Gajendra Moksha Katha 2 – Deviated spiritualists may lose the human body but not their spiritual attraction – Hindi
[Bhagavatam class at ISKCON Belgaum, India]
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Lecture Summary
- भगवान का आश्रय: आश्रय का अर्थ है अपनी चेतना को भगवान में लगाना। भागवत का मूल सिद्धांत है कि भगवान न केवल सर्वश्रेष्ट हैं, बल्कि वे समस्त जीवों के अस्तित्व का आधार हैं। प्रह्लाद महाराज के उदाहरण से यह समझाया गया है कि भगवान हमारे प्रतिस्पर्धी नहीं, बल्कि हमारी शक्ति के स्रोत हैं।
- आत्मा और चेतना का स्रोत: हर आत्मा में चेतना (सत्, चित्, आनंद) है, लेकिन यह चेतना भगवान पर निर्भर है। जैसे आंखें होने पर भी देखने के लिए रोशनी (सूर्य या अन्य स्रोत) की आवश्यकता होती है, उसी तरह हमारे ज्ञान का स्रोत भी भगवान ही हैं।
- जीवों में आत्मा की समानता: आत्मा सभी जीवों में एक समान है, चाहे वह मानव हो या जानवर। मुख्य अंतर चेतना के विकास का है। मानव शरीर ही वह माध्यम है जहाँ हम आध्यात्मिक जिज्ञासा (‘अथातो ब्रह्मजिज्ञासा’) कर सकते हैं।
- भक्ति और पुनर्जन्म: आध्यात्मिक प्रगति कभी नष्ट नहीं होती। यदि कोई व्यक्ति भक्ति के मार्ग पर चलता है और वह पूर्ण नहीं होती, तो अगले जन्म में उसे पुनः उपयुक्त वातावरण मिलता है। गजेंद्र को हाथी का शरीर मिलने के बावजूद उनकी पूर्व भक्ति जाग्रत हो गई, जिससे वे संकट के समय भगवान की स्तुति कर सके।
- कर्म और प्रतिक्रिया: भौतिक कार्यों की भौतिक प्रतिक्रिया होती है (जैसे पाप-पुण्य), लेकिन आध्यात्मिक स्तर पर की गई भक्ति का ‘रास’ कभी नहीं होता। जानवर आमतौर पर आत्मघाती नहीं होते, इसलिए उनके शरीर में चेतना का विकास धीमा होता है, लेकिन आध्यात्मिक चेतना बनी रहती है।
- प्रभुपाद के उपदेशों का संदर्भ: व्याख्यान में यह स्पष्ट किया गया कि प्रभुपाद जी के वचनों को उनके संदर्भ (Context) के साथ समझना चाहिए। एक ही सिद्धांत को अलग-अलग परिस्थितियों में अलग तरह से समझाया गया है। हमें शास्त्रों के शाश्वत संदेश और तत्कालीन परिस्थितियों के निर्देशों के बीच अंतर समझना चाहिए।
Full Transcription
श्री कृष्ण का आश्रय और गजेंद्र की प्रार्थना
हरे कृष्णा, हरे कृष्णा, हरे कृष्णा, हरे कृष्णा, हरे कृष्णा, हरे कृष्णा, हरे कृष्णा, हरे कृष्णा, हरे कृष्णा, हरे कृष्णा, हरे कृष्णा, हरे कृष्णा, हरे कृष्णा, हरे कृष्णा, हरे कृष्णा, हरे कृष्णा, हरे कृष्णा, हरे कृष्णा, हरे कृष्णा…
आश्रय ग्रहण करने का मतलब हमारी चेतना को उनमें लगाना है और भागवत में संपूर्ण भाव यह है कि किस तरह से भगवान का आश्रय ग्रहण करना है और कभी भगवान का आश्रय शारीरिक स्तर पर भी संकट में मिलता है, पर प्रधान भाव भागवत का जो है, वो चेतना जब भगवान में लग जाती है, वो है जो आश्रय परीक्षित महाराज को मिलता है और वो भागवत का मूल सिद्धांत है।
कई कहानियों में पुनर्जन्म का उल्लेख आता है और इस कहानी में बताया गया है कि किस तरह से पुनर्जन्म के आधार पर गजेंद्र को स्मृति हुई। “पूर्वं जन्म्यनुशिक्षितम्” – इस अध्याय के पहले श्लोक में बताया गया है कि पिछले जन्म का जो सीखा था, उसके लिए स्मृति हुई, तो अभी वहां से गजेंद्र प्रार्थना करना शुरू करते हैं। तो उनमें से आज की एक महत्वपूर्ण प्रार्थना के बारे में चर्चा कर रहे हैं। वो बता रहे हैं कि किस तरह से हमारा भगवान से संबंध है, खास करके ज्ञान के स्तर पर क्या है कि कई लोग सोचते हैं, “अरे, शिव, सौरक, भगवान और ये एक टरवासे साहिब समझ हैं” जिनमें जीवात्मा हैं, कहीं-कहीं हैं, उनसे बड़े देवता हैं, सर्वश्रेष्ट में जो हैं, वहां भगवान हैं।
पर यह जो पूर्ण समझ नहीं है भगवान की। God is not just the best of all beings. He is the basis of all being. भगवान सब जीवों में श्रेष्ठ नहीं है केवल, वे सब जीवों के अस्तित्वों के आधार हैं। अभी सब जीवों में श्रेष्ठ अगर भी बोलते हैं, तो अभी ऐसे हो सकता है कि विश्व में एक देश है, उसमें अमेरिका श्रेष्ठ देश है या टेनिस में अलग-अलग प्लेयर हैं, उनमें से कोई एक प्लेयर नंबर वन है, तो अभी जिसे विश्व की आर्थिक या राज्यती पॉलिसी बदल जाएगी और शायद चाइना वर्ल्ड नंबर वन बन सकता है, टेनिस में कोई अच्छा प्लेयर और अच्छा खेलने लगेगा, तो वो नंबर वन बन जाएगा। तो अगर हम समझेंगे कि ऐसे जीवों की एक श्रृंखला है, उनमें सर्वश्रेष्ठ भगवान है, तो फिर ऐसे संकल्पना हो सकती है कि कोई और शक्ति प्राप्त कर लेगा, तो वो भगवान बन जाएगा।
