसेज कम दुनिया में हजारों लैंग्वेज लगते हैं। उसी लैंग्वेज जो हम जानते हैं। तो आवर माइंड कैन कंसीव मैथमेटिक्स नेचर वर्क्स मैथमेटिक्स तो अल्बर्ट ने कहा है द मोस्ट अनरीज़नेबल द मोस्ट द मोस्ट अमेजिंग थिंग अबाउट द यूनिवर्स द मोस्ट इनकम्प्रहेंसिव थिंग अबाउट द यूनिवर्स इज़ दैट इट इज़ कॉम्प्रिहेंसिव।
यस।
क्यों हम समझ पाते हैं इसमें?
सो यूनिवर्स में जो मीनिंग है वी हैव अ मीनिंग सीकिंग माइंड एंड देयर इज अ मीनिंग कंटेनिंग वर्ल्ड
दोनों का कोइंसिडेंस कैसे आया है
परफेक्ट ये जो है दिस इट्स अ वैन ऑफ़ द स्ट्रांगेस्ट आर्गुमेंट्स व्हिच इज़ एक्चुअली स्ट्रेंथ बाय द एडवांसमेंट ऑफ़ साइंस
करेक्ट
जितना साइंस का एडवांसमेंट बढ़ रहा है उतना हम हमारे मन के कसे कंसेप्चुअल पॉकेबिलिटी और नेचर के मैकेनिज्म की कैपेबिलिटी में एक कोइंसिडेंस दिख रहे
एक कोऑर्डिनेशन एक से यूनिवर्सिटी लेकर रहते थे।
और दिस दिस स्ट्रंगेस्ट आर्गुमेंट बियर फ्यू अदर आर्गुमेंट्स आल्सो बट क्या है? ऐसा इसको एक जब सन कासेप्ट होती है ना उसमें एक होता है कन्वर्जेंट लाइंस ऑफ़ रीजनिंग मतलब इधर से मैं आता हूं तो इसी पॉइंट पे आता हूं। इधर से आता हूं तो उसी पॉइंट पे आता हूं। इधर से एक पॉइंट इसी पॉइंट पे आता हूं।
तो अगर हम ओरिजिन की दृष्टि से देख सकते हैं। मोरालिटी की दृष्टि से देख सकते हैं। मीनिंग की दृष्टि से देख सकते हैं। तीनों से हम उसी कंक्लूजन की ओर आ रहे हैं।
थोड़ी तो बहुत अच्छी तरह से आपने तीनों जो अलग-अलग दृष्टिकोण है आपने समझाया और आपने कहा कि जैसे ब्रह्मांड जो है वो अर्थ पूर्ण है और आपने कहा कि जो परम सत्य है या जिसको हम भगवान कहते हैं वो नॉन फिजिकल नॉन
मटेरियल है जो तो क्या वो नॉन फिजिकल नॉन मटेरियल ऑब्जेक्ट या मतलब जो भगवान है अस्तित्व जिनका तो उसको क्या हम मटेरियल यू नो दृष्टि से या मटेरियल थिंग से उनको पा सकते हैं इस दैट पॉसिबिलिटी मटेरियल दृष्टि को इस्तेमाल करके वो हमारी चेतना को विकसित कर सकते हैं।
अच्छा
तो इससे अभी बातचीत कर रहे हैं। हमारी जीवा, कान जो मटेरियल है इनको हम इस्तेमाल कर रहे हैं।
पर इससे क्या हमारी कॉन्शियसनेस को एक्सपेंड कर रहे हैं।
और हमारा कॉन्शियसनेस इतना एक्सपेंड होता है हमारी स्पिरिचुअलिटी अवेकन होती है।
अगर स्पिरिचुअलिटी अवेकन हो जाती है तो स्पिरिचुअल फैकल्टी से हम उसको समझ सकते हैं। डायरेक्टली अनुभव होता है। जो इनफेंस है उसको हम और कर सकते हैं। ठीक? तो जो अस्तित्व में जो मानते हैं जैसे कुछ लोग कहते हैं सीइंग इस बिलीविंग या जिसको हम नहीं देख सकते। जिसको टच नहीं कर सकते हम उसको मानते नहीं है। लेकिन यहां पर हम एक दूसरी दूसरा जो कांसेप्ट है वो समझते हैं कि नहीं हम हमारे मटेरियल बुद्धि से हमारी चेतना को विकसित कर सकते हैं और फिर हम उसको समझ सकते हैं। देखो जो सी बिलीव जो कहता है
जी
सो सबसे पहले अपना मोबाइल फोन फेंक देना चाहिए।
क्यों? क्योंकि आपने इलेक्ट्रोमैग्नेटिक वेव्स देखे हैं?
नहीं।
कैसे आप आपका फोन मोबाइल टेक्नोलॉजी इस्तेमाल करेंगे?
जी।
ऑल साइंटिफिक एडवांसमेंट
जी।
इज मूविंग फ्रॉम व्हाट? विज़िबल टू व्हाट इनविज़िबल। तो जैसे न्यूटन ने जब फल को गिरते हुए देखा
यानी उनके ऊपर सिर के ऊपर गिरा जो भी कहते हैं
तो वो एक विज़िबल चीज देखी थी। फल गिर रहा है।
पर उसने इनविज़िबल प्रिंसिपल कॉस्टट किया। क्या है कि ग्रेविटी
ग्रेविटी।
तो विज्ञान का एडवांसमेंट हर मानवों का जो एक विशेष फर्क है जानवरों से।
जी।
जानवर केवल जो देखते हैं उसके आधार नहीं जीते।
मानव को भी देखना मुश्किल महत्वपूर्ण है। पर देखकर हम जो हमारे बुद्धि से समझते हैं।
उसके आधार मानव ने सारी वैज्ञानिक प्रगति की है। तो जो फिजिक्स के लिए एप्लीकेबल है वो बेटा फिजिक्स के लिए भी एप्लीकेबल है। तो वैसे तो साइंस इन्वॉल्विंग है प्रभु जी जैसे हम देखते हैं लेकिन कुछ लोग जो आर्गुमेंट करते हैं या जो भगवान के अस्तित्व पर प्रश्न चिन्ह लगाते है वो कहते हैं कि ये जो आपकी जो आस्था है ये अंधी आस्था है और इसको हमारा विज्ञान जो है वो स्वीकार नहीं करता क्योंकि अभी तक आपने जैसे कोई भी जो वैज्ञानिक प्रमाण दिए जैसे चर्च पहले गैलियो का विरोध करता था। तो इस प्रकार से कई बार हमारे जो बिलीफ है हमारा जो फथ है बिलीफ सिस्टम है उसको अंध आस्था करके और नकारा जाता है। देखो एक है कांसेप्ट दूसरा है उसका एप्लीकेशन कासेप्ट किसी कांसेप्ट के मिस एप्लीकेशन से वो कांसेप्ट पूरा वो रोंग प्रू नहीं होता है डार्विन ने इवोल्यूशन का थरी बनाया
जी
अभी उसका उपयोग हिटलर ने किया एक सोशल डार्विज्म नाम का एक थ्योरी ताकि जैसे जानवरों में इवोल्यूशन होता है वैसे मानव में अलग-अलग रेसेस है
और उसने सोचा कि हमारा आर्य सबसे प्रगतिशील है और कुछ जिप्सी वगैरह है जूस है वो सबसे नीचे वाले है वो कहते है कि नेचर से ही वो अपने आप एक्सटेंट हो जाएंगे पर अभी आप टेक्नोलॉजी इस्तेमाल करके उनको एक्सलरेट कर देंगे उनका एक्सटेंशन तो अभी सो द होरेंटस मिसयज
यस
अभी वैज्ञानिकों ने सोशल डार्विनिज्म जो है चेक कर दिया है बट जस्ट बिकॉज़ हिटलर ने डार्विनिज्म का मिसयज किया इससे डार्विनिज्म रोंग प्रूव नहीं होता है
उसके लिए अपना मेरिट हमको उसका देखना पड़ेगा
समझ
मिस एप्लीकेशन ऑफ़ देखा तो अभी जो भगवान की संकल्पना है उसके आधार पर धार्मिक संस्था बनते हैं।
धार्मिक संस्था वो कुछ पोजीशन देते हैं।
बिल्कुल
तो वो शायद सही हो सकते हैं गलत हो सकते हैं। बट इस एक है कि साइंस जो है साइंस और जो कसेप्शन ऑफ़ गॉड है ये क्या इंटेंसिटी ऑोजिट न्यूटन ने जब वो उसको फल गिरा
गिरते हुए
देखा गिरते हुए देखा तो उसने सोचा कि ये फल क्यों गिरा?
