BTG distribution marathon inauguration talk – SHARE acronym – Hindi
[Saturday feast class at ISKCON, Nigdi, India]
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Lecture Summary
- भगवान का अनुभव और मंदिर का वातावरण: शिवभागवंदीर (श्री श्री राधा वृंदावनचंद्र) का प्राकृतिक और आध्यात्मिक वातावरण जीव मात्र को भौतिक संसार से परे एक उच्च चेतना और आध्यात्मिक जीवन की ओर आकर्षित करता है।
- दिव्य धन (भगवद्गीता ज्ञान): भगवद्गीता के अंतिम अध्याय (18.72) में भगवान कृष्ण अर्जुन को ‘धनंजय’ कहकर संबोधित करते हैं। भगवद्गीता का ज्ञान ही वास्तविक दिव्य धन है, जो व्यक्ति को अज्ञान, मोह और जीवन के भ्रम (दिशाहीनता) से मुक्त करता है।
- भौतिक बनाम आध्यात्मिक ज्ञान: भौतिक ज्ञान सिखाता है कि जीवन में क्या करना है, जबकि आध्यात्मिक ज्ञान सिखाता है कि जीवन का उपयोग किस उद्देश्य के लिए करना है।
- अक्रोनिक सूत्र — S.H.A.R.E. (साधना और नम्रता):
- S (साधना – Sadhana): साधना केवल स्वयं को भगवान से जोड़ने की प्रक्रिया ही नहीं, बल्कि दूसरों को भी भगवान से जोड़ने और ज्ञान बांटने (ग्रंथ वितरण/भगवद्दर्शन मासिक पत्रिका) की निस्वार्थ सेवा है।
- H (नम्रता – Humility): नम्रता से हृदय खाली नहीं, बल्कि भगवान और उनकी सेवा को स्वीकार करने के लिए ‘खुला’ (Open Heart) होता है। सच्चा अहंकार-रहित भाव (Humility) दूसरों के कल्याण और भगवान के प्रचार में आने वाली बाधाओं को सहने की शक्ति देता है।
Full Transcription
हरे कृष्णा! आज आप सबके बीच में, शिवभागवंदीर के चरण कमलों में भगवान के बारे में कुछ कथा करने का मौका मिल रहा है, इसके बारे में बहुत कृतज्ञ हूँ। और यह इतना अप्रतिम सुंदर मंदिर है, नैसर्गिक और आध्यात्मिक का एक बहुत सुंदर संगम है। यह जो भगवान का अनुभव है, मंदिर में हम कर सकते हैं और खास करके ऐसे वातावरण में, हमें लगता है कि हमारे आजकल के जीवन में जो कुछ हम जी रहे हैं, उसके परे भी कुछ है, उससे ऊँचा कुछ है और वह हमें महसूस करना है, वह हमें प्राप्त करना है। ऐसी इच्छा, ऐसी उत्कंठा जाग्रत हो सकती है, जब हम भक्तों के संग में ऐसे जीवन में वातावरण में आते हैं।
तो आज मैं भगवद्गीता के भगवान ने जो आखिरी श्लोक बोला है, उसके आखिरी शब्द के आधार पर आज की चर्चा करूँगा। तो भगवान ने अठारहवें अध्याय के बहत्तरवें श्लोक में… वह अपनी भाषा बंद करते हैं। यह बोलते हैं:
कच्चिदेतच्छ्रुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा ।
कच्चिदज्ञानसम्मोहः प्रनष्टस्ते धनञ्जय ॥
तो आखिरी शब्द जो भगवान इस्तेमाल करते हैं, वह क्या है? धनञ्जय। धनञ्जय का अर्थ किसी को पता है? धन को प्राप्त करने वाला। जो अर्जुन हैं, वह उनको धनंजय इस नाम से संबोधित किया है, इसका एक बहुत महत्वपूर्ण कारण है यहाँ भी। कि भगवद्गीता जो है, यह वास्तव में एक दिव्य धन है। और भगवान पूछ रहे हैं—अर्जुन, क्या आपने ध्यानपूर्वक सुना मेरा संदेश? क्या आपका अज्ञान और मोह नष्ट हो गया है? क्या तुम्हारा… क्या तुम्हें ध्यान रूपी जो धन है, वह मिल गया है?
वास्तविक धन क्या है?
तो धन अलग-अलग प्रकार से होता है। अभी साधारणतया हम धन क्या है, पैसे को धन बोलते हैं। सही है वह, इतना सही, पर अगर कोई बीमार व्यक्ति है और उसके लिए दुनिया में सिर्फ एक ही दवाई है उस बीमारी के लिए, तो फिर उसके लिए क्या होगा, सबसे मूल्यवान चीज़ जो है, वह क्या है, वह दवाई बन जाएगी। तो उसके लिए जो असली धन है, वह दवाई ही है।
तो उस तरह से, अगर मान लीजिए, कोई रास्ते पर जा रहा है… मैं अमेरिका में एक भक्त मुझे लेकर जा रहे थे, एक जगह पर, दूसरी जगह पर। और भारत में कैसे होते हैं, जब ड्राइविंग करते हैं… तो अभी हम कुछ पाश्चात्य देश से—अमेरिका, स्विट्ज़रलैंड आदि देशों से, रूस से, 20-25 योगियों को वृंदावन की यात्रा लेकर गए थे। तो इसके पहले अमेरिका के इस्कॉन मंदिर में भी नहीं आए, पहली बार डायरेक्टली इंडिया में आ गए, और फिर वह वृंदावन में आए थे। तो वह कहते हैं कि भारत में जैसे लोग ड्राइविंग करते हैं, वह देखें तो अमेरिका बहुत… पहले तो ऐसा लगा कि पूरा केओस (Chaos) है, पूरी गड़बड़ है, पर सब लोग इतना शांति से इस गड़बड़ में चल रहे हैं। वह देखकर बोले कि इसमें भी कुछ ऑर्डर है, कि गड़बड़ में कुछ योजना है, कैसी योजना है हमको समझना है।
तो क्या है, अमेरिका में अगर आप ड्राइव कर रहे हैं, कभी-कभी ऐसे लंबे रास्ते होते हैं, और कई समय तो कोई दिखता ही नहीं उस रास्ते पर, खास करके आप मेनलैंड में जाओगे तो। और वहाँ पर सब लोग GPS यूज करते हैं, किसी का नक्शा नहीं होता है, GPS सब यूज करते हैं। और गूगल मैप बताता है—यहाँ जाओ, वहाँ जाओ। और एक भक्त मुझे ड्राइव करके लेकर जा रहे थे, और वह ऐसे अंदर एक बहुत ही ऐसे बैरेन एरिया (Barren Area) था, जहाँ पर कुछ भी नहीं था, और वहाँ पर उनका GPS काम करना बंद हो गया। और वहाँ पर इंटरसेक्शन आ गया—यहाँ जाना है, यहाँ जाना है, वहाँ जाना है, और वहाँ पर कुछ भी नहीं था, तो अभी क्या करें? वह भक्त मुझे ड्राइव कर रहे थे, तो क्या होता है, कभी-कभी भक्तों के सेवा करने का उत्साह होता है, पर सेवा करने की क्षमता नहीं होती है। तो भक्त मुझे ड्राइव कर रहे थे, पर वह भी इस इलाके में पहली बार आए थे। तो फिर अभी उस समय हम रुके थे—कोई आएगा, कोई आएगा, किसी को पूछेंगे हम। और क्या होता है, वहाँ पर कई बार सूनसान रास्ता होता है, तो लोग रुकने को भी थोड़ा डरते हैं।
तभी हमको समझ में आया कि वास्तव में, कि अगर हम रास्ते पर घूम गए (भटक गए), तो सबसे मूल्यवान चीज़ क्या है? दिशा है, एक नक्शा है!
