When imagination points away from reality and when it points to reality – Hindi
[Bhagavatam class at ISKCON, Nasik, India]
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संक्षिप्त सारांश
कभी कभी बारिश में बादलों के गडड़गड़ाहट के साथ एक धनुष्य दिखता है, जह किसी धागे के बिना होता है। साधारान्तया जो धनुष्य होता है, वह धागे से बंधा होता है, पर इंद्रधनुष्य में कोई धागा नहीं होता है। और इसके बावजूद वह आस्मान में बड़ा ही सुन्दर रूप से प्रतित होता है। ठीक उसी तरह से, जब भगवान इस भौतिक जगत में आते हैं, तो वे एक साधारान मानों जैसे प्रतित होते हैं, पर वे किसी भौतिक परस्तिति पर निर्भर नहीं हैं। भगविता में पताया गया है कि भगवान अपनी अंतरंग शक्ति से आते हैं, जो की बाहय शक्ति के बंधन से।
मुख्य ट्रांसक्रिप्शन
कभी कभी बारिश में बादलों के गडड़गड़ाहट के साथ एक धनुष्य दिखता है, जह किसी धागे के बिना होता है। साधारान्तया जो धनुष्य होता है, वह धागे से बंधा होता है, पर इंद्रधनुष्य में कोई धागा नहीं होता है। और इसके बावजूद वह आस्मान में बड़ा ही सुन्दर रूप से प्रतित होता है।
ठीक उसी तरह से, जब भगवान इस भौतिक जगत में आते हैं, तो वे एक साधारान मानों जैसे प्रतित होते हैं, पर वे किसी भौतिक परस्तिति पर निर्भर नहीं हैं। भगविता में पताया गया है कि भगवान अपनी अंतरंग शक्ति से आते हैं, जो की बाहय शक्ति के बंधन से फूर्णते आमुक्त हैं, और जो साधारान जीवों के लिए बद्धा आवस्ता है, वह भगवान के लिए मुक्ता आवस्ता है। यहाँ पे विश्लोग तब तक हम रिसाइट करते हैं।
निर्गुणम्च गुणिन्यभात व्यक्ते गुणवान पुरुशोयता धनूर्वियति माहेंद्रम् ओमज्ञानति मिरंधस्य ज्ञानांजनिशलाकाया चक्षुरोन मिलतं येना तस्मईश्री गुरवे नमहा नमा ओम विष्णुपदाय कृष्णप्रश्थाय भूतले श्रीमते भक्ति वेदान्त स्वामी इति नामिने नमस्ते सरस्वती देवे गव्रवाणी प्रचारिने निर्विशेश शुन्यवादी पास्चात्य देश तारिने वान्चा कल्पतरूभ्यस्च कृपासं धुभ्येवच पतितानां पावनेभ्यो वैश्णवेभ्यो नमोनमहा जय श्री कृष्ण चैतन्या प्रभू नित्यानन्दः श्री अद्वैत गदाधारः श्रिवासादि गव्रभक्तव्रिंदः हरे कृष्णा हरे कृष्णा कृष्णा कृष्णा हरे हरे हरे रामा हरे रामा रामरामा हरे हरे हरे कृष्णा जो भी भक्तों ने अपने मॉबाईल फोन लाए हो किरपय उसको आप बन कर दिजिये ताकि वो कथामा डिस्टर्ब नहीं करें हरे कृष्णा तो आज सुबह हम श्रीमत भागवतम के दशंसकन से इस विशय पर जर्जा करेंगे की कलपना और सत्य इसमें क्या संबन्ध है विशय पर जर्जा करेंगे की कलपना और सत्य यहाँ पर दशंसकन में यह जो अध्याय है इसमें जैसे अभी बहुत बारिश हो रही है तो वैसे ही गुंदावन में बड़ी बारिश हो रही है और उस बारिश से शुगदेव गोई स्वाम जब उसका चिंतन कर रहे है तो चिंतन करते हुए निसरग को देख कर वे अलग-अलग उपमाएं, तुलनाएं कर रहे हैं और उनके द्वारा कुछ आध्यात्मीक शिक्षा पदान कर रहे हैं तो इस अध्याय को हम कह जाकते हैं अध्याय को पदान कर रहे हैं तुलनाएं कर रहे हैं आपकाल दुणिया से हम क्या करते हैं?
आपका विजिन एक प्रवाद जाना है। हम जो देखते हैं, वो अभी दो व्यक्ति शायद एकी चीज को देखते हैं, पर वो दोनों एकी चीज को नहीं देखते हैं, बिल्यों पर हैं से दू अग कोसि में जीदा आणि होता है फिड़ने को दिखा достиखते हैं अपने अंकाये लेकिन यही देह जदा रहे हैं להशती जहाएँ धी तोड़ा यूज़े लेका घंड़ी अग को जुचते हैं आखें भले एक ही चीज़ को देख रहे हैं, पर दो मन जो है, उसके बारे में अलग-अलग चीज़ों को सोचते हैं। तो यहाँ पे जो यह अध्याय है, इससे हम समझ सकते हैं कि निसर्ग में इतनी सारी चीज़े हैं, और हम इतनी बार उन सबको देखते हैं।
पर चुपदेव वो स्वामी, क्योंंकि उनकी चेतनाइत्या, अध्यात्मिक तत्व, और अध्यात्मिक सत्य में एक आगरत है, कि निसर को भी देखते हैं, तो उनको वहाँ पे अध्यात्म तत्व की याद आती है। और इस विशेशलोक में पताया गया है, कैसे आस्मान में हम कभी-कभी, जब बारिश होती हैं, तो इंद्र धनुश्य देखते हैं। तो अभी इंद्र धनुश्य दिखने में एक धनुश्य जैसे ही लगता है।
पर यह अलग है, क्योंंकि कई फरक है, पर एक फरक यहां पे पताया गया है, कि इंद्र धनुश्य है, वह उसमें कोई धागा नहीं होता है। तो जब कोई युद्ध में जाता है, उसके पहले जैसे कोई बंदुक लेकर जा रहा है, तो बंदुक काम कर रही के नहीं देखते हैं, बंदुक में गोलियां है के नहीं देखते हैं। तो वैसे ही, जब कोई धनुश्य से युद्ध करने जाता है, तो वो देखते है कि तीर उनके पास है अगर नहीं, और दूसरा, वो जो धागा है, वो कितना टाइटली बांध हो, उसमें कितना टेंशन है।
जितना उस धागे में टेंशन है, उतना ही वो जब तीर मारेंग खातक नहीं होगा वो, तो जो धनुश्य में को हम देखते है, तो उसमें पहले हमको धनुश्य का रूप दिकता है, धागा पहले नहीं दिक्ता है, पर धागा बड़ा महत्वपूर्ण होता है। पर इंद्रधनुष्च्य ऐसा धनुष्च्य है जिसमें धागा नहीं है तो उसकी तुलना, अभि क्या? किसे कर रहे हैं वो?
वो कह रहे है कि भगवान जब इस भावतिक जगत में आते है तो वो एक इंद्रधनुष्च्य के समान है कि क्या तुलना है, जैसे धागा, साधायन भनिश्य जोता है, वो धागे के बिना नहीं रहता है। उसी तरह से इस भौतिक जगत में कोई भी व्यक्ति वो भौतिक तत्वों और तीन गुणों के बिना वो कुछ कारे नहीं कर सकता है। यह तीन गुण जो है, इनकी दो समझ आते हैं, तीन गुण वास्तमें है क्या?