तो अगर न्यूटन नास्तिक होता
या ड्यूटन एक ब्लाइंड रिलीजियस फॉलोअर होता
दो एक्सट्रीम्स होते
तो अगर वो नास्तिक होता तो वो कहता कि सारा जो ब्रह्मांड है वो इसमें कोई ऑर्गेनाइजिंग प्रिंसिपल है ही नहीं सब केओटिकली चल रहा है तो फिर समझने की जरूरत ही क्या है
किसी अर्थ ही नहीं है अगर पहले से हमको कुछ एक प्राचीन दीवार है उसपे कुछ क्रिबल्स दिखते है
जी
हमको पहले से लगता है कि ये केवल निसर्ग के ही हवा से पानी से ये आए हैं तो उसका क्या अर्थ है समझने का प्रयास ही नहीं करेगा तो वो नहीं था द वेरी फैक्ट ही आस्क ये क्यों कैसे किस किस तरह से किस किस कारण ये गिरा है क्या मैकेनिज्म है उसका तो ही बिलीव्ड इन एन ऑर्डरली यूनिवर्स
और व्हाई बिलीव इन ऑर्डर इनवर्स बिकॉज़ देयर इज़ अ गॉड
गॉड इज़ अ ऑर्गेनाइजिंग प्रिंसिपल
यस
तो अभी कोई बहुत रिलीजियस पेटिक होता है वो कह सकता था कि ये फल क्यों गिरा ये भगवान के कारण गिरा
नहीं भगवान जो है वो फाइल इंटमेट ऑर्गेनाइजिंग प्रिंसिपल है
जी
पर एक ऑर्गेनिज्म का मैकेनिज्म है
और वो मैकेनिज्म समझना जो है वो साइंस का रोल है और उसमें साइंस बहुत प्रगति करता है
तो अभी जो इस तरह से जो रिजस फनेटिक्स होंगे वो शायद मैकेनिज्म मानेंगे ही नहीं
पर वैसे भी भगवान गीता में बताते हैं कि वो कहते है मया अध्यक्ष प्रकृति सुते चराचर ना जगत परिवर्त की मैं ओवरसी करता हूं
पर मैं ओवरसी करता अध्यक्ष पर उसके अंदर निस्ग का एक मैकेनिज्म है और वो मैकेनिज्म जो है वह एक तथ तो पूर्ण है।
ओम पूर्ण जगत पूर्ण है। तो इस जगत क्या मैकेनिज्म है वो समझना अच्छी बात है और वो विज्ञान का विज्ञान का उद्देश्य होता है।
तो ऐसे नहीं है कि विज्ञान और भगवान वास्तव में ऑोजिट ऑोज में है। रादर द फैक्ट दैट देयर इज अ ऑर्डरली यूनिवर्स। यूनिवर्स ऑर्डरली है। इसके लिए गॉड का एकिस्टेंस जो है
ये एक फाउंडेशनल प्रिंसिपल है।
ओके।
अगर यूनिवर्स ऑर्डर नहीं होता तो फिर उसको समझने का प्रयास है कि करता ही क्यों है?
जी।
इसीलिए ऑल द फाउंडर्स ऑफ़ साइंस
कोई भी फील्ड में जाओ आप वो फाउंडर मॉडर्न साइंस में हार गए। दे वर ऑल वेरी स्ट्रांगली थीस्टिक नेवर एथिस्टिक
पर जैसे विज्ञान आगे बढ़ते गया।
जी
तो क्या था पहले था कि हां भगवान ने इस जगत की को ऑर्गेनाइज किया है। ही अ क्रिएटर एंड ही द कंट्रोलर। ऐसा कम इसको थिज्म कहते हैं।
पर बाद में जैसे हम लॉस समझने लग गए जितने ज्यादा लॉ समझने लग गए था कुछ वैज्ञानिकों को ओवर कॉन्फिडेंस हो गया कि लॉ से सब कुछ हम समझ समझा सकते हैं। तो क्रिएटर का जरूरत नहीं है।
तो गॉड इज़ गॉड नहीं सॉरी कंट्रोलर का जरूरत नहीं। गॉड कंट्रोल में नहीं है।
जी।
तो गॉड मे बी द क्रिएटर बट ही इज़ नॉट द कंट्रोल।
इसको डीज़्म कहते हैं। नॉट इथज़्म बट डीज़्म।
अभी यहां पे एक घड़ी है।
जो ये घड़ी है घड़ी किसी ने बनाई है वो।
पर वो वो बनाने वाला अभी भी घड़ी को कंट्रोल नहीं कर पाए।
करेक्ट।
घड़ी का मैकेनिज्म उससे ही वो चल रहा है। बस तो ये डीज़्म आ गया।
डीज़्म आ गया।
और फिर और फिर उसके बाद में ऐसे वैज्ञानिकों का नास्तिक खास नास्तिक वैज्ञानिकों का खास करके आ थोड़ा कॉन्फिडेंस और कॉन्फिडेंस आ गया। मतलब भगवान क्रिएट के रूप में जरूरत है। तो एथिज्म आ गया है। पर ये पॉइंट ये है मैकेनिज्म
और पर्सन इतना कंट्राडिक्ट नहीं है।
जैसे कोई बिलियर्स खेल रहा है तो बिलियर्स के बोर्ड के ऊपर आप कैमरा रख दोगे
ठीक
तो वहां पे अगर आप देख लिक इस एंगल से इस फोर्स से इस बॉल को अलग
ये गेंद वहां पे गया वहां पे गया तो उसके कारण वो उधर चला गया ये सब हम लॉज़ ऑफ़ मैकेनिक्स से एक्सप्लेन कर सकते है
और सत्य है वो और उसी कैमरे का स्कोप को हम एक्सपैंड करेंगे
तो हम देखेंगे जो स्टिक है वो किसी व्यक्ति के हाथ में है
और वो एक्सपर्ट बिलीव्स क्लियर है
बिल्कुल
तो वो एक मैकेनिकल एक्सप्लेनेशन और पर्सनल एक्सप्लेनेशन कि वो बॉल होल में क्यों गया क्योंकि इस फोर्स ने इस एंगल से मारा गया था वो
और बहुत क्यों गया क्योंकि एक्सपर्ट लिफ्ट ले
कोई मारने वाला नहीं
वो दोनों जो है कॉम्प्लीमेंट्री एक्सप्लेनेशन है
तो अलग-अलग संदर्भ में हम अलग-अलग एक्सप्लेनेशन पे एम्फसिस करेंगे
तो अगर मान लीजिए भारत पाकिस्तान का कोई फाइनल मैच है और तभी ये समझ में अगर आखरी बॉल है और एक्सपेक्ट करते हैं
जी
अचानक वो ऑोजिट प्लेयर है श बॉल करता है तो विराट कोहली बैटिंग कर रहा है वो सिक्स मार देता है तो तभी अगर उस पोस्ट मैच इंटरव्यू में कोई पूछने वाला कमेंटेटर आपने आखिरी ब सिक्स कैसे मारा तो न्यूटन विराट कोहली बोलता है मैंने न्यूटन लॉ के पोशन से मार दिया तो अभी ये वो रेलेवेंट नहीं है उसमें
करेक्ट
ओके आपने कहा हिसाब कैसे सोचा श बॉल होगा आपने क्या प्रैक्टिस किया था
जो भी है तो वहां पे पर्सनल एक्सपर्ट पर मान लीजिए उसने थोड़ा सा थोड़ा एफर्टलेस हिट घुमाया है और फिर वो बॉल सिक्स चला गया कि तुम्हारा बैट कुछ स्पेशल ये नहीं कुछ नहीं मटेरियल का बैट है क्या इतना इतना लाइट फोर्स लगा के इतना कैसे आ रहे हैं?
