Dana Keli Lila enacted by Lord Chaitanya – Chaitanya Chandrodaya Nataka 3 Hindi
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Lecture Summary
- कवि कर्णपूर रचित ‘दानलीला’ नाटक: इसमें भगवान कृष्ण की दानलीला पर आधारित नाटक का वर्णन है, जिसे श्री चैतन्य महाप्रभु ने अपने पार्षदों के साथ प्रस्तुत किया था।
- नाट्यशास्त्र की उत्पत्ति व उद्देश्य: भरत मुनि रचित नाट्यशास्त्र का निर्माण ब्रह्मा जी ने सभी देवताओं के अनुरोध पर किया था। इसका मुख्य उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि प्रेक्षकों के हृदय में ‘रस’ (आध्यात्मिक अनुभूति) उत्पन्न करना और आत्मा का शुद्धिकरण करना है।
- रसिकता और पात्रता: श्रीमद्भागवत (1.1.3 – पिबत भागवतं रसमालयम्) का आस्वादन वही कर सकता है जो ‘रसिक’ और ‘भावुक’ (पात्र) है। आत्मज्ञानी व आत्माराम मुनि भी भगवान के अलौकिक गुणों से आकर्षित होकर भक्त बन जाते हैं।
- भगवान की लीलाओं का तत्त्वज्ञान: भगवान की अंतरंग लीलाएँ बाह्य रूप से सांसरिक प्रतीत हो सकती हैं, इसलिए आचार्यगण उन्हें हर किसी के सामने प्रकट करने से मना करते हैं। बिना पृष्ठभूमि और तत्त्वज्ञान समझे लीलाओं को देखने से दुर्योधन की भांति भ्रम (जैसे भगवान के विश्वरूप को जादू-टोना समझना) हो सकता है।
- अद्वैत आचार्य का स्वरूप: अद्वैत आचार्य वास्तव में महाविष्णु और सदाशिव के संयुक्त अवतार हैं। वे भगवान (हरि) से अभिन्न हैं और उन्होंने नाटक में एक प्रमुख भूमिका निभाई।
- चैतन्य महाप्रभु की परम कृपा और पात्रता का नियम: महाप्रभु परम कृपालु हैं, पर भक्ति में प्रवेश के लिए नियम न होने पर भी भक्ति में स्थिर रहने के लिए तृणादपि सुनीचेन… जैसे उच्च स्तर की पात्रता आवश्यक है।
- प्रश्नोत्तर सार:
- शिवजी की पूजा: तमोगुणी लोग भौतिक लाभ के लिए ब्रह्मांड के अंतर्गत शिव की पूजा करते हैं, जबकि शुद्ध भक्त सदाशिव को वैष्णवों में श्रेष्ठ (वैष्णवानां यथा शम्भुः) मानकर प्रणाम करते हैं।
- वाल्मीकि रामायण में राम जी का स्वरूप: वाल्मीकि रामायण का मुख्य उद्देश्य राम जी को एक ‘आदर्श मानव’ व ‘धर्मपालक’ के रूप में प्रस्तुत करना है, इसलिए वहाँ उनके ऐश्वर्य के स्थान पर धर्म-पालन को मुख्यता दी गई है।
- जीव की स्वेच्छा और ईश्वर का प्रेम: भगवान ने जीव को स्वेच्छा (Free will) दी है ताकि वह वास्तविक प्रेम का अनुभव कर सके। स्वेच्छा का दुरुपयोग करने पर जीव स्वयं उत्तरदायी होता है, फिर भी भगवान परमात्मा (अंदर) और गुरु-साधु-शास्त्र (बाहर) के रूप में उसका मार्गदर्शन करते रहते हैं।
Full Transcription
कवि कर्णपूर ने लिखा है, इसमें तीसरा अध्याय है—’दानलीला’। दानलीला यह भगवान कृष्ण की एक लीला है और इसका एक नाट्यात्मक स्वरूप से, एक नाटक इसके आधार पर चैतन्य महाप्रभु करते हैं और उसके बारे में जो वर्णन है, वह इस अध्याय में किया गया है।
तो इसमें मैं, यह लीला उठाने के पहले… नाट्यशास्त्र, यह एक पूरी परंपरा है वैदिक शास्त्र में। वैदिक संस्कृति में हम सोचते हैं नाटक मतलब कि कोई प्रवचन है, उसके पहले कोई दो-चार-आठ एक्टर ले लो—तुम यह भूमिका बनाओ, तुम यह भूमिका बनाओ, तुम यह भूमिका बनाओ—और उसको नाटक कह लेते हैं! वैदिक शास्त्र में नाट्यशास्त्र है, यह एक पूरा विज्ञान है। और उसमें बताया गया है… जो भरत मुनि ने नाट्यशास्त्र लिखा है, एक ग्रंथ लिखा है, और उसमें बताया गया है कि कैसे सभी देवी-देवता एक बार सब देवतागण ब्रह्मा जी से मिलने गए। और उन्होंने ब्रह्मा जी से कहा कि “हम चाहते हैं कि आप हमें एक ऐसे प्रकार के मनोरंजन के बारे में उपदेश कीजिए जो न केवल श्रवण हो, पर जो हम देख भी सकें, जो हम सहभाग भी हो सकें, और जो एक साथ-साथ मनोरंजन भी करे और हमारे आत्मा का शुद्धिकरण भी करे!”
