Bhishma Stuti 1.9.32-42
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प्रवचन का संपूर्ण सारांश (Summary)
यह व्याख्यान श्रीमद्भागवतम् के प्रथम स्कंध के नवें अध्याय (भीष्म स्तुति) पर आधारित है। इसमें पितामह भीष्म द्वारा बाणों की शय्या पर लेटे हुए भगवान श्री कृष्ण के रूप, गुण और लीलाओं का अत्यंत भावपूर्ण स्मरण किया गया है:
- भीष्मदेव की अंतिम चेतना: कुरुक्षेत्र युद्ध के समाप्त होने पर पितामह भीष्म बाणों के बिस्तर पर लेटे हैं। वे अपने मन और चेतना को अन्य सभी भौतिक आसक्तियों से समेटकर पूर्णतः भगवान श्री कृष्ण के चरणों में एकाग्र करते हैं।
- भगवान का स्वरूप और अवतार का उद्देश्य: भगवान अपने सुख और जीवों का कल्याण करने के लिए आते हैं। वे श्याम वर्ण के हैं, पीतांबरधारी हैं और अत्यंत सुंदर हैं। भगवान कुरुक्षेत्र में पांडवों के पक्ष में अर्जुन के सारथी बने थे।
- रणभूमि में भगवान का अद्भुत रूप: भीष्मदेव कुरुक्षेत्र की रणभूमि में कृष्ण के उस दिव्य रूप को याद करते हैं जहाँ युद्ध के दौरान घोड़ों को संभालने के कारण उनके सीने और मुख पर पसीना आ गया था, धूल से उनके केश अलंकृत हो गए थे, और भीष्म के तीरों से उनके शरीर पर आघात हुआ था।
- भक्त और भगवान का दिव्य संबंध: श्री विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर के अनुसार, भीष्मदेव के तीरों से प्रहार होने पर भी भगवान उस सेवा को अपने भक्त के अनुराग और प्रेम के रूप में स्वीकार करते हैं।
- भगवान का आकर्षण और दृष्टि: भगवान अपनी ‘अनिमिष’ (बिना पलक झपकाए) दृष्टि से अपने भक्तों की छोटी से छोटी सेवा को भी देखते हैं और स्वीकार करते हैं।
- भीष्मदेव की अंतिम चेतना एवं एकाग्रता: कुरुक्षेत्र युद्ध के समापन पर पितामह भीष्म बाणों की शय्या पर लेटे हैं। वे अपनी संपूर्ण चेतना और मति को अन्य सभी भौतिक आसक्तियों से समेटकर पूर्णतः भगवान श्री कृष्ण के चरणों में एकाग्र करते हैं।
- रणभूमि में भगवान का अद्भुत अनुरागी रूप: भीष्मदेव कुरुक्षेत्र की रणभूमि में कृष्ण के उस रूप का स्मरण करते हैं जिसमें अर्जुन के रथ को तेज़ी से हाँकने के कारण भगवान के मुख पर पसीना आ गया था, धूल से उनके घुंघराले बाल अलंकृत हो गए थे, और भीष्म के तीरों से उनके शरीर पर आघात हुआ था। श्री विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर के अनुसार, भीष्म के तीरों के प्रहार को भी भगवान ने अपने भक्त के अनन्य प्रेम व अनुराग के रूप में स्वीकार किया।
- भक्त की प्रतिज्ञा हेतु भगवान का अस्त्र उठाना: युद्ध के नवें दिन दुर्योधन के ताने सुनने पर भीष्म ने प्रतिज्ञा की थी कि वे पांडवों का संहार करेंगे या कृष्ण से अस्त्र उठवाएँगे। दसवें दिन जब भीष्म का पराक्रम प्रचंड हुआ, तब भगवान कृष्ण अपने भक्त की प्रतिज्ञा सत्य करने के लिए स्वयं की प्रतिज्ञा तोड़कर रथ का पहिया उठाकर भीष्म की ओर दौड़े।
- शक्तिहीनता का अभिनय एवं सर्वोच्च शिक्षा: भीष्मदेव अत्यंत ज्ञानी, पराक्रमी और परशुराम जी के योग्य शिष्य थे। वे चाहते तो अधर्म को रोक सकते थे, परंतु अपनी प्रतिज्ञा के कारण असहाय रहे। इससे यह शिक्षा मिलती है कि व्यक्ति कितना भी शक्तिशाली, दक्ष और गुणवान क्यों न हो, यदि वह अधर्म या भगवान के विरुद्ध खड़ा होता है, तो उसकी शक्ति व्यर्थ हो जाती है।
- युधिष्ठिर को उपदेश एवं भीष्म का भगवद्धाम गमन: भगवान कृष्ण के संकेत पर भीष्मदेव महाराज युधिष्ठिर को राजधर्म का उपदेश देते हैं और अंत में अपनी चेतना को भगवान के श्यामसुंदर रूप में लीन करके अपना शरीर त्यागते हैं।
