Three types of austerities – Gita 17.14-16 (Hindi)
Brahmachari class at ISKCON, Juhu
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Lecture Summary
1. सत्रहवें अध्याय की पृष्ठभूमि और श्रद्धा का स्वरूप
- प्रश्नोत्तरी: अर्जुन ने भगवान कृष्ण से पूछा कि जो लोग शास्त्रों की विधि का पालन नहीं करते, किंतु फिर भी श्रद्धा से युक्त होकर विभिन्न पूजा-पद्धति अपनाते हैं, उनकी निष्ठा किस गुण (सत्व, रज या तम) के अंतर्गत आती है?
- आहार, यज्ञ, तप और दान: भगवान उत्तर देते हैं कि मनुष्य की श्रद्धा और प्रकृति को उसके आहार, यज्ञ, दान और तप के माध्यम से समझा जा सकता है।
2. तपस्या के तीन स्तर (शरीर, वचन और मन)
भगवान कृष्ण ने स्पष्ट किया कि वास्तविक तपस्या केवल जंगलों में जाकर कठिन उपवास करना नहीं है, बल्कि अपने जीवन को तीन स्तरों पर अनुशासित करना है:
- शरीर की तपस्या (शारीरिक तप):
- देव, द्विज (ब्राह्मण/ज्ञानी), गुरु और प्राज्ञ (विद्वान) का आदर-पूजन करना।
- शौच (पवित्रता), आर्जवम् (सरलता), ब्रह्मचर्य और अहिंसा का पालन करना।
- नियंत्रण: इसका अर्थ भौतिक प्रवृत्तियों और हिंसा का पूर्ण दमन नहीं, बल्कि उन्हें धर्मसम्मत तरीके से नियोजित करना है।
- वाणी की तपस्या (वाचिक तप):
- अनुद्वेगकरं वाक्यं: ऐसे शब्द बोलना जो दूसरों के मन को बिना कारण विचलित या उत्तेजित न करें।
- सत्यं प्रियहितं च यत्: ऐसा सत्य बोलना जो प्रिय हो और सबका हित करने वाला हो, जिससे लोग सत्य की ओर आकर्षित हों।
- स्वाध्यायाभ्यसनं: नियमित रूप से शास्त्रों का अध्ययन और अभ्यास करना।
- मन की तपस्या (मानसिक तप):
- सौम्यत्वं: मन की प्रसन्नता और शांति बनाए रखना।
- मौनं: मन की अनियंत्रित बडबड और नकारात्मक आंतरिक संवाद (Inner Dialogue) को शांत करना।
- आत्मविनिग्रह: विचारों और इंद्रियों पर संयम रखना।
- भावसंशुद्धिः: अपने पूरे अस्तित्व और वृत्तियों का शुद्धिकरण करना।
3. देवी-देवताओं की उपासना और गुणों का प्रभाव
- शास्त्रों में देवताओं की पूजा, यक्ष-राक्षसों की उपासना और भूतों-प्रेतों की आराधना को क्रमशः सत्व, रज और तम गुणों से जोड़ा गया है।
- साधक को संकीर्णता त्यागकर हर स्तर की श्रद्धा का उचित सम्मान करना चाहिए और दूसरों के प्रति अनावश्यक खंडन या द्वेष की भावना से बचना चाहिए।
4. दोषारोपण (Blame Game) और आत्मनिरीक्षण
- मनुष्य सामान्यतः अपनी गलतियों के लिए तीन दिशाओं में दोष ढूँढ़ता है—किस्मत को कोसना, दूसरों पर ब्लेम गेम खेलना, या खुद को पूरी तरह नकारा मानकर हताश हो जाना।
- जब जीवन में कोई आलोचना या डाँट मिले, तो क्रोध करने के बजाय आत्मपरीक्षण (Self-introspection) करना चाहिए कि हमारी प्रतिक्रिया का वास्तविक कारण क्या है।
5. अहंकार, सेवा और संतुलन
- हम सब में अहंकार सूक्ष्म रूप से विद्यमान रहता है, जो अक्सर अवसर मिलने पर प्रकट होता है।
- भक्ति और सेवा में किसी एक कार्य में निपुणता (Specialization) या गहराई में जाना अच्छा है, पर उसे ही सब कुछ मान लेना या अन्य सेवाओं का अनादर करना तमोगुण का लक्षण है। अतः भक्ति मार्ग में परिपक्वता और संतुलन बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है।
Full Transcriptions
भगवद्गीता 17.14 – 16 पर चर्चा का आरंभ
हरे कृष्ण! क्या आवाज़ सुनाई दे रही है पीछे? कई समय के बाद यहाँ पे आ रहा हूँ। मैं जुड़ा हूँ, आप सब जुड़े हैं, स्वागत है लोगों। आज मैं भगवद्गीता के तीन श्लोक सत्रहवें अध्याय के, उन पे कुछ चर्चा करूँगा। यह जो है, यह तीन प्रकार की तपस्या की बात करती है। कुछ दिन पहले, दो दिन पहले निर्जला एकादशी हुई थी, तब हमने कुछ तपस्या की बात की थी। तो तपस्या क्या होती है? तपस्या किस प्रकार की भक्ति में अनुकूल होती है? और भगवद्गीता में ख़ास है कि तपस्या की बात क्या होती है, इसके बारे में हम चर्चा करते हैं।
भगवद्गीता का सत्रहवाँ अध्याय जो है, वह ‘श्रद्धात्रयविभागयोग’ है। श्रद्धा के तीन प्रकार और इसके विषय में यह है, यह शुरुआत होती है। अर्जुन भगवान को पूछते हैं कि आपने दो प्रकार के लोगों का वर्णन किया है, सोलहवें अध्याय में। एक प्रकार के लोग हैं जो शास्त्रों का पालन करते हैं और अपनी वासनाओं का नियंत्रण करते हैं। दूसरे प्रकार के लोग हैं जो शास्त्रों का उल्लंघन करते हैं और अपनी वासनाओं के अनुसार जीते हैं।
तो यह जो ऊपर के प्रकार के लोग हैं वो हैं दैवी प्रकार के लोग जो शास्त्रों का पालन करते हैं, तो अपनी वासनाओं का नियंत्रण करते हैं। और दूसरे हैं जो आसुरी प्रकार के लोग हैं जो शास्त्रों का उल्लंघन करते हैं और अपनी वासनाओं के अनुसार जीते हैं। तो अभी अर्जुन पूछते हैं कि इसके बीच में जो लोग हैं उनकी क्या अवस्था है?
ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयान्विताः। तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्त्वमाहो रजस्तमः॥
तो भगवान से पूछते हैं अर्जुन कि कुछ लोग ऐसे हैं कि शास्त्र का पालन नहीं करते हैं, पर उनमें श्रद्धा है। तो यह श्रद्धा किस प्रकार की श्रद्धा है? और आजकल के समाज में हम बहुत देखते हैं ऐसा कि कोई किसी बाबा की पूजा करते हैं, इस पंथ में होते हैं। और कई बार उनके ऐसे जो मार्ग होते हैं उनका शास्त्रों में उल्लेख नहीं होता है। फिर भी लोग काफ़ी श्रद्धा से स्वीकार कर रहे होते हैं, करते हैं। तो फिर इसके जवाब में भगवान बोलते हैं कि आपको ये देखना चाहिए कि वो लोगों की रहने की चर्या क्या है? रहने की पद्धति क्या है? उनकी विचारधारा क्या है? पूर्ण रूप से वो कौन से गुणों में हैं?