और तभी ब्रह्मा जी नाट्यशास्त्र का उपदेश देते हैं। और नाट्यशास्त्र का उपदेश है कि जो प्रेक्षकगण हैं, उनके हृदय में रस उत्पन्न करना।
शास्त्र का उपदेश… साधारणतया हम आध्यात्मिक विषय देखते हैं तो क्या होता है कि भावनाएँ बंधन का कारण बनती हैं, तो इसलिए “अनासक्त हो जाओ।” शास्त्र देखते हैं और भागवत में देखते हैं कि व्यक्ति जो अनासक्त होता है, वह भावनाओं से बाहर निकल सकता है। पर जो नाट्यशास्त्र जो है, उसका उद्देश्य है कि व्यक्ति के हृदय में भावनाएँ बंधन… और यह पूरा ज्ञान है कि इस प्रकार के प्रसंग, इस प्रकार के अभिनय उपयोग करने से, प्रयोग फैलाने से क्या भावना उत्पन्न हो जाए।
यह किसमें उत्पन्न होती है? यह सब में उत्पन्न नहीं होता है। जो भावनाएँ अनुभव करनी हैं, वह भावनाएँ अनुभव करने के लिए एक व्यक्ति को पात्रता चाहिए। जो व्यक्ति पात्र है, जो ‘रसिक’ है, वही रस अनुभव कर सकता है।
और इसलिए भागवत जो है, यद्यपि एक तत्त्वज्ञान का ग्रंथ है… भागवतम का जो पहला श्लोक है, वह क्या कहता है? वह वेदांत के भाव में है—धीमहि। उसका पहला श्लोक, उसका अंत कैसे होता है? सत्यं परं धीमहि। धीमहि मतलब मनन करो, चिंतन करो—”यह परम सत्य है, उसके बारे में चिंतन करो।”
पर उसी भागवतम का तीसरा श्लोक क्या है?
निगमकल्पतरोगैलितं फलं शुकमुखadamृतद्रवसंयुतम् ।
पिबत भागवतं रसमालयं मुहुरहो रसिका भुवि भावुकाः ॥
कि जो रस है, पियो और रसिक बन जाओ! तो यह दो हैं वास्तव में—यह पहला श्लोक है धीमहि और तीसरा श्लोक है रसिक बन जाओ। यहाँ वास्तव में जो शुकमुखाद् भागवतम का उद्देश्य है, वह दर्शाता है। शुकमुखाद् भागवतम एक तरह से विश्लेषण की तरह… शुकदेव गोस्वामी के आत्मचरित्र हैं। आत्मचरित्र वह उनके जीवन के प्रसंगों के आधार पर नहीं है। शुकदेव गोस्वामी पहले से ही आत्मसाक्षात्कारी थे, पर वे बाद में भगवद्भक्त बने। इसलिए वह प्रसिद्ध श्लोक आता है:
आत्मरामाश्च मुनयो निर्ग्रन्था अप्युरुक्रमे ।
कुर्वन्त्यहेतुकीं भक्तिमित्थम्भूतगुणो हरिः ॥
कि जो आत्माराम हैं, जो आत्मसंतुष्ट हैं, वे भी भगवान की ओर आकर्षित हो जाते हैं! इसलिए भगवान के गुण कितने अद्भुत हैं—इत्थम्भूतगुणो हरिः। तो जो लोग जो महान मुनिगण हैं, जो किसी भौतिक रूप से… भौतिक रंग, भौतिक भावनाओं से आसक्त नहीं होते हैं, वे भी भगवान के गुणों से आसक्त होते हैं। इसलिए भगवान के गुण भौतिक नहीं हो सकते हैं।
लीलादर्शन हेतु पात्रता और आचार्यों का दृष्टिकोण
तो कहते हैं—”मैं आज यह नाटक देखने आ नहीं पाऊँगा, क्योंकि मैं तो गोस्वामी नहीं हूँ। मैंने इंद्रियों का निग्रह नहीं किया है।” और ऐसे करके सब भक्त वही बोलने लगते हैं—श्रीवास पंडित, नित्यानंद प्रभु… पर ऐसे कहते हैं, चैतन्य महाप्रभु कहते हैं कि “अगर आप नहीं आओगे, तो मैं यह नाटक करूँगा किसके सामने? तो आपको आना चाहिए।” वे कहते हैं—”पर आपने कहा कि केवल जो गोस्वामी हैं, वही आएँ।” वे कहते हैं कि “भगवान कृष्ण की कृपा से आप आज गोस्वामी बन जाओगे। वास्तव में आप गोस्वामी ही हो, आपकी नम्रता है कि आपको लगता है कि आपने इंद्रियों का निग्रह नहीं किया। पर ऐसा हुआ भी हो, भगवान कृष्ण की कृपा से आप गोस्वामी बन जाओगे।”
क्यों गोस्वामी बनना आवश्यक है? क्योंकि जो भगवान की लीलाएँ हैं, वे बाह्य रूप से भौतिक लीलाओं जैसी लगती हैं। प्रतिबिंब के बारे में… तो एक दुर्भाग्य है कि जो असली आम है उसको भूल के जो प्रतिबिंब है उसकी ओर जाना। प्रतिबिंबित आम है नदी में, उसमें कूद के उसको ढूँढना यह दुर्भाग्य है। प्रतिबिंबित आम को सत्य समझना यह एक दुर्भाग्य है, पर असली आम को प्रतिबिंबित आम समझना, बहुत बड़ा दुर्भाग्य है!
