When imagination points away from reality and when it points to reality – Hindi
[Bhagavatam class at ISKCON, Nasik, India]
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Lecture Summary
- इंद्रधनुष और भगवान की प्रकृति: जिस प्रकार इंद्रधनुष में कोई धागा नहीं होता, फिर भी वह आकाश में सुंदर रूप से प्रकट होता है, ठीक वैसे ही भगवान जब इस भौतिक जगत में आते हैं, तो वे प्रकृति के तीन गुणों (सत्त्व, रजस, तमस) रूपी धागों से बंधे नहीं होते। वे पूरी तरह से निर्गुण और दिव्य हैं।
- जगत की असंतुष्टि और मनुष्य के तीन प्रयास: यह भौतिक जगत स्वाभाविक रूप से असंतुष्टि देने वाला है। इससे राहत पाने के लिए मनुष्य हमेशा तीन तरह के प्रयास करता है:
- आध्यात्मिक चेतना अपनाकर इस जगत के पार जाना।
- विज्ञान और तकनीक (Technology) के माध्यम से इसी जगत को बेहतर बनाना।
- कल्पना और मनोरंजन (जैसे- फ़िल्में) की दुनिया में खो जाना।
- कल्पना (Imagination) का सही और गलत उपयोग: आजकल दुनिया वास्तविकता से भागने के लिए करोड़ों रुपये ‘मोह’ (Illusion/Movies) बनाने में खर्च कर रही है, जो हमें सत्य से दूर ले जाता है। लेकिन गौड़ीय वैष्णव संप्रदाय में कल्पना का उपयोग भगवान की ओर जाने के लिए किया जाता है। भक्ति में नाटक, कीर्तन, कथा और विग्रह श्रृंगार के माध्यम से हम अपनी कल्पना शक्ति को परम सत्य (भगवान) से जोड़ते हैं।
- ब्रह्मा विमोहन लीला की शिक्षा: जब ब्रह्मा जी ने अपने मोह से ग्वालों और बछड़ों को चुरा लिया, तो भगवान कृष्ण ने उससे भी बड़ा मोह रचा और स्वयं ग्वालों व बछड़ों का रूप ले लिया (Illusion within an illusion)। इसका उद्देश्य ब्रह्मा जी के मोह को तोड़कर उन्हें परम सत्य का दर्शन कराना था।
- स्मृति और स्फूर्ति (भगवान को याद करने के दो स्तर):
- स्मृति (Conscious Recollection): जब हम खुद प्रयास करके भगवान का चिंतन करते हैं। शुरुआत में मन को नियंत्रित करना ज़हर जैसा लगता है, लेकिन अभ्यास से यह अमृत बन जाता है।
- स्फूर्ति (Spontaneous Recollection): जब भगवान की कृपा से बिना किसी प्रयास के ही मन भगवान में मग्न हो जाता है और भक्त को दिव्य आनंद की अनुभूति होती है।
- समस्याओं का समाधान और ओवरथिंकिंग (Overthinking): जीवन की समस्याओं के बारे में लगातार विचार करते रहना मन को हमारा शत्रु बना देता है। व्यर्थ की चिंताओं और ओवरथिंकिंग से बचने का सबसे अच्छा तरीका है— ज़िम्मेदारी (Responsibility) लेना। सेवा या किसी अच्छे काम की ज़िम्मेदारी एक ऐसा बोझ है, जो हमें व्यर्थ के बोझों से मुक्त कर देता है। खुद में बदलाव लाने के लिए हमेशा Small Simple Steps (छोटे और सरल कदम) से शुरुआत करनी चाहिए।
Full Transcriptions
कल्पना और सत्य: एक इंद्रधनुष का उदाहरण
कभी-कभी बारिश में बादलों की गड़गड़ाहट के साथ एक धनुष दिखता है, जो किसी धागे के बिना होता है। साधारणतया जो धनुष होता है, वह धागे से बंधा होता है, पर इंद्रधनुष में कोई धागा नहीं होता है। और इसके बावजूद वह आसमान में बड़ा ही सुंदर रूप से प्रतीत होता है। ठीक उसी तरह से, जब भगवान इस भौतिक जगत में आते हैं, तो वे एक साधारण मानव जैसे प्रतीत होते हैं, पर वे किसी भौतिक परिस्थिति पर निर्भर नहीं हैं। भगवद्गीता में बताया गया है कि भगवान अपनी अंतरंग शक्ति से आते हैं, जो कि बाह्य शक्ति के बंधन से पूर्णतः मुक्त हैं, और जो साधारण जीवों के लिए बद्ध अवस्था है, वह भगवान के लिए मुक्त अवस्था है।
यहाँ पर यह श्लोक तब तक हम रिसाइट करते हैं:
निर्गुणं च गुणिन्यभाद् व्यक्ते गुणवान् पुरुषो यथा।
धनुर्वियति माहेन्द्रं…
ॐ अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जनशलाकया।
चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः॥
नम ॐ विष्णुपादाय कृष्णप्रेष्ठाय भूतले।
श्रीमते भक्तिवेदान्तस्वामिन् इति नामिने॥
नमस्ते सारस्वते देवे गौरवाणीप्रचारिणे।
निर्विशेषशून्यवादिपाश्चात्यदेशतारिणे॥
वाञ्छाकल्पतरुभ्यश्च कृपासिन्धुभ्य एव च।
पतितानां पावनेभ्यो वैष्णवेभ्यो नमो नमः॥
जय श्री कृष्ण चैतन्य प्रभु नित्यानन्द।
श्री अद्वैत गदाधर श्रीवासादि गौरभक्तवृन्द॥
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
जो भी भक्तों ने अपने मोबाइल फोन लाए हों, कृपया उसको आप बंद कर दीजिए ताकि वो कथा में डिस्टर्ब नहीं करें। हरे कृष्ण।
श्रीमद्भागवतम के दशम स्कंध पर चर्चा
तो आज सुबह हम श्रीमद्भागवतम के दशम स्कंध से इस विषय पर चर्चा करेंगे कि कल्पना और सत्य, इसमें क्या संबंध है। यहाँ पर दशम स्कंध में यह जो अध्याय है, इसमें जैसे अभी बहुत बारिश हो रही है, तो वैसे ही वृंदावन में बड़ी बारिश हो रही है। और उस बारिश से शुकदेव गोस्वामी जब उसका चिंतन कर रहे हैं, तो चिंतन करते हुए निसर्ग को देख कर वे अलग-अलग उपमाएं और तुलनाएं कर रहे हैं, और उनके द्वारा कुछ आध्यात्मिक शिक्षा प्रदान कर रहे हैं।
तो इस अध्याय को हम कह सकते हैं कि वे उपमाओं के द्वारा शिक्षा प्रदान कर रहे हैं, तुलनाएं कर रहे हैं। आजकल दुनिया में हम क्या करते हैं? हमारा विजन एक प्रकार का होता है। हम जो देखते हैं, वो अभी दो व्यक्ति शायद एक ही चीज़ को देखते हैं, पर वो दोनों एक ही चीज़ को नहीं देखते हैं। भले ही आंखें एक ही चीज़ को देख रही हों, लेकिन अलग-अलग मानसिक चेतना के कारण उन्हें अलग-अलग चीज़ें दिखती हैं। आंखें भले एक ही चीज़ को देख रही हों, पर दो मन जो हैं, उसके बारे में अलग-अलग चीज़ों को सोचते हैं।
तो यहाँ पे जो यह अध्याय है, इससे हम समझ सकते हैं कि निसर्ग में इतनी सारी चीज़ें हैं, और हम इतनी बार उन सबको देखते हैं। पर शुकदेव गोस्वामी, क्योंकि उनकी चेतना, आध्यात्मिक तत्व और आध्यात्मिक सत्य में एकाग्र है, कि वे निसर्ग को भी देखते हैं, तो उनको वहाँ पे आध्यात्मिक तत्व की याद आती है। और इस विशेष श्लोक में बताया गया है, कैसे आसमान में हम कभी-कभी, जब बारिश होती है, तो इंद्रधनुष देखते हैं।
तो अभी इंद्रधनुष दिखने में एक धनुष जैसे ही लगता है। पर यह अलग है, क्योंकि इसमें कई फर्क हैं, पर एक फर्क यहाँ पे बताया गया है, कि इंद्रधनुष जो है, उसमें कोई धागा नहीं होता है। तो जब कोई युद्ध में जाता है, उसके पहले जैसे कोई बंदूक लेकर जा रहा है, तो बंदूक काम कर रही है कि नहीं देखते हैं, बंदूक में गोलियां हैं कि नहीं देखते हैं। तो वैसे ही, जब कोई धनुष से युद्ध करने जाता है, तो वो देखते हैं कि तीर उनके पास हैं या नहीं, और दूसरा, वो जो धागा है, वो कितना टाइटली बंधा है, उसमें कितना टेंशन है। जितना उस धागे में टेंशन है, उतना ही वो जब तीर मारेंगे घातक होगा। तो जो धनुष को हम देखते हैं, तो उसमें पहले हमको धनुष का रूप दिखता है, धागा पहले नहीं दिखता है, पर धागा बड़ा महत्वपूर्ण होता है। पर इंद्रधनुष ऐसा धनुष है जिसमें धागा नहीं है।
तीन गुणों का प्रभाव और भगवान की दिव्य प्रकृति
तो उसकी तुलना, अभी क्या? किससे कर रहे हैं वो? वो कह रहे हैं कि भगवान जब इस भौतिक जगत में आते हैं तो वो एक इंद्रधनुष के समान हैं। कि क्या तुलना है? जैसे बिना धागे के साधारण धनुष नहीं रहता है, उसी तरह से इस भौतिक जगत में कोई भी व्यक्ति, वो भौतिक तत्वों और तीन गुणों के बिना, वो कुछ कार्य नहीं कर सकता है। यह तीन गुण जो हैं, इनकी दो समझ आती हैं, तीन गुण वास्तव में हैं क्या? तो भगवान भी इसको भगवद्गीता में दो पद्धतियों से समझाते हैं कि तीन गुण क्या हैं।
एक है, जिसे आपने सब चित्रों में देखे होंगे, कोई व्यक्ति है, भगवद्गीता में चित्र है, कि उसके ऊपर तीन व्यक्ति हैं, तीन अलग-अलग रस्सियां दिखाते हैं, और वो कठपुतली के समान व्यक्ति को नचा रहे हैं, और उनके ऊपर भगवान हैं। तो चौदहवें अध्याय के पांचवें श्लोक में बताते हैं:
सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसम्भवाः।
निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम्॥
बताते हैं, कि तीन गुणों से सारे जीव बंध जाते हैं। पर इसके अलावा, गुणों की एक और परिभाषा है, गुण क्या?
दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया।
कि सारी भौतिक प्रकृति जो है, वह तीन गुणों से बनी हुई है। तो तीन गुणों का अर्थ होता है, कि इस भौतिक जगत का जो अस्तित्व है, उसका मूल कारण भी तीन गुण हैं। और इसके लिए हम उदाहरण देते हैं, कभी-कभी कैसे, कि अगर आप कुछ टीवी देख रहे हैं, तो वास्तव में, जिनको टीवी की टेक्नोलॉजी पता है, तंत्रज्ञान पता है, क्या होता है? टीवी के उस स्क्रीन पे केवल तीन रंग आते हैं। तीन रंग के छोटे-छोटे डॉट्स आते हैं—लाल, हरा, नीला होता है। तीन प्रकार के रंग होते हैं, और उन तीन रंगों के मिलन से ही सब बनता है। तो वास्तव में वहाँ पे कुछ नहीं है, सिर्फ तीन प्रकार की लाइट है, उसको पिक्सल्स कहते हैं, पर उससे सारे चित्र आते हैं।
तो उसी तरह सारे गुण जो हैं, क्या हैं? यह तीन चीज़ें हैं—सत्त्व, रजस, तमस, जो सारे भौतिक जगत के मूल हैं, और उसके द्वारा ही हर चीज़ की निर्मिति होती है।
पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान् गुणान्।
तो इस भौतिक जगत में, तेरहवें अध्याय में, बाईसवें श्लोक में भगवान कहते हैं, कि हम सब प्रकृति के तीन गुणों द्वारा निर्मित जो भी चीज़ें हैं, उनका भोग करने का प्रयास कर रहे हैं। तो यहाँ पर यह तीन गुणों का उल्लेख हो रहा है, वह तीन रस्सियों के रूप में नहीं है, वह क्या है? तीन मूलभूत तत्व, जिनके द्वारा सारे भौतिक जगत की सृष्टि हुई है, उसका उल्लेख आता है। तो जैसे कोई धनुष धागे के बिना काम नहीं कर सकता है, वैसे तीन गुणों के बिना किसी भी चीज़ का अस्तित्व नहीं हो सकता है।
भगवान का भौतिक गुणों से परे होना
तो इसका मतलब यह है, तीन गुण बड़े ही महत्वपूर्ण हैं, वो अनिवार्य (unavoidable) और फाउंडेशनल (foundational) हैं, मूल हैं सबका। पर, यहाँ पर बताया है कि जैसे धनुष, इंद्रधनुष, जो हर धनुष के लिए आवश्यक है, उसके बिना होता है वो। उसी तरह से, भगवान भी जब भौतिक जगत में आते हैं, तो जो हर व्यक्ति के अस्तित्व के लिए आवश्यक है—तीन गुण, भगवान उन तीन गुणों के परे होते हैं।
तो अभी कोई कह सकता है, कि ये इंद्रधनुष, वास्तव में तो एक केवल, अगर वैज्ञानिक दृष्टि से पूछेंगे, तो ये एक मोह है, कि इंद्रधनुष कहीं दिखता नहीं है। वास्तव में कुछ, अगर हम हवाई जहाज़ से जाएंगे, तो इंद्रधनुष तक पहुँचेंगे नहीं। जैसे आसमान में हमको क्षितिज दिखता है, जहां पे आसमान और ज़मीन मिल रही है, वैसे ही कोई कहेगा, इंद्रधनुष भी एक प्रकार का मोह ही है। तो क्या भगवान भी एक प्रकार के मोह ही हैं? कि अगर ऐसी तुलना की गई, हर तुलना का एक उद्देश्य होता है।
तो यहाँ पे अभी इंद्रधनुष एक हमारे लिए, शारीरिक स्तर पर जो हम उसको जाके कुछ छू सकते हैं, ऐसी चीज़ नहीं है। पर इसका मतलब इस तुलना का उद्देश्य क्या है? तुलना का यहाँ उद्देश्य यह नहीं है कि इंद्रधनुष एक मोह है, इसलिए भगवान भी मोह हैं। यहाँ पे उद्देश्य यह है, कि इंद्रधनुष बाकी धनुषों से अलग है, वैसे भगवान जब इस भौतिक जगत में आते हैं, तो बाकी लोगों जैसे ही दिखते हैं, पर वो अलग हैं। उनका दिव्यत्व जो है, उस पे ज़ोर दिया जा रहा है यहाँ पर।
जीवन की असंतुष्टि और तीन प्रकार के प्रयास
तो अभी यह जो है, हम तीन विषयों पर चर्चा करेंगे, मुख्य रूप से इसमें: कल्पना, भौतिक सत्य और आध्यात्मिक सत्य हैं। यह तीन स्तर हैं, और वास्तव में, अगर हम यह तुलना करते हैं, हम यह विश्लेषण करते हैं, तो जो भी, जिन्होंने भी इस भौतिक जगत के बारे में थोड़ा बहुत विचार किया है—वो भारतीय विचारवंत हों, पाश्चात्य विचारवंत हों, कहीं भी हों—वो समझ जाते हैं कि यह जो भौतिक जगत है, यह एक संतुष्टि देने वाली जगह नहीं है।
जब हमको बुरे अनुभव आते हैं, तो हम कह सकते हैं, यह दुखों से भरा हुआ है। पर जब भी वैसे बुरे अनुभव नहीं भी आ रहे हैं, तो कम से कम यह कह सकते हैं कि जो भौतिक जगत है, यह संतुष्टि देने वाली जगह नहीं है। तो अगर यह संतुष्टि देने वाली जगह नहीं है, तो हम क्या करें?
तो अभी हम वास्तव में, क्योंकि यह भौतिक जगत संतुष्टि नहीं देता है, तो मानवों ने इतिहास में तीन प्रकार के प्रयास किये हैं, इस भौतिक जगत की असंतुष्टि के परे जाने के लिए। एक है कि इस भौतिक जगत के परे जाएं, जो कि आध्यात्मिक प्रगति कहलाती है। दूसरा है कि इस भौतिक जगत को और अच्छा बनाएं, जिसे हम कहते हैं भौतिक प्रगति। और तीसरा है, एक काल्पनिक जगत की निर्मिति करें, जिसमें हम खो जाएं। काल्पनिक जगत मतलब कोई कला हो सकती है, कोई नाट्य हो सकता है, कोई ग्रंथ हो सकता है, कादंबरी हो सकती है। तो जब भौतिक जगत का कम से कम असंतुष्टिपूर्ण जगत होना, इससे राहत सब लोग चाहते हैं। और यह तीन प्रधान पद्धतियां हैं: या तो आप यहाँ से ऊपर चले जाओ, आध्यात्मिक चेतना लेकर चले जाओ; या इस भौतिक जगत को ही अच्छा बनाओ; या इस भौतिक जगत से एक कल्पना की दुनिया में चले जाओ और वहाँ पे कुछ संतुष्टि प्राप्त करो।
आधुनिक युग और तंत्रज्ञान का दृष्टिकोण
अभी जो आजकल का समाज है, एक तरह से हम विश्व के इतिहास में देखेंगे तो पिछले 200-300 साल जो हैं, यह एक तरह से विश्व के इतिहास में एक अपवाद के समान हैं। लगभग 1700-1800 साल के पहले अगर आप भारत में हों, यूरोप में हों, अमेरिका में हों, ऑस्ट्रेलिया में हों, कहीं भी हों, सब लोग समझते थे कि ये भौतिक जगत एक क्षणिक जगह है और इसके परे हमें जाना है। और जीवन का उद्देश्य यह है कि इस जगत में हम इस तरह से रहें कि इससे बेहतर दूसरे एक जगत में हम जाएं। और सब जो प्राचीन संस्कृतियां हैं, उसमें ये भाव है। हर संस्कृति में कुछ-कुछ भौतिकवादी लोग हुआ करते थे, पर अधिकांश लोगों की विचारधारा यही थी कि इस जगत के हमें परे जाना है।
पर जैसे ही विज्ञान की प्रगति होने लग गई, तो फिर क्या होने लग गया? लोग कहने लग गए कि विज्ञान के आधार पर नास्तिकवादी, भौतिकवादी लोग कहने लग गए कि इस जगत के परे कोई जगत है ही नहीं, वो केवल एक कल्पना है। और उसमें हम नहीं जा सकते हैं, जाना भी नहीं है हमको, क्योंकि वो कल्पना है। तो फिर हमें क्या करना है? हमें इसी जगत को बेहतर बनाना है और हमें सारी शक्ति जो है इस जगत को बेहतर बनाने में लगानी है।
विज्ञान की शुरुआत जब हुई, सोलहवीं-सत्रहवीं सदी में, तब अधिकांश वैज्ञानिक भगवान को मानते थे और भगवान की प्राप्ति जीवन का उद्देश्य है, ये भी मानते थे, कि हमें उस स्वर्ग में जाना है। उस समय सोच रहे थे कि जिस भगवान ने हमको धर्म दिया है आध्यात्मिक प्रगति के लिए, उन्हीं भगवान ने हमको विज्ञान दिया है भौतिक प्रगति के लिए। पर दोनों एक तरह से साथ जा रहे थे। पर जैसे विज्ञान के द्वारा थोड़ी प्रगति होने लग गई, और लोग इस जगत को ही कुछ अच्छा बनाने लग गए। तो फिर उनको लगने लगा कि ये दूसरे जगत में जाने की ज़रूरत क्या है? और दूसरे जगत को उन्होंने कल्पना बना दिया, कल्पना मानने लग गए। तो अभी आजकल अधिकांश लोग इसी भाव में होते हैं कि दूसरे जगत के बारे में ज़्यादा कुछ विचार करते ही नहीं हैं वो। हमको यहाँ पे ही रहना है। वो क्या, बहुत पहले एक हिंदी गाना था ‘जीना यहाँ, मरना यहाँ’। वैसे वो भाव हो गया है कि हमको यहाँ पे रहना है, यहाँ पे मरना है, इसके बिना और कुछ है ही नहीं यह जगत।
मोह का निर्माण और मनोरंजन
तो यह जो भाव है, अभी इस भाव से लोग जीते हैं तो अधिकांश लोग क्या हो रहे हैं? खास करके उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी में विज्ञान और तंत्रज्ञान (तकनीक) का बहुत प्रॉमिस (promise) था कि हमें एक आध्यात्मिक स्वर्ग की ओर जाने की कोई ज़रूरत नहीं है, क्योंकि हम तंत्रज्ञान के द्वारा इस जगत में स्वर्ग बना देंगे, वो भाव था। पर बीसवीं शताब्दी में दो बहुत घनघोर युद्ध हुए—पहला विश्व युद्ध, दूसरा विश्व युद्ध। और ये बीसवीं शताब्दी में वास्तव में जो युद्ध में जितने लोग मारे गए हैं, उतने पूरे पिछले 19 शताब्दियों में मिलकर नहीं मारे गए थे।