सत्व, रज और तमोगुण में जीवन शैली
तो ऐसा नहीं है जो अब्राहमिक धर्म हैं—अब्राहमिक धर्म मतलब क्रिश्चियनिटी, इस्लाम और जुडाइज्म धर्म हैं—उनमें ऐसा दायित्व है कि आप इस गुरु का पालन करो, इस मार्ग, इस शास्त्र को अपनाओ, और ऐसा करोगे तो आप स्वर्ग में जाओगे, नहीं करोगे तो आप नर्क में जाओगे। इस तरह का जो द्वन्द्व बताया गया है, वैसा हमारे शास्त्र में नहीं बताया गया है। शास्त्र में बताया गया है कि अलग-अलग प्रकार के गुण होते हैं: सत्वगुण, रजोगुण, तमोगुण। और जिस प्रकार के गुण हैं व्यक्ति के, उसके अनुसार उसको गति मिलने वाली होगी।
तो जो लोग शास्त्र का पालन नहीं करते हैं, तो भगवान कहते हैं पर उनको श्रद्धा रहती है, तो फिर वो श्रद्धा का उनके जीवन में परिणाम क्या हो रहा है? किस प्रकार की जीवन शैली जी रहे हैं? सत्व, रज, तम किस प्रकार का जीवन जी रहे हैं, यह आपको देखना है। तो वास्तव में अनेक लोग धर्म का नाम ले सकते हैं और धर्म के अनुसार कार्य कर सकते हैं, कह सकते हैं कि हम धर्म के अनुसार कार्य कर रहे हैं। पर ऐसा नहीं है कि सब लोग वास्तव में भले भगवान का नाम लें, किसी शास्त्र का नाम लें, वास्तव में वो धार्मिक हैं। यह उनके किस नाम से अपना कार्य करते हैं, वो क्या कार्य कर रहे हैं।
तो भगवान बताते हैं कि जो चार चीज़ें जो बताते हैं: आप उनका आहार देखो, आप उनका यज्ञ देखो, उनका दान देखो और उनका तप देखो। तो यह चार चीज़ें अगर आप उनकी देखते हैं तो आप समझ पाओगे कौन से गुण में हैं और कौन से गुण में नहीं हैं, समझ पाओगे।
ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः। जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः॥
अर्जुन की अनासक्ति और कर्म का त्याग
परमार्थ मतलब जो इस दुनिया के परे जो हम चाह रहे हैं कि भगवद्धाम की प्राप्ति करें, भगवत्प्रेम की जागृति करें। तो यह जो है, भगवद्गीता ऐसा है, अर्जुन जब भगवद्गीता सुनते हैं तो उसके पहले उनके मन में दो पर्याय होते हैं। वो सोच रहे होते हैं कि अगर मैं कार्य करूँगा तो मुझे युद्ध करना पड़ेगा। युद्ध करूँगा तो युद्ध में मैं मेरे रिश्तेदारों का वध करूँगा। तो उसका पाप लगेगा और पाप लगेगा तो कर्म बंधन में फँस जाऊँगा।
पापमेवाश्रयेदस्मान्हत्वैतानाततायिनः।
अर्जुन बताते हैं कि अगर मेरे गुरुजनों को हत करूँगा (मारूँगा) तो मुझे पाप लगेगा, तो मैं युद्ध नहीं करना चाहता हूँ। अगर वो कार्य नहीं करेंगे, युद्ध नहीं करेंगे, वो वैराग्य का स्वीकार कर लेंगे, तो:
यदि मामप्रतीकारमशस्त्रं शस्त्रपाणयः। धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत्॥
तो कहते हैं पहले अध्याय के पैंतालीसवें श्लोक में कि भले ही मैं कोई शस्त्र नहीं उठाऊँ, कोई युद्ध नहीं करूँ और मेरा वध भी हो जाए तो वो भी अच्छा है सोचने के लिए। कर्म का त्याग करना है कि आप कर्म कर रहे हैं वहाँ त्याग की भावना रख सकते हैं।
मैं कुछ समय पहले अमेरिका में था, तो वहाँ पर लॉस एंजिल्स में एक यूनिवर्सिटी में मैं लेक्चर दे रहा था। तो वहाँ पर एक विद्यार्थी ने सवाल पूछा कि वास्तव में ये जो अनासक्ति है, अर्जुन तो बता देंगे कि अगर आप युद्ध नहीं करोगे तो वो अनासक्ति नहीं होगी। वो सारी दुनिया कहेगी कि आप डर गए और डर के कारण भाग गए।
भयाद्रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथाः। येषां च त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम्॥
जिन्होंने आपको बहुत महान योद्धा माना है वो अभी बोलेंगे कि आप तो कायर निकले और आपकी निंदा करेंगे, तो आपको युद्ध करना ज़रूरी है। तो उसी भाव में जो भगवान यहाँ पे तपस्या बता रहे हैं, कैसे तपस्या करनी है। तो वह तपस्या के बारे में जो वर्णन करते हैं तो ऐसे नहीं बोलते कि आप जंगल में आके तपस्या करो। अर्जुन ने ऐसी तपस्या भी की है। जब वनवास में थे तब जब उनको अलग-अलग देवताओं से अलग-अलग शस्त्र चाहिए थे तो वो हिमालय के ऊपर गए, उन्होंने शिवजी को प्रसन्न करने के लिए बहुत तपस्या की और फिर भी तपस्या की इंद्र देव को प्रसन्न करने के लिए और उनसे फिर उनको अलग-अलग प्रकार के शस्त्र वरदान में मिले। तो अर्जुन ने उस प्रकार की तपस्या भी की है। ऐसा नहीं कि अर्जुन में वो तपस्या करने की क्षमता नहीं है। पर अर्जुन को यहाँ पर वो तपस्या करने को भगवान नहीं बता रहे हैं। अर्जुन को क्या बता रहे हैं? अर्जुन को बता रहे हैं कि किस प्रकार तपस्या करते हैं?
