Difference between glorification and flattery (Hindi)
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Lecture Summary
- भागवतम के प्रथम स्कंध में द्वारका-आगमन का प्रसंग: श्रीमद्भागवत के प्रथम स्कंध (अध्याय ११) में भगवान श्री कृष्ण का द्वारका में पुनः आगमन वर्णित है। यहाँ द्वारकावासी, वयोवृद्ध ब्राह्मण, गुरुजन और संबंधी उनके स्वागत हेतु आते हैं। वृद्ध ब्राह्मण चलने में असमर्थ होने पर भी कृष्ण के दर्शन कर आशीर्वाद एवं गुणगान प्रस्तुत करते हैं।
- गुणगान (Glorification) बनाम चापलूसी (Flattery/Sycophancy):
- चापलूसी (मस्का लगाना): यह भौतिक चेतना और स्वार्थ से प्रेरित होती है। चापलूसी करने वाला व्यक्ति सामने वाले से अपना काम निकालना चाहता है और उसके मन में ईर्ष्या/प्रतिस्पर्धा छिपी होती है।
- गुणगान: यह सात्त्विक अथवा आध्यात्मिक चेतना से उत्पन्न होता है। जब कोई श्रेष्ठ या पूज्य व्यक्ति किसी के वास्तविक गुणों की सराहना करता है, तो वह केवल शब्द नहीं होते बल्कि एक प्रोत्साहन और आशीर्वाद होते हैं।
- तीन प्रकार की चेतना में गुणगान:
- मिथ्या अहंकार (सकाम/स्वार्थी): केवल अपना काम निकालने या झूठी प्रशंसा प्राप्त करने के लिए।
- मानवीय/स्नेहपूर्ण: माता-पिता द्वारा बच्चे को प्रोत्साहन देना (वात्सल्य या प्रेमवश)।
- आध्यात्मिक (वैष्णव चेतना): यह स्वीकार करना कि सभी जीव भगवान के अंश हैं। वैष्णव संस्कृति में एक-दूसरे का सम्मान और गुणगान करना भक्ति में प्रोत्साहन देने के लिए अत्यंत आवश्यक है।
- वैष्णव-अपराध से बचाव एवं आंतरिक सम्मान: तृणादपि सुनीचेन… अमानिना मानदेन… के अनुसार दूसरों का सम्मान करने के लिए बहुत बड़ी आध्यात्मिक शक्ति लगती है, क्योंकि हमारा मिथ्या अहंकार दूसरों का आदर करने में बाधा डालता है। आदर केवल मुख के शब्दों से नहीं, बल्कि आंतरिक चेतना से होना चाहिए।
- आत्मा का दिव्य स्वरूप और प्रोत्साहन: श्रील प्रभुपाद जी प्रत्येक जीव को भगवान का नित्य अंश (ममैवांशो जीवलोके) मानकर, भले ही कोई बाह्य रूप से कितना भी पतित या अज्ञानी हो, उसके भीतर छिपे ‘सोने’ (दिव्य आत्मा) को पहचानकर उसे कृष्ण भक्ति में प्रोत्साहित करते थे।
Full Transcription
हरे कृष्णा! तो आज हम भागवतम के ग्यारहवें अध्याय (प्रथम स्कंध)—”भगवान श्री कृष्ण का द्वारका में आगमन”, इसमें चर्चा कर रहे हैं। तो हम इस विषय पर इसमें चर्चा करेंगे कि—गुणगान करना और मस्का लगाना (चापलूसी करना) इसमें क्या फर्क है?
पहले थोड़ी पृष्ठभूमि: श्रीमद्भागवत के प्रथम स्कंध में भगवान की लीलाओं का कुछ हद तक वर्णन होता है, और इसका विस्तृत वर्णन दशम स्कंध में होगा। तो भागवतम का जो हृदय है—दशम स्कंध—उसकी झलक प्रथम स्कंध में दी जा रही है। पर ये दोनों अलग प्रसंग हैं। जो पांडवों की लीला है, पांडवों के साथ भगवान की लीला है और द्वारकावासियों के साथ जो लीला है, इसका पूरा वर्णन दशम स्कंध में नहीं आता है। जो घटना यहाँ पर बताई गई है, वह वहाँ पर नहीं बताई गई है।
पर वह यहाँ पर क्यों बताई जा रही है? क्योंकि भागवतम का कथन किस प्रकार से हुआ, कैसे शुकदेव गोस्वामी और परीक्षित महाराज मिले, और वे दोनों किस तरह से महान व्यक्ति थे—यह बताने के लिए पहले शुकदेव गोस्वामी का कि जन्म कैसे हुआ, और फिर वे कैसे ब्रह्मज्ञानी थे और बाद में वे कैसे भक्त बन गए, इसका वर्णन सातवें अध्याय में आता है। वह संक्षिप्त रूप में आता है। पर आठवें अध्याय से भागवतम के अंत तक (पहले स्कंध के अंत तक) इन सारे घटनाओं का वर्णन इसलिए है कि परीक्षित महाराज कितने महान व्यक्ति थे, उनके पूर्वज कैसे थे, वे भगवान को कितने प्रिय थे और कितने वे भगवान के महान भक्त थे। पांडव जो थे, वह सब वर्णन प्रथम स्कंध में हो रहा है।
प्रथम स्कंध का अंतिम अध्याय जो है, वह है शुकदेव गोस्वामी का आगमन; और फिर अगले स्कंध में (दूसरे स्कंध में) शुरुआत होती है प्रश्नों की और प्रश्नों के उत्तरों की भी।
