Dealing with conflicts by dealing with the mind – Hindi
[Evening program at ISKCON, Nasik, India]
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Lecture Summary
1. भक्ति में दृष्टि (दृष्टिकोण) और वानर सेना का संकट
- रामायण का प्रसंग: सीता जी की खोज में दक्षिण दिशा में गए दल (अंगद, जांबवान, हनुमान जी) समय-सीमा (1 महीना) समाप्त होने पर हताश हो गए।
- मन का भेद: सुग्रीव के दंड के भय से अंगद के मन में सुग्रीव के प्रति पुराना द्वेष/संशय जाग उठा और वह प्रायोपवेश (अनशन) पर बैठ गया।
2. विवाद का अदृश्य आधार (The Iceberg Principle)
- हिमखंड सिद्धांत: किसी भी विवाद में जो 10% बाह्य कारण दिखता है, उसके पीछे मन में दबा 90% पुराना इतिहास, नफरत और धारणाएँ छिपी होती हैं।
- मन का चश्मा: हमारा मन एक माइक्रोस्कोप या दूरबीन की तरह है जो छोटी समस्या को बहुत बड़ा और बड़ी बात को छोटा करके दिखाता है।
3. भावनाओं का सही प्रबंधन (Processing Emotions)
- दबाना बनाम व्यक्त करना: भावनाओं को तुरंत उगल देना (Expressing) दूसरों को चोट पहुँचाता है, और दबाना (Suppressing) उन्हें अंदर ही अंदर सड़ाकर विकृत बना देता है।
- सही मार्ग: भावनाओं को न दबाना है, न उगलना है, बल्कि विवेक और भक्ति द्वारा प्रोसेस (Process) करना है।
4. योगायोग और ईर्ष्या/द्वंद्व से मुक्ति
- सम्पाती का आगमन: जब वानर हताश थे, तब जटायु का स्मरण करते ही सम्पाती (जटायु का भाई) मिला, जिसने दिव्य दृष्टि से लंका में सीता जी की उपस्थिति बताई।
- भगवान् की योजना: जब हम सेवा-भाव में निष्ठावान रहते हैं, तो भगवान् किसी न किसी ‘योगायोग’ से विषम परिस्थिति से बाहर निकलने का मार्ग बना देते हैं (जैसे न्यूयॉर्क में श्रील प्रभुपाद जी को शिष्य मिलना)।
5. वास्तविक पहचान — “कृष्ण दास”
- मुख्य पहचान: हमारी सांसारिक पहचान (पति, पत्नी, पुत्र, मित्र) गौण हैं। हमारी मुख्य और अचल पहचान है कि “हम भगवान् के नित्य दास हैं।”
- समस्याओं से पार पाना: जब हमारी पहचान ‘भगवान् का सेवक’ के रूप में पक्की होती है, तो पूर्वकर्मों या परिस्थितियों के कारण आने वाले दुखों और टूटे हुए संबंधों से हम विचलित तो हो सकते हैं, पर पूरी तरह तबाह या हताश नहीं होते।
Full Transcription
हरे कृष्णा! आप सबका इस शांति कक्षा में स्वागत है। तो आज हम जो भक्ति में एक महत्वपूर्ण अंग है—’दृष्टि’ (विश्वास/दृष्टिकोण), इसके बारे में चर्चा करेंगे। और मैं रामायण के कुछ प्रसंगों पर थोड़ा चर्चा करूँगा और उससे हम देखेंगे कि किस प्रकार से दृष्टियों में दीवारें आती हैं और किस तरह से उन दीवारों को थोड़ा दूर किया जा सकता है।
जो रामायण है, उसमें अलग-अलग प्रकार के प्रसंगों में जो मुख्य आकर्षण है, वह है अलग-अलग प्रकार की दृष्टियाँ (दृष्टिकोण)।
जब यह वानरों का समूह सीता जी को खोजने जाता है, तो उस समय चार दल बनाए जाते हैं और यह चार अलग-अलग दिशाओं में जाते हैं। तो इनमें से जो दक्षिण जाता है, उसका जो मुख्य नेतृत्व है, वह अंगद को दिया गया है। और अंगद के साथ-साथ उसमें जांबवान भी होते हैं और हनुमान जी भी होते हैं।
अब यह अंगद, जांबवान और हनुमान—ये तीनों अलग-अलग दृष्टि से बहुत ख्यातिप्राप्त हैं। जो अंगद हैं, वे राजकुमार हैं। पूर्व राजा, जो बालि थे, उनके पुत्र हैं। और अभी सुग्रीव ने भी ऐसी एक घोषणा की थी कि उनके बाद अंगद ही राजा बनने वाले थे, उन्हें युवराज नियुक्त किया था। जांबवान जो हैं, वे बहुत वृद्ध थे, बहुत अनुभवी थे। जांबवान के पास बहुत अनुभव और बुद्धि थी।
