Three types of austerities – Gita 17.14-16 (Hindi)
Brahmachari class at ISKCON, Juhu
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संक्षिप्त सारांश
शुरेंकरिया यावा सुनाई दे रहे हैं पिछे कई साने के बाद यहां पे आ रहो हूँ हैं मुझे जड़ों हैं, पासों की जड़ों हैं, स्वागती लोग आज मभलोगीता के तीन श्लोक सत्रव अध्याय के उन्हों पे कुछ चर्चा करूँगा यह जड़ों है, यह तीन परकार की तपस्या के बाद नहीं करती हैं कुछ दिन पहले, दो दिन पहले मेर्जय लिकादिशी हूँ थी सब में कुछ तपस्या की बाद नहीं करती हैं तो तपस्या क्या होती है, तपस्या किस परकार के बक्ति में हमकूल होती है और भगवानिता में खास है कि तपस्या के बाद क्या होती है, इसके बाद एनसर चाहते हैं भगवानिता का।
मुख्य ट्रांसक्रिप्शन
शुरेंकरिया यावा सुनाई दे रहे हैं पिछे कई साने के बाद यहां पे आ रहो हूँ हैं मुझे जड़ों हैं, पासों की जड़ों हैं, स्वागती लोग आज मभलोगीता के तीन श्लोक सत्रव अध्याय के उन्हों पे कुछ चर्चा करूँगा यह जड़ों है, यह तीन परकार की तपस्या के बाद नहीं करती हैं कुछ दिन पहले, दो दिन पहले मेर्जय लिकादिशी हूँ थी सब में कुछ तपस्या की बाद नहीं करती हैं तो तपस्या क्या होती है, तपस्या किस परकार के बक्ति में हमकूल होती है और भगवानिता में खास है कि तपस्या के बाद क्या होती है, इसके बाद एनसर चाहते हैं भगवानिता का सत्रावा अध्याय जो है, वह शद्धा त्रेंभाव नहीं करता है शद्धा के तीन परकार और इसके पाशू हुँ यह है, यह शुरुवात होती है भगवान आर्जुन भगवान को पूछते है कि आपने दो परकार के लोगों का वर्णन किया है इसलिए 16 लोग हैं एक परकार के लोग हैं जो शास्त्रों का पालवन करते हैं और अपनी वास्तनाव का नियंतर करते हैं दूसरी परकार के लोग हैं जो शास्त्रों का उजलोगन करते हैं और अपने वास्तनाव के निज़ार जीते हैं तो यह जो उपर के परकार के लोग हैं वो हैं दैवी परकार के लोग जो शास्त्रों का पालवन करते हैं तो अपनी वास्तनाव का नियंतर करते हैं और दूसरे हैं जो असुरी परकार के लोग हैं जो शास्त्रों का उजलोगन करते हैं और अपनी वास्तनाव के निज़ार जीते हैं तो अभी आर्जुन पूछते है कि इसके बीच में जो लोग हैं उनकी क्या वास्तना है यह शास्त्र वदिवसूच्य वर्तते शद्धयावनिता तेशानिष्ठात का कश्णा सत्वां अजस्तना तो बगान पूछते है अर्जुन कि कुछ लोग ऐसे हैं कि शास्त्र का पालन नहीं करते हैं परमिशद्धा है तो यह शद्धा कि किस परता कि शद्धा है और आजकल के समाज में हम बहुत देखे गए ऐसा कि कोई चीज बावात की पूजा करते हैं इस पंध में होते हैं और कई बार उन ऐसे जो मार्ग होते हैं उनकी शास्त्रों के लिए नहीं होता है फिर भी लोग काफ़ी शद्धा से विकार कर रहे हो करते हैं तो फिर इसकी जवाब में बगान बोलते है कि आपको ये देखना चाहिए कि वो लोगों का रहने का चर्या क्या है रहने की पद्धती क्या है उनकी विचाधरा क्या है प्रहांबूर्फ से वो कौन से गुरों में हैं तो ऐसे नहीं है जो अब्रहानिक धर्म है अब्रहानिक धर्म मतलब क्रिश्ट्यानिटी, इसलाम और जुडाइजम धर्म है उनमें ऐसे दायत है कि आप इस गुरों का पालम करो इस मार्व, इस शास्त्र को आप नाओ और ऐसे करोगे तो आप स्वर्भन जाओगे नहीं करोगे तो आप नर्क में जाओगे इस तरह का जो द्वन्दु बताया गया है वैसे हमारे शास्त्र में ही बताया गया है शास्त्र में बताया गया है कि अलग अलग परकार नहीं गुण होते हैं सत्वगुण, परजुँँ, तमगुण और जिस परकार नहीं गुण है व्यक्ति का उसके अनिसार उसको बती मिलने होगा तो जो लोग शास्त्र का पालां नहीं करते हैं तो भवान कहते है पर उनको शर्धा रहते है तो फिर वो शर्धा का उनके जीवन में परिणाम क्या हो रहा है किस परकार के जीवन शैली जी रहे है सत्व रजतम किस परकार का जीवन जी रहे है यह आपको देखना है तो वास्तव में अनेक लोग धर्म के नाम ले सकते हैं और धर्म के नुसार कारे कर सकते हैं कह सकते हैं कि हम धर्म के नुसार कारे कर रहे हैं पर ऐसे नहीं है कि सब लोग वास्तव में भले भगवान का नाम लो किस शात्र का नाम लो वास्तव में वो धर्मिक है यह उनकी किस नाम से अपना कारे करते हैं वो क्या कारे कर रहे हैं तो भगवान बताते है कि जो चार्च जो बताते है आप उनका हाद देखो आप उनका यग्य देखो उनका दान देखो और उनका तब देखो तो यह चार चीज़े गर आप उनकी देखते है तो आप समझ पाओगे कौन से गुर्ण में देखो और कौन से गुर्ण में समझ नहीं आओगे पूर्धम गच्छन सत्वस था अधो गच्छन गिता था जगन्य गुर्ण गच्छन सतवस था अधो गच्छन गिता था जगन्य गुर् परमार्थ मतलब जो इस दुनिया के परे जो हम चाहा रहे हैं कि बगवत दाम की प्राक्ती करें बगवत प्रेम की जाहूर्ती करें