Gita 18.40-63 – Bhakti is the spiritual summit that also extends down to wherever we may be (Hindi)
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Lecture Summary
यह प्रवचन श्रीमद्भगवद्गीता के 18वें अध्याय के उस भाग पर आधारित है जिसमें भगवान वर्णाश्रम धर्म, स्वभावगत कर्म और परम शरणागति (भक्ति) का विस्तार से वर्णन करते हैं।
- सामाजिक व्यवस्था और वर्णाश्रम: आध्यात्मिकता केवल एक व्यक्तिगत प्रयास नहीं है, बल्कि समाज में रहकर धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की दिशा में आगे बढ़ने के लिए वैदिक संस्कृति में वर्णाश्रम व्यवस्था (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र) की योजना बनाई गई है। यह भेदभाव के लिए नहीं, बल्कि हर व्यक्ति को उसके स्वभाव के अनुसार कार्य करने और समाज में सहयोग स्थापित करने का मार्ग है।
- स्वभावगत कर्म और उनकी विशेषताएँ:
- ब्राह्मण: शम (मन का नियंत्रण), दम (इंद्रियों का नियंत्रण), तपस्या, पवित्रता, ज्ञान और विज्ञान।
- क्षत्रिय: शौर्य, तेज, धैर्य, युद्ध से पलायन न करना, दान देना और प्रजा का सही मार्गदर्शन करना।
- वैश्य और शूद्र: कृषि, गोरक्षा, व्यापार (वैश्य) तथा समाज सेवा व सहयोग (शूद्र)।
- कर्मयोग से भगवद्गीता की सर्वोच्च भक्ति तक: व्यक्ति को अपने स्वाभाविक कर्म करते हुए उन्हें भगवान की पूजा या सेवा के रूप में अर्पित करना चाहिए (स्वे कर्मणा तमभ्यर्च्य)। केवल कर्म करने से सिद्धि नहीं मिलती, बल्कि कर्म को भगवान की प्रसन्नता के लिए करना ही वास्तविक योग है।
- परम शरणागति (भक्ति का मार्ग): अंत में भगवान अर्जुन को ज्ञान और कर्म योग के विभिन्न स्तरों से ऊपर उठाकर अपनी शरण में आने का उपदेश देते हैं (सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज)। जो व्यक्ति अपनी चेतना को पूरी तरह भगवान में लगा देता है (मच्चित्तः), वह भगवान की कृपा से सभी बाधाओं और दुखों से पार हो जाता है।
Full Transcription
न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः।
सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक् तं यदेभिः स्यात्त्रिभिर्गुणैः॥
तो यहाँ पे अभी कल सुधाने चर्चा की थी कि भगवान ने कर्म हमें सत्वगुण में कैसे करना है, उसका वर्णन किया है। उसके लिए उन्नीसवें श्लोक से शुरुआत की, कैसे हमारा ज्ञान, कर्म, कर्ता, फिर बुद्धि, धृति और सुख—यह छह चीज़ें किस तरह से तीन गुणों में हो सकती हैं और किस तरह से यदि हम यह सत्वगुण में लाएँगे, तो फिर हम कर्मबंधन से छूटने के मार्ग में अग्रसर हो सकते हैं।
तो अभी क्या है कि आध्यात्म यह केवल एक व्यक्तिगत कार्य नहीं है, यह एक सामाजिक कार्य भी है। कैसे? अगर नदी का प्रवाह एक दिशा में जा रहा है, तो उस दिशा में जाना, तैरना आसान हो जाता है। पर नदी का प्रवाह अगर एक दिशा में जा रहा है और उसके विरुद्ध में जाना है हमें, तो और मुश्किल हो जाता है।
तो अभी कलियुग जो है, इसमें अधिकांश समाज जो है, भौतिकवादी है। इसलिए अगर हमें आध्यात्म का अनुशीलन करना है, तो वो काफ़े मुश्किल होता है। लोग क्या है? वो प्रवाह के खिलाफ़ जाने के समान है। तो ऐसे नहीं है कि भौतिक जगत मतलब हमेशा भौतिकवादी है, भौतिकवादी होते हैं लोग, पर अगर एक धर्म की योजना है पूरी, तो क्या होता है? भौतिकवाद वो धर्म के अनुसार होता है।