जीवन का मार्गदर्शन: भगवद्गीता
तो उस तरह से अर्जुन… अर्जुन भगवद्गीता के शुरुआत में, वह घूम गए हैं (भ्रमित हो गए हैं)। और हम भूमि पर ही हैं, पर उनका मन घूम गया है—क्या करना है, क्या नहीं करना है, यह करना है, यह करना है। तो हम एक गाड़ी में सैर कर रहे हैं, तभी घूम गए हैं, तो एक शारीरिक घूम जाना है, पर जीवन के प्रवाह में, जीवन की सैर में अगर हम मानसिक रूप से घूम जाते हैं, क्या करना है पता नहीं होता है, तो फिर बहुत समस्या हो जाती है। और ऐसे ही बहुत से लोग आज की दुनिया में भी गुमराह हो गए हैं, उनको पता नहीं है क्या करना है, क्यों करना है।
और जैसे अर्जुन को उस समय भगवान ने भगवद्गीता का ज्ञान दिया, और बताया कि क्या है, कि आपको किस मार्ग में चलना है। तो यह धन है, उस धन के बिना जीवन का दिशा… जीवन में क्या करना है, जीवन का उद्देश्य क्या है, यह समझना… यह जो ज्ञान है, वह हमें भगवद्गीता देती है।
दो चीज़ें हैं—एक है भौतिक ज्ञान, दूसरा है आध्यात्मिक ज्ञान।
Material knowledge tells us what to do in life. Spiritual knowledge tells us what to do with life.
जिंदगी में क्या करना है, हम पूरे गुमराह हो जाते हैं। गहराई यह है कि जो काम बिगड़ गया है, लोग आत्महत्या कर लेते हैं, लोग बुरी आदतों में फँस जाते हैं। उसके अपने-अपने कारण हो सकते हैं, पर एक मूलभूत कारण है कि जीवन में कुछ प्रेरणादायक दिशा नहीं है—मुझे क्या करना है मेरे जीवन में।
अर्जुन को भगवान ने भगवद्गीता में ज्ञान दिया है। ज्ञान वास्तव में एक बहुत बड़ा खजाना है। जब यह धन प्राप्त हो जाता है, तो हमें जीवन का क्या उद्देश्य है, वह पता चल जाता है। उसके बिना हम जो भी प्राप्त करें—यह प्राप्त करें, वह प्राप्त करें, वह प्राप्त करें—सब कुछ अच्छा है, अच्छा हो सकता है, पर उससे कुछ अंतिम सुख नहीं मिलेगा। अंतिम सुख तभी हमें मिलता है जब हमें जीवन का अंतिम उद्देश्य पता होता है, जो आध्यात्मिक ज्ञान है। यहाँ हमें बताता है कि हमें जीवन में अंत में क्या प्राप्त करना है।
और जो भगवद्गीता का जो ज्ञान है, वही श्रील प्रभुपाद जी ने उनके भगवद्गीता के तात्पर्यों में हमें दिया है। और वही ज्ञान और आसान पद्धति से प्रभुपाद जी ने जो ‘भगवद्दर्शन’ (Back to Godhead) यह जो मासिक पत्रिका चालू की है, उसमें दिया है।
अभी मैं यह प्रवचन है, इसमें पाँच पॉइंट्स लूँगा—S.H.A.R.E. एक्रोनिम (Acronym) लूँगा मैं ‘SHARE’ की—हमें क्यों और कैसे यह आध्यात्मिक ज्ञान है, वह दूसरों को देना है, दूसरों के साथ बाँटना है।
S — साधना (Sadhana)
तो अभी जो पहला ‘S’ है, वह है साधना। साधना का मतलब क्या है? वह है कार्य जिसके द्वारा हम भगवान से खुद का संबंध जोड़ते हैं। हम जप करते हैं, हम कीर्तन करते हैं, पूजा करते हैं, सत्संग करते हैं—इन सब के द्वारा हम भगवान के करीब जाते हैं।
अभी भगवान के करीब जाने के लिए, यह केवल एक भावना नहीं है, यह वास्तव में एक साधना है। साधना के द्वारा भावना आती है। लोग कहते हैं कि “भक्ति तो हमेशा मेरे हृदय में होती है, 24 घंटे भगवान का नाम चल रहा होता है।” अच्छी बात है, 24 घंटे भगवान का नाम चल रहा है, पर 24 घंटे अगर भगवान का नाम अंदर चल रहा है, तो एक मिनट बाहर क्यों नहीं आता है?
तो साधना मतलब क्या है? वह एक कार्य है जिसके लिए हमारे अंदर भावना है, वह बाहर आती है। और अगर अंदर भावना नहीं है, तो साधना के द्वारा वह भावना जाग्रत होती है। कुछ लोग कहते हैं कि “आपको इतना जप करने की क्या ज़रूरत है, एक बार भगवान का नाम ले लो आप शुद्ध हो जाओगे।” हाँ, वह सही है, एक बार भाव से नाम ले लेंगे तो शुद्ध हो जाएँगे। वह कैसे है? कोई ओलंपिक में धनुर्विद्या के कम्पटीशन के लिए हमको साधना करनी पड़ती है। कहते हैं कि एक नाम भाव से ले लो, वह सही है, पर समस्या यह है कि भाव का अभाव है! तो वास्तव में हमें भाव की जागृति करनी है।
तो अभी यहाँ पर ग्रंथ वितरण का साधना से क्या संबंध है? प्रभुपाद जी ने हमको बताया है कि साधना मतलब वही चीज़ नहीं है जिसके द्वारा हम भगवान से संबंध जोड़ते हैं, पर साधना वह भी है जिससे हम दूसरों को भगवान से जोड़ते हैं। तो ऐसे नहीं है कि हमको शुद्ध होने के बाद ही दूसरों को भगवान का संदेश देना है। भले हम अभी अशुद्ध क्यों न हों, हमें ज्ञान भी इतना न हो, जितना ज्ञान है उतना हम दूसरों को देने का प्रयास करते हैं। और खुद में कुछ ज्ञान है भी नहीं, तो भी हम ग्रंथ दे सकते हैं।
अब इसके द्वारा क्या होता है जब हम दूसरों को कुछ देते हैं, शेयर करते हैं? सबसे पहले जो ‘S’ है, अगर हम यह देखते हैं कि यह भी एक सेवा है। भगवान आध्यात्मिक जगत से यहाँ पर आते हैं इसलिए कि सबको उनके ओर आकर्षित करने के लिए, और हम अगर उनकी योजना में सहयोगी हो जाते हैं, तो फिर इसके द्वारा हमें भगवान की बहुत कृपा मिलती है।
न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः ।
भविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि ॥
भगवान कहते हैं कि जो मेरे संदेश का वितरण करता है, उससे अधिक प्रिय मुझे कोई नहीं है, सबसे अधिक प्रिय है मुझे।
तो भगवान का संदेश अलग-अलग पद्धतियों से दिया जा सकता है। एक है कि लोग प्रवचन में आकर कथा सुन सकते हैं। दूसरा है कि हम उनको भगवद्गीता ग्रंथ देते हैं और वह पढ़ते हैं। तो भगवद्गीता ग्रंथ में क्या है कि भगवद्गीता एक बहुत ही महत्वपूर्ण ग्रंथ है और बहुत से लोग उसको लेते हैं। इंग्लिश में हम कहते हैं ‘भगवद्गीता यथारूप’ (Bhagavad-gita As It Is)। बहुत से लोग ‘भगवद्गीता यथारूप’ लेते हैं और बहुत से लोग ‘भगवद्गीता यथारूप’ वैसे रख देते हैं, वह क्या करते हैं उसको पढ़ते नहीं हैं। इतना बड़ा ग्रंथ है—कैसे पढ़ूँगा, कैसे समझूँगा मैं?
इसलिए क्या है, प्रभुपाद जी ने जो ‘बैक टू गॉडहेड’ (भगवद्दर्शन) जो मैगज़ीन चालू किया है… मैं अमेरिका में एक इंटरफेथ कॉन्फ्रेंस (Interfaith Conference) में था, वाशिंगटन डी.सी. में। इंटरफेथ कॉन्फ्रेंस मतलब अलग-अलग धर्मों के लोग आते हैं और वह सब बातचीत करते हैं। तो वहाँ पर एक क्रिश्चियन संस्था से एक पादरी आए थे, उनके एक प्रचारक आए थे। तो वह बता रहे थे वहाँ पर कि “हम कई सालों से बाइबल का बहुत वितरण कर रहे हैं। बाइबल का ऐसा रिकॉर्ड है कि वह दुनिया में सबसे ज्यादा वितरित किताब है।” वह बता रहे थे कि “हम बाइबल बाँटते हैं, तो हमने कुछ सर्वे किया, तो कुछ लोग वह पढ़ते हैं, पर हम बाइबल के आधार पर जब मासिक पत्रिका (Magazine) बाँटते हैं, तो बहुत से लोग वह पढ़ते हैं।” और वह बता रहे थे कि Magazines are the most accessible form of spiritual knowledge for people.
