Appreciating Krishna’s opulences, using his opulence of knowledge as an example – Hindi
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Lecture Summary
- सत्र की शुरुआत और आभार:
- वक्ता ने कानपुर के भक्ति समुदाय (विशेषकर प्रेम हरि प्रभु और राधेश्याम प्रभु) की सराहना की और डिजिटल माध्यम से भक्तों से जुड़ने पर आभार व्यक्त किया।
- भगवान का ऐश्वर्य और गलत संकल्पनाएँ:
- भगवान में 64 पूर्ण गुण होते हैं, जबकि ब्रह्मा जी (50), शिव जी (55) और विष्णु जी (60) में ये गुण अलग-अलग मात्रा में प्रकट होते हैं।
- गलत धारणा: केवल “भगवान सबसे श्रेष्ठ हैं” सोचना अधूरा है, क्योंकि हिरण्यकशिपु जैसी आसुरी प्रवृत्ति के लोग सोचते हैं कि तपस्या करके वे भी भगवान से आगे निकल सकते हैं।
- भगवान: समस्त अस्तित्व के मूल आधार (Basis of All Being):
- प्रह्लाद महाराज ने स्पष्ट किया कि भगवान केवल सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी/प्रतियोगी नहीं हैं, बल्कि वे सबकी शक्ति और अस्तित्व के मूल स्रोत हैं।
- भगवद्गीता ($10.39$) के अनुसार भगवान के बिना कोई भी वस्तु या जीव अस्तित्व में नहीं रह सकता।
- ऐश्वर्य और आकर्षण का स्रोत:
- ऐश्वर्य का अर्थ: जो भी वस्तु, गुण या व्यक्ति हमें आकर्षित करता है।
- संसार में दिखने वाला कोई भी आकर्षण, धन, सौंदर्य, खेल या ज्ञान का सामर्थ्य — वास्तव में भगवान के असीम ऐश्वर्य की एक छोटी-सी बूँद मात्र है।
- भौतिक दुनिया में जब लोग किसी सेलिब्रिटी के लिए इतने आकर्षित होते हैं, तो भक्ति विनोद ठाकुर के अनुसार इससे यह प्रेरणा लेनी चाहिए कि पूर्ण भगवान का आकर्षण कितना विशाल और अनंत होगा।
- प्रश्न-उत्तर (Q&A Highlights):
- प्रश्न: यदि हम भगवान के अंश हैं, तो हमारे अंदर कौन-से गुण हैं?
- उत्तर: आत्मा के स्तर पर हम सब में भगवान के मूल लक्षण ‘सच्चिदानंद’ (सत्, चित्, आनंद) सीमित मात्रा में मौजूद हैं। इसके अलावा, निर्माण करना, संभालना और संहार करना (G.O.D. स्वरूप) जैसे गुण भी जीवों में बहुत ही सीमित (मात्रात्मक) रूप से पाए जाते हैं।
Full Transcription
हरे कृष्णा, मैं कृतज्ञ हूँ कि आज आप सबके बीच में एक मौका मिला है, भले ही डिजिटली क्यों न हो। कानपुर में कई ऐसे भक्त हैं—प्रेम हरि प्रभु आदि—जिन्हें मैं कई सालों से जानता हूँ। राधेश्याम प्रभु और कई और भक्तों ने मुझे बताया है कि किस तरह से भक्तों का समुदाय बड़े ही आकर्षक और आक्रामक पद्धति से वहाँ पर बढ़ रहा है।
मैं पिछले कई सालों से, पैनडेमिक (महामारी) के पहले से, भारत से बाहर अधिक ट्रैवलिंग कर रहा था। इसलिए मैं भारत में ज़्यादा जगहों पर आ नहीं पाया। पहली बार आप सब के साथ हूँ मैं, तो कृतज्ञ हूँ कि यह मौका मुझे आज मिला है। आप सब के सामने भगवान के ऐश्वर्य के बारे में आज हम चर्चा करेंगे।
सत्र की संरचना एवं प्रश्न-उत्तर की विधि
