SB 5 5 6 Hindi HG Chaitanya Charan Prabhu ji How Mind Causes Bondage
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Lecture Summary
इस प्रवचन में प्रभु जी ने मंदिर निर्माण, सेवा, आधुनिक तकनीक, कर्म के सिद्धांत और आध्यात्मिक शुद्धि के बीच के गहरे संबंध को बहुत ही तार्किक और व्यावहारिक ढंग से समझाया है। पूरे व्याख्यान के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:
1. मंदिर का विज़न, ‘कर-सेवा’ और गौ-कृषि
प्रभु जी ने कानपुर के नए विशाल मंदिर के लिए 200 पूर्णकालिक भक्तों (पुजारी, कीर्तनकार, हरिनाम और पुस्तक वितरण) का विज़न साझा किया। उन्होंने ‘कर-सेवा’ (हाथों से की जाने वाली शारीरिक सेवा, जैसे साफ-सफाई) को अत्यधिक महत्वपूर्ण बताया। यह सेवा भक्तों के भीतर से वरिष्ठता या पद का अहंकार मिटाकर उन्हें “कृष्ण के दास” के रूप में विनम्र और एकजुट रखती है। इसके अलावा, कृषि और गौ-सेवा को स्वाभाविक रूप से कृष्ण भावनामृत जगाने और भागवतम में रुचि पैदा करने का सबसे अच्छा माध्यम बताया गया।
2. तकनीक और कर्म के परिणामों से भागने का प्रयास
आधुनिक समाज भौतिक प्रगति और तकनीक (जैसे बैरियाट्रिक सर्जरी, हैंगओवर की दवाएं आदि) का उपयोग अक्सर अपने कर्मों के परिणामों (दुःख) से बचने के लिए करता है। आज की विचारधारा यह है कि व्यक्ति बिना किसी परिणाम या जिम्मेदारी के भोग कर सके। यह मूलतः कर्म और उसके फल (Action and Result) के बीच की स्वाभाविक कड़ी को तोड़ने का प्रयास है, जो कि आध्यात्मिक प्रगति के विपरीत है।
3. कर्म के बाह्य (External) और आंतरिक (Internal) परिणाम
प्रभु जी ने समझाया कि प्रत्येक कर्म के दो परिणाम होते हैं:
- बाह्य परिणाम: व्यक्ति के पूर्व जन्म के अच्छे कर्मों (Past Good Karma) के कारण कई बार बुरे कर्मों का बाहरी परिणाम कुछ समय के लिए टल जाता है। इससे व्यक्ति को यह भ्रम हो जाता है कि वह पाप करके भी बच गया है।
- आंतरिक परिणाम: बाहरी परिणाम भले ही टल जाए, लेकिन आंतरिक परिणाम तुरंत मन पर प्रभाव डालते हैं। बुरे कर्मों से मन में वैसे ही गलत संस्कार (Conditioning) और प्रवृत्तियां छप जाती हैं। धीरे-धीरे व्यक्ति खुद ही अपनी बुरी आदतों की जंजीर में बंधता चला जाता है।
4. विपत्ति से ज्यादा खतरनाक है समृद्धि
व्यक्ति के चरित्र की असली परीक्षा विपत्ति (Adversity) से ज्यादा समृद्धि (Prosperity) में होती है। सबसे खतरनाक स्थिति तब होती है जब किसी के पास पूर्व जन्म के अच्छे कर्म (जिनसे उसे सत्ता, धन या अवसर मिलते हैं) और वर्तमान जन्म के बुरे कर्म/नीयत एक साथ हों। ऐसे में वह व्यक्ति अपनी शक्ति का घोर दुरुपयोग करता है और दूसरों का विनाश करता है।
5. अवसर (Opportunity) बनाम आंतरिक शुद्धि (Purity)
आध्यात्मिक जीवन में सिर्फ बाहरी अवसर या बड़ी सेवा मिलना ही काफी नहीं है। यदि भगवान के स्मरण से आंतरिक शुद्धि (Internal Purity) नहीं हो रही है, तो बाहरी शक्ति और पद (Opportunity) मिलने पर भक्त भी उस अधिकार का दुरुपयोग कर सकता है। इसलिए, हमें हमेशा शुद्धि की कीमत पर अवसर की तलाश नहीं करनी चाहिए। भगवान की सच्ची सेवा तभी संभव है जब बाहर से सेवा और भीतर से निरंतर स्मरण चलता रहे।
6. पूर्व जन्म के मिश्रित कर्म
अंत में प्रश्नोत्तर के दौरान, अजामिल का उदाहरण देते हुए यह स्पष्ट किया गया कि हर व्यक्ति के पिछले जन्मों के कर्मों का एक ‘मिक्स्ड बैग’ (अच्छे और बुरे दोनों कर्म) होता है। इसी कारण कई बार अच्छे वातावरण में रहने वाले व्यक्ति के जीवन में भी पिछले किसी जन्म के बुरे कर्म के कारण अचानक प्रलोभन या विपत्ति आ सकती है।
Full Transcription
सोचिए, हम कानपुर में कैसे थे, हम कुछ बाकी देंगे या बॉम्बे को फिर समर्पित है। तो कैसे मंदिर बन गया? इतना बड़ा मंदिर बन गया? मैं पहले कभी सोचता हूँ तो आश्चर्य होता है कि कैसे हो सकता है! लेकिन जब हम लोग मंदिर बना रहे थे, पहले मैं सोचा नहीं था कि इतना बड़ा हो जाएगा। मैं तो छोड़ दिया था प्रेमानंद जी पर डिज़ाइन करने के लिए और केजरीवाल जी को सुपरवाइज़ करने के लिए। लेकिन जब बन गया तब मैं देखा, अरे! यह इतना बड़ा हो गया, मैं तो सोचा भी नहीं था। लेकिन अब बन गया, तो यह जो मंदिर बना है, इसका कैपेसिटी है कम से कम दो सौ डिवोटी वहाँ पर फुल टाइम रहने चाहिए।
मेरे पास ब्लूप्रिंट है दो सौ भक्तों के लिए। आइडल, खा कर सोने के लिए नहीं, बल्कि सबके लिए मेरे पास सेवा है। मैं तो वेटिंग कर रहा हूँ कि कब डेढ़ सौ से ऊपर जाएँ, तो फिर मैं अपना ब्लूप्रिंट आप लोगों के साथ शेयर करूँ। तो मंदिर तो बन गया ऐसा कि प्रेमानंद प्रभु बता रहे थे कि हम अमरावती का वर्णन सुनते हैं, स्वर्गलोक का या नंदन कानन का वर्णन सुनते हैं, वैसे ही गोलोक धाम में या अन्य जगह पर कैसे सुंदर-सुंदर वाटिका हैं, द्वारिका का इत्यादि। तो उस रूप में हम लोगों ने राधा माधव की प्रसन्नता के लिए यह करने का प्रयास किया।
मंदिर के आगामी प्रोजेक्ट्स और प्रचार कार्य
बोट फेस्टिवल हो गया… आज सांत्वना प्रभु जी मिसिंग हैं। तो बोट फेस्टिवल, गोवर्धन धारण हो गया, तो धीरे-धीरे सब प्रभुपाद जी की कृपा से हो रहा है। लेकिन एक जो कार्य है, सेकंड फेज़ जो बाकी रह गया है मेरा, वही अंतिम शेष बाकी रह गया है। अभी गौशाला भी हो गया, यूथ और गृहस्थों के लिए आश्रम भी हो गया। तो धीरे-धीरे सब चल रहा है।
