Hindi – Nityananda Prabhu’s opposite moods with Jagai-Madhai & Shrikant Sen – Chaitanya Charan
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Lecture Summary
सारांश: नित्यानंद प्रभु के विभिन्न भाव, जगई-मधाई का उद्धार और शिवानन सेन का प्रसंग
यह व्याख्यान चैतन्य चरितमृत और वैष्णव दर्शन पर आधारित है, जिसमें वक्ता (चैतन्य चरण दास) ने श्री नित्यानंद प्रभु की अचिंत्य कृपा, उनके विभिन्न भावों, और उनके जीवन की प्रमुख लीलाओं (जैसे जगई-मधाई का उद्धार और शिवानन सेन के प्रसंग) के माध्यम से भगवद्-भक्ति के गहरे रहस्यों को समझाया है।
मुख्य बिंदु
1. भौतिक जगत और आध्यात्मिक जगत का अंतर
- यह भौतिक जगत एक ‘यूनिवर्सिटी’ की तरह है, जहाँ हम स्वार्थ भाव से ऊपर उठकर सेवा और समर्पण का पाठ सीखते हैं।
- मनुष्य जीवन केवल ‘सर्वाइवल’ (जीवित रहने) तक सीमित नहीं है, बल्कि यह बलिदान और दूसरों की सेवा करने की प्रेरणा देता है।
- जब-जब इस सृष्टि में धर्म की हानि होती है, तब-तब भगवान विभिन्न अवतारों के माध्यम से जीवों को भगवद्-प्रेम और ईश्वर-सेवा की ओर प्रवृत्त करने के लिए अवतरित होते हैं।
2. चैतन्य महाप्रभु और नित्यानंद प्रभु की कृपा (फ्री होम डिलीवरी)
- कलियुग में महाप्रभु और नित्यानंद प्रभु का अवतार जीवों के उद्धार के लिए अत्यंत कृपालु है।
- वक्ता ने भगवद्-भक्ति रूपी औषध (दवा) का उदाहरण देते हुए समझाया कि भगवान की कृपा किस प्रकार कार्य करती है:
- फ्री अवेलेबिलिटी (निःशुल्क उपलब्धता): चैतन्य महाप्रभु ने हरिनाम और भक्ति की सुविधा सबको दी।
- फ्री होम डिलीवरी (घर-घर जाकर वितरण): नित्यानंद प्रभु ने स्वयं घर-घर जाकर, गलियों में घूमकर हर व्यक्ति तक हरिनाम और भक्ति पहुँचाई।
- चोट खाकर भी कल्याण करना: नित्यानंद प्रभु ने अकारण उपकार करते हुए, जगई-मधाई जैसे पापी और मद्यप व्यक्तियों द्वारा प्रहार (मटके का टुकड़ा लगने से चोट) सहने के बाद भी उन्हें क्षमा किया और परम कृपा प्रदान की।
3. दो प्रकार की कृपा: सुलभ कृपा और अचिंत्य (Incomprehensible) कृपा
- प्रथम कृपा (भक्ति की शुरुआत): जो समझने में आसान है—जैसे मुफ्त में दवा मिलना, हरिनाम का प्रभाव और शुरुआती भक्ति।
- दूसरी कृपा (भक्ति में स्थिरता/सस्टेन करना): यह कभी-कभी अचिंत्य और कठिन प्रतीत होती है, जैसे कभी-कभी भक्तों को अप्रत्याशित परीक्षाओं या चेतावनियों का सामना करना पड़ता है।
4. शिवानन सेन और नित्यानंद प्रभु का प्रसंग
- वार्षिक पुरी यात्रा के दौरान, यात्रा प्रबंधकों में से एक शिवानन सेन से कुछ विलंब हो जाने पर नित्यानंद प्रभु अत्यंत क्रोधित हो गए और उन्हें डाँटते हुए शाप तक दे दिया।
- इस घटना पर शिवानन सेन के भतीजे श्रीकांत सेन की प्रतिक्रिया बहुत आक्रामक थी। उन्होंने इसे ‘अन्याय और अत्याचार’ मान लिया और नित्यानंद प्रभु के प्रति नाराजगी जताते हुए आगे निकल गए।
- जब श्रीकांत सेन जगन्नाथ पुरी पहुँचे, तो चैतन्य महाप्रभु ने उन्हें बहुत प्रेम से समझाया कि भगवान या उनके आचार्यों के व्यवहार के पीछे के रहस्य को सामान्य बुद्धि से समझना कठिन होता है। महाप्रभु ने उन्हें वैरागी अपराध न करने और धैर्य रखने की सलाह दी।
- यह प्रसंग सिखाता है कि कठिन परिस्थितियों में भी आचार्य और भगवान के प्रति हमारी निष्ठा अडिग रहनी चाहिए।
5. श्रील प्रभुपाद का उदाहरण और जीवन का सार
अंततः, शिक्षा यही मिलती है कि जीवन की हर परिस्थिति में—चाहे अनुकूलता हो या प्रतिकूलता—हमें अपनी सेवा और भक्ति भगवान की प्रसन्नता के लिए जारी रखनी चाहिए और नित्यानंद प्रभु तथा चैतन्य महाप्रभु से शरणागति की प्रार्थना करनी चाहिए।
व्याख्यान के अंत में इस्कॉन के संस्थापक-आचार्य श्रील प्रभुपाद के जीवन का संदर्भ दिया गया, जिन्होंने वृद्धावस्था में अमेरिका जाकर अत्यंत प्रतिकूल परिस्थितियों (जीरो फैसिलिटी) में भी कृष्णभावनामृत का प्रचार किया।
Full Transcription
नित्यानंद प्रभु की महिमा और महाप्रभु का आगमन
प्रभु के बारे में मैं एक सृष्टि को सच्चा करूँगा कि कैसे शहर में महाप्रभु और नित्यानंद प्रभु साथ में जीवों के उद्धार के लिए आया करते हैं। कैसे हैं कि ये प्रभु नित्यानंद प्रभु के बारे में आपका स्वागत है। इसको कुछ नहीं, आपके लिए कुछ लिखूँगा। तो अगर आप देखना चाहते हैं, आपको वहाँ से लिखना चाहते हैं, तो अगर आप लिखना चाहते हैं, अगर आपके लिखना चाहते हैं, तो आपके लिखना चाहते हैं, तो आपके लिखना चाहते हैं। वो दोनों साथ में कार्य करते हैं, इस जगत में जीवों का उद्धार करेंगे।