मैंने एक पावरपॉइंट बनाया है जो इंग्लिश में है, और मैं यह पावरपॉइंट वास्तव में एक व्हाइटबोर्ड के समान यूज़ करूँगा। क्योंकि भगवान के ऐश्वर्यों को, कृष्णा के ऐश्वर्यों को समझना आवश्यक है।
मैं थोड़ा-सा पॉज (विराम) लूँगा। अगर किसी को उसी विभाग के बारे में सवाल है, तो हम एक सवाल ले सकते हैं। समय होगा तो अंत में भी हम सवाल लेंगे, पर बीच में अगर सवाल होंगे—जो डायरेक्टली हमने जिस विभाग के बारे में तब तक चर्चा की है उस पर अगर सवाल होगा—तो हम उत्तर दे सकते हैं।
भगवान के ऐश्वर्य को समझने का महत्व
तो मुझे स्पष्ट नहीं है कि हम भगवान के बारे में जानना चाहते हैं, तो भगवान के ऐश्वर्य के बारे में जानने का महत्व क्या है? इसे समझने के लिए हमें समझना चाहिए कि भगवान के बारे में दो संकल्पनाएँ हो सकती हैं कि वह अपने जीव के बारे में जानना चाहिए।
भगवान में वे 64 गुण हैं और बाकी सब जीव हैं (जीव नहीं, बाकी सब जो भी अस्तित्व में हैं) वे अलग-अलग मात्रा में वे गुण दिखाते हैं। तो जो जीवात्मा हैं, उनमें लगभग 50 गुण सर्वाधिक हो सकते हैं, जो ब्रह्मा जी में दिखते हैं। शिव जी में 55 गुण हैं, विष्णु जी में 60 गुण हैं और भगवान श्रीकृष्ण में 64 गुण हैं।
सर्वश्रेष्ठता की अधूरी संकल्पना एवं आसुरी प्रवृत्ति
तो अभी यह किस तरह की संकल्पना है? कि सब जीव एक तरह से एक दर्जे या श्रेणी में हैं और भगवान सर्वश्रेष्ठ हैं। यह सही संकल्पना है, पर यह पूर्ण नहीं है। यह पूर्ण इसलिए नहीं है, क्योंकि अगर मैं टेनिस का उदाहरण दूँ: मान लीजिए 10,000 प्लेयर्स हैं और उनमें से एक नंबर 1 है। तो कल को कोई और व्यक्ति, जो अब नंबर 2 या नंबर 3 है, वह अच्छा खेलेगा तो वह भी नंबर 1 बन सकता है।
तो इस संकल्पना में क्या होता है कि भगवान अभी नंबर 1 हैं, सर्वश्रेष्ठ हैं; पर कोई और भी नंबर 1 बन सकता है! अधिकांश लोग—चाहे वे आसुरी प्रवृत्ति के हों या आसुरी प्रवृत्ति के न भी हों—वे कभी-कभी भगवान के रूप के बारे में इस तरह से सोचते हैं। खास करके आसुरी प्रवृत्ति के लोग इस तरह सोचते हैं। वे सोचते हैं कि “हाँ, विष्णु ने तपस्या की है, कृष्णा ने कुछ किया होगा जिसके कारण वे भगवान बन गए। अगर मैं उनसे ज़्यादा कुछ करूँगा, तो मैं भी भगवान बन सकता हूँ।”
हिरण्यकशिपु की यही धारणा थी। हिरण्यकशिपु यही सोच रहा था कि विष्णु बड़े शक्तिशाली हैं, पर यदि वह पर्याप्त रूप से तपस्या करेगा (और आत्म-ज्ञान भी उसमें शामिल था), तो वह सोच रहा था: “मैं अनेक जन्मों से… विष्णु ने मेरे भाई का वध किया है, उसका मैं बदला लूँगा।” तो यह संकल्पना क्या थी? कि भगवान सर्वश्रेष्ठ हैं, पर मैं उनके जैसा या उनसे भी शक्तिशाली बन सकता हूँ तपोबल के द्वारा।
प्रह्लाद महाराज का उत्तर और सर्वशक्तिमान भगवान
इसीलिए जब हिरण्यकशिपु ने बार-बार प्रह्लाद का वध करने का प्रयास किया और वह वध नहीं कर पाया, तो हिरण्यकशिपु क्रोधित, भ्रमित, विस्मित और पीड़ित हो गया। उसने प्रह्लाद से पूछा कि “तुम्हारी शक्ति का स्रोत क्या है?”
