Gajendra Moksha Katha – Hindi
Gajendra Moksha Katha 1 – Understanding how our mental impressions shape us – Hindi
Gajendra Moksha Katha 2 – Deviated spiritualists may lose the human body, but not their spiritual attraction – Hindi
Gajendra Moksha Katha 3 – Understanding when to wield control and when to yield control – Hindi
Gajendra Moksha Katha 4 – How age helps us become renounced – and how it doesn’t – Hindi
Gajendra Moksha Katha 5 – Which comes first – giving up lower taste or getting higher taste – Hindi
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संक्षिप्त सारांश
हरेगे कृष्णा जिगजेंद्र मोक्ष की कथा पे हम चर्चा कर रहे थे लिए थे चार प्रवचुनों में तो आज इसका अंतिम दिभाग में चर्चा कर रहे हैं यहाँ पे प्रार्थना हो रही है कि जिगजेंद्र कह रहे है नमो नमस्तुभ्यम असहिय वेग कि इस भूतिक जगत में जो वेग होते हैं काम क्रोध लोग के त्रविधाम नरकस्थीतं दौरं नाशिनमात्मन यह आत्मा का नाश करते हैं यह तीन वेग हैं कि यह असहिय हैं करते हैं तो यह तीन असहिय होंगे आप स्वामी हैं शक्ति त्रयाया खिलधी गुनायव और यह तीन शक्तियां जो हैं वह हमारे धी, हमारे चेतना, हमारे बुद्धी पे कारे करते।
मुख्य ट्रांसक्रिप्शन
हरेगे कृष्णा जिगजेंद्र मोक्ष की कथा पे हम चर्चा कर रहे थे लिए थे चार प्रवचुनों में तो आज इसका अंतिम दिभाग में चर्चा कर रहे हैं यहाँ पे प्रार्थना हो रही है कि जिगजेंद्र कह रहे है नमो नमस्तुभ्यम असहिय वेग कि इस भूतिक जगत में जो वेग होते हैं काम क्रोध लोग के त्रविधाम नरकस्थीतं दौरं नाशिनमात्मन यह आत्मा का नाश करते हैं यह तीन वेग हैं कि यह असहिय हैं करते हैं तो यह तीन असहिय होंगे आप स्वामी हैं शक्ति त्रयाया खिलधी गुनायव और यह तीन शक्तियां जो हैं वह हमारे धी, हमारे चेतना, हमारे बुद्धी पे कारे करते हैं और गुनायव वे बाहर तीन विशेह, जो इद्वियो के विशेह है जो तीन गुणों के आधार पर पकड़ होते हैं उनके द्वारा वो बिट्ट की जाते हैं तो ऐसे जो असहिय वेग है, उनसे कौन बचाते हैं आप गर कोई शरन लेता है, तो आप उनको बचाते हैं जो आपकी शक्ति है, उसका कोई अंत नहीं है कड़ी इंद्रियाना अनवाप्य बरतमने पर जिन्होंने अपने इंद्रियों पर नियंत्रन नहीं किया है वो आपको प्राफ नहीं कर सकते हैं तो इस श्लोक में तीन चीज़ें बताए जा रही हैं एक है कि ये भौतिक वास्तनाओं का प्रवाह जो है वेग है वो असह ही है दूसरा है कि अगर कोई भगवान के श्रेरन जाता है तो भगवान उनका इनसा भातनाओं से भी स्वग्शन करते है पर तीसरा बता रहे है जो इंद्रियों के नियंतरन में हैं, जो इंद्रियों को नियंतरन नहीं कर सकते हैं, वह भगवान को जान नहीं करते हैं. तो यहाँ पे ये सबाल उतता है, कि कैसे व्यक्ति आध्यात्मिक प्रगती अदर शुरू करता है या आगे बढ़ता है?
कई बार ऐसे कहते हैं कि हमें इंद्रियों पे अगर नियंत्रन नहीं कर रहे हैं तो हम भौतिक चेतना में पसे रहते हैं भौतिक चेतना में पसे रहेंगे तो आध्यात्मिक चेतना नहीं होती है तो फिर हम भगवान को नहीं जान सकते हैं दूसरी ओर से ये भी कहा जाता है कि जब तक आध्यात्मिक रुची नहीं आती है तब तक हम भौतिक भोग छोड़ नहीं सकते हैं क्योंंकि आत्मा जो है हमेशा सुक्ष आता है सुक्ष के बिना रह नहीं सकता है तो इसलिए परम्द्रिष्ट्वानि वर्तते बगवान कहते हैं बगवान कहते हैं कि जब हमको उचा स्वार मिलता है तो हम शांत हो जाते हैं तो फिर इसमें क्या पहले आता है तो क्या पहले हम भौतिक भोग छोड़ते हैं फिर आध्यात्मिक रुची प्राप्त करते हैं तो सबसे पहले क्या आता है शरवन शरवनं कीर्टन विश्णो समरनं पादसेवनं सारे बगती की विधी जो है उससे शिरुवात होती है शरवन से और भगवाइता में पताते हैं कि जो विक्ति छुती परायन है जो शरवन के लिए आसक्त है वह विक्ति ज़रूर भावन्धन के पाद आजा सकता जो शरवन में आसक्त रहते हैं भले यह बहुत अध्यात्मित्सी अज्ञानी भी क्योंं न हो पर अगर शरवन करते रहेगे तो फिर धीरे धीरे जो अज्ञान बड़ेगा और केवल शुर्ती परायन होने से शरवन करते रहें तो क्या हो जाएगा वह तेपि चाति तरंदेव बृत्यू वह बृत्यू के परेचार जाएगे भौस आगर के परेचार जाएगे प्रावपाजी भी अपने जो उन्होंने मार्की ने भागवत धर्म नाम का एक ग्रंथ लिखा ने ग्रंथ नहीं कविता लिखी जब वो जब उन्होंने अमेरिका का कोस्ट लाइन अमेरिका का तट पहली बार देखा तो अपना चिंतन करते हुए तो तभी भी वो बोलते है रजस्तमो गुणेरा सबाई अच्छान वासुदेव कथा रोजे नहीं से प्रसंद कि भाव मुझेले मुझे से इरस कि ये भक्ति का समझ कैसे पाएगे भागवतेर कथा से तब अवटार धीर हया शुने जदी काने बार बार नहीं कहते हैं हे प्रभो भागवत की कथा जो है ये वासुदो में आपका अवधार है और अगर कोई व्यक्ति सुनते रहेगा इसको धीर हया वो धीर हो जाएगा शुने जदी काने बारे बार।
अगर बार बार सुनते रहता है तो व्यक्ति धीज़ी वन जाता है। तो इसका मतलब क्या है कि भले कि शुरुभात में हमें रुची ना आये। तो साधारंत जिव भोती जगत में अधिकार लोग भोतिक चेतना नहीं होते हैं।
और भोतिक चेतना जग भोते हैं तो आध्यात्मिक रुची जदा नहीं होती है। तो फिर उनको ऐसे जीवात्माओं को आध्यात्मिक रुची देनी पड़ती है। उनको खुदको अपने आप नहीं आती है।