अब हनुमान जो हैं, इस समय तक हनुमान ने बहुत ज्यादा कुछ अद्वितीय कार्य नहीं किया था। जरूर हनुमान भी वह निमित्त थे जिनके द्वारा राम और सुग्रीव का मिलन हुआ, पर खुद की शक्ति के उद्देश्य से आज तक देखा जाए तो हनुमान जी ने अभी ज्यादा कुछ किया नहीं था। क्योंकि हनुमान जी को एक शाप मिला था कि बचपन में बहुत नटखटपन किया था, तो इसलिए वे अपनी शक्ति भूल गए थे। बाद में जब लंका के पार जाना था, तभी जांबवान ने उनको उनकी शक्ति का स्मरण दिलाया था। इसलिए जब बालि और सुग्रीव में संग्राम चल रहा था, तब हनुमान जी सम्मिलित नहीं हुए थे, क्योंकि तभी हनुमान जी को अपनी शक्ति का स्मरण नहीं था।
पर फिर भी हनुमान जो थे, वे श्रीरामचन्द्र जी के बहुत प्रिय थे। और जब वे जा रहे थे, तो तभी जो अँगूठी थी, जो श्रीरामचन्द्र जी के द्वारा दी गई, वह किसी और दल में किसी को नहीं दी गई थी, हनुमान जी को ही दी गई थी।
और सुग्रीव ने बताया था कि “अभी कोई भी चीज़ खोजने जाना हो, तो हम खोज सकते हैं, 5 मिनट खोज सकते हैं, 5 घंटे खोज सकते हैं, 5 दिन भी खोज सकते हैं, खोज तो असीमित मात्रा तक चल सकती है।” तो सुग्रीव ने बताया था कि “आप एक महीना ढूँढो और एक महीने में वापस आ जाओ।” और जो एक महीने के अंदर वापस नहीं आएगा, उसको मृत्युदंड दिया जाएगा। इसका उद्देश्य यह था कि जो अर्जेंसी (तात्कालिकता) है, उसका अहसास हो।
दक्षिण दिशा के दल का संकट
तो जब वे यश प्राप्त नहीं कर पाए, सीता जी को खोज नहीं पाए—एक तो सीता जी की उपस्थिति की दिशा भी नहीं मिली और दूसरा कि वे समय पर वापस भी नहीं पहुँचे—तो अभी क्या करना है, यह सोच में वे चिंता में पड़ गए। और इसके कारण वानरों में दो समूह बन गए, दो गुट बन गए।
एक था अंगद का पक्ष। अंगद कहने लग गया कि “अगर हम वापस जाएँगे, तो सुग्रीव… हम समय पर पहुँचे नहीं हैं, हम वैसे भी संकट में हैं। इस बात को देखते हुए, वे हमें मार भी सकते हैं।”
तो बाकी वानर कहते हैं, तारावती/तार कहते हैं—”क्या बोल रहे हो? सुग्रीव तुम्हारे चाचा हैं और वे कभी ऐसा नहीं करेंगे।”
पर तभी क्या हो गया, अंगद बोलने लगा—”बालिपुत्र सुग्रीव तो कुछ भी कर सकता है! जिस व्यक्ति ने स्वयं राम के साथ कपट किया, जिस व्यक्ति ने स्वयं अपने भाई को मारने में संकोच नहीं किया, तो उससे… ऐसे षड्यंत्र रचा कि अपने भाई को मरवाया, तो उसको किसी और रिश्ते की क्या परवाह है? वह राज्य के लिए इतना लालची है कि वह राज्य के लिए कुछ भी कर सकता है!”
जब अंगद इस तरह से बोलने लग गया, तो कुछ वानर उसके साथ सहमत हो गए। और उन्होंने बोला कि “नहीं, ऐसा नहीं होगा।” पर हनुमान जी बोले कि “सुग्रीव कभी ऐसा नहीं करेंगे।”
तो कुछ वानरों को लगा कि “नहीं, हम क्या करेंगे? वापस नहीं जाएँगे। वापस जाने पर एक तो बदनामी होगी, ऊपर से अन्याय होगा। बेहतर है कि हम यहाँ… जिस गुफा से हम आए थे, वहीं पर हम चले जाएँगे। और वहीं पर काफी अच्छी सुविधाएँ हैं, वहीं पर हम रहेंगे, किसी को पता भी नहीं चलेगा।”
हनुमान जी को लगा कि ऐसा नहीं है। अगर आप सुग्रीव से बेईमानी करोगे, और जाकर वहाँ तपस्या आदि करोगे, तो उससे कुछ पुण्य नहीं होने वाला है, इससे तो आपकी चेतना और खराब होगी।
तो अंगद प्रायोपवेश (अनशन) में बैठ गया, और कुछ वानर भी साथ में बैठ गए। और अभी जब इस तरह से हो गया, तो बाकी वानर असमंजस में पड़ गए कि क्या करें। अभी हनुमान जी सोचने लगे कि “यह क्या हो गया? हम यहाँ पर सीता जी को खोजने आए थे, और यहाँ पर ये तो अपनी जान देने पर तुल गए!”