जब हम प्रह्लाद का जवाब सुनते हैं, तो कभी-कभी हमको ऐसा लगता है कि प्रह्लाद क्या केवल हिरण्यकशिपु को उकसाने के लिए कुछ बोल रहे हैं? जिसे इंग्लिश में कहते हैं ‘don’t be cheeky’। चीकी मतलब क्या? कि आप उदंडता या अहंकार के साथ दूसरों को खुद को बहुत बुद्धिमान दिखाते हैं और दूसरों को कम दिखाने का प्रयास करते हैं। प्रह्लाद वैसा नहीं कर रहे हैं।
प्रह्लाद जवाब देते हैं कि “हे वरानुकूल/हे राजन! जो मेरी शक्ति का स्रोत है, वही तुम्हारी शक्ति का स्रोत है। सब शक्ति का एक ही स्रोत है—वह हैं भगवान।” वे कहते हैं कि मेरी शक्ति का स्रोत न केवल तुम्हारी शक्ति का स्रोत है, बल्कि तुम्हारी शक्ति के स्रोत का भी स्रोत है!
तो यह कैसे है? एक तरह से वह उकसाने वाला जवाब लगता है। मतलब क्या है? वह कह रहे हैं कि “तुम्हारी शक्ति तुम्हारी नहीं है, इतना गर्व मत करो।” हिरण्यकशिपु को तो बड़ा अहंकार है, तो क्या वह उकसा रहे हैं? नहीं, उकसा नहीं रहे हैं; वह एक सत्य समझाने का प्रयास कर रहे हैं।
उन्हीं श्लोकों में आगे वे बताते हैं कि “यह केवल तुम्हारे मन के भ्रम के कारण है, क्योंकि तुम्हारा मन अनियंत्रित और गुमराह (uncontrolled and misdirected) है।” अनियंत्रित होना बुरी बात है, पर गुमराह होना उससे भी बड़ी और बुरी बात है। तो उसके कारण क्या हो रहा है? “तुम विष्णु को अपना प्रतिस्पर्धी, विष्णु को तुम अपना शत्रु समझ रहे हो। पर विष्णु किसी के शत्रु नहीं हैं, वे सबके हितचिंतक हैं।”
भगवान: समस्त अस्तित्व के मूल आधार
Basis of all being—मतलब क्या? यह कोई ऐसा टेनिस प्लेयर नहीं है जो केवल नंबर 1 पर है। ऐसा नहीं है, बल्कि उसी टेनिस प्लेयर ने बाकी सब प्लेयर्स को सिखाया है और बाकी सब टेनिस प्लेयर्स की खेलने की क्षमता न केवल उनसे आई है, बल्कि उनसे ही लगातार आती रहती है। मतलब बाकी कोई टेनिस प्लेयर उस टॉप टेनिस प्लेयर के बिना खेल ही नहीं सकता है, वे वैसे हैं!
इसलिए basis of all being—भगवान केवल सभी जीवों में सर्वश्रेष्ठ ही नहीं हैं, वे सभी जीवों के अस्तित्व का कारण हैं! उनके बिना कोई भी अस्तित्व में नहीं हो सकता है, उनके बिना कोई भी कुछ कार्य नहीं कर सकता है।
न तदस्ति बिना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम्।
यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन॥
(भगवद्गीता १०.३९)
भगवान भगवद्गीता के 10वें अध्याय के श्लोक में कहते हैं कि “मेरे बिना कोई भी चीज़—चाहे वह चर हो या अचर—अस्तित्व में नहीं रह सकती, हे अर्जुन!”