तो इसलिए विश्वान चक्र उठा कर माधुर्या कादमनी में बताते हैं कि वास्तव में जो भगवत तत्व में भगवत भक्ति में, भगवत ज्ञान में श्रद्धा होती है वो द्रोपरकार से उत्पन्न हो सकती है। एक है स्वाभाविकी और दूसरी है बलेनोतपादिता स्वाभाविकी मतलब एक अंदर से ही व्यक्ति को आकरश है, श्रद्धा है श्रद्धा शब्द का मैं थोड़ा आगरिश्टेशन करूँगा दिरे दिरे पर दूसरी जो बता रहे है क्या है बलेनोतपादिता बलेनोतपादिता मतलब कि कोई अगर बहुत महान बक्त होते है तो उनकी जो श्रद्धा होती है, उनकी जो प्रेडम मैं बरता होता होता है उनकी जो करणा होती है उसके कारण लोगों को लगना लगता है कि जुरू इसमें कुछ सत्य है।
मैं इसे जानना चाहता हूँ। तो the greatest cause of devotion is devotees and the greatest cause of atheism is theists not atheists. भक्ति में वृद्धी भक्तों के द्वारा होती है और नास्तिकता में अगर कोई बड़ जाता है तो वो भी भक्तों के कारण ही होता है वो भी धार्मिक लोग के कारण ही होता है अगर मतलब क्या होता है कि इस दुनिया में हम भगवान को नहीं देख सकते हैं और भले ही कभी-कभी हमें अनुभाव हो जाये ऐसा कई दुनिया में अमेरिका में और हमें फारतों के आ रहे है कुछ लोग कहते हैं उनको कहते है कि I am SBNR SBNR मतलब क्या spiritual but not religious मैं आध्यात्मिक हूँ पर धार्मिक नहीं हूँ क्योंं कहते हैं ऐसे है वो क्योंं कहते हैं आध्यात्म मतलब मैं कुछ अनुभाव करना चाहता हूँ कुछ देखना चाहता हूँ कुछ दुनिया के परे कुछ और है क्या मैं जानना चाहता हूँ वो उसके परती उसके परती receptivity openness उसके परती मैं अनुकूल हूँ मैं जानना चाहता हूँ तो मैं spiritual हूँ धार्मिक मतलब क्या सोचते हैं वो religious कि आप कुछ अंग शर्धा रखते हो आप कुछ बिना जाने रिति रिवाजों का पाल्म करते हो और आप दुसरे धर्मों के परती नफरत करते हो युद्ध करते हो, हिंसा करते हो तो ऐसा मुझे नहीं बनना है तो अभी जो भाव है इसमें क्या होगा है ऐसे लोग का भाव है वो सोचते है कि वास्ता मुझे आध्यात्मिक अनुभाव, आध्यात्मिक द्रुष्टी प्राप्त करनी है पर वो सोचते है धर्म ये रिति रिवाजों से प्राप्त है, संकीर्ण ये मुझे भी चाहिए है तो ऐसे लोग जब सोचते है तो वो क्योंं सोचते है अधिकार शूक से एसे लिए होता है कि उन्होंने जो धार्मिक लोग देखे है वो धार्मिक लोग जाधा आध्यात्मिक नहीं थे वो धर्म वो धर्म का एक नकाव जैसे है कुछ इतिरिवास कर रहे है बक्ति सुदाना शाकुर बोला करते है कुछ लोग विग्रहों को दिखाते है ताकि कुछ दान प्राप्त कर सके तो वो उनको विग्रह क्या है वो एक धन्ता वन गया है तो ऐसा हर धर्म में होता है जो भौतिकवाती लोग जब कुछ धर्मिक मारगों में आ जाते हैं तो फिर वो अपना भौतिकवात धर्मिक संस्थाओं में, धर्मिक मारगों में लाते हैं और फिर क्या होता है बुद्धमान लोग होते हैं, वो देखते है कि वास्टा में ये क्या है जो तुम कररे हैं बाकिदुनिया कर रिए, वो ही तोंभी कर r wears बाकिदुनिया भौतिकमाषिया हाती है भौतिकमाशिया हाती है Firebase आधार्मिक उपसे करें तो आधार्मिक उपसे कर रहे हैं।
फ़रब क्या है उसके लिए? तो इसलिए जो इन लोगों को आजकल के पाश्यात देशन में, वेस्टरनाईज लोगों में, आधार्मिक संस्थाहों में लोगों को रुची नहीं है, कोई आध्यात्मिक विखती है। ऐशे विख्ती हो, अमें उनसे संग करके लगता है कि यह वास्तम है, यह प्रगति शिलवेस्टनव है।
उनके आदांत्रतान, उनके बरताओं से, उनके प्रवचनों से, उनके कारियों से हमें आध्यात्मिक प्रेरेणा मिलती हैं। तो फिर क्या होता है वो रुद्धी होती है। तो अभी इसका मतलब नहीं है कि धार्मिक संस्था या धार्मिक रितिर्यवात्स ये बुरे हैं।
पर मैं यहां पर कहने का जोर क्या है। मारा विशय ये है कि हम भौतिक स्वाद से आध्यात्मिक स्वाद तक कैसे भोच सकते हैं। तो उसमें, मैंने कहा कि सबसे पहले श्रवन के द्वारा मैं पता चलता है कि आध्यात्मिक स्वाद कुछ है।
और फिर हम उसकी बारे में थोड़ा खोज करने लगते हैं। तो यह होता कैसे है? यह प्रधान तया भक्तों के संग से होता है।
तो अगर जो भक्त है, जो धर्म का पालं कर रहे हैं, जो आध्यात्म का ग्यां दे रहे हैं, अगर हम देखते हैं कि वास्तों में उनको आध्यात्मिक रुची है, वो आध्यात्मिक चीजों में आनंद ने रहे हैं, तो फिर हमें विश्वाल्दा की ज़रूरि यह कुछ आध्यात्मिक सत्य है, और मुझे भी इसकी खोज करने चाहिए। इसके विपरीत जो अगर आध्यात्मिक या धार्मिक लोग है, अगर वो भी भौतिक भोगी कर रहे हैं, तो फिर लोग खोजते हैं कि धर्म करने की जुरूरत क्या है, भौतिक भोगी करना है, तो मैं इसके बिना भी कर सकता हूँ। तो प्रवापाजी कहते हैं, चार पुरुशार्थ जो थे बैदी संस्कुर्ति मताये गए थे, कौनसे हैं चार पुरुशार्थ?
धर्म, अर्थ, काम, और मोक्ष. तो प्रवापाजी कहते हैं, कि आजकल के पास्चात्र संस्कुर्ति में, आजकल के पास्चात्र संस्कुर्ति में, लोगों को अर्था और काम धर्म के बिना मिल जाता है। अब इश्ठायी रूप से नहीं मिलता है, पर मिल जाता है। आप मेहनत करो, कुछ नंदा करो, नौकरी करो, वो पैसा मिल जाएगा, फिर अच्छा नहीं मिलती मिल जाएगा।
तो अब जब अर्था और काम धर्म के बिना अगर मिल जाता है, तो लोग बोलते हैं, फिर धर्म के जरुवत क्या है? धर्म के जरुवत क्या है? और अगर लोग देकते है कि दहर्मीक लोग भी अर्था और काम के ही बीचे है, तो फिर वो बोलते है कि, अगर अरथाश काम जाता है, तो फिर शूरूं अगर धर्म के बिना मिल जा है, तोह तुम्हारे धार्मिक लोगों केआधेषका पालन क्योंं करें?
