Dealing with insecurities – Hindi
[Brahmachari class at ISKCON, Nasik, India]
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Lecture Summary
सारांश: भय का सामना और आध्यात्मिक जीवन
- गुरु और निर्भरता: आध्यात्मिक प्रगति हमारी अपनी ज़िम्मेदारी है। हमें यह समझना चाहिए कि अलग-अलग परिस्थितियों में मार्गदर्शन के लिए गुरु और भक्तों का संग आवश्यक है, किंतु परिपक्व समझ विकसित करके ही हम भक्ति मार्ग पर दृढ़ता से आगे बढ़ सकते हैं।
- भय का स्वरूप: भय इस भौतिक जगत का और तमोगुण का एक अनिवार्य लक्षण है। जब भय आवश्यकता से अधिक या विनाशकारी हो जाता है, तब यह नकारात्मक रूप ले लेता है।
- नियंत्रण और क्षमता: हमारे जीवन में नियंत्रण करने की आवश्यकता होती है, परंतु हमारी क्षमता मर्यादित है। पूर्व कर्मों के अनुसार प्राप्त क्षेत्र और हमारी क्षमता के बीच असंतुलन होने पर भय बढ़ जाता है।
- भय के प्रमुख कारण:
- अज्ञान और अवास्तविक चिंताएँ: जिन चीज़ों पर हमारा नियंत्रण नहीं है, उनके प्रति अत्यधिक विचार करना तमोगुणी भय को जन्म देता है।
- आसक्तियाँ: भौतिक चीज़ों या सामाजिक स्वीकृति (Rejection का भय) के प्रति अत्यधिक आसक्ति हमारे जीवन में अनावश्यक भय और चिंता उत्पन्न करती है।
- भय से मुक्ति के उपाय:
- सत्त्वगुण में स्थिति: अपनी क्षमताओं को पहचान कर और खुद की दूसरों से तुलना बंद कर सत्त्वगुण में आना।
- दो मुख्य प्रश्न पूछना: मन को भौतिक कल्पना से सत्य पर लाने के लिए स्वयं से पूछें—”इसका मुझपर अभी क्या प्रभाव हो रहा है?” और “इसके बारे में मैं अभी क्या कर सकता हूँ?”
- भगवान की शरणागति:
- डिपेंडेंस ऑन कृष्णा: जो हमारे नियंत्रण में नहीं है, उसके लिए भगवान पर पूर्ण निर्भर रहना।
- डिलिजेंस ऑन कृष्णा: जो हमारे नियंत्रण में है, उसके लिए पूरी ज़िम्मेदारी और एकाग्रता के साथ सेवा करना।
Full Transcription
हरे कृष्णा। तो आज मैं जो हमारे जीवन में अलग-अलग प्रकार के भय होते हैं, इंसेक्यूरिटीज होते हैं, उसके बारे में चर्चा करूंगा। और कुछ हद तक जीवन भक्ति फुल टाइम करने का प्रयास करें ब्रह्मचारी जीवन में, उसके बारे में इंसेक्यूरिटीज हैं, उसके बारे में चर्चा करूंगा थोड़ा। जीव गोस्वामी पाद, भगवद्गीता के उनके जो विश्लेषण उन्होंने किया है षट्संदर्बों में, उसमें वे विश्लेषण करते हैं कि भगवद्गीता का मूल संदेश क्या है। और इसके लिए वे भगवद्गीता का पहला श्लोक और आखिरी श्लोक उसकी चर्चा करते हैं। पहला श्लोक जो भगवान ने इंस्ट्रक्शन, उपदेश के रूप में बोला है और आखरी श्लोक जो उपदेश के रूप में बोला है। तो पहला श्लोक जो हमने पहले वचन जो भगवान बोलते हैं भगवद्गीता में वो पहले अध्याय के 25 श्लोक में बोलते हैं पर यह जो वचन है, यह डिस्क्रिप्टिव है, यह इंस्ट्रक्शन नहीं है, तो वर्णन कर रहे हैं, देखिए आप।
दूसरे अध्याय में, दूसरे और तीसरे श्लोक में, भगवान पुनः कुछ बोलते हैं पर वो भी क्या है, वह एक मित्र के रूप में एक दूसरे को प्रोत्साहन दे रहे हैं हे अर्जुन, ऐसा अनार्ग्य कर्म तो मत करो, ऐसा क्लैब्यम तुम में कहाँ से आया है, ऐसा मत आने दो तो क्लेब्यम मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परंतप। तो यह दोनों श्लोक भगवान भी एक मित्र के रूप में बोल रहे हैं और उसके बाद में अर्जुन शरणागत होते हैं अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः अशोच्यान अशोच्यान मतलब जिसके बारे में शोक करना उचित नहीं है जो शोक करने के योग्य नहीं है अभी एक तरह से शोक और भय ये अलग-अलग भावनाएं हैं पर शोक भी होता है वो भय से ही संबंधित हैं हम वही शब्द जो है जो मूल शब्द है शोच्यान का शोच वो भगवद्गीता का आखिरी शब्द भी है पर श्लोक 72 तक वो फलाश्लोक होती है 72 तक फलाश्लोक होती है बातत्तरवां श्लोक है एक प्रश्न अर्थोक श्लोक है पर जो आखरी उपदेशात्मक श्लोक है वो सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः यह देखिए सिमेट्री अशोच्यान और मा शुचः मूल शब्द एक ही है और अशोच्यान है यहाँ पर मा शुचः है मतलब भगवद्गीता का संदेश जीव गोस्वामी बोलते हैं आप शोक मत करो आप भय मत करो।
अभी यस्यां वै श्रूयमाणायै कृष्णे परम पुरुषे भक्तिर् उत्पद्यते पुंसाः शोकमोहाभयापहा भागवतम् के यह जो चार श्लोक है जिसमें व्यास देव क्या दृष्टि देखते हैं सारे ब्रह्मांड का जिसके आधार पर भागवतम् की रचना करते हैं उसका वर्णन आता है भागवतम् के श्लोक में और बताया गया है कि जब कृष्ण के बारे में श्रवण करते हैं यस्यां वै श्रूयमाणायै कृष्णे परमपुरुषे जो परमपुरुष कृष्ण हैं उनके प्रति भक्तिर् उत्पद्यते भक्ति उनके प्रति उत्पन्न हो जाती है शोक, मोह, भयापहा ये तीन अलग-अलग भावनाएं हैं शोक, मोह, भय भावनाएं हैं शोक भूतकाल के लिए होता है भय भविष्यकाल के लिए होता है मोह वर्तमान काल में होता है हर परिस्थिति में हमें है यह ऐसे क्यों हुआ, ऐसे क्यों हुआ उसने ऐसे नहीं करना चाहिए था मैंने वैसे नहीं करना चाहिए था यह सब शोक है मेरी तबीयत बिगड़ जाएगी, यह हो जाएगा वो हो जाएगा, तो क्या होगा यह भय है और मोह, अभी मुझे किस चीज़ से सुख मिल सकता है यह सब इसके बारे में मोह है।
भौतिक जगत का अनिवार्य अंग: भय और उसके प्रकार
तो अभी यह शोक, मोह, भय तो अभी जो भय होते हैं यह हम देखते हैं कि दो प्रकार से हम इसका चर्चा कर सकते हैं कि एक तो भय यह इस भौतिक जगत का एक लक्षण ही है हम जैसे इंग्लिश में ट्रांसलेट करते हैं आहार-निद्रा-भय-मैथुनम् च सामान्यमेतत् पशुभिर्नरैश्च। अभी भय है तो भय यहाँ एक फियर इज ऐन एक्जिस्टेंशियल कंडीशन ऑफ लाइफ इन द मटीरियल वर्ल्ड। यह जैसे हम कहो खाना खाना यहाँ एक फियर करना है वैसे एक तरह से जो भय है यह इस भौतिक जगत के बारे में एक अनिवार्य अंग है पर भगवद्गीता में भी बताया गया है कि भय यह एक तमोगुण का भी लक्षण है अध्याय के 35 श्लोक में भगवान बोलता है कि भयस्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च न विमुञ्चति दुर्मेधाः स पार्थ तामसः। विषादं मदमेव च न विमुञ्चति दुर्मेधाः स पार्थ तामसः हमेशा उदास रहता है यहाँ नशे में रहता है मतलब व्यक्ति यह अज्ञान की जगह है पर उसमें प्रकृति के तीन गुणों में अज्ञान यह एक और उसमें विशेषता है मतलब कैसे है कि कुछ प्रकार तक अज्ञान इस भौतिक जगत में अनिवार्य है क्योंकि इस भौतिक जगत की परिस्थिति ऐसी है कि हम अज्ञान में रहते हैं पर कुछ अज्ञान ऐसा है जो जब हम तमोगुण में आते हैं तब वो आता है तो इसको समझने के लिए कैसे है कि हम सबको खाना जरूरी है पर व्यक्ति कितना खाता है वह उस व्यक्ति में निर्भर है कितना क्या खाता है, क्या खाता है, किस प्रकार से खाता है तो जिसे खाना यह भौतिक जगत में जरूरी है पर वो खाना भगवद्गीता में बोलते हैं सत्त्व गुण में हो सकता है, रजोगुण में हो सकता है, तमोगुण में हो सकता है उस तरह से भय जो है यह इस भौतिक जगत में अनिवार्य है पर जब हम तमोगुण में होते हैं तो जो भय जो होता है वहां एक्सेसिव और डिस्ट्रक्टिव होता है वह जरूरत से ज्यादा भय हो जाता है और वह विनाशकारी भय होता है।