लेकिन मेरा जो 200 भक्त का जो कांसेप्ट है, आप समझ सकते हो, कम से कम मिनिमम 25 ब्राह्मण चाहिए फुल टाइम जो कि ठाकुर जी की सेवा कर सकें। उसमें भी कितने कुक चाहिए, कितने क्लीनर चाहिए, आरती के लिए सब कुछ चाहिए, तो मिनिमम 25 भक्त चाहिए पूजा के लिए। और वैसे ही मेरी इच्छा है कि यहाँ पर भी 24 ऑवर कीर्तन हो, जैसे वृन्दावन में होता है। तो कम से कम उसके लिए एक टीम चाहिए, जिसमें 20 से 25 डिवोटी वहाँ भी चाहिए, तो 50 तो यही लोग हो गए।
उसके बाद मेरी इच्छा है कि प्रत्येक दिन हरिनाम टोली जाए, उनकी वही सेवा रहे हरिनाम करना। श्रील प्रभुपाद जी इस्कॉन को स्थापित किये तो दो इम्पॉर्टेन्ट सर्विस था: हरिनाम और बुक डिस्ट्रीब्यूशन। तो करीब 25 भक्त लोग ऐसे हों जो कि केवल हरिनाम संकीर्तन वाले ही हों। वो डेली 10 बजे निकल जाएँ प्रसाद खा करके, और शाम तक हरिनाम करके अलग-अलग एरिया में आएँ। उसके बाद तो ऐसे हो गए 75 भक्त लोग। कम से कम 20-25 भक्त चाहिए हमको जो कि लोगों से संपर्क करें। उसके बाद पुस्तक वितरण के लिए भी वैसे डिवोटी चाहिए। और वैसे ही करीब पच्चीस से तीस डिवोटी चाहिए फुल टाइम टेम्पल के अंदर जो कि अन्य कर्म, जो मैनेजरियल कार्यक्रम हैं, उसके लिए हों। और साफ़-सफाई रखने के लिए अलग डिपार्टमेंट रहे।
और जो पच्चीस भक्त रहेंगे आउटरीच पर, वो टू डिफरेंट विलेज, चाहे पदयात्रा करके, चाहे कैसे भी प्रचार करें। तो इस प्रकार से 200 भक्तों का हमारे पास ब्लूप्रिंट है। और मैं आशा करता हूँ कि निमाई प्रभु सुन रहे हैं, इसको समझ भी रहे हैं और मन में कुछ सोच भी रहे होंगे। तो अब कितना दिन लगेगा, जितना जल्दी करते हैं उतना अच्छा है।
कर-सेवा और भक्तों का संग
लेकिन ये सब तो ठीक है, 200 भक्तों का ठीक है, लेकिन फिर भी मैं चाहूँगा कि प्रभुपाद जी के लिए जो था – बुक डिस्ट्रीब्यूशन, हरिनाम – वो तो सब अपना है। लेकिन मेरा बहुत क्लोज यह है कि ‘कर-सेवा’ कभी रुकना नहीं चाहिए। कर-सेवा एक ऐसा कार्य है जो सब लोगों को साथ रखता है। उसमें सीनियारिटी, जूनियरिटी इस सब को साइड करके, हम सभी कृष्ण के दास हैं, इस बात की अनुभूति हमें प्राप्त होती है। चाहे वो झाड़ू मारना है, चाहे वो पेपर उठाना है, कोई सफाई है, भले आधा घंटा हो, कोई बात नहीं, लेकिन कर-सेवा होना चाहिए।
और उसके बाद दूसरी बात, भक्तों के लिए अपना समय होना चाहिए, साथ में बैठ करके सब लोग भले गीता का पाठ करें, भागवतम का पाठ करें और स्टडी करें।
प्रभुपाद जी की बड़ी इच्छा थी और उस इच्छा को पूरा करने में बहुत भक्तों ने सहयोग किया, सभी भक्त सराहना के पात्र हैं। और मुझे पूरा विश्वास है कि राधा माधव जी उन लोगों पर कृपा बरसा रहे हैं और कृपा बरसाते रहेंगे जिन्होंने सहयोग किया है। निमाई प्रभु के सिर पर बहुत बड़ी रिस्पांसिबिलिटी है भक्त बनाना। टेम्पल बिल्डिंग बना देना आसान है लेकिन बिल्डिंग को मेन्टेन करना उस से भी ज़्यादा कठिन है। लेकिन मुझे पूरा आशा और विश्वास है कि सब लोगों को साथ में करके सेवा करेंगे। मुझे कोई टेंशन नहीं है कानपुर के विषय में क्योंकि मुझे कनविक्शन है कि प्रेमानंद प्रभु के अंडर सब कार्य अच्छी तरह से होगा। आप अच्छे डिवोटी हैं, मुझे पूरा गोविन्द प्रभु, हनुमान प्रभु पर विश्वास है कि कैसे इतना बड़ा मंदिर बन गया। मैं इतना ही चाहता हूँ कि प्रभुपाद जी की इच्छा थी और जैसा कि भागवतम में कहा गया है- “सत्यं विधातुं निजभृत्यभाषितम्” (भगवान अपने भक्तों की बात को सत्य सिद्ध करते हैं)। भगवान अपने भक्तों की इच्छा को पूरा करते हैं। प्रभुपाद जी की इच्छा थी और भगवान पूरा कर रहे हैं हम लोगों को माध्यम बना करके।
कृषि, गौ-सेवा और कृष्ण भावनामृत
राधारमण प्रभु, जितने भी सीनियर प्रीचर हैं जो यहाँ पर हैं, वो भी चले गए, हमारी कमिटी वाले सब लोग मिल करके और इस प्रकार से यह कार्य हुआ। अब इसको मेंटेन करें। साल बीत चुके, समय बहुत जल्दी बीत जाता है। कभी-कभी अपने बच्चे बड़े हो जाते हैं, हम लोग सोचते हैं अरे इतना बड़ा हो गया! मैं वही सोचा 10 साल बीत गया, बहुत जल्दी 10 साल बीत गया।
तो यहाँ राधा माधव जी की कृपा से सुंदर फार्म भी अपने पास है, तो यह भी मैं चाहता हूँ, बहुत लोग फार्म पर भी थोड़ा ध्यान दें। क्योंकि ये नेचुरल है, कृष्ण से जुड़ने का तरीका। कृष्ण गाय से और कृषि से जुड़े हुए हैं, तो जो कृष्ण से जुड़ना चाहता है उसे गाय और कृषि से जुड़ना ही चाहिए। और जब इन से आप जुड़ोगे तो भागवतम का टेस्ट आएगा। मैं पर्सनली एक्सपीरियंस किया हूँ तलासरी में रह करके। जब हम गायों के बीच में रहते हैं और जब खेती देखते हैं, खेत में टहलते हैं तो नेचुरली कृष्ण भावना उत्पन्न होती है, भागवत पढ़ने का मन करता है। तो आप सभी भक्त लोग भी फार्म पर हफ्ते में एक दिन कंपल्सरी होना चाहिए, सभी भक्त लोग जाएँ। वहाँ कर-सेवा करें या गौ माता की सेवा करें या कुछ भी करें। वहाँ पर सभी भक्त लोग हफ्ते में एक दिन जाएँ, दिन भर पूरा वहाँ के लिए रखा जाए। पुजारियों के अलावा आप हरिनाम और कर-सेवा करें।
कर्म, फल और आधुनिक टेक्नोलॉजी
उसको हम कर्म के लिए ‘एक्शन’ बोलते हैं। ऑब्जेक्टिव इसलिए बोल सकते हैं कि रिज़ल्ट होता है, कॉज़ है तो उसका कोई इफ़ेक्ट होता है। तो अभी अधिकांश रूप से जब व्यक्ति भौतिक स्तर पर प्रगति करना चाहते हैं, तो वो क्या करने का प्रयास कर रहे हैं? कि भले ही मैं कोई कार्य करूँ, मैं कर्म करने वाला हूँ, इससे कई लोग सोचते हैं कि जब मैं एक्शन कर रहा हूँ, उसके साथ-साथ मेरे पास अगर टेक्नोलॉजिकल पावर है, तो फिर क्या होगा? नो सफरिंग!