तुम में जो नियम बनाये है, निटीवाज बनाहैं उसका पालन हां क्योंं करें? तुमहरे थесьे में धर्म से है씬 आपवड़ोगराये海, नार्थो अर्थायो बग्यमते महर्तस्य धर्मसे कांतस्या कामोलावताया इसमता कामस्यने हिंद्रियप्रेतिलावोजीमें तयावता जीवस्य त्तव जिवत्यासा नार्थो इसचेखरम देह। ये भागवतम के पहले स्कंथ के तुसरे अध्याय के नौवे और दस्वे शलोक हैं।
दो शलोक हैं ये और प्रवापाल जी एक बार एक प्रोफेसर थौमस हॉफकिल्स से बात कर रहे थे और तौमस आपके लिए सनका स्वामी जी आपने इतने ग्रंथ लिके हुए तो अगर आपके सारे संदेश का अगर आपको सार बोलना हो तो आप क्या बताओगे प्रवापाल जी बताओगे दो शलोक बताओगे पहले अध्याय के नौव, दूसरे अध्याय के नौव या दस्वे शलोक क्या शलोक है ये प्रवापाल जी बताओगे धर्म का उद्देश धर्मस्य या आपवरगस्य आपवरगस्य मतलब इस भोतर जिगल से परे जाना है हमें हमें आध्यात्मिक प्रगति करने है, आध्यात्मिक प्राप्ति करने है धर्म का उद्देश वो आध्यात्मिक उन्नती है, आध्यात्मिक प्राप्ति है ना अर्थो अर्था लोग कन्पते अर्था ये उद्देश नहीं है धर्म अर्था काम मोक्ष धर्म अर्था काम मोक्ष धर्म अर्था काम में व्यक्ति अधिकांश होते बहुत चेतना में रहता है और इसलिए कई जन्मों तक व्यक्ति इसमें भसा रह सकता है तो इसलिए समझना कि धर्मा का अंतिम उद्देश मोक्ष है, मोक्ष में नहीं, भक्ति में मोक्ष है वो धर्म से काम मिल जाएगा अर्था मिल सकता है पर अर्था ये धर्म का उद्देश नहीं है कैसे कोई भी हम कारे करते है उसका एक प्रड़ाक्ट होता है उसका एक बाईप्रड़ाक्ट होता है प्रड़ाक्ट मतलब जो प्रधान उससे मिल रहा है बाईप्रड़ाक्ट मतलब जो बाजू में उससे मिल जाता है कुछ हो कैसे अगर कोई भक्त बन जाता है कोई प्रचारक बन जाता है तो अभी प्रचारक बन जाने से विक्ति को आदर मिल सकता है सम्माल मिल सकता है अभी विक्ति प्रचारक इसलिए नहीं बनना चाहिए कि उसको आदर सम्माल करें विक्ति को प्रचारक इसलिए बनना है कि वह खुद भगवान के करीब जा सके और दूसरों को भगवान के करीब जाने मलत कर सके तो प्रभाष्ची बोलते है कि नमरता का मतलब यह है कि आदर प्राप्त करने की अपेक्षा से चींतित नहीं होना जाएगे मुझे कितना लोग आदर करेंगे, कितना लोग आदर करेंगे हाँ आदर करेंगे तो बड़ा संतुष्य मिलती है कब मुझे आदर करने वाले है ऐसे जो अकांशा हैती तो वो ऐसा अगर होगा तो नमरता नहीं है प्रोपाजी मुझे तो क्या है यह उधर्मी से दे रहा हूं कि कोई चीज का एक प्रधान उद्देश होता है और उससे बाजु में एक दूसरा फल भी मिल सकता है तो प्रचार करने का प्रधान उद्देश है कि हम खुद भगवान की कथा करते हैं, हम भगवान के तरीच जाये और दूसरों को भगवान के तरीच जाने में मदद करें उसके साथ साथ अगर कुछ ना सद्मान मिल भी गया तो वो हम खुद के लिए नहीं लेते, जहां तो कर सकते हैं, भगवान के लिए अर्बंग करते हैं पर वो उसका उद्देश नहीं है, तो इससे ही बता रहे हैं ना अर्थो अर्था यो गनपते उसको भगवान की सेमा में लगाना है और फिर हम सब में इच्छा तो है काम का अर्था, कई बाद हम काम ये शब्द है ये नकारात्मक भाव में लेते हैं जो शार्रिक स्थर पे इंद्रियों का आकर्षन होता है, उसको हम काम बोलते हैं पर भागवतन में काम ये शब्द नकारात्मक रूप से भी लिया है, सकारात्मक रूप से भी लिया है ऐसे बताया गया है कि युदिश्व महराज के जब राज्य था तो जब वो इतना अच्छ धर्म से राज्य कर रहे थे कि सारी पुर्थ्वी यो पुर्थ्वी के वासियों के इच्छाएं थी वो पूरी कर रहे थे।
तो कामं बवर्श पर जन्यों। इससे बता रहे थे कि यार परियाप्त मात्रां में वर्षा होती थी और इससे जो भी लोगी इच्छाएं थी वो पूरी होती थी। तो काम क्या है काम ये हमेशा नकारात्मक नहीं है।
धर्मा अर्थ काम मोक्षें इसमे काम जो है एक पुरुशार्थ है। और पुरुषा आर्था मतलब ये अच्छा है, ये बुरा नहीं है। तो काम का कुछ सकारात्मक अर्था हो सकता है, काम का नकारात्मक अर्था हो सकता है।
नो नकारात्मक कभ हो जाता है। वो नकारात्मकता हो जाता है जब वो इच्छा के प्रभाव में आकर हम भगवान को भूल जाते हैं, नैतिकता को भूल जाते हैं और आध्यात्मिक मुल्यों के खिलाव कारे करने लगते हैं मतलब वो काम की पूर्ती ही हमारे जीवन का सरोस बनजाता है और उसके लिए हम बाकी सब त्याग देते हैं तो फिर काम हमारे लिए ख़तर्णाक हो जाते हैं पर हमारी आत्मा का एक सवभाव है इच्छा करना और उसका इच्छा करनि की सवभाव लाच नहीं किये जा सकता है पेलाओं परमात होती है, जाहट सकते हैं, अन्हीं मकर कह सकते हैं जो इच्छाये है उनका हम मार नहीं सकते हम उनका इलाज करते को ठीक कर सकते वो तो भवतिक इन्दृतपटी के परलोहन की इच्छायहें उनको हम अगर ठीक करते हैं तो भगवान की सेवा भगवान की भकति उसकी इच्छानेय जागरत हो जाती हैं।