तो फिर यहाँ पर जो वर्णन हो रहा है कि कैसे भगवान पांडवों को बहुत प्रिय थे; और जब कि द्वारकावासी, उनकी पत्नियाँ, उनके सदस्य थे, परिवार के सदस्य थे, उनको छोड़कर भी भगवान द्वारका से हस्तिनापुर जाया करते थे। और यह सब वर्णन इसलिए हो रहा है… कि अभी देखिए, यहाँ पर एक अध्याय भगवान का द्वारका में आगमन है, पर तुरंत उसके बाद में धृतराष्ट्र और विदुर का… धृतराष्ट्र का संदेश, और फिर पांडवों का… भगवान कृष्ण का जो तिरोभाव है, उसका भी वर्णन प्रथम स्कंध में अधिक नहीं आता है, सिर्फ उसका प्रभाव पांडवों पर क्या हुआ, उसका वर्णन आ रहा है।
तो इससे क्या बताया जा रहा है कि द्वारकावासियों को भगवान इतने प्रिय थे, फिर भी भगवान उनको छोड़कर पांडवों के साथ बार-बार रहा करते थे। तो पांडव कितने महान हैं, यहाँ इन सब प्रसंगों से बताया जा रहा है।
पर यहाँ पर भगवान पांडवों की इजाज़त लेकर फिर अभी द्वारका में प्रवेश कर रहे हैं। और सभी द्वारकावासी बहुत आनंदित हो गए हैं, और आनंदित होकर वे द्वार पर भगवान का स्वागत करने आ गए हैं।
और जब वे स्वागत करने आए हैं, तो यहाँ पर तीन श्रेणियों के लोगों के बारे में बताया गया है:
- स्वयं च गुरुभिः: स्वयं च मतलब भगवान आ रहे हैं, गुरुभिः मतलब जो उनके वरिष्ठ, उनके वरिष्ठ रिश्तेदार वगैरह हैं, वे सब आए हैं।
- स्थाविरैः विप्रैः: फिर विप्र हैं, फिर ब्राह्मण भी हैं। और किस प्रकार के ब्राह्मण हैं ये? स्थाविरैः विप्रैः। स्थाविरैः विप्रैः मतलब कि जैसे दो प्रकार के जीव बताए गए हैं वैदिक शास्त्रों में—स्थावर और जंगम। स्थावर मतलब जो हिल-डुल नहीं सकते (जैसे कि पेड़ है) और जंगम मतलब जो हिल-डुल सकते हैं (जो जानवर हैं, पक्षी हैं और मानव भी हैं)। तो जो मानव हैं वे जंगम होते हैं, पर ऐसे बताया है कि यह जो ब्राह्मण थे, ये इतने वृद्ध हो गए थे कि वृद्धता के कारण वे लगभग स्थावर रहित हो गए थे, वे चल-फिर नहीं पा रहे थे ज्यादा। पर फिर भी भगवान से इतना प्रेम था उनका कि वे भगवान से मिलने आ गए। और जब भगवान से मिलने आ गए, तभी उन्होंने क्या देखा कि वे भगवान का सुंदर दर्शन करके, वे भगवान का गुणगान करने लग गए। पर वह जो गुणगान था, वह भगवान से बहुत महत्वपूर्ण शब्द समझे—आशीर्भिः! तो जो ब्राह्मणों का गुणगान था, वह एक प्रकार से आशीर्वाद था। इसके बारे में हम चर्चा करेंगे। तो पहले श्रेणी के जो लोग थे, वे उनके ही रिश्तेदार थे—गुरुभिः; फिर स्थाविरैः विप्रैः; और तीसरे थे वन्दिभिः।
- वन्दिभिः: वन्दिभिः मतलब वन्दिभिश्च अन्यैः—बाकी सब लोग थे, वे उनकी वंदना कर रहे थे।
तो ब्राह्मण—जो बुजुर्ग ब्राह्मण थे—वे जो कर रहे थे, वह भी उनका गुणगान कर रहे थे, पर वास्तव में जो गुणगान था, वह क्या था? आशीर्भिः—वह एक आशीर्वाद के समान था। और इस तरह से सब उनका गुणगान करते हुए आविष्टपुरम्… वे द्वारकापुरी में प्रवेश कर रहे थे।
गुणगान (Glorification) और चापलूसी (Flattery) में अंतर
प्रभुपाद जी यहाँ पर ज़ोर देते हैं ब्राह्मणों पर, और वे तात्पर्य में बताते हैं कि कैसे जो ब्राह्मण राजाओं का गुणगान करते हैं, तो वह गुणगान वास्तव में बाह्य रूप से ऐसे लग सकता है जैसे हम भौतिक जगत में लोग किसी से कुछ प्राप्त करना हो, किसी से कुछ काम निकालना हो, तो उसका गुणगान करते हैं—”आप इतने महान हो, आप यह हो, आप वह हो”, और उसका गुणगान करके फिर अपना काम निकाल लेते हैं! तो वैसे ही यहाँ पर लग सकता है।
पर प्रभुपाद जी बोलते हैं कि यहाँ पर फर्क क्या है? फर्क यहाँ है—दो चीज़ें प्रभुपाद जी बताते हैं:
- वास्तविक गुण: जो राजा थे, वे वास्तव में गुणशील थे, गुणवान थे। और उनके वास्तविक गुणों का जब वर्णन किया जाता है, उनकी स्तुति की जाती है, तो वास्तव में वह चापलूसी या मस्का लगाना नहीं है।
- आशीर्वाद एवं प्रोत्साहन (आशीर्भिः): जो पुण्यवान, भक्तिपूर्ण व्यक्ति होता है, वह किसी और का गुणगान करता है, तो वह गुणगान एक प्रकार से प्रोत्साहन होता है, और उस प्रोत्साहन में आशीर्वाद होता है।
अगर कोई वरिष्ठ भक्त हमसे कहते हैं कि “आप बहुत अच्छे भक्त हो”, तो इसका मतलब क्या है? उन्होंने ज़रूर हमारे भीतर कुछ भक्ति के गुण देखे होंगे, पर साथ-साथ उसमें यह भी एक प्रकार से आशीर्वाद है कि हम उनके प्रोत्साहन से, उनके आशीर्वाद से और अच्छे भक्त बन सकें!