मुख्य ट्रांसक्रिप्शन
तो आज मैं भीष्म स्तुति, श्रीमद्भागवतम् के पहले स्कंध के नवें अध्याय के 32 श्लोक से 41 श्लोक, 10 श्लोक में कुल का ही चर्चा करेंगे।
तो श्रीमद्भागवतम् के पहले स्कंध के नवें अध्याय के… जो भागवतम् का शुकदेव गोस्वामी और परीक्षित महाराज का जो संवाद है, वह द्वितीय स्कंध से शुरू होता है। आख़िरी 19वें अध्याय में पहले स्कंध के शुकदेव गोस्वामी प्रकट होते हैं और उन्हें कुछ सवाल पूछते हैं। अब द्वितीय स्कंध से शुरू होती है उन दोनों की वार्तालाप। इसके पहले शुकदेव गोस्वामी और देवर्षि नारद ऋषि, उनके बीच की वार्तालाप चलना है।
तो जो अगले 11 स्कंधों में आने वाला है, उसकी एक झलक भागवतम् के पहले स्कंध में है। वहाँ परीक्षित महाराज को शुकदेव गोस्वामी और देवर्षि नारद के वार्तालाप सुनना है। उस समय वे किस चेतना में हैं, वह बहुत सुंदर रूप से इन श्लोकों में दर्शाया जाता है।
तो यह प्रसंग है कि कुरुक्षेत्र का युद्ध समाप्त हो गया है। महाराज युधिष्ठिर का राज्याभिषेक भी हो गया है। और अभी पितामह भीष्म अपने एक शरीर का त्याग करने वाले हैं। वे एक बाणों के बिस्तर पे लेटे हुए हैं, कुरुक्षेत्र की रणभूमि के एक विभाग में। और उनके पास महाराज युधिष्ठिर को लेकर भगवान श्री कृष्ण पहुँचे हुए थे। और पितामह भीष्म से युधिष्ठिर विस्तृत रूप से उपदेश लेते हैं। और उपदेश का अंत हो रहा है—राजधर्म का उपदेश है, इसके बारे में चर्चा करेंगे थोड़ा। और उसके अंत में क्या करने वाले हैं वे? वह अभी बोल रहे हैं कि “मैंने अलग-अलग विषयों पे बात की है, अभी मैं केवल भगवान में मन लगाना चाहता हूँ, एकाग्र करना चाहता हूँ।”
बड़े लंबे श्लोक हैं, तो तुम्हें अलग-अलग अर्थ एकाग्र करेंगे:
“इति मतिरुपकल्पिता वितृष्णा भगवति सात्वतपुंगवे विभूम्नि…”
भगवद्ग्राम में आते हैं, भगवद्ग्राम में आते हैं… पर मैं उसको गाता हूँ, तो सुनो।
अभी यहाँ बताया गया कि स्वसुखम—भगवान अपने सुख के लिए आते हैं। कभी मुझे लोग कहते हैं कि “मैं भगवान हूँ”, ऐसे कई लोग कहते हैं “मैं भगवान हूँ”। तो ऐसा जो भाव होता है, यह शास्त्रों के विपरीत है। क्योंकि अगर हम पूछें कि “आप भगवान हैं तो फिर आपको बीमारी क्यों होती है? आप बूढ़े क्यों होते हैं?” भगवान तो सर्वश्रेष्ठ हैं, उनको बूढ़ा कभी नहीं होना होता है, उनकी इच्छा के प्रतिकूल कुछ नहीं होना होता है।
तो लोग कहते हैं कि “नहीं, यह मेरी लीला है, मैं बूढ़ा क्यों हो रहा हूँ, मेरे दाँत क्यों गिर रहे हैं।” यह एक अस्पताल के समान होता है। अस्पताल में डॉक्टर आते हैं, किसलिए? वे सबको ठीक करते हैं। भव-रोग जो है, भवरोग को रोकने के लिए।
कभी-कभी लोग पूछते हैं कि “अगर भगवान अच्छे हैं तो इस दुनिया में इतनी बुराई क्यों होती है? इतने भयंकर भूकंप क्यों होते हैं? यह जो बुराई है, वह क्यों होती है?”
तो एक बार एक व्यक्ति डॉक्टर के पास गया। वह डॉक्टर ने कहा कि यह जो जगत है, वह बोला—”क्या आप भगवान में विश्वास करते हो?”
“नहीं! मुझे विश्वास नहीं है! दुनिया में इतनी बीमारी है, इतनी दुर्दशा है, इतना दुख है, भगवान कैसे होंगे? अगर भगवान होते तो यह सब नहीं होता।”
डॉक्टर ने कहा—”इस शहर में कोई भी डॉक्टर नहीं है!”
“क्या? मैं खुद डॉक्टर हूँ! मैं तुम्हारा इलाज कर रहा हूँ, कोई डॉक्टर नहीं है ऐसा कैसे?”
“नहीं है! उस दवाखाने के बाहर एक रास्ते में भिखारी था और वह भिखारी खाँस रहा था। खाँस रहा था पर तभी… वह बीमार है, यही सबूत है कि इस शहर में कोई डॉक्टर नहीं है!”
“वह बीमार इसलिए है कि वह मेरे पास आ नहीं रहा है!”
