Eradicate Sanatana-Dharma – Hindi
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Lecture Summary
सनातन धर्म एवं विवादित बयानों की पृष्ठभूमि:
- तमिलनाडु के मंत्री (उधयनिधि स्टालिन) द्वारा सनातन धर्म की तुलना मलेरिया और कोविड से करते हुए इसे पूर्णतः समाप्त करने का बयान दिया गया। इसका कारण समाज में व्याप्त जातिवाद, अस्पृश्यता (अछूतपन) और भेदभाव को बताया गया।
अस्पृश्यता और जाति व्यवस्था का शास्त्रीय विश्लेषण:
- शास्त्र बनाम इतिहास: अस्पृश्यता एक ऐतिहासिक व सामाजिक कुरीति (Historical Distortion) रही है, लेकिन इसका श्रीमद्भागवत, भगवद्गीता, वेदों या रामायण-महाभारत में कोई प्रमाण नहीं है (No scriptural reference)।
- वर्ण व्यवस्था बनाम ‘कास्ट सिस्टम’: भगवद्गीता (४.१३) के अनुसार वर्ण व्यवस्था गुण और कर्म आधारित है, न कि जन्म-आधारित। समय के साथ सांस्कृतिक रूढ़िवादिता और औपनिवेशिक काल (ब्रिटिश शासन) में इसे जन्म-आधारित एवं प्रशासनिक रूप से कठोर (Formalize) बनाकर भेदभाव में बदला गया।
सनातन धर्म के भीतर सुधार (Internal Reform):
- इतिहास गवाह है कि सनातन धर्म के भीतर से ही भक्ति आंदोलन के संतों (जैसे संत रविदास, संत चोखामेला, गोरा कुम्हार, श्री हरिदास ठाकुर) ने जन्म-आधारित भेदभाव का विरोध किया और सभी को समान आध्यात्मिक दर्जा दिया।
ब्रिटिश शासन और राजनीतिक स्वार्थ का प्रभाव:
- अंग्रेजों ने भारत की आत्मनिर्भर सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था (Socio-economic arrangement) को ब्रिटेन के आर्थिक लाभ के लिए छिन्न-भिन्न किया, जिससे विभाजन और भेदभाव अधिक मुखर हुआ।
- वर्तमान समय में समाज में व्यावहारिक भेदभाव घट रहा है, परंतु नेता अपने वोट-बैंक (Vote-bank politics) को जीवित रखने के लिए इन मुद्दों को बार-बार उछालते हैं।
- वास्तविक समाधान:
- भेदभाव का समाधान सनातन धर्म को मिटाने से नहीं, बल्कि सनातन धर्म के वास्तविक आध्यात्मिक ज्ञान (भगवद्गीता ५.१८ — समदर्शिनः) को पुनर्स्थापित करने से होगा, जो हर जीव को भगवान का सनातन अंश और आत्मा स्वीकार करता है।
Full Transcription
इशचर गौरांग प्रभु:
हरे कृष्णा चेतन्याचरण प्रभु जी! आपको देखकर बहुत खुशी हो रही है। बहुत आनंद आता है आपको हमेशा देखकर, और मैं आशा करता हूँ आप स्वस्थ होंगे प्रभु, खुश होंगे और अपनी सेवा में लगे हुए होंगे हमेशा की तरह।
चेतन्याचरण प्रभु:
हरे कृष्णा इशचर गौरांग प्रभु! हरे कृष्णा! थैंक यू सो मच प्रभु!
इशचर गौरांग प्रभु:
प्रभु, आज हम बात करना चाहते हैं—जैसे मैंने आपसे फोन पर बात की थी—तमिलनाडु के एक मंत्री के लड़के ने (उधयनिधि स्टालिन) स्टेटमेंट दी है कि “सनातन धर्म जो है, वह एक मलेरिया की तरह है, कोविड की तरह है, तो इसको रोकना नहीं है, इसको जड़ से समाप्त कर देना है, पूरी तरीके से खत्म कर देना है।”
अब यह एक विवादास्पद बयान है। इनकी बात सुनकर मुझे वह राजकुमार का एक डायलॉग याद आ गया—”अब सनातन धर्म तो विचार क्या है मिटाएंगे? इनके जैसे लाखों आए, लाखों चले गए। जिन्होंने सनातन धर्म को मिटाने की कोशिश की, इतिहास गवाह है कि वे समय के साथ खुद मिटते चले गए।”
लेकिन बात है कि ये ऐसा चाहते क्यों हैं? क्यों चाहते हैं कि सनातन धर्म मिट जाए? इनका कहना है कि सनातन धर्म की वजह से समाज में भेदभाव होता है, अनटचेबिलिटी (Untouchability) है, अछूतपन है, जातिवाद है—ये सारी समस्याएँ सनातन धर्म की वजह से हैं।
भागवतम है, पुराण हैं, वेद हैं—क्या उसमें से यह जातिवाद आ रहा है? और नहीं, तो फिर यह समाज में धीरे-धीरे कैसे ऐड (add) हो गया? ये कुरीतियाँ कहाँ से आ गईं? और जैसे कि ये लोग बोल रहे हैं, अगर सनातन धर्म को—वैसे तो संभव नहीं है, लेकिन चलो एक बार को मान भी लिया जाए कि सनातन धर्म को हटा दो—तो क्या ये प्रॉब्लम सॉल्व (solve) हो जाएँगे सनातन धर्म को हटाने से?
और आखिरी बात यह है कि ऐसे लोग जो जान-बूझकर इन मुद्दों को खत्म नहीं होने दे रहे हैं… लोगों के बीच में भेदभाव खत्म होता जा रहा है, बहुत तेज़ी से गिर रहा है, लेकिन जो ये मंत्री लोग हैं, संतरी लोग हैं, ये अपने वोट-बैंक के चक्कर में आज भी इन मुद्दों को जीवित रखते हैं। बार-बार लोगों के दिमाग में इसके ऊपर डालते हैं, क्योंकि इनकी वोट-बैंक पॉलिटिक्स इसी से चलती है। तो इससे लोगों का क्या करा जाए? क्या सॉल्यूशन (solution) है? हम एक आम आदमी इस बारे में क्या कर सकता है?
इन सारे सवालों को लेकर मैं फिर से एक बार अपने सब के प्रिय चेतन्याचरण प्रभु जी के पास गया हूँ। जो नहीं जानते हैं, बाय चांस, चेतन्याचरण प्रभु जी जो हैं, बहुत वरिष्ठ भक्त हैं, भगवद्गीता के ऊपर हज़ार आर्टिकल (articles) लिखे हैं, कई किताबें वे लिख चुके हैं, और शास्त्रों को ठीक से कैसे समझा जाए, उनकी बहुत गहरी इसमें अंडरस्टैंडिंग (understanding) है। और समाज को, जो भी हमारे सोशल इश्यूज (social issues) होते हैं, उनको शास्त्रों की नज़र से कैसे देखा जाए, इसमें उनका बहुत अच्छा पर्सपेक्टिव (perspective) रहता है।
तो ये सारे प्रश्न—कि हमारे शास्त्र जातिवाद के विषय में क्या बोलते हैं, और जो जातिवाद हमने देखा है, वह क्या है, इसमें अंतर क्या है, और सनातन धर्म का इसमें क्या योगदान हो सकता है, इन मुद्दों को हम कैसे देख सकते हैं और कैसे सही कर सकते हैं—इन सारे प्रश्नों को लेकर मैं चेतन्याचरण प्रभु जी के पास गया हूँ। अगर आप इन मुद्दों को ठीक से, गहराई से, बहुत अच्छे से समझना चाहते हैं, तो यह पॉडकास्ट आपके लिए बहुत हेल्पफुल (helpful) हो सकता है। तो चलिए शुरू करते हैं!
भगवद्गीता का जो हमारा फेवरेट वर्स (favorite verse) है, चौथे अध्याय का १३वाँ श्लोक (4.13), जिसमें कृष्ण क्लियरली (clearly) बोलते हैं:
चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः ।
गुण और कर्म से विभाजन है। अठारहवें अध्याय में फिर से भगवान् बता रहे हैं कि क्या-क्या गुण होने चाहिए। और सारे धर्मगुरु बार-बार एक ही बात बोलते हैं, सभी लोग एक ही बात बोलते हैं कि कहीं पर भेदभाव नहीं है, कास्ट सिस्टम (caste system) नहीं है, हमारे यहाँ वर्ण व्यवस्था है। पूरा सनातन धर्म वर्ण व्यवस्था के ऊपर है।
उसके बावजूद केवल मिनिस्टर्स (ministers) हैं जो यह बयान दे रहे हैं। तो ऐसा क्यों है? इनको बात समझ में आ नहीं रही है, या ये समझना चाहते नहीं हैं? ये अपने स्वार्थ के चक्कर में इतने ज्यादा फँसे हुए हैं कि वे इस बात पर विचार ही नहीं कर रहे कि समाज में कितना बड़ा एक दुष्परिणाम इसका हो सकता है, उनकी इस सोच से! आपको क्या लगता है प्रभु जी, वे क्यों इस तरह का विचार रखते हैं?
सनातन धर्म और अस्पृश्यता: चार अलग-अलग संदर्भ
चेतन्याचरण प्रभु:
आपने जो बताया, उसके बारे में मैं विचार कर रहा था। तो मैं तीन-चार चीज़ें देखना चाहता हूँ। जब ‘सनातन धर्म’ इस शब्द का इस्तेमाल हो रहा है, तो कई बार एक भाषा में यह समस्या आती है कि हम एक शब्द का उल्लेख कर रहे हैं, तो किस चीज़ का उल्लेख कर रहे हैं?
यहाँ ‘सनातन धर्म’ का उल्लेख चार अलग-अलग संदर्भों में किया जा सकता है:
- अस्पृश्यता (Untouchability) के साथ: अछूतपन या अछूतता का भाव।
- जाति पद्धति (Caste System) के साथ: जो जाति व्यवस्था है।
- हिंदू धर्म (Hinduism) के साथ: जो ऐतिहासिक रूप से प्रचलित रहा है।
- आध्यात्मिक ज्ञान (Spiritual Knowledge / Self-knowledge) के साथ: जो नित्य आत्मज्ञान है।
तो अभी सनातन धर्म का जब उल्लेख हो रहा है, तो किस चीज़ से उल्लेख किया जा रहा है?
अभी जब हम साधारणतया कृष्णभावनामृत में, प्रभुपाद जी ने बताया है कि ‘सनातन धर्म’ का मतलब क्या है—कि वह एक आध्यात्मिक ज्ञान है जो भगवान् भगवद्गीता में बताते हैं। यह प्रभुपाद जी की शिक्षा है, यह भगवद्गीता की शिक्षा है कि हम आध्यात्मिक ज्ञान जो है, सर्वजगत् और सब लोगों के लिए है। तो यह उल्लेख किया जा रहा है।
पर कुछ लोग सनातन धर्म का उल्लेख करते हैं, तो वे कहते हैं कि “यह अनटचेबिलिटी (untouchability) है, अछूतता का भाव है, यही सनातन धर्म है।” और वे कहते हैं कि इसका हमको पूरा विनाश कर देना चाहिए, इसको बिल्कुल रखना ही नहीं चाहिए।
तो अभी यह सवाल होता है कि जब कोई सनातन धर्म के बारे में बात कर रहा है—Who is speaking the right thing? (कौन सही बात कह रहा है?)
तो दो चीज़ें हैं इसमें:
- Who has the right to speak? (किसके पास बोलने का अधिकार है?)
- Who is speaking right? (कौन सही बोल रहा है?)
किसके पास अधिकार है यह बोलने के लिए? कोई बोल रहा है, बहुत कुछ लोग बोल सकते हैं कि “मेरे पास अधिकार है”, कोई कहता है “मुझे अधिकार नहीं है।” ठीक है, तो Who is speaking right? अलग-अलग लोग बोल सकते हैं, तो कौन सही बोल रहा है?
अभी कोई कहेगा कि “मैंने भेदभाव का अनुभव किया है, मैं अछूतता के कारण मुझे बहुत पीड़ा हुई है, तो इसलिए मुझे अधिकार है इसके बारे में बोलने का।” तो अभी जो दलित समाज है, जो अछूतता से प्रभावित हुए हैं—मान लीजिए इनमें से प्रधान जो हैं, वे अंबेडकर जी हैं। महाराष्ट्र से ही हूँ, महाराष्ट्र में उनका बहुत प्रभाव है। तो उन्होंने इसके बारे में कहा है।
तो जिसका हम कह सकते हैं—Anyone affected (कोई भी जो इससे प्रभावित हुआ है), उनको इसके बारे में कहने का अधिकार है। हम यह नहीं कह सकते हैं कि तुम्हें इसके बारे में बोलना ही नहीं चाहिए।
पर ठीक है, अगर आप बोल रहे हैं, तो Who is speaking right? आपके अनुभव के अनुसार आप बोल रहे हैं, पर कोई भी यह तो नहीं कह सकता है कि मेरा अनुभव जो है वही परम सत्य है, वही संपूर्ण सत्य है!
