Be creative in fixing the mind on Krishna – Hindi
[Bhagavatam class on Srimad-Bhagavatam 2.1.22 at ISKCON, Mira Road, Mumbai, India]
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Lecture Summary
यह व्याख्यान श्रीमद्भागवतम् के द्वितीय स्कंध के प्रथम अध्याय पर आधारित है, जिसमें राजा परीक्षित शुकदेव गोस्वामी से पूछते हैं कि मन को कैसे एकाग्र और शुद्ध (अमल) किया जाए। इसके मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
- मन की प्रकृति और चंचलता: मन आत्मा और बाहरी जगत के बीच एक खिड़की और टीवी दोनों की तरह कार्य करता है। पाँचों इंद्रियों (श्रोत्र, चक्षु, स्पर्शन, रसन, घ्राण) से आने वाले इनपुट मन के स्क्रीन पर दिखते हैं। जब मन विक्षिप्त या दूषित होता है, तो वह पुरानी यादों, प्रलोभनों और चिंताओं का टीवी चालू कर देता है, जिससे व्यक्ति विचलित हो जाता है।
- प्रकृति के तीन गुण और मन का एकाग्र होना:
- तमोगुण: व्यक्ति अंधकार और आलस्य में अपने मन की ही दुनिया में फँसा रहता है।
- रजोगुण: व्यक्ति तीव्र भौतिक इच्छाओं, धन, या वासना के कारण अत्यधिक मेहनत करता है और मन को एकाग्र तो करता है, पर इससे उसके मन का मल (भोग की वासना) और बढ़ता है।
- सत्वगुण: व्यक्ति विचारवान होता है और मन में उठने वाले व्यर्थ विचारों से खुद को अलग रखकर शांति से अपना कर्तव्य करता है।
- विराट रूप की अवधारणा: जो लोग भगवान के सूक्ष्म/श्रीविग्रह रूप पर ध्यान केंद्रित करने में असमर्थ हैं या जिनकी धारणा है कि भगवान का बड़ा रूप होना चाहिए, भागवत उनके लिए ब्रह्मांडीय ‘विराट रूप’ पर चिंतन का विधान बताती है (जहाँ आकाश शरीर, सूर्य-चंद्रमा आँखें, और नदियाँ नसें हैं)।
- भक्ति में ‘उद्दीपन’ (Attractiveness): रूप गोस्वामी के अनुसार ‘उद्दीपन’ वह माध्यम है जो हमारे मन को भगवान की स्मृति में प्रवृत्त करता है। प्रत्येक व्यक्ति का मन अलग है, इसलिए प्रचारक और साधक को यह पहचानना होता है कि किस माध्यम से मन भगवान में सरलता से लग सकता है (जैसे एक रोबोटिक्स में रुचि रखने वाले बालक का भगवद्गीता के संवादों को रोबोट से दर्शाने के विचार के माध्यम से गीता अध्ययन में प्रवृत्त होना)।
- श्रील प्रभुपाद का नवोन्मेष (Innovation): श्रील प्रभुपाद ने जगन्नाथ पुरी की पारंपरिक रथयात्रा को पूरे विश्व के अलग-अलग शहरों और तिथियों में आयोजित करके संपूर्ण विश्व को कृष्ण भावना में जोड़ने का अभिनव प्रयास किया।
Full Transcription
हरे कृष्णा! तो आज हम श्रीमद्भागवतम् में द्वितीय स्कंध के पहले अध्याय में विराट रूप की पृष्ठभूमि के बारे में चर्चा कर रहे हैं।
तो परीक्षित महाराज अभी मृत्यु की शय्या में हैं, सात दिनों में उनकी मृत्यु होने वाली है। इसका वर्णन पिछले स्कंध के अंत में हुआ है। और अभी वे शुकदेव गोस्वामी से सवाल पूछ रहे हैं। तो वे पूछ रहे हैं—”यथा संधार्यते ब्रह्मन्” कि किस तरह से हम हमारे मन को धारणा में लगा सकते हैं, “धारणा यत्र सम्मता” कि किस तरह से मन को एकाग्र कर सकते हैं? और किस लिए एकागर करना है? “मनोऽमलम्” — जिससे कि हमारे मन में जो मल है, वह निकल सके, मन अमल (शुद्ध) बन सके।
मन को एकाग्र करना यह ज़्यादा मुश्किल काम नहीं है, वह लोग कर सकते हैं। मूवी देखने जाते हैं तो तीन घंटा एकाग्र होकर मूवी को देख रहे हैं; क्रिकेट मैच होती है तो घंटों-घंटों तक लोग बैठकर वह क्रिकेट मैच को देखते रहते हैं। तो मन को एकाग्र करना इतना मुश्किल नहीं है, मन को एकाग्र करना इस तरह से कि मन शुद्ध हो सके—वह हमें सोचना है।
साधारणतया हम सब हमारे मन के द्वारा काफी हद तक नियंत्रित होते हैं। और हमारा मन ऐसी चीज़ है जो हमेशा हमारी चेतना को इधर-उधर घुमाते रहता है। आत्मा यहाँ पे है, मन बीच में है, और शरीर और भौतिक जगत बाहर है। मन जो है, एक तरह से आत्मा के लिए खिड़की है जिससे कि वह बाहर की दुनिया को देख सके।