शारीरिक तपस्या का अर्थ
हमारी जो शरीर है, हमारी वाचा है और हमारा मन है, इन तीनों के लिए अर्जुन को तपस्या बताते हैं। तो किस प्रकार की? तपस्या के लिए वर्णन करते हैं:
देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम्। ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते॥
पहला श्लोक, सत्रहवें अध्याय के चौदहवें, पंद्रहवें और सोलहवें श्लोक की चर्चा करते हैं, वर्णन करते हैं। वो देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम्। पूजनं मतलब आदर करना है। हम पूजा मतलब एक प्रकार की आरती की थाली से पूजा करना वर्णन कर सकते हैं, पर पूजा का अर्थ सिर्फ़ आरती की थाली नहीं, आदर करना है। भागवत में इसका उदाहरण आता है कि शुकदेव स्वामी तो काफ़ी युवा थे, सोलह साल के थे लगभग। पर जब वे नैमिषारण्य के जंगल में आये, शुकताल के वहाँ पे जहाँ पे परीक्षित महाराज ने अपना व्रत लिया था तप करने का, तभी सारे जो वरिष्ठ मुनि वहाँ बैठे थे, उन सब ने शुकदेव स्वामी महाराज के लिए आदर दिखाया क्योंकि वे प्राज्ञ थे। प्राज्ञ मतलब जिनमें बुद्धि है, जिनका ज्ञान विकसित है। भागवत में बताया गया है ‘वृद्धत्वं वयसा विना’ कि ऐसा नहीं है कि सिर्फ़ शरीर की आयु बढ़ने से व्यक्ति वृद्ध बनता है। जो वृद्ध शब्द है, वृद्ध का एक अर्थ है बुढ़ापा, पर वृद्ध का दूसरा एक अर्थ भी है कि वृद्धि हो रही है, आध्यात्मिक प्रगति हो रही है।
यह सत्रहवाँ अध्याय है, इसके पहले यह सोलहवाँ अध्याय था। सोलहवें अध्याय में बताया गया था कि किस तरह से व्यक्ति के तीन नर्क के द्वार हैं। किसको पता है कौन से तीन नर्क के द्वार हैं? काम, क्रोध और लोभ।
त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः। कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत्॥
सोलहवें अध्याय में बताया गया था कि यह भगवान के तीन नर्क के द्वार हैं। तो अभी यहाँ पर जो भगवान यह तपस्या बता रहे हैं वो बिल्कुल उसके विपरीत है। यह तीनों से बचने के लिए कि ब्रह्मचर्य मतलब व्यक्ति काम, वासना के प्रलोभन में नहीं जा रहा है। अहिंसा मतलब व्यक्ति क्रोध के प्रलोभन में नहीं जा रहा है। और आर्जवम, आर्जवम मतलब सरलता, मतलब वो लोभ के प्रभाव में नहीं जा रहा है।
तो यह काफ़ी रोचक है कि भगवद्गीता एक तरह से देखी जाये तो वह रणभूमि में हुई है, बताई गई है न। रणभूमि में वह इसलिए बताई गई थी जिससे कि अर्जुन को युद्ध करने को बोला जाये। पर उसी भगवद्गीता में, यहाँ पर अर्जुन को बताया जा रहा है कि आपको युद्ध करना है, अर्जुन को बता रहे हैं यह भी कि अहिंसा ये शरीर की तपस्या है। तो अगर अहिंसा ये शरीर की तपस्या है तो भगवान अर्जुन को हिंसा करने के लिए क्यों बता रहे हैं यहाँ पर? अर्थ यह है कि हम, हमारे जो भौतिक स्तर पे कार्य हैं या भौतिक स्तर पे प्रवृत्तियां हैं उनका पूरा दमन नहीं करना है, उनका नियंत्रण करना है। दमन मतलब उनको पूरा बंद करना है, नियंत्रण मतलब उनको एक नियोजित पद्धति से कार्य में लगाना है।
तो हिंसा भी कभी-कभी आवश्यक होती है। तो यहाँ पे जब धर्म के लिए हिंसा हो रही है तब हिंसा करना आवश्यक है। पर कोई भी छोटे से उत्तेजन पर, कोई थोड़ा सा उकसा देता है तो कभी-कभी हम रस्ते पर देखते हैं, कॉलेज में देखते हैं, कई जगहों पर देखते हैं लोग छोटी सी बात पर बहक जाते हैं और युद्ध करने लगते हैं, हाथापाई पर आ जाते हैं। तो क्या है, वहाँ पे क्या है? वहाँ पे हिंसा ये प्रलोभन है। वहाँ पे क्रोध के वश में आके लोग युद्ध कर रहे हैं। तो वहाँ पे विचार नहीं होता है कि क्या बात है, इसमें झगड़ा करने का कुछ मतलब है? इसमें झगड़ा करने का कुछ मतलब है? तो इतनी छोटी-छोटी बातों में कभी बहुत बड़े-बड़े झगड़े हो जाते हैं।
पर ऐसा नहीं है कि कभी युद्ध करना ही नहीं है, कुछ-कुछ समय के लिए युद्ध करना ज़रूरी होता है। तो यहाँ पर भगवान बता रहे हैं, अगर उनको अहिंसा बता रहे हैं, इसका मतलब नहीं कि हमेशा ही अहिंसा रखनी है। उसका मतलब है कि जब भी हिंसा की प्रवृत्ति आ जाएगी तो बिना विचार हिंसा नहीं करनी चाहिए, उस पे नियंत्रण होना चाहिए। तो कोई भी तत्व होता है, वह तत्व को, अगर उसी एक तत्व को सर्वस्व मान लेते हैं, तो समस्या आती है। तो अहिंसा यहाँ पूर्ण अंग है। प्रभुपाद जी बोलते हैं, शास्त्र में बताया गया है कि आप किसी भी जीव की हिंसा नहीं करो। पर यह तब है कि जब वो हिंसा का कोई कारण नहीं है, तो अगर कारण होगा तो कर सकते हैं। यहाँ पे भगवान बता रहे हैं अर्जुन को कि जो शरीर की जो वासनाएं होती हैं, उनसे जो कार्य करने की प्रवृत्ति होती है उस पे हमारा कुछ नियंत्रण होना चाहिए, तो वो बता रहे हैं इस तरह से नियंत्रण करो।
वचनों की तपस्या
तो अभी यह जो पहला श्लोक था इसमें भगवान ने बताया है शरीर की तपस्या कैसे करेंगे। और अगर हम देखेंगे कि ये तीन चीज़ें जो हैं—शरीर, वाचा, वचन और मन—वास्तव में इन सब को नियंत्रित करना एक से बढ़कर एक मुश्किल है। हम में से अधिकांश लोग कितना भी क्रोध आ जाएगा हाथापाई के लिए नहीं उतरेंगे, पर हमारे वचनों से कई बार हम हिंसा कर सकते हैं। और ऐसे कहा जाता है कि “Stones can break bones but words can break hearts.” पत्थर कोई मारता है तो उससे हड्डियां टूट सकती हैं पर वचनों से कोई मारता है तो व्यक्ति का हृदय टूट जाता है। और अगर हड्डियां टूट जाती हैं तो वो जुड़ सकती हैं, समय के साथ ठीक हो सकती हैं। पर हृदय टूट जाता है तो उसको ठीक करना काफ़ी मुश्किल होता है।
तो इसलिए अगले श्लोक में यह बताते हैं। पहले शरीर के स्तर पर तपस्या बताते हैं, उसके बाद में अभी वे भगवान मन के स्तर पर (वाचा के स्तर पर) तपस्या बता रहे हैं।
अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्। स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते॥
तो बताते हैं कि अनुद्वेगकरं वाक्यं, ऐसे वाक्य बोलो जिससे कि लोग विचलित न हों। अनुद्वेगकरं कि जिससे लोगों का जो मन है वो और विचलित न हो। उद्वेग मतलब उत्तेजना या दुःख। ख़ासकर उत्तेजना। अनुद्वेग करते हैं, जो दुःख देते हैं उसको उद्वेग करते हैं। अनुद्वेगकरं जो उद्वेग नहीं करते हैं, ऐसे बोलते हैं।
सत्यम् प्रियहितम् च यः। तो दूसरी चीज़ बता रहे हैं कि सत्य बोलो। इसमें क्या है भगवान जो शृंखला बता रहे हैं, पहले वो नहीं बोले कि सत्य बोलो, पहले बोले इस तरह से बोलो कि आप दूसरों का मन विचलित न करते हों और दूसरी बात बोले कि सत्य बोलो। इसका मतलब क्या है कि हमें ‘प्रियहितम् च यः’ करना है। कि हमें सिर्फ़ सत्य बोलना नहीं है, हमें सत्य बोलना है इस तरह से कि लोग सत्य की ओर आकर्षित हो जाएं। अगर हम सत्य बोलते हैं और उससे लोग विचलित हो जाते हैं, उससे वो दुखी हो जाते हैं और भगवान से दूर चले जाते हैं, तो फिर ऐसे सत्य बोलने से कुछ फ़ायदा नहीं है।
देवी-देवताओं की उपासना और श्रद्धा
कोई मान लीजिये कोई देवी-देवता की पूजा कर रहा है और कोई आता है, हमें बोलते हैं कि यह देवी-देवता की पूजा है, यह सब बकवास है, इसे कम बुद्धि वाले लोग करते हैं। अल्पमेधसाम्। वास्तव में यह बड़ा दुर्भाग्य है। मैं ऑस्ट्रेलिया से जब आ रहा था, सिंगापुर गए थे। सिंगापुर पूरे विश्व में एक ही ऐसा राष्ट्र है जहाँ पर इस्कॉन बैन है। इस्कॉन पर बैन है। और बैन क्यों है? वो सिंगापुर की सरकार के कारण नहीं है, वहीं के सिंगापुर के हिन्दू लोगों ने इस्कॉन पर बैन लगवाया है। और क्यों?
