Gita 13.18-29 – How the purusha gets bound by prakriti (Hindi)
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Lecture Summary
- ज्ञेय और परम सत्य का स्वरूप: भगवान श्रीकृष्ण तेरहवें अध्याय के अंत में ‘ज्ञेय’ (जानने योग्य परम सत्य) का वर्णन करते हुए बताते हैं कि वह समस्त ज्योतिमान वस्तुओं में भी परम ज्योति और तमगुण से पूरी तरह परे (तमसः परमुच्यते) है। ज्ञेय, ज्ञान और ज्ञाता का यह संबंध आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त करता है।
- भक्ति और शरणागति: यद्यपि ज्ञान और योग के विभिन्न मार्ग हैं, परंतु भगवान की अतुकी कृपा और भक्ति के बिना जीवात्मा उस असीमित परम सत्य को प्राप्त नहीं कर सकती। भक्त अपनी साधना और शरणागति के माध्यम से भगवान के दिव्य भाव को प्राप्त होता है।
- प्रकृति और पुरुष का संयोग: भौतिक जगत में होने वाले समस्त परिवर्तन (सुख-दुख, विकार आदि) प्रकृति के गुणों के कारण होते हैं। जीवात्मा जब भौतिक प्रकृति के गुणों से आसक्त हो जाती है, तब वह विभिन्न योनियों में जन्म-मृत्यु के बंधन में बंध जाती है।
- परमात्मा की उपस्थिति: शरीर में व्यक्तिगत जीवात्मा (क्षेत्रज्ञ) के साथ-साथ एक अन्य सर्वोच्च सत्ता ‘परमात्मा’ (पुरुषोत्तम) भी विद्यमान है, जो उपद्रष्टा (साक्षी) और अनुमन्ता के रूप में संपूर्ण शरीर और सृष्टि का पालन करते हैं।
- समदर्शिता और मुक्ति: जो साधक समस्त भूतों में एक ही परमात्मा को समान रूप से देखता है (समबुद्धि), वह अपने मन से अपनी आत्मा का पतन नहीं करता और अंततः परम गति (मोक्ष) को प्राप्त होता है।
Full Transcription
अब हम तेरवे अध्याय की आगे चर्चा करेंगे। तेरवे अध्याय में पहले बरसों के प्रवचन में हमने क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के बारे में चर्चा की थी। फिर कल हमने ज्ञान के बारे में चर्चा की और ज्ञेय के बारे में चर्चा की, वो लगभग पूरी होने के आगे थी। आगे तक पूरी नहीं हुई थी। तेरवे अध्याय के हम सत्रवे श्लोक तक आ गए थे। अठारहवें श्लोक की हम चर्चा करेंगे। अठारहवें की आधी हमने चर्चा की थी, सत्रहवां हुआ था। सत्रहवां हुआ था तो अठारहवें से हम चर्चा करते हैं। अठारहवां श्लोक इस विभाग के बारे में आगे आखिरी श्लोक है। उन में से भी थोड़ा आता है पर उसका अंत है।
इसमें ज्ञेय के बारे में चर्चा है। ज्ञेय मतलब जो विषय के बारे में ज्ञान प्राप्त करना है। ज्योतिषां अपि तत ज्योतिः, तमसः परमुच्यते, ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं। जो भी ज्योतिमान दिखती है, उन में से अगर जो चीज़े हैं, यहां भी दिखती का जो दिखने आया, अपि तत को चीज़े हैं, जो भी चीज़े हैं ज्योतिमान, उन में से सबसे अगर ज्योतिमान वो परम सत्य है। अभी हम देखेंगे इस विभाग में भगवान क्योंकि उपनिषदों के विषय में चर्चा कर रहे हैं और उसी भाषा में उसी तत्व की चर्चा कर रहे हैं। इसलिए मैं जैसे बताया था क्योंकि उपनिषदों में “मम” ये बहुत बार नहीं आता है। “मम” ये भगवान, भगवान के अतिरिक्त तो जाएं-जाएं बहुत बार नहीं आता है और पुराणों में आता है, खासफिकै भागवत पुराण में आता है। तो यहाँ पे वो जो ज्योतिषां अपि तत ज्योतिः तो वो जो परम सत्य है, वो सब ज्योतिमान चीज़ों में से सबसे अधिक ज्योतिमान है और क्या है? तमसः परमुच्यते।
इस जगत में बहुत से ज्योतिमान चीज़े हैं पर वो भी तमगुण से प्रभावित हो जाती है। यहां पे रोशनी है पर क्या है यह रोशनी हमेशा कालीन है? अंधकार आ जाएगा, तमगुण का प्रभाव आ जाएगा। पर वो जो परम सत्य है, तमसः परमुच्यते, वो हमेशा ही तमगुण के परे है। और फिर ज्ञानं, ज्ञेयं, ज्ञानगम्यं, पर तीन शब्द आते हैं। वो एकड़े से समाने लग रहे हैं, थोड़ा सा फर्क है, कल हम देख रहे थे। ज्ञानं, ज्ञेयं और परिज्ञातारः वो आते हैं। तीन चीज़ें जगत में करते हैं, जो व्यक्ति ज्ञान प्राप्त कर रहा है, वो ज्ञाता है। जिस चीज़ के बारे में ज्ञान प्राप्त कर रहा है, वो ज्ञेयं और जो उस ज्ञेयं से ज्ञाता के पास आ रहा है, वो ज्ञान है। तो इसमें अभी तीसरा है ज्ञानगम्यं। गम्यं मतलब जो गति है, उद्देश्य है। तो ज्ञान का उद्देश्य क्या है? ज्ञानगम्यं। तो अभी हम बोलेंगे कि जिस विषय के बारे में ज्ञान प्राप्त कर रहे हैं, वही उद्देश्य है।
इसमें फर्क क्या है? ऐसे नहीं है, अभी कोई विद्यार्थी कॉलेज में पढ़ाई कर रहा है, मान लीजिए इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा है, तो अभी उसका ज्ञान जो है, वह इंजीनियरिंग का ज्ञान है, पर वास्तव में उसको इंजीनियरिंग के ज्ञान से कोई प्रेम नहीं है, उसको बाद में नौकरी करनी है, पैसा कमाना है और एक अच्छा करियर बनाना है। तो उसका ज्ञान का उद्देश्य इंजीनियरिंग ज्ञान नहीं है, ज्ञान का उद्देश्य क्या है? पैसा कमाना है, नौकरी प्राप्त करना है। मतलब ज्ञान का विषय और ज्ञान का उद्देश्य, यह दोनों अलग है। ज्ञान का विषय और ज्ञान का उद्देश्य, यह दोनों अलग है, पर भगवान के बारे में ज्ञान प्राप्त करते हैं, वो अलग नहीं है। भगवान ही ज्ञान है। अभी सारा भौतिक जगत क्या है? भगवान की शक्ति है, भगवान की सृष्टि है। एक तरह से भगवान ही है, क्योंकि भगवान और उनकी शक्ति अभिन्न है।
इस तरह से वे पूरी तरह से ज्ञेयं हैं, पर हम भगवान के बारे में ज्ञान इस सृष्टि के बारे में ज्ञान प्राप्त करते हैं। इसलिए प्रभुपाद जी कहते हैं, कोई लोग पैसा कमाने के लिए भागवत कथा करते हैं, तो बोले कि भागवत का बहुत अच्छा अध्ययन करें और बहुत भागवत के लोग मधुरता से गायें, लाव को भावनात्मक पद्धति से वर्णन करें, तो उनको ज्ञेय भागवत के बारे में है, पर उनको ज्ञान-अगम्या क्या है? उनको पैसा है। पैसा नहीं होगा तो ख्याति होगा, नाम चाहिए, प्रसिद्धि चाहिए। तो पर जो आध्यात्मिक सेंटर में जाना है, रुदि सर्वस्य चनिष्ठितम। वह जो परम सत्य है, वो कहीं दूर नहीं है, सब के रुदय में है। अभी-अभी तक भगवान ने यह स्पष्ट रूप से नहीं बताया है कि वो परम सत्य क्या है, पर इसके पहले कहीं भगवान ने बताया है। भगवान ने कौन सर्वस्य चनिष्ठितम? मैं सब के रुदय में हूँ। सर्वस्य चाहं रुदि सर्वस्य चनिष्ठितम। तो ये क्या है? उस सर्वस्य के बाद में आया है। कौन सर्वस्य? 15वां अध्याय है। अभी तेरवें अध्याय में है, भगवान ने बताया है इस सर्वस्य पर।