भगवान कहते हैं भगवद्गीता में 15वें अध्याय के नौवें श्लोक में, बता रहे हैं कैसे आत्मा एक शरीर से दूसरे शरीर में जाता है। जब शरीर में जाता है तो क्या होता है? हर शरीर में उसको एक मन और उसके साथ इंद्रियाँ मिलती हैं। वास्तव में मन जो होता है, वह आत्मा के साथ ही आता है, पर वह जो मन है, वह उस शरीर की इंद्रियों से जुड़ जाता है और फिर उसके अनुसार आत्मा उपभोग करने का प्रयास करता है और आत्मा जीवन का अनुभव करता है।
कोई बड़ी बिल्डिंग अगर होगी जिसमें सिक्योरिटी कैमराज़ हैं… कई जगह कोई बड़ा ऑफिस होता है, बहुत महत्त्वपूर्ण बिल्डिंग है, तो वहाँ पर मान लीजिए उसके पाँच दरवाज़े हैं, तो हर एक दरवाज़े में एक कैमरा लगा हुआ है और उसका एक सिक्योरिटी रूम है। उस सिक्योरिटी रूम में एक बड़ा स्क्रीन है, इसमें पाँच खिड़कियाँ हैं, पाँच विंडोज हैं उसमें। और ये पाँचों विंडोज में ये बिल्डिंग के पाँचों दरवाज़ों में कौन आ रहा है, कौन जा रहा है, वह सब दिखता है।
तो हमारा मन उस बड़े स्क्रीन के समान है। और उसमें ये पाँच खिड़कियाँ जो हैं, ये पाँच इंद्रियों से जो भी जानकारी आ रही है, वह हम देख रहे हैं। पर जो मन है, न केवल खिड़की के रूप में कार्य करता है… तो अगर आप बैठे हुए हैं, तो जो आँखों से जानकारी आ रही है और कानों से जानकारी आ रही है, वह सब आपके मन के स्क्रीन पे दिख रही है। तो मन का स्क्रीन जो होता है, हमारे लिए खिड़की के समान कार्य करता है जिससे कि हम बाहर की दुनिया को देख सकें अच्छी तरह से और फिर उसपे उचित जो कार्य हैं, कर सकें।
पर जो मन है, न केवल खिड़की के रूप में कार्य करता है, वह एक टीवी के रूप में भी कार्य करता है! और कभी-कभी टीवी के रूप में वह अपना एक मूवी चालू कर लेता है। मान लीजिए कि आप यहाँ बैठे हैं और प्रवचन सुनने का प्रयास कर रहे हैं। पर मान लीजिए कि कल आपसे झगड़ा हो गया है, तो उस व्यक्ति ने आपसे कुछ कहा, आपने उससे कुछ कहा… और अचानक आपको किसी कारण याद आता है कि उस व्यक्ति ने क्या कहा था। और जैसे ही आ रहा था, “कैसे उसकी हिम्मत हुई ऐसा कहने की! जब उसने ऐसा कहा था, मुझे ऐसा कहना चाहिए था! मुझे ऐसी बुद्धि क्यों नहीं आई यह बताने के लिए? अगली बार जब मिलूँगा तो मुझे उनको बताना है, अब वह ऐसा बोलेंगे तो…”
अब हम यहाँ पर बैठे हैं, पर हमारा मन वह टीवी चालू कर देता है! और कहाँ चले जाते हैं हम, पता नहीं चलता! तो हमारा मन जो है, वह बड़ा चंचल है। चंचलता मतलब क्या कि वह कभी भी कोई भी मूवी चालू कर सकता है। और जब भी कोई भी मूवी चालू हो जाता है उसपे मन पे, तो फिर हम उसको देखने में लग जाते हैं।
और जितना हमारा मन दूषित है, उतने अलग-अलग प्रकार के मूवीज़ वहाँ पे चालू हो जाते हैं। अगर किसी व्यक्ति ने कभी शराब पी नहीं है, तो शराब की दुकान के बाहर जाएगा भी, तो उसको उतना उत्तेजन नहीं होगा।
मन उसपे… या तो हमें बाहर जो हो रहा है वह देखना है। वास्तव में उसमें भी हमें पूरा मग्न नहीं होना है, क्योंकि बाहर की दुनिया में भी बहुत से प्रलोभन हैं और हमारे मन की स्मृति में भी बहुत से प्रलोभन हैं। और आजकल का तकनीक क्या करता है? ये मन की पाँच खिड़कियाँ हैं, पर हमारे टीवी की सौ खिड़कियाँ होती हैं, हमारे कंप्यूटर के इंटरनेट से तो हज़ारों खिड़कियाँ आ जाती हैं! अब इंटरनेट फोन पर आ जाता है, तो फोन पर भी क्या है—यह देखो, वह देखो, वह देखो! तो इस तरह से हमारा मन बहुत दूषित होते रहता है।
तो अभी यह मन को किस तरह से स्थिर करना? अभी स्थिर करना मतलब यहाँ पर दो चीज़ें हैं: सबसे पहले हमें क्या करना है? मन पे वह दिखना चाहिए, मन उसपे केंद्रित होना चाहिए—मतलब वह दिखना चाहिए जो हमारे लिए अच्छा है। और दूसरा क्या है कि इस तरह से जो मन पे पहले से जो मूवीज़ आते हैं, वे बंद हो जाने चाहिए। मतलब एक चीज़ पे केंद्रित होना यह अच्छी बात है, पर वह किस चीज़ पे केंद्रित होना है, वह भी महत्त्वपूर्ण है।
The self controlled by one desire is not necessarily a self controlled person.