अभी जो होता है इसका मतलब कि भय वास्तव में एक तरह से हमारे संरक्षण के लिए ही अनिवार्य है भय नहीं होता है, भय नहीं होता है तो केयरलैस हो जाएगा और ध्यान नहीं देगा उसके लिए वो गिर सकता है तो वहां पे भय एक जरूरी है वो संरक्षण करता है, चौकन्ना बनाता है उनको पर मान लीजिए मैं वहां पे मुझे बहुत ऊंचे पहाड़ में गया था आप सब समझते हैं स्टिमुलस, जो बाहर पे रखा है अच्छा, स्टिमुलस के लिए आप सब समझते हैं स्टिमुलस प्रेरणा या प्रेरक हम सकारात्मक रूप से देखते हैं जिस चीज़ के कारण मुझे भय आ रहा है, अगर वस्तु है बाहर पे तभी भय आना ये अच्छा है, पर वस्तु है ही नहीं, फिर भय आ रहा है मतलब ये क्या है, ये फियरफुलनेस है तो अभी हम कभी भय से पूर्णतया मुक्त नहीं हो सकते हैं पर भय किस प्रकार का भय है, उसके बारे में हम चर्चा कर सकते हैं रूपी जी यहां तक कहते थे कि उनकी एक चिंता थी कि उनके शिष्य माया के प्रति पर्याप्त रूप से उनको भय नहीं है तो इस तरह से भय ये बुरी चीज़ नहीं है पर वो भय किस प्रकार का भय है और किस प्रकार का भय है, वहां समझना है।
नियंत्रण की असमर्थता और आधुनिक भय
तो अभी हमारी जीवन की परिस्थिति ऐसी है कि हम जो कार्य कर रहे हैं कि हम जो कार्य कर रहे हैं उसमें मुझे नियंत्रण करना जरूरी है अभी मैं कुछ क्लास दे रहा हूँ, तो मुझे कुछ हद तक ध्यान होना, स्मरणशक्ति होना, यह जरूरी है पर फिर भी ऐसे हो सकता है कि मैं भूल जाऊंगा तो अगर मैं भूल जाऊंगा तो क्या बोलूंगा, पता नहीं होगी तो कोई भी कार्य करना है, अगर हमें कुछ फेस्टिवल मैनेज करना है तो हमको कुछ हद तक नियंत्रण होना जरूरी है लोग इधर से आ जाएंगे, उधर से नहीं आना है उनको उधर से आ जाएंगे तो उनको उधर से नियंत्रण करना है पर अगर बहुत मात्रा में लोग आ जाएंगे तो उनको नियंत्रण नहीं कर सकते हैं तो एक तरह से हमें नियंत्रण करना हमारी जरूरत है पर नियंत्रण करने की क्षमता हम में है ही ऐसे जरूरी नहीं है इन दोनों में हम फंसे हैं कि मुझे नियंत्रण करना है पर नियंत्रण करने की शक्ति मुझमें नहीं है इसकी कारण मुझे भय होता है।
तो अभी कोई व्यक्ति अपना परिवार है और उस वहां के अपनी ऑटोनॉमी है तो आज ही उस को पैसा कमाना है तो पैसा कमाना ही जरूरी है पर पैसा कमा पाएगा ही इसकी अरे कुछ गारंटी नहीं है कल नौकरी चली जाएगी, दूसरी नौकरी मिलेगी नहीं, इकोनॉमी डाउन हो जाएगी तो क्या करेंगे। तो इस तरह से हम सबको हमारे सारे परिस्थिति के अनुसार भय अनिवार्य है। तो अभी हम भारत में हैं, तो यहां पे लोगों को हमें भय होता है कि जो नौकरी मिलेंगे कि नहीं या मैं अपना घर खरीद पाऊंगा की नहीं, क्या मेरा सेहत अच्छा रहेगा की नहीं अब पाश्चात्य देश में जाएंगे। तो वहां पे लोगों भय है। पहले इतना भय नहीं हुआ करता था नौकरी का, पर अभी इकोनॉमी बहुत वहां पे भी डाउन हो रही है। तो वहां पे लोगों को भय होता है। तो यहां पे कई बार लोग जीवन रिश्ते बनाते हैं तो रिश्तों के दौरान भय आ जाता है कि कोई रिश्ता टूट जाएगा तो क्या होगा ये हो जाएगा तो क्या होगा तो अलग-अलग पद्धतियों से हमें नियंत्रण करना है पर नियंत्रण वो नहीं हो पाता है।
इक्कीसवीं सदी के दो प्रमुख भय: आतंकवाद और अस्वीकृति
तो कुछ वैज्ञानिकों ने, मनोवैज्ञानिकों ने संशोधन किया है कि लोगों के प्रधान भय क्या होते हैं? तो जो 21वीं शताब्दी में हमने देखा कि 19वीं शताब्दी में, 20वीं शताब्दी में, 21वीं शताब्दी में, 18वीं शताब्दी में, लोगों के क्या भय थे। अभी एक कुछ ग्रंथ पढ़ के, लोगों के मेमॉएर्स पढ़ के, वही दिखा, देखा। तो जब मैं संशोधन किया कि दो भय ऐसे हैं, जो अभी खासकर के 21वीं शताब्दी में आ गया है अधिक रूप से। एक है फियर ऑफ टेररिस्ट्स। आतंकवादियों का भय। बहुत भय होता है। मैं डेल्वर एयरपोर्ट में था, तो किसी कारण से, जब मैं सिक्योरिटी चेक में जा रहा था, तो उनके मशीन ने दिखा दिया, कि मेरे क्रच के अंदर बॉम आ गया है। मैं इतनी बार वो क्रच लेके गया हूँ, पर कहीं भी कुछ प्रॉब्लम नहीं आ रहा था। तो इसके अंदर बॉम आ गया हो रहे हैं। तुरंत वहाँ से मुझे निकाला हो रहे है, फिर हाई सिक्योरिटी केबिन में लेके गए, और वहाँ पर पूरा चेक अप किया, बॉडी चेक अप किया, फिर वो क्रच खोलने लग गया है। जो ये कुबरी खोलने का प्रयास कर रहे थे, वो उनसे खुल नहीं रहा था। हमको मिला है कि यहाँ पर, इसके अंदर कोई अनइन्टीफाइड ऑब्जेक्ट है, जो एक्सप्लोसिव लगता है हमको। हमको ये तोड़ना पड़ेगा। तोडूंगा तो चलूंगा कैसे मैंने? हमारा प्रॉबलम नहीं है, आपका प्रॉबलम नहीं है। ऐसे कैसे हो सकता है? तो मैंने उनको दिखा रहा है, तो मैं स्क्रूटनी के लिए आए, खोला उन्होंने। और खोलने के बाद क्या बदला? मैं, वो क्रच के अंदर, क्रच हॉलो था, तो उसके अंदर थोड़ा मिट्टी था। तो वो मिट्टी को उन्होंने एक्सप्लोसिव मान गया था। तो उसके पहले मैं जो वृंदावन गया था, अमेरिका जाने के पहले, ब्रजधाम का आश्तिवार देने के लिए, और तभी क्रच के नीचे, जो एक रबर, यह होता है, होल्डर, वो रबर होल्डर निकला गया था। तो उसके बाद कुछ मिट्टी अंदर से लगे थी।
जब मुझे रबर होल्डर लाया था, तो उसके ऊपर लगा दिया था। सो, द वृंदावन डस्ट इज़ एक्सप्लोसिव। व्रज की रजो होती है, व्रज की रजो एक्सप्लोसिव होती है। तो अभी, वहाँ पर लोगों बहुत भय हो जाते हैं, कि अगर आतंकवादी आएंगे, आतंकवादी आएंगे कुछ एक्सप्लोजन हो गया, तो यह एक बहुत बड़ा भय है। तो दूसरा भय यह है, जो नए भय है एक तरह से, जो 21वीं शताब्दी में और बढ़ गया है, यह इज द फियर ऑफ रिजेक्शन।
रिजेक्शन मतलब, कि भारत हो या पाश्चात्य देशों, सब से 50, 100, 200 साल के लिए, सब जो संबंध जोड़ते थे, लोग विवाह होते थे, वो अरेंज होते थे, अभी क्या हो गया है, सब लोग खुद ही अपना पार्टनर ढूंढते हैं, तो इस तरह से उनको लगता है कि मुझे आजादी मिल गई है, जिसको मैं चाहूं, उसको मैं चुन सकता हूँ, पर इसके कारण क्या हो गया है, वो हर व्यक्ति को, खुद अपनी पात्रता दुनिया को दिखानी पड़ती है, और विवाह होते हैं, तो उसके कारण, मैं जब पहले बार अमेरिका में गया, तो मैं इतने सारे जिम देखे वहाँ पे, जिम, जिम्नेशियम होते हैं, इतने सारे देखे, मैं इतने, इतने लोग ये एक्सरसाइज कॉन्शियस कैसे हैं वो? इंडिया में तो इतने लोग जिम होते नहीं है, अभी हमें आने लग गए हैं, पर इतने होते नहीं है, तो मुझे लगा कि ये पाश्चात्य लोग एक्सरसाइज कॉन्शियस हैं, हेल्थ कॉन्शियस हैं, तो वो सही है, पर बाद में जब उनसे बात करता था, तो वो हेल्थ कॉन्शियस नहीं है, वो फिगर कॉन्शियस है, वो जिम में जाते हैं, अपने सेहत अच्छा रखने के लिए नहीं, अपने लुक्स अच्छे रखने के लिए, ताकि वो एक पार्टनर