लोग दुखी इसलिए हैं कि वे भगवान के पास जा नहीं रहे हैं। अगर भगवान के पास जाते हैं, भगवान का आश्रय ग्रहण करते हैं… पर वे इस जगत में भी हमारे दुखों से प्रहार में भी कृष्ण… कृष्ण का एक अर्थ होता है ‘आकर्षण’, जो सबको आकर्षित करे। दूसरा एक अर्थ है ‘कर्षण’—जो संसार का चक्र है, जन्म-मृत्यु का चक्र, उसको रोकना। जो यहाँ जन्म-मृत्यु के चक्र को रोकते हैं। कभी-कभी अपनी इच्छा से भगवान प्रकट होते हैं, लीला करने के लिए।
“प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया”
और जो जीव कृष्ण के पास जाते हैं, उनका भव-बंधन समाप्त हो जाता है। तो यहाँ चक्र को रोकते हैं।
आप एक विचित्र भगवान की पूजा करते हैं। कहते हैं कि “यह विचित्र क्या है, आप एक काले भगवान की पूजा करते हैं!” कौन हैं हमारे भगवान? काले कि नहीं हैं वे? काले नहीं हैं, वे श्यामवर्ण हैं। पाश्चात्य संस्कृति से अंतर समझना है। वे सोचते हैं कि भगवान बहुत ही शक्तिशाली, बहुत ही क्रोधी व्यक्ति हैं, वे बादलों में रहते हैं, जो पापी लोग हैं उन पे वे बिजली प्रहार करते हैं। और उनके मन में हमेशा लोग जलते रहते हैं।
तो ऐसी धारणा से अलग, हमारे भगवान एक नवयुवक हैं और वे माखन चोरी करते हैं! तो क्या हो गया, बहुत लोगों का भौतिक विश्वास हिल गया कि “ऐसे कैसे हो सकता है? ऐसे कैसे भगवान हो सकते हैं?” पर यहाँ पर क्या है, भगवान लीला करते थे तो स्वयं की महिमा को प्रकट करते थे। और वह बहुत सुंदर भाव है। वृंदावन में भगवान के लोग, भगवान की महिमा है। और भगवान का सौंदर्य, हमें तीनों लोकों में ऐसा सौंदर्य दुर्लभ मिला है।
साधारणतः भौतिक जगत में जो काला वर्ण होता है, वह उतना आकर्षक नहीं माना जाता है। पर भगवान श्याम हैं, पर वे श्यामसुंदर हैं! तो उनका काला वर्ण नहीं है, साँवला वर्ण है, श्याम वर्ण है। और उसके ऊपर जब उनकी पीतांबरी वस्त्र है, वह बहुत चमक रही है।
“वपुः अलकाकुलम्” — उनका जो वपु (शरीर) है, वह अत्यंत आकर्षित है। उनके जो कमल के समान नेत्र हैं… जैसे कमल जो होता है वह जल के समान होता है। तो उस प्रकार से भगवान जल के समान आते हैं, तो वे कभी जल की कीचड़ से प्रभावित नहीं होते हैं। मनुष्य कीचड़ के समान होते हैं और ऐसे भगवान कमल के समान हैं।
और भक्त का भगवान के साथ एक विशेष भाव से रस होता है, वह संबंध होता है। भीष्म पितामह का सबसे तीव्र, सबसे प्रगाढ़ जो स्मृति है, वह कुरुक्षेत्र के मैदान की है। जब वे युद्ध कर रहे थे पांडवों के खिलाफ, उस समय भगवान विजय-रथे अर्जुन के सखा के रूप में, उनके मित्र के रूप में थे। वह अर्जुन के मित्र मतलब सारथी बने थे, वे अर्जुन का रथ चला रहे थे। तो ऐसे भगवान की छवि भीष्म पितामह के मन में बस गई।
अगर आप जानते हैं, हवाई जहाज़ उड़ता है। तो अगर किसी को भी विमान से जाना है, यहाँ से मुंबई से अगर दिल्ली तक फ्लाइट लेते हैं, हवाई जहाज़ आता है। तो हवाई जहाज़ सीधा नहीं आता है। जब हवाई जहाज़ उड़ रहा है, तो 90% समय में होता है कि हवाई जहाज़ गलत दिशा में जा रहा होता है! क्यों? क्योंकि आसमान में बहुत तेज़ हवा होती है, बादल होते हैं, वातावरण की परिस्थितियाँ अलग-अलग होती हैं। तो वह सीधा एक दिशा में जा नहीं सकता है। हवाई जहाज़ जा रहा है तो 90% समय वह जिस दिशा में गंतव्य है उससे थोड़ा भटक जाता है, फिर ऑटो-पायलट उसको वापस सही दिशा में लाता है। तो 90% समय वह सही दिशा में नहीं जा रहा होता है, पर फिर भी सही जगह पहुँच जाता है।
तो वैसे ही हमारा मन है। मन को भगवान में लगाना आसान नहीं होता, मन भटक जाता है। पर जैसे ऑटो-पायलट वापस लाता है, वैसे ही भीष्म पितामह ध्यान कर रहे हैं कि “मैं भौतिक चीज़ों से अभी मेरी चेतना निकाल रहा हूँ और मेरी चेतना भगवान में लगा रहा हूँ।”
कुरुक्षेत्र की रणभूमि में कृष्ण के घुंघराले बाल… वह जो धूल उड़ रही थी, उससे बहुत अलंकृत हो गए थे, जैसे अलंकार के समान हैं। और उसके साथ-साथ कृष्ण के मुखारविंद पर क्या हो रहा है? अभी जब घोड़ों को नियंत्रित करना है तो कोई आसान काम नहीं है, और ख़ासकरके जब युद्ध निरंतर चल रहा हो। बड़ी चतुरता और तीक्ष्णता से दूसरा पक्ष प्रहार कर रहा है, तो कभी घोड़ों को इधर ले जाना, कभी घोड़ों को उधर ले जाना… सारथी को बड़ी मेहनत करनी पड़ती है।
तो उसके कारण भगवान के सीने पे और मुख पर पसीना आ गया है! पहली बात क्या है कि धूल-धूसरित बाल भी सुंदर नहीं होते, उस पर अगर वह पसीना आ गया है तो पसीना सुंदर नहीं होता। बहुत से लोग पसीने को रोकने के लिए डिओड्रेंट लगाते हैं, मलम लगाते हैं, पाउडर लगाते हैं। पर यहाँ कृष्ण के पसीने की बूँदें और धूल कण उन्हें और सुंदर दिखा रहे हैं!