मतलब क्या है कि कोई व्यक्ति एक चीज़ के लिए बड़े दृढ़ संकल्प से कार्य करता है, तो उसकी एक ही इच्छा है, पूरा केंद्र उसी पे है। मैं एक बार ट्रैवलिंग कर रहा था, ट्रेन में था। तो मैं देखा दूर पे कोई व्यक्ति खड़ा था और उसके हाथ में एक बीड़ बैग (bead bag) जैसी थैली थी। मैं सोचा कि चलो, वह जप कर रहे हैं, तो मिलते हैं उससे बात करते हैं। तो उसने बोला, “अरे! टच मत करो इसको!” क्या है यह? तो वह व्यक्ति क्या था, वास्तव में उसकी वह बीड़ बैग नहीं थी, वह नेल बैग (nail bag) थी, उसके नाखूनों की बैग थी! वह बताया कि गिनीज़ बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में एंट्री के लिए उसने दुनिया का सबसे बड़ा नाखून ग्रो करना था। तो इसलिए एक नाखून इतना बड़ा हो गया था कि वह नाखून को ढँकके रखने के लिए, संभाल के रखने के लिए उसने बैग में रखा था। तो वह बोलता है, “इसको टच भी मत करो, वह टच करेंगे तो नाखून टूट जाएगा, तो मेरा रिकॉर्ड चला जाएगा!”
तो वह जो खड़ा था, अभी उसको बैठने की जगह नहीं मिल रही थी। तो जो भी कोई आ रहा है, जा रहा है, बड़े ध्यान से देख रहा है—”कोई मेरी बैग को धक्का न लगा दे!” जितना हम जप करते समय भी भगवान में मन नहीं लगाएँगे, उतना उसका उसके नाखून में मन लगा था! अभी उसके नाखून में उसका मन लगा है, पर एक चीज़ पर मन है पूरा, इधर-उधर कुछ भी नहीं, ज़्यादा ध्यान नहीं देता। जो भी ध्यान दे रहा है, इसका मतलब यह नहीं है कि वह आत्म-नियंत्रित व्यक्ति है, इसका मतलब यह नहीं है कि मन वास्तव में शांत या स्थिर हो गया है।
तो प्रकृति के तीन गुण होते हैं। कौन-कौन से गुण होते हैं वे? सत्वगुण, रजोगुण और तमोगुण। प्रकृति के तीन गुण जो होते हैं, उसका हरेक का स्वभाव होता है। जो तमोगुण होता है, उसमें व्यक्ति न तो अच्छा विचार कर सकता है, सिर्फ़ अपने मन की दुनिया में घूमते रहता है। प्रकाश मतलब ज्ञान से सब कुछ देखना, प्रवृत्ति मतलब जो अच्छी तरह से कार्य करना… न तो देख सकता है, न तो कार्य कर सकता है—यह तमोगुण का लक्षण है। तो तमोगुण में मन बहुत विकृत होता है।
रजोगुण में व्यक्ति कार्य करता है—”मुझे यह प्रोजेक्ट पूरा करना ही है, मुझे यह काम करना ही है!” और उसके लिए लोग बहुत मेहनत करते हैं। तो पूरा मन वह एक ही चीज़ में लगे रहता है। अभी एक तरह से सोचें कि वे उस समय खाना भूल जाएँगे, सोना भूल जाएँगे, घंटों-घंटों काम करते रहते हैं। उनका मन केंद्रित है, पर क्या है? वे क्यों करना चाहते हैं? “उससे मुझे पैसा मिलेगा, उससे मैं भोग करूँगा।” तो यह जो आत्म-नियंत्रण है, वह आत्मा के उद्धार के लिए नहीं है, वह इंद्रियों के तर्पण के लिए है। पर तपस्या का उद्देश्य आत्म-साक्षात्कार था, वह इंद्रियों का भोग करना नहीं था भौतिक स्तर पर।
तो रजोगुण में कभी-कभी लोग जो होते हैं, एक चीज़ पर मन बड़े तीव्रता से लगा सकते हैं, पर उससे उनके मन का मल और बढ़ जाता है, कम नहीं होता। वे लोभ के कारण कार्य कर रहे हैं, काम-वासना के कारण वे कार्य कर रहे हैं, और उसके बाद में वह कार्य करने से उनकी जो वासनाएँ हैं, वह और बढ़ जाएँगी।
