Determination in the three modes – Hindi
[Class at Radha Madan-Gopal Mandir, ISKCON Nasik on Bhagavad-gita 18.33-35]
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Lecture Summary
- प्रभुपाद जी का आदर्श: प्रतिकूल परिस्थितियों और उम्र की सीमाओं के बावजूद, प्रभुपाद जी ने भगवान के संदेश को विश्वभर में फैलाने के लिए अद्वितीय दृढ़ संकल्प और समर्पण का परिचय दिया।
- जप और मानसिक व्यायाम: जप के दौरान मन का भटकना यह स्वाभाविक है। जप को किसी बोझ या परेशानी के रूप में न देखकर एक ‘मानसिक व्यायाम’ (Exercise) समझना चाहिए, जिससे मन मजबूत और सक्षम बनता है।
- तामसिक और सात्विक धृति (दृढ़ संकल्प):
- तामसिक धृति: भ्रम, भय, विषाद और अवास्तविक कल्पनाओं (जैसे डेलूजनल पैरासाइटोसिस का उदाहरण) में फंसे रहना और गलत आदतों को न छोड़ना (जिद करना) तामसिक दृढ़ संकल्प है। धृतराष्ट्र का चरित्र इसका एक उदाहरण है।
- राजसिक धृति: भौतिक सुखों, काम और अर्थ की प्राप्ति के लिए अत्यधिक आसक्ति रखना। बिना धर्म के रजोगुण व्यक्ति को असंतोष और अंतहीन तृष्णा की ओर ले जाता है (हिरण्यकशिपु का उदाहरण)।
- सात्विक धृति: योग और भगवान के साथ संबंध जोड़कर सकारात्मक योगदान देना। यह मन की तपस्या है, जहाँ असंतोष की भावना को त्यागकर संतुष्टि और कर्तव्य-भाव अपनाया जाता है।
- असंतोष और आधुनिक समाज: आधुनिक विज्ञापन और तुलना की संस्कृति के कारण लोगों में असंतोष बहुत बढ़ गया है। संतुष्टि कोई बाहरी परिस्थिति नहीं, बल्कि मन की एक तपस्या और निर्णय है।
- संग और व्यावहारिक परिवर्तन: नकारात्मक लोगों के संग से बचना चाहिए और वरिष्ठ भक्तों के मार्गदर्शन में रहना चाहिए। जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने के लिए केवल मानसिक संकल्प पर्याप्त नहीं है, बल्कि जीवनशैली और आदतों में व्यावहारिक परिवर्तन (जैसे प्रलोभनों से दूरी) करना आवश्यक है।
Full Transcription
हरे कृष्णा। इस कार्यक्रम में सहभागी होने का मौका प्राप्त प्रोग्राम में कुछ दक्य हूँ। मैं पिछले साल अमेरिका को प्रचार करने गया था। पिछले साल अमेरिका के वेस्ट कोस्ट पर लगुना बीच नाम की एक जगह है। बहुत सुन्दर जगह है। वहाँ पर मैं जिन भक्तों के ध्यान में रह रहा था, वो बता रहे थे मुझे कि क्या आप शिक्षा आश्रम को जानते हैं? हम उनके खान हैं। मैं भी उनका खान हूँ। प्रतिदिन ये वो अपने घर में अपना कार्यक्रम लेते हैं। जो हम प्रावल लेते हैं, वो शिक्षा आश्रम का गीता अमृत प्रावल सुनके हम हमारा प्रावल वो ही देते हैं। तो ये गीता अमृत का प्रावल सात सागर पार कर के अमेरिका के उस कोस्ट पे भी जाके पहुँच गया है। मैं बहुत प्रसन्न हूँ यहाँ पर।
मैं भगवद गीता के अठारहवें अध्याय के तीन श्लोकों पर चर्चा करूँगा। भगवद गीता में जो अठारहवा अध्याय है, वह एक तरह से गीता का सार है और दूसरी तरह से गीता का शिरोमणि है। सार मतलब उसके बीच में जो आता है या उसके सबसे महत्वपूर्ण जो चीज़ है, वो बताना। और शिरोमणि मतलब उसका सर्वोच्च है, वो बताना है। तो अठारहवें अध्याय में दोनों हो रहा है। जो भगवान ने पहले बताया है, वो उसको दोहरा रहे हैं पर वो सिर्फ दोहरा नहीं रहे हैं। वो दोहराते समय उसी विषय को और गूढ़ लेके जाते हैं और उसके साथ-साथ उसका और व्यावहारिक रूप से बंधन करते हैं।
कर्म और स्वार्थ का त्याग
तो अठारहवें अध्याय में भगवान बताते हैं किस तरह से जो तीन गुण हैं। भगवान ने पहले के अध्याय में बताया है कैसे हम कार्य करते हैं और किस तरह से हमें निष्काम भाव से कार्य करना है। सकाम कर्म है, वो बंधन का कारण बनता है। आज जो सोचना थी कि बंधन से छूटने के लिए मुझे कर्म ही छोड़ना चाहिए। पर भगवान कहते हैं कि आपको कर्म नहीं छोड़ना है। आपको क्या छोड़ना है? स्वार्थ छोड़ना है। कि जो व्यक्ति स्वार्थ छोड़ देता है, वो कर्म करता है पर कर्मयोगी कहलाता है। तो ये जो बताते हैं भगवान कि स्वार्थ भाव से काम करो। अच्छे करना, उसका विश्लेषण भगवान अठारहवें अध्याय में लेते हैं।
और अठारहवें अध्याय में जो प्रकृति के तीन गुण हैं, उनका उपयोग करके बताते हैं कि हम जो कर्म कर रहे हैं, वह किस पद्धति से हो सकता है। ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्म चोदना करणं कर्म कर्तेति त्रिविधः कर्मसंग्रहः। तो अठारहवें अध्याय के सत्रहवें, अठारहवें उन्होंने शिष्णों से चलता है, उससे भगवान बताते हैं कि आगे मैं क्या बोलने वाला हूँ। तो हम बताते हैं कर्म, कर्ता और फिर उसके बारे में ज्ञान, बुद्धिमत्ता, धृति और सुख।
कर्म मतलब जो कार्य कर रहे हैं, वो कहते हैं कि ये सत्वगुण में हो सकता है, रजोगुण में हो सकता है, तमोगुण में हो सकता है। जो कर्ता हो सकता है, वो भी सत्वगुण, रजोगुण, तमोगुण में हो सकता है। और उसके बारे में कहते हैं कि हमारा जो बुद्धि होती है, वह सत्वगुण, रजोगुण, तमोगुण में हो सकता है। और उसके बारे में हमारी धृति, धृति मतलब जो हमारा दृढ़ संकल्प है, वह भी सत्वगुण, रजोगुण, तमोगुण में हो सकता है। और फिर अन्त में हम जो कार्य करते हैं, उससे भी जो सुख मिल रहा है, वह सुख भी सत्वगुण, रजोगुण, तमोगुण में हो सकता है। मतलब इस तरह से जो कर्म हैं, उसका विश्लेषण भगवान कर रहे हैं।
जो व्यक्ति कर्म कर रहा है, भी कोई व्यक्ति बोल रहा है तो बोलना एक कर्म है। और बोलना कर्म है, व्यक्ति जो कर्म कर रहा है, वह कर्ता है और जो कर रहा है, उसकी कुछ बुद्धि है, उसका कुछ ज्ञान है, उसके कुछ दुर्ढ़ संकल्प हैं, वो सब भी अलग-अलग गुणों में हो सकता है। तो अठारहवें अध्याय के 33, 34, 35 श्लोक में जो हमारी धृति है, जो हमारे दृढ़ संकल्प हैं, वो कैसे सत्वगुण, रजोगुण, तमोगुण में हो सकता है, इसका वर्णन है। और फिर 37, 38, 39 श्लोक में हम किस प्रकार का सुख प्राप्त होता है, इसका वर्णन करते हैं।
तामसिक धृति और उसके लक्षण
तो मैं पहले तामसिक, फिर राजसिक और फिर सात्विक दृढ़ संकल्प परिवार की चर्चा करूँगा। तो 35 श्लोक में कहते हैं:
यया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च। न विमुञ्चति दुर्मेधा धृतिः सा पार्थ तामसी॥
तो कहते हैं या स्वप्नं, जो व्यक्ति हमेशा स्वप्न देखते रहता है, विराट को सोते समय बहुत से लोग स्वप्न देखते हैं, जो जागते हुए स्वप्न देखते रहता है। मतलब कुछ कार्य करता नहीं है, सिर्फ ऐसा होगा, ऐसा होगा, मैं ऐसा करूँगा, ऐसा करूँगा। तो जो स्वप्न देखता है पर कुछ करता ही नहीं है, तो ऐसा व्यक्ति जो है, वो तमोगुण में है।
स्वप्नं भयम्, भयम् मतलब हमेशा होगा, इसका क्या होगा, उसका क्या होगा, हमेशा भय में रहता है, वह भी तमोगुण है। तो अपना इन सब का मैं आगे वर्णन करता हूँ। आगे से तभी पहले हम सारे देखते हैं विषादम्। विषाद मतलब जो हो गया है, भविष्य में होने वाला है, उसके बारे में नकारात्मक भाव। यह गलत हो जाएगा, वो वैसा करेगा, यह ऐसा हो जाएगा। और विषाद मतलब जो हुआ है, उसके बारे में नकारात्मक है। यह ऐसे क्यों हुआ, उसने ऐसे क्यों किया, मैंने ऐसे क्यों किया। विषाद और ये सब जो होता है मदम्, मदम् विषाद प्यासा अपनं भयम् जो होता है, विषादं मदमे मदम्, मतलब एक प्रकार का नशा। तो वो एक नशा लेना, व्यापारी कुछ से भी हो सकता है और नशे में गुंग रहना, मतलब जो आजू-बाजू चल रहा है, उससे कुछ ज्ञान ही न होना।
न विमुञ्चति दुर्मेधा। तो जो मेधा मतलब बुद्धि, दुर्मेधा मतलब जो बुद्धि गलत दिशा में आ रही है। और न विमुञ्चति, न विमुञ्चति मतलब जो छोड़ता नहीं है। अभी क्या है कि स्वप्न देखना यह स्वाभाविक है, भय होना यह स्वाभाविक है, कुछ गलत हो गया है तो विषाद करना भी स्वाभाविक है। पर यही करते रहना और यह कभी छोड़ना ही नहीं। न विमुञ्चति, जो हमेशा भय में रहता है, जो हमेशा विषाद करते रहता है। न विमुञ्चति दुर्मेधा, ऐसा व्यक्ति जो है, उसकी बुद्धि जो है, धृतिः सा पार्थ तामसी, यह तमो गुणी धृति है। यह तमो गुणी धृति है।
अभी साधारणतया अगर हम दृढ़ संकल्प की बात करते हैं, तो दृढ़ संकल्प यह सकारात्मक होता है कि किसी में महान दृढ़ संकल्प है। तो दृढ़ संकल्प भले तामसिक कैसे हो सकता है? तो वास्तव में कोई व्यक्ति अगर कुछ गलत कार्य कर रहा है और वो गलत कार्य छोड़ ही नहीं रहा है, तो वो तामसिक धृति है। उसको हम दृढ़ संकल्प नहीं कहते हैं, उसको हम जिद्द कहते हैं। तो एक धृति होती है, वो व्यक्ति हमेशा गलत कार्य करता है और उसको बारे में गलत कैसे समझाए जाने पर भी, उसका परिणाम देखने कर भी, न विमुञ्चति दुर्मेधा जो उसको छोड़ता नहीं है, ऐसा व्यक्ति जो उसकी धृति है, भगवान कहते हैं तामसिक है।
डेलूजनल पैरासाइटोसिस का एक प्रसंग
तो एक बार एक डॉक्टर के पास एक स्त्री आई और उन्होंने कहा कि डॉक्टर मेरे पेट में एक फ्रॉग है। What is frog? मेंढक है। डॉक्टर मुझे कहा, मेरे पेट में मेंढक नहीं रह सकता है? नहीं, नहीं, मेरे डॉक्टर, मेरे पेट में मेंढक है, मुझे पता है वो अभीता।
तो ऐसे यह कहा नहीं है, काल्पनिक नहीं है। इसको एक नाम है, यह एक बीमारी है। इसको कहते हैं डेलूजनल पैरासाइटोसिस। मतलब कल्पना में, डेलूजन में, लोगों को लगता है कि उनके बदन में कुछ पैरासाइट है। तो फिर क्या होगा? नहीं है, कुछ नहीं है आपके, आपके है, मुझे पता है। तो एक डॉक्टर के बाद, डॉक्टर के बाद कुछ नहीं है, तो दूसरे डॉक्टर के पास गए, दूसरे डॉक्टर के पास गए। तो ऐसे दूसरे डॉक्टर के पास गए। जब दूसरे डॉक्टर के पास गए, दूसरे डॉक्टर के पास थोड़ा सब्र से सुना। तो जब सुना कि इसके पहले नौ डॉक्टर के पास जा के आए हैं, तो दूसरे डॉक्टर के पास गए कि आपके पेट में कुछ मेंढक नहीं है। तो माने की नहीं है।
तो उसने बोला कि मैं थोड़ा जांच करता हूँ और उसने कुछ जांच किया, हाँ सही है और सो तुम्हारे पेट में मेंढक है, चाहो डॉक्टर। हाँ, बहुत अच्छा हो गया है, आपने तो मैंने यकीन कर लिया, कोई यकीन कर ही नहीं रहा था मेरा। तो डॉक्टर, हाँ, बड़ी कठिन समस्या है हमको, आपके पेट का सर्जरी करना पड़ेगा और हम सर्जरी करके यह मेंढक को निकाल देंगे।
हम कब करना है? जल्दी से जल्दी करो।
डॉक्टर को तो हमने अभी कर देगा। तो डॉक्टर का क्या किया, वो स्त्री को एनेस्थीसिया दिया और फिर पेट में थोड़ा सा सर्जिकल कट कर दिया। और जब एक नर्स थी, उनको बोला कि बाहर में यह बाजू में तालाब है, वहाँ से एक मेंढक ले के आएं। और वो मेंढक ले के आएं। और जब मेंढक लाया, तो फिर जब होश में आ गई वो, तो दुन दिखाया कि यह मेंढक था आपके पेट में।
हाँ, वो इसलिए छूट करा, डॉक्टर, आपने मेरी ज़िन्दगी बचा ली है, बहुत-बहुत धन्यवाद, बहुत-बहुत धन्यवाद।
और बड़ी सुकून से वो चली और डॉक्टर, नर्स वो लगे, यह बड़ा बुद्धिमत्ता का बात हो गया कि वो भी खुश, हम भी खुश। यह तो बार-बार वो आके परेशान कर रहे थे, मेंढक है, पेट में मेंढक है।
तर क्या हो गया? वो दस दिन के बाद वो वापस आ गया बड़ी जिन्दा में। डॉक्टर, डॉक्टर, वो मेंढक के बच्चे थे और अभी वो बच्चों को निकालने के लिए आपको सर्जरी करना चाहिए।
तर न विमुञ्चति दुर्मेधा, तो जो बुद्धि है छोड़ती नहीं हो, जो काल्पनिक चीज़ है, कुछ मन पकड़ लेता है और उसको ही पकड़ के रखता है।
भय, हाँ, हमें कोई बीमारी हो, मैं, मैं में बीमारी नहीं हो, मालिक, हमें पहले से ही उसको टालने के लिए प्रयास करना चाहिए, जल्दी से ही उसको ठीक करना चाहिए। इस प्रकार का भय जो है, वो अच्छा है, एक तरसे। पर जब भय को ही हम पकड़ के रखते हैं और जो भय है, हमें गलत कार्य से बचाता है और सही कार्य करने में मदद करता है। तो अगर किसी में भय ही नहीं है, तो भय बुरा नहीं है, भय ज़रूरी है।
जैसे अगर कोई बालक, नटखट बालक है वो रस्ते के बीच में दौड़ते जाने लगता है और उसको भय ही नहीं लग रहा है, तो उसको भय नहीं लगने से उसके माँ को बहुत भय लगता है। तो भय अच्छा है, पर कोई व्यक्ति अगर भय के कार्य के लिए वो सोचता है कि मैं भी रस्ते के पार जाऊंगा ही, तो भय जो कि एक तरह से मैं चौकन्ना कर सकता है, वही हमको हतप्रभ करके निष्क्रिय बना सकता है। तो इस प्रकार का जो भय है, वो तामसिक है। न विमुञ्चति दुर्मेधा, जो भय को छोड़ता ही नहीं व्यक्ति, वैसी जो धृति है, वो तामसिक है।