विवाद के पीछे का अदृश्य आधार (आइसबर्ग सिद्धांत)
यहाँ पर क्या हुआ? जब कोई प्रसंग होता है हमारे जीवन में, जिसके कारण दो व्यक्तियों में तनाव आ जाता है—यहाँ पर तनाव आ गया था सुग्रीव और अंगद में—तो वह जो प्रसंग भले ही ज्यादा बड़ा न लगे, पर अक्सर उस प्रसंग के पीछे एक पृष्ठभूमि होती है। और वह हर व्यक्ति की मनोस्थिति के अनुसार होती है—क्या मनःस्थिति है, क्या विचारधारा है।
साधारणतः कोई बर्फ का गोला, हिमखंड (Iceberg) होता है, तो वह जब समुद्र पर तैर रहा होता है, तो हमको ऊपर से थोड़ा-सा ही हिमखंड दिखता है। और जो थोड़ा-सा दिखता है, वह कभी दिखता भी नहीं है या दिख भी जाता है तो लगता है कि छोटा-सा है, क्या फर्क पड़ने वाला है! पर अगर कोई जहाज के मार्ग में आ जाए, तो ऊपर तो छोटा है, पर नीचे बहुत बड़ा है। और जो नीचे बड़ा है, वह टक्कर कर देगा, तो बड़ी-बड़ी जहाजें भी टूट सकती हैं। कई जहाजों का ऐसे ही विनाश हो गया है।
तो अभी जब जहाज आ जाते हैं, खास करके जिन इलाकों में बर्फ होती है, हिमशिला होने की संभावना होती है… तो वैसे ही क्या होता है, जो हमारे जीवन में कोई प्रसंग आ गया, जिससे तनाव आ गया है, थोड़ा झगड़ा हो गया है, तो वह झगड़ा जो है, उसका जो कारण दिखता है, वह सिर्फ ऊपर का, वही हिमशिला का ऊपर का भाग है। पर उसके नीचे बहुत कुछ है! और वास्तव में उसके नीचे क्या है और कितना है, यह समझने की आवश्यकता होती है।
उसके प्रभाव में आकर कभी हम एक चीज़ बोलते हैं और दूसरा व्यक्ति उसको मिसइंटरप्रेट (गलत अर्थ) निकाल लेता है। “यह क्या हो गया? इतने में क्यों गुस्सा हो गया?” तो वास्तव में उनके मन में बहुत कुछ और चल रहा होता है।
मन का चश्मा और गलत धारणाएँ
तो अभी हम सब जानते हैं कि हमारा मन हमें कितना परेशान कर रहा है। तो हमारा मन जो है, कई बार हमें भ्रांत धारणाओं में डाल देता है।
- एक तो है कि हम इंद्रियों की तृप्ति करते हैं, उसमें मन कल्पना करता है कि इसमें इतना सारा सुख है। क्योंकि इससे वंचित रहकर अनुभव करते हैं, जब आत्मा जो अनुभव करती है, तो जो सुख होता है वह बहुत थोड़ा-सा होता है। पर मन कल्पना करता है कि वह बहुत अच्छा है।
- दूसरा यह कि मन हमें छोटी चीज़ को बड़ा करके दिखाता है कभी, और कभी बड़ी चीज़ को छोटा करके दिखाता है।
इसके कारण, एक तो है कि अगर हम इंद्रिय विषयों का चिंतन बहुत कर रहे हैं, तो हमें अपने आप से बहुत भ्रम होगा, पर उससे थोड़ा-सा ही सुख होता है।
उसी तरह से जब हम किसी से कुछ आदान-प्रदान कर रहे हैं, बातचीत हो रही है, और बातचीत में झगड़ा होने लग गया है, तो उसमें क्या हो गया है कि जो बातचीत का विषय है, वह यहाँ है। अभी जो विषय है—यहाँ पर एक व्यक्ति है, यहाँ पर दूसरा व्यक्ति है—और ये दोनों व्यक्ति जो हैं, ये इस विषय को अपने मन से देख रहे हैं।
मन मतलब हमारा मन एक चश्मा है। अभी यह चश्मा केवल देखने का यंत्र नहीं है, ऐसा कुछ माइक्रोस्कोप (सूक्ष्मदर्शी) या दूरबीन जैसा यंत्र है। वह क्या करता है? छोटी चीज़ को बहुत बड़ा बना देता है। और जो दूरबीन होती है, वह दूर की चीज़ को पास ले आती है।
तो जो हमारी आँखें हैं, आँखों के सामने अगर कोई ऐसा यंत्र आ गया, तो हम जो साधारण चीज़ जैसी है, वैसी नहीं देखते हैं, थोड़ी अलग दृष्टि से देखते हैं—छोटी चीज़ बड़ी हो सकती है। अगर कोई माइक्रोस्कोप के उल्टे सिरे से देखने लगे, तो क्या होगा? जो बड़ी चीज़ है, वह छोटी लगने लगेगी।
तो प्रसंग यह है, बातचीत का जो विषय है वह यह है, पर दो व्यक्ति उसे अपने मन के यंत्र से देख रहे हैं। और क्या होगा? व्यक्ति अपने मन के यंत्र से देख रहा है, तो एक व्यक्ति के लिए उसका जो मन है, वह एक माइक्रोस्कोप के समान बना रहा है, तो छोटी चीज़ को वह बहुत बड़ा बना रहा है। और दूसरा व्यक्ति जो है, वह अपने मन से देख रहा है, वह वही माइक्रोस्कोप के दूसरे सिरे से देख रहा है, तो बड़ी चीज़ उसको छोटी लग रही है।
तो बात इतनी-सी है, किसी को इतनी बड़ी लग रही है, दूसरे को इतनी-सी लग रही है। तो क्या होगा? वे दोनों बातें कर रहे हैं, एक को लगता है कि “इतनी बड़ी समस्या को यह गंभीरता से क्यों नहीं ले रहा है? इतनी छोटी-सी बात थी, तो इसको इतना बड़ा क्यों बना रहा है?”
तो समस्या क्या हो रही है? अगर समस्या यह समझ में आ जाए, तो इसको हल कर सकते हैं। पर जो झगड़े होते हैं, वे विषयों के आधार पर होते हैं।
दबी हुई भावनाएँ और उनका विस्फोट
तो हमें, जब कोई व्यक्ति किसी एक चीज़ से बहुत क्रोधित हो गया है, बहुत पीड़ित हो गया है, तो फिर हमें देखना है कि ऐसा क्यों हुआ। अलग-अलग लोगों का स्वभाव (Temperament) अलग-अलग होता है। कुछ लोग होते हैं, उनको कुछ अच्छा नहीं लगा, तो आपको तुरंत बोल देते हैं। कुछ लोग होते हैं, वे कभी बोलते ही नहीं हैं, तो वह क्रोध नफरत बन जाता है। और व्यक्ति साधारणतः जो क्रोध है, वह व्यक्त नहीं करेगा, पर बाद में कोई ऐसा प्रसंग आ जाएगा जब उसको लगेगा कि “अब मैं बोल सकता हूँ।” और तभी क्या होगा? सिर्फ क्रोध बाहर नहीं आएगा, नफरत बाहर आएगी!