तो वैसे नहीं है कि भगवान सब जीवों में सर्वश्रेष्ठ है, पर केवल वो इतना ही नहीं है, उनका स्तर जीवों में जो शक्ति है, सबकी शक्ति भगवान से आती है। और यहीं प्रह्लाद महाराज हिरण्यकशिपु को बताते हैं। जब हिरण्यकशिपु सोचते हैं, “तुम्हारी शक्ति कहां से आ रही है?” तो जो जवाब देते हैं, वो केवल उद्धंडता नहीं है, “मेरी शक्ति वहीं से आ रही है, जहां से तुम्हारी शक्ति आ रही है, जहां से तुम्हारी शक्ति की शक्ति भी आ रही है। तुम्हारी शक्ति कहां से? ब्रह्मा से आ रही है? उनकी शक्ति भी कहां से आ रही है? भगवान से आ रही है।”
तो वो जो प्रह्लाद is trying to change Hiranyakashyapu’s conception of Vishnu from a competitor to the basis. भगवान आपके प्रतिस्पर्ड्री नहीं है, वो जो कि “मैं तपस्या कर लूँगा, शक्ति प्राप्त कर लूँगा, मैं विष्णु का वध कर दूँगा, फिर मैं सर्वश्रेष्ठ बन जाऊंगा” यह उसकी संकल्पना है। तो भगवान आप बता रहे हैं कि ऐसे नहीं है। तुम्हारी शक्ति, तुम ब्रह्मांड से शक्ति प्राप्त कर के आते हो, ब्रह्माजी की शक्ति भी विष्णु से आ रही है। तो ठीक उस अंडरस्टैंडिंग से, हम जो समझते हैं, हम पताए जाए हमारी सबकी बुद्धि, वो भी भगवान से आ रही है।
आत्मा और चेतना का स्रोत
तो आत्म प्रतिपायन्मगिरान्। अगर हमें पताए जाए, आत्मा प्रतिपद विदानत्व संदर्भ में, आत्मा जो सोह्यं ज्योतिमान होता है। हर आत्मा में चेतना की शक्ति होती ही है। हर आत्मा जो है, सत्, चित्, आनंद है। चित्त मतलब अंत में चेतना की शक्ति होगी। पर तो चेतना की शक्ति आत्मा जरिए है, फिर भी चेतना की शक्ति भगवान पर है। जो भी हम देखते हैं, जो भी हम जानते हैं, वह भगवान के कारण जानते हैं। जैसे कि हमारी दृष्टि है, हमारी आंखें जब खुली होंगी, तो हम देख सकते हैं, पर केवल हमारी आंखें खुली होना यह पर्याप्त नहीं है देखने के लिए।
हमारे आंखें खुली होने के साथ-साथ न रोशनी होंगी बहुत और जो भी रोशनी आती है वो अलग-अलग सोर्सेज के साथ कर सकती है, कोई लाइट हो सकता है, कोई दीया हो सकता है, सूरज हो सकता है, पर जो भी अलग सोर्सेज होते हैं, वो कहां से आ रहे हैं? रोशनी सूरज से आ रही है। और सूरज की रोशनी भी भगवान से आ रही है। यदादित्यगतं तेजो जगत भासयतेऽखिलम्। यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम्। भगवत गीता के पंद्रहवें अध्याय के बारहवें श्लोक में भगवान बताते हैं कि सब की जो रोशनी है, वो मुझ से आ रही हैं।
तो जो भाव है कि सारा अस्तित्व जो है, वो भगवान पे आधारित है। न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम्। न अंतोऽस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां परन्तप। एष तूद्देशतः प्रोक्तो विभूतेर्विस्तरो मया। यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा। तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसंभवम्। अथवा कैतज्ञैर्तेन किम् ज्ञातेन तवार्जुन। विष्टभ्याहमिदम् कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत्। दसवें अध्याय के इकतालीस श्लोकों में वहां बोलते हैं कि सब चीजों का मैं बीज हूं, सारे अस्तित्व का, और उसके साथ सार, किसी भी चीज का अस्तित्व मेरे बिना नहीं हो सकता।
तो यहां भगवान बता रहे हैं, यह श्लोकतात है, अभी गजेंद्र को बुद्धियां आ गई हैं। गजेंद्र को भगवान से कैसे प्रार्थना करनी है, क्या प्रार्थना करनी है, ये बुद्धियां कहां से आईं? ये भगवान से आए हैं। तो आत्मप्रदीपाय, जो आत्मा है, उसके पास जानने की शक्ति है, पर जानने की शक्ति भी भगवान पर निर्भर होती है। परिशली आत्मा स्वतंत्र रूप से कुछ ही जान सकता है।
जीवों में आत्मा और चेतना का विकास
कुछ लोग हैं कि वो सिर्फ मानवों में आत्मा है, जानवरों में आत्मा नहीं है। तो वो कहते हैं, इसलिए एक शोध है, कुछ सोचते हैं कि जानवर सर्वस्व कुछ आध्यात्म के बारे में जान नहीं सकते हैं। अभी यह वो वास्तव में जो आत्मा का लक्षण चेतन है, तो अगर चेतना है, तो आत्मा होनी चाहिए। तो जो क्रिश्चियन लोग हैं, क्रिश्चियनिति भी बड़ी विशाल है, हिंदू धर्म के लोगों के अलावा विशाल था। न केवल अलग-अलग आत्माएं हैं, पर अलग-अलग प्रकार की आत्माएं हैं। तो जानवरों में, पेड़ों में और जानियते में कहते हैं, तीन प्रकार के अलग-अलग आत्माएं हैं।