करेक्ट।
तभी हम मैकेनिकल देखना चाहिए कि किसी प्लेयर का बैट बहुत होता है।
किसी प्लेयर का बैट लाइट होता है।
तो क्रिकेट में रूल कितना हैवी बैट कर सकते हैं आप। इतना लाइट बैट कर सकते हैं। तो क्या है? कभी मैकेनिकल एक्सप्रेशन देखना है। कभी पर्सनल एक्सप्रेशन देखना है।
और दोनों इंपॉर्टेंट है।
सो साइंस इज द स्टडी ऑफ़ मैटर। स्पिरिचुअलिटी इज द स्टडी ऑफ़ व्हाट मैटर्स।
हमारे जीवन में क्या महत्वपूर्ण है? वो समझना। स्पिरिचुअलिटी दोनों का अपना-अपना बिलकुल बिलकुल थैंक यू प्रभु जी आपने बहुत ही अच्छा यू नो सारांश में कंक्लूजन में बता दिया यू नो साइंस स्टडी व्हाट इस मैटर एंड स्पिरिचुअलिटी स्टडी व्हाट मैटर्स सो बहुत महत्वपूर्ण है और आपने बहुत अच्छी तरह से इस बात को तो समझा दिया कि जैसे यू नो क्रिएशन और यू नो जो क्रिएटर है और जो डायनामिक्स है वो दोनों साथ साथ में वो एग्जिट होते हैं और यू नो कॉम्प्लीमेंट्री टू ईच अदर जैसे आपने बताया और यू नो ही बेसिकली ही इज़ द क्रिएटर एंड द कंट्रोलर एस यू सेड और साइंस फिर जैसेजैसे यू नो इवॉल्व होते गया उन्होंने कहा कि नहीं कंट्रोल की आवश्यकता नहीं है और फिर क्रिएटर की आवश्यकता नहीं है। लेकिन जैसे हम देखते हैं या फिर कई बार साइंस इस चीज को भी कहता है कि जैसे हम मानते हैं कि समझो अगर भगवान है और ही इस द क्रिएटर यू नो ही इस द कंट्रोलर एंड ही इस प्रोबेब्ली यू नो जैसे हम जो थिस्म में मानते हैं कि भगवान जो है वो सब कुछ जानता है। उसके हाथ में सब कुछ है वो दयालु है। लेकिन जब हम इसको देखते हैं। सो हम जब देखते हैं के समाज के अंदर जैसे कई लोग समझो मर रहे हैं या किसी की हत्या हो रही है या कुछ हो रहा है तो फिर कोई व्यक्ति इस तरह से हम यू नो कंफ्यूज कर सकता है कि भगवान जो है वो वो शायद या तो उसमें शक्ति है लेकिन दया नहीं है या फिर वो दयावान है लेकिन शक्तिवान नहीं है तो इस इस चीज को कैसे समझा जाए और इसी की वजह से कई लोग जो है वो नास्तिकवाद को अपना लेते हैं और कहते हैं कि नहीं नहीं अगर भगवान है तो इतना बड़ा हादसा कैसे हो गया ऐसा कैसे हो गया हमारे जीवन में ऐसी घटना कैसे हट गई यहां पे दो चीजें हैं कि एक है कि इस फ्री बिल विल क्या हम सबको फ्री विल है
जी
अभी आप यहां पे बात करने आए हैं कुछ आप सुन रहे हैं कुछ नहीं सुन रहे बेसिकली फंक्शन हम कहते हैं आपके पास फ्री विल है और अगर फ्री विल है तो फ्री विल का कोई मतलब नहीं है। मगर फ्री विल मिस यूज़ नहीं भी कर सकती।
तो भगवान हां ऑल पावरफुल थे। भगवान ऑल ऑल है। ऑल लविंग और मर्सफुल भी है। पर भगवान ने सबको फ्री विल दिया है। और व्यक्ति अपने फ्री विल का मिसयूज़ जब करता है तो फिर वो वो जो करता है वो व्यक्ति की जिम्मेदारी है। उपद अनुमता च भगवान कहते है मैं आई एम द परमिट आई एम द ओवरसी उदाहरण है यथा आकाशितो नित वायु सर्वत्र महान जैसे मान लीजिए कोई आकाश आकाश कोई आप स्काई को आप एक अपसाइड डाउन बाउल के रूप में देख तो अभी अपसाइड डाउन बाउल जो है उसमें जो हवा है तो हवा इधर उधर जा सकती है पर वो जो बाउल है उसके एरिया में जाएगी कभी कोई बाउल बहुत बड़ा होगा वो तो फिर वो जो है और रुक जाएगी बाउ बॉल छोटा होगा तो थोड़ी कम जाएगी। तो इसमें क्या होता है? इंपॉर्टेंट चीज क्या है कि जब हम इस तरह से ये जो बॉल क्या है भगवान कहते हैं कि दिस इज द स्कोप इन व्हिच यू कैन यूज़ योर फ्री। ये जो स्कोप है जो हवा का एरिया रिस्ट्रिक्टेड है।
पर हवा का स्पेसिफिक मूवमेंट रेस्ट्रिक्टेड नहीं है।
तो हम सबको अपना अपना एक क्षेत्र एक स्फीयर ऑफ़ इन लिया है और उसमें हर एक व्यक्ति अपना फ्री यूज़ कर सकता है। तो अभी जो व्यक्ति फ्री विल कैसे यूज़ करता है उसके लिए भगवान रिसोंसिबल नहीं है। वो व्यक्ति रिसोंसिबल है और कभी कभी कोई व्यक्ति उपयोग कर लेते है अपने फ्री विल का तो उससे बहुत कुछ बुरा हो जाता है ऐसे व्यक्ति तो इफ द इफ फ्री विल इज़ टू बी प्रेजेंट देयर विल ऑलवेज बी द पॉसिबिलिटी ऑफ़ मिसयूज़ ऑफ़ फ्री विल एंड सफरिंग बिकॉज़ ऑफ़ द और ये एक तरह से फ्री विल के एकिस्टेंस का ही कासेप्ट्स है। तो ये एक चीज चीज से हो गया।
जी से समथिंग
हां कुछ मैं यहां पे जस्ट रोकना चाहूंगा प्रभु जी जैसे आप कहते हैं कि फ्री विल है लेकिन जैसे हम कहते है ना जैसे के यू नो भगवान की इच्छा के बिना एक पत्ता भी नहीं हिलता। तो जो कुछ होता है वो भगवान के सेंशन से होता है या उनकी इच्छा से होता है। तो क्या जो इस तरह की जो बुरी घटना होती है जो हादसा होता है क्या उसमें भी भगवान का रोल होता है या वो फ्री विल से ही है। तो मैं कैसे समझू कि ये मेरा फ्री विल से हो रहा है या वो भगवान करवा रहा है। तो अभी देखिए जो भगवान की इच्छा के बिना कुछ नहीं होता है। मैं आप इच्छा शब्द है थोड़ा केयरफुली यूज़ करना चाहिए। नथिंग हैप्स विदाउट द सेंशन ऑफ़
बट सेंशन का मतलब ये है इंटेंशन नहीं है।
जब कोई व्यक्ति बुरा कार्य करता है तो ऐसे नहीं कि भगवान चाहते हैं वो बुरा कार्य।
वो वो व्यक्ति चाहता है और भगवान उसको अलव करते हैं। तो हर एक व्यक्ति को अपने अपने कर्म के अनुसार कुछ क्षेत्र होता है
और उसमें छोटा बच्चा है छोटा नन्न बच्चा है उसको गुस्सा आएगा तो अपनी वो लात मारेगा
मां को लात मारेगा उसके पैर पैर इतने नन्हे होते कोमल होते हैं कि मां को नहीं लगेगा उसके पैर बहुत अच्छे है
पर कोई किसी राष्ट्र का डिक्टेटर है
उसके पास न्यूक्लियर वेपन है उसको गुस्सा आ जाए तो वो एक न्यू का बटन दबाएगा हजारों लोग लाखों के लोगों की हो सकती है
जी
तो क्या है अलग-अलग लोगों के पास अपनेप कर्म के अनुसार एक क्षेत्र होता है
जी
और वो क्षेत्र का दुरुपयोग करके वो क्षेत्र अपने दुरुपयोग स्वच्छा का दुरुपयोग करके लोग बुरा कार्य कर सकते हैं। जब ये करते हैं तो ऐसे कोई नहीं कह सकता है कि मैं जो कर रहा हूं भगवान मुझे करवा रहे हैं। नहीं मैं जो कर रहा हूं मैं कर रहा हूं।
जी
तो मैं ये भगवान की सेवा भाव में कर सकता हूं। भगवान को भूल के या भगवान के डिफाइन में कर सकता हूं। वो अलग पॉसिबिलिटी है। बट माय एक्शन आर माय एक्शन एंड आई एम रिस्पसिबल फॉर माय एकश। तो जैसे ये पहला फैक्टर है कि एक है फ्री युद्ध अदर साइड इस जो बुरा कार्य कर रहा है वो एक है अत्याचार करता है बड़े-बड़े तो अभी जो इसका विक्टिमाइज होता है उनके बारे में क्या कह सकते हैं दिस इज अ डिफिकल्ट क्वेश्चन कैसा है कि इस जगत में जब भी हमको कुछ समझ में नहीं आता है
तो मान लीजिए आप किसी नई जगह पे नौकरी करने लगते हैं और वहां पे वहां पे जो लोग होते हैं आपसे बहुत कोल्ड है
मेरा ये कोर्ट क्यों है?