भक्त और भगवान का संबंध
एक और सर्वस्य जो हमने भगवान बताते हैं कि मैं सब के रुदय में हूँ, वो भी बाद में आता है, पर इसके पहले कहीं आया है? तेरवें अध्याय एक जगह पर आया है, कहा है? 13वें अध्याय में। तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकं, ददामि बुद्धियोगं तं ये मामोपयान्ति ते। इसमें मैं ज्ञान देता हूँ। इसमें यह बताया नहीं कि मैं सब के रुदय में हूँ, पर यह वो अगले श्लोक को बताया है, तेषां एवानुकम्पार्थम् अहमज्ञानजं तमः, नष्टयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता। उनकी कृपा से तो क्या है? सीमित के पास कभी शक्ति नहीं हो सकती कि वह असीमित को समझ सके, पर असीमित के पास वह शक्ति है कि वह कुछ भी कर सकता है और कुछ भी कर सकता है, इसका मतलब है वह सीमित को भी अपना ज्ञान दे सकता है। तो यह भगवान की शक्ति है।
तो दृष्टांत शाह को बढ़ाते हैं कि कोई व्यक्ति कहता है, “साधा बनाओ, सूरज उगाओ, मुझे तुम देखना है,” तो फिर वह आदेश दे कि सूरज को उगा नहीं सकता है। पर भले ही उस व्यक्ति में कोई अशक्ति नहीं सूरज को उगाने की और सूरज को देखने की, पर सूरज जब उग जाता है, जब दर्शन देता है, तो वक्त या साधन देख सकता है। तो जो हमारी शक्ति में नहीं है, तो भगवान की शक्ति में है। पिल्लई लोग आचार्य, जो श्री संप्रदाय में एक महत्वपूर्ण आचार्य थे, वो धर्म देते हैं, वैसे वो एक छोटा बालक है, अगर वो सोचता है कि वो ये हाथी के सिर को छूना है, तो वो कितना भी प्रयास करेगा, वो हाथी के सिर को छू नहीं सकता है। पर अगर वो हाथी सोचता है कि मुझे इस बालक की इच्छा पूरी करनी है, तो क्या होता है? हाथी नीचे बैठ जाता है और अपना सिर सामने करता है, फिर वो बालक आसानी से सिर को छू सकता है।
तो वो तो इसी तरह से कहते हैं कि जो आत्मा जीवात्मा है, वो छोटे बालक के समान है और भगवान जो विभू हैं, अनंत और भगवान के असीमित स्वरूप है, कि वे इस भू की जीवात्मा में प्रकट होते हैं, एक तरह से शास्त्रों से अपना ज्ञान देते हैं। पिल्लई आचार्य ये उदाहरण विशेषतः विग्रहों के लिए देते हैं, कैसे वो असीमित भगवान है, वो एक सीमित लगने वाले विग्रहों में प्रकट हो जाते हैं। तो ये सब कैसे संभव है? उनकी कृपा से और उनकी कृपा कब प्रकट होती है? जब हम उनकी भक्ति करते हैं। इसलिए हम तो बताए गए, मतभक्त एतद् विज्ञाय मद्भवायोपपद्यते। मेरा भक्त ही समझ सकता है और कोई समझ भक्त का मतलब वो ज्ञानी भी थोड़ी बहुत भक्ति करता है, उसको बराबर है क्या है? यहाँ पर भक्त का संदर्भ किस-किस से आ रहा है? यहाँ पर ज्ञानी लोग भले ही भक्ति करके भगवान की प्राप्ति नहीं करना चाहते हैं, भले वो उनको ज्ञान मार्ग का पालन करके ब्रह्मन का ज्ञान प्राप्त करना है, निर्विशेष ज्ञान प्राप्त करना है, उसके लिए भक्ति करनी चाहिए।
इसलिए हम देखते हैं पहले भी तेरह से तेरह, 8 से 12 श्लोक में जब ज्ञान की 20 चीज़ें बताए थे, तभी भी अमानित्वम आडित्वम अहिंसा क्षांति आर्जवम् आचार्य उपसीवनं च, उसमें भक्ति का वर्णन आया था। तो वो यहाँ पर कोई बोले है क्या, 20 चीज़ों में से एक ही चीज़ बताए, भक्ति के 12वें श्लोक में, परिपूर्ण दाद के लिए ज्ञान है, उस मार्ग की परिपूर्ण दाद के लिए नहीं हो तो उस में भक्ति का थोड़ा अवलंबन होना चाहिए। भक्ति के बिना कोई चीज़ प्राप्त नहीं होता है। जैसे हम देखते हैं, अष्टांग योग में भी, पर भक्ति मार्ग में हमसे भक्ति को एक औजार के रूप में इस्तेमाल नहीं करते हैं, भक्ति को शाश्वत सत्य के रूप में स्वीकार करते हैं। तो बाकी मार्गों में हमको स्वीकार करना पड़ता है, भक्ति के बगैर कोई भी चीज़ प्राप्त नहीं कर सकता है। अष्टांग योग में हमसे भक्ति को एक औजार के रूप में, हमसे भक्ति को एक औजार के… बिना कोई भी चीज़ प्राप्त नहीं कर सकता है।
भाव का दोष होता है कि मेरा अस्तित्व, मेरा स्वभाव या मेरी भावना, मद्भाव जो बोलते हैं, तो यहीं भाव ही शब्द आता है, चौथे अध्याय के दसवें श्लोक में। वीतभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः, बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भवागताः। तो वहां पे मद्भवागताः उसका अर्थ प्रभुपाद जी लिखते हैं कि वो जो भक्ति के नौ स्तर है, आदौ श्रद्धा ततः साधुसंगो… उसमें भाव के बारे में वर्णन करते हैं। तो अगर भाव का अर्थ हम बोलते हैं तो अर्थ होता है भावना और फिर मद्भाव मतलब मेरी भावना मेरे प्रति प्रेम प्राप्त होता है। पर अगर हम भक्ति में देखते हैं कि भाव का अर्थ एक जगह पे अस्तित्व या स्वभाव ही होता है। आठवें अध्याय में, भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः। तो भूतभावोद्भवकरो इस भौतिक जगत की सृष्टि है, भौतिक जगत की सृष्टि करवाता है वो कर्म है। तो भाव का अर्थ होता है सृष्टि या स्वभाव या प्रकृति या अस्तित्व भी होता है।
जो भाव महोदय क्या है? तदा तद्भावभावितः। पहला भाव में भावना है, यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्, तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः। जो भाव आपका है, जो चेतना आपकी है, पर सदा तद्भावभावितः, उसी जैसी हमारी भावना है, वैसे हमारा अस्तित्व हो जाएगा। सदा तद्भावभावितः, वो अच्छा श्लोक है, इसमें दोनों अर्थ आते हैं।
प्रकृति और पुरुष का विचार
तो अभी इसके बाद में भगवान पुरुष और प्रकृति के बारे में चर्चा कर रहे हैं, 20 से लगभग 26-27 तक पुरुष और प्रकृति के बारे में चर्चा करते हैं। तो अभी वो प्रकृति के बारे में पहले उसका परिचय करें। प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि। प्रकृति और पुरुष, इन दोनों क्या है? आप जान लो कि ये अनादी उभौ अपि, उभौ मतलब दोनों क्या है? दोनों अनादी है, दोनों की कोई शुरुआत नहीं है। विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसंभवान्।