जानियत की पोह से भी जिटेटिव सोल्स असिस्ट से दाएं कि वो केवल बुद्धि होते हैं और कुछ करते नहीं हैं। जानवरों में आत्मा है और वो भावना है, इसे सेंसिटिव सोल्स कहते हैं। जो वो भावना एनकाउंटर करते हैं, पर वो कहते हैं कि सिर्फ मानवों में ऐसी आत्माएं हैं, जो रैशनल सोल्स हैं। ऐसे जो है कि बौद्धिक स्तर पर विचार कर सकते हैं। और वो कहते हैं जिन आत्माओं में the light of reason is there, जो एक बौद्धिक स्तर पर विचार धारा में आ सकते हैं, वो भगवान को जान सकते हैं।
इसलिए लोग सोचते हैं कि जो मानवी आत्माएं हैं, वही उनका जीवन विशेष है। वही आत्मान जीवन भगवान को जान सकते हैं। और जानवर हैं, या जानवर हैं या पेड़-पौधे हैं, उन में वो आत्मा जब सृष्टि होती है, जनन होता है, मृत्यु हो जाती है, वो आत्मा का विनाश हो जाता है। ऐसे उनकी परिभाषा है।
तो अभी ये पिछले क्रिश्चियनिटी के आदेश थे, पोप। तो अभी क्या है? पाश्चात्य देशों में लोग जानवरों से बहुत प्यार करते हैं। लोगों के पालतू जानवर होते हैं, पेट्स। तो क्या होता है पाश्चात्य देशों में? लोगों की विचारधारा बदली नहीं है। तो इसलिए क्या होता है, कई बार ऐसे स्त्रियां होती हैं, वो बच्चे नहीं चाहती हैं। और अभी यूरोप और अमेरिका में जो पापुलेशन ग्रोथ है, वास्तव में कम हो रहा है। उन देशों में लगभग पापुलेशन ग्रोथ जो है, 1.5, 1.6, 1.4 परसेंटेज है।
मतलब क्या है? दो व्यक्ति लगभग 1.5 व्यक्ति को निर्माण कर रहे हैं। तो इससे क्या होगा? लोगों की संख्या कम हो रही है। तो कई अमेरिकन और यूरोपियन शहरों में, तो अभी जो स्नेह करने का भाव है, वो सब में है। और खास करके स्त्री शरीर की ये विशेषता है कि वो तो निर्माण करने का भाव है। निर्माण करने का भाव है, मतलब किसी से स्नेह करके देखभाल करना। वहां जो आत्मा स्त्री शरीर में, उसकी एक स्वाभाविक, प्राकृतिक जरूरत है। तो वो बच्चों को पैदा करके उसको देखभाल नहीं करते हैं, तो क्या करते हैं? पालतू जानवर रख लेते हैं।
और वहां पे कई अमेरिकन शहरों में, अब जो ग्रामीण भाग है, अमेरिका में भी शहर है, ग्राम, सब जगहों में शहर और ग्रामीण भाग है, ग्रामीण भाग में इस विचार धारा इतनी फैली नहीं है, पर शहरों में कई जगहों पे ऐसे हो गया है कि जो पालतू जानवर हैं, कुत्ते और बिल्ली हैं, कुत्तों और बिल्लियों की लोग संख्या मानो बच्चों से ज्यादा है, तो चिल्ड्रेंस आर बीइंग रिप्लेस्ड विथ पेट्स। पालतू जानवर ये उनको बच्चों की जगहों पे लोग अपना लेते हैं, और फिर जो स्नेह दिख, परिवर्तित रूप आ गया, उसको कहते हैं डोगा। डोगा मतलब क्या? डॉग के साथ जो योगा करते हैं, उसको डोगा कहते हैं। तो आप और आपका कुत्ता दोनों साथ बैठकर योगा करो, और यहां पे डोगा टीचर्स भी होते हैं।
यहां तक कि, अरे! अमेरिकन तो बड़ा डिप्रेस हो गया है, उसको थोड़ा काउंसिल करो। हम कुछ तो काउंसिल कैसे करते हैं पता नहीं। पर क्या है, जो स्नेह जो बच्चों को दिखाना है, वहां भी जानवर को दिखा रहे हैं। तो फिर एक ऐसी स्त्री है, और जो पालतू जानवर रखती हैं, कई बार स्त्रियां रखती हैं, क्योंकि उनको कुछ तो अपने पालन-पोषण करने के भाव है, वो कहीं न कहीं तो जागृत करना है।
तो एक स्त्री ने पोप से पूछा कि वो क्रिश्चियन थी, “तो मैं स्वर्ग में जाऊंगी, तो क्या मेरा कुत्ता मेरे साथ आएगा या नहीं? तो मैं स्वर्ग में जाऊंगी, मेरे साथ कुत्ता आएगा या नहीं?” क्योंकि क्या है, उनकी संकल्पना है, आत्मा जो है, वो मानव शरीर में ही है। शाश्वत आत्मा जो है, वो मानव शरीर में ही है, तो शाश्वत जीवन केवल मानव शरीर को ही मिलेगा। तो भी क्योंकि लोगों को इतना कुत्ते से प्यार है, तो उसने अपने लोकल बिशप से पूछा, तो फिर वो केस एस्केलेट हो गया, और वो पोप तक पहुंच गया। और पोप ने कहा कि, “कुत्तों को शरीर में प्यार है, क्योंकि उसने प्यार किया है, वो तुम्हें प्यार करता है।” जो कुत्ते, जो बड़े प्रामाणिक रहे के, अपने क्रिश्चियन मालिकों के प्रति, तो उनके भी, वो भी स्वर्ग में चले जाएंगे। कैसे होगा? अगर उनकी आत्मा ऐसी है, कि जो नष्ट होने वाली है, तो क्या स्वर्ग में जाएगा? तो सिद्धांत के स्तर पर कुछ मैच नहीं हो रहा है।
