Hindi Does bhakti make us happy or do we have to practice bhakti happily – Chaitanya Charan
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हरे कृष्णा सॉरी मैं सोचा था 825 को क्लास है अलग-अलग जगह पे अलग-अलग टाइम भागवतम होता है वै सॉरी फॉर द डिले आई वोंट मेक द क्लास लगर क्लास ज्यादा नहीं लूंगा मैं तो मेरे मन में एक टॉपिक लेके आया था पर ये जो सेटिंग देख के जो टॉपिक मैं लेने वाला हूं शायद वो ले नहीं पाऊंगा क्योंकि पुष्पा अभिषेक का भाव है यहां पे। तो ये जो श्लोक तो मैं भक्ति क्या भक्ति क्या है? और भक्ति का विकास कैसे होता है? इसके बारे में आज चर्चा करेंगे। तो जब मैं साधारणत भागवतम क्लास लेता हूं तो ये एक एक्रोनिम लेता हूं चित कि कॉन्टेक्स्ट क्या है? किस संदर्भ में हम चर्चा कर रहे हैं। उसमें कुछ इनसाइट्स और उसके बाद में टेक अवे हमारे लिए। तो अभी जो श्लोक हमने पढ़ा सो श्याम पूर्णा थैंक यू फॉर दैट। तो फिर ये क्या है? यह भागवतम का एक बहुत ही महत्वपूर्ण सेक्शन है। चैप्टर 1.2 सिक्स टू 22 छठे श्लोक से 22वें श्लोक तक ये जो है इसमें भक्ति ये चैप्टर है डिविनिटी एंड डिवाइन सर्विस। डिविनिटी मतलब जो भक्ति के ऑब्जेक्ट है भगवान। और डिवोशनल सर्विस मतलब भक्ति है। तो इसका वर्णन आता है और इस विभाग यह जो सेक्शन है यह पूरे भागवतम में से सबसे ज्यादा प्रभुपाद जी ने ये सेक्शन में से कोट किया है अपने लेक्चर्स में अपने परपोट्स में और यह इतना महत्वपूर्ण सेक्शन है कि इसमें से कुछ श्लोक प्रभुपाद जी ने अपने मार्किने भागवत धर्म वो जो किताब लिखकर जो प्रार्थना लिखी जब अमेरिका जा रहे थे तभी उन्होंने इसमें से कुछ श्लोक लिए हैं तो और वो बंगाली काव्य है पर उसमें संस्कृत श्लोक उन्होंने लिए हैं। तो अभी उस विभाग का ये आखिरी श्लोक है। तो मतलब इस अभी इस विभाग में क्या बताया गया है कि पहले भक्ति की महिमा बताई गई है। फ्रॉम एप्रोक्सीमेटली सिक्स टू 10 जो है ग्लोरी ऑफ भक्ति है। कैसे भक्ति ये ज्ञान और वैराग्य दोनों उसमें आ जाता है। भक्ति वर्णाश्रम के पराकाष्ठा है कि सर्वोच्च परफेक्शन है। कैसे भक्ति से वास्तव में यह जो चार पुरुषार्थ है उन सब से परे जाता है व्यक्ति भक्ति ही कामस वो सारे श्लोक है और उसके बाद में जो है पोजीशन ऑफ भगवान ये प्रख्यात श्लोक है वतीस तत्व ज्ञान ब्रह्म परमात्म भगवान शब्द और फिर 12 से अगर हम 21 तक जाते हैं। क्या है? हाउ भक्ति वर्क्स। कैसे हम भगवान का स्मरण करते हैं? और भगवान का स्मरण करने से किस तरह से हमारा मन शुद्ध हो जाता है। यहां पर तुलना की जाती है कि जो भगवान का स्मरण जो है य अनुद्या आसीन युक्त कि भगवान का स्मरण यह एक तलवार के समान है। और उससे क्या होता है? कर्म ग्रंथ निबंधनम चिनती उसको काट जाता है और फिर उसके बाद में कैसे रजोगुण तमोगुण का प्रभाव कम होता है तदस्तो भावा काम लोभा फिर सारे जो हृदय ग्रंथि कट जाती है विद्यते हृदया ग्रंथ छिदते सर्व संशय तो कैसे भक्ति काम करती है उसका वर्णन किया गया उसके बारे में कुछ हम चर्चा करेंगे पर इसका जो आखरी श्लोक जो है वो हम चर्चा कर रहे हैं और यह श्लोक में एक इंग्लिश में कहते हैं पैराडॉक्स पैराडॉक्स मतलब विरोधाभास है। तो विरोधाभास क्या है इसमें? इस श्लोक को हम देखते हैं। अतो कवयो नित्यम भक्तिम परमयादा कि जो कवि है जो बुद्धिमान लोग है ये कवि शब्द इसके पहले भी आया था यदासना युक्त कर्म ग्रंथ निबंध छती कोविदास वही भाव है शब्द नहीं है पर वही भाव है जो बुद्धिमान लोग हैं तो जो जो कवय है जो बुद्धिमान लोग हैं नित्यम भक्तिम परमया मुदा वे भक्ति बड़े आनंद के साथ करते हैं। वासुदेव भगवती किसके प्रति भक्ति भगवान के प्रति प्रभुपाद उसके आधार उसको जोर देते हैं कि कैसे भगवान इतने एक्सेसबल है भगवान कैसे हमारे पास आ जाते हैं। वासुदेव भगवती कुरवती आत्म प्रसाद और उससे क्या होता है? हमारे आत्मा को संतुष्टि हो जाती है। कुर्वती आत्म प्रसाद अभी आत्म साधने में ये जो भाव है वह पहले ही श्लोक में आया था य आत्मा सुप्रसिद्धति जिससे आत्मा संतुष्ट हो जाता है तो इसमें विरोधाभास क्या है एक तरह से मुदा मुदा मतलब आनंद परमया मुदा बहुत आनंद होना और आत्म प्रसादनीम आत्म प्रसाद मतलब आत्मा तक संतुष्ट हो जाना क्या होता है कि हमारे अलग-अलग तरह की प्रसन्नता होती है कोई किसी छोटे बच्चे को गुदगुली करता है तो वो भी हंसने लगता है पर वो क्या है वो आनंद नहीं है। वो क्या केवल एक सेंसेशन है वो। तो आत्म प्रसादनी मतलब क्या? डीप हैप्पीनेस, डीपेस्ट हैप्पीनेस। तो यहां पे आनंद का उल्लेख दो बार आता है। पर ये दो बहुत ही अलग संदर्भ में है। पहले क्या बोलते हैं कि जो जो बुद्धिमान लोग हैं, वो बड़े आनंद से, वो भक्ति का अनुशीलन करते हैं, जिससे आत्मा को आनंद मिलता है। हम तो इसमें भी पैराडॉक्स क्या है कि अगर हम भक्ति योगा भक्ति योगा बोल रहे हैं हम प्रैक्टिस कर रहे हैं तो भक्ति योगा के एंड में उसका डेस्टिनेशन है हैप्पीनेस हम कुर्वंत आत्म प्रसाद यह करने से आत्मा को संतुष्टि मिल जाएगी तो ये दिस इज हैप्पीनेस एज अ डेस्टिनेशन पर इसके साथ-साथ क्या बता रहे हैं कि जो ैक्टिस करते हैं। वो प्रैक्टिस करते हैं। वो कैसे प्रैक्टिस करते हैं? दे प्रैक्टिस विद हैप्पीनेस। तो अभी क्या है? परमयाम उदा तो क्या भक्ति प्रैक्टिस करने के लिए हमको सुखी होना चाहिए या भक्ति प्रैक्टिस करने से हम सुखी हो जाएंगे? तो अभी साधारणता प्रभुपा जी कहते चैंट एंड बी हैप्पी। तो अभी जब चट एंड बी हैप्पी कहते थे उसका साधारणत हम सोचते हैं कि चट एंड यू विल बिकम हैप्पी। हम वो क्या है? उसे एक तरह से डेस्टिनेशन का भाव होता है। पर क्या है? यह जो है यहां पे चट एंड बी हैप्पी। मतलब चट एंड कल्टीवेट हैप्पीनेस। मेक हैप्पीनेस योर डिस्पोजिशन। अपनी एक प्रवृत्ति बनाइए कि सुखी रहिए। तो अभी इसमें से कौन सा सत्य है कि जप करने से हम सुखी हो गए या जप हमें सुख के साथ करना है। जैसे भगवान कहते हैं तेशाम सतत युक्त नाम भजता प्रीति पूर्वकम तदाम बुद्धि योगम तम ये उपयंतते कि आपको मुझे भक्ति कैसे करनी है प्रीति पूर्वकम करनी है तो अभी एक तरह से कहते हैं कि प्रीति तो भक्ति करने के बाद अंत में आएगी तो अभी भक्ति शुरुआत ही कर रहे हैं तो भक्ति प्रीति पूर्वक कैसे कर सकते हैं तो ये विरोधाभास है कि जो इमोशनल कॉम्पोनेंट है भक्ति का कि उसको हैप्पीनेस कह सकते हैं। उसको अफेक्शन कह सकते हैं। तो वो जो इमोशनल कॉम्पोनेंट है भक्ति का वो शुरुआत में हमको पहले से चाहिए या वो अंत में आएगा। तो अभी यह समझने के लिए हम कुछ खास करके विश्वनाथ चक्र ठाकुर जो कहते हैं उसके आधार पर चर्चा करेंगे। रामाचार्य भी इसके बारे में कुछ कहते हैं। पर मैं इसका विश्लेषण एक पर्टिकुलर पद्धति से करता हूं। ये हमारा कांसेप्ट है। ये पूरे भक्ति के अंत भक्ति का विश्लेषण करने के बाद आखिरी श्लोक में क्या बताया जा रहा है? कि आप भक्ति आनंद से करो और आपको आनंद मिलेगा। तो अभी जो सी है आई हैव इनसाइड। तो अब इसके बारे में हम देखेंगे तीन तरह से देखेंगे। इस भौतिक जगत में तीन सत्य होते हैं। इसको कहते हैं कभी-कभी जीव जगत और जगदीश। ये यम जीव ईश्वर प्रकृति कभी कहते हैं। कविता के तीसरा 