पहले-पहले जब भक्त… क्या होता है जब लोग भक्ति में आते हैं तो पहले बहुत उत्साह होता है। और उत्साह हाँ वो उत्साह हाँ मैं… मतलब क्या वास्तव में अंदर से उत्साह हो या ना हो, बाहर से उत्साह दिखाना बहुत होता है। तो क्या होता है जब हमें नया-नया कुछ पता चल जाता है सिद्धांत कि यह गलत है, वो गलत है, वो गलत है, सबको खंडन करने में बहुत उत्साह लेते हैं। तो वैसे ही पहले-पहले भक्त सिंगापुर में गए तो वहाँ पर देवी-देवताओं के मंदिर थे और उन्हीं मंदिरों में जाकर वह देवी-देवताओं के भक्त वहाँ पर ऑडियंस में थे और वहाँ पर देवी-देवताओं की भक्ति का खंडन करते थे।
तो वहाँ पर ऐसे कि सिंगापुर की राष्ट्रीय भाषाओं में से कई भारतीय भाषाएं भी राष्ट्रीय हैं, वहाँ पर बहुत से भारतीय लोग वहाँ पहले से रहते हैं। तो वह उत्तेजित हो गए कि उन्होंने सिंगापुर सरकार से कम्प्लेंट कर दी कि ये हरे कृष्ण लोग जो आ रहे हैं सिंगापुर में, ये हमारी हिन्दू कम्युनिटी में उपद्रव मचा रहे हैं। हम नहीं चाहते कि ये आएं। सरकार ने बंद कर दिया। जब भी भक्त जाते हैं वहाँ पे तो इस्कॉन के भक्त के रूप में नहीं जा सकते हैं। तो हमने वहाँ पे दूसरी संस्था का नाम बना दिया है, उस संस्था के अनुसार अब सारे कार्यक्रम होते हैं।
तो क्या है ये? कुछ हम देखते हैं चैतन्य चरितामृत में चैतन्य महाप्रभु भुवनेश्वर मंदिर में आते हैं और सब को बोलते हैं तुम शिवजी के भक्त मूर्ख हो? नहीं, वह भुवनेश्वर मंदिर में आते हैं और शिवजी की आराधना करते हैं। किस तरह से आराधना करते हैं कि शिवजी कितने महान भक्त हैं भगवान विष्णु के। पर वो शिवजी की पूजा का खंडन नहीं करते। हर एक चीज़ के लिए एक समय होता है। तो अगर कोई कृष्ण मंदिर में आया है और हम से भगवद्गीता का संदेश सुनना चाहता है तो उचित परिस्थिति में हम बता सकते हैं कि ये देवी देवता की पूजा ये ऐसी है ये ऐसी है। देवी देवता की पूजा, हमने शास्त्र की भी जो बात है न वो कभी-कभी हम एक ही चीज़ देते हैं।
तो भगवद्गीता में बताया गया है सातवें अध्याय में कि कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः प्रपद्यन्तेऽन्यदेवताः। जो काम के कारण जिनकी इच्छाएं लोभित हो गई हैं, वो देवता की पूजा करते हैं। देवान्देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि॥ (7.23). अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम्।
सातवें अध्याय के 20वें श्लोक से 23वें श्लोक तक भगवान देवी देवता की पूजा के बारे में वर्णन करते हैं। तो उसमें बताते हैं कि जो देवता की पूजा करते हैं वो ‘अल्पमेधसाम्’ हैं, वो कम बुद्धि वाले हैं। पर अगर हम ये एक चीज़ लेकर कहें देवी-देवता के उपासक अच्छा कम बुद्धि वाले हैं, ये एक सोपान बताया गया है। पर अगर हम सत्रहवें अध्याय में जाते हैं, सत्रहवें अध्याय में चौथे श्लोक में भगवान बोलते हैं कि:
यजन्ते सात्त्विका देवान् यक्षरक्षांसि राजसाः। प्रेतान् भूतगणांश्चान्ये यजन्ते तामसा जनाः॥
वो कहते हैं कि जो देवताओं की पूजा करते हैं वो सत्वगुणी हैं। और जो यक्षों की, राक्षसों की पूजा करते हैं वो रजोगुणी हैं। और जो प्रेतों की, भूतों की पूजा करते हैं वो तमोगुणी हैं। तो यहाँ पर भगवान बता रहे हैं कि देवी-देवता की पूजा कर रहा है जो सत्वगुण में है। तो अगर कोई सत्वगुण में है, तो वही भगवान बता रहे हैं कि देवी-देवता की पूजा कर रहा है कम बुद्धि वाला। यहाँ पर वास्तव में देवी-देवता की पूजा कर रहा है उसमें कुछ तरह का सत्वगुण ज़रूरी है क्योंकि हमें कोई देवी-देवता दिखते नहीं हैं, शास्त्र में बताया है उनकी लीलाओं का वर्णन, उनके कार्यों का वर्णन है, उनकी महिमा का वर्णन है, तो उसमें श्रद्धा रखना जो चीज़ दिखती नहीं है और जिसकी उपासना करने के कुछ नियम का पालन करना पड़ता है।
प्रकृति के गुण और जीवों की श्रेणियां
प्रकृति के गुण होते हैं। ऐसा नहीं है कि अगर कभी-कभी बोलें कि सत्वगुण का एक रंग है, रजोगुण का एक रंग है, तमोगुण का एक रंग है। यह तो सत्य है। पर जो एक रंग होता है, अगर मैं लाल बोलूँगा, तो अगर आप किसी पेंट की दुकान के पास जाओगे और लाल बोलोगे, तो वो लाल में आपको 600 लाल के शेड्स (shades) दिखा देंगे। तो क्या? तो कोई भी देवताओं की पूजा कर रहा है वो एक तरह से सत्वगुण पर है। पर देवताओं में किस देवता की पूजा कर रहा है, किस भावना से पूजा कर रहा है उसमें भी स्तर और भाग आते हैं।
तो शास्त्रों में ऐसे बताया गया है, शास्त्रों में ऐसे बताया गया है कि जो गाय होती है, जानवरों में पवित्र मानी गई है। और इसके विपरीत जो गधा है, बड़ा मूर्ख माना गया है। तो एक तरह से देखा जाए तो जो गधा है वो मूर्खता का प्रतीक बोलते हैं उसको, और जो गाय है उसको सत्वगुण में बोलते हैं। जो शेर है उसको रजोगुण में बोलते हैं। बंदर जो है उसको तमोगुण में बोलते हैं। गधा जो है उसको तमोगुण में बोलते हैं।
तो पर शास्त्र में, भागवत में से वर्णन आता है एक श्लोक है जिसके लिए बताते हैं स एव गोखरः। जो ऐसे प्रकार का व्यक्ति है वो एक गधा या एक गाय के समान है। गधा कहाँ, गाय कहाँ? दोनों को एक ही श्रेणी में क्यों डालते हैं? गधा या गाय क्यों क्या है? एक तरह से देखेंगे अगर हम जानवर योनि में देखेंगे, जानवर योनि में जो गाय है सत्वगुण में है, जो बंदर है या गधा है तमोगुण में है। पर दूसरी शैली से देखेंगे तो सब जानवर जो हैं वो तमोगुण में नहीं हैं कि जानवर योनि जो है वो ही तमोगुण में है। गाय जो है तमोगुण के स्तर में कुछ ऊपर के स्तर पर है, जो बंदर है वो तमोगुण में नीचे के स्तर में है।
