Intelligence means to place things in the most constructive context – Hindi
[Bhagavatam class at ISKCON, Punjabi Bagh, Delhi, India]
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Lecture Summary
श्रीमद्भागवतम् प्रवचन का सारांश: बुद्धि की वास्तविक परिभाषा
यह प्रवचन श्रीमद्भागवतम् के दशम स्कन्ध पर आधारित है, जिसमें वक्ता ने ‘बुद्धि’ के वास्तविक अर्थ और जीवन की समस्याओं के प्रति हमारे दृष्टिकोण पर गहरी चर्चा की है। बुद्धि का अर्थ केवल बौद्धिक क्षमता (Intellect) नहीं है, बल्कि चीज़ों को सही मात्रा और सही दृष्टिकोण से देखना है। इसे तीन मुख्य बिंदुओं में समझाया गया है:
1. समस्याओं को उचित संदर्भ में समझना (Contextualizing Problems)
- बुद्धिमान व्यक्ति वह है जो यह समझता है कि किस समस्या को किस स्तर पर हल करना है।
- मन के अस्थिर होने पर हम अक्सर छोटी समस्याओं (जैसे हाथ से ग्लास गिरना) को बहुत बड़ा मानकर हताश या डिप्रेस्ड हो जाते हैं, या फिर बड़ी समस्याओं (जैसे गंभीर बीमारी के लक्षण) को अनदेखा कर देते हैं।
- वक्ता ने एक बहुत महत्वपूर्ण नियम बताया है: क्षणिक भावनाओं के आधार पर कभी भी स्थायी निर्णय न लें (Never take permanent decisions based on temporary emotions)।
2. भगवान पर निर्भरता और व्यावहारिक प्रयास का संतुलन
- शास्त्रों में संसार को ‘दुखालय’ (दुखों का घर) कहा गया है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि हम समस्याओं का व्यावहारिक हल निकालना छोड़ दें (जैसे अस्पताल में होने पर भी इलाज ज़रूरी है)।
- बुद्धि का अर्थ यह जानना है कि किस परिस्थिति में हमें अपने स्तर पर ज़िम्मेदारी लेकर पूरा प्रयास करना है, और कब पूरी तरह भगवान पर निर्भर रहना है।
- हमें अपनी रुचि और क्षमता (Passion and Potential) को पहचान कर ऐसी सेवा चुननी चाहिए जो हम भगवान के लिए कर सकें (Find out something to do for Krishna)।
3. भक्ति और जीवन में कभी हताश न होना
- एक भक्त जीवन में कभी भ्रमित (perplexed) हो सकता है, लेकिन वह कभी हताश (frustrated) नहीं होता।
- हमारी चेतना और सेवा गंगा नदी की कई शाखाओं (tributaries) के समान है। यदि किसी कारणवश सेवा की एक शाखा या एक दरवाज़ा बंद हो जाता है, तो भगवान कोई दूसरा दरवाज़ा खोल देते हैं (जैसे श्रील प्रभुपाद के जीवन में हुआ जब अमेरिका में उनके लिए कई दरवाज़े बंद हुए पर नए रास्ते खुलते गए)।
- इसलिए हमारी आसक्ति किसी ‘विशेष सेवा’ से नहीं, बल्कि हमारे ‘सेवा भाव’ (Service Attitude) से होनी चाहिए।
प्रश्नोत्तर (Q&A) के मुख्य निष्कर्ष:
- दूसरों को कैसे प्रेरित करें: दूसरों को बलपूर्वक बदलने के बजाय उन्हें ज्ञान दें (Enlightenment), कार्य में लगाएं (Engagement) और उनके छोटे-छोटे प्रयासों की सराहना कर उन्हें प्रोत्साहित करें (Encouragement)।
- वास्तविक बुद्धि क्या है: बौद्धिक क्षमता (Information processing) हर किसी में नहीं होती, लेकिन जो प्रेमपूर्वक भगवान की सेवा करता है, उसे सही निर्णय लेने की बुद्धि (Decision-making ability) स्वयं भगवान प्रदान करते हैं।
Full Transcription
बुद्धि की परिभाषा और सही दृष्टिकोण
हरे कृष्णा। आज मैं यहाँ उपस्थित हूँ आप सब के बीच में, श्रीमद्भागवतम् के परम पवित्र दशम स्कन्ध में, भगवान के आविर्भाव के बारे में यहाँ पर चर्चा हो रही है। तो मैं इस विषय पर चर्चा करूँगा कि बुद्धि की परिभाषा क्या है? तो बुद्धि का अर्थ है, कि चीजों को सही मात्रा में, सही दृष्टि से देखना वह बुद्धि कहलाता है। तो इसके तीन पॉइंट (point) के बारे में मैं दूँगा।
पहला पॉइंट कि कैसे है? जब वहाँ पर पृथ्वी के पास समस्या आ गई है। तो किस समस्या को किस तरह निपटाना है, यह समझना बुद्धि की एक दृष्टि है। दूसरा है कि कब भगवान से हम एक दिव्य रूप से मदद चाहते हैं और कब हमें व्यावहारिक रूप से कुछ करना चाहिए। और तीसरा है कि किस तरह से हम कभी भक्ति में हताश न हों।
अब यहाँ पर पहला पॉइंट है कि किस समस्या का किस तरह सामना करना है, यह समझना बुद्धि का लक्षण है। अब यहाँ पर जब पृथ्वी को समस्या आ गई है, तो पृथ्वी देवताओं के पास जाती है, ब्रह्माजी के पास जाते हैं, सारे ब्रह्माजी जाते हैं भगवान विष्णु के पास। तो यहाँ पे मतलब क्या है, यह समस्या इतनी बड़ी है कि बहुत ऊंचे स्तर पे ले जा रहे हैं। मान लीजिए अगर किसी को छाती में दर्द हो रहा है और हम फिजिशियन के पास जाते हैं, साधारण डॉक्टर के पास जाते हैं, वो बोलते हैं कि तुम हार्ट स्पेशलिस्ट (Heart Specialist) के पास जाओ। और हार्ट स्पेशलिस्ट के पास जाते हैं, वो बोलते हैं कि तुम एक ऑन्कोलॉजिस्ट (Oncologist) के पास चले जाओ। तो अभी इसका मतलब क्या है कि कोई साधारण दर्द नहीं है, यह दर्द इतना गंभीर है कि आपको एक स्पेशलिस्ट के पास जाना चाहिए।
कभी कोई साधारण दर्द होता है हमको, तो थोड़ा सा डॉक्टर बोलेगा, थोड़ा आराम कर लो, ठीक हो जाएगा। तो क्या है यहाँ पर, अभी वो दर्द एक तरह से दर्द ही है, पर कभी-कभी वो दर्द, इसका यह लक्षण हो सकता है कि कोई बहुत गंभीर बीमारी है, और कभी कोई दर्द है, थोड़ा सा आपको स्ट्रेन (sprain) हो गया है, थोड़ा सा मार लग गया है, बस थोड़ा आराम कर लो, ठीक हो जाएगा।
व्यावहारिक दृष्टिकोण और मानसिक स्थिति
तो अभी हम व्यावहारिक रूप पर, यहाँ हम समझते हैं, अभी मान लीजिए हम सबको ठंडी लग रही है। तो अभी ठंडी लग रही है, तो क्या करना है? एक चीज़ हो सकती है कि अगर हमारे पास कोई शॉल है, कुछ स्वेटर है, हम पहन लेंगे, शॉल शरीर पर है तो सिर पर भी डाल देंगे। दूसरा है, किसी को बोलें कि पीछे का दरवाज़ा बंद कर लो। तीसरा है, किसी को बोलें कि इसमें से कोई भी एक चीज़ गलत या सही नहीं है। अभी किसी को बहुत ठंडी लगती है, उससे बहुत परेशानी हो जाती है, तो चौथा जो रिस्पांस (response) है, वो भी सही है। पर क्या है, हम एक व्यावहारिक रूप से हमारी बुद्धि के अनुसार तर्क निकालते हैं कि ठीक है, इस समस्या को कैसे हल करना चाहिए।
पर जब हमारा मन अनियंत्रित होता है… मैं अभी अमेरिका में था, कनेक्टिकट (Connecticut) में, वहाँ पर जो कुछ एडिक्ट्स (addicts) होते हैं, जो कुछ ड्रग (drug) और आदि चीज़ों से आसक्त हो गए हैं, उनका डी-एडिक्शन (de-addiction) का कैंपेन चल रहा था। उसमें मुझे एक लेक्चर देने को इनवाइट किया था। तो मैं उनसे बात कर रहा था, लेक्चर दे रहा था तो कन्वर्सेशन भी हो रहा था। तो कई बार यह लोग होते हैं, जो अगर शराब पीते हैं या ड्रग्स लेते हैं, तो इसलिए नहीं कि वो ड्रग्स से इतने आसक्त हैं। कई बार ऐसा होता है कि वो खुद से इतने हताश हो जाते हैं, डिप्रेस्ड (depressed) हो जाते हैं, उनको सारा जीवन आशाहिन लगता है, और फिर कुछ राहत चाहिए उनको, तो फिर वो ड्रग्स लेते हैं।