जैसे क्या होता है कि अगर हम कुछ चीज़ें जमीन के अंदर दबा के रख देते हैं, तो वे चीज़ें जमीन के अंदर वैसी की वैसी नहीं रहती हैं, वे परिवर्तित हो जाती हैं। अगर कोई मांस का टुकड़ा रख दिया है, तो उसको निकालेंगे तो वह और विकृत हो गया होगा, सड़ गया होगा, जब निकालेंगे तो और खराब होगा।
तो वैसे ही क्या होता है, जो हमारी भावनाएँ हैं, उनको अगर हम दबा के रखते हैं बहुत समय तक, तो क्या होता है? वे मरती नहीं हैं, वे जीवित रहती हैं और जब पुनः निकलती हैं, तो और विकृत होकर बाहर निकलती हैं।
इसलिए जब भावनाएँ आती हैं, इसके बारे में हम दो ही पर्याय सोचते हैं—या तो उसको व्यक्त (Express) कर दो या उसको दबा (Suppress) के रखो। हम भावनाओं को व्यक्त करने या दबाने के संदर्भ में सोचते हैं। पर एक तीसरा जो बहुत अच्छा निवारण है—वह है एक प्रक्रिया, जिसके द्वारा हम भावनाओं को सही दिशा दे सकें।…और जो हम बोलना भी नहीं चाहते हैं। सो इसमें क्या करना है कि…
तो हमारी भावनाएँ जो हैं, हम या तो उसको तुरंत व्यक्त (Express) कर लेते हैं या उसको दबा (Suppress/Repress) लेते हैं। तो तुरंत व्यक्त कर लेते हैं तो क्या होता है? कई बार हम दूसरों को बहुत दुख पहुँचाते हैं और हमको भी बहुत दुख पहुँचता है। तो प्रकृति ने जो संरक्षण दिया है कि हमारी भावनाएँ दुनिया को तुरंत दिखती नहीं हैं। पर अगर हम उस भावना को दबा देते हैं—क्रोध को दबा देंगे—तो वह अंदर ही अंदर सड़कर और विकृत हो जाती है।
इसलिए हमें दबाना भी नहीं है और तुरंत उसको उगलना/व्यक्त भी नहीं करना है:
Not expressing, not repressing, but processing!
उसको थोड़ा विश्लेषण करना है, उस पर विचार करना है और सही तरीके से उसको प्रोसेस करना है जिससे कि हम समझ सकें। तो अगर कोई बहुत क्रोधित हो गया है, तो उसको “इतनी छोटी-सी बात पर क्यों क्रोधित हो रहे हो” ऐसे बोलने के बजाय—”यह बात तुम्हारे लिए बहुत महत्वपूर्ण है, मैं समझ सकता हूँ, क्या तुम मुझे और बता सकते हो?” इस तरह से संवाद स्थापित करना चाहिए।
जांबवान, अंगद और हनुमान का प्रसंग
अब रामायण में जो वानर सीता जी को ढूँढने गए थे, उनके संकट पर आते हैं।
जब वानर प्रायोपवेश करके बैठ गए (अंगद और अन्य वानर अनशन पर बैठ गए), तो हनुमान जी ने उनके खिलाफ कुछ भी करने का प्रयास नहीं किया, उन पर हावी होने की कोशिश नहीं की। अंगद और हनुमान दोनों प्रामाणिक सेवक हैं, दोनों रामचंद्र जी के भक्त हैं। अंगद भी ऐसा है कि अंगद कभी भी प्रामाणिक राम-सेवा से पीछे नहीं हटता। भले ही राम ने तीर मारा था जिससे बालि का वध हुआ था, पर अंगद के मन में राम के प्रति कभी द्वेष नहीं रहा। उसका जो रोष था, वह सुग्रीव के प्रति था।
अंगद को यह पहली बार राम की सेवा करने का बड़ा मौका मिला था। और जब बालि मृत्यु-शय्या पर था, तो उसने अंगद को कहा था—”सुग्रीव की सेवा करो, सुग्रीव के माध्यम से राम की सेवा में लगे रहो।” और वास्तव में जो बालि था, वह मृत्यु के समय राम की शरण में गया था। यह देखकर कि “मेरे पिता राम की शरण में गए थे”, राम की सेवा का भाव अंगद में भी बहुत गहरा था।
तो अंगद और हनुमान दोनों ही भगवान के प्रामाणिक सेवक थे, दोनों में सेवा-भाव था। पर अभी यहाँ पर क्या हो गया था? एक दीवार आ गई थी और दोनों में मतभेद हो गया था।
हनुमान जी को लगता था कि हमें सीता जी को ढूँढने का प्रयास जारी रखना चाहिए। भले ही असफलता दिख रही हो, फिर भी जीवन का क्या फायदा अगर हम सेवा छोड़ दें?
समस्या में समस्या: सम्पाती का आगमन
कई बार क्या होता है कि जब हमारे सामने एक समस्या आ गई होती है, हम भगवान से प्रार्थना करते हैं, अपेक्षा करते हैं कि समस्या का हल निकले, पर होता क्या है? एक और बड़ी समस्या आ जाती है!
जैसे द्रौपदी के सामने जब दुर्वासा मुनि आ गए थे अपने शिष्यों के साथ भोजन माँगने (दुर्योधन की योजना के तहत), तो द्रौपदी ने कृष्ण से प्रार्थना की। कृष्ण आए और पहली चीज़ क्या बोले? “द्रौपदी, मुझे बहुत भूख लगी है!” द्रौपदी ने सोचा—”एक तो मैं ऋषियों को खाना नहीं दे पा रही हूँ, ऊपर से आप भी खाना माँग रहे हैं!” उसको लगा कि समस्या और बढ़ गई। पर भगवान की जो योजना थी, उन्होंने उस पात्र में लगा एक शाक का तिनका/दाना ले लिया और उससे दुर्वासा मुनि तथा उनके सारे शिष्यों का पेट भर गया, सब तृप्त हो गए!