को अट्रैक्ट कर सकें, वो है प्राइमरी उद्देश्य होगा, और पाश्चात्य देशों में योग, जो योग करते हैं, योगासन करते हैं, वहाँ भी बहुत लोकप्रिय हैं, पर कैसे कोई चीज, संस्कृति, एक संस्कृति तो दूसरे संस्कृति में आते हैं, तो उसका पूरा जो उद्देश्य बदल सकता है, भारत में योग साधना जो थी, योगासन जो थे, वह अधिकांश रूप से वैरागी पुरुष किया करते थे, पाश्चात्य देशों में, जो योगासन जो है, अधिकांश रूप से वो नौजवान स्त्रियां करती हैं, क्योंकि उनका उद्देश्य ये है कि उनको अपना शरीर आकर्षक रखना है, तो अगर कोई भी योगा प्रोग्राम में जाओगे, तो लगभग 90% वुमेन होते हैं वहाँ पे, और 10% पुरुष होते हैं वहाँ पे, तो यहाँ पर क्या हो गया है, कहने का उद्देश्य ये है कि ये जो फियर ऑफ रिजेक्शन, कि मैं खुद को, मैं दूसरों के लिए आकर्षक हूं या नहीं, इसकी चिंता, ये बहुत बड़ी चिंता होती है, जब मैं कॉलेज प्रोग्राम लेता हूँ, तो उसके बाद में विद्यार्थी आकर बात करते हैं, अधिकांश क्वेश्चन उनके होते हैं, कोई फिलॉसफी का कुछ पूछता ही नहीं है, अधिकांश क्वेश्चन रिलेशनशिप्स के बारे में होते हैं, ये ऐसे हो गया, ये वैसे हो गया, ये से हो गया, वैसे हो गया।
क्षेत्र और पूर्वकर्म: भय से मुक्ति का मार्ग
फियर ऑफ रिजेक्शन है। देखता है कि हमने नियंत्रण करना है पर नियंत्रण करने की क्षमता हम में नहीं है, उस विचारधारा से अगर हम विश्लेषण करते हैं हम सबको अपने-अपने पूर्व कर्मों के द्वारा कुछ क्षेत्र दिया गया है क्षेत्र मतलब भगवद्गीता के 13वें अध्याय में भगवान दो शब्द इस्तेमाल करते हैं प्रकृति और क्षेत्र नेचर और प्रकृति क्षेत्र क्षेत्रज्ञम्, पुरुषः प्रकृति, ज्ञान और ज्ञेय इन छह विषयों के बारे में चर्चा की जा रही है हमें प्रकृति मतलब साधारणतया जो है भौतिक प्रकृति के बारे में वर्णन होता है क्षेत्र मतलब वो भौतिक प्रकृति में किस इलाके पे एक आत्मा को नियंत्रण करने की क्षमता दी गई है वह उस आत्मा का क्षेत्र है तो अभी चींटी होगी, चींटी का क्षेत्र छोटा सा है उसका शरीर छोटा है, उसका क्षेत्र छोटा है जो हाथी है, उसका शरीर बड़ा है, उसका क्षेत्र भी बड़ा है चींटी एक घर में आ जाएगी, किसी को पता भी नहीं चलेगा हाथी घर में आ जाएगा, तो लोग डर जाएंगे अभी ये क्षेत्र जो है, ये केवल मात्रा में नहीं है कोई बिच्छू होता है, छोटा सा ही है और काटने की क्षमता जो है, उसको मृत्यु ला सकता है तो मतलब, वो क्षेत्र में हम प्रभाव किस तरह से कर सकते हैं वो शरीर की मात्रा से कर सकते हैं, शरीर की क्षमता से कर सकते हैं वह बौद्धिक क्षमता से कर सकते हैं तो अभी हम सबको हमारे पूर्व कर्म के अनुसार कुछ क्षेत्र मिला है कोई व्यक्ति, उनकी स्मरणशक्ति बहुत अच्छी होती है कोई व्यक्ति, व्यक्तियों की स्मरणशक्ति इतनी अच्छी नहीं होती है तो शास्त्रों के ज्ञान का स्मरण करके बोलने में किसी का क्षेत्र बड़ा है, किसी का क्षेत्र छोटा है कोई लोग उसके से बातचीत करने में बहुत सक्षम होते हैं न केवल बातचीत करने में, पर संबंध जोड़ने में संबंध जोड़ने के लिए जरूरी याद रखना, उचित समय पर उचित चीज बोलना कुछ लोगों का वो क्षेत्र अच्छा है, कुछ लोगों का वो क्षेत्र अच्छा नहीं है हम सबको अपने-अपने क्षेत्र पूर्वकर्म के द्वारा मिले हैं अब इस क्षेत्र को हम थोड़ा प्रशिक्षण से, प्रयास से बढ़ा भी सकते हैं किसी व्यक्ति को अच्छी बोलने की क्षमता पहले से हो सकती है पर प्रयास से वो उसको और बढ़ा भी सकता है तो यह जो हमारा क्षेत्र है, उस पे हमारा कुछ हद तक नियंत्रण होता है और जब हमारे प्रकृति के अनुसार, हमारे पूर्वकर्म के अनुसार जो हमें क्षेत्र दिया गया है और जो हम कार्य कर रहे हैं अगर ये दोनों क्षेत्रों में समन्वय नहीं है, तो भय बहुत बढ़ जाता है।
तो हम सबको, अगर हम देखेंगे, मुझे किस चीज के बारे में भय है? मैं अमेरिका में एक प्रवचन कॉलेज में प्रोग्राम गया था, ओवरकमिंग नेगेटिव इमोशंस तो उसमें एक था ओवर एक नकारात्मक जो भावना होते, उसको परे जाना, तो उसमें एक था भय, फियर तो फियर साथ विद्यार्थियों को हमने पूछा कि आप सबका सबसे बड़ा भय क्या है? तो सब लोगों ने अलग-अलग जवाब दिया, तो उससे वास्तव में हमें क्या समझ में आता है? कि अवर फियर रिवील्स व्हॉट वी होल्ड डियरेस्ट हमें सबसे महत्वपूर्ण क्या है हमारे जीवन में, वो पता चलता है कि इससे हमें भय होता है जब वो ट्विन टावर अमेरिका में गिर रहे थे, तो वो एक्सीडेंटली प्लेन का टक्कर हो गया था और प्लेइन का टक्कर होने के बाद जो ट्विन टावर में कुछ बिजनेसमेन ऐसे थे, वो रिजनेबल, तो 30वें, 40वें, 50वें मंजिल पे थे, तो वहाँ से दौड़ के नीचे आके भाग सकते थे, पर फिर भी वो कुछ स्टॉक शेयर में इन्वेस्ट कर रहे थे, शेयर से जरूर निकाल रहे थे, वो बोले, वो उनको बोला, अरे ये टावर गिरने वाला है, अब आ जाओ, यहां टावर पे टक्कर हो गई है, बॉम एक्सप्लोजन हो गया, आप आ जाओ, एक्सप्लोजन हो गया, नहीं, नहीं, कुछ नहीं हो गया, आपको काम करना है, और वहीं पर काम करते रहे, एक गिर जाएगा, नहीं, गिरने वाला है, काम करते रहे, कुछ लोग ऐसे थे, 50वें, 60वें मंजिल पे थे, और कई कि-कि गिरने का भय आ जाता था, वो स्कैटर्ड हो गए थे, भय दिखा है। दिस इज़ पार्ट वन
आसक्ति, नियंत्रण और भय का संबंध
आसक्ति से ही यह स्थिति हो जाती है कि जो दूर की चीज़ जो है, उसके बारे में भय आ जाएगा और जो पास की चीज़ है, उसके बारे में कम होता है। मैं जब अमेरिका में था, मैं एक जगह में था, मैं फ्लोरिडा में रहा था, तो फ्लोरिडा में तभी बहुत बड़ा तूफान आ गया था। अमेरिका के इतिहास में जो तूफान था, सबसे बड़े तूफानों में से एक था। तभी मैं फ्लोरिडा में था, क्योंकि वहाँ पर कुछ प्रोग्राम थे, तो मैं न्यूयॉर्क चला गया था। तो फिर न्यूयॉर्क से मैं कुछ भक्त थे, कुछ मित्र थे, कुछ रिश्तेदार भी थे, वो फ्लोरिडा में थे, तो उनको फोन किया मैंने, कि आप कैसे हो। तो सबसे पहले उन्हें जवाब दिया, आपको पता है, इंडिया हार गई क्रिकेट मैच। तो अभी वहाँ तूफान था, और तूफान के कारण कुछ लोग बेघर हो गए थे, बहुत बड़े घर में थे, तो उनको सबसे पहले वो चिंता थी, पर उनको तूफान आ गए इसकी चिंता नहीं थी, इंडिया हार गई क्रिकेट मैच की चिंता थी।
तो क्या होता है, कभी-कभी हमारे आसक्ति के कारण, हम जो असली खतरे पास में हैं, उसके बारे में चिंता नहीं करते हैं, पर यह दूर की चीज़ है, जिसके बारे में खतरे वास्तव में है भी नहीं इतने बड़े, यहां तो खतरा है नहीं, पर थोड़ा कम खतरा है उसके बारे में हमको भय होता है। तो पहली चीज़ मैंने बताया है कि भय क्यों होता है, क्योंकि हम, हमको जो नियंत्रण कर सकते हैं और जिस पे हम नियंत्रण करना चाहते हैं, अगर इन दोनों में भेद हैं, मैं अच्छे से बोल सकता हूं, पर मैं मैनेजमेंट अच्छे से नहीं कर सकता हूं, अगर मैं मैनेजमेंट में लगता हूं, तो फिर क्या होता है, क्योंकि मुझ में एक क्षमता वो कम है, इसके बारे में भय उसमें ज़्यादा होता है।