तो अब ये जीवन आशाहिन क्यों लगता है? तो क्या होता है, हम सबके जीवन में समस्याएँ आती हैं। पर जो लोग डिप्रेस्ड हो जाते हैं, खासकर के बहुत सीरियस डिप्रेशन जिनको आ जाता है, तो क्या करते हैं? वो छोटी-सी छोटी समस्या का सबसे बड़ा से बड़ा अर्थ निकालते हैं।
वहाँ बात करते हुए, एक लड़की बता रही थी कि वो किसी होटल में काम करती थी, टेबल्स पर वेट (wait) करती थी। और फिर क्या हो गया, एक बार वो सर्व कर रही थी और उसके हाथ से एक ग्लास गिर गया। और वो ग्लास गिर गया, उससे उसको ऐसा लगा कि “मैं इतनी निकम्मी हूँ, कि मैं ग्लास भी नहीं उठा सकती।” और उस एक चीज़ के कारण, उसने एक निष्कर्ष निकाल लिया कि “मैं मेरे जीवन में कुछ भी नहीं कर सकती।” और उससे उसको डिप्रेशन का बड़ा अटैक आ गया, और फिर डिप्रेशन से बचने के लिए उसने क्या कर लिया, उसने ड्रग्स लेना चालू कर दिया।
ग्लास गिरना इतनी क्या बड़ी बात है? सबसे ग्लास गिर सकता है। नहीं गिरना चाहिए, पर क्या होता है, अगर मन हमारा अस्थिर होता है, तो फिर क्या होता है, छोटी-छोटी चीज़ से हम बहुत बड़ा निष्कर्ष निकाल लेते हैं। अभी कभी-कभी छोटी चीज़ें होती हैं, वो बड़ी चीज़ का भी लक्षण हो सकती हैं, पर हर बार ऐसा नही है। अगर मान लीजिए दिल्ली में ठंडी लग रही है, उसके कारण कोई बोलता है कि “मैं दिल्ली में रहूँगा ही नहीं, मैं साउथ इंडिया में चला जाऊँगा।” ठीक है, अभी अगर आपको हर महीने, हर साल ऐसी समस्या आ रही है, तो फिर ठीक है। पर एक बार उसको बड़ी समस्या मानकर अगर वो एस्केलेट (escalate) कर देता है—कंपनीज में एस्केलेट बोलते हैं, एस्केलेट मतलब यह समस्या जो है, उसको नीचे से ऊपर तक लेकर जाना। तो जब हमारा मन छोटी समस्या को बहुत बड़ी बना देता है, तो फिर उससे डिप्रेशन आ जाता है। जब इस तरह से डिप्रेशन आ जाता है, तो चिंता भी आ सकती है। कोई छोटी सी चीज़ हो जाती है, पर उसको बहुत बड़ा बना देते हैं।
उचित संदर्भ में समस्याओं को समझना
तो अभी किस समस्या को किस स्तर पे हल करना है, इसमें सही-गलत कुछ नहीं है, इसमें ट्रू और फॉल्स (True/False) नहीं है, उसमें कंस्ट्रक्टिव (constructive) क्या है, सकारात्मक क्या है। ऐसे भी हो सकता है कि किसी के लिए दिल्ली का वातावरण ठीक है ही नहीं, पर वो एक बहुत बड़ा डिसीजन है। एक छोटे से प्रसंग से बहुत बड़ा निर्णय लेना… अगर नहीं, तो वहां हमें समझने के लिए पहले विचार करना चाहिए।
मान लीजिए, अगर हम कंप्यूटर पर काम कर रहे हैं, और फिर अचानक कंप्यूटर बंद हो जाता है, ऑन (On) नहीं हो रहा है, चार्ज नहीं हो रहा है। तो फिर हम देखेंगे, क्या हो गया? यह सॉकेट बराबर डाला है कि नहीं इसमें? फिर मैं देखूँगा कि वहां पे डाला है कि नहीं, फिर वो स्विच ऑन है कि नहीं? फिर मैं देखूँगा कि अच्छा, यह वायर ठीक से काम कर रही है, एक्चुअल इलेक्ट्रिसिटी है कि नहीं? अभी इसको बड़ा करते जाएंगे, बड़ा करते जाएंगे।
मैं एक मित्र जो कनाडा में है, बता रहा था कि लगभग 2.5 साल पहले सूर्य में ऐसा ही हुआ। वो बहुत ज़रूरी काम कर रहा था, पर अचानक कंप्यूटर ऑफ हो गया। यह क्या हुआ है? तो तभी उसको पता चला कि ऐसे एक चीज़ होती है, सोलर फ्लेयर्स (Solar flares)। सूरज से बहुत तेज़ किरणें निकलती हैं, और जैसे कोई आग होती है, उससे चिंगारी निकलती है, तो कोई चिंगारी कहीं दूर जाके गिर जाती है। वैसे सूरज से जो फ्लेयर्स निकलते हैं, अगर सूरज से लगभग हर 7-8 साल में वो फ्लेयर अगर पृथ्वी के वातावरण में आ गई, तो एक पल में सारे इलेक्ट्रिसिटी सर्किट (Electricity circuit) सारी दुनिया भर के बंद हो जाएंगे। तो अब उस समय क्या हुआ था, वो सोलर फ्लेयर पृथ्वी के वातावरण के बहुत पास में आ गया था। अंदर नहीं आया था। तो मतलब क्या है कि मेरा कंप्यूटर नहीं चल रहा है, उसका कारण यह सब हो सकता है कि सूरज से वो चिंगारी निकल रही है।
तो क्या है, हर एक चीज़ को हमें किस स्तर पे लेना है। वो कारण उस स्तर पे भी आ सकता है कभी, हम कभी इसका सोचेंगे भी नहीं। पर क्या है कि जो हमें व्यावहारिक रूप पे कार्य करना है, हमको समझना है कि what is the most constructive action in the situation? (इस परिस्थिति में सबसे सकारात्मक कार्य क्या है?) तो अगर मेरे हाथ से ग्लास गिर गया है, तो ठीक है अभी ग्लास उठा लो और भविष्य में ध्यान से काम करो।
पर जब मन इस तरह से काम करता है, तो एक चीज़ हो जाती है कि छोटी सी चीज़ को बहुत बड़ी बना देते हैं। और दूसरा यह भी हो जाता है कि बड़ी चीज़ को छोटा कर देते हैं। कि कोई बहुत बड़ी समस्या भी है, तो भी उसको बोलते हैं कि “क्या है, कोई बड़ी बात नहीं है।” अगर मान लीजिए किसी को ऐसी कोई बीमारी है, ऐसी कोई स्वेलिंग (swelling) वगैरह हो गई है, जो कैंसर हो सकता है। अगर कैंसर को ट्रीट करना है, तो जितना जल्दी डिटेक्ट हो जाएगा उतना अच्छा। पर उसकी ओर ध्यान नहीं देगा, “थोड़ा सा कुछ फोड़ा आ गया है शरीर पे।” तो बड़े चीज़ को छोटा मान सकते हैं, या छोटी चीज़ को बड़ा मान सकते हैं। आपको स्वेलिंग को स्वेलिंग के लिए अच्छे से ट्रीट करने के लिए देखना, यह इंटेलिजेंस (Intelligence) है।
हर चीज़ को अभी जब मुझे ठंडी लग रही है, उसको मुझे देखने के लिए अच्छा क्या है? कि मैं मूर्ख हूँ, मैंने आज स्वेटर नहीं पहना है, यह ठंडी लग रही है। या जिन लोगों ने मंदिर बनाया, उन्होंने यहाँ पर प्रॉपर हीटिंग (heating) क्यों नहीं किया। वो संदर्भ निकाल सकता हूँ मैं। या मैं बोल सकता हूँ, जिसने मुझे इस मंदिर में बुलाया, उसने मुझे बताया क्यों नहीं कि यहाँ पर ठंडी होती है। या मैं बोल सकता हूँ, कि यहाँ आजकल प्रदूषण इतना बढ़ गया है, इसके कारण यह ठंडी इतनी बढ़ गई है। या मैं बोल सकता हूँ, कि यह दिल्ली का वातावरण ही इतना खराब है।
तो क्या है कि अभी उस परिस्थिति में किस संदर्भ में मुझे उसको देखना है, यह समझना बहुत जरूरी है। मैं अमेरिका में एक परिवार के घर में रह रहा था, वो काउंसलर थे और किसी की काउंसलिंग कर रहे थे। वो कपल (couple) था, वो डिवोर्स (divorce) तक आ गया था, और वो सेपरेट हो रहे थे। उसकी शुरुआत कैसे हुई? उसकी शुरुआत इस तरह से हुई, कि जब पति ने कहा, “तुम टूथपेस्ट यूज़ करते हो, टूथपेस्ट इस दिशा की जगह उस दिशा में रखते हो।” अभी उससे वो बोले, “उससे मुझे समझ आ रहा है, तुम क्लीन्लीनेस (cleanliness) नहीं रखते, तुम हाइजीन (hygiene) नहीं रखते, तुम साफ-सफाई नहीं रखते। I have mentioned you do not care for me. You are not good for me.”