हम जिस जगत में रह रहे हैं, यह है भौतिक जगत, इसके ऊपर इससे बहुत बड़ा है आध्यात्मिक जगत। और इस आध्यात्मिक जगत से कई बार भगवान आते हैं। आध्यात्मिक जगत से कार्य करेंगे। आध्यात्मिक जगत से कार्य करेंगे। आध्यात्मिक जगत से कार्य करेंगे। आध्यात्मिक जगत से कार्य करेंगे। आध्यात्मिक जगत से कार्य करेंगे। आध्यात्मिक जगत से कार्य करेंगे। आध्यात्मिक जगत से कार्य करेंगे। आध्यात्मिक जगत से कार्य करेंगे। आध्यात्मिक जगत से कार्य करेंगे। आध्यात्मिक जगत से कार्य करेंगे। आध्यात्मिक जगत से कार्य करेंगे। आध्यात्मिक जगत से कार्य करेंगे। आध्यात्मिक जगत से कार्य करेंगे। आध्यात्मिक जगत से कार्य करेंगे। आध्यात्मिक जगत से कार्य करेंगे।
भौतिक जगत और भगवान का अवतरण
एक है कि वो यूनिवर्सिटी के रूप में काम करेंगे। यूनिवर्सिटी मतलब क्या है? यहाँ पर हम कुछ सीखते हैं। और हम क्या सीखते हैं? हम कैसे स्वार्थ भाव से जीना है, सेवा भाव से जीना है। यहाँ पर हम कुछ सीखते हैं। यहाँ पर हम कुछ सीखते हैं। यहाँ पर हम कुछ सीखते हैं। यहाँ पर हम कुछ सीखते हैं। यहाँ पर हम कुछ सीखते हैं। यहाँ पर हम कुछ सीखते हैं। यहाँ पर हम कुछ सीखते हैं। यहाँ पर हम कुछ सीखते हैं। यहाँ पर हम कुछ सीखते हैं। सृष्टि का नियम है, पर सृष्टि का नियम जो है जीवन का उद्देश्य नहीं है। इसे कैसे नहीं है कि सृष्टि में सदस्य हैं जो चाहता है, शक्तिशालू होगा, वो दूसरों को दबाए रखेगा।
पर हम मानवों में देखते हैं, मानव केवल सर्वाइवल अप्रिटेशन से नहीं जीते हैं, मानव जो जीते हैं सैक्रिफाइस, बाइनरी अप्रिटेशन। जो शक्तिशाली करती है, मानव जो नदी में बच्चा डूब रहा है, तो कोई कहते हैं कि वो तो अनफिट है डूब रहा है। नहीं, पर जो शक्तिशाली है, जो चाहता है तैरना, वो खुद अपना जीवन जोखिम में डाल के वो खुद उसको बचाने लगता है। जो मानवता की विशेषता है, कि हम मानव सैक्रिफाइस कर सकते हैं, जो खुद के सूट के लिए लेना है, नहीं, जो सही में फिट है, वो क्या करना है, जो फिट नहीं है, उनको दबाना नहीं है, उनकी मानवता करना है, उनकी सेवा करना। शारीरिक रूप से फिट होते हैं, तो वो क्या करते हैं, शारीरिक स्तर पर दूसरों का संरक्षण, जो ब्राह्मण होते हैं, वो बौद्धिक स्तर पर फिट होते हैं, तो वो बौद्धिक स्तर पर दूसरों का संरक्षण।
तो इस जगत को एक यूनिवर्सल समझना ये धर्म का बात है। तो जब भगवान कहते हैं, क्या होता है, कि जब धर्म की खिलाफत होती है, जब धर्म की खिलाफत होती है, तो मैं अवतार लेता हूँ, यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अब तक जो है कि जो अलग जगत में अलग धर्म हैं, अलग रिलीजियस हैं, उनमें अलग-अलग तरह से भगवान के बारे में मुझे बताया गया है, उन सबके बारे में एक तरह से उद्देश्य एक ही है, कि लोगों को ईश्वरत्व सेवा और भगवत प्रेम के ओर प्रवृत्त करना। भगवान का व्यक्तित्व, भगवान का परिवार, भगवान के मित्र, उनका वर्णन विशेष रूप से आता है। तो अगर हम विषयों की भगवान की संकल्पना है, उसकी दृष्टि से देखते हैं, तो आज का उत्सव क्या है, किसी को पहले ही आता है।
भगवान का पंचतत्व अवतार और स्वार्थी जीवन का दुख
अगर आज पहले ही आता है, किसी को पहले ही आता है, किसी को पहले ही आता है, किसी को पहले ही आता है, किसी को पहले ही आता है, किसी को पहले ही आता है, किसी को पहले ही आता है, किसी को पहले ही आता है, किसी को पहले ही आता है, किसी को पहले ही आता है, किसी को पहले ही आता है, किसी को पहले ही आता है, किसी को पहले ही आता है, किसी को पहले ही आता है, किसी को पहले ही आता है, किसी को पहले ही आता है, किसी को पहले ही आता है, किसी को पहले ही आता है, किसी को पहले ही आता है, किसी को पहले ही आता है।
जैसे भगवान है, भगवान का एक पंचतत्व अवतार। जैसे कृष्ण बलराम होते हैं, वैसे ही समाधि बनते हैं। जैसे क्या तो पति हैं, नित्यानंद प्रभु का अवतार? अगर जो भरद की और स्वार्थी मिजाजी लगते हैं, तो उससे न केवल हम दूसरों को दुखी बनाते हैं, पर वो भी दुखी बनाते हैं। तो जैसे जो लोभी व्यक्ति होता है, वो दूसरों का शोषण करता है, उससे दूसरों को दुखी बनाता है। पर वो इतना शोषण करता है, तो वो प्राप्त कर लेता है और वो प्राप्त करने से कुछ भी सुखी नहीं होता है।
लोग जो होता है, उसके लिए वो भी देखते रहता है जो उनके पास नहीं है। तो क्या होता है जो लोग ग्रीडी होते हैं, जो ग्रीडी होते हैं, हमेशा बोलो नीदी होते हैं। तो ग्रीडी होते हैं, हमेशा नीदी होते हैं। इतना भी उनके पास होता है तो हमेशा कम है इसलिए। वो संतुष्ट नहीं रहते हैं। तो स्वार्थ है दूसरों के प्रति ना रहते हैं, खुद भी दुखी रहते हैं। खुद भी संतुष्ट नहीं होते हैं। तो ऐसे दुखमय जीवन से भगवान हमें राहत देना चाहते हैं।
कलियुग में चैतन्य महाप्रभु और नित्यानंद प्रभु का कृपा भाव
तो इस जगत में हम कहते हैं दुख होते हैं, डिस्ट्रेस होता है, दुख एक तरफ अपनी जगत नहीं होता है, अपनी जगत नहीं होता है, अपनी जगत नहीं होता है, अपनी जगत नहीं होता है, अपनी जगत नहीं होता है, अपनी जगत नहीं होता है, अपनी जगत नहीं होता है, अपनी जगत नहीं होता है, अपनी जगत नहीं होता है, अपनी जगत नहीं होता है, अपनी जगत नहीं होता है।