13वा अध्याय है। इसके तीन शीर्षक है। तीन कॉम्पोनेंट्स के शीर्षक है वो। तो अभी जब हम भक्ति करते हैं जो भक्ति का जो हम मैकेनिज्म भक्ति में एक मैकेनिज्म ही नहीं है और कुछ है। पर जो हम समझते हैं वो हम ये तीन पहलुओं से देखेंगे कि जीव की दृष्टि से, जगत की दृष्टि से और जगदीश की दृष्टि से। और फिर किस में क्या हैप्पीनेस की क्या रोल है उसमें? इमोशन का क्या रोल है। हम तो अभी हम शुरुआत करते हैं जीव से। अभी जो आत्मा अभी हम जो है आत्मा है भगवता का पहला सीख वो है कि देहिनोस यथा देह तो अभी जो जीव है इसमें एक कई बार कंट्रोवर्सी होता है कि जो भक्ति है हम वो कहते हैं वो इनहेरेंट है या वो इनहेरिटेड है। हम इनहेरेंट मतलब क्या? यह पहले से हम में है। इनहेरिटेड मतलब क्या? हमको दी जाती है वो। तो अभी इनहेरेंट जो है ये गौडिया वैष्णव संप्रदाय में इसका काफी इसके बारे में विश्लेषण हुआ है। अगर इनहेरेंट है तो इसके लिए क्या है? नित्य सिद्ध कृष्ण प्रेम साध्य कबु नाय। श्रवणा आदि शुद्ध चित्त करय उदय। तो नित्य सिद्ध नित्य सिद्ध मतलब वो पहले से है। पर जैसे सूर्य पहले से अस्तित्व में है पर सूर्य का उदय होना चाहिए। तो वो उदय कैसे होगा? श्रवण आदि शुद्ध चित्त करय उदय। तो वो एक भाव है कि भक्ति पहले से हम में है और भक्ति एक सूरज के समान है। वो सूरज अभी ढका हुआ है या अस्त हुआ है और श्रवण से उसका उदय हो जाएगा। यह भाव है। और दूसरा है ब्रह्मांड भ्रमित कौन भाग्यवान जीव गुरु कृष्ण प्रसाद पाए भक्ति लता बीज। तो अब ये दूसरा है भक्ति लता बीज मतलब क्या? भक्ति बाहर से हमको दी जाती है। तो मतलब क्या है? भक्ति ये इनहेरिटेड है। क्या है? भक्ति हमको कोई गुरु की कृपा से भगवान की कृपा से वो हमको मिलती है। तो ये दोनों श्लोक हम कोट करते हैं। पर ये दोनों श्लोक एक तरह से ऑलमोस्ट ऑोजिट चीज कह रहे हैं। ऑलमोस्ट पूरी तरह से नहीं। पर ये ऑोजिट एक तरह से है कि भक्ति इन्हेरेंट है या इन्हेरिटेड है। तो अभी ये एक थीम मैं तीनों इसके लिए लूंगा जीव जगदीश और जगत को समझाने के लिए क्या है ये द रोल ऑफ मेटाफर्स रोल ऑफ एनालॉजीस कि जो हम उदाहरण लेते हैं उपमा लेते हैं वो उपमा से क्या स्पष्ट होता है और क्या स्पष्ट नहीं होता है। हम तो अभी दोनों में क्या है यहां पे मेटाफर था सन का। यहां पे मेटाफर है सीड का। हम तो अभी इंग्लिश में तीन चीजें हैं। सिमिली, मेटाफर और एनालॉजी। कभी-कभी हम तीनों को एनालॉजी बोल के यूज़ करते हैं। पर सिमिली मतलब क्या है? ए इज़ लाइक बी। ये क्या है? सिमिली हो गया। ए इज बी। वो उसका भीम का शरीर एक भीम का शरीर एक पहाड़ के समान था। तो यह एक सिमली होता है। मेटाफर मतलब भीम पांडवों की सेना एक एक विशाल सागर थी। सागर के समान नहीं थी। सागर ही थी। तो वो डायरेक्ट मेटाफर होता है। और ये एनालॉजी मतलब क्या है? ए इज लाइक बी एंड सी इज़ लाइक डी। जब मल्टीपल पॉइंट्स ऑफ़ कंपैरिजन होते हैं तो उसको एनालॉजी कहते हैं। कभी-कभी एक ही शब्द हम इस्तेमाल करते हैं सबके लिए। पर पॉइंट ये है एक चीज को समझाने के लिए हम उसकी किसी और चीज से तुलना करते हैं। तो जब हम मेटाफर्स यूज़ करते हैं, कोई भी तुलनात्मक डिवाइस हम यूज़ करते हैं, तो यह समझना महत्वपूर्ण है कि कोई भी तुलनात्मक कोई भी तुलना परफेक्ट नहीं होती है। कोई भी तुलना कंप्लीट नहीं होती है। चैतन्य महाप्रभु इसके लिए बताते हैं शाखा चंद्र न्याय। शाखा चंद्र न्याय का मतलब क्या है? कि जो शाखा है जो कोई छोटा बच्चा है, वह चांद को देखना चाहता है। पर उसको चांद वो हमेशा नहीं आजू-बाजू देखता है। ऊपर देखने की आदत नहीं है उसको। तो मां उसको चांद दिखाने की क्या करती है? वो पेड़ दिखता है तुमको? हां। वो पेड़ की क्या शाखा दिखती है? हां। यह पेड़ की दूसरी शाखा दिखती है। उसके बीच में तुमको चमकता हुआ चीज दिखता है? हां। हां, वो चांद है। मुझे चांद मिल गया। मैं अभी शाखा पर चढ़ के चांद को पकड़ लूंगा। नहीं। आपको चांद दिख गया है। लगता है कि शाखाओं के बीच में है पर वास्तव में वो वहां पर नहीं है। वो हमारे समझने के लिए है। तो कोई भी तुलना है वो परफेक्ट नहीं होती है। हम तो अभी हमें अमेरिका में कई जगह पे ऑटो ड्राइविंग कार्स आ गए हैं। कई कार्स में ऑटो ड्राइविंग मैकेनिज्म है। पर ड्राइवर फिर भी होता है। पर ड्राइवर को ज्यादा कुछ करना नहीं पड़ता है। पर अभी जो ट्रकर्स वगैरह अमेरिका में बहुत प्रोटेस्ट कर रहे हैं क्योंकि वो पूरा उसको रिप्लेस करने वाले हैं। कि वह कार को कुछ ड्राइवर चाहिए ही नहीं। तो, एक भक्त मुझे पूछ रहे थे, मैं अमेरिका में था कि प्रभुपाद जी कार ड्राइवर का एनालॉजी देते हैं। पर अभी ड्राइवर के बिना कार चल रहा है। तो, फिर क्या यह शरीर भी आत्मा के बिना चल सकता है। तो मैं बोला कि जो ड्राइवर है वो एक पर्सन है पर ड्राइवर ये एक प्रिंसिपल भी है। क्या है कि वो कार अपने आप नहीं चल। हम ऑटोमेटिक कह सकते हैं। ऑटोमेटिक का एक ही मतलब है कि किसी और ने प्रोग्राम किया है। वो ड्राइवर कभी-कभी कोई कोई रिमोट से डिवाइस चलता है। तो ऐसे नहीं अपने आप चल रहा है। वो कोई और उसने प्रोग्रामिंग किया है। तो प्रोग्रामिंग कहीं और से आया है। तो एक एक पैसिव प्रिंसिपल है। एक एक्टिव प्रिंसिपल है। तो जो शरीर है वो पैसिव प्रिंसिपल है। जो आत्मा है वो एक्टिव प्रिंसिपल है। पर कैसे है कि शास्त्रों में हम उदाहरण देखते हैं। आत्मा को यहां पे ड्राइवर बताया गया है। पर अगर हम वो चैरियट बॉडी मेट देख लेते हैं तो रथ में जो है वह आत्मा ड्राइवर नहीं है वही आत्मा पैसेंजर बन जाता है। वहां पर क्या है बुद्धि जो है सारथी बन जाती है। तो क्या है दोनों उपमाओं का उद्देश्य अलग है। जो जो कार और ड्राइवर का उपमा है उसका उद्देश्य क्या है? यही समझाना कि ये जड़ तत्व के परे कुछ और है। पर जो चैरियट रथ का उदा उपमा है उसका उद्देश्य क्या है? यह समझाना कि वास्तव में इन सब का मैकेनिज्म कैसे है? यह काम कैसे करता है? शरीर और आत्मा काम कैसे करती है? तो मन और बुद्धि के माध्यम से। मन जो है वह लगाम है और जो बुद्धि है वो सारथी है। तो अभी इस मेटाफर में भी क्या है? देखिए अहंकार को ज्यादा बताया नहीं है। कई जगह पे भगवान मई अर्पित मनो बुद्धि बोलते हैं। भगवान अधिकांश रूप से मई अर्पित मनोबुद्धि अहंकार नहीं बोलते। क्या है? मन और बुद्धि प्राइमरी है काम करने के लिए। तो हर एक मेटाफर जो है एक तुलना है। वह एक टूल है समझाने के लिए पर कोई भी परफेक्ट नहीं है। तो अभी इसमें क्या है कि क्या भक्ति इनहेरिटेड है या इनहेरेंट है? तो इसका अभी कोई परफेक्ट रेोल्यूशन नहीं है। पर क्या है कि हर एक तुलना का एक लिमिटेशन होता है। तो अभी कैसे है? तो अभी एक तुलना के लिमिटेशन से पर जाने के लिए हम एक और तुलना ले सकते हैं। तो क्या है जो कोल है। उसको अगर हम सोइल के समान देखते हैं, जमीन के समान देखते हैं। द सोइल इज फर्टाइल। तो अभी जो फर्टाइल सोइल होता है तो जमीन अगर फर्टाइल होती है तो वहां पे कुछ उग सकता है। अगर बीज भी डालेंगे अगर जमीन रेगिस्तान है तो वहां पे कुछ उगेगा नहीं। हम्म। तो अभी क्या है कि ये अगर हम ये सोइल की उपमा लेते हैं। जमीन की उपमा लेते हैं। जमीन इज ग्राउंड। व्हाट इज़ सइल एक्सैक्टली?