तो यहाँ हमें समझना ज़रूरी है। अभी हम तो भगवान के ऐश्वर्य के बारे में चर्चा कर रहे हैं, पर भगवान के ऐश्वर्य को समझने के लिए हमें पहले भगवान क्या हैं, यह समझना ज़रूरी है। भगवान के यह दो अर्थ हैं और वास्तव में दोनों सत्य हैं:
- भगवान सभी जीवों के आधार हैं, जीवों के स्रोत हैं। भगवान के बिना कोई जीव जुड़ नहीं सकता।
- भगवान सब जीवों में सर्वश्रेष्ठ भी हैं।
ये दोनों धारणाएँ हैं और दोनों ही महत्त्वपूर्ण हैं।
ऐश्वर्य की परिभाषा: आकर्षण का केंद्र
अब जब यह समझ आ गया है, तो ऐश्वर्य क्या है, यह समझने का प्रयास करेंगे। ऐश्वर्य का मतलब क्या है? That which attracts and captures our attention—जो चीज़ें हमें आकर्षित करती हैं और न केवल आकर्षित करती हैं, हमारा आकर्षण बरकरार भी रखती हैं।
ऐसी बहुत-सी चीज़ें हो सकती हैं। मान लीजिए अभी आप सब यहाँ पर बैठे हैं, आप अलग-अलग जगह पर बैठे हैं—कोई मंदिर में है, कोई अपने यूथ सेंटर में होगा—और अचानक कोई व्यक्ति आ जाता है जो बहुत ऊँचा है, मान लीजिए 7 फीट ऊँचा है। तो क्या होगा? यह थोड़ा अनोखा है, सब देखेंगे कि कौन है यह व्यक्ति जो इतना बड़ा है। तो कोई भी असाधारण चीज़ होती है, वह लोगों को आकर्षित करती है।
या कोई बहुत ही धनवान व्यक्ति आता है। मान लीजिए कोई आता है और उसने ऐसा कोई जूता या ब्रांड पहना है जो बहुत-बहुत महँगा है। तो लोग सोचेंगे—अच्छा! यह कौन व्यक्ति है? वे उसका ऐश्वर्य देखेंगे, तो वह धन का ऐश्वर्य है; उससे आकर्षित हो जाते हैं।
तो यहाँ पर ऐश्वर्य का मतलब क्या है? कि जो चीज़ें हमें आकर्षित करती हैं, उनको ऐश्वर्य बताया गया है।
भगवान: समस्त सौंदर्य और ऐश्वर्य के स्रोत
जो हमने दो संकल्पनाएँ देखीं—कि भगवान सभी जीवों में सर्वश्रेष्ठ हैं और भगवान सभी जीवों के आधार हैं—अब यहाँ जो भगवान के ऐश्वर्य हैं, उनके संबंध में बोलना है, तो दो अर्थ हो सकते हैं:
- अनेक जीवों में ऐश्वर्य है, पर भगवान में सबसे अधिक ऐश्वर्य है। बहुत से लोग इस जीव-जगत में बुद्धिमान हो सकते हैं, भगवान सबसे ज़्यादा बुद्धिमान हैं। बहुत से लोग आकर्षक हो सकते हैं, भगवान सबसे ज़्यादा आकर्षक हैं। पर यह केवल एक संकल्पना है।
- दूसरी संकल्पना यह है—और इससे पूर्णता होती है—कि न केवल भगवान सबसे अधिक सुंदर हैं, न केवल भगवान सबसे अधिक बुद्धिमान हैं, बल्कि जिसके पास भी जो भी बुद्धि है, वह भगवान से आ रही है! जिसके पास जो भी सौंदर्य है, वह भगवान से आ रहा है!
इसका मतलब क्या होगा? कि भगवान न केवल सबसे अधिक सुंदर हैं, पर सबके सौंदर्य का भी स्रोत भगवान ही हैं।
जगत् का आकर्षण और भगवान का ऐश्वर्य
यदि हम समझेंगे कि भगवान सर्व-ऐश्वर्यपूर्ण हैं, तो इसका मतलब क्या होगा? कि इस जगत में बहुत-सी आकर्षित करने वाली चीज़ें हैं, पर जो भी चीज़ हमें आकर्षित करती है, उसका आकर्षण कहाँ से आ रहा है? भगवान से आ रहा है!
लोग बहुत-सी चीज़ों से आकर्षित हो सकते हैं। कुछ लोग होते हैं जो शक्ति से आकर्षित होते हैं। अभी कुछ समय पहले ही ओलंपिक गेम्स हुए और ओलंपिक गेम्स में मान लीजिए भारत में किसी ने कोई मेडल जीत लिया, गोल्ड मेडल जीत लिया किसी फील्ड में। तो जिस एथलीट, जिस खिलाड़ी ने गोल्ड मेडल जीता, उसके बारे में सोशल मीडिया पे और मीडिया में बहुत चर्चा होने लगती है। उनके गुणगान होने लगते हैं कि उन्होंने कैसे इतनी शिक्षा प्राप्त की, कैसे इतने दक्ष बने, उन्होंने क्या-क्या संघर्ष किया—उसके बारे में चर्चा होती है।
भारत में क्रिकेट बड़ा लोकप्रिय है। तो कोई क्रिकेटर अगर बहुत अच्छा खेलता है, बैटिंग करता है, तो उसके बारे में बहुत-से लेख आते हैं, उसकी पिक्चर्स आती हैं। तो अभी उन सब लोगों की जो क्षमताएँ हैं, वह उनकी हैं, पर वह केवल उनकी ही नहीं हैं; वह वास्तव में भगवान का ऐश्वर्य है जो उनके द्वारा प्रकट हो रहा है!