हम कई बार कहते हैं कि हम सब भगवान से आए हैं, पर हम ये भी कहते हैं कि आत्मा सनातन है। तो अगर आत्मा सनातन है तो फिर आत्मा भगवान से कैसे आया है? तो दोनों थोड़ा विरोधाभास लगता है। अगर हम भगवान से आए हैं, एक समय हम नहीं थे, उसके बाद में हम आए, मतलब भगवान ने हमारी सृष्टि की, तो उसका मतलब है कि हम सनातन नहीं हैं। तो उसमें सत्य क्या है? क्या हम सनातन हैं या भगवान ने किसी पाय समय पे हमको बनाया है? तो वास्तव में यह जो है, हमारा वैदिक शास्त्रों का तत्व ज्ञान यह है कि आत्मा भी सनातन है। कुछ लोग बोलता है कि इसमें आत्मा सनातन है, इसके बारे में आता है। हाँ, जीवलोके जीवभूतः सनातनः, हमेशा के लिए है, तो ये 15वें अध्याय के साथ, 15वें अध्याय के साथ…
अहं सर्वस्य प्रभवो, क्या सब कुछ भगवान से आता है? एतद्योनीनि भूतान्युत्पर्पति… श्लोक है सातवें अध्याय का छठा श्लोक, उसका अर्थास्तव क्या है? कि इस भौतिक जगत में आपको जो भी दिखाई दे रहा है, वह भौतिक और आध्यात्मिक शक्ति के संगम से बनाया गया है, उसके अलावा और कुछ नहीं है। तो उसमें खासकर कि सब कुछ भगवान से आ रहा है, वर्णन नहीं है, तो ये भी वर्णन आता है कि अहं सर्वस्य प्रभवः। तो वैसे ही उपनिषद में आता है कि एको बहुस्यां, जो एक था, वो अनेक हो गए। तो मतलब दोनों चीज़ शाश्वत होता है, एक है कि आत्मा सनातन है और दूसरा है कि आत्मा भगवान से आ रहा है।
तो वास्तविक शक्ति क्या है? तो इसमें क्या है कि एक है, इसको इंग्लिश में क्रोनोलॉजी और एंटोलॉजी कहते हैं। क्रोनोलॉजी मतलब क्या? कि समय के अनुसार, इस समय यह हुआ, 1965 में प्रभुपाद जी अमेरिका आ गए, 1966 में इस्कॉन की स्थापना हुई, 1968 में पहली रथयात्रा हुई, 1969 में बीबीती की स्थापना हुई। ऐसे यह क्रोनोलॉजी मतलब क्या? क्या प्रसंग कब हुए, समय के अनुसार यह होता है, उसको क्रोनोलॉजी कहते हैं, कैसे क्या हुआ। एंटोलॉजी मतलब अस्तित्व का स्वभाव, किस प्रकार से अस्तित्व होता है। तो जब हम जब हम बात करते हैं कि आत्मा सनातन है, तो वह अस्तित्व के स्वभाव के अनुसार है। अस्तित्व के स्वभाव के अनुसार क्या है? आत्मा सनातन है, आत्मा की कभी शिव शुरुआत नहीं होती है, पर आत्मा और भगवान का संबंध बताना है, तो संबंध बताने के लिए क्या है कि आत्मा, भगवान भी सनातन है, पर आत्मा स्वतंत्र नहीं है, केवल भगवान स्वतंत्र है और आत्मा भगवान पे निर्भर है।
तो आत्मा की निर्भर अवस्था को समझाने के लिए ऐसे बताया जाता है कि आत्मा जो है, भगवान से आया है। तो जो आत्मा भगवान से आया है, वो बताया जाया है, ऐसे नहीं है कि आत्मा भगवान से आया है, ऐसे नहीं है कि आत्मा भगवान से आया है, ऐसे नहीं है कि एक समय आत्मा नहीं था। आत्मा ये परतंतर सत्य है, आत्मा का सत्य तो परतंतर है, स्वतंत्र नहीं है, यह समझाने के लिए ऐसे बताया जाता है कि आत्मा भगवान से आया है। इसलिए इसे नहीं है कि आत्मा भगवान से आया है, इसे परतंतर सत्य है कि आत्मा भगवान से आया है, इसे नहीं है कि आत्मा भगवान से आया है कि आत्मा भगवान से आया है।
तो यह क्या है? एक प्रतीकात्मक रूप से बताया है, प्रतीकात्मक रूप से कई बार शास्त्र में इस्तेमाल होता है। आप भगवद्गीता को प्रतीकात्मक रूप से है, जो अगर हम उसको सीधा से लेंगे तो कुछ अर्था ही नहीं निकलेगा उस श्लोक का। प्रतीकात्मक रूप से कोई श्लोक है भगवद्गीता में? नहीं, वो तो सत्य है। प्रतीक उदाहरण, लेकर उदाहरण मतलब क्या? ये एक सत्य है और वो समझाने के लिए दूसरा एक उदाहरण थे, वो उदाहरण है, वो भी उदाहरण है, उदाहरण मतलब क्या? ये एक सत्य है और वो सत्य सत्य ही है, पर सत्य को समझाने के लिए कोई अलग बताए जाते हैं। पर यहां पर सत्य है ही नहीं, वो एक चीज़ बताए जा रहे है कि दूसरा ही कुछ सत्य है, वो समझाने के लिए वो है।
दूसरे अध्याय का 69वां श्लोक: या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी, यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः। जो साधारण लोग के रात है, वो आध्यात्मिक वादियों के लिए दिन है और जो आध्यात्मिक वादियों के लिए रात है, वो बाक्सर लोग के लिए दिन है। अभी रात और दिन तो सूरज के उगने से और सूरज के सोने से होता है, तो फिर सीधा-सीधा देखेंगे तो शब्द का कोई अर्था है ही नहीं। तो इस श्लोक का पर अर्था क्या है? रात मतलब यहाँ पर अर्था है कि जब कोई कार्य नहीं कर रहा है, इसमें कोई कार्यहीन हो जाता है व्यक्ति और दिन मतलब जो कार्यहीन होता है उससे। तो इस श्लोक का अर्था क्या है कि जो भौतिक चीज़े हैं, उसमें भौतिक लोग बहुत कार्यहीन होते हैं, पर आध्यात्मिक चीज़े का कार्यहीन नहीं होते हैं। तो यह प्रतीकात्मक है, उससे एक वाद प्रतीकात्मक… आध्यात्मिक प्रवृत्ति का नाश होता है।
और यहीं ईशोप शब्द भी आता है, तीसरे श्लोक को। ये चात्मनो हनस्ते जना अंधेन तमसावृताः। वे लोग आत्मा को मार डालते हैं, प्रभुपाद जी बोलते हैं “killers of the soul”। तो भी यहाँ एक मूलभूत तत्व है कि आत्मा को कोई मार नहीं सकता है। तो यह प्रतीकात्मक है, क्या है कि जब हम कहते हैं कि आत्मा भगवान से आता है, वो प्रतीकात्मक है, स्वच्छ नहीं है, वो प्रतीकात्मक है। वैसे ही चैतन्य चरितामृत बताते हैं कि एक बार भगवान की इच्छा कहा, यह गोपियां इतना आनंद दे रहे हैं, उससे आधा आनंद दे रहे हैं, इसलिए मुझे उनका आनंद चखना है, इसलिए मैं उन गोपियों के रूप में आ जाऊंगा, उनका भाव स्वीकार करके और उनका रूप स्वीकार करके आऊंगा। आधा भाव भक्ति सम्मिलित करके कृष्ण स्वरूप, चैतन्य महाप्रभु आ जाऊंगा और फिर कृष्ण में चैतन्य महाप्रभु के रूप में आ जाऊंगा।
तो क्या इसका मतलब एक समय समय चैतन्य महाप्रभु थे नहीं? चैतन्य महाप्रभु… प्रकृति और पुरुष दोनों अनादी हैं, दोनों की कोई शुरुआत नहीं है और उनमें से यहाँ पर जो भी परिवर्तन हो रहा है, वो परिवर्तन किसमें हो रहा है? वो परिवर्तन प्रकृति में हो रहा है। प्रकृति में परिवर्तन हो रहा है मतलब क्या? कभी गर्मी होती है, कभी ठंडी होती है, कभी बारिश होती है, कभी सूखा होता है यह बाहर रूप से, अंतरंग रूप से कभी हम प्रसन्न नहीं होते हैं, कभी हम क्रोध हो जाते हैं, कभी हम हताश हो जाते हैं, यह सब क्या हैं? प्रकृति में परिवर्तन हो रहे हैं। तो स्थूल क्षेत्र में परिवर्तन हो सकता है या सूक्ष्म क्षेत्र में परिवर्तन हो सकता है, ये सब परिवर्तन कहां से हो रहे हैं? प्रकृतिसंभवान्। तो अभी अगले श्लोक में बताएंगे, यह जो परिवर्तन होते हैं, यह परिवर्तन का और प्रभाव क्या होता है?