मिट्टी दैट इज़ आल्सो नॉट एक्सक्टली। फर्टाइल मिट्टी नहीं बोलते हम उपजाऊ मिट्टी। ठीक है? जमीन आप समझ जाते हैं मेनली। तो जो अभी जो जो अभी क्या होता है कि अगर हम सोइल की उपमा लेते हैं जमीन की उपमा लेते हैं तो उसका मतलब क्या है कि एक तरह से उसमें पोटेंशियलिटी है ग्रोथ का। पर दूसरा है कि कुछ और बाहर से आना भी जरूरी है। तो ये दोनों सत्य है। ऐसे नहीं कि यही सत्य है या वो सत्य है कि आत्मा में पोटेंशियलिटी जरूर है भगवान का प्रेम करने की पर वो पोटेंशियलिटी जो है उसको डेवलप करने के लिए बाहर से कुछ स्टिमुलेशन चाहिए। अभी ये स्टिमुलेशन जो है उद्दीपन कह सकते हैं उसको जो बाहर से जो प्रवृत्ति करते हैं प्रवृत्त करता है वो कभी-कभी पिछले जन्म से भी आया हो सकता है। तो ऐसे नहीं कि इस जन्म में ही कुछ भक्त का संग मिलना चाहिए। चिंतामणि जो जो बिल मंगल ठाकुर है। उनको इस जन्म में कुछ भक्त का संग नहीं मिला। आज तो एक वेश्या के संग के पास गए थे। पर तभी जो पूर्व जन्म का जो संग था वो इस जन्म के अनुभव से जागृत हो गया। तो कभी-कभी ऐसे लग सकता है कि किसी ने पिछले जन्म में भक्ति की है तो ऐसे लग सकता है कि इस जन्म में वो इनहेरेंट है। हम जैसे जैसे हम कहते हैं भक्तों के संग से भक्ति बढ़ती है। पर हम देखते हैं गजेंद्र की मोक्ष की हम प्रार्थनाएं बोलते हैं। तो गजेंद्र को किस भक्त का संग था? उस परिस्थिति में कोई संग नहीं था। पर क्या जजाप परम जाप्यम प्राक जन्म अनुशिक्षितम। तो क्या है? भक्ति इनहेरेंट है या इन्हहेरिटेड है ये एक तरह से पॉइंट मिस करता है। भक्ति क्या है? भक्ति हमेशा पोटेंशियल है। ये जो आत्मा है उसमें हमेशा प्रेम करने की प्रवृत्ति है। और प्रेम करने के लिए आत्मा एक शाश्वत एक अनलिमिटेड एक इनफाइनाइट एक परफेक्ट ऑब्जेक्ट ढूंढ रहा है। तो वह ऑब्जेक्ट का खोज तो द टेंडेंसी टू लव है बट नॉट जस्ट द टेंडेंसी टू लव द टेंडेंसी टू लव एन इटरनल ऑब्जेक्ट कि भगवान की जो खोज है उस अभी शायद किसी को पता नहीं हो कृष्ण भगवान है। शायद किसी को पता नहीं होगा कि कृष्ण कृष्ण बांसुरी बजाने वाले ये सब ये सब ज्ञान शायद आत्मा में पहले से नहीं होगा। पर जो परम सत्य इस जगत में परम सत्य क्या है? उसकी खोज करने की प्रवृत्ति व्हाट इज द सुप्रीम ऑब्जेक्ट ऑफ लव? ये आत्मा में पहले से है। तो जब हम भक्ति का तत्वज्ञान समझते हैं तो कभी-कभी क्या होता है? हमें ऐसे लगता है मुझे कुछ यह करना है जो करने की क्षमता ही मुझ में नहीं है। मान लीजिए किसी को कुछ कुछ कुकिंग करने का इंटरेस्ट ही नहीं है। कुछ प्रवृत्ति नहीं है। इंटरेस्ट नहीं है। एबिलिटी नहीं है। कुछ भी नहीं है। और उनको बोलो तुमको कुकिंग करना है। तो कभी-कभी लगता है कि उसको इंग्लिश में कहते हैं अ स्क्वायर पैग इन अ राउंड होल। कि कैसा है? एक कोई स्क्वायर ऑब्जेक्ट है उसको आप राउंड जगह में डाल देते हैं। तो कई भाई हमको लग सकता है कि मैं जो कर रहा हूं ये इसके लिए मैं सूटेबल नहीं हूं। इसके पूर्णतया मैं अनसूटेबल हूं। तो मुझे जैसे प्रभु जी फिश आउट ऑफ वाटर तो एक भक्त मुझे बता रहे थे कि मुझे लगता है प्रभुपाद जी ने मुझे मैं क्या अभी कुछ समय पहले दुबई में था तो वहां पे एक भक्त का बेटा मुझे मिलने आया था वो बता रहा था कि मैं बचपन से सुना कि कैसे ये मटेरियल वॉइस जो है वो ऐसे लगता है कि ये हम ये ऐसे बताइए वी आर फिश आउट ऑफ वाटर पर बोलता है जब भक्तों के संग में आता है तभी मुझे लगता है कि आई एम अ फिश आउट ऑफ वाटर कि मुझे लगता है कि भक्तों के संग में डोंट बिलोंग एट ऑल। हर जगह पे मुझे अनकंफर्टेबल लगता है। तो फिर मैं उससे बात कर रहा था तो क्या आई वास ट्राइंग टू अंडरस्टैंड? तो क्या था कि वो अलग-अलग लोगों की अलग-अलग प्रवृत्ति होती है। तो ही इज़ वेरी एनालिटिकल एंड वेरी आर्टिस्टिक। अभी क्या होता है कोई भी एक ऑर्गेनाइज्ड रिलीजन में आता है तो कोई ऑर्गेनाइजेशन में आता है तो उसका एक सिस्टम होता है। तो जो एनालिटिकल लोग होते हैं बहुत वो उस सिस्टम में फिट नहीं होते क्योंकि वो ज्यादा सवाल पूछते रहते हैं और जो आर्टिस्टिक लोग होते हैं वो बहुत क्रिएटिव होते हैं। तो क्या है उनको जो एकिस्टिंग सिस्टम है उसमें काम करना बोर हो जाता है तुरंत मुझे कुछ करना है। तो अभी है ना अगर कोई एनालिटिकल है और आर्टिस्टिक है दोनों है तो वो एक ऑर्गेनाइज्ड रिलीजन में फिट ही नहीं हो पाएगा वो इट इज़ लाइक अ नाइट मेयर फॉर हिम। पर इसका मतलब यह नहीं है कि वो भक्ति नहीं कर सकता है। तो मैंने बोला कि वो कुछ प्रभुपाद जी के शिष्य हैं। है। मैं इतना आर्टिस्टिक नहीं हूं पर मैं काफी एनालिटिकल हूं। तो मैंने जो मेरे मेरे से कई वरिष्ठ भक्तों से मिला है कि कई प्रभुपाद जी के शिष्य है वो वो बहुत एनालिटिकल है या वो आर्टिस्टिक है। तो आई हैव टॉक विथ देम कि आप कैसे भक्ति करते हाउ डिड यू फिट इन? तो आई कनेक्टेड हिम वि द कपल ऑफ़ प्रभुपाद डिसाइपल्स एंड दे टॉक विथ हिम के जो ये भक्त है उनके पिताजी माता-पिता जो है बहुत सीनियर भक्त हैं वहां पर कंग्रगेशन में और उनके भी चिंता थी कि हमारा बेटा भक्ति नहीं करना चाहता है। तो एक्चुअली क्या था कि ऐसे हो सकता है हमको कभी कोई लग सकता है कि मैं मेरे जो करना करने को बताया जा रहा है उसमें फिट नहीं होता हूं मैं पर वो क्या है वो शरीर और मन के स्तर पे हो सकता है आत्मा के स्तर पे नहीं है कभी-कभी हमको जो जिम्मेदारियां दी जाती है हमसे जो अपेक्षाएं होती है एक बुद्धि और शरीर के मन और शरीर के स्तर पे हम उस पे फिट नहीं हो सकते कभी नहीं होते ऐसा हो सकता है बट एट द लेवल ऑफ द सोल वी आर ऑल ऑलवेज फिट वी आर ऑलवेज फिट मतलब क्या है कि यह एक सोल की नेचुरल प्रोपेंसिटी है। तो जो शुरुआत में बताया जा रहा है कि भक्ति आनंद से करो। क्यों आनंद से करो? क्योंकि दिस इज व्हाट आई एम मेंट टू डू। मेरे आत्मा की यही पुकार है। मेरे आत्मा की यही खोज है। मेरे आत्मा की यही जरूरत है। तो भले ही अभी हम भगवान तक पहुंचे नहीं है। भगवान तक भगवान का प्रेम अभी तक हुआ नहीं है। पर क्या है जब हम समझ जाते हैं कि दिस इज द नेचुरल लॉन्गिंग ऑफ माय सोल दैट इटसेल्फ गिव्स जॉय। तो कैसे हैं कि दो प्रकार के लोग होते हैं। दोज़ हु आर लॉस्ट एंड दोज़ हु आर सो लॉस्ट दैट दे डोंट इवन नो दे आर लॉस्ट। तो हम कह सकते हैं लॉस्ट स्क्वायर्ड है वो। तो कोई ऐसे है कि लॉस्ट है वो। वो गुमराह हो गया है पर उसको पता है कम से कम कहां जाना है और अगर उसको पता है ठीक है यह रास्ता है इधर से जाना है मुझे तो पहुंच जाएगा तो क्या है एक तरह से जब हम भक्ति करने लगते हैं अगर हम भक्ति के तत्वज्ञान को समझ जाते हैं कि यह मेरी आत्मा की नेचुरल लोंगिंग है तो फिर वह जो है व्यक्ति उससे ही एक रिलीफ मिल जाता है दिस इज व्हाट आई एम मेंट टू डू और वो जो रिलीफ है यह मुझे अभी क्या मैं पहुंचा नहीं हूं पर यह रास्ते से जाना है। बहुत पता चल जाता है। उससे भी बड़ा आनंद हो जाता है। कोई रेगिस्तान में घूम गया है। अगर उसको पता चल गया इधर जाना है। कोई सागर में घूम गया पता इधर जमीन है। उससे ही बहुत रिलीफ मिल जाता है। तो ये जो है