तो इसलिए उसको समझने के लिए पात्रता लगती है। तो इसलिए हमारे आचार्यगण ने बताया है कि जो लीलाएँ हैं इस तरह से, वे सब के सब के सामने प्रदर्शित नहीं करने जाएँ, खास करके जो अंतरंग लीलाएँ हैं। आचार्यगण के अनुसार पात्रता लगती है।
तो क्या करते हैं? उसमें अगर दो… कृष्ण और यशोदा मैया हैं, तो वे अपने हाथ हिलाते हैं, पैर हिलाते हैं, यशोदा मैया डाँट रही होती हैं, कृष्ण माफी माँग रहे होते हैं—तो इसमें कोई कुछ बोलता नहीं है, सिर्फ वह चेहरों का हाव-भाव है। अगर पहले से लीला पता नहीं है, तो सिर्फ यह हाव-भाव हिला रहे हैं—क्या कर रहे हैं, कुछ समझ नहीं आएगा।
तो उसी तरह से जो बताते हैं कि भगवान की लीला को हम देखते हैं, तो उसके पहले हमें वह लीला क्या है, उसकी पृष्ठभूमि क्या है, उसका तत्त्वज्ञान क्या है—यह समझना ज़रूरी है। अगर वह नहीं पता होगा, तो नटो नाट्यधरो यथा—तो जो एक अज्ञानी व्यक्ति है, वह जैसे भरतनाट्यम जैसा नृत्य देखता है, उसे कुछ समझ में नहीं आता है, वैसे ही हमें भगवान की लीला समझ में नहीं आएगी।
और वही हुआ दुर्योधन के साथ! दुर्योधन ने भगवान का योगेश्वर के रूप में विराट रूप भी देखा, उन्होंने देखा कैसे विश्वरूप भगवान ने दिखाया है, पर उसने क्या कहा? “यह तो जादू-टोना कर रहे हैं!” नटौना कर रहे हैं, समझ में नहीं आया।
इसलिए यहाँ भी बता रहे हैं कि मुहुरहो रसिका भुवि भावुकाः—भागवत कहती है कि आप रसिक बन जाओ, और वह रसिक बनने के लिए पृष्ठभूमि मिलनी चाहिए। पहले नौ स्कंधों में भी रस है थोड़ा-बहुत, पर खास करके भागवत का जो मुख्य रस है, वह दशम स्कंध में है। संपूर्ण भागवत में 335 अध्याय हैं, उनमें से 90 अध्याय जो हैं, वे भागवत के दशम स्कंध में हैं। और यह 90 अध्याय एक तरह से भागवत का हृदय हैं, और लगभग श्रीमद्भागवत का एक-तिहाई हिस्सा जो है, वह दशम स्कंध है—बहुत बड़ा है। उसके लिए व्यक्ति को रसिक कैसे बनना है, यह पृष्ठभूमि यहाँ पर दी गई है।
तो चैतन्य महाप्रभु यहाँ पर लीला करते हैं, तो वे बताते हैं कि जो व्यक्ति पात्र हैं, वही इस लीला को देख सकते हैं, बाकी सब व्यक्ति यह लीला को देखेंगे फिर भी समझ नहीं पाएँगे। कभी-कभी समझ नहीं पाएँगे या कभी-कभी गलत समझ लेंगे। नटो नाट्यधरो यथा—यह पता नहीं है तो उसको समझेगा नहीं क्या चल रहा है। और कोई व्यक्ति भौतिक संकल्पना में सोचता है, तो उसको लगता है कि भौतिक कार्य ही चल रहा है, तो गलत समझ जाएगा।
नाटक की पृष्ठभूमि और अद्वैत आचार्य का तत्त्व
इस लीला की शुरुआत में कवि कर्णपूर बताते हैं कि किस तरह से बाह्य रूप में क्या चल रहा है यहाँ पर। कवि कर्णपूर ने यह नाटक किसके लिए लिखा है? अपने आश्रयदाता प्रतापरुद्र महाराज के लिए। और इस नाटक में जो है कि एक सूत्रधार है और एक नट है, तो वे दोनों चर्चा कर रहे हैं।
तो बाह्य स्तर पर कैसे हम देखते हैं, भागवत में कई स्तरों पर संवाद होते हैं। बाह्य स्तर पर संवाद है जो सूत गोस्वामी और नैमिषारण्य के ऋषियों का; उसके अंदर संवाद है शुकदेव गोस्वामी और परिक्षित महाराज का; उसके अंदर फिर संवाद होगा मैत्रेय और विदुर का; और फिर मैत्रेय और विदुर के संवाद में फिर देवहूती और कपिलदेव का संवाद होता है। तो ऐसे अंदर चलते रहता है एक तरह से।