किसी भी क्षेत्र में अगर कोई बड़ा ही प्रभावशाली है, लोकप्रिय है, आकर्षक है, तो जो भी चीज़ें उनको आकर्षक बनाती हैं, वह वास्तव में भगवान से आ रही हैं।
भौतिक आकर्षण के परे: भक्ति की प्रेरणा
जब हम ऐसी लोकप्रियता देखते हैं, तो एक तरह से हम कह सकते हैं कि “ये तो सब लोग माया में हैं, ये सब लोग माया में पड़कर ऐसी चीज़ों से आकर्षित हो रहे हैं।” पर वह केवल एक दृष्टिकोण है। सत्य दृष्टिकोण है, पर एक दृष्टिकोण है।
लोग किसी सेलिब्रिटी को देखने के लिए, उसको मिलने के लिए, उसकी एक झलक प्राप्त करने के लिए इतने उतावले हो जाते हैं कि एक तरह से वे उसके लिए ‘सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज’ कर देते हैं! सब कुछ भूल जाते हैं। कोई मूवी स्टार है, कोई स्पोर्ट्स स्टार है, कोई म्यूजिशियन है—तो ऐसे लोग जो होते हैं, उनके शो में जाने के लिए, उनका एक ऑटोग्राफ प्राप्त करने के लिए, उनके साथ एक सेल्फी लेने के लिए लोग क्या-क्या नहीं करते हैं!
हजारों मील दूर जाते हैं, हजारों रुपये खर्च करते हैं और उससे वे कुछ चीज़ें प्राप्त करना चाहते हैं। आजकल तो ऐसी सेल्फी की पॉपुलैरिटी है कि किसी से मिलते हैं तो उनके साथ सेल्फी ले लेते हैं। कई सेलिब्रिटीज सेल्फी के लिए चार्ज करते हैं और उनके साथ एक सेल्फी लेने का चार्ज 100,000 डॉलर तक होता है! One hundred thousand dollars! One dollar is around eighty rupees!
तो मतलब हम कहते हैं—लवमात्र साधु संग, एक क्षण के साधु संग का बहुत महत्व है। तो यहाँ क्या है? ‘लवमात्र सेलिब्रिटी संग’ चाहिए! एक सेलिब्रिटी के साथ फोटो चाहिए। तो हम यह कहते हैं कि यह माया है, यह मोह है। वह एक दृष्टिकोण है देखने का।
पर दूसरा दृष्टिकोण यह है कि इस व्यक्ति में भगवान के आकर्षण की केवल एक बूँद आ रही है और यह बूँद अगर किसी व्यक्ति को इतना आकर्षित कर सकती है, तो फिर जहाँ पूरा सागर होगा, वहाँ कितना आकर्षण होगा! वह कितना आकर्षित कर सकता है!
अभी हम वह आकर्षण महसूस नहीं कर रहे हैं, यह सत्य है। पर वह जो आकर्षण है, वह वास्तव में है। तो एक तरह से भक्तिविनोद ठाकुर कहते हैं कि जब भौतिकवादी लोग भौतिक चीज़ों से आकर्षित हो जाते हैं और उसके लिए इतनी मेहनत करते हैं, तो वे केवल उसका खंडन नहीं करते कि भौतिकवादी लोग कितने माया में हैं; बल्कि वे कहते हैं कि “ये लोग इन चीज़ों से कितना आकर्षित हो रहे हैं और कितनी मेहनत कर रहे हैं! इससे मुझे प्रेरणा मिलती है कि मैं भगवान की और सेवा करूँ, भगवान की ओर और आकर्षित होने का प्रयास करूँ।”
तो अभी जो है, कृष्णा के अलग-अलग ऐश्वर्य देखें, तो उनमें से एक ऐश्वर्य जिसकी हम आज चर्चा करने वाले हैं—ज्ञान (Knowledge)। तो यह ऐश्वर्य का महत्व क्यों है? क्योंकि ऐश्वर्य के द्वारा हम भगवान का आकर्षण कितना है, यह समझ सकते हैं। और इस भौतिक जगत में भी हम इसको देखकर समझ सकते हैं।
श्रोताओं के साथ प्रश्न-उत्तर (Q&A)
So, at this stage, before we go ahead, किसी के कोई सवाल हैं जो अब तक मैंने बोला है उसके आधार पर? कोई सवाल होगा तो हम ले सकते हैं। Then, of course, we will take questions at the end.