तो भगवान भी इसको भगविता में दो पद्धतिय से समझाते हैं, तीन गुण क्या है। एक है, जिसे आपने सब चित्रों देखे होगे, कोई व्यक्ति है, भगविता में चित्र है, कि उसके उपर तीन व्यक्तिया है, तीन नादानते अस्लिया दिखाते हैं, और वो कटपुतली के रुमान व्यक्ति को नचा रहे हैं, और उनके उपर भगवान है, तो तीन गु दावे अध्याय के पाछे श्टोक में बान दोताते हैं, सत्वं मजस्तमैती, गुणाः प्रकृति संभवान, निबद्नन्धिमहाः बाहों, देहे देहिनमवयं, बताते हैं, कि तीन गुणों से सारे जीव बंध जाते हैं, पर इसके अलावा, गुणों की एक वर परिभ भाषा है, गुण क्या, जो दैवीह एशा गुणमाया दुरत्या, कि सारी भावतिक प्रकृति जो है, वह तीन गुणों से बनी हुई है, तो तीन गुण दोनों का होता है, कि इस भावतिक जगत का जो अस्तित्व है, उसका मूल कारण भी तीन गुण है, और इसके लिए हम उधारन देते हैं, कभी कभी कैसे, कि अगर आप कुछ टीवी देख रहे हैं, तो वास्तव में, जिनको टीवी के टेकनोलोजी पता है, तद्धग्यान पता है, क्या होता है, टीवी के उस स्क्रीन पे केवल तीन रंग आते हैं, तीन रंग के चोड़ी चोड़ी ड़ौट्स आते हैं, लाल, पीला, हरा, नीला होता है, लाल, हरा, नीला होता है, तीन प्रकार के रंग ढोते हैं, और उन तीन रंगों के मिलन तो वास्तो में वहाँ पे कुछ नहीं है, सिर्फ तीन प्रकार के लाइट है, तीन प्रकार, उसको पिक्सल्स कहते हैं, पर उससे सारे चित्र आते हैं, तो उससे सारे गुण जो है क्या है, यह तीन चीजे है, सत्वर जस्तमस, जो सारे भौतिक जगत के मूल है, और उसके द्वारा ही हर चीज की निर्मिति होती है, पुरुष्यः प्रकृतिस्तोही, भुंक्ते प्रकृति जान, गुणान, तो इस भौतिक जगत में, तेरवे अध्याय में, बाईसे शलोक में भुगान कहते है, कि हम सब प्रकृति के तीन गुणों दोरा निर्मित जो भी चीजे है, उनका भोग करने का प्रयास कर रहे हैं. तो यहाँ पर यह तीन गुण का उल्लेक हो रहा है, वह तीन रस्यों के रूपे नहीं है, वह क्या है, तीन मूलभूत तत्व, जो जिनके द्वारा सारे भौति जगत के सृष्टि हुई है, उसका उल्लेक हाता है. तो जैसे कोई धनुश्य भागे के पिना काम नहीं कर सकता है, वैसे तीन गुणों के बिना किसी भी चीज़ का अस्तित्व नहीं हो सकता है. तो इसका मतलब यह है, तीन गुण बड़े ही महत्तपूर्ण हैं, वो अन्य, वो अनवाइडबल, फाउंडेशनल है, मूल है सबका, पर, यहाँ पर बता है कि जैसे धनुश्य, इंद्र धनुश्य, जो हरे धनुश्य के लिए आवश्यक है, उसके बिना होता है वो. उसी तरह से, भगवान के भी बहुत एक जगत में आते है, तो जो हरे गेट्ती के अस्तित्व के लिए आवश्यक है, तीन गुण, भगवान उन तीन गुणों के परे होते हैं. तो अभी कोई कह सकता है, कि ये इंद्र धनुश्य, वास्तो में तो एक केवल, अगर विज्ञानिक दुश्य से पुछेंगे, तो ये एक मोह है, कि इंद्र धनुश्य किसी दिखता नहीं है, वास्तो में कुछ, अगर हम हवाईयाह से जाएगे, तो इंद्र धनुश्य तक पुछेंगे नहीं है, जैसे आस्मान में हमको उक्षितिज दिखता है, जहांपे आस्मान और जमीन मिल रही है, वैसे ही कोई कहेगा, इंद्र धनुश्य भी एक परकार का मोह है ही है, तो क्या भगवान भी एक परकार के मोह है है, कि अगर ऐसी तुलना की गई, हर तुलना का एक उद्देश होता है, तो यहांपे अभी इंद्र धनुश्य एक हमारे लिए, शारीक स्थर पर जो हम उसको जाके कुछ चू सकते है, ऐसी चीज नहीं है, पर इसका मतलब इस तुलना का उद्देश क्या है, तुलना का यहाँ उद्देश नहीं है कि इंद्र धनुश्य एक मोह है, इसे लिए भगवान ही भी मोह है, यहाँ भे उद्देश हें है, कि इंद्र धनुश्य बाकी धनुशय पर ऑलग है, वैसे भगवान जब इस भौती जगत में आते हैं, तो बाकी लोगों जैसे ही लिखते हैं, पर वो अलग है।
उनका दिव्यत्व जो है, उस पे जोर दिया जा रहा है यहाँ पर। तो अभी यह जो है, हम तीन विशयों पर चर्चा करेंगे, मेंली इसमें, कैसे है कि इसमें, कल्पना, भौतिक सत्य और अध्यात्मिक सत्य हैं। यह तीन स्तर हैं, और वास्तव में, अगर हम यह तुलना करते हैं, हम यह विशलेशन करते हैं, तो जो भी, जिनों ने भी इस भौतिक जगत के बारे में थोड़ा बहुत विचार किया है, वो भारतिय विचारवन्त हो, पास्चात्य विचारवन्त हो, कहीं भी हो, वो समझ जाते हैं कि यह जो भौतिक जगत है, यह एक संतुष्टि देने वाली जगा नहीं है, जब हमको बुरे अनुभव आते हैं, तो हम कहे सकते हैं, यह दुखों से भरा हुआ है, पर जब भी वैसे बुरे अनुभव नहीं भी आ रहे है, तो कम से कम यह कह सकते हैं कि जो भौतिक जगत जो है, यह संतुष्टि देने वाली जगा नहीं है, तो अगर यह संतुष्टि देने वाली जगा नहीं है, तो हम क्या करें?
तो अभी हम वास्तमें, क्योंंकि यह भौतिक जगत संतुष्टि नहीं देता है, तो मानवों ने इतिहास में तीन परकार के प्रयास किये हैं, इस भौतिक जगत की असंतुष्टि के परेजाने के लिए. एक है कि इस भौतिक जगत के परेजाय, जोकि आधःतिक परगति केलाते हैं, दूसरा है कि इस भौतिक जगत को और अच्छा बंगाए, जिसे हम कहिते हैं भौतिक प्रगती, और तीसरा है, एक कालपनी जगत की निर्मिती करें, जिसमें हम खोजें. कालपनी जगत मतलब कोई कला हो सकती है, कोई नाट्य हो सकता है, कोई ग्रंथ हो सकता है, कादंबरी हो सकती है। तो यह जब भोतिक जगत का कम से कम असंतुष्टी पूर्ण जगत होना, इससे राहत सब लोग चाहते हैं।
और यह तीन पुरद्धान पढ़यत्यय में हैं। यह तो तुम्हारी आईऔं से ऊपर चले जाो, एह ही जगत है, यहाँ से आधियातमी कश्यत्ना लो चले जाओ, यह इस भोतिक जगत कोई अच्छा बनाओ, या इस भौतिक जगत से एक कल्पना के दुनिया में चले जाओ और वहाँ पे कुछ संतुष्टी प्राप्त करूँ। अभी जो आजकल का समाज है एक तरह से हम विश्व के इतिहास में देखे गए तो पिछले 200-300 साल जो है यह एक तरह से विश्व के इतिहास में एक अपवाद के समान है लगबक 1700-1800 साल के पहले अगर आप भारत में हो, यूरोप में हो, अमेरिका में हो, अस्ट्रेलिया में हो, कहीं भी हो सब लोगे समझते थे कि ये भौतिक जगत एक शनिक जगह है और इसके परे हमें जाना है और जीवन का उद्देश यह है कि इस जगत में हम इस तरह से रहे कि इस से भैतर दूसरे एक जगत में हम जाए और सब जो प्राशीन संस्कुत्य है, उसमें ये भाव है हर संस्कुत्य में कुछ-कुछ भौतिक वादी लोग हुआ करते थे पर अधिकांच लोगों के विचाया धरा थी यह से थी कि इस जगत के हमें परे जाना है पर जैसे ही विज्ञान के प्रगती होने लग गई तो फिर क्या होने लग गया लोग कहने लग गए कि विज्ञान के आधार पर नास्तिक वादी, भौतिक वादी लोग कहने लग गए कि इस जगत के बरे कोई जगत है ही नहीं वो केवल एक कलपना है और उसमें हम नहीं जाय सकते हैं जाना भी नहीं है हमको क्योंंकि वो कलपना है तो फिर हमें क्या करना है हमें इसी जगत को भेथर बनाना है और हमें सारी शक्ति जो है इस जगत को भेथर बनाने में लगानी है विज्ञान के शुरुवात जब हुई सोलावे सत्रावे सत् आधुनिक विज्ञान की सोलावे सत्रावे सत् भावधि में तब अधिकान्चिस्व वेघ्जाणिक भगवान को मान्ते थे और भगवान की प्राप्ती जीवन का उध्यस्य ये भी मान्ते थे जियवं इस voorग में जाना है-जाना है- उस समय सोच रहे تھे कि जिस भगवान ने हमको धर्म दिया है अध्यात्मिक प्रगति के लिए, उने भगवान ने हमको विज्ञान दिया है भोतिक प्रगति के लिए।
पर दोनों एक तरह से साथ जा रहे थे। पर ज़ैसे विज्ञान के दोरा थोड़ी प्रगति होने लग गई, और लोग इस जगत को ही कुछ अच्छा बनाने लग गए। तो फिर उनको लगने लगा कि ये दूसर जगत में जाने के जुरूरत क्या है।
और दूसर जगत को उन्होंने कलपना बना दिया। कलपना मानने लग गया। तो भी आजकल अधिकांच लोग इसी भाव में होते हैं कि दूसर जगत के बारे में जाधा कुछ विचार करते ही नहीं हैं वो।
हमको यहां पे ही रहना है। वो क्या बहुत पहले एक हिंदी गाना था जीना यहां, मरना यहां। वैसे वो भाव हो गया है कि हमको यहां पे रहना है, यहां पे मरना है, इसके पिना और कुछ है यह भी जगत।