तो लोग कई बार सोचते हैं ‘What is the purpose of power?’ पावर का यह उद्देश्य है, शक्ति हमें इसलिए प्राप्त करनी है कि मैं कर्म करूँ पर उसका फल न आये मुझे। और यह हम देख सकते हैं कई स्तरों पर। जब व्यक्ति कुछ कार्य करते हैं, अभी हम साधारण रूप से देख सकते हैं बाह्य दिशा में। यह प्रोवोकेटिव एग्जांपल है पर अभी जब पुरुष और स्त्री साथ में आते हैं, उसका एक नैसर्गिक प्रभाव होता है कि संतान उत्पत्ति होती है। तो लोगों को भोग चाहिए पर संतान उत्पत्ति नहीं चाहिए, तो क्या करते हैं? टेक्नोलॉजी से वो पहले ही बर्थ कण्ट्रोल पिल लेके आते हैं या उसके बाद में अबॉर्शन करवाते हैं।
अभी I am not blaming men or women, ये ह्यूमन साइकोलॉजी इसमें कैसे है, कि उससे क्या हो रहा है? मुझे कर्म करना है पर मुझे कर्म का जो परिणाम होने वाला है वो नहीं चाहिए। और टेक्नोलॉजी को इन्क्लूड करने का क्या मतलब है यहाँ पे? अभी मैं ये नहीं कह रहा हूँ कि सारी टेक्नोलॉजिकल एडवांसमेंट इसी उद्देश्य से होती है। इस दुनिया में तीन गुण होते हैं, तो टेक्नोलॉजी भी हम कह सकते हैं कि तीन गुणों में उसका उपयोग हो सकता है – सत्व, रजस और तमस। टेक्नोलॉजी एक तरह से एक औज़ार है, यह एक टूल है। इसका उपयोग अलग-अलग चीज़ों के लिए, अलग-अलग कार्यों के लिए कर सकते हैं। तो मान लीजिये कहीं प्रदूषण हो गया है, कहीं पानी बहुत कंटैमिनेट हो गया है, अभी हम पानी पीते हैं, गर्मी होती है…
तो पीतल के हम कंटेनर में रखते हैं, तो उससे ठंडा होता है, उससे शुद्ध भी होता है, ऐसे कहते हैं। वो भी एक प्रकार टेक्नोलॉजी ही है। और कई जगह पे आजकल जो रीसाइक्लिंग (recycling) प्लांट्स होते हैं, कुछ जगह पे बहुत वो ट्रेडिशनल पद्धतियों से बनाये गए हैं। तो उसमें क्या है, वो टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल है, पर वो एक तरह से सत्त्वगुणी टेक्नोलॉजी है। यह टेक्नोलॉजी हम यूज़ कर रहे हैं, जिससे कि हम जो समस्या है उसका हल कर सकें।
पर टेक्नोलॉजी ऐसे भी हो सकती है, जो राजसिक हो सकती है, जो तामसिक हो सकती है। जब कोई अभी न्यूक्लियर पावर (nuclear power) से कोई हम इलेक्ट्रिसिटी चला सकते हैं, न्यूक्लियर पावर से हम वेपन्स (weapons) बना सकते हैं, जिससे पूरे प्लानेट का भी विनाश हो सके। तो क्या है, एक राजसिक ही इस्तेमाल हो सकता है, एक तामसिक ही इस्तेमाल हो सकता है। तो किसलिए हम कर रहे हैं? आयुर्वेद भी एक टेक्नोलॉजी ही है। वो टेक्नोलॉजी ऐसी है कि ठीक है, इस प्रकार से कफ, वात, पित्त का कुछ समस्या है, तो आप ये दवाई लो, ये ऐसा खाना मत खाओ, इससे आपका स्वास्थ्य है और अच्छा हो जाएगा।
तो टेक्नोलॉजी हर जगह पे है, कई बार हम कहते हैं न, ये एक मॉडर्न साइंस या मॉडर्न टेक्नोलॉजी है, तो ये कैसे है, this itself, ये दोनों को हम साथ में जब कर देते हैं, तो this is a mistake. साइंस ये मॉडर्निटी के पहले भी था, तो all science is not necessarily modern science. आजकल जो प्रभाव हो रहा है दुनिया में, वो मॉडर्न साइंस का है, आजकल जो प्रभाव हो रहा है, वो टेक्नोलॉजी, मॉडर्न टेक्नोलॉजी है।
अभी एक इंग्लैंड और अमेरिका में एक किताब बेस्ट सेलर बन गई है, विलियम डेलरिम्पल (William Dalrymple) नाम का एक ऑथर (author), हिस्टोरियन (historian) है, he is quite sympathetic to India. उसने ‘गोल्डन रोड’ (Golden Road) नाम की एक किताब लिखी है, he says how everything that has made western civilization has come from India. वो थोड़ा एग्जैगरेशन (exaggeration) है, वो भारत के अध्यात्म की बात नहीं कर रहे हैं, वो भारत के भौतिक प्रगति की भी बात कर रहे हैं। तो इसलिए टेक्नोलॉजी ये ऐसे नहीं है।
अभी हम जो दिव्यास्त्र, महाभारत, रामायण में इस्तेमाल करते हैं, वो भी एक प्रकार की टेक्नोलॉजी ही है। आज के युग में, अगर वो घोड़े से है कि ये जाने के लिए भारी नहीं रहा है, तो चलता नहीं है, वो खुद होगा जीतने में भी है, तो नहां जो आज के लिए अच्छा थी, नहीं जाने के लिए नहीं है। तो अगर कुछ मुझे दे जो है, वो तपस्या करके प्राप्त करता है। तो वो एक तरह से तपस्या करना सात्विक है।
पर जब द्रोण, जो साधारण थे या द्रोणाचार्य जो थे, वो आचार्य थे, अर्जुन के गुरु थे। पर जब वो फ्रस्ट्रेट हो गए थे एक समय पे, तो वो साधारण योद्धाओं पे दिव्यास्त्रों से आक्रमण करने लग गए। साधारण सेनाओं को भी। तो दिव्यास्त्र एक तरह से ये दैवी हैं, देवताओं से आये हैं ये, पर जब उसका उपयोग ऐसा हो रहा था, वो तामसिक उपयोग है उसका। तो पॉइंट है कि टेक्नोलॉजी जो है, वह सात्विक, राजसिक, तामसिक हो सकती है।
तो अभी किसी का पेट बिगड़ गया है, तो हम दही लेते हैं। दही से थोड़ा पेट ठीक हो जाता है। यह भी एक प्रिमिटिव (primitive) स्तर पर टेक्नोलॉजी है। उसको ही हम दही को लेकर कुछ टेबलेट बना सकते हैं। टेबलेट और पोर्टेबल होते हैं। कई और इंग्रेडिएंट्स (ingredients) हो गए। तो टेक्नोलॉजी जो है, पर टेक्नोलॉजी का उपयोग कैसे हो रहा है, बहुत महत्वपूर्ण है।
टेक्नोलॉजी, कर्म और जगत में दुःख
एक पूरे मानवता के लिए एक बहुत बड़ी प्रॉब्लम है। वो स्वीकार भले करे या ना करे, जगत में डिस्ट्रेस (distress) है। जगत में दुःख है। यहाँ एक बहुत बड़ी प्रॉब्लम है। और यह डिस्ट्रेस को कैसे हमें हल करना है, इसके लिए अलग-अलग विचारधाराएं हैं। अलग-अलग विचारधाराओं के लिए अलग-अलग कार्य होते हैं।
आजकल की विचारधारा क्या है? जगत में डिस्ट्रेस है, पर व्यक्ति को जो दुःख होता है, अगर दुःख नहीं होता है तो वो हम ढूँढ के निकालें। तो वो कार्य न करें, ये भाव नहीं है। अभी कई बार ऐसे होता है कि लोग शराब पीते हैं, शराब से हैंगओवर (hangover) होता है। तो वो ये इन्वेस्टिगेशन (investigation) करें, रिसर्च (research) करें, कि कैसे लोगों को शराब से छुड़ाएं, उसको ज्यादा फंडिंग (funding) नहीं मिलता है। पर क्या रिसर्च होता है, कि शराब पीने के बाद कोई और ड्रिंक (drink) अगर आप लोगे, तो आपको हैंगओवर नहीं होगा।
तो क्या होता है, उससे आप ये दवाई ले लो, उसके बाद में ये ड्रिंक ले लो, या शराब के पहले आप ये ले लो, शराब के बाद ये ले लो। इतना करना है, तो शराब लेना ही क्यों है पहले? तो पहले याद रखना पड़ता है पहले। और ये एक बहुत बड़ा इंडस्ट्री (industry) है, कि इसमें अभी क्या होता है, इसमें जो कंपनीज (companies) हैं, अगर ऐसे मैन्युफैक्चर (manufacture) करें तो, उनको पैसा ही मिलने वाला है। इसके पहले आप ये ले लो, इसके बाद में ये ले लो। तो शराब का भी पैसा मिलेगा, और शराब के पहले-बाद में जो ले रहे हैं, उसके लिए भी पैसा मिल जाएगा। तो क्या है, दो चीज़ें हैं, if action leads to distress. Now, we don’t want distress.
कर्म के परिणाम और आधुनिक समाधान
तो अगर distress नहीं चाहिए, तो दो solution हैं। एक है, कि जो action से distress आ रहा है, उसके link को तोड़ने का प्रयास करें। दूसरा है, action को रोको। तो अभी अधिकांश, आजकल का जो तंत्रज्ञान है, वह क्या करता है, जो action से result होने वाला है, वह link को तोड़ देते हैं। और जिस हद तक इस link को हम तोड़ सकते हैं, उसको वह progress कहते हैं। Again, this is not the only definition of progress. पर कुछ काफी हद तक ऐसे है, कि आप जो भी कार्य कर रहे हो, उससे क्या होता है, जो result आने वाला है, वह result को हम कैसे रोक सकते हैं?