यह मैं क्यों प्रसंग बता रहा हूँ? क्रिश्चियनिटी की निंदा नहीं करनी है यहां पर। उद्देश्य यह है कि जो विचारधारा है कि आत्मा केवल मानवों में है, यह कई लोगों को लॉजिकल क्वायरमायर में फंसा देती है। मतलब तर्क के स्तर पर उसको ठीक तरह से उसको बचा नहीं सकते हैं, फंस जाते हैं लोग इस तरफ में।
जीवों और मनुष्यों में आत्मा की एकरूपता
तो ये क्या है? वास्तव में ऐसे नहीं है कि जानवरों में आत्मा नहीं है। जानवरों में भी आत्मा है। तो डिफरेंस बिटवीन सोल्स इन ह्युमन बॉडीज एंड एनिमल बॉडीज इज नॉट ऑफ नेचर, बट ऑफ डिग्री। ऐसे नहीं है कि मानव में एक प्रकार का आत्मा है और जानवरों में दूसरे प्रकार का आत्मा है। एक ही प्रकार का आत्मा सब में है, पर वो जो आत्मा की चेतना किस हद तक विकसित हुई है, वो अलग है।
तो भगवद्गीता के अट्ठारहवें अध्याय में भगवान बताते हैं बीसवें श्लोक में— सर्वभूतेषु येनैकमभावमव्यमीक्षते। अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम्॥
वह बताते हैं कि जो सत्वगुण में व्यक्ति होता है, सत्वगुण में ज्ञान की क्या परिभाषा है? वो सब जीवों को देखता है, पर केवल जीवों के शरीरों को नहीं देखता है। सर्वभूतेषु येनैकम। सब भूतों में, सब जीवों में एक, एक चीज देखता है, क्या एक चीज देखता है? भावमव्यमीक्षते। शरीर नश्वर है, पर शरीर के परे कुछ एक अव्यय भाव है, कुछ आध्यात्मिक तत्व है, जो समान है।
अविभक्तं विभक्तेषु। शरीर के रूप में बहुत से अलग-अलग विभाजन हैं। मैं पुरुष हूं, ये स्त्री है, मैं भारतीय हूं, ये पाकिस्तानी है, मैं सफेद हूं, ये काला है। मैं छोटा हूं, ये ऊंचा है। ऐसे अलग-अलग भेद हो सकते हैं। मैं मानव हूं, ये जानवर, इतने भेद हो सकते हैं, पर अविभक्तं विभक्तेषु। यह सब भेदों के परे जो समान देखते हैं, वो कहते हैं तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम्। वो जो ज्ञान है, सात्विक ज्ञान है।
तो अभी जानवरों में और मानवों में फर्क क्या है? एक ही प्रकार के आत्मा है, पर वो आत्मा की चेतना का अलग-अलग प्रमाण से विकास हुआ है। तो मानव और जानवरों में आत्मा के स्वभाव में फर्क नहीं है, आत्मा के प्रकार में फर्क नहीं है, आत्मा के चेतना के विकास में फर्क है। तो जो आत्मा की चेतना कम विकसित होती है, तो फिर वहां साधारणतया आध्यात्मिक चीजों के बारे में विचार नहीं कर सकते हैं।
मानव शरीर का यह सुविधा है कि वह आध्यात्मिक तत्व का चिंतन कर सकता है। भागवत के ग्यारहवें स्कंध में वर्णन आता है कि भगवान ने जब संपूर्ण सृष्टि पूरी कर ली, उसके बाद में, जब उन्होंने मानव की सृष्टि की, तब यह संतुष्ट हो गए। क्योंकि मानव जो है, सृष्टि के उद्देश्य को पूर्ण कर सकते हैं। बाकी सारे जो जीव हैं, वो जीते हैं, वो संघर्ष करते हैं और उनकी फिर मुक्ति हो जाती है।
जो एक ज्ञानी थे डार्विन, उसने सिद्धांत प्रतिपादित किया कि सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट, कि जो सबसे तंदुरुस्त हैं, वही जिएंगे। तो प्रभुपाद जी ने इसका खंडन किया था कि इवन द फिटेस्ट की सर्वाइवल नहीं है। कितना भी तंदुरुस्त कोई हो, जीता नहीं है। सबकी मुक्ति भी होती है। एक तुलनात्मक रूप पे जो अधिक तंदुरुस्त हैं, वो ज्यादा समय तक जिएंगे, पर अंत में सबकी मुक्ति होती है।
तो जो जानवर शरीरों में हैं, वो आत्मा जीता है, संघर्ष करता है और तो मुक्ति हो जाती है। मानव जीवन में भी ऐसे ही होता है, पर मानव जीवन में इस संघर्ष का उद्देश्य क्या है, यह साधारणतया व्यक्ति समझ सकता है, अगर चाहे तो। इसलिए शास्त्र में बताया गया है— अथातो ब्रह्मजिज्ञासा। अभी मानव जीवन आपको मिल गया है, तो ब्रह्मजिज्ञासा, आध्यात्म का विचार करो। भौतिक चीजों के विचार में मत फंसाओ। बहुत जरूरत करना पड़ेगा, पर उसमें फंसना नहीं है। वो इसको जीवन का उद्देश्य नहीं बनाना है।
भौतिकवादी दृष्टिकोण बनाम आध्यात्मिक जीवन
भक्तिविनोद ठाकुर, जो हमारे कृष्ण चैतन्य महाप्रभु आंदोलन के प्रधान आचार्य हैं, वो कहते हैं कि कौन सा धर्म भौतिकवादी है और कौन सा धर्म आध्यात्मिक है। सब धर्म कहते हैं कि भगवान है, सब धर्म कहते हैं कि भगवान के धाम में जाकर हमको जीना है। यह सब अच्छा है, पर व्यावहारिक रूप पे जब तक लोग सोचते हैं कि यही जीवन सर्वस्व है, तो उनकी विचारधारा कुछ भी हो, उनका तत्वज्ञान कुछ भी हो, वो प्रैक्टिकली मटेरियलिस्ट्स हैं। जब तक हम सोचते हैं कि यही जीवन सब कुछ है, तब तक हम भौतिकवादी हैं।