सत्वगुण में हम विचारवान होते हैं, पहले विचार करते हैं। जैसे कुछ भक्त हैं, कुछ भक्त नहीं हैं, तो हम जब घर में आते हैं तो वे मूवी देख रहे हैं। तो अभी हमको मूवी देखने में कोई रुचि नहीं है। तो हम घर में जाएँगे, वह मूवी चालू रहेगा, उसको बंद करने की हममें शक्ति नहीं है क्योंकि वे नाराज़ हो जाएँगे, गुस्सा हो जाएँगे, झगड़ा हो जाएगा। तो वह मूवी चालू रहेगा, पर हमको मूवी देखने की ज़रूरत नहीं है। मूवी चलते रहेगा, हम हमारा काम करते रहेंगे।
वैसे कभी-कभी क्या होता है, मन में विचार होता है। अभी वह विचार को मन से निकाल देना बड़ा मुश्किल है। मन में विचार रहेगा, पर वह पीछे चलते रहेगा, हम हमारा काम करते रहेंगे।
तो कैसे है कि मन का, जैसे मैं बोला था, एक स्क्रीन है। उस पर एक खिड़की बड़ी खुली रहती है और बाकी छोटी खिड़कियाँ भी खुली रहती हैं। तो अभी वह बड़ी खिड़की पे क्या लाना है हमें, किस पे केंद्रित करनी है वह, जिससे कि मन शुद्ध हो जाए?
अभी भागवतम् इस प्रश्न का उत्तर अलग-अलग स्तर पर देता है। हम सब हमारे पूर्व संस्कारों के कारण, पूर्व कर्मों के कारण आध्यात्मिक प्रगति के मार्ग पे अलग-अलग स्तर पे हैं। और अलग-अलग स्तर पे होने के कारण, हम उसी पद्धति से हम सब कार्य नहीं कर सकते हैं।
तो अभी पाश्चात्य देशों में जो लोग होते हैं, उनके धर्मों के अनुसार वे कहते हैं कि “आप कभी किसी मूर्ति की पूजा मत करो।” वे उसको आइडोलैट्री (idolatry) कहते हैं। आइडोलैट्री मतलब कि अगर आप मूर्ति की पूजा कर रहे हो, मतलब उनका क्या विचार होता है कि जो मूर्ति है, वह भगवान का प्रतिस्पर्धी बन जाएगी! वे विचार करते हैं कि जो कम बुद्धि वाले लोग हैं, वे भगवान का चिंतन नहीं कर सकते हैं, इसलिए उनके लिए मूर्ति बना देते हैं। पर धीरे-धीरे क्या होता है कि मूर्ति जो होती है, लोग उस मूर्ति की पूजा करते हैं और जो मूर्ति भगवान की है, वे उस भगवान को भूल जाते हैं। इस तरह से उनकी विचारधाराओं में क्या होता है, वे सोचते हैं कि मूर्ति यह भगवान की प्रतिनिधि तो कर रही है, पर इस मूर्ति को ही लोग पूजा करने लगते हैं और भगवान को भूल जाते हैं। इसलिए वे कहते हैं कि मूर्ति की पूजा नहीं करनी चाहिए। और यहाँ तक कि उनके धर्मों में—क्रिश्चियनिटी, इस्लाम इन धर्मों में—वे कहते हैं कि जहाँ भी मूर्ति की पूजा हो, वह मूर्ति की पूजा बंद करो। अगर आप बाइबल पढ़ते हैं, तो वहाँ भी धार्मिक जगह जो भी मूर्तियाँ हैं, उन मूर्तियों को तोड़ देने का उल्लेख है।
अब एक अमरीकी युवक है जो धार्मिक फैमिली से है। वह पहली बार मंदिर में आया। तो मुझे बता रहा था कि पहली बार जब मंदिर में आया और मंदिर में उसने मूर्तियाँ देखीं, तो उसके मन में पहला विचार आया कि इनको तोड़ना चाहिए! अभी हम बोलेंगे कि यह असुरी विचार है, पर वास्तव में वह कोई असुरी प्रवृत्ति का व्यक्ति नहीं है, बहुत अच्छा व्यक्ति है, सच्चा व्यक्ति है, साधारणतया सत्वगुण में रहता है। पर उसके मन में वह विचार आता है क्योंकि उसके बचपन से उसी प्रकार की संकल्पना से मूर्ति का वह विचार करता है।