वह देखो, अभी… इससे क्या होता है, जब प्रह्लाद महाराज बताते हैं, “दुःखौषधं तदपि दुःखम्” (दुःख की औषधि भी दुःख ही है)। कभी इस श्लोक को ऐसे बोला जाता है, हमें किसी दुःख की औषधि को ढूँढना ही नहीं चाहिए। ऐसे नहीं बताया जाता है। ऐसे नहीं है कि हर जो दुःख इस जगत में आ रहा है, उसकी औषधि ढूँढने से और दुःख आने वाला है। अगर वो तामसिक है, तो ज़रूर होगा वैसे। अगर सात्विक है, तो ज़रूरी नहीं ऐसे होने वाला है।
अगर मान लीजिये कोई शराब पी रहा है, उससे उसको दुःख हो रहा है। और शराब पीना छोड़ देता है। शराब छोड़ने के लिए वो प्रयास करता है। और छूट जाती है। तो वो दुःख की औषधि ही है। क्या उससे उसको और दुःख होने वाला है? नहीं, यहाँ पर जो “दुःखौषधं तदपि दुःखम्” जो बताया गया है, कि जब हम कोई दुःख है, वो दुःख का हल ढूँढना चाहते हैं, पर किस तरह से ढूँढ रहे हैं वो? भौतिक स्तर पे ठीक है, कार्य तो हो जाए पर कार्य का कोई परिणाम न हो। इस तरह से देखते हैं। तो उससे वास्तव में प्रगति नहीं होती है। उससे वास्तव में कोई कल्याण नहीं होता है।
अभी ऐसे नहीं था कि प्राचीन काल में people would unite only for procreation. वो unrealistic standard है बहुत लोगों के लिए। But people would not stop procreation after union. क्या है कि जब पुरुष-स्त्री साथ में आते हैं तो उससे बच्चे होते हैं। इसलिए कि आप प्राचीन काल में देखते हैं, प्राचीन में नहीं, 200-300 साल पहले भी, लोगों को काफी बच्चे हुआ करते थे। प्राकृतिक रूप से तो आपको बच्चे हुआ करते थे, कई बच्चे बचपन में उनकी मृत्यु हो जाती थी। हम देखते हैं शची माता के समय में भी, उनके कितने नौ बच्चे पहले थे उनकी मृत्यु हो गई, फिर बाद में विश्वरूप और विशम्भर का जन्म हुआ।
तो पॉइंट यह है कि जो नैचरल प्रोसेस (natural process) है, उसमें इंटरफेरेंस (interference) नहीं था। पर अभी बहुत सा, बहुत सा टेक्नोलॉजिकल एडवांसमेंट ऐसे हो रहा है, कैसे हम कार्य करें पर उसका फल हम न भुगतें। उसको break the link between action and result के लिए बहुत प्रयास हो रहा है।
परिणाम से बचने का प्रयास और उसके प्रभाव
अभी आजकल बहुत से लोग बहुत वेट कॉन्शियस (weight conscious) होते हैं। और कुछ लोग ऐसे होते हैं कि कुछ लोगों का शरीर है कि उनका वेट आसानी से बढ़ जाता है। कुछ लोग ऐसे होते हैं, अपने जिह्वा को एक समान से, कुएँ के समान मानते हैं, वो खाते हैं पर फिर भी उनका कभी वेट बढ़ता नहीं है। अभी थोड़ा बहुत फर्क है उसमें।
पर क्या है, अभी अगर किसी का वेट बहुत बढ़ रहा है, तो थोड़ा हमें खाना रेगुलेट (regulate) करना है। पर अभी क्या, एक बैरियाट्रिक सर्जरी (Bariatric Surgery) नाम की सर्जरी है, वो क्या कर देते हैं, वो आपका पेट खोल के पेट को स्टिच (stitch) कर देते हैं। ताकि क्या होता है, थोड़ा सा खाने पे ही आपको लगता है पेट भर गया है। तो अभी क्या करते हैं, जब हमको पेट भरा हुआ लगता है, तो हम खाएंगे नहीं। पर पेट को पहले स्टिच कर दिया, तो थोड़ा सा जाकर… बहुत सिम्पलिफाई (simplify) करके बोल रहा हूँ, बैरियाट्रिक सर्जरी क्या होती है वो, पर सिम्पलिफाई करके बोल रहा हूँ।
कोई व्यक्ति है जो असंतुष्ट है अपने विवाह में। तो उनके लिए ये बहाना हो जाता है, अगर मैं आकर्षक हूँ, और अगर मैं विवाह में आकर्षक साथी चाहता हूँ। तो अभी मैं आकर्षक बन गया हूँ, मैंने सर्जरी करा ली, अभी मैं इतना, I am not so fat, so I can find a better partner. तो almost 80% bariatric surgeries are followed by divorce. तो वो bariatric surgery इसलिए नहीं कर रहे हैं, कि उनका सेहत अच्छा बनाना है, उनको खुद और आकर्षक बनना है, ताकि I can find a better partner.
तो अभी जिसने बैरियाट्रिक सर्जरी की, वो family breakdown होगा, यह सोचा नहीं होगा उसने। अभी ऐसा होना ज़रूरी है, कुछ-कुछ लोगों को बहुत बीमारी हो सकती है, शायद वो बैरियाट्रिक सर्जरी कर सकते हैं, प्रिंसिपल के लिए नहीं। कि जो हम दुःख के लिए, परिणाम, दुःख से हम छूटने के लिए कार्य कर रहे हैं, उससे हम छूट नहीं पाते हैं, यह हम भौतिक स्तर पर भी देख सकते हैं।
कर्म के दो परिणाम: बाह्य और आंतरिक
पर अगर क्या है, कि जो action होता है, उसके दो results होते हैं। एक है external, और दूसरा है internal. और जो external result है, अब external result क्या है? कि मान लीजिये कोई जानवर को मारता है, कसाई है वो। तो अभी जानवरों को मारना एक कर्म है, कितना तुच्छ कर्म है वो। उसका कुछ फल मिलने वाला है। पर अंदर से क्या होगा? वो व्यक्ति की, जो compassion है, sensitivity है, जो दूसरों के दुःख को समझने की क्षमता है, वो धीरे-धीरे कम हो जाएगी। तो कई बार क्या होता है? कि जो external result है, this can be delayed. Delayed by कर्मा (karma)।
अभी कर्मा, भगवान कहते हैं, “गहना कर्मणो गतिः”। अभी कर्मा का फल, हम कर्मा से और दूर धकेल सकते हैं। क्या मतलब है इसका? कि अगर, मान लीजिये, कोई दसवीं मंजिल से कूद के आत्महत्या करता है, तो वो गिर जाएगा, उसका हाथ पैर टूट जाएगा, शायद उसका सिर फूट जाएगा, उसकी मृत्यु हो जाएगी। पर, कोई 500 मंजिल के, 500 स्टोरी बिल्डिंग के ऊपर गया है, और वहाँ से वो आत्महत्या करता है। तो क्या होगा? वो भी गिरने वाला है, पर गिरने के लिए समय लगेगा।
कभी-कभी क्या होता है? जब किसी ने कुछ कर्म किया है, अगर किसी ने कुछ बुरा कर्म किया है, तो उसके अच्छे कर्म के कारण, उसके बुरे कर्म के फल में, वो दूर धकेल जाता है, देरी होती है। तो उस से उसे एक मोह निर्मित होता है कि मुझे फल नहीं मिलने वाला है। मैं फल से छूट गया हूँ। पर ऐसे नहीं है।
कर्म का गणित और पूर्व जन्म के संस्कार
जो “गहना कर्मणो गतिः” होता है, कैसे है? कि मान लीजिये किसी को पता चलता है कि अरे इस बैंक में सौ करोड़ रुपये आ गए। तो दस चोर होते हैं कि हम चोरी करने वाले हैं। दस चोर चोरी करने का प्रयास अलग-अलग पता करते हैं। दस अलग-अलग ग्रुप हैं, अलग-अलग इंडिविजुअल हैं। उन में से एक चोर ही यशस्वी (सफल) होता है। बाकि कोई और गार्ड आ जाते हैं, ये हो जाता है, वो हो जाता है। सफल नहीं होते। तो अभी ये एक चोर ही यशस्वी क्यों हुआ? क्यों? क्योंकि उसका अच्छा कर्म था पहले से। तो आपको बुरा कर्म करने के लिए गुड कर्म चाहिए होता है।
तो अगर किसी को बुरा कर्म करना है, कोई भी कर्म करना है… आपको इस जगत में कुछ भी यशस्वी करने के लिए गुड कर्म चाहिए होता है। तो क्या है? कोई व्यक्ति कोई बुरा कर्म भी करना चाहता है, तो इस जगत में कुछ भी अगर आपको यशस्वी करना है, तो वो यश प्राप्त करने के लिए कुछ अच्छे कर्म की ज़रूरत होती है। अभी हिटलर जो था, हजारों लाखों लोगों को उसने मारा। अगर आपको 8-9 मिलियन ज्यूस (Jews) को मारने का लक्ष्य प्राप्त करना है, तो अभी हिटलर की जो वाक् शक्ति थी, बहुत पावरफुल थी उसकी। पर उसके पूर्व कर्मा से वो लीडर बनने वाला था।
पर उसका अभी जो उसने कर्म किया, वो अगर इसके बुरे कर्मा से बढ़ रहा था, मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि कर्म करने के लिए छूट है। यह रूल कहता है कि जब मैंने 10 यूनिट का कर्म किया है, तो मुझे 10 यूनिट का result मिलेगा। अब कर्मा मैथमेटिकल नहीं है। इतना सिंपल नहीं है कि मैथमेटिक्स से हम समझाएं, पर हम यहाँ पर उदाहरण ले रहे हैं। नार्मली हम सोचते हैं, मैंने 10 यूनिट का कर्म किया है तो मुझे 10 यूनिट का फल मिलेगा।
पर कई बार ऐसे होता है, हम 100 यूनिट का कर्म करते हैं और हमको 10 यूनिट का फल मिलता है। कई बार हमने देखा होगा कभी, इतनी मेहनत की पर कुछ हुआ ही नहीं होगा। तो अब ये ऐसे क्यों हो रहा है? क्योंकि कुछ पूर्व कर्म है जिससे माइनस नाइन्टी (-90) आ जाता है। तो अभी हमको ये ऐसे याद रहता है जब हमने बहुत मेहनत की पर कुछ फल आया नहीं। पर अगर हम, if we are truly honest, कई बार हम देखते हैं कि हमने दस यूनिट का कर्म किया और हमको सौ (100) का फल मिलता है। हम थोड़ी सी ही पढ़ाई करते हैं किसी एग्जाम के लिए, और जो पढ़ाई किया है वो ही आता है और अच्छे मार्क्स मिल जाते हैं। अभी ऐसे भी होता है। तभी क्या हो गया? पीछे प्लस नाइन्टी (+90) आ गया।
तो अभी जो कर्म है, ये मतलब action से result आते हैं, ये सही है। But ऐसे ज़रूरी नहीं है कि only present action will lead to the present result. क्या है? Present action + past action will lead to the result. Or you can say present action – past action.