अन्य धर्मों से तुलनात्मक उदाहरण
मान लीजिए अगर हम किसी और धर्म का उदाहरण लेते हैं। अभी हम इस्लाम के बारे में बात करते हैं। तो इस्लाम भी बहुत बड़ी चीज़ है, उसमें अलग-अलग प्रकार के लोग हैं। उसमें से एक छोटा-सा भाग है—वह है एक्सट्रीमिज्म (Extremism)। वह क्या है? उसमें आतंकवाद आता है, उसमें जिहाद आता है। तो अभी अगर किसी को उसका अनुभव हुआ है, तो वह शायद इस्लाम के बारे में बुरा कहेंगे। पर क्या इस्लाम वही है? आजकल के समाज में, आजकल के जगत् में Every fourth person is Muslim (हर चौथा व्यक्ति मुस्लिम है), तो क्या सारे मुस्लिम आतंकवादी होते हैं? अगर ऐसे होते, तो सारा विश्व बहुत बड़े खतरे में होता!
हम क्रिश्चियनिटी (Christianity / ईसाई धर्म) के बारे में बात कर सकते हैं, किसी भी चीज़ के बारे में बात कर सकते हैं। अभी क्रिश्चियंस जो थे, क्रिश्चियनिटी में कई लोग ऐसे थे काफी समय तक, जो गुलामी (Slavery) को जस्टिफाई (justify) करते थे। तो अभी कोई कहेगा क्या कि क्रिश्चियनिटी में स्लेवरी थी, इसलिए हम क्रिश्चियनिटी को ही पूरा… हमको उसका विनाश कर देना चाहिए, उसको इराडिकेट (eradicate) कर देना चाहिए?
तो अगर कोई ऐसे कहेगा इस्लाम के बारे में, कोई कहेगा कि हमें पूरा इस्लाम को इराडिकेट कर देना चाहिए, तो उसका प्रतिकार होगा, बहुत भीषण होगा!
इसलिए अभी क्या है कि जब ऐसा कोई कह रहा है, तो वह उस धर्म की बहुत ही छोटी-सी चीज़ को ले रहा है और उसके आधार पर कुछ कह रहा है। और फिर हम कह सकते हैं कि क्रिश्चियनिटी में कुछ श्लोक/आयते आती हैं बाइबल में, जैसे Slaves should obey their masters (गुलामों को अपने मालिकों की आज्ञा माननी चाहिए)। इस्लाम में कुछ ऐसे विधान आते हैं कि जो भी काफिर हैं, उनको मार देना चाहिए। जो लोग ऐसा कोट (quote) कर रहे हैं, क्या वे सही में जो क्रिश्चियनिटी का एसेंस (essence) है या इस्लाम का एसेंस है, उसके बारे में बता रहे हैं या कुछ एक फ्रिंज (fringe) बता रहे हैं? यह समझने के लिए हमें वह पूरी जो सिस्टम (system) है, उसको देखना चाहिए। केवल उसकी एक चीज़ को देखना उचित नहीं है।
अस्पृश्यता का वास्तविक स्रोत: शास्त्र बनाम इतिहास
तो अभी अगर हम… हम जो सनातन धर्म देखते हैं, उसमें अनटचेबिलिटी (untouchability / अस्पृश्यता) जो आती है—तो अनटचेबिलिटी यह ज़रूर एक हिस्टोरिकल रियलिटी (Historical reality / ऐतिहासिक सत्य) है। यह ऐतिहासिक दृष्टि से सत्य है, और This is definitely a regrettable reality—यह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण, यह बहुत ही बुरा सत्य है भारतीय समाज का।
पर यह आया कहाँ से है? इसका सोर्स (Source / स्रोत) क्या है?
अगर हम देखते हैं, तो अनटचेबिलिटी खास करके हिंदू धर्म के बारे में सबसे घृणास्पद जो चीज़ है, यह बताई जाती है। हम जाति पद्धति के बारे में धीरे-धीरे आगे बढ़ेंगे, पर यह जो है, इसका सोर्स क्या है?
- इसको गीता में कहीं नहीं बताया गया है।
- इसको भागवतम में कहीं नहीं बताया गया है।
- इसको रामायण, महाभारत में कहीं नहीं बताया गया है।
तो इसको अगर वेदों में जाते हैं, तो ऋग्वेद में या किसी वेदों में इसका उल्लेख नहीं है। इसका वेदों में उल्लेख नहीं है! तो कहीं भी हमारे जो शास्त्र हैं, उनके प्रधान किसी शास्त्र में इसका उल्लेख नहीं है।
कुछ लोग कहते हैं कि यह ‘धर्मशास्त्रों’ में आता है। पर धर्मशास्त्रों में जो भी आता है, वह बिल्कुल स्पष्ट नहीं है। जैसे चांडाल, म्लेच्छ—ऐसा उल्लेख आता है, यह भागवतम में भी आता है। पर ऐसे लोगों को अछूत मानना—यह जो है, इसका कहीं भी उल्लेख नहीं आता है। धर्मशास्त्रों में भी कहीं ऐसा क्लियर (clear) नहीं है—No reference, no clear reference.
तो यह कहाँ से आया है? यह जिसको भी हम हिंदूइज़्म या सनातन धर्म कहते हैं, उसके मूल शास्त्रों में यह कहीं भी नहीं है!
तो इसको हिंदूइज़्म से जोड़ना, और यहाँ तक कि इसको सनातन धर्म से इक्वेट (equate) करना—यह एब्सोल्यूटली रॉन्ग (absolutely wrong) है!
क्योंकि यह भले ही ऐतिहासिक सत्य हो, लेकिन Historical is not scriptural (जो ऐतिहासिक है, जरूरी नहीं कि वह शास्त्रीय हो)! क्योंकि सब कुछ इतिहास में जो हुआ है… Historical is not scriptural, and scriptural is religious and spiritual. तो जो भी भारत में हुआ है, हम यह नहीं कहते कि वह सब सनातन धर्म ही था।
और इसका क्या सबूत है कि हम कह सकते हैं कि यह सनातन धर्म नहीं है? तो इसको हम तीन दृष्टि से देख सकते हैं:
- नो स्क्रिप्चरल रेफरेंस (No Scriptural Reference): शास्त्रों में ही बताया गया है… अभी कुछ कह रहे हैं कि “अंहा! अनटचेबिलिटी बहुत बुरी चीज़ है!” हाँ, हम भी स्वीकार करते हैं। जैसा आपने ही शुरुआत में बताया, कोई भी धर्मगुरु है आजकल के समाज में, कोई भी अनटचेबिलिटी को प्रोपेगेट (propagate) नहीं कर रहा है, अछूतता को प्रस्थापित करके उसको विस्तारित करने का बिल्कुल प्रयास नहीं कर रहा है। तो इसलिए इसको इक्वेट करना कि “अछूतता ही सनातन धर्म है, और इसलिए हमको सनातन धर्म को इराडिकेट (eradicate) कर देना चाहिए”—यह क्या है? This is a horrendous misrepresentation! यह न केवल एक गलत समझ है, पर यह एक बहुत ही भयानक गलत समझ है!
सनातन धर्म के भीतर सुधार की परंपरा (Internal Reform)
इशचर गौरांग प्रभु:
नहीं प्रभु, मैं अभी तक आपकी बात समझ रहा हूँ कि हिस्ट्री (History) में जो भी चीज़ें चल रही हैं, उसको सनातन धर्म की तरह रिप्रेजेंट (represent) करना, और उससे भी ज़्यादा, जो आप बता रहे हैं—उसको मान लेना कि यही सनातन धर्म है, सनातन धर्म का मूल उद्देश्य ही अनटचेबिलिटी है, तो उसका तो कोई सेंस (sense) ही नहीं बन रहा है!
चेतन्याचरण प्रभु:
एग्जैक्टली (Exactly)! अभी हम यह कह रहे हैं कि यह सनातन धर्म नहीं है। कैसे हम कह सकते हैं कि यह सनातन धर्म और अनटचेबिलिटी एक नहीं हैं?
पहला कारण: No scriptural reference (कोई शास्त्रीय प्रमाण नहीं होना)—यह पहली चीज़ हमने ऑलरेडी बता दी।
पर अभी कई और कारण देख सकते हैं:
- मच इंटरनल रिफॉर्म (Much Internal Reform): इंटरनल रिफॉर्म मतलब वैदिक संस्कृति, वैदिक शास्त्रों से ही जो लोग प्रेरित हुए हैं, उन्होंने ही इसके बारे में, इसके विरुद्ध में कहा है।
तो अगर हम देखते हैं, कई भक्ति में संत हुए हैं। और जो भक्ति के संत थे, वे अनेक लोअर कास्ट (lower caste / निचली जातियों) से थे। महाराष्ट्र में संत चोखामेला थे, गोरा कुम्हार थे (पॉटर थे)। ऐसे बहुत से संत हुए हैं जो कुम्हार थे, बहुत से ऐसे हैं जो कोबलर (cobbler) थे, चमार थे।
तो अभी हम देखते हैं, गौड़ीय वैष्णव पद्धति में भी हरिदास ठाकुर थे। वह जो थे, उनको सनातन समाज में म्लेच्छ कहा जाता था, क्योंकि वे सनातन धर्म के बाहर के एक परिवार में जन्मे थे। तो Not only were they accepted, but they were respected! (न केवल उनको स्वीकार किया गया, बल्कि उनको अत्यधिक आदर दिया गया!)
तो अगर कोई कहता है कि “यही सनातन धर्म है”, तो सनातन धर्म में जो महान हस्तियाँ मानी जाती हैं, उनमें भी ऐसे लोग हैं जो नीची कास्ट (जाति) के थे, और वहाँ ऐसा बहुत इंटरनल रिफॉर्म (आंतरिक सुधार) हुआ है। और ऐसे नहीं कि इंटरनल रिफॉर्म कुछ ही लोगों ने किया है, अनेक वैष्णवों ने किया है, संतों ने किया है।
इशचर गौरांग प्रभु:
प्रभु, रिफॉर्म (reform) का मतलब यहाँ पर क्या बोलना चाह रहे हैं? किस… मतलब क्या रिफॉर्म हुआ है?
चेतन्याचरण प्रभु:
रिफॉर्म मतलब यहाँ—Correct historical reality! (ऐतिहासिक विकृति को सुधारना!) जो हिस्टोरिकल रियलिटी थी कि अनटचेबिलिटी आ गई थी, जो कि गलत चीज़ थी, तो उसी धर्म में उसके खिलाफ प्रतिकार किया गया है।
जैसे मैंने बोला था कि स्लेवरी (दास प्रथा) थी क्रिश्चियनिटी में। तो जब अमेरिका में सिविल वॉर (Civil War) हुआ था, तो कुछ क्रिश्चियंस कह रहे थे कि बाइबल के अनुसार स्लेवरी रखनी चाहिए, और कुछ क्रिश्चियंस कह रहे थे कि नहीं रखनी चाहिए। तो क्या किसी ने कहा कि क्रिश्चियनिटी में स्लेवरी थी, इसलिए क्रिश्चियनिटी को ही आप निकाल दो? तो यह कहना बहुत गलत है एक तरह से!
- हाइजीन और सोशल डिस्टेंसिंग की थ्योरी (Hygiene Theory): फिर दूसरा हम देख सकते हैं कि यह अनटचेबिलिटी कहाँ से आई है?
तो इसको अभी मैं… I am not justifying it, I am not at all justifying it, I am only explaining it! (मैं इसका बिल्कुल समर्थन या बचाव नहीं कर रहा हूँ, मैं केवल इसका कारण समझा रहा हूँ।)
यह कहाँ से आ सकती है? इसके बहुत से थ्योरीज़ (theories) हैं। भारत का इतिहास है, भारत बहुत बड़ा विशाल देश था, और सब पर किसी एक का नियंत्रण नहीं था, अलग-अलग पद्धतियाँ थीं।
तो कई बार यह अनटचेबिलिटी जो आई थी, वह एक तरह से हाइजीन (hygiene / स्वच्छता) से आई हो सकती है। मैं यह नहीं कह रहा हूँ… जो लोग मल-मूत्र, मांस ऐसी चीज़ों से संपर्क में रहते हैं, तो उसमें जर्म्स (germs) आ सकते हैं। अभी जो लोग ऐसा काम हमेशा करते हैं, तो उनको कुछ हद तक उसमें इम्युनिटी (immunity) आ जाती है। पर बाकी लोग उससे संपर्क में नहीं हैं उतना, तो उनको उतनी इम्युनिटी नहीं आती है।
तो शायद हम जो टर्म्स यूज़ (use) करते हैं—जर्म्स या इम्युनिटी—उस समय लोग वे टर्म्स यूज़ नहीं करते होंगे, पर एक तरह से थोड़ी-थोड़ी समझ होती है।
तो अभी जैसे कोविड के समय जो सोशल डिस्टेंसिंग (Social distancing) हमने रखी थी कि कोई एक-दूसरे के पास नहीं आना चाहिए, तो वह एक तरह की अनटचेबिलिटी के संपर्क जैसी ही थोड़ी-थोड़ी थी।
तो अभी यह जो है, मैं स्पष्ट बोल रहा हूँ कि I am not justifying it! यह सही है, ऐसा नहीं बोल रहा हूँ मैं। मैं यह बोल रहा हूँ कि यह कहाँ से आया हो सकता है। इसके लिए अलग-अलग थ्योरीज़ बताई गई हैं, और हाइजीन की एक थ्योरी हो सकती है। सही होगी या नहीं होगी पता नहीं, पर यह शास्त्रों से आया हुआ एक डिस्क्रिमिनेशन (discrimination / भेदभाव) नहीं है!