इसलिए होता है कि मासिक होते हैं, वह आध्यात्मिक ज्ञान और आसान पद्धति से मिल जाता है। ग्रंथ जो है, पढ़ने को थोड़ा… यह बड़ा ग्रंथ है, कब मैं पढ़ूँगा? क्या होता है, हमको पढ़ना है, ज़रूरी पढ़ना है, पर क्या होता है—”आज नहीं”। और रोज होता है “आज नहीं”। पर मासिक में क्या होता है, तीन फर्क होता है मासिक और ग्रंथ में:
- छोटा आकार: सबसे पहला होता है कि मासिक छोटा होता है। अभी वही भगवद्गीता एक हजार पन्नों की है, आठ सौ पन्नों की किताब प्रभुपाद जी के तात्पर्यों के साथ। कोई भी मासिक एक हजार पन्नों का नहीं होता है। मासिक होता है 40 पन्ने, 70 पन्ने, 90 पन्ने जो भी है। तो क्या है, छोटा है, तो मैं पढ़ सकता हूँ उसको।
- छोटे-छोटे लेख (Small Simple Steps): दूसरी चीज़ उसमें यह होती है कि उसमें छोटे-छोटे लेख होते हैं। तो क्या होता है, व्यक्ति को लगता है किताब पूरा नहीं पढ़ूँगा तो उसको अधूरापन लगता है, पर अगर मैंने एक लेख भी पढ़ लिया, तो ‘चलो पूरा नहीं, मैंने कुछ तो किया, थोड़ा कुछ तो पढ़ लिया मैंने, कुछ तो समझ में आया’, ऐसा लगता है। तो क्या होता है कि एक सेल्फ-डेवलपमेंट (Self-development) में, खुद को अगर इम्प्रूव करना है, उसमें एक विधि बताई जाती है—Small Simple Steps (छोटे और साधारण कदम)। आप आगे लोगे, उतना आप करोगे और धीरे-धीरे आप आगे कर पाओगे। तो मासिक क्या होता है—छोटा होता है, उसमें लेख भी छोटे होते हैं, तो एक लेख तो पढ़ूँगा। और फिर उसमें बहुत अच्छा लगा मुझे लेख, तो एक और पढ़ लेता हूँ।
- नयापन: और तीसरा उसमें क्या होता है, एक नयापन होता है। हर एक महीने में, हर दो महीने में नया कुछ आ रहा है। तो क्या होता है कि हमारा मन जो होता है, हमेशा कुछ नई चीज़ चाहता है। अभी भगवद्गीता 5000 साल से है, “5000 साल से नहीं पढ़ी है, मैंने 5001 साल नहीं पढ़ी तो क्या फर्क पड़ता है”, ऐसा हमारा मन बोलता है। पर इस महीने का मासिक है—”पढ़ लेते हैं क्या है इस महीने, देखते हैं।”
तो जब हम आध्यात्मिक ज्ञान दूसरों को देते हैं, तो इस पद्धति से देते हैं कि वह आसानी से पढ़ सकें। जिसको हम साधना के रूप में देखते हैं। जैसे मैं जप करता हूँ, वैसे ही यह एक सेवा है कि दूसरों को यह ज्ञान दूँ, और ऐसी पद्धति में ज्ञान दूँ कि वह आसानी से ले सकें, आसानी से स्वीकार कर सकें। तो यह है साधना। (S.H.A.R.E. एक्रोनिम का ‘S’)।
H — नम्रता (Humility)
दूसरा क्या है इसमें अक्षर—‘H’। ‘H’ मतलब Humility। Humility मतलब नम्रता।
अभी आध्यात्मिक मार्ग में अगर प्रगति करनी है, तो हम सबको नम्रता जाग्रत करनी है। जितने हम नम्र हो जाएँगे, उतनी भगवान की कृपा हमको मिलेगी। क्या होता है, नम्र जो हृदय होता है, वह भगवान से प्राप्त करने के लिए पात्र होता है। जो गर्व से भरा हृदय होता है, वह कैसा है? जो व्यक्ति खुद से ही भरा हुआ है—”मैं इतना बड़ा हूँ, मैंने यह किया, मैंने वह किया, मैंने वह किया”—तो वह व्यक्ति खुद से ही इतना भरा हुआ है कि भगवान को अंदर आने की जगह ही नहीं है!
जैसे अगर एक ग्लास है, इसमें मुझे अगर पानी डालना है, पर इसमें अगर पहले से ही कुछ आधा भरा हुआ है, कोई जूस भरा हुआ है, कुछ भरा हुआ है, तो पानी डालूँगा तो पानी बाहर बहेगा। तो वैसे क्या होता है, जो व्यक्ति का हृदय गर्व से भरा होता है, तो उसके हृदय में भगवान आ ही नहीं सकते हैं।
पर जब हम नम्र होते हैं, तो ऐसे नहीं कि हृदय खाली होता है। नम्र होते हैं, तो हमारा हृदय खाली हृदय नहीं, खुला हृदय होता है! इसमें फर्क है—खाली हृदय मतलब हृदय में कुछ है ही नहीं, पर खुला हृदय मतलब वह भगवान के लिए खुला है।
So, humility creates an open heart, not an empty heart.
तो उसके द्वारा अभी नम्रता कैसे प्राप्त कर सकते हैं? अलग-अलग पद्धति है। साधारणतया हम नम्रता सोचते हैं कि अगर हम भगवान के सामने आकर प्रणाम करते हैं, वरिष्ठ भक्तों को प्रणाम करते हैं, वह एक प्रकार की नम्रता है, यह अच्छी है। पर नम्रता का वास्तव में अर्थ क्या है? नम्रता का यह अर्थ है कि:
Humility means to not let our ego come in the way of our service, of our purpose.
अगर हम भक्तों के बीच में ही आते हैं, समान मानसिकता के लोगों के बीच में आते हैं, और हम कुछ भक्ति करते हैं, तो वह हमारा सम्मान करते हैं, हम उनका सम्मान करते हैं, और इसके द्वारा क्या होता है, हम सब आसानी से जीवन जी सकते हैं, और यह अच्छी संस्कृति है। पर क्या है कि जब जो लोग भगवान को मानते नहीं हैं, जो लोग भगवान की भक्ति को इतना मानते नहीं हैं, उनके सामने जाते हैं, उनको अगर हम जो आध्यात्मिक ज्ञान बताते हैं, तो फिर क्या होता है—तभी हमको थोड़ी नम्रता स्वीकार करनी पड़ती है।
अभी जब अमेरिका में, मैं मंदिरों में लेक्चर देता हूँ, तो 500, 1000, 300, 700, 800 लोग होते हैं, पर अगर कॉलेजों में जाते हैं, तो कॉलेजों में 10, 20, 25, 30, 40 विद्यार्थी होते हैं। और वे सब कंपने (झिझकने) में जाते हैं। कुछ समय पहले मैं इंटेल में, फिर माइक्रोसॉफ्ट में… नम्रता, वह नम्रता से हमारी बात स्वीकार नहीं कर रहे होते हैं। जब लोगों में, दूसरों में नम्रता नहीं होती है, तो हमें नम्रता लानी पड़ती है। क्या होता है, अगर दूसरा व्यक्ति नम्र है, तो फिर क्या है, उनसे बातचीत करने में हमें कुछ नम्रता लानी नहीं पड़ती है।
पर दूसरा व्यक्ति, अगर बात स्वीकार नहीं कर रहा है, तो अगर हम उनसे कुछ बात करने जाते हैं और वे कुछ उल्टा ही बोलते हैं, कुछ तिरस्कार करते हैं, तो फिर भी शांत रहकर अपनी बात को बताना, उसके लिए नम्रता लगती है। हम अगर किसी को उपदेश दे रहे हैं और वे ‘हाँ’ बोले हाथ जोड़कर नम्रता से सुन रहे हैं, तो फिर उससे हम नम्रता का विकास नहीं करते हैं।
तो इसलिए, अगर हम ऐसे लोगों के पास जाते हैं, जो इतनी भक्ति में रुचि नहीं रखते हैं और उनको हम ग्रंथ देते हैं, तो उसमें क्या होता है? हम एक सेवक का भाव स्वीकार कर रहे हैं। हम भगवान के सेवक हैं, और हम भगवान के सेवक बनकर जा रहे हैं—कभी वे स्वीकार करेंगे, कभी वे स्वीकार नहीं करेंगे।
प्रतिकूल परिस्थितियों में नम्रता का विकास
और ऐसा करने से क्या होता है? अगर वे भले स्वीकार करते हैं तो अच्छा है, पर स्वीकार करने के संदर्भ में हमें क्या करना है? हमें थोड़ा समझाना पड़ता है, थोड़ा याचना करनी पड़ती है, और उस सबसे नम्रता का विकास होता है।
और कई बार, जब हम इस तरह से दूसरे लोगों के पास जाते हैं और उनसे बोलते हैं अच्छी तरह से, वे हमारा तिरस्कार भी कर रहे हैं, तो भी हम शांत रहते हैं और फिर उनसे बात करते हैं, तो उससे हम ज्यादा नम्रता विकसित करेंगे। न केवल मंदिर में आकर सिर्फ भगवान को प्रणाम करेंगे—हाँ, वह भी ज़रूरी है—पर क्या है कि ऐसी परिस्थिति, जिसमें हमारा अहंकार सामने आता है और वहाँ पर हम अहंकार आने नहीं देते हैं, और हम नम्रता रखते हैं, हम शांत रहते हैं, तो उससे नम्रता का विकास बहुत ज्यादा हो जाता है।
मेरे एक मित्र हैं इज़राइल में, और उनके परिवार में लगभग 27 पीएचडी लोग हैं—उनके भाई, उनकी बहन, उनकी माँ, उनके पिता, उनके दादा, उनके सारे कज़िन जो हैं। तो यह भी बहुत बड़े विद्वान हैं।
तो वे बता रहे थे कि वे इज़राइल में ग्रंथ वितरण कर रहे थे। तो वहाँ पर क्या पद्धति हो गई? वे ग्रंथ रखते हैं, वे वहाँ पर मैगज़ीन/ट्रैक्ट्स रखते हैं। और फिर उसके साथ-साथ एक भक्त कीर्तन करता है, और दूसरा भक्त… लोगों जो सड़क पर ही बैठ जाते हैं वे, और फुटपाथ पर, कॉर्नर में, एक भक्त हरमोनियम लेकर कीर्तन करता है, और दूसरा भक्त जो होता है, वह ग्रंथ बाँटता है।
तो यह भक्त बता रहा था कि कई बार कुछ लोग आते हैं, चले जाते हैं, और कोई ध्यान नहीं देता था। तो एक बार जब वह जा रहा था, उसने किसी भक्त को दिखाया यह, किसी एक व्यक्ति को मैगज़ीन दिखाया, और वह व्यक्ति उसके तरफ देखा, और क्या किया—वह उसके तरफ देखकर उनके ऊपर थूक दिया!