तो यह जो भाव है, अभी इस भाव से लोग जीते हैं तो अधिकांच लोग क्या हो रहे हैं? खास करके उनिसवे और बीसवे शताबती में विज्ञान और तंत्रज्ञान का बहुत प्रमिस था कि हम, हमें एक आध्यात्मिक स्वर्ग के ओर जाना के कोई ज़रूत नहीं है क्योंंकि हम एक तंत्रज्ञान के द्वारा इस जगत में स्वर्ग बना देगें वो भाव था पर बीसवे शताबती में दो बहुत घनगोर युदद हुये पहला विश्व महाव युद्द, दुसरा महाव विश्व महाव युद्ध और ये बीसवे शताबती में वास्तप में जो युद्ध में जितने लोग मारे गाय है उतने पूरे पिछले 19 शतापदियों में मिलके नहीं मारे गये थे।
और खास करके जब अनुबाम का यूज हुआ जैपान के उपर अमेरिका के द्वारा, तब जो तंत्रज्ञान के द्वारा हम एक स्वर्ग इस भोते जगत पर लायेगे, उसका जो एसे फुगा था, बबल था, वो बर्स्ट हो गया। अभी इसका मतलब यह नहीं कि लोग अभी भी तंत्रज्ञान के पिछे भागते नहीं हैं। तंत्रज्ञान, कोई भी नया फोन आता है, नया टीवी आता है, नया कंप्यूटर आता है, तो उसका बहुत भारा, बहुत ग्लैमर होता है उसका, बहुत गुणगान जैसे होता है।
पर फिर भी, आजकल भी तंत्रज्ञान से अधिकांच लोग क्या होगे? कि उससे ऐसे आशा है, कि हम हमारे जीवन को बहतर बनाएगे। इस जगत को बहतर बनाएगे कि नहीं पता नहीं हमको।
टेकनलोजी विल मेक आवर लाइफ बेटर। क्या वो दुन्या को और अच्छा बनाएगे है, वो किसी को पता नहीं है। क्योंंकि दुन्या में इतनी सारी समस्या आये हैं और कई समस्या तंत्रज्ञान के कारण ही आयी है।
तो यह जो भाव है कि हम भौतिक प्रगती करेंगे। यह काफी हद तक चल रहा है, पर आजकल तंत्रज्ञान की प्रगती सबसे अधिक भौतिक जगत से कालपनिक जगत में लोगों को ले जाने के लिए हो रही है। अगर एक हजार साल बाद, कोई अर्कियोलोजिस्स होते है, जो लोग पहले के लोग कैसे रहा करते थे, उसके बारे में संशोधन करते है, अगर वैसे कोई थे, एक हजार साल बाद, कोई बिस्वीक, किस शताबदी में, लोग कैसे रहते थे, वो दून रहे हैं।
तो उस समय क्या मॉल्यवान चीज थी, टिस हजार साल पहले, किसी के बास कोई सोने का मटका था, ऐसे कुछ वो दूनते हैं, आर्टिफैक्ट। तो अगर हम, अगर कोई देखेगा कि बिस्वीक, किस शताबदी में, सबसे, सबसे कीम्ती चीज, सबसे महंगी चीज, और सबसे प्रचलित चीज, ऐसी क्या है, जो लोग, उसको इस्तमाल करते हैं। तो महंगी प्रचलित चीज, और महंगी प्रचलित चीज, 21st सेंचियूरी के लिए, मूवीज होगा।
जो मूवी होते हैं, अभी कभी कभी एक मूवी के लिए, करोडो करोडो रुपए खर्ष हो जाते हैं। और कितने सारे मूवी बनते रहते हैं। अभी करोडो रुपए में तो बहुत कुछ बन सकता है।
और आजकल जो आनिमेशन या हाई एफेक्स यूज करते हैं, मूवीज बनाते हैं, उसमें करोडो करोडो रुपए नहीं, करोडो करोडो डॉलर्स भी खर्ष हो जाते हैं। तो अभी ये इतना जो महेंगा, इतना पैसा, मनुरंजन ये मानो समाज में हमेशा रहा है, पर यह जो भाव है कि, मनुरंजन के पैसे पिछे इतना पैसा खर्च करना, और इतना पैसा खर्च कर के, क्या करना है, की एक है कि आप सत्य को और अच्छा बनाओ, की मोह को और अच्छा बनाने के लिए पैसा कर्च करना, ये कुछ अलग ही शीज है, मेरा अमेरिका में मैं एक लेक्शर था, अमरिका इस्टिटूट वा इलूजिन।
जैसे इंडियन इस्टिटूट वा टेकलोजी होता है, वैसे अमरिका का इंस्टिटूट का क्या होगा? संस्ता। तो अमरिका की मोह की संस्ता।
अमरिका इस्टिटूट वा इलूजिन। इलूजिन मतलब क्या? वो पूरा है कि… कैसे हम इसको… वो बिसिकली फिल्म टेकलोजी है, पुना में एफटी आया जैसे है, वैसा है वो. तो अभी ये भाव क्या है, इसकी विचार धारा क्या है?
कि सब लोग इस्विकार करते हैं कि ये भौतिक जगत, ये एक सन्तुष्टी देने वाला जगह नहीं है, पर इसके बारे में हम क्या करें? अगर यहाँ पर सन्तुष्टी नहीं मिल रही है, तो क्या करें? अभी इस भौतिक जगत को और अच्छा करना है, तो उसको काफी मेहनत लगती है, और शायद वो अच्छा होगा भी या नहीं भी अच्छा होगा. मैंने पास एक छोटा घर है, मुझे बड़ा घर चाहिए, अभी कब मैं इतना पैसा कमाँगा, जिसे कि मैं बड़ा घर ला पाऊंगा?
वो नहीं हो सकता है, तो मैं एक टीवी पर मुझे देखता हूँ, जिसमें जो हीरो है, उसका एक बहुत बड़ा घर है, और फिर मैं कलपना करता हूँ कि मैं वो हीरो हूँ, और मैं इस घर में रह रहा हूँ. तो अभी मोह जो है, यह हमेंशा एक तरह से, मोह की निर्मिति करना सत्य की निर्मिति करने से आसान है। क्योंंकि केवा आसान है, कrelated पने मोह हम हमेंने कलपना से निर्मान करते है तरऄ सत्य है हमें बेहवारिक रूक से बड़ी मेहनत करने पड़ी हैं. तो ये 3 चीज़ पटाया जी जी भौतिक सथ्य है, मोह हो है और आध्यातिक सथ्य है तो आजकल के समाज में अधिकांच शक्ति कहा जा रही है या तो इस भौतिक संदिन को अच्छा करें, या उसे अधिक क्या है इस भोती जगत से राहत प्राप्त करने के जो मोह बना रहे हैं उस मोह को अच्छा करें।
पर वास्तव में इससे क्या होता है? लोग सत्य से और दूर चले जाते हैं। आध्यात्मिक सत्य से दूर जाही रहे हैं पर भोतिक सत्य से भी दूर जाही रहे हैं।
तो श्रिमत भागोतं के इसी दश्यमसकंद में यह जो है मोहन निर्मान करना और मोहन निर्मान करने से कैसे व्यक्ति स्वयम मोहित हो जाता है इसके बारे में सुन्दर वृत्तांत आता है और वृत्तांत है वो ब्रह्म वि मोहन निला का अभी यह श्रिमत भागोतं के दश्यमसकंद के चोदवे अध्याय में अधगाण शुरुप चे आता है 13-14 अध्याय में तभी यहां पर क्या हो रहा है भागोतं का दशंसकन्त जो है, उसमें एक विशेश सौणदर्य है। और वो सौनदर्य क्या है? कि उसमें भगवान करिष्ण के वृंदावन की लीला का वरणन है।
और जब यह वृंदावन की लीला का वरणन हो रहा है, तो एक तरह से वो भगवान के मिठास का वरणन है। कैसे भगवान कितने मधूर लीला करते हैं। क्योंंकि मधूरता का वरणन है।
पर कभी-कभी हम उस मधूरता में रहते रहते हैं, यह भूल जाय सकते है कि वास्तव में यह भगवान है। तो इसलिए तशंसकंड में बार-बार हमें भगवान की मधूर लीला बताते हुए, ऐसी लीलाओं का भी वरणन आता है, कि जिससे भगवान की महिमा का भी वरणन आता है। भगवान को समझने के लिए दो चीज़ें हमें समझने के लिए हैं, उनका ग्रेटनेस और उनका स्वीटनेस, उनकी महिमा और उनकी मधूरता, तो खास करें भागवतम के शंसकंड में उनकी मधूरता का वरण है, पर साथ-साथ उनकी महिमा का भी वरण आता है।
तो अभी जब यहां पर ऐसे बताये गया है, कोई वेक्ति, जो है, जैसे अंध्यधनिश्य को कालपनिक मान लेते हैं, वैसे वो भगवान को भी एक कालपना मान सकता है, कि यह कोई कृष्ण है, यह कालपनिक को, किसी कवी ने बना यह कहानी है, और वैसे सोचके वो, अभी क्रिष्ना इन थी स्थरों में यहाँ प रहे हैं, आध्यात्मक स्थर में थे। पर कोविग व्यक्ती उन्हों क्या सरता क्या। जब क्रिष्ना इस बव्तिक जगत में भी आते हैं।
तो कोई व्यक्ति उनको समझ सकता है कि ये तो इस बोतिक जगत के नहीं है। तो कहां के हो गए? यहां के हो गए।
वो एक कलपना की उत्पत्ती है। तो अभी जब कृष्णवंदान में लीला कर रहे होते हैं, तो कई बड़े-बड़े असुरों का वो बड़े आसानी से वध कर देते हैं। जब ऐसा जब वध कर देते हैं वो, तो सारे देवी-देवता भी आश्चर चेकित हो जाते हैं।
और खास करते जब अगहासुर का वद होता है, तो फिर उससे वे बड़े ही आश्चर चेकित हो जाते हैं। सब आश्चर चेकित हो जाते हैं और उनसे सबसे अधिक ब्रह्माजिया का आश्चर चेकित हो जाते हैं। और जब ब्रह्माजिया से आश्चर चेकित हो जाते हैं, तो तभी वे विचार करते हैं कि, यह कौन है बालक?
और जब वो आके देखते हैं, कि यह बालक तो एक चोटा सा मासुम बालब जैसे ही है, और यह तो खेल रहा है, और उस समय क्रिश्णु क्या कर रहे होते हैं? वह अपने सारे मित्रों के साथ खाना कहा रहे होते हैं। और जब खाना कह रहे होते हैं, तो कौन करते हैं, कभी।
mentioned that sometimes he सिर्फ करे रहा है, कार्य सा के दुबे प्रमाय के साथ कर रहे हैं। तो भी ब्रंमाजी रशोनत होते है, कि यह भगवान कैसे हो सकते हैं? भगवान को तो हम सहस्रशीरिश पुरुशः हम बड़े पूजा के साथ उनको भोग लगाते हैं।
तो यह भगवान नहीं हो सकते हैं। और यह सोचके फिर वो क्या करते हैं? यह भगवान नहीं है, मैं इनकी कुछ परिक्षा करता हूं।
अ will he make it? तो वो भगवान के प्रिक्षा कर लगे हैं। तो वो क्या करते है?