भले ही हम बोलें कि मैं आत्मा में विश्वास करता हूं, भगवान में विश्वास करता हूं, वो भी स्वर्ग में जाना है, पर अगर हम सोच रहे हैं, हमारी सारी विचारधारा, हमारे सारे कैलकुलेशंस, हमारे सारे तर्क, जो हम करते हैं, हमें यह करना है, यह नहीं करना है, अगर हम इस विचार से कर रहे हैं, कि इस जीवन में मुझे क्या फायदा होने वाला है, तो अगर इस जीवन के फायदा और नुकसान से ही हम सब कुछ विचारधारा कर रहे हैं, तो हम व्यावहारिक स्तर पर भौतिकवादी हैं, भले ही हम आध्यात्म के बारे में कितनी भी बातचीत करें।
तो इसलिए यहां तो बताया गया है कि अभी जो मानव जीवन में हम समझ सकते हैं, कैसे आध्यात्म का उद्देश्य क्या है, शाश्वत कैसे प्राप्त करना है, तो यह ज्ञान मानव जीवन में कहां से आता है? एक तरह से आत्मा में यह हमेशा क्षमता होती है, पर यह क्षमता भगवान की कृपा से होती है, यह हमें बताया गया है— नमात्मदीपाय साक्षिणे परमात्मने।
तो जो भगवान आत्मा को देखने की, समझने की बुद्धि देते हैं, वो भगवान क्या है? साक्षिणे, वो सब जीवों के हृदय में हैं, साक्षी के रूप में, और वो देखते हैं हमारी इच्छा क्या है। अगर हमारी इच्छा है भगवान की भक्ति करने की, बहिरंग विदूराय मनसः चेतसामपि, तो भी जो भगवान है, वो हमें ज्ञान देते हैं, पर वो हमारे ज्ञान के परे हैं। God is the giver of our knowledge, but he is beyond our knowledge. उनसे हम वो ज्ञान प्राप्त करते हैं, नो धाय, पर फिर भी वो हमारे ज्ञान के परे हैं। मनसः चेतसामपि, हमारी चेतना जो है, बहिरंग विदूराय, कभी-कभी हम वाणी से समझने का प्रयास करते हैं, मन के स्मरण से समझने का प्रयास करते हैं, बुद्धि के स्तर पर विचार करके समझने का प्रयास करते हैं, तो इन सब से हम भगवान को नहीं समझ सकते हैं।
अभी भगवान को नहीं समझ सकते हैं, इसका मतलब यह नहीं है कि भगवान को बिल्कुल नहीं समझ सकते हैं। भगवान को नहीं समझ सकते हैं, मतलब एक अर्थ है कि जितनी हमारी क्षमता है, उससे भगवान को समझने का प्रयास करते हैं, पर उसके परे भगवान बहुत बड़े हैं। भगवान को कभी हम किसी संकीर्ण शास्त्र के दायरे में उनको नहीं फंसा सकते हैं। अभी हमने भगवान को समझ लिया… नहीं! ऐसे नहीं होगा। हम काफी हद तक… प्रभुपाद जी कहते हैं कि हम उतना भगवान को समझ सकते हैं जिस से कि हम उनके प्रति भक्ति कर सकें, जिस से कि हम प्रेम कर सकते हैं, पर हमको पूर्णतः आप्त भी कह सकते हैं।
भगवान ही सब चीजों के स्रोत हैं
कैसे भगवान को हम न समझें? यह दसवें अध्याय के चतुश्लोकी भागवत में, भगवद्गीता के निर्देश सुंदर रूप में बताया गया है। सुंदर रूप से चतुश्लोकी भगवद्गीता है— अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते। इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः॥
भगवान कहते हैं कि जो समझता है, मुझे क्या, किस भाव है? अहं सर्वस्य प्रभवो, कि सब चीजें मुझसे आ रही हैं, मैं, आप, दुनिया, सब कुछ भगवान से आ रहे हैं। अहं मत्तः सर्वस्य प्रभवो, मत्तः सर्वं प्रवर्तते। और ऐसे नहीं है कि सिर्फ मुझसे आ रही है और अभी मेरा कुछ काम नहीं है, अब मैं भी उनका अभी भी संभाल रहा हूं, जो इससे समझता है, भजन्ते मां, वो मेरा भजन करने लगता है, वो मेरा भक्त बन जाता है, भावसमन्विताः पूरे हृदय के साथ।
क्योंकि वो क्या बन गया है? बुधा, बुद्धिमान बन गया है, जो समझता है कि मैं सब जीवों का स्रोत हूं, इसलिए मैं ही… मतलब भगवान ही, भगवान ही सब जीवों के स्रोत होते हैं, इसलिए भगवान ही हमारे स्नेह, हमारे प्रेम, हमारे भक्ति के सर्वोच्च पात्र व्यक्ति हैं। यह समझ कर जब हम भक्ति करने लगते हैं, तो फिर क्या है वो व्यक्ति? बुधा है।
भक्ति बहुत लोग करते हैं, हर धर्म में अलग-अलग लोग से अलग-अलग पद्धति से लोग भक्ति करते हैं, पर कई लोग भावुक स्तर पर भक्ति करते हैं, तो मैंने प्रार्थना की थी और प्रार्थना पूरी होगी, कैसे? कभी वो कृष्ण मंदिर में आएंगे, किसी बाबा के मंदिर में चले जाएंगे, कहीं और चले जाएंगे, वो सोचते हैं कि कोई ना कोई है जो मैंने अगर मेरी जरूरतें पूरी कर लेगा तो मैं जाता हूं, उसकी पूजा करता हूं। तो क्या है? ऐसे भाव से वो भक्ति करता है, तो वो भावुक है।
पर तत्वज्ञान के स्तर में बुधा बनता है, मतलब वो समझता है कि भगवान जो है वो सब चीजों के स्रोत है, तो वो बुद्धिमान है, ज्ञानवान है। पर फिर भी अगले श्लोक में क्या बताते हैं?
मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम्। कथयन्तः च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च॥
वे कहते हैं कि मेरे भक्त, मेरी भक्ति किस तरह से करते हैं? मच्चित्ता, उनकी चेतना मुझ में लग जाती है। मद्गतप्राणा बहुत सुंदर करते हैं, इतना ही नहीं कहते हैं वो कि वो मेरे बारे में विचार करते हैं, उनका मन मुझ में लग जाता है। The thoughts of my pure devotees dwelling me, मतलब जो महान भक्त हैं, उनके मनों… उनका जो मन है, उनकी जो विचार है, उनके विचारों के लिए मैं एक घर बन गया हूं, उनके विचार मुझ में रहते हैं।
तो हम बहुत डिस्पर्सिव एक्सपीरियंस, वाइब्रेशन के केवल विचार करते हैं, पर वो विचार करते हैं, वापस कुछ और विचार करने लगते हैं। पर हम कई जगहों पर जा सकते हैं! पर जहां-जहां जाते हैं, वहां से हम घर में आ जाते हैं वापस। तो वैसे भक्त जो होते हैं, वो बहुत सी चीजों का विचार, केवल ये अकेले करने का कारण नहीं है, संग में करने का है, इसलिए बोधयन्तः परस्परम्, वे एक दूसरे से आदान-प्रदान करते हैं और इसमें बड़ा आनंद लेते हैं। कथयन्तः च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च, और इस तरह से एक दूसरे से मेरी महिमा के बारे में चर्चा करने के बारे में रमण करते हैं, बड़ा आनंद लेते हैं।
भक्तों की संगति और भगवान की असीम महिमा
पर इसमें हमारे विश्व… हम यह कोई पॉइंट देख रहे हैं ऊपर, कैसे हम हमारी बुद्धि से भगवान को समझ नहीं सकते हैं। तो यहां पे उसके लेख में क्या है? पहले भगवान ने बता दिया कि ये बुधा हो गए पिछले श्लोक में, पर अभी इस श्लोक में बता रहे हैं बोधयन्तः, बोधयन्तः च मां नित्यम्।
तो अगर वो पहले से उनको बोध हो गया है, तो अभी और बोध करने की जरूरत क्या है? पहले ही बुधा हो गए हैं वो, तो अभी बोधयन्तः कैसे हो सकता है? पहले से अगर उनको ज्ञान है कि भगवान की महिमा क्या है, तो फिर एक दूसरे से बातचीत करके और फिर वो कैसे और उनका ज्ञान कैसे बढ़ रहा है? क्योंकि क्या है? भगवान की ज्ञान की महिमा है वो असीमित है, कि जो पहले से ही ज्ञान प्राप्त कर चुके हैं, वो क्या? भगवान असीमित है, मैं इस इधर से भगवान को देख रहा हूं, तो मेरी सीमित दृष्टि से मैं भगवान की महिमा एक नहीं समझ सकता हूं।
कोई व्यक्ति इधर से देखता है, कोई व्यक्ति इधर से देखता है, वो देखते हैं भगवान की महिमा ऐसी है, व्यक्ति इधर से देखते हैं भगवान की महिमा ऐसी है, तो इस तरह से जो है हम भगवान के बारे में ज्ञान हमेशा प्राप्त कर सकते हैं। तो इसलिए क्या है कि भगवान को पूर्णतया हम कभी समझ ही सकते हैं। भगवान जो भक्त अपने बुद्धि का इस्तेमाल करता है, इसलिए नहीं करता है कि भगवान को अपनी बुद्धि से जीत ले, इसलिए इस्तेमाल करता है कि अपनी बुद्धि से भगवान की सेवा कर सके। तो अपनी बुद्धि से जितनी क्षमता है, उतने हम समझते हैं।
तो इसलिए अभी इस कहानी में विशेषता क्या है कि गजेंद्र जो है, वो एक जानवर के शरीर में है और जब कोई जानवर के शरीर में है, तो फिर उनको भले कैसे इतना साथ तत्वज्ञान याद आ गया? कैसे ऐसे-ऐसे संस्कृत के श्लोकों में प्रार्थना करने लगे? साधारणतया ये संभव नहीं है। जैसे मैं पहले बता रहा था कि जो आत्मा है, वो जानवर शरीर में आध्यात्मिक जांच नहीं कर सकती है, आध्यात्मिक जिज्ञासा नहीं कर सकती है, तो फिर यहां पर गजेंद्र जानवर के शरीर में आध्यात्मिक जिज्ञासा कैसे कर रहे हैं?
तो यह है भक्ति की महिमा कि भक्ति की शुरुआत जानवर शरीर में नहीं कर सकती है, पर भक्ति अगर पहले मानव शरीर में शुरू कर दी है, तो वो जानवर शरीर में बाद में भी बरकरार रखी जा सकती है। तो जो भगवान कहते हैं— स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्। नैहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते।
यह दूसरे अध्याय के चालीस श्लोकों में बता रहे हैं कि इस जो भक्ति की संपत्ति जो हम प्राप्त करते हैं, उसका कभी रास नहीं होता है, उसका कभी विनाश नहीं होता है, कभी उसका खोते नहीं है। उसका मतलब क्या है कि अगर हमारी चेतना भगवान की ओर आकर्षित हो गई है, तो फिर वो जो भगवान के प्रति जो आकर्षण है, वो हमेशा रहता है, वो कभी जाता नहीं है, हमेशा और भले ही किसी कर्म से व्यक्ति जानवर शरीर में चला जाए, तो भी वो आध्यात्मिक आकर्षण जो है, वो रहता है।
आध्यात्मिक प्रगति और पुनर्जन्म
अभी भगवद्गीता में जो व्यक्ति भक्ति करता है, उसकी क्या गति होती है? अगर आध्यात्मिक प्रगति करता है, पूर्णता नहीं प्राप्त होती है, उसकी क्या गति होती है? उसके बारे में दो परिणाम बताए। एक बताया है जो अर्जुन पूछते हैं कि अगर अयथेषु श्रद्धायुपे तो योगचलितमानसा अप्राप्त योगसंसिद्धिं कां कृष्ण गच्छति? वो पूछते हैं कि क्या गति प्राप्त होती है, वावती जो योग में पूर्णता नहीं प्राप्त करते हैं?