अब यह उस समय तो इतना गुस्सा हो गया—”यह क्या हो रहा है!” पर तभी उसने सोचा कि क्या है कि “यह उनकी भी दिव्य चेतना है कि यह भगवान मुझे शुद्ध करने का, धोने का मौका दे रहे हैं, नम्र होने का मौका दे रहे हैं।” और उसने सिर्फ हाथ जोड़ दिया, कुछ भी नहीं किया, और वह व्यक्ति चला गया।
पर कुछ समय के बाद वापस आ गया! वह बोला कि “तुम्हारा मासिक (मैगज़ीन) दो मुझे।” तो क्या हो गया? वह बोला कि क्या हुआ था कि उसको गुस्सा बहुत आता था, उसका शॉर्ट टेम्पर था, गुस्सा जल्द आ जाता था। और वह एक थेरेपिस्ट के पास जा रहा था, साइकोलॉजिस्ट के पास, एंगर इशू (Anger issue), उसका गुस्सा कम करने के लिए। तो उसका… तो क्या हुआ था, उसके घर में इतने झगड़े हो रहे थे, उसकी पत्नी ने उससे कहा था कि “तुम अगर अपना गुस्सा कम नहीं करोगे, तो मैं तुमको डिवोर्स (Divorce) दे दूंगी।” तो वह अपने गुस्से से बहुत परेशान हो गया था।
क्या होता है, हमारा मन ऐसे होता है—कभी हमें गुस्सा आ जाता है, हम फैसला करते हैं “मैं गुस्सा नहीं करूँगा”, और फिर भी गुस्सा आ जाता है। हम किसी को बोलते हैं—”वह नया साल चालू हो गया था, मैं क्रोध नहीं करूँगा”, और फिर हमको क्रोध आ जाता है। फिर दूसरा व्यक्ति बोलता है कि “तुम क्रोध कर रहे हो”—”मैं क्रोध नहीं कर रहा हूँ!” तो क्या हो जाता है, हमें क्रोध पहले आता है, और फिर हमें क्रोध आता है कि मुझे क्रोध क्यों आ रहा है! तो मन ऐसे है कि हमको फँसा देता है।
तो फिर वह व्यक्ति बहुत पीड़ित था कि वह चाह रहा था कि मुझे क्रोध नहीं आए, और फिर भी क्रोध आ रहा था। तो फिर उसके कारण वह अपने ही दिमाग में बहुत-बहुत विचलित था। और यह भक्त ने उसको ‘बैक टू गॉडहेड’ दिखाया था, तो उसने बोला था “नहीं चाहिए मुझे” और थूक दिया था। पर बाद में जब वह आगे गया, तो उसने देखा कि इस व्यक्ति ने कुछ नहीं किया, इसको अपने क्रोध पर इतना नियंत्रण है, तो यह कैसे नियंत्रण है, मुझे पता करना है।
तो उसने बोला, “तुम्हारे पास क्या है जो तुमको भी क्रोध पर नियंत्रण करा दे? देखो, यह ग्रंथ में होगा, मुझे ग्रंथ दे दो।” तो उसने वह मासिक ले लिया।
तो हमको तो शायद ऐसा कभी परीक्षा नहीं आएगा, पर फिर भी यह जो भाव है कि अगर हम नम्रता जाग्रत करते हैं, तो उससे हम भगवान के करीब आ सकते हैं। और खास करके, अभी हम अलग-अलग प्रकार से भगवान का संदेश दे सकते हैं, पर जब हम लोगों के सामने जाते हैं, उनके साथ बात करते हैं, तो तभी हमारे पास आध्यात्मिक ज्ञान से नम्रता प्राप्त करने का बहुत अच्छा मौका है। तो यह था ‘H’ (Humility)।
A — अनुभूति और मूल्य ज्ञान (Appreciation)
उसके बाद में क्या आएगा? ‘A’। ‘A’ मतलब Appreciation।
Appreciation मतलब—यह प्रशंसा नहीं है, Appreciation का एक अर्थ है इंग्लिश में प्रशंसा करना, पर यहाँ ‘A’ का एक अर्थ है कि हम खुद यह समझते हैं कि हमारे पास जो-जो चीज़ है, उसकी कीमत कितनी है।
We appreciate the value of what we have.