आधुनिक समाज और बढ़ती चिंताएं
और आजकल के समाज में हम जिस प्रकार से जी रहे हैं, चिंताएं बहुत बढ़ गई हैं। और चिंताओं के लिए कई बार कारण भी है क्योंकि समाज जो है, जो आर्थिक परिस्थिति है, जो नौकरी है, इस सब में थोड़ी अस्थिरता है, जिसके कारण चिंता होना स्वाभाविक है।
पर ये जो चिंता है, इसके बारे में एक विलक्षण बात ये है कि जो साइकोलॉजिस्ट जो मनोचिकित्सक हैं, उन्होंने संशोधन किया और उन्होंने देखा कि अगर हम दुनिया को डिवाइड करते हैं, तो जो अमेरिका है, यूरोप को फर्स्ट वर्ल्ड कंट्रीज कहते हैं, वो काफी प्रगतिशील है। और भारत है, चाइना है, वो थोड़ा बीच में है। भारत के भी ग्रामीण भाग है, वो थोड़े प्रगतिशील नहीं है। तो उन्होंने देखा कि साधारणतः चिंता होती है कि वो जो प्रगतिशील देश हैं, उनमें अधिक है। जितना देश प्रगतिशील है, उसमें चिंता और है।
और इतना ही नहीं कि जब से भारतीय लोग या चीनी लोग इधर से जो थर्ड वर्ल्ड से फर्स्ट वर्ल्ड में जाते हैं, अमेरिका में जाते हैं, तो भारत में उनकी चिंता का स्तर कम होता है, अमेरिका में जाके चिंता बढ़ जाती है।
तो यह ऐसा क्यों है? साधारणतः हम सोचते हैं कि बाह्य रूप से कुछ अनिश्चितता हो। अगर मान लीजिए मुझे कहीं जाना है और मुझे एक प्लेन पकड़ना है और मेरा गाड़ी खोजेगा कि नहीं पता नहीं, कि अगर अनिश्चितता है, तो मुझे उससे बड़ी चिंता होती है। तो उसके विपरीत अगर जितनी निश्चितता है, जितना सब कुछ निश्चित है, उतना हमें निश्चितता हो जाती है।
तो पाश्चात्य देशों में बहुत कुछ से देखेंगे तो देखेंगे तो काफी हद तक निश्चितता है। ऐसे कभी होता नहीं है कि अगर आप बटन दबाओ तो इलेक्ट्रिसिटी आएगी कि नहीं, पता नहीं। नल चालू करो तो पानी आएगा कि नहीं, पता नहीं। ऐसे बहुत कुछ सब कुछ निश्चित है। फिर भी चिंता अधिक क्यों है?
चिंता का एक कारण है कि बाह्य रूप से बाह्य रूप से अनिश्चितता होगा, पर जब बाह्य रूप से निश्चितता काफी है, फिर भी चिंता क्यों है? यह चिंता इसलिए है कि वास्तव में जो मन है, वह बहुत भौतिकवादी हो जाता है। जब मन बहुत भौतिकवादी हो जाता है, तो मन हमेशा भौतिक चीज़ों को देखता है। और जितनी भी चीज़ें हमारे पास हो, उतनी हमें कम भी लगती है और मुझे एक और चाहिए था।
धृतराष्ट्र का चरित्र और तामसिक दृढ़ संकल्प
यह तमोगुणी दृढ़ संकल्प जो है, वह महाभारत में धृतराष्ट्र के जीवन में दिखता है। अभी धृतराष्ट्र जो था, वह जब तक उसका पुत्र नहीं था, दुर्योधन नहीं था, तब तक हम महाभारत में देखते हैं कि वो कुछ बुरा कार्य नहीं करता है। एक तरह से वो एक सज्जन के समान जी रहा है। और जब धृतराष्ट्र, जब पुत्र होता है, दुर्योधन, तो उस समय अभी उसको लगता है कि मैं तो राजा नहीं बन पाया, मेरा पुत्र राजा नहीं जाएगा। और उस समय पांडु महाराज जो होता है, तभी गांधारी नाराज हो जाती है पहले, पर तभी भी ये पुत्र हो जाते हैं। जब उसके सारे पुत्र हो जाते हैं, दुर्योधन सबसे पहला पुत्र होता है, तो उस समय पांडु के पुत्र वापस आएंगे कि नहीं, पता नहीं होता है। पुत्र तो है, तो हर तरह से दुर्योधन के लिए प्रशिक्षण दिया जाता है और धृतराष्ट्र की अपेक्षा में कि मेरा पुत्र नहीं राजा करेगा और मेरे पुत्र के द्वारा मैं राज्य करूँगा।
वास्तव में असलियत में होता क्या है? उसके द्वारा उसका पुत्र राज्य करता है, भले ही दुर्योधन कभी राजा बनता नहीं है, फिर भी दुर्योधन वो धृतराष्ट्र को एक कठपुतली के लिए नचाता है और अपने इशारों पे कार्य करने के लिए करता है।
एक तरह से देखेंगे तो धृतराष्ट्र और दुर्योधन में फ़र्क यह है कि धृतराष्ट्र वह उसमें भी आసక్తి है, पर वह खुद आసక్తి में ज़्यादा कार्य नहीं करता है। पर दुर्योधन में आసక్తి है और आसक्ति बहुत कार्य करते हैं, बहुत से बुरे कार्य करता है। और धृतराष्ट्र जो कार्य कर रहा है, दुर्योधन जो कार्य कर रहा है, उसके और वो आँखें बंद करता है। उसकी आँखें बंदी हैं पहले से, पर वह ध्यान नहीं देता है उसको और जो करना है, वो करने देता है। और इस तरह से वो क्या करता है कि धृतराष्ट्र को अपने बुरे कार्य में रोकने की जगह पे प्रभावित करता है।
और ऐसे जब कर रहा होता है, तो कुछ लोग होते हैं कि उनकी जो विवेक बुद्धि होती है, एक तरह से मर गई होती है। मतलब कोई बहुत ही बड़े गुन्हे, बहुत ही बड़े मतलब बुरे गुन्हेगार होते हैं, कोई बहुत आतंकवादी होते हैं, जिन्होंने बहुत से लोगों को मार डाला है। तो किसी का खून भी करते हैं, उनको कुछ बुरा लगता ही नहीं है, क्योंकि आप उनकी जो विवेक है, तुम तरह से मर गई है, विवेक बुद्धि मर गई है। तो वो संवेदन, उनकी संवेदनशीलता के रही नहीं है कुछ।
तो जब दुर्योधन पांडवों के बारे में बड़ा अत्याचार करता है और अत्याचार करके द्रौपदी का अपमान करता है, उनका राज छिन लेता है और चला उनको बाहर भेजता है, जंगल भेजता है, वनवास भेजता है, तो उसके बाद में दुर्योधन के पास में सारा ऐश्वर्य आराम है और ऐश में जी रहा है।
पर धृतराष्ट्र बड़ी चिंता में है। क्यों चिंता में है? उसको बार-बार जो भीम ने कह दिया है कि मैं ये सब सौ पांडवों को मारा हूँ, वही वाणी उसके दिमाग में घूम रही है, घूम रही है, घूम रही है। तो उसको क्या करें, क्या करें, क्या करें, क्या करें? जो तुम्हारे के लिए किया, वो अपमान नहीं होना चाहिए था। उस समय तो वो उत्तेजना में आके जो भी दुर्योधन कर रहा है, उसको, उसको इजाज़त देता है, उसमें एक तरह से सहभागी भी होता है। पर बाद नहीं, उसको चाहिए था, यह बड़ा अपमान नहीं है, बड़ा गलत किया है, इसे ठीक करना चाहिए था।
कर्म बंधन और मानसिकता
वास्तव में गलती का भी अहसास दो प्रकार से होता है। एक है, इसको इंग्लिश में कहते हैं consequentialist ethos और non-consequentialist ethos.