तो अभी साधारणतया हम मंदिर में आते हैं, विग्रहों का दर्शन करते हैं, तो विग्रहों को देखकर हमारे मन में भगवान के प्रति भक्ति जाग्रत होती है, भक्ति प्रवृत्त होती है। पर कोई और व्यक्ति किसी और पृष्ठभूमि से आ रहा है, तो मूर्ति को देखकर उसके मन में शायद भक्ति जाग्रत न हो, भक्ति प्रवृत्त न हो। तो फिर ऐसे व्यक्तियों के लिए वे अपना मन भगवान में कैसे लगाएँ? पर उस समय अगर उनको बोलें कि “मूर्ति पर आप चिंतन करो, उसको आप प्रार्थना करो”, वे कर ही नहीं पाएँगे। तो उनकी जो पृष्ठभूमि है, उसके अनुसार विग्रह पर चिंतन करना उनके लिए प्रतिकूल है।
तो मैंने एक आज की दुनिया से उदाहरण दिया है। यहाँ पर भागवतम् में वही वर्णन आता है, उसी प्रकार का वर्णन आता है। यह अध्याय है, यह विभाग है भागवतम् का कि यह विश्वरूप दर्शन—भगवान का जो विराट रूप है, उस पर चिंतन कैसे करें, इसके बारे में वर्णन कर रहे हैं। तो भागवतम् भी ऐसी ही परिस्थिति के बारे में बताता है कि कुछ लोगों के लिए भगवान के व्यक्तिगत रूप पे चिंतन करना बड़ा मुश्किल हो सकता है।
कुछ लोग ऐसे होते हैं कि उनको लगता है कि भगवान तो बहुत बड़े होने चाहिए। मंदिर में अरे! इतने छोटे से विग्रह हैं, ये क्या भगवान कैसे हो सकते हैं? अगर कुछ लोगों की बहुत भौतिक संकल्पना है, तो उनको लगता है कि भगवान का जो बड़प्पन है, वह बड़े शरीर में, बड़ी काया में दिखना चाहिए। तो इसलिए वे भगवान के रूप का चिंतन नहीं कर पाएँगे—”नहीं, ये क्या भगवान हो सकते हैं, ये तो इतने छोटे से हैं!” तो फिर उनके लिए क्या है? भागवतम् में बताया गया है कि वे भगवान के विराट रूप पर चिंतन कर सकते हैं।
तो जो भक्ति है, यह कोई एक चीज़ से या एक कार्य से सीमित नहीं है। भक्ति का उद्देश्य यह है कि व्यक्ति जहाँ भी है, वहाँ से उसकी चेतना ऊपर बढ़े। और किस व्यक्ति के लिए क्या अनुकूल है, यह अलग-अलग परिस्थिति में फ़र्क होता है।
तो अभी यह विराट रूप की संकल्पना जो यहाँ पर कही जा रही है, वह क्या है कि ठीक है, आप कल्पना कीजिए कि जो बड़ा आसमान है, वह भगवान के शरीर का एक अंग है; जो सूर्य और चंद्र हैं, वे भगवान की आँखें हैं; जो नदियाँ हैं, वे भगवान के शरीर पे बाल के समान हैं; जो बड़े-बड़े सागर हैं, वे उनकी नाभि में जल के समान हैं… भगवान इतने बड़े हैं! हाँ, जरूर उनको पूजना चाहिए! इस भाव से भगवान के प्रति थोड़ा तो आदर, थोड़ा तो उनके प्रति सबमिशन, उनके प्रति नम्र भाव प्रकट हो सकता है।
जो भक्त होते हैं, जो ख़ासकर भक्ति का प्रचार कर रहे हैं, वह उनकी ज़िम्मेदारी होती है कि किस तरह से व्यक्ति जहाँ भी हो, वहाँ से उसके मन को भगवान में कैसे लगाएँ, यह बताएँ। प्रभुपाद जी इसमें बड़े सुंदर उदाहरण देते हैं।
एक बार प्रभुपाद जी जब अमेरिका में थे 1965-1966 में, तभी बहुत से लोग वहाँ पर ड्रग्स लिया करते थे। और उनका क्या विचार था कि ड्रग्स लेने से, नशा करने से हम आध्यात्मिक प्रगति करेंगे। तभी एक ड्रग था, उसका नाम था एलएसडी (LSD)। अभी LSD यह एक केमिकल नाम है, पर वे जो लोग LSD लेते थे, उन्होंने खुद को अपना नाम दे रखा था—LSD मतलब ‘League of Spiritual Discovery’ (आध्यात्मिक खोज का संघ), कि जो भी यह ड्रग लेंगे, वे आध्यात्मिक अन्वेषण करेंगे, वे आध्यात्मिक खोज करके आध्यात्मिक प्रगति करेंगे!