यह क्यों बता रहा हूँ न, यह देवताओं की पूजा भी ऐसे हो सकती है। हम साधारणतः बोलते हैं कि देवताओं के उपासक हैं, जो शक्ति की देवी की पूजा करते हैं वो तमोगुण में हैं या जो ब्रह्मा की पूजा करते हैं वो रजोगुण में हैं, जो विष्णु की पूजा करते हैं सत्वगुण में हैं। यह स्तर सही है। पर इसमें कैसे है, जो विष्णु की पूजा करते हैं वो सत्वगुण में हैं। तो जो हैं यहाँ पे कि जो देवी-देवता की पूजा कर रहे हैं, इनमें भी श्रद्धा है, वो शास्त्रों का पालन कर रहे हैं, उनका भी आदर करना चाहिए।
वचनों में मधुरता और मौन की तपस्या
‘अनुद्वेगकरं वाक्यं’ मतलब क्या कि लोगों से ऐसा बर्ताव न करें जिससे कि उनका मन बिना किसी फल के उत्तेजित हो जाए। तो मान लें कोई गणेश जी की पूजा करता है तो हम जाकर बोलते हैं गणेश की पूजा कम बुद्धि की निशानी है, आपको शास्त्रों की पूजा करनी चाहिए, सिर्फ़ भगवान की पूजा करनी चाहिए। ये लोग ये बताते हैं, ये धर्म का मामला बड़ा ही मुश्किल है छोड़ दो। ये कह कर नास्तिक बन जाते हैं। तो हमने क्या किया उनके लिए? हमने उनका कोई सहयोग नहीं किया, उनकी कोई सेवा नहीं की, उनके साथ हिंसा की है वास्तव में तो।
वचन इस तरह से बोलने चाहिए, सत्य इस तरह से बोलना चाहिए: अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्। हितं, लोगों का हित होना चाहिए और लोगों का हित होने के लिए जो हमारे वचन हैं, प्रिय होने चाहिए। तो अभी ऐसा संभव नहीं है कि हमेशा हम जो बोलेंगे वो सब के लिए प्रिय ही होगा। कभी-कभी अप्रिय वचन बोलने ही पड़ते हैं। ख़ासकर कोई भी अगर किसी अथॉरिटी पोजीशन (Authority Position) में आता है तो लोगों का मार्गदर्शन करने के लिए उनको बताना पड़ता है कि ये जो आप कर रहे हैं गलत कर रहे हैं। तो अप्रिय वचन बोलने पड़ते हैं।
पर मौन… कई बार हम हमारी जिह्वा शांत रख सकते हैं पर हमारा मन अस्वस्थ रहता है, मन अस्वस्थ रहता है, मन अस्वस्थ रहा होता है, अंदर ही अंदर बडबड करता रहता है। और अगर कुछ बोलने को नहीं है तो कुछ डिवाइस चालू करते हैं, टीवी चालू करते हैं, मोबाइल चालू करते हैं, मोबाइल पे कुछ मूवीज देखते हैं, कुछ रेडियो सुनते रहते हैं। मन की जो ध्वनि है उसको शांत करना। तो मौन जो है, बाह्य रूप से हम बोलें या ना बोलें, हमें मन को शांत करना पड़ता है। जब ऐसा हो जाए तो क्या होगा?
योगिनं सुखमुत्तमम्, योगी उत्तम सुख का अनुभव करेगा। उपैति शान्तरजसम्, अभी जो रजोगुण है शांत हो जाएगा, ब्रह्मभूतमकल्मषम् व्यक्ति सारे कल्मष से मुक्त होकर समझेगा, मैं स्वयं ब्रह्म हूँ, मैं आध्यात्मिक तत्व हूँ, मैं आत्मा हूँ, समझ जाएगा।
तो मौन, मतलब मन को शांत करते हैं। और जब हम कृष्ण कथा करते हैं, कृष्ण कीर्तन करते हैं तो बाह्य रूप से वो मौन नहीं लगता है। हम ज़ोर-ज़ोर से कृष्ण नाम गा रहे हैं तो वो तो कोलाहल लगता है कभी-कभी। तो वो मौन नहीं लगता है और वास्तव में उससे, भले ही कोलाहल लगे, उससे मन शांत हो रहा है। मन शुद्ध हो रहा है, शुद्ध हो रहा है, शांत हो रहा है।
मौन, भगवान यहाँ पे तपस्या बोल रहे हैं, वो मन की तपस्या है। मतलब जो मन की आवाज़ है, मन की बडबड चालू होती है। यह ऐसा ही है क्या होता है, जो भी होता है, साधारणतः उसके बारे में मन कमेंट (comment) करता रहता है। कोई व्यक्ति आ गया, यह तो आलसी है, यह व्यक्ति चिड़चिड़ा है, यह व्यक्ति ऐसा ही है, यह वैसे ही है। तो हम भले ही वैसे बोलें नहीं, हर चीज़ के बारे में मन कमेंट करता रहता है। और यह जो है, यहाँ कई बार बहुत डैमेजिंग (damaging) होता है, बहुत हानिकारक होता है।
मन का जो, हमारे मन में हमेशा एक इनर डाइलॉग (inner dialogue) चल रहा होता है। और वो इनर डाइलॉग जो है, वो अगर हमेशा नकारात्मक रहे खुद के बारे में नकारात्मक हो सकता है, दूसरों के बारे में नकारात्मक हो सकता है। कोई व्यक्ति आता है और हमेशा सकारात्मक बात करता है, तो मन सोचता है ‘इसको ज़रूर मुझसे कुछ काम होगा, इसलिए इतना अच्छे से बात कर रहा है’। तो हो सकता है, नहीं हो सकता है, पर हम इस व्यक्ति से नकारात्मक क्यों रहते हैं? अगर कुछ गलत हो जाता है हमारे साथ, ‘किस्मत ही फूटी है’। किस्मत फूटी है नहीं, तुम क्यों कोस रहे हो किस्मत को? हम हमारे नकारात्मक भाव से क्या करेंगे, वो ही करेंगे।
तो इसलिए, जो है मन का जो हमेशा डाइलॉग चालू रहता है, वो ऐसा है, वो ऐसा है, वो ऐसा है, तो उसको शांत करना है। और वह, जब हम भगवान कृष्ण में लगाते हैं मन को, तभी वो मन मौन होता है।
आत्मविनिग्रह और भावसंशुद्धि
मौनम्, इसी मौन के साथ हम बोलते हैं आत्मविनिग्रह, जो खुद पर नियंत्रण करना है। तो अभी, ये तो पहले ही बोल चुके, सत्रहवें के चौदहवें श्लोक में पहले ही कि आपको ब्रह्मचर्य पालन करना है, अहिंसा करना है, सरलता, आर्जवं रखना है। तो यहाँ पे आत्मविनिग्रह का मतलब क्या है? पहले बताया गया है कि शारीरिक स्तर पे उन चीज़ों में लगना नहीं है। तो शारीरिक स्तर पे कम से कम हिंसा मत कर, शारीरिक स्तर पे कम से कम जो इन्द्रियतृप्ति में मत लग। पर यहाँ पे आत्मविनिग्रह का बता रहे हैं, यहाँ पे चिंतन के स्तर पे भी विचारों को ज़्यादा दूर जाने मत दो। और इसलिए अगर हो रहा है, भावसंशुद्धिः। भावसंशुद्धि मतलब हमारे पूरे अस्तित्व का शुद्धिकरण हो रहा है।