तो अभी वो टूथपेस्ट इस दिशा में रखे है, उसमें क्या बड़ी बात है? पर क्या है, जो हमारा मन होता है, वह किस प्रसंग को किस संदर्भ में देखेगा, यह हम समझ नहीं पाते हैं, इसका हम भविष्यवाणी नहीं कर सकते हैं। अलग-अलग लोग, उसी चीज़ को अलग-अलग संदर्भ में देखेंगे, और वही व्यक्ति, उसी प्रसंग को, समय-समय पर अलग-अलग संदर्भों में देखेगा। तो अभी कौनसा संदर्भ सबसे सकारात्मक है यह समझना बहुत ज़रूरी है। अगर हम वहां नहीं समझेंगे, तो क्या होगा? हम गलत स्तर पे कार्य करेंगे। छोटी सी बात है, “ठीक है, ये बाथरूम में टूथपेस्ट ऐसे रखना चाहिए, ऐसे नहीं रखना चाहिए।” छोटी सी बात है, उसको उसी स्तर पे निपटा लो। तो इतनी बड़ी बात बनाने की क्या ज़रूरत है?
बुद्धि और सही समय पर सही निर्णय
पर कभी-कभी ऐसा भी हो सकता है, कि कोई समस्या है, उसको हम निपटाएं ही नहीं। मान लीजिए, किसी के जीवन में बहुत समस्या है, और क्या होता है, कभी-कभी, ये पहला पॉइंट हमें समझना है। बुद्धि की परिभाषा मतलब क्या है? कि हर एक चीज़ को हम उचित संदर्भ में समझने का प्रयास करते हैं। उचित मतलब, जो सबसे सकारात्मक संदर्भ हो, उस संदर्भ में अगर हम समझेंगे, तो फिर हम सही कार्य कर पाएंगे।
किसी को एक सवाल है इस पर? इस पॉइंट के बारे में किसी को सवाल होगा तो हम एक सवाल ले सकते हैं। अच्छा, अभी बीच में सवाल हो तो इसी पॉइंट से, जनरल सवाल मत करना अभी।
प्रश्न: क्या डिसाइडिंग फैक्टर्स (deciding factors) होते हैं कि हम उस समय में वो करेक्ट डिसीजन (correct decision) ले सकें? किस तरह से हम फैसला करें, कि जो मैं कार्य करने वाला हूँ, वो सही है या नहीं?
उत्तर: अभी क्या है, उसमें अनुभव लगता है। उसको थोड़ा बड़े संदर्भ में देखना और समझना, वो अनुभव से काफी आ जाता है। जो छोटे बच्चे होते हैं, कोई भी समस्या आ गई तो रोने लगते हैं। खासकर के जब बच्चे बोल नहीं सकते, नवजात शिशु होता है, तो रोते हैं हमेशा, उनकी एक ही भाषा होती है रोना। तो अभी माँ-बाप को समझना पड़ता है कि क्यों रो रहा है। इसको भूख लगी है, या इसको बुखार आया है, या इसको पेट में दर्द है, या इसको सिर्फ ध्यान चाहिए। उसके लिए एक ही भाषा है रोना। तो कोई भी समस्या है, हम उसको एक ही स्तर पर एस्केलेट कर देते हैं—रोना।
पर जैसे हम बड़े होते हैं, तो हम समझते हैं कि “अच्छा मुझे यह हुआ है तो यह बोलना चाहिए, ऐसा हुआ है तो ऐसा करना चाहिए।” तो उस तरह से जैसे हम धीरे-धीरे जीवन का अनुभव करने लगते हैं, उससे हम समझने लगते हैं कि ठीक है, इस समस्या को इस तरह हल करना चाहिए। और इसलिए मैंने बोला कि इसमें सही-गलत ज़रूरी नहीं है। क्योंकि उस स्तर पर भी देख सकता है कोई, हो सकता है कि “मैं एक ग्लास उठा नहीं पा रहा हूँ, उसका मतलब यह हो सकता है कि शायद मैं यह काम करने के योग्य नही हूँ, मुझे कुछ और काम करना चाहिए।” तो ऐसा नहीं कि इसमें यह स्तर पर लेना सही है या गलत है, पर सबसे सकारात्मक क्या है, सबसे कंस्ट्रक्टिव (constructive) क्या है, वो हम अनुभव से समझ सकते हैं।
कभी छोटी समस्या को बहुत बड़ा बना देते हैं हम, इतना बड़ा क्यों करना है इसमें? बाद में हमको समझ आता है। जैसे जब हम गाड़ी चला रहे हैं, तो हम अपने बारे में फैसला करते हैं और वो देखते हैं। तो पृथ्वी जो है, वो जा रही है पहले ब्रह्मा जी के पास। तो हम अलग-अलग किसी संदर्भ से समझते हैं कि डिफरेंट केसेस में देवता भी डिफरेंट परिस्थितियों को अप्रोच करते हैं। जैसे कभी शिवजी के पास पहुंचते हैं, कभी ब्रह्मा जी के पास पहुंचते हैं।
क्षणिक भावनाओं से परे: तांस्तितिक्षस्व भारत
तो एक प्रिंसिपल मैं अपनाने का प्रयास करता हूँ: Never take permanent decisions based on temporary emotions. (क्षणिक भावनाओं पर आधारित स्थायी निर्णय कभी न लें)। यह क्या है कि जो भावनाएं होती हैं, आती हैं, जाती हैं। क्योंकि क्या होता है, कोई ऐसा कुछ कार्य करता है जिससे बहुत गुस्सा आ जाता है और उस समय गुस्से में हम ऐसा कुछ बोल देते हैं या ऐसा कुछ कर देते हैं कि जिससे शायद रिश्ता हमेशा के लिए टूट जाएगा। तो ऐसा कुछ मत करो जिससे कि हमेशा के लिए उससे परेशानी हो जाएगी। जो परिस्थिति है, जो इमोशंस हैं, वो टेम्परेरी (temporary) हैं। अभी ऐसा नहीं है कि हमें कार्य नहीं करना है, पर वो जो भावनाएं आती हैं, भावनाएं आएंगी-जाएंगी, उसके बाद में शांत होने के बाद विचार कर सकते हैं। तो क्या है कि जब हम कार्य कर लेते हैं, उसके बाद में उसको पुनः हम अनडू (undo) नहीं कर सकते हैं, बहुत मुश्किल है करना। इसलिए never take permanent decisions based on temporary emotions.