Consequentialist ethos मतलब क्या? कोई कारण गलत है क्योंकि उसका गलत परिणाम होने वाला है और वो परिणाम नहीं भुगतना चाहता है, क्योंकि परिणाम मुझे मिल रहा है, इसलिए मुझे लग रहा है वो गलत कारण नहीं करना चाहिए था। तो ऐसे लोग क्या है, वो सोचते हैं कि अगर मैं गलत कार्य करूँ और उसके परिणाम से बच सकता हूँ, तो गलत कार्य करने में कुछ समस्या नहीं है। तो लोग कहते हैं कि क्या है? गलत काम करना समस्या नहीं है, गलत काम करने का पकड़े जाना समस्या है।
ऐसे नहीं हो सकते हैं। अगर मैं गलत कार्य कर नहीं हो सकता हूँ, तो मैं गलत कार्य कर नहीं हो सकता हूँ। हम जो गलत कार्य कर रहे हैं, उसका परिणाम भले ही हमको नहीं मिले, पर जो भी हम गलत कार्य करते हैं, उससे एक गलत कार्य करने की मानसिकता बन जाती है। और मानसिकता ही कर्म बंधन का कारण बन जाती है।
कोई व्यक्ति मान लीजिए एक अच्छे परिवार से है और उसमें बोलते हैं, उस परिवार में उसमें पढ़ाया गया है कि आपको शराब नहीं पीना चाहिए, आपको सिगरेट नहीं पीना चाहिए। और वो क्या करता है? छिप के पीता है, छिप के सब करता है। तो अभी भले कोई परिवार वाले पकड़ेंगे, फिर भी क्या होगा? वो जो आदत है, वो पकड़ेगी और वो आदत ही एक बंधन बन जाएगी। तो इस तरह से व्यक्ति अपने कर्मों से बच नहीं सकता है।
पर धृतराष्ट्र की आसक्ति होती है कि मुझे यह मिलना ही चाहिए, मुझे राज्य चाहिए। और अभी उसको जो विषाद हो रहा है, वो विषाद क्यों हो रहा है? इसलिए नहीं कि हमने गलत कार्य किया, जो गलत कार्य किया है, उसका बड़ा गलत परिणाम होने वाला है, इसलिए हमको वो नहीं करना चाहिए। मतलब द्रौपदी का अपमान किया, उसका उसको इतना अपसाद नहीं है कि द्रौपदी का अपमान करने के कारण अभी मेरे पुत्रों का ज़िंदगी जोखिम में आ गया है, उसके कारण उसको भय है। उसका नहीं करना चाहिए था।
तो विषाद है और इन सब के कारण वो अस्तुनी दुखी है।
तो विदुर एक समय पर धृतराष्ट्र से कहता है कि देखो, जब यह राज नहीं था तुम्हारे पास, तब हमेशा तृष्णा थी, तृष्णा, तृष्णा, कब मिलेगा राज है, कब मिलेगा राज है। राज जब था, तभी तुम्हें भय था, यह क्या होगा भविष्य में? राज जब चला गया, अभी क्या हो गया है? अभी दुख है कि राज चला गया। विदुर बाद में कुछ विदुर बाद में बताते हैं और कहते हैं कि क्या इस तरह से वास्तव में तुम्हारी राज से इतनी आसक्ति थी पर से तुम्हें सुख मिला ही कम, सुख तुम्हें मिला ही नहीं कम? तो जो आसक्ति होती है, वह जब असीमित मात्रा में हो जाती है, वह आसक्ति बुरी नहीं है। आसक्ति एक तरह से एक स्वाभाविक है, जब वे धर्म के नियमों के अनुसार है, तो फिर वह इससे जब वह ठीक है, पर जब हमारी जो आसक्ति है, हमारा जो वासना है, वह हमें अधार्मिक बना लेती है, तभी उसके परिणाम का है: न विमुञ्चति दुर्मेधः धृतिः सा पार्थ तामसी।
आसक्ति और व्यसन
कभी-कभी कुछ लोग बड़े आलसी होते हैं, कुछ कार्य करते ही नहीं हैं। और उनको बोला, कुछ काम करो ना? मुझे में कुछ क्षमता है ही नहीं। मुझे में कुछ धृति सा पार्थ है ही नहीं। जो व्यक्ति कहता है मुझे में कुछ धृति सा पार्थ है ही नहीं, वास्तव में उसके लिए भी धृति सा पार्थ है। कौन सी धृति सा पार्थ है? एडिक्शन, एक परवर्स फॉर्म ऑफ एडिक्शन है। जो बड़ी आसक्ति है, आसक्ति यहां तक पूरी आदत बढ़ जाती है, वो वो यहाँ भी क्या है, एक धृति सा पार्थ का ही एक विचित्र रूप है, वो एक विकृत रूप है वो।
और इस विकृत रूप में व्यक्ति कैसे फंस गया वो? क्योंकि वही जो धृति सा पार्थ था, वो गलत निशान चला जा रहा है। तो यहां तमोगुणी धृति सा पार्थ है।
इसके पहले भगवान बताते हैं:
यया तु धर्मकामार्थान् धृत्या धारयतेऽर्जुन। प्रसङ्गेन फलाकांक्षी धृतिः सा पार्थ राजसी॥
तो व्यक्ति अगर काम और अर्थ, इसके लिए चार पुरुषार्थ बताता है शास्त्रों में: धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। तो यया तु धर्मकामार्थान् धृत्या धारयतेऽर्जुन। तो धर्म, अर्थ, काम इनके लिए बड़ा धृत्या धारयते, प्रसङ्गेन फलाकांक्षी, प्रसंग मतलब बड़े आ सकती करता है। फलाकांक्षी, फल के आकांक्षी में धृत्या धारयते, धृत्या धारयते, जो इंद्रियां की धृति है, उससे बड़ी रुचि रखता है।
और अगर हम शास्त्रों में देखते हैं कि जो देवता है, वो भी इंद्रिय धृति में लगते हैं। जो असुर है, वो भी इंद्रिय धृति में लगते हैं। पर दोनों में फ़र्क क्या है? कि जो देवता है, विश्वंक्त स्मृतो देवो असुरस्त विपर्ययो, कि जो देवतागण है, वो भी इंद्रिय धृति करते हैं, वो धर्म के अनुसार करते हैं। और जो असुर है, वो धर्म के खिलाप जाकर इंद्रिय धृति करते हैं, धर्म का उल्लंघन करके हैं।
और भौतिक जगत में भौतिक चेतना स्वाभाविक है और जब भौतिक चेतना स्वाभाविक है, तो भौतिक इंद्रिया धृति की ओर आकर्षण होना यह भी स्वाभाविक है। तो शास्त्र में कहता है कि जो इंद्रिया धृति है, वह हम धीरे-धीरे जो एक स्वाभाविक वैभव के हैं, वो अपने आप जागृत हो जाएगा, अगर हम धर्म के अपने में जीवन जीते हैं।
तो जो व्यक्ति रजोगुण में है, तो एक ऐसा रजोगुण है जो सबको गुण की ओर जाता है और एक ऐसा रजोगुण है जो तमोगुण की ओर जाता है। तो जो व्यक्ति रजोगुण में है पर धर्म का पालन नहीं करता है, बड़ा सकता है इंद्रिया धृति के लिए, वो वास्तव में तमोगुण की ओर जा रहे हैं। तो हम वर्गीकरण करते हैं, जो व्यक्ति इंद्रिया धृति के पीछे जा रहे हैं, भौतिक चीज़ों के पीछे जा रहे हैं, वो कर्मी कहते हैं। कर्मी हैं और विकर्मी हैं जो दोनों इंद्रिया धृति के पीछे जा रहे हैं और जो धर्म के नियमों के खिलाफ जा के इंद्रिया धृति करते हैं, वो जो हैं विकर्म कहते हैं। और जो विकर्म करते हैं, उसका परिणाम यह होता है कि वह कितनी भी इंद्रिया धृति प्राप्त करें, जो इंद्रिया धृति से संतुष्टि के लिए होता है।