भक्तों की सेवा और कार्यक्षमता का संतुलन
अभी कुछ भक्त ऐसे होते हैं, उन चीजों के बारे में ज़्यादा करना, वो उनको बहुत अच्छा लगता है। लेक्चर तो, मैं, लेक्चर तो एक ड्यूटी होती है। कुछ लोग अपने-अपने अच्छा लगता है, उसके बारे में लोग बात करना, कितना टाइम बात करेंगे, जल्दी खत्म करो यार से। तो क्या होता है कि हर एक व्यक्ति के अनुसार कुछ चीज़ उनको अच्छा लगता है, कुछ चीज़ उनको बोझ लगता है। तो यह क्या है कि एक चीज़ मैंने बोला कि हम किस चीज़ में सक्षम हैं। उसके अनुसार, अगर उसके बाहर हम जाके कुछ कार्य करते हैं तो हमारा भय बढ़ जाता है। क्योंकि हमें वो नियंत्रण करने की शक्ति है, उतनी नहीं है हमें उसमें।
दूसरे चीज़ में बताया कि अगर हम आसक्त होते किसी चीज़ से तो फिर हम ऐसे चीज़ में नियंत्रण करना चाहते हैं जिसमें वास्तव में कुछ नियंत्रण है भी नहीं। मैं स्टॉक मार्केट क्रैश होने वाला है तो उसमें क्या नियंत्रण है मेरा। अभी जब हम भक्ति करते हैं, भक्ति में लगते हैं तो उससे वास्तव में भय किस तरह से हमको आश्रय मिलता है।
सत्त्वगुण और आत्म-निरीक्षण (इंट्रोस्पेक्शन)
आसक्ति ऐसे नहीं है कि हमेशा बुरी ही है, एक तरह से जिम्मेवारी के लिए हम लेते हैं तो उसमें थोड़ी आसक्ति होनी चाहिए। अगर हमारी आसक्ति जिम्मेवारी के पीछे… मैं थोड़ा चर्चा बाद में करूँगा, पर एक तरह से हमारी आसक्तियाँ कम हो जाती हैं। दूसरा है कि जब हम भक्ति करते हैं, उसके लिए हम सत्त्वगुण में आते हैं। सत्त्वगुण में आते हैं तो हमारे आत्म-निरीक्षण हम और कर सकते हैं और उससे हम कुछ समझ सकते हैं कि मैं किस चीज़ में सक्षम हूँ और फिर यह जो मिसमैच होता है, कई बार वो दुनिया बोलते हैं अरे दुनिया में लोग बोलते हैं कि ये सेवा करनी चाहिए, ये करने से बहुत कुछ सेवा ऐसा होती है कि ये करेंगे तो सब लोग गुणगान करेंगे, सब लोग सराहना करेंगे, पर अगर वो मेरा स्वभाव नहीं है तो वो करने की ज़रूरत नहीं है मुझे और वो न करने से मुझे खुद को अक्षम मानना ज़रूरी नहीं है।
कभी कुछ-कुछ लोग प्रचार कैसे होते हैं कि वो लोगों को बहुत हंसाते हैं तो भी उनके प्रचार के लिए सैकड़ों लोग आ जाते हैं, तो फिर शायद उतना वो लोगों को आकर्षित नहीं करेंगे। तो अभी कुछ लोगों का ऐसे कर्म होता है कि इससे वो उनको हंसा सकते हैं, लोगों को आकर्षित कर सकते हैं, पर कितने लोगों को हंसा रहे हैं वो महत्वपूर्ण नहीं है, कितने लोगों को भक्ति में प्रेरणा देने हैं वो महत्वपूर्ण नहीं है। तो अगर कुछ लोग आम तुलना करते हैं, इसके प्रचार में इतने लोग आते हैं, मेरे प्रचार में कुछ नहीं आते हैं, कोई लोग नहीं आते हैं, उससे अगर मुझे इनसिक्योरिटी होने लगती है तो मुझे समझना चाहिए कि हर एक व्यक्ति को भगवान ने अलग-अलग भूति दी है, अलग-अलग क्षमता दी है, तो फिर मेरी क्षमता के अनुसार मैं सेवा करूँगा।
रजोगुण की तुलनात्मक प्रवृत्ति बनाम सत्त्वगुण
तो अगर हम जब तक हम रजोगुण में हैं तो क्या होते हैं हम बहुत तुलनात्मक रहते हैं। जब हम रजोगुण में होते हैं तो हम दूसरों से तुलना करते होते हैं, हम बहुत तुलनात्मक रहते हैं। सत्त्व में आता है तो हम तुलना कैसे करते हैं, हम खुद की क्षमता से करते हैं, बिल्कुल इंट्रोस्पेक्शन और इसके द्वारा थे हम समझ सकते हैं कि वास्तव में ठीक है। ये मेरी क्षमता है, क्षमता के साथ मैं कर रहा हूँ। ये मेरी क्षमता ज्यादा अच्छा है तो इसमें मैं ज्यादा जोर देता हूँ, वो ऐसे हम देख सकते हैं।
और मूलभूत रूप से जो दो चीज़ें हैं, हमें नियंत्रण करना है और नियंत्रण की शक्ति हम में भक्ति के ज्ञान से कैसे देख सकते हैं। भक्ति में दो चीज़ें हैं: डिपेंडेंस ऑन कृष्णा और डिलीजेंस फॉर कृष्णा। डिपेंडेंस ऑन कृष्णा मतलब भगवान पे निर्भर हो जाना। और डिलीजेंस फॉर कृष्णा मतलब भगवान के लिए ज़िम्मेदारी लेना। भगवान के लिए ज़िम्मेदारी लेके एकाग्र होके सेवा करना। द्रोपदी की शरणागति होती है तो वो अपने दोनों हाथ उठा लेते हैं। डिपेंडेंस ऑन कृष्णा मतलब भगवान पे निर्भरता है। जब अर्जुन भगवद्गीता ज्ञान में शरणागत होते हैं, वो अपने हाथ में उठा लेते हैं, वो अपना धनुष उठा लेते हैं। तो उनकी शरणागति क्या है? भगवान के लिए ज़िम्मेदारी स्वीकार करना, डिलीजेंस फॉर कृष्णा।
नियंत्रण और भगवान पर निर्भरता का संतुलन
अभी कैसे है कि दोनों शरणागति ही है, पर हमारे सब के जीवन में, हर परिस्थिति में कुछ चीज़ें हमारे नियंत्रण में हैं, कुछ चीज़ें हमारे नियंत्रण में नहीं हैं। तो जो चीज़ें हमारे नियंत्रण में हैं, उसके लिए हमें ज़िम्मेदारी स्वीकार करना। कुछ डिलीजेंस के साथ हमारी वास्तविकता में है, और कुछ कृष्णा के साथ थी नहीं है वास्तविकता में जो हम जीवन में हमारे नियंत्रण नहीं है, उसके लिए हम भगवान पे निर्भर हैं।
मैं जब लगभग 10 साल पहले प्रवचन, 20 साल पहले प्रवचन करना चालू किया था, तब ये एक वरिष्ठ भक्त ने कुछ गाइडलाइंस दिए थे कि कैसे आपको प्रवचन करना है। तो आखिरी पॉइन्ट था भगवान पे निर्भर रहो, ब्रैकेट में, पर ओनली आफ़्टर यू आर प्रिपेयर्ड। अपनी तैयारी करने के बाद। अगर कोई बिना तैयारी के प्रवचन के जाता है, मैं भगवान पे निर्भर हूँ। वो भगवान पे निर्भरता नहीं है, वो वास्तविकता में गैर-ज़िम्मेदारी है। जब हम प्रवचन करते हैं, तो प्रवचन देते हैं, तो फिर क्या है? उसकी तैयारी करना, क्या बोलने वाला हूँ, उसके जितना हो सकता है उतना प्रवचन के बारे में, कुछ प्रश्न-उत्तर होने वाले हैं, तो अब उसके लिए कौन प्रश्न, कौन पूछने वाला है, हमको पता नहीं है तो उसके लिए डिपेंडेंस ऑन कृष्णा, तो उसके लिए हमें भगवान पे निर्भरता नहीं है हम भी तैयारी कर सकते हैं थोड़ी बहुत, पर कितना हम तैयारी कर सकते हैं, किस प्रकार का सवाल, कौन पूछने वाला है उसके बारे में।
इसलिए हर कार्य में, जब हम देखते हैं कि क्या मेरे नियंत्रण में है और क्या मेरे नियंत्रण में नहीं है और जिस चीज़ पे हमें नियंत्रण है उस पे हम हमारी शक्ति डालते हैं, उस पे हम ज़िम्मेदारी लेते हैं और जो हमारे नियंत्रण में नहीं है वहां हम भगवान पे निर्भर कर देते हैं। अगर ये भाव होता है तो जो हमारा भय है वहां काफी हद तक हम कम कर सकते हैं।
भौतिक जगत की अनिवार्यता और हमारी चेतना
अब क्योंकि हमेशा, जो मैं शुरुआत में बोला मैंने कि, कि भय यह एक भौतिक जगत का अनिवार्य विभाग ही है क्योंकि हमारे नियंत्रण में जो है, वह सीमित है पर हमारा यश है, हमारा अस्तित्व भी है, वह ऐसे चीज़ों पे निर्भर है, जो हमारे नियंत्रण में नहीं हैं। मुझे प्रवचन देना है मुझे, पर प्रवचन से लोग कितना परिपूर्ण मिलेंगे, क्योंकि वह प्रवचन पे निर्भर नहीं है, वह उसके अब जो प्रश्न-उत्तर होंगे उस पे भी निर्भर है तो फिर अब उसमें मैं नियंत्रण नहीं है, तो इसलिए अगर मेरा मन… तो भय अनिवार्य है क्योंकि कुछ चीजें मेरे नियंत्रण में नहीं हैं, काफ़ी चीजें मेरे नियंत्रण में नहीं हैं, तो इसलिए भय अनिवार्य है पर अगर मैं जो चीजें मेरे नियंत्रण में नहीं हैं, उसके बारे में ही विचार करता हूँ, और जो चीजें मेरे नियंत्रण में हैं, उसके बारे में विचार करता ही नहीं हूँ, तो फिर उससे मैं मेरा भय बढ़ा रहा हूँ।
