Damodarashtakam Texts 5-8 – Hindi
[Talk at Cincinnati, USA]
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Lecture Summary
- दामोदराष्टकम् की व्याख्या (श्लोक 5 से 8):
- 5वाँ श्लोक (भगवान का सौंदर्य व प्रेम): भगवान कृष्ण का मुखारविंद कमल के समान अत्यंत सुंदर, पवित्र और नीली अलकों (बालों) से घिरा हुआ है। यशोदा मैया द्वारा उन्हें बार-बार बिंब फल जैसे लाल अधरों पर चुंबन देना (तथा रस्सी से बांधना) भगवान और भक्त के अंतरंग प्रेम का प्रतीक है।
- 6ठा श्लोक (कृपा की याचना): सत्यव्रत मुनि प्रार्थना करते हैं कि हे दामोदर! हे अनंत विष्णु! आप मुझ पर अपनी कृपा-दृष्टि की वर्षा कीजिए। मैं इस भव-सागर (दुख जलाब्धि) में मग्न हूँ, मुझे इस संसार से उबारकर अपने दिव्य रूप का दर्शन दीजिए।
- 7वाँ श्लोक (मोक्ष की अनिच्छा व प्रेम-भक्ति): जैसे आपने कुबेर के पुत्रों (नलकूबर और मणिग्रीव) का उद्धार कर उन्हें भक्ति प्रदान की, वैसे ही मुझे केवल अपनी प्रेम-भक्ति प्रदान कीजिए। मुझे मोक्ष की कोई आकांक्षा नहीं है।
- 8वाँ श्लोक (दामोदर रस्सी, श्रीमती राधारानी व अनंत लीलाओं को प्रणाम): श्लोक के अंत में उस दिव्य रस्सी (दाम), उदर (जो पूरे विश्व का धाम है), भगवान की परम प्रिय श्रीमती राधारानी और उनकी अनंत लीलाओं को बार-बार प्रणाम किया गया है।
- परंपरा और आधुनिकता का संगम: हम सब अपनी संस्कृति (परंपरा) और आधुनिक समाज के चौराहे (Intersection) पर जीते हैं। भक्ति इन दोनों को आपस में जोड़ती है।
- उद्दीपन (Spiritual Stimulus): भगवान की सुंदर लीलाएँ, चित्र और नाम हमारे हृदय में भक्ति के भाव को जाग्रत करने के लिए ‘उद्दीपन’ का कार्य करते हैं।
- दुख की परिभाषा व वास्तविक सुख: श्रीमद्भागवत और प्रह्लाद महाराज के अनुसार, अप्रिय वस्तु का मिलना और प्रिय का न मिलना ही दुख है। सुख भौतिक संसाधनों या धन-संपदा से नहीं, बल्कि उनका भगवान की सेवा में सही उपयोग करने से मिलता है।
- सच्ची भक्ति का भाव: भक्ति कोई व्यापार (Business) नहीं है कि “मैं यह पूजा करूँगा, आप मुझे यह दो।” भक्ति केवल निष्काम सेवा और प्रेम की याचना है।
Full Transcription
हरे कृष्णा! आज यह बहुत ही पवित्र दामोदर महीने का एक दिन है। तो कुछ दिन पहले, दो दिन पहले मैंने दामोदराष्टकम् पर प्रवचन लिया था, उसमें हमने पहले जो चार श्लोक थे उस पर चर्चा की थी। तो आज अगले चार श्लोकों पर चर्चा करूँगा। फिर भी जो उस दिन नहीं थे, फिर भी उनके लिए भी यह एक इंडिपेंडेंट (स्वतंत्र) क्लास है, स्वतंत्र क्लास है।
तो आप समझ सकते हैं, हर एक हम सब जब जीते हैं, तो हम सब एक इंटरसेक्शन (Intersection), एक मिलाव में जीते हैं। एक है हमारी परंपरा, हमारी ट्रेडीशन, हमारी संस्कृति; और दूसरा है हमारा आजकल का समाज। तो इन दोनों रोड का एक इंटरसेक्शन होता है—एक रोड इधर से आता है, एक रोड उधर से आता है, तो दोनों का एक जगह इंटरसेक्शन होता है, मिलन होता है। उसी तरह से हम सब जीते हैं। तो हम एक संस्कृति से संबंधित हैं, आज के जीवन का प्रवाह कुछ अलग है, तो इन दोनों के बीच में हम जी रहे हैं।
तो भक्ति की जो विधि है, यह वास्तव में दोनों को साथ मिलाती है। व्यक्ति में, एक भक्ति में एक परंपरा, जो हमारे रीति-रिवाज होते हैं, वे सब आते हैं। पर उसके साथ-साथ भक्ति में आजकल की दुनिया होती है, उसमें हम भक्ति कर रहे हैं, तो इसलिए हम तंत्र-ज्ञान भी इस्तेमाल करते हैं, माईक्स इस्तेमाल करते हैं।
तो पारंपरिक जो पारंपरिक है, कंटेंपरेरी मतलब आजकल का है, जो ट्रांसेंडेंटल है, वह सब समय की पाबंदियों से परे हैं—सब समय, भूत, भविष्य, वर्तमान सब के परे हैं, वह दिव्य है। तो भगवान जो हैं, भगवान यह केवल प्राचीन नहीं हैं। भगवान का दिव्य अस्तित्व समझना है, तो हाँ उसके लिए एक पारंपरिक दृष्टिकोण समझ सकते हैं, आध्यात्मिक दृष्टिकोण समझ सकते हैं।
दामोदर लीला जो है, यह हजारों सालों के लिए भक्ति संस्कृति में, इसको भक्त याद करते हैं। पहले दो श्लोकों में इस लीला का वर्णन आता है कि कैसे कृष्ण भागे और कृष्ण को बाँधा गया। और फिर उसके बारे में बाकी सब श्लोकों में इसका विश्लेषण आता है। पहले दो श्लोकों में लीला का वर्णन आता है, तीसरे श्लोक में वर्णन आता है कि यह कितना अद्भुत लीला है कि जो भगवान सबके नियंत्रक हैं, वे यहाँ बँध गए हैं। और फिर चौथे श्लोक में वर्णन आता है कि अभी जब कुछ हम बहुत आकर्षक चीज़ देखते हैं, तो फिर साधारणतया उसमें कुछ प्राप्त करने की इच्छा होती है। उनको ताजमहल देखने की बहुत रुचि थी, तो फिर उनको ताजमहल दिखाया, और बाद में वृंदावन में कुसुम सरोवर देखने के बाद वे बोले कि वास्तव में कुसुम सरोवर वृंदावन में ताजमहल से अधिक सुंदर है, शांत है, उसमें सुकून अधिक है।