और उसकी विशेष बात क्या है कि जब भीष्म ने तीर छोड़े थे, वे तीर तो अर्जुन की ओर छोड़े थे, पर जब रथ इधर-उधर जाता है तेज़ी से, तो जो निशाना है, कभी निशाने पर तीर नहीं लगता, किसी और को तीर लगता है। तो क्षत्रियों में युद्ध का ऐसा नियम होता है कि जो सारथी होते हैं, उन पर प्रहार नहीं करते हैं। पर कभी-कभी गलती से सारथी को भी तीर लग जाता है। तो भीष्म के तीर बड़े ही तीखे, बहुत तेज़ी से, बड़े प्रहार से जाते हैं और वे कृष्ण को जा लगे थे!
तो इसके पीछे का भाव समझाने के लिए… अगर खून आ रहा है, तो खून तो किसी को पसंद नहीं आ सकता, खून तो हम देखना नहीं चाहते। तो इसके लिए विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर एक बहुत ही रसिक उदाहरण देते हैं। वे कहते हैं कि जो कार्य हुआ है, वह कार्य का उद्देश्य बड़ा मधुर होता है। जब कोई नवविवाहित पुरुष और स्त्री होते हैं, और वे विवाह के बाद एक-दूसरे से प्रेम करते हैं, चुंबन करते हैं, तो कभी-कभी वह चुंबन करते समय दंत-क्षत (काटना) होता है, तो उससे थोड़ा खून निकलता है। पर वह जो है, प्रेम का आदान-प्रदान होता है।
तो भले ही खून निकल रहा हो, उससे हमें भगवान विष्णु/कृष्ण के शरीर से खून निकल रहा है, पर वह अत्यंत अनुरागी और प्रीतिपूर्ण लगता है! तो भगवान के साथ संबंध कभी बुरा नहीं होता। यहाँ पर दर्शा रहे हैं कि “भगवान की सेवा किसी भी रूप में हो, भगवान ने इस रूप में मेरी सेवा को स्वीकार किया है।”
तो आज मैं भीष्म स्तुति, श्रीमद्भागवतम् के पहले स्कंध के नवें अध्याय के 32 श्लोक से 41 श्लोक, 10 श्लोक में कुल का ही चर्चा करेंगे।
तो श्रीमद्भागवतम् के पहले स्कंध के नवें अध्याय के… जो भागवतम् का शुकदेव गोस्वामी और परीक्षित महाराज का जो संवाद है, वह द्वितीय स्कंध से शुरू होता है। आख़िरी 19वें अध्याय में पहले स्कंध के शुकदेव गोस्वामी प्रकट होते हैं और उन्हें कुछ सवाल पूछते हैं। अब द्वितीय स्कंध से शुरू होती है उन दोनों की वार्तालाप। इसके पहले शुकदेव गोस्वामी और देवर्षि नारद ऋषि, उनके बीच की वार्तालाप चलना है।
तो जो अगले 11 स्कंधों में आने वाला है, उसकी एक झलक भागवतम् के पहले स्कंध में है। वहाँ परीक्षित महाराज को शुकदेव गोस्वामी और देवर्षि नारद के वार्तालाप सुनना है। उस समय वे किस चेतना में हैं, वह बहुत सुंदर रूप से इन श्लोकों में दर्शाया जाता है।
तो यह प्रसंग है कि कुरुक्षेत्र का युद्ध समाप्त हो गया है। महाराज युधिष्ठिर का राज्याभिषेक भी हो गया है। और अभी पितामह भीष्म अपने एक शरीर का त्याग करने वाले हैं। वे एक बाणों के बिस्तर पे लेटे हुए हैं, कुरुक्षेत्र की रणभूमि के एक विभाग में। और उनके पास महाराज युधिष्ठिर को लेकर भगवान श्री कृष्ण पहुँचे हुए थे। और पितामह भीष्म से युधिष्ठिर विस्तृत रूप से उपदेश लेते हैं। और उपदेश का अंत हो रहा है—राजधर्म का उपदेश है, इसके बारे में चर्चा करेंगे थोड़ा। और उसके अंत में क्या करने वाले हैं वे? वह अभी बोल रहे हैं कि “मैंने अलग-अलग विषयों पे बात की है, अभी मैं केवल भगवान में मन लगाना चाहता हूँ, एकाग्र करना चाहता हूँ।”
बड़े लंबे श्लोक हैं, तो तुम्हें अलग-अलग अर्थ एकाग्र करेंगे:
“इति मतिरुपकल्पिता वितृष्णा भगवति सात्वतपुंगवे विभूम्नि…”
भगवद्ग्राम में आते हैं, भगवद्ग्राम में आते हैं… पर मैं उसको गाता हूँ, तो सुनो।