तो जो भगवान क्या करने हैं, भगवान क्या में संतीज देते हैं, तो जो आध्यात्मिक दुख होता है, वो हम आध्यात्मिक कर पाते हैं, और जो आध्यात्मिक दुख होता है, वो एलिमिनेट कर पाते हैं, तो इस तरह से जगत में जगत में दुख होता है, पर भगवान के इसी प्रपाल से हम वो दुख के परे जा सकते हैं, और वही संतीज बताने के लिए भगवान करते हैं।
तो कलियुग में जब गौरंग महाप्रभु नित्यानंद लोग आते हैं, तो यह जो है, दोस्त, कलियुग की चैतन्य महाप्रभु बहुत प्रपाल हैं, और उनका वो प्रपाल भाव है, वो हम नित्यानंद प्रभु और दर्शा करते हैं। कैसे चैतन्य महाप्रभु साथ में कारण करते हैं और उनके दिव्य सहयोग से कैसे हम सहयोग का भाव सीख सकते हैं और कैसे हम एक दूसरे में साथ सहयोग करके कारण कर सकते हैं, उसके बारे में महाचर्चा करते हैं।
तो अभी चैतन्य महाप्रभु कब आए थे, किसी को पता है? चारो बासो के लिए पता है किसी को? कहना आए थे, निर्मो कब था? नवद्वीप मायापुर में। अभी मायापुर में, योगपीठ मायापुर में। अभी ये चैतन्य महाप्रभु का जीवन है और नित्यानंद प्रभु चैतन्य महाप्रभु से छोटे हैं या बड़े हैं? बड़े हैं।
भगवान से बड़ा कौन और नित्यानंद प्रभु का आगमन
ये भगवान से बड़ा कौन हो सकते हैं? भगवान से बड़े सिर्फ भगवान ही हो सकते हैं। तो ये भगवान का अद्वैत तो नित्यानंद प्रभु जो होते हैं, वो कितने बड़ा एक जोकात है? पाटी जोकात है। तो नित्यानंद प्रभु का जन्म कहाँ हुआ था? एक चक्रवर्ती प्रभु तो अभी इन दोनों का पार्थ रास्ता था वो चक्रवर्ती प्रभु से मिलता है।
तो हम देखेंगे कहाँ का में इंटरसेक्शन होता है। और तो कैसे वो काले रहता है? तो अभी चक्रवर्ती महाप्रभु जो अभी जीवन में पहले वो एक बड़े पंडित, बड़े और पंडित की प्रकाष्ठा उन्हें प्राप्त की और फिर उन्होंने ये दिखाया कि पंडित से परे पंडित उससे क्या हो रहा है? उससे में लोग सोचते हैं, कम बुद्धि वाले लोग भक्ति करते हैं। ऐसा भाव होता है।
जो बुद्धि वाले लोग होते हैं, वो ज्ञानी होते हैं। वो अद्वैत का चिंतन करते हैं। तो महाप्रभु ने दिखाया कि वो बहुत बड़े पंडित थे, बड़े-बड़े पंडितों को उन्होंने हरा दिया।
तो महाप्रभु ने क्या किया? उससे सदा, जो कंटेम्पररी डेफिनेशन का सक्सेस था, उसमें वो सक्सेसफुल बुद्धि है। महाप्रभु ने सदा लोग भक्ति करते हैं तो अच्छा है, पर अगर मान लीजिए कोई आईआईटी से जुड़ा है वो भक्ति कर रहा है, तो तो क्या होता है अपने? ये क्या नहीं क्या विशेषे, तो भक्ति करती क्या होता है? अभी गुंगो बिंदम में आईआईटी बाबा बड़े पॉपुलर हो गए थे, गावी देखने के इस्कॉन में बहुत भगत हैं, जो आईआईटी बाबा के लिए करते हैं, और वास्तव में वो बहुत सेवा करते हैं, ये पर किसी कारणों से सेंसेशनल हो गया है, पर क्या है तो आजकर के समाज में जो सक्सेस का डेफिनेशन है, कोई बहुत बुद्धिमान होगा तो आईआईटी ऐसे बड़े उद्यान में जाएगा, मेरे पित्रे वो आईआईटी में पढ़ाई करने के लिए होंगे, तो मैं आईआईटी का नया स्ट्रुपांग दे किया, आईआईटी का आजकल के समाज में जो सक्सेस का डेफिनेशन है, कोई बड़े उद्यान में जाएगा, मेरे पित्रे वो आईआईटी में जाएगा, तो मैं आईआईटी का डेफिनेशन है, तो संन्यास आश्रम में लोगों से नियम होती है, पर जो अवधूत होते हैं, वो सन्यास आश्रम से भी परे खेला होती है, तो वो अवधूत बनते हैं, तो वो सारी भारत में भ्रमण करते हैं, और भी जैसे ही उनको पता चला, कि अभी महाप्रभु, जो उनके भाई वो अभी भक्ति का भाव प्रकट करने लगे, तो तुरंत वो नवद्वीप में आ गए, और फिर नवद्वीप में वो वहाँ में पहली बार यदिनाथ आचार्य माँ के भगत हैं, उनके विदर में उन दोनों की मुलाकात करें, और फिर बहुत लीलाओं में आगे, तो आप देख रहे हैं, तो इसलिए उन्हीं लीलाओं में हम फोकस करेंगे, उससे कुछ शांति देखने का प्रयास है।
महाप्रभु और नित्यानंद प्रभु की लीलाओं का अवलोकन
तो अभी जब महाप्रभु आए, तो एक तरह से मैं बोला, पहले उनका लाइफ का ओवरव्यू कर लेता हूँ, फिर बातें हम देखते हैं, तो चार साल तक महाप्रभु, जो मायापुर में वो भक्ति का भाव दर्शा थे, उसके बाद महाप्रभु ने क्या किया, सन्यास किया थे, और फिर वे जगन्नाथ पुरी चले गए, जगन्नाथ पुरी से तो यह दोनों मायापुर में आए थे, फिर उसके बाद में, क्या हो गया, महाप्रभु जो है, उसके बाद में पूरी में थे, और पहले तो नित्यानंद प्रभु के साथ पूरी में आए थे, और उसके बाद में कहा, आप वापस बंगाल में जाओ, और फिर बंगाल में रह रहे थे वो, और फिर आते थे और जाते थे, और ऐसे, मुझे अनेक सालों तक किया था, जब तक महाप्रभु का अवैध महाप्रभु नहीं था, और फिर जब महाप्रभु बहुधाम चले थे, तो उसके बाद नित्यानंद प्रभु की बहुधाम चले थे।