तो यह जो है बगवत गीता ऐसा है आर्जून जब बगवत गीता सुनते हैं तो उसके पहले उनके मंद में दो पर्याय होते हैं वो सोच रहे होते हैं कि अगर मैं कार्य करुँगा तो मुझे युद्ध करना पड़ेगा युद्ध करुँगा तो युद्ध में मैं मेरे विष्ठदारों का वध करुँगा तो उसके पाप लगेगा और पाप लगेगा तो कर्म बंदे में पस जाओगा पापमेवाश्यों रस्मान हत्वैतानाताइना रस्मानार्वाहंतु वार्जन बताते हैं कि अगर मेरे सुर्यों को हट करुँगा तो मुझे पाप लगेगा तो मैं युद्ध नहीं करना चाहता हूँ अगर वो कारे नहीं करेंगे युद्ध नहीं करेंगे वो वैराग के स्विकार कर लेंगे तो यदी मां प्रती कारण अशस्त्रम शस्त्रपाण है धात राष्ट्रारने हमने स्प्रमेक्षेम तरंबाइत तो कहते हैं पहले अध्यागे पड़ाकाल से शोचने की बले ही मैं कोई शास्त्र नहीं उठाओं कोई युद्ध नहीं करूँ और मेरा वद भी हो जाए तो वो भी अच्छा है सोचने के लिए कर्म का त्याग करना है कि आप कर्म कर रहे हैं वहाँ त्याग की भावना सकते हैं कर्म का त्याग करना है कि आप कर्म कर रहे हैं वहाँ त्याग की भावना सकते हैं मैं कुछ समय पहले अमरिका में था तो वहाँ पर लोस ऐंजिन्स में एक इनिवर्सिटी में मैं लेक्शर रहा था तो वहाँ पर एक विद्धाती ने सबाल पूछा कि वास्तव में कि ये जो अनासक्ती है कि ये जो अना सक्ती है कि ये जो अनासक्ती अर्जुन तो बता देगे कि अगर आप आपका युद्ध नहीं करोगे तो वो अनासक्ती नहीं होगी होगी वो सारी दुनिया गईगे कि आप डर गएगे और डर के कारण वयादराव परतं मंसंतेत्वामार्था कि एशांजितं भहमतों भूत्वा यासिसिलागरम जो जिनोंने आपको बहुत महान युद्ध माना है वो अभी बोलेगे कि आप तो कायर निकले और आपकी नह्या करेंगे तो आपको युद्ध करना ज़रूरी है तो उसी भाव में जो भगवान यहाँ पे तपस्या बता रहे है कैसे तपस्या करनी है तो वह तपस्या के बारे में जो बनल करते हैं तो ऐसे नहीं बोलते कि आप जंगल में आके तपस्या करने आर्जुन में ऐसे तपस्या भी की है जब बनवास में थे तब जब उनको अलग-अलग देवताओं से अलग-अलग शिस्तर चाहिए थे तो वो हिमालेव के उपर आखे उनने शिवु जी को प्रसंद करने के लिए बहुत तपस्या की और फेर भी तपस्या की इंदर देव को प्रसंद करने के लिए और उनसा पर उनको अलग-अलग परकार के शिस्तर वादाओं तो आर्जुन में उस परकार की तपस्या भी की है ऐसे नहीं कि आर्जुन में वो तपस्या करने की शम्ता नहीं है पर आर्जुन यहां पर वो तपस्या करने को भगवान भी बता रहे है आर्जुन क्या बता रहे है?
आर्जुन को बता रहे है कि किस परकार तपस्या करते है? हमारी जो श़रीर है, हमारी वाचा है और हमारा मन है इन तीनों के लिए आर्जुन पर तपस्या करते है तो किस परकार की? तपस्या के लिए वादाओं करते हैं देवद्विजगुरू प्राज्यां पूजनमिशल्चमार्जवं प्रम्मचर्यमाहिमसाच्यो शारीरं तप उच्छते पहला जश्टों के सप्ता अध्याके चाउदावा, पंद्रावा और सुलावश्यों करते हैं स्विवार्ण करते हैं वो देवद्विजगुरू प्राज्यां पूजनमिशल्चमार्जवं पूजनमिशल्चमार्जवं मतलब आधर करना है हम पूजा मतलब एक प्रकार की आर्थिकी थाली से पूजा करना वर्ण कर सकते हैं पर पूजा का आर्थिकी थाली से आधर करना है पूजा का आर्थिकी थाली से पूजनमिशल्चमार्जवं पूजनमिशल्चमार्जवं पूजनमिशल्चमार्जवं पूजनमिशल्चमार्जवं पूजनमिशल्चमार्जवं पूजनमिशल्चमार्जवं पूजनमिशल्चमार्जवं पूजनमिशल्चमार्जवं पू बादोतमें इसका उदार्णाता है कि शुदेवस्वामी तो काफी जुआ थे सोला साल के थे लगबाद पर जब वे नेमिशार्यमे के जंगल में आये शुदकाल के महाँफे जहांपे परिशित महाराज ने अपना व्रत ही जा था तप करने का तभी सारे जो वरिष्ट महाँ हो रहे थे वह उन सब ने शुदेवस्वामी महाराज के लिए कि वे प्राव्गी थे प्राव्गी मतलब जिन्में बुद्धी है जिनका ज्ञान विक्सित है बादोतमें बता गया है बुद्धत्म वयसाविना कि ऐसे नहीं है कि सिर्फ शरीब के आईउ बड़ने से बुद्ध बनता है जो बुद्ध शब्द है बुद्ध का एक अर्था है कि बुढाबाव पर बुद्ध का दूसरा एक अर्था भी है बुद्धी हो रही है बुद्धी हो रही है उतलग प्रगती हो रही है बुद्ध का एक अर्था है कि बुद्धी हो रही है बुद्धी हो रही यह सत्रावा अध्या है इसके पहले यह सोलावा अध्या था सोलावा अध्या में पताया रहा था कि किस तरह से विक्ति को तीन नरत के द्वार है किसको पताया कौन से तीन नरत के द्वार है काम, ख्रोग, अर्लोग त्रिविधं नरतस्थेदं द्वारं नाशनमात्मा काम, ख्रोग, अर्लोग, स्टरस्मा, रेतः, प्रयूंति जित, सोलाव अध्या के किसको पताया रहा था कि यह भगवान की तीन नरत के द्वार है तो अभी यहां पर जो भगवान यह तपस्या बता रहे है वो बिल्कुल उसके विपरिती यह तीनों से बचने के लिए कि ब्रह्मचर्य मतलब विक्ति काम, वास्ना के परलोगन