वोजब इच्छाने मिलत जाती हैं तो वो वास्तद में हमें भखति में प्रगतारी कररें आजायत कती हैं। भखति के सालausaul भखत नहीं ऐसे हम गुरु पुजा में गाते हैं गुरु मुखः पद्मवाक्या चित्तेते कर्याइक्य। जो हमारे गुरुदेवने में आदेश दिया है जो उपदेश दिया है उसको स्विकार करना यहाँ हमारी जीवन का उपदेश है अभी महान बक्ति सुदान चोठाकुर एक महान वैश्णो थे और उनकी जो शिष्य थे वे भी महान वैश्णो थे बड़े पंडित थे, बड़े समर्पित थे और उन्होंने बक्ति सुदान चोठाकुर को पूरे भारत भर में 64 मंदिर बनाने मदब कियें कभी कभी हम यह सोचते है कि बक्ति सुदान चोठाकुर के चले जाने के बाद गौरिया मठ में थोड़ा जग्ड़ा हो गया और साथ गौरिया मठ कुछ कारे नहीं कर पाया एक तरसे वो सत्य है वो that is a over simplification काफि काफि जो हुआ वो जतिल था पर इसका मतलब नहीं है कि उनकी वो शिष्य थे वो अच्छे शिष्य नहीं थे जब बक्ति सुदान चोठाकुर जीवित थे तो तभी प्रभुपाज जी या आपने उनको अपनी ग्रहस्त के जरमदारी में ज़्यादा अगेखे हो तो उनको बक्ति सुदान चोठाकुर को मदद करने में वो दिरेक्कली मदद नहीं कर पा रहे थे तो जब बक्ति सुदान चोठाकुर में लगबक 1921 से 1934 से तेरा सालों में 64 केंडर भारत में बनाये संस्ताम 1919 में वो चालो गया तो 15 सालों 15 सालों में 64 केंडर बना होना यह बहुत बड़ी बात है और यह बक्ति सुदान चोठाकुर के पिरेरना है पर उनके शिश्यों ने उनको मदद की थी उसके कारणी तो वो हुआ तो उनके शिश्यों भी महान भक्त थे पर उनके गुरुदेव के गुजर जाने के बाद कैसे एक साथ रहना है वहाँ समझ नहीं पाए उसका भी कारण है उसमें हम नहीं जाएगे पर यहाँ पर मेरा कहने का भाव यही है उद्देश है मैं पॉंट यही बोल रहा था कि बक्ति मतलब इच्छानों को त्यागना नहीं है भक्ति का भाव है इच्छानों को लेना तो क्या हो गया जब यह भक्ति संस्थाकुर गुजर गए और फिर सारे गौडिया मठ के निताओं में थोड़े जगड़े होने लगे तो अन सबने सोचा कि हमने जो हमारा मठ बनाया है उसको बरकरा रखे जो लोग यहाँ पे आये उनको प्रचार करेंगे और बहुत से भक्त जो विरक्त हो गए संस्था बनाते हैं जगड़े होते हैं सब छोड़ दो गए हम से भगवान की भक्ति करेंगे पर आप अपनी भक्ति करते रहें प्रामायंता से बहुत से भक्ते पर प्रभुबाद जी की विशेश्था क्या थी प्रभुबाद जी ने उनके गुरुदेव में जो आदेश दिया था वो आदेश को कि पास्चार देशों में जाकर प्रचार करो उस आदेश को अपने जीवन का ड्राइविंग फोर्स बना दिया अपने जीवन को आगे चलाने के लिए वो उनके अपनी प्रधान इच्छा होना था तो प्रभुबाद वो अच्छरी में क्या कर रहे हैं भी वो कैसे हमारे घर में, चोटा सा घर था उनका तो प्रभुबाद के लिए जब उनके घर में थे तो पहले 5-6 दिन तक उनके घर के कोच पे प्रभुबाद के लिए सोए फिर बाद में वो बोल रहे के तो बाद में उनको लाकि ये सही नहीं है स्वामि जी ये विर्द दे कैसे तो उनने एक दुसरा एक रूम लिया तो प्रभुबाद जी उस रूम में रहते थे और उस रूम में कुछ भी नहीं था एक केवल एक कमरा था और एक बाद में बातरूम था तो वहाँ पर रहते थे और फिर सबगे उठ के प्रभुबाद जी यहां पर आते थे यहां पर किचन था, यहां पर कुकिंग करते थे तो सब कुछ प्रभुबाद जी को खुद करना पड़ा और फिर जब वो प्रचार करने लग गये तो खुद ही कहा प्रचार करना है कमरा लेना, जगा लेना, उसके लिए पैसे प्राप्त करना फिर अगर कोई लोग आने वाले है तो उनको बुलाना वो कहते है कि अगर मैं सोचता हूँ मैं इस चीज का विचार नहीं करूँगा तो कैसे अगर मैं बोलूगा मन और शरीब में फ़रक ही है अगर मैं बोलूगा मैं इसको चूँगा नहीं तो मैं सोचता हूँ ये मेरे से दूर है पर अगर मैं सोचता हूँ मैं विचार नहीं करूँगा इसके बारे में तो वो न करन उस चीज के बारे में विचार नहीं करूँगा इस विचार में भी उस चीज का विचार है ही You getting this?
मैं जब बोलता हूँ जब हम बोलते हैं कि मैं इस चीज का विचार नहीं करूँगा अगर मैं बोलता हूँ कि मैं एकादशी को खाने का विचार नहीं करूँगा ठीक है पर मैं खाने का विचार नहीं करूँगा उसमें खाने का विचार आ गया है अपने आप तो ये शुरुवात हो सकते हैं मैं खाने का विचार नहीं करूँगा पर उसके बाग में क्या है मुझे कुछ और चीज का विचार करना है और उर्फ विचार में जब मैं लग जाता हूँ तो फिर ये खाने का विचार बाहर निकल जाएगा तो विचार नहीं जाएगा विचार नहीं जाएगा मतलब हमारे मन को जब हम भगवान की स्मर्ण से भगवान की सेवा की इच्छाओं से भर देते हैं तो बाकी इच्छाएं बाहर चल जाती है तो प्रहुपाजी की इच्छा क्या थी कि वो अपने चेतना को इतने सारी इच्छाओं से भर दिया था तो जब ये हैंगरील प्रहुपाजी से मिले और प्रहुपाजी की फुरी अलमारी भरी थी मार्जिन से मार्जिन तक लिखे हुए नोट्स तो वोले स्वामे जी इस एक लाइफ टाइम वर्क तो उन्होंने पिछला कि एक दो गंडे का थोड़ा और टाइपिंग होगा अरे तो जिंदगी बार के टाइपिंग का काम होगा ये प्रहुपाजी से मिले लाइफ टाइम वर्क एक जिंदगी नहीं बहुत जिंदगी का काम है ये तो हम जो भक्ति करते हैं तो मारा मुलीगी विश्य बلم यह था जो हमको अध्यात्मी कुरची प्रापद करनी है और भोतिक भोख की इच्छा छोड़नी है तो शुरुवात कहां से होती है इसकी तो पहले हम भोतिक भोख छोड़ते है अध्यात्मिक इच्छायें हमारे उदेन जाहूरत होती हैं।
तो संग का प्रभाव क्या होना चाहिए। स्रवन का प्रभाव क्या होना चाहिए। सिर्फ शारेख रूप से अगर आम किसी के पास आते हैं यहां एक ही कमड़े में आ जाते हैं, एक ही घर में आ जाते हैं।