हिरण्यकशिपु का प्रसंग और असंतोष
तमोगुण में क्या होता है कि व्यक्ति इतना मद में रहता है कि कुछ करता ही नहीं, इंद्रिया धृति प्राप्त करने के लिए मेहनत करनी पड़ती है पर वो भी नहीं करता है। रजोगुण में इंद्रिया धृति करता है व्यक्ति पर क्या है कि धर्म नहीं है, तो कितना भी इंद्रिया धृति करें, कितनी भौतिक चीज़ें प्राप्त करें, वो संतुष्ट नहीं होगा।
तो ऐसा जो है, वो उसका उदाहरण है, शास्त्रों में दिया गया है, हिरण्यकशिपु का। वो वास्तव में शुरुआत में एक तरह से धर्म का पालन करता है, बड़ी कठोर तपस्या करता है। बड़ी कठोर तपस्या करता है, ऐसी तपस्या करता है कि जो ब्रह्माजी आते हैं, वो कहते हैं, बड़े-बड़े जो ब्राह्मण श्रेष्ठ हैं, भृगु, वो भी ऐसी तपस्या आप अपनी जीवन से नहीं कर पाएगी। तो धर्म करता है वो, बड़ा। पर इसलिए था, धर्म काम हो, था, काम हो चाहिए और अर्थ चाहिए। और उसके बाद में ऐसा ऐश्वर्य प्राप्त करना है वो कि इंद्र के लिए भी वैसा ऐश्वर्य नहीं था क्योंकि इंद्र जो राजा था और बाकी सब सेवक थे। पर जब हिरण्यकशिपु राजा बन गया, तो इंद्र उसका सेवक बन गया। तो इंद्र के लिए कभी इंद्र सेवक नहीं था।
तो जो हिरण्यकशिपु राजा प्राप्त किया, वो इतना था कि उसको इंद्र से भी अधिक ऐश्वर्य था। पर भागवत में बताया गया है कि इसके बावजूद वो असंतुष्ट था, असंतुष्ट था।
और क्यों असंतुष्ट था? वो कई बार हमें लगता है कि मैं असंतुष्ट हूँ क्योंकि जो मुझे चाहिए हो, मुझे नहीं मिला है। मुझे आज की अगर खाने में ये व्यंजन होता, मैं बड़ा संतुष्ट हो जाता, प्रसन्न हो जाता। अगर मेरे पास यह नया फोन हो जाता, तो मैं बड़ा संतुष्ट हो जाता। यह फोन नहीं है, इसलिए असंतुष्ट हूँ। मैं यह घर नहीं है मेरे पास, इसलिए असंतुष्ट हूँ। हमको लगता है कि मेरे पास यह चीज़ नहीं है, इसलिए मैं असंतुष्ट हूँ। यह संभावना हो सकती है, कोई चीज़ें हमारे पास नहीं है, इसलिए हम असंतुष्ट हूँ।
पर क्या है? एक है असंतुष्टि, यह एक भावना है और असंतुष्टि, यह एक वृत्ति भी है। तो मतलब क्या है? असंतुष्टि की भावना जो है, ये कोई एक चीज़ प्राप्त नहीं हुई, इसलिए आ जाते हैं। इसलिए इस्तेमाल होगा ने जर्ध से।
अधिविश्वास क्या होता है? कि कोई एक चीज़ नहीं है, इसलिए मैं संतुष्ट हूँ, यह हो सकता है। पर जब व्यक्ति रजोगुण में रहता है और धर्म का आधार नहीं है, तो जितनी भी चीज़ें प्राप्त हो जाएगी, मन की आदत ही हो जाती है कि जो मेरे पास नहीं है, वो देखना। जो मेरे पास है, अगर मैं देखूंगा, तो उससे संतुष्टि आएगी।
अभी ऐसे हो सकता है कि मेरे पास जो चीज़ें हैं, उसमें कुछ कमी है और मुझे कोई और चीज़ चाहिए। अगर मुझे कुछ कमी आएगी, उससे संतुष्टि आएगी? अगर मुझे कुछ कमी आएगी, कितना भी प्राप्त कर लिया, वो यही देखता था, अभी क्या नहीं है मेरे पास? अभी इंद्र उसको प्रणाम कर रहा था और उससे देखा, बहुत प्रणाम नहीं कर रहा है। अभी एक पाँच साल का लड़का क्या फ़र्क करता है? वो प्रणाम कर रहा है, नहीं कर रहा है, कुछ फ़र्क नहीं पड़ता है। छोड़ा लड़का है, पर उसको इतना उससे क्रोध आ गया कि वो उसको मारने पे तुल गया हो। और यह कोई साधारण पाँच साल का लड़का नहीं था।
तो यह क्या हो गया है कि मतलब यह उसका जो अहंकार था, अहंकार की जो भूख थी, वो अहंकार की जो हवस थी, वो कभी पूरी नहीं हो सकती। तो रजोगुण में अगर धर्म नहीं है, तो कितना भी प्राप्त करें, व्यक्ति हमेशा असंतुष्ट और खासकर के आधुनिक समाज में यह असंतुष्टि की आदत जो है, वह बहुत ज़्यादा हो गई।
क्यों? क्योंकि जो पूर्वी, पूर्व का समाज था, उसमें लोगों की जो दृष्टि थी, कितना देख सकते थे? जो तंत्र ज्ञान ज्यादा नहीं था, तो अपने ग्राम में, अपने गाँव में, अपने शहर में जो चीज़ें हैं, वो देख सकते थे। पर आज अगर हमको तुलना करनी है, तो क्या तुलना करेंगे हम? सारी दुनिया में अच्छी चीज़ें, उनसे तुलना करेंगे। और मेरे पास भले अच्छी चीज़ होगी, दुनिया में किसी के पास उससे और अच्छी चीज़ होगी, तो अरे, मेरे चीज़ कुछ बनते चाहिए, जो चाहिए और उसको इतनी अच्छी चीज़ लाल भी बनने, तो क्या होगा? कोई उससे और अच्छी चीज़ बना देगा। और फिर उसके कारण जब अच्छी चीज़ के पास अच्छी चीज़ होगी, तो तो मेरे पास नहीं चीज़ होगी।
जब हम सारे दुनिया से तुलना कर रहे हैं, तो कभी भी हम संतुष्ट नहीं हो सकते हैं। कितना भी हम प्राप्त करें, दुनिया में ऐसे बहुत से चीज़ें हैं, जो हमसे ज़्यादा फिर उसके पास होगी, इसलिए संतुष्टि नहीं, एक भावना नहीं है, यह एक निर्णय है।
मन की तपस्या और संतुष्टि
सत्रहवें अध्याय में जो भगवान तपस्या के बारे में वर्णन करते हैं, तो शरीर की तपस्या, जिह्वा की तपस्या और मन की तपस्या, इसके बारे में बोलते हैं:
मनःप्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः। भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते॥
पुत्र भगवद्गीता के 14, 15, 16 श्लोक में बाद चर्चा करते हैं प्रकार की तपस्या की। तो वो कहते हैं तभी कि मनःप्रसाद, संतुष्टि, संतुष्टि, ये क्या करें भगवान? यह एक मन की तपस्या है।
अभी मन की तपस्या का मतलब क्या है? वास्तव में हम शरीर की तपस्या बोल सकते हैं, उपवास करना या कुछ लोग अलग प्रकार की तपस्या कर सकते हैं, सिर पे खड़े रहने जाना, वो एक प्रकार की तपस्या हो सकती है। तो शरीर की तपस्या हम समझ सकते हैं, मन की तपस्या क्या होती है?