तमोगुण में क्या होता है कि हम इन बारे में अनिवार्य हैं, अनिवार्य में अनिवार्य हैं… जो भी करना है, मैं पूरा करके दिखाऊँ, कोई समस्या नहीं आएगी, मैंने फैसला कर लिया, होके ही रहेगा यह। तो ऐसा ज़रूरी नहीं है कि होके रहेगा। जब हम सोचते हैं कि पूरतः, सब कुछ मेरे नियंत्रण में है, यह सब कुछ मेरे नियंत्रण में आ जाएगा, वो राजसिक है—ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहम बलवान्सुखी, आद्योऽभिजनवानस्मी कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया। भगवान कहते हैं यह आसुरी प्रवृत्ति है वास्तव में, कि मैं ईश्वर हूं, मैं भोगी हूं, सब से अच्छा मैं हूं, जो भी चाहूं मैं करूंगा, जो भी मेरे बीच में आ जाएगा, मैं उसको निकाल दूँगा। यह जो भाव है, मैं सब कुछ नियंत्रण कर सकता हूं, यह रजोगुण का भाव है।
रजोगुण और तमोगुण के भय
मैं कुछ भी नियंत्रण नहीं कर सकता, यह तमोगुण का भाव है, यह किस्मत ही फूटी है, कोई मेरी मदद नहीं करता है, सब लोग अपनी-अपनी दुनिया में हैं, कोई मेरी परवाह नहीं करता है, मैं अकेला पड़ा हूँ यहाँ, क्या करूँ मैं। इस तरह से जो हमारे नियंत्रण में नहीं हैं, उस पे हम रह रहते हैं, तो हम खुद को असहाय महसूस करने लगते हैं। अभी दोनों, रजो और तमोगुण, वो दोनों से भय आता है।
क्योंकि कुछ चीज़ मेरे नियंत्रण में है, मैं कैसे ड्राइव कर रहा हूँ, मैं स्पीड लिमिट के ऊपर नहीं जा रहा हूँ, मैं ब्रेक दबाने के तत्पर हूँ कि अभी सामने से कोई शराबी आता है, शराबी कोई ड्राइव कर रहा है, उसमें मेरा नियंत्रण नहीं है। अगर मैं ड्राइविंग करते समय सोचूँगा कि सब कुछ मेरे नियंत्रण में हैं, कोई भी परिस्थिति में मैं चला सकता हूँ, तो वहाँ पर सिग्नल है, अभी एक बहुत कठिन टर्न है, स्लो जाओ। बोला, नहीं, मैं हाई स्पीड पर चला जाऊंगा। तो क्या होगा, मैं नियंत्रण नहीं कर पाँगा, और एक्सीडेंट हो जाएगा वहाँ पर। तो रजोगुण में हम, अगर मैं गाड़ी चला रहा हूँ, और गाड़ी अभी रास्ते से बाहर जा रहे हैं, तो तभी कुछ लोग क्या होते हैं, पैनिक हो जाएगा, एक्सीडेंट होने वाला है। ठीक है, अभी कम से कम नियंत्रण करो, एक्सीडेंट होगा, पर अगर मैं स्टीयरिंग व्हील छोड़ ही दूँगा, तो और बड़ा एक्सीडेंट हो जाएगा, तो कुछ हद तक हमारा नियंत्रण की क्षमता हम में है, तो उस तरह से हमको इंद्रियों का नियंत्रण करना है, हमको सोचना है, मैं मेरे दृढ़ संकल्प से पूरे इंद्रियों विषयों पे विजय प्राप्त करूँगा, कोई प्रलोभन मुझे विचलित ही नहीं करेगा, यह रजोगुण का भाव है।
और तमोगुण में कोई सोचता है, कैसे कोई नियंत्रण कर सकता है, यह संभव ही नहीं है, प्रयास नहीं करता नियंत्रण करेगा, तो और पनामा आ जाएगा, यह तमोगुण में चले जाते हैं। तो हमें जो हर परिस्थिति में, अगर हम सत्त्वगुण में आते हैं, तो फिर हम देख सकते हैं क्या मेरे नियंत्रण में है, क्या मेरे नियंत्रण में नहीं है, और जो मेरे नियंत्रण में है, उस पे हम हमारी चेतना एकाग्र करके उस पे कार्य करते हैं, और जो हमारे नियंत्रण में नहीं है, उस पे हम भगवान पे निर्भर हो जाते हैं।
आध्यात्मिक सत्य और भौतिक कल्पना से मुक्ति
तो अगर हमको भय होने लगता है, हर एक व्यक्ति को अलग-अलग पद्धति से भय हो सकता है, और इसे हम नहीं होना चाहते हैं कि हमारे नियंत्रण में बहुत करते हैं, अरे मुझे भय लगता है कि मुझे कैंसर हो गया है, तो कौन देखभाल करेगा मेरी, भविष्य में अगर मंदिर बंद पड़ गया, तो मैं कहां जाऊंगा, भविष्य में यह हो जाएगा, तो क्या होगा, भविष्य में वो हो जाएगा, तो क्या होगा। तो अगर भय हो रहा है, तो ऐसे नहीं है कि हमको अस्तुर्णत ऐसे नहीं बोला जाएगा, अरे भय हो गया, मतलब क्या है, कि मैं में आ सकता हूँ, मुझे भगवान में श्रद्धा नहीं है, उस दिशा में जाने की ज़रूरत नहीं है, ठीक है, अगर श्रद्धा नहीं है, तो क्या कर सकते हैं, श्रद्धा बढ़ाने की विधियों का पालन कर रहे हैं, उससे धीरे-धीरे श्रद्धा बढ़ जाएगा।
पर अभी हम क्या पहला सवाल है, इसका अभी मुझ पे क्या परिणाम होने वाला है, अगर आंधी-तूफान आ रहे हैं, भविष्य में यह हो जाएगा, तो क्या होगा, ठीक है, अभी क्या होने वाला है उससे, अभी, ठीक है, यह हो सकता है, अभी कुछ भी नहीं हो रहा है, तो हम, कैसे देखते हैं कि हमारा, यह स्पिरिचुअल रियलिटी है, यह मटेरियल रियलिटी है, यह मटेरियल इमेजिनेशन है, एक भौतिक कल्पना है, भौतिक सत्य है, और एक आध्यात्मिक सत्य है।
तो जो शुद्ध भक्त है, वो आध्यात्मिक सत्य में स्थित है, वो समझ गए, कि मैं आत्मा हूँ, भगवान हमारे साथ हृदय में है, तो भगवान सब कुछ देख लेंगे। तो अभी तक हम आध्यात्मिक सत्य में पूरी तरह से स्थित नहीं हुए, थोड़ा हमको जानकारी है, थोड़ा विश्वास भी है, पर उतना नहीं है। तो जब भय होता है, तो क्या होता है, हम भौतिक कल्पना में चले जाते हैं, और ये हो जाएगा, हो जाएगा, हो जाएगा, तो क्या होगा। तो हमें सत्त्वगुण में देखना चाहिए, हम भौतिक सत्य में हैं, अगर मैं गाड़ी चला रहा हूं, और बारिश होने लग गई है, तो बारिश में टायर स्किड हो जाएगा, तो एक्सीडेंट हो जाएगा, तो क्या होगा, ठीक है, अभी क्या हो रहा है—how does it affect me right now, अभी मैं गाड़ी चला रहा हूं, ठीक है, what can I do about this right now, अभी क्या है कि हमारा भौतिक जगत से जो इंटरेक्शन होता है, हमारा भौतिक जगत से जो सम्बन्ध होता है, वो दो पद्धति से होता है, हम वहां से कुछ जानकारी अंदर लेते हैं, और हम यहां से कुछ कार्य करते हैं। तो हमारे ज्ञानेन्द्रियों से कुछ चीज़ें अंदर लेते हैं, कर्मेन्द्रियों से कुछ कार्य करते हैं। तो जो भय होता है, क्या होता है? कि हमारे जो ज्ञानेन्द्रियों को इधर-उधर बिखरा देता है। अरे ये हो जाएगा, वो हो जाएगा, वो हो जाएगा।
वर्तमान में जीना और वर्बलाइज करना
तो क्या है, सत्त्वगुण में आना मतलब? कि सबसे पहले, कि इसका मुझे अभी क्या परिणाम होने वाला है? क्या सवाल है? अभी। मतलब, अभी क्या परिणाम होने वाला है? अभी तो कुछ नहीं है। अच्छा कल प्रवचन, मैं पहला प्रवचन देने वाला हूँ। अगर मैं भूल गया तो क्या होगा? अभी क्या प्रवचन, अभी कुछ नहीं होने वाला है। अभी मेरे पास 2-3 घंटे हैं, मैं तैयारी करता हूँ। मैं नोट्स सामने रखूँगा, इसलिए भक्तों को, कोई मुझे श्लोक भूल जाता है, कोई भक्त याद दिला देंगे श्लोक। क्योंकि हम अभी क्या कर सकता हूँ? अभी इसका मुझे क्या प्रभाव हो रहा है? मतलब, बाहर से क्या अंदर आने वाला है? और अभी मैं इसके बारे में क्या कर सकता हूँ?
