Hindi-What does simply living mean practically Mumbai – Chaitanya Charan
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हरे कृष्णा
हरे कृष्णा
आज सुबह आप सबका स्वागत है। यहां पर प्रभुपाद जी कह सकते हैं हम फुल फॉर्म में है। एक लंबा तात्पर्य दे रहा है और उन्होंने कहीं कई विचार व्यक्त की है कई भावनाएं व्यक्त की है। और अगर हम देखेंगे ये प्रथम स्कंद प्रभुपाद जी ने कब लिखा हुआ है कि जब प्रभुपाद जी अकेले हैं। प्रभुपाद जी के कोई अनुयाई नहीं है, उनका कोई प्रभाव नहीं है। तो उनके ग्रंथ कोई पढ़ने वाला है वो भी पता नहीं। है पर फिर भी प्रभुपाद जी का पूरा विश्वास है उनका जो स्ट्रेंथ ऑफ कन्विक्शन है वो यहां पे स्पष्ट दिखाई दे रहा है तो जो चित्त का फ्रेमवर्क है सॉरी जो कॉन्टेक्स्ट जो है संदर्भ क्या है कि यहां पे एक शास्त्र का संदर्भ है और फिर तो शास्त्र के जो टिप्पणी लिखने वाले जो भाष्य लिखने वाले लिखने वाले आचार्य उनका संदर्भ है तो आज मैं उसपे ज्यादा जोर दूंगा क्योंकि हम कई भक्तों से अभी ये संदर्भ देख रहे हैं कि किस तरह से महाराज युधिष्ठिर राजा बन गए और एक तरह से यहां पे भागवतम में थोड़ा फास्ट फॉरवर्ड किया गया है। अभी कोई भी घटना होती है, कोई भी प्रसंग होता है, अगर आपसे वृंदावन यात्रा को जाते हो। तो ऐसे नहीं कि वृंदावन यात्रा की हर घटना को आप बताएंगे। तो कोई आपको पूछता है क्या हुआ? तो कौन सी घटना आपके लिए महत्वपूर्ण है जो बताई जा रही है। तो एक तरह से जो युद्ध हो गया वो वॉर हुआ और उसके बाद में जो पूरा रिहबिलिटेशन कि अभी युद्ध से रिकवर करना आसान नहीं है। युद्ध में बहुत विनाश होता है। युद्ध में बहुत पैसा खर्च होता है। युद्ध में जान जाती है लोगों की। तो उससे पुनः राज्य को स्थापना करना इतना आसान नहीं है। तो सारा रिहबिलिटेशन जो है इसका ज्यादा वर्णन यहां पे नहीं है। उस रिहबिलिटेशन के बाद में क्या आया है? िटी समृद्धि जो आई है वो समृद्धि का वर्णन भागवतम में हो रहा है और ये समृद्धि के जो लक्षण बताए जा रहे हैं क्या बताया जा रहा है कामम वर्षजन्य तो दो चीजें बताई जा रही है कि हम जो मानव रहते हैं इस जमीन पर तो एक तरह से हम हमारे संघर्ष में लगे रहते हैं कि मुझे ये प्राप्त करना है ये व्यक्ति ने ऐसा किया ये व्यक्ति ने मेरी बात क्यों नहीं सुनी हम इस एक तरह से इस हॉरिजॉन्टल जो विज़न होता है, इसमें फंसे होते हैं कि मैंने यह काम किया, तो फिर मुझे यह मिलेगा, यह काम नहीं किया, तो यह नहीं मिलेगा। मैंने इतना किया था, उसने क्यों नहीं दिया मुझे यह? तो, हम यह हॉरिजॉन्टल रीज़न में रहते हैं। पर वास्तव में जो हमारा जीवन है, वो हमारे ऊपर से और हमारे नीचे से जो आ रहा है उस पर बहुत निर्भर है। तो क्या है? कामम परजन्य। ऊपर से क्या आता है? जल आता है। अभी केवल जल ही नहीं आता है, ऊपर से सूरज भी आता है। उससे सन से क्या होता है, लाइट आता है और फिर हमारा सारा जो हीट और पावर आता है तो जो हम अलग-अलग तरह से यूज़ करते हैं। तो हमारे ऊपर से जो आ रहा है सर्व काम सो क्या है? कामम वर्ष पर्जन्य। मानव की समृद्धि के लिए जो ऊपर से आता है पानी वो बहुत महत्वपूर्ण है। और नीचे से क्या आता है? नीचे से अनाज आता है। सबसे पहले फूड आता है। वो पृथ्वी से आता है। तो सर्वकाम दुगाम कि पृथ्वी भी प्रचुर मात्रा में सब कुछ दे रही है। सर्वकाम दुगाम तो प्रभुपाद जी अन्न होता है। पर अन्न के अलावा यहां पे क्या होता है? मिनरल्स होते हैं। अभी मिनरल्स में अर्थ से पृथ्वी से क्या-क्या आता है? ऑइल हो सकता है। गोल्ड ज्वेल्स हो सकते हैं। अलग-अलग चीज़ हो सकती है। तो अभी हम देखते हैं कि आज भी जो राज्य बहुत पावरफुल है एक तरह से वहां पे जो पृथ्वी से आता है वो बहुत महत्वपूर्ण है। जो मिडिल ईस्ट इतना पावर तो क्या इन्फ्लुएंशियल है क्योंकि इतना वहां पे ऑइल आता है। चाइना बहुत इन्फ्लुएंशियल बन गया है क्योंकि वहां पे जो रेयर अर्थ मिनरल्स जो सारे इलेक्ट्रॉनिक व्हीकल्स में वगैरह लगते हैं वो चाइना का मोनोपोली है। किसी और राज्य के उतने है ही नहीं। ताइवान छोटा सा राष्ट्र है। पर वो चाइना से खिलाफ जाता है और अकेला रह पा रहा है क्योंकि ताइवान के पास जो सेमीकंडक्टर का सप्लाई है वो उसके लिए अमेरिका उसको संरक्षण कर रहा है। सारा विश्व उसका संरक्षण कर रहा है। तो पॉइंट क्या है कि हम हमारे जीवन में हम सोचते हैं कि मुझे ये काम करना है, ये करना है और ये सब करना जरूरी है हमारे लिए। पर हमारे अस्तित्व के लिए हमारे प्रयास के अलावा और बहुत कुछ जरूरी है। तो अभी ये जो ऊपर से अभी जो आ रहा था प्रचुर मात्रा सर्व काम दुधामह जो जो हमारी इच्छाएं जो जरूरत है उनको पूरा करने वाली पृथ्वी जो है और उसमें क्या जा रहा है कि और कितनी समृद्ध थी उसका लक्ष्य दिया जा रहा है कि कभी-कभी ऐसा होता है रेगिस्तान मतलब जमीन पे कुछ पानी भी नहीं होता है