फिर घौलो को दूर लगे हैं। अ भी, जानवरों में बी इतना छारा करता है। हम मानवों में स्वविच्चा होती है जानवर में।
घौर दिज़ें। वो गर घास खा रहे हंँ एक जिकमवें हना खा लिया तो इसके बाद ने उनके बाये हात में जो घास है उनके आंडाय आत में जो घास है जो खा सकुं दे अब कौन क्हाएगे यह उनके स्विद्शायं पर निर्भर अभी गहास सामने है, तो गाय ये नहीं सोच सकती कि आज एकादश्य है, आज मैं गहास नहीं खाओंगे। तो वो स्वेच्चा उनके पास नहीं है।
क्या है कि आणिमल्स कें चूज हाँ तो फूल्फिल देर बयालोजिकल इंस्टिंक्स। ज़हårt जानवर तिंता हे कि कैजे मैं उन्हीं पूर्ति करूँ। मानवये सुनात कर सकते हैं कि क्या मुझे इंडियतार तीय करनी चाहते हैं??
करनी है या नहीं। तो जो स्वेच्छा की मात्रा है मानवों में वो जानवरों से काफ़ी अधिक है। पर तो अभी गईयां घास खा रहे होते हैं जहाँपर घास ख़तम हो जाता है तो तभी ब्रह्माजी ऐसा मोह निर्मान करते है कि वो गईयों को लगता है कि यहां का जो घास है वो इतना अच्छा नहीं है और वहाँ पर जो घास है बड़ा अच्छा है और इससे वहाँ पर पहुँझ जाते हैं वो तो वहाँ पर थोड़ा घास खाते है पर ब्रह्माजी ऐसा मोह निर्मान करते है कि यहां पर भी इतना अच्छा नहीं है वहाँ पर और अच्छा है और ऐसे ही घास के खोज में वो गईयां किर्षने के साथ ही होती है, सामना ही होती है पर वहाँ से दूर चल जाते है और किर्षने और गौले बात कर रहे होते हैं और जब बात कर रहे होते हैं कभी-कभी होता है ऐसे कि चोटे बच्चे बड़े नठकड होते हैं माँ कुछ काम कर रही है और फिर बच्चा कोई लेटा हुआ है, कुछ खेल रहा है और एक-दो मिनिट के लिए माँ कोई इदर देखती है, उदर देखती है कहा चला गया?
तो भी एक गईया जो होती है वो एक-दो से नटखट होती है, पर यहाँ पर यह नटखटा होती है, केवल नटखटा के कारण वो दूर नहीं चले जाते है, यहाँ पर क्या होता है अगर बच्चे खेलते वो इधर चले जाएगे पर कोई बच्चे को बोलता है मैं तुमको चॉकलेट देता हूँ और वो चॉकलेट को दिखाते दिखाते वो बच्चे को दूर ले जाते हैं तो बच्चा अपने खेल-कुछ भी थोड़ा बहुत दूर चले जाएगा पर वो चॉकलेट के मोह से जाये पर वो चॉकलेट के मोह से दूर चले जाएगा वो भोजन पान करे और वो उसके सेवा भाव में होते हैं क्रिश्न करे, मैं धूनता हूँ तो फिर वो धूनने निकलते हैं और धूनते, धूनते, धूनते और जाते हैं काफी दूर चले जाते हैं पर कहीं भी उनको गया दिखते नहीं है और फिर वो जब वापस आते है तो क्या होता है उस समय ते एक ब्रह्माजी ने पना मोह इदर भी कर लिया है और ब्रह्माजी मोह क्या करते है वो सारे गाले जो होते हैं उनको सुला देते हैं और फिर सुला कर अपनी शक्ति के द्वारा वो उनको एक गुफा में छिपा जाते हैं तो अभी यहां क्या किया है उन्होंने व्रिंदावन में ब्रह्माजी ने एक मोह कर दिया है अभी ब्रह्माजी जो है एक तरह से वह वह एक देवता है एक तरह से देवताओं के देवताओंमें सबसे वरिष्ट देवता है वह और देवताओं कि जो फरिशानी भी होती है तो वह उन्के पास जाते हैं तो ब्रह्माजी जो होते है जब वो इस प्रकार का मोह निर्मान करते है तो हम एक कह सकते है महा होता है.. mamaa hota hai.. मौख़ो भी अलग अलग परिकार का हो सकता है।
mamahoh bhi alag alag prakaar ka hansahté hawan. सात्विक मोहो हो सकता है sātvik maahoh ho sakta hai राजसिक मोहा वो सकता है rājasik māhah wo sakta hain तामसिक मौहा ऊज हो सकता है। tamasik māhah ho saktá hai. जिसे थोड़ा हमको हमारे जीवन को अच्छे मुल्य सिखने को मिलते हैं तो वो एक सात्विक मोह होता है तो अभी हमने तीन चीज़े बताये कि यह हमारी भौतिक जगत है, यह आध्यात्मिक जगत है और यह कालपनिक जगत है तो इस दुष्टी से जब बताते हैं हम तो क्या है, कालपनिक और आध्यात्मिक बहुत दूर हैं, विपरीत हैं पर वास्तों में यह ऐसे ज़रूरी नहीं है यह ऐसे हो सकता है कि कलपना से से हम भगवान के पास जा सकते हैं Reality is not a product of imagination, but reality leaves a lot of room for imagination कि सत्य यह है, कलपना की उत्पत्य नहीं है मतलब परम सत्य आध्यात्मि जगत भगवान यह परम सत्य है, कुछ कलपना की निर्मिति नहीं है पर सत्य की ओर पहुशने के लिए हम कलपना का इस्तमाल कर सकते हैं तो अभी जब हम क्रिष्ण लीला पर कुछ नातक करते हैं हमारे संप्रदाई, गौडिया वैश्ण संप्रदाई में, जो है नाठ्य पर बहुत जोर दिया गया अगर आप चेतनी चर्टांमुत पढ़ते हैं, खास कर कि उसके अंत लीला तो उसमें कई बारे से वर्णा आता है, चेतनी महापुरों के पारशित कह रहे है कि जो भक्त है, वो नाठ्य और काविय में बड़ी निपुन होते हैं जब चेतनी महापुरों 500 साल पहले जब आये थे तो उस समय बेंगाल में नाठ्य और काविय बहुत प्रचलित था तो चेतनी महापुरों और उनके भक्तों ने क्या किया जो कलपना का माध्यम उस समय बड़ा प्रचलित था उसका इस्तमाल किया क्या करने के लिए भगवान का गुंगान करने के लिए भगवान की अनुभूती देने के लिए और हमारे आचारियों ने कई नाठक लिखे हैं चेतनी चंद्रोदाय नाठक है लितमाधव, विदक्दमाधव और ऐसे अनेक नाठक है और नाठक किस तरह से लिखने हैं इसके भी नियम होते हैं तो इसको एक नाठक चेतनी का नामा ग्रंथ है उसमें रुपोको स्वामें लिखा है बल्देविद्याविशनी उसमें और इसतारत वर्णन किया है और इसमें भाव क्या है कि साधारन्ते आजब कोई कोई सात्विक ग्रंथ लिखता है सात्विक मोह के निर्मिती करता है असे कहते है फिक्षन इसे अन्रियालिटी जो आपको बेटर अंडर्स्टेंडिंग का रियालिटी करता है क्या है आच्छा फिख्षन कोई अच्छे कादमबरी खलपना होती है पर वो ऐसी खलपना होती है जो आपको सत्य की और अच्छे समयच दिलाते हैं क्या क्योंं अच्छी समयच दिलाते है इसी है कि जिस बहुतीः जगत में जो जिवन हँता है वह तो अधिकांच रूप से कुछ ज़्यादा रुचकर नहीं होता है, बोरिंग होता है।
अगर मान लिएज़े कोई आप से कहता है कि आप सुभाए से राज तक जो भी कारे करते हैं, उसका हम वीडियो रेकॉर्डिंग करते हैं। और इस 24 गंटे आपने जो कारे किया है, वो अगले दिन आप बैठ के देखो। तो खुद नहीं, पिछले दिन क्या किया, वो देखते बैठेगे तो हम बोर हो जाएगे।
क्या हमारा खुद का भी जीवन इतना इंट्रेस्टी नहीं होता है कि हम उसका दिन बर उसके बारे में चिंदन कर सकें। तो क्या होता है कि एडिटिंग जब करते हैं, आप लिखते हैं तो एडिटिंग करते हैं, एडिटिंग को हिंदे में क्या बोलते हैं? संपादक, एडिटर होता है, पर ठीक है, एडिटिंग, एक्सपर्ट एडिटिंग, मेंज़ करने के लिए पेजेज़ के लिए रीडरों करने के लिए स्किप करते हैं।
अच्छा संपादक कौन होता है? वह सारे पन्नों को निकाल देता है, जो पढ़ने वाले हैं, जो उनको स्किप करेंगे, जो नहीं पढ़ेंगे। तो क्या, जो फिक्शन है, उसमें क्या होता है?
लोगों का पूरे जीवन का वर्णन नहीं होता है। जो जीवन के इंटरेस्टिंग शीज़े हैं, उनका वर्णन होता है। और उसके कारण, यह अन्ड रियालिटी है, क्योंंकि सबका जीवन ऐसा नहीं होता है, पर यह अन् पूरे जीवन का वर्णन नहीं होता है।
तो यह जो है, यह जो, जो एक अच्छी कादंबर लिखते हैं, उसके दौरा मोह होता है, पर मोह से सत्य की और अच्छी समझ हमें आती हैं। और यह जो भाव है, यह भोतिक सत्य के यह जागो लागो होता है, पर यह आध्यात्मिक सत्य के लिए लागो होता है। अभी जब हम भगवान के विगरहों का अभोशन करते हैं, तो क्या भगवान आध्यात्मिक जगत में बिलौकुल ज़यहमने यहां पे सुशोबित किया है वैसे ही है, अभी भगवान असीमित है।
अद्वैतम अच्छुतमनादिम अनन्तरूपम। अनन्तरूपम। उनकी अनन्तरूप है।
और भागवतम में एक संदर्शलोग आता है, ब्रह्माजी के प्रार्थनाव में ही, दशब सकंद में नहीं, तीसर सकंद में, यद्यद्धियात उरुगाय विभावयंति, तत्तद्वपूप्रणियसे सद अनुग्रहाय। यद्यद्धियात उरुगाय विभावयंति, आपका चिंदन करते हैं, आप उसी रूप में उनके सामने परखित होते हैं। प्राभौपाजी के प्राभौपाजी के प्रार्थन में कहते है कि बक्त को कलपना करने चयीए, कि उनके रुदे में एक महल है और उस महल में एक सिमहासैन है और उस सिमहासइन पह उन्हें भगवान को विराजमान करना है. और फिर भगवान कहते हैnh você shouldn’t imagine like this,but know that it’s not imagination. ऐसे आप ख़लपना कर店भ़ी ये ख़लपना नहीं हैं. क्योंं ये ख़लपना नहीं है?