तो यहाँ पर क्या हो रहा है? सबसे बाह्य रूप से कवि कर्णपूर, प्रतापरुद्र महाराज के लिए लिख रहे हैं। सूत्रधार और परिपार्विक जो हैं, वे सबको बता रहे हैं, और उसमें अभी लीला हो रही है और उसमें जो गुणात्मक रूप से प्रेजेंट किया जा रहा है।
जैसे कल हमने चर्चा की थी कि एक वैराग्य और भक्ति, उनमें चर्चा हो रही थी। गुणात्मक रूप से क्या प्रभाव होता है, यहाँ बता रहे हैं। वे बताते हैं कि यह संवाद है मैत्री और भगवद्भक्ति, इन दोनों में संवाद हो रहा है। मैत्री और मैत्रेय—ये दोनों अलग हैं। मैत्रेय नाम के ऋषि हैं, मैत्री यह एक गुण है जो मित्रत्व होता है, मैत्रता, उसको अभिव्यक्त करने वाला एक गुण है।
तो जिस तरह से तीसरे अध्याय में वैराग्य बहुत दुखी हो गया था कि “मैं कहाँ जाऊँ, कहाँ आश्रय प्राप्त करूँ?”, वैसे ही यहाँ पर जो मैत्री होती है… “मैं कहाँ जाऊँ, कहाँ आश्रय प्राप्त करूँ?”
चैतन्य चरितामृत के पहले 12 जो अध्याय हैं, वे तत्त्वज्ञान पर आधारित थे काफी। तो उसमें से छठे अध्याय में, सातवें अध्याय में अद्वैत आचार्य का क्या स्तर है, नित्यानंद प्रभु का क्या स्तर है—वह सब बताया गया है। तो वहाँ पर श्लोक आता है: अद्वैतं हरिणाद्वैताद्… अद्वैत आचार्य का नाम अद्वैत क्यों है? कि वे हरि से अद्वैत (अभिन्न) हैं! वास्तव में अद्वैत आचार्य कौन हैं? वे सदाशिव और महाविष्णु, दोनों के एक साथ रूप हैं।
शिवजी के विभिन्न स्वरूप और सदाशिव तत्त्व
अगर यह भौतिक जगत है और यह आध्यात्मिक जगत है, तो जो भौतिक जगत और आध्यात्मिक जगत का जो जंक्शन है—जहाँ एक स्थान से दूसरे जगत में जाते हैं—तो वहाँ पर सदाशिव का कैलाश धाम है। और वह जो कैलाश धाम है, वह एक-चौथाई आध्यात्मिक जगत में है, तीन-चौथाई भौतिक जगत में है। पर वह भौतिक जगत में किसी भौतिक ब्रह्मांड के अंदर नहीं है। ब्रह्मांड जो है, वह अशाश्वत है। ब्रह्मांड की सृष्टि होती है, कभी विनाश होता है। पर जो भौतिक तत्त्व जो है, जड़ चीज़ भी है, वह भी शाश्वत होती है। इसका रूप शाश्वत नहीं होता है, पर वह मैटर जो है, जड़ वस्तु जो है, वह शाश्वत होती है।
सदाशिव का जो धाम है, वह शाश्वत है। और वे सदाशिव वास्तव में भगवान विष्णु के ही विस्तारित रूप हैं। जैसे अलग-अलग वैकुंठ लोक हैं जहाँ पर विष्णु शाश्वत रूप में रहते हैं, वैसे ही सदाशिव जो हैं, वे एक शाश्वत रूप हैं जो कैलाश धाम में हमेशा स्वामी के रूप में रहते हैं। तो वे एक सदाशिव हैं।
फिर इसके बाद में वहाँ से विस्तारित होते हैं एक और शिव का रूप, जो हर एक ब्रह्मांड के अंदर ब्रह्मा जी के माथे से आता है—ब्रह्मा जी का क्रोध जो उत्पन्न होता है, वह शिव जी का रूप है। यह ब्रह्मांड की सृष्टि में सबसे पहले ब्रह्मा जी उत्पन्न होते हैं, फिर ब्रह्मा जी से सनत्कुमार उत्पन्न होते हैं, फिर रूद्र उत्पन्न होते हैं। तो यह शिव जी का दूसरा रूप है।