अभी यहाँ बताया गया कि स्वसुखम—भगवान अपने सुख के लिए आते हैं। कभी मुझे लोग कहते हैं कि “मैं भगवान हूँ”, ऐसे कई लोग कहते हैं “मैं भगवान हूँ”। तो ऐसा जो भाव होता है, यह शास्त्रों के विपरीत है। क्योंकि अगर हम पूछें कि “आप भगवान हैं तो फिर आपको बीमारी क्यों होती है? आप बूढ़े क्यों होते हैं?” भगवान तो सर्वश्रेष्ठ हैं, उनको बूढ़ा कभी नहीं होना होता है, उनकी इच्छा के प्रतिकूल कुछ नहीं होना होता है।
तो लोग कहते हैं कि “नहीं, यह मेरी लीला है, मैं बूढ़ा क्यों हो रहा हूँ, मेरे दाँत क्यों गिर रहे हैं।” यह एक अस्पताल के समान होता है। अस्पताल में डॉक्टर आते हैं, किसलिए? वे सबको ठीक करते हैं। भव-रोग जो है, भवरोग को रोकने के लिए।
कभी-कभी लोग पूछते हैं कि “अगर भगवान अच्छे हैं तो इस दुनिया में इतनी बुराई क्यों होती है? इतने भयंकर भूकंप क्यों होते हैं? यह जो बुराई है, वह क्यों होती है?”
तो एक बार एक व्यक्ति डॉक्टर के पास गया। वह डॉक्टर ने कहा कि यह जो जगत है, वह बोला—”क्या आप भगवान में विश्वास करते हो?”
“नहीं! मुझे विश्वास नहीं है! दुनिया में इतनी बीमारी है, इतनी दुर्दशा है, इतना दुख है, भगवान कैसे होंगे? अगर भगवान होते तो यह सब नहीं होता।”
डॉक्टर ने कहा—”इस शहर में कोई भी डॉक्टर नहीं है!”
“क्या? मैं खुद डॉक्टर हूँ! मैं तुम्हारा इलाज कर रहा हूँ, कोई डॉक्टर नहीं है ऐसा कैसे?”
“नहीं है! उस दवाखाने के बाहर एक रास्ते में भिखारी था और वह भिखारी खाँस रहा था। खाँस रहा था पर तभी… वह बीमार है, यही सबूत है कि इस शहर में कोई डॉक्टर नहीं है!”
“वह बीमार इसलिए है कि वह मेरे पास आ नहीं रहा है!”
लोग दुखी इसलिए हैं कि वे भगवान के पास जा नहीं रहे हैं। अगर भगवान के पास जाते हैं, भगवान का आश्रय ग्रहण करते हैं… पर वे इस जगत में भी हमारे दुखों से प्रहार में भी कृष्ण… कृष्ण का एक अर्थ होता है ‘आकर्षण’, जो सबको आकर्षित करे। दूसरा एक अर्थ है ‘कर्षण’—जो संसार का चक्र है, जन्म-मृत्यु का चक्र, उसको रोकना। जो यहाँ जन्म-मृत्यु के चक्र को रोकते हैं। कभी-कभी अपनी इच्छा से भगवान प्रकट होते हैं, लीला करने के लिए।
“प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया”
और जो जीव कृष्ण के पास जाते हैं, उनका भव-बंधन समाप्त हो जाता है। तो यहाँ चक्र को रोकते हैं।
आप एक विचित्र भगवान की पूजा करते हैं। कहते हैं कि “यह विचित्र क्या है, आप एक काले भगवान की पूजा करते हैं!” कौन हैं हमारे भगवान? काले कि नहीं हैं वे? काले नहीं हैं, वे श्यामवर्ण हैं। पाश्चात्य संस्कृति से अंतर समझना है। वे सोचते हैं कि भगवान बहुत ही शक्तिशाली, बहुत ही क्रोधी व्यक्ति हैं, वे बादलों में रहते हैं, जो पापी लोग हैं उन पे वे बिजली प्रहार करते हैं। और उनके मन में हमेशा लोग जलते रहते हैं।
तो ऐसी धारणा से अलग, हमारे भगवान एक नवयुवक हैं और वे माखन चोरी करते हैं! तो क्या हो गया, बहुत लोगों का भौतिक विश्वास हिल गया कि “ऐसे कैसे हो सकता है? ऐसे कैसे भगवान हो सकते हैं?” पर यहाँ पर क्या है, भगवान लीला करते थे तो स्वयं की महिमा को प्रकट करते थे। और वह बहुत सुंदर भाव है। वृंदावन में भगवान के लोग, भगवान की महिमा है। और भगवान का सौंदर्य, हमें तीनों लोकों में ऐसा सौंदर्य दुर्लभ मिला है।
साधारणतः भौतिक जगत में जो काला वर्ण होता है, वह उतना आकर्षक नहीं माना जाता है। पर भगवान श्याम हैं, पर वे श्यामसुंदर हैं! तो उनका काला वर्ण नहीं है, साँवला वर्ण है, श्याम वर्ण है। और उसके ऊपर जब उनकी पीतांबरी वस्त्र है, वह बहुत चमक रही है।