के नहीं जा रहा है अहिंसा मतलब विक्ति ख्रोग के परलोगन के नहीं जा रहा है और आर्जवम, आर्जवम मतलब सरलता, मतलब वो लोग के प्रभाव में नहीं जा रहा है तो यह काफी रोचक है कि भगवत घीता एक तरह से देखी जाये तो वह रन्भूमी में हुई है, बताई गई ही न, रन्भूमी में वह इसलिए बताई गई थी जिससे कि आर्जुन को युद्ध करने को बोला जाये पर ओसी भगवत घीता में, यहां पर आर्जुन को बता जा रहा है कि आपको युद्ध करना है, आर्जुन को बता रहे है यह भी कि अहिंसा ये शरीर के तपस्य है तो अगर अहिंसा ये शरीर के तपस्य है तो भगवान अर्जुन को हिंसा करने के लिए बता रहे है यहां पर अर्था यह है कि हम, हमारे जो भावतिक स्थर पे कार्य है या भावतिक स्थर पे प्रवुत्या है उनका पूरा दमन नहीं करना है उनका नियंत्रन करना है दमन मतलब उनको पूरा बनत करना है नियंत्रन मतलब उनको एक नियोजित पढ़धती से कार्य में लगता है तो हिंसा भी कभी कभी आवश्चिक होती है तो यहांबे जब धर्म के लिए हिंसा हो रहा है तब हिंसा करना आवश्चिक है पर कोई भी छोटे से उत्तेजन पर कोई थोड़ा सा उपसा देता है तो कभी कभी हम रस्ते पर देखते हैं, कॉलज में देखते हैं, कई ज़्योग पर देखते हैं लोग छोटे से बहल जाती हैं और जुद्ध करने लगते हैं, हाथा पाई पर आ जाते हैं तो क्या है, वहाँ पे क्या है, वहाँ पे हिलसा ये प्रलोग है वहाँ पे क्रोध के वश्च में आ थे इन लोग जुद्ध कर रहे हैं तो वहाँ पे विचार नहीं होती है कि क्या बात है, इसमें ज़गडा करने कुछ मतलब है, इसमें जगडा करने कुछ मतलब है तो इतने छोड़ी-छोड़ी बातों में कभी बहुत बड़े-बड़े जल्गे हो जाते हैं पर ऐसे नहीं है कि कभी युद्ध करना ही नहीं है, कुछ-कुछ समय के लिए युद्ध करना ज़रूरी होता है तो यहाँ पर भगवान बता रहा है, अगर उनको अहिंसा बता रहा है, इसका मतलब नहीं कि हमेशा ही अहिंसा रखना है उसका मतलब है कि जब भी एहिंसा की प्रोत्ति आ जाएगे तो भी एहिंसा नहीं करनी चाहिए उस पे नियंद्र नहीं चाहिए तो कोई भी तत्व होता है, वह तत्व को, अगर उसी एक तत्व को सर्वस्रिश्च बता रहते हैं, तो समस्या आती है तो अहिंसा यहां तो पूर्णांग है रोपा जी बोलता है, माहिंसा यहां तो बोलता है शास्त्र में बता रहा है कि आप किसी भी जीवन की हिंसा नहीं करो पर यह कम है कि जब वो हिंसा का कुई कारण नहीं है, तो एगर कारण होंगा तो कर सकते हैं यहां पे भगवान बता रहे है आर्जुन को कि जो शरीर के जो वासनाएं होती हैं, उनसे जो कारे करने के प्रवुत्ति होती है उस पे हमें अमारे कुछ अन्यंत्रन होना चाहिए, तो वो बता रहे हैं इस तरह से अन्यंत्रन करो तो अभी यह जो पहला शलोग था इसमें भगवान ने बता रहा है शरीर की तपस्य कैसे करेंगे और अगर हम देखेंगे कि ये तीन चीज़ जो है शरीर, वाचा, वचन और मन वास्तव में इन सब को नियंतन करना एक से एक और मुझ्किल है हम मेंसे अधिकांच लोग कितना भी क्रोत आ जाएगा हाथा पाई के लिए उत्राएगे पर हमारे वचनों से कई बार हम निल्सा कर सकते हैं और ऐसे कहा जाता है कि स्टोन्स कें ब्रेक बोन्स बर वर्डस कें ब्रेक हार्ट्स पत्थर कोई मारता है तो उससे हड्या तूप सकती है पर वचनों से कोई मारता है तो व्यक्ति का रुदर्य तूप जाता है और अगर हड्या तूप जाती है तो वो जो भाव है उसको समय तूप हो सकती है पर रुदर्य तूप जाता है तो उसको ठीक करना काफ़ी मुश्किल होता है तो इसलिए अगले श्टोक में यह बताते हैं पहले शिर्वी के स्थर पर तपस्य बताते हैं उसके बाद में अभी वे बगवान मन के स्थर पर तपस्य बता रहे हैं अनुद्वेग करम वाक्यम सत्यम् प्रियहितं चयः साधायाब्धसनं चयः वानमयं तप उच्छते तो बताते हैं कि अनुद्वेग करम वाक्यम ऐसे वाक्य बोलो जिस्ते कि लोग मिचलिक न हो अनुद्वेग करम कि जिसे लोग का क्योंं मन है वो और मिचलिक न हो उद्वेग मतलब उतेजन या दुख जाने सकते हैं खासका उतेजन अनुद्वेग करते हैं जो दुख लेते हैं उसको उद्वेगर करते हैं अनुद्वेग करम जो उद्वेग नहीं करते हैं ऐसे उच्छते हैं सत्यम् प्रियहितम् चयः तो दुसरा चीज़ बता रहे हैं कि सत्य बोला इसमें क्या है भगवान जो सिंख्रा बता रहे है पहले वो नहीं बोले सत्य बोले पहले बोले इस तरह से बोलो कि आप दुसरों का मुझे विच्रित न करते हैं और दुसरी बोले कि सत्य बोले इसका मतलब क्या है कि हम प्रियहितम् चयः नहीं करते हैं कि हमें सिर्फ सत्य बोलना नहीं है हमें सत्य बोलना है इस तरह से कि लोग सत्य के ओर आकरशित हो जाएं अगर हम सत्य बोलते हैं और उससे लोग विच्रित जाते हैं उससे वो दुखी हो जाते हैं और भगवान से दूर चले जाते हैं तो फिर ऐसे सत्य बोलने से कुछ पाजा नहीं है कोई मान लिजिये कोई देवि देवता की पूजा कर रहा है और कोई आता है हमें