और खास करके जब अणुबम (Atom bomb) का इस्तेमाल हुआ जापान के ऊपर अमेरिका के द्वारा, तब जो तंत्रज्ञान के द्वारा हम एक स्वर्ग इस भौतिक जगत पर लाएंगे, उसका जो गुब्बारा था, बबल (bubble) था, वो बर्स्ट (burst) हो गया। अभी इसका मतलब यह नहीं कि लोग अभी भी तंत्रज्ञान के पीछे भागते नहीं हैं। तंत्रज्ञान, कोई भी नया फोन आता है, नया टीवी आता है, नया कंप्यूटर आता है, तो उसका बहुत भारी, बहुत ग्लैमर (glamour) होता है उसका, बहुत गुणगान जैसे होता है। पर फिर भी, आजकल भी तंत्रज्ञान से अधिकांश लोगों की क्या आशा है? कि उससे हम हमारे जीवन को बेहतर बनाएंगे। इस जगत को बेहतर बनाएंगे कि नहीं, पता नहीं हमको। टेक्नोलॉजी विल मेक आवर लाइफ बेटर (Technology will make our life better)। क्या वो दुनिया को और अच्छा बनाएंगे, वो किसी को पता नहीं है। क्योंकि दुनिया में इतनी सारी समस्याएं हैं और कई समस्याएं तंत्रज्ञान के कारण ही आयी हैं।
तो यह जो भाव है कि हम भौतिक प्रगति करेंगे, यह काफी हद तक चल रहा है, पर आजकल तंत्रज्ञान की प्रगति सबसे अधिक भौतिक जगत से काल्पनिक जगत में लोगों को ले जाने के लिए हो रही है। अगर एक हज़ार साल बाद, कोई आर्कियोलॉजिस्ट (archaeologist) होते हैं, जो लोग पहले के लोग कैसे रहा करते थे, उसके बारे में संशोधन करते हैं। अगर वैसे कोई थे, एक हज़ार साल बाद, वो ढूंढ रहे हैं कि इक्कीसवीं शताब्दी में लोग कैसे रहते थे। तो उस समय क्या मूल्यवान चीज़ थी? तीस हज़ार साल पहले, किसी के पास कोई सोने का मटका था, ऐसे कुछ वो ढूंढते हैं, आर्टिफैक्ट (artifact)। तो अगर कोई देखेगा कि इक्कीसवीं शताब्दी में सबसे कीमती चीज़, सबसे महंगी चीज़, और सबसे प्रचलित चीज़ ऐसी क्या है, जो लोग इस्तेमाल करते हैं? तो सबसे महंगी और प्रचलित चीज़ 21st सेंचुरी (21st century) के लिए ‘मूवीज़’ (movies) होगा।
जो मूवी होते हैं, अभी कभी-कभी एक मूवी के लिए करोड़ों-करोड़ों रुपए खर्च हो जाते हैं। और कितने सारे मूवी बनते रहते हैं। अभी करोड़ों रुपए में तो बहुत कुछ बन सकता है। और आजकल जो एनीमेशन या वीएफएक्स (VFX) यूज़ करते हैं, मूवीज़ बनाते हैं, उसमें करोड़ों रुपए नहीं, करोड़ों डॉलर्स भी खर्च हो जाते हैं। तो अभी ये इतना महंगा, इतना पैसा… मनोरंजन ये मानव समाज में हमेशा रहा है, पर यह जो भाव है कि मनोरंजन के पीछे इतना पैसा खर्च करना, और इतना पैसा खर्च कर के क्या करना है? कि एक है कि आप सत्य को और अच्छा बनाओ, कि मोह को और अच्छा बनाने के लिए पैसा खर्च करना, ये कुछ अलग ही चीज़ है।
अमेरिका में मेरा एक लेक्चर था, अमेरिका इंस्टिट्यूट ऑफ इल्यूजन (American Institute of Illusion)। जैसे इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (IIT) होता है, वैसे अमेरिका की संस्था क्या होगी? अमेरिका की मोह की संस्था: अमेरिका इंस्टिट्यूट ऑफ इल्यूजन। इल्यूजन मतलब क्या? वो पूरा है कि… कैसे हम इसको… वो बेसिकली फिल्म टेक्नोलॉजी है, पुणे में एफटीआईआई (FTII) जैसे है, वैसा है वो।
तो अभी ये भाव क्या है, इसकी विचारधारा क्या है? कि सब लोग स्वीकार करते हैं कि ये भौतिक जगत, ये एक संतुष्टि देने वाली जगह नहीं है। पर इसके बारे में हम क्या करें? अगर यहाँ पर संतुष्टि नहीं मिल रही है, तो क्या करें? अभी इस भौतिक जगत को और अच्छा करना है, तो उसको काफी मेहनत लगती है, और शायद वो अच्छा होगा भी या नहीं भी अच्छा होगा। मेरे पास एक छोटा घर है, मुझे बड़ा घर चाहिए, अभी कब मैं इतना पैसा कमाऊँगा, जिससे कि मैं बड़ा घर ला पाऊँगा? वो नहीं हो सकता है, तो मैं एक टीवी पर मूवी देखता हूँ, जिसमें जो हीरो है, उसका एक बहुत बड़ा घर है, और फिर मैं कल्पना करता हूँ कि मैं वो हीरो हूँ, और मैं उस घर में रह रहा हूँ।
तो अभी मोह जो है, यह हमेशा एक तरह से… मोह की निर्मिति करना सत्य की निर्मिति करने से आसान है। क्योंकि केवल अपनी कल्पना से हम मोह का निर्माण करते हैं, जबकि सत्य के लिए हमें व्यावहारिक रूप से बड़ी मेहनत करनी पड़ती है। तो ये 3 चीज़ें बताई गईं: भौतिक सत्य है, मोह है और आध्यात्मिक सत्य है। तो आजकल के समाज में अधिकांश शक्ति कहाँ जा रही है? या तो इस भौतिक दुनिया को अच्छा करें, या उससे अधिक क्या है, इस भौतिक जगत से राहत प्राप्त करने के लिए जो मोह बना रहे हैं, उस मोह को अच्छा करें। पर वास्तव में इससे क्या होता है? लोग सत्य से और दूर चले जाते हैं। आध्यात्मिक सत्य से दूर जा ही रहे हैं, पर भौतिक सत्य से भी दूर जा रहे हैं।
श्रीमद्भागवतम और भ्रम-विमोहन लीला
तो श्रीमद्भागवतम के इसी दशम स्कंध में यह जो है, मोह निर्माण करना और मोह निर्माण करने से कैसे व्यक्ति स्वयं मोहित हो जाता है, इसके बारे में सुंदर वृत्तांत आता है और वो वृत्तांत है ब्रह्मा विमोहन लीला का। अभी यह श्रीमद्भागवतम के दशम स्कंध के चौदहवें अध्याय में… तेरहवें-चौदहवें अध्याय में आता है। तो अभी यहाँ पर क्या हो रहा है? भागवतम का दशम स्कंध जो है, उसमें एक विशेष सौंदर्य है। और वो सौंदर्य क्या है? कि उसमें भगवान कृष्ण की वृंदावन की लीलाओं का वर्णन है।
और जब यह वृंदावन की लीलाओं का वर्णन हो रहा है, तो एक तरह से वो भगवान की मिठास का वर्णन है। कैसे भगवान कितनी मधुर लीला करते हैं। क्योंकि मधुरता का वर्णन है, पर कभी-कभी हम उस मधुरता में रहते-रहते, यह भूल जा सकते हैं कि वास्तव में यह भगवान हैं। तो इसलिए दशम स्कंध में बार-बार हमें भगवान की मधुर लीला बताते हुए, ऐसी लीलाओं का भी वर्णन आता है, जिससे भगवान की महिमा का भी वर्णन आता है।
भगवान को समझने के लिए दो चीज़ें हमें समझने के लिए हैं, उनका ग्रेटनेस (greatness) और उनकी स्वीटनेस (sweetness), उनकी महिमा और उनकी मधुरता। तो खास करके भागवतम के दशम स्कंध में उनकी मधुरता का वर्णन है, पर साथ-साथ उनकी महिमा का भी वर्णन आता है। तो अभी जब यहाँ पर ऐसे बताया गया है, कोई व्यक्ति जो है, जैसे इंद्रधनुष को काल्पनिक मान लेते हैं, वैसे वो भगवान को भी एक कल्पना मान सकता है, कि यह कोई कृष्ण हैं, यह काल्पनिक हैं, किसी कवि ने बनाई यह कहानी है…
भगवान का भौतिक जगत में आगमन
और वैसे सोच के वो, अभी कृष्णा इन तीन स्तरों में यहाँ पर रहे हैं, आध्यात्मिक स्तर में थे। पर कोई व्यक्ति उनको समझता है क्या? जब कृष्णा इस भौतिक जगत में भी आते हैं, तो कोई व्यक्ति उनको समझ सकता है कि ये तो इस भौतिक जगत के नहीं हैं। तो कहाँ के हो गए? यहाँ के हो गए। वो एक कल्पना की उत्पत्ति है।
तो अभी जब कृष्ण वृंदावन में लीला कर रहे होते हैं, तो कई बड़े-बड़े असुरों का वो बड़ी आसानी से वध कर देते हैं। जब ऐसा वध कर देते हैं वो, तो सारे देवी-देवता भी आश्चर्यचकित हो जाते हैं। और खास करके जब अघासुर का वध होता है, तो फिर उससे वे बड़े ही आश्चर्यचकित हो जाते हैं। सब आश्चर्यचकित हो जाते हैं और उनमें सबसे अधिक ब्रह्माजी भी आश्चर्यचकित हो जाते हैं।
ब्रह्माजी द्वारा भगवान की परीक्षा
और जब ब्रह्माजी आश्चर्यचकित हो जाते हैं, तो तभी वे विचार करते हैं कि, यह कौन है बालक? और जब वो आके देखते हैं, कि यह बालक तो एक छोटा सा मासूम बालक जैसे ही है, और यह तो खेल रहा है, और उस समय कृष्ण क्या कर रहे होते हैं? वह अपने सारे मित्रों के साथ खाना खा रहे होते हैं। और जब खाना खा रहे होते हैं, तो कौन करते हैं, कभी… mentioned that sometimes he सिर्फ कर रहा है, कार्य सखा के भाव और प्रेम के साथ कर रहे हैं।
तो भी ब्रह्माजी विस्मित होते हैं, कि यह भगवान कैसे हो सकते हैं? भगवान को तो हम ‘सहस्रशीर्षा पुरुषः’ हम बड़े पूजा के साथ उनको भोग लगाते हैं। तो यह भगवान नहीं हो सकते हैं। और यह सोचके फिर वो क्या करते हैं? यह भगवान नहीं हैं, मैं इनकी कुछ परीक्षा करता हूँ। Ah, will he make it? तो वो भगवान की परीक्षा करने लगते हैं।