शास्त्रों में ऐसी पद्धति नहीं बताई गई है कि किसी को आप अछूत बोलकर उनको मानवीय स्तर का आदर भी न दो, उससे भी नीचे कुछ कर दो—ऐसा भाव नहीं है!
तो अभी कुछ लोग कहते हैं, ऐसे अलग-अलग कारण कोई ढूँढ सकता है, और उसके लिए हिस्टोरिकल रिसर्च (historical research) चाहिए। जो भी जिसको करना है, रिसर्च कर सकते हैं, but we are not justifying it!
पर अभी इसके लिए एक जस्टिफिकेशन (justification) दिया जाता है कभी-कभी कि जो पुनर्जन्म (reincarnation) और कर्म है, इसके द्वारा बताया जाता है कि जो लोग ऐसा कार्य कर रहे हैं, उनको बताया जाता है कि “तुमने पूर्व जन्म में बुरे कर्म किए हैं, तुम्हारा ऐसे जातियों में जन्म हुआ है, और इसलिए तुमको अभी ऐसे ही रहना चाहिए।”
दर्शन (Philosophy) बनाम संस्कृति (Culture)
इशचर गौरांग प्रभु:
प्रभु, मेरी अंडरस्टैंडिंग (understanding) यह बनी है कि जो मेन प्रिंसिपल (main principle) है, जो भगवान् भगवद्गीता के 4.13 में बता रहे हैं, वह गुण और कर्म के आधार पर ही है। मतलब मेन प्रिंसिपल वह है।
लेकिन अगर क्षत्रिय पुरुष है, क्षत्रिय स्त्री है, जब वे आपस में साथ में रहते हैं, तो बहुत हाई प्रोबेबिलिटी (high probability) है कि उनका पुत्र भी क्षत्रिय गुणों वाला ही हो। जब वर्ण व्यवस्था का ठीक से इस्तेमाल होता था, तो वहाँ से जन्म भी इम्पॉर्टेंट (important) हो जाता है प्रैक्टिकल पर्पस (practical purpose) से कि अगर किसी ब्राह्मण का पुत्र है, तो मोस्ट लाइकली (most likely) वह भी ब्राह्मण ही होगा। तो इसलिए वहाँ से जन्म को भी जो धीरे-धीरे इम्पॉर्टेंस देनी शुरू हो गई?
चेतन्याचरण प्रभु:
एग्जैक्टली! परफेक्ट (Exactly! Perfect)!
अभी कैसे है कि एक है—जैसे विज्ञान में होता है—एक है साइंस (Science) और दूसरी है टेक्नोलॉजी (Technology)।
अभी हम ज़ूम (Zoom) टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल कर रहे हैं, इंटरनेट का इस्तेमाल कर रहे हैं। तो अभी इंटरनेट कैसे काम करता है, यह बहुत कम लोगों को वास्तव में पता है, पर इंटरनेट का यूज़ (use) बहुत सारे लोग करते हैं।
तो उसी तरह से क्या है:
- एक है फिलोसोफी (Philosophy / तत्त्वज्ञान)
- दूसरी है कल्चर (Culture / संस्कृति)
तो तत्त्वज्ञान क्या है, वह बहुत से लोगों को पता नहीं होता है, पर वे संस्कृति का अनुशीलन कर रहे हैं।
अब मान लीजिए कोई फोन यूज़ करता है। अब उसको बोलते हैं कि “ठीक है, आप जो फोन है, पानी में यूज़ मत कीजिए, उससे कुछ शौक लग सकता है, कुछ बीमारी/हानि हो सकती है।” पर लोग उस पर ध्यान नहीं देते। एक बार यूज़ किया, दूसरी बार यूज़ किया, कुछ फर्क नहीं पड़ा। कई बार यूज़ करने के बाद एक बार ऐसा हो सकता है कि पानी के कारण उसका विस्फोट हो जाता है!
तो अभी यह क्यों हुआ है? ऐसे नहीं है कि वह फोन खराब है! वह फोन कैसे इस्तेमाल करना है, उसका ज्ञान जो है, वह कम प्रचलित है।
तो वैसे ही क्या है—तत्त्वज्ञान एक है, पर जब वह तत्त्वज्ञान संस्कृति में चला जाता है, तो कल्चर में कई बार कुछ चीज़ें आती हैं जो फिलोसोफी से आती हैं, पर कई चीज़ें जो होती हैं, वे सुपरस्टिशन (superstition / अंधविश्वास) से भी आती हैं, कई चीज़ें केवल एक तरह से ट्रेडीशन (tradition / परंपरा) से आती हैं। पर वह ट्रेडीशन स्क्रिप्चर (scripture / शास्त्र) से नहीं आ रहा है!
इसलिए अगर भगवान् गोवर्धन-लीला में पूछते हैं नंद महाराज को कि “आप जो इंद्र की पूजा कर रहे हैं, यह शास्त्रों के अनुसार है या रीति-रिवाज के अनुसार?” मतलब Scriptural is not necessarily equal to traditional! (जो पारंपरिक है, ज़रूरी नहीं कि वह शास्त्रीय भी हो!)
तो यह थोड़ा सूक्ष्म पॉइंट है, पर यह महत्वपूर्ण पॉइंट है कि भले भारत में जाति पद्धति हो और जाति पद्धति को जन्म से बताया गया हो, यह स्क्रिप्चर (शास्त्रों) से क्या आया है? वर्ण व्यवस्था (वर्णश्रम) आई है! और जो रीति-रिवाज हैं, उससे कास्ट सिस्टम (जाति व्यवस्था) आई है। और जो कास्ट सिस्टम है, इसका शास्त्रों के आधार पर अनेक आचार्यों ने इसका खंडन भी किया है!
तो इसलिए कोई कहेगा कि कर्म और पुनर्जन्म के तत्त्वज्ञान के अनुसार इस कास्ट सिस्टम को बताया गया है—ठीक है, वह एक कारण हो सकता है, पर वह एकमात्र कारण (sole cause) नहीं है।
और इसलिए शास्त्रों में भी अनेक अपवाद हैं, ऐसे अनेक उदाहरण हैं। जैसे भागवत में उदाहरण आता है कि राजा भरत के अनेक पुत्र होते हैं, और कुछ पुत्र ब्राह्मण बनते हैं, कुछ पुत्र वैश्य बन जाते हैं। तो यह कोई डिनाई (deny) नहीं कर रहा है, पर यह शास्त्रों से ही आया है, यह भी बिल्कुल सही नहीं है। तो कर्म और रीइन्कार्नेशन से ही डिस्क्रिमिनेशन होगा, यह ज़रूरी नहीं है।
राजनीतिक स्वार्थ और मार्क्सवादी विचारधारा
अभी जो लोग इसके बारे में बात करते हैं, वे काफी लोग बहुत लेफ्ट-विंग (Left-wing) के लोग होते हैं। लेफ्ट-विंग मतलब कम्युनिज्म (Communism), सोशलिज्म (Socialism)—यह सब होता है उसमें।
तो अभी अगर हम देखते हैं कि एप्लीकेशन (application) जो हुआ है… जब अप्लाई करते हैं, तो कई बार मिस-अप्लिकेशन (mis-application) होता है उसका।
अगर हम कम्युनिज्म का उदाहरण देखते हैं, तो सोवियत रूस और चीन—इन दोनों में कम्युनिज्म को अप्लाई किया गया था, और लगभग ७० सालों तक चला यह (१९१७ से लगभग १९८९ तक)। और इसका क्या परिणाम हुआ? इसका परिणाम यह हुआ कि बिना किसी युद्ध के Hundred million deaths! (दस करोड़ लोगों की मृत्यु हो गई!) सरकार ने, जो भी स्टेट के खिलाफ है, उसका वध कर दिया!
तो अभी जो लोग आज मार्क्सवादी (Marxist) हैं, कम्युनिस्ट (Communist) हैं, सोशलिस्ट (Socialist) हैं, और उनसे पूछते हैं कि “तुम्हारी आइडियोलॉजी (ideology / विचारधारा) से इतने सारे लोगों की मृत्यु हो गई”, तो वे कहेंगे तुरंत कि “स्टालिन और लेनिन जो थे, वे कम्युनिस्ट नहीं थे, उन्होंने कार्ल मार्क्स की शिक्षाओं को मिस-अप्लाई (mis-apply) किया है!” तब वे जस्टिफाई कर रहे हैं कि यह मिस-अप्लिकेशन है।
पर जब कास्ट सिस्टम की बात आती है, तब वे कहते हैं—”नहीं! यह मिस-अप्लिकेशन नहीं है, यही एक्चुअल टीचिंग (actual teaching / वास्तविक शिक्षा) है!”
तो This is a game that can be played both ways! (यह ऐसा खेल है जो दोनों तरफ से खेला जा सकता है!) तो यह ऐसी तलवार है जो दोनों तरफ से कट सकती है। अगर आप इसको इस्तेमाल करने वाले हो सनातन धर्म के खिलाफ, तो वह आपकी जो आइडियोलॉजी है, उसके खिलाफ भी इस्तेमाल हो सकता है!
अंग्रेजों द्वारा जाति व्यवस्था का औपचारीकरण (Formalization)
इशचर गौरांग प्रभु:
प्रभु, इन जनरल (in general) मेरी अंडरस्टैंडिंग बनी थी कि जो कास्ट सिस्टम है, इसको फॉर्मली (formally) जो है, वह ब्रिटिशर्स (Britishers / अंग्रेजों) ने इंडिया में इंट्रोड्यूस (introduce) किया। मतलब यह एक अनकही बात थी कास्ट सिस्टम पहले, लेकिन ब्रिटिशर्स ने प्रॉपर डॉक्यूमेंट (document) के साथ… मैंने एक बार डॉ. सुधांशु त्रिवेदी जी को सुना था, उन्होंने शायद ऐसा कुछ मेंशन (mention) किया था कि पहली बार ब्रिटिशर्स ने डॉक्यूमेंटेड की थी कि ३००० जातियां हैं भारत में अलग-अलग तरीके से—जैसे जो कुम्हार हैं इस-इस तरीके से।
तो क्या इसका मतलब यह है कि जो कास्ट सिस्टम है, वह कहीं न कहीं इंट्रोड्यूस हो गया था हमारे ट्रेडीशन में, कल्चर में समय के साथ, लेकिन ब्रिटिशर्स ने इसको बहुत फॉर्मलाइज़ करके, बहुत ज्यादा प्रोपेगेट (propagate) करके, मतलब इसको एक तरह से पूरा नाम दे दिया कास्ट सिस्टम का, और उसको भेदभाव की तरह सनातन धर्म के साथ जोड़ने का काम जो ब्रिटिशर्स ने किया है—ऐसा कुछ है क्या? या ऐसा नहीं है?
चेतन्याचरण प्रभु:
अभी कैसे है कि जब भारत में मुगलों का या इस्लामिक शासन था, तो There was no socio-economic disturbance (उन्होंने सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था को ज्यादा नष्ट नहीं किया)।
उन्होंने सांस्कृतिक स्तर पर, धार्मिक स्तर पर थोड़ा विध्वंस किया—मंदिरों को तोड़ा, इसको थोड़ा, उसको थोड़ा। पर समाज का जो ऑर्गेनाइजेशन (organization) था, उसमें उन्होंने कुछ ज्यादा इंटरफेयर (interfere) नहीं किया। यहाँ इस वर्ण के लोग काम कर रहे हैं, वहाँ उस वर्ण के लोग काम कर रहे हैं। उनका क्या था? “जहाँ तक हमको टैक्स (tax) मिल रहा है, ठीक है।”
क्योंकि जो मुग़ल या मुस्लिम शासक थे, वे भारत में ही बस गए थे। पर ब्रिटिश (अंग्रेज) कभी यहाँ बसे नहीं, वे नॉन-रेजिडेंट्स (non-residents) ही रहे।
ब्रिटेन सबसे पहले एक छोटा-सा देश है, उसकी पापुलेशन (population / जनसंख्या) भी बहुत छोटी-सी थी। और वहाँ से जब ब्रिटेन से लोग भारत में आते थे, तो उनको लगता था कि यह भारत तो बहुत ही गर्म देश है, इसमें इतनी सारी बीमारियाँ हैं, इतनी गर्मी है। तो वे जब भारत में आते थे, तो उनको लगता था कि भारत में जाना एक तरह से उनके लिए पनिशमेंट (punishment / सजा) है!