बलते हैं कि यह देवि देवता की पूजा है यह सब भक्वास है इसकाम बुद्धी वाल लोग करते हैं अलप में इससा बासता में बड़ा तुरभाग्य है मैं अस्ट्रिलिया से जब आ रथा सिंगापोर गए आ था सिंगापोर पूरे विश्व में एक ही ऐसा राष्टर है यहाँ पर इसकाम बैंड है इसकाम पर बैंड है और बैंड क्योंं है वो सिंगापोर के सरकार में कारण नहीं है वहीं के सिंगापोर के हिंदु लोगों ने इसकाम पर बैंड लेते हैं और क्योंं पहले पहले जब बक्त क्या होता है जब लोग बक्ती में आते हैं तो पहले बहुत उच्छा होता है और उच्छा हाँ वो उच्छा हाँ मैं उच्छा हां मैं मतलब क्या वास्तव में अंदर से उच्छा हो या ना हो पहार से उच्छा दिखाना बहुत होता है तो क्या होता है जब हमें नयास कुछ पता जा जाता है सिध्धान सबको यह गलत है वो गलत है वो गलत है सबको खंडन करने में बहुत उच्छा लेते हैं तो वैसे ही पहले-पहले भक्त सिंगापोर में गए तो वहाँ पर देवी देवताओं के मंदिर थे और उन्ही मंदिरों में जाकर वह देवी देवताओं के भक्त वहाँ पर ओरियन्स में थे और वहाँ पर देवी देवताओं के भक्ति के खंडन करते हैं तो वहाँ पर ऐसे की सिंगापोर के राष्टि बाशाओं में से कई भारती बाशाओं भी राष्टि वहाँ पर बहुत से भारती लोग वहाँ पहले से रहते हैं तो वह उत्तिजित हो गए कि उन्हें सिंगापोर सरकार से कुम्प्लीट करते हैं कि ये हरे कुष्ण लोग जो आ रहे हैं सिंगापोर में ये हमारे हिंदु कमिटी में उप्दरम बता रहे हैं हम नहीं जाते कि ये आ रहे हैं सरकार ने बंद कर दा जबी भक्त जाते हैं वहाँ पे तो इस कौन के भक्ते रूप में नहीं आ सकते हैं तो हमें वहाँ पे जुसरे संस्ता का नाम बना दिया है उस संस्ता के अंसार आप सारे कर्कर्म होते हैं तो क्या है ये कुछ हम देखते नहीं कि चेतन जड़ता अमरुति में चेतन महा प्रो भोनेशार मंदर में आते हैं और सब को मोलते हैं तुम शुजी के भक्तबूर को नहीं वह भोनेशार मंदर में आते हैं और शुजी को आराजन करते हैं किस तरसे आराजन करते हैं कि शुजी कितने महान भकता है बगवानिष्ण के पर वो शुजी की पुला की खणड़ानी का हरे एक चीज के लिए एक समय होता है तो अगर कोई कृष्ण मंदर में आया है और हम से भगवधीता का संदिश चुनना चाहता है तो उचित परिशिते में हम बग़ा सकते हैं कि ये देव देवता की पूजा ये ऐसी है ये ऐसी है, देव देवता की पूजा हमने शास्तुर का भी जो बात है न वो कड़ी कड़ी हम एक ही चीज देते हैं तो भगवधीता में बताय गया है साथ वे अध्याय में की कामई स्थेस्थे रित ज्याना परपद्यान तेने देवता की जो काम के कारण इनकी इच्छाए लोभित हो गई है, वो देवता की पूजा करते हैं ये तेने देवता पूजा यान्ति देवता नहीं अलगो मेरे समझ करते हैं 7.23 कामई स्थेस्थे रित ज्याना योगियां ने अंतरमिं भखता चत्याशद्धयाय पुतस्यावारणान्ति दबत्वित्व तामां नहें योगियाणितान् अंतवत्तु फलंतेशां तद भखत्यापमिधसान् देवान देव योगियां ती मद भखता यां ती मां ती तर अंतव साथवे अध्याय के 20. श्लोक से 23. श्लोक का बगवान देवी देवता को पूचा है उसके बारे में वर्लिंब करते हैं तो उसमें ते आकरिशोर बताते है कि जो देवता को पूचा करते हैं वो अल्बमिधसा है वो कम बुद्धिवान है पार अगर हम ये एक चीज लेके हैं देवी देवता के उपास अच्छा कम बुद्धिवान है ये एक सोचासं बताया गया है पर अगर हम सत्रवे अध्याय में जाते हैं सत्रवे अध्याय में चौते शौक में भवान बोलते है कि यजन्ते सात्विका देवा यक्षरक्षां सिराजसां प्रेतान भूतगणांस्चाने जन्ते तांसाजना वे करता है कि जो देवता के पूचा करते हैं वो सत्वगुण है यजन्ते सात्विका देवा यक्षरक्षां सिराजसां और जो यक्षों की राक्षों की पूचा करते हैं वो रजुगुण है और प्रेतान भूतगणांस्चाने जो प्रेतों की भूतों की पूचा करते हैं वो तमुगुण है तो यहाँ पर बहुत बता रहे है कि देवी देवता की पूचा कर रहा है जो सत्वगुण है तो अगर कोई सत्वगुण में है तो वही बहुत बता रहे है कि देवी देवता की पूचा कर रहा है कम बुद्धिवा यहाँ पर वास्तव में देवी देवता की पूचा कर रहा है उसमें कुछ तरका सत्वगुण जरूरी है कि हमें कोई देवी देवता दिखते नहीं है शास्त्र में बता रहे है उनकी लीलाव का वर्ण, उनकी कारेव का वर्ण है, उनकी भह्मा का वर्ण है तो उसमें श्रद्धा रखना जो चीज़ दिखती नहीं है और जिसका उपास्ना करने के कुछ नियम का पालम करना पढ प्रकृति के गुन होते हैं, अगर ऐसे नहीं है कि अगर कभी कभी बोले कि सत्यो गुन का एक रंग है, वज्यो गुन का एक रंग है, तमो गुन का एक रंग है यह तो सत्य है, पर जो एक रंग होता है, अगर मैं लाल बोलूंगा, तो अगर आप कसी पेंट के पास जाओगे और लाल बोलोगे, तो वो लाल में आपको 600 लाल के शेयर दिखा देखें तो क्या?