तो जब हम इम्प्योर (impure) को इम्प्योर देखते हैं, हम प्योर (pure) जानते हैं कि जो अशुद्ध है, जब हम उसको समझते हैं ये अशुद्ध है, तब हम शुद्ध हो जाते हैं। अभी क्या होता है, अभी जब हमारा मन रजोगुण में होता है, अशुद्ध होता है, वो अच्छा लगता है, आकर्षक लगता है, वो अशुद्ध नहीं लगता है। पर जब हम स्वीकार करते हैं, यह अशुद्ध है तो फिर क्या होगा, जब हम स्वीकारते हैं यह अशुद्ध है, तो हम खुद ही उससे दूर होते हैं।
तो जब बुद्धि के स्तर पर नहीं है, बुद्धि के स्तर पर ऐसा होगा तो अच्छी बात है। कम से कम हमें बुद्धि के स्तर पर समझना चाहिए, भले मुझे अच्छा लगता है, पर यह उचित नहीं है। यह शास्त्रों में इसके ख़िलाफ़ बताया गया है, यह मुझे नहीं करना चाहिए। तो बुद्धि के स्तर पर ज़रूर हमें समझना है। पर जब मन यह स्वीकार कर लेता है तो तभी क्या होता है? तभी हम वास्तव में शुद्ध हो जाते हैं। तो जब मन वास्तव में शुद्ध हो जाता है, तभी क्या होता है? तभी इतना प्रलोभन ही नहीं आता है, तभी हम वास्तव में शुद्ध हो जाते हैं। तो इस तरह से भावसंशुद्धि हो जाती है, तपो मानसमुच्यते।
दैनिक जीवन में तपस्या
तो यहाँ पर तपस्या जो भगवान बता रहे हैं, अगर हम इसका अनुशीलन कर रहे हैं तो इसमें वो एकादशी का उपवास करना तपस्या नहीं बता रहे हैं। वो भी एक प्रकार की तपस्या है, ज़रूर। पर वो तपस्या जो है, वह पंद्रह दिन में एक बार आती है या निर्जला एकादशी होगी तो साल में एक बार आती है। तभी हम तपस्या करेंगे तो अच्छी बात है। पर यह जो हमें बता रहे हैं, यह पूरे जीवन में, नित्य दिन करना है।
और इसलिए हमें एक दिन साल में उपवास करने से ज़रूर शुद्धिकरण होगा, और उससे उतना परिवर्तन नहीं होगा हमारे जीवन में। सत्वगुण है उसको विकसित करने के लिए छोटी-छोटी चीज़ें हैं जिनको हम करते हैं। कोई अगर निर्जला उपवास करेगा तो लोग कहेंगे यह तो बड़ा तपस्वी है। पर कोई चिल्ला के कुछ बोलता नहीं है, तो हम उसको तपस्या नहीं बोलना चाहते हैं। पर सबके जीवन में ऐसे प्रसंग आते ही हैं जब उनको क्रोध आ जाएगा, सबके जीवन में ऐसे कोई कुछ उल्टा-सीधा बोल देगा, उल्टा-सीधा हो जाता है। तो जो व्यक्ति शांत रहता है, खुद क्रोधित नहीं होता है, वो भी तपस्या है।
भगवान इस तरह तपस्या की परिभाषा बता रहे हैं। वो तपस्या की परिभाषा ऐसी नहीं है कि हमें सारा जीवन त्याग करके कुछ चमत्कारिक करना है। हमारे साधारण जीवन में, हम धीरे-धीरे अगर इसका अनुशीलन करेंगे, तो क्या होगा, इससे हमारा परिवर्तन हो जाएगा।
तपो दिव्यं पुत्रका येन सत्त्वं शुद्ध्येद्यस्माद् ब्रह्मसौख्यं त्वनन्तम्।
ऋषभदेव महाराज, पाँचवें अध्याय में, अपने पुत्रों को उपदेश देते हैं तो कहते हैं कि तपस्या का फल क्या होता है? ब्रह्मसौख्यं त्वनन्तम्, जो ब्रह्म सुख है, अनंत सुख है, वो हमें प्राप्त होता है।
यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम्।
पर इस स्वीट राइस के ऊपर एक कड़वी दवाई का लेप रखा है। पर आप कड़वी दवाई को बाहर निकाल के सिर्फ़ स्वीट राइस नहीं खा सकते हैं। आपको कड़वी दवाई पीने के बाद ही स्वीट राइस मिल सकता है। तो अग्रे विषमिव पहले ज़हर है, परिणामे अमृतोपमम्। तपस्या ऐसी है। हमको लगता है कि नहीं, नहीं कर सकते हैं, पर वास्तव में जो तपस्या है वो हमेशा तपस्या नहीं लगती है। तो हम भी प्रसन्न रहेंगे, हम भी संतुष्ट रहेंगे, दूसरों के साथ में हमारे संबंध अच्छे रहेंगे और हमें जो भी महत्वपूर्ण कार्य जीवन में करने हैं उसको हम अच्छी तरह से कर सकते हैं।
सारांश
सारांश में आज हमने चर्चा की किस तरह से कि सत्रहवें अध्याय में भगवान बता रहे हैं कि अगर कोई शास्त्रों का पालन नहीं करता है और श्रद्धा है तो व्यक्तियों को कैसे समझना चाहिए? उनके कार्यों को समझना चाहिए। उनके गुणों के संबंध में है। और उसके गुणों के संबंध में भगवान यज्ञ, दान, तपः और आहार इन चार विषयों के बारे में बोले हैं। तो उसके संबंध में तपः के बारे में चर्चा करते हैं। और हमने देखा कि भगवद्गीता में कर्म को त्याग करने को नहीं बोला है, कर्म में त्याग, कर्म को त्याग की भावना से करने को बोला है।
और उसके संबंध में यहाँ पे जो भगवान बताते हैं तपस्या करना है, वो जंगल में जाके बहुत उपवास करना नहीं बता रहे हैं। वो शरीर के स्तर पे, जिह्वा के स्तर पे और मन के स्तर पे हमें हमारे जीवन में थोड़े-थोड़े परिवर्तन करने हैं। और शरीर के स्तर पे हमने देखा कैसे काम, क्रोध, लोभ, जो हम सब को धकेलता है किसी दिशा में उसका प्रतिकार करना मतलब सत्य बोलना, सरल रहना या क्रोध न करना या ब्रह्मचर्य रखना, उसका हम नियमन करते हैं।
वचन में भगवान ने बताया ‘अनुद्वेगकरं वाक्यं’, इस तरह से बोलना है कि हम लोगों को विचलित न करें। तो हमें इस तरह से बोलना है कि सिर्फ़ सत्य नहीं बोलना है, सत्य इस तरह से बोलना है कि सत्य से लोगों को आकर्षित करना है।
और मन की तपस्या में देखते हैं ‘संतुष्टि’। यह एक तपस्या है कि मैं असंतुष्ट हूँ या संतुष्ट हूँ, इस भावना के प्रति सजग रहना है। हमें देखना है क्या चीज़ें हमें असंतुष्ट करती हैं, उन चीज़ों से दूर रहना है। संतुष्टि यह एक फ़ैसला है। अगर हम यह फ़ैसला करते हैं तो हम जिस भी परिस्थिति में रहेंगे हम संतुष्ट रहेंगे। हमको जो भगवान ने दिया है उन चीज़ों का उपयोग करके उनकी सेवा में हम प्रगति करते रहेंगे। तो बहुत धन्यवाद। किसी का कोई सवाल है?