तो उससे एक स्वाभाविक है कि हमारे मन में कुछ इच्छा जाग्रत होती है—मुझे यह चीज़ देखनी है, मुझे यहाँ पर जाना है। तो उसी तरह से जब हम भगवान की लीला सुनते हैं, तो फिर उससे क्या होना चाहिए? उससे भगवान के प्रति आकर्षण बढ़ना चाहिए, वह सही है। पर भक्ति मतलब वास्तव में हमारी इच्छाएँ भगवान के प्रति और बढ़ जाना है—भगवान का स्मरण करना, भगवान की सेवा करना, भगवान के ध्यान में पूरा मग्न हो जाना। इसके लिए भगवान से आकर्षित होना यह जो होता है, यह भक्ति का उद्देश्य है।
तो आपका इस रूप में स्मरण करना है, तो हम पाँचवें श्लोक से चर्चा करेंगे। कोई गा सकता है? यह हम सब साथ में जाएँगे, एक-एक लाइन जाएँगे और फिर हम उसके बाद चर्चा करेंगे। तो पाँचवें लाइन से:
इदं ते मुखाम्भोजमत्यन्तनीलै-
र्वृतं कुन्तलैः स्निग्ध-रक्तैश्च गोप्या ।
मुहुश्चुम्बितं बिम्ब-रक्ताधरं मे
मनस्यविरास्तामलं लक्ष-लाभैः ॥ ५ ॥
यह जो रूप है, यह मुख जो है आपका, अंभोज के समान है। उसको कहा कमल के समान है। यह तो भगवान के अलग-अलग शरीर के अंग होते हैं, उनको कई बार कमल से तुलना भी आती है—चरण-कमल कहते हैं। एक श्लोक आता है, किसी को पता है? जिसमें भगवान के अनेक अंगों को कमल से तुलना की गई है? एक कुंती महारानी की प्रार्थना में आता है, आप मेरे पीछे दोहरा सकते हैं:
नमः पङ्कजनाभाय नमः पङ्कजमालिने ।
नमः पङ्कजनेत्राय नमस्ते पङ्कजाङ्घ्रये ॥
यहाँ पर भगवान के अंगों की चार तुलना की गई है:
- पङ्कजनाभाय: मतलब उनकी नाभि जो है, वह एक पंकज (कमल) के समान है।
- पङ्कजनेत्राय: नेत्राय मतलब आँखें, तो उनके आँखें पद्मनयन, कमलनयन भगवान को कहते हैं।
- पङ्कजाङ्घ्रये: अङ्घ्रि मतलब चरण, तो उनके चरण भी कमल के समान हैं।
- पङ्कजमालिने: माला भी उनकी पंकजों की है।
कमल यहाँ बताया गया है कि वरम् इदं ते मुखाम्भोजम्। अंभोज का संस्कृत में अर्थ है—अंबु (पानी) और ज (जिसमें उगता है या जिसका जन्म होता है)। जैसे कमल होते हैं, जो जल में उगते हैं और बढ़ते हैं, तो ‘अंभोज’।
तो यहाँ पर बताया क्या जा रहा है कि कमल से तुलना क्यों की जाती है? गुलाब से तुलना हो सकती है, किसी अलग फूल से भी हो सकती है तुलना, पर खास करके कमल से तुलना करते हैं क्योंकि कमल जो होता है, ऐसा होता है कि वह भले ही दलदल में उगता है, पर वह दलदल से दूषित नहीं होता है। कोई भी कीचड़ वगैरह कमल पर लग जाता है, तो फिसल के निकल जाता है। तो इसलिए कमल की तुलना जो है, वह भगवान से करते हैं कि भगवान दिव्य होते हैं। भले ही वे इस जगत में आते हैं, पर इस जगत में जो दूषण है—जो स्वार्थ है, काम, क्रोध, लोभ है—उनसे भगवान कभी प्रभावित नहीं होते हैं। भगवान हमेशा दिव्य रहते हैं।
तो उनका जो चेहरा है, वह एक सुंदर है और पवित्र भी है। तो कमल की तुलना… कमल सुंदर होता है और कमल को पवित्र भी माना जाता है, शुद्ध माना जाता है। तो आप कहते हैं कि वरम् इदं ते मुखाम्भोजम्।
और मैं केवल यहाँ पर उनके मुख… कैसे? मैंने पिछले श्लोक में, पिछले प्रवचन में बताया था कि कैसे भगवान जब भक्तों से भक्ति का संबंध जोड़ते हैं, तो केवल ऐसा संबंध नहीं है कि “मैं भगवान हूँ, तुम मेरे सामने आके प्रणाम करो।” भगवान अलग-अलग रस का अनुभव करना चाहते हैं। तो इसमें क्या है, यहाँ बताया गया है कि यशोदा मैया क्या कर रही हैं: इदं ते मुखाम्भोजम् अत्यन्तनीलैर्वृतं कुन्तलैः स्निग्ध-रक्तैश्च गोप्या।
तो भगवान का जो चेहरा है, वह उनके बालों के द्वारा आच्छादित है। और भगवान का वर्ण कैसा है? नील-वर्ण है। कुछ साल 1965-66 में प्रभुपाद जी ने अंतरराष्ट्रीय कृष्णभावनामृत संघ (इस्कॉन) चालू किया, और उस समय क्या था, अमेरिका में सिविल राइट्स का आंदोलन चल रहा था काफी, कि जो गोरे और काले लोग हैं उनमें काफी झगड़े हो रहे थे। काले लोग काफी समय तक उनका शोषण किया गया था, तो वे अपने हक के लिए लड़ रहे थे। पर और कुछ गोरे लोग थे, वे उसका विरोध कर रहे थे।
तो उस समय में प्रभुपाद जी के एक शिष्य थे, वे ओहायो स्टेट यूनिवर्सिटी में यहाँ पर वे इंग्लिश सिखाते थे। तो एक बार उनके प्रिंसिपल ने उनको बुला लिया—”मुझे पता नहीं है कि यहाँ का ऐसा नियम है कि भगवान के बारे में बात नहीं कर सकते। पर तुम एक भगवान की विचित्र संकल्पना के बारे में बात करते हो।” शिष्य ने कहा—”मेरी कोई संकल्पना नहीं है भगवान के बारे में। अगर आपकी कोई संकल्पना है ही नहीं, तो फिर आप मेरी संकल्पना को विचित्र कैसे कह सकते हैं?” प्रिंसिपल ने कहा—”नहीं, नहीं, नहीं! पर तुम बता रहे हो कि तुम बता रहे हो कि भगवान एक काउबॉय (Cowboy) हैं!”
तभी अगर आपको वेस्टर्न मूवीज के बारे में थोड़ा पता है, तो काउबॉय मूवीज होती हैं, वे घोड़ों पर बैठके, गन लेकर… वेस्टर्न मूवीज कहते हैं, वे काउबॉय होते हैं। तो वे बोले—”कृष्ण काउबॉय नहीं हैं, काउहर्ड बॉय (Cowherd boy) हैं! काउहर्ड बॉय—वे गोपाल हैं, वे वैसे हैं।” प्रिंसिपल ने कहा—”पर तुम कहते हो कि भगवान काले हैं!” तो वे बोले कि—”भगवान काले नहीं हैं, भगवान नीले हैं!”