और भारत ये गर्म जगह होती है तो इसीलिए हम देखते हैं कि बहुत गर्मी होती है कोई क्या कोई बड़ा व्यक्ति आने वाला है या कोई उत्सव है तो जमीन पर भी हम पानी स्प्रिंकल करते हैं उससे क्या होता है थोड़ा कूलिंग एटमॉस्फियर होता है तो अभी स्प्रिंकल करने के लिए अगर पानी ही नहीं है तो वो कमी है। पर यहां पे बताया जा रहा है कि स्प्रिंकल करने के लिए दूध था। जो गायों के गायों के स्तन में जो दूध था वो आनंद से इतना दूध दे रहे थे। तो ये एक समृद्धि का लक्षण है। तो यहां पे जो प्रोस्पेरिटी समृद्धि है उसका वर्णन हो रहा है। और फिर ये मैं संदर्भ की चर्चा कर रहा हूं यहां पे कि ये संदर्भ को लेकर प्रभुपाद जी क्या कर रहे हैं? जो आधुनिक समाज जो है उसकी तुलना कर रहे हैं और आधुनिक समाज की तुलना में प्रपाद जी काफी चीजों के बारे में सवाल उठा रहे हैं उनका खंडन कर रहे हैं तो उसमें काफी है पर उसमें मैं एक पॉइंट जो हमारे नियंत्रण में है उसपे मैं थोड़ा जोर दूंगा तो साधारणता क्या होता है जो शास्त्र होते हैं अभी शास्त्र जो होते है वो एक समय पे अभी हम कह सकते हैं कि अराउंड जो स्क्रिप्चरल रेवेलेशन स्क्रिप्चर का जो रेवेलेशन होता है मतलब जो बताए जाते हैं वो एक समय बताए जाते हैं। तो हम कह सकते हैं अप्रोक्समेटली ये 3000 साल पहले हुआ था। तो अभी आज जो है हम 2025 में है। तो ये जो टाइम का डिवीजन हम जो मानते हैं वो वो जीसस के जन्म से हमने बताया था तो एडी और बीसी आता है वो आज आज क्रिसमस भी है। तो अभी कैसे है कि इसमें अभी यहां पे एक परिस्थिति थी एक सिचुएशन एक सरकमस्टेंस था। और अभी आज एक परिस्थिति है। तो सरकमस्टेंस जो है आज का है ये। तो अभी स्क्रिप्चर में जो होता है उसका जो संदेश है, शास्त्रों का जो संदेश है वह सनातन है। सनातन मतलब वो अभी शास्त्र बोलने के पहले भी वो लागू था क्योंकि वो प्रिंसिपल्स टाइमलेस है। धर्म के प्रिंसिपल्स है। धर्म ये समाज में और निसर्ग में और भगवान के साथ जीने के लिए टाइमलेस प्रिंसिपल्स वो बताए गए। पर वो जो प्रिंसिपल्स होते हैं वो अलग-अलग जगह पे अलग-अलग तरह से अप्लाई होते हैं। तो अभी प्रभुपाद जी क्या कर रहे हैं? वो वहां पे जो हुआ है उस समय जो हुआ है और जिस प्रकार समृद्धि आई है और प्रभु तुलना कर रहे हैं अभी आज क्या हमारे पास समृद्धि आई है वो समृद्धि अभी नहीं आई है और वो कह रहे हैं किस तरह से मेनली प्रभुपाद जी जो बोल रहे हैं आजकल का एनालिसिस करते हैं तो उसमें वो तीन चीजें बोल रहे हैं एक है पहले वो बता रहे हैं कि एनिमल्स कि इतने सारे जानवरों को मारा जा रहा है दूसरा है प्रभुपाद जी बोलते हैं कि इंद्रिय तृप्ति जो है शायद वो वो हाउस ऑफ पेशा घर है या जो भी है वो उसके बारे में तो बता रहे है उल्लेख कर रहे हैं और दूसरा तीसरा बोल रहे हैं वो बोल रहे हैं कि इंडस्ट्रीज और वॉर्स कई पॉइंट्स है मैं तीन पॉइंट्स को यहां पे सारा मेन बता रहा हूं तो प्रपाद जी बोल रहे हैं कि क्या हो रहा है कि अभी आजकल तो अधिकांश लोग ऑफिस में काम करते हैं। अभी भी लोग फैक्ट्री में काम करते हैं। पर क्या है जो अभी जो इनेशन रेवोल्यूशन हो गया है तो फैक्ट्री में काम करने वाले लोग थोड़ा कम हो गए हैं। अभी जो आईटी कंपनी वगैरह काम करते हैं वैसे लोग ज्यादा है। बहुत महत्वपूर्ण है। पर जब प्रभुपाद जी थे तभी प्रभुपाद जी अभी इन्हने जो तात्पर्य लिखा है ये 196 में लिखा है ये तात्पर्य प्रभुपाद जी ने पहला स्कंद जो है वो तीन वॉल्यूम में छापा प्रपा जी का ओरिजिनल प्लान था कि 18 स्कंध जो थे वो 50 वॉल्यूम में छापे गए तो बाद में उन्होंने प्लान चेंज किया और फिर क्या है? 12 स्कंद जो है 18 वॉल्यूम में छापे गए। तो पहला स्कंद उन्होंने तीन वॉल्यूम में छापा था। और एक-एक वॉल्यूम जो था एक-एक साल लगा उनको। लिखने के लिए समय लगा पर उनको वो उसके लिए स्पोंसरशिप प्राप्त करने के लिए प्रिंट करने के लिए समय लगा था। 62 63 64 में प्रभुपाद जी ने एक एक स्प एक-एक वॉल्यूम छापा। तो अभी उस समय भारत में इंडस्ट्रियलाइजेशन पे बहुत जोर दिया जा रहा था। कि बड़े-बड़े इंडस्ट्रियल प्रोजेक्ट्स बनाए जा रहे थे। ऑफकोर्स भारत ने तभी सोशल सोशलिज्म का मॉडल अपनाया था। और जो सोशलिज्म का मॉडल था मतलब क्या है? कि स्टेट जो राष्ट्र है उसके पास सारी शक्ति होगी और राष्ट्र भी सब कुछ फाइनेंस सब कुछ प्राइवेटाइज नहीं पर पब्लिक पब्लिक प्रॉपर्टी बनाया गया था। और उसके अनुसार प्रगति हो रही थी और वो जो मॉडल था वो भारत ने यूएसएसआर से लिया था। यूएसएसआर में फेल हो गया। भारत में भी फेल हो गया। भारत अभी अधिकांश रूप से कैपिटलिस्ट बन गया है। पर क्या था? ये जो भौतिक प्रगति का मार्ग चल रहा था। और प्रभुपाद जी एक तरह से वह शास्त्रों में जो बताया गया है उसका अभी वो एक हमारी दृष्टि से विश्लेषण कर रहे हैं कि समाज में अभी इतनी सारी समस्याएं है इतनी सारी चीजें गलत हो रही है तो अभी मैं ये अभी ये अगर मैं 10 साल पहले ये प्रवचन देता था तो कि एक बहुत ही पावरफुल प्रभुपा कैसे मॉडर्न सोसाइटी का कंडेमेशन करता था मैं कितना कितनी सारी चीजें गलत है और क्या-क्या विनाश कार्य कर रहे हैं हम और वो अच्छा है एक तरह से पर क्या है कि अभी मैं थोड़ा हमारे क्या है कि दुनिया का की निंदा करना बड़ा आसान है पर वो निंदा करने से हमको थोड़ा अच्छा लगता है कि अरे दुनिया कितनी बुरी है मैं कितना अच्छा हूं पर उससे हमें हम क्या कर सकते हैं उसमें ज्यादा फायदा नहीं होता है तो इसीलिए जो हमें जो सीआईटी जो है आई इनाइट है इसमें क्या देखूंगा मैं? मैं स्पिरिचुअल एडवांसमेंट आध्यात्मिक प्रगति की दो संकल्पनाएं हैं। एक है कि टर्निंग बैक द क्लॉक। कि जो घड़ी है उसको पीछे करना। मतलब क्या है? कि जैसे लोग हजार साल पहले या 5000 साल पहले रहे थे वैसे रहना। और आध्यात्मिक मतलब है टर्निंग बैक द क्लॉक। भगवान के पास जाना है। हमारे धर्म के अनुसार जाना है तो हमें पहले जैसे लोग थे वैसे जाना है। टर्निंग बैक द क्लॉक। और दूसरा विज़न है कि टर्निंग ऑन द कंपास। कंपस का मतलब क्या है? हम सबके अंदर एक विवेक बुद्धि है। और वो जो विवेक बुद्धि है जो अंत में हमें सही मार्ग पे जाती है। भगवान के पास जाने के लिए प्रवक्त करती है। उसको और विकसित करना और उसको जब हम विकसित करते हैं तो फिर उससे क्या होता है? हम जिस परिस्थिति में भी है उस परिस्थिति से मैं कैसे भगवान के पास जा सकता हूं उसको हम खुद सोच सकते हैं। उसको उस मार्ग को हम खुद खोज सकते हैं। तो अभी जो टर्निंग बैक द क्लॉक का