कभी-कभी ऐसे होता है, कुछ व्यक्ति होते हैं, उनके लिए हम बहुत कुछ करते हैं। उनके लिए हम सौ चीज़ें करते हैं और जो 101वीं चीज़ नहीं की है उसके बारे में वो सोचते हैं। कोई अपने अच्छे कर्म के कारण वह अभी बहुत शक्तिशाली बन गया है।
सत्ता, अपराध और कर्म की प्रतीक्षा
तो शायद वह कोई गुनाह भी करता है, तो पुलिस भी उससे डरती है। तो पुलिस भी कुछ करने आगे आती ही नहीं है उसको। तो क्या है? क्या वह कर्मा के नियम से बच रहा है? नहीं, उसका पहले का जो कर्म है, वो कुछ हद तक, कुछ समय तक बफर (buffer) रहेगा। और जैसे मैंने बताया था कि बहुत ऊंचाई पर कोई जाता है, और वहाँ से नीचे कूदता है, तो वो जमीन पे गिरने वाला है। पर कितना ऊंचा गया है, उसके अनुसार कितना समय लगेगा उसको गिरने के लिए, उसमें फर्क हो सकता है।
अभी जब दुर्योधन, जब द्रौपदी के साथ गैर-व्यवहार करता है, तो अभी इस प्रकार से, कामवासना से हो, या क्रोध से हो, या अहंकार से हो, जो भी, ऐसे दुर्योधन करने वाले लोग हमेशा होते हैं। दुर्भाग्यवश समाज में, पर साधारणतः ऐसे कोई गुनाह करने वाले, दुर्योधन जैसे कार्य करने वाले हैं, तो क्या होता है, वो व्यक्ति कहीं डार्क लेन, या किसी कमरे में, वो जबरदस्ती करता है जहाँ कि कोई गवाह नहीं रहे हैं।
पर अगर मान लीजिये कोई खुल्लम-खुला ऐसे कार्य कर रहे हैं, तो वो परवाह नहीं करता है। किसी कार्य के लिए, उसको कायदे का कुछ भय ही नहीं। अगर मान लीजिये, खुल्लम-खुला किसी रस्ते पे नहीं करता है, वो पुलिस स्टेशन में जाके, या कोर्ट में जाके ऐसे कार्य करता है, उसका मतलब क्या है? कि उसको नियम का, कानून का कुछ डर नहीं है। कानून का उसको डर नहीं है, तो अब ऐसे होगा, भले ही वो व्यक्ति कहीं भी कुछ भी कर सकता है, ऐसे लगता है, पर दुर्योधन को भी अपने कर्म का फल मिला, समय लगा उसके लिए।
तो क्या होता है, तो ऐसे कोई व्यक्ति, पॉलिटिकल पावर (political power) प्राप्त करके, या फिजिकल पावर (physical power) प्राप्त करके, कोई स्कूल में बुली (bully) होगा कोई, वो सब पे दादागिरी करता है, सबको डराता है, उसका सामना कोई नहीं कर सकता है। उसके पास फिजिकल पावर है। तो कोई political power, physical power प्राप्त करके कुछ बुरा कार्य कर सकता है और कुछ हद तक उसको कुछ परिणाम नहीं मिलता है, कुछ समय तक।
तो उसी तरह से जो कोई power प्राप्त करता है, power हो सकता है physical, power हो सकता है political, तो उसी तरह से power हो सकता है technological. तो अगर किसी को ये power मिला है, और उस power मिलने से क्या हो सकता है, कभी-कभी वो व्यक्ति जो कर्म कर रहा है, उसका फल उसको नहीं मिलेगा। मिलने वाला है, पर ऐसे लगता है कुछ समय के लिए वो उस फल से बच गया है। वो फल को टाल रहा है, पर वो जो है हमेशा के लिए नहीं रहने वाला है।
क्योंकि जब पाप का घड़ा भर गया है… क्या है, किसी के पाप का घड़ा बहुत बड़ा हो सकता है। तो उसको भरने के लिये बहुत समय लग सकता है। तो आप बोलेंगे कितना यह बुरा कर रहा है, कुछ क्यों नहीं हो रहा है इसको? सबको अपने-अपने कर्म का फल मिलेगा।
कर्म के आंतरिक संस्कार और मन का बंधन
तो ये बाह्य स्तर पे मैं बात कर रहा हूँ। क्या है कि बाह्य स्तर पे क्या है कि जो व्यक्ति कार्य करता है, उसका फल ज़रूर मिलता है। पर जो भी action होता है, अगर कोई कार्य कर रहा है, तो उसका एक external result होता है। तो इसका external result, it depends on कर्मा। कब वो result आएगा, कब नहीं आएगा, उसमें कर्मा का नियम आता है कुछ हद तक। पर साथ-साथ, उसका एक इंटरनल रिजल्ट (internal result) होता है।
इंटरनल रिजल्ट क्या होता है कि मन में वो कंडीशनिंग (conditioning) आ जाता है। मन में उस प्रकार का इम्प्रेशन (impression) हो जाता है। और यह जो impression है, इससे कोई नहीं बच सकता है। यह सबको होने वाला है। अगर कोई काम-वासना से कुछ कार्य करता है, कोई क्रोध से कुछ कार्य करता है, कोई लोभ से कार्य करता है, तो उसी प्रकार का कार्य करने की प्रवृत्ति उसमें और, और, और strong होने वाली है। और जब इस तरह से प्रवृत्ति और बढ़ जाती है उसमें, तो फिर वह क्या कर रहा है? वास्तव में एक तरह से, he is using his own rope to hang himself. खुद की रस्सी से वह खुद को बांध रहा है। खुद को फंसा रहा है।
तो अभी क्या है इस तरह से, कोई… I’ll give two examples, ये मन में कैसे बंधन होता है, उसके बारे में हम चर्चा कर रहे हैं। तो मैं अमेरिका में था, एक भक्त यहाँ पर रह रहा था, तो वो inheritance law में थे। अभी inheritance law क्या होता है, कि अगर कोई माता-पिता गुज़र जाते हैं, तो उनका पैसा है, उनके बच्चों में कैसे distribute होगा। उसके लिए will बनाते हैं लोग। तो where there is a will, there are many willing relatives!
तो जहाँ पे पैसा होता है, अनेक रिश्तेदार वहाँ पे आ जाते हैं। ‘अरे पैसा है, उनकी संपत्ति है अगर, तो मुझे मिले, कुछ आप भारत में कुछ दे दो मुझे।’ क्या होता है कि अभी माता-पिता के पास बहुत पैसा हो सकता है, और वह चाहते हैं कि सारा पैसा हमारे बच्चों को जाए, पर फिर भी वो अगर देखते हैं कि मेरे बच्चे ज़िम्मेदार नहीं हैं, तो फिर वो सोचते हैं कि सारा पैसा एक साथ में हमको नहीं देना चाहिए।
वर्तमान कर्म और पूर्व कर्म का संयोजन
देखो, अच्छा जीवन जीने के लिए, गुड पास्ट कर्मा और बैड प्रेजेंट कर्मा, यह वर्स्ट कॉम्बिनेशन (worst combination) है। क्योंकि क्या है, मैं भक्ति में आने के पहले था कि मुझे गुस्सा जल्दी आ जाता था, और क्या था, बहुत लोगों को गुस्सा आता है, पर कुछ लोग ऐसे होते हैं, गुस्सा जब आता है, तो इतने वो आग-बबूला होते हैं कि कुछ बोल ही नहीं पाते। कुछ लोग ऐसे चीखते हैं, चिल्लाते हैं, पर कुछ बोलते ही नहीं हैं। क्या बोलना है, समझ भी नहीं आता है।
पर क्या था, मेरे लिए, I had a bad temper and good vocabulary. ये एक deadly combination है। तो गुस्सा आता है, और मेरे शब्दों की क्षमता थी अच्छी, मैं इस तरह से लोगों से सार्कास्टिकली (sarcastically) बात करता था, इस तरह से इन्सल्ट (insult) करता था, कि क्या है, वो ज़िन्दगी भर लोगों को याद रहता था। तो अभी मेरी अच्छी vocabulary है, that is probably because of past good karma. पर अभी, अगर मुझे गुस्सा आ रहा है, that is present bad karma.