तो अभी उस समय ऐसा ही नशा किया हुआ एक व्यक्ति आया। प्रभुपाद जी से पूछा, “प्रभुपाद जी! आप बोल रहे हैं वैकुंठ है, वैकुंठ में बड़ा आनंद है, तो वैकुंठ आनंद क्या है, बताओ मुझे?”
तो प्रभुपाद जी ने उसको जवाब दिया कि “आप कल्पना कीजिए कि एलएसडी का एक सागर है! वैकुंठ मतलब एक एलएसडी का सागर है!”
अभी एलएसडी तो एक ड्रग है, वह ड्रग तमोगुण में होता है। वैकुंठ शुद्ध सत्व में है। तो अभी प्रभुपाद जी शुद्ध सत्व का जो भगवद्धाम का आनंद है, उसकी एलएसडी से तुलना कैसे कर सकते हैं? वास्तव में तुलना इसलिए कर रहे हैं कि वही उस व्यक्ति को समझ में आता है!
अगर मान लीजिए कोई प्रवचन करने आते हैं, और जो श्रोतागण हैं उनमें से किसी को संस्कृत नहीं आता है, और प्रवचनकर्ता पूरा प्रवचन संस्कृत में देकर चले जाते हैं… सब कुछ वे सही बोले, पर किसी भी चीज़ का सही प्रभाव नहीं हुआ! तो जो भाषा है, हम आसानी से समझ सकते हैं कि व्यक्ति अगर वह भाषा समझता ही नहीं है, तो फिर हम क्या बोल रहे हैं, उनको समझ में नहीं आएगा।
पर जिस तरह से भाषा एक शब्दों की रचना होती है, उसी तरह से हमारी विचारधारा जो होती है, वह भी भाषा के समान ही होती है। हमारी जो विचारधारा होती है, हम जिस विचारधारा से आते हैं, वह हमारी बुद्धि की भाषा है, और उसके अनुसार ही व्यक्ति को समझाना पड़ता है। जो व्यक्ति अगर सोचता है कि भगवान बड़े होने चाहिए, उनको विराट रूप नहीं दिखाएँगे तो समझ भी नहीं आएगा।
यह विराट रूप का वर्णन महाभारत में भी आता है। राजनीतिक लोग दिखावा करने में बड़े अच्छे होते हैं। तो अभी दुर्योधन बड़ा स्वार्थी था, सब कुछ मेरे लिए चाहिए था उसको। पर दिखाने के लिए उसने क्या किया था? जब उसने अपने सब भाइयों के लिए महल बनाए, तो उसने दुःशासन के लिए जो महल बनाया, वह खुद से अच्छा महल बनाया। “देखो, मैं मेरे भाई से कितना प्रेम करता हूँ, मैं कितना निःस्वार्थी हूँ! मेरा जो महल है, उससे अच्छा दुःशासन का महल है।” पर वास्तव में दुःशासन उसका ही सेवक था, और यह सब ऑप्टिक्स (optics) के लिए था, दिखाने के लिए था यह सब।
तो उसने सोचा कि जब कृष्ण आएँगे, तो मैं कृष्ण को दुःशासन के महल में रखूँगा जिससे कि सबसे आलीशान महल था। और फिर उसने दूसरी योजना बनाई थी। कभी जो लोग योजना बनाते हैं, तो प्लान A होता है और प्लान B होता है। उसका प्लान A था कि मैं कृष्ण को गिरफ्तार कर दूँगा! और कृष्ण को जब बंदी बना लूँगा, तो फिर क्या होगा? कृष्ण बहुत शक्तिशाली व्यक्ति हैं, वे अगर बंदी बन जाएँगे, तो फिर पांडवों को जीतना बड़ा आसान हो जाएगा।
और इस तरह से प्रयोग किया कि सारे सभासद प्रभावित होने लगे—धृतराष्ट्र प्रभावित हो गया, दुःशासन भी प्रभावित हो गया। और फिर दुर्योधन आग-बबूला होने लग गया—”कृष्ण मेरे सारे किए-कराए पर पानी फेर रहे हैं!” तभी उसने अपने शस्त्र छोड़ दिए।
विराट रूप जो है, वास्तव में अलग-अलग है। ऐसा नहीं है कि जैसे ब्रह्मलोक है, इंद्रलोक है, विष्णुलोक है, वैसे कोई विराट रूप लोक नहीं है ब्रह्मांड में कि वहाँ पर विराट रूप हमेशा रहता है, नहीं। विराट रूप उनको भगवान पे केंद्रित करने के लिए क्या अनुकूल है, वह हमें देखना है।
रूप गोस्वामी ने एक ‘भक्तिरसामृतसिंधु’ नाम का ग्रंथ लिखा है। उसमें हम भक्ति के रस का आस्वादन कैसे कर सकते हैं, इसका वर्णन किया है। और उसका ही अगला ग्रंथ जो है, वह है ‘उज्ज्वलनीलमणि’। उज्ज्वलनीलमणि में वे ख़ासकर भगवान में कैसे मन लगा सकते हैं, उस पे वर्णन किया है भगवान की लीलाओं का, भगवान की लीलाओं का विश्लेषण करके वर्णन किया है।