- पहला रूप: सदाशिव रूप।
- दूसरा रूप: हर ब्रह्मांड के अंदर जो शिव जी ब्रह्मा जी से उत्पन्न होते हैं।
- तीसरा रूप: अलग-अलग एकादश रूद्र।
तो इन तीनों में से सनातन शिव (सदाशिव) जो हैं, यह लगभग विष्णु के समान ही हैं। और ये सनातन शिव जो सदाशिव हैं, उनका स्तर जो है वह ब्रह्मा जी से श्रेष्ठ है, क्योंकि वे प्रकृति (दुर्गा देवी) के अधीक्षक, उनके स्वामी हैं।
और उसके अलावा, इसलिए हम देखते हैं कुछ-कुछ लीलाओं में ऐसे होता है कि ब्रह्मा जी शिव जी से प्रार्थना करते हैं, और कुछ-कुछ ऐसी लीलाएँ होती हैं कि जहाँ पर ब्रह्मा जी भगवान से प्रार्थना कर रहे हैं कि “आप आ जाओ, आप अवतार लो।” और उसमें शिव जी बाकी सब देवताओं के साथ होते हैं।
यहाँ पर मतलब भाव क्या है? कौन-से शिव जी की बात हो रही है, उसके अनुसार है। अगर ब्रह्मांड के अंदर के शिव जी हैं, तो वे ब्रह्मा जी के पुत्र हैं। पर यह सब ब्रह्मांड लोकों के परे जो शिव जी हैं—सदाशिव—जो कैलाश धाम में रहते हैं, वे भौतिक जगत के तट पर ब्रह्मा जी से भी श्रेष्ठ हैं।
तो अद्वैत आचार्य कौन-से सदाशिव के विस्तारित रूप हैं? अद्वैत आचार्य सदाशिव के विस्तारित रूप हैं, जो सदाशिव लगभग विष्णु से अभिन्न हैं। इसलिए कृष्णदास कविराज गोस्वामी बताते हैं कि वास्तव में जो समझता है कि शिव जी और विष्णु एक ही हैं, वह अपराध करता है; पर जो सोचता है कि शिव जी और विष्णु पूर्णतया अलग हैं, उनमें कोई भी एकत्व नहीं है, वह भी अपराध करता है! क्योंकि:
क्षीरं यथा दधि विकारविशेषयोगात् ।
जैसे दूध जो है, वह दही में परिवर्तित हो जाता है, वैसे विष्णु से शिव जी बनते हैं।
तो इसलिए यहाँ पर बताने का भाव क्या है कि जब यह लीला हो रही है, तो यहाँ पर कवि कर्णपूर बताते हैं कि जो भगवान की भूमिका है, वह अद्वैत आचार्य करते हैं। तो अद्वैत आचार्य वास्तव में एक तरह से हरि से अभिन्न हैं—अद्वैतं हरिणाद्वैताद् भक्तिशंसनात्। उनको आचार्य कहा गया है क्योंकि वे भक्ति सिखाते हैं, और चूँकि वे भगवान से अभिन्न हैं, इसलिए उनके नाम में ‘अद्वैत’ है।
और उनका जो नाम था—साधारण अद्वैत आचार्य पूरी उनकी पदवी है। ‘प्रभुपाद’ जैसे पदवी है… उनका नाम कमलाक्ष था, अद्वैत आचार्य पदवी है। यह नाम दिव्य है।
और राधारानी और कृष्ण वास्तव में एक ही व्यक्ति हैं जिन्होंने दो रूप लिए हैं—राधा कृष्ण एक आत्मा, दुइ देह धरि। अन्योन्ये विलास करि… कृष्णदास कविराज गोस्वामी बताते हैं कि राधा-कृष्ण एक आत्मा हैं जिन्होंने दो देह धारण की हैं और अन्योन्य विलास (लीला) करते हैं।
तो इस तरह से इस लीला में वास्तव में दोनों जो भूमिकाएँ थीं, वे भगवान ने ही स्वीकार कीं। पर बाह्य रूप से एक भूमिका चैतन्य महाप्रभु स्वीकार करते हैं राधारानी की, और एक भूमिका जो है, वह अद्वैत आचार्य स्वीकार करते हैं।
और फिर चैतन्य महाप्रभु सेवकों से कहते हैं कि “आप ध्यान दीजिए कि कोई भी जो अनुचित व्यक्ति है, वह इस लीला के दर्शन के लिए न आए।” तो फिर चैतन्य महाप्रभु से पूछते हैं—”तो उचित कौन है, अनुचित कौन है? फैसला कैसे करोगे?” तो चैतन्य महाप्रभु उनकी ओर देखते हैं और कुछ जवाब भी नहीं देते हैं और चले जाते हैं।