पर कई बार क्या होता है कि हमारे सामने एक समस्या आई होती है, हमारा मन उस समस्या में अटक गया होता है। अगर मन समस्या में अटक गया है, तो मैं अपनी दृष्टि से समस्या को देख रहा हूँ, सामने वाला अपनी दृष्टि से देख रहा है। और दोनों की दृष्टि में अगर समन्वय नहीं आ रहा है, तो जब तक हमारा मन उस समस्या में अटका हुआ है, कोई निष्कर्ष निकलने वाला नहीं है।
तो फिर क्या होता है? एक और बड़ी समस्या आ जाती है, जिससे दोनों का मन उस नई समस्या की तरफ चला जाता है, और फिर जो पुरानी समस्या थी, वह उतनी बड़ी नहीं रह जाती!
यहाँ पर जब वानर प्रायोपवेश (अनशन) करके बैठ गए थे, तभी वहाँ एक विशाल गिद्ध आ गया! उसका नाम था सम्पाती। वह आकर एक ओर से इनको देखने लगा—”अरे! आज तो नियति ने मुझे बहुत सारा भोजन दे दिया!” और वह धीरे-धीरे वानरों के पास आकर बैठ गया।
अब ये वानर तो फैसला कर चुके थे कि वे अपना शरीर त्यागने वाले हैं। पर जब देखा कि कोई विशाल पक्षी उन्हें जीवित या मरने के बाद नोच-नोचकर खाने वाला है, तो अंगद दुखी होकर बोलने लगा। उसके मन में एक तो संशय और क्रोध था सुग्रीव के प्रति, पर साथ ही वह दुखी भी था।
अंगद दुख में बोल पड़ा—”ऐसे लगता है कि श्रीरामचन्द्र जी की सेवा में हमारी मृत्यु होने वाली है, जैसे जटायु की मृत्यु हुई थी! जटायु ने श्रीरामचन्द्र जी की सेवा करने का कितना महान प्रयास किया और राम-सेवा में अपने प्राण दे दिए। उसी तरह शायद हमारी भी मृत्यु होने वाली है।”
योगायोग (Coincidence) और ईश्वरीय कृपा
अब एक तरह से देखेंगे, तो उस समय अंगद का जटायु का स्मरण करना और जटायु के बारे में बात करना एक ‘योगायोग’ (दैवीय संयोग) था। जटायु कौन था? सम्पाती का भाई!
जब सम्पाती ने जटायु का नाम सुना, तो उसने पूछा—”तुम मेरे भाई जटायु के बारे में क्या बोल रहे हो?” फिर सम्पाती ने अपनी पूरी कहानी बताई कि कैसे सूर्य के पास उड़ते समय उसके पंख जल गए थे।
अंगद ने उससे पूछा—”क्या आपको पता है सीता जी कहाँ हैं?”
सम्पाती ने कहा—”मैं जब यहाँ पड़ा हुआ था, तो मैंने देखा कि रावण एक स्त्री को रथ में दक्षिण दिशा की ओर ले जा रहा था। मेरा शरीर तो अशक्त हो गया है, पर मेरी दृष्टि अभी भी बहुत तीक्ष्ण है। मेरी दृष्टि से मैं देख रहा हूँ कि यहाँ से सौ योजन दूर सागर के पार जो लंका है, उस लंका के अशोक वाटिका में सीता जी बैठी हैं!”
और जैसे ही वानरों ने यह सुना, उन्होंने प्रायोपवेश (अनशन) छोड़ दिया! उनका उत्साह वापस लौट आया।
तो यहाँ पर अंगद भले ही हताश होकर बोल रहा था, पर उसके अंदर सेवा-भाव जीवित था। जब उसने जटायु का नाम लिया, तो सम्पाती के माध्यम से उन्हें सीता जी का पता मिल गया। जो राह कहीं नहीं दिख रही थी, वह रास्ता खुल गया!
इसको कहते हैं योगायोग (Coincidence)। जब जीवन में एक ऐसी दृष्टि से रास्ता नहीं दिखता, तो एक अप्रत्याशित घटना होती है। कोई खत आता है या कोई व्यक्ति मिलता है, जिसमें बहुत महत्वपूर्ण जानकारी मिल जाती है और हमारा काम बन जाता है। भगवान कई बार अप्रत्यक्ष रूप से सहायता करते हैं।
श्रील प्रभुपाद और न्यूयॉर्क का प्रसंग
श्रील प्रभुपाद जब अमेरिका में थे, प्रचार करने के लिए न्यूयॉर्क में थे, तभी उनके पास बिल्कुल पैसे नहीं थे। प्रचार करने के लिए पाम्पलेट्स छापने के पैसे भी नहीं थे। तो प्रभुपाद जी ने प्रमोशन/विज्ञापन का सबसे सस्ता तरीका निकाला। वह क्या था?
वे न्यूयॉर्क की सड़कों पर टहलते थे। क्योंकि न्यूयॉर्क की सड़कों पर एक भारतीय संन्यासी, भगवा वस्त्र पहने हुए चलना बड़ा अनोखा लगता था। लोग पूछते थे—”आप कौन हैं?”
एक बार जब प्रभुपाद जी रास्ते पर चल रहे थे, सड़क के एक तरफ प्रभुपाद जी थे और दूसरी तरफ से दो युवक चल रहे थे—ब्रूस और कीथ (Bruce & Keith)। वे दोनों गुरु की खोज में भारत भी आए थे, पर उन्हें भारत में कोई सच्चा गुरु नहीं मिला था और वे निराश होकर वापस लौट आए थे। वे सड़क पर जा रहे थे, उन्होंने दूसरी तरफ देखा कि एक भारतीय संन्यासी टहल रहे हैं। वे तुरंत दौड़कर प्रभुपाद जी के पास आए और बोले—”क्या आप भारत से हैं?” प्रभुपाद जी ने कहा—”हाँ।”
वे दोनों प्रभुपाद जी के पहले शिष्यों में से बने (ब्रह्मानंद स्वामी और कीर्तननंद) और उन्होंने बहुत सेवा की!