यह चौंसठ गुण क्या हैं, वह बड़ा लंबा हो जाएगा। I think उसके लिए सेपरेट प्रवचन लगेगा। हम सिर्फ एक उदाहरण दे रहे थे कि एक Hierarchy है, एक श्रेणी है, ओके? आप ‘भक्तिरसामृतसिंधु’ के सेकंड हाफ में वह पढ़ सकते हैं कि चौंसठ गुण क्या हैं।
Yes, सत्यराज गोपीनाथ प्रभु!
सत्यराज गोपीनाथ प्रभु: हरे कृष्णा प्रभु जी! दंडवत प्रणाम। प्रभु जी, मुझे पूछना था जैसे हम लोगों ने पढ़ा है—ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः—तो जैसे हम जीवात्मा भगवान के अंश हैं, तो भगवान के कौन-कौन से गुण हम जीवात्माओं के अंदर आते हैं?
वक्ता: ओके, अच्छा सवाल है! तो अगर हम सब भगवान के अंश हैं, तो भगवान के कौन-से गुण हमारे अंदर हैं? क्योंकि हम अंश हैं, तो सबसे पहले भगवान ‘सच्चिदानंद’ हैं, तो वह गुण हममें भी है। In ways, we all too are satchitanand. Usually, we think of satchitanand as the spirit. यह जो ‘सच्चिदानंद’ है, यह आत्मा की ही एक डिफाइनिंग कैरेक्टरिस्टिक (परिभाषिक लक्षण) है, इसका यह मूलभूत लक्षण है। तो वह हम सब में है।
और उसके अलावा जो चीज़ें भगवान में असीमित मात्रा में हैं, वह हममें सीमित मात्रा में हैं। वह क्या हैं? भगवान सब जगह पर हैं, क्योंकि भगवान असीमित मात्रा में हैं। हममें वह शक्ति सीमित मात्रा में है, तो हम सब जगह पर नहीं हैं, हम एक जगह पर हैं। हम सब कुछ नहीं कर सकते हैं, हम कुछ चीज़ें कर सकते हैं। हम सब कुछ नहीं जान सकते हैं, हम कुछ चीज़ें जान सकते हैं।
जैसे भगवान के बारे में दूसरी चीज़ें बताते हैं—G.O.D.—जिसको कहते हैं Generator, Organizer, and Destroyer। यह भगवान करते हैं और हम जानते हैं कि ब्रह्मा, विष्णु, महेश ये तीन चीज़ें करते हैं—निर्माण करना, उसका पालन करना और उसका संहार करना। तो हम सब भी यह कर सकते हैं, पर हम सब सीमित मात्रा में कर सकते हैं। मान लीजिए हम कोई आर्किटेक्ट हैं, तो कोई घर बना सकते हैं, हम कोई खिलौना बना सकते हैं। तो हम कुछ चीज़ों को मैनेज कर सकते हैं और हम कुछ चीज़ों का विध्वंस भी कर सकते हैं।
तो यह जो है, भगवान में असीमित मात्रा में है और हम सब में सीमित मात्रा में है।
और यह मैं अगले विभाग में चर्चा करने वाला हूँ कि जब भगवान के कुछ Official Attributes (आधिकारिक गुण) हैं और भगवान के Personal Attributes (व्यक्तिगत गुण) हैं। Official Attributes मतलब कि जो भगवान का पद है, उसके अनुसार भगवान के कुछ गुण हैं; और जो भगवान का व्यक्तित्व है, उसके अनुसार कुछ गुण हैं।
तो भगवान का जो व्यक्तित्व है, वे गुण भगवान में हैं और शायद हममें होंगे या नहीं होंगे, क्योंकि हमारा व्यक्तित्व अलग है। जैसे भगवान में सौंदर्य है, तो सब लोगों में वैसा सौंदर्य नहीं है। अभी जो हमारा व्यक्तित्व है, वह हमारे पूर्व कर्मों से आता है। तो कुछ लोगों के अच्छे कर्म हैं, तो उनमें बहुत बुद्धि हो सकती है; कुछ लोगों के अच्छे कर्म होंगे, तो उनमें बहुत शक्ति हो सकती है।
पर आत्मा में क्या है? जो भगवान के मूलभूत लक्षण हैं—सब कुछ कर पाना, सब कुछ ज्ञात होना और सर्वव्यापी होना—उनके सीमित मात्रा में रूप हम सब में हैं: सच्चिदानंद! और भगवान के मूलभूत गुण—निर्मिति करना, पालन करना और संहार करना।