क्या हमारे पास है, उसकी कीमत हम और अच्छे से समझ सकते हैं।
मैं कनाडा में एक मेडिकल कॉन्फ्रेंस (Medical conference) में गया था। वहाँ पर Spirituality and Medicine (आध्यात्म और दवाई) इस पर वह कॉन्फ्रेंस था। तो उसमें वहाँ पर बता रहे थे कि कैसे… अभी दवाई तो बोले वैज्ञानिक है, तो उसमें अध्यात्म की ज़रूरत क्या है? तो बता रहे थे कि जो है, आजकल का समाज ऐसे हो गया है कि लोग एक-दूसरे की कीमत नहीं करते हैं। लोग एक-दूसरे की चीज़ों को ज्यादा महत्व देते हैं, लोगों का महत्व नहीं करते हैं। तो उसके कारण क्या हो गया है? सब बहुत ऑब्जैक्टिफाई (Objectify) हो गया है, सब बहुत एक भौतिक बन गया है। उसके कारण संबंधों में नहीं टिक रहे हैं।
तो इसके कारण क्या हो जाता है, कई बार ऐसे हो रहा था कि वे दवाई भी बनाते हैं, तो जब दवाई बनाते हैं, तो जो दवाई बनाने वाले हैं—”यह डालो, यह डालो, यह डालो, मिक्स करो उसमें, फिर इसको मशीन में डालो, फिर मशीन से उधर लेकर जाओ”—उस सब में काफी चीज़ें मशीन से होती हैं, पर कुछ चीज़ें मानव को भी करनी पड़ती हैं। और अगर वह मानव वहाँ पर ध्यान नहीं देते हैं जो दवाई बना रहे हैं, तो उससे क्या होता है? वह दवाई में कुछ गड़बड़ हो जाती है।
तो अभी उनके लिए तो यह रोज़ की नौकरी ही है—रोज़ मुझे दवाई बनानी है, रोज़ मुझे यही करना है। पर जिनके पास यह दवाई जा रही है, जो यह दवाई लेने वाले हैं, उनके लिए जीवन-मृत्यु का यह सिलसिला है! अगर वह दवाई अच्छी तरह से नहीं बनी होगी, दवाई में कुछ मिलावट है या कुछ कमी है, तो फिर वह व्यक्ति मर सकता है उसके कारण।
तो अभी, तो वह क्या हो रहा था कि कई बार जो ऐसे फार्मेसी में, जो मैन्युफैक्चरिंग में थे, जो बना रहे थे दवाई, वे थोड़े लापरवाह हो गए थे। तो फिर उन्होंने लोगों को डांटा—”नहीं, आप ध्यान दो, आप ध्यान दो, ध्यान से बनाओ यह।” पर लोग फिर भी लापरवाह हो रहे थे।
तो फिर उन्होंने क्या किया, जो फार्मेसी के लोग थे जो बना रहे थे, उनको बोला कि “आपका अगले एक महीने के लिए जॉब चेंज हो गया है। आपका क्या काम है? आप यह मैन्युफैक्चरिंग मत करो। जहाँ पर एपिडेमिक (Epidemic) है, जहाँ पर बहुत बड़ी बीमारी है, वहाँ पर जाकर यह दवाई लोगों को सप्लाई करने का तुम्हारा काम है।”
और जब उन्होंने वह चालू किया, तो उन्होंने अपनी आँखों से देखा कि व्यक्ति कितना पीड़ा में है, उसको दवाई देते हैं, उसको राहत मिलती है। और जब ऐसे वे देखने लग गए खुद, तो उनको समझ में आ गया कि यह दवाई कितनी महत्वपूर्ण है, दवाई की क्षमता कितनी है! और फिर उसके बाद में, वे जब दवाई बनाते थे, तो वे और ध्यान से बनाने लगे।
आध्यात्मिक ज्ञान का वास्तविक मूल्य
तो ठीक उसी तरह से क्या है कि हम सब के पास आध्यात्मिक ज्ञान है, और जो आध्यात्मिक ज्ञान है, यह एक बहुत बड़ा खजाना है। जैसे वह दवाई बहुत महत्वपूर्ण है, पर क्या है, दुनिया में जो समस्या बाकी सब की होती है, हमारी भी समस्या होती है, और हमको लगता है “इससे क्या फर्क पड़ा है, इसका मूल्य क्या है, इसकी कीमत क्या है?” यह हमको इतनी आसानी से समझ में नहीं आती है।
पर जब हम दूसरों को यह देने का प्रयास करते हैं, और वह देने से उनके जीवन में परिवर्तन आ जाता है… भक्ति में कैसे परिवर्तन होता है? अगर पहले कोई भक्ति स्वीकार करता है, तो परिवर्तन काफी हो जाता है। लोगों की बुरी आदतें होती हैं, बुरी आदतें चली जाती हैं, और फिर उनका हुलिया बदल जाता है और उनका व्यवहार बदल जाता है। बाद में भक्ति रोज़ करते हैं, अभी भी परिवर्तन हो रहा है, पर कैसे होता है? वह परिवर्तन धीरे-धीरे होता है।
पर जो परिवर्तन भक्ति में नए आने वाले लोगों में होता है, वह स्थूल स्तर पर होता है—कोई बुरी आदतें होती हैं और वे बुरी आदतें ऐसे ही छूट जाती हैं।
मैं अभी मायापुर में था, तो एक रूस से भक्त थे, उनसे बात कर रहे थे। तो वे बता रहे थे कि एक बार वे हमारे मंदिर के अध्यक्ष (Temple President) थे। तो वे मंदिर में बैठे थे और अचानक फोन आ गया। और जैसे ही फोन उठाया, कोई चिल्लाने लग गया उनके ऊपर। अभी क्या हो गया? और वह कुछ सुन रहे थे कि वह कुछ बोल रहा था कि “ये लोग लोगों को जबरदस्ती किताब दे देते हैं, अनजाने में जबरदस्ती किताब दे देते हैं।” वह क्या करते हैं, कभी ऐसे हुआ है, यह अच्छा नहीं है, कभी-कभी उत्साह के नाम पर कुछ हो जाता है। तो कभी-कभी वे लोगों को ऐसे बोलते हैं कि “यह किताब में वह चीज़ें हैं जो उसमें है ही नहीं”, तो ऐसा बोलकर वे कभी-कभी गलत बाँट देते हैं। तो फिर बाद में वे गलत किताब पढ़ते हैं—”इसमें कुछ भी नहीं है”, तो फिर उसको लगता है कि “यह क्या है!”
तो फिर क्या होता है? अभी क्या है, हर चीज़ का हम संबंध भगवान से जोड़ सकते हैं, पर वह संबंध कैसे जोड़ना है, वह व्यक्ति को समझाना चाहिए। तो कभी कोई क्या होते हैं, ज्यादा उत्साह से कुछ कर देते हैं। तो यह भक्त को लग रहा था कि शायद किसी ने ऐसे किया है, इसलिए गुस्सा हो गया है। पर बाद में जब वह शांत हुआ, फिर वह व्यक्ति बोल रहा था फोन में बता रहा था कि—”आप एक हफ्ते पहले, मुझे आपके किसी भक्त ने एक ग्रंथ दिया, और वह पढ़ा। और उसमें मैंने यह मंत्र सुना, मंत्र देखा, अब पढ़ा। उसके बाद मंत्र का उच्चारण करने लगा—हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे, हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।”
तो उसमें क्या है, इंग्लिश में ‘राम’ होता है, आर-ए-एम (RAM), आर-ए-एम मतलब वही जानवर (Ram) का नाम होता है। तो वह राम राम हरे हरे… तो वह बोल रहा है कि वह यह मंत्र जब जप करने लग गया, तो उसने बताया कि “मैं कई सालों से शराब पिया करता था, और मैं कई सालों से शराब छुड़ाने का प्रयत्न कर रहा था, पर छूट नहीं रही थी। अभी मैं यह जप चालू कर दिया, और शराब की इच्छा ही चली गई!”
तो वह बोल रहा था, तब वे भक्त सुनकर बड़े आनंदित हो गए—”ऐसा परिवर्तन हो गया!” फिर अध्यक्ष को याद आया कि जब फोन उठाया था, तब यह डांट रहा था, यह गुस्सा हो रहा था। तो गुस्से होने की बात क्या है? तब उसने बताया कि—”तुम्हारे पास इतनी शक्तिशाली पद्धति है, इतना शक्तिशाली ज्ञान है, तुमने इससे पहले मुझे क्यों नहीं दिया?!”
इसलिए वह डांट रहा था! “मैं इतने सालों से संघर्ष कर रहा था, मुझे पहले मिल जाता, तो मैं आसानी से यह छोड़ देता!”