कार्यकारणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते, पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुः उच्यते। पुरुषः कारण-करण-कर्तृत्वे… तो यह थोड़ा श्लोक है ना, यह समझना थोड़ा मुश्किल होता है क्योंकि यह थोड़ा विचित्र श्लोक है। वास्तव में आठवें स्कंध में बिल्कुल ऐसा ही श्लोक है, भागवत के दो श्लोक हैं, भागवत के जो बिल्कुल लगभग वैसे के वैसे भागवत में आते हैं। यह एक कारण-करण-कर्तृत्वे है और नौवें स्कंध का एक आखिरी श्लोक आता है, वह बिल्कुल ऐसे ही यदा यदा हि धर्मस्य और परित्राणाय साधूनां वैसे ही श्लोक आपे दे आता है। तो लगभग वो असी ते नब्बे प्रतिशत एक समान है, थोड़ा सा पूछा लगे है उसने।
तो यहाँ पर क्या बताया जा रहा है कि पहले से व्यक्तियों को बताया कि भौतिक जगत में जो भी परिवर्तन हो रहा है, वह क्यों हो रहा है? वह प्रकृति के कारण हो रहा है। कारण-कारण-कर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते। मतलब क्या कि भौतिक जगत में परिवर्तन हो रहा है। मान लीजिए, इसको मारा, ऐसे, तो क्या हुआ? मैंने इसको मारा, ये ऐसे मारा है, एक कार्य हो गया, तो उसका कुछ प्रभाव क्या हुआ? उसका प्रभाव का आवास की आगे। तो इस भौतिक जगत में कुछ कार्य होते हैं और कुछ प्रभाव होते हैं, या बस परिवर्तन जो होता है, तो क्योंकि हमें भोग करने की इच्छा होती है, हमें कुछ चीज़ों से आ सकती हैं और क्योंकि उन चीज़ों से हम आसक्त होने के अगर हमारी भावना है, उसमें जाती है, इसलिए उन चीज़ों को कुछ होता है, तो फिर सुख और दुख होता है।
अगर इसको मारेंगे तो कुछ सुख-दुख होगा नहीं, पर किसी के गाल में मारेंगे तो बड़ा सुख-दुख हो जाएगा। तो क्या हो रहा है एक तरह से, भौतिक से वो ही हो रहा है, एक हाथ जाके किसी और चीज़ को लग रहा है, पर इसमें बहुत परत है। तो जो भौतिक स्तर परिवर्तन हो रहे हैं, वो प्रकृति के कारण हो रहे हैं, पर उन परिवर्तनों के कारण जो प्रभाव होता है किसी में, वो क्यों है? उसके आसक्ति के अनुसार है। अगर अभी भारत में किसी को बेसबॉल क्या है पता ही नहीं है, जैसे भारत में लोग क्रिकेट के पीछे पागल होते हैं, वैसे अमेरिका में लोग बेसबॉल के पीछे पागल होते हैं। तो अभी बेसबॉल में एक टीम हार गई, दूसरी टीम जीत गई, तो अमेरिका में इतना उसके बारे में सेलिब्रेशन होता है या मेला होता है, कभी कोई टीम हार जाती है तो क्या, लोग इतना उससे स्टेडियम को जला जाते हैं, इतना उससे हो जाते हैं।
कभी लोग, पांच बार कोई टूर्नामेंट के फाइनल में पहुंच गए और पांचों बार फाइनल में हार गए और ये पांचों बार तो श्रीलंका के लोकप्रिय क्रिकेट के फैंस, क्रिकेट के फैंस? तो आखिर जो मैच था, जो श्रीलंका में ही हुआ था, उसका फाइनल, तो उसमें लग रहा था श्रीलंका जीत जाएगी और जब वो श्रीलंका हार गई, तो वो इतने हताश हो गए, कि वहाँ पे छह क्रिकेट फैंस ने आत्महत्या दिख रहे थे, क्या गया? और श्रीलंका क्या इतना अमीर भी देश नहीं है, तो क्या गया है? वो ही स्टेडियम के बाहर कोई पेड़ था, पेड़ पे अच्छे लोग रहे थे, साथ में अपने गले को रस्सी बांध के पा रहे थे। हम साथ में क्रिकेट देख रहे थे, साथ में क्रिकेट में दुख कर रहे थे, तुम ही क्रिकेट देख रहे थे।
तो अभी क्रिकेट ग्राउंड में जो हो गया, उससे हो गया भी, उससे इतनी भावनाएं क्यों आ गई? तो अभी क्रिकेट ग्राउंड में जो हो गया, किसी ने गेंद डाला, किसी ने उसको बैट से मारा, वो क्या है? कारण-कार्य-कर्तृत्वे हेतु प्रकृतिरुच्यते। वो भौतिक प्रकृति का परिवार नहीं हो रहा है, पर क्या है? पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुः उच्यते। जब भोग करने की भावना है, तभी क्या होता है? किसी को इतना सुख होता है, इतना दुख होता है। तो जब भारत में जीत तीन, चार, तीन, पांच, छह, सात, जब वर्ल्ड कप जीता था, मुंबई में हो रहा था, तो पूरे विश्व के इतिहास में वो जो दिन था, वर्ल्ड कप जीतने के बाद, किसी एक दिन में इतना शराब का सेलिब्रेशन दुनिया में कहीं नहीं हो रहा है। तो उसके बाद से इतने लोगों ने शराब किया और इतना सेलिब्रेशन किया, तो क्या, एक जीत गए, तो क्या है? तो यहाँ आसक्ति के कारण हमें सुख और दुख होता है।
तो इसलिए भगवान आप क्या बता रहे हैं, कि भौतिक प्रकृति जो है, उसमें परिवर्तन तो हो गए, पर वो परिवर्तन के कारण हमें प्रभाव कब होगा, जब हमें भोग करने की भावना है। भोग करने की भावना नहीं है, तो प्रभाव नहीं होगा।
पुरुष और गुणों का संग
और जो भोग करण हमें और अगले श्लोक में करते हैं।
पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुंक्ते प्रकृतिजान्गुणान्। कारणं गुणसंगोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु॥
पुरुषः प्रकृतिस्थो हि… पुरुषः स्वचेतन है और प्रकृति अचेतन है, तो उनमें वास्तव में कोई सामने नहीं है। पर यह पुरुषः प्रकृतिस्थो हि है, प्रकृति में क्यों चला जाता है उसमें? भुंक्ते प्रकृतिजान्गुणान्। अभी देखिए, कभी आप कोई टीवी देख रहे हैं या भी कोई कंप्यूटर देख रहे हैं, तो कंप्यूटर में कभी क्या होता है, खराब हो गया, तो फिर कोई ब्लू-स्क्रीन आता है या अगर आप पहले टीवी देख रहे होते तो वो इंटरप्शन आता है, तो कुछ आता ही नहीं है, सॉरी फॉर इंटरप्शन आता है या सिर्फ सब स्पॉट-स्पॉट-स्पॉट-स्पॉट आते हैं, कुछ आता ही नहीं है।