उसमें दोनों की चेतना महत्वपूर्ण है—जो गुणगान कर रहा है और जो गुणगान स्वीकार कर रहा है।
भौतिक जगत का गुणगान (स्वार्थ और ईर्ष्या)
भौतिक जगत में जब गुणगान होता है, तो वास्तव में दोनों स्वार्थ की चेतना में मिलते हैं। जो गुणगान कर रहा है, उसको वास्तव में उस व्यक्ति से कुछ लेना-देना नहीं है, वास्तव में उससे अपना काम करवाना है। वह उस व्यक्ति को एक औज़ार के रूप में इस्तेमाल कर रहा है। वह उसके मुँह पर उसका गुणगान करेगा, और उसके पीठ पीछे उसको बहुत अनाप-शनाप कहेगा! क्योंकि वास्तव में भौतिक जगत में किसी के लिए हृदय से आदर रखना मुश्किल होता है, क्योंकि हमेशा एक प्रतिस्पर्धात्मक भाव (Competitive spirit) होता है।
क्योंकि भौतिक जगत में जो भी चीज़ें हैं, वे सब सीमित हैं। इसलिए अगर किसी और व्यक्ति को कुछ मिल गया, तो वह मुझे नहीं मिलेगा! अगर कोई विद्यालय में, कक्षा में कोई विद्यार्थी पहला आता है, तो बाकी विद्यार्थी भले जो उसका अभिनंदन करेंगे, फिर भी उनके हृदय में ईर्ष्या होगी कि “मैं पहला आता तो कितना अच्छा होता!” तो वह जो अभिनंदन होता है, कई बार हृदय से नहीं होता है, क्योंकि उसमें स्पर्धात्मक भाव के कारण ईर्ष्या होती है।
तो यह स्पर्धात्मक भाव होता है जो गुणगान कर रहा है उसमें। तो वह गुणगान इसलिए करता है क्योंकि अच्छा लगना चाहिए, ऐसे नहीं लगना चाहिए कि मैं उसकी ईर्ष्या कर रहा हूँ, या दिखावे के लिए करते हैं, या फिर उससे कुछ मदद चाहते हैं—”तुम कौन-सी किताबें पढ़ते हो मुझे बताओ, ताकि मैं अगली बार पहला आ जाऊँ!”
जो भी लोग करते हैं भौतिक चेतना में, वह स्वार्थ से हमेशा दूषित होता है। कभी-कभी न केवल स्वार्थ से दूषित होता है, पर केवल स्वार्थ से ही भरा होता है पूरा!
और जो व्यक्ति गुणगान स्वीकार कर रहा है, वह व्यक्ति भी वास्तव में मिथ्या अहंकार की भावना में होता है। वह सोचता है कि “मैं कितना महान हूँ, मैंने यह किया, मैंने वह किया, मैं इतना बड़ा हूँ!”
तो यहाँ जो भाव है, भगवद्गीता (३.२७) में भगवान् बताते हैं:
प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः ।
अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते ॥
कि प्रकृति ही सब कुछ कर रही है। अगर मुझे अच्छा गाना आता है, वास्तव में वह एक औज़ार है जो प्रकृति ने और भगवान् ने मुझे दिया है, और वे अपनी योजना के अनुसार कार्य कर रहे हैं। हमने ज़रूर इसमें कुछ प्रयास किया होगा, पर वास्तव में जो गुण हैं वे हमारे नहीं हैं, प्रकृति कार्य कर रही है।
एक बार एक गाँव में बड़ा आलसी व्यक्ति था। वह इतना आलसी था कि उसको कुछ भी काम हो, घर से निकलने को भी तैयार नहीं होता था, हमेशा घर में बैठा रहता था। और एक दिन गाँव वालों ने देखा कि वह एक घोड़े पर बैठकर बहुत तेज़ी से चल रहा है! तो सब लोग आश्चर्यचकित हो गए। सब लोगों ने पूछा—”अरे भाई! आज क्या बात है, इतने तेज़ी से क्यों चल रहे हो?” तो उसने बोला—”मुझे क्यों पूछ रहे हो, घोड़े को पूछो!”