तो अभी हम दो लीलाओं में चर्चा करेंगे, एक जो थी यहाँ पर, जब महाप्रभु और नित्यानंद प्रभु दोनों साथ पर मायापुर नहीं है, और दूसरी ऐसी लीला है, जब नित्यानंद प्रभु ट्रैवल करके बंगाल से मायापुर आ रहे हैं, बंगाल से महावदान्य अवतार करता है, और जो महावदान्य अवतार हैं, बहुत प्रणाम है, वो इसलिए है कि जो भगवत प्राप्ति की विधि है, हरिनाम का दर्शन करना, हरिनाम करना, हरिनाम के द्वारा भक्ति के अग्रे आसानी से भगवान को प्राप्ति करता है, पर नित्यानंद प्रभु के उल्से भी ज्यादा कृपा मानते हैं, क्योंकि क्या है, ये अगर हम समझते हैं कि कैसे ये कृपा है, अभी मान लीजिए जब पेंडमिक था, जब पेंडमिक था, तो कुछ वैक्सीन बन रहे हैं, वैक्सीन इसके लिए इसके लिए अगर लोग पीड़ित हो रही हैं और कोई ऐसी दवाई है जो व्यक्ति को ठीक करती है, पर वो जो दवाई है, वो बहुत महँगी है, क्योंकि अभी-अभी भी तो वो बहुत महँगी दवाई है, तो अगर महँगी दवाई है, तो क्या होगा, उसको प्राप्त करने के लिए मुश्किल होगा, पर अगर मान लीजिए, वो महँगी दवाई को कोई फ्री देता है, तो क्या होता है, इसको हम बहुत कृपालु मानेंगे, कि अगर कोई महँगी दवाई को फ्री दे रहा है, तो कोई ऐसे हॉस्पिटल है, सारे पावर्स के लिए, यहाँ पे हमको तो एक पूरी मिल लेता है, यह बहुत उदारता की बात है, उदारता की बात है।
भौतिक जीवन का मोह और भगवान की कृपालुता
पर यह भौतिक जगत का मोह ऐसे है कि सबसे ही समस्या है जगत में, यह नहीं है कि हम मोह में हैं, एक समस्या है, हम अपने मोह में हैं, कि हमको मोह में हैं, यह नहीं पता नहीं है। कुछ लोग श्राप भी देते हैं, नहीं 10-17 सालों से पाश्चात्य देशों में, अमेरिका में उन्हें प्रचार कर रहा हूँ, तो क्या है कि थोड़ा महासंस्कृति भी देखने को भी है, तो मुझे एक बात पता है, हम सारे लोग सोचते हैं कि शराब पीना तामसिक कार्य है, कोई सत्त्वों को नहीं कर सकते हैं, प्रचुरों को नहीं कर सकते हैं, तामसिक कार्य कोई सत्त्वों को नहीं कर सकते हैं, प्रचुरों को नहीं कर सकते हैं, तामसिक कार्य कोई सत्त्वों को नहीं कर सकते हैं, तामसिक कार्य को नहीं कर सकते हैं, तामसिक कार्य को नहीं कर सकते हैं, काम एक लोगों को दिखाते हैं, आज तुम्हारे पापा से आदि ने, आज तुम्हारे पापा से आदिने, आज तुम्हारे पापा से आदिने, आज तुम्हारे पापा से आदिने, आज तुम्हारे पापा से आदिने, आज तुम्हारे पापा से आदिने, आज तुम्हारे पापा तो तुम्हारे पापा से आदिने, आज तुम्हारे पापा से आदिने, आज तुम्हारे पापा से आदिने, आज तुम्हारे पापा से आदिने, आज तुम्हारे पापा से आदिने, आज तुम्हारे पापा से आदिने, आज तुम्हारे पापा से आदिने, आज तुम्हारे पापा तो वो इतना श्राप दीजिएगा, कि उसको ये अहसास भी नहीं होने, श्राप दिया, ये कुछ नहीं होगा, अहसास भी नहीं होगा, तो क्या है, कि इस तरह से जो इतना मोहम है, उसको मोहम है, तो तुम्हारे पापा से आदिने कुछ नहीं होगा, तुम्हारे पापा से आदिने, तो क्या होता है, तो वो व्यक्ति फ्री मेडिसिन देना एक कृपा है, मान लीजिए कोई ऐसे है हॉस्पिटल से घर-घर जाना जाता है और वो दवाई ना रोडी फ्री अवेलेबिलिटी एक है कि आप यहाँ पे आ जाओ और आप ये देखो, फ्री अवेलेबिलिटी एक कृपा है, पर फ्री डिस्ट्रीब्यूशन फ्री अवेलेबिलिटी नहीं है, यह फ्री क्या है? फ्री होम डिलीवरी।
तो फ्री होम डिलीवरी क्या है? ये पापर घर-घर जाता है, तो चैतन्य महाप्रभु जो है, वो फ्री अवेलेबिलिटी देते हैं, और डिस्ट्रीब्यूशन लोग क्या करते हैं? फ्री होम डिलीवरी करते हैं। तो ऐसे है डिस्ट्रीब्यूशन रूप की कृपा गृहे-गृहे गिलिया। तो क्या करते हैं? घर-घर जाते हैं और घर-घर जाके वो दर्बोग से दर्शाते हैं कि आप जितने महाप्रभु आए हैं, जितने महाप्रभु आए हैं, तो अपने महाप्रभु आए हैं, तो यह हरिनाम मंत्र का, भगवान की भक्ति का, भगवान की स्मरण का ऐसा एक जादुई प्रभाव होता है कि व्यक्ति जो है, स्वार्थ से स्वार्थ वो सब धीरे-धीरे अपने आप करना होता है, तो यह ऐसी दवाई है जो वास्तव में जितने आप उसको सिखाते जाते हैं, उतना हमारे स्वार्थ से सिखाते जाता है, उतना ही हमारे संतुष्टि जो है, चान्वी और संतुष्टि वो बढ़ने जाती है।
तो यह इतनी अपनी होगी और उसमें भी क्या है, अभी प्री डिलीवरी करना यह बहुत परिक होता है, पर मान लिया जाए कोई किसी के घर में आता है दवाई देने होता है, तो क्या अगर टीबी होता है, तो क्या अगर टीबी होता है, तो क्या, अगर एक साल से इसकी दवाई दे लेते हैं, पर वो पीछा दवाई दे लेते हैं, इसके दवाई 22 साल से टीबी हुआ था, तो डॉक्टर नहीं होगा, तो पीछा दवाई दे लेते हैं, अगर टीबी होता है, तो क्या, अगर टीबी होता है, तो डॉक्टर नहीं होगा, तो पीछा दवाई दे लेते हैं, अगर टीबी होता है, तो पीछा दवाई दे लेते हैं, तो पीछा दवाई दे लेते हैं, अगर टीबी होता है, तो डॉक्टर नहीं होगा, तो पीछा दवाई दे लेते हैं।