इसका मतलब यह नहीं है कि हम उस एक्तिका संग कर रहे हैं। हो सकता है, but the essence of association is the transfer of desires. संग का मार्थ क्या है कि इच्छाओं की प्राव्ति करना। अगर हम भक्तों के संग में आते हैं, भक्तों के रुदे में जुलंद इच्छा होती है, कि हमें भगवान की सेवा करनी है, भगवान का चरवन करना है, भगवान के बारे में प्रचार करना है, तो उनकी संग से, अगर हमारे रुदे में वो इच्छा आ जाती है, तो हम भक्तों का संग कर रहे हैं।
अगर हम भक्तों के संग में आ खे देखते हैं, यह भक्त देखो, मंदिल में सो रहा है, देखो यह भक्त कितना खाता है, देखो यह भक्त, यह भक्त, यह भक्त क्या है, हमेंशा मंदिल में आ खे, दूसरों में दोज़ देखते रहते हैं, मैं आ खे वो ही कर रहा हूँ, मैं क्या कर रहा हूँ, दूसरा सब को दोज़ देखते रहता है, कुछ भक्त आ थे, मैं जब पुना में था, एक भक्त आ थे थे, रोज सुबह श्रिंगार आर्थी के दर्शन के आ थे, रोज सुबह, और श्रिंगार आर्थी के दैसे ही दर्शन हो जाता था, सिगह पुझारे डिपार्ट में जा रहे थे, और पुझारे को बोल जाते हैं, अरे तुमने ये ड्रेसिंग में ये डेकोरशन अच्छा नहीं किया, ये बरावर नहीं किया, ये बरावर नहीं किया, रोज का रिति रिवास था उनका, तो क्या था वो दर्शन भगवान को देखने के लिए जा रहे थे, वो भगवान के श्रिंगार में क्या गल्टी हुई है, वो देखने के लिए जा रहे थे, तो अभी ये ये भाव है, वहाँ ज्यादा उचित नहीं है, तो भक्तों के संग में भक्तों के संग में कुछ हो सकते हैं, उनके कुछ गल्टिया करते हैं, उनके अपने-अपने कंडिशिनिंग्स हैं, उनके अपने-अपने कमियां हैं, तो वो सब है, पर मैं भक्तों के संग में क्यूं आ रहा हूँ, भक्त का संग जब कहते है, तो भक्त भी अलग-अलग दर्जे के होते हैं, अलग-अलग श्रेडी के होते हैं, अलग-अलग समर्पन के होते हैं, तो मैं अगर भक्तों के संग में क्यूं आ रहा हूँ, मैं इसलिए आ रहा हूँ कि मुझे मेरे भक्ति में वुद्धी करनी है, मैं दो उधारनों गाद बियंट करता हूँ इसका, कि इन भौतिक उधारन है, पर ये आध्यात्मिक कर्तुव है इसके लिए, प्रभुपाजी संग के लिए उधारन मिलते हैं, कि जैसे कोई अगर बिस्नस में होगा, तो वो बिस्नस में अपना कोई बिस्नस चेंबर बना देता है, ताकि सारे बिस्नस लोग एक साथ में आयें, और फिर वो बातचीत करके कुछ पॉलिसी बना सकते हैं, अच्छी तरह से कारे कर सकते हैं, तो एसी बिस्नस में साथ में आएं कि स्टॉक एकशेंज बना देते हैं, तो अभी स्टॉक एकशेंज में क्या होता है, कि सब लोग आते क्योंं हैं वहाँ पे, उनको अपना पैसा बढ़ाना है, मैं 10,000 रुपे डालता हूँ, मैं इच्छा है कि 15,000 हो जाए, 20,000 हो जाए, पर अभी स्टॉक एकशेंज में जब हम आते हैं, हमारा पैसा हम डालते हैं, हमारा उद्दिश क्या है कि हमारे पैसे को बढ़ाना, पर सिर्फ स्टॉक एकशेंज में आके, अपने आप पैसा बढ़ने वाना नहीं है, स्टॉक एकशेंज में अलग अलग परकार के ब्रोकर हो सकते हैं, और कुछ ब्रोकर ऐसे हो सकते हैं, कुछ दलाल ऐसे हो सकते हैं, जो एकस्पर्ट है और जानते हैं, आप यहाँ पैसा डालो, फिर आपका पैसा बढ़ जाता है, और हम देखते हैं पैसा बढ़ जाता है, पर कुछ ऐसे दलाल हो सकते हैं, जो वहाँ पे दुसरों का पैसा फसाने के लिए आए हैं, तो हम उनको अगर पैसा देगे तो हमारा पैसा डूप जाएगा, या फिर कुछ ऐसे दलाल हो सकते हैं, जो बेहीमान नहीं है, पर वह अभी तब एक्सपर्ट नहीं है, नक्षे नहीं है, तो उनको पैसा डालेगे तो क्या होगा, उसका ज़्यादा पैसे का बुद्धी नहीं होगा, तो उसी तरह से जो भक्तों का संग है, भक्ति की संस्था है, वो मान लिजे एक भक्ति का स्टॉक एक्शेंजे से है, तो हम सब के रुदे में थोड़ी बहुत भक्ति है, थोड़ी बहुत श्रद्धा है, वो आके हम यहां पे इंवेस्ट करते हैं, तो हमारा उद्देश क्या है, कि हमारे भक्ति के स्टॉक को हमें और बढ़ाना है, तो जब कोई स्टॉक एकशेंजे आता है, तो उसके पैसे के रुद्धी करना, यह उसके खुद की ज़िन्मेधारी है, ऐसे नहीं बोल सकता है, मैं स्टॉक एकशेंजे में गया, अभी वो स्टॉक एकशेंजे की ज़िन्मेधारी है, कि मेरा पैसा बढ़ाते है, नहीं, मेरी जिन्मेधारी है, तो ठीक उसे करेंगे, जब कोई व्यक्ति धर्म के मार्ग में आता है, तो यह उसकी ज़िन्मेधारी है, कि उसकी शर्धा, उसकी भक्ति को बढ़ाना है, तो कई बार ऐसे धर्म के नाम पे लोग होते हैं, जो वास्तों में धर्मिक कारण नहीं कर रहे होते हैं, वो धर्म के नाम पे अपना धन्दा कर रहे होते हैं, ऐसे लोगों का संग करेंगे थे का होगा, हमारे शर्धा का नाश हो जाएगा, तो हमें ऐसे लोगों से संग नहीं करना है, भक्तों के संग में भी अगर आते हैं हम, तो भक्ता अलग अलग श्रेणी पे होते हैं, तो कुछ भक्ता ऐसे होते हैं, वो इतने, वो कैसे इनेक्सपर्ट, अदक्षे दलाल के समान हैं, तो उनका हम जादा संग करेंगे, तो क्या होगा, हमारे भक्ता की जा वो भक्त जादा गंभीर नहीं है भक्ति में, जो ऐसे दिली भक्ति करते हैं, अभी उनको जज़ नहीं करना है, वो दिली भक्ति क्योंं कर रहे हैं, पर वो उनकी