इसलिए धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष—इसमें अर्थ और काम ये भौतिकवादी ही हैं, पर क्या है? धर्म के अनुसार होते हैं वो, तो फिर वो व्यक्ति अपने भौतिक ज़िम्मेदारियाँ निभाते हुए, अपनी भौतिक इच्छाएँ पूरी करते हुए भगवान की ओर प्रगति कर सकता है। तो इसके लिए समाज की रचना भी अगर होगी, तो बहुत उचित है यह।
और यह वास्तव में वैदिक संस्कृति, वैदिक शास्त्र, वैदिक धर्म का और बाक़ी दुनिया में जो भी धर्म हैं, उनका फ़र्क है। क्या है? इस्लाम है, क्रिश्चियनिटी है, जैनिज़्म है, बुद्धिज्मि है, ऐसे अनेक धर्म हैं, तो उनमें से किसी भी धर्म में एक पूरी तरह से व्याप्त समाज की रचना, जिससे कि धर्म में प्रगति कर सके, ऐसे किसी भी धर्म में बताया नहीं है। क्रिश्चियनिटी में बताया कि आप जीज़स में श्रद्धा रखो और अपना जीवन जियो, पर बाइबल में अगर हम पढ़ते हैं, तो बाइबल में ऐसे कोई समाज की रचना करने का वर्णन नहीं है। तो बाद में कुछ क्रिश्चियन राजा थे, विचारवंत थे, तो हमने कुछ बनाया है नहीं। तो वैसे इस्लाम में भी हम क़ुरआन में पढ़ते हैं, क़ुरआन में ऐसे कुछ निर्णय नहीं हैं।
तो वैदिक शास्त्र जो है, उसमें न केवल एक आध्यात्मिक गति बताई है, बहुत स्पष्ट से बताई है, स्वाधा वो खुला नहीं है वहाँ, नहीं है। उसके साथ-साथ यह भी बताया है कि समाज की रचना किस तरह से की जाए, जिससे कि व्यक्ति वो आध्यात्मिक गति की ओर प्रगति कर सके। तो इसलिए यह जब होता है, तो फिर व्यक्ति के लिए प्रगति करना आसान हो जाता है, संघर्ष कम होता है।
तो इसके लिए वर्णाश्रम की पद्धति बताई है। और वर्णाश्रम में प्रभुपाद जी बोलते हैं—वर्ण यह शरीर के लिए होता है, आश्रम यह आत्मा के लिए होता है। मतलब वर्ण क्या है? ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र—यह क्या है? इसके द्वारा व्यक्ति अपने स्वभावों के अनुसार वह कार्य कर सकता है और अपने जो भौतिक ज़िम्मेदारियाँ हैं, उनको पूरा कर सकता है।
तो ब्राह्मण, ब्राह्मण का कर्तव्य करेगा। और जो स्त्रियाँ होती हैं, उनका भी अपना वर्ण होता है। प्रभुपाद जी बोलते हैं कि साधारणतया स्त्रियाँ जो होती हैं, वो अपने पति को उनके धर्म में मदद करती हैं। इसलिए जो उसी वर्ण में विवाह होता है, तो अच्छा होता है। कभी-कभी कुछ कहते हैं कि स्त्रियों का वर्ण अलग नहीं होता है, अपने पति का एक वर्ण होता है, मतलब स्त्री का वर्ण विवाह के पहले पता होना चाहिए। तो उसका मतलब क्या है? अपने आप स्त्री का वर्ण, पुरुष का वर्ण एक नहीं होता है, वो समाज की योजना से एक होना चाहिए।
तो इसलिए जो इंटर कास्ट मैरिजेस हैं, इंटर कास्ट मैरिजेस हो, क्या बोलते हैं? अंतरजातीय विवाह—वैदिक संस्कृति में उसको इतना उसकी पुष्टि नहीं की है, उसको अच्छा नहीं बोला है। क्या होता है? फिर वो दोनों के स्वभाव में, दोनों के स्वधर्म में वो समस्या आ जाती है।