तो क्या होता है? जब सिर्फ से स्पॉट आते हैं, तो तभी क्या है उसमें कोई आकर्षण नहीं है। हम अभी वास्तव में हमेशा टीवी पर वो स्पॉट से आते हैं और कुछ आता ही नहीं है, पर वो क्या है? वो जब अलग-अलग रंग के स्पॉट से आते हैं और अलग-अलग पद्धति से आते हैं, तो उससे कुछ रूप प्रकट हो जाते हैं और जब वो रूप प्रकट हो जाते हैं, तो उससे कुछ आकर्षण होता है। तो हमेशा क्या हो रहा है? वो सिर्फ स्पॉट से ही आ रहे हैं, पर जब वो स्पॉट से किसी रूप में आ जाते हैं, तो उससे आकर्षण होता है। भुंक्ते प्रकृतिजान्गुणान्। तो सब कुछ प्रकृति ही है, पर जब प्रकृति गुणों के संगम के कारण कुछ अलग-अलग रूपों में आती है, अलग-अलग रंगों में आ जाती है, अलग-अलग गंधों में आ जाती है, तो क्या होते है? वो बहुत आकर्षक बन जाते हैं। प्रकृतिजान्गुणान्, अलग-अलग क्या है? कारण, कुछ गुणसंगोऽस्य, तो गुण से आसक्त हो गया है व्यक्ति, सदसद्योनिजन्मसु, क्योंकि गुण से आसक्त हो गया है व्यक्ति, उसके अनुसार भोग करने का प्रयास करता है, तो सदसद्योनि, अच्छे योनियों है या बुरे योनियों जन्म होता है।
तो यहाँ पे भगवान या बालजिन में पूछा कि पुरुष क्या है, प्रकृति क्या है, तो भगवान ने पहले बताए थे कि दोनों अनादी है, पर महत्वपूर्ण सवाल क्या आता है कि ये पुरुष जो है, प्रकृति में बंध कैसे गया? भोग करने की इच्छा होती है, उसके कारण वह प्रकृति में जो परिवर्तन होता है, उससे बहुत प्रभावित हो जाता है और उससे न केवल तभी सुख-दुख होता है, पर उसकी मानसिक तभी वैसे विकसित हो जाती है, मतलब अगर व्यक्ति किसी भौतिक वाली व्यक्ति है, वह पुरुष स्त्री से आसक्त हो जाता है बहुत, तो वह क्या होता है? वह स्त्री के बारे में चिंतन करता है, तो उसके वाले साथ अगले जन्म में उसका कारण प्रश्न ही मिल जाएगा उसको। तो न केवल तभी सुख-दुख मिलता है, पर उसके बाद में अगले जन्म में वैसे ही हो जाता है। पुरुषः प्रकृतिस्थो हि… इस तरह से पुरुषः प्रकृति में चला जाता है।
तो अभी हमारे आचार्य कहते हैं कि यह जो वाक्य है, यह श्लोक 13.22, यह संपूर्ण अगले 6 अध्यायों का बीज वाक्य है, बीज श्लोक है। यह क्या है कि इस श्लोक से जीवात्मा के भोगन देन के बारे में वर्णन आ रहा है और अभी कैसे होता है? अभी कोई बीज होता है, बीज से वृक्ष आता है, तो 15वें अध्यायों में एक वृक्ष के बारे में अगले है, ऊर्ध्वमूलमधःशाखम अश्वत्चं प्राहुर्व्ययं, बताया है कि एक ऐसा वृक्ष है जिसके जो शाखाएं हैं वो नीचे है, जिसके मूल ऊपर है। तो वो जो क्या है? वो भौतिक अस्तित्व को एक प्रतीकात्मक रूप से वृक्ष के लिए बताया गया है।
तो वो जो वृक्ष है, वो वृक्ष शुरुआत कैसी होती है उसकी? वृक्ष, हरे वृक्ष शुरुआत बीज से होती है। तो बीज क्या है? यह बीज है, तो भोग करने की प्रवृत्ति जो है, वो बीज है। इसे सारे वृक्ष की निर्मिती होती है और फिर इस वृक्ष में जब वृक्ष उत्पन्न हो जाता है, बीज पर ज्ञापन नहीं, उसके बाद में जल चाहिए, जल से क्या होता है? वो वृक्ष बढ़ता है। तो वृक्ष 15वें अध्याय में होता है, चौदवें अध्याय में वो वृक्ष कैसे वृद्धि होती है, वो बताता है। चौदवां अध्याय क्या है? प्रकृतेः तीन गुण, प्रकृति त्रैगुण विभाग योग उसको बोलते हैं। अगर अभी ये वृक्ष है, वृक्ष के ऊपर के भाग है, नीचे का भाग है, तो ऊपर का भाग जो है, वो क्या है? वो दैवी लोक है और जो नीचे का भाग है, वो असुरी लोक है। ये दैवी प्रकृति है, असुरी प्रकृति है, वो 16वें अध्याय में होता है।
और फिर 17वें अध्याय की शुरुआत अगर आप देखते हैं तो क्या है? बहुत 17वें अध्याय में आप लोग पूछते हैं कि ये भगवान, जो दैवी प्रकृति के भी लोग नहीं है और असुरी प्रकृति के भी लोग नहीं है, उनकी क्या गति होती है? ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः। ये 16वें अध्याय की 24 शुरुआत है वो, तो भगवान ने स्पष्ट बताया है कि आसुरी लोग है, पर अर्जुन 17वें अध्याय के पहले श्लोक में पूछते हैं, यह शास्त्रविधिमुत्सृज्य, वो शास्त्र का पालन नहीं करते हैं, पर वर्तते श्रद्धान्विताः, तो उनकी क्या गति होगी? मतलब अर्जुन वृक्ष के बीच में जो लोग हैं, उनके बारे में पूछते हैं। आप समझ रहे हैं कैसे विकास हो रहा है? वृक्ष के बीच का वर्णन तेरवें अध्याय के 22वें श्लोक में हुआ, फिर वृक्ष का वर्णन 15वें अध्याय में आता है। तो वृक्ष को बढ़ने के लिए पानी लगता है, वो तीन गुण है, उसका वर्णन 14वें अध्याय में आता है। तो वृक्ष का ऊपर का भाग जो है, वो दैवी प्रकृति, नीचे का भाग असुरी प्रकृति, वो 16वें अध्याय में वर्णन आता है और उसके बीच में भाग है जो लोग दैवी भी नहीं है, असुरी भी नहीं है, उसके बीच में उन लोगों का वर्णन 17वें अध्याय में आता है और अंत में इस सारे वृक्ष से बाहर कैसे निकलना है और कैसे भावना से निकलना है बाहर, वो 18वें अध्याय में आता है। 18वें अध्याय का शीर्षक क्या है? मोक्षसंन्यासयोग, यह परफेक्ट्रेशन… परवर बोलते हैं, संक्षिप्त इस तरह से। तो यह श्लोक बहुत महत्वपूर्ण है, पूरे आखरी छह अध्यायों के विचारों का प्रवाह है, वो समझने के लिए।
परमात्मा का स्वरूप
तो अभी इसके बाद में भगवान बता रहे हैं कि यह एक पुरुष तो हो गया जो क्या है? भोक्ता पुरुषोऽसि भुङ्क्ते जो भोग करने की इच्छा से यहाँ पर है और जो बंध गया है सदसद्योनिजन्मसु। और उसके अलावा एक और पुरुष है जो बंधन में नहीं है, उपद्रष्टानुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः परमात्मेति चाप्युक्तो देहेऽस्मिन्पुरुषः परः।
इसी में एक और आ गया, परः, परः मतलब परः का एक आ गया होता होता है, परः जो दिव्य है, परः होता होता है एक और, एक दूसरा है पुरुषः परः, उसका क्या विशेषता है? वो बंधावा नहीं, उपद्रष्टा, वो उपर से देख रहा है, उपद्रष्टा कर बंधावा में नहीं फसा हुआ है, अनुमन्ता और वो क्या? अनुमति दे रहा है और वो क्या? भर्ता, भोक्ता, महेश्वरा, वो पालन करता है, वो भोग करता है। अभी भोक्ता और भुङ्क्ते दोनों में फर्क है, यह भोक्ता मतलब यहाँ पर क्या है? कि भुङ्क्ते मतलब जो भोग करते हैं, तो भोक्ता अगर महेश्वर है और यही बताता है स्पष्ट रूप से परमात्मा के बारे में वर्णन, यहाँ प्यार है परमात्मा इति चाप्युक्तः, उक्तः मतलब उनको बताया जाता है, उनका नाम क्या है? परमात्मा और देहेऽस्मिन्, वो भी देहे में है। वो एक ऐसे पुरुष है जो परः है।