यह एक प्रिंसिपल हम अपना सकते हैं और यह वास्तव में क्या है, गीता का एक श्लोक है: “तांस्तितिक्षस्व भारत” (tāms titikṣasva bhārata)। इसका एक अलग पद से वही बताया गया है। और इसके लिए किस समस्या के लिए किसके पास जाना है, वह भी क्या है? हमारा उस व्यक्ति से क्या सम्बन्ध है, उस व्यक्ति की क्या जिम्मेदारी है या क्या उनका पोस्ट (post) है, और उससे ज़्यादा उस व्यक्ति का क्या स्वभाव है, वह सब देख के हमको फैसला करना होता है।
मैं जब एक मंदिर में रह रहा था, तो वहाँ पे जो एक वरिष्ठ भक्त थे, उन्होंने मुझे कहा कि “अगर तुम्हें कुछ काम करवाना है मेरे पास आओ। तुमको बात करनी है तो उनके पास जाओ। बैठ के बात करने के लिए मेरे पास समय नहीं है। कुछ काम करवाना है तो मेरे पास आना।” तो कुछ-कुछ भक्त होते हैं, वह स्पष्ट कर देते हैं। पर कुछ-कुछ भक्त होते हैं, उनके हमको स्वभाव से समझ आता है, उनके आदान-प्रदान से समझ आता है कि ये जो करना है कैसे होता है।
एक तरह से ये भक्तों का संग एक जॉइंट फैमिली (joint family) के समान है। तो क्या होता है, अगर बड़ी जॉइंट फैमिली होती है, तो उसमें अलग-अलग लोग अलग-अलग ज़रूरतें पूरी करते हैं। अगर हमको कुछ चाहिए कि ये करना है, वो करना है, तो फिर हमारे माता-पिता हो सकते हैं। अगर हमको सिर्फ कुछ बड़ा दुख हुआ है, तो हम दुखी होकर कुछ बोलना चाहते हैं, शांत होना चाहते हैं, शायद हमारे दादा-दादी हो सकते हैं। अलग-अलग लोग, अलग-अलग भूमिकाएं निभाते हैं, अलग-अलग ज़रूरतें पूरी करते हैं।
तो ये तीन चीज़ें हैं: उस व्यक्ति का स्वभाव, उस व्यक्ति की जिम्मेदारी या पोस्ट, और हमारा उनके साथ का सम्बंध। इन तीनों के द्वारा हम फैसला कर सकते हैं कि हमें किसके पास जाना है। जैसे अभी अगर हम डॉक्टर नहीं हैं तो थोड़ी सी बीमारी भी आएगी, तो हम खुद डॉक्टर के पास चले जाएंगे। अगर कोई डॉक्टर है, तो थोड़ी सी बीमारी आएगी, तो हम खुद कोई ट्रीटमेंट कर सकते हैं। पर अगर बहुत गंभीर हो गया है, तो उनको भी किसी स्पेशलिस्ट के पास जाना पड़ेगा।
तो उस तरह से क्या है कि जब हम नए होते हैं, तो फिर हमें शायद मार्गदर्शन की और ज़्यादा ज़रूरत होती है और छोटी-छोटी ज़रूरतों के लिए जाएंगे। पर जैसे हमको थोड़ा अनुभव आता है, हम भी थोड़ा वरिष्ठ बन जाते हैं, तो हमें कुछ समस्याओं का हल खुद ढूंढना पड़ता है। पर अगर कुछ ऐसी समस्याएं हैं कि इसका हल नहीं ढूंढ पा रहे हैं, तो हमें कोई ऐसा भक्त ढूंढना चाहिए जो हमें नॉन-जजमेंटली (non-judgmentally) सुन सके। नॉन-जजमेंटली मतलब क्या? कि अगर मैं बोलूँ, “अच्छा मुझे ऐसा लग रहा है, मैंने ऐसा किया,” और वो बोलें, “अरे तुम तो इतने सीनियर हो, तुम भी ऐसा करते हो?” अगर वो ऐसा बोल रहे हैं तो क्या होगा? तो फिर हम बोल ही नहीं पाएंगे उनसे। तो हम सबको चाहिए कि कोई न कोई एक भक्त हो जो हमको नॉन-जजमेंटली सुन सके।
भगवान पर निर्भरता बनाम व्यक्तिगत प्रयास
तो पहला पॉइंट यह था कि किस तरह से बुद्धि का मतलब है कि हर एक समस्या का उचित संदर्भ में हम उसका निवारण करने का प्रयास करते हैं। अभी दूसरा पॉइंट यह है कि कैसे हम किस समस्या को खुद के हाथ में लेके उसका निवारण करें, और किस समस्या के लिए चरणागत होकर या भगवान पर निर्भर हो जाएं।
तो अभी यहाँ पे जब हम शास्त्रों में पढ़ते हैं, शास्त्र में बताया गया है कि यह जगत ‘दुखालय’ है। तो अभी पृथ्वी दुख में है और ब्रह्माजी के पास जाती है। ब्रह्माजी उनसे यह नहीं कहते हैं कि “हाँ यह जगत दुखालय है, तुम वही अनुभव कर रही हो।” नहीं, ऐसे नहीं बोलते हैं वो। क्योंकि अभी जब बताते हैं शास्त्र दुखालय है, उसका मतलब यह नहीं है कि सबको उसमें दुखी ही रहना है। उसका मतलब है कि हमारी जो अपेक्षाएं हैं उसको मॉडरेट (moderate) करना है।
जैसे जगत दुखालय है, उसका मतलब क्या है? एक उपमा लेनी है तो जगत एक अस्पताल के समान है। अभी अस्पताल में जो भी एडमिटेड (admitted) हैं, वो सब उनको कुछ ना कुछ तो पीड़ा होगी। तो अगर हॉस्पिटल में कोई सोचता है कि मैं ऐशो-आराम से रहूंगा तो वो संभव नहीं है। पर अभी हॉस्पिटल में भी अगर किसी को बहुत दर्द हो रहा है, तो फिर तुरंत नर्स को बुलाएंगे, डॉक्टर को बुलाएंगे, कुछ इमरजेंसी ट्रीटमेंट (emergency treatment) करवाएंगे।
इसी तरह से जगत दुखालय है, इसका मतलब यह नहीं है कि कोई दुखी है उसको हम बोलें कि “यह दुखालय ही है”। दुख भी अलग-अलग स्तर के होते हैं और कभी कुछ दुख इतने गंभीर होते हैं कि उनका निवारण करना बहुत जरूरी हो जाता है, और उसके लिए व्यावहारिक रूप से कार्य करना होता है।
तो जो तत्त्वज्ञान है, तत्त्वज्ञान यह जरूरी है समझना कि यह जगत दुखालय है। पर इसका मतलब यह नहीं है कि हम तत्त्वज्ञान का इस्तेमाल समस्याओं का हल न करने के लिए करें। कभी-कभी ऐसा हो सकता है कि हां, हमको जीवन में समस्याएं हैं और उसको थोड़ा सहन करना सीखना चाहिए। “यह जीवन का स्वभाव है, यह रिश्तों का स्वभाव है, यह जगत का स्वभाव है, दुख आते हैं सहन कर लो इसको।” यह एक तरह से जरूरी है।
ग्रुप साइकोथेरेपी और समस्याओं का साझाकरण
मैं कनाडा में था, एक भक्त हैं वहाँ पे जो साइकोथेरेपिस्ट (Psychotherapist) हैं। और वो बोले थे, “मैं कई सालों तक इंडिविजुअल साइकोथेरेपी कर रहा था और अभी मैं ग्रुप साइकोथेरेपी (Group Psychotherapy) करता हूँ।” साइकोथेरेपी मतलब क्या? जो साइकियाट्रिस्ट (Psychiatrist) होते हैं वो दवाई देते हैं। साइकोलॉजिस्ट (Psychologist) जो होते हैं वो दवाई नहीं देते हैं, वो बात करते हैं। बात करके भावनाओं का मार्गदर्शन देकर उसका निवारण करने का प्रयास करते हैं। तो अभी ग्रुप साइकोथेरेपी मतलब क्या? कई लोग साथ में बैठते हैं और वो लोग अपनी समस्याओं की बात करते हैं, फिर कुछ सलाह-मशविरा होता है, फिर उससे कुछ हल निकालने का प्रयास करते हैं।
तो मैं बोल रहा था कि अभी हमारे जीवन में जो दुख हैं, हमारी जो ग्लानि है, कभी-कभी वे इतने प्राइवेट (private) होते हैं कि एक व्यक्ति को बोलना भी बड़ा मुश्किल हो जाता है। अभी 10-15 लोगों के सामने कौन बोलने वाला है यह सब? वो बता रहे थे कि वास्तव में वहां कॉन्फिडेंशियलिटी कोड (Confidentiality Code) होते हैं कि आपको किसी को पब्लिक में कुछ बोलना नहीं है। वो सब मानते हैं कि सबने कुछ बोला हुआ है वहाँ पे। पर वो बोले कि इसका फायदा यह होता है कि हम सबका मन हमको यह बोलता है कि “तुम्हारे जैसा दुखी कोई नहीं है।” हमको बहुत दुख इसलिए होता है कि हमको लगता है बाकी सब लोग सुखी हैं, मैं अकेला दुखी हूँ। पर जब हम सबकी समस्याएं सुनते हैं तो लगता है, “नहीं बाप रे, सबके जीवन में समस्याएं हैं।”