“वपुः अलकाकुलम्” — उनका जो वपु (शरीर) है, वह अत्यंत आकर्षित है। उनके जो कमल के समान नेत्र हैं… जैसे कमल जो होता है वह जल के समान होता है। तो उस प्रकार से भगवान जल के समान आते हैं, तो वे कभी जल की कीचड़ से प्रभावित नहीं होते हैं। मनुष्य कीचड़ के समान होते हैं और ऐसे भगवान कमल के समान हैं।
और भक्त का भगवान के साथ एक विशेष भाव से रस होता है, वह संबंध होता है। भीष्म पितामह का सबसे तीव्र, सबसे प्रगाढ़ जो स्मृति है, वह कुरुक्षेत्र के मैदान की है। जब वे युद्ध कर रहे थे पांडवों के खिलाफ, उस समय भगवान विजय-रथे अर्जुन के सखा के रूप में, उनके मित्र के रूप में थे। वह अर्जुन के मित्र मतलब सारथी बने थे, वे अर्जुन का रथ चला रहे थे। तो ऐसे भगवान की छवि भीष्म पितामह के मन में बस गई।
अगर आप जानते हैं, हवाई जहाज़ उड़ता है। तो अगर किसी को भी विमान से जाना है, यहाँ से मुंबई से अगर दिल्ली तक फ्लाइट लेते हैं, हवाई जहाज़ आता है। तो हवाई जहाज़ सीधा नहीं आता है। जब हवाई जहाज़ उड़ रहा है, तो 90% समय में होता है कि हवाई जहाज़ गलत दिशा में जा रहा होता है! क्यों? क्योंकि आसमान में बहुत तेज़ हवा होती है, बादल होते हैं, वातावरण की परिस्थितियाँ अलग-अलग होती हैं। तो वह सीधा एक दिशा में जा नहीं सकता है। हवाई जहाज़ जा रहा है तो 90% समय वह जिस दिशा में गंतव्य है उससे थोड़ा भटक जाता है, फिर ऑटो-पायलट उसको वापस सही दिशा में लाता है। तो 90% समय वह सही दिशा में नहीं जा रहा होता है, पर फिर भी सही जगह पहुँच जाता है।
तो वैसे ही हमारा मन है। मन को भगवान में लगाना आसान नहीं होता, मन भटक जाता है। पर जैसे ऑटो-पायलट वापस लाता है, वैसे ही भीष्म पितामह ध्यान कर रहे हैं कि “मैं भौतिक चीज़ों से अभी मेरी चेतना निकाल रहा हूँ और मेरी चेतना भगवान में लगा रहा हूँ।”
कुरुक्षेत्र की रणभूमि में कृष्ण के घुंघराले बाल… वह जो धूल उड़ रही थी, उससे बहुत अलंकृत हो गए थे, जैसे अलंकार के समान हैं। और उसके साथ-साथ कृष्ण के मुखारविंद पर क्या हो रहा है? अभी जब घोड़ों को नियंत्रित करना है तो कोई आसान काम नहीं है, और ख़ासकरके जब युद्ध निरंतर चल रहा हो। बड़ी चतुरता और तीक्ष्णता से दूसरा पक्ष प्रहार कर रहा है, तो कभी घोड़ों को इधर ले जाना, कभी घोड़ों को उधर ले जाना… सारथी को बड़ी मेहनत करनी पड़ती है।
तो उसके कारण भगवान के सीने पे और मुख पर पसीना आ गया है! पहली बात क्या है कि धूल-धूसरित बाल भी सुंदर नहीं होते, उस पर अगर वह पसीना आ गया है तो पसीना सुंदर नहीं होता। बहुत से लोग पसीने को रोकने के लिए डिओड्रेंट लगाते हैं, मलम लगाते हैं, पाउडर लगाते हैं। पर यहाँ कृष्ण के पसीने की बूँदें और धूल कण उन्हें और सुंदर दिखा रहे हैं!
और उसकी विशेष बात क्या है कि जब भीष्म ने तीर छोड़े थे, वे तीर तो अर्जुन की ओर छोड़े थे, पर जब रथ इधर-उधर जाता है तेज़ी से, तो जो निशाना है, कभी निशाने पर तीर नहीं लगता, किसी और को तीर लगता है। तो क्षत्रियों में युद्ध का ऐसा नियम होता है कि जो सारथी होते हैं, उन पर प्रहार नहीं करते हैं। पर कभी-कभी गलती से सारथी को भी तीर लग जाता है। तो भीष्म के तीर बड़े ही तीखे, बहुत तेज़ी से, बड़े प्रहार से जाते हैं और वे कृष्ण को जा लगे थे!