तो यह क्या था? यह योगायोग था! रास्ते में चलते-चलते मिल गए। भगवान ही ऐसी व्यवस्था करते हैं।
रिश्तों और समस्याओं के परे: हमारी वास्तविक पहचान
तो अगर हमारे जीवन में कोई समस्या है, समस्या के समाधान के लिए कोई और स्थिति आ रही है, तो इसका मतलब यह नहीं है कि भगवान मदद नहीं कर रहे हैं।
कभी-कभी क्या होता है, जब हमारा मन किसी एक समस्या में फँसा होता है, तो उस समस्या का हल नहीं निकल सकता। तब जब मन उस संकीर्णता से बाहर निकलता है, तो हम समस्या का वास्तविक समाधान ढूँढ पाते हैं।
अंगद और हनुमान दोनों ने अपने सेवा-भाव को सर्वोपरि रखा। जब यह प्रसंग समाप्त हुआ और वानर सुग्रीव के पास लौटे, तो हनुमान जी सुग्रीव के पास गए और अंगद की वफादारी और साहस की प्रशंसा की। अंगद ने भी पुनः सुग्रीव की संप्रभुता स्वीकार की, कोई संशय नहीं रखा। अंगद बड़े उत्साह और साहस के साथ राम और सुग्रीव की सेवा में लग गया।
इसलिए कभी-कभी परिस्थितियों के अनुसार कुछ विषय बहुत बड़े बन जाते हैं। संघर्ष (Conflicts) केवल हमारे और दूसरों के बीच में नहीं होते, बल्कि कभी-कभी हमारे और कृष्ण के बीच में भी आ जाते हैं।
बहुत समस्याएँ आ सकती हैं, बहुत झगड़े हो सकते हैं। कभी-कभी ऐसी दीवारें बन जाती हैं जो गिरती ही नहीं हैं। पर कितनी भी बड़ी दीवार हो, कितनी भी बड़ी समस्या हो, भगवान सर्वभूत हैं—वे सबके हृदय में विराजमान हैं।
अगर हम उस मन के प्रवाह में आकर समस्या को भगवान और अपने बीच में नहीं आने देंगे, एक सेवा-भाव रखेंगे—”भगवान, यह बहुत बड़ी समस्या आ गई है, यह गलतफहमी हो गई है, पर मैं आपकी सेवा में लगा रहूँगा”—तो भगवान मार्ग निकाल देंगे। वह रिश्ता भले ही बाद में सुधरे या न सुधरे, पर अगर हमारा भगवान से रिश्ता सुदृढ़ है, तो कोई भी तनाव आए, हम विचलित भले हों, पर टूटेंगे नहीं!
भक्ति का मतलब केवल मंदिर में आकर जप करना या प्रवचन सुनना नहीं है—वह बहुत महत्वपूर्ण है, जरूर महत्वपूर्ण है—पर उसका मुख्य उद्देश्य क्या है? इन सब के द्वारा हमारी पहचान (Identity) बदलनी चाहिए!
अगर हम खुद को पहचानते हैं कि “मैं किसी का पति हूँ, किसी की पत्नी हूँ, किसी का बेटा हूँ, किसी की माता हूँ, किसी का मित्र हूँ”—ये सब सांसारिक संबंध हैं। अगर इनमें से कोई संबंध हमारी मुख्य पहचान बन जाता है, और फिर उस संबंध में कोई समस्या आती है, तो हमें लगता है कि हमारी अस्तित्व/पहचान पर ही खतरा आ गया है! और फिर हम बहुत विचलित हो जाते हैं।
पर अगर हम समझें कि मेरी मुख्य पहचान क्या है?
जीवरे ‘स्वरूप’ हय-कृष्णेर ‘नित्य-दास’
मेरी मुख्य पहचान है कि “मैं भगवान का सेवक हूँ।” और भगवान के सेवक के रूप में मैं अलग-अलग भूमिकाएँ निभा रहा हूँ—मैं किसी का पति हूँ, किसी की पत्नी हूँ, किसी का पिता हूँ, किसी का पुत्र हूँ। ये सारे जो रिश्ते हैं, इन रिश्तों के द्वारा मैं भगवान की सेवा कर रहा हूँ।
तो कभी कुछ रिश्ते बहुत घनिष्ठ हो जाते हैं, कभी कुछ रिश्ते ढीले हो जाते हैं। पर हर एक रिश्ते को हम सेवा के भाव से देखते हैं और अपनी मुख्य पहचान रखते हैं कि “मैं भगवान का दास हूँ।”
श्रील रूप गोस्वामी चैतन्य चरितामृत में बताते हैं:
सर्वोपाधि-विनिर्मुक्तं तत्परत्वेन निर्मलम् ।
हृषीकेण हृषीकेश-सेवनं भक्तिरुच्यते ॥
उपाधियों से मुक्त होना है। इसका मतलब यह नहीं है कि गृहस्थी या जिम्मेदारियाँ छोड़ देनी हैं, बल्कि यह समझना है कि ये सब गौण (Secondary) पहचान हैं। हमारी प्राथमिक पहचान क्या है? कि हम भगवान के सेवक हैं।
अगर हम किसी रिश्ते से बहुत गहराई से जुड़े हैं और वह व्यक्ति हमें ठुकरा देता है, तो हमारी मुख्य पहचान अगर वही रिश्ता था, तो हम पूरी तरह टूट जाएँगे। पर अगर हमारी प्राथमिक पहचान यह है कि “मैं भगवान का सेवक हूँ”, तो कोई रिश्ता छूटे या ठुकराए भी, हम दुखी ज़रूर होंगे, पर तबाह नहीं होंगे!