लाल के 600 लाल के शेयर दिखा देखा देखा देखा देखा द तो कोई भी देवताओं के पूजा कर रहा है वो एक तरह से स्थवुर्भे पर देवताओं में किस देवता के पूजा कर रहा है किस भावना से पूजा कर रहा है उसमें भी स्थवुर्भे मान आते है तो शास्त्रों में ऐसे बताया गया है शास्त्रों में ऐसे बताया गया है कि जो गाए होती है उहाँ जानवरों में पड़ी कोई तरहाँ गया है और इसके विपरी जो गधा है बड़ा मूर्ख माना गया है तो एक तरह से देखा जाएँ तो जो गधा है वो मूर्खताता प्रतिक बोलते है उसको और जो गाए हैं उसको सत्वगुण में बोलते हैं जो शेह हैं उसको लगों में बोलते हैं बंदर जो हैं उसको तमुगुण में बोलते हैं गधा जो हैं उसको तमुगुण में बोलते हैं तो पर शास्ट्र में भावतमे से बना आता है एक शलोक है जिसके लिए बताते सव एव गोखरा जो ऐसे प्रकार का व्यक्ति है वो एक गधा या एक गाय के समारी है गधा कहां गाय कहां दोनों को एक इसमी शेमी को डालते हैं गधाय गाय क्योंं क्या है एक तरसे देखेंगे अगर हम जानवर योनी में देखेंगे जानवर योनी में जो गाय है सत्मगुण में हैं जो बंदर है या गधाय तमगुण में हैं पर दूसरी शलिए से देखेंगे तो सब जानवर जो है वो तमगुण में नहीं है कि जानवर योनी जो है वो ही तमगुण में है गाय जो है सत्मगुण तमगुण के सत्मगुण में हैं तमगुण के स्थर में कुछ उपर के स्थर है जो गाय जो बंदर है वो तमगुण में भीचे के स्थर में है यह क्योंं बता रहा हूँ न यह देवताओं के पूजा भी ऐसे हो सकती है हम साधायन्ता बोलते हैं कि देवताओं के उपासक हैं जो शक्ति की देवी की पूजा करते हैं वो तमगुण में हैं या जो ब्रह्मा की पूजा करते हैं वो सत्मगुण में हैं जो विश्ण की पूजा करते हैं सत्मगुण में हैं यह स्थर सही है पर इसमें कैसे है जो विश्ण की पूजा करते हैं वो सत्मगुण में हैं जो विश्ण की पूजा करते हैं वो सत्मगुण में हैं तो मतलब सत्मगुण की पूजा करते हैं तो जो हैं यहांपे कि जो देविजित पूजा कर रहे हैं इसमें पी श्रिद्धा है वो शास्त्यों का पालें कर रहे हैं उनका भी आदर करने चाहिए अनुद्वेज करमवाक्यम मतलब क्या कि लोगों से ऐसा बगतान ही करें जिससे कि उनका मन बिना किसी फल के उत्तेजित हो जाएं तो माले कोई गनेश की पूजा करता है तो हम जाने कोई बोलते हैं गनेश की पूजा कम बुद्धी की आपको शास्त्यों का पूजा करने चाहिए सिर्फ भगवान की पूजा करने चाहिए ये लोग ये बताते हैं ये लोग बताते हैं ये धर्म का मामला बड़ाई मुश्किल है छोड़ दो ये साथ और रास्ति पूजा जाता है तो हमने क्या किया उनके लिए हमने उनकी कोई सहयोग नहीं किया उनकी कोई सेवा नहीं किया उनके हिंसा की है वास्तम तो वच्चन इस तरह से बोलने चाहिए सत्य इस तरह से बोलना चाहिए अनुद्वेग करम वाक्यम सत्यम प्रिय हितम चाहिए हितम लोगों को हित होना चाहिए और लोगों को हित होने के लिए जो हमारे वच्चन हैं प्रिय होने चाहिए तो अभी ऐसांभव नहीं है कि हमेशा हम जो बोलेगे वो सब के लिए प्रिय ही होगा कभी कभी अप्प्रिय वच्चन बोलने ही पड़ती है कास है कोई भी अगर किसी अथौर्टी पोजिशन में आता है तो लोगों को मारग वच्चन करने के लिए उनको पता नहीं पड़ती है कि इन जो आप कर रहे हैं तो सही कर रहे हैं इन जो आप कर रहे हैं तो गलत कर रहे हैं तो अप्प्रिय वच्चन बोलने करने के लिए पड़ती है पर मौन मौन मौन मौन मौन मौन मौन मौन मौन मौन मौन मौन अस्थाकी कोी बार हम는ं हमारा जीवा शांत रह सकती है पर हमारा मन ओसीख रहा हुई पर हमारा मन ओसी恰ह होता है मन ओसीख रहा ही मन ओसीख रहा होता है अल्योंझी घर bababal क्योंंकि वरकर नहीं करतक करतक करतक करतक करतक करतक करतक करतक करतक करतक करतक करतक करतक करतक करत करतक करतक करतक करतक करतक और अगर कुछ बोलने को नहीं है तो कुछ डिवाइस शालू करते हैं तो वोलते रहता है कुछ टीवी चालू करते हैं, मोबाइल चालू करते हैं, मोबाइल के कुछ मूवीज देखते हैं, कुछ रेडियो सुनते रहते हैं मन की द्वनी है उसको शांत करना, उसको शांत करना तो मौन जो है, बहाई रूप से हम बोले या ना बोले, हमें मन को शांत करना करना करते हैं जब इसे हो जाएँ तो क्या होगा?
योगिनम सुखम उत्तमं, योगि उत्तम सुख का अनुभव करेंगा उपईति शांत, तरजसं, अभी जो रजोगुन हैं शांत हो जाएगा, ब्रह्म भूतम कलमशम व्यक्ति सारे कलमश से मुक्त होकर कहते हैं, मैं स्वयं ब्रह्मा हूँ, मैं आध्यात्मी तत्व हूँ, मैं आत्मा हूँ, समझ जाएगा तो मौनं, मतलब मन को शांत करते हैं और जब हम कृष्ण कथा करते हैं, कृष्ण कीरतिन करते हैं तो भाईरूप से वो मौनत नहीं लगता है, वो मौनत खार करते हैं, जो शार कृष्ण कर रहे हैं, तो वो तो कोला हल लगता है कभी-कभी तो वो मौन नहीं लगता है और वास्ते में उससे, वो इस परकार से, बढ़े ये कोला हल लगे, उससे मन शांत हो रहे है मन शुद्ध हो रहा है, शुद्ध हो रहे है, शांत हो रहे है मौनं, बगवान यहां पे तपस्चा बोल रहे है, वो मन की तपस्चा है, मतलब जो मन की आवास है, मन की बड़बर चांग होता है, यह ऐसा ही है क्या होता है, जो भी होता है, साधार इंटहा, उसके बारे बारे मन कॉमेंट करते होता है कोई व्यक्ति आ गया, यह तो आलसी है, यह व्यक्ति जिरचिटा है, यह व्यक्ति ऐसा ही है, यह वैसे ही है तो हम बले कि वैसे बोले नहीं, हर चीज के बारे मन कॉमेंट करते होता है और यह जो है, यहाँ कई बार बहुत लेमेजी होता है, बहुत हानिकारक होता है मन का जो, हमारे मन में हमें हमेशे एक इनर डायलोग चल रहा होता है और वो इनर डायलोग जो है, वो अगर हमेशे नकारात्मक रहे था कुछ के बारे में नकारात्मक सकता है, दुशों के बारे में नकारात्मक सकता है कोई व्यक्ति आता है और हमेशे नकारात्मक सकता है, उसको जरूरत से कुछ काम होगा, इसलिए इतना अच्छे बात कर रहा है तो हो सकता है, नहीं हो सकता है, पर हम इस व्यक्ति से नकारात्मक क्योंं रहते हैं अगर कुछ गलत हो जाता है हमारे साथ है, किस्मत ही फूटी है किस्मत फूटी है नहीं, तुम्हें क्योंं खोड़ रहे हो किस्मत को तुम्हें हम हमारे नकारात्मक भाव से क्या करेंगे, वो ही करेंगे तो इसलिए, जो है मन का जो हमेशा डाइलोग चानल करते है, वो ऐसा है, वो ऐसा है, वो ऐसा है तो उसको शांत करना है और वहाँ, जब हम बगवान कृष्ण पे लिए करते हैं मन को, तभी वो मन मौन होता है माउनम, इसे माउनम के साथ हम बोलते है आत्मविनिक ग्रह जो खुद्विन जिन्ध्रिन करना है तो अभी, ये तो पहले ही बोल चुके, सत्र, चोदरिश्टो, पहले ही की, कि आपको प्रमचर्या पान करना है, हिमसा करना है, सरलता, आर्जवं रखना है तो यहाँ पे आत्मविनिक ग्रह का बतलब क्या है?