मतलब क्या है? कि इसका एक और जो उदाहरण बता रहा था। यानी जो भगवान है वो वो भूत भविष्य और वर्तमान सबके स्वामी है ऐसे वेदा समती वर्तमान अर्जुन भविष्य भूतानी माम त वेद न कश्चन तो अभी एक तरह से ये टर्निंग बैक द क्लॉक का मतलब क्या है कि अगर मैं यहां पे हूं तो भूतकाल में जैसे लोग जी रहे थे वैसे मुझे जीना है और वैसे जिऊंगा तो मैं भगवान के पास जाऊंगा। और दूसरा है कि यहां पे जैसे भी हूं मैं वहां से मुझे भगवान के पास जाना है। तो ये है टर्निंग बैक द क्लॉक। ये क्लॉक के बारे में है। हमें बूथ में जाना है। और ये जो है कंपास है। कंपास मतलब क्या? जहां पे भी हो वहां से मुझे प्रगति करनी है। तो अभी जो जगत में जो ये जो है अलग-अलग धर्म है। अभी क्रिश्चियनिटी और इस्लाम ये दो प्रधान धर्म है जगत में। अभी क्रिश्चियनिटी और इस्लाम में एक प्रधान फर्क जो है वो क्या है? कि क्रिश्चियनिटी इज कल्चर इंडिपेंडेंट। कि या और क्रिश्चियन इसके लिए बहुत प्राउड है। वो कहते हैं कि जीसस ने उनकी जीसस की जो शिक्षाएं हैं वो किसी संस्कृति से टाई नहीं की है। जीसस ने कहा है कि आप सिंग द प्रज़ ऑफ़ गॉड कि आप भगवान का गुणगान करो। वो ऐसे नहीं बताया कि इस भाषा में करो, इस ट्यून से करो, इस गीत से करो। इस तरह से करो। और इसीलिए क्रिश्चियन कहते हैं कि जो क्रिश्चियनिटी है ये अफ्रीका में जा सकती है, भारत में जा सकती है, साउथ अमेरिका में जा सकती है और वहां के संस्कृति के अनुसार लोग क्रिश्चियन हो सकते हैं। तो अभी मैं कुछ दिन पहले पंजाब में था और वहां पर पंजाब में मैं जा रहा था क्योंकि वहां पर लगभग ऑफिशियल स्टैटिस्टिक्स तो अभी हमेशा से अलग होते हैं। कुछ लोग कहते हैं लगभग 20 टू 30% लोग क्रिश्चियन हो गए और वहां पे जो क्रिश्चियंस है वो सारे क्रिश्चियंस क्या है वो पूरा जो वहां का लोकल कल्चर है उसको अडॉप करते हैं। अभी क्रिश्चियन प्रीस्ट से वो सैफन पहन लेते हैं। क्रिश्चियन प्रीस्ट जो होते हैं वो उन्होंने लोकल लैंग्वेज में उनके सारे गुण सारे जीसस के प्र जो है मेरे भक्त ओसा में है वो बोलते हैं कि क्रिश्चियनिटी में वर्जिन मैरी है तो उसको वो कहते हैं उसकी पूजा करते हैं उसको मरियम्मा कहते हैं तो अभी जो नाम है पूरे इतना आसान है उन्होंने एक क्रिश्चियन लोगों ने क्रिस्टोनिषद बना दिया है जीसस ईश सहस्त्र नाम बना दिया है तो अभी क्या होता है वो अभी क्रिश्चियनिटी ये कहती है कि यू डू नॉट हैव टू टर्न बैक द आपको क्रॉप बिलकुल ये जो है टर्न बैक नहीं करना है इस्लाम जो है वो एक तरह से जो हार्ड लाइन इस्लाम है वो कहता है टर्न बैक द क्लॉक। तो इसीलिए जो इस्लामिक स्टेट्स था वो उसने जब लोगों को गिरफ्तार किया लोगों को मारना था क्या उसको आप शायद वीडियो देख के जिंदा जला दिया उन्होंने और फिर जला दिया जिंदा पर बाद में क्या है? वो मोबाइल में से उसको लाइव स्ट्रीम किया। तो वास्तव में नोबडी कैन एक्चुअली टर्न बैक द क्लॉक। वो आतंकवादी जो 700 600 600 600 अराउंड 600 मोहम्मद वगैरह आए थे तो उस समय के सिक्स 6 सेवन सेंचुरी में तभी जो अस्त्र इस्तेमाल किए वो अस्त्र इस्तेमाल नहीं करते अगर आतंकवाद करना है आक्रमण करना है तो एक तरह से टर्निंग बैक द क्लॉक है ये पर कहना जिस हद तक कर सकते हैं उस हद तक करना है तो अभी प्रभुपाद जी जो सिखाते हैं प्रभुपाद जी ने इंटरनेशनल सोसाइटी फॉर क्या बताया है कृष्णा कॉन्शियसनेस ये इंटरनेशनल सोसाइटी फॉर एंटी इंडस्ट्रियलाइजेशन इंटरनेशनल सोसाइटी फॉर एंटी टेक्नोलॉजी इंटरनेशनल सोसाइटी फॉर एंटी प्रोग्रेस ऐसे नहीं बताया है तो अभी जो कृष्णा कॉन्शियसनेस है ये इसमें क्या है ये एक तरह से टर्निंग ऑन द कंपस है कि जो आत्मा है वो सतयुग में हो कलयुग में हो वो 19वीं शताब्दी में हो 21वीं शताब्दी में हो 11वीं शताब्दी में जहां पे भी हो आत्मा की एक स्वाभाविक जो प्रवृत्ति है कि वो भगवान की ओर जाए। वो भगवान को खोजे। इस जगत के परे और कुछ खोजे और वो प्रवृत्ति को हमें शुद्ध करके और विकसित करना है। तो इसीलिए हम कह सकते हैं कि ये जो है टर्निंग ऑन द कंपास ये महत्वपूर्ण है। पर इसका मतलब ये नहीं है टर्निंग बैक द क्लॉक महत्वपूर्ण नहीं है। टर्निंग बैक द क्लॉक ये एक चीज है। वो नहीं कर सकता है कोई। पर जो प्रोग्रेस में प्रॉब्लम आता है, प्रोग्रेस का जो विज़न है, एक तरह से हम देखेंगे अगर हम देखेंगे कि कैसे है कि अगर हम टाइम बोलते हैं ये प्रेजेंट है और पास्ट है। ये पास्ट है। तो अगर हम जो शास्त्रों का विज़न है और जो आधुनिकता का विज़न है, मॉडर्न विज़ है तो मॉडर्न विज़ क्या है कि प्राचीन काल में लोग बहुत प्रिमिटिव थे। वो प्रोग्रेस नहीं थे। तो क्या है ये मॉडर्न विज़ जो है वो क्या है? एक प्रोग्रेस का विज़न है। अभी हमारे पास इतना तंत्र ज्ञान आ गया है। अभी हमारे पास इतना इतने सारे साइंटिफिक नॉलेज आ गया है। हमने इतनी प्रगति की है। तो ये मॉडर्निटी का विज़न है। पर अगर हम जो शास्त्रों का विज़न है खास करके जो पौराणिक विज़ है जो पौराणिक विज़न जो है वो क्या है वो प्रोग्रेस नहीं है वो रिग्रेस है रिग्रेस का मतलब क्या है कि हम प्रगति नहीं कर रहे हैं अधोगति कर रहे है अभी मैं इसको पौराणिक विषय बोल रहा हूं वैदिक विषय नहीं बोल रहा हूं क्योंकि जो ये चार युग है ये जो संकल्पना है ये पुराणों में आती है वेदों में और उपनि में संकल्पना नहीं आती है। भगवत गीता में भी स्पेसिफिकली ये कलयुग का ज्यादा उल्लेख नहीं आता है। उल्लेख नहीं आता है। पर वो महाभारत में तो महाभारत में उल्लेख आता है। तो उपनिषदों में क्या है कि युगों की संकल्पना नहीं है। उपनिषदों में क्या है कि जो मानव की चेतना है तमसो मा छूम। कि आप अज्ञान से हो। आप