अभी देवहूति का उदाहरण है श्रीमद्भागवतम् में। यद्यपि वो ब्राह्मण के… क्षत्रिय के परिवार में जन्मी थीं, पर उसका स्वभाव ब्राह्मण जैसे था। और उसके कारण ही उसने स्वयं से जब उसने नारद मुनि से कर्दम मुनि के बारे में सुना, तो उसका हृदय… उसके हृदय में आकृष्ट हो गया। और फिर जब स्वयं भुवन को पता चला, तो उनको लेके गए और फिर उनके साथ उनकी सेवा करने लगी। और उनके साथ वो ब्राह्मणी के समान ही जीवन जी रही थीं।
महाभारत में वर्णन आता है कि शकुंतला की कहानी आती है। तो जब भरत महाराज होते हैं, वो शकुंतला को देखते हैं, उनके आकृष्ट होते हैं, वो कहते हैं—तुम ऋषि के कन्या के रूप में रह रही हो, पर मैं ब्राह्मण हूँ, मैं क्षत्रिय हूँ… तो क्षत्रिय मैं एक ब्राह्मणी के लिए आकृष्ट नहीं हो सकता, तो ब्राह्मणी मेरे लिए एक माता के समान होगी। तो मैं तुम्हारे आकृष्ट हो रहा हूँ, इसका मतलब यह है कि आप भले ही ऋषि के कन्या के रूप में रह रही हूँ, आप ब्राह्मणी नहीं हूँ, आप क्षत्राणी… फिर वो अपनी पूरी कहानी बताती है।
तो ये कहानी का भाव क्या है? कि वैदिक संस्कृति में हर एक व्यक्ति को अपने वर्ण के अनुसार कार्य करने के लिए सहयोग दिया जाता है। अगर कोई क्षत्रिय राजकुमारी है, उसको अगर बोले कि आप ब्राह्मणी जैसे रहो, तो मुश्किल हो जाएगा। उसकी उसी तरह से, जैसे पुरुष का वर्ण है, वैसे स्त्री का वर्ण है। सबको अपने-अपने वर्णों के अनुसार कार्य करने का मौका मिलता है, तो फिर क्या होता है? वो व्यक्ति भौतिक दृष्टि से भी कुछ संतुष्टि प्राप्त करता है।
कैसे है? एक है आध्यात्मिक सुख जो हम भगवान का स्मरण करते हैं, भगवान की सेवा करते हैं, उससे प्राप्त होता है। और उसके विपरीत है भौतिक सुख। अभी भौतिक सुख ऐसे होता है कि उसमें हम अगर इंद्रियतृप्ति करते हैं, वो एक प्रकार का भौतिक सुख है। पर उसके साथ-साथ इंद्रियतृप्ति मतलब क्या? हमारी वासना है—काम, क्रोध, लोभ, मोह उससे जो सुख मिलता है, वो भौतिक सुख कहते हैं। पर वो इकलौता भौतिक सुख नहीं है। अगर कोई ब्राह्मण, ब्राह्मण जैसे कार्य करता है, मतलब क्या? ब्राह्मण को शास्त्र का अध्ययन करने में आनंद ही लगता है, तो वो कार्य करता है, तो उससे उसको एक भौतिक सुख मिलता है। पर यह भौतिक सुख जो है, एक धार्मिक भौतिक सुख है।
क्षत्रिय, अगर उसको राज करने की स्वाभाविक आकांक्षा है, युद्ध ऐसा करता है वो, तो उससे क्षत्रिय को… क्षत्रिय कर्तव्य करने में, मैं अभी क्षत्रिय, भक्त भले नहीं होगा, वो भक्त नहीं है, फिर भी क्षत्रिय कर्तव्य कर रहा है, तो क्या है? वो एक भौतिक सुख मिलेगा। वो क्या है? वो व्यक्ति को जो अधार्मिक भौतिक सुख है और धार्मिक भौतिक सुख है, इन दोनों में फ़र्क है। अगर कोई से विवाह के बाहर कोई पुरुष-स्त्री का संबंध होता है, तो वो क्या है? वो अधार्मिक भौतिक सुख है। पर अगर एक कोई ब्राह्मण, ब्राह्मण, क्षत्रिय, क्षत्रिय, अपने-अपने वर्णों के अनुसार कार्य करते हैं, तो वो एक भौतिक सुख ही है उसमें, पर वो क्या है? धर्म के अनुसार भौतिक सुख है। और वह सुख व्यक्ति को आश्रय प्रदान करता है।
ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परंतप।
कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः॥