जगई-मधाई का उद्धार और नित्यानंद प्रभु की अहैतुक कृपा
ये जो हैं, ये भाव है नित्यानंद प्रभु का कृपा के साथ, जगई और मधाई के साथ। नित्यानंद प्रभु क्या करते हैं, वो घर-घर रास्ते-रास्ते पर जा रहे हैं, और वहाँ पे वो जगई और मधाई को प्रणाम देने का प्रयास करते हैं, और तभी जब फ्री होम डिलीवरी होता है, तभी उसमें अटैक होता है, उसमें उसमें अटैक होता है, उसमें इंजरी होती है, पर फिर भी वो सर्विस एटीट्यूड रखता है, वो दूसरों का कल्याण सोचता है, तो ये क्या है? ये परम करुणा की पराकाष्ठा है।
मार के फ्री जब महाप्रभु ऐसे है, तो जब नित्यानंद प्रभु ऐसे है, जो पीड़ा है, जो मारता है, जो भी नित्यानंद प्रभु क्या करते हैं, वो जब महाप्रभु, नित्यानंद प्रभु को नहीं मोह करने के लिए जरूर नहीं हो, जब नित्यानंद प्रभु आक्रम हो जाता है, जैसे महाप्रभु बताना चाहिए जाता है, और शायद महाप्रभु तुरंत वहाँ पर आ जाते हैं, जब वहाँ पर आ जाते हैं, तो वो देखते हैं, नित्यानंद प्रभु एक छोटा सा बात प्रहार नहीं होता है, और वो पास नित्यानंद प्रभु हो दे, एक मटके का लटका होता है, जोर से पुरिदाल… [संदर्भित कथा के अनुसार] सारे शराबी भी एक समान में होते हैं, शराबी भी किसी ज्यादा शराब किया और किसी ज्यादा कौन शराब किया होते हैं।
तो क्या होता है कि अगर मान ले वो शराबी है और कोई… वो मटका महाप्रभु को मारता है, नजान लोई… जगई महाप्रभु के चांस में गिर जाता है, पर महाप्रभु जगई के चांस में कोई… कोई… कोई जगई के चांस में, मैं तुम्हें माफ नहीं करूँ, कल्पे माफ नहीं करूँ, अगर मैंने कभी कोई पुण्य किया है, मैंने कभी आपको पसंद किया है तो… तो क्या है, अगर सिर्फ मैं है तो भी अच्छा है, मैंने तरह अंगबंद कर रहा है, पर जो फियर है, फियर से, फियर से क्या होता है? फियर से एक्शंस जो होते हैं, वो चेंज होते हैं, हो सकते हैं, पर वो जो एक्शंस चेंज हैं, वो टेम्परेरी है और वो सुपरफिशियल है। बाहर जब तक वो खतरा है, तब तक मैं नहीं कर रहा हूँ, पर जो लव है, जो कम्पैशन है, उससे क्या होता है? केवल एक्शंस नहीं बदलते हैं, उससे देहज़ बदलता है।
तो महाप्रभु के सुदर्शी चक्र को देख करके क्या होता है? जगई अपना आक्रमण छोड़ते हैं, पर नित्यानंद प्रभु की कृपा का भाव कि हमने इस पर आक्रमण किया है, और वो व्यक्ति क्या कर रहा है? हमें हमारे लिए एक्शंस करते हैं, तो वो देख के लिए वो भगवान की शरण में हो जाता है, वो भगवान की पर्ची करने के लिए, नहाँ तक कि वो महाप्रभु है, तो यह नित्यानंद प्रभु की अद्वितीय कृपा है, कि जो भगवत भक्ति हैं, जो भगवत भक्ति में इसको प्राप्त करना बड़ा मुश्किल होता है, योगी लोग बहुत प्रयास करते हैं, सुदृढ़ भगवत प्रशांत आत्मानं कोटीश्च भगवत हैं, जो बहुत हैं, उन महान लोगों में वो दुर्लभ होते हैं, ऐसी वो प्राप्त भक्ति होते हैं, वो भगवत नित्यानंद प्रभु की संपत्ति होते हैं, यही उनकी बहुत प्रभु है, जो दाओ होता है, कभी-कभी हमारा प्रेम दिखाते हैं, कि हमारे भावनाएं हैं, हमारे इच्छा दुस्सा में होता है, वो हम प्रभु करते हैं।
मान लीजिए कोई हमारी मदद होने देते हैं, मैं इच्छा इच्छा करने की आदम से मुझे बहुत नाराज होते हैं, क्रोध आ गया है, पर अगर हमें अंदर का भाव है, प्रभु का भाव है, हम वो भावनाएं होते हैं, पर कभी कोई प्रेम होता है, वो दिखता है, एक्सप्रेशन्स जो भाव है, क्रोध है, योगी भाव है, वो दिखाना होता है, माँ उन्हें बिजात थी है, अगर चाहिए प्रेसिनी के बाद पहली बार कोई हॉस्टेल में रहने जाता है, तो तभी उसको भी डर लग रहा है चाहिए, तो माँ उन्हें बिजात थी है, क्रोध आ गया है, तो उसको भी डर लग रहा है, तो वो बच्चा है, क्रोधी का भाव, अगर वो बच्चे से लिरा हो रहा है, तो भाव आ रहा है क्रोधी का, तो जो माँ है, वो भाव को नियंत्रण कर रहा है, तो कभी क्यों? तो नित्यानंद प्रभु जो अपने भावना है, तो अपने नियंत्रण कर रहा है, पर मान लीजिए हमारा बच्चा है, हमारे बच्चे को माँ प्रापाया है, तो उसके सामने उसके प्रति माँ का पिता क्रोधी करते हैं, वो क्रोधी क्या है? वो प्रापाया का बच्चा है, जिसे प्रह्लाद को मारने के लिए रंजी पर आते हैं, तो क्या आता है? नरसिंह देव जो होते हैं, वो क्रोध के रूप में आते हैं, क्रोध जो होता है, वो विश्व के इतिहास में से क्रोध करता है, तो दोनों तरह से महा है, तो ऐसे लिए नहीं है कि जिंघर महाप्रभु का प्रेम नहीं है, जिंघर महाप्रभु का प्रेम है, और दोनों का प्रेम नहीं है, और दोनों का प्रेम है, वो अलग-अलग भाव से दिखता है, और दोनों वो प्रेंटे की काल करते हैं।