तो फिर इसका मतलब क्या है कि वास्तव में एक तरह से चैतन्य महाप्रभु भी चाहते हैं कि केवल जो उचित व्यक्ति है, वही इस लीला का दर्शन करे। और साथ-साथ वे सबको उनकी लीला में आने के लिए मौका मिले, यह दिखा रहे हैं।
महाप्रभु की परम कृपा बनाम भक्ति की पात्रता
तो कभी-कभी कहते हैं कि चैतन्य महाप्रभु महा-कृपालु हैं, परम कृपालु हैं। तो परम कृपालु का मतलब क्या है? ऐसे नहीं है कि मान लीजिए कोई कॉलेज है—भारत में आईआईटी (IIT) बहुत बड़ा कॉलेज होता है—तो सब जो छात्र होते हैं, उनकी इच्छा होती है कि आईआईटी में जाना है। तो अगर मान लीजिए आईआईटी बहुत कृपालु बन जाए, तो उसका मतलब क्या है? वे कहेंगे कि आईआईटी के लिए कोई एंट्रेंस एग्जाम नहीं है, जो आईआईटी में प्रवेश करना चाहता है, वह प्रवेश कर सकता है। तो क्या है, प्रवेश कोई भी कर सकता है, पर अगर आईआईटी की डिग्री चाहिए तो पढ़ाई करनी पड़ेगी!
तो उसी तरह से चैतन्य महाप्रभु परम कृपालु हैं, मतलब क्या कि भक्ति की शुरुआत के लिए कोई पात्रता नहीं चाहिए, पर वास्तव में भक्ति में उत्तीर्ण होना है, तो पात्रता चाहिए।
यह हम देखते हैं शिक्षाष्टकम् के दूसरे श्लोक में बताया गया है:
नाम्नामकारि बहुधा निजसर्वशक्ति-
स्तत्रार्पिता नियमितः स्मरणे न कालः ॥
यहाँ स्मरण करने के लिए कोई नियम नहीं है! पर तुरंत तीसरे श्लोक में बताया गया है:
तृणादपि सुनीचेन तरोरपि सहिष्णुना ।
अमानिना मानदेन कीर्तनीयः सदा हरिः ॥
अब यह तृणादपि सुनीचेन… बड़ा कठिन नियम है! तो दूसरे श्लोक में बताया गया है कोई नियम नहीं है, और बाद में बहुत ही कठिन नियम बना दिया! तो इसमें फर्क क्या है?
फर्क यह है कि स्मरणे न कालः—कि सिर्फ शुरुआत करने के लिए, स्मरण करने के लिए कोई नियम नहीं है, कहीं भी स्मरण कर सकते हैं। पर सदा कीर्तनीयः—सदा स्मरण करना है, तो फिर तृणादपि सुनीचेन आवश्यक है। दोनों में यह फर्क है।
तो वास्तव में चैतन्य महाप्रभु के मार्ग में भक्ति की शुरुआत के लिए पात्रता नहीं चाहिए। प्रभुपाद जी जब वृंदावन में थे, तो साधारणतया एक वरिष्ठ वैष्णव का स्वभाव क्या होता है कि वृंदावन में जाएँ और क्षेत्र-संन्यास ले लें कि “मैं मेरी मृत्यु तक वृंदावन को छोड़ूँगा नहीं।” और संन्यासी जो होते हैं, वे समुद्र के पार नहीं जाते। पर प्रभुपाद जी ने चैतन्य महाप्रभु की भविष्यवाणी को पूरा करने के लिए क्या किया? उन्होंने वृंदावन में रहने का जो नियम था, वह त्याग दिया; संन्यासी का जो नियम था कि विदेश नहीं जाना, उसको त्याग दिया!
श्रीमद्भागवत की महिमा अनेक आचार्यों ने बताई है, पर जो गौड़ीय वैष्णव सिद्धांत में बताया गया है—जहाँ वैष्णव रस की पराकाष्ठा है—वह कहीं भी नहीं है। और चैतन्य महाप्रभु अपनी लीलाओं से दर्शाते हैं कि कैसे उसको हम अनुभव कर सकते हैं और वह दूसरों के साथ बाँट सकते हैं।
श्रोताओं के प्रश्न एवं शंका-समाधान
प्रश्न 1: शिवजी के अलग-अलग रूप हैं, तो किस शिवजी की पूजा कहाँ होती है?