एक ऐसा ही सेशन हुआ था, उसके बाद मैं बता रहा था कि उन्होंने क्या किया। सबने अपनी समस्याएं बताईं, फिर सबने बोला कि अगर ये थॉट एक्सपेरिमेंट (thought experiment) करें, सब विचार करो आप, कि आपकी समस्याएं आप अपने जीवन से बाहर निकालकर इस टेबल पर रख सकें, और सब अपनी-अपनी समस्याएं टेबल पर रख सकें, तो आप में से कोई आपकी समस्या किसी और के साथ एक्सचेंज (exchange) करना चाहेगा? और किसी ने हाथ ऊपर नहीं किया। एक तरह से यह सबके जीवन में समस्याएं हैं, और दुनिया में समस्या है, यह समझ के हमारे जीवन को आगे बढ़ाते रहना, यह भी ज़रूरी है, यह सहनशीलता है, यह टॉलरेंस (tolerance) है।
दार्शनिक बनाम व्यावहारिक समाधान
पर कभी-कभी कुछ ऐसी समस्याएं होती हैं, उसके लिए हमें कुछ व्यावहारिक हल ढूँढना पड़ता है। कुछ समस्याएं ऐसी होती हैं, ठीक है, रिश्तों में समस्याएं आती रहती हैं। दो लोग होते हैं, साथ में रहें तो थोड़ी समस्या आएगी, पर अगर उसमें कुछ बहुत सीरियस हो रहा है, तो फिर उसमें हमें कुछ कार्य करना पड़ेगा। अलग-अलग चीज़ों में तत्त्वज्ञान के आधार पर हम कहते हैं “सहन कर लो,” पर ऐसा नहीं है कि हर चीज़ को सहन करना है। जब इस जगत में असुरों का राज हो जाता है, असुर आतंक करने लगते हैं, तो फिर पृथ्वी को ब्रह्मा जी नहीं कहते हैं कि “आप इसे सहन कर लो।” यह इतना गंभीर है कि इसके लिए हमें भगवान के पास आना पड़ेगा और भगवान से हल ढूँढना पड़ेगा।
तो कई बार क्या होता है कि कोई हमें प्रैक्टिकल प्रॉब्लम (practical problem) के साथ आता है, और हम उनको फिलोसॉफिकल सलूशन (philosophical solution) दे देते हैं, और यह बहुत फ्रस्ट्रेटिंग (frustrating) हो जाता है। एक बार श्रील प्रभुपाद जी एक लीडर्स की मीटिंग कर रहे थे मायापुर में। प्रभुपाद जी ने अलग-अलग समस्याएं बताईं कि हमारे जो लीडर्स हैं, उनको और सक्षम बनना चाहिए भक्तों की देखभाल करने के लिए। तो हमें जो लीडरशिप का स्टैण्डर्ड है, उसको बढ़ाने के लिए और क्या करना चाहिए? तो किसी एक भक्त ने बताया, “हम सबको ध्यान से जप करना चाहिए।” और प्रभुपाद जी ने कहा, “Another impractical answer” (एक और अव्यावहारिक उत्तर)।
प्रभुपाद जी ने कहा, जप करना ज़रूरी है। हाँ, जप करना ज़रूरी है, पर हर संदर्भ में सिर्फ यही उत्तर देना ठीक नहीं है। भगवान कहते हैं:
तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्।
ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते॥
(जो प्रेमपूर्वक मेरी सेवा में निरंतर लगे रहते हैं, उन्हें मैं वह बुद्धि देता हूँ जिसके द्वारा वे मुझ तक आ सकते हैं।)
जो बुद्धि है, कैसे मुझे कार्य करना है, किस परिस्थिति में, इस परिस्थिति में ऐसे करो, इस परिस्थिति में ऐसे करो। कुछ चीज़ें ज़रूर ऐसी हैं, जिस परिस्थिति में हमें भगवान पर ही निर्भर रहना है, हम उसमें कुछ नहीं कर सकते हैं। पर कुछ चीज़ें ऐसी हैं, जिसमें हमें खुद की क्षमता से, खुद की शक्ति से प्रयास करना है।
एक उदाहरण इसके लिए है, कि मान लीजिए हम सागर में जा रहे हैं, और सागर में कभी-कभी बड़ी-बड़ी लहरें आ जाती हैं। और अगर कोई बहुत बड़ी लहर आ गई है, तो उसके खिलाफ हम जा नहीं सकते हैं। तो तभी शायद वो लहर जिस दिशा में जाएगी, उसी दिशा में लेकर जाएगी, हम कुछ नहीं कर सकते हैं। पर, सागर में तो लहरें आती ही रहने वाली हैं। कोई बहुत बड़ी होगी, कोई छोटी होगी। पर फिर भी, जब लहरें नहीं हैं, तो हमें जिस दिशा में जाना है, उस दिशा में हमको प्रयास करना है। यह जीवन को भवसागर बताया गया है, तो कभी-कभी हमारे जीवन में ऐसी लहरें आ जाएंगी, तो उसको हम कुछ भी नहीं कर सकते हैं, ठीक है, स्वीकार कर लेते हैं।
पर फिर भी हम सोचते हैं कि “इस परिस्थिति में मैं आगे कैसे बढ़ सकता हूँ, इस परिस्थिति में मैं क्या कर सकता हूँ?” एक समय भारत में एक लहर आ गई थी, भौतिक प्रगति की, कि अभी भारत को आज़ादी मिल गई है, और यह आज़ाद भारत भौतिक प्रगति करके समृद्ध हो जाएगा। तो वो लहर ऐसी थी कि उसके प्रतिकार में प्रभुपाद जी भी जा नहीं पा रहे थे। कितना भी प्रचार करो, वो लोगों के मन में जा ही नहीं रहा था। तो तभी प्रभुपाद जी ने क्या किया? ठीक है, उस लहर के हम खिलाफ नहीं जा सकते, तो प्रभुपाद जी उस लहर के रास्ते से बाहर निकल गए, और अमेरिका चले गए।
और उस समय में, अमेरिका में ऐसी लहर थी, जो लोगों को अध्यात्म की ओर ले जा रही थी। ऐसा नहीं कि आसानी से वहाँ पर अध्यात्म के, भक्ति के बीज बोए, पर वहाँ पर लोगों को रुचि थी। तो प्रभुपाद जी का उद्देश्य था कि उनको आध्यात्मिक ज्ञान प्रदान करना था, पर कुछ परिस्थिति ऐसी थी कि वो भारत में कुछ नहीं कर सकते थे, तो उन्होंने उस लहर के रास्ते से खुद को अलग कर लिया, और ऐसी जगह पर चले गए जहां वो प्रचार कर सकें।
तो मैं पहला पॉइंट बता रहा था कि किस परिस्थिति को किस संदर्भ में देखना है, वह बुद्धि है। और उसी की अगली बात है कि भगवान पे निर्भर रहो, पर व्यावहारिक रूप से पूरा प्रयास करो।
सेवा भाव और व्यावहारिक ज़िम्मेदारी
मैं जब 20-25 साल पहले प्रवचन देने लग गया था, तो एक वरिष्ठ भक्त ने मुझे मार्गदर्शन के लिए पॉइंट बताए थे। भगवान पे निर्भर रहो, पर अपनी कुछ तैयारी करने के बाद। अगर कोई प्रवचन करने आता है, “मैंने कुछ तैयारी नहीं की, मैं भगवान पे निर्भर हूँ।” वो भगवान पे निर्भरता नहीं है, वह गैर-ज़िम्मेदारी है। इसलिए हमें अंतिम दृष्टि से हर चीज़ में भगवान पे निर्भर रहना है, पर व्यावहारिक दृष्टि से कुछ चीज़ों पे हमें ज़िम्मेदारी लेनी है।
तो ये कैसे समझेंगे? सेवा भाव अगर स्थिर रखेंगे, तो ये समझ जाएंगे। हम देखते हैं, परीक्षित महाराज को जब शाप मिल गया, तो तभी उन्होंने सात दिन पूरा ध्यान लगाकर भागवत का ही श्रवण किया। पर जब उसके पहले वो राजा थे, वो कोई ज़िम्मेदार पद में थे, तो उन्होंने क्या किया, अपने पुत्र को राजा बना दिया और चले गए। पर जब वो ज़िम्मेदार पद में थे, तभी उनको जानकारी मिली कि कलि मेरे राज्य में सक्रिय हो गया है। तो वो खुद निकले अपने सारे राज्य का निरीक्षण करने के लिए। और फिर उन्होंने वहाँ पे कार्य किया। जैसे ही कलि को देखा, तो उसको आक्रमण किया, उसको सज़ा दी।