सबसे पहले भगवान जवाब में आश्वासन देते हैं कि पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते। न हि कल्याणकृत्कश्चिद्दुर्गतिं तात गच्छति॥ वो कहते हैं, “हे पार्थ, ने तुम आश्वस्त रहो कि अगर कोई कल्याणकृत् कार्य करता है, कोई आध्यात्मिक दिशा में प्रगति करने का प्रयास करता है, उसका कभी विनाश नहीं होगा।” यह चालीसवें श्लोक में भगवान बोलते हैं।
फिर इकतालीसवें और बयालीसवें श्लोक में दो प्रयास बताते हैं। अगर किसी ने थोड़ी सी भक्ति की है और फिर वो पूरा नहीं किया है भक्ति में, पर बहुत सी भौतिक इच्छाएं हैं, वो उनका पूरा करना है, तो भौतिक इच्छाएं पूरा करने के लिए उसको स्वर्ग में जाने का मौका थी और स्वर्ग में जाके वो इच्छाएं पूरी करने के बाद फिर वो पुनः मानव शरीर में जन्म लेगा।
शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते। वो शुची नाम, कोई सुशील परिवार में जन्म होगा या धनवान परिवार में जन्म होगा, दोनों क्या है? अच्छी संस्कृति या अच्छी संपत्ति, ये दोनों क्या है? एक सुविधा है जिससे कि अगली जन्म वापस भक्ति कर सकें।
और किसी ने बहुत प्रगति कर ली है, तो क्या होगा? अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम्। एतद्धि दुर्लभतरं लोके जन्म यदृदृशाम्॥ फिर नहीं तो फिर बहुत प्रगति कर ली है, तो सीधा भक्त के घर में जन्म लेगा, जो धीमताम, पर किसी अंतर से आध्यात्मिक प्रगति बन गई है, वो हर एक व्यक्ति को खुद जांच करना है। पर जो इस तरह से धीमताम बन गए हैं, उनके घर में जन्म लेता है, तो क्या? बचपन से ही भक्ति के संस्कार मिल जाते हैं। अगर कोई व्यक्ति भक्ति करता है, पर भक्ति किसी कारण से पूरी नहीं करती है और आधी छोड़ देता है, तो व्यक्ति के संस्कार मिल जाते हैं।
तो उस समय अर्जुन और अधिकांश क्षत्रिय जो थे, उस समय वो पुण्य का जीवन जी रहे थे और भगवान अर्जुन को बता रहे हैं कि आप पुण्य के जीवन में मत जियो, आप भक्ति के जीवन में जाओ। पुण्य के जीवन में क्या है? मतलब हम पुण्य कर्म करते हैं और अगले जन्म में हमको अच्छे भौतिक फल प्राप्त होते हैं। भक्ति मतलब हम भगवान की सेवा करते हैं और भगवद्धाम जाने का प्रयास करते हैं।
तो भगवान ये दो संभावनाएं बता रहे हैं कि आप या तो स्वर्ग में जाओगे या एक भक्ति के घर में जन्म होगे। तो वे कब बता रहे हैं? अगर वे व्यक्ति पुण्यवान जीवन जी रहा था और फिर वो अगर भक्ति करने लगता है, पर वो भक्ति पूरी नहीं करता है और फिर पुनः एक पुण्यवान जीवन में जीने लगता है, तो फिर उसको यह प्राप्त होगा।
पर अगर व्यक्ति पहले पुण्यवान जीवन नहीं जी रहा था, पहले वो एक पापी पूर्ण जीवन जी रहा था, बहुत एक आसक्ति, बहुत एक प्रलोभन के पीछे भागने लगता है, अंदर भागता है कि देवताएं हैं और असुर हैं, दोनों इंद्र तृप्ति चाहते हैं। देवताओं के पास भी अप्सराएं हैं, ऐश्वर्य है, वो भी इंद्र तृप्ति चाहते हैं, पर फर्क क्या है? देवताएं धर्म के अनुसार में इंद्र तृप्ति चाहते हैं, असुर जो हैं, धर्म का उल्लंघन करके इंद्र तृप्ति चाहते हैं। तो अगर कोई ऐसा व्यक्ति होता है, जो भक्ति छोड़ के पाप कर्मों में लग जाता है, तो फिर भौतिक स्तर पर उसको उस पाप कर्मों का फल मिलेगा और कभी-कभी व्यक्ति को एक जानवर के शरीर में जा सकता है।
चेतना की अमरता और गजेंद्र की प्रार्थना
कोई भक्त अगर मान लीजिए आत्महत्या कर लेता है, तो कोई भक्त भी भूत बन सकता है, ये क्या है? वो एक भौतिक स्तर पर भौतिक कार्य के भौतिक प्रतिक्रिया हो गई। एक भक्त एक बार एक यात्रा को लीड कर रहे थे, तो वहां पे एक माता जी थी, अचानक वो अलग कुछ बोलने लग गई, वो स्त्री थी, लगभग पुरुष के आवाज में बोलने लग गई। तो भक्त उनको मदद कर रहे थे समझने के लिए कि उनको भूतों के कुछ आगे है, तो फिर वो जब कर रहे थे, कीर्तन कर रहे थे, उसको अलग नसीम-मंत्र वगैरह बोले, तो फिर वो अचानक क्या हो गया? वो पुरुष की आवाज में बोलने लगे कि “ये सब करने की कुछ जरूरत नहीं है, वो सब वास्तव में मायापुर यात्रा जा रहे थे”, तो वो बोले कि “जब सही मायापुर पहुंच जा रही है, मुझे भी मायापुर जाना है।”
पुरुष की आवाज में बोलने लगे कि “ये सब करने की कुछ जरूरत नहीं है, वो सब वास्तव में मायापुर जाना है।” आध्यात्मिक स्तर पर उनको एक जानवर का शरीर मिल गया, गजेंद्र बन गया। वहां है जो आध्यात्मिक स्तर पर भगवान से मिलने का आकर्षण था, वो अभी तक बचा रहा है और क्योंकि उस शरीर में थे, तो अभी ऐसे नहीं है कि कोई व्यक्ति पिछले जन्म में महान भक्त क्यों न हो, ऐसे नहीं है कि अगले जन्म में जन्म से ही स्वाभाविक रूप से अपने आप पहले से भक्ति जागृत हो जाएगी। जब भक्ति की प्रवृत्ति होती है, पर ऐसे नहीं है कि जो महान भक्त पिछले जन्म में जन्म में होगा, उसके हाथ में बीड बैग पहले से होगी, ऐसे नहीं होता है।
तो जब जन्म में होगा, तो जो शरीर है, उस शरीर की प्रवृत्ति के अनुसार व्यक्ति कार्य करता है, तो छोटा बच्चा होगा, तो होइगा उसको मां का दूध चाहिए, छोटा बच्चा अपनी-अपनी प्रवृत्ति के अनुसार होगा। पर धीरे-धीरे जैसे आध्यात्म की ओर उसको एक एक्सपोजर करा जाता है, जब आध्यात्म से संपर्क करा जाता है, तो फिर एक स्वाभाविक आकर्षण निकलते हैं वो और फिर आध्यात्म को बहुत आसानी से पकड़ सकते हैं।
तो मतलब शारीरिक स्तर पर जो प्रक्रिया स्वाभाविक होती रहती है, पर आध्यात्म मतलब कुछ और होगा कि जो सामान्य लोगों में आकर्षण नहीं है, उस आकर्षण होगा उस व्यक्ति में। तो वैसे ही गजेंद्र जानवर का शरीर मिल गया, हाथी का शरीर मिल गया, तो हाथी के जैसे ही कार्य कर रहे थे, तो स्वाभाविक थे, शरीर के जैसे कार्य करेंगे।
पर जब एक बड़ी विपत्ति आ गई, शारीरिक स्तर पर कुछ रहा नहीं, तब क्या हो गया है? तब आध्यात्मिक स्तर पर आ गए होंगे और आध्यात्मिक स्तर पर जब आ गए, तो फिर उन्होंने जो भक्ति थी, वो पुनः जागृत हो गई और उस तरह से वो भगवान के प्रति जो ज्ञान था, भगवान के प्रति भक्ति थी, उसके अनुसार वो अभी भगवान को प्रार्थनाएं अर्पण कर रहे हैं।
तो जो हमारी चेतना है, वो हमेशा भगवान के… अगर चेतना को हमने भगवान से आकर्षित कराया है, भक्ति के द्वारा, तो वो आकर्षण कभी नहीं जाता है, भले ही भौतिक स्तर पर कर्म के कारण, प्रकृति के कारण, किसी शाप के कारण कुछ भी उपद्रव आते रहे, भौतिक स्तर आते रहे, पर जो भगवान के प्रति चेतना है, वो हमेशा आकर्षण रहेगी और यह जो चेतना के आकर्षण के कारण, अगर चेतना का आकर्षण पहले से दिखेगा नहीं, पर जब उचित परिस्थिति आ जाएगी, तब वो दिख जाएगा। और दूसरे कारण जो है, गजेंद्र अभी इस तरह से सुंदर प्रार्थनाएं अर्पण कर रहा है और वो भगवान को अभी किस तरह से प्रार्थना अर्पण करते हैं?