तो तपस्या का मतलब क्या है? कि जो करना आसान नहीं है, जो करना मुश्किल है, वो फिर भी हम दृढ़ता के साथ करते हैं। तो अभी उपवास करना या आसान नहीं है, पर जो इतने स्वाभाविक है, खाना पर हम जब तपस्या कर रहे हैं, मतलब जो शरीर की साधारण माँग है, उसको हम दृढ़ता से नहीं बोलते हैं।
तो मन की तपस्या मतलब क्या? जो मन की स्वाभाविक दौड़ है, जिस दिशा में मन स्वाभाविक रूप से दौड़ता है, उस दिशा में उसको न जाने देना। तो इस तरह से भगवान कह रहे हैं कि मन की तपस्या क्या है? संतुष्टि।
तो जो चीज़ें मेरे पास नहीं है, वहाँ देखना और असंतुष्ट रहना, यह मन का स्वभाव है, यह मन की प्रवृत्ति हो गई है। तो ऐसी प्रवृत्ति होते हुए भी उस दिशा में न जाना, यह एक तपस्या है और यह तपस्या भगवान कहते हैं, यह मन की तपस्या है।
तो प्रभुपाद जी इस तथ्य पर हमें लिखते हैं कि जितना हम भौतिक विषयों के बारे में, इंद्रियों के विषयों के बारे में, यह संतुष्टि का शिखर है। तो दोनों, दोनों के बीच में एक बड़ी खाई है। तो असंतुष्टि से हम संतुष्टि तो जाएंगे कैसे हैं? हम संतुष्ट करना अच्छा है, तो सीखते हैं। पर मैं तो असंतुष्ट हूँ, कैसे संतुष्ट मुलका हूँ?
तो इन दोनों की खाई के बीच में जो पुल है, वो शास्त्र का ज्ञान है, शास्त्र का अध्ययन है। हम देखेंगे, हमारे स्वाभाविक जीवन में, दैनिक जीवन में अगर हम शास्त्र का अध्ययन नहीं करते हैं, शास्त्र का श्रवण नहीं करते हैं, तो तुरंत असंतुष्टि बढ़ जाएगी। यह ठीक नहीं है, यह कैसा कर रहा है, यह अच्छा नहीं है, वो अच्छा नहीं है।
जो शास्त्र का अध्ययन छोड़ देंगे, शास्त्र का श्रवण छोड़ देंगे, असंतुष्टि बढ़ जाएगी। और शास्त्र का अध्ययन अगर हम ध्यान पूर्वक करेंगे, तो असंतुष्टि… असंतुष्टि बढ़ जाएगी।
कुछ लोग कहते हैं कि अगर आप असंतुष्ट हो जाओगे, तो फिर आपको जीवन में कुछ करोगे ही नहीं। वो कहते हैं आपको महत्त्वाकांक्षी रहना चाहिए जीवन में और महत्त्वाकांक्षा होने के लिए आपको असंतुष्टि कभी नहीं होना चाहिए। पर ऐसे नहीं है, कोई व्यक्ति महत्त्वाकांक्षी भी हो सकता है, मुझे कुछ करना है जीवन में, पर महत्त्वाकांक्षा के लिए असंतुष्टि ज़रूरी नहीं है कि एम्बिशन के लिए बिकॉज़ अपडिस्टिस्फैक्शन।
और एम्बिशन के लिए बिकॉज़ अपडिस्टिस्फैक्शन कि मुझे कुछ योगदान करना है, मैं कुछ काम कर रहा हूँ, मैं बड़ी मेहनत भी कर रहा हूँ। पर मेहनत करने का एक उद्देश्य हो सकता है कि मेरे पास कुछ नहीं है और मुझे वो प्राप्त करना है, उसलिए मुझे योगदान करना है।
दूसरा है कि मुझे भगवान ने कुछ शक्तियाँ दिए हैं, कुछ बुद्धि दिए हैं, कुछ प्रतिभाएँ दिए हैं, तो उन सब का मुझे उपयोग करना है और उनके द्वारा मुझे कुछ योगदान करना है। तो हमारी जो महत्त्वाकांक्षा है, ऐसे नहीं है कि जो व्यक्ति संतुष्ट है, व्यक्ति कुछ काम नहीं करेगा, कुछ महत्त्वाकांक्षा नहीं करेगा, महत्त्वाकांक्षा नहीं होगा, पर व्यक्ति अगर महत्त्वाकांक्षा नहीं रहेगा, किसलिए? उसका उद्देश्य है, व्यक्ति योगदान का भाव है, असंतुष्टि नहीं है। जो मेरे पास है, उसके लिए मैं संतुष्ट हूँ, पर जो मेरे पास है, मुझे उसका और उपयोग करना है, दूसरों की सेवा करनी है, दूसरों को मदद करना है और जो भगवान ने भेंट दी है, उसका मुझे उपयोग करना है। वो भाव से जब हम कार्य करते हैं, तो हम संतुष्ट भी रहते हैं और कार्यरमत भी रहते हैं।
सात्विक धृति और योग द्वारा योगदान
और इसके लिए एक रजोगुण में बताता हूँ, तो तमोगुण में जाता है, दूसरा रजोगुण में, सात्विक गुण में जाता है। सात्विक गुण में, सात्विक गुण में जो दृढ़ संकल्प है, भगवान बताते हैं, दूसरा रजोगुण में, सात्विक गुण में, सात्विक गुण में… हमारे अंदर है।
तो मन और शरीर का जो संबंध होता है, एक तरह से प्राण से होता है। प्राण और फिर हमारे शरीर में इंद्रियां प्रधान है और इंद्रियों के द्वारा कार्य कार्य करते हैं। तो मन, प्राण, इंद्रिय क्रिया, व्यक्ति धृति से धृत्या यया धारयते मनः प्राणेन्द्रियक्रियाः योगेना व्यभिचारिण्या। और इन सब से वो कार्य किससे करता है? योग के रूप में कार्य करता है।
तो धृतिः सा पार्थ सात्विकी, जो मैं बनाता हूँ योग और योगदान। योगदान मतलब contribution, योग मतलब connection. So by connection, we can do contribution.