तो इसलिए क्या था कि इस्लामिक समय में भारत में जो भी पद्धति थी—जाति पद्धति हो या जो भी हो, जो वर्ण के अनुसार चल रही थी—क्या उसमें भेदभाव था? हो सकता है भेदभाव था, पर उससे किसी को ज्यादा प्रभाव नहीं हो रहा था। क्यों? क्योंकि जो अलग-अलग वर्ण के लोग थे, वे अलग-अलग एरियाज़ (areas) में अपना काम कर रहे थे। तो ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र—ये सब अपने-अपने एरियाज़ में काम कर रहे थे। तो इसका फंक्शनल एरिया (functional area) सबका अलग था।
पर जब ब्रिटिश लोग आ गए, तो उन्होंने क्या किया? Socio-economic disruption (सामाजिक-आर्थिक तबाही) कर दिया!
क्योंकि उनकी केवल यह इच्छा नहीं थी कि हमें भारत में राज्य करके भारत से सिर्फ टैक्स लेना है, उनको भारत की पूरी इकोनॉमिक सिस्टम (economic system / आर्थिक व्यवस्था) को बदलना था! उनका उद्देश्य क्या था? कि अगर यह ब्रिटेन है और यह भारत है, तो भारत से हम रॉ-मटेरियल (raw materials / कच्चा माल) वहाँ भेजेंगे, और फिर वहाँ से फिनिश्ड प्रोडक्ट्स (finished products / तैयार सामान) यहाँ पर लाएंगे, और फिर उससे क्या करेंगे? उससे हम बहुत प्रॉफिट (profit) कमाएंगे!
तो भारत में कॉटन (रूई) उगाएंगे, उसको मैनचेस्टर लेकर जाएंगे, मैनचेस्टर में कपड़े बनाएंगे, और फिर वह कपड़े भारत में बेचेंगे, और उससे हमको बहुत प्रॉफिट होगा! इसीलिए गांधी जी ने खादी चालू किया था। वे बोले कि “हम खादी बनाएंगे, यहीं से उगाएंगे, यहीं कपड़े बनाएंगे, तो हमारा पैसा बाहर नहीं जाएगा।”
तो अभी ऐसा चेंज (change) करने के लिए उनको भारत का जो सोशियो-इकोनॉमिक सिस्टम था, जो आर्थिक समृद्धि थी, उसको ध्वस्त करना बहुत जरूरी था! उसके बिना उनको ज्यादा फायदा नहीं होता था। मुस्लिम शासक जो भारत में आए थे, उनके समय भारत समृद्ध रहा। पर ब्रिटिश लोगों को भारत की समृद्धि नहीं चाहिए थी, उनको ब्रिटेन की समृद्धि चाहिए थी!
इसलिए भारत को किस तरह से रीऑर्गेनाइज (reorganize) करना है जिससे कि ब्रिटेन की आर्थिक समृद्धि बढ़ जाए, वह उनका मुख्य उद्देश्य था।
इसलिए उन्होंने क्या किया? जो सोशल डिवीज़न (social division) था—”ये लोग यहाँ काम कर रहे हैं, ये लोग वहाँ काम कर रहे हैं”—उस सब को ध्वस्त कर दिया! और उसके कारण जो फंक्शनल सिस्टम थी, वह ध्वस्त हो गई। तभी भेदभाव जो है, वह ज्यादा प्रकट हो गया!
प्रकट हो गया मतलब क्या है? जब एक वर्ण के लोग यहाँ काम कर रहे हैं, दूसरे वर्ण के लोग वहाँ काम कर रहे थे, तो सब अपनी-अपनी जगह में एक तरह से संतुष्ट थे, एक तरह से समृद्ध थे। ऐसे नहीं है कि जो वैश्य लोग या शूद्र लोग थे, वे बहुत गरीबी में रह रहे थे, अपनी-अपनी परिस्थितियों के अनुसार वे भी समृद्ध रह रहे थे।
पर जब वह सिस्टम पूरा ध्वस्त हो गया, तो जो भेदभाव है, इसका और ज्यादा बुरा परिणाम होने लग गया।
There is a difference between Separation and Discrimination. (पृथक्करण और भेदभाव में अंतर होता है।)
वास्तव में सेपरेशन (Separation / कार्य-विभाजन) का मतलब: “तुम यहाँ काम करो, हम यहाँ काम करते हैं।” यह ठीक है, जरूरत है तो कर सकते हैं। पर डिस्क्रिमिनेशन (Discrimination / भेदभाव) का मतलब: “तुम यहाँ काम कर ही नहीं सकते! तुम यहाँ काम करोगे तो तुम गलत हो, तुम बुरे हो।” यह तब विद्यमान होने लग गया जब समाज की जो पद्धति थी, वह ध्वस्त होने लग गई।
तो कह सकते हैं—नहीं, पहले की भी समाज की पद्धति बुरी ही थी? पर अभी जाति पद्धति के बारे में अगर कोई कहता है कि ‘कास्ट सिस्टम’ और ‘वर्ण व्यवस्था’ एक ही है, कोई ऐसा दावा करता है कि एक ही है, तो फिर हम सवाल कर सकते हैं कि अगर कहीं बहुत भेदभाव हुआ है किसी समाज में, तो अगर अत्यधिक शोषण हुआ है, तो उससे क्रांति (Revolution) होती है!
जहाँ गरीब लोग बहुत नीचे दबाए जाते हैं और अमीर लोग बहुत ऊपर होते हैं, तो अगर बहुत भेदभाव रहता है, तो गरीब लोग क्रांति कर लेते हैं—जैसे फ्रेंच रिवोल्यूशन (French Revolution) हुआ था, रशियन रिवोल्यूशन (Russian Revolution) हुआ था!
पर हम देखते हैं, भारत में हज़ारों सालों से समृद्धि रही थी—Thousands of years there was prosperity! भले ही भारत पर ७००-८०० सालों से मुस्लिम शासकों ने राज्य किया, फिर भी भारत समृद्ध रहा। क्यों? This prosperity came from the socio-economic arrangement!
तो अगर जो निचली मानी जाने वाली जातियों के लोग थे, अगर वे लोग इतने दुखी, इतने पीड़ित रहे थे, तो फिर उन्होंने क्रांति क्यों नहीं की? अगर वे इतने पीड़ित रहे थे, तो जब भारत में अधिकांश रूप से मुस्लिम राज्य था, तो भी सारे निचली मानी जाने वाली जातियों के लोगों ने मुस्लिम धर्म क्यों नहीं अपना लिया?
उसके पहले भी जब हम ५वीं शताब्दी ईसा पूर्व से ५वीं शताब्दी ईस्वी (5th century BC to 5th century AD) देखते हैं, तो उस समय में बौद्ध धर्म (Buddhism) और जैन धर्म (Jainism) काफी प्रचलित था। इस १००० सालों में जब बौद्ध और जैन धर्म था, तब सारे निचली जातियों के लोगों ने बौद्ध धर्म क्यों नहीं अपना लिया?
इशचर गौरांग प्रभु:
प्रभु, आज हम बात करना चाहते हैं—जैसे मैंने आपसे फोन पर बात की थी—तमिलनाडु के एक मंत्री के लड़के ने (उधयनिधि स्टालिन) स्टेटमेंट दी है कि “सनातन धर्म जो है, वह एक मलेरिया की तरह है, कोविड की तरह है, तो इसको रोकना नहीं है, इसको जड़ से समाप्त कर देना है, पूरी तरीके से खत्म कर देना है।”
अब यह एक विवादास्पद बयान है। इनकी बात सुनकर मुझे वह राजकुमार का एक डायलॉग याद आ गया—”अब सनातन धर्म तो विचार क्या है मिटाएंगे? इनके जैसे लाखों आए, लाखों चले गए। जिन्होंने सनातन धर्म को मिटाने की कोशिश की, इतिहास गवाह है कि वे समय के साथ खुद मिटते चले गए।”
लेकिन बात है कि ये ऐसा चाहते क्यों हैं? क्यों चाहते हैं कि सनातन धर्म मिट जाए? इनका कहना है कि सनातन धर्म की वजह से समाज में भेदभाव होता है, अनटचेबिलिटी (Untouchability) है, अछूतपन है, जातिवाद है—ये सारी समस्याएँ सनातन धर्म की वजह से हैं।
भागवतम है, पुराण हैं, वेद हैं—क्या उसमें से यह जातिवाद आ रहा है? और नहीं, तो फिर यह समाज में धीरे-धीरे कैसे ऐड (add) हो गया? ये कुरीतियाँ कहाँ से आ गईं? और जैसे कि ये लोग बोल रहे हैं, अगर सनातन धर्म को—वैसे तो संभव नहीं है, लेकिन चलो एक बार को मान भी लिया जाए कि सनातन धर्म को हटा दो—तो क्या ये प्रॉब्लम सॉल्व (solve) हो जाएँगे सनातन धर्म को हटाने से?
और आखिरी बात यह है कि ऐसे लोग जो जान-बूझकर इन मुद्दों को खत्म नहीं होने दे रहे हैं… लोगों के बीच में भेदभाव खत्म होता जा रहा है, बहुत तेज़ी से गिर रहा है, लेकिन जो ये मंत्री लोग हैं, संतरी लोग हैं, ये अपने वोट-बैंक के चक्कर में आज भी इन मुद्दों को जीवित रखते हैं। बार-बार लोगों के दिमाग में इसके ऊपर डालते हैं, क्योंकि इनकी वोट-बैंक पॉलिटिक्स इसी से चलती है। तो इससे लोगों का क्या करा जाए? क्या सॉल्यूशन (solution) है? हम एक आम आदमी इस बारे में क्या कर सकता है?
इन सारे सवालों को लेकर मैं फिर से एक बार अपने सब के प्रिय चेतन्याचरण प्रभु जी के पास गया हूँ। जो नहीं जानते हैं, बाय चांस, चेतन्याचरण प्रभु जी जो हैं, बहुत वरिष्ठ भक्त हैं, भगवद्गीता के ऊपर हज़ार आर्टिकल (articles) लिखे हैं, कई किताबें वे लिख चुके हैं, और शास्त्रों को ठीक से कैसे समझा जाए, उनकी बहुत गहरी इसमें अंडरस्टैंडिंग (understanding) है। और समाज को, जो भी हमारे सोशल इश्यूज (social issues) होते हैं, उनको शास्त्रों की नज़र से कैसे देखा जाए, इसमें उनका बहुत अच्छा पर्सपेक्टिव (perspective) रहता है।
तो ये सारे प्रश्न—कि हमारे शास्त्र जातिवाद के विषय में क्या बोलते हैं, और जो जातिवाद हमने देखा है, वह क्या है, इसमें अंतर क्या है, और सनातन धर्म का इसमें क्या योगदान हो सकता है, इन मुद्दों को हम कैसे देख सकते हैं और कैसे सही कर सकते हैं—इन सारे प्रश्नों को लेकर मैं चेतन्याचरण प्रभु जी के पास गया हूँ। अगर आप इन मुद्दों को ठीक से, गहराई से, बहुत अच्छे से समझना चाहते हैं, तो यह पॉडकास्ट आपके लिए बहुत हेल्पफुल (helpful) हो सकता है। तो चलिए शुरू करते हैं!
भगवद्गीता का जो हमारा फेवरेट वर्स (favorite verse) है, चौथे अध्याय का १३वाँ श्लोक (4.13), जिसमें कृष्ण क्लियरली (clearly) बोलते हैं:
चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः ।
गुण और कर्म से विभाजन है। अठारहवें अध्याय में फिर से भगवान् बता रहे हैं कि क्या-क्या गुण होने चाहिए। और सारे धर्मगुरु बार-बार एक ही बात बोलते हैं, सभी लोग एक ही बात बोलते हैं कि कहीं पर भेदभाव नहीं है, कास्ट सिस्टम (caste system) नहीं है, हमारे यहाँ वर्ण व्यवस्था है। पूरा सनातन धर्म वर्ण व्यवस्था के ऊपर है।
उसके बावजूद केवल मिनिस्टर्स (ministers) हैं जो यह बयान दे रहे हैं। तो ऐसा क्यों है? इनको बात समझ में आ नहीं रही है, या ये समझना चाहते नहीं हैं? ये अपने स्वार्थ के चक्कर में इतने ज्यादा फँसे हुए हैं कि वे इस बात पर विचार ही नहीं कर रहे कि समाज में कितना बड़ा एक दुष्परिणाम इसका हो सकता है, उनकी इस सोच से! आपको क्या लगता है प्रभु जी, वे क्यों इस तरह का विचार रखते हैं?