तभी क्या है कि जब इस तरह से हम किसी के जीवन में परिवर्तन देख लेते हैं कि उसकी कोई बुरी आदत है और छूट जाती है, और यह भक्ति की शक्ति है। भक्ति की अंतिम शक्ति जो है कि हमें भगवान से जोड़ लेती है, पर भक्ति की यह भी शक्ति है कि हमारी जो बुरी चीज़ें हैं, उससे छुड़ा देती है हमको।
तो ऐसा परिवर्तन हम देखते हैं, तो हमको लगता है कि “हरे कृष्ण हमारे जीवन में ऐसा परिवर्तन कर रहा है, तो मेरे जीवन में कुछ करेगा, मेरे जीवन में अच्छे से जप करना चाहिए।” तो जो हम कर रहे हैं, उसकी कीमत हम और अधिक रूप से समझ सकते हैं, जब हम यह दूसरे को देते हैं और उनके जीवन में परिवर्तन देखते हैं।
और अगर हम किसी को भक्ति के मार्ग में लाने में मदद कर सकते हैं और उनके जीवन में परिवर्तन देखते हैं, तो उससे एक बहुत दिव्य संतुष्टि मिलती है। न केवल एक भगवान की कृपा मिलती है, पर हमारा खुद का विश्वास बहुत बढ़ जाता है।
तो इसलिए Appreciation क्यों है? कि अगर हम लोगों को भगवद्ज्ञान देते हैं और मासिकाओं का वितरण करते हैं, तो उसके द्वारा क्या होता है? उसके द्वारा हम खुद जो हमारे पास है, जो खजाना है, जो कीमती चीज़ है, उसकी सराहना बढ़ जाती है। यह था ‘A’।
R — जिम्मेदारी (Responsibility)
इसके बाद में क्या है? ‘R’। ‘R’ का मतलब है Responsibility। Responsibility मतलब जिम्मेदारी।
अब जिम्मेदारी का मतलब क्या है कि हम सब वास्तव में अभी भक्ति तो कर रहे हैं, पर भक्ति करते समय अलग-अलग प्रकार से भक्ति हो सकती है। एक है कि हम खुद मंदिर में आते हैं। तो अभी मान लीजिए, हम किसी मित्र को बुला रहे हैं—”आप मंदिर में आओ, मंदिर में आओ।” और वे आते नहीं, आते नहीं, बाद में आ जाते हैं। तो अच्छा है, मंदिर में एक बार तो आ गए। तो फिर बाद में हम बोलेंगे कि “अगली बार यह उत्सव है” और अगली बार वे आ गए हैं, तो अच्छी बात है।
पर अगर वे न केवल आते हैं, अपने और दो मित्रों को लेकर आ जाते हैं और फिर वे बोलते हैं—”यह मंदिर ऐसा है, यहाँ पर यह ऐसा है, वहाँ पर ऐसा है”, तो इसका मतलब क्या है? कि अब वे केवल एक मेहमान के रूप में नहीं हैं, वे एक मेजबान (Host) बन गए हैं! और जब कोई ऐसा करता है, मतलब क्या है कि उनको मंदिर अच्छा लगा है, उनका मंदिर से कुछ संबंध जुड़ा हुआ है, और इसलिए वे दूसरों को ला रहे हैं।
तो उसी तरह से क्या है कि जब हम भक्ति करते हैं, तो पहले जो भक्ति की विधि है, भक्ति का ज्ञान है, हम क्या कर रहे हैं—हम आकर सुनते हैं, यह अच्छा लग रहा है। पर वही ज्ञान अगर हमको अच्छा लगता है, तो हमें दूसरों को सुनाना चाहिए और दूसरों को भी हम लाते हैं।
तो फिर उससे क्या होता है? हम एक प्रकार से जिम्मेदारी ले रहे हैं कि “यह ज्ञान न केवल मुझे चाहिए, मुझे दूसरों को भी देना है।” और भक्ति में हम प्रगति उस हद तक करते हैं, जितना हम जिम्मेदारी स्वीकार करते हैं।
श्रील प्रभुपाद जी से एक बार पूछा गया था—”कृष्ण भावना का मतलब क्या है?” बहुत बार पूछा गया था, अलग-अलग जगह पर प्रभुपाद जी ने अलग-अलग जवाब दिए हैं। प्रभुपाद जी ने कहा कि कृष्ण भावना का मतलब यह है कि जब आपको लगता है कि भगवान मुझसे पूछ रहे हैं—”तुम मेरे लिए क्या कर रहे हो?” (What are you doing for me?)
अगर हमको ऐसा लगता है कि भगवान हमसे पूछ रहे हैं “तुम मेरे लिए क्या कर रहे हो?”, तो प्रभुपाद जी बोलते हैं कि वह ‘कृष्ण भावना’ है।
अगर हमको ऐसा लगता है कि “भगवान मेरे स्वामी हैं, मैं उनका सेवक हूँ”, और जब सेवक स्वामी के पास जाता है, तो पूछता है—”आपको क्या चाहिए? मुझे क्या करना है?”
अधिकांश लोग मंदिर में आते हैं और भगवान से पूछते हैं—”तुम मेरे लिए क्या कर रहे हो? मैंने यह प्रार्थना की थी, मैंने यह किया था, मेरी यह समस्या है, कब होने वाला है, कब यह समस्या जाने वाली है?”
हम भगवान की पूर्ण क्षमता को समझ नहीं रहे हैं। वह क्या है? भगवान हमसे शक्तिशाली हैं, इस समस्या का हल हम नहीं निकाल पा रहे हैं, भगवान हमसे शक्तिशाली हैं, भगवान इसका हल कर रहे हैं। यह भाव हमारा अच्छा भाव है, पर भगवान न केवल हमसे ज्यादा शक्तिशाली हैं, पर वे हमसे ज्यादा बुद्धिमान भी हैं!
तो जब हम मंदिर में आकर भगवान से पूछते हैं कि “तुम मेरे लिए क्या कर रहे हो?”, तो उसमें भाव क्या हो जाता है कि भगवान और हम दोनों एक संबंध बना लेते हैं, और संबंध की शर्त क्या है? संबंध के टर्म्स क्या हैं कि “मेरी बुद्धि और आपकी शक्ति! मेरी बुद्धि से मैं योजना बनाऊँगा, तुम अपनी शक्ति से योजना चलाओ।”
तो अभी भगवान से क्या होता है, इस तरह का संबंध अगर हम रखते हैं, तो हम भगवान की जो दिव्य बुद्धि है, उसको हमारे जीवन में कार्य करने का मौका ही नहीं दे रहे हैं।
पर जब हम समझते हैं कि भगवान हमसे ज्यादा बुद्धिमान हैं—हम ज़रूर अपनी बुद्धि से सोच सकते हैं कि यह समस्या है, मुझे लगता है यह हल है इसका, हम प्रार्थना कर सकते हैं भगवान से, पर:
करिष्ये वचनं तव
“भगवान, आपकी जो इच्छा है, मैं करूँगा। आपकी जो योजना है, वह मुझे समझने दो और मैं उस योजना में सहयोगी हो जाऊँगा।”
तो अगर वह भाव रखते हैं, वह भाव मतलब वास्तव में भक्ति में प्रगति का भाव है। इस भाव में… अभी भगवान हमसे पूछें “तुम मेरे लिए क्या कर रहे हो?”, तो भगवान से संबंध जोड़ना है, भगवान से प्रेमपूर्ण संबंध जोड़ना है। और प्रेमपूर्ण संबंध जोड़ने का मतलब क्या है? जिम्मेदारी लेना! जितना कोई संबंध में जिम्मेदारी लेता है, उतना ही वह संबंध सुदृढ़ होता है।
मान लीजिए घर में पति-पत्नी हैं। पत्नी अपने पति से कहती है… और वह पति दिन भर घर में ही बैठा रहता है, कुछ नौकरी नहीं कर रहा है। और पत्नी कहती है—”हमारे घर में कुछ नहीं है, अभी हमको कुछ खरीदना है, अन्न खरीदना है, सामान खरीदना है, हमको पैसे चाहिए।” पति बोलता है कि “मैं तुमसे बहुत प्रेम करता हूँ!”—”हाँ-हाँ, पर हमको यह चाहिए।”—”हाँ, मैं तुमसे बहुत प्रेम करता हूँ!”
अगर प्रेम करते हैं, तो जिम्मेदार बनो और कुछ खरीदो, नौकरी करो, कुछ पैसे लेकर आओ!
अगर पति घर आता है थका हुआ, और फिर पत्नी बोलती है, भूख लगी है उसको, तो पत्नी कहती है—”मैं तुमसे बहुत प्रेम करती हूँ।”—”कुछ खाना दो!”—”मैं तुमसे बहुत प्रेम करती हूँ!”—नहीं!
अगर प्रेम है, तो उसमें क्या है? जिम्मेदारी लेकर हम सेवा करते हैं। अगर सिर्फ प्रेम के वचन बोलते हैं पर जिम्मेदारी नहीं ले रहे हैं, और जिम्मेदारी लेकर सेवा नहीं कर रहे हैं, तो वह प्रेम केवल एक भावुक प्रेम है। It’s not real love, it’s sentimental love.