तो उसमें एक शब्द का इस्तेमाल करते हैं और वह शब्द है ‘उद्दीपन’। उद्दीपन मतलब वह चीज़ जो हमें भगवान की स्मृति में उद्दीपित करती है, जो प्रवृत्त करती है भगवान की स्मृति के लिए।
हम सब इंडिविजुअल (व्यक्तिगत) हैं, अलग-अलग व्यक्ति हैं। हम सबका अपना-अपना मन है और हरेक मन की अपनी-अपनी वृत्तियाँ होती हैं। तो हम सबको हमारे मन को भगवान में लगाना है, पर मेरा मन किस तरह से भगवान में लगेगा और आपका मन भगवान में किस तरह से लगेगा, इसमें थोड़ा भेद होता है क्योंकि हरेक मन अलग होता है।
तो जैसे हम भौतिक जगत में भी देखते हैं कि वही चीज़ से सब लोग उत्तेजित नहीं होंगे। कोई व्यक्ति अगर क्रिकेट के पीछे बहुत आसक्त है, तो क्रिकेट मैच चल रही होगी तो वह बड़ा उत्तेजित हो जाएगा; कोई व्यक्ति क्रिकेट के पीछे बहुत उत्तेजित नहीं होगा, किसी व्यक्ति को क्रिकेट के बारे में पता भी नहीं है, क्रिकेट के बारे में कुछ रुचि नहीं है। इसलिए भौतिक जगत में भी हम सबका मन उन्हीं चीज़ों से विक्षिप्त होगा, ऐसा नहीं है। कुछ-कुछ चीज़ें समान हैं, पर कुछ-कुछ चीज़ें अलग भी होती हैं।
उसी तरह से भक्ति में भी… भौतिक जगत में चीज़ें हैं जो हमारे मन को आकर्षित करती हैं और वे उसके द्वारा हमारे मन को बद्ध कर देती हैं। आध्यात्मिक जगत में भगवान भी अनेक पद्धतियों से हमारे सामने आते हैं। तो उनमें से कुछ भगवान के जो मैनिफेस्टेशंस (प्रकट रूप) हैं, भगवान के जो प्रकट होने की पद्धतियाँ हैं, कुछ हमारे लिए विशेष रूप से हमें प्रवृत्त कर सकती हैं।
तो हम सबको देखना है कि हमारा भक्ति में उद्दीपन क्या है। जब मैं भगवान के दर्शन करता हूँ, तो फिर मैं साधारणतया एक श्लोक बोलता हूँ भागवतम् से, भगवद्गीता के आचार्यों के ग्रंथों से। और जब श्लोक का वर्णन करता हूँ, तो उससे क्या होता है, वह बुद्धि प्रवृत्त हो जाती है—जो भगवान का यहाँ पर गुणगान हो रहा है, वही भगवान यहाँ पर सामने विग्रहों के रूप में हैं। तो उसके द्वारा मन भगवान में अच्छे से लगता है।
शास्त्रों में बहुत सुंदर वर्णन आते हैं कि भगवान किस तरह से बड़े आकर्षक रूप में हमें प्रकट होते हैं। रूप गोस्वामी ने एक ग्रंथ लिखा है—’चित्रकवित्वम्’। चित्रकवित्वम् में हमें बहुत सुंदर श्लोक बताए गए हैं। शब्दों के अक्षरों के बड़े निपुण हैं रूप गोस्वामी, तो उन्होंने कई श्लोक बनाए हैं जो केवल एक या दो अक्षरों से सम्मिलित हैं।
एक श्लोक है, इसमें सिर्फ़ दो अक्षर इस्तेमाल करते हैं—’च’ और ‘र’:
“चरचोरुरुचिरचोरा रुचिरोऽरं चराचरे।
चौराचारोऽचिराच्चिरं रुचा चारुरचुचुरात्॥”
…(श्लोक उच्चारण)…
जाते हैं… और कृष्ण का… एक लड़का था, वह धार्मिक नहीं था, पर उसको रोबोटिक्स में बहुत रुचि थी। और उसमें जीत भी रहा था। तो वह रात को जागे रहकर भी रोबोट के बारे में पढ़ता था—यह रोबोट कैसे बना सकते हैं, वह रोबोट कैसे बना सकते हैं, उसमें उसको रुचि थी। पर उसको “मंदिर में आओ, थोड़ा प्रवचन सुनो, कीर्तन करो”, उसमें बिल्कुल रुचि नहीं थी।
तो उसकी मदर बोलती है कि “इसको भक्ति में हम कैसे रुचि लाएँ? उसको सिर्फ़ रोबोट में रुचि है, पर भक्ति में रुचि नहीं है।”
तो मैं उससे बात कर रहा था, बड़ा बुद्धिमान लड़का था। तो मैं समझा कि “तुम रोबोट बनाते हो, कॉम्पिटिशन होती है नेशनल लेवल की, उसमें तुम रोबोट बनाते हो, तो तुम कौन सा रोबोट बनाते हो? यह आइडिया कहाँ से लाते हो?”