परस्तिती हो सकती, उनकी मनस्तिती हो सकती है, जो भी है, पर अगर हम उसका संग करते रहे हैं, तो हमारी भक्ति दिली रहेंगे, अगर हमारी परस्तिती, मनस्तिती ऐसी है, कि हम वैसे ही भक्ति कर सकते हैं, तो उतने स्थरपे भक्ति करना अच्छा है, बिना भक्ति न करने के, पर हमें समझना है, कि जैसे मैं अगर स्टॉक एक्स्टेंग में आ रहा हूँ, तो मुझे मेरा पैसा बढ़ाना है, तो वैसे मैं मंदिर में आ रहा हूँ, भक्तों के संग में आ रहा हूँ, तो मुझे मेरे भक्ति का स्टॉक बढ़ाना है, और मेरे भक्ति का स्टॉक बढ़ाना, ये मेरी सर्मेदार है, तो कौन से भक्तों के संग के द्वारा मुझे प्रेर्णा मलती हैं, कौन से भक्तों के संग के द्वारा मेरी आध्यात्मित इच्छाएं बढ़ती हैं, कौन से भक्तों के संग के द्वारा मुझे और श्रमन करने की, और विग्रहों की सेवा करने की, और प्रचार करने की, और व्रंतों की वित्रन करने की, और अलग-अलग प्रकार की सेवा करने की प्रेर्णा मलती हैं, तो उन भक्तों का संग मुझे प्रधान रूप से लेना है, तो दुश्रे भक्तों का संग लेना है, ऐसे नहीं उनका अनादर करना है, पर हमें, हमारा उद्देश क्या है, यह सप्रस्ट रखना है, अगर हम उद्देश भूल जाते हैं, तो भक्तों के संग में भी हम गुम्रा हो सकते हैं, क्योंंकि क्या गुम्रा हो जाएगे, अरे यह भक्त ऐसे कर रहा है, वो भक्त ऐसे कर रहा है, वो भक्त ऐसे कर रहा है, तो मैं भी ऐसे कुछ नहीं करते रुप का, नहीं, हमारी आध्यात्मिक प्रवृत्ति, यह हमारी जिम्मेदारी है, और भक्तों का संग मतलब क्या है, आध्यात्मिक इच्छाओं की जादरती होगा, तो अभी हमें आध्यात्मिक उच्छी हो या नहों हो, नहीं, ऐसे नहीं है, हम सबको थोड़ी बहुत आध्यात्मिक उच्छी ज़रूर हैं, इसलिए हम बंदिर में आ रहे हैं, भक्तों का, भक्ति की विधिका पालन कर रहे हैं, पर हम कभी सो, आध्यात्मिक उच्छी मु काम आ जाता है, क्रोध आ जाता है, लोग आ जाता है, तो गुस्सा जाता है, तो हमको गुरा लगता है, यह क्योंं है, तो यह भी अच्छा है, हमको यह त्यागना है, पर हमारा खेंदर क्या है, कि इसको त्यागना या वो प्राप्त करना नहीं है, सबसे पहले क्या है, हमें आध्यात्मी इच्छांव के जागरती करना है, जितने हमारे आध्यात्मी इच्छाओं के जगरती होगी, उसके द्वारा अपने आप भोतिक जो आसक्तिया है, वो कम हो जाएगी, और आध्यात्मीः रूची बढ़ जाएगी, तो भगवान कहते हैं अभ्यास्योगिन ततो माम इच्छाप्तुँ धनन्जयव बारवे अंध्याय के नवे शलोक में वो कहते हैं आप अभ्यास्योग का पालून करो अभ्यास्योग मतलब क्या है वही बक्ती के विदी जन का पालून करो बख्तों का संखो, जहू करो, किर्टन करो, पुजा करो इंके दारह क्या होना चाहिये?
इसका फलय होना चाहिए माम इच्छा पुदने दे आपको मेरी इच्छा, मुझे प्राप्त करने की इच्छा आहके बढ़ने चाहिए तो जितना ये होगा हमारी इच्छा भगवान का प्राप्त करने के बड़ेगी तो अपने आप जो भोतीक इच्छा है वो चली जाएगी तो इसलिए हमें भकतों का शरुवन करना, भकतों का संग करना सबका उद्देश यह है कि हमें हमारी भक्ति की रुद्धी करनी हैं भक्ति की रुद्धी करनी हैं और उस भक्ति की रुद्धी मतलब हमारी आध्याद्मी की इच्छाएं बढ़ने चाहिए और एक उधारन था शौक एक्स्चेंज का दूसरा उधारन है अस्पताल का जब हम अस्पताल में आते हैं तो हमारा उद्देश क्या है कि मुझे मेवरी बिमारी को ठीक करना है तो अभी अस्पताल में दूसरे लोग अलग अलग परकार से बिमार हो सकते हैं तो कभी कभी ऐसे होता है कि मैं एक बार पुना में था तो वहाँ एक जिन्दल हॉस्पेटल में गया तो मुझे फ़ोड़ा मलेरिया था उसके लिए हॉस्पेटल में गया पर हॉस्पेटल में जब एड्मिट हो गया तो हॉस्पेटल में टीवी हो गया तो मलेरिया तीन दिन में जला गया है पर टीवी का ट्रेट्मैन नौ महने लेना पड़ा उसके लिए तो काफ़े एड्बाल्स थीवी हो गया है तो कभी कभी आस्पताल में हम ठीक होना के लिए जाते हैं पर आस्पताल में बिमार हो सकते हैं तो क्या है अस्पताल में अलग अलग लोग है अस्पताल में अभी एक तरह से यह अस्पताल के अथौरिटी की जुम्मिदानी है कि वो अस्पताल के अत्मौस्फियर को वातारण को ऐसा रखे कि लोगों को बिमारी बढ़ी नहीं पर कभी कभी क्या होता है अस्पिताल में भी जुम्मिदानी होते हैं जो जंतू होते हैं और कभी भावे बिमारी हो सकते हैं तो जब हम अस्पताल में आते हैं तो हमें भी चोकन न रहना है कि मुझे किसे अगर कोई वक्ति बिमार हो गया है तो फिर उस वक्ति से अगर उसकी बिमारी हो गया है तो हम उसका संग नहीं कर सकते हैं तो मुझे जब टीवी हो गया था तो फिर मैं लगबाग 9 महने मुझे मुझे मास लगा के बैठा था क्योंंकि जंतू सब बाहर आते हैं तो एक भक्त आखे बोले अभी आप जैन सादु बन गयो मुझे पट्टी लगा दिया है पर क्या है मुझे भक्तों भाई संग करना है पर वो जरूरी है उस समय क्योंंकि हमको जंतू नहीं फैलाने है किसे में तो ये पॉइंट मैं देता रहा हूँ कि ये एक अस्पताल की जंबदारी है पर ये मरीद की जंबदारी है कि मैं जब अस्पताल में जा रहा हूँ तो फिर मुझे दूसरे बिमारी नहीं आने चाहिए मैं यहाँ पर जा रहा हूँ ठीक होने के लिए तो उस तरह से जो भक्ति के संस्ता है जो भक्तों का संग है वह