तो वास्तव में, जो भौतिकवादी व्यक्ति है, उसे कभी-कभी लगता है कि वह बहुत कार्य कर रहा है, पर असलियत देखेंगे तो वह जो कार्य है, उसकी प्रवृत्तियों के अनुसार ही हो रहा है। कभी-कभी जब वह प्रवृत्ति उसकी इच्छा के खिलाफ जाती है, तो उसकी प्रवृत्ति… “क्या हो रहा है यह?” पर कभी-कभी, बहुत बार वह समझ में भी नहीं आता है। तो इसलिए वह व्यक्ति भी मिथ्या अहंकार पर होता है, भावना का जो गुणगान स्वीकार कर रहा है, और ऐसे गुणगान से केवल उसका मोह जो है, वह और बढ़ जाता है, और बढ़ जाता है।
मानवीय स्नेह एवं प्रोत्साहन
पर इसके अलावा, दूसरी भावना में भी गुणगान हो सकता है। क्योंकि जो स्वार्थ भाव है… भौतिक चेतना में स्वार्थ होता है, पर मानवीय भावनाएँ भी होती हैं। अगर कोई बालक है, वह पहली बार चलने लगता है, तो उसके माता-पिता बहुत प्रसन्न हो जाते हैं और उसको शाबाशी देते हैं, तालियाँ बजाते हैं। तो वास्तव में हम कह सकते हैं कि इसमें भी स्वार्थ है, पर यहाँ एक तरह से जो विश्लेषण है बड़ा निष्ठुर है। हमें यहाँ पर समझना चाहिए कि यहाँ पर माता-पिता का भाव एक तरह से जो होता है, अपने बालक को प्रोत्साहन देना है।
तो इसलिए जो हम भौतिक और आध्यात्मिक चेतना में विभाजन करते हैं, उसमें हमें यह समझना चाहिए कि कुछ मानवीय भावनाएँ हैं, जो भले ही पूरी तरह आध्यात्मिक न हों, पर वे हमेशा मिथ्या अहंकार की भावना पर भी नहीं होती हैं, क्योंकि उसमें दूसरे व्यक्ति की चिंता होती है, दूसरे व्यक्ति के कल्याण की इच्छा भी होती है। तो ऐसा प्रोत्साहन हम सबको एक-दूसरे का करना जरूरी है, जिससे कि हमें हमारे जीवन में जो समस्याएँ आती हैं, जो हमें कभी-कभी हार का सामना करना पड़ता है किसी परिस्थिति में, उसमें हम हौसला हारे बिना आगे चल सकें।
आध्यात्मिक गुणगान और वैष्णव-संस्कृति
और फिर इससे ऊपर है—आध्यात्मिक चेतना। हम खुद समझते हैं कि “मैं शरीर नहीं हूँ, मैं आत्मा हूँ, मैं भगवान् का अंश हूँ। और यह व्यक्ति भी भगवान् का अंश है।” और उस व्यक्ति को भगवान् की सेवा में प्रोत्साहित करने के लिए अगर हम उनका गुणगान करते हैं, तो वह बहुत महत्वपूर्ण है!
क्योंकि इस भौतिक जगत में जब हम भक्ति करते हैं, तो अनेक प्रकार से विरोध आते हैं। प्रभुपाद जी उदाहरण दिया करते थे कि जैसे नदी का प्रवाह एक दिशा में हो और हम तैर रहे हैं दूसरी दिशा में, तो तैरने के लिए हमेशा संघर्ष होता है। उसी तरह से भौतिक जगत में जो प्रवाह होता है, वह हमेशा भौतिक चीज़ों की ओर, भौतिक आकर्षणों की ओर होता है। इसलिए हमेशा संघर्ष करना पड़ता है कि हम भगवान् की शरण लें, भगवान् की सेवा में बने रहें। और इस संघर्ष में हम सबको प्रोत्साहन की ज़रूरत होती है!
और इसलिए वैष्णव-संस्कृति में एक-दूसरे का गुणगान करना यह बहुत महत्वपूर्ण बताया गया है। हम श्रीमद्भागवत में देखते हैं, न केवल भक्त भगवान् का गुणगान करते हैं, पर चैतन्य चरितामृत में भी जब भक्त एक-दूसरे से मिलते हैं, तो भक्त एक-दूसरे का गुणगान करते हैं।
यहाँ तात्पर्य में प्रभुपाद जी दो चीज़ें बताते हैं:
- एक साधारण संस्कृति जिसमें ब्राह्मण क्षत्रियों का गुणगान कर रहे हैं।
- इस परिस्थिति में जो क्षत्रिय हैं (भगवान् श्री कृष्ण), वे केवल क्षत्रिय नहीं हैं, वे स्वयं भगवान् हैं और वे ‘उत्तमश्लोक’ हैं। वे सब प्रकार के गुणों से पूर्णतया सब प्रकार के गुणगान के लिए पात्र हैं, वे ‘उरुगाय’ हैं। तो इसलिए बताया गया है कि उरुगाय उनके लिए जितना भी गुणगान करें उतना कम ही है भगवान् के लिए।
तो भगवान् के गुणगान के बारे में जो यहाँ पर बताया जा रहा है, वह प्रभुपाद जी एक विशेष प्रसंग है, एक विशेष परिस्थिति है, पर प्रभुपाद जी उस परिस्थिति पर ज़ोर नहीं दे रहे हैं, जो संस्कृति है जिसमें वह हो रहा है उस पर ज़ोर दे रहे हैं। और उस संस्कृति में बता रहे हैं कि क्षत्रिय ब्राह्मणों का गुणगान करते हैं, और हम यही देखते हैं कि भागवत में कई जगह पर आता है जब स्वायंभुव मनु और कर्दम मुनि एक-दूसरे से मिलते हैं, तो वे दोनों एक-दूसरे का गुणगान करते हैं।
अमानिना मानदेन — सम्मान देने की सामर्थ्य
तो यहाँ पर गुणगान करते समय किस प्रकार से हमें गुणगान करना चाहिए? कि जो शिक्षाष्टकम् के तीसरे श्लोक में बताया गया है:
तृणादपि सुनीचेन तरोरपि सहिष्णुना ।
अमानिना मानदेन कीर्तनीयः सदा हरिः ॥
यहाँ पर कीर्तनीयः सदा हरिः जो बताया गया है कि सदा भगवान् हरि का कीर्तन करना चाहिए। तो कभी-कभी हम प्रयास कर सकते हैं कि मैं हमेशा जब जितना समय जितना हो सकता है जप करूँ, अच्छी बात है, प्रयास करना चाहिए। पर यहाँ हमेशा भगवान् का कीर्तन करना यहाँ केवल एक यांत्रिक प्रयास से हम यशस्वी नहीं हो सकते हैं। तो उसके लिए एक चेतना का परिवर्तन ज़रूरी है। और वह चेतना का परिवर्तन जो ज़रूरी है, वह इस श्लोक की पहली तीन पंक्तियों में बताया गया है कि जब हम नम्र, सहनशील… तो भक्तिविनोद ठाकुर अपने गीत में बताते हैं कि सबको सम्मान देने के लिए… “मैं सबको सम्मान दे सकूँ, इसके लिए आप मुझे शक्ति दीजिए।”
क्या है वह श्लोक?