तो बच्चे को बढ़ा करना एक पेरेंट के लिए बहुत बच्ची है, तो दो ते सिंपल पेरेंट पैनलिस जो कर रहे हैं, ऐसे उनका जो समर, उनका जो डेडिकेशन है, उसकी सराहना करने के लिए बहुत बच्ची है, तो क्या होता है, तो माँ का ही भाव होता है, तो एक पेरेंट होता है जो लव होता है, दो पेरेंट जरूरी हैं क्योंकि एक पेरेंट जो होता है वो अनकंडीशनल लव देता है और दूसरा पेरेंट जो होता है वो कंडीशनल लव देता है, क्योंकि बच्चा लव रक्षा माँ से बहुत ऐसा है, अभी जाहिर माँ होने के लिए कुछ नहीं होना चाहिए, कुछ नहीं होना चाहिए, जाहिर माँ होने के लिए ऐसा नहीं चाहिएगा आप, तो क्या है, अभी दोनों जरूरी हैं, क्योंकि अगर दोनों का लव अनकंडीशनल हो जाएगा, तो क्या होगा, बच्ची वो डिसिप्लिन काउंट होगा, बच्चा बड़ा कैसे होगा, दोनों का लव अनकंडीशनल हो जाएगा, तो फिर वो बच्ची को लव के लिए… तो क्या है, वहाँ दोनों की कृपा है, चैतन्य महाप्रभु की कृपा है, पर क्या है, वो कृपा का भाव हो जाएगा, और नित्यानंद प्रभु एक बहुत विशेषी का भाव हो जाएगा। तो अभी मैं एक और कहानी बताऊंगा, उसमें नित्यानंद प्रभु का भाव विशेषी का भाव… पर वो एकिकेट को भी आदिष्ट नहीं है
भगवान के विविध गुण और नित्यानंद प्रभु की अचिंत्य कृपा
कुछ जरूरत होता है, कुछ इकेट होता है, शिष्टाचार होता है, शिष्टाचार नहीं है, नियम नहीं है, पर वो ऐसे कार्य करना होता है। तो कभी कोई मित्मा, प्रीतमित, प्रीतमित गजलते हैं, वो बिल्कुल पर वो बरहमी होना बात होनी है, क्योंकि भगवान ऐसे है, थाने भगोन ऐसे है, और भगवान उसके परिविविर्ध करता है, तो किसी एक गुण से हम भगवान को सीमित करते हैं। वो गुण भगवान में हैं, पर क्या होता है, अगर भगवान को क्रोध नहीं करते हैं, वो दिखाते हैं और बहुत आत्रित्या को से पार दिखाते हैं। केवल वही भुने की घंडी, हर एक व्यक्ति को होता है। उनके अलग-अलग भाव होते हैं, अलग-अलग मून होते हैं। पर कम छोड़ी यहाँ तो शब्द देते हैं, पूर और विशन।
इस इसमें प्रभुपाद जी का पूर के लिए होता है। तो क्या है, कभी-कभी हम दोनों शब्द एक साथ मिलते हैं, पर वास्तव में दोनों शब्द बहुत मिलते हैं, कैसे थी प्रभुपाद जी का एक मिशन था, पर उनके मेनी मूड्स थे। कि अलग समय में मूड्स थे, कभी-कभी लोग देखते थे कि हमारा जब्दुपण है, उससे जब्दुपण कोई लोग जब्दुपण नहीं है। तो प्रभुपाद जी के अलग मूड्स थे, पर मिशन क्या था? एक ही मिशन था कि कृष्णा पावना होता है।
तो वैसे ही नित्यानंद रोहों का अलग महारोगा एक ही मिशन है, कि सबका अलग महारोगा करते हैं, पर उनके भी अलग महारोगा नहीं होता है। तो दूसरा ही बात नहीं है, नित्यानंद रोहों के सन्यास लेके जगन्नाथ पुरी में रह रहे थे, तो नित्यानंद रोहों के शक्ति वहाँ पे आए, तो नित्यानंद रोहों के शक्ति वहाँ पे आए, तो नित्यानंद रोहों के शक्ति वहाँ पे आए, तो नित्य तो नित्यानंद रोहों के शक्ति तो नहीं करता था, पर भी आदेश किया है, इसलिए चले थे। अभी हर साल, जब माया भूल से, जब मैंकौल से आते थे, चार महीने चार भूल का से होता था, तो तभी वो पुरी आ रहे थे और तभी वो महाप्रभु पसंद करते थे, जब इतने पर लोग आते थे, महाप्रभु को देखे बहुत पसंद होते थे, पर बात में किलिए थे, चार महीने बहुत लंबा समय है, कैसे है कि मानते जाएँ कोई पत्रेश में पुछार करता है, और हम महाप्रभु देखा थे, नाम देखा थे, तो चार महीने महाप्रभु देखा थे, तो आपका चार महीने महाप्रभु सेंटर देखा था, तो तो समझ देना आपको, आपके आपकी सेवा एविज़े ले गया था, तो महाप्रभु देखा थे कि तुम मत आओ, और हर साल महाप्रभु देखा थे कि तुम मत आओ, और हर साल देखा थे कि तुम मत आओ, तो हर साल महाप्रभु देखा थे कि तुम मत आओ, तो हर साल महाप्रभु देखा थे कि तुम मत आओ, तो हर साल महाप्रभु देखा थे कि त…
शिवानंद सेन और नित्यानंद प्रभु का प्रसंग
तो अभी एक बार ऐसे ही जिनजान आ रहे हैं, तो सारे जो भक्त जाते थे, तो वहाँ पे ये सारे क्या तरह होते जाते थे, तो याफटरा के जो मेनिजिनल थे, वो शिवानंद से जाते थे, और उस साले जाना, तो एक भक्त जा रहे थे, तो हर जिनलों पे एक बार तो उस साले जो बादा थे, तो… तो नखा था, तो तो नखा थे, वो बहुत बहसे नाखा थे, तो शिवानंद से बात कर रहे थे, तो उनकी कमे लग जाएगा, तो बाकी साल को जाना था, तो तो नखा थे, तो बाकी साल चले गया, तो शिवानंद से प… तो तो नखा थे, तो तो नखा थे, तो तो नखा थे, तो तो नखा थे, तो तो नखा थे, तो तो नखा थे, तो तो नखा थे, तो तो नखा थे, तो तो नखा थे, तो तो नखा थे, तो तो नखा थे, तो तो नखा थे, तो तो नखा थे, तो वैसे ही आ गए, नवर्भुक्र बताया, नित्यानंद पर नाराज हो गया है, तो नित्यानंद पर नाराज हो गया है, तो अभी क्या हो गया था, तो शिवानंद सेन पर नाराज हो गया था, और नित्यानंद प्रभु पर जैसे शिवानंद सेन पर देखा, नवर्भुक्र पर नाराज हो गया, तो कहा कि तुम्हारे बारे में एक तनते भुका, आ तुम किनने गयर से मिला, मैं तुम्हें शाप देता हूँ।