तो अभी हमने पहली चर्चा की थी इसी अध्याय क्या है? अठारहवें श्लोक में आया था, तो वही इसका भी स्पष्ट रूप से परमात्मा है। अभी परमात्मा ये शब्द का इस्तेमाल भगवद्गीता में इसी शब्द का प्रचुर से तीन बार आता है, तो ये दूसरी बार है। इसके पहले छठे अध्याय के सातवें श्लोक में आता है, जितात्मनः प्रशांतस्य परमात्मा समाहितः, शीतोष्णसुखदुःखेषु तथामानापमानयोः। जो व्यक्ति आत्मन को जीत लेता है, इसको निंदर प्राप्त… तो क्या होता है? परमात्मा समाहितः, वो परमात्मा तक पहुंच गया है। तो वहाँ पर परमात्मा के बारे में उल्लेख आता है, पर परमात्मा कौन है, यह वर्णन नहीं आता है। यहाँ पर परमात्मा कौन है, उसका वर्णन आता है। और एक बार परमात्मा का वर्णन कहां आता है? 15वें अध्याय के 17वें श्लोक में, उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः, यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः। उसी तरह है एक आत्म पुरुष, वो उत्तम पुरुष है, उसका नाम क्या है परमात्मा। तो परमात्मा का वर्णन है, मतलब जो शरीर है, उसमें क्या है? एक आत्मा है, दूसरा परमात्मा है।
कुछ माया वाले लोग बोलते हैं क्या है कि या वो उपनिषद की उदाहरण बताता है, उपमा की एक प्रश्न है, इसमें दो पंछी है और एक पंछी उसको खा रहा है, दोनों को कभी अच्छे फल परते सुझे रहा है, बुरे कट्टे स्वाद के फल परते, तो दुखे और दूसरा पंछी है, उसे देख रहा है। तो देखने वाला पंछी कौन है? परमात्मा है। खाने वाला पंछी जीवात्मा है। तो अभी ये श्लोक है, अभी उपनिषद ये श्लोक देखे, कठोपनिषद में, श्वेताश्वतर उपनिषद में आता है, यह द्वौ सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते, तयोरन्यो पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्नन्नन्योऽभीचाकशीति।
समाने वृक्षे पुरुषो निमग्नोऽनीशया शोचति मुह्यमानः, जुष्टं यदा पश्यत्यन्यमीशमस्य महिमानमिति वीतशोकः। जुष्टं यदा पश्यत्यन्यमीशम, अगर यह आत्मा जो है, यह खाने वाला पंछी है, वो सिर-ना-सिर मुड़ता है और जो देख रहा है पंछी, उसके ओर देखता है, तो क्या होता है? उसके सारे शोक चल जाएगे। इसमें उपनिषद में इतना है बता रहा है कि आत्मा को दृष्टि भौतिक जगत से वो भगवान के ओर ले जाएगे, परंचत्य के ओर ले जाएगे। तो मायावादी क्या बोलते हैं? इस श्लोक में यह बताया नहीं है, पर उसको रहते हैं कि जायगे पंछी दूसरे पंछी के ओर देखता है, दोनों पंछी एक-दूसरे के ओर देखते हैं और दोनों मज़े खेलते हैं। वास्तव में ऐसे भी बताया नहीं है कि यह दूसरे पंछी के ओर देखता है, तो क्या होगा? सारे मोह से मुक्त हो जाएगा। पर हम देखते हैं कि भगवान ही बताते हैं कि उनका अस्तित्व शाश्वत है, जायगे 15वें अध्याय के 7वें श्लोक बताते हैं।
तो आत्मा जो फंस गया है प्रकृति में, उससे बाहर कैसे निकलेगा? तो उसका वर्णन अभी अगले तीन श्लोक में आएगा।
ज्ञान और मोक्ष का मार्ग
तो अभी पर सबसे पहले भगवान बताएगा कि अभी मैंने जो बताया है, वहाँ ज्ञान क्या है, उसका सार?
य एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणैः सह, सर्वथा वर्तमानोऽपि न स भूयोऽभिजायते।
य एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणैः सह, सर्वथा वर्तमानोऽपि न स भूयोऽभिजायते। उसका पुनः जन्म नहीं होगा, वो पुनः बहुबंधन में नहीं फंसेगा, न स भूयोऽभिजायते। इस तरह से क्या बताया जा रहा है कि पुनः अगर व्यक्ति को बहुबंधन नहीं फंसेगा, तो ये ज्ञान को समझना चाहिए। तो लगभग ये जो है, जन्म-कर्म च मे दिव्यम्… उसमें क्या बताया जाएगा? आप मुझे समझ जाएगा तो क्या होगा? सिर्फ भौतिक संसार में आपको से नहीं आगे, उसके साथ क्या होगा? आप मेरे पास आओगे। तो ये क्या है? दो चीज़ें हैं।
अगर हम देखेंगे, अगर हम आत्मा के ज्ञान को समझ जाएंगे, तो भोगनन से निकल सकते हैं, पर सिर्फ आत्मा को समझने से हम भगवद्धाम नहीं प्राप्त कर सकते हैं। भगवद्धाम आत्मज्ञान से हम मुक्ति प्राप्त कर सकते हैं, पर भगवद्धाम ज्ञान से हम भगवद्धाम प्राप्त कर सकते हैं। हम देखते हैं, यह जो भेद है, 10वें अध्याय के तीसरे और सातवें श्लोक में आता है। तीसरे श्लोक में आता है, यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम्, असमूढः स मर्त्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते। तो क्या, अगर विधि समझ जाता है मामजमनादिं च, विधि समझ जाएगा तो क्या होगा? एक है कि वो पापों से मुक्त हो जाएगा, पर उसका ही अगला भाग जो है, महाँ पर सातवें श्लोक बोलते हैं भगवान, कि सोऽविकल्पेन योगेन युज्यते नात्र संशयः। कि अगर आप समझ जाएंगे, तो ना केवल आप पापों से मुक्त हो जाओगे, पर आप मेरी भक्ति में लग जाओगे।
तो दोनों हमको चाहिए, हमको सिर्फ क्या है? हमको सिर्फ बीमार से ठीक नहीं होना है, बीमार से ठीक होना अच्छी बात है, पर बीमार से ठीक होने के बाद हमको स्वास्थ्य, हमारा सेहत जो है स्वास्थ्य है, वो पुनः प्राप्त भी करना है। क्या होता है कि इसको बहुत बड़ी बीमारी दिया है, अगर एक सर्फ ट्यूबरकुलोसिस में हो गया है, तो मुझे 5-6 साथ में पुराना ट्यूबरकुलोसिस हो गया था, 6 महीने हॉस्पिटल में था, 6 महीने कंटिन्युअसली ट्रीटमेंट दे रहा था और उसके बाद में डॉक्टर कहा भी ट्यूबरकुलोसिस के जर्म से आपके सर्फ चली गए थे, तो बीमारी नहीं है, पर बीमारी नहीं है, इसका मतलब नहीं कि स्वास्थ्य आ गया, आपको अभी 6 महीने आप आराम कर रहे थे कि आपकी बीमारी चला गया है, पर आ गए तो दोनों एक ही चीज़ नहीं है, एक है जो नकारात्मक है वो चल जाना है और दूसरा है सकारात्मक आना है।
तो आत्मज्ञान से नकारात्मक चल जाएगा, आत्मज्ञान से क्या होगा? अगर आप समझूंगा कि मैं शरीर नहीं आत्मा हूँ, तो भौतिक चीज़ों के भोग पर, पर आत्मज्ञान से सकारात्मक भगवान की आत्मशीन नहीं आएगा, वहाँ आने के लिए दूसरा कुछ करना पड़ेगा, भगवान की सेवा करनी पड़ेगी। तो दोनों चाहिए हैं, यहाँ पे क्या बताया गया है, अगर यहाँ प्रकृति का पुरुष का समझ जाए…