तो इसके पीछे का भाव समझाने के लिए… अगर खून आ रहा है, तो खून तो किसी को पसंद नहीं आ सकता, खून तो हम देखना नहीं चाहते। तो इसके लिए विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर एक बहुत ही रसिक उदाहरण देते हैं। वे कहते हैं कि जो कार्य हुआ है, वह कार्य का उद्देश्य बड़ा मधुर होता है। जब कोई नवविवाहित पुरुष और स्त्री होते हैं, और वे विवाह के बाद एक-दूसरे से प्रेम करते हैं, चुंबन करते हैं, तो कभी-कभी वह चुंबन करते समय दंत-क्षत (काटना) होता है, तो उससे थोड़ा खून निकलता है। पर वह जो है, प्रेम का आदान-प्रदान होता है।
तो भले ही खून निकल रहा हो, उससे हमें भगवान विष्णु/कृष्ण के शरीर से खून निकल रहा है, पर वह अत्यंत अनुरागी और प्रीतिपूर्ण लगता है! तो भगवान के साथ संबंध कभी बुरा नहीं होता। यहाँ पर दर्शा रहे हैं कि “भगवान की सेवा किसी भी रूप में हो, भगवान ने इस रूप में मेरी सेवा को स्वीकार किया है।”
“विशिखहतोविशीर्णदंशः क्षतजपरिप्लुत आत्ततायिनो मे। सपदि तदभिसारसार रूपो भगवति तस्य मनोऽस्तु मेऽरविन्दे॥”
तो भगवान कुरुक्षेत्र में जो अद्भुत लीला है, उसका स्मरण करने लगे। तो सब जगह भगवान यहाँ जो लीला है, यहाँ पांडव आदि सब हस्तियाँ हैं। जो लीला है, तो इतनी विशाल मात्रा में लोगों की मृत्यु हो गई है।
“हतनृपपतयः परां गताः…”
तो क्या होगा, दोनों सेनाएँ जो भी उनके सामने आ गई थीं… और भी क्या होगा? “स्वेन रूपेण…” तो भगवान इस तरह से परिस्थिति ला देते हैं उस भक्त के जीवन में कि उसको चुनाव करना होता है। जब अर्जुन की इच्छा थी कि “मैं देखना चाहता हूँ दोनों सेनाओं को”, तो बराबर दोनों सेनाएँ सामने रहती हैं। क्यों? क्योंकि अर्जुन को चुनाव करना है कि वह अपने स्वजनों के लिए युद्ध रोकेगा या भगवान की सेवा के लिए युद्ध करेगा। तो भगवान चुनाव के लिए बराबर सामने रहते हैं।
तो फिर क्या हो गया? दोनों का बल वे देख रहे थे। और यहाँ पर भीष्म पितामह कह रहे हैं कि जब भगवान ने केवल अपनी दृष्टि से देखा, तो क्या हो गया? “हृतहृतवती” — मतलब क्या हो गया कि जो दूसरे पक्ष के योद्धा थे, उनका आयु (जीवन) भगवान ने केवल अपनी दृष्टि से हर लिया!
हम साधारणतया समझते हैं कि भगवान ने अस्त्र नहीं उठाया, पर भीष्म पितामह क्यों बता रहे हैं कि जब भगवान ने देखा कुरुक्षेत्र की रणभूमि में… भगवान ने अपनी दृष्टि से ही सब योद्धाओं की आयु छीन ली! तो अर्जुन के तीरों से तो केवल उनके शरीर गिरे, पर आयु तो भगवान ने पहले ही छीन ली थी।
तो भीष्म पितामह बता रहे हैं कि “भगवान ने तो दृष्टि से ही सबका आयु छीन लिया, उसमें भीष्म का भी आयु छीन लिया! तो ऐसे भगवान का मैं चिंतन करता हूँ। भगवान मेरी मति को हर लें, भगवान मेरा परम कल्याण करें।”
नौवें दिन की रात को क्या होता है? नवें दिन युद्ध में युधिष्ठिर महाराज भीष्म पितामह के पास जाते हैं और पूछते हैं कि “हम आपका वध कैसे कर सकते हैं? मैं विश्वास नहीं कर सकता कि पांडव आपको हरा सकते हैं, पर आपकी शक्तियाँ ऐसी हैं कि देव और असुर दोनों साथ में आ जाएँ तो भी आपको नहीं हरा सकते।”
तब दुर्योधन ने भी भीष्म पितामह को ताना मारा था कि “आप पांडवों से प्रेम करते हैं, इसलिए आप पूरी शक्ति से युद्ध नहीं कर रहे हैं। अगर मुझे पता होता तो मैं कर्ण को सेनापति बनाता!”
अब भीष्म पितामह के लिए यह बड़ा अपमान था! मान लीजिए भारत और पाकिस्तान का मैच चल रहा है और भारत हारने लगता है, और कोई कप्तान को बोले कि “अगर हमको पता होता कि आप अच्छी तरह मैच खेलने वाले नहीं हो तो हम दूसरे को कप्तान बनाते!” एक तो हारने का दुख, और ऊपर से उनकी प्रामाणिकता पर संदेह!
तो भीष्म पितामह ने कहा—”दुर्योधन! मैंने तुम्हें कितनी बार बोला है कि जो कृष्ण हैं, वे नारायण हैं और कोई उनका वध नहीं कर सकता। पर तुम्हारी संतुष्टि के लिए, कल मैं पाँचों पांडवों का वध करूँगा या कृष्ण को अस्त्र उठाने पर मजबूर करूँगा!”