अगर ये दो सवाल हम करते हैं, तो तुरंत हम, इन दो सवालों के जवाब ढूंढने में, हम सत्त्वगुण में आ जाते हैं। और जब हम महामंत्र बोलते हैं, कि हम कई बार से कहते हैं कि, जोर से बोलो, मन में मत बोलो। कि मन में बोलते हैं तो क्या होता है? तो मन इधर-उधर भटकते रहता है, और हमें भी बताने जाता है, कि मन भूल रहा है। हम जब बोलते हैं, तभी भी मन भूलता है, पर अगर बहुत भूलने लगा तो, तो हमारा मन बोलना भी बंद कर देगा। हम मुंह से बोलना भी बंद कर देंगे। हम सोच में लग जा रहे हैं। जब मुंह से बोलते हैं, तो फिर, उससे क्या होता है? हमारे, हम और जागरूक होते हैं, हम और सचेत हो जा रहे हैं। तो उससे तरह से यह जो सवाल है, इसको अगर हम, अगर हम सबको अपना-अपना भय लगता है, तो यह दोनों सवाल, मन में नहीं, थोड़ा जोर से, नहीं कोई चीख के बोलने की ज़रूरत नहीं है, पर वर्बलाइज इट। क्योंकि यह मुझे अच्छा करता है अगर हम बोलते हैं, तो क्या होता है, तो फिर जो मन इधर-उधर भटक रहा है, वो आ जाता है, यहां पे आ रहा है, ठीक है, क्योंकि यह मुझे अच्छा करता है अगर हम बोलते हैं, यह हो सकता, यह हो सकता, यह हो सकता, ठीक है, मैं इसके बारे में क्या कर सकता हूँ, ठीक है, यह कर सकता हूँ, यह कर सकता हूँ, यह कर सकता हूँ।
द्रौपदी और अर्जुन का दृष्टांत तथा भगवान पर पूर्ण निर्भरता
तो क्या होता है, कि जितना, कई बार ऐसी परिस्थितियां आ सकती हैं हमारे जीवन में, कुछ भी हमारे नियंत्रण में नहीं है, उस समय हम द्रौपदी की परिस्थिति में चले जाते हैं, पूरा हाथ ऊपर कर लो। पर ऐसे नहीं है कि जब दुशासन ने द्रौपदी को खींच के लेके गए थे अंदर, तो तब से पहले से उसने हाथ ऊपर कर दिये थे, तो ऐसे नहीं है कि द्रौपदी जब उसने हाथ ऊपर किये तभी वो शरणागत थी, उसके पहले भी वो प्रयास कर रही थी, तर्क-वितर्क कर रही थी, वो जो अत्याचार हो रहा था उसको रोकने का प्रयास कर रही थी, तभी भी वो धर्मनिष्ठ ही थी, जितनी उसकी क्षमता थी, उसकी क्षमता के अनुसार नियंत्रण करने का प्रयास कर रही थी, वो तर्क-वितर्क करके वो जो भी पत्ती थी, उसको टालने का प्रयास कर रही थी, पर जब कुछ भी नियंत्रण नहीं रहा, तो उसने हाथ ऊपर कर ली थी।
उस तरह से हम देखते हैं, अर्जुन भी जब जयद्रथ का वध करना था, पूरा प्रयास के लिए नहीं, और भरसक प्रयास करके वो जयद्रथ के पास में पहुंच गए, पर जब ऐसी शैली को कि दीवार मानो बीच में आ गई, और सूरज जब रोशनी खत्म होने लग गए, तो क्या हो गया? भगवान ने मदद कर ली, भगवान ने सूरज को ढँक लिया। तो इसलिए भक्ति में हमें भगवान पे निर्भर रहना है, पर भगवान के शरणागत हो जाना मतलब, सिर्फ भगवान पे निर्भर रहना यह कैसे है? एक तरह से, जो मेरे नियंत्रण में नहीं है, उसके लिए मैं भगवान पे निर्भर रहा हूँ। अभी जो मेरे नियंत्रण में है, उसके लिए मैं भगवान पे निर्भर हूँ… हम सब के पास कुछ क्षमता ज़रूर है, तो उस क्षमता का इस्तेमाल करके हम भगवान की सेवा में लगते हैं।
और इस तरह से, जब हम ये दो चीज़ें समझ जाते हैं, क्या मेरे नियंत्रण में है, उसके लिए मैं ज़िम्मेदार रहता हूँ, दोनों में हम भगवान की स्मृति कर सकते हैं। तो क्या नहीं मेरे कंट्रोल में है, कृष्णा के कंट्रोल में है। क्या मेरे कंट्रोल में है, कृष्णा के कंट्रोल में है, जो मेरे नियंत्रण में है, वो भगवान की योजना के अनुसार मुझे ये नियंत्रण दिया गया है। तो रजोगुण में क्या होता है, दोनों में भगवान को नहीं दिखते हैं, जो मेरे नियंत्रण में नहीं है, वो क्या होगा पता नहीं, जो मेरे नियंत्रण में है, मैं… इन दोनों में हम भगवान को देखते हैं, और इस तरह से हम कृष्णभावनाभावित होकर जो भय है, उससे मुक्त हो सकते हैं।
भय का सामना और भगवान की शरण
उसके परे जा सकते हैं। मच्चित्ता सर्वदुर्गानि मत्प्रसादात्तरिष्यसि। भगवान कहते हैं कि अगर आप मेरी चेतना में आ जाओगे, तो जो भी परिस्थितियां आएंगी आपके जीवन में, विपत्ति की और सारी विपत्तियों के आप मेरे परे जा सकते हो। इस तरह से हम भगवान के तत्वज्ञान को समझकर, उसको हमारे जीवन में व्यावहारिक रूप से कारगत करके, हम सारे भयों का सामना कर सकते हैं। तो सारांश में अच्छा है कि किस तरह से हम हमारे भय का सामना कर सकते हैं। तो उसमें हमने शुरू में देखा कैसे कि हमें भय यह एक तमोगुण का लक्षण है और भय यह भौतिक जगत का भी लक्षण है। तो भय यह अनिवार्य है और भय यह संरक्षणात्मक है जब हम किसी खतरे में होते हैं। पर जब खतरा नहीं है तभी भय रहता है तो वो नकारात्मक है, वो बहुत ही अधिक है और वो डिस्ट्रक्शनकारक हो जाता है। तो इन दोनों में फर्क कैसे होता है कि हम सबको भय क्यों होता है? हम सबको नियंत्रण करना है, करना ज़रूरी है। पर नियंत्रण करने की क्षमता हमारी मर्यादित है। इसके कारण हम सबको भय अनिवार्य है कि हमें नियंत्रण करना है, पर नियंत्रण कर सकते हैं कि नहीं, हमें पता नहीं है। इसमें हम, हमारे पूर्व कर्मों के अनुसार हमें कुछ क्षेत्र दिया गया है, कुछ नियंत्रण करने की क्षमता दी गई है। तो अगर हमारे नियंत्रण करने की क्षमता के विपरीत हम कुछ नियंत्रण करने का प्रयास करते हैं, तो उससे हमारा भय बहुत बढ़ जाता है। यह एक तरह से पहला कारण है भय का। तो उससे हम जितना हम सत्त्वगुण में आ जाएंगे, तो हमारे नियंत्रण करने की क्षमता और नियंत्रण करने का कारण, हम दोनों में समन्वय बिठाने का प्रयास करेंगे और उससे हम भय को कम कर सकते हैं।
दूसरा है कि हमारे आसक्तियों के कारण हमें भय आ जाता है कि उसके कारण जो चीज़ों में हमारा नियंत्रण है भी नहीं, उसके बारे में हम चिंता करने लगते हैं। तो जब हम भक्ति करते हैं, तो उससे हमारी आसक्तियाँ कम हो जाती हैं, उससे भय भी कम हो जाता है। तो आसक्तियों के संबंध में उदाहरण लिया, वो ट्विन टावर्स में तूफान बाहर है, उसकी चिंता नहीं है और भारत हार रहा है क्रिकेट में, उसकी चिंता होगी है। तो इस तरह से हमारा मन हमें आसक्तियों के कारण जो चीज़ें महत्वपूर्ण भी नहीं हैं, उसमें फंसा सकता है। अगर समझ नहीं पाएंगे कि क्या मेरे नियंत्रण में है और क्या मेरे नियंत्रण में नहीं है, तो उससे भय हो सकता है। अगर जो मैं सोचता हूँ, यह सब कुछ मेरे नियंत्रण में है या सब कुछ मेरे नियंत्रण में आ जाएगा और जब कुछ नियंत्रण से बाहर चला जाता है, तो भय लगने लगता है, तमोगुण में लगता है कि कुछ भी मेरे नियंत्रण में नहीं है, तो भय ही भय लगा रहता है। जब हम जो हमारे नियंत्रण में नहीं है, उसके बारे5 में बहुत विचार करते हैं, तो उससे जो भय आता है, वो तमोगुणी भय है, क्योंकि कुछ चीज़ें हमारे नियंत्रण में नहीं होती हैं। इसलिए भय अनिवार्य है, पर उनके बारे में हम ज़्यादा विचार करने की जगह जो चीज़ें हमारे नियंत्रण में हैं, उस पर ज़ोर देते हैं, तो उससे हम कार्यशीश हो सकते हैं। यह सत्त्वगुण में हमारे दुष्ट लाने के लिए हम दो सवाल पूछ सकते हैं—इसका मुझपर अभी क्या प्रभाव हो रहा है और इसके बारे में मैं अभी क्या कर सकता हूँ? तो जो मन भौतिक कल्पना में चला गया है, उसको हम भौतिक सत्य पे ला सकते हैं और फिर उससे हम भक्ति की साधना से आध्यात्मिक सत्य पे ला सकते हैं। आध्यात्मिक सत्य क्या है? कि जो मेरे नियंत्रण में नहीं है, वो भगवान के नियंत्रण में है, जो मेरे नियंत्रण में है, वो भी भगवान के नियंत्रण के द्वारा ही मुझे नियंत्रण दिया गया है। तो दोनों में मैं भगवान का स्मरण कर सकता हूँ। तो भक्ति में हम भगवान की शरणागति दो पद्धति से कर सकते हैं—डिपेंडेंस ऑन कृष्णा, उनके निर्भर हो जाना और डिलिजेंस ऑन कृष्णा, उनके लिए ज़िम्मेदारी स्वीकार करना। और जब हम ये दोनों करते हैं, पहला श्लोक था अशोच्यान और आखिरी श्लोक था मा शुचः, तो इस संदेश के द्वारा हम हमारे शोक से या हमारे भय से हम धीरे-धीरे उसका सामना करके उसके परे जा सकते हैं। बहुत-बहुत धन्यवाद, हरे कृष्णा! कोई सवाल है किसी का?