तो present bad karma and past good karma, ये बहुत खतरनाक combination है। तो क्या होता है, उससे जो व्यक्ति बुरा कार्य करना चाह रहा है, उसको करने में सुविधा मिल जाती है। तो जैसे भागवत में बताया गया है महाराज वेन के बारे में, जो अंगराज के पुत्र थे। अभी पूर्व जन्म में कुछ अच्छा कर्म था, इसके लिए वो राजकुमार बने। पर अभी present प्रवृत्ति क्या थी? बड़ी क्रूर प्रवृत्ति थी। तो एक साधारण कोई गरीब बच्चा होगा, वो क्रूर होगा, वो कितना कुछ परेशान किसी को कर सकता है? थोड़ा बहुत करेगा किसी को। पर कोई राजकुमार होगा, वहाँ अगर क्रूर होगा, वो अगर बेरहम होगा, तो वो दूसरों पर कितना दुःख दे सकता है, कितना अत्याचार कर सकता है। तो प्रेजेंट बैड कर्मा (present bad karma) और पास्ट गुड कर्मा (past good karma), यह एक तरह से बहुत डेडली कॉम्बिनेशन है।
अगर हम देखेंगे, यह, I’ll come to this graph towards the end. तो प्रेजेंट कर्म और पास्ट कर्म में क्या चला? इसमें एक साथ में पास्ट गुड है और एक साथ में वर्तमान बुरा है। तो इधर पास्ट गुड है, प्रेजेंट कर्मा है, पास्ट कर्मा है, वो लोग हैं। तो इससे बढ़कर कुछ बुरा नहीं है। और बुरा व्यक्ति है, पर ज्यादा कुछ कर नहीं सकता, क्योंकि पूर्वकर्म ज्यादा अच्छा नहीं है, ज्यादा कुछ शक्ति नहीं है उसके पास कुछ करने के लिए। किसी को बहुत गुस्सा आता है, पर क्या कहते हैं? वो कमज़ोर व्यक्ति है। शरीर में कुछ शक्ति नहीं है। बोलने में कुछ शक्ति नहीं है। कुछ अच्छे मित्र नहीं हैं। गुस्सा भी आएगा, तो क्या करने वाला है वो? ज़्यादा कुछ करेगा नहीं वो। तो बुरा है पर वो ज़्यादा उसमें पावर नहीं है। पूरा पावरलेस (powerless) नहीं है।
पर अगर present कर्मा अच्छा है, पूर्व कर्मा बुरा है, तो फिर क्या है? It is distress but auspicious. क्या है कि अभी उसमें दुःख है उसके जीवन में भी। पर क्या है उसका भविष्य अच्छा है। कि पूर्व जन्म का जो कर्म है, वो अभी भुगत रहा है, पर वो पूर्व जन्म कितना भी बुरा कर्म हो, वो इन्फाइनाइट (infinite) नहीं है। वो खत्म होने वाला है। और अगर अच्छे कर्मा भी कर रहा है, तो भविष्य उसका उज्जवल है। तो अगर पास्ट कर्मा पॉजिटिव है, प्रेज़ेंट कर्मा नेगेटिव है, तो क्या है, वो अच्छा होने लगता है, पॉजिटिव होने लगता है।
तो तभी उसकी दादी गुज़र गई। तो ये जो भक्त हैं, वो बोल रहे थे कि उनका specialization है कि वो ऐसा will बनाएँ कि कभी कोई break न कर सके उस will को। तो मैं बोला, “Is that a such a big need?” वो बोले, “बड़ा profession है ये एक, कि ऐसे will बनाएँ कि कोई break न कर सके उस will को।”
बुराई की प्रवृत्ति और कर्म का सिद्धांत
तो क्या है कि, यहाँ पर मैं कहने का अर्थ क्या बता रहा हूँ कि जो हमारे मन में प्रवृत्तियां होती हैं, वो सब में होती हैं। पर अगर किसी की… क्योंकि मन में कई बुरी प्रवृत्तियां हैं, और कुछ हद तक सब में होती हैं वो। जो मन में बुरी प्रवृत्ति होती है, अगर बाह्य रूप से वो प्रवृत्तियों पे कार्य करने की सुविधा किसी को मिल जाती है, तो यह एक अपने में बड़ा खतरा है। तो मन में जो हमारा बंधन होता है, वो वास्तव में कभी-कभी दिखता नहीं है।
क्योंकि कभी कैसे लगता है कि व्यक्ति बुरा कार्य कर रहा है, कुछ नहीं हो रहा है इसको। पर सबको उससे परिणाम होता है। अगर कुछ लोग शराब पीते हैं, वो शराब पीने की कॉम्पिटिशन (competition) लेते हैं। कौन ज्यादा पीएगा? और वो बोलता है कि, “मैं तो 2, 3, 4, 5 बॉटल पीता हूँ, मुझे कुछ भी नहीं होता है। उसके बाद भी मैं कार ड्राइविंग कर सकता हूँ।” आप कर सकते हो कार ड्राइविंग, पर आप जब कार ड्राइविंग करें, बाकि कोई उस कार में कार ड्राइविंग कर सकता है कि नहीं।
पॉइंट यह है कि, कुछ लोग ऐसे होते हैं कि, वो थोड़ा शराब पीते हैं, और उनको तुरंत हेडेक (headache) आता है, या हैंगओवर होता है। कुछ लोग कहते हैं कि, “अरे मैं इतना शराब पीता हूँ, मुझे कुछ नहीं होता है।” वो क्या है? वो पूर्व कर्म से है। कुछ लोग कहते हैं कि, “अरे मैं तो रोज स्वीट्स खाता हूँ, मुझे कुछ डायबिटीज कुछ नहीं हुआ है।” ठीक है, नहीं हुआ है, पर इसका मतलब यह नहीं है कि उससे कुछ होने वाला नहीं है।
तो पॉइंट यह है, कभी-कभी, जब कोई बुरा कार्य कर रहा है, उससे जो परिणाम होता है, वो शायद नहीं आएगा। पर जो बुरे कार्य करने की जो प्रवृत्ति है, अगर वो मन में है, तो जैसे ही मौका मिल जाएगा, वो वैसे कार्य कर लेगा। तो इसलिए, जब हमें किसी का करैक्टर, किसी और का नहीं, खुद का करैक्टर असेस (assess) करना है… मुझे एक भक्त बोले, मुझे एक बहुत सवाल पूछना है, “ठीक है, अगर मैं किसी और का अपमान करता हूँ, और उसको समझ भी नहीं आता है कि उसका अपमान हुआ है। तो क्या मुझे वो अपमान करने का कर्म मिलेगा?” मैंने उनको बोला कि “अगर आपको कर्म के नियम के बारे में पता है तो क्यों किसी को इंसल्ट करना है?”