स्टार्टिंग जॉय जो है स्टार्टिंग हैप्पीनेस क्या है? उसका एक कॉम्पोनेंट है रिलीफ। रिलीफ क्या है? दिस इज माय नेचर। दिस इज माय नेचुरल लॉन्गिंग। यह एक तरह से हम समझ सकते हैं। तो यह जीव की दृष्टि से आनंद क्यों होता है हमको? यह समझते हैं कि यही मुझे करना है। दूसरा है हम जगत की दृष्टि से देखेंगे कि तो अभी जब हमारा हमारा भगवान से प्रेम हो जाएगा तो तभी परम आनंद हो जाएगा। पर अभी क्या है जो आनंद है क्योंकि क्या है? ये रास्ते पे जाना है। तो अभी जगत जो है जगत का स्वभाव क्या है? इसके लिए अलग अलग मेटाफर्स है। अलग-अलग तुलनाएं की गई है। तो एक मेटाफर है। यह जगत एक ड्रीम के समान है। जीव जागो जीव जागो गौरा चांद बोले। तो अभी ये एक मेटाफर है। दूसरा एक मेटाफर है। यह जगत एक रिफ्लेक्शन के समान है। हम क्या उर्ध मूलमदा शाखम अश्वत्थम प्राव्ययम। ये जगत एक प्रतिबिंब के समान है। तीसरा है ये जगत एक जेल के समान है। हम कैसे है कि जेल मतलब क्या अभी दुर्ग कहते हैं हम दुर्ग ये फोर्ट है या प्रजन है वो जगत एक जेल के समान है और ऐसे अनेक मेटाफर होते हैं मैं सारे नहीं ले रहा हूं अभी बट आई जस्ट गिव यू इंडिकेशन अलग-अलग मेटाफर्स का अभी एक मेटाफर है कि ये जो जगत है ये एक इस जगत में जो जो भोग है वो सब एक मिराज के समान है। तो मिराज और रिफ्लेक्शन एक ही तरह से देख सकते हैं। आई विल कम बैक टू दिस। तो अभी इस इस तरह से अलग-अलग मेटाफर है। अनेक और मेटाफर दे सकते हैं। तो अभी ये जगत में जो मेटाफर है हर एक तुलना जो की जाती है उससे एक चीज स्पष्ट होती है। हम तो अभी क्या है कि अगर हम कहते हैं ये जगत एक सपने के समान है। तो अभी हर एक मेटाफर का लिमिटेशन भी होता है। प्रभुपाद जी के एक शिष्य थे। वो बोलते हैं कि वो वो मायावादी बैकग्राउंड से आए थे। प्रभुपाद जी ने एक लिस्ट देख जगत सपने के समान है तो बोले ठीक है वो लेक्चर खत्म हो गया और जब बाहर जाना था यहां पे दरवाजा था यहां पे यहां पे दीवार थी बोले कि दीवार एक केवल मोह है बोले दिस दिस वॉल इज़ अ इलुजन दिस वॉल इज़ इल्लुजन बोल के वो सीधा दीवार के ओर चले गए दीवार को सिर पे लग गया और सर पे बंप हो गया उनको सिर पे तो फिर वो प्रभुपाद जी के पास गए प्रभुपा जी बोले प्रभु जी आपने बोला कि सब कुछ तो ये ये एक सपना के समान है ये सब एक मोह है तो प्रभुपाद जी बोले, यह इट इज़ इट इज़ इलुजन। इन द सेंस दैट इट इज़ टेंपररी। जो ड्रीम है, वह केवल सपना, हम कहते हैं, उसका मतलब ये नहीं है कि ये फॉल्स है। ये तो ये जगत सपना है। इस ये इसका एना इस ये पॉइंट लेके बलदेव विद्या भूषण अपने गोविंद भाष में पूरा उल्टा कर देते हैं रीजनिंग को। वो कहते हैं कि ये जगत सपना है। जगत को सपने से तुलना की गई है। और हमारे शास्त्रों में बताया कि जगत सत्य है। इसीलिए सपना भी सत्य है। वो कहते हैं। और वो कहते हैं कुछ लोगों को अच्छे सपने आते हैं। कुछ लोगों को बुरे सपने आते हैं। तो ये क्यों होता है जिनको बुरे सपने क्यों आते हैं? वो कहते हैं कि जो हमारे पूर्व कर्म होते हैं जो मेजर कर्म होते हैं उनका फल हमको जागृत अवस्था में मिलता है। जो माइनर कर्म होते हैं उनका फल हमको सपने में मिलता है। तो मैं कनाडा में था एक भक्त से मिला। बोला था कि एक व्यक्ति वो भक्त बनने लगा था। बोला था कि मुझे सोने से डर लगता है क्यों? अभी कुछ समय से मुझे इंसोमिया हो गया है तो ना सोने से कितनी परेशानी होती है मुझे थोड़ा पता चल गया अभी स्लीप एपनिया क्या हो रहा है वो पर क्या है कि बोले सोने से क्यों डर लगता है अनेक से डर लगता है सोने से क्यों जैसे ही सोता हूं मुझे नाइट मेजर्स आने लगते है खौफनाक नाइट मैज आते है वो क्या है कि आजकल ये टीवी टीवी आजकल टेक्नोलॉजी बहुत बढ़ गया है तो क्या है बहुत से हॉरर मूवीज, हॉरर टीवी शोज़ आते हैं और उसमें बहुत से खौफनाक इमेजेस देखने को मिलते हैं और क्या सोने से डर लगता है। तो अभी क्या है? ये एक प्रकार का कर्म का फल है। तो सपना है पर क्या है? किसी को बुरे सपने क्यों आते हैं? क्योंकि वो एक पूर्व कर्म का फल है। तो विष्णु का एक नाम है विष्णु सहस्त्रनाम में दुस्वप्न नाशनम। दुस्वप्न नाशनम कि भगवान जो है अगर भगवान का स्मरण करते हैं, भगवान का नाम का गान करते हैं तो भगवान हमारे बुरे सपनों का विनाश कर सकते हैं। तो ड्रीम मेटाफर जो है इसके लिए क्या है? इसका पर्पस क्या है? एक तरह से यह कहना कि देयर इज अनदर रियलिटी। एक और कोई और सत्य है और उसको क्या लगे हमको? एक न्यू स्टेट ऑफ कॉन्शियसनेस। हमारे स्टेट ऑफ कॉन्शियसनेस को हमको बदलना है। कि जैसे जागृत अवस्था और अवस्था सोया हुआ अवस्था क्या है? यह अलग स्तर ही है। और एक तरह से कह सकते हैं कि हमारे कंट्रोल में नहीं है। ये एक तरह से वो परमात्मा के पास स्विच होता है कि कब हम जागे होते हैं और सो जाते हैं और कब होते सोते हैं और जाग जाते हैं। कभी अलार्म से भी उठते नहीं है। कभी हमारे अलार्म से और लोग अलार्म हो जाते हैं। पर हम उठते नहीं है। तो क्या है? कभी हम सोना चाहते सो नहीं पाते। कभी हम नहीं सोना चाहते सो जाते हैं। तो ये क्या है? एक तरह से हम प्रयास कर सकते हैं, अलार्म लगा सकते हैं। पर क्या इट्स अ शिफ्ट ऑफ कॉन्शियसनेस। वो एक अलग रियलिटी है। उसको पहुंचना है। अभी ये रिफ्लेक्शन या मिराज देखते हैं तो इसका फोकस क्या है? डेवलपमेंट ऑफ इंटेलिजेंस। कि हमें बुद्धि से समझना है कि यह मोह है, यह प्रतिबिंब है, यह एक मृग तृष्ण है। तो बुद्धि का विकास करो। उससे आप मोह के परी जाएंगे। अगर आप जेल का उदाहरण देखते हैं तो क्या है इसके लिए चेंज ऑफ़ बिहेवियर। कि किसी ने बुरा बर्ताव किया है। इसके कारण वो जेल में गया है। तो जेल से निकलना है तो उसको अपना बर्ताव बदलना है। अब ये रिफ्लेक्शन या मिराज का उदाहरण देखते हैं तो इसका प्रॉब्लम क्या होता है कि अगर कुछ लोगों की बौद्धिक क्षमता ज्यादा विकसित नहीं है तो क्या ये मोह को समझ पाएंगे कि नहीं? अगर हम कहते हैं कि हम जेल में हैं तो अभी इसका ऑब्वियस प्रॉब्लम ये आता है है कि किसी को भी अगर जेल में डाल रहे हैं उसने क्या गलत किया उनको बताना चाहिए। तो उसको बताए बिना ही जेल में डाल देते हैं तो फिर वो एक तरह से वो प्रॉपर नहीं है। वो प्रॉपर जस्ट सिस्टम नहीं लगता है। तो हर एक जो मेटाफर है उसका एक एफसिस होता है। तो अभी जो मेरा फेवरेट मेटाफर है वो है हॉस्पिटल। क्या है? अभी कहते हैं किस तरह से