यह चार वर्ण हैं। वैश्य में नहीं हुई, वैश्य के बारे में बोल गई। कर्माणि प्रविभक्तानि, उनके हरेक के अपने-अपने कर्म हैं। और ये कर्म के साथ हैं पहले—स्वभावप्रभवैर्गुणैः। उनके जो गुण हैं, उनके अनुसार उनके कर्मा आते हैं।
चौथे अध्याय में भगवान ने बताया कि चातुर्विण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः।
शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च।
ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम्॥
तो ब्राह्मणों के स्वभाव के अनुसार इस प्रकार का वो कर्म करेंगे। तो यहाँ पर हम देखते हैं भगवान बोल रहे हैं—मैं कर्म बताऊँगा, पर वो ब्राह्मणों का कर्म नहीं वर्णन कर रहे हैं, ब्राह्मणों के गुण वर्णन कर रहे हैं। अगर हम ब्राह्मणों का कर्म देखते हैं, तो क्या है? वो भगवान बोल रहे हैं—यजन, याजन, पठन, पाठन, दान, परिग्रह। खुद यजन करना, दूसरों को यजन सिखाना। यजन, याजन, पठन, पाठन, खुद शास्त्रों का अध्ययन करना, दूसरों को शास्त्रों का अध्ययन सिखाना, शास्त्र सिखाना। और दान, परिग्रह—वो दान देते हैं उनको और वो दान स्वीकार करते हैं। और बहुत ज़्यादा दान आ गए, तो वो दान दे देते हैं।
जो महाराज दशरथ जब पुत्र प्राप्ति के लिए यज्ञ करते हैं, तो यज्ञ के बाद में जो ऋषि गणा आ जाते हैं, वो कहते हैं कि मैं मेरा पूरा राज्य आपको दान दे देता हूँ। तो जब वो राज्य दान देते हैं, दशरथ महाराज को पूरे अच्छे से जानते हैं कि ये ब्राह्मण राज्य स्वीकार नहीं करेंगे। आजकल कोई लंपटी हो रहे हो, आप मुझे को दान दे दो और घर जाएगा, वो पूराप्ति दे दे, तो वो बोलते हैं—मैं दान स्वीकार करता हूँ और मैं ब्राह्मण हूँ, मुझे ये क्या आवश्यकता है?
तो ऋषि श्रृंग वो गेरे, वो सब ब्राह्मण होते हैं—हम आपको यह वापस कर देते हैं और आप यह धर्म के अनुसार राज्य करो। तो दान और परिग्रह, वो जितनी ज़रूरत है, उतना स्वीकार करते हैं और बाद में उसको पुनः दान दे देते हैं। यहाँ पर, वहाँ क्या बता रहे हैं? गुण बता रहे हैं। क्योंकि क्या है? व्यक्ति वो कर्म उचित पद्धति से नहीं कर सकता है, अगर गुण नहीं है उसमें तो। तो अगर शमो-दमा नहीं है, तो वो क्या करेंगे व्यक्ति? सारे दान स्वीकार करेंगे, पर दान देगा नहीं है, क्या होगा? लेगा, लेगा और कुछ देगा नहीं है।
प्रभुपाद जी बोलते हैं जो ब्राह्मण होते हैं, उनके दो कर्तव्य होते हैं—क्या होता है कि जो उनके वाणी से वो भोजन करते हैं, पर वाणी से उनको कथा भगवान के ज्ञान करना चाहिए। तो आजकल क्या होता है? बहुत से ब्राह्मण होते हैं, वो सिर्फ़ भोजन करते हैं और कुछ ज्ञान देते ही नहीं हैं, सिर्फ़ कुछ मंत्र बोलते हैं, रीति-रिवाज करते हैं। और क्या होता है? लोग सिर्फ़ रीति-रिवाज के स्तर पर रहते हैं, आध्यात्मिक ज्ञान को प्राप्त नहीं होते हैं। तो वास्तव में ब्राह्मण के कर्म करने के लिए गुणों की आवश्यकता है।
तो यहाँ पर एक गुण बताया है—शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च। शम मतलब मन को शांत रखना, दम मतलब इंद्रियों को नियंत्रण करना। अभी इंद्रियों में फ़र्क क्या है? कि सबसे अच्छा यह है कि मन को ही नियंत्रण कर लें। मन को नियंत्रण कर लेंगे, तो फिर हमें भौतिक चीज़ों से विचलित नहीं होगे। पर अगर मन को नियंत्रण नहीं कर सकते हैं, मन किसी कारण विचलित हो जाता है, तो भी शारीरिक स्तर पर कुछ कार्य नहीं करना, मतलब इंद्रियों को नियंत्रण करना।