इंटेंट, कंटेंट और कॉन्सक्वेंस
क्योंकि नीयत की क्या बात है। हम क्या करना चाहते थे और क्या वास्तव में परिणाम हुआ। तो मान लीजिये कोई बैंक में चोरी करने जाता है और वो चोरी करने के बाद पकड़ा जाता है। मतलब चोरी करके भाग रहा है तो भी पकड़ा जाता है। कोई चोरी करने जाता है और जब चोरी करने जाता है वो बैंक में ट्रेज़री (treasury) तक पहुँचने के पहले ही पकड़ा जाता है। “मैं तो चोरी की नहीं, पर तुम चोरी करने गए थे।” तो कॉंसिक्वेंस (consequence) नहीं आया है पर कंटेंट (content) फिर भी था।
तो क्या होता है कि अभी राइट (right) और रांग (wrong) जो है न, कौन सा एक्शन सही है, कौन सा एक्शन गलत है, ये तीनों फैक्टर (factor) से फैसला होता है। अगर कॉंसिक्वेंस हो गया है… और अभी अधिकांश जगत में शराब पीना इलीगल (illegal) नहीं है, पर शराब पीके ड्राइविंग करना ये इलीगल है। ये बहुत जगह पे इलीगल है और क्या है, सारे विश्व में लगभग इलीगल है। और जो लोगों को शराब पीने की भी आदत होती है, उनमें भी कुछ हद तक सद्बुद्धि होती है। अगर कुछ सद्बुद्धि कह सकते हैं, जो भी कहना है, कुछ बुद्धि होती है।
मान लीजिये अगर छह-सात मित्र किसी पार्टी में जा रहे हैं, अपने शराब पीने वाले होते हैं। तो वो छह-सात मित्र पहले से फैसला कर लेते हैं, “आज की पार्टी तुम्हारे तपस्या का दिन है। यह क्या है, तुम हमको ड्राइव करने वाले हो, तुम ड्राइव करके वापस लाने वाले हो, तो तुमको शराब नहीं पीना चाहिए। आज की पार्टी में तुम तपस्या करो, अगली पार्टी में मैं तपस्या करूँगा।” तो अभी वो शराब पी रहे हैं, वो हम कह सकते हैं, उसमें कोई सेंस कंट्रोल (sense control) नहीं है। पर वो शराब पी के ड्राइविंग नहीं करना है, उतनी तो सद्बुद्धि है उनमें।
तो अगर मान लीजिये, कोई शराब पी के ड्राइविंग करता है, और फिर शराब से क्या होता है बेसिकली, बहुत चीज़ें होती हैं, पर एक है, कि व्यक्ति का जो इम्पल्स कंट्रोल (impulse control) होता है, वो बहुत लो (low) हो जाता है। गुस्सा आ जाता है, तो तुरंत उसका हाथ उठ जाएगा। तो अभी मान लीजिये, वो ड्राइविंग कर रहा है, कोई बीच में आ गया, और गाड़ी किसी को मार दे उसने, बेहोश हो गया, किसी की मृत्यु हो गई। तो अभी ये एक्सीडेंट कह सकते हैं, पर अगर वो शराब पीके कर रहे हैं, तो वो कॉंसिक्वेंस हो गया है, तो वो बहुत गंभीर होगा।
अगर मान लीजिये वो शराब पीके ड्राइव कर रहे हैं, और कोई एक्सीडेंट नहीं होता, किसी को मारते नहीं हैं, फिर भी उनको पकड़ते हैं वो, तो क्या होगा? वो भी क्राइम (crime) होता है, तो आपके खिलाफ कोई स्ट्राइक (strike) हो जाएगा, अगर दो-तीन बार हो जाएगा, तो आपका ड्राइविंग लाइसेंस (driving license) ले लेंगे। तो उसमें क्या है, कुछ कॉंसिक्वेंस नहीं हुआ है। एक है कि शराब पीके ड्राइव कर रहे हैं, और उससे कोई एक्सीडेंट हो जाता है, आप शराब पीके ड्राइव कर रहे हैं, कंटेंट भी है, वो भी गलत है। उसका भी परिणाम होगा।
अभी इंटेंट (intent) होगा। मान लीजिये कोई बहुत शराब पिया है। और क्या होता है, कई बार ऐसे लोग शराब पीते हैं, और कुछ लोगों में इतना तो बुद्धि होती है, कि “शराब भी मैंने ज्यादा पी लिया है।” तो कई लोग बोलते हैं, कि वो शराब पीते हैं, तो वो बार टेंडर (bartender) या बार में कोई बोलता है, तो वो परवाह नहीं करते हैं। तो मान लीजिये वो आते हैं बाहर खुद car drive करने के लिए और जब car drive करने के लिए आते हैं तभी कोई वो bartender किसी police को बोलता है, “He is drunk and he is trying to drive.” तो उसको पकड़ लेते हैं।
तो अभी क्या ये गुनाह है? वो गुनाह नहीं होगा, हम कह सकते हैं, पर फिर भी, वो डॉक्टर बोलेगा नहीं, पुलिस बोलेगा, “तो आप ड्राइव नहीं कर सकते हैं। आप अपनी कार कीज़ (car keys) हमें दे दें और हम आपको किसी टैक्सी में डाल देंगे।” तो इंटेंट भी होगा, तो भी वो बुरा है।
ये, मैं कर्मा के लिए कह रहा हूँ, जो हम कार्य करते हैं, वो अगर कोई बुरा कार्य करना चाहता है, बुरा कार्य करता है, और बुरा कार्य करने से बुरा फल होता है। तो क्या है, एक तरह से तीनों में reactions हैं। But वो reaction है, एक तरह से इंटेंट के लिए least होगा, कंटेंट के लिए more होगा, और कॉंसिक्वेंस हो गया तो most आता है। जो reaction होता है, जो अगर कार्य करता है, तो उसका reaction और बढ़ जाता है।
निष्कर्ष
So, the last point I was going to make here, कि जैसे मैं बता रहा था कि, जो अगर किसी के मन में संस्कार हो गये हैं, मन में impressions हो गये हैं, ऐसे कोई बार-बार गुस्सा करता है, कोई काम-वासना का भोग करता है, कोई बार-बार ईर्ष्या करता है, पर शायद अभी external situation ऐसे नहीं है, कि उससे कुछ ज़्यादा परिणाम होता है।
मन की प्रवृत्तियां और बाहरी अवसर (Purity vs Opportunity)
जैसे कोई व्यक्ति, उसको बहुत गुस्सा आता है, और व्यक्ति अगर गुस्सा आता है, नियंत्रण करने का प्रयास भी नहीं करता है। पर क्या है, अभी व्यक्ति के पास कुछ ज़्यादा शक्ति नहीं है, तो व्यक्ति गुस्सा करते हैं, तो क्या होता है उससे? कुछ होता नहीं है। पर मान लीजिये, व्यक्ति गुस्से पर नियंत्रण करने का प्रयास नहीं कर रहा है, और एक दिन, मान लीजिये, किसी के घर में गए हैं, और उसके घर में, मान लीजिये, गन (gun) है। और इस व्यक्ति को गुस्सा आता है।
और एक्सटर्नल (external) एक्शन होता है, उसकी एक्टिविटी कहीं कुछ है, क्या होता है, किसी बुरी परिस्थिति या आदेश में कार्य करता है, तो हर बुरे कार्य करने से इंटरनल टेंडेंसी (internal tendency) बढ़ती है। शायद वो इंटरनल टेंडेंसी एक्सटर्नल एक्शन में नहीं आएगी। अभी नहीं आएगी। पर अगर बाहर से कोई उसको सुविधा मिल जाती है, वो opportunity या सुविधा मिल जाती है, तो फिर तभी वो व्यक्ति क्या करेगा, उसका कोई भरोसा नहीं है। क्या-क्या वो ज़रूर उससे कार्य कर देगा? It depends उस व्यक्ति की संस्कृति क्या है, उस व्यक्ति का विवेक, बुद्धि क्या है।
पर अगर ये जो कर्मा, जो मन के स्तर पर हो रहा है, कर्मा का फल, अगर उसको हम टाल नहीं रहे, उसको नियंत्रित करने का प्रयास नहीं कर रहे हैं, तो जब उसको सुविधा मिल जाती है, तो वो बहुत बुरा कार्य कर सकता है।
चरित्र की परीक्षा: विपत्ति और समृद्धि (Adversity and Prosperity)
That’s why, चाणक्य पंडित भी कहते हैं, और बाइबल में भी बताया गया है- “A person’s character is tested, not just in adversity, but also in prosperity.” जब व्यक्ति के जीवन में विपत्ति आती है, तो उसका चरित्र दिखता है, किस तरह से क्या वो टूट जाता है, या वो प्रयास करते रहता है। तो चरित्र बहुत determined है, firm है, tough है वो, वो चरित्र adversity में दिखता है। पर वो चरित्र उससे ज़्यादा prosperity में दिखता है।
क्योंकि क्या है, prosperity में क्या होता है, अगर उसमें कोई बुरी प्रवृत्तियां हैं, तभी उसको वो कार्य करने के लिए मौका मिल जाता है। क्या तभी वो वैसा कार्य कर देगा? और अभी हम हमेशा देखते हैं, कि मेरे जीवन में यह विपत्ति आ गई, वो विपत्ति आ गई, और ये क्यों आया, कब खत्म होगा? वो सही है, nobody wants unhappiness in life. पर जब हमारे पास prosperity आएगी, तो are we ready for that prosperity?
प्रभुपाद जी ने एक बार कहा था, अपने शिष्यों से, GBC में कहा था कि, “कृष्ण आपको पूरा जगत अठारह दिन में दे सकते हैं, पर क्या आप यह जगत लेने के लिए तैयार हो?” जैसे कृष्ण ने पांडवों को अठारह दिन में दे दिया, तो क्या हाल है? हमें अगर, बहुत से लोग… अब यहाँ देवकीनंदन प्रभु बता रहे थे, कितना बड़ा विज़न (vision) है उनका। तो अगर हजारों की मात्रा में लोग भक्त बन गए, और वो सेवा में लगना चाहते हैं, जो हम बोलते हैं, वो करने के लिए तैयार हो जाते हैं। तो हमें अगर इतने सारे लोग आ जाएंगे, तो उससे क्या हमारा अहंकार बढ़ जाएगा? क्या जब लोग हमारी बात मानने लगेंगे, तो क्या हम हमारा पावर अब्यूज़ (power abuse) करेंगे? क्या हम ऐसा नहीं करेंगे?