तो वो क्या करते हैं? फिर ग्वालों को दूर ले जाते हैं। अभी, गौर दीजिये, जानवरों में भी इतना चारा खाता है। हम मानवों में स्वेच्छा होती है। जानवर अगर घास खा रहे हैं, एक जगह में खाना खा लिया, तो इसके बाद उनके बाएँ हाथ में जो घास है, उनके दाएँ हाथ में जो घास है, जो खा सकते हैं, अब कौन खाएंगे यह उनकी स्वेच्छा पर निर्भर है। अभी घास सामने है, तो गाय ये नहीं सोच सकती कि आज एकादशी है, आज मैं घास नहीं खाऊंगी। तो वो स्वेच्छा उनके पास नहीं है। क्या है कि Animals can choose how to fulfill their biological instincts. जहाँ जानवर सोचता है कि कैसे मैं उसकी पूर्ति करूँ। मानव ये चुनाव कर सकते हैं कि क्या मुझे इंद्रियतृप्ति करनी है या नहीं। तो जो स्वेच्छा की मात्रा है मानवों में, वो जानवरों से काफ़ी अधिक है।
ब्रह्माजी का मोह और बछड़ों का दूर जाना
पर तो अभी गैयाँ घास खा रही होती हैं। जहाँ पर घास ख़त्म हो जाता है, तो तभी ब्रह्माजी ऐसा मोह निर्माण करते हैं कि वो गैयाँ को लगता है कि यहाँ का जो घास है वो इतना अच्छा नहीं है, और वहाँ पर जो घास है बड़ा अच्छा है। और इससे वहाँ पर पहुँच जाती हैं वो। तो वहाँ पर थोड़ा घास खाती हैं, पर ब्रह्माजी ऐसा मोह निर्माण करते हैं कि यहाँ पर भी इतना अच्छा नहीं है, वहाँ पर और अच्छा है। और ऐसे ही घास की खोज में वो गैयाँ कृष्ण के सामने ही होती हैं, पर वहाँ से दूर चली जाती हैं।
और कृष्ण और ग्वाले बात कर रहे होते हैं। और जब बात कर रहे होते हैं, कभी-कभी होता है ऐसे कि छोटे बच्चे बड़े नटखट होते हैं। माँ कुछ काम कर रही है और फिर बच्चा कोई लेटा हुआ है, कुछ खेल रहा है, और एक-दो मिनट के लिए माँ कोई इधर देखती है, उधर देखती है, कहाँ चला गया? तो एकदम से गैया जो होती है वो एक तो नटखट होती है, पर यहाँ पर यह नटखटपन होता है, केवल नटखटपन के कारण वो दूर नहीं चले जाते हैं।
यहाँ पर क्या होता है, अगर बच्चे खेलते-खेलते वो इधर चले जाएंगे, पर कोई बच्चे को बोलता है मैं तुमको चॉकलेट देता हूँ, और वो चॉकलेट को दिखाते-दिखाते वो बच्चे को दूर ले जाते हैं, तो बच्चा अपने खेल-कूद से भी थोड़ा बहुत दूर चला जाएगा। पर वो चॉकलेट के मोह से दूर चला जाएगा। वो भोजन पान करें और वो उनके सेवा भाव में होते हैं। कृष्ण कहते हैं, मैं ढूँढता हूँ। तो फिर वो ढूँढने निकलते हैं और ढूँढते, ढूँढते, ढूँढते काफी दूर चले जाते हैं पर कहीं भी उनको गैयाँ दिखती नहीं हैं।
वृंदावन में ब्रह्माजी का महा-मोह
और फिर वो जब वापस आते हैं, तो क्या होता है? उस समय तक ब्रह्माजी ने अपना मोह इधर भी कर लिया है। और ब्रह्माजी मोह क्या करते हैं? वो सारे ग्वाले जो होते हैं उनको सुला देते हैं। और फिर सुला कर अपनी शक्ति के द्वारा वो उनको एक गुफा में छिपा देते हैं। तो अभी यहाँ क्या किया है उन्होंने वृंदावन में? ब्रह्माजी ने एक मोह कर दिया है।
अभी ब्रह्माजी जो हैं, एक तरह से वह एक देवता हैं। एक तरह से देवताओं के देवताओं में सबसे वरिष्ठ देवता हैं वह। और देवताओं को जो परेशानी भी होती है, तो वह उनके पास जाते हैं। तो ब्रह्माजी जो होते हैं, जब वो इस प्रकार का मोह निर्माण करते हैं, तो हम यह कह सकते हैं महा मोह होता है। मोह भी अलग-अलग प्रकार का हो सकता है। सात्विक मोह हो सकता है, राजसिक मोह हो सकता है, तामसिक मोह हो सकता है।
जिससे थोड़ा हमको हमारे जीवन को अच्छे मूल्य सीखने को मिलते हैं, तो वो एक सात्विक मोह होता है। तो अभी हमने तीन चीज़ें बताईं कि यह हमारा भौतिक जगत है, यह आध्यात्मिक जगत है और यह काल्पनिक जगत है। तो इस दृष्टि से जब बताते हैं हम, तो क्या है, काल्पनिक और आध्यात्मिक बहुत दूर हैं, विपरीत हैं। पर वास्तव में यह ऐसे ज़रूरी नहीं है। यह ऐसे हो सकता है कि कल्पना से हम भगवान के पास जा सकते हैं। Reality is not a product of imagination, but reality leaves a lot of room for imagination. कि सत्य यह है, कल्पना की उत्पत्ति नहीं है, मतलब परम सत्य, आध्यात्मिक जगत, भगवान—यह परम सत्य है, कुछ कल्पना की निर्मिति नहीं है। पर सत्य की ओर पहुँचने के लिए हम कल्पना का इस्तेमाल कर सकते हैं।
कल्पना और कला का आध्यात्मिक उपयोग
तो अभी जब हम कृष्ण लीला पर कुछ नाटक करते हैं, हमारे संप्रदाय, गौड़ीय वैष्णव संप्रदाय में, नाट्य पर बहुत ज़ोर दिया गया है। अगर आप चैतन्य चरितामृत पढ़ते हैं, खास करके उसकी अंत्य लीला, तो उसमें कई बार यह वर्णन आता है। चैतन्य महाप्रभु के पार्षद कह रहे हैं कि जो भक्त हैं, वो नाट्य और काव्य में बड़े निपुण होते हैं। जब चैतन्य महाप्रभु 500 साल पहले जब आये थे, तो उस समय बंगाल में नाट्य और काव्य बहुत प्रचलित था। तो चैतन्य महाप्रभु और उनके भक्तों ने क्या किया? जो कल्पना का माध्यम उस समय बड़ा प्रचलित था, उसका इस्तेमाल किया। क्या करने के लिए? भगवान का गुणगान करने के लिए, भगवान की अनुभूति देने के लिए।
और हमारे आचार्यों ने कई नाटक लिखे हैं। चैतन्य चंद्रोदय नाटक है, ललित माधव, विदग्ध माधव और ऐसे अनेक नाटक हैं। और नाटक किस तरह से लिखने हैं, इसके भी नियम होते हैं। तो इसका एक ‘नाटक चंद्रिका’ नामक ग्रंथ है, उसमें रूप गोस्वामी ने लिखा है, बलदेव विद्याभूषण ने उसमें और विस्तृत वर्णन किया है।
और इसमें भाव क्या है? कि साधारणतया जब कोई सात्विक ग्रंथ लिखता है, सात्विक मोह की निर्मिति करता है, उसे कहते हैं Fiction is unreality which gives you better understanding of reality. क्या है अच्छा फिक्शन? कोई अच्छी कादंबरी कल्पना होती है, पर वो ऐसी कल्पना होती है जो आपको सत्य की और अच्छी समझ दिलाती है। क्यों अच्छी समझ दिलाती है? इसलिए कि जिस भौतिक जगत में जो जीवन होता है, वह तो अधिकांश रूप से कुछ ज़्यादा रुचिकर नहीं होता है, बोरिंग होता है।
अगर मान लीजिये कोई आप से कहता है कि आप सुबह से रात तक जो भी कार्य करते हैं, उसका हम वीडियो रिकॉर्डिंग करते हैं। और इस 24 घंटे आपने जो कार्य किया है, वो अगले दिन आप बैठ के देखो। तो खुद का ही, पिछले दिन क्या किया, वो देखते बैठेंगे तो हम बोर हो जाएंगे। क्योंकि हमारा खुद का भी जीवन इतना इंटरेस्टिंग नहीं होता है कि हम दिन भर उसके बारे में चिंतन कर सकें।
तो क्या होता है कि एडिटिंग जब करते हैं, आप लिखते हैं तो एडिटिंग करते हैं। एडिटिंग को हिंदी में क्या बोलते हैं? संपादक, एडिटर होता है। पर ठीक है, एडिटिंग, एक्सपर्ट एडिटिंग, मैनेज करने के लिए, पेजेज़ के लिए, रीडर लोग उसको स्किप करते हैं। अच्छा संपादक कौन होता है? वह सारे पन्नों को निकाल देता है, जो पढ़ने वाले हैं, जो उनको स्किप करेंगे, जो नहीं पढ़ेंगे। तो क्या, जो फिक्शन है, उसमें क्या होता है? लोगों का पूरे जीवन का वर्णन नहीं होता है। जो जीवन की इंटरेस्टिंग चीज़ें हैं, उनका वर्णन होता है। और उसके कारण, यह Unreality है, क्योंकि सबका जीवन ऐसा नहीं होता है, पर यह पूरे जीवन का वर्णन नहीं होता है। तो यह जो है, जो एक अच्छी कादंबरी लिखते हैं, उसके द्वारा मोह होता है, पर मोह से सत्य की और अच्छी समझ हमें आती है।
भगवान की असीमितता और कल्पना
और यह जो भाव है, यह भौतिक सत्य की जगह लागू होता है, पर यह आध्यात्मिक सत्य के लिए भी लागू होता है। अभी जब हम भगवान के विग्रहों का श्रृंगार करते हैं, तो क्या भगवान आध्यात्मिक जगत में बिल्कुल जैसे हमने यहाँ पे सुशोभित किया है वैसे ही हैं? अभी भगवान असीमित हैं।
अद्वैतमच्युतमनादिमनन्तरूपम्।
उनके अनन्तरूप हैं। और भागवतम में एक सुंदर श्लोक आता है, ब्रह्माजी की प्रार्थनाओं में ही, दशम स्कंध में नहीं, तीसरे स्कंध में:
यद्यद्धिया त उरुगाय विभावयन्ति तत्तद्वपुः प्रणयसे सदनुग्रहाय।
आप जिस रूप का चिंतन करते हैं, आप उसी रूप में उनके सामने प्रकट होते हैं। प्रभुपादजी तात्पर्य में कहते हैं कि भक्त को कल्पना करनी चाहिए, कि उनके हृदय में एक महल है और उस महल में एक सिंहासन है और उस सिंहासन पर उन्हें भगवान को विराजमान करना है। और फिर भगवान कहते हैं, you shouldn’t imagine like this, but know that it’s not imagination.