भगवान भगवद्गीता (18.58) में कहते हैं:
मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि ।
“यदि तुम अपने चित्त को मुझमें लगाओगे, तो मेरी कृपा से तुम जीवन की सभी कठिनाइयों और दुर्गम बाधाओं को पार कर जाओगे।”
और अगर वह शक्ति लगा के रखते हैं, तो धीरे-धीरे जब मन उस समस्या के विचारों से दूर हटने लगता है, तो वह शक्ति कम लगती है। तो इसलिए पहले थोड़ी शक्ति लगती है। और उस शक्ति की ज़रूरत को देखकर कभी-कभी हम बोलते हैं—”यह नहीं हो पाएगा।” पर हम वह शक्ति लगाएँगे, तो बाद में उतनी शक्ति नहीं लगेगी।
तो इसलिए एक तो भक्ति के स्तर पर—भक्ति में कैसे हमारे मन को आसानी से लगा सकते हैं, वह देखें। और बुद्धि के स्तर पर समझना भी कि “विचार करने से समस्या का हल नहीं हो रहा है।” तो बुद्धि के स्तर पर जबरदस्ती से हम मन को खींचा करते हैं, इससे हम मन को समस्या से बाहर ला सकते हैं।
दीर्घकालिक समस्याएँ और ‘दैव’ (नियति) का प्रभाव
प्रश्न: “कभी-कभी कुछ समस्याएँ कई सालों तक चलती रहती हैं। परिस्थिति बदलने के लिए हम प्रयास करते हैं, पर होता कुछ और है। उस समय हम भगवान पर श्रद्धा रखकर आगे कैसे बढ़ सकते हैं?”
उत्तर: कैसा है कि जो कुछ समस्याएँ आती हैं, उनका कारण केवल हमारी परिस्थिति नहीं है, कई बार कुछ समस्याओं का कारण हमारे पूर्वकर्म भी होते हैं। तो इसलिए हम जो समस्या को देखते हैं कि “मैंने यह किया और इसका यह परिणाम हो जाए”—बस केवल हमारे वर्तमान कार्य ही परिस्थिति का एकमात्र कारण नहीं हैं। उससे भी परे कुछ और चीज़ें हैं—और वह क्या है? हमारा पूर्वकर्म!
पूर्वकर्म का मतलब क्या है? मान लीजिए कोई डॉक्टर है, वह कोई ऑपरेशन करता है। डॉक्टर अपनी तरफ से ऑपरेशन बहुत अच्छी तरह से कर लेता है। पर वह ऑपरेशन करते समय मरीज को कोई कॉम्पप्लिकेशन (जटिलता) आ जाती है, और ऑपरेशन के बाद ठीक होने के बजाय स्थिति और खराब हो जाती है।
अब वास्तव में कॉम्पप्लिकेशन डॉक्टर के गलत सर्जरी करने से नहीं आया है, वह अपने आप कोई कॉम्पप्लिकेशन आ गया है। तो फिर क्या होता है? एक तरह से डॉक्टर का नाम खराब होता है—”तुमने सर्जरी गलत की!” हो सकता है डॉक्टर की गलती न हो, पर फिर भी बदनामी हो जाती है।
तो तभी हमें समझना चाहिए कि कभी-कभी कुछ परिस्थितियाँ ऐसी आती हैं कि उस समय हमारे पूर्व जन्म के कर्म प्रतिकूल होते हैं। जब प्रतिकूल होते हैं, तो हमारे उद्देश्य भले ही कितने अच्छे क्यों न हों, उसका अच्छा परिणाम नहीं होता है।
तो ऐसा जब हो रहा है, तो हमें कम से कम आध्यात्मिक रूप से सजग होना चाहिए। भगवद्गीता (2.47) में भगवान् कहते हैं:
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥
“कर्म में तुम्हारा अधिकार है, पर फल से आसक्त मत हो।” क्यों? क्योंकि फल केवल तुम्हारे कर्म से नहीं आ रहा है, तुम्हारी नियति (दैव) भी उसमें सहयोगी है। इसलिए तुम फल से आसक्त मत हो। और यह भी मत समझो कि तुम ही इस फल के एकमात्र कारण हो, क्योंकि हमारे परे भी कुछ और शक्तियाँ कार्य कर रही हैं। और इसका मतलब यह भी नहीं है कि तुम कर्म करना ही छोड़ दो!
हमें क्या देखना है? कि “भले ही समस्या हो, भले ही समस्या का हल करने का प्रयास करने से वह और बढ़ रही हो, मुझे यह देखना है कि यह समस्या मेरी पहचान नहीं है! मेरी पहचान है कि मैं भगवान् का सेवक हूँ। और भगवान् की सेवा के भाव में मुझे जो भी कार्य करना है, वह मैं करूँगा।”
फिर हमें फैसला करना है—अगर हम यह सोच रखते हैं कि “कुछ भी हो, समस्या बड़ी हो या छोटी, समस्या हमेशा के लिए रहे या कुछ समय के लिए रहे, मैं भगवान् का सेवक हूँ।”
तो अगर मैं समझ जाता हूँ कि मैं भगवान् का सेवक हूँ, तो फिर यह देखना है कि भगवान् की सेवा मैं किस तरह से कर सकता हूँ। तो कभी-कभी उस समस्या के साथ जीना ही एक तरह से भगवान् की सेवा हो सकती है!