तो फिर बाद में शायद चलता है कि आप जिस इलाके से थे
जी
उस इलाके से पहले कुछ व्यक्ति आया था और वहां से उसने सबसे दुर्व्यवहार किया है बेईमानी की है। तो क्या होता है
पहले हां तो एक फ्रेम में अगर हम किसी चीज को समझ नहीं पाते हैं
तो वी एक्सपेंड द फ्रेम
ओके
ठीक है मे बी दिस इस अबाउट माय माय बैकग्राउंड या ऐसा हो सकता है कि हां बचपन से कोई बचपन का कोई मित्र हमको मिलता है और हम बड़ा आनंद होते हैं पर वो बहुत ओल्ड लगता है
जी क्या शायद जब हम बचपने में थोड़ा हमने उसके साथ बोली किया था थोड़ा हमने उसके साथ बुरा व्यवहार किया था हम वो भूल गए पर उसको याद
तो जब क्या बेसिक पॉइंट क्या है कि जब एक इमीडिएट फ्रेम में हम समझ नहीं पाते हैं तो उसको और फ्रेम को हम और बड़ा बोल देते हैं सोच समझ लीजिए
जी
कि ये नॉर्मल वे ऑफ़ फंक्शन है। अगर हम यहां पे बात कर रहे हैं और अगर यहां पे शायद माइक होता
जी
पर माइक से आवाज नहीं आता।
जी
पहले माइक का बट बंद हो गया। जी
मेकअप बटन बंद नहीं होगा तो क्या यहां पे अपना चला गया
वो नहीं है तो क्या यहां पे यहां पे क्या कुछ और कोई नॉइज़ आ रहा है जैसे आवाज नहीं आ रहा है
स्लोली वी स्टार्ट लुकिंग फॉर बिगर एंड बिगर एक्सप्लेनेशन
तो वैसे ही क्या है कि जब ये कर्म का फ्लिप साइड एक दूसरा साइड क्या है कि हम जो परिस्थिति में आते हैं कभी-कभी हम नॉर्मली क्या होता है कि हम जैसे कार्य करता है वैसे हमको फल मिलता है
जी
अगर विद्यार्थी अच्छा पढ़ाई करता है तो उसको अच्छा मिलता है कोई किसी फील्ड में प्रैक्टिस करता है तो वो इंप्रूव होता है। तो नॉर्मल एक्शन से हमको रिजल्ट मिलता है। बट सम टाइम इट हैप्स कि हमको एक्शन का रिजल्ट नहीं मिलता है। ये एक्शन का विपरीत रिजल्ट मिलता है।
तो तभी नॉर्मली आई एम डूइंग 100 एंड गेटिंग 100 रिजल्ट। यू अंडरस्टैंडिंग। पर अगर मैं 100 कर रहा हूं मुझे 10 रिजल्ट मिल रहा है। तो उसका मतलब क्या है? कुछ पीछे का बैकलग आ रहा है। पीछे से कुछ माइनस 90 आ रहा है। उसके कारण क्या हो रहा है? मुझे 10 रिसर्च मिल रहा है। और ये होता है हम सब कहते हैं कभी कभी पर आपका कभी उल्टा भी होता है कि हम 10 करते हैं पर आपको 100 भी मिलता है।
विद्यार्थी थोड़ा सा पढ़ाई करता है उसको जो पढ़ता है वो एग्जाम में अच्छे मार्क्स हो जाते हैं।
जी
तो 10 है का इनपुट है पर 100 का रिजल्ट है। तो मतलब क्या है? वहां पे प्लस 90 भी आ रहा है।
तो बेसिकली क्या है कि जो कर्म के नियम से ऐसे होता है कि हां कभी-कभी हम कह सकते हैं कि जो छोटे बच्चे हैं उनके बड़ा अत्याचार होता है वो बहुत बहुत बुरा है। तो अगर हम कहते हैं कि ये बहुत बुरा है सत्य है वो पर कुछ कुछ बच्चे होते वो प्रोडस होते हैं।
उनमें ऐसा टैलेंट होता है कि चार साल का बच्चा कोई म्यूजिक स्टूडेंट प्ले करने लग मैथ्स का जीनियस होता है। सात आठ साल का चेस्ट चैंपियन बन जाता है। तो अभी क्या है कभी-कभी नेचर से या जगत में जो अस्तित्व में किसी के साथ बहुत नेगेटिव होता है। किसी के साथ बहुत पॉजिटिव होता है।
जी
तो व्हाई सिंगल आउट ओनली द नेगेटिव? वो पूरा पिक्चर देखना है। कोई एक्स्ट्राऑर्डिनरी नेगेटिव भी है जगत में। एक्सट्रोली पॉजिटिव भी है।
बिल्कुल।
तो ये मेरे लिए केवल एक थरी नहीं है। ये मैं जब छोटा छोटा था एक साल का जब था तो मेरी मां मुझे पास में हम जहां पे रहते थे वहां पे छोटा सा गांव शहर था वो महाराष्ट्र में तो वहां पे वो ले गई मुझे पुल का वैक्सीन लेने के लिए।
जी
पर वो छोटा सा शहर था इसलिए पावर सप्लाई चला जाता था। तो पिछले पिछले रात को उसी क्लिक में पावर सप्लाई चला गया था।
और तभी क्या हुआ कि वो डॉक्टर ने और किसी ने देखा नहीं कि पावर सप्लाई गया है। तो जो वैक्सीन का जो ट बढ़ गया ज्यादा हो गए और जब वो वैक्सीन ले दिया गया तो उस पोलियो टालने की जगह उससे ही पोलियो को मैं चलना सीख ही रहा था तभी गिर गया मैं और चल नहीं पाया मुझे सब याद नहीं है ये जब मैं ढाई तीन साल का था तभी हमारे दूर के एक रिश्तेदार वहां पर आई थी मेरे घर में और वो मेरी मां को सांत्वना दे रही थी बहुत बुरा हो गया बच्चे को पोलियो हो गया और मेरी मां के अभी तक क्या हालत है की जो भी शरीर के स्तर पर उसे कमी होगी बुद्धि के स्तर भगवान से देती
जी
तो अभी पता नहीं मुझे मेरे मां ने कुछ ऑब्जर्वेशन किया था या उनकी वो आशा थी उनकी प्रार्थना थी उनके आशीर्वाद थे जो भी थे तो वो मेरे मन में रह गया गड पार्ट बाद में आया पर वो इंटेलेक्चुअल पार्ट जो है बुद्धि का पार्ट रह गया पढ़ाई करने लग गया मैं देखा कि क्या है कि मैं पढ़ाई में अच्छा हूं याद अच्छे से आ जाता है एनालाइज कर पाता हूं मैं आर्टिकुलेट कर पाता हूं तो उसके बाद में जब हमारे नेबरहुड में एक लड़का था वो अच्छा बहुत अच्छा था।
जी
और खेल कूद बहुत अच्छा था और फिर पर तो क्योंकि मैं अच्छा लगभग ही जीरो था।
जी
तो वो मेरा बहुत मजा उड़ाता था। मतलब लंगड़ा वगैरह बोला करता था मुझे तो थोड़ा बुरा लगता था। आई वास मोर अनइड देन बट क्योंकि मैं मेरे फिजिकल साइंस इतना आइडेंटिफाई नहीं करता। साइंटिफाई करता था। इंटेलेक्चुअल साइंस से ज्यादा आइडेंटिफाई करता था। पर एक बार मेरी मां ने मुझे बताया कि उसकी मां उनके पास आई थी और बोलती कि वो मैथ्स में स्ट्रगल कर रहा है। और मैं मैथ्स में अच्छा था।
तो आप उसको मैं उसको मैथ्स में मदद कर सकता हूं।
जी। नहीं मैं नहीं कर सकता वहां कहती है वो हमारे पड़ोसी है वो तुम्हारा मित्र है मतलब वो मेरा मित्र नहीं है मैंने लग गए वहां मां ने बोला मदद कर दी उसकी तो मैं इसको समझाना था 10 मिनट उठाया मैंने गा मुझे एक ध्यान में आया कि उसका शरीर बड़ा अच्छा तंदुरुस्त था पर उसके सिर के बीच में कुछ था ही नहीं
मतलब वो इंटेलेक्चुअली बिलकुल कैपेसिटी नहीं थी उसकी
हम वो ट्राई कर रहा था पर बेसिक मैथमेटिक में समझ नहीं पा रहा था तो मेरा एक पार्ट था वो सोचा कि आई शुड लाफ इट इट
पर समथिंग स्टंग मी सोचने लग गया कि जैसे मुझ में एक शारीरिक कमी है और वो शारीरिक कमी के आधार पे मुझ हाथ
जी
और उसमें एक बौद्धिक कमी है अगर मैं उस हूं तो मुझे उसमें फर्क क्या है
बिल्कुल
तो अभी क्या है सब में कुछ कमी होता है उसमें कुछ मुझे फिजिकल लिमिटेशन था पर इंटेलेक्चुअल स्ट्रेंथ था उसमें इंटेलेक्चुअल लिमिटेशन था मुझे फिजिकल फिजिकल स्ट्रेंथ था उसमें तो क्या होता है जो लाइफ है वो अनफेयर थी। किसी हर एक को लगेगा कि कुछ किसी ना किसी दृष्टि से लाइफ अनफेयर है। पर जो बिग पिक्चर है उसमें लाइफ इज फेयरली अनफेयर।
फेयरली
मतलब कुछ दृष्टि में दूसरों से कम है हमारे पास हमको लगता है उससे जो पात्र डिर्व करता हूं उससे कम है। कुछ एरिया में जो है वो ज्यादा है।
तो हमारे जीवन का सबसे महत्वपूर्ण डिसजन जो देने वाले है व्हाट विल आई फोकस ऑन? हाउ लाइफ इस फेयर या हाउ लाइफ अनफेयर टू। अगर हम वो आओ लाइफ अनफेयरली उसप जोर देने वाले हैं तो आप जीवन भर रिजेंटफुल रहेंगे
गुणा रहेगी नकारात्मक रहेगा
अगर हम इसप जोर देंगे लाइफ कैसे फेयर है मुझे
तो उसी को हम लिबररेज कर पाएंगे उसी को मैक्सिमाइज करके रिसोर्सफुल और पॉजिटिव बन जाएंगे