प्रश्न-उत्तर: दोषारोपण (Blame Game)
हमारी उँगलियाँ तीन दिशाओं में जाती हैं। एक है ऊपर, एक है बाहर, तीसरी अंदर। मतलब मेरी किस्मत ही फूटी है, मेरी नियति है, इसलिए जो भी करता हूँ ख़राब जाता है। दूसरा है हम दूसरों को दोष देते हैं: “तुमने मुझे ठीक से बताया नहीं। इसके कारण ऐसा हुआ। तुम बता रहे थे तो सब कुछ चला जाता।” और तीसरा है, हम खुद को दोष देते हैं, यह भी अच्छा नहीं है। खुद को दोष देते हैं मतलब क्या बोलते हैं? “मैं कभी कुछ कर ही नहीं पाऊँगा।” तो उससे हम हताश हो जाते हैं।
ये तीनों जो हैं, यह वास्तविक नहीं हैं, मन के खेल हैं। इसके लिए फ्री मिसडायरेक्शन (free misdirection) ब्लेम गेम (blame game) में हैं। कि जो ब्लेम गेम है, उसको दोष देना, उसमें तीन प्रकार से हमारा मन इधर-उधर जाता है। तो मान लीजिए कोई चोर कहीं दौड़ रहा है। और उसका कोई सहयोगी है। पुलिस आके पूछती है, “वो चोर कहाँ गया?” वास्तव में चोर इधर ही है, पर वो कहता है “नहीं उधर गया, उधर गया, उधर गया।” और पुलिस को भगा देते हैं और चोर जहाँ पर है उसको पता ही नहीं चलता है।
तो वैसे ही क्या करता है हमारा मन? जो असली समस्या है, वो हम देखते ही नहीं हैं। “अरे ये ऐसा है, वो ऐसा है, मैं वैसा हूँ, मेरी दुनिया ये ऐसी है।” हम ऐसा बोल के क्या करते हैं, ध्यान ही हटा देते हैं, जो समस्या है उसको हम नहीं देखते हैं।
तो जब गलती हो जाती है तो क्रोध ऐसे आता है कि एक तो हो सकता है कि हम खुद पर क्रोधित हो जाते हैं कि “मैं इतना निकम्मा कैसे हो गया, मैंने ऐसी गलती कैसे की?” या फिर दूसरा लगता है कि वो व्यक्ति पर क्रोध हो जाता है कि वो व्यक्ति हमारा दोष ढूँढ़ते हैं, भले ही हमारा दोष हो या न हो। तो क्या होता है दोष हो भी, तो भी ख़ास करके जो व्यक्ति अगर हमसे थोड़ा सीनियर है, थोड़ा सा सीनियर है, तो क्या होता है, उसमें हमें वो जब कुछ गलती बताते हैं, तो हमें अपने आपमें अच्छा नहीं लगता है। तो क्या होता है, “ये क्यों मुझे गलती बता रहा है?” कोई वरिष्ठ बता रहे हों तो बात अलग लगती है। पर इसमें क्या होता है, इसको अहंकार बोलना उचित नहीं है, अहंकार हो सकता है, पर यह साधारण स्वाभाविक मानव भावना है।
संवेदनशीलता और आत्मनिरीक्षण
अभी कुछ साधु पुरुष भी होते हैं, जो रफ़-दाढ़ी कर लेते हैं, पर उनका रहन-सहन होता है, एक प्रकार से साधु जैसे होता है। पर ये जो लोग थे, वो पहले से हिप्पी (hippie) बैकग्राउंड से आये थे, तो थोड़ा हिप्पी जैसा बोलना था, चलना था, रहना था, और उनका रूप भी वैसे ही हो गया। तो अभी प्रभुपाद जी के साथ गए थे, उनको मिसरिप्रेजेंट (misrepresent) कर रहे थे। प्रभुपाद जी ने कुछ बताया नहीं उनको। प्रभुपाद जी ने क्या किया, एक बार ‘बैक टू गॉडहेड’ मैगज़ीन आ गया था, उस ‘बैक टू गॉडहेड’ मैगज़ीन में, हरिदास ठाकुर और वेश्या की कहानी थी, उसका चित्रण था।
आपको भी संवेदनशीलता का स्मरण रखना चाहिए कि कोई पब्लिक में न बोले, संवेदनशीलता से प्राइवेट में बोले। पर अगर हमें कोई डाँट भी देता है तो हमें क्रोध आ जाता है। तो कम से कम उस क्रोध पे नियंत्रण करें और हम देख सकते हैं कि ये संवेदनशीलता हमारी भावना बताती है कि हमारे लिए क्या महत्वपूर्ण है।
अगर कोई बोलता है ज़िम्बाब्वे में बॉम्ब फट गया, बॉम्ब फट गया पर ज़िम्बाब्वे से हमें कुछ लेना-देना नहीं है। अरे जुहू बीच में बॉम्ब फट गया, जुहू बीच है या हमारे इर्दगिर्द जहाँ भी है, तो हम थोड़े उत्तेजित होते हैं क्योंकि वो हमारे लिए महत्वपूर्ण है। तो कैसे है कि अगर कोई हमें डाँटता है, तो वो व्यक्ति डाँट रहे हैं या हमें गुस्सा आ रहा है, तो हम थोड़ा अन्वेषण कर सकते हैं, आत्मपरीक्षण कर सकते हैं, देखते हैं कि वो गुस्सा क्यों आ रहा है। यहाँ पर कुछ तो चीज़ है जो महत्वपूर्ण है:
“सेवा मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण है और ये सेवा मैं अच्छे से करनी चाहिए थी। मैं ऐसे केयरलेस (careless) कैसे हो गया, मैंने ध्यान क्यों नहीं दिया?” वो भाव है। या “यह व्यक्ति डाँट रहे हैं इसलिए मुझे गुस्सा आ रहा है कि शायद व्यक्ति के साथ मेरा संबंध अच्छा नहीं है।” क्यों संबंध अच्छा नहीं है वो हम आत्मनिरीक्षण कर सकते हैं। खुद समझ सकते हैं। उन भावनाओं पर कार्य करने की जगह पर हम देख सकते हैं कि भावनाएं क्यों आ रही हैं और फिर उससे हम खुद के बारे में समझ सकते हैं, हमारे संबंध के बारे में समझ सकते हैं। और हर एक व्यक्ति के बारे में क्यों क्रोध आ रहा है, वो अलग हो सकता है। पर समझ सकते हैं इस तरह से।