पहले बताये गया है कि शारीक स्थर पे उन चीजों में लगना नहीं है तो शारीक स्थर पे कम से कम हिसा मत कर, शारीक स्थर पे कम से कम जो इंद्रिश्टित्ति में मत लगा पर यहाँ पे आत्मविनिक ग्रह का बता रहे हैं, यहाँ पे लगन के स्थर पे भी जो विचारों को ज़्यादा दूर जाने मत था और इसलिए आगर हो रहा है, भाव संशुद्धिन भाव संशुद्धिन, भाव संशुद्धिन मते हमारे पूरे अस्तित्व का शुद्ध करना हो रहा है तो जब हम इंपियौर का इंपियौर देखते हैं, हम प्यौर जाने हैं कि जो अशुद्ध हैं, जब हम उसको समझते हैं ये अशुद्ध हैं, तब हम शुद्ध हो जाते हैं अभी क्या होता है, अभी जब हमारा मन रजोगन में होता है, अशुद्ध होता है, वो अच्छा लगता है, आकरशक लगता है वो अशुद्ध नहीं लगता है पर जब हम सुखारत नहीं हैं, वह अशुद्ध है तो फिर क्या होगा, जब हम नहीं आशुद्ध हैं, तो हम कुदी उससे दूर होते हैं तो जब भुद्धी की सरप नहीं है, भुद्धी की सरप ऐसा होगा तो अच्छी बात है कम से कम हम भुद्धी की सरप समझना चाहिए, भले मुझे अच्छा लगता है, पर यह उच्छी नहीं है यह पर शास्वन में इसके खिलाग पता गया है, यह मुझे नहीं करना चाहिए तो भुद्धी की सरप तब ज़रूर हमें समझना है पर जब मन यह स्विकार कर लेता है तो तभी क्या होता है?
तभी हम वास्तम शुद्ध हो जाते हैं तो जब मन वास्तम शुद्ध हो जाते हैं, तभी क्या होता है? तभी इतना परलोगनी नहीं आता है, तभी हम वास्तम शुद्ध हो जाते हैं तो इस तरह से भावसं शुद्ध हो जाते हैं तमो मान सबुच्चते हैं तो यहां पर तपस्या जो भावां बता रहे हैं, अगर हम इसका अणुशा कर रहे हैं तो इसमें वो एकादशी को उपवास कर रहे हैं तपस्या नहीं बता रहे हैं वो भी एक परकारी तपस्या है, जरूर पर वो तपस्या जो है, वह पंदर दिन में एक बार आती है या निर्जाने काल से होगे तो साल में एक बार आती है तभी हम तपस्या करेंगे तो अच्छी बात है पर यह जब हमें बता रहे हैं, यह पूरी जीवन में निर्जान करना है और इसलिए हमें एक दिन साल में उपवास करने से जरूर शुद्धिकरन होगा और उससे उतना परिवर्तन नहीं होगा हमारे जीवन में इतना हम कोई जो सत्रुन है उसको विक्षित करने के लिए चोटी-चोटी जीज़े है जिसकि हम करते हैं, कोई अगर मानले क्रोधित होके चिला के कुछ बोलता नहीं किसी को कोई अगर निर्जान उपवास करेंगे तो नहीं, यह तो बड़ा तपस्य है, हम बोलेंगे तो कोई चिला के कुछ बोलता नहीं है, तो हम उसको तपस्य नहीं बोलता चाहते है पर सबके जीवन में ऐसे पसंग आते ही है जब उनको क्रोध आजाएगा सबके जीवन में ऐसे कोई कुछ ऐसे उल्टा चिदा बोलते था, उल्टा चिदा हो जाता है तो जो व्यक्ति शांत रहता है, कुछ कोधित नहीं होता है, वो भी तपस्य है बगवान इस तरफे तपस्या के परिवाशा बता रहे है वो तपस्या के परिवाशा ऐसी नहीं है कि हमें सारा जीवन त्याग करके कुछ चमकारिक करने का है हमारे साधारन के जीवन नहीं है, हम धिरधिर अगर इसका अनुशीन करेगे, तो क्या होगा, इससे हमारा परिवाशा नहीं जाएगा तपोर दिव्विन पुत्र का इन सुद्धंश चुध्ये जस्माद ब्रह्म सुखं पनंतम ब्रह्म सुख्यं पनंतम प्रशब्देव महराज, पाच्वे अध्या में, अपने पुत्रों को जाओ, देजिते तो कहते हैं कि तपस्या का पल क्या होता है ब्रह्म सुख्या अनंतम, जो ब्रह्म सुख्या है, अनंतम सुख्या है उसका वो हमें प्राप्त होता है यत्वग्रेविशन्ग परिगामें अम्पुरितों, भगविशन्ग परिगामें अम्प पर इस स्वीट राइस के ऊपर एक कड़वी दवाई का लेख रहे हैं पर आपको कड़वी दवाई को बाहर डाल के सिर्फ स्वीट राइस नहीं ले सकते हैं आपको कड़वी दवाई पीने बाहर नहीं स्वीट राइस ले सकते हैं तो अग्रेविशन्ग पहले जहर है परिगामें अम्प तपस्या ऐसे है हमको लगता है कि नहीं नहीं करने सकते हैं पर वास्तव में है जो तपस्या है वो हमेशा तपस्या नहीं लगती है तो हम भी प्रसंदल हैंगे हम भी संतुष्ट रहेंगे दुसरों के साथ में हमारे संवन्द अच्छे रहेंगे और हमें जो भी महत्रपूर्ण चीज़ कारें जीवन में करनी हैं उसको हम अच्छे तरह से कर सकते हैं सारांश में निया चर्चा की किस तरह से कि सत्रवे अध्याय में भगवान बता रहे है कि अगर कोई शास्तियों का पालं नहीं करता है और शद्धा है तो व्यक्तियों को कैसे समझना चाहिए?
उनके कार्यों समझना चाहिए उनके गुण के संवन्द है और उसके गुणों के संवन्द में भगवान यज्जियों, दान, तपः और अन्लु इन थी विचारों के बारे में वाला हैं तो उसके संवन्द में तपः के बारे में चल चाहते हैं और हम देखा कि भगवान दीता में कर्म को त्याग करने को नहीं बोला है कर्म में त्याग, कर्म को त्याग की भावना से करने को बोला है और उसके संवन्द में यहाँ पे जो भगवान बताते है प्रस्चा करना है, वो जंगल में जाके बहुत उपवास करना आगर नहीं बता रहे है वो शरीर के स्थर पे, जिवा के स्थर पे और मन के स्थर पे हमें हमारे जिवा थोड़ थोड़ परिवर्थन करने हैं और शरीर के स्थर पे हम देखा कैसे कि जो काम क्रोग लोग, जो हम सब को धकेलता है किसी दिश्चा में उसका प्रतिकार करना मतलब यह सत्य बोलना है सरलत रहना या क्रोध न करना या ब्रह्मचल रखना उसका हम निजन करते हैं वचन में भगवान ने बताया क्या अनुद्धुवेग करना है इस तरह से बोलते हैं कि हम लोगों को विच्छ्रित न करें तो हमें इस तरह से बोलना है कि हम सत्य नहीं बोलना है सत्य इस तरह से बोलना है कि सत्य क्योंं?