थैंक यू प्रभु जी आपने बड़ा अच्छा एग्जांपल दिया और जैसे आपने अपने खुद के निजी जीवन से ये जो एग्जांपल देके बताया कि किस प्रकार से आपकी माता बड़ी आशावाद थी और भगवान में आस्था रखती थी जिसकी वजह से उस का ये विश्वास था कि नहीं ठीक है अगर मेरे बच्चे के साथ कुछ दुर्घटना भी हुई है तो एटलीस्ट वो भगवान उसकी कमी को पूरी कर देगा लेकिन कई बार ऐसा होता है कि लोग जो जो निराशावादी होते हैं या जो भगवान में ज्यादा आस्था नहीं रखते या उनके जीवन में जब दुर्घटना होती है तो वो भगवान को कोसने लगते हैं और कहते हैं कि इनकी वजह से ऐसा हुआ भगवान ने ऐसा किया या वो ऐसा कर सकता था वो हस्तक्षेप कर सकता था हमारे जीवन में उन्होंने क्यों नहीं किया और कई बार ऐसा होता है कि हमारे जीवन में जैसे आपने बहुत अच्छा एग्जांपल दिया कि हमने 10% किया है और 100% रिजल्ट आता है क्योंकि 90% उसका किया हुआ है और हमने 90% एफर्ट डालने के बाद भी 10% रिजल्ट आता है। तो कई बार ऐसी सिचुएशन में जहां पर हम 90% प्रयास करते हैं और 10% ही उसका रिजल्ट आता है तो लोग उसको समझ नहीं पाते हैं और कई बार वो नास्तिक बन जाते हैं और कहते हैं कि नहीं मतलब उनका एक्सपीरियंस ऐसा रहता है कि नहीं मैंने बहुत कुछ किया लेकिन भगवान ने मेरा साथ नहीं दिया या उसने हस्तक्षेप नहीं किया उसको करना चाहिए था और उसी को कोस के और फिर नास्तिकवाद का ज्यादा बढ़ावा देने लग जाते हैं और भगवान से उनकी श्रद्धा हट जाती है।
क्या है कि मैं जो बोल रहा हूं लाइफ फेयर या अनफेयर है।
जी
इसका मतलब ये नहीं है कि 50% फेयर है, 50% अनफेयर है।
जी।
ऐसे कुछ कुछ लोगों में हो सकता है कि वो 5% फेयर है या 95% अनफेयर है।
ऐसे भी हो सकता है।
अच्छा।
पर अब इसलिए अगर कोई किसी को फेथ क्राइसिस हो रहा है तो उनको कभी गिल्टी नहीं कराना है। वो लाइफ इज डिफिकल्ट और एवरीबडी हैज़ हार्ड टाइम्स। हार्ड टाइम एक्सटर्नली हार्ड टाइम इंटरनल। पर पॉइंट ये है कि अल्टीमेटली ये चॉइस हर को करना है।
जी
क्या व्हाट इज राइट इन माय लाइफ और व्हाट इज रोंग माय? तो कई बार क्या होते है? हम देखते हैं द गिफ्ट्स इन लाइफ। अरे मेरे पास इतना पैसा नहीं है। मेरा इतना इतना टैलेंट नहीं है। मेरे पास ये फेम नहीं है।
गिफ्ट्स इन लाइफ देखते हैं।
पर अगर उसके फाउंडेशन में क्या है द गिफ्ट ऑफि इटसेल्फ से गिफ्ट
सो अगर हम देखते हैं हमारे जीवन हमारा शरीर कितना वनरेबल है कितने सारे जर्म्स से इसका कभी भी विनाश हो सकता है
कितने सारे एक्सीडेंट्स हो सकते है एक बग या एक बैंक एक जो बग अंदर से आ सकता है
एक कार का एक बैंक हो सकता है वहां मृत्यु हो सकती है द फैक्ट दैट वी आर अलाइव इज अ मिरेकल तो ये एक तरह चमत्कार तो इसीलिए हम कह सकते हैं कि बहुत कुछ मेरे जीवन में गलत है वो सही हो सकता है। बट एकदम द वैरी फैक्ट दैट वी आर अलाइव दैट मीन्स देयर इज मोर राइट देन रोंग इन एंड गड इस नॉट ये डन फॉर अस देयर इज समथिंग मोर दैट इज देयर फॉर अस पोटेंशियली इन लाइफ इसीलिए क्या है एक सकारात्मक भाव रखना ये महत्वपूर्ण है और अगर किसी में अगर हम देखते है कि मेरे जीवन में बहुत कुछ बुरा हुआ है पर फिर भी बिलकुल सही भी है।
सही है। तो अभी हमारे सफरिंग होता है और गॉड ऊपर है। इसमें थ्री कनेक्शन हो सकते है। गॉड द कॉज ऑफ़ द सफरिंग। गॉड इज द कंफर्ट द सफरिंग और गॉड इस द क्योर फॉर द सफरिंग। कॉज इज़ कंफर्ट ऑफ़ द क्योर। तो अभी इस जगत में कॉज क्या है? स्पेसिफिकली कॉज क्या है? वो समझना काफी मुश्किल होता है। मैं अमेरिका में था एक कॉलेज में लेक्चर दे रहा था। तो तभी एक एक आई डोंट बिलीव इन व्हाट? बोल रहे हैं व्हाई इज दैट? देखिए मैं जब चार पांच पांच साल का था मेरे पिता क्रिश्चियन थे चर्च आए थे पर वो चर्च चर्च से आ रहे थे और उनके कार का क्रैश हो गया दोनों की घुट गई मेरे साथ ऐसे क्यों हो गया मैं तब से भगवान मुझे छोड़ गए
अच्छा
तो फिर तो फिर अभी तब से मैं मैं एक ऑर्फन बन गया मैं अलग-अलग और पहले था फिर मैं मैं लाइफ वेरी तो अभी वो एक अच्छा टॉप यूनिवर्सिटी में था अपने यहां पे लेक्चर दैट स्टोरी हाउ वुड यू गेट टू दिस रिमारकेबल रिबल स्टोरी बिहाइंड दिस
तो उसने बताया कि जब मैं मैं अलग-अलग में था फिर में था
जी
पर जब मैं 12 साल का था 12 13 साल का था तभी एक बहुत अच्छी फैमिली ने मुझे अलॉट कर दिया
अच्छा
और फिर उन्होंने मुझे बहुत सपोर्ट किया वो भगवान भगवान को नहीं मानते पर मैं बहुत लकी था और फिर मैं यहां पे उनके प्रभाव से यहां पे कॉल पे आया तो बोला की यू ऑलवेज अराउंड 12 13 साल थे तभी आप अडॉप हुए यस उसके उसके चांसेस कितने हो गए कि कितने किस ऐज के में बच्चे अडॉप होते है बोले बहुत रेयर है आई वास वै लकी तो वेट मिनट कि आर यू बीइंग फेयर टू गॉड कह रहे कि जब तुम्हारे माता पिता की मृत्यु हो गई उसके लिए तुम भगवान को रिसोंसिबिल कर रहे हो
और जब तुमको किसी अच्छे परिवार ने अडॉप कर लिया उसको हम चांस कह रहे थे तो या तो दोनों के लिए भगवान को रिसस करो या दोनों को चांस मिलो।
जब अच्छा होता है तो हम कहते हैं ये मेरा लक है और बुरा होता है भगवान है। जैसे स्कूल में जब मार्क्स मिलते थे तो अच्छे मार्क आए तो मैंने स्कोर किया है और खराब मार्क आए तो टीचर ने मुझे खराब मार्क दिए।
तो क्या है कि हमें हमारा जीवन तो जीना अपने व्यक्ति को
तो कैसे उसका सामना करना है तो एक सकारात्मक भाव रखना ही बहुत अच्छा है। और अगर भगवान कॉज क्या है? इस जगत में अलग-अलग कॉज पता है कि फ्री विल का कॉज होता है।
और इस जगत में जो जीव है उनको मिसयज हो जाता है।
उस टाइप का कॉज गॉड इस नॉट द कॉज ऑफ़ आवर सफरिंग। सफरिंग कम्स बाय द मिसयज़ ऑफ़ फ्रीडम। बट गॉड इस द कंफर्ट फॉर आवर सफरिंग। तो अभी अभी इतनी आध्यात्मिक तंत्र ज्ञान के रूप में प्रगति हो रही है। फिर पूरे विश्व में जो मेडिटेशन है, प्रेयर है, मंत्रा चटिंग है। ये सब लोग और कर रहे हैं। कीर्तन कर रहे हैं। जी क्योंकि क्या है इन सब से कुछ राहत मिलती है कुछ मिलती है और कुछ मन को मिलता है तो कितना भी बड़ा सफर हमारे नियम में आना जाए अगर हम भगवान का स्मरण करते हैं तो फिर एक मन को शांति मिलती है तो गिन कंफर्ट असफ और ये अनुभव जो कंफर्ट मिलता है वो वो कोई टेक्नोलॉजी कोई केवल आइडल कोई एक ही सी फिलोसफी ये कंफर्ट नहीं दे सकते और उसके बाद में ही गॉट द कॉरिंग तो अगर हम भाम भगवान की भक्ति करते हैं हम खुद को उसके द्वारा शुद्ध होते हैं तो जो हमारे सेल्फ डिस्ट्रक्टिव टेंडेंसी है वो कम हो जाएगी
और उससे क्या होगा हमारे जीवन का जो दुख है वो भी और कम हो जाएगी और इस तरह से अल्टीमेटली ग अत्यंतिक दुख निवृत्ति जो है अल्टीमेट जो दुख का निवारण है वो भगवान से होता है। इसीलिए वरिंग अबाउट व्हाट इज द कॉज जगह पे दुख आता है। कहां से आता है समझ सकते हम जगह नहीं समझते तो ठीक है आ गया है अभी पर इसका सामना मुझे करना है तो उसमें कमफर्ट और रूप में गड इस अ वेरी वेरी पावरफुल ट्रुथ दैट यू कैन एक्सेस तो ये जो गड एस अ कॉज यू नो ग कमफर्ट एंड गड फॉर सो ये केवल जब हम समझते हैं तो ये हर किसी के जीवन में होता है गुरुजी नहीं केवल आस्तिक व्यक्ति के जीवन में नास्तिक व्यक्ति के जीवन में जैसे आपने बड़ा अच्छा एक्स देके बताया कि जब 12 साल की उम्र में स्टार्ट किया गया तो पहले वो भगवान को दोष दे रहा था पर लेकिन बाद में कहा कि चांस नहीं है तो तो भगवान ने किया तो जैसे अगर हमको कोई चीज को एक्सेप्ट करना है तो एक कांसेप्ट जो हमको अभी समझ में आ रहा है तो या तो वो पूर्ण रूप से करना है यू नो या फिर उसको मतलब जो जो कुछ हो रहा है या वो भगवान के इंटरफेरेंस से हो रहा है या फिर अगर हम उसको नकारते हैं तो ऐसा कहते हैं कि नहीं यू नो मैं बिल्कुल वैसा मानता ही नहीं हूं। बट यहां पर एक प्रॉब्लम ये होता है प्रभु जी की जो जो लोग ईश्वर को नहीं मानते हैं उनके जीवन में भी जो घटनाएं घटती है तो हम जब देखते हैं कि जैसा आपने कहा कि गॉड एस अ कॉज तो वो भी जो हो रहा है बेसिकली उसमें किसी न किसी हायर ट्रुथ का यू नो इंटरफेरेंस होता है वो उनके जीवन में जो करवा रहा है लेकिन जो उनकी मानसिक अवधारणा होती है वो केवल दूर हो जाती है ईश्वर से तो ऐसा क्यों होता है?