इसमें यह है? कि निवृत्त तर रूपगी माना भव औषधा मनोभरामात तो अभी जो हॉस्पिटल है इसमें क्या कई बार जो हरि नाम है या भगवान की कथा है भगवान का स्मरण है ये एक दवाई के समान बताया गया है भ औषधा मुकुंदमाला सूत्र में भी हरे हरि जो भगवान का नाम है भगवान का स्मरण है परम औषधि के समान है तो अभी इसमें क्या है हॉस्पिटल का मतलब क्या है क्यों जोर है क्योर ऑफ डिजायर्स। हमारी हमारी इच्छाओं को ठीक करना है। तो अभी हॉस्पिटल जो है ये अगर मेटाफर हम देखते हैं तो इसका एफेसिस क्या होता है कि हॉस्पिटल में पेन जरूर होगा हमेशा। कोई भी हॉस्पिटल में जाता है वहां पर दर्द में होंगे ये लोग। बट पेन इज अ फीचर। पेन इज नॉट द पर्पस। कि अस्पताल में क्या है? दर्द देना यह उद्देश्य नहीं है। दर्द से राहत देना ये उद्देश्य है। तो इसमें क्या है कि अगर जेल में बोलते हैं मतलब क्या है कि बाकी तीनों जो मेटाफर है एक तरह से तुमने गलती की है। तुम सोए हुए हो तुम मोह में तुम निकलो। ये जो तीनों जो मेटाफर्स है ये एक तरह से ज्यादा ही ज्ञानी मेटाफर्स है। क्योंकि इसमें क्या है? देयर इज नो रोल फॉर गॉड। तुमने गलती की है तुम सुधरो। पर अस्पताल का जो मेटाफर है इसमें क्या है? भगवान यह हमारे डॉक्टर हैं। तो यह मेटाफर से क्या होता है कि दिस इज द मोस्ट भक्ति कंपैटिबल मेटाफर। बाकी मेटाफर भी ऐसे नहीं कह सकते कि हम इस्तेमाल नहीं कर सकते। हर एक मेटाफर का अपनेप परिस्थिति संदर्भ में महत्व है। पर यह जो है इसमें गॉड्स लव जो है कैसे क्या है कि गॉड इज द डॉक्टर ट्रीटिंग अस। भगवान हमारे साथ है। भगवान हमारे लिए है। तो जब हम ये समझते हैं कि मैं एक अस्पताल में हूं और अस्पताल में हूं और मेरा अभी ट्रीटमेंट हो रहा है तो अभी अस्पताल में क्या हो सकता है कि एक तरह से एक है कॉज ऑफ द डिसीज। और दूसरा है क्योर फॉर द डिसीज। तो कॉज इज नोन या नॉट नोन। हम् और क्योर जो है नोन या नॉट नोन। बीमारी का कारण क्या है? बीमारी का हल क्या है? तो इस तरह से क्या चार क्वाड्रेंट्स हो सकते हैं। तो इनमें से सबसे अच्छा क्वाड्रेंट कौन सा है?
सबसे अच्छा
फोर्थ। ये बेस्ट है कि हमको क्यों हुआ है पता है बीमारी और क्या हल है उसका पता है। अभी तक बीमारी का हल नहीं हुआ है पर पता है। इसमें से वर्स्ट कौन सा है?
हां क्या है कि अगर बीमारी का कारण क्या है वो भी पता नहीं है और बीमारी का हल क्या है वो भी पता नहीं है। तो अभी फर्स्ट और थर्ड होगा तो क्या है उसमें?
एक कारण पता है। पर कई बीमारियां ऐसी होती है। वो पता है पर वो क्यूरेबल नहीं है। ठीक है? अभी तुमको ये बीमारी हो गई। 1 साल में तुम्हारी मृत्यु होने वाली है। हम् हैप्पी वन ईयर ऑफ लाइफ तो क्या है कॉज है क्योर नहीं है इट्स अ क्योर है कॉज नहीं है पता है वो भी बेहतर है एक तरह से यू कैन से दिस इज़ बेटर हम दिस इज़ दिस इज़ बैड तो अभी क्या है जब हम भक्ति करने लगते हैं तो अभी इनमें से हम कह सकते हैं जब हम भक्ति करने लगते हैं तो या तो हम इस क्वाड्रेंट में आ जाते हैं चौथे या कम से कम तीसरे क्वार्टर में आ जाते हैं। चौथा मतलब क्या है? एक अंतिम दृष्टि से हमको पता है कि हम भगवान से दूर चले गए इसलिए हमारे सारे दुख है। भगवान की ओर मुड़ेंगे तो दुख हमारे अंत हो जाएंगे। व्यवहारिक रूप से यह परेशानी मेरे जीवन में क्यों आई है? वो परेशानी क्यों आई उसका पता नहीं हमको पर हम जानते हैं भगवान का आश्रय लेंगे तो क्या है? हम उनके परे चले जाएंगे। भजहु रे मन श्री नंद नंदन अभय चरणारविंद रे तो अभी इस जगत के अधिकांश लोग जो हैं वो पहले या दूसरे क्वाड्रेंट में फंसे हुए हैं। तो क्या है कि अगर अभी मैं 20 22 20 साल पहले मुझे टीबी हो गया था तो उसके पहले एक डेढ़ साल में बहुत बीमार था और कोई डायग्नोसिस ही नहीं हो पा रहा था। फिर अंत में चेस्ट का एक्सरे वगैरह हुआ। फिर जो जो डॉक्टर था फिजिशियन वो मेरे से मिलने गया वो बहुत ग्रेव था। तुमको बहुत तुमको बहुत टीबी हो गया है। तुमको सीरियस टीबी हो गया है। और मेरा पहला रिएक्शन था थैंक गॉड। देखा पागल हो गए क्या? तुमको टीबी हो गया मैंने बताया। बोला हां मुझे कुछ तो प्रॉब्लम पता है पर अभी क्या प्रॉब्लम है पता तो चल गया। और फिर उसका हल क्या है वो भी पता चल गया अभी। अगर हम डॉक्टर के पास जाते है और डॉक्टर बोलते हैं कि तुम को ऐसी बीमारी है मैंने आज तक सुनी नहीं इस बीमारी के बारे में। तो व्यक्ति के अहंकार को अच्छा लगता है। इतनी स्पेशल बीमारी हो गई है। पर क्या है व्यवहारिक दृष्टि से वो प्रॉब्लम है वो तो क्या है शास्त्रों में कई बार बताया गया है बहो ज्ञान तपसा पूता मद भाव मागत पहले बहुत लोग इसी मार्ग पे गए हैं और वो शुद्ध हो गए वो सिद्ध हो गए हैं तो एक तरह से यहां पे भी जॉय होता है क्या प्रॉब्लम है क्या हल है वो पता चल गया है तो इसीलिए हम जब भक्ति करते हैं तो क्या है ये हमको अभी आनंद जो परम आत्मा के स्तर पर जो आनंद है वो आया नहीं है पर क्या है कि मैं सही मार्ग पे लग गया हूं मुझे बीमारी एक अच्छे डॉक्टर के पास हूं मैं उसका हल क्या है वो पता चल गया है तो वो ही एक बड़ा एक रिलीफ है पर रिलीफ से बढ़कर वो एक जॉय होता है ठीक है मैं अच्छी स्थिति में हूं तो ये जो है वो आनंद भक्तिम परमया मुदा भक्ति आनंद से क्यों करते हैं? क्योंकि मुझे अभी क्या है? ये जगत में जो भी हो रहा है, अभी हॉस्पिटल का उदाहरण मैं क्यों ले रहा हूं यहां पे? क्योंकि हॉस्पिटल में दर्द भी होता है। पर हॉस्पिटल का जो उद्देश्य है वो दर्द नहीं है। तो इस जगत में जो ऑबुलेंस है इस जगत में ऑब्वियलेंस है। फॉर एग्जांपल ब्यूटी है। स्ट्रेंथ है। इंटेलिजेंस है। तो ये दोनों को हम दो दृष्टि से देख सकते हैं। एक है उनको विषय के रूप में देख सकते हैं। दूसरा है उनको विभूति के रूप में देख सकते हो। तो विषय मतलब क्या? यह जगत में जो कुछ है वह मुझे मोह में डालने वाला है। जगत में जो कुछ भी आकर्षक है वो मुझे मोह में डालने वाला है। पर विभूति मतलब क्या है? यह भगवान से आया है और ये मुझे भगवान की याद दिला रहा है। तो अभी हम आज पुष्पा अभिषेक मना रहे हैं। जो पुष्प है ये सुंदर होते हैं। तो कोई इनको विषय के रूप में देख सकता है कि वो रोमांस के लिए भौतिक इंद्र तृप्ति के लिए वो फूलों का इस्तेमाल कर सकता है या वही अभी कोई कहेगा ज्ञानी होगा तो यह फूल क्या है इसका सौंदर्य अभी अभी अभी अभी है फूल शाम तक सारे वो ड्राई हो जाएंगे विद हो जाएंगे क्या फायदा है उनका उसे आकर्षित मत हो जाओ टेंपरेरी है पर वो रियल है तो विषय का मतलब क्या है दिस विल टेक अस टुवर्ड्स इलुजन ये हमें मोह में फल देके और यह सत्य है पर यह विभूति मतलब दे विल टेक मी टुवर्ड्स रियलिटी तो यह जगत को हम सकारात्मक रूप से देख सकते हैं कि इस जगत में सौंदर्य है वह