उत्तर: वास्तव में यह अधिकांश रूप से उपासक की धारणा पर निर्भर है। जैसे बाकी संप्रदायों में भी कृष्ण की पूजा होती है—श्री संप्रदाय में कृष्ण की पूजा होती है, मध्व संप्रदाय में कृष्ण की पूजा होती है, पर वहाँ कृष्ण की पूजा ऐश्वर्य भाव में होती है। अधिकांश रूप से वे रुक्मिणी-द्वारकाधीश की पूजा करते हैं, राधा-कृष्ण की पूजा नहीं करते।
यहाँ शास्त्रों में बताते हैं कि एक गोलोक वृंदावन है, और गोलोक वृंदावन के बाहर एक वैकुंठ वृंदावन है। वैकुंठ वृंदावन मतलब जहाँ राधा-कृष्ण की ऐश्वर्य भाव में पूजा होती है, माधुर्य भाव में पूजा नहीं होती। अगर कोई व्यक्ति इस भौतिक जगत में राधा-कृष्ण की ऐश्वर्य भाव में पूजा करता है, तो वह वहाँ वैकुंठ वृंदावन में जाएगा।
अन्तःकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम् ।
मतलब कृष्ण की पूजा कर रहे हैं, पर किस भावना से पूजा कर रहे हैं, वह महत्वपूर्ण है।
तो उसी तरह से जो व्यक्ति यहाँ पर शिवजी की पूजा करते हैं, तो किस धारणा से पूजा कर रहे हैं, वह महत्वपूर्ण है। अधिकांश लोग जो शिवजी की पूजा करते हैं, वे कुछ भौतिक चीज़ों की प्राप्ति के लिए ही करते हैं, और कई बार तामसिक रीति-रिवाजों से पूजा की जाती है। तो इसलिए तमोगुण में जो सनातन स्तर का आध्यात्मिक साक्षात्कार प्राप्त करने की इच्छा नहीं है, इसलिए वहाँ जो पूजा है वह सदाशिव की नहीं है, वहाँ इस जगत में (ब्रह्मांड के अंतर्गत) जो शिवजी हैं, उनकी ही है। और उनकी पूजा के द्वारा कुछ इस भौतिक जगत के अशाश्वत फल प्राप्त होते हैं। उनके लिए भी अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम् श्लोक लागू होता है।
पर उसके साथ-साथ बताया गया है कि कुछ लोग अगर शिवजी की शुद्ध भाव से पूजा करते हैं (उन्हें परम वैष्णव मानकर), तो फिर शिवजी उनको अपने सदाशिव धाम में ले आते हैं, और वहाँ पर वे शिवजी के साथ सनातन काल के लिए भगवान की भक्ति करते रह सकते हैं। अगर वही उनकी इच्छा है, तो वे कर सकते हैं, पर वह एक अपवाद (exception) है। अधिकांश रूप से जो शिवजी की पूजा करते हैं, वे भौतिक इच्छाओं के साथ ही पूजा करते हैं।
मायापुर/वृंदावन में शिवजी की पूजा:
वृंदावन और मायापुर में भूतेश्वर शिव, गोपीश्वर महादेव, कामेश्वर महादेव आदि रूपों में शिवजी की पूजा की जाती है। यदि हम धाम में हैं और धाम के लोगों को सिद्धांत अच्छी तरह से पता है कि परम श्रेष्ठ कौन हैं, और फिर शिवजी की एक ‘भक्त’ (वैष्णवानां यथा शम्भुः) के रूप में पूजा कर रहे हैं, तो उसमें कुछ अनुचित नहीं है। चैतन्य महाप्रभु भी जब दक्षिण भारत की यात्रा पर जाते हैं, तो वे भुवनेश्वर में जाते हैं और वहाँ शिवजी के दर्शन व स्तुति करते हैं। मुरारी गुप्त द्वारा रचित ‘चैतन्य चरित’ में ‘शिवाष्टकम्’ आता है, जो शिवजी का एक महान भक्त के रूप में गुणगान है।
इस्कॉन के मंदिरों में प्रभुपाद जी ने मुख्यतः कृष्ण पूजा पर बल दिया ताकि नवागंतुकों के मन में भ्रम (confusion) न हो। पर धामों में जहाँ ऐतिहासिक/शास्त्रीय पृष्ठभूमि है, वहाँ क्षेत्रपाल या भक्त के रूप में शिवजी या गणेश जी की उपस्थिति सांस्कृतिक रूप से स्वीकार्य है।
प्रश्न 2: वाल्मीकि रामायण में श्री रामजी के भगवत्ता का स्पष्ट उल्लेख क्यों नहीं है?
उत्तर: हर एक शास्त्र का एक विशेष उद्देश्य होता है। वाल्मीकि रामायण का उद्देश्य तब स्पष्ट होता है जब वाल्मीकि ऋषि नारद मुनि से पूछते हैं कि—”इस संसार में सब गुणों से संपन्न आदर्श मानव कोई है क्या?” तब नारद जी बताते हैं कि “हाँ, एक मानव ऐसे हैं—श्री रामचंद्र!”