तो यहाँ जो है कि लोगों को बहुत आश्चर्यचकित चीज़ लगती है। एक बार एक अमेरिकन टीवी या रेडियो शो था, उसने पूछा कि “आपकी जिंदगी में सबसे आश्चर्यजनक चीज़ आपने क्या सुनी है?” तो उसमें किसी ने जवाब दिया कि “कोई हरे कृष्णा हमारे पास आता है (अमेरिकन बोल रहा था) और वे कहते हैं कि भगवान एक नीले ग्वाले हैं! यह सबसे आश्चर्यजनक चीज़ मैंने सुनी हुई है।”
तो यह जो भगवान की संकल्पना है, यह बड़ी अप्रतिम है। क्योंकि क्या है, भगवान यहाँ पर ऐश्वर्य में नहीं रह रहे हैं, भगवान बड़ी सरलता में रह रहे हैं। भगवान निसर्ग के साथ, जो निसर्ग में सौंदर्य है, सरलता है, उसके साथ समन्वय के साथ रह रहे हैं। तो यहाँ भगवान तो गोपाल हैं, पर यहाँ बड़े छोटे हैं। उनका चेहरा, उनका जो वर्ण है नीला है, और उनके जो बाल हैं, बड़े सुंदर हैं। और उनका एक नाम है ‘केशव’, जो आप अभी गा रहे थे—’केशव’। तो केशव के अलग-अलग अर्थ हैं, पर एक अर्थ है कि ‘जिनके केश (बाल) बड़े सुंदर हैं’।
तो ऐसे जो भगवान हैं—वृतं कुन्तलैः स्निग्ध-रक्तैश्च गोप्या—उनके बाल बड़े ही कोमल हैं, बड़े ही सिल्की, जो हैं बड़े ही कोमल और बड़े आकर्षक हैं। तो ऐसे जो भगवान का रूप है, वह बता रहे हैं। पर इसमें भगवान के चेहरे पर… वह बता रहे हैं, पर चेहरे पर एक विशेष मार्क है, एक विशेष लक्षण है, वह अगली पंक्ति में है। तो इसके आगे गाते हैं:
इदं ते मुखाम्भोजमत्यन्तनीलै-
र्वृतं कुन्तलैः स्निग्ध-रक्तैश्च गोप्या ।
मुहुश्चुम्बितं बिम्ब-रक्ताधरं मे
मनस्यविरास्तामलं लक्ष-लाभैः ॥ ५ ॥
चुंबन… अभी वे चुंबन नहीं कर रहे हैं, अभी उन्होंने बाँध के रखा है कृष्ण को। पर क्या है, उन्होंने पहले जब कृष्ण उठे थे, कृष्ण खेल रहे थे, कृष्ण के पास आए, जब कृष्ण उनके स्तन से दूध पी रहे थे… कृष्ण उस समय बहुत छोटे थे। तो फिर जब कृष्ण स्तन से दूध पी रहे थे, तो यशोदा मैया देख रही थीं, इतना सुंदर कृष्ण लग रहे थे कि उन्होंने कृष्ण को उठा लिया।
और यहाँ जो लक्षण देखकर कि भगवान और भक्त कितना एक व्यक्तिगत, एक पर्सनल (personable) रिलेशनशिप जो है, यह देखकर क्या हो रहा है, सत्यव्रत मुनि पूरे भाव-विभोर हो रहे हैं। हम सब इस भौतिक जगत में प्रेम के अभिलाषी होते हैं। अलग-अलग लोग अलग-अलग चीज़ें प्राप्त करते हैं—कोई बहुत धनवान बनना चाहता है, कोई बहुत रूपवान बनना चाहता है, कोई बहुत अच्छी तरह से कांटेक्ट चाहता है, कोई बहुत स्मार्ट बनना चाहता है। हम अलग-अलग चीज़ें चाहते हैं। जिस बात से हम सब उस प्रेम के कुछ, उस स्नेह के, उस रिश्ते के कुछ लक्षण-चिह्न चाहते हैं। अलग-अलग लोगों के लिए अलग-अलग चीज़ें महत्वपूर्ण होती हैं।
पर जब इस तरह से किसी के स्नेह का हमें कुछ मूर्तिमान स्वरूप दिखता है—मान लीजिए यहाँ किसी का जन्मदिन है, और उस दिन कोई भेंट भेजता है, तो फिर क्या है? वस्तु है जो उस स्नेह को उतारती है। या फिर कोई अच्छा कार्ड लिखकर भेजता है, उस पर कोई अच्छा संदेश भेजता है, तो फिर वह भी एक स्वरूप है। तो क्या है कि वह उद्दीपन बन जाती है।
उद्दीपन का अर्थ क्या है? उद्दीपन is Spiritual stimulus. इसलिए भौतिक जगत में किसी को जैसे क्रिकेट से बहुत आकर्षण है, और वहाँ पर एक क्रिकेटर का चित्र देखते हैं—बड़े मैच में उसने सिक्सर मार के मैच जीत लिया है—वह देखते हैं तो तुरंत उसकी स्मृति चालू हो जाती है। तो उसी तरह से क्या है, वह एक तरह से भौतिक उत्तेजना (stimulus) है। तो हमें आध्यात्मिक जगत में भी, आध्यात्मिक क्षेत्र में भी भगवान की स्मृति करने के लिए अलग-अलग उद्दीपन प्रेरित कर सकते हैं।
तो किसी को एक… कोई लीला बड़ी आकर्षक, भगवान की लीला आकर्षक लगती है—कालिया-दमन, भगवान करते हैं कालिया पर नाचते हुए, लीला अलग आकर्षक लगती है—तो वह चित्र देखते हैं, तो उससे जो भगवान के लिए अलग विचार चालू हो जाते हैं। तो यह सत्यव्रत मुनि के लिए है, तो वह उनके लिए प्रेम का लक्षण है। वह दोनों के लिए प्रेम का लक्षण है, पर सत्यव्रत मुनि के लिए क्या है? यह एक भक्ति में उद्दीपन है कि कितना यह व्यक्ति… कितना प्रेम है कि भगवान और उनके भक्तों में! और वह देखकर… अलग-अलग चीज़ों के कितने भी लाभ मिल जाएँ, उससे क्या संतुष्टि है वास्तव में? यही सर्वश्रेष्ठ है, यही सर्व-महत्वपूर्ण है। क्यों यह सबसे महत्वपूर्ण है? क्योंकि जब भगवान की स्मृति होती है, तो भगवान अनंत हैं, तो भगवान की स्मृति में आनंद भी अनंत है!
तो हम सबके सामने भी अलग-अलग उद्दीपन हैं। इसमें क्या है, तीन चीज़ें होती हैं: एक है यह उद्दीपन का जब हम उपयोग करते हैं… क्या है?