जब हम भगवान से संबंध में हैं, हमारा योग के द्वारा अंदर भगवान से संबंध है, उससे हमको संतुष्टि मिली है, तो हम इस दुनिया में कार्य करते हैं, उससे योगदान करते हैं। नहीं तो फेल जो हम कार्य करते हैं, उससे वास्तव में हम असंतुष्ट रहते हैं और दूसरों को भी असंतुष्ट करते हैं।
तो जो धृति है, वह जब सात्विक गुण में होती है, तो उस धृति से हम सकारात्मक कार्य करते हैं, उससे हम इस दुनिया में भी महत्वपूर्ण कार्य कर सकते हैं, महत्वपूर्ण कार्य कर सकते हैं, पर इस तरह से रह सकते हैं कि हम असंतुष्ट रहते हैं और दूसरों को भी असंतुष्ट करते हैं। हम सुखी रहते हैं और दूसरों को भी सुखी करने में मदद कर सकते हैं।
तो यह जो धृति है, मन, प्राण, इंद्रिय क्रिया, जो मन, प्राण, इंद्रिय क्रिया, इससे हम भी हमेशा क्रिया कर रहे होते हैं। तो जो हमारी क्रिया है, वह किस तल से हो रही है, यह हमें समझना है।
मन का प्रवास और वैचारिक भटकाव
तो क्या होता है, अगर, हमारा, अगर मान लीजिए हम रस्ते पर जा रहे हैं और कोई व्यक्ति बोलता है, हमको रस्ते में मिलता है, मेरे घर में आ जाओ ना। तो हम सोचेंगे, कौन है व्यक्ति, तो घर कहाँ है, क्यों बुला रहा है, मुझे क्या करना है, मुझे कुछ काम है क्या? और तो हम सोच के फैसला करेंगे, जो व्यक्ति पर जाना है या नहीं जाना।
कोई बोलेगा, हम रस्ते में जा रहे हैं, कहीं जा रहे हैं, मेरे घर में आ जाओ, हम तुरंत नहीं जा रहे हैं। तो व्यक्ति पूछता है, तो हम उसका निरीक्षण करते हैं, उसके बारे में सोचते हैं और फिर फैसला करते हैं।
तो जिस तरह से हम शारीरिक रूप से एक हम चल रहे होते हैं, कुछ प्रवास कर रहे होते हैं, उसी तरह से हमारा मन भी किसी दिशा में जा रहा होता है, एक तरह से हमारे विचार, हमारी चेतना जो है, एक तरह से एक प्रवास कर रही है। तो उस समय हमारे मन में कुछ विचार आ जाता है।
हम कुछ कार्य कर रहे हैं, हम रस्ते पर जा रहे हैं और हम शायद कोई व्यक्ति ऑफिस से घर जा रहा है और रस्ते पर जा रहे हैं, वहाँ भी देखते हैं, यहाँ भी एक मंदिर कर रहे हैं, यहाँ भी एक शराब की दुकान है, यहाँ भी यह है, वहाँ भी जा रहे हैं। चलो, मैं जाता हूँ, यहाँ भी। तो जो ऐसे विचार आ जाता है, तो क्या है? कई बार कुछ लोग बोलते हैं कि अभी मैं बड़ा ध्यान पूर्वक मैं ऐसा, मैं बहुत ध्यान पूर्वक रहूँगा, मैं कुछ कार्य नहीं करूँगा, मैं यह नहीं करूँगा, मैं वो नहीं करूँगा।
और अगर कोई व्यक्ति ऐसे फैसला करता है कि मैं कार्य नहीं करूँगा और कोई बाहर व्यक्ति बोलता है कि तुम ये करते हैं, आओ और मैं जाता हूँ, नहीं, नहीं, मैं यह नहीं करने वाला हूँ। तो मतलब मान लीजिए कुछ लोग होते हैं कि वो उपवास करते हैं, तो क्या होता है, वो दुनिया के सामने कोई बोलता है, आप थोड़ा खा लो, नहीं, मैं नहीं खाऊँगा। पर बाद में अकेले मैं मुझे थोड़ा खा लेते हैं, किसी को पता नहीं चलेगा, खा लेते हैं।
तो वही क्या विचार है, कि वही विचार, अगर हमारा दृढ़ संकल्प जो है, कोई बाहर से उसको चुनौती देता है, तो हम कई बार नहीं बोलते हैं, पर उसको अंदर से ही कोई बोलता है, प्रलोभन आ जाता है, तो हम सोचते हैं, मुझे ही खाने की इच्छा है, मुझे अंदर से ही कोई नहीं बोल रहा है। जो मेरे अंदर हर एक इच्छा आ रही है, वो मेरी इच्छा नहीं है कई बार, वो हमारे मन की जो वृत्तियाँ है, हमारे मन की जो वासनाएँ हैं, उसके द्वारा प्रवृत्त हो जाती है। अगर उसके से प्रवृत्त हो जाती है, तो उसके कारण हम कई बार ऐसे कार्य कर देते हैं, जो हमें करने की ज़रूरत नहीं है।
तो इसलिए, मन की जो क्रिया है, उस पर जो व्यक्ति नियंत्रण करता है, वो सात्विक मुनि दृढ़ संकल्प है। उसका अगर सात्विक मुनि दृढ़ संकल्प कैसे आता है? योगेन, योगेन है, मतलब, हम योग साधना करते हैं, उसके द्वारा हमारा जो मन, बुद्धि, इंद्रियाँ, इन सब के लिए नियंत्रण आता है।
पििवोटल हैबिट्स और मन का वजन
तो अगर किसी व्यक्ति को कुछ परिवर्तन करना है अपने जीवन में, तो कैसे है कि एक, उसको कहते हैं इंग्लिश में, साइकोलॉजी में कहते हैं, दे आर पििवोटल हैबिट्स। तो अगर किसी व्यक्ति को कुछ परिवर्तन करना है…
वैसे ही क्या है, जितने हम हमारे मन में आसक्तियाँ बढ़ जाती हैं, उस तरह से, एक तरह से क्या होता है, हमारा मन का वज़न बढ़ जाता है। और मन का वज़न जब बढ़ जाता है, तो ऐसे नहीं है कि जब मन में आसक्तियाँ बढ़ जाती हैं, तो मन निष्क्रिय हो जाता है। वेराल फिजिकल वेट में आसक्तियाँ बढ़ जाता है, मेंटल वेट में आसक्तियाँ बढ़ जाता है। जब मन का वज़न बढ़ जाता है, मतलब मन में आसक्तियाँ बढ़ जाती हैं, तो वो आसक्तियों की दिशा में मन बड़ा कार्यरतः होता है, पर बाकी दूसरी की दिशा में कुछ भी कार्य नहीं करता है। तो जब आसक्तियों के वज़न से दब जाते हैं, तो फिर हम कार्य नहीं कर पाते हैं। हम, वो जो वज़न है, हमको दबा देता है।
तो जब हम भक्ति के कार्य कर रहे हैं, तो जब हम जप कर रहे हैं, जब शास्त्रों का अध्ययन कर रहे हैं, भगवान की पूजा कर रहे हैं, तो ये क्या है, वो जब वज़न कांटे पे खड़ा हो जाता है, तभी असली वज़न क्या है, दिखा देता है।
तो जब हम जप करने लगते हैं, जब हम शास्त्रों का अध्ययन कर रहे होते हैं, तभी हमारा मन इधर-उधर घूमने लगता है। तभी इसका मतलब यह नहीं है कि ये भक्ति के कुछ फायदा नहीं है। तो जब हम कहते हैं, अरे, मैं जप करता हूँ, जब मेरा मन नहीं लगता है, सिर्फ जप छोड़ते हूँ, ये कैसे है? अरे, जब मैं वज़न करता हूँ, तो वज़न बहुत बढ़ता है, इसलिए मैं वज़न करूँगा? ये नहीं। अभी वज़न नहीं करने से वज़न बढ़ना रुकने वाला नहीं है, वज़न नहीं करने से वज़न तो बढ़ते ही रहने वाला है। तो जब हम जप कर रहे हैं और मन इधर-उधर भाग रहा है…
मन की वास्तविकता और जप का अभ्यास
इसका मतलब यह नहीं है कि हमें जप नहीं करना है। उस समय हमको पता चलता है कि अभी मेरा मन कितना अनियंत्रित हो गया है। और उसके बाद में जब हम मन को नियंत्रित करने का प्रयास करते हैं, तो उसमें भी… मैं इसके साथ वर्णन करूँगा कि उसमें भी हमारा जो विचार धारा है, हम जब जप कर रहे हैं… जप ये तो दिव्य कार्य है, पर जब ये दिव्य कार्य हम तामसिक वृत्ति से कर सकते हैं या सात्विक वृत्ति से कर सकते हैं।