“मैं अलग-अलग पढ़ता हूँ, उसके द्वारा मैं आइडिया लाता हूँ।”
“आजकल अमेज़न नाम की कंपनी जहाँ पे ऑनलाइन सामान खरीदते हैं… आपको यह खरीदना है, वह कहते हैं अमेज़न से खरीद सकते हैं। तो अमेज़न के जो वेयरहाउसेस होते हैं जहाँ पे सामान रखते हैं, अमेज़न लोगों को एम्प्लॉय नहीं करते हैं, वे सब रोबोट्स होते हैं। हम ऑर्डर करते हैं तो अमेज़न के कंप्यूटर के रोबो में जाता है कि यह सामान जाके उठाओ और पैक करो, तो वह सब रोबो पैक करते हैं। तो जो रोबो सब पैक करते हैं…”
तो मैं उसको बोला, “यह रोबो तो सब लोग बनाते होंगे?”
“हाँ।”
“तुमको अगर रोबो की कॉम्पिटिशन में पार्ट लेना है, तुम कुछ नए प्रकार का रोबो क्यों नहीं बनाते?”
“क्या रोबो?”
“तुम ऐसा कर सकते हो कि जब कृष्ण और अर्जुन भगवद्गीता में संवाद कर रहे हैं, उस संवाद का तुम रोबो बनाओ!”
“नहीं, नहीं, मैं नहीं बनाता हूँ ऐसा।”
वह तो चला गया था। मैं उसके माता-पिता से बात कर रहा था। पाँच-दस मिनट के बाद वापस आ गया वह लड़का! “यह एक अच्छा आइडिया है! कोई भी ऐसा रोबो नहीं बनाने वाला है, पूरे कॉम्पिटिशन में मैं अकेला ऐसा रोबो बनाऊँगा! अच्छा आइडिया है!”
वह लड़का बोलता है, “मैं सोचता हूँ इसके बारे में।” और उसके बाद में उसके माता-पिता ने मुझे मेल लिखा कि “अभी वह पूरा घंटों-घंटों बैठकर भगवद्गीता पढ़ रहा है कि क्या है यह भगवद्गीता में, कैसे मैं इसको रोबो के द्वारा डिपििक्ट (depict) कर सकता हूँ!” और उसमें अभी उसकी भगवद्गीता में रुचि लगने लगी है।
तो क्या है? उनको जो भगवान में मन लगाना आसान हो जाएगा। तो इसलिए प्रचारक की ज़िम्मेदारी है कि न केवल एक फार्मूला बोले—”जप करो, भगवद्गीता पढ़ो, यह करो, वह करो” (वह ज़रूरी है), पर वह इस तरह से बोले जिससे कि व्यक्ति को वह समझ में आ सके जो व्यक्ति को आकर्षक लग सकता है।
तो प्रभुपाद जी एक प्रवचन में बोलते हैं कि “यह कृष्ण भावनामृत आंदोलन प्रैक्टिकली इन्वेंटेड बाई मी (practically invented by me) है, कि सारे कृष्ण भावनामृत आंदोलन का मैंने अन्वेषण किया।” अन्वेषण मतलब क्या?
प्रभुपाद जी ने… अभी कुछ ही दिनों में रथयात्रा आ रही है, तो रथयात्रा प्रभुपाद जी ने… जगन्नाथ पुरी में रथयात्रा होती थी, पर साधारणतया उसी दिन में होती थी जिस दिन में जगन्नाथ पुरी में रथयात्रा हो। पर प्रभुपाद जी ने क्या किया कि दुनिया में अलग-अलग जगहों पर, अलग-अलग समय पर रथयात्रा चालू की। प्रभुपाद जी की कृष्ण भावना थी और फिर प्रभुपाद जी बोले कि “आप यह रथ निकालो और इस रथ के सामने आप नाचो!”