वास्तमिक अस्पताल की जंबदारी है और यहां पर हम आ रहे हैं ठीक होने के लिए पर यहां पर भक्त अलग-अलग पाश्यो भुमी से आ रथे है उनकी अपनी-अपनी कंडिशिन्स होती है उनकी अपनी-अपनी बद्धा पर उनकी अपनी-अपनी कमियां होती है तो कभी-कभी उनके संग से हमें वो कमियां हो जाती है कैसे नहीं होना है हमें भक्ति में विद्धी करने है तो अगर किस भक्तों में कुछ अनर्था भी है तो एक तरह से वे संस्था की जम्मेधारी है कि वो भक्तों का जाधा प्रभाव दूसरे भक्तों की संग में नहीं हो इससे एस्पताल की जम्मेधारी है कि दूसरे लोग इरेफेक्ट नहीं हो और उसके साथ-साथ यह व्यक्ती की जम्मेधारी है कि ठीक है अगर इस भक्त के संग से मुझे में क्रोध बढ़ रहा है इस भक्त के संग से मुझे में आहंकार बढ़ रहा है तो ऐसे नहीं है कि हम भक्त को बुरा कहना है क्योंंकि अगर कोई व्यक्ती बिमार है, बिमार है वो तो जब कोई बिमार होता है, तो हम उसको बुरा नहीं मुलते हैं पर हम उस व्यक्ति से थोड़ा लिंस्टन्स रखते हैं कि मुझे इस बिमारी ना आए तो हमें हमेशा हमारी चेतना के पारे में सतर्ख रहना है और देखना है कि भक्तों के संग से मेरी चेतना पर क्या प्रभाव हो रहा है और हमारी चेतना की विद्धी, की प्रगती यह हमारी जंबिदारी है सहस्ता के स्थर्पे मैलेज्बन का यह जंबिदारी है कि अगर कोई बहुत क्रोधी है, भक्त बहुत अहंकारी है कोई भक्त बहुत कुछ अनर्थों से उनको प्रभावित है तो फिर उनको ज़्यादा कुछ बड़ा इंफ्लूइंशिल पोजिशनस मुव्मेंड में नहीं देना चाहिए ताकि वो दुस्तों को प्रभाव कर सके पर उसके साथ साथ यह हमारी भी जंबिदारी है और जब हम इस तरह से खुद की जंबिदारी स्विकार करते हैं कि मेरी प्रगती यह मेरी जंबिदारी है और मैं भक्तों के संग में आ रहा हूँ कि मेरी भक्ति की विद्धी हो और मेरे भक्ति की विद्धी के लिए है जो होगा वो मैं करूँगा तो जिन भक्तों के संग से मुझे प्रेणा मिलती है उन भक्तों का संग मैं अधित करूँगा जिस सेवा करने, जो सेवा करने मुझे उची मिलती है वो सेवा मैं ज़रूर करूँगा अभी क्या है कि संस्था में भी ऐसे होता है मैं अंदिर में आओंगा यह गलत क्या है यह गलत हो रहा है यह गलत हो रहा है दुनिया में बहुत गलत हो रहा है कल्युग में उनको लगता है मैं दूसरा जो गलत हो रहा है, वो देखने में मुझे मैं देखो, मैं नहीं गलती देखा लगता है कि गलती देखना यह बुद्धिमत्ता का लक्ष है बाकि कोई लोग गलती नहीं देख रहे हैं, मैं देख रहा हूँ बट कल्युग जो है दोशों का सागर है तो कल्युग में दोश देखने के लिए उतनी ही बुद्धी रखती है जितना कि सागर में पानी देखने के लिए है सागर में चार और पानी ही है तो हाँ दोश जरूर है और दोशों को ठीक करना है पर अगर कुछ नहीं चाहता है ठीक करने के थीक है नहीं तो फिर मुझे जो सेवा में पिरिर्णा है मैं वो सेवा करूँगा और कम से कम उस शेतर में मैं कुछ ठीक करते रहूंगा बाकी शेतरों में दुसरा को जाकर ठीक करते हैं तो अगर हमारा उद्देश हम स्पश्च रखते है मैं यहाँ पर आध्यात्मी प्रगती करने के लिए आ रहा हूँ तो फिर जो भी चीज़े आएगी हमारे जीवन में, भक्तों के संग में भी हो उससे हम मिचलिप नहीं हो जाएगा, उससे हम पदधरश्टे नहीं हो जाएगे हम समझाएं कि यह मेरे अनुकुन भक्ति के लिए अनुकुन नहीं है तो मैं इसको बाजू कर रखूंगा और मैं आगे प्रगती करते रहूंगा जो मेरे प्रगती के लिए अनुकून है, मैं वो सुखार करूंगा और आगे पढ़ूंगा और इस भाव से जब हम, और दुसरों को भी हमें प्रेर्णा देनी है, दुसरों को भी पर हमारे क्षमता के उसर हम कर सकते हैं जब हम खुद की इस अमिदारी सुखार करते हैं तो फिर हम देखेंगे कि भक्तों का संग बहुत अनुकून है सर भक्तों का संग हर तरह से अनुकून है, ऐसे नहीं है पर भक्ति के लिए भक्तों का संग बहुत अनुकून है प्रभुपाजी, मैं एक प्रसंद के साथ यहां पेंत करता हूँ प्रभुपाजी जब एक बार अमेरिका में थे तो उनके एक शिष्णों से मिलने आए प्रभुपाजी, जो बाकिं भक्त का मिले इतना परिशान करते हैं मुझे इतना समस्या हो रही है, मैं क्या करोगे प्रभुपाजी बोले, कि ये गुरु भाईयों में हमें, गुरु भाईयों में, गुरु भाईयों में हमें हमें चाहते रहता है मेरे गुरु भाईयों ने मुझे बहुत परिशान किया ऐसा जवाब तो उनको बिल्कुल अपने क्षार नहीं थी तो प्रभुपाजी बोले जब आपके लिए अच्छा करते हैं आपके लिए आपके लिए अच्छा करते हैं मतलब, दूसरे भकत आपसे लिए किसे आगम कर रहे है क्योंंकि हमारी सेवा में हमको एक आशरे मिल जाएगा हमारी सेवा में हमको रुची मिल जाएगी हमारी सेवा से हमारी प्रदति होती रहेगी तो छली आएगी भक्तों के संग्बेबी हमें क्या देखना है कई भक्त ऐसे होते हैं जो स्नेह पूर्वक, आदर पूर्वक, अच्छी तर से बाच्चित करते हैं कुछ नहीं करते हैं पर हम यहां पे आये किस लिए है कि हमें आध्यात्मिक प्रदति करने हैं हमारी कृष्ण भगवान से, हमारी गुरुदेव से जो सम्बन्द है सेवा का उसके द्वारा हमें आध्यात्मिक प्रदति होने वाली है तो प्रपन्पालाय तुरंद शत्ये तो यहां बताये गए है कि जो शर्णागत होते हैं उनका भगवान सरक्षन करते हैं तो शर्णागत होना मतलब क्या?