वास्तो में एक कenseful सेकल्पना ही है, काल्पनिक स्最क्टीि स् आस्थमाल करके आम जन यह से विचार कर रहे हैं पर यह क्या है? यह ऐसी कल्पना है, जो हमें आध्यात्मीक स्स्त्य को ले जा रहे है। अभी ऐसी कलपन हो सकती है, जो हमें अध्यात्मिक सत्य से दूर मिले जा सकती है. तवर जब ब्रह्मा जी मोह निर्मान करते है, तो उनका मोह ऐसे होता है क्योंंकि वे खुद सत्वकुण में है, तो वो जब मोह निर्मान करते हैं, तो उनका मोह भी एक तरसे सात्विक होता है।
तो उस मोह में क्या करते हैं? वह गौलो और बच्चियों को दूर भेजेते हैं। वो दूर ले जाते हैं।
और फिर क्रिष्णा देखते है, क्या हो गए यहाँ पह। तो अभी क्या होता है, कि इस भौतिक जगत में जो मोह निर्मान होते हैं, अलग-अलग प्रकार के मोह हो सकते हैं। एक है कि भौतिक जगत में कोई बुद्धिमान व्यक्ति होते हैं, वो मोह निर्मान कर सकते हैं।
अभी कोई भी मूवी हो, तामसिक मूवी बनाना है, तो तामसिक मूवी बनाने के लिए भी बुद्धिमात्ता लगती है। क्योंं क्या होगा, अगर वो बुद्धिमत्ता से नहीं बनाया है, तो वो मोह से भी लोग बोर हो जाएगे। कई बार जब मूवी होता है, वो फ्लॉप हो जाता है।
मतलब क्या है, ये मोह अच्छा नहीं था। ये मोह इतना अच्छा नहीं था, कि आमको देखने में कुछ उची नहीं है। तो अभी मोह की निर्मिती के लिए भी बुद्धिमात्ता लगती है।
तो ब्रह्मा जी ऐसा मोह कर देते है, कि वो बालों को और बच्छलों को पूरा गाया भी कर देते हैं वहाँ से। पर क्या है, सब मोह की निर्मिती करने में भी भगवान सबसे माहिर है। भगवान कहते है, यगर आप बेइमानी करोगे, भगवान ऐसे मोह करता है कि जिससे हो कर दहत।ा थी जो गब्बाला गाय घॉं रह थे।
पर जब ब्रह्मा जी बच्छलों को एगा और जक कता है, यह विसतारित लीला है, पर हम इस तत्वग्यान के दुरिशे से देख रहे हैं, इसलिए पुरी लीला पे वर्णन नहीं करेंगे हम। पर जब वहाँ पे वो वापस आ जाते हैं, ब्रह्मा जी तो देखते है क्या हो गया है यह? अरे यहाँ पे अभी तक यह सब, वो सोचे थे कि मैंने यहाँ पे मोह निर्मान कर दे, सारा उब्द्रो हो गया होगा यहाँ पे, पर वहाँ पे कुछ भी उब्द्रो नहीं होता है, से मान लिजिये, अच्छल कश्मीर में बड़ा चिंता हो रही है, महाँ पे कुछ आतंखवादी आकरमन करने वाले हैं, या कुछ हो रहा है, तो बड़ी चिंता है वहाँ पे, मालिजिये कोई आतंखवादी है, कोई किसे गगबे बम्ब लगा लेता है, और वो टाइम बाम्ब है, और वहाने जानते है, कि वहां पे एक विश्पोट खोजा होजाएगा।
तर पर किमीलान ठित्रवं्स करें। और काम में निज्द नहीं होता, तब आपनि येगरता होते हैं। जब Speaker जब कुछ कोई विश्च रखना जाता हैं, और वो डिस्टर्ब नहीं होता है, तो क्या होता है?
हम डिस्टर्ब हो जाते हैं उससे. किछ होगा क्योंं नहीं यहाँ पह? आप बटन दबाते हैं, वहाँ पर बॉम विस्पोड होना है, बॉम विस्पोड होते हैं, अरे क्या हो गया? तो वैसे ही क्या होता है?
ब्रह्मा जी वहाँ पर वो डिस्टर्बन्स करना जाते हैं, और कुछ भी डिस्टर्बन्स नहीं होई. सब बच्चडे और गॉले बिल्कुल वैसे के वैसे ही वहीं पह. यह देखे क्या होता है? ब्रह्मा जी डिस्टर हो जाते हैं, अरे क्या हो गया यह? और फिर जब ऐसे कोई बंब का विस्पोर्ट नहीं हुआ है, तो किसे ने बंब निकाल दिया है, यह क्या हो गया?
तो ऐसे ब्रह्मा जी विच्छित होके देख रहे होते हैं, और तभी भगवान क्या करते हैं? कि कृष्णा यूजिस एन इलूजिन, विदिन एन इलूजिन, तो कृष्णा विच्छित करते हैं. क्या हुआ है? ब्रह्मा जी ने एक मोह निर्मान किया है, कि सारे गौलों को वो दूर ले जाते हैं, तो वो सारे गौलों को दूर ले के गए है, उसमें कृष्णा एक मोह बनाते है, कि सारे गौलों को वो दूर ले जाते हैं, और फिर विदिन एन इलूजिन है, मोह के अंदर एक मोह है, उसमें वो क्या करते हैं?
उसमें वो खुद को प्रकट करते हैं, और वो दिखाते है, कि सारे जो बच्चड़े और गौले हैं, वो वास्तव में उनके विस्तारित रूप हैं. पर यहाँ पर एक विशेजि बात है, क्या करते हैं? कृष्णा जो विस्तार करते हैं, तो ऐसे नहीं दिखाते है, कि वें इसाब कृष्ण के वि पूजा वगएरे करते थे वो, वो विष्णु के पूजा करते थे, विष्णु के याशना करते थे, जब भी समस्या होती थी, तो विष्णु के याशना करते थे. तो उनको जो भगवान की महिमा और एश्वर्यक्या दर्शन था, वो विष्णु के रूप में था। तो अभी यहाँ पे जब वो देखते हैं कि सारे विश्ण मूर्थी क्रिष्ण से आ रही है एते चाम्शः कलहः पुम्स क्रिष्णस्तु भगवान इंद्रारि व्याकुलम् लोकम् बुर्दयंति युगे युगे क्रिष्णस्तु भगवान स्वयं कि क्रिष्ण ही सारे अवतारों के स्तोत है वो अवतार ही है जब यह देखते हैं ब्रह्माजी तो ब्रह्माजी पहले तो बिल्कुल मोहित हो जाते हैं यह क्या हो रहे हैं वो कुछ समझ में नहीं आता है पहले और फिर जब उनको समझ में आता है तो फिर वो भगवान के सामने आखी गिर जाते हैं और भगवान को प्रार्थनायारपन करते हैं और जब भगवान को प्रार्थनायारपन करते हैं उसमें पहले वो भगवान की महिमा का वानन करते है फिर भाव में वंदावन की मधुरता का वानन करते हैं फिर याचना करते है कि हे प्रभो कुरपया आप मुझे आपके इस वंदावन में कुछ थान दे दिजे ये सारे व्रजवासी इतने महान है कुरपया मुझे इनके चरन कमलो का रज की मुझे याचना है कि याचना करता हूँ तो यहाँ पर क्या होता है कि ब्रह्माजी एक मोह निर्मान करते है पर भगवान उससे बड़ा मोह निर्मान करते है और इस मोह में क्या करते है वो परम सत्य का दर्शन कराते है तो हमारे सबके जीवन में एक तरफ तो हम सब इस से राहत चाहते हैं तो अधिकांच जगत क्या है यहाँ से ऐसी कलपना के ओर जा रहा है जो सत्य से उन्हें दूर ले जाता है पर जब हम भकती में आते हैं और भकती के कारे जब हम करते हैं तो हमें उसी कलपना की शक्ति को इस्तमाल करना है पर इस तरह से इस्तमाल करना है कि हमें वो कलपना सत्य के ओर ले जाया कि कलपना सत्य के ओर ले जाया मतलब क्या?