There is the perceiver, there is the perception, and then there is the recollection.
कि जो व्यक्ति देखने वाला है, जो देखना है, सुनना है, इस सब को अनुभव करने वाला है—जो सचेत व्यक्ति है, जो अनुभव करता है, और फिर अनुभव करने की वस्तु है। तो अभी यह अनुभव करने की वस्तु से अनुभव कब आता है? जब हृदय में भक्ति होती है।
तो कैसे हैं यहाँ? दो चीज़ें हैं:
The spiritual stimuli are both — they are the activators of devotion and they are activated by devotion.
दोनों हैं यह। मतलब कैसे हैं? कि भगवान के सुंदर मंदिर के घर में आएँगे, तो अगर हृदय में थोड़ी भक्ति है, तो वह देखकर आकर्षण जाग्रत होता है। तो अगर किसी को विश्वास ही नहीं है, श्रद्धा नहीं है… तो यह पुनः हम दोहराएँगे:
मुहुश्चुम्बितं बिम्ब-रक्ताधरं मे मनस्यविरास्तामलं लक्ष-लाभैः ॥
यहाँ पर क्या हो रहा है अभी? अभी जब स्मृति होती है, तो किसकी स्मृति होती है, कैसे होती है? कि जब हम किसी व्यक्ति को, किसी चीज़ को एक संदर्भ में देखते हैं… Absorption is a function of connection. जब हम किसी चीज़ में मग्न हो जाते हैं, तो एक तस्वीर से क्या होता है—”अरे, वह मैच में ऐसे हुआ था, अरे यह प्लेयर ने ऐसे किया था, वह ऐसे किया था।” तो Absorption is a function of connection. जो चीज़ हम देखते हैं, उसको जितना हम दूसरी स्मृतियों से जोड़ सकते हैं, उतना हम उसमें एकाग्र हो जाते हैं।
तो यहाँ पर क्या हो रहा है? वे भगवान के इस रूप को देख रहे हैं, और फिर इस श्लोक में वे क्या कर रहे हैं? वे भगवान को अलग-अलग नामों से संबोधित कर रहे हैं। और अलग-अलग नामों से वे क्या दिखा रहे हैं कि वे यह जो चित्र है, यह जो अप्रतिम प्रतिमा जो है, उसको देखकर दर्शन कर रहे हैं वे। वह उससे याद कर रहे हैं कि यह वास्तव में कोई साधारण नहीं है, यह भगवान हैं!
तो नमो… अब यह ‘नमो’ जो है, यह बार-बार नहीं आता है इस श्लोक में, क्योंकि यह बहुत ही अंतरंग लीला है। तो पहले इसमें आया था—नमो ईश्वरम्। तो जब भगवान के बहुत ही मधुर रूप के बारे में चर्चा हो रही है, तो उस समय यशोदा मैया भगवान को प्रणाम नहीं करतीं, वह असाधारण हो जाएगा। क्योंकि क्या है, उनके माँ के रूप में… पर जब हम कोई भी चीज़ समझते हैं, तो क्या होता है? कभी उसको बहुत करीब जाकर हम देखते हैं, और कभी उसको दूर जाकर देखते हैं।
यह अगर मैं यहाँ पर आके कहूँगा कि मैं अभी एक प्रवचन दूँगा कैसे अलास्का में जो भालू हैं, उनकी जनसंख्या कम हो रही है। यह क्या संबंध है इसका? अगर मैं ऐसे “इस साल में इतने संख्या थे, इतने संख्या कम हो गई, इतने संख्या कम है”, मुझे लगेगा… पर मैं बोलूँगा, और फिर यह जनसंख्या कैसे कम हो रही है, इससे मैं फिर बताऊँगा कि इस प्रवचन से आजकल के पर्यावरण में बहुत उपद्रव हो रहा है। और यह पर्यावरण में उपद्रव इसलिए हो रहा है क्योंकि हम… हमारे अंतरंग पर्यावरण में संतुलन आ जाएगा।
तो क्या है कि एक है Specific Facts, और दूसरा है Universal Principles। तो अगर केवल हमको Specific Facts मिलते हैं—कुछ यह जानकारी, यह जानकारी, यह जानकारी—तो जानकारी से केवल समझ नहीं आती है। जानकारी इंटरेस्टिंग होती है, पर उससे कुछ समझ नहीं आती है। क्योंकि क्या है, इस जानकारी का महत्व क्या है? तो जानकारी को समझने के लिए क्या है, हमें उच्च स्तर से देखना पड़ता है—इसका महत्व क्या है, इसका अर्थ क्या है? तो वह From Specific Facts to Universal Principles, इसको इंग्लिश में कहते हैं ‘लैडर ऑफ एब्स्ट्रैक्शन’ (Ladder of Abstraction)।
पिछले श्लोक में क्या हुआ है? वह एक बहुत ही विशिष्ट और विशिष्ट दृष्टि को बताया गया है। पर अभी इससे वे ऊपर से दूर से देख रहे हैं—बड़ा बिग पिक्चर व्यू (Big picture view), बर्ड्स आई व्यू (Bird’s eye view)। कि यह वास्तव में कुछ आधार है। मान लीजिए किसी ने अपने बच्चे को चुंबन किया है, ऐसे नहीं है, यह बच्चा कोई बड़ा ही अप्रतिम है।
तो इस श्लोक में क्या है, वह बिग पिक्चर व्यू, बर्ड्स आई व्यू—जैसे होता है कि एक पक्षी ऊपर से देखता है, तो क्या होता है? वह पूरा चित्र देखता है। तो वैसे दूरदृष्टि क्या है कि यह जो बालक हैं—नमो देव—जो हैं, यह भगवान हैं!
तो ‘देव’ एक शब्द के अलग-अलग अर्थ होते हैं:
- ‘देव’ का एक अर्थ होता है कि जैसे दिया होता है, जैसे अभी दिवाली पर बाहर दिया लगाया हुआ है, तो जो ज्योतिपूर्ण होते हैं उन लोगों को देव कहते हैं।
- ‘देव’ का एक दूसरा अर्थ होता है कि जो देते हैं, जो वरदान देते हैं उनको देव कहते हैं।
- ‘देव’ का एक अर्थ होता है कि जो दैवी प्रवृत्ति के होते हैं उनको देव कहते हैं।
तो यह जो हैं, देव हैं। न केवल यह देव हैं, यह देवों के देव हैं—नमो देव दामोदर।
तो यहाँ पर क्या हो रहा है? दोनों जो नाम हैं, चुने हुए हैं, दो से ही हैं नाम—नमो देव दामोदर। पर भले ही बाँध दिए गए हैं, अभी भी वे सीमित नहीं हैं, वे क्या हैं? अनंत हैं—नमो देव दामोदर अनन्त!