अंधकार से रोशनी की ओर जाओ। अज्ञान से आप जो है ज्ञान की ओर जाओ। तो एक तरह से हम देखेंगे कि दो संकल्पनाएं हैं। ये बिल्कुल अलग है। तो और ये जो इसमें ये समझना महत्वपूर्ण है क्योंकि क्या होता है अगर मॉडर्निटी की संकल्पना है तो क्या है कि हम अगर यहां पे है तो वी लुक बैक एट द पास्ट विथ कंटेंप्ट कि पुराने लोगों के साथ हम एक पुराने प्राचीन की ओर हम एक तिरस्कार के साथ देखते हैं कि ये पुराने लोग तो अज्ञानी थे वो वो क्या थे मूर्ख थे अनकल्चर थे और अभी हम प्रगतिशील हो गए तो अभी ये भाव से क्या होता है पुराने समय से हमें कुछ सीखना नहीं है वो जो है पास्ट को हमें छोड़ देना है और ये जो है कि प्रोग्रेस का अगर कोई टेक्नोलॉजी आ गया है एक प्रकार का समाज आ गया है तो अभी उसका खंडन करना जरूरी नहीं है। अभी हम यहां पे ये साउंड सिस्टम यूज़ कर रहे हैं। तो हम zूम पे क्लासेस सुनते हैं। तो टेक्नोलॉजी का खंडन करना जरूरी नहीं है। पर टेक्नोलॉजी से जो मेंटालिटी आता है क्या मेंटालिटी क्या है? कि हम प्रोग्रेस कर रहे हैं। इसीलिए जो पास्ट में था वो पास्ट क्या है? उसका तिरस्कार करना है। उसको खंडन करना है। उसको त्याग देना है। उसी से हम आगे जाएंगे। और इसके विपरीत क्या है? अगर हमारा ये दूसरा दृष्टि है। क्या है? पुराने क्वेश्चन है। हमारे जब पास्ट को देखते हैं तो क्या होता है? वो रिस्पेक्ट के साथ देखते हैं। कि जो प्राचीन काल में लोग थे उनके वो उनके पास भी कुछ ज्ञान है। उस ज्ञान से हमें कुछ सीख हम कुछ सीख सकते हैं। हमें कुछ सीखना है। उनके पास ऐसा कुछ वैल्यूएबल ज्ञान था। तो अभी लगभग जो सेकंड वर्ल्ड वॉर का समय था, सेकंड वर्ल्ड वॉर के पहले तक तो ये जो था पास्ट पास्ट की ओर लगभग कंटेंप्ट से देखना यह पाश्चात देशों में हो रहा था पर सेकंड वर्ल्ड वॉर में इतना विध्वंस हुआ और वो विध्वंस की मात्रा टेक्नोलॉजी के कारण बहुत ज्यादा हो गई और उसके कारण तब से क्या हो गया है पाश्चात देशों में एक तरह से पास्ट की ओर थोड़ा रिस्पेक्ट से देखा जा रहा है इसलिए प्रभुपाद जी जब 1960 में गए थे प्रभुपाद जी बोले कि वो ईस्टर्न इंडियन एंशिएंट नॉलेज दे रहे हैं तो उसको रिस्पेक्ट से देखा जा रहा था अभी जो भारत है एक तरह से भारत में क्या हुआ था ये जो पास्ट को एक कंटेंट से देखना ये उससे ज्यादा मतलब क्या है कि मैं बताता था कैपिटलिज्म है और कम्युनिज्म है ये दो मेन सोशियोइकोनमिक सिस्टम्स थी तो कम्युनिज्म में ये तो बहुत ज्यादा था कैपिटलिज्म इतना नहीं था कम्युनिज्म में था क्या कि जो कार्ल मार्क्स आया फिर उसने कम्युनिज्म के बारे में सिखाया और उससे सारे समाज का कल्याण हो जाएगा और और जो पास्ट में था क्या पास्ट में शक्तिशाली लोग थे शक्तिशाली लोग जो थे जो राजा हो सकते थे वो सब क्या राजा या रईस जमींदार हो सकते थे वो सब गरीब लोग का शोषण करते थे तो क्या कम्युनिज्म में एक लीनियर प्रोग्रेस का मॉडल बहुत इंपॉर्टेंट था और उनके प्रोग्रेस के मॉडल में क्या था कि व्हाट कीप्स पीपल अमोंग ऑल द थिंग्स दैट कीप दैट कीप पीपल लॉक इन द पास्ट द स्ट्रांगेस्ट इज रिलजन कि जो लोगों को भूतकाल में फंसा के रखता है। उनमें से सबसे बड़ी चीज क्या है? वो है धर्म। इसीलिए उनको कहता था कि कम्युनिज्म का प्रगति करना है तो धर्म का नाश करना है। इसीलिए द रिलजन इस द ओपियम ऑफ़ द मासेस वगैरह वो कहा करता था। तो अभी क्या है कि ये जो है ये कैपिटलिज्म में इतना नहीं था कि हमें धर्म के खिलाफ ही जाना है। क्योंकि भारत ने कम्युनिज्म अडॉप्ट कर लिया। सोशलिज्म कम्युनिज़्म में अडॉड किया। वो क्या है? सोशलिज्म क्युम का एक सॉफ्ट और कजिन है तो उसमें भारत जो था वो धर्म के काफी खिलाफ चला गया था। भारत के पहले प्रधानमंत्री ने कहा कि जो हमारे जो बड़े बड़े-बड़े इंडस्ट्रियल प्लांट्स है ये आधुनिक भारत के मंदिर हो गए। हमें मंदिरों की कोई जरूरत नहीं है। तो ये जो भाव था क्या था कि भूत में लोग लोग भक्ति करते थे, धर्म करते थे, भगवान की पूजा करते थे। उसको पूरा खंडित करना है। तो अभी प्रभुपाद जी ने अपने जो तात्पर्य लिखे है तो वो क्या है इस प्रकार का एक प्रोपेगेंडा समाज में हो रहा है। इस प्रकार का दुष्प्रचार समाज में हो रहा है। और उससे प्रभुपाद जो है उसको प्रभुपाद जी रिस्पोंड कर रहे हैं अपने तात्पर्य में। तो अभी क्या है कि दो चीजें हैं हमें क्या जो प्रेजेंट का है प्रेजेंट अब वर्तमान में जो है जो एक है कि लेट्स पुट दिस वे। एक है प्रेजेंट की टेक्नोलॉजी और दूसरी है प्रेजेंट की मेंटालिटी। अभी टेक्नोलॉजी का मतलब क्या है? कि किस तरह से हम समाज में कार्य कर सकते हैं। तो टेक्नोलॉजी एयर कंडीशनिंग हो सकता है, वो एयर ट्रेवल हो सकता है, वो मोबाइल्स हो सकते हैं, जो भी है। तो अभी वी आर नॉट अगेंस्ट टेक्नोलॉजी। पर जो मेंटालिटी है सॉरी वे रोंग टेक्नोलॉजी ओके मेंटालिटी इज नो अगर हम इसको कृष्ण भावना के दृष्टि से देखते हैं कि टेक्नोलॉजी को युक्त वैराग के रूप से हम देख सकते हैं। पर ये जो मानसिकता है कि जो प्राचीन काल के लोग सब मूर्ख थे प्राचीन काल के लोग जो भगवान में विश्वास करते थे वो तो मूर्खता की परकाष्टता है। तो ये इसको हम स्वीकार नहीं कर सकते। तो प्रभुपाद जी का जो प्राइमरी फोकस था कि जब ये भाव आता है कि तंत्रज्ञान से प्रगति होते रहेगी होते रहेगी। और भगवान में श्रद्धा ये एक ओल्ड फैशन भावना है, विचार है। उसको हमें त्यागना है। जितना हम प्रगति करेंगे उतना प्रोग्रेस जो है वो भारत को वो हम सबको भगवान से दूर ले जाएगा। ये उस समय वो एक संकल्पना थी क्योंकि प्रोग्रेस वाज़ इक्वेटेड विद सोशलिज्म एंड प्रोग्रेस। पर आजकल के समाज में कैसे हुआ है? एक तरह से हम कह सकते