कि भकती मतलब केवल आके मंदिर में आके भगवान का जब करना या भगवान की पूजा करना ऐसे नहीं है तो जब भगवान का शिंगार करते हैं तो इतनी सुन्दर्ता से वो शिंगार करना है कि उससे हमारा मन, उससे हमारा रुदे उनके ओर आकरशित हो जाये जब भगवान की अभी जनमाश्टमे आ रहे हैं तो हम कुछ नाटक करते हैं तो जब नाटक करते हैं वो इतना अच्छी से करना है कि हमारा चेतना भगवान चेले जाये जब हम भगवान की कथा सुनते हैं भगवान की कथा तो आजुन करते हैं तो इस तरह से करना है कि हम उसमें आकरशित हो जाये हमारा मन उसमें लग जाये तो इसके लिए दो चीज़े आते हैं जिसके साथ मैं अंध करूँगा कि अभी हमारी चेतना इस भोतिक जगत में है और भोतिक जगत से हमको आध्यात्मी जगत के चेतना को ले जाना है तो इस चेतना जो है हम अभी इस भोतिक जगत में कई चीज़ों से आकरचित हो सकते हैं कुछ आशा हो सकते है कि मुझे यह भोतिक जगत को यह अच्छा बनाना है मुझे अच्छा घर चाहिए और अच्छी नौकरी चाहिए और अच्छा यह एक चीज़े करनी है अभी यह एक स्वाभाविक इच्छा है ऐसे नहीं कि उसको पूरा त्यागना है और हम सबको इस भोतिक जगत से राहत के लिए कुछ हम चाहते हैं तो हमें हम जो भी कर रहे हैं वो इस तरह से करना है कि हमारे चेतना भगवान की ओर प्रगतिशील रहे और यह भगवान की ओर हमें जो हमारे चेतना जाती है वो दो पद्धते जाती है स्मृति और स्पूर्ति स्मृति मतलब क्या स्मृति is conscientious recollection स्पूर्ति is spontaneous recollection स्मृति मतलब क्या है हम प्रयास करके भगवान के बारे में विचार करते हैं हम प्रयास करके भगवान पर चिंतन करते हैं तो हम जब-जब करने का प्रयास करते हैं तो मन लगता नहीं है पर हम मन लगाने का प्रयास करते हैं इधर-उधर मन सब भागता है पर उसको लाते हैं हम स्मृति है यह साधना भक्ति की पढ़ान विदी है स्मर्थव्य सततं विष्णु स्मर्थव्य नजात चेत आप सदई भी भगवान का प्रयास करने का प्रयास को और भगवान को नभूलो पर जब हम इस तरह से कर रहे होते हैं साधना भक्ति तो जो स्मृति है वो एसेंडिंग होती है स्मृति मतलब हम प्रयास करके भगवान का स्मर्ण करते हैं पर जो स्मृति होती है वो भगवान के कुरुपा से आ जाती है कभी कभी हम जब करते है तो कभी कभी जब में इतना मन लग जाता है कि ऐसे लगता है कि जब कभी खतम ही नहो और कभी कभी ऐसे होता है जब करते है लगता है कि जब कभी खतम ही नहीं होता है तो क्या होता है जब ऐसे लगता है जब कभी खतम ही नहीं होता है मतलब तभी क्या है हमें प्रयास करना है यतो यतो निष्चेति मनस्चंचलमस्थिरम् ततस्ततो नियम्येतत आत्मन्येवश्यम्नेय जहां भी बन भागता है उसको भगवान में लगाओ पर हम सबको भी कभी कभी ऐसे अनुभव होता है कि भगवान की कृपास से हम उनके स्मृति में एक तरह से मगन हो जाते हैं हम शायद दर्शन करने आते हैं पर कभी कभी दर्शन करते हैं तो इतना आकरशक रहता है भगवान का दर्शन कि हम कभी सबकुछ भूल जाते हैं हम कीरतन करते हैं पर कभी कभी कीरतन में ऐसा मन लग जाता है कुछ एक अलगी अनुभूति हो रही है तो यह जो अलगी अनुभूति है जब हम साधना भक्ति कर रहे होते हैं तो शायद 99.99% 99.99% 99.99% जो होती है वो हमको अलगी अनुभूति करनी पड़ती है तो प्रयास करना पड़ता है पर कभी कभी ऐसा एक अलग आ जाती है कि तब मन भगवान में लग जाता है वो क्या है स्पूर्थी है और तभी हमें प्रयास नहीं करना बढ़ता है तभी अपने आप मन भगवान हो जा जाता है और तभी क्या होता है बड़े दिव्य आनंद की दिव्य शांति की दिव्य भावनाओं के अनुभूती होती है और जैसे हम प्रगती करते रहते हैं जैसे शुद्ध होते रहते हैं तो क्या होता है धीरे धीरे जो है स्पूर्थी की मातरा कम हो जाएगी स्पूर्थी की मातरा बढ़ जाएगी प्रयास तो हमेशा ही करते रहना परते हैं जो दिव्य आनंद होता है उसकी शुरुवात कैसे होती है यत तद अग्रे विश्यमिव परिणामे अम्रुतो पमं पहले जो होता है उसमें एक विश्च की समान होता है पर बाद में अम्रुत आता है पहले विश्च की होता है क्योंंकि मन लगता नहीं है भगवान में हम लगा रहे हैं भगवान में पर सो हजार चीजे उससे और आकरशक हमको लगती है तो फिर भी हमको मन लगाना है तो वो प्रयास है जहांपे मन भाग रहा है उससे हम मन भगवान में लगाते हैं यह एक प्रयास है और यह जहर के समान लगता है पर क्या होता है जितना हम प्रयास करते है तो उतना वो अम्शुद्ध हो जाते हैं फिर यह जहर की मातरा कम होने लगती है और अम्रुत और अधिक हम आसानी से महसूस कर सकते हैं अधिक मातरा में अधिक समय तक महसूस कर सकते हैं और फिर जो हम शुद्ध हो जाते हैं तो तभी क्या होता है यह अत्यत्दग्रे विश्व में वो परिणामे अम्रुतमम् नहीं रहता है जैतन महापुर्य से बताया है पूर्णामृता स्वाधनम् कि यह से पहले जहर और फिर अम्रुत नहीं पर हमें ही शाही अम्रुत उस तिति पे जब हम आते है तभी सुसुखम करतमा हुए है पूर्णामृता स्वाधनम् तभी जो है इस भोतिक जगत में भी हम आध्यात्मिक अनुभूति सदाइव कर सकते हैं।
और उस तर पर अगर हम आ जाते हैं तो उस तर से आध्यात्मी जगत के प्राप्ती केवल काल से हमें फ़रक रहता है। अलड़ी हम आध्यात्मी चेतना में आ गए हैं और आध्यात्मी जगत के प्राप्ती जरूर हमें हो जाएगे। तो अभी हम इस भौतिक जगत में हैं पर अगर हम स्मृति करते रहेंगे भगवान की हमने को स्मृति करनी है हम अमरे कलपना का इस्त्माल करके भगवान की स्मृति कर सकते हैं हमारे भौतिक जगत को परिवर्तित करके भगवान की स्मृति को बढ़ा सकते हैं हमारा घर है पर घर में जितने हम भगवान की चित्र रह सकते हैं भगवान का खिरतन रख सकते हैं तो इस भौतिक जगत को भी हम परिवर्तित करते हैं जिससे की भगवान की स्मृति बढ़ सके कलपना हमारे क्रियेटिविटी रचनात्मकता है उसको भी इसत्माल करते है जिससे भी हम हमारे चेतना भगवान के ओर लेते हैं और अंत में भगवान हमारे चेतना को उपर खा लेते हैं जो मेझ में मन लगाते हैं उनको मैं खुद उद्धार कर लेता हूँ भगवान कहते है तो सारांश में आज हैं चर्चा की किस तरह से कि कलपना और सत्य में क्या सम्मंद है जो यहां पर शलोक बताय गया है यह निसरगी की दुरिश्टी से आध्यातनीक शक्ति के ओर कैसे प्रगति कर सकते है उसका वर्णन है और यहां पर एक ऐसा उधारन दिया है जो कालपनीक लग सकता है पर वह एक आध्यातनीक उधारन है जैसे हमको बालिश में इंद्र धनुशे दिखता है जो जिसमें कोई धागा नहीं है वैसे ही इस भोती जगत में भगवान परड़ोते है पर भगवान तीन गुणों से परे है जैसे धागे के बिना कोई धनुशे काम नहीं कर सकता है वैसे ही तीन गुणों के बिना कोई भी व्यक्ति का आस्तव नहीं हो सकता है तीन गुणों का दो अर्था होते है जो रस्य हमें बानते है और जो मूल तत्व है इस भोती जगत की निर्मिती के लिए जैसे कोई टीवी पर कोई देख रहा है जो तीन रंग जो होते है वैसे तो यहाँ पर तीन गुणों का उलेक वो तीन रंगों के समान किया गया है टीवी पर यहाँ पर यह उधारण है इसका उद्देश यह नहीं है कि इंद्धनुश्य कालपनिक है और भगवान भी कालपनिक है पर क्या है कि इंद्धनुश्य दिखता है पर जैसे बाकी सब दिखते हैं धनुश्य वैसे नहीं है भगवान दिखते है पर वैसे नहीं है तो उसी पर हमने चर्चा कि किस तरह से कि जो भौतिक जगत कभी भी संतुष्टि प्रदान नहीं करता है इसलिए लोग तीन प्रकार के प्रयास करते इस भौती जगत की संतुष्टि से कि असंतुष्टि पूर्ण सभाव के पतिकार करने के लिए एक है आध्यात्मिक चेतना की प्राप्ति करो आध्यात्मिक जगत की प्राप्ति करो दूसरा है इस भौती जगत को अच्छा बनाओ एक कालपनी जगत की निर्मति करो और वहाँ पे राहत प्राप्ति करो तो जैसे ही वैज्ञानिक और तत्रज्ञानिक प्रकति हुई तो लोगों ने जो आध्यात्मिक जगत है उसको कलपना मान लिया और फिर भौती जगत को और अच्छा बनाने का प्रयास किया पर उसमें काफ़ी समस्या है उससे काफ़ी समस्या आ रही है तो अभी अधिकांश तत्रज्ञान की प्रगति क्या है और अच्छा मोह बनाने में है और एबीस वी केसी सितादी का सबसे महेंगा सबसे महेंगा और सबसे प्रचलित अगर कोई आर्टिफैक्ट होगा तो वो हैं मुवीज होगे तो इतना मोह क्योंं बनाने में लोग लगे हुए हैं क्योंंकि वो भौती जगत संतुष्टि पुराण नहीं करता है और यहां पर जाने के लिए आध्यात्मी के लिए जाने के जानकारे नहीं है तो इसमें जा रहे हैं लोग तो मोह साधारंत है भगवान से हमें दूर ले जाता है पर कल्पना के द्वारा हम भगवान के करीब कैसे आ सकते हैं उसकी बारे में हमने ब्रह्मा भी मोहन लीला के बारे में चर्चा की कैस तरह से ब्रह्मा जी ने एक मोह निर्मयान किया पर भगवान ने उसी मोह का इस्तमाल किया किस लिए ब्रह्मा जी को सत्य दिखाने के लिए तो ब्रह्मा जी का उद्देश एक तरह से भगवान का परिक्षन करना था पर दूसरा भगवान के महिमा दूसरों को दर्शाना था तो भगवान ने उसका ही इस्तमाल किया तो उस तरह से हम भी हमारी कलपना का इस्तमाल कर सकते है भगवान के करीब जाने के लिए किस तरह से हमने देखा कि हमारी कलपना का इस्तमाल करके हम स्मृति कर सकते है भगवान की हम जो भी कारे कर रहे हैं हमारे बहुती जगत में कारे करते हैं हम भगवान की स्मृति करने का प्रयास करते हैं और जब इससे हम स्मृति कर रहे हैं तो जैसे भगवान ने हमारी जो मोह किया था उसके इस्तमाल करके हमें सत्य का दर्शन करा दिया उससे हमारी ही स्मृति में भगवान कभी स्मृति ला देगे स्मृति मतलब हम प्रयास करके भगवान का स्मृति कर देगे स्मृति मतलब भगवान की कुरपा से एक एक बाड के समाल उनके बारे में विचार, उनके बारे भावनाय हमारी चेतना को आपलावित कर देती है और हम दिव्य चेतना, दिव्य आनंद में स्थित हो जाते हैं जैसे हम प्रगती करेगे तो हमारी भगवान की चेतना है उसमें पहले अधिकांच मातरा में स्वूर्ति होगी पर धीरे धीरे स्वूर्ति बढ़ जायेगी जब तक हम साधना भक्ति कर रहे हैं तो स्वूर्ति जादा होती है तो इसलिए पहले जहर, बाद में अमृत होता है पर जितना हम शुद्ध हो जायेगे तो स्वूर्ति की मातरा बढ़ जायेगी और फिर जो वहां पे पूर्णा अमृता स्वाधनम सदैवा अमृत का स्वाधन हम कर सकते है बहुत-बहुत धन्यवाद हरे कृष्णा हरे कृष्णा पूर्वी सर्वे भोन्त सुखिना सर्वे संतु निरामया सर्वे भधरानि पश्चंतु माकश्ची कोई दुखी नहीं हो ये भाव होता है तो इन दोनों का मेल कैसे हम लोग अच्छा सवाल है कि अगर एक तरह से शास्टन बताये गया है कि हमें सब को जगत दुखाले ही है।
जगत दुखाले है तो सब सुखी हो, ये भाव कैसे आता है। ये कैसे है कि distress is a feature of the world, it is not the purpose of the world. कि ये दुख है, ये जगत का एक लक्षन है, जगत का उद्देश नहीं है। और इसका उधारन हम दे सकते है एक अस्पताल।
अभी अस्पताल में सब लोग विमार है, सब लोग एक तरह से पीड़ा में हैं, पर डॉक्टर की इच्छा क्या होती है? सब लोग ठीक हो जाये। दॉक्टर की सब विमार है, सब विमार रहे है, इसी इच्छा नहीं होती है।
कुछ डॉक्टरों के हो सकती है। दॉक्टर की सब लोग एक तरह से पीड़ा में हैं, सब लोग एक तरह से पीड़ा में हैं। प्रहुँजी, कहने के लिए करने के लिए करन जो जीवन माद्ध है और आपको चाहींगा बनना चाहिंगा यह करते हैं चोटे अब यह चाहिंगा क्योंंकि कोई चलाइजीकर जैसे हैं यह में एक बहुत चाहिंगी लाफते हूं, तो आपका अब किसमात होती है हम भक्ति करते हैं, पर कल्यूग में भक्ति बड़ी दुर्लभ है, और भक्ति करते हैं, हमें बड़ी समस्याई आती हैं. कृष्णे मदद तो करते हैं, पर फिर भी हमें संगर्ज करना बढ़ता है, बड़ी मुश्किल होते हैं, तो किस चेतना से हम आगे बढ़ सकते हैं?
कृष्णे मदद तो करते हैं, पर फिर भी हमें संगर्ज करना बढ़ सकते हैं, पर फिर भी हमें संगर्ज करना बढ़ सकते हैं, तो किस चेतना से हमें संगर्ज करना बढ़ सकते हैं, पर फिर भी हमें संगर्ज करना बढ़ सकते हैं, तो किस चेतना से हमें संगर्ज करन नहीं है कि हमें समस्याई आयेंगी या नहीं आयेंगी, पर कुछ हट तक हम चुनाओं कर सकते हैं, कि किस प्रकार की समस्याओं का हम सामना करेंगे. जैसे मतलब क्या है कोई अगर बिमार है तो दर्द तो होने ही वाला है उसको पर अगर वो दवाई ले रहा है, दवाई कड़वी है, कोई सर्जरी कर रहा है, सर्जे से दर्द होता है तो अभी वो भी दर्द ही है, पर वो दर्द ऐसा है जिससे कि वो बिमारी के दर्थ से धीले दिले परे जाएगा।
हमारे जिवं में समस्याई होती है, वो कैसे होती है? कि कुछ ऐसे कुछ… तो पहले में आपके पास पर जाते हैं, फिर महिंदे बोल। कि हमें ज़्यादागाद जाते हैं, हमें अने ज़ीवं के जिवं में कितना पर निर्भर है।
हमें कितना पर निर्भर है। जब वो पूरा समानार्य है, पर एक अश्चितितना उधारण से बोल सकते हूं। कि अगर तुलना करते हैं, एक ऐसे ग्राफ बनाते हैं हम कि ये है प्रोबलेम और प्रोबलेम सॉल्विंग अबिलिटी और ये है टाइम तो हमारे जीवां में समस्याएं जो होती हैं तो अगर कोई समस्या है और उसके वारे में भिचारी नहीं करता है कोई तो फिर वो भी बड़ी बड़ी समस्या है अगर हमारे तब्बे ठीक नहीं है और हम सोचते ही नहीं है कि क्या दवाई लेना है, कैसे डौक्रेबाई जाना है, क्या करना है उसके वारे में भिचारी नहीं करेंगे तो वो बड़ी समस्या है ज़रूर हमको दवाई तो लेना है, उसके वारे में भिचार करना है तो जब हम किसी समस्या के वारे में भिचार करते हैं तो समस्या के कैसे सामना करना है, वो जो ग्राफ है ऐसे बढ़ता है प्रब्लेम सौल्विंग अबिलिटी इंकरीजिस आज भी थिंक बाद प्रब्लेम जितना हम भिचार करते है, उतने हमको सपश्चता आती है कि समस्या के वारे में क्या कर सके पर यह जो ग्राफ है, यह ऐसे सीधा ही बढ़ते नहीं रहता है यह एक मातरा तक बढ़ता है और उसके बाद में फ्लैट हो जाता है मतलब हम पहले सोचते हैं तो कुछ सपश्चता आती है ठीक है, ऐसे नहीं करना चाहिए, ऐसे करना चाहिए पर और सोचते रहेगे तो क्या होता है वो और सपश्चता नहीं आती है और फिर उसके बाद में और सोचेगे तो फिर वास्तम में नीचे आने लगता है जो सपश्चता आती है वो भी चली जाती है इसको कहते हैं इंग्लिएश में ओवर थिंकिंग कि नौट थिंकिंग इसे प्राब्लेम है न विचार करना और बहुत विचार करना भी दोनों से समस्या होती है कुछ लोग ऐसे होते है कि तो ऐसे मन में ही फ़स जाते है कि उनको समझ में जाता है क्या करना है तो हम सबको क्या करना है जो भी समस्या है उसके बारे में हमको विचार करना ज़रूरी है पर उसको רेगुलीटिद पद्धती से विचार करना है मतलब क्या रेगुलीटि पद्धती से विचार करना?