अभी यहाँ जब हुआ, तो अभी यहाँ पर नित्यानंद प्रभु थे, यहाँ पर शिवानंद सेन पर देखा, वो शिवानंद के साथ उनके एक नेफ्यू क्या होता है भाव्या है नहीं, वो भी यहाँ पर देखा, तो वो कौन थे? श्रीकांत सेन, वो भी थे। तो अभी नित्यानंद के लिए जो कार्य किया, एक बस कहती है अनक्रीडिबल, नहीं क्या होता है, मैं कोई आरांदर सो नहीं रहा, मैं यहीं पर ही होजना कर रहा था, वो आपे बस किया, कोई सकते है, तो क्या होता है? अभी नित्यानंद के लिए नहीं कह सकते है, एक्शन… ये प्रभु, ये तो मेरी कृपा है, कि आपके चरण का मल, मैं भी च्छाची कर रहा हूँ, और मैं माफी चाहता हूँ कि आपको सुनदा होते, मैं अपनी होजना कर रहा हूँ, कि वो बिल्कुल उत्सा नहीं हुए, वो बिल्कुल कोई जस्टिफाई नहीं…
श्रीकांत सेन की प्रतिक्रिया और महाप्रभु का सांत्वना
तो अभी ये मुझकृपा मान लिया, पर ये बात हो गया, पर क्या हो गया, अर्जातों की तो तो शांत हो गया, वो भी उनके साथ देखे, सब कुछ हो गया, पर ये क्यों थे, शिवानंद जी, श्रीकांत सेन, वो क्या हो गया, वो मान लिया है, वो कहने जा ये तो क्या है मर्जी नहीं, ये अट्रोसिटी है, अट्रोसिटी ये अन्याय, अत्याचार है, क्या ये तो इतने से डिमार्ज कर सकते हैं अब ही, मैं, जैसे चाचा में तो बड़ी लेकती हूँ, मैं अत्याचार से डिमार्ज कर सकते हूँ, ये भी जैसे हाँ हो गया हो गया है, वो इतने कुछ उत्सा हो गया है, कि वो महले कि पाकिसम पर बोल रहा है, तो मैं बोल रहा हूँ, वो महान है, तो मैं क… तो वो आगे चले गया है।
तो जब वो आगे चले गया है, तो फिर वो पहले ही पहुँच गया है, कहाँ, जगन्नाथ में पहुँच गया है, और जगन्नाथ में पहुँच गया है, तो मैं पहले से पहुँच गया हूँ, और जगन्नाथ में पहुँच गया है, तो मैं… पहुँच गया हूँ, पहुँच गया हूँ, पहुँच गया हूँ, पहुँच गया हूँ, पहुँच गया हूँ, पहुँच गया हूँ, पहुँच गया हूँ, पहुँच गया हूँ, पहुँच गया हूँ, पहुँच गया हूँ, पहुँच गया हूँ, पहुँच गया हूँ, कि तुम अन्वास्थान नहीं करोगे, तो जैसे वोल्डे वाला था, महाँ भूने का कुछ नहीं है, कोई जहरे से मैं देख रहा हूँ, कि महाँ विच्चित हो तो पहले से उसका महाँ विच्चित है, उसका महाँ तुम पहुँच जीदी है, तुम पहुँच जीदी है, तो पहले, अभी महाँ भूने का स्नेहर के साथ वाच्चित के में महाँ भूने नहीं कहा कि त्यान हो तो मेरे भाई के तुम को अच्छा कर सकते हूँ, तुम को अच्छा कर सकते हैं, तुम दे रहे हूँ, विश्ण वे रति आपको तुम्हारे बिद्गेरना नहीं चाहिए, विश्णा अपराद नहीं करो, उसे चले जाए पड़े स्लेक्ष नहीं चाहिए, विश्णा नहीं चाहिए, तुम्हारे बिद्गेरना नहीं चाहिए, तुम्हारे बिद्गेरना नहीं चाहिए, तुम्हारे बिद्गेरना नहीं चाहिए, तुम्हारे बिद्गेरना नहीं चाहिए, तुम्हारे बिद्गेरना नहीं चाह…
क्यों? अगर कुछ गलती होती है, वो प्रासार्ण में प्रासार्ण कर सकते हैं, पर कुछ हमारे नियातन्ते परे होता है, उसके कारण वो दूस्सा वाले होता है, तो हमें प्रासार्ण कर सकते हैं, हमें प्रासार्ण कर सकते हैं, हमें प्रासार्ण कर सकते हैं, हमें प्रासार्ण कर सकते हैं, हमें प्रासार्ण कर सकते हैं, हमें प्रासार्ण कर सकते हैं, हमें प्रासार्ण कर सकते हैं, हमें प्रासार्ण कर सकते हैं, हमें प्रासार्ण कर सकते हैं, हमें प्रासार्ण कर सकते हैं, वाहरोप से सिदा पर ऐसा करके उन्होंने शिवानन सेंगी महिमान करें, कि हम सबके साथ अन्याय होगा, क्यों होगा, क्यों होगा, एसे होगा, इजाकिफ्यक का सुभाव होगी है, उसके पावजूर अगर हम भगवान के पति सेमा हाँ रह सकते हैं, वो ये बहुत पर…
प्रभुपाद का उदाहरण और नित्यानंद प्रभु की अचिंत्य कृपा का सार
प्रभुपाद जी जब अपने लिए 70 साल के उमर में अमेरिका चले गए, उस समय न प्रभुपाद जी ने बहुत प्रयास किया था, बहुत प्रयास करने के बाद नहीं, कुछ ज़्यादा यश नहीं रही था, कुछ बंट दिख पाया थे, एकी बंट पी शिष्चें 40 नहीं था, माइनस 40 था श्रीकांत सेन का प्रभुपाद नहीं कर सकता, वो दिपनी था, श्रीकांत सेन का प्रभुपाद नहीं कर सकता, वो दिपनी था, श्रीकांत सेन का प्रभुपाद नहीं कर सकता, वो दिपनी था, श्रीकांत सेन का प्रभुपाद नहीं कर सकता, वो दिपनी था, श्रीकांत स… और जब ऐसे होता है, तो ऐसे नहीं है, कि चैतन्य महाप्रभु सिद्धान्त को कैसे सोच कर सकते हैं, जो हम सब काफ़तों का आदरच होता है, कि इतना भी बड़ा हमारे ज़िहन में हो जाये, हमारी प्रतिक्रिया शिवाननसेन के साथ है, ये तो तो पेड… जो भी बड़ा हुआ है, जो भी बड़ा हुआ है, जो भी बड़ा हुआ है, जो भी बड़ा हुआ है, जो भी बड़ा हुआ है, जो भी बड़ा हुआ है, जो भी बड़ा हुआ है, जो भी बड़ा हुआ हुआ है, जो भी बड़ा हुआ हुआ है, जो भी बड़ा हुआ हु…