देखिए मैं बोल रहा हूं कि दी आर थ्री पॉसिबल रिलेशनशिप्स बिटवीन आवर सफरिंग एंड ऑल
जी
थ्री पॉसिबल वो वेज़ ऑफ़ कनेक्ट नहीं होगा। तो अभी जो नास्तिकवाद है आस्था से दूर जाना ये व्यक्ति कभी भी कर सकता है।
दुख में कर सकता है। सुख में भी कर सकता है। सुख में भी होता है कि अरे व्यक्ति समृद्धि आ गई है। भगवान की क्या जरूरत है मुझे? तो ये जो है मटेरियल वेल बीइंग और मटेरियल डिस्ट्रेसिंग और डिस्ट्रेस और फथ इन गॉड और डिसबिलीफ इन गॉड
इनका कोई वन टू वन कोरिलेशन नहीं है
कई बार ऐसे होता है कि जब दुख ज्यादा हो जाते हैं तो लोगों को भगवान की तरह ज्यादा पड़ती है फिर
जी
ऐसे भी हो सकता है कि समुद्र ज्यादा हो जाती है तभी लोगों के लोग बेसिक जीवन की लीड हो चुकी है तभी वो स्पिरिचुअलिटी फोकस कर सकते है
जी
तो किस तरह से व्यक्ति भगवान के पास जाएगा या भगवान से दूर जाएगा ये हर एक व्यक्ति का इंडिविजुअल है।
पर एक समाज के स्तर पे जैसे अभी हम डिस्कशन कर रहे हैं डिबेट हो रहे हैं आजकल लाहौर इससे क्या है एक इंटेलेक्चुअल अवेयरनेस होता है। तो जिनको सवालों के जवाब चाहिए उनको वो इन्वेस्ट एक्सप्लोर करना इन्वेस्टिगेट करने का काम एक मौका तो मिलता है
फिर उससे हर व्यक्ति के बाद उसको फैसला करना है जिस तरह जाना है
तो ये अच्छा है जी जैसे ये जो वाद विवाद हो रहा है ये डिबेट हो रहा है इससे एक अवेयरनेस बढ़ रही है और पता चल रहा है क्योंकि बहुत सारे प्रश्न आ रहे हैं उनका समाधान भी हो रहा है। लेकिन अगर एक बेसिक प्रश्न पूछा जाए कि क्यों यू नो आस्था क्यों जरूरी है? क्यों भगवान में जैसे क्या ऐसा है कि भगवान में आस्था करने पे जो है समाज वो ज्यादा यू नो ऑर्डरली हो जाता है। ज्यादा अर्थ पूर्ण हो जाता है। जो हिंसाएं कम होती है या जो क्राइम रेट है वो घट जाता है। तो फर्क क्या पड़ता है? जैसे अगर कोई कहता है कि नहीं मुझे मुझे क्या करना है? मैं क्यों भगवान को मानूं? मैं अपना जी रहा हूं मैं किसी को कष्ट नहीं दे रहा हूं। लेकिन अगर हम एक्सपीरियंस की दृष्टि से देखे या फिर कुछ डाटा की दृष्टि से देखे तो क्या ऐसा है कि जैसे समझो कोई देश है जहां पर धर्म प्रधान है वहां पर ज्यादा क्राइम हो रहे हैं या जो धर्म प्रधान नहीं है वहां ज्यादा क्राइम हो रहे हैं तो किस तरह से मतलब जो हम अगर हमारे ऑडियंस को अगर एक संदेश भी देना चाहते हैं ऐसा तो क्या करेंगे क्यों आज पर द सोशल सोशल इफेक्ट्स ऑफ
जी
तो अभी एक कॉम्प्लेक्स सब्जेक्ट है बट मेन स्ट्रीम मीडिया में कहा जाता है कि धर्म के नाम धर्म के कारण लोगों में हिंसा हो जाती है
और लोग इतने सारे युद्ध करते हैं और जो क्रूड हुए अमेरिका में फिर भारत में पार्टीशन हुआ भारत का टेररिज्म होता है तो ये सब जो पब्लिक माइंड में काफी थे
पर उसके साथसाथ जो पब्लिक माइंड में नहीं है वो भी उससे बड़ा सत्य है
कि इस दुनिया में एक बहुत बड़ा एक्सपेरिमेंट हुआ है एथिज्म एट अ स्टेट लेवल वो है सोवियत रशिया और चाइना में जो वो कम्युनिस्ट थे और वो कम्युनिस्ट जो थे उसमें एथिज्म एग्रेसिवली ओप किया जाता था
कम्युनिज्म में ऐसा होता है कि रिलजन इस द ओपियन
रिलजन को इरेडिकेट करने का प्रयास किया गया
तो उसमें हुआ क्या बिना किसी मेजर वॉर के सरकार ने ही सरकार के ही कार्यों से सरकार के ही पॉलिसी से सरकार के ही ऑपरेशन से मिलियन लोगों की मृत्यु फर्स्ट वर्ल्ड वॉर और सेकंड वर्ल्ड वार दोनों की कंबाइन जो है ज्यादा हुई है।
तो अभी कोई कहेगा ये एथिज्म से नहीं है। कम्युनिज्म से है। वो सत्य है। पर वो कम्युनिज्म में एथिज्म एक बहुत इंपॉर्टेंट कॉम्पोनेंट था।
तो अगर आप वो डिफरशिएशन वहां पे करोगे कि एथिज्म से नहीं है कम्युनिज्म से है। तो फिर वही डिफरशिएशन आपको रिलजन और रिलीजियस एक्सक्लूसिव में करना है।
जी
कि जो जो रिलीजन के नाम को लेकर नकाब लेकर वो पावर होते हैं। उनको पिटिकल पावर चाहिए होता है। तो ऐसे में लोग इंसाफ नहीं है।
और वो दुर्भाग्य विषय है। पर क्या है कि बेसिकली अगर हम देखते हैं एट अ इंडिविजुअल लेवल ऑफ़ प्रैक्टिस। द आइडिया ऑफ़ थिंक इन गॉड। नॉट जस्ट फथ के संता मतलब केवल मानसिक संकल्पना नहीं है। फथ ट्रांसलेटेड प्रैक्टिस। प्रैक्टिस मतलब क्या? कोई कुछ मेडिटेशन कर रहा है। कोई कोई स्पिरिचुअल कम्युनिटी में जा रहा है। कोई चर्च में जा रहा है, कोई इंडिया में जा रहा है, कोई मस्जिद में जा रहा है। तो ऐसा भी ऑक्सफर्ड ऑक्सफर्ड ने एक बुक ऑफ़ हेल्थ पब्लिश किया था वो
और उसने दे 2000 स्टडीज अक्रॉस द वर्ल्ड कि लोगों का रिलीजियस फेथ और उनके जो फिजिकल हेल्थ के पैराटर्स है जैसे उनका हार्ट अटैक है, उनका स्ट्रोक है या उनके मेंटल हेल्थ के पैरामीटर उनका डिप्रेशन है, उनके सुसाइड एलर्जीस है। उनके जो ये जो सब है सब तो उसमें क्या कनेक्शन है रिलेशन जब देखने का प्रयास किया तो इनका क्या इनका रिसर्च क्या था कि ऑन एव्री सिंगल पैरामीटर जो लोग कुछ स्पिरिचुअल कोई स्पिरिचुअल प्रैक्टिस करते हैं समथिंग दैट कनेक्ट दे हायर रियलिटी
उससे उनका फिजिकल और दोनों इंप्रूव होता है
यहां तक कि बिलीवर्स भगवान शंकर थे लिव न इयर्स लगर देन नॉन बिलीव तो पॉइंट ये है कि इंडिविजुअल प्रैक्टिस जो है उससे डेफिनेटली बेनिफिट होता है।
अभी कुछ कुछ ऐसे देश है जिसमें सरकार जबरदस्ती कुछ लोगों को नास्तिक बनाती है या जबरदस्ती आस्तिक बनाती है। पर वैसे बहुत लिमिटेड है।
और जो जो एक कनेक्शन इन द हायर रियलिटी अ सोर्स ऑफ़ हायर मीनिंग फॉर लाइफ ये मानव की एक नेचुरल जरूरत है।
जो नास्तिक लोग है वो काफी समय से एक 150 साल से बताते आ रहे हैं कि अभी ने कहा था कि गड इस डे भगवान की भी मृत्यु हो गई है। भगवान रिलजन जो है वो अभी अर्थहीन हो गया है
और वो खत्म हो जाएगा। अपेक्षा थी कि वैज्ञानिक प्रगति ऐसे होगी जैसे भगवान की श्रद्धा कम हो जाएगी। नास्तिक बढ़ जाएगा। वैज्ञानिक प्रगति हो रही है। बट साइंस एक चीज है साइंस मेक्स द आउटर वर्ल्ड बेटर। स्पिरिचुअलिटी मेक्स द इनर तो जो है इनर वर्ल्ड को इम्रूव करना है। उसके प्रैक्टिस बहुत होती है