मन विचलित है और मन उत्तेजित कर रहा है कि कुछ करो, और इंद्रियों को बोलते हैं—नहीं करूँगा। क्षमा और उत्साह है, अगर कर सकते हैं, तो ये समझना है। तो एक कमरा है और वो कमरे के बाहर एक चोर है और कमरे के अंदर एक मूल्यवान हीरा है। तो अभी अगर वो जो मालिक है, उसको पता है कि यह हीरा चोरी करने के लिए बाहर एक चोर आया है, दरवाज़ा के बाहर ही खड़ा है, तो क्या करेगा वो? वो दरवाज़ा बंद कर लेगा, बोल्ट कर लेगा, चेन लगा लेगा, खुलेगा ही नहीं दरवाज़ा। तो इस तरह से क्या हो गया? वो चोर अंदर आ ही नहीं पाएगा।
पर अगर ग़लती से वो दरवाज़ा खुला रह गया, तो क्या हो गया? तब वो दरवाज़ा पे कुछ पड़ेगा वो चोर, और अभी दरवाज़ा खुल के अंदर आ गया, तो क्या करेगा मालिक? अरे, अभी चोर आ जाओ कि ले ले, चोर, हीरा चल जाओ! नहीं, क्या करेगा? वो भी अंदर से दरवाज़ा पे मारेगा और गढ़ा पर बंद करके उसको वहाँ फेंकेगा, वहाँ डालने का प्रयास करेगा।
तो वैसे ही क्या है? जो कमरा है, यह हमारी चेतना के समान है। तो हमारी चेतना में जो रत्न है, वो कृष्ण भक्ति का रत्न है, कृष्ण के स्मरण का रत्न है। और यह कमरे के दरवाज़े के बाहर क्या है? माया है—निकटस्थमाया तटस्थहिया धरे। निकट ही माया है, पर। तो अभी हमें माया से बचना है, तो क्या करना है? कमरे का दरवाज़ा बंद करना है, मतलब क्या है? मन भगवान में ही लगा देना है, ताकि और कुछ मन में आए ही न, विचार भगवान की सेवा में, भगवान के स्मरण में मन लगा देंगे, तो माया को प्रवेश करने का मौक़ा ही नहीं मिलता है। तो यह है शम।
सबसे अच्छा क्या है कि मन को इस तरह से नियंत्रित कर लें कि और कहीं मन जाए ही नहीं, माया को आने का मौक़ा ही न मिले। पर किसी तरह से मन अगर इधर ख़ाली रह गया, माया से प्रवेश हो गया, बहुत भौतिक वास्तव है मन में आ गया, तो फिर क्या करना है? तभी वो चोर अंदर आ गया, तो क्या करना है? तभी वो चोर को ढकेल के बाहर निकालना है, वो मतलब है दम।
दम मतलब क्या? मन उत्तेजित हो गया है, पर मैं उस पर कार्य नहीं करूँगा, मैं उसके अनुसार इंद्रियतृप्ति में नहीं लगूँगा। तो शम और दम ये दोनों ब्राह्मणों के गुण हैं। और शम और दम दोनों करने के लिए क्या लगता है? तपस्या लगती है। और इस तरह से अलग-अलग गुण हैं—शम, दम, तपस्या, शौचं… जो ब्राह्मण को शुद्ध रहना पड़ता है। तो उसके अनेक नियम मनुस्मृति में बता रहे हैं।
यहाँ पर एक महत्वपूर्ण भाग है। भगवान यहाँ पर ब्राह्मण के गुणों में भक्ति नहीं बता रहे हैं, क्यों भक्ति नहीं बता रहे हैं? यहाँ पर आस्तिक्यं है, ज्ञानं, विज्ञानं… आस्तिक्यं ज्ञान मतलब… यहाँ पर आस्तिक्यं का ज्ञान है, विज्ञान मतलब उसका साक्षात्कार है। आस्तिक्यं मतलब, हम साधारणतया आस्तिक्यम, आजकल के समाज में आस्तिक्यम् इस्तेमाल करते हैं किसके लिए? जो भगवान में विश्वास करते हैं, भगवान में विश्वास नहीं करते हैं… पर वैदिक संस्कृति में आस्तिक्यम् मतलब जो वेदों में विश्वास करते हैं, उनको आस्तिक्यम् कहते हैं।