ध्यानेन आत्मनि पश्यंति केचिदात्मानमात्मना, अन्ये सांख्येन योगेन कर्मयोगेन चापरे।
ध्यानेन आत्मनि पश्यंति, कुछ लोग पश्यंति देखते हैं केचिदात्मानमात्मना, अन्ये सांख्येन योगेन कर्मयोगेन चापरे, कुछ लोग कर्मयोग से करते हैं। तो इसमें से भगवान क्या बोलते हैं कि ये सब विधियां हैं, इनमें से भगवान किसी की पुष्टि नहीं कर रहे हैं कि हम ये सब विधियां हैं। अगर हम डॉक्टर के पास आ जाएंगे, आपको कहा ये ट्यूबरकुलोसिस आ गए हैं, तो कुछ लोग ट्यूबरकुलोसिस के लिए होम्योपैथी याद करते हैं, कुछ लोग नेचुरोपैथी करते हैं, कुछ लोग एलोपैथी करते हैं और फिर बताएंगे मैं क्या चाहता हूँ, आप क्या करना चाहते हैं, यही देखते हैं।
चौथे अध्याय में भी ऐसे आता है कि अलग-अलग प्रकार के यज्ञ नहीं होते हैं, कुछ लोग क्या करते हैं, 25वें श्लोक में कुछ, कुछ लोग देव-देवता को पूछते हैं, कुछ ब्रह्मन को पूछते हैं, कुछ योग करते हैं, कुछ ये करते हैं, कुछ वो करते हैं, पर भगवान बोलते हैं, आपको बढ़ा करना चाहिए, वो चौथे श्लोक में भी करते हैं, तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया, आप गुरु के पास जाएं, गुरु इसर मार्ग है आत्म साक्षात्कार के लिए, पर रोकिसमाती पुष्ट करते हैं वो अगले श्लोक में आएगा।
अन्ये त्वेवमजानन्तः श्रुत्वान्येभ्य उपासते, तेऽपि चाति तरंत्येव मृत्युं श्रुतिपरायणाः।
अन्येष्वेवं अजानन्तः, कुछ और लोग है एवं अजानन्तः, यह कुछ जानते हैं इसके बारे में श्रुत्वा, वो श्रवण करते हैं। श्रवण जो है, यह भक्ति का अंग है, श्रुत्वा अन्येभ्य, कुछ और लोगों से श्रवण करते हैं और भी क्या करते हैं? उपासना करने लगते हैं, पूजा करने लगते हैं, भक्ति करने लगते हैं और तेऽपि चाति तरंत्येव, वो भी अति तरंत्येव, वो भी चल जाते हैं, मृत्योः श्रुतिपरायणाः, नारायण परायणा होना चाहिए। इसके बिल्कुल विरुद्ध है, नारायण परायणा कहा था कि नारायण परास्य वै न कुतश्चन बिभ्यति, चित्रेषु महाराज के बाद बताते हैं, इतना बड़ा श्राप दिया फिर भी वे विचलित नहीं हुए, नारायण परायणा। नारायण परायणा एक जड़ है, पर क्या है? बहुत बड़े लोग क्या होते हैं? कामक्रोध परायणा। कामक्रोध परायणा आता है, 16वां अध्याय में आता है, 16वां अध्याय में आता है, कामक्रोध परायणा…
समता और दृष्टा दृष्टि
आवत संचायते किंचे… सक्तवां स्थावरजंगमः, क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्तद्विद्धि भरतर्षभ।
आवत संचायते किंचे… यहाँ पर जो भी सृष्टि में अस्तित्व को लगता है, कोई वो छोड़ी की छोड़ी की को न हो, वो क्या है? सत्युम् स्थावरजंगमा, जो भी है इस भौतिक जगत में, स्थावर और जंगम हो। स्थावर और जंगल, ये चलने-फिरने… आजीने… चलने-फिरने… आजीने… चलने-फिरने… आजीने… चलने-फिरने… आजीने… चलने-फिरने… आजीने…
यहाँ पे ये एक आत्मा है, जिसको पूर्व कर्म से एक शरीर मिल गया है, तो किसी लोगों को आकर से एक शरीर मिलता है, कुछ लोगों को आकर से एक शरीर नहीं मिलता है, पर क्या है? वो एक क्षेत्र है, जो उसको मिला है, तो उहाँ भवन्दन में हैं, मेरी भवन्दन में हैं, हम दोनों को एक दूसरे… उहाँ भवन्दन बढ़ाना नहीं मिलेगा। तो किसी लोगों को आकर से एक शरीर है, जो उसको मिल नहीं मिलता है, तो…
समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम्, विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति।
समं सर्वेषु भूतेषु, सब भूत है, सब जीवात्मा है, समं रूप से देखना है, क्या समारा भी देखने हैं? तिष्ठन्तं परमेश्वरम्, की इसके अंदर एक ईश्वर है। अभी ये परमेश्वर, इसका संधि का विकरण दो पाथ से होता है, एक परमेश्वर कहलाता है, एक परमात्मा को देख सकते हैं और दूसरा है परम ईश्वर, जो ईश्वर मतलब आत्मा भी एक तरह का ईश्वर ही है, इस शरीर में भले ही हम परमेशन हैं, पर हम भी ईश्वर हैं, मैं वो बोलना चाहता हूं और उसके साथ मैं बोल रहा हूँ, तो उस तरह से मैं नेवानी को नियंत्रण कर रहा हूँ, तो मैं भी एक प्रसवराह ईश्वर हूँ, छोटा ईश्वर हूँ। और यह जो ईश्वर है, वो परम है। परम क्या था? सर्वश्रेष्ण हो सकता है और परम का धर्म होता है कि परा, मतलब आध्यात्मिकता है। तो मतलब सब लोग में क्या है? आत्मा है, उसका कभी विनाश नहीं होने वाला है।
और एस्ट्रेस जो देखता है, जो पश्यति स पश्यति। जो जो देख रहा है, वही वास्तव देख रहा है, बाकी जो लोग है, वो आंखें हैं, फिर भी वो देख नहीं रहे हैं। क्या है? जो हम देखते हैं, हम सिर्फ आंखों से नहीं देखते हैं, हम ज्ञान से देखते हैं। अभी एक कोई छोटा बालक है घर में, उसको मां बोलती है कि देखो घर में कहीं कचरा दिखेगा आपको, कहीं कागज का टुकड़ा गिरा होगा, तो उसको तुम क्या करना है, फाड़ देना आपका पॉकेट में बढ़ाते हैं। यह पश्यति स पश्यति, जो समझता है कि साधारण कागज नहीं है, यह वास्तव में लक्ष्मी है, यह पैसा है। तो क्या है? अभी बाहर रूप से देखें तो एक कागज दिखेगा, पर ज्ञान से जो देखता है, वही सत्य में देख रहा है, यह पश्यति स पश्यत, वहाँ हमारे ज्ञान का चक्षु नहीं है, पर जब हम शुरू के पर आत्मा देखते हैं और आत्मा की समानता देखें, यह पश्यति स पश्यत। और इस तरह से अगर देखें तो उसका प्रभाव क्या होगा? वो अगले श्लोक में बाबा और बोलते हैं। यह विद्या-विने संपन्न के समान नहीं है? महाँ पे से बता रहा है कि आप शुरू के पर आत्मा तत्वों को देखो, भाव एक ही है। अच्छी एक विद्या श्लोक आता है इस तरह से। सुहृद् मित्रार्यदासीना मध्यस्थद्वेषबन्धुषु, साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिविशिष्यते। शत्वाय त्यागना वश्यक भी हुई है।
समाबुद्धेन सबको देखो। पर वो किस तरह से समाबुद्धेन देखो? वो अलग-अलग ज्याव पर अलग-अलग भाव है। यहाँ पर क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ की दृष्टि से आता है, पर इन प्रैक्टिकल एप्लीकेशन दोनों एक पर। इसकी बाद में अभी इस तरह से जो देखता है, उसका प्रभाव क्या होगा?