तो एक है आध्यात्मिक चेतना, और आध्यात्मिक कार्यों में हमारी चेतना को लगाना बहुत जरूरी है। पर अगर भौतिक स्तर पर हमने कोई ज़िम्मेदारी स्वीकार की है, तो अगर हम वो आदर और शक्ति स्वीकार कर रहे हैं, तो फिर हमारी ज़िम्मेदारी है कि उस पद के लिए जो व्यावहारिक रूप से करना है, वो हम करें। अगर वो नहीं कर रहे हैं, तो फिर आप वो पद स्वीकार मत कीजिए। ऐसा नहीं कि हर एक व्यावहारिक स्तर पे ही प्रतिकार करना है। पर अगर व्यावहारिक स्तर पे हम कुछ ले रहे हैं समाज से, हम आदर ले रहे हैं, सम्मान ले रहे हैं, सुविधा ले रहे हैं, और फिर हम उसके आदान-प्रदान में जो अपेक्षित है, वो नहीं कर रहे हैं, तो फिर वह उचित नही है।
मान लीजिए, हमको कुछ मुश्किल सवाल है, कि भगवद्गीता के इस श्लोक में ऐसा क्यों बताया है? तो अगर हम किसी भक्त से पूछते हैं, वो बोलते हैं “क्या है, कि आप टेक्निकल (technical) मत जाओ, आप जप करो, सब सवालों का जवाब मिल जाएगा।” ठीक है, यह भी एक जवाब है। पर अगर कोई भक्ति शास्त्री टीचर बनने की ज़िम्मेदारी ले रहा है, तो फिर उनकी ज़िम्मेदारी है कि भगवद्गीता इस हद तक समझें कि वे जवाब दे सकें। अलग-अलग संदर्भों में अलग-अलग हो सकता है।
कुछ लोग कहेंगे कि हम व्यावहारिक स्तर पर कुछ भी नहीं करना चाहते हैं। तो फिर व्यावहारिक स्तर पर कुछ भी पदवी मत लो। हमारी परंपरा में भजनानंदी होते हैं, गोष्ठ्यानंदी होते हैं। जब भजनानंदी काउंसलर बना हुआ है, प्रचारक बना हुआ है, तो फिर उनकी जो व्यावहारिक ज़िम्मेदारी है, वो भी करनी ज़रूरी है।
तो फिर हमें देखना चाहिए कि हमारी क्षमता क्या है और हमारी रुचि क्या है। कई बार मैं अमेरिकन यूनिवर्सिटीज (American Universities) में लेक्चर देता हूँ, कि how to find your purpose in life? (हमारे जीवन का उद्देश्य कैसे ढूंढें?) हम यह कह सकते हैं कि जीवन का उद्देश्य भगवत प्राप्ति करना है। वो ठीक है, वो अंतिम उद्देश्य है, पर व्यावहारिक रूप से इस जीवन में क्या करना है? कई बार अगर कोई ऐसी जगह है जहाँ पर अच्छा मंदिर नहीं है, अच्छा मार्गदर्शन नहीं है, तो कई बार ऐसे होता है कि हम कहते हैं कि भौतिक जगत में जो आत्मा है वो गुमराह हो गई है, भटक रही है। पर ऐसे भी हो सकता है कि कोई गुमराह आत्मा इस्कॉन (ISKCON) में भी हो। मैं भक्ति करने लग गया हूँ, पर मेरे भक्ति के जीवन में करना क्या है मुझे?
अगर आजीवन भक्ति करनी है, तो हमको कोई ज़िम्मेदार सेवा चाहिए। हमारा जीवन उस हद तक अर्थपूर्ण बनता है, जिस हद तक हम कोई ज़िम्मेदारियां स्वीकार करते हैं। कुछ लोग क्या करते हैं, ‘पिटी पार्टी’ (Pity Party) करते हैं। पिटी पार्टी मतलब क्या? कि एक व्यक्ति बोलता है “मेरे साथ ऐसा बुरा हो गया,” दूसरा व्यक्ति बोलता है “मेरे साथ ऐसा बुरा हो गया।” दोनों साथ में आते हैं, बोलते हैं “दुनिया कितनी बुरी है देखो,” और कुछ हल निकालते नहीं हैं।
अगर दुनिया में हज़ारों चीज़ें गलत हैं, पर कोई चीज़ ऐसी है जिससे मुझे बहुत परेशानी होती है कि यह ऐसे नहीं होना चाहिए, तो हमें देखना चाहिए कि यह समस्या हल करने के लिए मेरे पास क्या क्षमता है? कोई मंदिर में आता है, बोलता है कि “यहाँ पर यह मंदिर का जो नोटिस बोर्ड है, यह इतना अच्छा नहीं है। मैं इसकी ज़िम्मेदारी लेता हूँ। मैं इसको अच्छे से डेकोरेट (decorate) करूँगा, अच्छे प्रिंट आउट लूँगा, अच्छे से सब कुछ करूँगा।”
हमें देखना चाहिए कि जो बाहर का समाज है, जो भी अंदर है, कोई ऐसी समस्या है, कोई ऐसी ज़रूरत है जो पूरी करनी है? क्या हमें उसमें रुचि (passion/interest) है, और क्या हमारे पास पोटेंशियल (potential) है उसे करने के लिए? अगर ये दोनों चीज़ों का समन्वय आ जाता है, तो फिर हम कुछ ऐसा कर सकते हैं जिससे कि हमको भी लगता है कि मैंने कुछ कंट्रीब्यूट (contribute) किया।
अगर हमें लगता है कि “मुझे इतना तत्त्व ज्ञान पता नहीं है, अगले छह महीनों के लिए मैं शास्त्रों का अध्ययन करूँगा, अच्छी तरह से लेक्चर सुनूँगा,” फिर हमको बाद में लगता है कि “ठीक है, मैं तो ये कर रहा हूँ, पर मुझे कुछ अभी प्रचार करना चाहिए।” तो फिर क्या है, इस तरह से हम खुद भी फैसला कर सकते हैं दूसरों के मार्गदर्शन को लेकर। किस चीज़ में रुचि है? क्या मुझे करना अच्छा लगता है? और हाँ, मेरे पास यह क्षमता है, मैं यह कर सकता हूँ।
मैं अलाचुआ (Alachua) में था अमेरिका में, वहाँ पर प्रभुपाद जी के शिष्य रोचन प्रभु मुझे बता रहे थे। मैंने पहले प्रसंग पढ़ा भी था कि किस तरह से जब वो इंग्लैंड में थे, तो कई भक्त आ रहे थे इधर-उधर से और प्रभुपाद जी को बता रहे थे कि “जर्मनी में ऐसा प्रचार चल रहा है, फ्रांस में ऐसा प्रचार चल रहा है।” तो प्रभुपाद जी ने कहा, “Find out something to do, and then do it for Krishna.” कि आप ढूंढो कि आप क्या करना चाहते हैं, आपको क्या अच्छा लगता है, वो ढूंढो और वह कृष्ण के लिए करो।
अभी हमारी संस्था इतनी बड़ी बन गई है कि शायद वरिष्ठ भक्त, हमारे गुरु वर्ग हर भक्त को समझ के, उसकी क्या क्षमता है, क्या परिस्थिति है, उसको सब कुछ समझ के एक-एक सेवा देना काफी मुश्किल हो जाएगा। तो अगर सेवा मिल रही है तो वो एक भाग्य है, पर साथ-साथ अगर हम यह देखेंगे कि मुझे किसमें रुचि है और मुझे किसमें क्षमता है, प्रतिभा है, तो फिर हमें खुद प्रेरणा मिलेगी वो करने के लिए।
भक्ति में हताश न होना: चेतना की विभिन्न शाखाएं
तो अभी आखिरी पॉइंट मैं लेता हूँ। पहला पॉइंट यह था कि हमें बुद्धि से समझना है, सकारात्मक रूप से इस प्रसंग पर कैसी मेरी प्रतिक्रिया होनी चाहिए। दूसरा है कि अगर हम सेवा भाव रखते हैं, तो किस चीज़ में भगवान पे निर्भर रहना है, किस चीज़ में खुद ज़िम्मेदार बनना है, यह समझना है। आखिरी पॉइंट यह देखना है कि बुद्धि का मतलब है कि कभी भी हम हताश नहीं होने चाहिए।
प्रभुपाद जी बोलते हैं, “A devotee may be perplexed, but a devotee is never frustrated.” (एक भक्त परप्लेक्स्ड (perplexed) हो सकता है, कन्फ्यूज़्ड हो सकता है, पर कभी हताश नहीं होता)। हताश होना मतलब मुझे सेवा करने की इच्छा ही नहीं है। परप्लेक्स्ड मतलब कि मुझे ऐसा कंफ्यूजन है कि “क्या करना है, यह करना है या यह करना है?”