सनातन धर्म और अस्पृश्यता: चार अलग-अलग संदर्भ
चेतन्याचरण प्रभु:
आपने जो बताया, उसके बारे में मैं विचार कर रहा था। तो मैं तीन-चार चीज़ें देखना चाहता हूँ। जब ‘सनातन धर्म’ इस शब्द का इस्तेमाल हो रहा है, तो कई बार एक भाषा में यह समस्या आती है कि हम एक शब्द का उल्लेख कर रहे हैं, तो किस चीज़ का उल्लेख कर रहे हैं?
यहाँ ‘सनातन धर्म’ का उल्लेख चार अलग-अलग संदर्भों में किया जा सकता है:
- अस्पृश्यता (Untouchability) के साथ: अछूतपन या अछूतता का भाव।
- जाति पद्धति (Caste System) के साथ: जो जाति व्यवस्था है।
- हिंदू धर्म (Hinduism) के साथ: जो ऐतिहासिक रूप से प्रचलित रहा है।
- आध्यात्मिक ज्ञान (Spiritual Knowledge / Self-knowledge) के साथ: जो नित्य आत्मज्ञान है।
तो अभी सनातन धर्म का जब उल्लेख हो रहा है, तो किस चीज़ से उल्लेख किया जा रहा है?
अभी जब हम साधारणतया कृष्णभावनामृत में, प्रभुपाद जी ने बताया है कि ‘सनातन धर्म’ का मतलब क्या है—कि वह एक आध्यात्मिक ज्ञान है जो भगवान् भगवद्गीता में बताते हैं। यह प्रभुपाद जी की शिक्षा है, यह भगवद्गीता की शिक्षा है कि हम आध्यात्मिक ज्ञान जो है, सर्वजगत् और सब लोगों के लिए है। तो यह उल्लेख किया जा रहा है।
पर कुछ लोग सनातन धर्म का उल्लेख करते हैं, तो वे कहते हैं कि “यह अनटचेबिलिटी (untouchability) है, अछूतता का भाव है, यही सनातन धर्म है।” और वे कहते हैं कि इसका हमको पूरा विनाश कर देना चाहिए, इसको बिल्कुल रखना ही नहीं चाहिए।
तो अभी यह सवाल होता है कि जब कोई सनातन धर्म के बारे में बात कर रहा है—Who is speaking the right thing? (कौन सही बात कह रहा है?)
तो दो चीज़ें हैं इसमें:
- Who has the right to speak? (किसके पास बोलने का अधिकार है?)
- Who is speaking right? (कौन सही बोल रहा है?)
किसके पास अधिकार है यह बोलने के लिए? कोई बोल रहा है, बहुत कुछ लोग बोल सकते हैं कि “मेरे पास अधिकार है”, कोई कहता है “मुझे अधिकार नहीं है।” ठीक है, तो Who is speaking right? अलग-अलग लोग बोल सकते हैं, तो कौन सही बोल रहा है?
अभी कोई कहेगा कि “मैंने भेदभाव का अनुभव किया है, मैं अछूतता के कारण मुझे बहुत पीड़ा हुई है, तो इसलिए मुझे अधिकार है इसके बारे में बोलने का।” तो अभी जो दलित समाज है, जो अछूतता से प्रभावित हुए हैं—मान लीजिए इनमें से प्रधान जो हैं, वे अंबेडकर जी हैं। महाराष्ट्र से ही हूँ, महाराष्ट्र में उनका बहुत प्रभाव है। तो उन्होंने इसके बारे में कहा है।
तो जिसका हम कह सकते हैं—Anyone affected (कोई भी जो इससे प्रभावित हुआ है), उनको इसके बारे में कहने का अधिकार है। हम यह नहीं कह सकते हैं कि तुम्हें इसके बारे में बोलना ही नहीं चाहिए।
पर ठीक है, अगर आप बोल रहे हैं, तो Who is speaking right? आपके अनुभव के अनुसार आप बोल रहे हैं, पर कोई भी यह तो नहीं कह सकता है कि मेरा अनुभव जो है वही परम सत्य है, वही संपूर्ण सत्य है!
अन्य धर्मों से तुलनात्मक उदाहरण
मान लीजिए अगर हम किसी और धर्म का उदाहरण लेते हैं। अभी हम इस्लाम के बारे में बात करते हैं। तो इस्लाम भी बहुत बड़ी चीज़ है, उसमें अलग-अलग प्रकार के लोग हैं। उसमें से एक छोटा-सा भाग है—वह है एक्सट्रीमिज्म (Extremism)। वह क्या है? उसमें आतंकवाद आता है, उसमें जिहाद आता है। तो अभी अगर किसी को उसका अनुभव हुआ है, तो वह शायद इस्लाम के बारे में बुरा कहेंगे। पर क्या इस्लाम वही है? आजकल के समाज में, आजकल के जगत् में Every fourth person is Muslim (हर चौथा व्यक्ति मुस्लिम है), तो क्या सारे मुस्लिम आतंकवादी होते हैं? अगर ऐसे होते, तो सारा विश्व बहुत बड़े खतरे में होता!
हम क्रिश्चियनिटी (Christianity / ईसाई धर्म) के बारे में बात कर सकते हैं, किसी भी चीज़ के बारे में बात कर सकते हैं। अभी क्रिश्चियंस जो थे, क्रिश्चियनिटी में कई लोग ऐसे थे काफी समय तक, जो गुलामी (Slavery) को जस्टिफाई (justify) करते थे। तो अभी कोई कहेगा क्या कि क्रिश्चियनिटी में स्लेवरी थी, इसलिए हम क्रिश्चियनिटी को ही पूरा… हमको उसका विनाश कर देना चाहिए, उसको इराडिकेट (eradicate) कर देना चाहिए?
तो अगर कोई ऐसे कहेगा इस्लाम के बारे में, कोई कहेगा कि हमें पूरा इस्लाम को इराडिकेट कर देना चाहिए, तो उसका प्रतिकार होगा, बहुत भीषण होगा!
इसलिए अभी क्या है कि जब ऐसा कोई कह रहा है, तो वह उस धर्म की बहुत ही छोटी-सी चीज़ को ले रहा है और उसके आधार पर कुछ कह रहा है। और फिर हम कह सकते हैं कि क्रिश्चियनिटी में कुछ श्लोक/आयते आती हैं बाइबल में, जैसे Slaves should obey their masters (गुलामों को अपने मालिकों की आज्ञा माननी चाहिए)। इस्लाम में कुछ ऐसे विधान आते हैं कि जो भी काफिर हैं, उनको मार देना चाहिए। जो लोग ऐसा कोट (quote) कर रहे हैं, क्या वे सही में जो क्रिश्चियनिटी का एसेंस (essence) है या इस्लाम का एसेंस है, उसके बारे में बता रहे हैं या कुछ एक फ्रिंज (fringe) बता रहे हैं? यह समझने के लिए हमें वह पूरी जो सिस्टम (system) है, उसको देखना चाहिए। केवल उसकी एक चीज़ को देखना उचित नहीं है।
अस्पृश्यता का वास्तविक स्रोत: शास्त्र बनाम इतिहास
तो अभी अगर हम… हम जो सनातन धर्म देखते हैं, उसमें अनटचेबिलिटी (untouchability / अस्पृश्यता) जो आती है—तो अनटचेबिलिटी यह ज़रूर एक हिस्टोरिकल रियलिटी (Historical reality / ऐतिहासिक सत्य) है। यह ऐतिहासिक दृष्टि से सत्य है, और This is definitely a regrettable reality—यह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण, यह बहुत ही बुरा सत्य है भारतीय समाज का।
पर यह आया कहाँ से है? इसका सोर्स (Source / स्रोत) क्या है?
अगर हम देखते हैं, तो अनटचेबिलिटी खास करके हिंदू धर्म के बारे में सबसे घृणास्पद जो चीज़ है, यह बताई जाती है। हम जाति पद्धति के बारे में धीरे-धीरे आगे बढ़ेंगे, पर यह जो है, इसका सोर्स क्या है?
- इसको गीता में कहीं नहीं बताया गया है।
- इसको भागवतम में कहीं नहीं बताया गया है।
- इसको रामायण, महाभारत में कहीं नहीं बताया गया है।
तो इसको अगर वेदों में जाते हैं, तो ऋग्वेद में या किसी वेदों में इसका उल्लेख नहीं है। इसका वेदों में उल्लेख नहीं है! तो कहीं भी हमारे जो शास्त्र हैं, उनके प्रधान किसी शास्त्र में इसका उल्लेख नहीं है।
कुछ लोग कहते हैं कि यह ‘धर्मशास्त्रों’ में आता है। पर धर्मशास्त्रों में जो भी आता है, वह बिल्कुल स्पष्ट नहीं है। जैसे चांडाल, म्लेच्छ—ऐसा उल्लेख आता है, यह भागवतम में भी आता है। पर ऐसे लोगों को अछूत मानना—यह जो है, इसका कहीं भी उल्लेख नहीं आता है। धर्मशास्त्रों में भी कहीं ऐसा क्लियर (clear) नहीं है—No reference, no clear reference.
तो यह कहाँ से आया है? यह जिसको भी हम हिंदूइज़्म या सनातन धर्म कहते हैं, उसके मूल शास्त्रों में यह कहीं भी नहीं है!
तो इसको हिंदूइज़्म से जोड़ना, और यहाँ तक कि इसको सनातन धर्म से इक्वेट (equate) करना—यह एब्सोल्यूटली रॉन्ग (absolutely wrong) है!
क्योंकि यह भले ही ऐतिहासिक सत्य हो, लेकिन Historical is not scriptural (जो ऐतिहासिक है, जरूरी नहीं कि वह शास्त्रीय हो)! क्योंकि सब कुछ इतिहास में जो हुआ है… Historical is not scriptural, and scriptural is religious and spiritual. तो जो भी भारत में हुआ है, हम यह नहीं कहते कि वह सब सनातन धर्म ही था।
और इसका क्या सबूत है कि हम कह सकते हैं कि यह सनातन धर्म नहीं है? तो इसको हम तीन दृष्टि से देख सकते हैं:
- नो स्क्रिप्चरल रेफरेंस (No Scriptural Reference): शास्त्रों में ही बताया गया है… अभी कुछ कह रहे हैं कि “अंहा! अनटचेबिलिटी बहुत बुरी चीज़ है!” हाँ, हम भी स्वीकार करते हैं। जैसा आपने ही शुरुआत में बताया, कोई भी धर्मगुरु है आजकल के समाज में, कोई भी अनटचेबिलिटी को प्रोपेगेट (propagate) नहीं कर रहा है, अछूतता को प्रस्थापित करके उसको विस्तारित करने का बिल्कुल प्रयास नहीं कर रहा है। तो इसलिए इसको इक्वेट करना कि “अछूतता ही सनातन धर्म है, और इसलिए हमको सनातन धर्म को इराडिकेट (eradicate) कर देना चाहिए”—यह क्या है? This is a horrendous misrepresentation! यह न केवल एक गलत समझ है, पर यह एक बहुत ही भयानक गलत समझ है!
सनातन धर्म के भीतर सुधार की परंपरा (Internal Reform)
इशचर गौरांग प्रभु:
नहीं प्रभु, मैं अभी तक आपकी बात समझ रहा हूँ कि हिस्ट्री (History) में जो भी चीज़ें चल रही हैं, उसको सनातन धर्म की तरह रिप्रेजेंट (represent) करना, और उससे भी ज़्यादा, जो आप बता रहे हैं—उसको मान लेना कि यही सनातन धर्म है, सनातन धर्म का मूल उद्देश्य ही अनटचेबिलिटी है, तो उसका तो कोई सेंस (sense) ही नहीं बन रहा है!
चेतन्याचरण प्रभु:
एग्जैक्टली (Exactly)! अभी हम यह कह रहे हैं कि यह सनातन धर्म नहीं है। कैसे हम कह सकते हैं कि यह सनातन धर्म और अनटचेबिलिटी एक नहीं हैं?