और किसमें अनंत हैं वे? अगर अनंत मतलब कहेंगे कि वहाँ उसकी कोई सीमा नहीं है, पर हम कभी कह सकते हैं कि यह तो सागर अनंत है, पर फिर भी सागर अनंत नहीं होता है, उसका अंत होता है। पर यहाँ पर यह इतने अनंत हैं कि वे क्या हैं? वे ‘विष्णु’ हैं—अनन्त विष्णो!
अब ‘विष्णु’ हम साधारणतया सोचते हैं कि जो शंख-चक्र-गदा-पद्म पहने धारण किए हुए जो व्यक्ति हैं, उनको विष्णु कहते हैं, वह सत्य है। पर ‘विष्णु’ इस शब्द का एक अर्थ भी है। विष्णु का अर्थ है कि ‘विश्व के हर अणु में जो व्याप्त हैं, उन्हें विष्णु कहते हैं’, जो सर्वव्यापी हैं, विश्व के हर अणु में हैं।
तो यह भगवान कितने अनंत हैं! केवल मात्रा के लिए नहीं हैं, यह सही में अनंत हैं। जितनी भी अस्तित्व की व्याप्ति है, पूरे अस्तित्व में हैं। और ऐसे भगवान बाँध दिए गए हैं! तो उनको मैं नमन करता हूँ—नमो देव दामोदर अनन्त विष्णो।
तो यह लीला का महत्व है। असीमित भगवान, वे बाँध दिए गए हैं। उसका इन चार नामों के द्वारा बड़े ही ज्ञान और सौंदर्य के साथ वहाँ पर उसका उल्लेख होता है।
और यह भगवान इस तरह से इतने भक्ति से बँध जाते हैं, इतने कृपालु हैं वे अपने भक्तों के प्रति कि वे भक्त से बँध गए हैं—प्रसीद प्रभो दुःख-जलाब्धि-मग्नम्।
तो वहाँ पर तो एक आनंद का कुंड है, आनंद कुंड में सब लीन हो रहे हैं, सब मग्न हो रहे हैं। पर यहाँ पर क्या है—दुःख-जलाब्धि! यह इस भौतिक जगत क्या है? दुखों से भरा हुआ है—दुःख-जलाब्धि! ‘अब्धि’ मतलब सागर, ‘जल’ मतलब पानी। तो इसमें इस भौतिक जगत… यह एक सागर है, पर यह सागर में क्या है? सागर यह दुखों का सागर है। यह बड़े निराशावादी हैं, क्योंकि लोग कहते हैं “कभी खुशी कभी गम है”। अब ऐसे क्यों कहते हैं दुखों का सागर है? वास्तव में कैसे है कि यह अगर कोई सोचता है कि दुखों का सागर नहीं है, इसका विश्लेषण हम तीन पद्धतियों से कर सकते हैं।
दुख की परिभाषा क्या हो सकती है? दुख की कई लोग अलग-अलग परिभाषा करते हैं, हो सकती है। पर प्रह्लाद महाराज बहुत सुंदर परिभाषा करते हैं। दुख का अनुभव सुंदर नहीं होता है, पर दुख का विश्लेषण सुंदर है। यह क्या कहते हैं? दुख का अनुभव सुंदर नहीं होता है, दुख का अनुभव सुंदर नहीं होता है, दुख का अनुभव सुंदर नहीं होता है, दुख का अनुभव सुंदर नहीं होता है, दुख का अनुभव सुंदर नहीं होता है, दुख का अनुभव सुंदर नहीं होता है, दुख का अनुभव सुंदर नहीं होता है, दुख का अनुभव सुंदर नहीं होता है, दुख का अनुभव सुंदर नहीं होता है, दुख का अनुभव सुंदर नहीं होता है, दुख का अनुभव सुंदर नहीं होता है, दुख का अनुभव सुंदर नहीं होता है, दुख का अनुभव सुंदर नहीं होता है…
कितनी सारी आज कई दिन में अगर आप गिनोगे, तो कितनी सारी अप्रिय चीज़ें आपकी ज़िंदगी में हो गई होंगी। तो कहते हैं कि यह टू-पॉइंट डेफिनेशन (Two-point definition) है। अप्रिय चीज़ें… दुख की परिभाषा क्या है कि जो मुझे प्रिय है वह नहीं मिलता है, मुझे जो अप्रिय है वह मिलता है।
तो उस परिभाषा से हम सब सब लोग जगत में दुखी हैं। पर कोई कहेगा—”पर मैं मेहनत करता हूँ और कभी-कभी मुझे जो प्रिय है वह मिल भी जाता है, तब तो मैं सुखी हो जाऊँगा?” पर वे कहते हैं—नहीं! जब ऐसे होता है: दुःखौषधं तदपि दुःखम्। कभी-कभी ऐसे होता है जो प्रिय है वह मिल जाता है, और उसके कारण ही दुख होता है! कई बार ऐसे होता है कि हम चाहते हैं कि मुझे यह चीज़ मिल जानी चाहिए, यह पद मिल जाना चाहिए, यह संबंध बढ़ना चाहिए, ऐसे होना चाहिए, वैसे होना चाहिए… प्राप्त करते हैं, और कई बार ऐसे होता है कि वही चीज़ हमारे दुख का कारण बन जाती है! अब यह हर बार होगा ऐसे ज़रूरी नहीं है, पर ऐसे होता है कई बार।
तो यहाँ पर ऐसे कहने का भाव क्या है कि यह मत सोचो कि सिर्फ आपको जो चीज़ चाहिए वह प्राप्त हो जाएगी, तो उससे आपको सुख मिल जाएगा, ज़रूरी नहीं है ऐसे। कभी-कभी जो चीज़ प्राप्त हो जाएगी, तो उससे… प्राप्त हो जाएगी तो उससे… प्राप्त हो जाएगी तो उससे… प्राप्त हो जाएगी तो उससे… प्राप्त हो जाएगी तो उससे… प्राप्त हो जाएगी तो उससे… प्राप्त हो जाएगी तो उससे… प्राप्त हो जाएगी तो उससे…
तो इसलिए ऐसे नहीं है कि हमें जो चाहिए उसकी इच्छा नहीं करनी चाहिए, जो प्रिय है उसकी इच्छा नहीं करनी चाहिए, उसके प्रयास नहीं करने चाहिए। पर यहाँ भाव रखना कि यह प्राप्त हो जाने से मुझे सुख मिल जाएगा, वह भाव जो है, वह भ्रांत है। जो बोले—”मेरी प्रणाली अच्छी नहीं है, नहीं मेरी प्रणाली अच्छी है, प्रयास नहीं परिणाम चाहिए”, वे बहुत ही माँगते हैं जगत में।
पर हम सबको जानना चाहिए जीने के लिए कि यह सुख का बंद नहीं है। Happiness comes not by making money, but by making something worthwhile with money. यह पैसे बनाने से… पैसा सार्थक सबको ज़रूरी होता है, पर पैसे से सुख नहीं होता है। आप पैसे के साथ क्या कर रहे हो, पैसा आप किस तरह से इस्तेमाल कर रहे हैं, उस से सुख मिलता है।
यहाँ पर बता रहे हैं कि दुःख-जलाब्धि-मग्नम्। यह हम सब दुखों के सागर में… मैं कह रहा हूँ कि हे प्रभो, मैं दुख के सागर में मग्न हूँ। और प्रसीद प्रभो—हे कृपा करो प्रभो, आप मुझ पर कृपा करो। यह क्या कृपा करो? वह अगली पंक्ति में बताएँगे। तो हम आते हैं, अगली पंक्ति आते हैं:
नमो देव दामोदर अनन्त विष्णो