सकल सम्माने सकल मानदेते शकति दिया नाथा…
क्या कह रहे हैं अपने? कि सबको सम्मान करने के लिए… किस प्रकार सम्मान? यथा-यथा उस व्यक्ति के पद के अनुसार, इसके लिए आप मुझे शक्ति दीजिए।
साधारणतया हम जब भगवान् से प्रार्थना भी करते हैं, तो हमारी प्रार्थना होती है कि “भगवान् मुझे ऐसी शक्ति दीजिए जिससे कि मैं ऐसे कार्य कर सकूँ ताकि सब लोग मेरा सम्मान करें!” तो हमारा भाव जो होता है—अगर भगवान् की सेवा के लिए हम बहुत बड़े कार्य करना चाहते हैं, तो अच्छा है वह, पर केवल वह अगर हम हमारे खुद के गुणगान के लिए चाह रहे हैं, तो वह अनुचित है।
और यह जो है—बहुत बड़े-बड़े कार्य करना—यह अच्छा है भगवान् की सेवा में, हमें चाहिए कि भगवान् का जो मिशन है वह हम बहुत-बहुत अच्छी तरह से विस्तार कर सकें उसका। पर यह जो शक्ति है, इसके लिए शक्ति लगती है, पर इससे अधिक शक्ति जो लगती है वह है… क्योंकि क्या है, जब हम कुछ ऐसा कार्य करते हैं जो सम्माननीय हो, जिससे हमें आदर मिलता है, वह भले ही हम भगवान् की प्रसन्नता के लिए कर रहे हों, भले ही भगवान् की सेवा के अनुसार ही कार्य कर रहे हों, पर उस समय क्या होता है? उसमें हमारा मिथ्या अहंकार भी उसमें संयुक्त होता है!
तो क्या होता है, जब हम कोई बड़ा कार्य कर रहे हैं, तो भगवान् की सेवा करने की इच्छा उसमें सिर्फ नहीं है, भगवान् की सेवा करने की इच्छा के साथ-साथ हमारी भी महिमा दुनिया को दिखाने की इच्छा है उसमें! तो ऐसे नहीं है कि इसके कारण ऐसे विचार से हम वह कुछ भगवान् की सेवा में अच्छा नहीं कर रहे, क्या है कि हमारे स्तर पर येन केन प्रकारेण मनः कृष्णे निवेशयेत्—किसी न किसी तरह से भगवान् की सेवा करनी है हमें।
पर तो क्या होता है, जब हम कोई बहुत बड़ा कार्य करते हैं, तो उसमें हमारा मिथ्या अहंकार हमें सहयोग करता है, और इसलिए उसको उतनी शक्ति नहीं लगती जितना कि हम दूसरों को आदर देने में लगती है! क्योंकि दूसरों को आदर देने के समय क्या होता है, हमारा मिथ्या अहंकार उसका विरोध करता है! और उस मिथ्या अहंकार का विरोध करके किसी का गुणगान करना जब होता है, तो वह आसान नहीं होता!
तो इसलिए भक्तिविनोद ठाकुर कह रहे हैं… और वे यहाँ पर यह भी नहीं कह रहे हैं कि दूसरों का गुणगान करने के लिए वह शक्ति नहीं है, वे कहते हैं दूसरों का सम्मान करने के लिए शक्ति दीजिए।
अब गुणगान और सम्मान इसमें फर्क क्या है?
- गुणगान: शब्दों से कहना।
- सम्मान: अंदर से वह भाव होना, दूसरों के प्रति आदर का भाव होना।
कभी-कभी हम भक्तों में मिलते हैं, तो हम एक रीति-रिवाज के रूप में दूसरों का गुणगान करते हैं—”आप इतने अच्छे भक्त हो, आप यह हो, आप वह हो”, और उसमें भले ही कभी-कभी हमारा स्वार्थ भी होता है। कभी कोई वक्ता हमारा गुणगान करने लगता है, तो हम सोचने लगते हैं कि इनको कुछ सेवा चाहिए होगी हमसे, इसलिए यह बोल रहे हैं। तो वास्तव में अगर वैसे है भी, तो वह बुरा नहीं है, क्योंकि वह हमें भगवान् की सेवा में ही लगा रहे हैं।
पर जो है कि हमारी जो अंतरंग चेतना होती है, वह कुछ समय तक हम छिपा सकते हैं, पर धीरे-धीरे वह दूसरों को समझ में आ जाती है। तो अगर कोई व्यक्ति हम देखते हैं, कोई आम है, दूसरों के प्रति सही में उनके कल्याण की चिंता है, उनसे स्नेह है और उनके प्रति आदर है, तो वह जो है धीरे-धीरे समझ में आ जाता है। और अगर वह नहीं है, तो वह भी समझ में आ जाता है। केवल हमारे वचन हैं और बोलने की पद्धति है, उससे ही हम दूसरों से संपर्क नहीं करते हैं, हमारी अंतरंग चेतना है उससे भी हम दूसरों से आदर प्रदान करते हैं। और जो शुद्ध भक्त होते हैं, जो महान भक्त होते हैं, उनकी हृदय की शुद्धता इतनी होती है कि उससे लोग प्रभावित हो जाते हैं।
सूक्ष्म चेतना और आदर का प्रभाव
तो वैज्ञानिक संशोधन कर रहे हैं, उन्हें पता चल रहा है कि हमारी जो इंद्रियाँ हैं, उनसे ही हम ज्ञान नहीं प्राप्त करते, उसके अलावा अनेक पद्धतियाँ हैं जिससे भी ज्ञान प्राप्त करते हैं। और यह कैसे होता है, वह उनको समझ में नहीं आता है। पर यह है, मैं इसके दो उदाहरण दूँगा और फिर हमारा जो भाव है उस पर हम केंद्रित करेंगे।