कर्तव्य, कर्म और प्रकृति के गुण
चार्ट, प्रोफ़ाईड किए तो आपके लिए बोल रही है कि तुम्हें का सामना करना चाहिए, युद्ध करना चाहिए। तो कृष्ण के लिए कि तुम्हें जो बोल रही है कि जीवित स्थिति चाहिए, तो जो इससे वो कृष्ण की शक्ति के बारे में प्रेरित कर सकता है। तो उसका जीवन तीन गुणों से बंधा हुआ है। तो अगर हेल्पलेस है, तो पार्टी के विपरीत के बारे में प्रेरित कर सकता है। तो अगर हेल्पलेस है, तो पार्टी के विपरीत के बारे में प्रेरित कर सकता है। तो अगर हेल्पलेस है, तो पार्टी के विपरीत के बारे में प्रेरित कर सकता है कि आप विचार करके फैसला करो कि आपको क्या करना है। तो मतलब कर, भगवान यह नहीं कह रहा है कि मोह में हो तू, तुम्हें तुम्हें फैसला करना है। और अर्जुन का 10 श्लोक उसके बाद में बोलते हैं, करिष्ये वचनं तव, मैं आप जो बोलोगे, वो मैं करूँगा। तो हम सब कर्ता ज़रूर हैं, ऐसे नहीं है कि हम कर्ता नहीं हैं। तो I think सोलहवें श्लोक में अठारहवें अध्याय में भगवान बोलते हैं—तत्रैवं सति कर्तारम् आत्मानं केवलं तु यः पश्यत्य कृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मतिः। जो सोचता है कि मैं अकेला करता हूँ, वह मोह है। तो इसलिए हम ज़रूर कर्ता हैं, हम प्रकृति के तीन गुणों से बंधे हैं। पर विज्ञानाधिप्रतिपूरक पता देवं के तासुपरेमे कि किस गुण के प्रभाव में हमें आना है, वो चुनाव हम कर सकते हैं। जीव है, वह अपने आप तीन गुणों के परे में नहीं आ सकता है, पर वह सत्त्व गुण में रहना चाहता है या तमोगुण में रहना चाहता है या रजो गुण में रहना चाहता है।
अगर कोई विद्यार्थी पढ़ाई कर रहा है और उसको नींद आने लगती है या उसको बोर होने लगता है, तो अभी अगर वो सोचेगा कि मैं मेरे कमरे में जा के बिस्तर पे लेट के पढ़ाई करूँगा, तो क्या हो जाएगा? अगर मैं मेरे मोबाइल पे कुछ न्यूज़ पढ़ता हूँ, कुछ फेसबुक पढ़ता हूँ, तो उसमें फंस जाएगा, शायद रजो गुण में चला जाएगा।
सेवा और क्षमता का विचार
…कार्ये करना ज़रूरी नहीं है मेरे लिए, इसको नहीं बोल सकता हूँ उस तरह से। ये शिवान प्रिया? प्रयास करते हैं, क्या हमारे पेड़ीकोट स्किल्स देते हैं उस शिवान का काम करने के लिए, क्या हम प्रयास नहीं करते हैं? अगर कुछ क्षेत्र में शिवा बहुत ज़रूरी है, तो क्षेत्र में हमें क्षमता नहीं है, तो फिर क्या भगवान हमें वो क्षमता देंगे? देखो, भगवान क्षमता देंगे या नहीं है, हमें पता नहीं है, पर हमें क्या पता है, कि हम हमारे शरणा ज़रूर व्यक्त कर सकते हैं कि ये हमारी क्षमता किस में है या किस में नहीं है, ये समझने के लिए भी काफ़ी सत्त्वगुण लगता है। कि कई बार हमारे, अभी हम जब आत्म-निरीक्षण भी करते हैं, तो कई-कई बार वो आत्म-निरीक्षण नहीं होता है, वो मन-निरीक्षण हो जाता है। मतलब हम मन के आधार पर देख रहे हैं। अगर मन को पूछेंगे, क्या ये सेवा, मेरे स्वभाव के लिए कौन सी सेवा है? मन बोलेगा, जो सेवा तुम कर रहे हो, वो नहीं है। अगर हम प्रचार कर रहे हैं, तुम शास्त्रों का अध्ययन करो, इतना प्रचार करो, क्या फ़ायदा होगा? शास्त्रों का कुछ ज्ञान है क्या? हम शास्त्रों का अध्ययन करें, कितना शास्त्र पढ़ोगे? जा के प्रचार करो ना! हम जो भी कर रहे हैं, मन हमको आज प्रचार कर रहे हैं, कितना शास्त्र पढ़ोगे… तो वह एक तरह से हमारे पूर्व कर्मों पे निर्भर है, एक तरह से भगवान की योजना पे निर्भर है।
तो कभी-कभी ऐसे होता है कि कोई ये, कोई प्रचारक है, वो युवा प्रचारक है, पर उनके प्रवचन में सैंकड़ों लोग आते हैं। कोई बहुत वरिष्ठ सन्यासी प्रचारक है, पर वो इतने अच्छे से प्रचार नहीं कर पाते हैं, इतने लोग उनके प्रचार में नहीं आते हैं, आकर्षित नहीं होते हैं। तो क्या इसका मतलब भगवान ने उनको क्षमता नहीं दी है? नहीं, क्षमता जो होती है, वो अलग-अलग पद्धति से होती है। कुछ लोग लोगों को आकर्षित करते हैं, कुछ लोग, कुछ प्रचारक होते हैं, वो एक व्यक्तिगत रूप पर लोगों को प्रेज़ कर सकते हैं। तो क्या है? Ability is not the only evidence of Krishna’s mercy, कि व्यक्ति को क्षमता मिल गई, यही भगवान की कृपा का लक्षण ज़रूर नहीं है। Ultimately, absorption is the greatest symptom of Krishna’s mercy. व्यक्ति, भगवान कितना, भगवान के स्मरण में लीन हो गया है? कोई व्यक्ति के प्रवचन में हज़ार लोग आते हैं, पर अगर वो यही देख रहा है कि हज़ार लोग आए मेरे प्रवचन में, तो प्रवचन देते समय जो श्रोतागण हैं, वह भगवान का स्मरण कर रहे हैं, पर यह वक्ता स्मरण कर रहा है, हज़ार लोग को मैंने आकर्षित किया है!