प्रसीद प्रभो दुःख-जलाब्धि-मग्नम् ।
कृपा-दृष्टि-वृष्ट्याति-दीनं बतानु-
गृहाणेष मामज्ञमेध्यक्षि-दृश्यः ॥ ६ ॥
तो कृपा-दृष्टि-वृष्ट्या—हे प्रभो, आपकी कृपा-दृष्टि मुझ पर बरसाओ! वृष्ट्याति-दीनं बतानु… मैं बहुत ही पतित हूँ।
अभी कोई व्यक्ति जब मान लीजिए जो हम भगवान के पास जाते हैं, तो एक भक्ति और पुण्य में भाव अलग होता है। जब हम पुण्य करते हैं, तो पुण्य एक तरह से भगवान से हम धंधा कर रहे हैं—”मैं तुम्हारी यह पूजा करूँगा, तुम मुझे यह दो।” तो यह एक बिजनेस के समान है। तो वह भी अच्छा है, कम से कम भगवान से संबंध तो है। पर भक्ति में जो भाव होता है, वह एक बिजनेस का भाव नहीं होता है, वह एक सेवा और याचना का भाव होता है।
तो यहाँ साधारणतया जब कोई गरीब व्यक्ति किसी अमीर व्यक्ति से माँगता है, तो तीन चीज़ें होती हैं साधारणतया। फिर बताते हैं कि आप कितने धनवान हो, आप कितने दानवीर हो—व्यक्ति का गुणगान होता है। दूसरा फिर होता है कि मैं कितनी बुरी परिस्थिति में हूँ—हमारे घर कुछ खाना नहीं है, हमारा घर टूट रहा है, मेरे बच्चे भूखे हैं, यह है, वह है—खुद की दयनीय अवस्था बताते हैं। और फिर तीसरे में कुछ याचना करते हैं कि “आप कुछ प्रभाव में मुझे दे दें।”
तो इस तरह से जो है, जब भगवान से प्रार्थना करते हैं भक्त, तो आप कई बार यह तीन भाव देखेंगे कि भगवान का गुणगान—”आप कितने महान हो!” तो अभी नमो देव दामोदर अनन्त विष्णो—यह जो है, भगवान का गुणगान था। और फिर वह अपने दयनीय…
कुछ लोग कहते हैं कि भगवान की कृपा-दृष्टि से धन मिल जाएगा, ऐश्वर्य मिल जाएगा। वह कृपा-दृष्टि, वह भी एक कृपा है भगवान की। पर भगवान की सबसे बड़ी कृपा यह है कि वे हमें इस भव-सागर से उठा लेते हैं। और भव-सागर से कैसे उठाते हैं? हमारी आसक्ति को उठाते हैं। हमारी आसक्ति जगत से लगी हुई है, जब भगवान की कृपा-दृष्टि से हमारी ओर देखते हैं, तो फिर उसके द्वारा भगवान के प्रति आकर्षण जाग्रत हो जाता है। भगवान की कृपा-दृष्टि से उनका सौंदर्य, उनका ऐश्वर्य, उनकी जो मधुरता है, हमारे हृदय में जाग्रत हो जाती है। उससे क्या होता है फिर?
गृहाणेष मामज्ञम्—अज्ञम् मतलब अज्ञानी। “मैं अज्ञानी हूँ कि मैं इन आँखों से आपको देख सकूँ।” अभी तक सत्यव्रत मुनि कैसे देख रहे हैं? अपने मन से चिंतन कर रहे हैं। क्योंकि हमारे मन की भी एक आँखें होती हैं। जब किसी व्यक्ति से बड़ा स्नेह या प्रेम का संबंध होता है, तो व्यक्ति दूर भी हो जाएगा, तो हम आँखें बंद कर लेंगे, तो उस व्यक्ति का चित्र हमारे मन में आता है। तो फिर अभी तक वे मन की आँखों से देख रहे हैं, पर वे चाह रहे हैं कि “हे प्रभो, आप कृपया मेरे सामने आ जाओ और मुझे आप दर्शन दीजिए!”—कृपा-दृष्टि-वृष्ट्याति-दीनं बतानुगृहाणेष मामज्ञमेध्यक्षि-दृश्यः।
एक और आगे आते हैं:
कुबेरात्मजौ बद्ध-मूर्त्यैव यद्वत्-
त्वया मोचितौ भक्ति-भाजौ कृतौ च ।
तथा प्रेम-भक्तिं स्वकां मे प्रयच्छ
न मोक्षे ग्रहो मेऽस्ति दामोदरेह ॥ ७ ॥
तो भगवान जब एक कार्य करते हैं, तो उससे अनेक उद्देश्य साध्य करते हैं। तो एक तरह से यहाँ पर बन जाते हैं… अगर पिछले श्लोक में बताया उन्होंने कि यह भगवान अभी भी अनंत हैं। नहीं, वे दामोदर हैं, फिर भी अनंत हैं, उनकी शक्ति सीमित नहीं है। तो अभी उसका प्रमाण दे रहे हैं—कैसे अगर यह बँधे हुए हैं, खुद को बाँधे हुए हैं, वे छुड़ा भी नहीं सकते हैं, तो कैसे वे अनंत हैं, कैसे वे सीमित नहीं हैं? तो वह एक उसके बारे में जो प्रसंग हुआ, उसके बारे में बता रहे हैं। कृष्ण लीला है, कुछ बहुत कुछ प्रमाण दे रहे हैं, कुछ बहुत कुछ प्रमाण दे रहे हैं, कुछ बहुत कुछ प्रमाण दे रहे हैं, कुछ बहुत कुछ प्रमाण दे रहे हैं, कुछ बहुत कुछ प्रमाण दे रहे हैं, कुछ बहुत कुछ प्रमाण दे रहे हैं, कुछ बहुत कुछ प्रमाण दे रहे हैं, कुछ बहुत कुछ प्रमाण दे रहे हैं, कुछ बहुत कुछ प्रमाण दे रहे हैं, कुछ बहुत कुछ प्रमाण दे रहे हैं, कुछ बहुत कुछ प्रमाण दे रहे हैं, कुछ बहुत कुछ प्रमाण दे रहे हैं, कुछ बहुत कुछ प्रमाण दे रहे हैं, कुछ बहुत कुछ प्रमाण दे रहे हैं, कुछ बहुत कुछ प्रमाण दे रहे हैं, कुछ बहुत कुछ प्रमाण दे रहे हैं, कुछ बहुत कुछ प्रमाण दे रहे हैं, कुछ बहुत कुछ प्रमाण दे रहे हैं, कुछ बहुत कुछ प्रमाण दे रहे हैं, कुछ बहुत कुछ प्रमाण दे रहे हैं, कुछ बहुत कुछ प्रमाण दे रहे हैं, कुछ बहुत कुछ प्रमाण दे रहे हैं, कुछ बहुत कुछ प्रमाण दे रहे हैं, कुछ बहुत कुछ प्रमाण दे रहे हैं, कुछ बहुत कुछ प्रमाण दे रहे हैं, कुछ बहुत कुछ प्रमाण दे रहे हैं, कुछ बहुत कुछ प्रमाण दे रहे हैं, कुछ बहुत कुछ प्रमाण दे रहे हैं, कुछ बहुत कुछ प्रमाण दे रहे हैं, कुछ बहुत कुछ प्रमाण दे रहे हैं, कुछ बहुत कुछ प्रमाण दे रहे हैं, कुछ बहुत कुछ प्रमाण दे रहे हैं…
तथा प्रेम-भक्तिं स्वकां मे प्रयच्छ ।
न मोक्षे ग्रहो मेऽस्ति दामोदरेह ॥
“इस तरह से आप मुझे प्रेम-भक्ति प्रदान करो।” तो यहाँ पर दो इच्छाएँ हो रही हैं। पिछले श्लोक में इच्छाएँ हो रही हैं कि आप कृपा दिखाओ मुझे और आपका दर्शन दो। यह तो बहुत बड़ी चीज़ माँग रहे हैं। मान लीजिए अगर आप कार में ड्राइविंग कर रहे हैं और कार पर कोई भिखारी नॉक करता है—”क्या चाहिए?”—”आप एक कार दे दो न मुझे!”—”क्या? यह तो मेरी ज़रूरत है, कैसे एक कार दे दो मुझे?”