- चींटियों का उदाहरण: दुनिया में ऐसी जगहें हैं जहाँ पर भूकंप बहुत होते हैं। तो अभी जब भूकंप कब होगा, कैसे होगा, इसकी भविष्यवाणी करना लगभग नामुमकिन है। हमारे पास जो यंत्र हैं, कितना बड़ा भूकंप है वह बता सकते हैं, पर भूकंप होगा कि नहीं वह बताना बड़ा मुश्किल है। तो वैज्ञानिक देखते हैं कि कई बार जब कहाँ भूकंप होता है, तो वहाँ जो जानवर होते हैं, उनका जो बर्ताव है बदल जाता है। और यूरोप में ऐसा संशोधन हुआ है कि जो चींटियाँ होती हैं, जब भूकंप होता है उसके एक दिन पहले और उसके एक दिन बाद तक वे चींटियाँ अपने जो घर होते हैं उसके अंदर जाती ही नहीं हैं! उसके बाहर घूमती रहती हैं। और अभी यहाँ कई भूकंपों में उन्होंने क्या देखा है कि जितना बड़ा भूकंप होता है, उतना वे चींटियाँ अपने घरों से दूर रहती हैं! तो अभी उनको कैसे समझ में आता है चींटियों को कि भूकंप होने वाला है? और यह एक बार होगा, दूसरे बार होगा, तीसरे बार होगा… पर यह सैकड़ों बार हो रहा है! और एक चींटी नहीं है ऐसे नहीं है कि जो एक ही… अगर हम इस बालकनी में चींटियों की जनसंख्या बनाएँगे तो कितना होगा, कितने सारे हैं! और ऐसे नहीं है कि अगर एक चींटी के पास कुछ विशेष बुद्धि है, वह चींटी समझ जाती है और बाकी सब को ईमेल कर देती है, नहीं! यह एसएमएस (SMS) कर देती है, उनमें इस प्रकार से कोई संदेश भेजने की सुविधा भी नहीं है। मतलब वे चींटियाँ स्वयं समझ जाती हैं! तो कैसे समझती हैं, वह उनको पता नहीं है। वे कुछ मनगढ़ंत धारणा करते हैं कि उन चींटियों के दिमाग में कोई चुंबकीय जैसी शक्ति होगी, और जब भूकंप होता है तो उसमें से कोई चुंबकीय जैसी शक्ति निकलती होगी और इन दोनों जब समझ में आते हैं, तो चींटियों को समझ जाता है कि कुछ यहाँ पर खतरा होगा। तो अभी यह सब मनगढ़ंत बात है, पर यहाँ पर कहने का अर्थ क्या है कि इस सृष्टि में ऐसी चीज़ें हैं जो हम हमारे केवल इंद्रियों से समझ नहीं सकते हैं।
- दृष्टि का अनुभव: वैज्ञानिकों ने मानवों के साथ प्रयोग किया है कि एक व्यक्ति यहाँ पर बैठा है (जैसे मान लीजिए मैं बैठा हूँ यहाँ पर) और मेरे पीछे कोई व्यक्ति बैठा है, और वह कभी मेरी ओर घूर के देखता है और कभी कहीं और देखता है, और मैं उसको देख नहीं सकता हूँ। पर मुझसे पूछा जाता है कि “आप अंदाजा लगाओ, क्या वह व्यक्ति आपकी ओर देख रहा है या नहीं?” तो अगर यह केवल अंदाजे की बात होगी तो फिर क्या होगा, ५०% समय में सही होगा, ५०% समय में गलत होगा। पर कुछ लोगों के लिए ९०% होता है कि वे लोग… तो इसका ऐसे कई वीडियो क्लिपिंग भी हैं। तो वह व्यक्ति आपसे कहता है कि “देख रहा हूँ?—हाँ, नहीं, हाँ, नहीं…” तो वहाँ पर जो बता रहे हैं…
तो कहने का तात्पर्य यह है कि अंतरंग रूप से संवाद किस तरह से हम कर सकते हैं? यहाँ समझ के कि वास्तव में भक्त कितने दुर्लभ हैं इस दुनिया में! भक्तों में कुछ गुण कम हो सकते हैं, हम देखते हैं कि “यह भक्त आलसी है, यह भक्त क्रोधी हो जाता है, यह भक्त ऐसा है, यह भक्त वैसा है…” अभी यह कुछ कमियाँ हम भक्तों में हो सकती हैं, पर वास्तव में जो भक्तों का प्रधान लक्षण है—कृष्ण-शरणम्! कि इस दुनिया में लाखों-करोड़ों लोग हैं, और उनमें कृष्ण-शरणम्… वे भक्त बन जाते हैं।
भले ही बातचीत में हम ज्यादा कुछ गुणगान न भी करें, फिर भी अगर सम्मान हो अंदर, तो उससे भी धीरे-धीरे संबंध इतने अच्छे बन जाते हैं। और ऐसे नहीं कि सिर्फ अंदर करना है और गुणगान बाहर से कभी नहीं करना है—”अंदर भाव है न, तुम्हें समझ नहीं आता है तो तुम्हारी कमी है”, ऐसे नहीं सोचना चाहिए हमें। हमें वास्तव में दूसरों का गुणगान भी करना चाहिए।
और वह गुणगान क्यों करना है? ऐसे नहीं है कि रीति-रिवाज के रूप में, वास्तव में हमें देखना है कि इस भक्त में कुछ गुण हैं। और अगर वे गुण हैं, तो ये गुण भी कुछ आध्यात्मिक गुण हो सकते हैं, कुछ भौतिक गुण हो सकते हैं। वास्तव में जो कोई भक्ति कर रहा है, तो सब गुण जो हैं वे एक प्रकार से आध्यात्मिक हो जाते हैं, क्योंकि वे भगवान् की सेवा में ही वे गुण लगाए जा रहे हैं, इस्तेमाल हो रहे हैं। पर किसी में कुछ भौतिक गुण भी होते हैं, तो उनका भी विकास करना जरूरी है। कोई व्यक्ति अच्छा गाता भी है, तो कोई अच्छा लिखता है, कोई अच्छा अनुशीलन करता है किसी भी गुण का, तो उसमें प्रयास लगता है, उसमें अभ्यास लगता है। और उससे ही व्यक्ति और अच्छी तरह से वह कार्य कर सकता है। और वह प्रयास, वह अभ्यास करने के लिए उस व्यक्ति को प्रोत्साहन चाहिए। तो प्रोत्साहन देना बहुत जरूरी है!