यह नहीं है जरूरी नहीं है कि हमारे साथ अपने इंद्रोप नियंतर होना चाहिए नहीं हमारे जितनी शम्ता है उस हद तक हम सेवा करते रहे हैं उस हद तक हम शर्णागत रहे हैं और धीले धीले वो शम्ता बढ़ते जाएगे तो हमारे शुरुवात कहां से होती है? शुरुवात आध्यात्मिक रुची से नहीं होती है शुरुवात भोतिक अनासक्ति से नहीं होती है शुरुवात यह सेवा भाव से होती है हम सेवा भाव से थोड़ी से सेवा करने लगते हैं उससे थोड़ी आध्यात्मिक रुची आए लगती है उससे थोड़ी भोतिक अनासक्ति आए लगती है फिर और सेवा करते हैं और वो बढ़ती आता है तो कोई भी यह नहीं कह सकता है कि मैं कुछ भी सेवा नहीं कर सकता हूँ मंदिर में आए परसाद तो गरहन कर सकते हैं वो भी एक सेवा है अफकोस वो एकलोती सेवा नहीं है हमें और भी सेवा करनी है पर हम सेवा जरूर कर सकते हैं तो अगर हम सेवा करते रहेगे तो जो भोतिक प्रलोभन है भोतिक रुची है वो चली जाएगे अध्यात्म कुछी धिरधिरे जावरत हो जाएगे और फिर उस तरह से हमारी सेवा में ही हमें सन्तुष्टी मिलेगे सुसुखां करतं आउदेगे जो भक्ति बड़ी सुखमे है वो जितना हमारी चेतना सेवा में हम आशुत कर देगे उतना हम भक्ति कैसे सुखमे है वो अनुभव कर सकते हैं तो सारांचना आज हमें चर्चा थी किस तरह से यहाँ बाया है गजन को बता रहे है कि जो इस भोती जिगत में वासनाई है वो असहिय है पर उनसे भगवान जो शरणागत होते हैं उनको बचा लेते हैं भगवान की शरण लेना है भगवान में रुची प्राप्त करनी है या पहले हमें भोतिक वासनाओं को छोड़ना है तो पहले हमें क्या करना है शरवन करना है शरवन से हमें घ्यान मिलता है बुद्धी मिलती है और शरवन में हम भक्तों का संग करते है उसके द्वारा हमें आध्यात्मिक इच्छाएं प्राप्त होती है और हम देखा कैसे कि केवल शरवन की आसक्ती हो जाएगी तो उससे भक्ति अज्ञान की प्राप्त कर सकता है और भक्ति में बुद्धी जो है उसका कारण है भक्तों का संगर और भक्ति में अधोगती भी है वो भी कारण है उसका भक्तों का ही संगर नास्थिक लोग भी क्योंं बनते हैं भोतिकवादी लोग क्योंं बनते हैं क्योंंकि वो देखते हैं, मतलब भक्त में मतलब भक्त भी बोलते हैं साधरन धार्मिक लोग जो है अगर धार्मिक लोग भोतिकवादी रहते हैं फिर लोग बोलते हैं धर्म का क्या फाइदा है तो उससे जो नास्थिकवादी बढ़ता है वो भोतिकवादी धार्मिक लोग के कारणी बढ़ता है तो religious materialism is the cause of materialism धार्मिक भोतिकवाद के कारणी भोतिकवाद पड़ जाता है तो भोतिकवादी लोगों को साधरन था अर्था और काम में रुची हैं और वो लेकते हैं धार्मिक लोग भी धर्म है इसलिए कहा रहे हैं उनको अर्था और काम मिलेगा इसलिए तो बोलते हैं धर्म के ज़रूरत क्या है मुझे अर्था और काम उसके बिनावे मिल रहा है तो वास्तद में धर्म का उद्देश क्या है आध्यात्मिक प्रगती है अपवर्ग है प्रहुपाजी बोले था ये मेरे संदेश का सबसे महतुबुन भाव ये है धर्म से अर्था और काम मिल जाएगा पर वो एक बाईप्रोडक्ट है दूसरा अडिशनल चीज़े जो में और चीज़े मिल रहे हैं प्रधान है आध्यात्मिक प्रगती है और अगर ऐसे नहीं करते हैं तो बहुत से लोग आजकल समाज में आध्यात्मिक चीज़ों के लुची है पर धार्मिक चीज़ों के प्रति लुची नहीं है क्योंं?
क्योंंकि वो दोते है धार्मिक लोग जाधा आध्यात्मिक नहीं है वो भोतिकवादी ही है इसलिए हम धार्मिक संस्थां में भी आते हैं तो केवल धार्मिक संस्थां में आके हमारी प्रगती नहीं होती है धार्मिक संस्थां में आके जो आध्यात्मिक विक्ति है उनके संग से हमारी प्रगती होती है और संग का आर्थम प्रधान लोग से क्या है कि इच्छाओं का प्राप्त होना, आध्यात्म, ट्रांस्वर इच्छाओं को प्राप्त करना तो हमें देखा कि भक्ति में प्रगती करने के लिए इच्छाओं को त्यागना इतना महतुपूर्ण नहीं है कि इच्छाओं को स्विकार करना बहुत एक इच्छाओं को त्यागना है नहीं और उससे महतुपूर्ण है आध्यात्मिक इच्छाओं को स्विकार करना प्रभुपाज्जी के बारे में हम देखा कैसे काफ़िल स्थारेच से कि कितने संगर्च के बाव जो बिना किसी सुविधा के जब उन्हें प्रचार शुरू किया तो क्योंं कर पाएं वो इतना संगर्च क्यूंकि अपनी गुरुदेव के आदेश पालं करनी की इच्छा बड़ी परबल थी तो वैराज्य था पर वैराज्य से मत पोना उनकी जो इच्छा के आध्यात्मिक वो बड़ी परबल थी तो हम अमारे इच्छाओं को बाहर नहीं ढखेर सकते हैं पर हम उनको हमारे आध्यात्मिक इच्छाओं से भर लेगे तो वो चले जाएगे बाहर हम किसी चीज़ को सोच सकते हैं मैं इसके बारे स्पर्श नहीं करूँगा पर मैं इसके बारे में सोचूँगा नहीं उसमें हम उसके बारे सोच रहे हैं तो इसलिए हमें किसी और चीज जो हम सोच सकते हैं उसको हमारे जीवन मिलाना है तो भक्तों के संग में हमें भक्ति की इच्छाओं को जागर करना है पर इसके लिए दो उधारन दिये एक है स्टॉक एक्शेंज का स्टॉक एक्शेंज में लोग जाते हैं अपने पैसा बढ़ाने के लिए और बढ़ सकता है पैसा पर वो पैसा बढ़ाना व्यक्ती की खुद की जिम्मजारी है अच्छे दलाल के साथ संवन जुड़ा के पैसे को बढ़ा सकते हैं वैसे ही हम जब मंदिर में आते हैं, धार्मिक संस्था में आते हैं हमारी भक्ति की जो भी स्टॉक है हमारा उसको हम बढ़ाना है पर वह कभी हम गमा भी सकते है वो वैसे के वैसे आर सकता है या वो बढ़ सकता है उचित संग है तो फिर यह हमारी जिम्मजारी है वैसे ही अगर हम भक्ति का संग, भक्तों का संग आये धार्मिक संस्था यह एक अस्पताल की समान है तो कभी अस्पताल में हमारी विमारी बढ़ भी सकती है अगर हम किसी विमार विक्ती से संग कर ले तो तो वैसे धार्मिक संस्था में आके भी लोगों का अनर्थ बढ़ सकता है कभी कभी होना नहीं चाहिए वैसे पर यह बहुत विक्ती की और संस्था की दोनों की जनमदारी है तो हम मंदिल में आते हैं और उन भक्तों का संग करते हैं जिनके दुआरा हमारी आध्यात्मिक इच्छाओं की प्रुद्धी होती है और ऐसे संग से हम प्रगती करेगे और ऐसे संग के दुआरा जितने हमारी आध्यात्मिक इच्छाओं की बढ़ जाएगी तो हमें आध्यात्मिक रुची निलेगी और भावतिक रुची चली जाएगी और उस तरह से भक्ति और सुखम सुखम बन जाएगी बहुत-बहुत धन्यवाद हरे कृष्णा पर परिमान