तो इसलिए, भगवान की भक्ति भी क्या है? अगर हम जिम्मेदारी से सेवा करते हैं भगवान के लिए, तो फिर वह जो भक्ति है, वह सुदृढ़ बन जाती है। तो यह, अगर हम भगवान का ज्ञान दूसरों को वितरित कर रहे हैं, तो वही हमारी जिम्मेदारी है।
प्रभुपाद जी ने स्वयं यह जिम्मेदारी स्वीकार की थी। और प्रभुपाद जी, जब उनको पहली बार ज्ञान मिला, तो बड़े दिव्य आनंदित हो गए वह। पर तभी वह अपने गृहस्थाश्रम में थे, उनको बड़ी जिम्मेदारियाँ थीं, और सोचते थे कि अभी मैं इस ज्ञान का प्रचार नहीं कर सकता। पर फिर उन्होंने खुद यह ‘बैक टू गॉडहेड’ (भगवद्दर्शन) मैगज़ीन चालू कर दिया। अभी उनके गुरुदेव तभी इस जगत से चले भी जाते हैं, और कोई उनका गुरुभाई उनको बोल नहीं रहा था कि तुम यह नहीं कर रहे हो, तुम वह नहीं कर रहे हो। प्रभुपाद जी खुद की प्रेरणा से यह कर रहे थे।
और अगर आप देखते हैं, 1944-1945 में यह प्रभुपाद जी ‘बैक टू गॉडहेड’ छाप रहे थे… तो 1940, 41, 42, उस समय में दुनिया में बहुत बड़ी भीषण चीज़ चल रही थी। 1944-45 में, किसी को पता है क्या हो रहा था? दूसरा विश्व युद्ध चल रहा था तभी!
तो उस समय क्या है कि सरकार लोगों को पेपर (कागज) भी नहीं देती थी। और खास करके क्या हो रहा था कि भारत ब्रिटिश राज में था और ब्रिटेन चाहता था कि भारतीय लोग ब्रिटेन की सेना में आ जाएँ, पर कई भारतीय सैनिक जो थे, वह जर्मनी के साथ हो गए थे, सुभाष चंद्र बोस उनके साथ चले गए थे। उसके कारण जो भारतीय सरकार (ब्रिटिश सरकार) थी, वह सोचती थी कि अगर भारत में कोई प्रोपेगैंडा (Propaganda) हो जाएगा, प्रतिपादन हो जाएगा इंडियन नेशनल आर्मी (भारत की सेना) का, तो फिर उससे बहुत भारतीय हमारे खिलाफ हो जाएँगे।
तो इसलिए सरकार ने पेपर का जो सप्लाई था, वह बहुत कम कर दिया था और पेपर की कीमत बहुत बढ़ गई थी। तो कई बार जब प्रभुपाद जी को भगवद्दर्शन छापना होता था, तो पेपर की कीमत इतनी होती थी कि प्रभुपाद जी को अपना खुद का खाना, नाश्ता छोड़कर वह क्या कर रहे थे—’बैक टू गॉडहेड’ के लिए कागज खरीद रहे थे! और कागज की कीमत बढ़ गई थी, पर लोग तो मासिक खरीदने के लिए इतने उत्साही नहीं थे, तो प्रभुपाद जी ‘बैक टू गॉडहेड’ की कीमत नहीं बढ़ा पा रहे थे।
तो प्रभुपाद जी अपना खून-पसीना एक करके तभी ‘बैक टू गॉडहेड’ छाप रहे थे। और उनका भाव यह था कि यह जो संदेश है, यह लोगों को प्रदान करेंगे, तो उससे क्या होगा? लोग जो हैं, उनकी आध्यात्मिक चेतना बढ़ जाएगी।
मन से होती है युद्ध और शांति की शुरुआत
मैं यूनेस्को (UNESCO) के एक कॉन्फ्रेंस में गया था, पुणे में ही था कुछ साल पहले, वर्ल्ड पीस कॉन्फ्रेंस (World Peace Conference)। तो वहाँ पर यूनेस्को के भारत के जो अध्यक्ष आए थे, वह बता रहे थे कि यूनेस्को के चार्टर में लिखा हुआ है कि:
Just as war begins in the minds of people, peace also has to begin in the minds of people.
युद्ध की शुरुआत कहाँ होती है? लोगों के मन में होती है! लोगों के मन में गुस्सा होता है, क्रोध होता है, हिंसक भावनाएँ आती हैं और फिर उसके बाद में युद्ध चालू होता है। तो वैसे ही, अगर शांति चालू होनी है, तो लोगों के मन से शुरुआत होनी चाहिए।
तो प्रभुपाद जी… तभी पूरा विश्व महायुद्ध चल रहा था, पर प्रभुपाद जी वह आध्यात्मिक ज्ञान देने का प्रयास कर रहे थे, जिससे कि लोगों के मन में शुद्धता आ जाएगी, शुद्धि आ जाएगी और शांति आ जाएगी।
तो उस समय में प्रभुपाद जी ने बहुत मेहनत की। और कई बार वह जो भगवद्दर्शन बाँटते थे, तो तभी दिल्ली में बहुत धूप होती थी। अभी मैं कुछ एक हफ्ते पहले दिल्ली में था, तो अभी दिल्ली में धूप है, पर क्या है, बहुत प्रदूषित हो गया है।
स्मॉग/वातावरण के बारे में बहुत संशोधन हो चुका है। तो अभी आप इंटरनेट में कुछ साइट्स पर डेटा डाल दो कि इस साल में इस जगह पर वातावरण क्या था, आपको जानकारी मिल सकती है। तो अभी मेरे एक मित्र, वह शिकागो में हैं, तो कल फोन करके बोले कि विश्व के इतिहास में सबसे कम जो तापमान है, वह कल शिकागो में दर्ज हुआ था, विश्व के पूरे इतिहास में! वह लगभग माइनस 45 डिग्री टेम्परेचर था (-45°C)! अभी अंटार्कटिका, आर्कटिक जो है, उससे भी कम हो गया है। तो आजकल वातावरण काफी खराब हो रहा है, पर वातावरण का बहुत संशोधन चल रहा है, तो उसके द्वारा भूतकाल में क्या वातावरण था, उसका एक तरह से जाँच कर सकते हैं।
तो तभी इतनी भीषण धूप में… और उसमें प्रभुपाद जी जवान भी नहीं थे, वह लगभग पचास साल की उम्र हो गई थी उनकी उस समय। तो उस समय में वह चल रहे थे, वह जा रहे थे, भगवद्दर्शन बाँट रहे थे। क्यों? क्योंकि उन्होंने वह जिम्मेदारी स्वीकार की थी!
प्रभुपाद जी कहते हैं कि अर्जुन का यही भाव था। अभी अर्जुन को भगवान ने विराट रूप जब दिखाया, तो दिखाया कि सारे जो दुष्ट कौरव थे, उनका नाश हो गया। तो फिर अर्जुन ने यह नहीं कहा कि “भगवान, आपने तो उनका नाश कर ही दिया है, अब मुझे युद्ध करने की क्या ज़रूरत है?”
हम भी अगर जिम्मेदारी लेते हैं, तो हमें भी भगवान दिव्य रूप से उनकी कृपा देंगे, प्रगति देंगे। तो यह आध्यात्मिक ज्ञान बाँटने की जिम्मेदारी हम स्वीकार करेंगे, तो उससे हम बहुत तेज़ी से प्रगति कर सकते हैं, न केवल खुद प्रगति करेंगे, बल्कि भगवान की कृपा भी प्राप्त करेंगे।
E — दिव्यानंद (Ecstasy)
‘SHARE’ एक्रोनिम का अंतिम अक्षर है ‘E’। ‘E’ मतलब Ecstasy। Ecstasy मतलब दिव्यानंद!
भगवद्गीता में ही आगे लिखते हैं… मैंने 72वाँ श्लोक बताया, इसके बाद 73वें श्लोक में अर्जुन कहते हैं—”हाँ भगवान, मैं समझ गया हूँ और मैं आपकी वाणी का ही पालन करूँगा—करिष्ये वचनं तव।”
और उसके बाद 74 से 78 श्लोक में संजय बात करते हैं। अब जो संदेश कृष्ण ने अर्जुन को दिया, वही संदेश संजय ने धृतराष्ट्र को भी सुनाया। तो वह संदेश कृष्ण ने जब अर्जुन को दिया, तो अर्जुन का हृदय परिवर्तित हो गया। पर जब वही संदेश संजय ने धृतराष्ट्र को दिया, धृतराष्ट्र का हृदय परिवर्तित नहीं हुआ, धृतराष्ट्र वैसा का वैसा ही रहा।
पर इसके बावजूद, अगर हम संजय का भाव सुनते हैं, संजय 76-77 श्लोक में बोलते हैं… संजय ने यह भगवद्गीता सुनी और दोहराई, उसके बाद में क्या हो गया? यह भगवद्गीता कितना दिव्य ज्ञान है, उसकी सराहना करने लगे:
इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः ।
संवादमिममश्रौषमद्भुतं रोमहर्षणम् ॥
“बड़ा ही अद्भुत संवाद यह सुनने को मिला मुझे!”