हम हताश क्यों होते हैं? हम किसी एक चीज़ में अपनी भक्ति, इच्छा, और भावना को इतना लगा देते हैं कि अगर वो एक चीज़ नहीं हो रही है, तो हम खुद को पूरा असहाय मान लेते हैं। हमें समझना है कि वास्तव में, जैसे गंगा सागर की ओर जाती है, उसी तरह से हमारी चेतना गंगा के समान है और भगवान सागर के समान हैं। गंगा एक नदी नहीं होती, गंगा की अनेक शाखाएं (tributaries/branches) होती हैं। इस शाखा से थोड़ा पानी जा रहा है, इस शाखा से थोड़ा पानी जा रहा है, और सब शाखाओं से गंगा सागर की ओर जा रही होती है।
उसी तरह से हमारी चेतना की अनेक-अनेक शाखाएं हैं, और हर एक शाखा से हमारी चेतना भगवान की ओर जा रही है। हमारा जप एक शाखा हो सकती है, हमारी भगवान के विग्रहों की पूजा एक शाखा हो सकती है, अगर हम बुक डिस्ट्रीब्यूशन (book distribution) कर रहे हैं वो एक शाखा हो सकती है, हम प्रचार करते हैं वो एक शाखा हो सकती है। हमारे कुछ भक्तों से सम्बन्ध हैं, जिससे हमको प्रेरणा मिलती है, वो एक शाखा हो सकती है।
हमारे जो रिश्ते हैं—हमारे पति, पत्नी, माता, बहन, भाई, बच्चे—अगर हम सेवा भाव से करते हैं, वो भगवान की सेवा है। तो उन सब में भी क्या है, उसके द्वारा हमारी चेतना भगवान की ओर जा रही है क्योंकि मैं इस व्यक्ति की सेवा इसलिए कर रहा हूँ, ना केवल इसलिए कि ये मेरे पति हैं या पत्नी हैं, पर यह भगवान के अंश हैं।
अगर हम ये भाव रखते हैं कि हमारे चेतना में अलग-अलग विभाग हैं, वो सब शाखाएं हैं, तो इससे क्या होता है? अगर किसी कारण एक शाखा बंद हो जाती है, तो हम हताश नहीं होंगे। हम हताश क्यों हो जाते हैं, क्योंकि हम हमारी चेतना का सारा जल एक ही शाखा में डाल देते हैं। और वो शाखा अगर बंद हो गई, तो लगता है मेरा जीवन ही खतम हो गया।
मैं एक भक्त से मिला था अमेरिका में, वो बहुत बड़े बुक डिस्ट्रीब्यूटर थे। क्या होता है कि अगर आप शरीर संभाल के नहीं करते, बड़े वज़न उठाते हैं बहुत समय तक, तो पीठ में दर्द हो सकता है। तो उनको पीठ में दर्द हो गया और ऐसा दर्द हो गया कि डॉक्टर बोले कि “अब आप बैग उठा ही नहीं सकते।” तो अभी वो बोले कि “अभी मैं करूँगा क्या ज़िन्दगी में? यही तो मेरी सेवा थी।” कुछ समय के लिए बड़े मायूस हो गये। पर फिर बाद में किसी भक्त से बातचीत हुई, तो बोले कि “आजकल की दुनिया सोशल मीडिया की दुनिया है। आप सोशल मीडिया से, फेसबुक से, यूट्यूब से लोगों से कांटेक्ट (contact) करो।”
और फिर क्या हुआ, कि जो इतने सालों से बुक डिस्ट्रीब्यूशन या प्रीचिंग (preaching) कर रहे थे, उन्होंने बहुत से लोगों के कार्ड लिए थे, पर किसी को फॉलो-अप (follow-up) करने का मौका नहीं था। फिर उन्होंने उन लोगों से कांटेक्ट करना शुरू किया, और वो बोले, “अभी भले ही मैं मेरे कमरे से बाहर नहीं आता हूँ, पर उस एक कमरे से मैं इतने सारे लोगों को प्रचार कर रहा हूँ।”
एक फिजिकली (physically) जाना और बुक डिस्ट्रीब्यूशन करना, ये एक उनकी शाखा थी, वो बंद हो गई। पर इसका मतलब नहीं कि उनकी भक्ति बंद हो जानी चाहिए। दूसरी शाखा खुल गई। इसलिए Intelligence means to be more attached to service attitude than to service. (बुद्धि का मतलब है कि हमारी सेवा से आसक्ति कम, और सेवा भाव से आसक्ति ज़्यादा होनी चाहिए)। सेवा भाव से आसक्ति होगी तो, ठीक है अभी ये सेवा नहीं हो रही है, तो मैं ये दूसरी सेवा कर सकता हूँ।
भगवान भले ही एक दरवाज़ा बंद कर देते हैं, तो दूसरा दरवाज़ा ज़रूर खोल देते हैं। पर क्या होता है, हम जो दरवाज़ा बंद होता है, उसकी ओर देखते रहते हैं और गुस्से से उसकी ओर देखते रहते हैं, और रोने लगते हैं। जब एक दरवाज़ा बंद हो गया है, तो कौन सा दरवाज़ा खुला है? अगर हम थोड़ी खोज करेंगे, तो ज़रूर हमको पता चलेगा।
मैं एक भक्त से मिला, वो बहुत अच्छे संकीर्तन करते थे। और कुछ हो गया, और उनकी वाणी चली गई। वाणी चली गई, तो कीर्तन भी नहीं कर पाए, जप भी नहीं कर पाए, तो बड़े हताश हो गए। फिर वरिष्ठ भक्तों से बात कर ली कि “आप जिह्वा से जप नहीं कर सकते हैं, तो आप मन में जप करो।” वो बोले कि “अभी मैं मन में जप करने लग गया हूँ, और वास्तव में पहले से ज़्यादा ध्यान दे रहा हूँ, क्योंकि पर्याय नहीं है कुछ और।”
श्रील प्रभुपाद का दृष्टांत और सेवा भाव
तो कोई भी ऐसी परिस्थिति नहीं है जो हमारी भक्ति को पूरा बंद कर दे। अगर हम बच्चे हो गए, तो हम उनको प्रेरणा देंगे, मार्गदर्शन देंगे, सुविधा देंगे। भगवान अपनी योजना के अनुसार, अपनी इच्छा के अनुसार, सही मार्ग पर लेकर आ जाएंगे। तो हमें हमारी चेतना को केवल एक शाखा पर कभी मर्यादित नहीं होने देना है।