लोगों को आप कर्षित करना है और मन के तपस्यां में देखते हैं सन्तुष्ट यह एक तपस्या कि मैं असंतुष्ट हूँ यह सन्तुष्ट हूँ से भावना के स्थाप रहना है हमें देखना है क्या चीज़ों में असंतुष्ट करती हैं उन चीजों से दूर रहना है सन्तुष्ट यह एक पैसला है अगर हम यह पैसला करते हैं तो हम जिसी परस्ते में रहेंगे हम सन्तुष्ट रहेंगे हमको जो भगवाई दिया है उस चीजों का उप्योग करके उनकी सेवा में हम प्रग्वाई करते रहेंगे तो बहुत धन्यवाद किसी को सवाल है प्रग्वाई करते रहेंगे हमारी उम्हिया तीन दिशां में आती है एक है ऊपर एक है बाहर तिसली अंगर मतलब मेरे किसमति कूटी है मेरे निर्ति है तिसली जो भी करता है हमें वो सब कहा जाता है एक तरफ से दूसरा है हम दूस्रो को दोईदे देखें तुमने मुझे ठीक से बताया नहीं।
इसके आगड़े से हुआ। तुम बता रहे हैं तो सबकुछ चली जाते हैं। और तीसरा है, उन्हें खुद को दो जेते हैं, यह भी अच्छा नहीं है।
खुद को दो जेते हैं मतलब क्या मलते है? मैं कभी कुछ करी नहीं होगा। तो उससे हम भता शुरू करते हैं।
इस तीनों जो हैं, यह वासितों नहीं है, मन के खेल है। इसके लिए फ्री मिस्डारेक्शिल्स के लिए ब्लेम गेम में हैं। कि जो ब्लेम गेम है, उसको दोश देना, उसमें तीन प्रकार से हमारा मन है इधर उधर गया उधर।
इससे करता है। तो मान लिए कोई चोर कहीं दौड रहा है। और अच्छोर का इससे कोई सहयोगी है।
पुलिस आके पुछते हैं, उस चोर कहा गया? वास्तव में चोर इधर ही है, नहीं उधर गया उधर गया उधर गया। और पुलिस को तीनों वर भगा रहते हैं और चोर जहाँ पर है उसको पता ही नहीं चलता है।
तो वैसे ही क्या करता है हमारा मन? जो है, जो असली समस्या है, वो हम देखते ही नहीं है। और अरे ये ऐसा है, वो ऐसा है, मैं वैसा हूँ, मेरी दुनिया ये ऐसी है।
हम ऐसा बोल के क्या करते हैं, ध्यान ही लिए देते हैं जो समस्या है उसका हम नहीं देखते हैं तो जब गलती हो जाती है तो क्रोध इसे आता है कि एक तो हो सकता है कि हम कुछ पर क्रोध हो जाता है कि मैं इतना निकम्मा कैसे हो गया, मैंने ऐसे गलती कैसे की या फिर दूसरा लगता है कि वो व्यक्ति पर क्रोध हो जाता है कि वो व्यक्ति हमारा दोश दूलते है बले ही हमारा दोश हो या नहो तो क्या होता है दोश हो भी, तो भी खास करके जो व्यक्ति अगर, इसे आप बताये थे कि हमसे थोड़ा सेनियर है, थोड़ा से सेनियर है, तो क्या होता है, उसमें हमें वो जब कुछ गलती बताते है, तो हमें आपने अच्छा नहीं लगता है, तो क्या होता है, तो ये क्योंं मुझे गलती बता रहा है, वो वरिष्टे बता रहा थे तो वाद अलग लगती है, पर इस दुसरे प्रास्टर उससमें क्या होता है, इसको अहंकार बोलना ये उचित नहीं है, अहंकार हो सकता है, पर यह साधारन सभाविक माना भावना है, अभी कुछ साधु पुरुष भी होते हैं, जो रंबि दाड़ी कर लेते हैं, पर उनका रहं सेन होता है, एक प्रकार से साधु जैसे होता है, पर ये जो लोग थे, वो पहले से हिपी बैग्राम से आये थे, तो अभी तब थोड़ा था हिपी जैसे बोलना था, चलना था, रहं था, और उससे उरूप भी वैसे ही हो गया, तो अभी प्रवापाजी के साथ जाये थे, उनको मिस्रत सेन कर रहे थे, प्रवापाजी ने कुछ बताया नहीं उनको, प्रवापाजी ने क्या किया, एक बार बैक टुवालेड मैगजीन आ गया था, उससे बैक टुवालेड मैगजीन में, हरिदास ठाकुर और वेशा की कहान थी, उसका चित्रन था, प्रवापाजी ने कहान थी उसका चित्रन, प्रवापाजी ने प्रवापाजी ने प्रवापाजी ने प्रवापाजी आपको भी सम्विधिन्शेव का सरणा चाहिए कि जहां तो कोई सके पब्लिक में नहीं बोले सम्विधिन्शेव के एक प्राइबेट में बोले पर अगर हमें कोई डाट दी देता है तो हमें क्रोथ बैजा जाता है तो कमसे कुम स्क्रोथ पे कारेन करें और हम देख सकते है कि इन एक सम्विधिन्शेव हमारी भावना बताते है कि हमारे लिए क्या महतुप होती है अगर कोई बोलता है जिंबाबे में बॉम फट गया करेंगे बॉम फट गया की पर जिंबाबे में हमें कुछ लिए देखना नहीं है आरे जुही बीच में बॉम फट गया जुही बीच है या हरें गूत जहा नहीं है हम को थड़ा और क्या है कि वो हमारी महतपून है तो कैसे है कि अगर कोई हमें डाटता है तो वो वेक्ती डाट रहे है या हमें गुस्सा आ रहा है तो हम फोड़ा अन्विक्षन कर सकते हैं हमारे आत्मपरिक्षन कर सकते हैं देखते कि वो गुस्सा क्योंं आ रहे हैं नहां पर कुछ तो चीज़ है जो महतपूर है सेवा मेरे लिए बहुत महतपूर है और ये सेवा मैं अच्छे से करनी चाहिए था मैंने ऐसे मैंने ऐसे कैरलेस कैसे कैरलेस कैसे हो गया मैंने द्यान क्योंं नहीं दिया वो भाव है या व्यक्ति ये व्यक्ति राट रहे है तो इसलिए मुझे गुस्सा आ रहा है कि शायद व्यक्ति के साथ की संभंद अच्छा नहीं है क्योंं संभंद अच्छा नहीं है वो हम आत्मनिक्षिन कर सकते हैं करके खुद समझ सकते हैं वो भावनाओं पर कारे करने के जगहों पर हम देख सकते हैं कि भावनाओं के क्योंं आ रहे हैं और फिर उससे हम खुद के बारे में समझ सकते हैं हमारे क्योंं पर हमारे संभंद के बारे में समझ सकते हैं और हर एक व्यक्ति के बारे में क्योंं खुद आ रहे हैं वो अलग हो सकते हैं पर समझ सकते हैं इस तरह से यह कहांसी विश्ण है?