हैं कि कुछ हद तक जो है प्रोग्रेस हर तरह से नहीं कह सकता मैं प्रोग्रेस जो है तो इस प्रोग्रेस टेकिंग पीपल प्रोग्रेस और गॉड तो प्रोग्रेस से आर पीपल गोइंग अवे फ्रॉम गॉड आर पीपल कमिंग क्लोजर टू गॉड प्रोग्रेस के कारण जो भक्ति है आध्यात्म है भगवान है इनके लोग इनसे दूर जा रहे हैं करीब आ रहे है या वो न्यूट्रल है प्रोग्रेस भी हो रहा है मन भक्ति भी हो रही तो हम कह सकते हैं एक तरह से तीनों है अभी जो हम कहते हैं अगर सोशल मीडिया का डिस्ट्रैक्शन है सोशल मीडिया से बहुत डिस्ट्रक्शन होता है लोगों का अटेंशन स्पैन कम हो रहा है उसके द्वारा जो है क्या हो रहा है लोग भगवान से दूर जा रहे हैं ये सत्य है एक तरह से सत्य पर दूसरा भी सत्य है कि जो भारत का जो मीडिया था मेन स्ट्रीम मीडिया जिसे कहते हैं लोग उसको लेगसी मीडिया कहते हैं। अभी तो मिनिस्ट्री मीडिया था सारे टाइम्स ऑफ़ इंडिया हो, इंडियन हो ये सारा बहुत ही लेफ्टिस्ट लोगों ने कंट्रोल किया था। और जो धर्म के समर्थन में जो भी नैरेटिव्स थे जो भी विचार थे वो मेन स्ट्रीम पब्लिशर मेन स्ट्रीम में पब्लिशर होते और अगर वो जो अल्टरनेटिव नैरेटिव जो आया है अभी जो धर्म के प्रचारक है या धर्म के मतलब मैं भक्ति के प्रचार नहीं बोल रहा हूं। जो धर्म के बारे में प्रस्तावना कर बता रहे हैं कुछ वो जो है है जो सोशल मीडिया से ही हम कह सकते हैं काफी हद तक जो लेफ्टेस्ट कंट्रोल से फ्रीडम आया है जो मतलब क्या है अभी जो राम मंदिर बना
तो उसके राम मंदिर के समर्थन में मेन स्ट्रीम मीडिया कभी कुछ लिखता ही नहीं था तो सोशल मीडिया था सोशल मीडिया पे उसप उसके बारे में प्रचार हो गया उसके बारे में जो है तो एक तरह से ये फेवरेबल भी है तो मैं नहीं कह रहा हूं सोशल मीडिया सब कुछ अच्छा है। ये नहीं कह रहा हूं कि सब कुछ बुरा है। क्या है कि इट डिपेंड्स और कुछ हद तक न्यूट्रल भी है। लोग सोशल मीडिया बहुत कुछ सीख रहे हैं। वो जो कुछ कुछ हिस्ट्री के बारे में सीखते हैं, जग्राफी के बारे में सीखते हैं। सब जानते हैं अपने रुची भी नहीं है। संबंध नहीं है। पर अभी इसमें क्या हो सकता है? तीनों हो सकता है। तो अभी हमें क्या करना है? हम सोशल मीडिया को खंडन कर सकते हैं। हम अभी एआई को खंडन कर सकते हैं। टेक्नोलॉजी बढ़ते जा रहा है। पर क्या है? ये खंडन करने से ज्यादा फायदा होने वाले हैं। हमें क्या करना है? जहां भी व्यक्ति है उसमें उनका अगर कंपस हम टर्न ऑन करते हैं। उनमें अगर कृष्ण भावना जो है वो उसके बारे में या भगवान के बारे में अर्थात ब्रह्म जिज्ञासा वो जागृत कराते हैं तो फिर वो लोग सोशल मीडिया देखे फिर उससे वो आध्यात्मिक टीचर्स की ओर जाएगी। वो एआई से भगवान की बार और पहुंचेगी। तो अभी कुछ समय पहले एक आर्टिकल आया था। कि एक प्रोमिनेंट एथिस्ट है, नास्तिक है। वह उसने कई बार क्या हुआ कि बड़े आस्तिक लोगों से डिबेट किया है। ठीक है? अमेरिका में नास्तिक और आस्तिकों में डिबेट यूरोप और अमेरिका में वो काफी पब्लिक में काफी आता है। भारत में दो तीन चार दिन पहले पहली बार एक ऐसा डिबेट हुआ। एक नास्तिक वास्तविक में और उसको कई मिलियंस ऑफ यूथ आ चुके हैं। तो ऐसे इस विषय में ज्यादा डिबेट होते नहीं भारत में। पर अमेरिका यूरोप में काफी डिबेट हुआ करते। तो ये जो प्रोमिनेंट एक चीज था उसने क्या किया? चैट जीपीटी से डिबेट किया एथिज्म के बारे में और चैट जीपीटी ने ऐसे आर्गुमेंट्स दिए कि वो हार गया चैट जीपीटी से। तो एक्चुअली चैट जीपीटी ने गॉड को एस्टैब्लिश कर दिया। तो अभी क्या है कि क्या चैट जीपीटी बनता है? नहीं। चाहे वो तो केवल एक टेक्नोलॉजी है। वो एक प्रोग्राम है। और ऑफ कोर्स कोई और अलग प्र देगा तो नास्तिकवाद का भी कंक्लूजन आ सकता है उसमें। तो क्या हुआ उसने वो उसे वो पूरा आर्गुमेंट्स पब्लिश किया वो कि क्या आर्गुमेंट था? क्या आर्गुमेंट था? अभी ये उसने कैसे स्पिन किया उसको? ये नहीं दिखाया उसने कि अरे मैं हार गया। उसने दिखाया ये चैट जीपीटी को क्रिश्चियन लोगों ने प्रोग्राम किया है। और वी हैव टू रेस्क्यू चैट जीपीटी फॉर क्रिश्चियनिटी। उसने इस तरह से उसने उसको दिखाने का प्रयास किया। पर पॉइंट क्या है कि जो तंत्रज्ञान है हमें हमें कभी कभी क्या होता है कि ओ एक तरह नस्टाल्जिया भूतकाल में सब कुछ इतना अच्छा था पर हम हम जो घड़ी को पीछे नहीं ले जा सकते तो क्या जो अभी की परिस्थिति है उसको स्वीकार करना है और उस परिस्थिति में मैं कैसे भक्ति कर सकता हूं उस पे जोर देना है तो हां एक दो चीजें है इसमें हम कह सकते हैं कि मैं प्रेजेंट से जहां पे भी है हम शहर में रह रहे थे शहर में प्रदूषण होता है। शहर में एक तरह हवा का प्रदूषण होता है। तरह से मन का प्रदूषण होता है। ये सब सही है। पर क्या है? हम में से कितने लोग शहर छोड़ के जाके किसी गांव में जाके किसी खेती खेती कर सकते हैं। तो जो कर सकते हैं उनको हमें एनकरेज करना है। कि सब लोग शहर में आना चाहते हैं। तो अगर जहां तक आप रह सकते हैं गांव में अच्छी बात है। सिंपल पर क्या है? सिंपल लिविंग महत्वपूर्ण है। दिस इज द लास्ट पॉइंट आई विल मेक जो हमारे टेक अवे है चित में कि क्या है कि हम कहते हैं कि हमें क्या करना है सिंपल लिविंग और क्या है दूसरा क्या है