यहाँ प्रभुपाद जी की विशेषता थी… (राधा गोकुलानंद भगवान् की जय!)… यहाँ प्रभुपाद जी की विशेषता थी कि प्रभुपाद जी… हम एक तरह से प्रभुपाद जी का एक ही पहलू देखते हैं कि प्रभुपाद जी लोगों को कभी ‘फूल’, ‘रास्कल’, ‘मूढ़’ कहा करते थे। पर प्रभुपाद जी का जो स्नेहपूर्ण, प्रेमपूर्ण भाव था, उससे भी सबको प्रोत्साहित करते थे भक्ति में। और अगर प्रभुपाद जी लोगों को प्रोत्साहित नहीं कर सकते थे और नहीं कर रहे होते, तो जो लोगों को भगवान् के बारे में कुछ जानकारी ही नहीं थी, वे लोग भगवान् को क्यों अपना जीवन समर्पित करते?
तो प्रभुपाद जी में यह भाव था कि वे हर एक व्यक्ति को… वे उनके जो बाह्य आवरण हैं कि व्यक्ति इस तरह से म्लेच्छ है, या शूद्र है, या ऐसा है, या वैसा है, उसके परे व्यक्ति को देखते थे कि यह दिव्य आत्मा है, और आत्मा के स्तर पर यह भगवान् का भक्त है! भले ही व्यक्ति अभी आवृत हो, वह व्यक्ति जाग्रत होने की एक क्षमता सब में है।
नित्य-सिद्ध कृष्ण-प्रेम ‘साध्य’ कबहूँ नय ।
श्रवणादि-शुद्ध-चित्ते करये उदय ॥
प्रभुपाद जी कई बार यह श्लोक बताया करते थे, और खास करके जब वे अपने विदेशी भक्तों को भारत में लेकर आते थे, तब कि वे अपने भारतीय लोगों को वह बताते थे कैसे इन लोगों को कुछ भी पता नहीं था, पर फिर भी ये भक्त कैसे बन गए! प्रभुपाद जी खुद श्रेय नहीं लेते थे कि मैंने कोई जादू किया है, वे कहा करते थे कि वास्तव में कृष्ण-भक्ति सब में है, अगर उनको श्रवण करने का मौका दिया जाए, तो उससे वे सब भक्त बन जाएँगे!
तो इसलिए यह प्रभुपाद जी की विशेषता थी। चाणक्य पंडित का जो श्लोक है, वह प्रभुपाद जी कई बार बोला करते थे कि अगर सोना है, वह अगर कचरे में पड़ा है, तो सोने को कचरा निकाल के ले लिया जाएगा!
हर एक व्यक्ति जो है, वह भगवान् का अंश है। १५वें अध्याय के ७वें श्लोक में भगवान् बताते हैं कि ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः—हर एक जीव जो है, वह मेरा अंश है। तो भगवान् जो हैं, वे पूर्ण सुवर्ण के समान हैं। हमारा भाव क्या है? विग्रहों की सेवा करनी है, प्रचार करना है, पर यह सब का भाव क्या है, यह सब का उद्देश्य क्या है? कि जो हर एक व्यक्ति अंदर से शुद्ध सोना है, और बाहर से जो कुछ गंदगी का आवरण लग गया है, तो वह गंदगी का आवरण निकाल के वह जो असली सोना है, उसको बाहर लाना है!
और वहाँ लाने के लिए हमें दूसरों को मार्गदर्शन देना है। मार्गदर्शन देते हैं कि “आप महामंत्र जप करो, शास्त्र का अध्ययन करो, उससे आप समझोगे कि वास्तव में आप क्या हो असली में। और अभी आपकी जो भी कष्ट-दशा हो गई है—कुछ दुर्गुण हो सकते हैं, कुछ व्यसन हो सकते हैं, कुछ अनर्थ हो सकते हैं—पर यह सब बाह्य है, अंदर से वास्तव में आप शुद्ध हो, सोने के समान हो!”