श्रीकांत सेन की जो प्रतिक्रिया हुई है, इसमें क्या है? चेतन महाप्रोमोडियों से प्रतिक्रिया हुई है, चेतन महाप्रोमोडियों से प्रतिक्रिया हुई है, चेतन महाप्रोमोडियों से प्रतिक्रिया हुई है, चेतन महाप्रोमोडियों से प्रतिक्रिया हुई है, चेतन महाप्रोमोडियों से प्रतिक्रिया हुई है, चेतन महाप्रोमोडियों से प्रतिक्रिया हुई है, चेतन महाप्रोमोडियों से प्रतिक्रिया हुई है, चेतन महाप्रोमोडियों से प्रतिक्रिया हुई है, चेतन महाप्रोमोडियों से प्रतिक्रिया हुई है, चेतन म महाप्रोमोडियों से प्रतिक्रिया हुई है, चेतन महाप्रोमोडियों से प्रतिक्रिया हुई है, चेतन महाप्रोमोडियों से प्रतिक्रिया हुई है, चेतन महाप्रोमोडियों से प्रतिक्रिया हुई है, चेतन महाप्रोमोडियों से प्रतिक्रिया हुई है, चेतन महा प् महाप्रोमोडियों से प्रतिक्रिया हुई है, चेतन महाप्रोमोडियों से प्रतिक्रिया हुई है, चेतन महाप्रोमोडियों से प्रतिक्रिया हुई है, चेतन महाप्रोमोडियों से प्रतिक्रिया हुई है, चेतन महाप्रोमोडियों से प्रतिक्रिया हुई है, चेतन महा प् प्रतिक्रियों से प्रतिक्रिया हुई है, चेतन महाप्रोमोडियों से प्रतिक्रिया हुई है, चेतन महाप्रोमोडियों से प्रतिक्रिया हुई है, चेतन महाप्रोमोडियों से प्रतिक्रिया हुई है, चेतन महाप्रोमोडियों से प्रतिक्रिया हुई है, चेतन महाप्रोम…
प्रभुपाद जी जो भगवान के ऐसे लीला होती है, तो भी समझने में मुझे कुछ-कुछ हो जाता है। प्रभुपाद जी सारे विश्व में प्रचार करने के बड़े-बड़े प्रकल्प तो बना रहे थे, पर एक प्रकल्प का एक प्रकली था जिसमें प्रभुपाद जी तो कौन सारे नहीं थे, शायद कहीं कोई साथ है विश्व। जर्गी, प्रभुपाद जी तो भगवान ने नवंबर 14, 1977 को विला जा जाना था। और केवल 2 महीने पर, जनवरी 14 को यू हुमन दे का लाण के लिए ज़िने जाना था। तो अभी प्रभुपाद जी ने इतनी मेहनत की थी, वो मंदिर को लाने के लिए और प्रभुपाद जी कृष्ण से कहते थे कि कुछ सद्गी को कहने के लिए जीने तो मुझे देखो, मैं ये मंदिर देखूँगा, आपके लिए मैं मंदिर बढ़ा था और जी ने सद्गी के लिए तो प्रभुपाद को पूछा देखा था कि आपके लिए आपके लिए चाहिए? प्रभुपाद जी ने कहा कि कुछ चाहिए कि कुछ चाहिए कि सेवा किया है, वो सेवा का क्रेडिट प्रभुपाद नहीं जाएगा, सेवा किया है, उसका सक्सेसफुल कंप्लीशन यह पूरा हो जाएगा, वो गिंदिश्वने के लिए तो प्रभुपाद नहीं जाएगा, उनकी जो असक्ति थी, एवन भगवान के साथ और जो एक सी तुम्ही असक्ति है, वहाँ भगवान की प्रभुपाद नहीं जाएगा और विद्यान प्रभु से हम प्रार्थना कर सकते हैं।
तो इस जगत में कोई भी चीज़ हमें भगवान से कर सकते हैं, हर भगवान से भगवान कर सकते हैं और विद्यान प्रभु से हम प्रार्थना कर सकते हैं, विद्यान प्रभु से हम प्रभु से हम प्रार्थना कर सकते हैं। जगत एक तरह से जंगल बन जाता है, अगर हम सेल्फलेस रहते हैं, इस बाद हम चाहते हैं यूनिवर्सिटी बन जाता है, तो हमें इन जंगल से यूनिवर्सिटी जाने के लिए भगवान धर्म की समस्थमा अपना रहते हैं और ये करने के लिए भगवान भारा होता है, तो ये भगवान धर्म की समस्थमा है, तो इसमें जान देना, भगवान धर्म की जान देना, यही धर्म की समस्थमा है।
पर हम देखते हैं, नित्यानंद प्रभु एक तरह से कहते हैं, एक अंडरस्टैंडेबल मुसी, एक एक कृपा जो है, वो आसानी से हम समझ सकते हैं क्या है? कि जो बड़ी महँगी दवाई है, वो फ्री देना और उसका रापियो फ्री देना और उसका होम डिलीवरी करना और होम डिलीवरी के गार भी इंजरी भी होता है, तो होगी क्या है, उसको फिर भी उस व्यक्ति के लिए माफी माँगना और उस व्यक्ति को फिर भी कृपा देना, तो फ्री जो देना है, वो क्या है? यह चैतन्य महाप्रभु की कृपा है। होम डिलीवरी करना, नित्यानंद लोगों की कृपा है। पर होम डिलीवरी इन स्पाइट ऑफ इंजरी, यह जो है चैतन्य महाप्रभु के नित्यानंद लोगों के जगई-मधाई के कृपा है, मेरी पार डिलीवरी ये कृपा है, मार खेल करें डिलीवरी।
पर ये दूसरी कृपा जो है, नित्यानंद प्रभु की इनकंप्रिहेंसिबल मानसी, जो ऐसी कृपा है, जो शायद समझ में नहीं आती है, वो भी कृपा है। ये क्या है? यह पहली कृपा जो है, हमें भक्ति में स्टार्ट करने होगे तर, पर ये दूसरी है, वो हमको सस्टेन करने होगे तर। वो क्या है? नित्यानंद प्रभु ने से अनरीजनेबल कार्य किया। जो अनरीजनेबल क्या था? जो शिवानंद सेन से बड़े कुदित हो गए। तो जब ऐसे हो गए, तो शिवानंद सेन की चेतना है, वह महाप्रभु की प्रभाव है, कि ऐसे परिस्थिति नहीं हो, वह भगवान प्रभु है। अब यह शिवानंद सेन की जो प्रतिक्रिया है, वह क्या है? एक ह्यूमन रिएक्शन है। तो उस समय में उनको शिवानंद महाप्रभु ने सांग मिलता है, तो हमें क्या है, हमें चाहते हैं कि हमें नित्यानंद प्रभाव मिल जाएँ परिस्थिति में, इसी परिस्थिति में हम प्रभुनां भी अनुकूल रहें, और प्रतिकूल नहीं, पर कोई प्रतिकूल बन जाना है, तो नित्यानंद प्रभु ने चैतन्य महा सांग मिलता है, हमें कोई सांग मिलता है, कि अगर भी नित्यानंद प्रभु की कृपा है, नित्यानंद की कृपा से ही चैतन्य महा कृपा करता है, तो चाहिए हमें एक पैसी कृपा मिलने जरूरत होती है, और कभी कोई शायद हमें पैसी कृपा बनना है।