हाई थिंकिंग सिंपल लिविंग और हाई थिंकिंग तो पॉइंट इसमें क्या है कि इसके विपरीत बहुत से लोग क्या कर रहे हैं दे आर सिंपली लिविंग एंड हार्डली थिंकिंग तो लोग केवल अरे मुझे ये काम करना है वो काम करना है ये काम करना है वो क्यों कर मैं जीवन का उद्देश्य क्या है? जीवन अर्थपूर्ण में क्या प्राप्त करने वाला? उसका विचार ही नहीं कर रहे। तो अभी क्या है? एक तरह से वन एंड टू ये दोनों अलग है। सिंपल लिविंग एंड हाई थिंकिंग ये दो पॉइंट्स है। बट मोर इंपॉर्टेंट क्या है? आवर लिविंग शुड लीड टू थिंकिंग। इस तरह से हमें जीना है कि हम थिंकिंग कर पाए। तो द पॉइंट इज कि हमारा जीवन शैली ऐसे हो कि जिससे कि हमें हमें आध्यात्मिक चिंतन करने का करने के लिए प्रवृत्ति मिले के लिए समय मिले के लिए सुविधा मिले तो अभी इसीलिए हाई थिंकिंग अभी कैसे होगा अभी सिंपल लिविंग का अगर मतलब हम बोलते हैं कि कोई बोलता है कि मैं जाके मैं जाके किसी गांव में रहता हूं किसी ग्रामीण जगह में रहता हूं तो वहां पे कोई पानी नहीं आता है तो पानी के लिए आपको लंबा जाना पड़ता है तो अभी उसमें क्या होता है वो सिंपल लिविंग में उसी में समझ जाएगा फिर हाई थिंकिंग आपको जप करना है साधना करना है मुश्किल हो जाएगा तो पॉइंट ये है कि अभी अभी ऐसे पॉसिबल है कि कोई गांव में रहता है और बेसिक फैसिलिटी है अवेलेबल और फिर वो है आसान हो सकता है वो पॉसिबल है। पॉइंट क्या है कि सिंपल लिविंग का एक सिंपल लिविंग का एक सिंपल डेफिनेशन क्या है कि द लिविंग जो लिविंग है इट शुड नॉट टेक मोर टाइम देन शुड टेक मोर टाइम देन नेसेसरी। सो जो टाइम जरूरी है उतना देना है उसके लिए पर उससे ज्यादा टाइम नहीं लेना है। तो अभी कोई व्यक्ति लोकल से आ रहा है। कहता है मैं खुद की कार खरीदता हूं। तो क्या कार खरीद नाम तो सिंपल लिविंग नहीं है। अगर आप कार से खरीद सकते हो और कार से आपका समय बचता है तो फिर और कार में आप कुछ लेक्चर सुन सकते हो। लोकल में ज्यादा कुछ कर नहीं सकते हो। तो क्या है? सिंपल लिविंग के नाम में आप लोकल से ट्रेवल करोगे तो क्या उससे हाई लीकिंग नहीं हो रहा है। पर इसके विपरीत अगर कोई न्यूयॉर्क या लंदन जैसे शहरों में जाता है तो अभी वहां पे क्या है? पब्लिक ट्रांसपोर्ट काफी अच्छा है। और अगर आप वहां से कार से जाते हो तो एक्चुअली आप पब्लिक ट्रांसपोर्ट में यू कैन यू हैव मोर पीस ऑफ माइंड। कार में वो क्या वहां पोलशन के कारण आप शहर के अंदर जाते हो तो वहां पे टारफ होता है और लंदन में तो हर स्ट्रीट पे सिग्नल होता है। तो क्या होता है कि ज्यादा आप फोकस नहीं कर पाते। तो किसी को फैशन से मुझे कार ड्राइव करना है। और लोग सोचेंगे अगर मैं लोकल से अब सबवे से आया हूं क्या मेरे पास पैसा नहीं है कार के लिए? नहीं। पर अगर आपके लिए वो अनुकूल है तो सिंपल लिविंग ये लोकल से ना जा जाके कार से जाना या कार से ना जाके लोकल से जाना सिंपल लिविंग जो है उसको ऐसे कुछ एक्सटर्नल से टाई करना जरूरी नहीं है। सिंपल लिविंग इज दैट व्हिच इनेबल्स हाई थिंकिंग तो क्या है कि युक्त आहार विहारस्य भगवान बोलते हैं कि आपका आहार और विहार इस तरह से करो जिससे कि आप युक्त रह सके। युक्त मतलब क्या योग में लग सके। इसीलिए कहते हैं भगवान नात अत योग नचकांत मन कि क्या है कि ज्यादा बहुत ज्यादा नहीं सोना है। बहुत कम नहीं सोना है। बहुत ज्यादा नहीं खाना है। बहुत कम नहीं खाना है। तो क्या है कि बेसिकली हमारा जो मटेरियल साइड है उसको कुछ समय तो लगने वाला है। पर उसको इतना समय ना लगे कि हम आध्यात्म के लिए हमारे पास समय ना हो। तो अभी टेक्नोलॉजी है। अभी हम फोन इस्तेमाल करते हैं। तो हां फोन से हम क्या है कि हम सेवा हम हमारी सेवा भी कर सकते हैं। भगवान की सेवा भी फोन से कर सकते हैं। तो क्या है कि अभी अगर हम फोन देख लेते हैं तो क्या एक भक्त है उसको फोन का क्या करना चाहिए? कुछ भक्त हो गए जो स्मार्टफोन यूज़ नहीं करते। बिल्कुल और अच्छा एक तरह से वो नहीं करते हैं। पर कई बार क्या होता है फिर उनके कोई असिस्टेंट होते हैं वो सारे स्मार्टफोन यूज़ करते हैं। उनसे हम कांटेक्ट करते हैं। तो एक तरह से जो पॉइंट ये है कि वी आर नॉट प्रो फोन और एंटी फोन। हमें क्या है कि अगर फोन के यूज़ के हम फोन के यूज़ से हम कृष्ण के करीब जा रहे हैं या कृष्ण की सेवा कर रहे हैं तो अनुकूल है। पर क्या है कि अगर फोन से गेट थिंग्स डन। ये एक चीज है। हम काम कर सकते हैं। पर दूसरा क्या होता है? फोन से क्या करते हैं हम? वी गेट अवे फ्रॉम थिंग्स। हम फोन में ही फस जाते हैं। एंड वी गेट अवे फ्रॉम कृष्णा। फोन में क्या हो जाता है? अरे यहां पे ये ये क्लिपिंग आ गया। यहां पे वो आ गया है। यहां पे वो आ गया। और उसी में क्या होता है? लोग फस जाते हैं। तो अगर हम उसको सिंपल लिविंग का मतलब नहीं है कि फोन इस्तेमाल नहीं करना है। पर सिंपल लिविंग का ये मतलब भी नहीं है फ़ इस्तेमाल करना है। सिंपल लिविंग का मतलब क्या है? फ़ के साथ आप क्या कर रहे हैं? तो जो टर्न ऑन द कंपस तो अभी कुछ लोगों के लिए सिंपल लिविंग का मतलब होगा कि मुझे इस प्रकार के कपड़े पहनने हैं। कुछ लोगों का होगा मुझे इस प्रकार के कपड़े पहनने है तो मुझे इस प्रकार के घर में रहना है। मुझे इस प्रकार के घर में रहना है। तो ये जो है ये हम एक प्रिस्रिप्शन नहीं दे सकते किसी की सबके लिए कि आपके लिए सिंपल लिविंग मतलब ऐसे है सिंपल लिविंग का सिंपल मतलब क्या है कि द लिविंग दैट फ्रीज अस फ्रॉम थिंकिंग फॉर थिंकिंग कि जो किस प्रकार की जीवन शैली जिससे कि मेरा मन फ्री हो जाता है और विचार करने के लिए भगवान के बारे में चिंत करने के लिए भगवान की सेवा करने के लिए तो अगर कोई टेक्नोलॉजी से और प्रोग्रेस से इतना इनफचुएट हो गया उसको लगता है कि टेक्नोलॉजी से ही सारी समस्याओं का हल हो जाएगा। भगवान की जरूरत नहीं है। तो वैसी मेंटालिटी को जरूर त्यागना है। वैसी मेंटालिटी का खंडन करना है। तो प्रभुपाद जी अपने तात्पर्य में क्या कर रहे हैं? वैसी मेंटालिटी का खंडन कर रहे हैं। प्रपाद जी वो लाइफ कम्स ऑफ़ लाइफ के कन्वर्सेशन में बोलते हैं कि वी आर नॉट अगेंस्ट द नोइंग स्पिरिट ऑफ साइंटिस्ट। वैज्ञानिक रिसर्च करके जानना चाहते हैं। वी आर नॉट अगेंस्ट द नोइंग स्पिरिट ऑफ़ साइंटिस्ट। वी आर वी आर अगेंस्ट साइंस गोइंग अगेंस्ट गॉड कि जब विज्ञान भगवान की तरफ जाता है उसके खिलाफ है तो प्रभुपाद वास नॉट एंटी टेक्नोलॉजी प्रभुपाद वास प्रो कृष्णा और हमें भी क्या करना है प्रो कृष्णा बनना है तो सारांश में आज मैंने चर्चा की किस तरह हमारा अब्रड ये टॉपिक था कि किस तरह से कृष्णा कॉन्शियसनेस एंड सिंपल लिरिक का मतलब क्या है? कि तो सीआईटी कॉन्टेक्स्ट में हमने देखा सबसे पहले किस तरह से यहां पे अभी महाराज युधिष्ठिर के राज्य में अह युद्ध हो गया है। उसके बाद मेंबिलिटी हो गया समृद्धि आ गई है। और हमने देखा समृद्धि जो होती है वो कई बार हम बोलते हैं कि सरकार ने ये पॉलिसी बनाया। हमने ये काम किया। इसने ये ऐसा बिजनेस किया। इससे प्रोस्पेरिटी आ गया। हम सोचते हैं। प्रोस्पेरिटी क्या है? ऊपर जो बारिश आती है और जो नीचे से अनाज आता है जो उससे उसके उस पर प्रोस्पेरिटी ज्यादा निर्भर है और फिर हमने देखा कि किस तरह से कि जो प्रभुपाद जी जो प्रपाद जी क्या कर रहे हैं जो आध्यात्मिक प्रगति के दो संकल्पनाएं हैं कि एक है कि शास्त्र जिस समय बताया गया था आज का समय है 3000 बीसी और एक है 2025 तो भगवान भगवान हमे सबके ऊपर है तो एक हैं की टर्न ऑन द कंपास ये एक आध्यात्मिकता से दूसरा क्या है टर्न बैक द क्लॉक की हमें जो घड़ी है उसको पीछे लेके जाना है तो अभी जो हमारी संकल्पना है ये क्या है कि हमें जो कम्पस को प्रभु जी कृष्णा से चालू किया पर इसमें तो हमें एक महत्वपूर्ण है कि जब हम कंपसराउंड कर रहे हैं तो हमने देखा कि मॉडर्न और जो टाइम और जो लेवल है तो जो मॉडर्निटी का विज़ क्या है? मॉडर्न विज़ कहता है कि हम प्रोग्रेस कर रहे हैं। और प्रोग्रेस कर रहे हैं। इसीलिए क्या होता है? कि हम जो भूत की ओर क्या देखते हैं? पास्ट की ओर एक कंटेंट के साथ तिरस्कार के साथ देखते हैं। इसका कुछ आता ही नहीं है। और यह जो है यह बहुत टॉक्सिक मेंटालिटी है जो शास्त्रों का पौराणिक विज़ क्या है इसके विपरीत कि हम ये पौराणिक विज़न जो है कि हम जो क्या कर रहे है रिग्रेस कर रहे है प्रोग्रेस नहीं कर रहे है कलयुग जो है बहुत ही युग है पर इसका भाव क्या है इससे क्या है हम पास्ट को रिस्पेक्ट की ओर देखते है और ये महत्वपूर्ण है कि पास्ट को रिस्पेक्ट की ओर देखते है सीख राशि एक्ना क्योंकि क्या है जो खास करके जो कम्युनिज्म सोशलिज्म में प्रोग्रेस का था क्या था उसमें था कि प्रोग्रेस मतलब रिजेक्ट गॉड क्योंकि क्या है गॉड से ही वो भूतकाल में लोग शिथिल बन गए थे कुछ काम नहीं करते थे कुछ रेवोल्यूशन नहीं करते थे तो ये जो है हमें जो मॉडर्निटी का है मॉडर्निटी में दो चीजें है एक है टेक्नोलॉजी और दूसरा है मेंटालिटी तो मॉडर्निटी का टेक्नोलॉजी हम स्वीकार कर सकते हैं। दिस इज ओके। और जो मेंटालिटी है वो नहीं स्वीकार कर सकते। क्या है कि भूतकाल के लोग मूर्ख थे और भूतकाल में जब भगवान पे विश्वास था वो गलत था। वो हम नहीं स्वीकार कर सकते। और हमारा टेक अवे क्या है? कि हमें सिंपल लिविंग का मतलब क्या है? कि फोकस फ्री इट फ्री इज़ टाइम फॉर सिंग। थिंकिंग कौन से प्रकार के हम कैसे हमारा जीवन जिए जिससे कि हमारा ज्यादा से ज्यादा समय फ्री हो जाए भगवान के बारे में आध्यात्म के बारे में चिंतन करने के लिए हम फ्री हो जाए तो वो हाई थिंकिंग के लिए क्या होगा हमारे लिए किस लेवल का कंफर्ट किस लेवल का फैसिलिटी मुझे चाहिए जिससे कि मैं प्रगति कर सकता हूं बात आध्यात्म में वो फैसला हर हर एक व्यक्ति को इंडिविजुअली करना है बहुत बहुत धन्यवाद हरे कृष्णा किसी का कोई सवाल है? इन दैट लेवल वन ही सेड पुराणिक पीपल पुरणिक प्रोविज़ से दैट वी हैव रिग्रेस एंड हेंस वी रेस्पेक्ट द पास्ट दैट वी अस। अह एंड यू सेड दैट वी शुड टर्न आवर कंपास्ट टुवर्ड अह गॉड टू मेक द बेस्ट मार्गिन ऑफ़ एडजस्टमेंट। सो स्टूडेंट दैट द मिड पॉइंट ऑफ़ दैट क्रॉस इज़ द बेस्ट स्पॉट दैट वी लिव लाइक दोज़ टू सम एक्सटेंट एट द सेम टाइम वी थिंक वी लिव इन दिस वर्ल्ड एंड थिंक ऑफ गॉड टू गेट द बेस्ट सिचुएशन और बेस्ट कॉनशसनेस और बेस्ट वे ऑफ लिविंग। ओके। तो आप कह रहे हैं कि दोनों का मिड पॉइंट अगर होगा तो वो अच्छा है। अभी अच्छा विचार है ये। तो दो चीज़ इसमें कैसे है कि वो एग्जैक्ट पॉइंट कहां आएगा? क्योंकि टेक्नोलॉजी कास्टेंटली इवॉल्व कर रही है। और पास्ट में भी अभी कौन से टेक्नोलॉजी से या कौन से कल्चर के आस्पेक्ट से हमारे पास्ट के विचार कैसे होगा? तो वो मुश्किल है। तो पर वो जैसे कहते हैं कि लिव इन द वर्ल्ड बट डोंट बी ऑफ़ द वर्ल्ड। हम कहते हैं कि इतनी दुनिया में ले दुनिया के लिए मत जियो। तो अभी वो वो बात सही है। वो बैलेंस जो है पद्म पत्रम बस कविता में भगवान बताते हैं कि अभी सोशियोलॉजिस्ट में जो है उसमें दो विचार है कि इस टेक्नोलॉजी वैल्यू इंडिपेंडेंट या इस टेक्नोलॉजी वैल्यू परमिटेड। मतलब क्या व्यक्ति की नैतिक विचारधारा जो है क्या टेक्नोलॉजी उसके इंडिपेंडेंट है या टेक्नोलॉजी उसको प्रभाव करता है इंट्रिंसली तो अभी कैसे है कि बताया था कि टेक्नोलॉजी से कोई हिंसा या अश्लीता देख सकता है टेक्नोलॉजी से कोई वो आध्यात्म भी देख सकता है धर्म के बाद देख सकता है पर क्या है क्या टेक्नोलॉजी न्यूट्रल है हम कह सकते हैं फोन तो वैसे न्यूट्रल ही है जो जो भी साइट पे जाऊंगा मैं वहां पे जाऊंगा वो पर वो इतना सिंपल नहीं है टेक्नोलॉजी से क्या होता है कि जो एक तरह से टेक्नोलॉजी जो है टेक्नोलॉजी ही ऑफर्स अस अ मिरर ऑफ सोसाइटी। और मिरर ऑफ़ सोसाइटी का मतलब क्या है? कि अभी समाज में जिस प्रकार के