पर कहांसी विश्ण आ रहे हैं हम नहीं बारे में खुद के बारे में समझ सकते हैं पर कहांसी विश्ण के बारे में खुद के बारे में समझ सकते हैं पर कहांसी विश्ण के बारे में समझ समझ सकते हैं पर कहांसी विश्ण के बारे में समझ समझ सकते हैं पर कहांसी विश्ण के बारे में समझ समझ समझ स मुझे अहंकार आजाएगा वास्तद में ऐसा विचार ही अहंकार है क्योंं? क्योंंकि ऐसे विचार में हम ऐसे विचार होच रहे हैं कि अभी अहंकार नहीं है मेरे पास जब मैं ऐसे बोलता हूँ क्यारे मैं अच्छा मुझन बगाओंगा आजाएगा मैं सोचती हूँ कि मैं अच्छा मुझन बगाओंगा आजाएगा उसके बाद मुझे अहंकार आजाएगा उसमें मतलब क्या बोलता हूँ मैं?
कि मुझे अहंकार है नहीं अभी पर बाद में आजाएगा अहंकार तो ऐसे नहीं है हम सब में अहंकार पहले से है तो क्या है? हम सब में अहंकार है पर हम सब के पास कई बार वो अहंकार प्रदर्शित करने के लिए मौका नहीं है या अहंकार प्रदर्शित करने के लिए कारण नहीं है मतलब, मैं तो सोचता थो मैं बहुत बड़ा हूँ कैसे दिखाओ, कैसे लोगों को बड़ा हूँ? वो पता नहीं हूँ इसलिए मेरा गर्व बाहर नहीं आ रहा है प्रदर्शित करने के लिए कारण नहीं है प्रदर्शित करने के लिए यत्तु कृष्णवत एकस्मिन मतलब अगर मैं अच्छा कीर्टन कर सकता हूँ तो अच्छा कीर्टन करना ही सब कुछ मान लेता हूँ तो अरे प्रभचन क्या है?
मुझ धर्म तो हरी नाम है मैलेज्मेंड वो तो माया है मैं कीर्टन करता हूँ इसलिए मैं महान बगता हूँ और बाखे कोई है नहीं कुछ ऐसा अगर भाव होता है मेरे लिए ये चीज़ महतुपूर्ण है मैं ये चीज़ महतुपूर्ण कर सकता हूँ इसलिए मैं ये करूँगा पर दूसरी सेवायां भी महतुपूर्ण हैं दूसरी सेवायां को भी आदध नहीं चाहते हैं भले कि मैं वो सेवा नहीं करना हूँ तो वहाँ हमें विकास होना चाहते हैं तो अगर एक चीज़ को हम सब कुछ मान रहे हैं तो वास्तमें तमगुण का लक्षी है तो इसलिए हम परशीक्षन देते हैं ख़ासका कि जब नए भक्त आते हैं तो ब्रह्मचारी ट्रेनिंग वगर जब होती है शुरुवात में या बेस ट्रेनिंग होती है तो उसमें अलग अलग शेत्रों में अलग अलग भावों में उसको थोड़ा ट्रेनिंग मिल जाता है पर उस समय भी अगर किसी के लिए कुछ विशेख शम्ता है तो विशेख शम्ता को कम से कम उसकी जानकारी तो होना जाएगा उस भक्तों जानकारी हो जाएगा कि हम हमारी संस्कृति बनाये रखे तो किसी भी चीज में अगर निपून होना है तो एक तरह से उसमें infatuate होना जरूरी है उसमें अगर हम चाहते है कि किसी को बहुत अच्छा संगीत करना है किसी को बहुत अच्छा लिकट बनना है किसी को बहुत अच्छा पुजारी बनना है किसी को बहुत अच्छी कोई सेवा करनी है तो उसमें कभी-कभी जाना पड़ता है अगर कोई जनमाश्टन के लिए बहुत अच्छा ड्रेस बना रहा है तो उस समय वो कभी-कभी एक बगवान का ड्रेस बनाने के लिए हफते-हफते महने-महने लगते है और वो बहुत सुन्दर अगर ड्रेस बना रहा है तो बाकिस आगे चीज़ों को दूर रखना होता है मैं इसे के बारे में जाता हूँगा तो कभी-कभी अगर एक विशेश सेवा में जा रहा है तो उसमें उसके बहुत सखोल चला जाना वो गलत नहीं है पर वो उससे परिवक्त ता होना चाहिए कब मैं इतना अंदर जाके भी भक्ति में रह सकता हूं और कभी-कब मैं इतना इसके बारे में जाकता हूं कि भक्ति चली जाते हैं उससे पूई रहता है तो मैं अगर मैं भगवान के ड्रेस में इतना मैली हो जा रहा हूं कि जब दर्शन खुलता है तो मैं ड्रेस ही देखता हूं भगवान देखता ही नहीं है तो फिर वो उचित नहीं है तो इसलिए यहाँ बैलन्स रहना चाहिए सब तो असाधार हैं दया अगर व्यक्ति, भक्ति में प्रगती करके वो सत्वकुण में आ जाता है सत्वकुण में क्या होता है हम सर्वद्वारेशु देहे से त्रकाश में जायें किसी एक चीज में स्वेशलाइजिशन अच्छी बात है पर वो एक चीज ही सब कुछ नहीं मानना चाहिए और कभी कभी कुछ समय के लिए वो एक चीज में चाहना दुरा नहीं है जरूरी हो सकता है और उसके बाद में पुना मारद पर आ जाना भी जरूरी है तो इसलिए वो परिपक्वता होन जाएँ है तो भक्ति में कुछ हद तक प्रदती करने के बाद कोई व्यक्ति किसी एक विश्य में जाता है तो फिर वो व्यक्ति परिपक्वता के लिए सम्तुलन रख सकता है पतिरांसी एक विश्या?
बहुत-बहुत धन्यवाद श्रीमन प्रदोरिता की श्रेप्रभुपार देखी गर्वन में भक्ति में लेखी कई और सवाल की थे कि कल में कल भावकुं में के लिए सवाल पूछ सकते है कल हमारा कैम्प भी है अभी आप सवाल पूछ सकते है बहुत बहुत धन्यवाद