टेंपरेरी है। पर भक्ति की यह स्पेशलिटी है कि भक्ति यूज द टेंपरेरी टू टेक अस टू द इटरर्नल। कि भक्ति क्या है? जो हमारे पास क्षणिक क्षणिक के लिए कुछ ही समय के लिए है। उसको मोह बोल के उसको ठुकराना नहीं है। जो है उसको एक शाश्वत उद्देश्य के लिए इस्तेमाल करना है। तो जैसे हम कहते हैं कि जब जो कर्म मार्ग है वह क्या करता है? अगर एटीट्यूड टुवर्ड्स द वर्ल्ड जगत की ओर देखना है। कर्म क्या करता है? उसको सारे जगत को रोमांटिसाइज करता है। अरे ये जगत इतना सुख से भरा हुआ है। सिर्फ तुम सुखी नहीं हो। बस तुम उसके जैसे बन जाओ, तुम ये प्राप्त कर लो, तुम ये खाओ, तुम ये खरीदो, तुम सुखी हो जाओगे। जगत को रोमांटिसाइज करते हैं। ज्ञान मार्ग में क्या करते हैं? जगत को हम डीमोनाइज करते हैं। ये जगत क्या है? सब कुछ मोह है इस जगत में। सब कुछ जो है जो आकर्षण लगता है वो और फसाएगा तुमको। तो बचे रहो। तो अभी इन दोनों के बीच में भक्ति मार्ग क्या करता है? इस जगत को यूटिलाइज करता है। तो कोई भी सौंदर्य हो, शक्ति हो, बुद्धि हो, जो भी इस जगत में आकर्षक है, भक्त उसको मोह बोल के टालते नहीं है। भक्त क्या करते हैं? उसको ये टेंपरेरी है पर ये मैं भगवान की सेवा में इस्तेमाल कर सकता हूं। इसीलिए भक्त जो है विभूति के रूप में देखते हैं। अभी ये मैं पुणे में 1996 से आया था तो तभी छोटा मंदिर था कुंज बिहारी में भी इतना बड़ा मंदिर बन गया है। तो इतना ऐश्वर्य है इतना मैं कई बार यहां पे आया हूं। पर कल पहली बार मैं मेन एंट्रेंस से अंदर आया। तो जो पूरा एंबियंस है, इतना बहुत मैजेस्टिक है और और और सीनिक भी है वो मैजेस्टिक मतलब एलिकंस जैसा है पर जो गार्डन वगैरह है वृंदा देवी है इट्स सो ब्यूटीफुल तो क्या है ये विभूति से लोग आकर्षित हो जाते हैं तो अभी ये कह सकते हैं ये भगवान की स्थिति ये टेंपरेरी है ये भी कुछ भी जगत भी शाश्वत नहीं है बट द टेंपरेरी कैन टेक अस टू द इटरर्नल तो भक्ति से क्या होता है वर्ल्ड की ओर भी हमारा जो दृष्टि होता है वो एफमेटिव हो जाता है जो क्या है जगत में जो अर्थ है हम उसको अनर्थ नहीं कहते कहते हैं ये अर्थ परमार्थ के लिए इस्तेमाल करना है। तो पैसा हो सकता है, क्षमता हो सकती है, जो भी है और लास्ट पॉइंट यह है हम देखेंगे अभी जगदीश के बारे में। तो अभी जब हम भगवान को समझते हैं तो यह भी बहुत महत्वपूर्ण है कि हम भगवान को किस तरह से समझते हैं। अभी क्या होता है कि हम कृष्ण को जब समझते हैं तो कोई भी रिलेशनशिप होता है। तो अभी एक भक्त मुझे बता रहे थे कि मुझे बताया गया कि तुम जप करो तुम्हारी चिंता चल खत्म हो जाएगी। चट एंड बी हैप्पी च ऑल एंजाइटटी विल गो अवे। पर जब से मैं जप चालू किया है तो मुझे अभी जप करने की चिंता होने लग गई है। जप का क्वांटिटी पूरा करना है। जब का क्वालिटी इंप्रूव करना है। बोले मेरे जीवन में चिंता बढ़ गई है कम होने की जगह पे। तो बोले ये ये क्या ये कोई कई बार एडवरटाइजिंग होता है, बे टेंस होता है, डिसेप्टिव एडवरटाइजिंग होता है। तो बोले क्या है डिसेप्टिव एडवरटाइजिंग है यह? कि आप बोले जब से चिंता चली गई फिर चिंता बढ़ गई है। तो मैंने उनको बताया कि क्या होता है एक है हमारा एक्सपीरियंस या हमारा इमोशन। हम्म जो हम अनुभव कर रहे हैं। और उसके पीछे होता है हमारा इंटेलिजेंस। हमारी जो बुद्धि है तो अभी क्या है? पेन। यह अनुभव हो सकता है। हम अभी किसी को फ्रैक्चर हुआ है दर्द होता है उसको हम और डॉक्टर जब उसका सर्जरी करते हैं तो उसे सर्जरी से और दर्द होता है तो क्या है दोनों दर्द किसी को पेट में दर्द है डॉक्टर इंजेक्शन देते हैं तो क्या है एक अनुभव के स्तर पर दोनों दर्द ही है पर क्या है दोनों दर्द बहुत अलग है एक दर्द जो है अस्पताल का उदाहर पहले तो क्या है? देयर इज़ अ देयर इज़ अ पेन दैट इज़ अ पार्ट ऑफ़ द डिसीज एंड देयर इज़ अ पेन दैट इज़ अ पार्ट ऑफ़ द ट्रीटमेंट। तो अनुभव के स्तर पर दोनों में फर्क नहीं लगेगा। पर बुद्धि के स्तर पे हम उसका फर्क समझ सकते हैं। तो उसी तरह से जो हमें ए्जायटी होती है। अभी जप करने की एंग्जायटी हो सकती है। पर क्या है? वो ए्जायटी एक ट्रीटमेंट के पार्ट की एंग्जायटी है। और जो जगत में एंग्जायटी होती है वो हमारा रजोगुण तमोगुण के कारण होता है वो ए्जायटी होती है तो क्या है वो हां चिंता हो सकती है पर उसका क्वालिटी उसका नेचर बहुत अलग होता है तो इसलिए अभी हम जब चिंता कर रहे हैं उसका भी एक महत्वपूर्ण है कि हमें समझना चाहिए जो भक्ति है उसको दो दृष्टि से देख सकते हैं अभी हम भगवान पे जोर दे रहे हैं भक्ति इज अनदर टू डू टू डू मतलब क्या है कि मुझे इतनी सारी चीजें करनी है और यह एक और चीज है। मैं ऑस्ट्रेलिया में था। मैं एक टाइम मैनेजमेंट सेमिनार दे रहा था। तो मैं बोला था लोगों के ऑल ऑफ़ अस हैव लॉट्स ऑफ़ टू डूस। एक विद्यार्थी ने हाथ उठाया। मेरे ही सेज़ आई डोंट हैव टू डूस आई हैव मस्ट डूस। कि अगर हर चीज मेरे जीवन में ऐसी नहीं करूंगा, तो क्या होगा? मेरा सारा जीवन बर्बाद हो जाएगा। तो हमारे जीवन में बहुत से टूज होते हैं और हमारी भक्ति एक और टू हो जाता है। और एक और चीज करना है अभी कैसे करूंगा मैं। बहुत ऐसे लग सकता है। तो अनदर टू डू यह सही है। पर वास्तव में भक्ति क्या है? भक्ति इज अनदर वे टू डू। भक्ति इज नॉट भक्ति का मतलब क्या है? एक और एक्टिविटी अपने जीवन में ऐड कर दो। यह नहीं है। भक्ति क्या है? एक अलग विचारधारा है। एक अलग कंसेप्शन है। ये क्या कंसेप्शन है? कि हम इस ब्रह्मांड में अकेले नहीं हैं। भगवान हमारे साथ है और भगवान हमारे लिए है। गॉड इज विद अस एंड गॉड इज फॉर अस। जितनी हम भक्ति करते हैं तो वो चेतना और बढ़ने लगती है। और जब वो चेतना बढ़ने लगती है तो उससे क्या होता है कि हम इस जगत के द्वंदुओं में भी थोड़ा पीसफुल हो जाते हैं। थोड़ा शांत हो जाते हैं। क्या मतलब है उसका? अनदर टू डू मतलब क्या है? कि अभी मेरा जीवन है। इसमें यह काम करना है, वह काम करना है, वह काम करना है। इसमें एक और काम आ गया। यह अनदर टू डू हो जाता है। पर अनदर वे टू डू मतलब क्या है कि जब हम भक्ति करते हैं जब हम भक्ति नहीं कर रहे हैं तो क्या होता है हमारे लिए जगत बहुत बड़ा होता है और जगत के द्वंद्व जो होते हैं वो भी बहुत बड़े हो जाते हैं कोई भी समस्या आ गई तो बड़ी चिंता में फंस जाते हैं और अगर भगवान है तो भी भगवान क्या होते हैं छोटे से होते हैं मैं जब 30 साल 30 लगभग 30 35 इयर्स पहले मैं भक्ति में लग गया तो मेरे सारे रिश्तेदारों को मैं बताने लग गया कि भक्ति क्या है भगवान क्या है तो मैं चाचा गए वो बोले भगवान उनसे तो मेरा बहुत अच्छा संबंध है। तो मैंने उनको कभी कुछ भक्ति करते हुए देखा था। कुछ आध्यात्मिक पढ़ते हुए बात करते कभी नहीं देखा था। तो मैंने