आज हमने चर्चा की कि किस तरह गजेंद्र अपनी प्रार्थना भगवान को अर्पित कर रहे हैं। गजेंद्र भगवान को ‘आत्मदीप’ (आत्मा के प्रकाश) के रूप में संबोधित करते हैं, क्योंकि आत्मा के पास जानने की क्षमता तो है, लेकिन वह पूरी तरह भगवान पर निर्भर है। जैसे आंखें होने पर भी देखने के लिए सूर्य की रोशनी की आवश्यकता होती है, वैसे ही बुद्धि और ज्ञान के लिए भी हमें भगवान की कृपा चाहिए। भगवान केवल जीवों में सर्वश्रेष्ठ नहीं हैं, बल्कि वे समस्त अस्तित्व का आधार हैं। प्रह्लाद महाराज ने हिरण्यकशिपु को यही समझाया था कि तुम्हारी शक्ति, ब्रह्मा की शक्ति, सब भगवान से ही आती है, अतः भगवान को प्रतिस्पर्धी के रूप में नहीं, बल्कि अपना मूल आधार समझना चाहिए।
जानवरों में आत्मा, चेतना और आध्यात्मिक प्रगति
हमने इस बात पर चर्चा की कि क्या जानवरों में आत्मा होती है। कुछ धर्म और विचारधाराएं यह मानती हैं कि जानवरों में आत्मा नहीं है या केवल मनुष्यों में ही ‘तार्किक आत्मा’ (Rational Soul) होती है। पाश्चात्य देशों में बच्चों की कमी के कारण लोग जानवरों को बच्चों के विकल्प के रूप में अपना रहे हैं, जिससे यह प्रश्न उठता है कि क्या जानवर स्वर्ग जा सकते हैं।
वास्तव में, आत्मा सभी शरीरों में एक ही प्रकार की है, अंतर केवल चेतना के विकास का है। मानव शरीर में ही आध्यात्मिक जिज्ञासा (‘अथातो ब्रह्मजिज्ञासा’) संभव है। यदि कोई मनुष्य आध्यात्मिक प्रगति करता है, तो वह भक्ति नष्ट नहीं होती। मृत्यु के बाद, यदि भक्ति पूर्ण नहीं हुई है, तो व्यक्ति या तो पुण्यवान परिवार में जन्म लेगा या फिर ऐसे भक्त के घर में जहाँ उसे पुनः भक्ति का संस्कार मिले।
जानवर के शरीर में साधारणतः आध्यात्मिक जिज्ञासा संभव नहीं है, लेकिन यदि किसी ने पिछले जन्म में भक्ति की है, तो वह आध्यात्मिक आकर्षण बना रहता है। गजेंद्र के साथ यही हुआ—उन्हें हाथी का शरीर मिला, लेकिन उनकी पूर्व भक्ति के कारण, जब उन पर विपत्ति आई, तो उनकी आध्यात्मिक चेतना जागृत हो गई और उन्होंने भगवान से प्रार्थना की।
कर्म, आत्मा की गति और प्रभुपाद के उपदेशों का संदर्भ
चर्चा के दौरान यह स्पष्ट हुआ कि भौतिक स्तर पर कर्मों की प्रतिक्रिया होती है, लेकिन आध्यात्मिक स्तर पर किए गए कार्य कभी नष्ट नहीं होते। यदि कोई व्यक्ति आत्मत्या करता है या पाप कर्मों में लिप्त होता है, तो उसे उसके अनुरूप निम्न योनियाँ या भूत योनि मिल सकती है। प्रभुपाद जी के उपदेशों के संदर्भ में यह समझना महत्वपूर्ण है कि उन्होंने अलग-अलग परिस्थितियों में अलग-अलग निर्देश दिए। उनके वचनों को ‘सार्वभौमिक’ (universalize) करने के बजाय उनके पीछे के संदर्भ (context) को समझना आवश्यक है।
अंत में, भक्ति का मूल उद्देश्य भगवान के प्रति शुद्ध आकर्षण पैदा करना है। यदि हम धीरे-धीरे भी भक्ति करते हैं, तो वह हमारी चेतना को भगवान के प्रति आकर्षित करती रहती है। यह यात्रा निरंतर चलती रहती है और गजेंद्र की प्रार्थना हमें यही सिखाती है कि चाहे शरीर कोई भी हो, पूर्ण शरणागति और भगवान का स्मरण ही मुक्ति का मार्ग है।