जब करने में हमको प्रयास करना पड़ता है, परिश्रम भी करना पड़ता है। आपको प्रयास करना पड़ता है। वही जो चीज़ है, आप मान लीजिए कोई व्यक्ति कोई प्रवास करके आया हुआ है और फिर हवाई अड्डे पर आया हुआ है। और वहाँ पर कोई कुली नहीं है, तो खुद को वज़न लेकर जाना है। तो अभी खींचेगा, वज़न उठाएगा, कितना ये वज़न है! गुस्सा हो जाएगा, नाराज़ हो जाएगा। तो बाद सबको बोले है, मुझे इतना वज़न उठाना पड़ा, इतनी परेशानी हो गई।
पर वही व्यक्ति बाद में जिम्नेजियम में जाएगा और किसी को पैसा देगा वज़न उठाने के लिए। क्या फ़र्क है उसमें? दोनों समय वज़न ही उठा रहा है। पर एक समय की क्या है? ये वज़न उसको लगता है कि ये तो परेशानी है। और दूसरे समय में वज़न उठाना, उसको ये व्यायाम है। और जो व्यायाम है, तो उसमें भी मेहनत लगती है, उसमें भी थकान आती है। पर विचार… जब ये व्यायाम है, तो उससे क्या होता है? ये उससे वह व्यक्ति उत्साह से वो करता है।
दोनों समय वज़न उठाना है, पर जो विचार धारा है, जो वृत्ति है, मानसिकता है, वो बिल्कुल विपरीत है। तो उसी तरह से जब हम जप करते हैं, तो हम भगवान कृष्ण को हमारी चेतना में ला रहे हैं। कृष्ण तो इतने विशाल हैं, तो वो बड़े वज़नीदार हैं। कृष्ण को हमारी चेतना में उठाना, उन पे एकाग्र करना उतना आसान नहीं है। तो उसको कभी लगता है कि ये बड़ा मुश्किल है।
तो अगर हम सोचेंगे ये तो परिश्रम है, तो हम छोड़ देंगे उसको। उससे हम क्या करने का प्रयास करेंगे? उससे हम छूटने का प्रयास करेंगे, कैसे खत्म करना है जपा है और अगला काम करने कर जाएँ। तो कैसे है? जब हम ऐसा जप करते हैं, तो फिर क्या होता है? उससे हमको फ़ायदा नहीं होता है, हमको भगवान से संबंध नहीं जुड़ रहा है, उससे हमारा शुद्धिकरण नहीं हो रहा है, उससे हमको संतुष्टि नहीं मिल रही है। और वो तो फिर ऐसा समय का व्यर्थ चला जाता है।
पर जब हम सोचते हैं कि ये वास्तव में एक मौक़ा है, जिससे भगवान से मन को जोड़ने का, और ये मुश्किल है, पर ये एक एक्साइज है। जैसे अगर कोई व्यक्ति व्यायाम चीज़ें से कर लेता है, शरीर तंदुरुस्त हो जाता है, तो उस समय थोड़ा परिश्रम है, पर जो तंदुरुस्त शरीर है, उससे दिन भर कार्य कर सकता है। जैसे जप करते समय परिश्रम करना पड़ता है, वो एक व्यायाम है। पर वो व्यायाम से क्या होता है? हमारा मन सक्षम हो जाता है। और सक्षम मन के साथ हम दिन भर अच्छी तरह से कार्य कर सकते हैं।
सात्विक धृति और योग का महत्त्व
तो सात्विक गुण जो दृढ़ संकल्प है, उसमें योग महत्त्वपूर्ण है। अगर योग में हम दृढ़ संकल्प लाते हैं, तो फिर बाक़ी सब चीज़ों में दृढ़ संकल्प लाना अपने आप आ जाता है। योग में दृढ़ संकल्प नहीं है, तो बाक़ी सब चीज़ों में दृढ़ संकल्प लाना काफी मुश्किल होता है।
योगेनाभिचारेण धृतिः सा पार्थ सात्विकी॥
प्रभुप्राद जी जो हैं, उनका तो दिव्य दृढ़ संकल्प था। पर जो दृढ़ संकल्प है, उनका क्या था? कि वास्तव में व्यक्ति साधारणतया जवान होता है, तो बड़ा महत्त्वाकांक्षी होता है। फिर बाद में मिडिल एज़ में जब आ जाते हैं, सोचते हैं कि मुझे जो मिल गया, उसका बरक़रार रखे तो अच्छा है। और जब बूढ़े हो जाने तो, तो फिर क्या होता है? महत्त्वाकांक्षा कम हो जाती है। महत्त्वाकांक्षा रही भी तो भी शरीर में कार्य करने की क्षमता नहीं रहता है। तो महत्त्वाकांक्षा जब धीरे-धीरे कम हो जाती है और व्यक्ति हताश हो जाता है।
प्रभुपाद जी जब सत्तर साल के थे, तो उन्होंने क्या किया? उन्हें अमेरिका जाना है। अभी उस समय अभी भारत में आज कल तो जाना है, तो बहुत से लोग अमेरिका चले जाते हैं। पर उस समय अमेरिका जाना काफ़ी… पर उस समय में बहुत कम लोग आया करते थे। तो जो उनकी स्पॉन्सर थी, सुमित्रा मोरारजी, जो प्रभुपाद जी उनको बोली कि मैं आपको अमेरिका का टिकट देता हूँ। तो उन्होंने समझा जी, अमेरिका इस सो ओल्ड और आप सो ओल्ड, कि अमेरिका बहुत ठंडी है, ठंडा है। उन्होंने कहा कि मैं अब इसलिए अक्टूबर में अमेरिका गया था, तो वहाँ पर मैं दो स्वेटर पहना था। मैं उनको बोला, बहुत तो लोग इतनी ठंडी है, आप अमेरिका की ठंडी में आओ, आपको छह स्वेटर पहनने पड़ेंगे। वो तभी कुछ माइनस टू डिग्री टेंपरेचर था। तो अमेरिका तभी माइनस ट्वेंटी, माइनस ट्वेंटी-फाइव टेंपरेचर हो जाता है।
तो प्रभुपाद जी ऐसे परिस्थिति में अमेरिका गए थे। और क्यों गए वो अमेरिका? तो उनको कोई असंतुष्टी नहीं थी कि कुछ कमी के गए थे, उनको योगदान करना था। ये एक महत्त्वाकांक्षा थी, क्या एक महत्त्वाकांक्षा थी कि भगवान कृष्ण का संदेश है, वो सारी दुनिया को देना है। तो उनकी जो महत्त्वाकांक्षा थी, वास्तव में एक तरह से देखेंगे तो अद्वितीय है।
बिना पैसे के, बिना किसी कॉन्टैक्ट के, अकेला विदेश जाएगा, बड़ा मुश्किल है ये। और ऐसे भी जो व्यक्ति ज़िंदगी में पहले कभी विदेश नहीं गए, पहले जाएगा तो वापस भी आ सकते हैं, पर पहले कभी नहीं गए, तो व्यक्ति जाएगा, बड़ा मुश्किल है।
दिव्य दृढ़ संकल्प और समस्या का समाधान
तो भक्ति का जो दृढ़ संकल्प है, वो कहाँ से आता है? सात्विक गुण दृढ़ संकल्प योग सिद्ध साधना से आता है। जो दिव्य दृढ़ संकल्प है, वो भगवान में श्रद्धा से आता है।
भगवान में श्रद्धा मतलब कि जब मैं सोचना हूँ कि यह समस्या है और मैं हूँ यहाँ पे। यह समस्या इतनी बड़ी है, मैं इतना छोटा हूँ, मैं कैसे कुछ करूँगा? और ऐसा जब हम सोचते हैं, तो क्या होता है? इससे एक उच्ची दुदति है कि यह समस्या और बड़ी लगती है। समस्या है, पर जितना हम समस्या का चिंतन करते हैं, वो समस्या और बड़ी लगते सकता है। फिर हमको लगता है, मैं कुछ कर ही नहीं सकता हूँ।
तो अब जो भक्ति में क्या है? हम करते हैं, हम समस्या का चिंतन नहीं करते हैं, भगवान का चिंतन करते हैं।
मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि।
और भगवान कहते हैं अठारहवें अध्याय के अठारहवें श्लोक में कि अगर आप मेरी चेतना में रहोगे, मेरा चिंतन करोगे, सर्वदुर्गाणि… जो भी समस्याएँ आएगी, समस्याएँ आएगी, पर आप उनके परे जाओगे, मत्प्रसादात् तरिष्यसि। आप उन समस्याओं के परे जाओगे। और किस तरह से परे जाओगे? भगवान का… वास्तव में भगवान की दिव्य योजना होती है। भक्ति का दृढ़ संकल्प, उसके बारे में हम अगली अपनी चर्चा करेंगे।