व्यासप्रसादाच्छ्रुतवानेतद्गुह्यमहं परम् ।
योगं योगेश्वरात्कृष्णात्साक्षात्कथयतः स्वयं ॥
“यह जो भगवान ने स्वयं संदेश दिया है, मेरे गुरु व्यासदेव की कृपा से प्राप्त हुआ है।”
और फिर वह कहते हैं कि यह संदेश सुनकर मुझ पर क्या प्रभाव हो रहा है:
रांजन्संस्मृत्य संस्मृत्य संवादमिदमद्भुतम् ।
केशवार्जुनयोः पुण्यं हृष्यामि च मुहुर्मुहुः ॥
“हे राजन्! मैं इस अद्भुत संवाद को याद कर-करके हर पल हर्षित हो रहा हूँ!”
और वही भाव दूसरे श्लोक (77वें श्लोक) में दोहराते हैं:
तच्च संस्मृत्य संस्मृत्य रूपमत्यद्भुतं हरेः ।
विस्मयो मे महान् राजन् हृष्यामि च पुनः पुनः ॥
“हे राजन्! भगवान के उस अत्यंत अद्भुत रूप को याद कर-करके मैं बार-बार विस्मित और हर्षित हो रहा हूँ!”
तो भगवान का संदेश जब हम दूसरों को देने का प्रयास करते हैं, तो उससे क्या आता है? उसके द्वारा भले ही दूसरा व्यक्ति कृष्ण भावनाभावित हो या न हो, हम स्वयं कृष्ण भावनाभावित हो जाएँगे! और जैसे संजय संतुष्ट हो गया, वैसे हम भी दिव्य संतुष्टि और हर्ष का अनुभव करेंगे।
तो क्या होगा? हम यहाँ पर हैं, सामने वाला व्यक्ति यहाँ पर है, भगवान यहाँ पर हैं। अब वह व्यक्ति भगवान का संदेश स्वीकार करेगा, तो उसका कल्याण हो जाएगा। पर हम भगवान का संदेश देने का प्रयास करेंगे, उससे भगवान प्रसन्न हो जाएँगे। और जब भगवान प्रसन्न हो जाएँगे, तो वह हमारे हृदय में भक्ति जाग्रत कर देंगे, दिव्यानंद जाग्रत कर देंगे! तो इसके लिए हम हर्षित हो जाएँगे।
तो यह जो है, यह केवल हम दूसरों का कल्याण नहीं कर रहे हैं, खुद का भी कल्याण कर रहे हैं। इसलिए, जितना हो सके उत्साह के साथ, हम अगर जो भगवान का संदेश है, उसका वितरण करने का प्रयास करेंगे, तो हम देखेंगे कि हम भगवान की योजना में सहभागी होकर दूसरों का कल्याण करेंगे और खुद का भी कल्याण कर पाएँगे।
संपूर्ण प्रवचन का सारांश (Summary of Entire Lecture – S.H.A.R.E.)
सारांश में, आज मैंने चर्चा की कि किस तरह से भगवद्गीता का जो ज्ञान है, वह एक दिव्य खजाना है।
- किसी बीमार व्यक्ति के लिए दवाई सबसे बड़ा धन है।
- किसी गुमराह व्यक्ति के लिए कोई नक्शा या दिशा सबसे बड़ा धन है।
उसी तरह से जीवन में अगर हमारा मन घूम गया है, गुमराह हो गया है, तो जीवन का उद्देश्य देने वाला जो ज्ञान है, वह सबसे बड़ा धन है। आजकल के जीवन में बहुत से लोग गुमराह हो गए हैं, यह हम इस तरह समझ सकते हैं कि लोग आत्महत्या करते हैं, डिप्रेशन हो जाता है उनको, बुरी आदतों में फँस जाते हैं, क्योंकि जीवन में उनके लिए प्रेरणादायक दिशा नहीं है।
तो अर्जुन भी इस तरह से ही गुमराह हो गए थे, हताश हो गए थे, पर भगवान ने भगवद्गीता का ज्ञान देकर, उस धन के द्वारा अर्जुन का सारा दुख और मोह दूर कर दिया। वही जो धन है, हमें मिला है, और इस धन का वितरण करना यह हमारा भी अवसर है।
इसके संदर्भ में मैंने आज का सूत्र चुना—S.H.A.R.E.:
- S — साधना (Sadhana): जो हम जप करते हैं, कीर्तन करते हैं, उससे हमारा संबंध भगवान से जुड़ता है। उसी तरह से, दूसरों को भगवान का संदेश देने से भी हमारा संबंध भगवान से जुड़ता है, यह भी एक सेवा है। तो हमें पूर्ण शुद्ध होने की प्रतीक्षा करने की ज़रूरत नहीं है, जिस स्तर पर हम हैं, उस स्तर से हम भगवान का संदेश दे सकते हैं। और खास करके मासिकाओं के रूप में देते हैं, तो वह छोटा होता है—छोटा मासिक होता है, छोटे लेख होते हैं, आसानी से पढ़े जा सकते हैं, उसमें नयापन होता है।
- H — नम्रता (Humility): जो लोग भक्ति आसानी से स्वीकार नहीं करते हैं, उनको जाकर समझाने में हमारे अंदर नम्रता आती है। जब दूसरा व्यक्ति नम्र नहीं है, उससे बातचीत करने के लिए हमें नम्रता जाग्रत करनी पड़ती है। और नम्रता जब होती है, तो हमारा हृदय खुल जाता है, जिससे कि भगवान हमारे हृदय में आ सकें और हम भगवान के करीब जा सकें। जैसे इज़राइल में वह भक्त नम्र रह गए, और उनके थूकने वाले व्यक्ति ने बाद में आकर उनसे मैगज़ीन ले ली कि “तुम इतना संयम कैसे रख सकते हो अपने क्रोध पर?”
- A — अनुभूति/मूल्य ज्ञान (Appreciation): जो हमें ज्ञान मिला है, उसकी सराहना हम तब ज्यादा कर पाते हैं, उसकी कीमत हम अधिक समझते हैं जब हम वह दूसरों को देते हैं। जैसे कोई दवाई बनाने वाले हैं, जब वे देखते हैं कि दवाई कितनी कीमती है और लोगों के जीवन में कितना फर्क ला सकती है, तो वे दवाई ध्यानपूर्वक बनाते हैं। जैसे रूस के वह भक्त थे, जिनके माध्यम से एक व्यक्ति महामंत्र जप करके शराब के व्यसन से मुक्त हो गया। तो किसी के जीवन में ऐसा परिवर्तन देखकर हमारी श्रद्धा और बढ़ जाती है।
- R — जिम्मेदारी (Responsibility): हम जब भगवान का संदेश दूसरों को देने के लिए जिम्मेदारी लेते हैं, तो इसका मतलब है कि हम केवल एक मेहमान नहीं हैं, हम मेजबान बन रहे हैं। कृष्ण भावना का मतलब क्या है? हम भगवान के सेवक हैं। अधिकांश लोग आते हैं भगवान के पास और पूछते हैं—”आप मेरे लिए क्या कर रहे हैं?”, पर भक्त का भाव होता है कि भगवान हमसे पूछ रहे हैं—”तुम मेरे लिए क्या कर रहे हो?” जब हम जिम्मेदारी लेकर सेवा करते हैं, तो हमारी भक्ति बहुत सुदृढ़ हो जाती है, जैसे श्रील प्रभुपाद जी ने वृद्धावस्था में भी इतनी कठिन परिस्थितियों में जिम्मेदारी ली।
- E — दिव्यानंद (Ecstasy): जैसे संजय सफल नहीं हुए धृतराष्ट्र को परिवर्तित करने में, फिर भी धृतराष्ट्र को कृष्ण भावना का संदेश देते हुए संजय स्वयं कृष्ण भावनाभावित हो गए और आनंदित हुए। उसी तरह से, दूसरों को जब हम कृष्ण भावना का संदेश देने का प्रयास करेंगे, तो भले ही वे स्वीकार करें या न करें, हम स्वयं कृष्ण भावनाभावित हो जाएँगे और दिव्यानंद का अनुभव करेंगे।
यह ऐसा धन है कि जब हम दूसरों को देने का प्रयास करेंगे, तो सामने वाला स्वीकार करे या न करे, हमारे पास का जो धन है, वह और बढ़ जाएगा। इस तरह से हम दूसरों का भी कल्याण कर पाएँगे और खुद का भी कल्याण कर पाएँगे।
बहुत-बहुत धन्यवाद! हरे कृष्णा!