अहंकार और सेवा में संतुलन
“मुझे अहंकार आ जाएगा।” वास्तव में ऐसा विचार ही अहंकार है। क्यों? क्योंकि ऐसे विचार में हम ये सोच रहे हैं कि अभी अहंकार नहीं है मेरे पास। जब मैं ऐसे बोलता हूँ कि अरे मैं अच्छा भजन गाऊँगा, तब आ जाएगा। मैं सोचता हूँ कि मैं अच्छा भजन गाऊँगा, उसके बाद मुझे अहंकार आ जाएगा। उसमें मतलब क्या बोलता हूँ मैं? कि मुझे अहंकार है नहीं अभी पर बाद में आ जाएगा अहंकार। तो ऐसा नहीं है, हम सब में अहंकार पहले से है। तो क्या है? हम सब में अहंकार है पर हम सब के पास कई बार वो अहंकार प्रदर्शित करने के लिए मौका नहीं है या अहंकार प्रदर्शित करने के लिए कारण नहीं है। मतलब, मैं तो सोचता हूँ मैं बहुत बड़ा हूँ, कैसे दिखाऊँ लोगों को कि मैं बड़ा हूँ? वो पता नहीं है इसलिए मेरा गर्व बाहर नहीं आ रहा है प्रदर्शित करने के लिए कारण नहीं है।
यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन् मतलब अगर मैं अच्छा कीर्तन कर सकता हूँ तो अच्छा कीर्तन करना ही सब कुछ मान लेता हूँ। “अरे प्रवचन क्या है? मुख्य धर्म तो हरि नाम है। मैनेजमेंट तो माया है। मैं कीर्तन करता हूँ इसलिए मैं महान भक्त हूँ और बाक़ी कोई है नहीं।” कुछ ऐसा अगर भाव होता है। मेरे लिए ये चीज़ महत्वपूर्ण है, मैं ये चीज़ महत्वपूर्ण कर सकता हूँ इसलिए मैं ये करूँगा, पर दूसरी सेवाएं भी महत्वपूर्ण हैं। दूसरी सेवाओं का भी आदर होना चाहिए। भले ही मैं वो सेवा नहीं कर रहा हूँ, तो वहाँ हमें विकास करना चाहिए। तो अगर एक चीज़ को हम सब कुछ मान रहे हैं तो वास्तव में तमोगुण का लक्षण है।
तो इसलिए हम प्रशिक्षण देते हैं, ख़ासकर कि जब नए भक्त आते हैं तो ब्रह्मचारी ट्रेनिंग वगैरह जब होती है शुरुआत में या बेस ट्रेनिंग होती है तो उसमें अलग-अलग क्षेत्रों में, अलग-अलग भावों में उसको थोड़ा ट्रेनिंग मिल जाता है। पर उस समय भी अगर किसी के अंदर कुछ विशेष क्षमता है तो विशेष क्षमता की कम से कम उसकी जानकारी तो होनी चाहिए। उस भक्त को जानकारी हो जाएगी कि हम हमारी संस्कृति बनाये रखें।
तो किसी भी चीज़ में अगर निपुण होना है तो एक तरह से उसमें इन्फैचुएट (infatuate) होना ज़रूरी है। उसमें अगर हम चाहते हैं कि किसी को बहुत अच्छा संगीतकार बनना है, किसी को बहुत अच्छा लीडर बनना है, किसी को बहुत अच्छा पुजारी बनना है, किसी को बहुत अच्छी कोई सेवा करनी है, तो उसमें कभी-कभी गहराई में जाना पड़ता है। अगर कोई जन्माष्टमी के लिए बहुत अच्छा ड्रेस बना रहा है, तो उस समय वो कभी-कभी भगवान का एक ड्रेस बनाने के लिए हफ़्ते-हफ़्ते, महीने-महीने लगाता है। और वो बहुत सुन्दर अगर ड्रेस बना रहा है तो बाक़ी चीज़ों को दूर रखना होता है।
मैं इसी के बारे में जाता हूँ, तो कभी-कभी अगर एक विशेष सेवा में जा रहा है तो उसमें बहुत गहराई में चला जाना गलत नहीं है। पर उससे परिपक्वता आनी चाहिए: ‘कब मैं इतना अंदर जाके भी भक्ति में रह सकता हूँ और कभी-कभी मैं इतना इसके बारे में जाता हूँ कि भक्ति चली जाती है, उससे दूरी रहती है।’ तो अगर मैं भगवान के ड्रेस में इतना तल्लीन हो जा रहा हूँ कि जब दर्शन खुलता है तो मैं ड्रेस ही देखता हूँ भगवान को देखता ही नहीं हूँ, तो फिर वो उचित नहीं है। तो इसलिए यहाँ बैलेंस (balance) रहना चाहिए।
व्यक्ति, भक्ति में प्रगति करके वो सत्वगुण में आ जाता है। सत्वगुण में क्या होता है? सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन् प्रकाश उपजायते। किसी एक चीज़ में स्पेशलाइजेशन (specialization) अच्छी बात है, पर वो एक चीज़ ही सब कुछ नहीं मानना चाहिए। और कभी-कभी कुछ समय के लिए वो एक चीज़ में जाना बुरा नहीं है, ज़रूरी हो सकता है। और उसके बाद में पुनः मुख्य मार्ग पर आ जाना भी ज़रूरी है। तो इसलिए परिपक्वता होनी चाहिए। तो भक्ति में कुछ हद तक प्रगति करने के बाद कोई व्यक्ति किसी एक विषय में जाता है, तो फिर वो व्यक्ति परिपक्वता के लिए संतुलन रख सकता है।
बहुत-बहुत धन्यवाद। श्रीमद् भगवद्गीता की जय। श्रील प्रभुपाद की जय। भक्तों ने और भी कई सवाल किये थे कि कल के सत्र में आप सवाल पूछ सकते हैं। कल हमारा कैम्प भी है, अभी आप सवाल पूछ सकते हैं। बहुत बहुत धन्यवाद।