पहला कारण: No scriptural reference (कोई शास्त्रीय प्रमाण नहीं होना)—यह पहली चीज़ हमने ऑलरेडी बता दी।
पर अभी कई और कारण देख सकते हैं:
- मच इंटरनल रिफॉर्म (Much Internal Reform): इंटरनल रिफॉर्म मतलब वैदिक संस्कृति, वैदिक शास्त्रों से ही जो लोग प्रेरित हुए हैं, उन्होंने ही इसके बारे में, इसके विरुद्ध में कहा है।
तो अगर हम देखते हैं, कई भक्ति में संत हुए हैं। और जो भक्ति के संत थे, वे अनेक लोअर कास्ट (lower caste / निचली जातियों) से थे। महाराष्ट्र में संत चोखामेला थे, गोरा कुम्हार थे (पॉटर थे)। ऐसे बहुत से संत हुए हैं जो कुम्हार थे, बहुत से ऐसे हैं जो कोबलर (cobbler) थे, चमार थे।
तो अभी हम देखते हैं, गौड़ीय वैष्णव पद्धति में भी हरिदास ठाकुर थे। वह जो थे, उनको सनातन समाज में म्लेच्छ कहा जाता था, क्योंकि वे सनातन धर्म के बाहर के एक परिवार में जन्मे थे। तो Not only were they accepted, but they were respected! (न केवल उनको स्वीकार किया गया, बल्कि उनको अत्यधिक आदर दिया गया!)
तो अगर कोई कहता है कि “यही सनातन धर्म है”, तो सनातन धर्म में जो महान हस्तियाँ मानी जाती हैं, उनमें भी ऐसे लोग हैं जो नीची कास्ट (जाति) के थे, और वहाँ ऐसा बहुत इंटरनल रिफॉर्म (आंतरिक सुधार) हुआ है। और ऐसे नहीं कि इंटरनल रिफॉर्म कुछ ही लोगों ने किया है, अनेक वैष्णवों ने किया है, संतों ने किया है।
इशचर गौरांग प्रभु:
प्रभु, रिफॉर्म (reform) का मतलब यहाँ पर क्या बोलना चाह रहे हैं? किस… मतलब क्या रिफॉर्म हुआ है?
चेतन्याचरण प्रभु:
रिफॉर्म मतलब यहाँ—Correct historical reality! (ऐतिहासिक विकृति को सुधारना!) जो हिस्टोरिकल रियलिटी थी कि अनटचेबिलिटी आ गई थी, जो कि गलत चीज़ थी, तो उसी धर्म में उसके खिलाफ प्रतिकार किया गया है।
जैसे मैंने बोला था कि स्लेवरी (दास प्रथा) थी क्रिश्चियनिटी में। तो जब अमेरिका में सिविल वॉर (Civil War) हुआ था, तो कुछ क्रिश्चियंस कह रहे थे कि बाइबल के अनुसार स्लेवरी रखनी चाहिए, और कुछ क्रिश्चियंस कह रहे थे कि नहीं रखनी चाहिए। तो क्या किसी ने कहा कि क्रिश्चियनिटी में स्लेवरी थी, इसलिए क्रिश्चियनिटी को ही आप निकाल दो? तो यह कहना बहुत गलत है एक तरह से!
- हाइजीन और सोशल डिस्टेंसिंग की थ्योरी (Hygiene Theory): फिर दूसरा हम देख सकते हैं कि यह अनटचेबिलिटी कहाँ से आई है?
तो इसको अभी मैं… I am not justifying it, I am not at all justifying it, I am only explaining it! (मैं इसका बिल्कुल समर्थन या बचाव नहीं कर रहा हूँ, मैं केवल इसका कारण समझा रहा हूँ।)
यह कहाँ से आ सकती है? इसके बहुत से थ्योरीज़ (theories) हैं। भारत का इतिहास है, भारत बहुत बड़ा विशाल देश था, और सब पर किसी एक का नियंत्रण नहीं था, अलग-अलग पद्धतियाँ थीं।
तो कई बार यह अनटचेबिलिटी जो आई थी, वह एक तरह से हाइजीन (hygiene / स्वच्छता) से आई हो सकती है। मैं यह नहीं कह रहा हूँ… जो लोग मल-मूत्र, मांस ऐसी चीज़ों से संपर्क में रहते हैं, तो उसमें जर्म्स (germs) आ सकते हैं। अभी जो लोग ऐसा काम हमेशा करते हैं, तो उनको कुछ हद तक उसमें इम्युनिटी (immunity) आ जाती है। पर बाकी लोग उससे संपर्क में नहीं हैं उतना, तो उनको उतनी इम्युनिटी नहीं आती है।
तो शायद हम जो टर्म्स यूज़ (use) करते हैं—जर्म्स या इम्युनिटी—उस समय लोग वे टर्म्स यूज़ नहीं करते होंगे, पर एक तरह से थोड़ी-थोड़ी समझ होती है।
तो अभी जैसे कोविड के समय जो सोशल डिस्टेंसिंग (Social distancing) हमने रखी थी कि कोई एक-दूसरे के पास नहीं आना चाहिए, तो वह एक तरह की अनटचेबिलिटी के संपर्क जैसी ही थोड़ी-थोड़ी थी।
तो अभी यह जो है, मैं स्पष्ट बोल रहा हूँ कि I am not justifying it! यह सही है, ऐसा नहीं बोल रहा हूँ मैं। मैं यह बोल रहा हूँ कि यह कहाँ से आया हो सकता है। इसके लिए अलग-अलग थ्योरीज़ बताई गई हैं, और हाइजीन की एक थ्योरी हो सकती है। सही होगी या नहीं होगी पता नहीं, पर यह शास्त्रों से आया हुआ एक डिस्क्रिमिनेशन (discrimination / भेदभाव) नहीं है!
शास्त्रों में ऐसी पद्धति नहीं बताई गई है कि किसी को आप अछूत बोलकर उनको मानवीय स्तर का आदर भी न दो, उससे भी नीचे कुछ कर दो—ऐसा भाव नहीं है!
तो अभी कुछ लोग कहते हैं, ऐसे अलग-अलग कारण कोई ढूँढ सकता है, और उसके लिए हिस्टोरिकल रिसर्च (historical research) चाहिए। जो भी जिसको करना है, रिसर्च कर सकते हैं, but we are not justifying it!
पर अभी इसके लिए एक जस्टिफिकेशन (justification) दिया जाता है कभी-कभी कि जो पुनर्जन्म (reincarnation) और कर्म है, इसके द्वारा बताया जाता है कि जो लोग ऐसा कार्य कर रहे हैं, उनको बताया जाता है कि “तुमने पूर्व जन्म में बुरे कर्म किए हैं, तुम्हारा ऐसे जातियों में जन्म हुआ है, और इसलिए तुमको अभी ऐसे ही रहना चाहिए।”
दर्शन (Philosophy) बनाम संस्कृति (Culture)
इशचर गौरांग प्रभु:
प्रभु, मेरी अंडरस्टैंडिंग (understanding) यह बनी है कि जो मेन प्रिंसिपल (main principle) है, जो भगवान् भगवद्गीता के 4.13 में बता रहे हैं, वह गुण और कर्म के आधार पर ही है। मतलब मेन प्रिंसिपल वह है।
लेकिन अगर क्षत्रिय पुरुष है, क्षत्रिय स्त्री है, जब वे आपस में साथ में रहते हैं, तो बहुत हाई प्रोबेबिलिटी (high probability) है कि उनका पुत्र भी क्षत्रिय गुणों वाला ही हो। जब वर्ण व्यवस्था का ठीक से इस्तेमाल होता था, तो वहाँ से जन्म भी इम्पॉर्टेंट (important) हो जाता है प्रैक्टिकल पर्पस (practical purpose) से कि अगर किसी ब्राह्मण का पुत्र है, तो मोस्ट लाइकली (most likely) वह भी ब्राह्मण ही होगा। तो इसलिए वहाँ से जन्म को भी जो धीरे-धीरे इम्पॉर्टेंस देनी शुरू हो गई?
चेतन्याचरण प्रभु:
एग्जैक्टली! परफेक्ट (Exactly! Perfect)!
अभी कैसे है कि एक है—जैसे विज्ञान में होता है—एक है साइंस (Science) और दूसरी है टेक्नोलॉजी (Technology)।
अभी हम ज़ूम (Zoom) टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल कर रहे हैं, इंटरनेट का इस्तेमाल कर रहे हैं। तो अभी इंटरनेट कैसे काम करता है, यह बहुत कम लोगों को वास्तव में पता है, पर इंटरनेट का यूज़ (use) बहुत सारे लोग करते हैं।
तो उसी तरह से क्या है:
- एक है फिलोसोफी (Philosophy / तत्त्वज्ञान)
- दूसरी है कल्चर (Culture / संस्कृति)
तो तत्त्वज्ञान क्या है, वह बहुत से लोगों को पता नहीं होता है, पर वे संस्कृति का अनुशीलन कर रहे हैं।
अब मान लीजिए कोई फोन यूज़ करता है। अब उसको बोलते हैं कि “ठीक है, आप जो फोन है, पानी में यूज़ मत कीजिए, उससे कुछ शौक लग सकता है, कुछ बीमारी/हानि हो सकती है।” पर लोग उस पर ध्यान नहीं देते। एक बार यूज़ किया, दूसरी बार यूज़ किया, कुछ फर्क नहीं पड़ा। कई बार यूज़ करने के बाद एक बार ऐसा हो सकता है कि पानी के कारण उसका विस्फोट हो जाता है!
तो अभी यह क्यों हुआ है? ऐसे नहीं है कि वह फोन खराब है! वह फोन कैसे इस्तेमाल करना है, उसका ज्ञान जो है, वह कम प्रचलित है।
तो वैसे ही क्या है—तत्त्वज्ञान एक है, पर जब वह तत्त्वज्ञान संस्कृति में चला जाता है, तो कल्चर में कई बार कुछ चीज़ें आती हैं जो फिलोसोफी से आती हैं, पर कई चीज़ें जो होती हैं, वे सुपरस्टिशन (superstition / अंधविश्वास) से भी आती हैं, कई चीज़ें केवल एक तरह से ट्रेडीशन (tradition / परंपरा) से आती हैं। पर वह ट्रेडीशन स्क्रिप्चर (scripture / शास्त्र) से नहीं आ रहा है!
इसलिए अगर भगवान् गोवर्धन-लीला में पूछते हैं नंद महाराज को कि “आप जो इंद्र की पूजा कर रहे हैं, यह शास्त्रों के अनुसार है या रीति-रिवाज के अनुसार?” मतलब Scriptural is not necessarily equal to traditional! (जो पारंपरिक है, ज़रूरी नहीं कि वह शास्त्रीय भी हो!)
तो यह थोड़ा सूक्ष्म पॉइंट है, पर यह महत्वपूर्ण पॉइंट है कि भले भारत में जाति पद्धति हो और जाति पद्धति को जन्म से बताया गया हो, यह स्क्रिप्चर (शास्त्रों) से क्या आया है? वर्ण व्यवस्था (वर्णश्रम) आई है! और जो रीति-रिवाज हैं, उससे कास्ट सिस्टम (जाति व्यवस्था) आई है। और जो कास्ट सिस्टम है, इसका शास्त्रों के आधार पर अनेक आचार्यों ने इसका खंडन भी किया है!
तो इसलिए कोई कहेगा कि कर्म और पुनर्जन्म के तत्त्वज्ञान के अनुसार इस कास्ट सिस्टम को बताया गया है—ठीक है, वह एक कारण हो सकता है, पर वह एकमात्र कारण (sole cause) नहीं है।
और इसलिए शास्त्रों में भी अनेक अपवाद हैं, ऐसे अनेक उदाहरण हैं। जैसे भागवत में उदाहरण आता है कि राजा भरत के अनेक पुत्र होते हैं, और कुछ पुत्र ब्राह्मण बनते हैं, कुछ पुत्र वैश्य बन जाते हैं। तो यह कोई डिनाई (deny) नहीं कर रहा है, पर यह शास्त्रों से ही आया है, यह भी बिल्कुल सही नहीं है। तो कर्म और रीइन्कार्नेशन से ही डिस्क्रिमिनेशन होगा, यह ज़रूरी नहीं है।
राजनीतिक स्वार्थ और मार्क्सवादी विचारधारा
अभी जो लोग इसके बारे में बात करते हैं, वे काफी लोग बहुत लेफ्ट-विंग (Left-wing) के लोग होते हैं। लेफ्ट-विंग मतलब कम्युनिज्म (Communism), सोशलिज्म (Socialism)—यह सब होता है उसमें।
तो अभी अगर हम देखते हैं कि एप्लीकेशन (application) जो हुआ है… जब अप्लाई करते हैं, तो कई बार मिस-अप्लिकेशन (mis-application) होता है उसका।
अगर हम कम्युनिज्म का उदाहरण देखते हैं, तो सोवियत रूस और चीन—इन दोनों में कम्युनिज्म को अप्लाई किया गया था, और लगभग ७० सालों तक चला यह (१९१७ से लगभग १९८९ तक)। और इसका क्या परिणाम हुआ? इसका परिणाम यह हुआ कि बिना किसी युद्ध के Hundred million deaths! (दस करोड़ लोगों की मृत्यु हो गई!) सरकार ने, जो भी स्टेट के खिलाफ है, उसका वध कर दिया!