ऐसे आप कल्पना करते हैं, फिर भी ये कल्पना नहीं है। क्यों ये कल्पना नहीं है? वास्तव में एक तरह से कल्पना ही है, काल्पनिक शक्ति का इस्तेमाल करके हम जन यह विचार कर रहे हैं। पर यह क्या है? यह ऐसी कल्पना है, जो हमें आध्यात्मिक सत्य की ओर ले जा रही है।
मोह के भीतर भगवान का मोह
अभी ऐसी कल्पना हो सकती है, जो हमें आध्यात्मिक सत्य से दूर ले जा सकती है। पर जब ब्रह्मा जी मोह निर्माण करते हैं, तो उनका मोह ऐसे होता है क्योंकि वे खुद सत्त्वगुण में हैं, तो वो जब मोह निर्माण करते हैं, तो उनका मोह भी एक तरह से सात्विक होता है। तो उस मोह में क्या करते हैं? वह ग्वालों और बछड़ों को दूर भेजते हैं। वो दूर ले जाते हैं। और फिर कृष्णा देखते हैं, क्या हो गया यहाँ पर।
तो अभी क्या होता है, कि इस भौतिक जगत में जो मोह निर्माण होते हैं, अलग-अलग प्रकार के मोह हो सकते हैं। एक है कि भौतिक जगत में कोई बुद्धिमान व्यक्ति होते हैं, वो मोह निर्माण कर सकते हैं। अभी कोई भी मूवी हो, तामसिक मूवी बनानी है, तो तामसिक मूवी बनाने के लिए भी बुद्धिमत्ता लगती है। क्यों? क्या होगा, अगर वो बुद्धिमत्ता से नहीं बनाया है, तो वो मोह से भी लोग बोर हो जाएंगे। कई बार जब मूवी होती है, वो फ्लॉप हो जाती है। मतलब क्या है, ये मोह अच्छा नहीं था। ये मोह इतना अच्छा नहीं था, कि हमको देखने में कुछ रुचि नहीं है। तो अभी मोह की निर्मिति के लिए भी बुद्धिमत्ता लगती है।
तो ब्रह्मा जी ऐसा मोह कर देते हैं, कि वो ग्वालों को और बछड़ों को पूरा गायब भी कर देते हैं वहाँ से। पर क्या है, सब मोह की निर्मिति करने में भी भगवान सबसे माहिर हैं। भगवान कहते हैं, अगर आप बेइमानी करोगे, भगवान ऐसे मोह करते हैं कि जिससे वो ग्वाले और गायें वहाँ रह रहे थे। पर जब ब्रह्मा जी बछड़ों को गायब कर देते हैं, यह विस्तारित लीला है, पर हम इसे तत्वज्ञान की दृष्टि से देख रहे हैं, इसलिए पूरी लीला पे वर्णन नहीं करेंगे हम।
पर जब वहाँ पे वो वापस आ जाते हैं, ब्रह्मा जी तो देखते हैं क्या हो गया है यह? अरे यहाँ पे अभी तक यह सब… वो सोचे थे कि मैंने यहाँ पे मोह निर्माण कर दिया, सारा उपद्रव हो गया होगा यहाँ पे, पर वहाँ पे कुछ भी उपद्रव नहीं होता है। जैसे मान लीजिये, आजकल कश्मीर में बड़ी चिंता हो रही है, वहाँ पे कुछ आतंकवादी आक्रमण करने वाले हैं, या कुछ हो रहा है, तो बड़ी चिंता है वहाँ पे। मान लीजिये कोई आतंकवादी है, कोई किसी के बैग में बम लगा लेता है, और वो टाइम बाम्ब है, और वो लोग जानते हैं, कि वहां पे एक विस्फोट हो जाएगा। पर कोई डिस्टर्बन्स न हो। और काम में डिस्टर्ब नहीं होता, तब अपनी एकाग्रता में होते हैं। जब Speaker जब कोई विषय रखना चाहता है, और वो डिस्टर्ब नहीं होता है, तो क्या होता है? हम डिस्टर्ब हो जाते हैं उससे। कुछ होगा क्यों नहीं यहाँ पर? आप बटन दबाते हैं, वहाँ पर बम विस्फोट होना है, बम विस्फोट होते हैं, अरे क्या हो गया?
तो वैसे ही क्या होता है? ब्रह्मा जी वहाँ पर वो डिस्टर्बन्स करने जाते हैं, और कुछ भी डिस्टर्बन्स नहीं होता। सब बछड़े और ग्वाले बिल्कुल वैसे के वैसे ही वहीं पर। यह देख के क्या होता है? ब्रह्मा जी डिस्टर्ब हो जाते हैं, अरे क्या हो गया यह? और फिर जब ऐसे कोई बम का विस्फोट नहीं हुआ है, तो किसी ने बम निकाल दिया है, यह क्या हो गया? तो ऐसे ब्रह्मा जी विस्मित होके देख रहे होते हैं, और तभी भगवान क्या करते हैं? कि Krishna uses an illusion, within an illusion. तो कृष्णा विस्मित करते हैं।
क्या हुआ है? ब्रह्मा जी ने एक मोह निर्माण किया है, कि सारे ग्वालों को वो दूर ले जाते हैं, तो वो सारे ग्वालों को दूर ले के गए हैं। उसमें कृष्णा एक मोह बनाते हैं, कि सारे ग्वालों को वो दूर ले जाते हैं, और फिर within an illusion है, मोह के अंदर एक मोह है। उसमें वो क्या करते हैं? उसमें वो खुद को प्रकट करते हैं, और वो दिखाते हैं, कि सारे जो बछड़े और ग्वाले हैं, वो वास्तव में उनके विस्तारित रूप हैं।
पर यहाँ पर एक विशेष बात है, क्या करते हैं? कृष्णा जो विस्तार करते हैं, तो ऐसे नहीं दिखाते हैं, कि ब्रह्मा जी वो सब कृष्ण की पूजा वगैरह करते थे, वो विष्णु की पूजा करते थे, विष्णु की याचना करते थे, जब भी समस्या होती थी, तो विष्णु की याचना करते थे। तो उनको जो भगवान की महिमा और ऐश्वर्य का दर्शन था, वो विष्णु के रूप में था। तो अभी यहाँ पे जब वो देखते हैं कि सारी विष्णु मूर्तियां कृष्ण से आ रही हैं:
एते चांशकलाः पुंसः कृष्णस्तु भगवान् स्वयम् ।
इन्द्रारिव्याकुलं लोकं मृडयन्ति युगे युगे ॥
कि कृष्ण ही सारे अवतारों के स्रोत हैं, वो अवतारी हैं। जब यह देखते हैं ब्रह्माजी तो ब्रह्माजी पहले तो बिल्कुल मोहित हो जाते हैं। यह क्या हो रहा है वो कुछ समझ में नहीं आता है पहले। और फिर जब उनको समझ में आता है, तो फिर वो भगवान के सामने आके गिर जाते हैं और भगवान को प्रार्थनाएं अर्पण करते हैं। और जब भगवान को प्रार्थनाएं अर्पण करते हैं उसमें पहले वो भगवान की महिमा का वर्णन करते हैं, फिर भाव में वृंदावन की मधुरता का वर्णन करते हैं, फिर याचना करते हैं कि, हे प्रभु कृपया आप मुझे आपके इस वृंदावन में कुछ स्थान दे दीजिए, ये सारे व्रजवासी इतने महान हैं, कृपया मुझे इनके चरण कमलों की रज की मुझे याचना है, मैं याचना करता हूँ।
तो यहाँ पर क्या होता है कि ब्रह्माजी एक मोह निर्माण करते हैं पर भगवान उससे बड़ा मोह निर्माण करते हैं। और इस मोह में क्या करते हैं वो परम सत्य का दर्शन कराते हैं।
भक्ति, कल्पना और सत्य की ओर यात्रा
तो हमारे सबके जीवन में एक तरफ तो हम सब इस (संसार) से राहत चाहते हैं, तो अधिकांश जगत क्या है? यहाँ से ऐसी कल्पना की ओर जा रहा है जो सत्य से उन्हें दूर ले जाता है। पर जब हम भक्ति में आते हैं और भक्ति के कार्य जब हम करते हैं, तो हमें उसी कल्पना की शक्ति को इस्तेमाल करना है। पर इस तरह से इस्तेमाल करना है कि हमें वो कल्पना सत्य की ओर ले जाए। कि कल्पना सत्य की ओर ले जाए, मतलब क्या?