समस्याओं से निपटने के तीन दृष्टिकोण
- हम खुद को बदल लें और सहन कर लें।
- हम परिस्थिति/व्यक्ति को बदल लें।
- हम उस स्थिति से दूर हट जाएँ।
ये तीनों पर्याय हम सेवा-भाव से भी कर सकते हैं और द्वेष/घृणा के भाव से भी कर सकते हैं।
- द्वेष भाव से: मैं खुद सहन कर रहा हूँ, पर सारा गुस्सा और क्रोध अंदर दबा के रख रहा हूँ—तो बाद में वह विस्फोट होगा।
- सेवा भाव से: जब हम समस्या से दूर चले जाते हैं, तो हम सोचते हैं—”मुझे जीवन में बहुत कुछ सार्थक करना है, ज़िंदगी केवल समस्याओं में उलझे रहने के लिए नहीं है, इसलिए मैं इस समस्या से हटकर दूसरी सेवा में लगता हूँ।”
पर जब हम द्वेष से भागते हैं, तो हम दूर चले जाते हैं पर हमारा मन उसी में फँसा रहता है। अगर सेवा-भाव रहता है, तो हम विचार कर सकते हैं कि “मैं इस स्थिति में भगवान् की सेवा किस तरह से कर सकता हूँ?” उस भाव से जब हम प्रार्थना करते हैं, तो भगवान् हमें मार्ग दिखाते हैं।
पूर्वकर्म बनाम वर्तमान कर्तव्य
प्रश्न: “अगर सब पूर्वकर्म का फल है, तो क्या हमें सामने वाले व्यक्ति के दोषों को सहते रहना चाहिए या कदम उठाना चाहिए?”
उत्तर: यह विचार करना कि “यह सब मेरे पूर्व जन्म का फल है”—कभी अनुकूल हो सकता है, कभी अनुकूल नहीं भी हो सकता।
मान लीजिए कोई नागरिक है और उसके घर में चोरी हो गई। वह पुलिस के पास जाता है, और पुलिस वाला बोलता है—”यह तो तुम्हारे पूर्व जन्म के कर्मों का फल है, मैं क्या करूँ!” यह उचित नहीं है! क्योंकि राजा/पुलिस का धर्म है कि चोर को पकड़े और संपत्ति वापस लाए। राजा द्वारा पूरा प्रयास करने के बाद भी अगर चोर न पकड़ा जाए, तब नागरिक सोच सकता है कि “शायद यह मेरे पूर्व जन्म का कर्म था।”
तो हमें देखना है कि “मेरा अभी का धर्म/कर्तव्य क्या है?”
जब किसी व्यक्ति के कारण हमें बहुत दुख पहुँचा है, तो उसको दोष न देना आसान नहीं होता। उस समय हम दो चीज़ें कर सकते हैं:
- मन को व्यस्त रखना: जब तक हम उस व्यक्ति के बारे में विचार कर रहे हैं, मन में दोष ही आएगा। तो बेहतर है कि हम उस व्यक्ति के बारे में विचार करना ही बंद कर दें और अपने मन को किसी सकारात्मक सेवा या जिम्मेदारी में व्यस्त कर लें।
- घाव को बार-बार न कुरेदना: यदि कोई ताजा जख्म (घाव) हुआ है, तो काल के प्रभाव से वह धीरे-धीरे भर जाता है। पर अगर हम बार-बार उसको स्पर्श करके देखें कि “दर्द हो रहा है कि नहीं, दर्द हो रहा है कि नहीं”—तो घाव कभी भरेगा नहीं!
तो जो घाव हमें भावनात्मक स्तर पर हुए हैं, उनके बारे में बार-बार सोचने से बेहतर है कि हम सोचें ही नहीं।
क्षमा (Forgiveness) और आत्म-ग्लानि (Guilt) से मुक्ति
क्षमा करने का मतलब यह नहीं है कि हम घटना को पूरी तरह भूल जाएँगे, बल्कि इसका मतलब यह है कि घाव भर चुका है और अब उस निशान को देखकर दर्द नहीं होता।
एक समय ऐसा आएगा जब हम कहेंगे—”जो हुआ सो हुआ, वह एक अध्याय था जो समाप्त हो गया। अब मुझे जीवन में आगे बढ़ना है।” जब तक हम ईर्ष्या, नफरत और क्रोध को दिमाग में लेकर चलेंगे, हम आगे नहीं बढ़ पाएँगे।
स्वयं को क्षमा करना (Forgiving Yourself): खुद को माफ करना भी बहुत महत्वपूर्ण है। कई बार अहंकार या आत्म-ग्लानि (Guilt) के कारण हम खुद को माफ नहीं कर पाते।
- खुद को सही ठहराना (Justifying): यह सोचना कि “मैंने कुछ गलत नहीं किया, मैं ही सही था”—यह आत्म-सुधार नहीं है।
- गलती स्वीकार कर आगे बढ़ना: यह सोचना कि “हाँ, मुझसे बहुत बड़ी गलती हुई है, पर अब वह हो चुकी है। मुझे इस गलती से सीख लेकर जीवन में आगे बढ़ना है और खुद को सुधारना है।”
जब हम खुद को बार-बार कोसते रहते हैं, तो वह आत्म-ग्लानि हमारे और भगवान् के बीच में आ जाती है। उससे हम सुधरते नहीं हैं, बल्कि और हताश हो जाते हैं।
इसलिए यदि अतीत में कोई गलती हुई भी है, तो उस गलती को अपने और भगवान् के बीच मत आने दीजिए। भगवान् से प्रार्थना कीजिए—”हे प्रभु, मुझसे गलती हुई, पर अब मैं आपकी शरण में रहकर आगे बढ़ना चाहता हूँ।” इस चेतना से हम जीवन में प्रगति कर सकते हैं।
बहुत-बहुत धन्यवाद! हरे कृष्णा!