और जो आध्यात्मिक ज्ञान है, तत्त्वज्ञान है, उसका उद्देश्य वास्तव में यह है कि हर एक व्यक्ति दिव्य है, हर एक व्यक्ति भगवान् का अंश है—यह बताना।
श्रीमद्भागवतम् के तीसरे स्कंध में बताया है कि सबसे बड़ा हितैषी, सबसे बड़ा दूसरों की सेवा करने वाला व्यक्ति कौन है? बताते हैं, बहुत अच्छी तरह से बताया है कि ऐसे नहीं बताया कि जो हमेशा भगवान् का गुणगान करता है… ‘अभय’ का आश्वासन देना!
अभय के आश्वासन का मतलब क्या है? कि जब हम समझते हैं कि “नहीं, हम मरणशील शरीर नहीं हैं, हम यह देहाती भाव से परे आत्मा हैं, और आत्मा जो अविनाशी है, कोई भी शस्त्र उसको विनाश नहीं कर सकता।” दूसरे अध्याय के २३वें श्लोक में भगवान् बताते हैं। तो इसका भाव यह है कि जब हम समझते हैं कि हम वास्तव में दिव्य हैं, अविनाशी हैं, आध्यात्मिक हैं, तो इससे अभय प्राप्त होता है।
और यहाँ तत्त्वज्ञान प्रदान करना, यह सबसे बड़ा हितचिंतन है, सबसे कल्याण का कार्य है।
कभी-कभी लोग ‘गीता-सार’ कभी-कभी कोई दुकानों में होता है, और उसमें वे लिखते हैं—”जो हुआ, वह अच्छा हुआ; जो हो रहा है, वह अच्छा हो रहा है; जो होने वाला है, वह भी अच्छा ही होगा।” तो अभी मैंने तो दर्जनों बार भगवद्गीता पढ़ी है, कहीं भी ऐसा श्लोक नहीं मिला! कहाँ से आया ऐसा श्लोक पता नहीं है।
और पूरे भगवद्गीता का उद्देश्य हमें एक तरह से हम कह सकते हैं कि निष्कर्ष हम निकाल सकते हैं—मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम्, सुहृदं सर्वभूतानाम्—जैसे भगवान् सब चीज़ों के नियंत्रण में हैं, और जो भगवान् कर रहे हैं वह अच्छा है, तो वह निष्कर्ष निकाल सकते हैं। पर यह गीता का सार नहीं है! गीता का सार “क्या हो रहा है” उसके बारे में नहीं है, “हमें क्या करना है” उसके बारे में है!
तो जो हो रहा है वह ज़रूर अच्छा हो रहा है, पर क्या हम जो कर रहे हैं वह अच्छा कर रहे हैं? हम भक्त दुर्लभ हैं, फिर भी हम भक्तों को सम्मान नहीं दे पाते हैं…
वास्तव में जो कोई प्रकार की प्रवृत्ति है, उसका अनुशीलन करना होता है। जो आदत है किसी आध्यात्मिक तत्त्व को मन में रखने की, उसका बार-बार हम श्रवण करते हैं, उसका मनन करने का प्रयास करते हैं, तो उससे उसका अनुशीलन होता है। तो अगर भूल भी गए हैं, तो कोई बात नहीं है, जब स्मरण आ जाता है, तो पुनः हम उसको कार्य रूप में ला सकते हैं, उसको पुनः हम अपने जीवन में अमल करा सकते हैं।
एक उदाहरण दिया जाता है कि अगर कोई हवाई जहाज़ बैंगलोर से बॉम्बे जा रहा है, तो ९०% समय वह हवाई जहाज़ जो होता है, वह रास्ते से थोड़ा भटका हुआ होता है! क्यों? क्या होता है जब वह आसमान से जा रहा है, तो हवा का प्रवाह होता है, कोई बादल होते हैं, कोई वातावरण की परिस्थिति होती है। तो वह हवाई जहाज़ कभी भी बिल्कुल सीधे रास्ते पर जा नहीं पाता है। तो फिर भी वह कैसे पहुँच जाता है बॉम्बे? क्योंकि वह जब समझ जाता है कि “अभी थोड़ा गलत रास्ते में जा रहा है”, तो पुनः सही रास्ते पर आ जाता है!
जब हम गाड़ी चला रहे होते हैं, तो गाड़ी के स्टीरिंग व्हील को पकड़ के रखते हैं। क्यों? क्योंकि पकड़ेंगे नहीं तो अपने आप गलत दिशा में चली जाएगी। तो थोड़ा-सा वापस लाना पड़ता है, वापस लाना पड़ता है।
तो उसी तरह से क्या होता है, हमारे मन की पूर्व प्रवृत्तियों के कारण हम गलत दिशा में चले जाएँगे, तो इससे हताश नहीं होना है। यह अपेक्षित ही है! पर अपेक्षित है, पर इसका मतलब यह नहीं है कि यह अनिवार्य है। वह होगा, पर उसको हम ठीक कर सकते हैं। यह इतना गुमराह हो कि उल्टा जाने लग गए, फिर भी हम पूरा मुड़ के वापस आगे जा सकते हैं।
तो इसलिए यह मन की प्रवृत्ति है, उसको कोई जादू से अपने आप परिवर्तित नहीं होने वाली है। उसको हम अपेक्षित होना चाहिए कि वह गुमराह करेगी मुझे, पर जैसे ही मुझे स्मरण हो जाएगा, तो पुनः मैं सही रास्ते में आ जाऊँगा। और जितना हम ऐसा करेंगे, तो धीरे-धीरे वह सही रास्ते में हम रहेंगे, और वह गुमराह करने की प्रवृत्ति भी कम हो जाएगी।
बहुत-बहुत धन्यवाद!
ग्रंथराज श्रीमद्भागवत की जय! श्रील प्रभुपाद की जय! गौर-भक्तवृंद की जय!
गौर-प्रेमानंदे हरि-हरि बोल!
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