तो पिछले श्लोक में बोलते हैं कि जब उनको लगता है सत्यव्रत मुनि को कि “मैंने बहुत बड़ी चीज़ माँग ली है—हे भगवान, आप मुझे दर्शन दे दो! तो मेरी पात्रता क्या है दर्शन प्राप्त करने की? ठीक है, अगर आप दर्शन नहीं देते मुझे, तो फिर मुझे कम से कम आप आपकी भक्ति प्रदान करो।”
और वे बोलेंगे—”मैं पात्र नहीं हूँ”, तो यहाँ पर उदाहरण दे रहे हैं कि जैसे यह नलकूबर और मणिग्रीव भी पात्र नहीं थे, पर उन्हें आपने… आपने उनको भक्ति प्रदान की, तो मुझे भक्ति प्रदान करो—तथा प्रेम-भक्तिम्। “जैसे उनको भक्ति प्रदान की, वैसे स्वकां मे प्रयच्छ—मैं याचना कर रहा हूँ, मैं प्रयास कर रहा हूँ, यह मेरी अभिलाषा है।”
और फिर कहते हैं कि… और भगवान बोले कि “मैं आपको कुछ और दे देता हूँ”, “नहीं, मुझे…” जब भगवान देते हैं, तो भगवान हमारी इच्छाओं को जज करते हैं। प्रभुपाद जी एक लेक्चर में बोलते हैं कि माया क्या है? माया जो होती है, वह देखती है कि आप भगवान को कितना चाहते हो—How serious are you about Krishna? कि अगर आप भगवान के धाम जाना चाहते हो, तो भगवान के धाम आप सेवा करना चाहते हो, या भगवान को डिस्टर्ब करना चाहते हो—”मुझे यह दो, यह दो, यह दो, यह दो!” तो अगर आपको कुछ और चाहिए, तो भगवान माया के द्वारा वह चीज़ दे देंगे। “और मुझे मोक्ष नहीं चाहिए, मुझे केवल आप ही चाहिए हे भगवान!” बार-बार वे यह भी बता रहे हैं कि बाकी चीज़ नहीं चाहिए है।
अभी साधारणतया जो अधिकांश लोग भौतिक जगत में होते हैं, उनकी भौतिक इच्छा है—मुझे घर चाहिए, मुझे यह-वह चाहिए है। पर जो सत्यवादी/आध्यात्मिक होते हैं, उनको यह भौतिक चीज़ों से प्रलोभन नहीं होता है। पर उनका प्रलोभन क्या होता है? मोक्ष! “इस भौतिक जगत से मुक्ति मिल के जो मुझे शांति प्राप्त करनी है—मोक्ष।” तो वे कहते हैं—वह भी प्रलोभन नहीं है! न मोक्षे ग्रहो मेऽस्ति दामोदरेह।
और फिर यह जो लीला है, इसमें कई बार ऐसा भाव होता है कि हम देखते हैं भक्त, कैसे भी शुद्ध भक्ति के मार्ग में, कि भक्त कुछ याचना भी करते हैं, पर जब वे अपनी प्रार्थना का अंत करते हैं, वह जीवन की परिपूर्णता है। इसलिए आखिरी श्लोक जो है, वह पुनः गुणगान है, वह कोई याचना नहीं है।
इसलिए मान लीजिए, अगर हम किसी से मिलने आते हैं, तो हम उनसे कुछ माँगते हैं। तो ठीक है, अगर वह जो इंटरैक्शन होता है, वह जो बातचीत होती है, वह उसी माँग पर अंत होती है, और अगर वे नहीं देते हैं, तो फिर क्या हमारी उनकी याद पूरी रहती है? उनके बारे में याद अच्छी नहीं रहती है। और उनका भी याद होता है कि “यह माँग रहा था, मैंने नहीं दिया।” If some request is not fulfilled, then the interaction ends on a bad taste, is it not?
हम किसी से कुछ माँगने जाते हैं और वे ‘नहीं’ बोलते हैं, तो हम किसी को बोलते हैं—”आपकी रिक्वेस्ट के लिए आओ”, और बोलते हैं—”नहीं-नहीं, मैं नहीं आता।” और हम बोलते हैं—”तुम कभी आते नहीं हो”, हम फोन रख देते हैं, तो क्या होगा? वह उस समय तो नहीं आया, पर उससे संबंध भी खराब हो गए। ठीक है, अगर वह नहीं आता, फिर नहीं आ रहा, फिर नहीं आ रहा…
भगवान तो दिव्य हैं, भगवान तो हमेशा हमारे प्रणाम और नमन के योग्य हैं। पर भगवान ही केवल योग्य नहीं हैं, जो भगवान से संबंधित होता है—न केवल लोग हों, जो भक्त भी होते हैं, वे भी महान होते हैं।
नमस्तेऽस्तु धाम्ने स्फुरद्-दीप्ति-धाम्ने
त्वदीयोदरायाथ विश्वस्य धाम्ने ।
नमो राधिकायै त्वदीय-प्रियायै
नमोऽनन्त-लीलाय देवाय तुभ्यम् ॥ ८ ॥
“मैं आपको प्रणाम करता हूँ।” किसको प्रणाम करता हूँ? “न केवल आपको प्रणाम करता हूँ, पर आपको जिस रस्सी ने बाँधा है, उसको भी प्रणाम करता हूँ!”