लोग हैं वैसे ही टेक्नोलॉजी में ज्यादा आएगा। तो हम कह सकते हैं कि समाज में अभी भी सतोगुणी लोग हैं पर वो काफी कम है। समाज में रजस लोग जो है वो काफी है। और तमस लोक भी काफी है। तो जो टेक्नोलॉजी होगा वो भी उसी तरह से है कि ऑनलाइन हम देखेंगे या एआई में देखेंगे तो जो सात्विक कंटेंट है बहुत है पर उससे ज्यादा राजसिक कंटेंट है उससे ज्यादा थॉमस थमस कंटेंट है अभी जो अभी इंटरनेट का जो जो पोर्न इंडस्ट्री है वो वास्तव में इतना बड़ा है कि जो भारत का आईपीएल है और अमेरिका का एनबीए है दोनों का ये दोनों के विश्व के सबसे बड़े एक सबसे रिच सबसे पैसे वाले लीग है इन दोनों का पैसा पूरा कंबाइन कर देगा तो उससे भी पोर्न इंडस्ट्री का पैसा कम पैसा ज्यादा है तो पोर्न इंडस्ट्री जो है वो ड्रग इंडस्ट्री से भी बड़ी है अल्कोहल इंडस्ट्री से भी बड़ी है तो कभी क्या है ये पूरा इंडस्ट्री इंटरनेट से ही आया है अभी लोग असली चीजें तो हमेशा देखा करते थे पर ये इंडस्ट्री पूरा जो है ये ये इंटरनेट से ही आया है एक तरह से तो इसका मतलब क्या है कि टेक्नोलॉजी को हम पूरा वैल्यू न्यूट्रल नहीं कह सकते टेक्नोलॉजी से व्यक्ति सतोगुण भी आ सकता है, रजोगुण भी आ सकता है, तमोगुण भी आ सकता है। पर प्रोपोशनलिटी में जो रजोगुण टर्म वो टेक्नोलॉजी से ज्यादा एक्सेस है। क्योंकि लोग उस तरह से सात्विक वेबसाइट बनाने वाले लोग कितने हैं? राजनीतिक वेबसाइट वाले लोग कितने हैं? तामसिक तामसिक वेबसाइट बनाने वाले लोग कितने हैं? तो एक है एक प्रॉब्लम है प्रपोशनलिटी। तो प्रपोशन में क्या है? ये एक प्रॉब्लम है। और दूसरा क्या है? एक्सेसबिलिटी। अभी एक्सेसिबिलिटी का मतलब क्या है? सात्विक कोई भी अपने घर में बैठ के भी मंगल आरती का दर्शन कर सकता है। वो अच्छा है। पर क्या है कि वो एक मिनट में मंगल आरती का दर्शन कर सकता है। और एक स्विच चेंज करके फिर क्या है कोई अश्लील व्यवसाय भी आ सकता है। व्याहारिक जीवन में अगर किसी को मंदिर से शराब खाना जाना है तो क्या है? कुछ देर चलता जाना पड़ेगा। तो द ई कैन बी अ प्रॉब्लम आल्सो। तो जब बहुत एक्सेसिबल हो जाता है तो क्या किसी सात्विक प्रवृत्त आ जाए सात्विक कार्य भी करेगा पर तामसिक प्रवृत्त आ जाए तामसिक कार्य भी बहुत करना आसान हो जाता है तो एक्सेसबिलिटी क्या है वो न्यूट्रल हम कह सकते है पर प्रॉब्लम ये है कि मानवों में राज तामसिक प्रवृत्त ज्यादा है टेक्नोलॉजी हम तुमको जो चाहिए वो हम दे रहे हैं आपको पर हमको जो चाहिए हमारी इच्छाओं को परिवर्तन करने का टेक्नोलॉजी में कोई उसमें इनबिल्ट सेफ गार्ड नहीं है
तो उसके कारण वो जो प्रॉब्लम होता है ऑफको तीसरा जो है टेक्नोलॉजी का भी अपना एक मेमोरी होता है। मेमोरी मतलब क्या कि जैसे हम जो ब्राउज करते हैं जो सर्व करते हैं वो सोशल मीडिया का याद रखता है और वही हमको बार-बार दिखाते रहता है। इसीलिए क्या होता है जो हमारी प्रवृत्तियां है उसको ही उसके अनुसार ही हमको दिखता है। तो इसका मतलब तो एक तरह से क्या हो गया? टेक्नोलॉजी से ह्यूमन रिस्पसिबिलिटी और बढ़ गई है। एक पाश्चात्य विचारक है फिलोसफर है वो कहते हैं कालिया ही सेड दैट द मोर आउटर पावर वी गेट द मोर इनर पावर वी नीड जितने हमें बाहर से शक्ति मिलती है उतनी हमें अंतरंग शक्ति और जरूरी है ताकि हम वो बाहर की शक्ति अच्छे से इस्तेमाल करें नहीं तो फिर क्या होगा कि जो अंतरंग शक्ति नहीं है मतलब अंतरंग विल पावर नहीं है तो क्या होगा ठीक है मुझे मंदिर में भगवान का दर्शन करना है या कोई मूवी देखना है या कोई और चीज करनी है तो क्या है दोनों का संभावना है पॉसिबिलिटी दोनों का है पर जो प्रोपेंसिटी है वो क्या है ज्यादा वो भौतिक बात को चला जाएगा तो इसीलिए हम वो न्यूट्रल पॉइंट जो दोनों का है हम कह सकते हैं वो वो फाइंड करने के लिए क्या है स्पिरिचुअलिटी से क्या होता है कि टेक्नोलॉजी से हमको जो आउटर पावर बहुत बढ़ गया है पर प्रॉब्लम ये है कि ओनली स्पिरिचुअलिटी कैन इनक्रीस आवर इनर पावर। तो अगर ये बढ़ गया है तो क्या ये इनर पावर अगर बढ़ जाएगा तो फिर टेक्नोलॉजी कैन बी अ बिग टूल और इवन अ बिग ब्लेसिंग यू कैन सी। एम आई एड्रेसिंग योर क्वेश्चन।
सो यू मीन टू से दैट वी डोंट नीड टू गो बैक अह इन टर्म्स ऑफ़ लिमिटिंग आवर टेक्नोलॉजी सोशल मीडिया एक्सपोज़र रादर अह थिंकिंग आवर इनर सेल्फ अह स्पिरिट टू हैंडल इट प्रॉपर्ली।
हां करेक्ट। कैसे है कि अभी इनर पावर की बात करते हैं। तो अभी कई जो बड़े बड़े-बड़े सोशल मीडिया के फाउंडर्स हैं वो अपने बच्चों को सोशल मीडिया यूज़ नहीं करने देते। क्योंकि क्या है उनका भाव क्या है कि ऐसे नहीं वो कहते हैं सोशल मीडिया इतना बुरा है किसी ने यूज़ नहीं करना चाहिए। पर बच्चों में वो इनर पावर नहीं है। तो इसीलिए बच्चों को आप 16 साल के हो जाए 18 साल के हो जाए। उसके बाद में आप सोशल मीडिया यूज़ कीजिए। तो अभी 18 साल के बाद भी क्या व्यक्ति को इनर पावर होगा कि नहीं वो अलग सवाल है पर क्या है उसके पहले होना कम है संभावना कम है और वो तो उस तरह से द आईडिया दैट इनर पावर आल्सो नीड्स टू बी डेवलप्ड तो अगर हम क्या करेंगे अगर हमारे प्रचार में हम टेक्नोलॉजी का खंडन करेंगे तो लोग क्या होगा हमसे दूर चले जाएंगे पर अगर हम व्हाई टॉकिंग अबाउट चेंज ऑफ़ टेक्नोलॉजी हम बता जिम्मेदारी क्या है जिम्मेदार बनेंगे इनर पावर डेवलप करना है और वो इनर पावर भगवान के स्मरण से आता है। वो शुद्धिकरण से आता है। तो फिर क्या होगा? वी आर ऑफरिंग अ सशन रादर देन जस्ट गिविंग कंडेशन। खंडन नहीं कर रहे हैं हम सशन दे रहे हैं। तो फिर वो थोड़ा और अपीलिंग है वो लोगों के लिए।
बहुत-ब धन्यवाद। भागवतम की
जय।
प्रभुपाद की
जय।
गौर भक्त की जय।