अब यह बात जब दुर्योधन के तंबू से बाहर आई, तो कृष्ण और अर्जुन साथ में थे। कृष्ण ने अर्जुन से कहा—”हे अर्जुन! दुर्योधन के तंबू में भीष्म ने यह प्रतिज्ञा ली है।” दुर्योधन का चेहरा लाल हो गया था, शर्मा गया था।
उस दसवें दिन ऐसी भीषण भिड़ंत हुई! भीष्म पितामह की गोली (तीरों) का सामना कोई नहीं कर सकता था। अर्जुन भी सामना कर रहे थे, पर अर्जुन स्नेह के कारण पूरी शक्ति से युद्ध नहीं कर रहे थे, और भीष्म पितामह पूरी शक्ति से युद्ध कर रहे थे! भीष्म पितामह पांडवों से नफ़रत नहीं कर रहे थे, वे भगवान की लीला देखना चाहते थे, इसलिए पूरी शक्ति से युद्ध कर रहे थे।
तभी भगवान कृष्ण ने क्या किया? उन्होंने अपनी प्रतिज्ञा (अस्त्र न उठाने की) तोड़ दी! वे रथ से नीचे कूद पड़े। रथ का एक पहिया (चक्र) उन्होंने उठा लिया। अब यहाँ पर रथ का पहिया उन्होंने उठाया, क्योंकि भगवान कृष्ण का अस्त्र क्या है? सुदर्शन चक्र!
तो अगर उनको चक्र चाहिए था, तो अपने सुदर्शन चक्र को बुला सकते थे। पर यहाँ भगवान अपने भक्त (अर्जुन) के संरक्षण में इतने चिंतित थे कि वे उस सुदर्शन चक्र को बुलाना भूल गए! उनको बस जो सामने दिखा—रथ का पहिया—वही चक्र की तरह उठाकर दौड़ने लग गए! जैसे एक शेर हाथी को मारने के लिए तेज़ी से दौड़ता है, वैसे ही भीष्म पितामह को मारने के लिए भगवान दौड़े!
तो भगवान को आते देखकर भीष्म पितामह अत्यंत प्रसन्न हो गए! वे निढाल हो गए और बोले—”आइए भगवान, आइए! मेरा वध कीजिए!” अर्जुन पीछे से दौड़कर आए और भगवान के चरणों को पकड़ लिया—”प्रभु! आप रुकिए, आप अपनी प्रतिज्ञा मत तोड़िए!”
तो भीष्म पितामह इसी रूप का स्मरण करते हुए अपना शरीर त्याग रहे हैं।
और फिर उसके बाद के श्लोकों में बताते हैं कि यही भगवान एक हैं, पर अनेक रूपों में आते हैं। और जो भी भगवान के सुंदर रूप हैं, वे मेरे सामने आ रहे हैं।
यह कब हो रहा है? जब युधिष्ठिर महाराज का राज्याभिषेक हो गया है, उसके बाद युधिष्ठिर महाराज कृष्ण के साथ भीष्म पितामह के पास जाते हैं।
वहाँ भीष्म पितामह लेटे हैं—वह व्यक्ति जिसको गांधारी ने स्वयं जेठा बेटा माना था, वह व्यक्ति जिसने धनुर्विद्या परशुराम जी से सीखी थी और परशुराम जी को भी युद्ध में परास्त कर दिया था! वही भीष्म, जब काशी नरेश की राजकुमारी का स्वयंवर था, अकेले सारे राजाओं को हरा दिया था। वही भीष्म आज बाणों की शय्या पर लेटे हुए हैं!
और जब कृष्ण पांडवों को लेकर वहाँ पहुँचे, तो कृष्ण ने कहा—”युधिष्ठिर! जाओ, भीष्म पितामह से उपदेश लो।”
तो युधिष्ठिर महाराज ने कहा—”प्रभु! आप तीनों लोकों के स्वामी हैं, आप स्वयं उपदेश क्यों नहीं देते?”
तो कृष्ण ने कहा—”भीष्म पितामह ज्ञान के सागर हैं। और भीष्म पितामह ने जीवन भर हस्तिनापुर के सिंहासन की रक्षा की प्रतिज्ञा निभाई। उन्होंने प्रतिज्ञा की थी कि न केवल मैं राजा नहीं बनूँगा, बल्कि हस्तिनापुर के राजा का सेवक बनकर रहूँगा। पर जब दुर्योधन जैसा अधार्मिक व्यक्ति राजा बना, तो भीष्म असहाय हो गए।”
यहाँ दुनिया को शिक्षा देने के लिए भीष्म पितामह शक्ति होते हुए भी शक्तिहीन से बने रहे। वे दिखाना चाहते थे कि व्यक्ति कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, कितना भी दक्ष क्यों न हो, कितना भी गुणवान क्यों न हो—यदि वह अधर्म या भगवान के विरुद्ध जाता है, तो उसकी शक्ति, दक्षता और गुण सब व्यर्थ हो जाते हैं!
इसलिए भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर महाराज को ज्ञान दिया। और कृष्ण ने भीष्म को वरदान दिया कि “जब तक तुम उपदेश दोगे, तुम्हें इन बाणों की पीड़ा का अहसास नहीं होगा, तुम्हारी बुद्धि तरुण अवस्था के समान निर्मल रहेगी।”
और इस प्रकार भीष्म पितामह ने अपने प्राण भगवान श्री कृष्ण के चरणों में समर्पित कर दिए।
श्री जगन्नाथ भगवान की जय!
श्री भीष्म पितामह की जय!
श्रील प्रभुपाद की जय!
गौर भक्तवृंद की जय!
निताई गौर प्रेमानंदे हरि हरि बोल!