कई बार जो भक्त होते हैं, जगन्नाथ रथयात्रा में जाते हैं, जगन्नाथ का कोई… उनका कोई वस्त्र होता है, वह हाथ में बाँधते हैं। भगवान से संबंधित छोटी चीज़ें, वे भी पवित्र हो जाती हैं। क्योंकि यह जो रस्सी है, उसका कितना भाग्य है कि वह रस्सी… रस्सी आपको बाँध पाई! नमस्तेऽस्तु धाम्ने।
और स्फुरद्-दीप्ति-धाम्ने—कोई साधारण रस्सी नहीं है, यह बड़ी दिव्य भाग्यवान रस्सी है। हमको इससे दृष्टि हो रही है कि यह रस्सी भी चमक रही है, यह रस्सी स्फुरद्-दीप्ति-धाम्ने—और दीप्ति का धाम है वह।
त्वदीयोदरायाथ विश्वस्य धाम्ने—तो यहाँ पर क्या है? यहाँ पर शब्दों का खेल है—धाम, धाम, धाम! तो पहली पंक्ति में धाम आता है, उसके अंत में धाम आता है, और दूसरी पंक्ति में भी धाम आता है—धाम्ने, धाम्ने! कई बार भक्त गाते हैं तो वह… नमस्तेऽस्तु धाम्ने स्फुरद्-दीप्ति-धाम्ने… ऐसा जाता है वह।
और क्या है? वह ‘धाम’ और ‘धाम’ है। ‘धाम’ मतलब जहाँ पर वह रहता है, ‘धाम’ मतलब रस्सी। तो आपका जो उदर है, आपका जो पेट है, वह विश्व का धाम है! वह कैसे है? कृष्ण जो हैं, उनके एक विस्तारित रूप हैं विश्व, और विश्व के नाभि से, उनके पेट से वह कमल आता है, जिससे सारे विश्व की सृष्टि होती है। तो भगवान विश्व-रूप भगवान बताते हैं कि सारे विश्व में… उनके ही शरीर में होता है। तो इसलिए आपका जो उदर है, जो विश्व का धाम है, उस उदर को इस रस्सी ने बाँध लिया है! तो कितनी अद्वितीय यह रस्सी है! तो उस रस्सी को तो प्रणाम करता हूँ।
और फिर उसके बाद वे कहते हैं कि “मैं आपको भी प्रणाम करता हूँ।”
नमस्तेऽस्तु धाम्ने स्फुरद्-दीप्ति-धाम्ने त्वदीयोदरायाथ विश्वस्य धाम्ने
नमो राधिकायै त्वदीय-प्रियायै — “मैं उन राधिका को प्रणाम करता हूँ जो आपको बहुत प्रिय हैं!”
तो अभी हम साधारणतया कहते हैं कि इस लीला में तो कृष्ण और यशोदा हैं, तो राधा कैसे आ गईं यहाँ पर? तो इसके दो विश्लेषण हैं:
- संप्रदाय दृष्टिकोण: हम सब भक्ति कर रहे हैं, भक्ति के सनातन संप्रदाय हैं। हम गौड़ीय वैष्णव संप्रदाय में हैं, तो इस संप्रदाय में राधारानी की महिमा के बारे में बहुत भक्तों को दृष्टांत और साक्षात्कार हैं। तो भक्ति सिद्धांत सरस्वती ठाकुर कहते हैं कि जब कृष्ण को यशोदा मैया बाँध रही थीं, तो वे बाँधने का बहुत प्रयास कर रही थीं। और आप जानते हैं कि जब भक्ति कर रहे हैं, निरंतर बाँधने का प्रयास कर रहे हैं और दो अंगुल छोटा पड़ता है, तो यह जानकर सारे वृंदावन में महिमा फैल जाती है। निरंतर वे जो प्रयास करते हैं, और फिर तब तो कृष्ण छोटे बालक हैं, राधारानी उनसे बहुत छोटी हैं। राधारानी वृषभानु और राधारानी के साथ आती हैं वहाँ पर। जब सब गोपियाँ अपनी रस्सियाँ देती हैं और वे सब कम पड़ जाती हैं, तब कृष्ण मानते नहीं हैं। तब तभी जो राधारानी होती हैं, अपने बालों से इतने रिबन (फीते) निकाल के देती हैं। और जब यशोदा वह रिबन लगाती हैं, तो फिर कृष्ण बँध जाते हैं! तो यहाँ पर जो है, राधारानी जो हैं, उनका बहुत महत्वपूर्ण रोल है।
- तत्त्व दृष्टिकोण: दूसरी चीज़ बताई है कि राधारानी यह केवल एक व्यक्ति नहीं हैं, राधारानी एक तत्त्व हैं—वे ‘ह्लादिनी शक्ति’ हैं। वे सारी सृष्टि की भक्ति की स्रोत हैं। हममें जो हमारे हृदय में जो भक्ति आती है, वह राधारानी की कृपा से आती है। जो यशोदा के हृदय में भक्ति है, वह भी जो ह्लादिनी शक्ति है, जो राधारानी का मूर्तिमान रूप है, उसके द्वारा आती है। सबकी भक्ति राधारानी से आती है, इसलिए नमो राधिकायै—”मैं उन राधिका को प्रणाम करता हूँ, त्वदीय-प्रियायै—जो आपको बहुत प्रिय हैं और आप जिनको बड़े प्रिय हैं!”
और “हे प्रभो, आप… यह आपकी एक अप्रतिम लीला है, पर ऐसे ही आपकी अनंत लीलाएँ हैं!”—नमोऽनन्त-लीलाय देवाय तुभ्यम्। “आपको प्रणाम करता हूँ तुभ्यम्, जो इस तरह की अनंत लीलाएँ करते हैं!”
और इस प्रकार की लीलाओं में अगर हम स्मरण करने लगते हैं, तो फिर हम अनंत काल तक स्मरण कर सकते हैं, अनंत काल तक हम दिव्यानंद का अनुभव कर सकते हैं। वही आशा करते हैं कि “प्रभो, आपने अनंत लीलाएँ की हैं, मैं उन लीलाओं के स्मरण में ही हमेशा रहना चाहता हूँ।”
एक और बार हम जाएँगे:
नमो राधिकायै त्वदीय-प्रियायै नमोऽनन्त-लीलाय देवाय तुभ्यम्
दामोदर भगवान की जय!
किसी को कोई सवाल है प्रभुजी? तो आपके लिए समराइज कर सकते हैं।