कोई व्यक्ति, दस लोग आए, कुछ-कुछ प्रचार करते, वहाँ आँखें बंद करके प्रचार करते, एक वरिष्ठ सन्यासी हैं। वहाँ आँखें बंद करके पूरा प्रचार करते हैं, उनको बोला कि, उनको सवाल पूछा मैंने एक बार। आज कि आप आँखें बंद करके क्यों प्रचार करते हैं? वो से इदर डाई। “I am a very fallen soul. I preach only for my purification.” तो हमारे पुरीफ़िकेशन को बोला था कि मैं बहुत पतित हूँ, क्योंकि नम्रता है ये, कि मैं एक प्रचार मेरे शुद्धिकरण के लिए कर रहा हूँ। और मेरे शुद्धिकरण कब होगा जब मैं भगवान का स्मरण करूँगा। तो प्रचार का उद्देश्य क्या है? खुद भगवान का स्मरण करो, जो ऑडियंस है, वो भगवान का स्मरण कर रहा हूँ। तो मुझे आँखें खोलने की क्या ज़रूरत है? तो मैं भगवान का स्मरण आँखें बंद करके करूँगा। जिनको स्मरण करना है, वो स्मरण करेंगे। तो मैं उनको बोला, आप आँखें बंद करो, लोग भी आँखें बंद करके सो जाते हैं। इनको सोना है, सोने दो उनको। तो उनकी विचार था, वो काफ़ी अलग है। तो क्या है कि हमें ज़्यादा इसके बारे में विचार नहीं करना है कि भगवान क्षमता देगा कि नहीं। अगर हमको क्षमता नहीं मिलती है, तो हम सोचें, यार भगवान मुझे कृपा नहीं कर रहे हैं, क्या भगवान मुझसे नाराज़ हैं, भगवान ऐसे क्यों कर रहे हैं? कि भगवान कृष्ण के मन को समझने का प्रयास करना। अगर हम सोचें, यार भगवान मुझसे नाराज़ कर रहे हैं। भक्ति जब हम स्वीकार करते हैं, मतलब क्या? एक रहस्यपूर्ण जीवन भगवान किसी के संबंध में हम स्वीकार करते हैं। मतलब भगवान कैसे कार्य करेंगे, क्यों कार्य करेंगे, उसके हम कुछ प्रिडिक्शन, भविष्यवाणी नहीं कर सकते उसके बारे में।
तो हम हमारे शरणागत भाव से, जो भी सेवा दी है, करते रहते हैं और जैसे हम समझते हैं कि अच्छा इसमें मुझे क्षमता ज़रूर है, धीरे-धीरे उस सेवा के वहाँ हम जा सकते हैं। एक बार कुछ कष्ट हो गया है? तब जैसे हम डिपेंडेंस की बात करते हैं, बहुत होता है और एक बार हमारा बहुत होता है कि डिपेंडेंस नहीं होता है तो जो अथार केस होता है, तो देख सकते हैं, वो सोच कर सकते हैं…
गुरु, निर्भरता और आध्यात्मिक प्रगति
प्रभुपाद जी बोलते हैं कि जो गुरु है, वह एक पारदर्शक मीडियम है जीव और कृष्ण के बीच में, भक्त और कृष्ण के बीच में। तो अभी कभी-कभी ऐसे हो सकता है कि वही भगवान जो मुझे आश्रय दे रहे हैं, किसी एक व्यक्ति के द्वारा, वह आश्रय मुझे बाद में किसी और व्यक्ति से दे सकते हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि दोनों से हमारा डिपेंडेंस के पहले कृतघ्न हो जाते हैं। पर हमें यह भी देखना है कि मेरी ज़रूरत अभी क्या है? व्यक्ति होता है छोटा बालक होता है, तो माँ पे निर्भर होता है, पिता पे निर्भर होता है। बड़ा होता है तो उसको अपने भाई-बहन होते हैं, मित्र होते हैं। बड़ा होता है उसका आखुद का परिवार होता है। तो अभी क्या है कि हमारे आध्यात्मिक जीवन में भी अलग-अलग परिस्थितियों में हमें अलग-अलग प्रकार के संगों की ज़रूरत पड़ती है और जो संग हमें जब भक्ति में नए आए थे, उससे बहुत प्रेरणा मिलती है, शायद 10 साल के बाद उस संग से हमें उतनी प्रेरणा नहीं मिलेगी, तो 15 साल के बाद उससे प्रेरणा नहीं मिलेगी। तो हमें हमेशा यह समझना है कि यह ध्यान में रखना है कि मेरी आध्यात्मिक प्रगति यहाँ मेरी ज़िम्मेदारी है, यह किसी और की ज़िम्मेदारी नहीं है, यह मेरे गुरु की भी ज़िम्मेदारी नहीं है, यह मेरी ज़िम्मेदारी है। प्रभुपाद जी कहते हैं कि हम सब को, हम अपना खुद का प्लेन खुद को चलाना है। तो हम, हम जब निर्भर भी होते हैं, जब मैं किसी से निर्भर भी होता हूँ, तो ऐसे नहीं है कि तुम जो बोलोगे मैं वो करूँगा और मेरी अपनी ज़िम्मेदारी खत्म! ऐसे नहीं है। और निर्भरता भी मैं मेरे ज़िम्मेदार बुद्धि के अनुसार चुन के निर्भर होता हूँ। जब कहते हैं इनिशिएशन के बारे में भी ऐसे, इनिशिएशन दिया है, केवल एक पल पे किया हुआ एक कार्य नहीं दिया है, इसलिए बार-बार हमें खुद को कमिट करना चाहिए। उस तरह से डिपेंडेंस दिया है, यह एक चॉइस है।
और अगर ऐसे हो गया है कि जिस पे मैं पहले निर्भर था, कोई भी परिस्थिति क्यों न हो कि वो चले गया है या वो भक्ति में नहीं है, हमारा उनसे संबंध अच्छा नहीं है, तो हमें देखना है कि क्यों हुआ। अगर कुछ सीख सकता हूँ मैं उससे, तो अच्छी बात है, पर मुझे मेरे भक्ति में प्रगति करने के लिए अभी जो ज़रूरी है, वहाँ स्वीकार करके मुझे आगे प्रगति करनी है। इसलिए यहाँ जब हम बेसिक डायनामिक्स समझते हैं कि मेरी आध्यात्मिक प्रगति मेरी ज़िम्मेदारी है, उसके बाद मैं यह ज़िम्मेदारी मैं कैसे पूरी करूँगा? उसके लिए निर्भरता ज़रूरी है, पर निर्भरता किस पे होनी चाहिए है? वह महत्वपूर्ण है देखना। अगर जिन पे मैं निर्भर हो रहा हूँ, वो भी उनसे मुझे आश्रय नहीं मिल रहा है, उनसे मुझे मार्गदर्शन नहीं मिल रहा है, उनसे मुझे प्रेरणा नहीं मिल रहा है, तो अभी मैं उनका आदर करूँगा, पर मुझे आश्रय, मार्गदर्शन, प्रेरणा की ज़रूरत है, वह ज़रूरत कहाँ से पूरी हो सकती है? तो उनके बारे में हमें कृतघ्न नहीं होना है, उनके बारे में हमें कीप ए डिस्टेंस, अगर डिस्टेंस किसी के बारे में आ गया है, पर हमें ज़रूरी है कि हम हमारी ज़रूरत पूरी करके भक्ति करते रहें। जब इस तरह से यह भाव हम देखते हैं कि यह मेरी ज़िम्मेदारी है, पर फिर हम हमारी ज़रूरत है, वो पूरा करने का प्रयास हम खुद करेंगे।
कुछ भक्त होते हैं, वो बहुत एनालिटिकल होते हैं, उनको बहुत से सवाल आते हैं और उनको सवालों के जवाब चाहिए, तो उनको बहुत संशय आते हैं और संशय तो उनको हल चाहिए। कोई भक्त है दूसरे हैं, जो मान लीजिए कोई भक्त है, जो उनको बहुत एनालिटिकल है, उनकी अथॉरिटी है, वो इतने एनालिटिकल नहीं हैं, तो वो शायद बोलें कि तुम इतने सवाल क्यों सोचते हो, तुम इतना सोचते क्यों हो? तुम सीधा जप करो, सेवा करो, कुछ वो बोल सकते हैं, पर मैं नहीं रह सकता वैसे। यह मेरी ज़रूरत है। अगर तब मुझे ऐसे कोई भक्त है, जो भी एनालिटिकल हैं, उनकी मैं लेक्चर सुन सकता हूँ, उनसे सवाल पूछ सकता हूँ, उनका संग ले सकता हूँ और मैं उससे मैं जवाब प्राप्त कर सकता हूँ।
तो ऐसे यह कैसे होता है कि हम जिनसे भी आश्रय ग्रहण करते हैं? जब हम बालक छोटा होता है, तो क्या होता है? उसके लिए अपने माता-पिता ही सब कुछ होते हैं, माता-पिता ही भगवान होते हैं। पर उसके बाद में, जब वो युवा का समय चले आते हैं, मन में भक्ति, यह इतना नहीं दिया, यह नहीं किया, यह उनमें अच्छा नहीं है, यह उनमें अच्छा नहीं है, तो क्या होता है? तभी वो एक रिबेलियन के फेस में चल जाता है। तो पूरा एक पहला था टोटल एक्सेप्टेंस, तो बाद में होता है टोटल रिजेक्शन। और उसके बाद में जब हम और बड़े हो जाते हैं, तब हम थोड़ा और मैच्योर अंडरस्टैंडिंग आता है। तो एक ब्रिटिश लेखक है, वो कहते हैं कि जब मैं 15 साल का था, तब मेरे पिता वो एक अज्ञानी मूर्ख थे। अब मैं 25 साल का हो गया हूँ, मुझे आश्चर्य लगता है कि मेरे पिता ने 10 साल में कितना सीख लिया! मैं परिपक्व हो गया हूँ, तो वो जब बोले थे कि ऐसा सही है, वो समझ में आ गया हूँ।
तो क्या होता है कि हम जब परिपक्व हो जाते हैं, तो एक मैच्योर अंडरस्टैंडिंग आता है। एक हमारी धारणा होती है कि ये भक्त मतलब ऐसे हैं। जब पहले आते हैं मंदिर, हमको लगता है हर भक्त शुद्ध भक्त है। और फिर हमको बाद में लगता है कि सब भक्त अशुद्ध हैं, कोई शुद्ध भक्त है ही नहीं इसमें! फिर बाद में आप प्रगति करते देखते हैं, हाँ ठीक है, सब अशुद्ध भी होंगे, पर बहुत से भक्त सिंसियर हैं, प्रयास कर रहे हैं और संघर्ष कर रहे हैं, उनसे भी प्रेरणा मिल सकती है। तो हमको परिपक्व स्तर पे आना है।