कि भक्ति मतलब केवल आके मंदिर में आके भगवान का जप करना या भगवान की पूजा करना, ऐसे नहीं है। तो जब भगवान का श्रृंगार करते हैं, तो इतनी सुंदरता से वो श्रृंगार करना है कि उससे हमारा मन, उससे हमारा हृदय उनकी ओर आकर्षित हो जाए। जब भगवान की अभी जन्माष्टमी आ रही है तो हम कुछ नाटक करते हैं। तो जब नाटक करते हैं वो इतना अच्छे से करना है कि हमारी चेतना भगवान में चली जाए। जब हम भगवान की कथा सुनते हैं, भगवान की कथा का आयोजन करते हैं, तो इस तरह से करना है कि हम उसमें आकर्षित हो जाएं, हमारा मन उसमें लग जाए।
स्मृति और स्फूर्ति – भगवान की चेतना के दो मार्ग
तो इसके लिए दो चीज़ें आती हैं जिसके साथ मैं अंत करूँगा कि अभी हमारी चेतना इस भौतिक जगत में है, और भौतिक जगत से हमको आध्यात्मिक जगत की चेतना को ले जाना है। तो इस चेतना जो है, हम अभी इस भौतिक जगत में कई चीज़ों से आकर्षित हो सकते हैं। कुछ आशा हो सकती है कि मुझे यह भौतिक जगत को अच्छा बनाना है, मुझे अच्छा घर चाहिए और अच्छी नौकरी चाहिए और अच्छा यह एक चीज़ें करनी है। अभी यह एक स्वाभाविक इच्छा है, ऐसे नहीं कि उसको पूरा त्यागना है। और हम सबको इस भौतिक जगत से राहत के लिए कुछ हम चाहते हैं।
तो हमें, हम जो भी कर रहे हैं वो इस तरह से करना है कि हमारी चेतना भगवान की ओर प्रगतिशील रहे। और यह भगवान की ओर हमें जो हमारी चेतना जाती है वो दो पद्धति से जाती है: स्मृति और स्फूर्ति। स्मृति मतलब क्या? Smriti is conscious recollection. स्फूर्ति is spontaneous recollection.
स्मृति मतलब क्या है? हम प्रयास करके भगवान के बारे में विचार करते हैं, हम प्रयास करके भगवान पर चिंतन करते हैं। तो हम जब जप करने का प्रयास करते हैं तो मन लगता नहीं है, पर हम मन लगाने का प्रयास करते हैं। इधर-उधर मन सब भागता है, पर उसको लाते हैं, हम स्मृति है। यह साधना भक्ति की प्रधान विधि है:
स्मर्तव्यः सततं विष्णुर्विस्मर्तव्यो न जातुचित्।
आप सदैव भगवान का स्मरण करने का प्रयास करो और भगवान को न भूलो। पर जब हम इस तरह से कर रहे होते हैं साधना भक्ति, तो जो स्मृति है वो Ascending होती है। स्मृति मतलब हम प्रयास करके भगवान का स्मरण करते हैं। पर जो स्फूर्ति होती है वो भगवान की कृपा से आ जाती है।
कभी कभी हम जप करते हैं तो कभी कभी जप में इतना मन लग जाता है कि ऐसे लगता है कि जप कभी ख़त्म ही न हो। और कभी कभी ऐसे होता है जप करते हैं, लगता है कि जप कभी ख़त्म ही नहीं होता है। तो क्या होता है जब ऐसे लगता है जप कभी ख़त्म ही नहीं होता है? मतलब तभी क्या है? हमें प्रयास करना है:
यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम् ।
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत् ॥
जहां भी मन भागता है उसको भगवान में लगाओ। पर हम सबको भी कभी-कभी ऐसा अनुभव होता है कि भगवान की कृपा से हम उनकी स्मृति में एक तरह से मगन हो जाते हैं। हम शायद दर्शन करने आते हैं, पर कभी-कभी दर्शन करते हैं तो इतना आकर्षक रहता है भगवान का दर्शन कि हम कभी सब कुछ भूल जाते हैं। हम कीर्तन करते हैं पर कभी-कभी कीर्तन में ऐसा मन लग जाता है, कुछ एक अलग ही अनुभूति हो रही है।
तो यह जो अलग ही अनुभूति है, जब हम साधना भक्ति कर रहे होते हैं, तो शायद 99.99% जो होती है, वो हमको प्रयास करना पड़ता है। पर कभी-कभी ऐसा एक अलग अनुभूति आ जाती है कि तब मन भगवान में लग जाता है, वो क्या है? स्फूर्ति है। और तभी हमें प्रयास नहीं करना पड़ता है।
भगवान में मन लगाने का प्रयास और दिव्य आनंद
तभी अपने आप मन भगवान में लग जाता है, और तभी क्या होता है? बड़े दिव्य आनन्द की, दिव्य शान्ती की, दिव्य भावनाओं की अनुभूति होती है। और जैसे हम प्रगति करते रहते हैं, जैसे शुद्ध होते रहते हैं, तो क्या होता है? धीरे-धीरे जो है, स्मृति की मात्रा कम हो जाएगी, स्फूर्ति की मात्रा बढ़ जाएगी। प्रयास तो हमेशा ही करते रहना पड़ते हैं।
जो दिव्य आनन्द होता है, उसकी शुरुआत कैसे होती है?
“यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम्।”
पहले जो होता है, उसमें एक विष के समान होता है, पर बाद में अमृत आता है। पहले विष के समान होता है क्योंकि मन लगता नहीं है भगवान में। हम लगा रहे हैं भगवान में, पर सौ-हज़ार चीज़ें उससे और आकर्षक हमको लगती हैं। तो फिर भी हमको मन लगाना है। तो वो प्रयास है, जहां पे मन भाग रहा है उससे हम मन भगवान में लगाते हैं। यह एक प्रयास है, और यह ज़हर के समान लगता है।
पर क्या होता है? जितना हम प्रयास करते हैं, तो उतना हम शुद्ध हो जाते हैं। फिर यह ज़हर की मात्रा कम होने लगती है, और अमृत और अधिक हम आसानी से महसूस कर सकते हैं, अधिक मात्रा में, अधिक समय तक महसूस कर सकते हैं। और फिर जब हम शुद्ध हो जाते हैं, तो तभी क्या होता है? यह “यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम्” नहीं रहता है। चैतन्य महाप्रभु ने बताया है, “पूर्णामृतास्वादनम्।” कि यह पहले ज़हर और फिर अमृत नहीं, पर हमेशा ही अमृत उस स्थिति पे जब हम आते हैं, तभी “सुसुखं कर्तुमव्ययम्।” पूर्णामृतास्वादनम्। तभी जो है, इस भौतिक जगत में भी हम आध्यात्मिक अनुभूति सदैव कर सकते हैं। और उस स्तर पर अगर हम आ जाते हैं, तो उस स्तर से आध्यात्मिक जगत की प्राप्ती केवल काल से हमें फ़रक रहता है। ऑलरेडी (Already) हम आध्यात्मिक चेतना में आ गए हैं और आध्यात्मिक जगत की प्राप्ती ज़रूर हमें हो जाएगी।
भौतिक जगत में भगवान की स्मृति बढ़ाना
तो अभी हम इस भौतिक जगत में हैं, पर अगर हम स्मृति करते रहेंगे भगवान की, हमने स्मृति करनी है। हम हमारी कल्पना का इस्तेमाल करके भगवान की स्मृति कर सकते हैं। हमारे भौतिक जगत को परिवर्तित करके भगवान की स्मृति को बढ़ा सकते हैं। हमारा घर है, पर घर में जितने हम भगवान के चित्र रख सकते हैं, भगवान का कीर्तन रख सकते हैं, तो इस भौतिक जगत को भी हम परिवर्तित करते हैं जिससे कि भगवान की स्मृति बढ़ सके। कल्पना हमारी क्रियेटिविटी (रचनात्मकता) है, उसको भी इस्तेमाल करते हैं जिससे भी हम हमारी चेतना भगवान की ओर ले जाते हैं। और अंत में भगवान हमारी चेतना को ऊपर उठा लेते हैं। जो मुझ में मन लगाते हैं, उनको मैं खुद उद्धार कर लेता हूँ, भगवान कहते हैं।
सारांश: कल्पना और सत्य का संबंध
तो सारांश में आज हमने चर्चा की किस तरह से कि कल्पना और सत्य में क्या संबंध है। जो यहां पर श्लोक बताया गया है, यह निसर्ग की दृष्टि से आध्यात्मिक सत्य की ओर कैसे प्रगति कर सकते हैं, उसका वर्णन है। और यहां पर एक ऐसा उदाहरण दिया है जो काल्पनिक लग सकता है, पर वह एक आध्यात्मिक उदाहरण है। जैसे हमको बारिश में इंद्रधनुष दिखता है जिसमें कोई धागा नहीं है, वैसे ही इस भौतिक जगत में भगवान प्रकट होते हैं, पर भगवान तीन गुणों से परे हैं।
जैसे धागे के बिना कोई धनुष काम नहीं कर सकता है, वैसे ही तीन गुणों के बिना कोई भी व्यक्ति का अस्तित्व नहीं हो सकता है। तीन गुणों के दो अर्थ होते हैं: जो रस्सी हमें बांधती है, और जो मूल तत्व है इस भौतिक जगत की निर्मिती के लिए। जैसे टीवी पर कोई देख रहा है, जो तीन रंग जो होते हैं, वैसे तो यहाँ पर तीन गुणों का उल्लेख वो तीन रंगों के समान किया गया है टीवी पर। यहाँ पर यह उदाहरण है, इसका उद्देश्य यह नहीं है कि इंद्रधनुष काल्पनिक है और भगवान भी काल्पनिक हैं। पर क्या है कि इंद्रधनुष दिखता है पर जैसे बाकी सब दिखते हैं धनुष, वैसे नहीं है। भगवान दिखते हैं पर वैसे नहीं हैं।
तो उसी पर हमने चर्चा की, किस तरह से कि जो भौतिक जगत कभी भी संतुष्टि प्रदान नहीं करता है। इसलिए लोग तीन प्रकार के प्रयास करते हैं इस भौतिक जगत की असंतुष्टिपूर्ण स्वभाव का प्रतिकार करने के लिए:
- आध्यात्मिक चेतना की प्राप्ति करो, आध्यात्मिक जगत की प्राप्ति करो।
- दूसरा है, इस भौतिक जगत को अच्छा बनाओ।
- एक काल्पनिक जगत की निर्मिति करो और वहाँ पे राहत प्राप्ति करो।
तो जैसे ही वैज्ञानिक और तंत्रज्ञानिक प्रगति हुई, तो लोगों ने जो आध्यात्मिक जगत है उसको कल्पना मान लिया, और फिर भौतिक जगत को और अच्छा बनाने का प्रयास किया। पर उसमें काफ़ी समस्याएं हैं, उससे काफ़ी समस्या आ रही है। तो अभी अधिकांश तंत्रज्ञान की प्रगति क्या है? और अच्छा मोह बनाने में है। और इक्कीसवीं शताब्दी का सबसे महँगा और सबसे प्रचलित अगर कोई आर्टिफैक्ट होगा, तो वो मूवीज़ (movies) होंगे। तो इतना मोह क्यों बनाने में लोग लगे हुए हैं? क्योंकि वो भौतिक जगत संतुष्टि प्रदान नहीं करता है और यहां पर जाने के लिए, आध्यात्मिक के लिए जाने की जानकारी नहीं है, तो इसमें जा रहे हैं लोग।
तो मोह साधारणतः भगवान से हमें दूर ले जाता है, पर कल्पना के द्वारा हम भगवान के करीब कैसे आ सकते हैं? उसके बारे में हमने ब्रह्मा विमोहन लीला के बारे में चर्चा की। किस तरह से ब्रह्मा जी ने एक मोह निर्माण किया, पर भगवान ने उसी मोह का इस्तेमाल किया। किस लिए? ब्रह्मा जी को सत्य दिखाने के लिए। तो ब्रह्मा जी का उद्देश्य एक तरह से भगवान का परीक्षण करना था, पर दूसरा भगवान की महिमा दूसरों को दर्शाना था। तो भगवान ने उसका ही इस्तेमाल किया।
तो उस तरह से हम भी हमारी कल्पना का इस्तेमाल कर सकते हैं भगवान के करीब जाने के लिए। किस तरह से हमने देखा कि हमारी कल्पना का इस्तेमाल करके हम स्मृति कर सकते हैं भगवान की। हम जो भी कार्य कर रहे हैं हमारे भौतिक जगत में, कार्य करते हैं, हम भगवान की स्मृति करने का प्रयास करते हैं। और जब इससे हम स्मृति कर रहे हैं, तो जैसे भगवान ने वो जो मोह किया था उसका इस्तेमाल करके हमें सत्य का दर्शन करा दिया, उससे हमारी ही स्मृति में भगवान कभी स्फूर्ति ला देंगे।
स्मृति मतलब हम प्रयास करके भगवान का स्मरण करते हैं। स्फूर्ति मतलब भगवान की कृपा से एक बाढ़ के समान उनके बारे में विचार, उनके बारे में भावनाएं हमारी चेतना को आप्लावित कर देती हैं, और हम दिव्य चेतना, दिव्य आनन्द में स्थित हो जाते हैं। जैसे हम प्रगति करेंगे तो हमारी भगवान की जो चेतना है, उसमें पहले अधिकांश मात्रा में स्मृति होगी, पर धीरे-धीरे स्फूर्ति बढ़ जायेगी। जब तक हम साधना भक्ति कर रहे हैं तो स्मृति ज़्यादा होती है, तो इसलिए पहले ज़हर, बाद में अमृत होता है। पर जितना हम शुद्ध हो जायेंगे तो स्फूर्ति की मात्रा बढ़ जायेगी, और फिर जो वहां पे “पूर्णामृतास्वादनम्” सदैव अमृत का आस्वादन हम कर सकते हैं। बहुत-बहुत धन्यवाद। हरे कृष्णा।
प्रश्नोत्तर: जगत की समस्याएं और हमारा दृष्टिकोण
प्रश्न: “सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत्।” कोई दुखी नहीं हो, ये भाव होता है। तो इन दोनों का मेल कैसे हम लोग करें?