तो अभी जो लोग आज मार्क्सवादी (Marxist) हैं, कम्युनिस्ट (Communist) हैं, सोशलिस्ट (Socialist) हैं, और उनसे पूछते हैं कि “तुम्हारी आइडियोलॉजी (ideology / विचारधारा) से इतने सारे लोगों की मृत्यु हो गई”, तो वे कहेंगे तुरंत कि “स्टालिन और लेनिन जो थे, वे कम्युनिस्ट नहीं थे, उन्होंने कार्ल मार्क्स की शिक्षाओं को मिस-अप्लाई (mis-apply) किया है!” तब वे जस्टिफाई कर रहे हैं कि यह मिस-अप्लिकेशन है।
पर जब कास्ट सिस्टम की बात आती है, तब वे कहते हैं—”नहीं! यह मिस-अप्लिकेशन नहीं है, यही एक्चुअल टीचिंग (actual teaching / वास्तविक शिक्षा) है!”
तो This is a game that can be played both ways! (यह ऐसा खेल है जो दोनों तरफ से खेला जा सकता है!) तो यह ऐसी तलवार है जो दोनों तरफ से कट सकती है। अगर आप इसको इस्तेमाल करने वाले हो सनातन धर्म के खिलाफ, तो वह आपकी जो आइडियोलॉजी है, उसके खिलाफ भी इस्तेमाल हो सकता है!
अंग्रेजों द्वारा जाति व्यवस्था का औपचारीकरण (Formalization)
इशचर गौरांग प्रभु:
प्रभु, इन जनरल (in general) मेरी अंडरस्टैंडिंग बनी थी कि जो कास्ट सिस्टम है, इसको फॉर्मली (formally) जो है, वह ब्रिटिशर्स (Britishers / अंग्रेजों) ने इंडिया में इंट्रोड्यूस (introduce) किया। मतलब यह एक अनकही बात थी कास्ट सिस्टम पहले, लेकिन ब्रिटिशर्स ने प्रॉपर डॉक्यूमेंट (document) के साथ… मैंने एक बार डॉ. सुधांशु त्रिवेदी जी को सुना था, उन्होंने शायद ऐसा कुछ मेंशन (mention) किया था कि पहली बार ब्रिटिशर्स ने डॉक्यूमेंटेड की थी कि ३०००० जातियां हैं भारत में अलग-अलग तरीके से—जैसे जो कुम्हार हैं इस-इस तरीके से।
तो क्या इसका मतलब यह है कि जो कास्ट सिस्टम है, वह कहीं न कहीं इंट्रोड्यूस हो गया था हमारे ट्रेडीशन में, कल्चर में समय के साथ, लेकिन ब्रिटिशर्स ने इसको बहुत फॉर्मलाइज़ करके, बहुत ज्यादा प्रोपेगेट (propagate) करके, मतलब इसको एक तरह से पूरा नाम दे दिया कास्ट सिस्टम का, और उसको भेदभाव की तरह सनातन धर्म के साथ जोड़ने का काम जो ब्रिटिशर्स ने किया है—ऐसा कुछ है क्या? या ऐसा नहीं है?
चेतन्याचरण प्रभु:
अभी कैसे है कि जब भारत में मुगलों का या इस्लामिक शासन था, तो There was no socio-economic disturbance (उन्होंने सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था को ज्यादा नष्ट नहीं किया)।
उन्होंने सांस्कृतिक स्तर पर, धार्मिक स्तर पर थोड़ा विध्वंस किया—मंदिरों को तोड़ा, इसको थोड़ा, उसको थोड़ा। पर समाज का जो ऑर्गेनाइजेशन (organization) था, उसमें उन्होंने कुछ ज्यादा इंटरफेयर (interfere) नहीं किया। यहाँ इस वर्ण के लोग काम कर रहे हैं, वहाँ उस वर्ण के लोग काम कर रहे हैं। उनका क्या था? “जहाँ तक हमको टैक्स (tax) मिल रहा है, ठीक है।”
क्योंकि जो मुग़ल या मुस्लिम शासक थे, वे भारत में ही बस गए थे। पर ब्रिटिश (अंग्रेज) कभी यहाँ बसे नहीं, वे नॉन-रेजिडेंट्स (non-residents) ही रहे।
ब्रिटेन सबसे पहले एक छोटा-सा देश है, उसकी पापुलेशन (population / जनसंख्या) भी बहुत छोटी-सी थी। और वहाँ से जब ब्रिटेन से लोग भारत में आते थे, तो उनको लगता था कि यह भारत तो बहुत ही गर्म देश है, इसमें इतनी सारी बीमारियाँ हैं, इतनी गर्मी है। तो वे जब भारत में आते थे, तो उनको लगता था कि भारत में जाना एक तरह से उनके लिए पनिशमेंट (punishment / सजा) है!
तो इसलिए क्या था कि इस्लामिक समय में भारत में जो भी पद्धति थी—जाति पद्धति हो या जो भी हो, जो वर्ण के अनुसार चल रही थी—क्या उसमें भेदभाव था? हो सकता है भेदभाव था, पर उससे किसी को ज्यादा प्रभाव नहीं हो रहा था। क्यों? क्योंकि जो अलग-अलग वर्ण के लोग थे, वे अलग-अलग एरियाज़ (areas) में अपना काम कर रहे थे। तो ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र—ये सब अपने-अपने एरियाज़ में काम कर रहे थे। तो इसका फंक्शनल एरिया (functional area) सबका अलग था।
पर जब ब्रिटिश लोग आ गए, तो उन्होंने क्या किया? Socio-economic disruption (सामाजिक-आर्थिक तबाही) कर दिया!
क्योंकि उनकी केवल यह इच्छा नहीं थी कि हमें भारत में राज्य करके भारत से सिर्फ टैक्स लेना है, उनको भारत की पूरी इकोनॉमिक सिस्टम (economic system / आर्थिक व्यवस्था) को बदलना था! उनका उद्देश्य क्या था? कि अगर यह ब्रिटेन है और यह भारत है, तो भारत से हम रॉ-मटेरियल (raw materials / कच्चा माल) वहाँ भेजेंगे, और फिर वहाँ से फिनिश्ड प्रोडक्ट्स (finished products / तैयार सामान) यहाँ पर लाएंगे, और फिर उससे क्या करेंगे? उससे हम बहुत प्रॉफिट (profit) कमाएंगे!
तो भारत में कॉटन (रूई) उगाएंगे, उसको मैनचेस्टर लेकर जाएंगे, मैनचेस्टर में कपड़े बनाएंगे, और फिर वह कपड़े भारत में बेचेंगे, और उससे हमको बहुत प्रॉफिट होगा! इसीलिए गांधी जी ने खादी चालू किया था। वे बोले कि “हम खादी बनाएंगे, यहीं से उगाएंगे, यहीं कपड़े बनाएंगे, तो हमारा पैसा बाहर नहीं जाएगा।”
तो अभी ऐसा चेंज (change) करने के लिए उनको भारत का जो सोशियो-इकोनॉमिक सिस्टम था, जो आर्थिक समृद्धि थी, उसको ध्वस्त करना बहुत जरूरी था! उसके बिना उनको ज्यादा फायदा नहीं होता था। मुस्लिम शासक जो भारत में आए थे, उनके समय भारत समृद्ध रहा। पर ब्रिटिश लोगों को भारत की समृद्धि नहीं चाहिए थी, उनको ब्रिटेन की समृद्धि चाहिए थी!
इसलिए भारत को किस तरह से रीऑर्गेनाइज (reorganize) करना है जिससे कि ब्रिटेन की आर्थिक समृद्धि बढ़ जाए, वह उनका मुख्य उद्देश्य था।
इसलिए उन्होंने क्या किया? जो सोशल डिवीज़न (social division) था—”ये लोग यहाँ काम कर रहे हैं, ये लोग वहाँ काम कर रहे हैं”—उस सब को ध्वस्त कर दिया! और उसके कारण जो फंक्शनल सिस्टम थी, वह ध्वस्त हो गई। तभी भेदभाव जो है, वह ज्यादा प्रकट हो गया!
प्रकट हो गया मतलब क्या है? जब एक वर्ण के लोग यहाँ काम कर रहे हैं, दूसरे वर्ण के लोग वहाँ काम कर रहे थे, तो सब अपनी-अपनी जगह में एक तरह से संतुष्ट थे, एक तरह से समृद्ध थे। ऐसे नहीं है कि जो वैश्य लोग या शूद्र लोग थे, वे बहुत गरीबी में रह रहे थे, अपनी-अपनी परिस्थितियों के अनुसार वे भी समृद्ध रह रहे थे।
पर जब वह सिस्टम पूरा ध्वस्त हो गया, तो जो भेदभाव है, इसका और ज्यादा बुरा परिणाम होने लग गया।
There is a difference between Separation and Discrimination. (पृथक्करण और भेदभाव में अंतर होता है।)
वास्तव में सेपरेशन (Separation / कार्य-विभाजन) का मतलब: “तुम यहाँ काम करो, हम यहाँ काम करते हैं।” यह ठीक है, जरूरत है तो कर सकते हैं। पर डिस्क्रिमिनेशन (Discrimination / भेदभाव) का मतलब: “तुम यहाँ काम कर ही नहीं सकते! तुम यहाँ काम करोगे तो तुम गलत हो, तुम बुरे हो।” यह तब विद्यमान होने लग गया जब समाज की जो पद्धति थी, वह ध्वस्त होने लग गई।
तो कह सकते हैं—नहीं, पहले की भी समाज की पद्धति बुरी ही थी? पर अभी जाति पद्धति के बारे में अगर कोई कहता है कि ‘कास्ट सिस्टम’ और ‘वर्ण व्यवस्था’ एक ही है, कोई ऐसा दावा करता है कि एक ही है, तो फिर हम सवाल कर सकते हैं कि अगर कहीं बहुत भेदभाव हुआ है किसी समाज में, तो अगर अत्यधिक शोषण हुआ है, तो उससे क्रांति (Revolution) होती है!
जहाँ गरीब लोग बहुत नीचे दबाए जाते हैं और अमीर लोग बहुत ऊपर होते हैं, तो अगर बहुत भेदभाव रहता है, तो गरीब लोग क्रांति कर लेते हैं—जैसे फ्रेंच रिवोल्यूशन (French Revolution) हुआ था, रशियन रिवोल्यूशन (Russian Revolution) हुआ था!
पर हम देखते हैं, भारत में हज़ारों सालों से समृद्धि रही थी—Thousands of years there was prosperity! भले ही भारत पर ७००-८०० सालों से मुस्लिम शासकों ने राज्य किया, फिर भी भारत समृद्ध रहा। क्यों? This prosperity came from the socio-economic arrangement!
तो अगर जो निचली मानी जाने वाली जातियों के लोग थे, अगर वे लोग इतने दुखी, इतने पीड़ित रहे थे, तो फिर उन्होंने क्रांति क्यों नहीं की? अगर वे इतने पीड़ित रहे थे, तो जब भारत में अधिकांश रूप से मुस्लिम राज्य था, तो भी सारे निचली मानी जाने वाली जातियों के लोगों ने मुस्लिम धर्म क्यों नहीं अपना लिया?
उसके पहले भी जब हम ५वीं शताब्दी ईसा पूर्व से ५वीं शताब्दी ईस्वी (5th century BC to 5th century AD) देखते हैं, तो उस समय में बौद्ध धर्म (Buddhism) और जैन धर्म (Jainism) काफी प्रचलित था। इस १००० सालों में जब बौद्ध और जैन धर्म था, तब सारे निचली जातियों के लोगों ने बौद्ध धर्म क्यों नहीं अपना लिया?
पहले इस्लाम के लोग आए थे, लगभग ७०० साल तक उनका राज था, ७००-८०० साल तक कह सकते हैं। तो इस समय में, इस सारे समाज में भारत की जो प्रॉस्परिटी (prosperity) थी, यह बहुत रही है। तो अगर यह सोशियो-इकोनॉमिक सिस्टम इतना खराब था, तो यह राष्ट्र इतना प्रॉस्परस (prosperous) क्यों रहा?
लगता है कि “ठीक है, जो नीचे की जाति के लोग थे, उनके पास कोई ऑप्शंस (options) नहीं थे, इसलिए वह समृद्ध था।” पर उनके पास ऑप्शंस थे! वे धर्म छोड़कर दूसरे धर्म में जा सकते थे, पर फिर भी नहीं गए!