तो कई बार क्या होता है हम फेथ पे ज्यादा जोर देते है पर अगर प्रैक्टिससेस पे हम जोर देते हैं क्या किस प्रकार प्रैक्टिस कर रहे हैं व्यक्ति और उसके क्या परिणाम हो
तो जब व्यक्ति अंतरंग रूप से वो एक ट्रांस एक हायर पीस अनुभव करता है
हायर हैप्पीनेस अनुभव करता है तो उससे वास्तव में समाज में सकारात्मक भी परिवर्तन
थैंक यू
तो ये बहुत महत्वपूर्ण है जैसा आपने कहा कि हम मनुष्य समाज में रहते है मनुष्य है और एक पूर्ण जीवन जीना चाहते है जिसमें सुख शांति और खुशी ये जो है ये सभी तलाशते रहते है एंड एवरीवन इस सर्चिंग फॉर फॉर हैप्पीनेस एक्चुअली और जैसे आपने कहा कि अंतरंग रूप से जब हम ये प्रैक्टिससेस को फॉलो करते है तो हमने देखा है कि उसमें ज्यादा प्रसन्नता ज्यादा संतुष्टि ज्यादा खुशी वगैरह लोगों को मिलती है तो इससे बहुत ही क्लियरली ये बात समझ में आती है कि जो लोग लोग आस्था रखते हैं भगवान में और आस्था रखने के साथ साथ जो प्रैक्टिस जो है जो करते हैं जो हमारे शास्त्रों में दी गई है तो उससे जो है बहुत जीवन खुशहाल हो जाता है तो मैं कहना चाहूंगा गुरु जी कि हमारे दर्शकों को पॉइंट
प्लीज अभी मैं जब बता रहा हूं सर कहने का ये मतलब नहीं है कि ऑल एथिस्टिक पीपल आर बेटर देन ऑल एथिस्टिक पीपल लेकिन व्यक्ति का जो बर्ताव होता है बिहेवियर होता है वो मल्टीपल फैक्टर्स से आता है
जी इट कुड बी दैट एथ कैन बी गुड पीपल इट कुड बीस्ट कैन बैड मतलब उसमें उनके फिलोसफी या वर्ल्ड व्यू जो है मेरे बिलीव फिनोमिन वो कितना कंट्रीब्यूटिंग फैक्टर है वो देखना है
एथिज्म एथ आल्सो गुड पीपल बट देयर इज नथिंग इन एथिज्म टू मेक देम गुड पीपल
कोई कह सकता है कि नहीं नहीं एक ही हमारा जीवन है यही हमारी पृथ्वी है इसीलिए इसका हमें कल्याण करना चाहिए
तो ये जो है थोड़ा विचार ंत लोग है उनका विचार होगा
पर जो अधिक भौतिकवादी है जिसमें बहुत सी वासना है उसने कहा अगर एक ही जीवन है
तो मुझे भोग करना है और अगर मुझे शक्ति मिलती है मुझे धूप तथा कर सकता हूं मैं किसी को किसी को नीचे दबा के कर सकता क्यों ना कर
तो अगर हम एथिस्ट ही है और एथिज्म का जो होल्ड व्यू क्या है कोई हायर रियलिटी नहीं है तो बेसिकली वी आर जस्ट इवॉल्व एनिमल्स
तो एनिमल जीवन में क्या है माइट इज राइट ही होता है
तो एथ अच्छे लोग हो सकते है पर एथिज्म सेल्फ
जी
डस नॉट प्रमोट गुडनेस एक थिस्म अगर लिटरली उसका लॉजिकल हम उसका एक्सप्लिकेशन निकालेंगे
तो क्या होगा वो माइरा का सोसाइटी हो जाएगा
और जो थीज़्म है उसका मिसयूज़ हो सकता है थीस मिस बिहेव कर सकते हैं
पर थीस का इम्लिकेशन क्या है कि थी जो है ये वी आर ऑल अकाउंटेबल टू अ हायर रियलिटी
और इसलिए उससे एक तरह से एक चेक आता है कि चेक मतलब यू हैव टू बी केयरफुल अबाउट योर एक्शन अभी आपके पास पावर है इसलिए आप कुछ कर लोगे यू विल बी अकाउंटेबल आफ्टर सो इन दैट सेंस थिज्म इज मोर कंडसिव टू अनऑर्डरली सोसाइटी और थज़्म को कैसे अप्लाई किया जा रहा है वो देखना महत्वपूर्ण है। एंड वन मोर पॉइंट है कि अभी हम देखते हैं कि कुछ लोग रिपोर्ट करते हैं कैंडिडेट कंट्री जो है वो नास्तिक है पर वहां पे एक्चुअली वेल बीइंग काफी है पीसफुल अभी वो सत्य थे। पर जब हम देखते हैं अगर उन उन लोगों को ही आप फर्स्ट पर्सन टेस्टिम से पूछते हैं
जी
तो इज देयर वेल बीइंग इज देयर इज देयर पीसफुल इज इट बिकॉज़ ऑफ़ देयर एथिस तो ये सब नहीं है।
मेनी अदर फैक्टर्स इन इट। उन्होंने अपनी इकॉनमी कैसे ऑर्गेनाइज की है? सोसाइटी कैसे ऑर्गेनाइज की है? वो नेचर के पास में है। अलग-अलग चीजें हैं। तो वो अभी एक है कोज़ेशन दूसरा है कोरिलेशन।
तो कॉज़ेशन मतलब ए और ए और बी साथ में जा रहे हैं और एक ही कारण भी हुआ
जी
पर अब कॉग्निज्म तो दोनों साथ में जाते जिसने सोशल का रिसर्च है की कि जब जो लोगों के हाथ बड़े होते हैं
जी
वो लोगों की वोकबरी अच्छी होती है बड़े हाथ से वोकबरी का क्या संबंध है
छोटा बच्चों का छोटा
तो क्या है वो जो एज होता है व्यक्ति का
छोटा कमाई होगा तो उनका छोटा हाथ छोटा होता है तो क्या छोटा होगा
जी
एज बड़ा होगा तो हाथ बड़ा होगा फैमिली बड़ा होगा
ये तो कोरिलेशन है कोज़ेशन नहीं है वो
तो अनलेस हम स्पेसिफिकली कॉज लिंग देख सकते हैं एक मास लेवल पे
जी
वो विदाउट दैट वी कैन नॉट रियली से कि एकज़्म इस द कॉज ऑफ़ पीपल बी मोर पीसफुल एंड
हमने जहां तक देखा है कि हम कम्युनिस्ट रशिया का चाइना का उदाहरण दिया था शुरू
तो इट हैज़ ले टू ग्रेट डिजास्टर एस अ ब्रॉडर प्रिंसिपल कि हर एक व्यक्ति को ये खुद चुनना है
कि मदर वो वो एक मीनिंगफुल जगत में जी रहे हैं या एक मीनिंगस जगत में जी रहे है
एक मीनिंगफुल जगत में उसमें कुछ चीजें है जिसका मीनिंग हम समझ नहीं पा रहे है
पर शायद भविष्य में रिसर्च करके हम समझ पाएंगे कॉमर्स में स्पिरिचुअल ग्रोथ से हम समझ पाएंगे या एक अर्थहीन जीवन जगत है और उसमें हम कुछ ना कुछ अर्थपूर्ण बनाने का प्रयास कर रहे है वो सब कुछ नाश हो जाता है जी
ये फंडामेंटल चॉइस है।
जी
तो जो मीनिंग की खोज जो है ये हर एक व्यक्ति को एक नीड है उसके लिए
जी
और जो विज्ञान की है वो भी मीनिंग के ही खोज में है। तो आइंस्टाइन ने कहा था सस आर्ट्स एंड द रिलज आर ऑल फ्रूट्स ऑफ़ द सेम ट्री ऑफ ह्यूमन ग्रोथ वही मानव जो आर्थ की खोज में विज्ञान को ढूंढता है विज्ञान मेंशन करता है। वही धर्म के बारे में कुछ सोचता है। सोचता है वही जो आर्ट्स है जो वही करता है तो ये तीनो जो है वी आर ऑल सर्चिंग फॉर मीनिंग और जो नास्तिकवाद है इट जस्ट रिजेक्ट्स वन सोर्स ऑफ़ मीनिंग दैट हैस प्रोवाइड मीनिंग फॉर मिलियंस ऑफ़ पीपल फॉर मिलियन
एंड इट ऑफर्स नथिंग एल्स इन