उनको बोला व्हाट डू यू मीन गुड रिलेशनशिप? तो बोले म्यूचुअल नॉन इंटरफेरेंस कि वो वहां पे सुखी है। मैं यहां पे सुखी हूं। तो कई लोगों को लगता है भगवान है भी तो भी क्या फर्क पड़ता है? कुछ महत्व नहीं है। पर जब हम भक्ति करते हैं तो क्या होता है? जगत छोटा होता है और भगवान बड़े बन जाते हैं। तो जब जगत छोटा हो जाता है तो उससे क्या होता है? जगत के द्वंद भी छोटे हो जाते हैं। तो एक तरह से क्या होता है? यह जगत छोटा हो जाता है, भगवान बड़े हो जाते हैं। जब भगवान बड़े हो जाते हैं तो क्या होता है? हम पीसफुल हो जाते हैं। तो भगवान का स्मरण करना उसकी चिंता हो सकती है। पर भगवान का स्मरण करने से यह समझने से कि भगवान बड़ा सत्य है। सबसे बड़ा सत्य है। क्या होता है? धीरे-धीरे हमारी चिंता कम होने लग जाती है। हम तो ऐसे ही इसमें आई विल मेक वन लास्ट पॉइंट एंड कंक्लूड। कैसे है कि जब भगवान की भक्ति कर रहे हैं तो हम पीसफुल हो जाते हैं क्योंकि हम समझते हैं कि इस जगत में शायद मेरा पैसा चला जाएगा, मेरा रेपटेशन चला जाएगा, मेरा स्वास्थ्य चला जाएगा। पर भगवान कभी नहीं जाएंगे। भगवान हमेशा मेरे साथ में है। तो ये समझने से हम शांत हम पीसफुल हो जाते हैं। पर पॉइंट यह है कि कृष्णा जो है कभी-कभी हम समझते हैं हम कृष्णा को एक डिमांडिंग गॉड के रूप में देख सकते हैं। बट कृष्णा इज एक्चुअली एन अंडरस्टैंडिंग गॉड। कृष्णा कैसे? एज गॉड डिमांडिंग मतलब क्या है? कि ये करना है, ये करना है, ये करना है, ये करना है। अंडरस्टैंडिंग मतलब क्या है? कृष्ण समझते हैं। हमारा ऑफिस में हमारे ऑफिस में कुछ काम है पर घर में शायद हमारे कोई बीमार है किसी का एक्सीडेंट हो गया है तो एक ऑर्डिनरी बॉस भी समझता है कि हां तुम जाके अपने घर का काम संभाल लो तो भगवान तो हमारे बॉस नहीं है भगवान क्या है वो हमारे परमपिता है ओ अगर हमारे जीवन में कुछ समस्या आ रही है उसके कारण हम थोड़ा डिस्ट्रैक्ट हो जाते हैं फोकस नहीं कर पाते तो कृष्णा अंडरस्टैंड्स दैट कृष्णा इज एन अंडरस्टैंडिंग गॉड अगर हम देखते हैं 12व अध्याय के आठव से 11 श्लोक में कृष्ण अलग-अलग स्तर बताते हैं। तुम मुझसे कैसे कनेक्ट हो? बेस्ट कहते हैं वो तुम हार्ट के स्तर पर कनेक्ट हो जाओ। मुझे अपना सब पूरा अंतरंग जो है मुझे अर्पण कर दो। म अर्पित मनो बुद्धि माम एवस संशय नहीं मनस म बुद्धिम निवेश निवशिष मव अत उधम संशय अगर आप आपके हृदय को अर्पण नहीं कर सकते हो तो आप आपका मन को फोकस करो। तो ये जो है ये शुद्ध भक्त का स्तर है। उसके बाद में क्या है? अतिम समाधात न शको स्थिरम अभ्यास योग माम धनंजय कहते हैं तू अपना मन मुझ पर फोकस करने को तो ये सिद्ध भक्त का स्तर है ये साधक भक्त का स्तर है अगर कहते हैं कि अगर ये मन भी मैं फोकस नहीं करवाता हूं तो भगवान कहते हैं तुम अपने बॉडी को फोकस करो अथितम समाधात नोस अभ्यास समर्थोसी मत कर्म परमो भव मद्थ कर्माण कुर सिद्धिम वापससी तो यह एक तरह से एक सेवक का स्तर है। कई लोगों से सेवा कर सकते हैं पर साधना करने को जमता नहीं है उनको। भगवान कहते हैं वो भी ठीक है। और वो कहते हैं अगर यह भी आप नहीं कर सकते हो तो कहते हैं यू कैन ऑफर द वर्ल्ड टू मी। मतलब आप दूसरों के लिए कुछ करो। हम वो कहते हैं कि आप केवल क्या है? गुरु यतात्मवान आप एक सेल्फलेस हो जाओ। आप क्या है? खुद से बड़ा कोई राष्ट्र की सेवा करना चाहता है। कोई अपने समाज की सेवा करना चाहता है। कोई एनवायरमेंट की सेवा करना चाहता है। तो कुछ हद तक सेल्फलेस हो जाओ। तो कृष्णा ही कृष्णा इज अंडरस्टैंडिंग गॉड। तो जब हम जप करते हैं तो आई विल नाउ सर्कल बैक टू द लास्ट पॉइंट सर्कल बैक टू द फर्स्ट पॉइंट कि इज भक्ति इनहेरेंट और इनहेरिटेड? उसके बारे में कैसे है कि हम जब भक्ति कर रहे हैं तो एक चीज समझना है। ऐसे नहीं है कि हम भक्ति करके इट इज नॉट दैट वी हैव टू फॉलो द रूल्स ऑफ भक्ति टू अर्न कृष्णास लव। मुझे सुबह इस समय पे उठना ही चाहिए। मुझे इतना इस समय तक ये जप कर रहे हैं। उसके बाद मुझे कृष्ण प्रेम करेंगे। हम भक्ति इसलिए नहीं कर रहे हैं टू अर्न कृष्णास लव। कृष्णा ऑलरेडी लव्स अस। हम भक्ति इसलिए कर रहे हैं टू रियलाइज कृष्णास लव। क्या है जब भक्ति प्रैक्टिस जो हम कर रहे हैं ऐसे नहीं है कि अगर हम हमारी साधना नहीं करते हैं अच्छी तरह से तो भगवान हम पर गुस्सा हो जाएंगे भगवान प्रेम करना छोड़ देंगे ऐसे नहीं है इट इज नॉट टू अर्न कृष्णास लव क्या होता है कभी छोटे बच्चे होते हैं अगर उनको लगता है कि मैं अच्छे मार्क्स नहीं लाऊंगा तो मेरे माता-पिता मुझे प्रेम ही नहीं करेंगे तो तुम ये करना चाहिए वो करना चाहिए उसके बाद में तुम्हें कोई प्रेम करेगा अभी हर एक व्यक्ति कोई जगत में ऐसे लगता है। इस जगत में जो प्रेम है वो नश्वर होता है। अगर कोई बहुत पैसा कमा रहा है, पैसा नहीं कमाएगा तो क्या लोग उसको प्रेम करेंगे? कोई बहुत दिखने में आकर्षक है। अगर वो दिखने में आकर्षक नहीं रहेगा तो क्या उनको कोई प्रेम करेगा? तो इस जगत में हमको वी हैव टू अर्न कृष्णास लव। हमको प्रेम कई बार कमाना पड़ता है। पर भगवान का हमें प्रेम कमाना नहीं है। हमको वी हैव जस्ट रियलाइज कृष्णास लव। तो इसका क्या उदाहरण है जैसे सूरज है। हमको कुछ करना नहीं है जिससे कि सूरज रोशनी देने वाला है। हमको क्या करना है? हम कुछ पे बिल पे करके सूरज से रोशनी नहीं लेते हम। हमें क्या करना है? हमें सिर्फ अपनी आंख खोलनी है। अगर हमारी आंखें बंद है तो सूरज की रोशनी हमको दिखती नहीं है। आंखें खुल जाती है तो सूरज की रोशनी हमें दिखने लगती है। तो उसी तरह से क्या है? भगवान ऑलरेडी हम सबसे प्रेम करते हैं। पर अभी हमारी आंखें बंद है। इसलिए भगवान किस तरह से प्रेम करते हैं यह हमको अभी दिखता नहीं है। पर जितना हम भक्ति करने लगते हैं भगवान कितने कृपालु है वो समझ में लगता समझ में आने लगता है हमको। तो कैसे है कि जब हम भक्ति कर रहे हैं तो यह सूरज को अपने आप रोशनी दे रहा है। तो अभी हमें जरूर तो क्या इसका मतलब है कृष्ण डिमांड नहीं करते हैं। क्या हमें कृष्ण को समर्पण नहीं होना है। क्या क्या इसका मतलब है कि हम जप करें या ना करें ऐसे सेवा करें या ना करें कुछ भगवान तो मुझे पहले से ही प्रेम करते हैं। हां भगवान प्रेम करते हैं पर हम क्या करते हैं महत्वपूर्ण है। मान लीजिए कोई लड़का है किसी लड़की को प्रपोज करता है। प्लीज मैरी मी। और वो लड़की पूछती है क्यों तुमसे मुझसे शादी करना चाहते हो? और लड़का कहता है ये शहर में कोई और लड़की मुझसे शादी नहीं करना चाहता है। तो अभी क्या है? दैट इज नॉट द मोस्ट रोमांटिक ऑफ़ प्रपोजल्स। अगर वो लड़की उसका प्रपोजल स्वीकार करती है तो दैट वो उससे दैट शोज़ द हर लव फॉर हिम नॉट हिज लव फॉर हर क्या है वो उससे इतना प्रेम करती