प्रभुपाद जी भारत में प्रचार करना चाहते थे, पर भारत में कितने सारे दरवाज़े उनके लिए बंद हो गए। पर प्रभुपाद जी की भक्ति का प्रचार करने की इच्छा बंद नहीं हुई। अमेरिका में गए। अमेरिका में भी आसान नहीं था। फिर बाद में वो योगा स्टूडियो, वो दरवाज़ा बंद हो गया। प्रभुपाद जी जब न्यूयॉर्क में गए, योगा स्टूडियो में गए, वो बोले, “आप कीर्तन कर सकते हो, पर आप प्रचार मत करो,” क्योंकि वहाँ पर जो गुरु थे, वो मायावादी थे। फिर प्रभुपाद जी अपनी खुद की जगह में रहने लग गए। और वहाँ पर जो जेनिटर (janitor) था, जो गार्ड था, उसने ही प्रभुपाद जी का टाइपराइटर और डिक्टाफोन चोरी कर लिया। तो प्रभुपाद जी फिर वहाँ से निकले, लोअर ईस्ट साइड (Lower East Side) में चले गए।
वहाँ पर जो उनके साथ व्यक्ति रह रहा था, डेविड एलन (David Allen), लग रहा था कि वो शायद उनका पहला शिष्य बनेगा, और वही नशे के प्रभाव में इतना पागल हो गया कि प्रभुपाद जी पर आक्रमण करने आ गया। तो कितने दरवाज़े बंद होते गए, पर प्रभुपाद जी ने देखा, कौन सा दरवाज़ा खुला है, और आगे बढ़ते गए। और फिर बाद में भगवान ने तो ऐसा दिखा दिया कि यह केवल एक धारा ही नहीं है, यह एक सागर बन गया है।
तो बुद्धि का मतलब क्या है कि, जो समस्या है, उसको सबसे सकारात्मक संदर्भ में हम हल ढूँढने का प्रयास करें। छोटी सी समस्या को हम बहुत बड़ा अर्थ दे देते हैं, तो डिप्रेशन हो जाता है। यह हम व्यावहारिक स्तर पर बुद्धि और अनुभव के द्वारा समझ सकते हैं, कि किस समस्या का हल किस स्तर पर करना है।
प्रश्नोत्तर: दूसरों को भक्ति में कैसे जोड़ें?
प्रश्न: अगर हम कुछ कार्य करते हैं, तो पहले इरादा होता है, फिर बुद्धि होती है। तो हम हमारी बुद्धि से कार्य कर सकते हैं, पर किसी और को भी साथ में कार्य कराना है, तो उनमें हम वो इरादा कैसे निर्माण कर सकते हैं?
उत्तर: इसे मैं कहता हूँ एंगेजमेंट (Engagement), एनकरेजमेंट (Encouragement), एन्लाइटनमेंट (Enlightenment)। अगर हम माता-पिता हैं, हम चाहते हैं कि हमारे बच्चे भक्ति में लग जाएं, तो हम ज़बरदस्ती नहीं कर सकते हैं।
- एन्लाइटनमेंट (Enlightenment): मतलब कि हम ज्ञान देते हैं कि ये करेंगे तो ऐसा होगा, ये करेंगे तो ऐसा होगा। मतलब किसी को हम नक़्शा दे रहे हैं।
- एंगेजमेंट (Engagement) / एनकरेजमेंट (Encouragement): हम चाहते हैं कि लोग दस चीज़ें करें। और वो एक चीज़ भी करते हैं, तो उनके लिए प्रगति है। पर क्या है, वो एक चीज़ की है, उसकी सराहना करनी चाहिए। बजाय यह कहने के कि “आपने एक चीज़ कर ली, अब आगे नौ चीज़ें भी कर लो।” उससे क्या होता है, उनको लगता है कि “तुम्हारी अपेक्षाओं के बोझ के तले मैं दब ही जाऊँगा। मेरी कुछ ज़िन्दगी रहेगी नहीं।”
छोटी सी भी चीज़ के लिए उसकी सराहना करनी चाहिए। तो ऐसा करेंगे तो क्या होता है, उनको प्रोत्साहन मिलता है। हमारी अपेक्षा होती है, “अभी तुमने एक माला कर लिया, अभी सोलह माला कब से करने वाले हो?” इंस्टेड ऑफ़ गिविंग एनकरेजमेंट, वी गिव फर्दर एक्सपेक्टेशंस (Instead of giving encouragement, we give further expectations)। अगर हम ये तीन चीज़ें करते हैं—एन्लाइटनमेंट, एंगेजमेंट और एनकरेजमेंट—तो फिर उनको भी सही मार्ग में चलने का जो पुश (push) है, वो मिल जाएगा।
पर अगर वो नहीं चाहते हैं, वो कार्य नहीं करते हैं, तो हमें फिर एक व्यावहारिक रूप पर फैसला करना है कि “ठीक है, अगर आप ये नहीं करना चाहते हैं, मैं ये करना चाहता हूँ—लिव और लेट लिव (Live and let live)।”
बुद्धिमान कौन है?
प्रश्न: कोई व्यक्ति सेवा कर रहा है, पर उसे बुद्धिमान नहीं कह सकते हैं। तो क्या वैष्णव संग, गुरु संग से भी श्रेष्ठ है सेवा?
उत्तर: दसवें अध्याय के 10-11वें श्लोक के तात्पर्य में श्रील प्रभुपाद जी बोलते हैं भगवद्गीता में, कि कभी-कभी अगर कोई भक्तों के संग में सेवा भी कर रहा है, और अगर वो प्रगति नहीं कर पा रहा है (यानी वो उतना बुद्धिमान नहीं है), तो भगवान इतने कृपालु हैं, जो उनको बुद्धि दे देंगे और वो प्रगति कर पाएंगे।
वहाँ पर जो बुद्धिमान है, वह बुद्धि एक अलग प्रकार की बुद्धि है। अगर आप मायावादियों का तात्पर्य पढ़ते हैं, कई लोग क्या कहते हैं, कि बुद्धि ही सर्वश्रेष्ठ है। ज्ञान योग का मार्ग है और ज्ञान से आपको लीन होना है। और अगर आपको ज्ञान नहीं है (यानी आप बुद्धिमान नहीं हैं), तो फिर आप भक्ति करो। उनके लिए ज्ञान मार्ग है, जो भावुक लोग हैं, उनके लिए भक्ति मार्ग है। ऐसा कुछ लोग कहते हैं।
ऐसा सत्य नहीं है। क्योंकि क्या है, बहुत से भक्ति के आचार्य भी हम देखते हैं, बहुत बुद्धिमान थे। गौड़ीय संप्रदाय में जीव गोस्वामी जी लिखते हैं, कि जो भी बुद्धि ज़रूरी है, भगवान की ओर प्रगति करने के लिए, वो मिल जाएगी।
इसमें आप थोड़ा सा अगर भेद करना चाहें, तो इंटेलेक्ट (Intellect) और इंटेलिजेंस (Intelligence) में कर सकते हैं। इंटेलेक्ट मतलब इन्फॉर्मेशन प्रोसेसिंग एबिलिटी (Information processing ability), जानकारी को याद करके बोलना। वो क्षमता शायद सब लोगों में नहीं होगी, कुछ लोगों में ज़्यादा होगी। पर क्या है, अध्यात्म की ओर प्रगति करने के लिए जो डिसीजन मेकिंग एबिलिटी (Decision making ability) वाली बुद्धि ज़रूरी है, वह सबको मिल जाएगी, भले ही वो व्यक्ति इंटेलेक्चुअल (Intellectual) हो या ना हो।
बहुत-बहुत धन्यवाद, हरे कृष्णा!