कि जब हमारे ज़ेम में समस्या है to क्या हैctor वह चोटे बालक के समान है। तो जो मन होता है the mind is more worried if there is a solution rather than what is the solution. मतलब इस समस्या को कोई हल है उसकी बारे में उसकी बारे में सुझाज़़ चिंता होते हैं। क्या हल है वह जानने में उसके उतनी अरुचिनी होती है।
मतलब क्या है इसके कहने का विश्टेशन कतसे कि जब हमारे ज़्याव में कोई समस्याय होती है तो एक ऐसी प्रवृत्ति होती है उसके बारे में हमेशा विचार करते रहें किसी को ऐसी विमारी है कब ठीक होने वाले कोई पता नहीं है बहुत समय से विमार रह रहे है यहाँ किसी के नोकरी चली गई है कब नोकरी मिलेगी क्या होगा कोई रिश्टे में कोई समस्या आ रही है तो कुछ कुछ समस्या होती है जिनका कब हल आने वाला है पता नहीं है और उनके हल को लाने के लिए हमारे पास कुछ करने की शमता सीमित होती है तो अगर ऐसी परस्तित में कोई है तो हमें जहां तक हो सके एक नियम बनाना चाहिए की है कि for problems that are constantly there don’t keep constantly thinking or talking about the problem अगर किसी को कोई बिमारी है तो घर में कोई बहुत बिमार है अगर काफी समय से कोई बिमार है तो भी सब को पता है कि आपको ये करना है, वो करना है, वो करना है कुछ चीज़े नियमित होती है पर अगर उसके बारे में हमेशा बात करते रहे गर जो हम सबको काम करना है वो काम कर देगे पर उसके बारे में बात नहीं करें और नखेल बात नहीं करना ऐसे नहीं पर हमारा मन भी दूसरे चीज़ों में लगा तो क्या होता है जब समस्या हमेशा रहती है हल कब आने वाले पता नहीं है तो एक तरह से स्वभाव हो जाता है कि हम ओवर थेंकिंग हो जाते हैं और उससे क्या होता है उससे हमारा मन ही हमारा बहुत बड़ा शत्यों बन जाता है ऐसे नहीं कि समस्या है नहीं समस्या है पर वो समस्या की मात्रा बहुत बढ़ जाती है हम उसके बारे में हमेशा विचार करते रहते हैं तो पर प्रब्लेम्स के लिए अगर हम इसके बारे में होते हैं बारी जीवन में कुछ स्टिम्यूलेटिंग है कुछ चैलेंजिंग है कुछ जो हमारा मन इसमें लग सकता है ऐसी चीज़े है तो फिर क्या होता है इसमें से मन निकल जाता है तो इसलिए जो प्रशुरात ने बताया कि हम समस्या है के लिए चुनाव नहीं कर सकते है पर क्या समस्या है उसका चुनाव कर सकते है मतलब क्या है यह समस्या मेरे पास पहले से जीवन में है और उसके बारे में भी विशार करते रहूंगा तो मैं उसमें जिंदा गाड़ा जाओंगा तो ठीक है यह समस्या है पर मैं कुछ और जंबिदारी लेता हूँ कुछ और ऐसे चीज़ लेता हूँ जिसमें मेरा मन लग जाएगा मुझे लगा पहले से बहुत सारी जंबिदारी और कहां से ले लू मैं तो यह ऐसे नहीं है कि हमें पर हमें क्या होता है हमारे मन को कहीं न कहीं लगाना है और few things focus the mind as much as responsibility कि जंबिदारी सबसे ज़्यादा हमारे मन को लगाती है क्या है मन लगाओ बोलते हैं पर मन लगता नहीं जब तक कोई जंबिदारी नहीं होती है मान लीजी अगर आपको कहते हैं आप इतना चिंता कर रहे हो थोड़ा शास्तर का पढ़न करो ठीक है आप शास्तर खोलते हैं पर यह समस्या है वो समस्या है क्या करेंगे शास्तर में मन नहीं लगता है पर अगर आपको पता है कि अभी मुझे एक गंटे के बाद जो पढ़ रहा हूँ उस पर एक लिक्शर देना है तो क्या होगा अगर वो जिम्मेदारी होगी तो मन तुरंट लग जाएगा वहाँ पर अगर हम कुछ प्रवचन सुन रहे हैं ठीक है सैकडो प्रवचन सुन रहे हैं पर मान लेगे प्रवचन के बाद में हमको बताना है कि प्रवचन में क्या सुना मैंने ओके ओके ओके तो फिर ध्यान परोग सुनेंगे हम तो क्या होता है कि responsibility is a burden that frees us from burdens जिम्मेदारी ये ऐसा बोजा है जो हमें बोजों से मुक्त करता है तो यह एक बड़ी जिम्मेदारी की लक्षन चीज है ये जब हम भगवान की सेवा के कुछ जिम्मेदारी लेते हैं तो एकदर से ऐसा लग सकता है कि पहले से मेरे इतने सारे बोजों है ये कहां से लूँगा मैं और सत्य है, हमको एक व्याभारेक लूँग से भी देखना है इतना भी सेवा नहीं होने चाहिए कि हम उसमें पूरा दब जाते हैं पर कई बार हमारी परस्थिती हमें इतनी दबारी होती जितनी हमारी मनस्थिती दबारी होती है तो वो मन के दबावल से मुक्त करने के लिए किसी और चीज में अगर हम मन लगा सकते हैं तो फिर वो बहुत अच्छा है तो इसलिए जिम्मेदारी अगर हम… लग सकता है कि पहले जीवन मुझ्किल है कल यूग में जीवन मुझ्किल है उसमें भक्ति करना और मुझ्किल है और उसमें भक्ति में जिम्मेदारी लेना और मुझ्किल है पर ये एक दूसरी सत्य है एक विवाहरिक रूप से हम सबके पास 24 घंटे ही है हम उसमें 24 घंटे से जाधा कुछ कर नहीं कर सकते हैं पर एक मानसिक दूसरी से देखेंगे हम तो वास्तो में हमारे जो बोज़ा होता है हमारे मन का बोज़ा दुनिया से बोज़ा से जाधा होता है और फिर हम दूसरा कोई अगर बोज़ा उठा लेते हैं दूसरे कोई जिम्मेदारी लेते हैं तो मन को उतना समय नहीं मिलता है हमको और बोज़ा दबाने के लिए तो यह हम थोड़ा खुद का आत्मा निरिख्षन करके दूसरे भकतों के सलहा करके फैसला कर सकते है कि कितना हम जिम्मेदार लेना चाहिए हैं पर यह नहीं, एसे यह black and white नहीं है हमें एक balance रखना है पर वह balance रखने के लिए हमें देखना है कि दो चीज़े हैं एक व्यवाहारिक सत्य है और एक मानसीक सत्य है और केवल व्यवाहारिक सत्य के लिए हम पूरा नहीं जाना है और केवल मानसीक सत्य के लिए पूरा नहीं जाना है हमें दो चीज़े के लिए एक balance रखना है तो हम सोचते कुछ है और करते कुछ है तो हमारे विचार धारा तीन गुणों से प्रभावित होती है या हमारे विचारों से तीन गुण प्रभावित होते हैं यह कैसे है कि वो पुराना सबाल है अंडा पहले आता है और मुर्गी पहले आता है तो उसका जवाब है जो है उसके साथ शुरुवात करो तो अगर अंडा है तो अंडा के साथ शुरुवात करो मुर्गी है तो मुर्गी के साथ शुरुवात करो तो मतलब क्या है कि यह सत्य है कि हम किस प्रकार के विचार करेगे किस प्रकार के विचार हमारे मन में एक स्वाभाविक पढ़ति से आएगे वह तीन गुणों के प्रभाव से निर्भारित होता है कोई अगर बहुत लालची है तो उसमें लोब बहुत है तो जहां भी जाएगा सबसे पहले पैसा देखेगा अच्छा इतना पैसा इतना पैसा इतना पैसा इतना पैसा तो हमारे कैसे है कि कुछ विचार या अधिकांच विचार हम कह सकते है ये एक अपने आप पूरो प्रभाव से आ जाते हैं इसे अगर कंप्यूटर का स्क्रीन होगा देखेगे तो कुछ कुछ नोटिफिकेशन अपने आप आ जाते हैं पर जो भी नोटिफिकेशन आते है उन सब को ही उन में से किसी को हम को नोटिस करना इसे ज़रूरी नहीं है शायद हम वो दस नोटिफिकेशन आये है पर वो किसी भी एक नोटिफिकेशन को न देख के हम कोई और आप खोल सकते हैं तो वैसे ही क्या है हमारे पूर्व कार्यों के कारण किसी प्रकार से हमें गुणों का प्रभाव हो गया है और वो गुणों के प्रभाव के कारण कुछ प्रकार के विचार अपने आप ये मारे मन में आ जाएगे पर विचार आते है उसपे हम जितना चिंतन करते है उतना विचार बढ़ता है और उसके अलावा कोई और चिंतन हम करते है तो वो भी बढ़ता है उसके बारे में तो हमें क्या करना है जो भी हमारी अभी की परिस्थिति है उसमें हम सकारात्मक, रचनात्मक, आध्यात्मिक क्या कर सकते है देखना है तो खुदको परिवर्तन अगर करना है तो उसके शुरुवात कैसे कर सकते है SSS Small Simple Steps छोटी सी चीज़ आप क्या कर सकते है क्या है कि मन पे हम सोचते एक है, हम इरादा एक करते है पर कारण सुरो जाता है तो क्या है मन के लिए हम क्या कारे करते है कितने नियमित्ता से कारे करते है यह ज़्यादा महत्वपूर्ण है हम कितनी मात्रा में कारे करते है यह महत्वपूर्ण नहीं है मतलब क्या अगर हमको कहना है हमें शास्त्र पढ़ना है यह भागोतम जानना है क्योंंकि जब मुझे समय मिलेगा तो मैं रोज चार घंटा भागोतम पढ़ूंगा पर वो समय शायद हमको चार मेने में एक दिन मिलता है और तभी हम चार घंटा पढ़ लेते हैं और बात में चार मेने के लिए खोलती भी नहीं है अच्छा है कमसें उतना तो पढ़ रहे हैं पर अगर हम फैस्ला करते हैं कि मैं रोज चार मिनेट भागोतम पढ़ूंगा तो हम कहते हैं बागोतम इतना बड़ा है अगर हम चार मिनेट भागोतम पढ़ेगे और चार मेने में चार घंटा भागोतम पढ़ेगे तो शायद टोटल मातरा एक ही हो सकता है एक मेने में चार घंटा होगा था तो टोटल क्वांटिटी एक ही हो सकता है पर क्या है?
मन पे जो उसका प्रभाव है, समिस्कार है, अलग होता है तो इसलिए कोई अगर जीवन में परिवर्थन करना है और हम कर नहीं पारे तो कोई बड़ा परिवर्थन के पारे में सोचने के जूरूत नहीं है कोई चोटा चीज जो हम कर सकते वो उससे चालू कर दिजे और अगर वैसे चालू कर देगे तो धीरे धीरे धीरे रुब्दी हो जाएगी तो इसलिए मैंने कहा कि हाँ हमारे गुणों के द्वारा हमारे विचारों पे प्रभाव होता है तो हमारे जो भी मन स्थिती है, जो भी परिश्ठी है उसमें हम अभी क्या कर सकिते हूँ? जो सम्भव है तो सेंच बियाल पे पारण चीज से चौल आपकर लीज़े से करलेगे, थिरे थिरे अगर उसन्सकार हो जाेगा तो मन का परिवर्तन हो जाएगा, और फिर वही चीज और मात्रा में करना भी आसान हो जाएगा।