है मैं तुम्हारे लास्ट ऑप्शन हूं तो भी मैं स्वीकार कर लेती हूं उसका प्रेम कब दिखेगा जब उसको ऑप्शंस होंगे कोई अल्टरनेटिव भी कोई और इंटरेस्टेड है फिर भी वो उसके हाथ रहता है तो क्या उससे उसका प्रेम दिखेगा तो उसी तरह से कई बार हम भगवान के पास कब आते हैं भगवान मैंने सब कुछ ट्राई किया कुछ काम नहीं किया आप ही मेरा आखरी आश्रय हो तो भले ही हमारे भगवान आखरी आश्रय होते भगवान स्वीकार कर लेते हैं। यह क्या है? भगवान का हमारे लिए प्रेम है। तो कृष्णा एक्सेप्ट्स इवन इफ वी आर ह लास्ट ऑप्शन। हम पर क्या है? हमारा प्रेम क्या है? दैट कृष्णा शुड बी आवर फर्स्ट ऑप्शन। क्या है? सी लव दैट इज नॉट टेस्टेड कैन नॉट बी ट्रस्टेड। जो जो टेस्ट नहीं हुआ उसको ट्रस्ट नहीं कर सकते हैं। तो क्या है कि इस जगत में कई बार समस्या आती है। हमारे टेस्ट आते हैं। वो हमको भक्ति कर रहे हैं और हमको टशंस आते हैं। अरे ये प्रलोभन आता है। वो प्रलोभन आता है। वो प्रलोभन आता है। तो क्या है? ये क्यों आ रहा है? ऐसे नहीं कि भगवान हमसे प्रेम नहीं करते। भगवान वास्तव में हमें हमारे प्रेम दर्शाने का मौका दे रहे हैं। तो हमें ज्यादा से ज्यादा भगवान को ऑफर करना है। क्यों? क्योंकि उससे हमें हमारा प्रेम दिखाना है। तो वी ट्राई टू ऑफर आवर बेस्ट टू कृष्णा। तो दैट इज आवर लव। बट जो भी बेस्ट का स्टैंडर्ड है कभी अगर हम उसको मीट नहीं कर पाते हैं तो इसका मतलब ये नहीं कि कृष्णा हमको रिजेक्ट कर देते हैं। तो कृष्ण कितने के हाउ लविंग कृष्णा इज? ये समझ जाते हैं हम तो उससे भी क्या होता है? हमें प्रेम करने की प्रेरणा मिल जाती है। कि इतने प्रेम पूर्ण भगवान जो है वो मुझसे प्रेम करते हैं। वो मेरा प्रेम चाहते हैं तो जरूर मैं उनसे प्रतिसाद करूंगा। अगर कोई बहुत ही इंपॉर्टेंट व्यक्ति है, कोई प्राइम मिनिस्टर है, कोई पुलिस कमिश्नर है, कोई मूवी स्टार है, स्पोर्ट स्टार है। हम उनसे मिलना चाहते हैं और हमको पता चलता है कि वो हमसे मिलना चाहते हैं। तो वो हमसे मिलना चाहते थे। अरे तुम मुझसे मिलना चाहते हो। जैसे भक्त थे लंदन में तो वो जॉर्ज हरिसन से मिलना चाहते थे। और बहुत प्रयास कर रहे थे। मिल ही नहीं पा रहे थे। और बाद में वो एक स्टूडियो में गए थे। वहां पर जॉर्ज शूटिंग कर रहा था। वो एक दरवाजा खोला उसने। वो अंदर से बाहर आया था। उसने देखा भक्तों के थुन भक्तों से आई हैव बीन सर्चिंग फॉर यू फॉर सो लॉन्ग। तो भक्त बोले अरे हम आपको ढूंढ रहे थे आप हमें ढूंढ रहे थे। तो कोई बड़ा व्यक्ति है जो हमको ढूंढ रहा है। हमसे मिलना चाहता है तो उससे बड़ा आनंद हो जाएगा। तो कैसे भगवान हमसे संबंध जोड़ना चाहते हैं भगवान ऑलरेडी हमसे प्रेम करते हैं। ये जानते हैं। भले ही हमने उनका प्रेम अभी तक रियलाइज नहीं किया है। पर वो समझने से क्या होता है? आनंद आ जाता है। तो भक्तिम परमया दा तो अंत में हमारा टेक अवे क्या है कि ये केन प्रकारारे मन कृष्ण निवेश जैसे भी हमें भक्ति में प्रेरणा मिलती है जो भी मेटाफर हो जो भी उदाहरण हो जो भी विश्लेषण हो उससे ले हमें भगवान की भक्ति में लगना है तो हाउ भक्ति ग्रोस भक्ति का विकास कैसे होता है यह विषय था हमारा आज तो हमने तीन चीजें देखी इनसाइड पे कॉन्टेक्स्ट में क्या देखा मेनली कैसे है जो भक्ति 1.2.22 जो था कि भक्ति का जो हैप्पीनेस है क्या वह एंड में आता है या हमको शुरुआत में लाना होता है तो यह हमारा सवाल था तो इसके संबंध में हमने जीव जगत और जगदीश इन तीनों के बारे में चर्चा की। तो जीव में क्या भक्ति इनहेरेंट है या इनहेरिटेड है? सो इन्हहेरिटेड मतलब क्या है? वो सन के समान है, सूर्य के समान है या वो एक बीज के समान है। तो हमने देखा क्या? वो पोटेंशियल है। वो पहले से है पर उसको प्रवृत्त करना है। सोइल के समान है। जगत के बारे में हमने अलग-अलग मेटाफर देखे। कैसे है? जगत के बारे में क्या है? इसको हम कह सकते हैं कि यह एक ड्रीम है। यह एक प्रतिबिंब है। यह एक जेल है। तो ये सारे मेटाफर सही है। पर इसमें भगवान की भूमिका नहीं आती है। तो हमने क्या देखा? अस्पताल है। हॉस्पिटल है ये। तो हॉस्पिटल मतलब क्या है? कि गॉड इज फॉर अस। भगवान ने हमको अकेला नहीं छोड़ा है। कि जगत क्या है? पेन है। पर वो जो पेन है वो वास्तव में हमारे कल्याण के लिए है। तो इसमें हमें जगत में जो सुंदर चीजें उनको विषय के रूप में देख सकते हैं या उनको विभूति के रूप में देख सकते हैं। तो जो ज्ञान मार्ग है और जो कर्म मार्ग है कर्म मार्ग क्या करता है? जगत को रोमांटिसाइज कर देता है। जो ज्ञान मार्ग है क्या करता है? उसको डिमनाइज कर देता है कि सारा यहां पर मोह ही है। भक्ति मार्ग क्या करता है? उसको यूटिलाइज करता है। तो हां ये टेंपरेरी चीजें हैं। पर टेंपरेरी चीजें को हमें भगवान की सेवा में इस्तेमाल करना। जगदीश क्या है? तो हमने देखा कृष्ण के बारे में दो चीजें हैं। इस कृष्णा डिमांडिंग या इस कृष्णा अंडरस्टैंडिंग। तो अंडरस्टैंडिंग के बारे में हमने दो पहलू देखे कि किस तरह से किस हमने देखा कैसे भगवान चार स्तर देते हैं कि आप आपका हृदय मुझे अर्पण करो। नहीं तो फिर आपका मन अर्पण करो। मतलब फोकस करो। नहीं तो फिर आपका शरीर से सेवा करो। नहीं तो आप जगत में तो कुछ कल्याण करो। स्वार्थ से कार्य मत करो। यह 12.8 से 11 है। और दूसरा हमने देखा कि कैसे है कि वी डोंट हैव टू अर्न कृष्णास लव। जब हम हमारी भक्ति कर रहे हैं। भक्ति प्रैक्टिस हम करना चाहते हैं अच्छी तरह से। इसका उद्देश्य यह नहीं है कि हम क्या हमें भगवान का प्रेम खरीदना है या प्राप्त करना है। क्या करना है हमको? रियलाइज करना है। भगवान ऑलरेडी प्रेम करते हैं हमको। वी हैव टू रियलाइज कृष्णास लव। ऑफकोर्स हम एक्सप्रेस करते हैं हमारा लव। क्या है कि वी वांट टू डू आवर बेस्ट फॉर कृष्णा। कृष्णा डिमांडिंग नहीं है बट वी वांट टू ऑफर आवर बेस्ट। क्यों ऑफर आवर बेस्ट? क्योंकि क्या है जो लव है लव जब टेस्टेड होता है तभी ही वो ट्रस्टेड बन जाता है। जब किसी को कोई अल्टरनेटिव नहीं है इसीलिए वो किसी से प्रेम करता है। तो क्या प्रेम कर रहा है या केवल परवाह पर्याय नहीं है इसलिए कर रहा है। तो इसलिए जब हमारे समस्याएं आती है तो हमारे लव को वो एक टेस्ट करने का मौका है। और आखिरी पॉइंट था जो हमारा टेक अवे है कि जो मेटाफर्स है जो एनालॉजीस है जो पॉइंट्स है मेटाफर्स कौन सा मेटाफर हमें इस्तेमाल करना है येन केन प्रकारारेण जिस किसी भी तरह से हमें भक्ति में प्रेरणा मिलती है। किसी भी तरह से हमें कुछ संतुष्टि मिलती है। अफेक्शन लगता है भगवान की ओर कन्विक्शन लगता है। किसी भी तरह से वो लगे उससे हमें भक्ति में चलते रहना। है और धीरे-धीरे जो भगवान का प्रेम है उसका हमें साक्षात्कार हो जाएगा। बहुत-बहुत धन्यवाद। हरे कृष्णा।