तो क्या है, कि बहुत से लोग, हमको ऐसे लगता है कि बाहर से मुझे opportunity नहीं मिल रहा है, और उसके कारण मैं कुछ नहीं कर पा रहा हूँ। और ये सत्य हो सकता है, opportunity नहीं मिल रहा है, पर external opportunity के साथ-साथ, जो internal purity है, वो भी ज़रूरी है। अगर वो नहीं होगा, तो external opportunity से, कुछ constructive होने के बजाय, वो destructive हो जाएगा। सकारात्मक की जगह, नकारात्मक हो जाएगा।
सेवा, स्मरण और आध्यात्मिक प्रगति
तो इसलिए, जब हम भक्ति कर रहे हैं, तो भक्ति में, एक तरह से external service होता है, और internal remembrance होता है। तो service से, हम सेवा करते रहेंगे, तो उससे धीरे-धीरे opportunity आ जाएगा। अगर हम जिम्मेदारी से सेवा कर रहे हैं, तो क्या होगा, वरिष्ठ भक्त देखेंगे, और हमको सुविधा ज़रूर दे देंगे। पर हमारे अंदर से, जब हम भगवान का स्मरण कर रहे हैं, तो उससे purity आता है। और जब ये purity आता है, जब अंदर से शुद्धिकरण आता है, तो जब opportunity मिलेगा, तो उसको हम अच्छी तरह से use कर पाएंगे।
नहीं तो, जो श्लोक बता रहा था- “एवं मनः कर्मवशं प्रयुङ्क्ते”, जो आज पढ़ रहे थे, वो हमारे मन के वश में आकर, जो बाहर की सुविधा मिली है, उसका हम, शायद जानबूझ के नहीं होगा, पर अंजाने में भी उसका दुरुपयोग हो सकता है। इसलिए our desire, we can always seek opportunity, but not at the cost of purity. हमें अंदर से purity चाहिए, और बाहर से opportunity चाहिए।
आज हमने चार पॉइंट्स में चर्चा की है, किस तरह से, कि जो भौतिक हम कर्मा के लिए प्रयास कर रहे हैं… यहाँ पे हमने चर्चा की किस तरह से, आजकल जो प्रोग्रेस (progress) जो बोलते हैं, प्रोग्रेस का, ख़ास करके टेक्नोलॉजिकल प्रोग्रेस, उसका मतलब क्या है? कि जो एक्शन से जो result आ रहा है, उसके लिंक को ब्रेक करना। पर जो spiritual progress जो होता है, उसमें क्या है? उसमें हम वो action को रोकने का प्रयास करते हैं।
तो अभी टेक्नोलॉजी itself is not bad, टेक्नोलॉजी भी सत्व, रजस और तमस में हो सकती है। तमस में जो ख़ास करके टेक्नोलॉजी होती है, उसका उद्देश्य क्या होता है? कि हम action करें पर उसका परिणाम ना आये। शराब तो पीना है, पर ऐसा कोई substance पीना है जिससे शराब का बुरा परिणाम नहीं होगा। तो उस तरह से अलग-अलग हमने देखे उदाहरण इसके लिए।
और फिर क्या इसमें कोई ऐसे कर सकता है, वास्तव में कोई action करे और result को न लाये? Is that possible? तो यह temporarily possible हो सकता है। वो कैसे हो सकता है हमने देखा? कि किसी के पास power आता है। वो power physical हो सकता है, political हो सकता है या वो technological हो सकता है। और यह power आता है, तो क्या हो रहा है वास्तव में उससे? उससे जो present action है, present action से भी present result आने वाला है, पर क्या होता है? अगर मान लीजिये present action minus 100 (-100) है, पर किसी के पास जो past action है, वो plus 100 (+100) है, तो क्या होगा उससे? उसको लगता है, मैंने action किया है, पर कुछ हद तक ऐसे लग सकता है कि कोई कार्य कर रहा है, पर उससे फल उसको नहीं मिल रहा है। Power के कारण ऐसा लगा है।
तो उसके बाद में हमने देखा कि सबसे deadly combination क्या है? हमने एक four quadrant देखा कि Positive present karma and Positive past karma. तो उसके अनुसार सबसे deadly combination क्या है? Positive past karma and Negative present karma. तो उससे क्या होगा? उस व्यक्ति को लगेगा कि मुझे कुछ नहीं होने वाला है और उससे वो बुरा करते रहेगा। और बाद में जो फल आएगा वो बहुत सारे कर्मों का फल आने वाला है।
और इसलिए जब हम… when we want to grow, हम चाहते हैं कि हम जब भौतिक जगत में हों या भक्ति में हों, हम जब ग्रो करना चाहते हैं तो we always think मुझे बाहर से, external से opportunity मिलना चाहिए। पर उसके साथ-साथ हमको internally जो है, purity भी ज़रूरी है। तो बाहर से अगर service से हमको opportunity मिलता है पर अंदर से remembrance नहीं है, भगवान का स्मरण नहीं है, तो क्या होगा? हमें सेवा करने की सुविधा मिलेगी पर सेवा का भाव अंदर से नहीं रहेगा। और फिर जो सुविधा मिलेगी उसका शायद हम दुरुपयोग भी कर सकते हैं।
तो इसलिए we can seek service but we also try to cultivate remembrance और उससे हम सकारात्मक रूप से जो है, we can transform. Thank you very much! हरे कृष्णा! So we will have question answers tomorrow. Okay, one question.
प्रश्नोत्तर: पूर्व जन्म के कर्म और वर्तमान का स्वभाव
प्रश्नकर्ता: हरे कृष्णा! Thank you so much for wonderful class. यह पूछना था कि जैसे नेचुरली यह conclusion है, ऐसा होना चाहिए कि पास्ट किसी का गुड कर्मा है तो अभी भी व्यक्ति को अच्छा ही करना चाहिए। लेकिन ऐसा कैसे हो जाता है कि पास्ट गुड कर्मा है लेकिन अभी बहुत बदमाश है? क्या होता है कि जो पास्ट अगर कर्मा अच्छे हैं तो अभी अच्छा करना चाहिए?
उत्तर: देखिए, यह कर्मा काफी समय से है, तो पास्ट मतलब क्या? पास्ट वन लाइफ, पास्ट टू लाइफ, पास्ट फाइव लाइफ, पास्ट हंड्रेड लाइफ? किसी का भी पास्ट, सबका पास्ट एक मिक्स्ड बैग (mixed bag) ही होता है। बहुत कम ऐसे लोग होते हैं कि उनका पास्ट पूरा शुद्ध ही होगा। तो ऐसे हो सकता है कि पिछले तीन-चार जन्म पहले जो कर्म किये हैं, उसका अच्छा परिणाम अभी मिल रहा है। पर पिछले जन्म में कुछ कर्म किये हैं, उससे बुरा परिणाम मिल रहा है।
तो यह कॉम्प्लेक्स (complex) है। अजामिल का प्रसंग देखते हैं, तो अजामिल ने ज़रूर कुछ अच्छे कर्म किये थे, उसके कारण उसका एक ब्राह्मण परिवार में जन्म हुआ, वो एक सुशील प्रवृत्ति, सुशील संस्कृति में रह रहा था। अधिकांश रूप से हम कह सकते हैं कि वो जब बाहर गया था, वो कोई भोग करने के लिए भी नहीं गया था। वो तो सेवा के लिए गया था, अपने पिताजी की सेवा के लिए।
तभी जो दृश्य उसने देख लिया, वो जो दृश्य था, वो एक दुर्भाग्य कह सकते हैं। वो शायद पूर्व कर्म, पहले का कुछ नकारात्मक कर्म हो सकता है, ऐसा कह सकते हैं। तो अभी कैसे करें? साधारणतया हम कहते हैं कि कोई मिज़री (misery) आता है, कोई दुःख आता है, तो उसको हम पूर्व जन्म का बुरा कर्म कहते हैं। पर एक्चुअल ट्रिब्यूलेशन (actual tribulation)… Tribulation is stress and adversity. ट्रिब्यूलेशन के लिए आपको सोशल मीडिया की ज़रूरत नहीं है… जिसके कारण वो टेम्प्टेशन (temptation) उसके जीवन में आ गया है।
अगर इस जीवन का भी कर्मा था, जिसके कारण उसने वो टेम्प्टेशन को स्वीकार कर लिया। पर एक पर्सन के लिए एक रोमांटिक इंटरेस्ट (romantic interest) नहीं है… पर अगर वो नहीं करने के लिए, यह एक पर्सन के लिए एक रोमांटिक इंटरेस्ट नहीं है।
ग्रंथराज श्रीमद् भागवतम की जय! श्रील प्रभुपाद की जय! गौर भक्त वृन्द की जय! निताई गौर प्रेमानंदे हरि हरि बोल!