तो कहते है की जीवन के दुख है वो तो रहने वाले है पर एथिज्म डस नॉट रिमूव द पेंस ऑफ़ लाइफ इट ओनली रिमूव्स द होप दैट द प्स मे हैव सम परपस इन फ्यूचर मे हैव सम इट इज इट इज ओवर साइकोलजिकली डमेज डेंजरस डेंजरस हो सकता है कम से कम डमेजिंग है नेगेटिव ये उसका इफेक्ट काफी हो सकता है नहीं तो जैसा आपने एक्स दिया प्रभु जी की जो एक एक दुनिया है जो अर्थ पूर्ण है और उसमें कुछ अनर्थ हो सकता है यू नो जिसको हम सॉल्व करने की कोशिश करते हैं या जिसको हम पहुंचने की कोशिश करते है और एक दूसरी दुनिया है जो पूरी ही अनर्थ पूर्ण है बेसिकली तो तो लॉजिकली अगर हम थोड़ा सा भी सोचते विचार करते हैं और इसको मनन करते तो हमको समझ में आता है कि अर्थपूर्ण दुनिया जिसके अंदर कुछ अनर्थ हो सकता है आई थिंक उसका चयन करना ज्यादा अच्छा है और जैसे आपने कहा कि जो चॉइस केवल केवल एक आर्बिटरी चॉइस एविडेंस बेस चॉइस है
एविडेंस चॉइस दो एक एक इमारत है
जी
एक बड़ा महल जैसे 100 कमरे
जी
तो उसमें अगर हम कहते हैं 98 कमरे जो है पूरे डिसऑर्डर है
जी
तो दो कमरे क्लीनेंस
जी
तो हम कह सकते 98 कमरे जो अनक्लीन है
वो सारे डिसऑर्ग उसको देखिए एक बिल्डिंग को केयर टेक कर
पर दो कमरे भी अगर क्लीन है तो
वो कहां से क्लीन हुए वो सवाल आता है
जी
तो हमें क्या है कि यहां यूनिवर्स में बहुत कुछ चीजें समझ में नहीं आती
नहीं आती
और जैसे साइंस क्या है वी हैव फाउंड सम मीनिंग कि ये प्लनेट्स कैसे मूव हो रहे हैं जो इलेक्ट्रोमग्नेट्स कैसे ट्रांसमिट होते हैं ये बहुत कुछ हम समझ पाए तो ये मीनिंग कहां से आया है अगर एक भी रूम अगर उस उस पैलेस पे क्लीन है तो फिर दैट दैट उसका एक ही एक्सप्लेनेशन है कि कोई ऑर्गेनाइजर है केयर टेकर है उसका
जी
और फिर बाकी अनक्लीन क्यों है वो कारण हो सकता है क्या तो इंटेंशनली अनक्लीन है या वो केयर टेकर क्लीन करने के लिए किसी और ने अनक्लीन बना दिया है केयर क्लीन करने का बट इवन इफ यू कैन फाइंड वन आइलैंड ऑफ़ मीनिंग
जी
दैट रिक्वायर्स एन एक्सप्लेनेशन
और वो जो एक्सप्लेनेशन है एक मीनिंगलेस यूनिवर्स में एक आइलैंड का मीनिंग भी आता है तो वो मीनिंगलेसनेस यूनिवर्स मीनिंगलेस ऑफ़ यूनिवर्स को वो फॉल्सिफाई कर देता है एक्चुअली द वेरी एडवांसमेंट ऑफ़ साइंस साइंस इज़ एबल टू फाइंड मीनिंग
इन द यूनिवर्स एंड एबल टू फाइंड मैकेनिज़्म्स बाय व्हिच थिंग्स वर्थ दैट इज़ एक्चुअली द स्ट्रांगेस्ट आर्गुमेंट अगेंस्ट थिंग्स एथिज्म एथिज्म
एथिज्म सो जस्ट साइंस इज़ इवॉल्विंग एंड ऑब्वियसली यू नो इट इज़ फाइंडिंग द वैल्यू एंड यू नो आंसर टू टू ऑर्डरलीनेस ऑफ़ द यूनिवर्स जो हो रहा है तो डेफिनेटली यू नो जैसे जैसे हम आगे बढ़ते जाते हैं और साइंस और इसको समझ समझते जाता है तो समझ में आएगा कि जैसे दो कमरे जो क्लीन हुए है 98 भी जो है वो क्लीन हो सकते है या किसी ने क्लीन किए हैं कोई क्लीन करेगा तो हम ऐसा कह सकते हैं प्रभु जी क्या हम एक कंक्लूजन लगा सकते है कि जो साइंस और स्पिरिचुअलिटी है यू नो इट इज़ कॉम्प्लीमेंट्री टू ईच अदर एंड इट एक्चुअली यू नो गोज़ अलोंग इट कैन बी कॉम्प्लीमेंट्री डिपेंड ऑन हु आर द साइंटिफिक लीडर्स एंड हु आर द स्पिरिचुअल लीडर्स साइंटिफिक लीडर एथिस्टिक फैटिक हो तो वो स्पिरिचुअलिटी को जगह नहीं रखेगी।
स्पिरिचुअल लीडर जो फनेटिक होंगे तो वो साइंस के लिए कोई जगह नहीं
पर दोनों में मैच्योर अगर लोग दोनों दे रिस्पेक्ट ईच अदर तो तो फिर क्या है तो फिर दोनों साथ में आ सकता है जरूर और वही जो वैदिक नॉलेज सिस्टम्स है इंडियन नॉलेज सिस्टम जो अभी कहते है उसमें जो मटेरियल स्पिरिच दोनों जाते बोथ आर मेंट फॉर अल्टीमेटली द सेम पर्सन जो ईश्वर ने बताया विद्या अविद्या कहते है की जो मटेरियल नलेज है उससे हम इस जगत को नेविगेट कर सकते है लाइफ में हमको दो चीजें चाहिए मीन्स चाहिए और मीनिंग चाहिए
मीन्स
मीन्स मतलब क्या अगर मैं बीमार हो गया तो मेरे वास्तु कैसे अच्छा करना है
अगर मेरे मेरा दीवार यहां पर टूटने में आ गया है उसको कैसे रिपेयर करना है ये मीन्स है तो मटेरियल नॉलेज जो है मीन्स है वो इस जगत को नेविगेट करने के लिए बहुत महत्वपूर्ण है
जी
और साइंस सर को बहुत मटेरियल ये रहा है
पर इस जगत को नेविगेट करके कहां जाना है
जी
उसके लिए स्पिरिचुअल नॉलेज है
तो दोनों जो है दोनों जगत में के लिए महत्वपूर्ण है उपनिषद में जो दिया है वो बैलेंस बोथ आर वैलड एंड नाइस
थैंक यू प्रभु जी तो आज हमने बहुत सारी यू नो इस विषयों पर चर्चा की शुरुआत हमने की क्या भगवान कल्पना है भगवान का अस्तित्व है या नहीं डस व्हाट एक्सिस्ट और नॉट और वहां से लगा के कौन वह कौन सत्य है ये जो यूनिवर्स है निस्ग है ये कैसे चल रहा है इसको कौन चला रहा है किस प्रकार से जो कर्म के सिद्धांत जो है वो भी प्रभु जी ने हमको इसमें बताए और बहुत अलग अलग विषयों पर हमने चर्चा करके इसको आगे ले गए और हमने देखा कि किस प्रकार से जो विज्ञान है वो धीरे धीरे समझ रहा है और जो हमारे यू नो स्पिरिचुअलिटी के कांसेप्ट है उसको भी एक्सेप्ट कर रहा है तो जो नास्तिकवाद का जो जो नारा है वो बेसिकली हम हम समझते हैं कि उससे इतना ज्यादा बेनिफिट है वो समाज को नहीं हो सकता है लेकिन जो आस्तिक लोग है जो जो प्रिंसिपल को अपने जीवन में अप्लाई करके और अपने जीवन को सुखमय खुशहाल वगह बना सकते हैं। तो प्रभु जी आप कंक्लूजन में कुछ कहना चाहेंगे ऑडियंस से हमारा के इन समरी बेसिकली जो व्यक्ति है उसको किस प्रकार से समाज में बिहेव करना चाहिए। ताकि वो इस समाज में कंट्रीब्यूटर बन सके। अपने जीवन को भी सफल बना सके और समाज के लिए और दूसरों के जीवन में भी कुछ कंट्रीब्यूट कर सके।
साइंस एंड स्पच दोनों हमारे लिए रिसोर्सेज है।
यूज़ द बोथ रिसोर्सेज एंड ट्राई टू लीव द मोस्ट मीनिंगफुल लाइफ। अगर हम ओपन माइंडेडली हम सर्च करते हैं।
मीनिंग के लिए तो साइंस विल गिव अस सम आंसर्स, चाइल्ड विल गिव सम आंसर्स। एंड ईच वर्ड विल हैव टू फाइंड आउट हाउ टू इंटीग्रेट देम। बट कोई लेट्स नॉट क्लोज आवर डोर टू एनी रिसोर्स जी
तो दोनों को हम बैलेंस करके साइंस कैन हेल्प अस टू मेक द आउटर वर्ल्ड कैल्पक इनर वर्ल्ड बैटल थैंक यू
थैंक यू सो मच हरे कृष्णा