समं पश्यं हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम्, न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम्।
समं पश्यन्, समान रूप से देखता है, देखती सर्वत्र सब जगह पे क्या कि समवस्थितमीश्वरम्, वो देखता है कि सब जगह में, सब लोगों में आत्मा अस्तित्व है। ऐसी यह श्लोक है, कजाचार्य बोलते है कि आत्मा का उल्लेख करता है, परमात्मा का उल्लेख करता है, दोनों का उल्लेख करता है, सब लोगों में वही स्थित आत्मा है, परमात्मा है, कुछ भेद नहीं है लोगों में। न हिनस्त्यात्मनात्मानम्, अपने मन से खुद का पतल नहीं करेगा। मतलब क्या कि अगर कोई मेरा अपमान करता है, साधारणतया क्या होता है? बहुती बहुत व्यक्ति का तुम मेरा अपमान करें, मैं उससे बड़ा तुम्हारा अपमान करता हूँ, कहते हैं क्या अपमान है? क्या होता है? तुम शेर तो मैं सवाशेर क्योंकि मैं उसका दुगुना आ जाते हैं, ज़्यादा करते हैं आपको देखते हैं, तो वो भाव होता है। तो वो भाव से वो संघर्ष बढ़ जाता है। तो क्या है?
अगर हम देखते हैं कि वास्तव में हम एक बात में, एक बीच पर हमारे प्रेसिडेंट मिनिस्टर बता रहे थे कि वो एक बात अमेरिका में प्रेसिडेंट कर रहे थे और वो एयरपोर्ट पर थे, प्रेसिडेंट कर रहे थे, एक नीग्रो व्यक्ति था, आजकर नीग्रो नहीं बोलते हैं, वो नीग्रो से जाति भावत है, इसको अफ्रीकन अमेरिकन बोलते हैं, यह अफ्रीकन अमेरिकन बोलते हैं, तो वो आदमी को किताब दिखाया और किताब देखने के लिए नाक में मुक्का मार दिया और वो नीग्रो नहीं बोलते हैं और वो नीग्रो नहीं मुक्का मार दिया, नाक में किताब देखने के लिए और वो नीग्रो नहीं मुक्का मार दिया।
तो भी क्या है, साधारण देख चाहते हैं, मैं तो मुझे मार सकता हूँ, तो मैं तो मार सकता हूँ, पर तभी वो ने क्या हो गया, पता नहीं, मुझे इसलिए कहते हैं कि भगवान भी इसके रुदय में है, भगवान ने इसको इसलिए अलाउ किया है, मुझे सहन करना सही है और फिर और उनके लोग देख रहा था, मैंने वो मार दिया, मैं आपको किताब दिखाने जाता था, मैं आपको किताब दिखाने जाता था, यह नहीं चलिया, पर वो बोल गया, किताब नहीं ले और चला गया। पर क्या हुआ? दूसरा दो-तीन वो देख रहे थे क्या हो रहा है कि कोई गिर गया, किसको मार ले, तो लोग उत्साहित हो जाते हैं, क्या हो रहा है? वो बोले, बाकी लोगों देखा कि मैं कितना विनम्रता से नहीं बात करें, क्या उतना विनम्रता से किताब बात करें कि किताब क्या हम जाना सोते हैं और बाकी तीन लोगों ने बात करें।
तो क्या है? जब हमारा, अगर हम देखते हैं कि वास्तव में भगवान ही सब परिस्थिति में अंतरिम है, तो फिर हम उचित पद्धति से उसका response प्रतिक्रिया कर सकते हैं। तो इससे सभी हम मन्य के द्वारा प्रतिक्रिया करते हैं, जब भगवान, ऐसे भगवान का हाथ नहीं देखते हैं, तो फिर क्या होता है? हम बहुत इसकर प्रतिक्रिया करते हैं। तो ऐसे कर भी हो सकता है कि हमें ऐसे नहीं कि हमेशा कोई आक्रमण करें, तो हमें इसे को सहन कर लेना है, कभी-कभी हमें कोई मंदिर में, कोई मंदिर को उत्सव कर में वो आता है, तो हमें भी शस्त्र इस्तेमाल करने पड़े तो कर सकते हैं। प्रभुपाद जी ने मायापुर में बताए थे कि आप बंदूकें भी रख सकते हैं, भक्तों को वहाँ पर बंदूक को चलाने में वो शिक्षण चाहिए है। तो ऐसे नहीं कि सब जगह अहिंसा ही रखना है हमको, प्रभुपाद जी ने क्या है कि जो उचित कार्य है, वो उचित कार्य करना चाहिए है और क्या उचित है, वो अलग-अलग मिलता है।
पर अगर हम भगवान यंत्र कहें देखते हैं, तो फिर न हिनस्त्यात्मनात्मानं, कि नहीं हमारे आत्मा से उसका ये मार-पतन नहीं होगा, ततो याति परां गतिम्। मारपुर मंदिर था, तभी कुछ महाँ पर ये गुंडे आ गए थे, उसने शुरुआत आ गए थे, वो विग्रहों को उद्धोष्ट करने वाले थे। तभी तो भक्तिचारु महाराज थे, महाँ पर भक्तिचारु महाराज नहीं थे, ना उनको पहले से पोलियो था, अभी मैं होता हूँ, कसिका चलते हैं, तो बहुत सारे लोग गरंड दिखा के आ रहे थे।
तो क्या हुआ? जब उन देखा कि विग्रहों पर आक्रमण करने चले गए, तो वो अपने कर्चेस को ले के आ गए और उनके उस्तों को आक्रमण करने लगे। तो अभी वो ये देखे कि ये व्यक्ति तो चल नहीं है, पर तो फिर उसके बाद में वो विस्फोटक हो गया और बहुत बड़ा हादसा हो गया, पर बाद में जब उनको पूछा गया तो तभी, तभी बताया था कि वास्तव में कि ये जो मेरा पहले पेर था, वो पहले से ही पुराने पापों से खराब था और जो खराब है, भगवान की सेवा में त्याग करने का मौका मिल गया है मुझे, ये मेरा भाग है और उससे कम से कम विग्रह में आक्रमण तो नहीं हो गया, तो क्या हो गया, वो विस्फोट हो गया, तो वो लोग भी डर गए, पुलिस हो गए आज्ञा, तो वो जले भाग गए महाँ से।
तो क्या है? यहाँ भगवत कुछ भी त्याग करने के लिए तैयार हो सकते हैं। तो क्या है? न हिनस्त्यात्मनात्मानं कि हम उस तरह सुचित कार्य कर सकते हैं, जिससे कि हम बंधन में नहीं फंसेगें, पर बंधन से बाहर निकलेंगे। तो यह जो ज्ञान चक्षु है, इसके बारे में हम बहुत अच्छा होगे तब करेंगे। बहुत-बहुत धन्यवाद। श्री कृष्ण भगवद्गीता की, श्री कृष्ण भगवद्गीता की जय! बहुत-बहुत बहुत-बहुत बहुत-बहुत बहुत-बहुत!