तो यह पॉइंट कहने का उद्देश्य यह है कि जो सेपरेशन (Separation) था वह था, पर सेपरेशन से डिस्क्रिमिनेशन (Discrimination), डोमिनेशन (Domination), पर्सिक्यूशन (Persecution), दूसरे लोगों का दमन करना, दूसरे लोगों का शोषण करना—ऐसा नहीं था!
और जहाँ तक हम कह सकते हैं कि एक प्रकार का हैरार्की (hierarchy / उच्च-नीच का क्रम) था, कि कुछ जातियों को ऊपर मानना, कुछ को नीचे मानना—यह तो ब्रिटेन में भी था! ब्रिटेन में एक वर्ग था जिसे ‘जेंट्री’ (Gentry) कहते थे, या उसे अरिस्टोक्रेसी (Aristocracy) कहते थे। वहाँ जो राजा लोग होते थे या जैसे ड्यूक्स (Dukes), लॉर्ड्स (Lords) होते थे, और फिर उसके बाद जो अलग-अलग प्रकार के लोग थे, उन्हें सर्फ (Serf / भूदास) कहा जाता था।
तो अलग-अलग प्रकार के लोग ब्रिटेन में भी थे! ऐसे नहीं है कि यह केवल भारत में था कि कुछ लोग ऊँचे हैं। और यह भी बर्थ (जन्म) से ही था! कोई अरिस्टोक्रेट या ड्यूक की फैमिली में जन्मा है, कोई लॉर्ड की फैमिली में जन्मा है, तो कोई किसान (farmer) की फैमिली में जन्मा है, तो उसको किसान ही बने रहना पड़ता था।
तो इसी सिस्टम के लिए मैं यह पॉइंट बोलना चाहता हूँ, क्योंकि इस बर्थ-बेस्ड (birth-based) सिस्टम को जब वे इंडिया में आए, तो उन्होंने उसको भी उसी नज़र से देखा और समझा, और इसी तरीके से उन्होंने इसको डिफाइन (define) और प्रोपेगेट (propagate) किया। तो यहाँ पर भी वह बर्थ-बेस्ड कास्ट सिस्टम का और ज्यादा प्रचलन आ गया।
क्लास सिस्टम बनाम कास्ट सिस्टम (Class vs Caste System)
चेतन्याचरण प्रभु:
एक है क्लास सिस्टम (Class System) और दूसरा है कास्ट सिस्टम (Caste System)।
अभी क्लास सिस्टम जो है, वह आज के भी समाज में है। अभी क्लास सिस्टम अगर आप फ्लाइट (flight) में जाते हो, तो एक इकोनॉमी क्लास (Economy class) है, एक बिजनेस क्लास (Business class) है, एक फर्स्ट क्लास (First class) है, और उसमें फैसिलिटीज (facilities) अलग-अलग हैं। तो अभी जो क्लास सिस्टम है, वह इकोनॉमी (पैसे) के आधार पर है कि किसके पास कितना पैसा है।
पर इसके पहले जो क्लास सिस्टम था, वह बर्थ (जन्म) के आधार पर था—चाहे ब्रिटेन हो या भारत। भारत में वर्ण व्यवस्था जो थी, वह गुण और कर्म के आधार पर थी।
तो अभी एक्जैक्टली कब वर्ण व्यवस्था कास्ट सिस्टम में बदली और कितनी बदली, वह हिस्टोरिकल रिसर्च (historical research) का विषय है। So generally, unless there is very clear evidence, I don’t want to blame all the problems of India on the West. (जब तक बहुत स्पष्ट प्रमाण न हो, मैं भारत की सारी समस्याओं का दोष पश्चिम पर नहीं मढ़ना चाहता।)
इंडिया में भी यह कास्ट सिस्टम था, जन्म के अनुसार भेदभाव पहले भी था। जैसे कि हम देखते हैं, चैतन्य चरितामृत में उल्लेख आता है कि किसी ब्राह्मण पर किसी म्लेच्छ का पानी भी गिर जाएगा, तो उस ब्राह्मण की जात चली जाएगी। तो ऐसा उल्लेख था। यह प्यूरिटी (पवित्रता/शुद्धि) के अनुसार भेद था, वह था।
पर हम जानते हैं कि ब्रिटिश आने के पहले भी १४वीं, १५वीं और १६वीं शताब्दी में (विशेष रूप से इन ३ शताब्दियों में) भक्ति आंदोलन भारत में बहुत स्प्रेड (फैला) हुआ। और भक्ति आंदोलन में जो कास्ट सिस्टम था, उसका बहुत रेफ्यूटेशन (refutation / खंडन) हुआ है, उसके खिलाफ काफी कुछ कहा गया है।
तो मेरा मुख्य पॉइंट यह है कि अगर कोई कहता है कि “सनातन धर्म का मतलब यही है कि अनटचेबिलिटी और कास्ट सिस्टम”, तो ठीक है, मान लीजिए कि इतिहास में कुछ विकृतियाँ थीं, पर उनका खंडन इसी सनातन धर्म के भीतर से ही हुआ है!
तो सनातन धर्म को इराडिकेट (eradicate / समाप्त) कर देना, यह बिल्कुल न केवल गलत है, पर This is horrible and despicable! (यह अत्यंत घृणास्पद और भयानक सोच है!)
व्यावहारिक समाधान और निष्कर्षण
इशचर गौरांग प्रभु:
यह आपने बहुत अच्छे से क्लैरिफाई (clarify) किया प्रभु! मुझे एटलीस्ट (at least) बहुत अच्छे से समझ में आ गया, और आई होप (I hope) जो पॉडकास्ट देख रहे होंगे, उनको भी समझ में आ गया होगा कि एक्जैक्टली अनटचेबिलिटी या कास्ट सिस्टम का हमारे शास्त्रों में कोई रेफरेंस नहीं है, और यह कहाँ से और कैसे आया।
लेकिन प्रभु, एक नॉर्मल (normal) इंसान किस तरह से इस चीज़ पर क्या रिएक्शन (reaction) होना चाहिए? क्योंकि मुझे नहीं लगता पॉलिटिशियंस (politicians / राजनेता) इंटरेस्टेड हैं यह जानने में कि सही क्या है। मुझे तो लगता है कि बल्कि शायद वे जानते हैं, लेकिन वे अपने स्वार्थ की दृष्टि से देखते हैं। तो प्रैक्टिकली (practically) क्या सॉल्यूशन (solution) है इस चीज़ का?
चेतन्याचरण प्रभु:
देखिए, तीन शब्द हैं: Expel, Explain, Expose!
- Expel (बाहर निकालना): जो कास्ट बेस्ड डिस्क्रिमिनेशन (जाति-आधारित भेदभाव) है या अनटचेबिलिटी है, इसको आजकल के कोई भी धर्मगुरु स्वीकार नहीं कर रहे हैं, और जहाँ कहीं प्रचलित है, उसका खंडन कर रहे हैं।
अभी हाल ही में मैं हैदराबाद गया था, वहाँ पर ‘टैंपल ऑफ इक्वेलिटी’ (Temple of Equality) बनाया गया है—रामानुजाचार्य जी का। रामानुजाचार्य श्री संप्रदाय के महान संत थे, और उन्होंने किस तरह से जाति पद्धति का खंडन किया और शास्त्रों के आधार पर भक्ति में सबको समानता का अधिकार दिया!
भगवद्गीता (९.३२) में भगवान् स्पष्ट कहते हैं:
मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः ।
स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम् ॥
भगवान् कहते हैं कि जो मेरी शरण लेता है, वह चाहे किसी भी कुल या योनि में जन्मा हो, उसका उद्धार हो जाता है! तो इस भ्रांत धारणा को हमें आज के समाज से Expel (समाप्त) कर देना चाहिए। श्रील प्रभुपाद जी ने पाश्चात्य देशों में जाकर उन लोगों को भी (जिन्हें वर्ण व्यवस्था से बाहर माना जाता था) न केवल स्वीकार किया, बल्कि उन्हें ब्राह्मण और गुरु बनने की पात्रता दी!
- Explain (व्याख्या करना): जो चौथा लेवल मैंने बताया था—Spiritual Knowledge (आध्यात्मिक ज्ञान)। अगर हम आध्यात्मिक ज्ञान का और प्रचार करते हैं, उसको और समझते और समझाते हैं, तो यह जो भेदभाव है, वह अपने आप समाप्त हो जाएगा!
जैसे अगर हम सिद्ध कर देते हैं कि 3 + 5 = 8 होता है, तो वह ९ नहीं है, ७ नहीं है, ११ नहीं है—यह अपने आप स्पष्ट हो जाता है। तो अगर हम सही ज्ञान को Explain करते हैं, तो बाकी भ्रांत धारणाएँ अपने आप दूर हो जाती हैं।
इस्कॉन ने अभी ‘ट्राइबल केयर मिनिस्ट्री’ (Tribal Care Ministry) चालू की है, जो अलग-अलग आदिवासी (tribal) क्षेत्रों में जाकर लोगों को भक्ति से जोड़ रही है और उन्हें आध्यात्मिक स्तर पर उठा रही है।
- Expose (उजागर करना): कुछ लोग ऐसे होते हैं जिनके स्वार्थी उद्देश्य होते हैं (जैसे वोट-बैंक पॉलिटिक्स), उन्हें Expose करना ज़रूरी है!
आज भारत में अगर जातिवाद जीवित है, तो वह मुख्य रूप से वोट-बैंक पॉलिटिक्स (Vote-bank politics) के कारण है।
मैरिज (विवाह) में लोग थोड़ा जाति का ध्यान रखते हैं, पर वह डिस्क्रिमिनेशन (discrimination) नहीं है, वह सेलेक्शन (selection) है! विवाह में लोग कल्चरल कॉम्पैटिबिलिटी (cultural compatibility / सांस्कृतिक तालमेल) देखते हैं कि रीतियों से लड़की पहले से परिचित हो। वह कोई दमन या भेदभाव नहीं है।
पर पॉलिटिक्स में क्या होता है? राजनेता सोचते हैं कि “मैं इस जाति का हूँ, मुझे इस जाति का वोट मिलने वाला है, तो मैं इसको फेवर (favor) करूँगा।”
और जो लेफ्ट आइडियोलॉजी (Leftist ideology) है, वह क्या कहती है? “The way to end past discrimination is present discrimination!” (अतीत के भेदभाव को खत्म करने का तरीका है—वर्तमान में भेदभाव करना!) वे कहते हैं कि अतीत में जिन जातियों के साथ भेदभाव हुआ है, अब वर्तमान में ऊँची जातियों के साथ भेदभाव करो!
ठीक है, अगर किसी गरीब व्यक्ति को मदद चाहिए, तो आप उसे शिक्षा और नौकरी की सुविधा दो, पर वे कहते हैं—”नहीं, हमें गरीबी के आधार पर नहीं, बर्थ (जन्म) के आधार पर आरक्षण चाहिए!” तो यह जो प्रेजेंट डिस्क्रिमिनेशन आ रहा है, यह उन लोगों से आ रहा है जो सनातन धर्म की निंदा करते हैं।
तो अगर किसी चीज़ को समाप्त करना है, तो इस भेदभाव को बनाए रखने वाली सोच को समाप्त करना चाहिए!
सनातन धर्म में अंततः यही बताया गया है कि हर एक व्यक्ति आत्मा है।
ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः ।
आत्मा के स्तर पर हर एक व्यक्ति भगवान् का सनातन अंश है।
भगवद्गीता के पाँचवें अध्याय के १८वें श्लोक में भगवान् कहते हैं:
विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि ।
शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः ॥
जो वास्तव में ज्ञानी/पंडित है, वह विद्यायुक्त ब्राह्मण, गाय, हाथी, कुत्ते और चांडाल—सब में एक ही समान आत्मा को देखता है (समदर्शिनः)।
तो अगर कोई सही में भेदभाव का अंत करना चाहता है, तो सनातन धर्म को प्रस्थापित करो! सनातन धर्म के आध्यात्मिक ज्ञान से ही संपूर्ण भेदभाव का अंत संभव है।
इशचर गौरांग प्रभु:
बहुत-बहुत धन्यवाद चेतन्याचरण प्रभु जी! आपसे बात करके हमेशा बहुत सीखने को मिलता है। दर्शकों से अनुरोध है कि प्रभु जी का अपना एक बहुत बेहतरीन चैनल है जहाँ वे सोशल इश्यूज, स्पिरिचुअलिटी और शास्त्रों की सही अंडरस्टैंडिंग पर लगातार बात करते हैं। आप डिस्क्रिप्शन और कमेंट सेक्शन में दिए गए लिंक से प्रभु जी के चैनल को ज़रूर देखें। थैंक यू सो मच प्रभु जी! हरे कृष्णा!
चेतन्याचरण प्रभु:
हरे कृष्णा! थैंक यू वेरी मच!