इसलिए यद्यपि वे अलौकिक लीलाएँ करते हैं, पर वाल्मीकि रामायण में मुख्यतः उन्हें एक ‘आदर्श मानव’ और ‘धर्मपालक’ के रूप में दर्शाया गया है। वहाँ कर्मकांडीय धर्म के पालन से स्वर्ग आदि की प्राप्ति का वर्णन है, वैकुंठ का उतना विस्तार से वर्णन नहीं है।
जहाँ तक शिवजी द्वारा रामजी की या रामजी द्वारा शिवजी की पूजा का प्रश्न है, किसी एक कार्य से हम अंतिम तत्त्व-निष्कर्ष नहीं निकाल सकते। श्रीमद्भागवत में हम देखते हैं कि कृष्ण अपने मित्र सुदामा के चरण धोते हैं और उनकी पूजा करते हैं, पर उससे सुदामा भगवान नहीं बन जाते! कार्य के साथ-साथ उसकी पृष्ठभूमि और तत्त्वज्ञान को देखना आवश्यक है।
रामायण के प्रसंगों में हम देखते हैं:
- जब सभी देवता परेशान होकर विष्णु के पास जाते हैं कि “आप अवतार लीजिए”, तो उन देवताओं में शिवजी भी शामिल होते हैं।
- जब रावण का वध होता है, तो सब देवता रामचंद्र जी की स्तुति करने आते हैं और उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं।
इससे स्पष्ट है कि वाल्मीकि रामायण में भी शिवजी का स्तर श्रीराम या विष्णु से ऊपर नहीं है।
प्रश्न 3: यदि जीव स्वेच्छा (Free Will) का दुरुपयोग करता है, तो क्या उसके लिए भगवान जिम्मेदार हैं?
उत्तर: आध्यात्मिक तत्त्व को समझाने के लिए जो भी भौतिक उदाहरण (जैसे पिता-पुत्र, कार-ड्राइवर, रथ-सारथी) दिए जाते हैं, उन सब उदाहरणों की एक सीमा (limitation) होती है।
जैसे कार और ड्राइवर के उदाहरण का उद्देश्य यह समझाना है कि जड़ वस्तु से चेतना नहीं आती, वह चेतन आत्मा से आती है। रथ और सारथी के उदाहरण का उद्देश्य शरीर, इंद्रियों, बुद्धि और आत्मा के संबंध को समझाना है।
वैसे ही पिता और पुत्र का उदाहरण आत्मा और परमात्मा के संबंध के एक पहलू को दर्शाता है—कि हम भगवान से आए हैं और हमारा स्वाभाविक स्थान भगवान के धाम में है। पर भौतिक कानून में भी, यदि पुत्र 18 साल से बड़ा हो जाए और कोई अपराध करे, तो उसके लिए पिता को जिम्मेदार नहीं ठहराया जाता।
यद्यपि हम भगवान से आए हैं, पर हम एक स्वतंत्र आत्मा हैं। भगवान ने हमें भिन्न रूप से ‘स्वेच्छा’ (Free will) दी है। और स्वेच्छा के अनुसार जो हम कार्य करते हैं, उसकी जिम्मेदारी हम पर ही होती है।
भगवान ने स्वेच्छा क्यों दी?
क्योंकि स्वेच्छा के बिना ‘प्रेम’ का अनुभव संभव ही नहीं है! यदि किसी को जबरदस्ती या डरा-धमका कर कहा जाए कि “मुझसे प्रेम करो”, तो वह प्रेम नहीं है। यदि कंप्यूटर हर बार चालू होने पर “I Love You” बोले, तो उससे कोई प्रेम का अनुभव नहीं करता, क्योंकि वह केवल एक प्री-प्रोग्राम्ड मशीन है, उसमें चेतना और स्वेच्छा नहीं है।
इसलिए भगवान हमें स्वेच्छा देते हैं और उसमें हस्तक्षेप (force) नहीं करते। पर फिर भी, वे हमें सुधारने का निरंतर प्रयास करते हैं:
शिक्षा-गुरु के रूप में भगवान बाहरी और आंतरिक दोनों रूपों में मार्गदर्शन करते हैं:
- अंदर से: चैत्य-गुरु (परमात्मा) के रूप में हृदय में आवाज़ देते हैं कि क्या सही है और क्या गलत।
- बाहर से: गुरु, साधु, शास्त्र और प्रकृति (निसर्ग) के माध्यम से सिखाते हैं (जैसे अवधूत ब्राह्मण के 24 गुरु)।
तो भगवान ऐसे नहीं हैं कि “तुमने मेरी बात नहीं मानी तो दफा हो जाओ।” वे स्वयं इस भौतिक जगत में परमात्मा रूप में हमारे साथ आते हैं और हमें सही मार्ग पर लाने का हर संभव प्रयास करते हैं।
इस प्रकार हम भगवान के असीम प्रेम और उनकी व्यवस्था को समझ सकते हैं।
बहुत-बहुत धन्यवाद! श्रील प्रभुपाद की जय! गौर-भक्तवृंद की जय!