उत्तर: अच्छा सवाल है कि अगर एक तरह से शास्त्रों में बताया गया है कि यह जगत दुखालयम् ही है। जगत दुखालयम् है तो सब सुखी हों, ये भाव कैसे आता है? यह कैसे है कि distress is a feature of the world, it is not the purpose of the world. कि ये दुख है, ये जगत का एक लक्षण है, जगत का उद्देश्य नहीं है।
और इसका उदाहरण हम दे सकते हैं एक अस्पताल। अभी अस्पताल में सब लोग बीमार हैं, सब लोग एक तरह से पीड़ा में हैं, पर डॉक्टर की इच्छा क्या होती है? सब लोग ठीक हो जाएं। डॉक्टर की इच्छा सब बीमार हैं, सब बीमार रहें, ऐसी इच्छा नहीं होती है। कुछ डॉक्टरों की हो सकती है, पर डॉक्टर की इच्छा होती है सब ठीक हों। प्रभुजी, कहने के लिए, करने के लिए, जो जीवन माध्यम है और आपको चाहिए, बनना चाहिए, यह करते हैं, छोटे अब यह चाहिए क्योंकि कोई चुनौतीपूर्ण (challenging) जैसे हैं, यह मैं एक बहुत चुनौतीपूर्ण लाइफ (life) से हूँ, तो आपका अब किस्मत होती है।
प्रश्न: हम भक्ति करते हैं, पर कलियुग में भक्ति बड़ी दुर्लभ है, और भक्ति करते हैं, हमें बड़ी समस्याएं आती हैं। कृष्ण मदद तो करते हैं, पर फिर भी हमें संघर्ष करना पड़ता है, बड़ी मुश्किल होती है, तो किस चेतना से हम आगे बढ़ सकते हैं?
उत्तर: ऐसा नहीं है कि हमें समस्याएं आयेंगी या नहीं आयेंगी, पर कुछ हद तक हम चुनाव कर सकते हैं कि किस प्रकार की समस्याओं का हम सामना करेंगे। जैसे मतलब क्या है, कोई अगर बीमार है तो दर्द तो होने ही वाला है उसको। पर अगर वो दवाई ले रहा है, दवाई कड़वी है, कोई सर्जरी कर रहा है, सर्जरी से दर्द होता है, तो अभी वो भी दर्द ही है। पर वो दर्द ऐसा है जिससे कि वो बीमारी के दर्द से धीरे-धीरे परे जाएगा। हमारे जीवन में समस्याएं होती हैं, वो कैसे होती हैं? कि कुछ ऐसे कुछ… तो पहले मैं आपके प्रश्न पर जाता हूँ, फिर मैं हिंदी बोलूंगा। कि हमें ज़्यादातर जो जीवन में है, हम पर निर्भर है। जब वो पूरा सामान्य है, पर एक निश्चित उदाहरण से बोल सकता हूँ।
ओवर थिंकिंग (Overthinking) और समस्याओं का समाधान
कि अगर तुलना करते हैं, एक ऐसे ग्राफ (graph) बनाते हैं हम कि ये है प्रॉब्लम (problem) और प्रॉब्लम सॉल्विंग एबिलिटी (problem solving ability) और ये है टाइम (time)। तो हमारे जीवन में समस्याएं जो होती हैं, तो अगर कोई समस्या है और उसके बारे में विचार ही नहीं करता है कोई, तो फिर वो भी बड़ी समस्या है। अगर हमारी तबीयत ठीक नहीं है और हम सोचते ही नहीं हैं कि क्या दवाई लेना है, कैसे डॉक्टर के पास जाना है, क्या करना है, उसके बारे में विचार नहीं करेंगे तो वो बड़ी समस्या है। ज़रूर हमको दवाई तो लेना है, उसके बारे में विचार करना है।
तो जब हम किसी समस्या के बारे में विचार करते हैं तो समस्या का कैसे सामना करना है, वो जो ग्राफ है ऐसे बढ़ता है: Problem solving ability increases as we think about the problem. जितना हम विचार करते हैं, उतनी हमको स्पष्टता आती है कि समस्या के बारे में क्या कर सकते हैं। पर यह जो ग्राफ है, यह ऐसे सीधा ही बढ़ते नहीं रहता है। यह एक मात्रा तक बढ़ता है और उसके बाद में फ्लैट (flat) हो जाता है।
मतलब हम पहले सोचते हैं तो कुछ स्पष्टता आती है, ‘ठीक है, ऐसे नहीं करना चाहिए, ऐसे करना चाहिए।’ पर और सोचते रहेंगे तो क्या होता है? वो और स्पष्टता नहीं आती है, और फिर उसके बाद में और सोचेंगे तो फिर वास्तव में नीचे आने लगता है, जो स्पष्टता आती है वो भी चली जाती है। इसको कहते हैं इंग्लिश में ओवर थिंकिंग (overthinking)।
Not thinking is a problem. न विचार करना और बहुत विचार करना, भी दोनों से समस्या होती है। कुछ लोग ऐसे होते हैं कि तो ऐसे मन में ही फंस जाते हैं कि उनको समझ में नहीं आता है क्या करना है। तो हम सबको क्या करना है? जो भी समस्या है उसके बारे में हमको विचार करना ज़रूरी है, पर उसको रेगुलेटेड (regulated) पद्धति से विचार करना है।
मतलब क्या रेगुलेटेड पद्धति से विचार करना? कि जब हमारे जीवन में समस्या है तो वो छोटे बालक के समान है। तो जो मन होता है, the mind is more worried if there is a solution rather than what is the solution. मतलब इस समस्या का कोई हल है, उसके बारे में ज़्यादा चिंता होती है। क्या हल है वह जानने में उसकी उतनी रुचि नहीं होती है।
जिम्मेदारी (Responsibility) से मन को नियंत्रित करना
मतलब क्या है इसके कहने का विश्लेषण कैसे है? कि जब हमारे जीवन में कोई समस्याएं होती हैं, तो एक ऐसी प्रवृत्ति होती है उसके बारे में हमेशा विचार करते रहें। किसी को ऐसी बीमारी है, कब ठीक होने वाले हैं कोई पता नहीं है, बहुत समय से बीमार रह रहे हैं, या किसी की नौकरी चली गई है, कब नौकरी मिलेगी, क्या होगा, कोई रिश्ते में कोई समस्या आ रही है। तो कुछ समस्याएं होती हैं जिनका कब हल आने वाला है पता नहीं है, और उनके हल को लाने के लिए हमारे पास कुछ करने की क्षमता सीमित होती है।
तो अगर ऐसी परिस्थिति में कोई है, तो हमें जहां तक हो सके एक नियम बनाना चाहिए: for problems that are constantly there, don’t keep constantly thinking or talking about the problem. अगर किसी को कोई बीमारी है, तो घर में कोई बहुत बीमार है, अगर काफी समय से कोई बीमार है, तो भी सब को पता है कि आपको ये करना है, वो करना है, वो करना है। कुछ चीज़ें नियमित होती हैं। पर अगर उसके बारे में हमेशा बात करते रहें, अगर जो हम सबको काम करना है वो काम कर देंगे, पर उसके बारे में बात नहीं करें। और केवल बात नहीं करना ऐसे नहीं, पर हमारा मन भी दूसरी चीज़ों में लगाएं।
तो क्या होता है? जब समस्या हमेशा रहती है, हल कब आने वाला है पता नहीं है, तो एक तरह से स्वभाव हो जाता है कि हम ओवर थिंकिंग (overthinking) हो जाते हैं। और उससे क्या होता है? उससे हमारा मन ही हमारा बहुत बड़ा शत्रु बन जाता है। ऐसे नहीं कि समस्या है नहीं, समस्या है, पर वो समस्या की मात्रा बहुत बढ़ जाती है। हम उसके बारे में हमेशा विचार करते रहते हैं।
तो प्रॉब्लम्स (problems) के लिए अगर हम बाहरी जीवन में कुछ स्टिम्यूलेटिंग (stimulating) है, कुछ चैलेंजिंग (challenging) है, कुछ जो हमारा मन इसमें लग सकता है ऐसी चीज़ें हैं, तो फिर क्या होता है? इसमें से मन निकल जाता है। तो इसलिए प्रभुपाद ने बताया कि हम समस्या के लिए चुनाव नहीं कर सकते हैं, पर क्या समस्या है उसका चुनाव कर सकते हैं। मतलब क्या है? यह समस्या मेरे पास पहले से जीवन में है और उसके बारे में विचार करते रहूंगा तो मैं उसमें ज़िंदा गड़ जाऊंगा। तो ठीक है, यह समस्या है पर मैं कुछ और ज़िम्मेदारी लेता हूँ। कुछ और ऐसी चीज़ लेता हूँ जिसमें मेरा मन लग जाएगा।
मुझे लगेगा पहले से बहुत सारी ज़िम्मेदारी है और कहां से ले लूँ मैं? तो यह ऐसे नहीं है। हमें क्या होता है? हमारे मन को कहीं न कहीं लगाना है। And few things focus the mind as much as responsibility. ज़िम्मेदारी सबसे ज़्यादा हमारे मन को लगाती है। क्या है, मन लगाओ बोलते हैं, पर मन लगता नहीं जब तक कोई ज़िम्मेदारी नहीं होती है।
मान लीजिये अगर आपको कहते हैं ‘आप इतना चिंता कर रहे हो थोड़ा शास्त्र का पठन करो।’ ठीक है आप शास्त्र खोलते हैं, पर ‘यह समस्या है, वो समस्या है क्या करेंगे’, शास्त्र में मन नहीं लगता है। पर अगर आपको पता है कि अभी मुझे एक घंटे के बाद जो पढ़ रहा हूँ उस पर एक लेक्चर (lecture) देना है, तो क्या होगा? अगर वो जिम्मेदारी होगी तो मन तुरंत लग जाएगा वहाँ पर। अगर हम कुछ प्रवचन सुन रहे हैं, ठीक है, सैकड़ों प्रवचन सुन रहे हैं। पर मान लीजिये प्रवचन के बाद में हमको बताना है कि प्रवचन में क्या सुना मैंने। ‘ओके ओके ओके’, तो फिर ध्यान पूर्वक सुनेंगे हम।
तो क्या होता है कि responsibility is a burden that frees us from burdens. जिम्मेदारी ये ऐसा बोझ है जो हमें बोझों से मुक्त करता है। तो यह एक बड़ी जिम्मेदारी की लक्षण चीज़ है ये। जब हम भगवान की सेवा की कुछ जिम्मेदारी लेते हैं, तो एकदम से ऐसा लग सकता है कि पहले से मेरे इतने सारे बोझ हैं, ये कहां से लूँगा मैं? और सत्य है, हमको एक व्यावहारिक रूप से भी देखना है। इतनी भी सेवा नहीं होनी चाहिए कि हम उसमें पूरा दब जाएं। पर कई बार हमारी परिस्थिति हमें इतनी नहीं दबा रही होती है, जितनी हमारी मनःस्थिति दबा रही होती है। तो वो मन के दबाव से मुक्त करने के लिए किसी और चीज में अगर हम मन लगा सकते हैं, तो फिर वो बहुत अच्छा है।
तो इसलिए जिम्मेदारी… लग सकता है कि पहले जीवन मुश्किल है, कलियुग में जीवन मुश्किल है, उसमें भक्ति करना और मुश्किल है, और उसमें भक्ति में जिम्मेदारी लेना और मुश्किल है। पर ये एक दूसरा सत्य है। एक व्यावहारिक रूप से हम सबके पास 24 घंटे ही हैं। हम उसमें 24 घंटे से ज़्यादा कुछ नहीं कर सकते हैं। पर एक मानसिक दृष्टि से देखेंगे हम, तो वास्तव में हमारे मन का बोझ दुनिया के बोझ से ज़्यादा होता है। और फिर हम दूसरा कोई अगर बोझ उठा लेते हैं, दूसरी कोई जिम्मेदारी लेते हैं, तो मन को उतना समय नहीं मिलता है हमको और बोझ दबाने के लिए। तो यह हम थोड़ा खुद का आत्मनिरीक्षण करके, दूसरे भक्तों की सलाह करके फैसला कर सकते हैं कि कितनी हमें ज़िम्मेदारी लेनी चाहिए। यह ब्लैक एंड वाइट (black and white) नहीं है, हमें एक बैलेंस (balance) रखना है। पर वह बैलेंस रखने के लिए हमें देखना है कि दो चीज़ें हैं: एक व्यावहारिक सत्य है और एक मानसिक सत्य है। और केवल व्यावहारिक सत्य के लिए हम पूरा नहीं जाना है और केवल मानसिक सत्य के लिए पूरा नहीं जाना है, हमें दोनों चीज़ों के लिए एक बैलेंस रखना है।
हमारे विचारों पर तीन गुणों का प्रभाव
तो हम सोचते कुछ हैं और करते कुछ हैं। तो हमारे विचार धारा तीन गुणों से प्रभावित होती है, या हमारे विचारों से तीन गुण प्रभावित होते हैं? यह कैसे है कि वो पुराना सवाल है: अंडा पहले आता है या मुर्गी पहले आती है? तो उसका जवाब है: जो है उसके साथ शुरुआत करो। तो अगर अंडा है तो अंडे के साथ शुरुआत करो, मुर्गी है तो मुर्गी के साथ शुरुआत करो।
मतलब क्या है कि यह सत्य है कि हम किस प्रकार के विचार करेंगे, किस प्रकार के विचार हमारे मन में एक स्वाभाविक पद्धति से आएंगे, वह तीन गुणों के प्रभाव से निर्धारित होता है। कोई अगर बहुत लालची है, तो उसमें लोभ बहुत है, तो जहां भी जाएगा सबसे पहले पैसा देखेगा। ‘अच्छा इतना पैसा, इतना पैसा, इतना पैसा।’ तो कुछ विचार या अधिकांश विचार हम कह सकते हैं, ये पूर्व प्रभाव से अपने आप आ जाते हैं।
जैसे अगर कंप्यूटर का स्क्रीन होगा देखेंगे, तो कुछ-कुछ नोटिफिकेशन (notification) अपने आप आ जाते हैं। पर जो भी नोटिफिकेशन आते हैं, उन सब को ही, या उन में से किसी को भी हमको नोटिस (notice) करना ही है, ऐसे ज़रूरी नहीं है। शायद वो दस नोटिफिकेशन आये हैं, पर वो किसी भी एक नोटिफिकेशन को न देख के हम कोई और ऐप (app) खोल सकते हैं। तो वैसे ही क्या है? हमारे पूर्व कार्यों के कारण किसी प्रकार से हमें गुणों का प्रभाव हो गया है, और वो गुणों के प्रभाव के कारण कुछ प्रकार के विचार अपने आप हमारे मन में आ जाएंगे। पर विचार आते हैं, उसपे हम जितना चिंतन करते हैं, उतना विचार बढ़ता है। और उसके अलावा कोई और चिंतन हम करते हैं तो वो भी बढ़ता है।
तो हमें क्या करना है? जो भी हमारी अभी की परिस्थिति है, उसमें हम सकारात्मक, रचनात्मक, आध्यात्मिक क्या कर सकते हैं, देखना है। तो खुद को परिवर्तन अगर करना है तो उसकी शुरुआत कैसे कर सकते हैं? SSS – Small Simple Steps. छोटी सी चीज़ आप क्या कर सकते हैं? क्या है कि मन पे हम सोचते एक हैं, हम इरादा एक करते हैं, पर कार्य कुछ और शुरू हो जाता है। तो क्या है? मन के लिए हम क्या कार्य करते हैं, कितनी नियमितता से कार्य करते हैं, यह ज़्यादा महत्वपूर्ण है। हम कितनी मात्रा में कार्य करते हैं, यह महत्वपूर्ण नहीं है।
मतलब क्या? अगर हमको कहना है, हमें शास्त्र पढ़ना है, यह भागवतम जानना है, क्योंकि जब मुझे समय मिलेगा तो मैं रोज़ चार घंटा भागवतम पढ़ूंगा। पर वो समय शायद हमको चार महीने में एक दिन मिलता है, और तभी हम चार घंटा पढ़ लेते हैं और बाद में चार महीने के लिए खोलते भी नहीं हैं। अच्छा है, कम से कम उतना तो पढ़ रहे हैं। पर अगर हम फैसला करते हैं कि मैं रोज़ चार मिनट भागवतम पढ़ूंगा, तो हम कहते हैं भागवतम इतना बड़ा है अगर हम चार मिनट भागवतम पढ़ेंगे, और चार महीने में चार घंटा भागवतम पढ़ेंगे, तो शायद टोटल मात्रा एक ही हो सकती है। एक महीने में चार घंटा होता था, तो टोटल क्वांटिटी एक ही हो सकती है। पर क्या है? मन पे जो उसका प्रभाव है, संस्कार है, वो अलग होता है।
तो इसलिए कोई अगर जीवन में परिवर्तन करना है और हम कर नहीं पा रहे हैं, तो कोई बड़ा परिवर्तन के बारे में सोचने की ज़रूरत नहीं है। कोई छोटी चीज़ जो हम कर सकते हैं, उससे चालू कर दीजिये। और अगर वैसे चालू कर देंगे तो धीरे-धीरे वृद्धि हो जाएगी। तो इसलिए मैंने कहा कि हाँ, हमारे गुणों के द्वारा हमारे विचारों पे प्रभाव होता है। तो हमारी जो भी मनःस्थिति है, जो भी परिस्थिति है, उसमें हम अभी क्या कर सकते हैं? जो सम्भव है, तो छोटे लेवल (small level) पे साधारण चीज़ से चालू आप कर लीजिये। वो कर लेंगे, धीरे-धीरे अगर वो संस्कार हो जाएगा तो मन का परिवर्तन हो जाएगा, और फिर वही चीज़ और मात्रा में करना भी आसान हो जाएगा।