तो आस्तिक्यम् मतलब क्या? जो ब्राह्मण होते हैं, उनको वेदों में विश्वास होना चाहिए। अभी भगवद्गीता यह वेदों का सार है, वेदों का सर्वोच्च निष्कर्ष है, तो सब ब्राह्मणों को वो पता होगा, यह आवश्यक नहीं है और सब ब्राह्मण वेदों के भगवान की भक्ति करेंगे, यह भी आवश्यक नहीं है। क्या होता है? वैदिक शास्त्रों में तामसी कृति-रिवाज़ भी बताए गए हैं और वो जो ब्राह्मण करते हैं, ऐसे हो सकता है उनको जो परम सत्य है, पता नहीं है।
कई बार अंधे, ब्राह्मण में से वर्णन आता है कि जब रावण युद्ध करने जा रहा था, या रावण के राक्षस युद्ध करने जा रहे थे, तो तभी उसको शुभकामना और मंगल प्राप्त करने के लिए उसके ब्राह्मण थे और वो पूजा-पाठ कर रहे थे। तो वो ब्राह्मण को बताया था कि वो यतुधान थे, उनका नाम था। तो यह ब्राह्मण थे, यह सात्विक ब्राह्मण नहीं थे, यह भक्त ब्राह्मण नहीं थे। अगर भक्त होते, तो भगवान के विरुद्ध जा के यश प्राप्त करने के लिए कामना नहीं करते, उसके लिए यज्ञ नहीं करते।
तो क्या होता है? ब्राह्मण अलग-अलग स्तर पर होते हैं—सात्विक, राजसिक, तामसिक। पर तामसिक ब्राह्मण में क्यों नहीं हो, उनमें श्रद्धा होती है कि वेदों में जो बताया है, अगर यज्ञ करेंगे, पूजा करेंगे, तो उससे फल मिलेगा। उनके जीवन का उद्देश्य यह नहीं होता है कि भगवान को हमारा जीवन समर्पण करना है, उनका उद्देश्य होता है कि हमको यहीं पर सुख होना है, पर उसके लिए हमें वेदों का पालन करना चाहिए। तो आस्तिक क्यों? ब्राह्मणों में आस्तिक्य होना चाहिए।
अभी भक्ति के बाद में वर्णन भगवान आगे करेंगे। तो यह ब्राह्मणों के गुणों हो गए। इसके बाद में क्षत्रियों के गुणों के बारे में भगवान बताएंगे:
शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम्।
दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम्॥
शौर्यं—शौर्यं मतलब क्या? डरना नहीं है, हिम्मत रखना है। बहुत ही धैर्य से युद्ध करना है। तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम्, कैसे युद्ध करना है, किस तरह से? वो डरते नहीं है, कि युद्ध में क्या हो जाएगा, युद्ध में भय के बिना युद्ध करते नहीं हैं। युद्ध बहुत एक शक्तियों है। और फिर दानमीश्वरभावश्च, वो दान देना बड़ा महत्वपूर्ण कार्य है।
धिष्ठिर महाराज, महाभारत में वर्णन आता है कि जब उनको निमंत्रण मिलता है, वास्तव में निमंत्रण एक तरह से आदेश ही होता है धृतराष्ट्र का कि आप यह जुआ खेलने आ जाओ, सबसे पहले वो सभा में प्रवेश करते हैं, तो वो शकुनि से कहते हैं कि जो धन मैं ब्राह्मणों की सेवा के लिए इस्तेमाल करना चाहता हूँ, जिसके लिए मैंने अर्जित किया है, क्यों आप इस जुए के माध्यम से, बेईमानी से मुझसे छीनना चाहते हैं?
और जब उसके बाद में जा रहे हैं, जुआ में सब कुछ खो देते हैं वो, और फिर जब वो जंगल में जा रहे होते हैं, तो कई ब्राह्मणों के साथ आने लगते हैं। तभी युधिष्ठिर महाराज क्या विलाप करते हैं? मेरा कितना दुर्भाग्य है कि मैं अभी ब्राह्मणों की सेवा नहीं कर पा रहा हूँ। और फिर तभी वो अपने गुरु, अपने जो पुरोहित होते हैं, भुम ऋषि, उनसे पूछते हैं कि मैं यह ब्राह्मणों को सेवा करना चाहता हूँ अभी भी, तो कैसे कर सकता हूँ सेवा? मैं कैसे उनका पालन कर सकता हूँ? मेरे पास राज्य नहीं है।
तो तभी वो उनको बोलते हैं कि आप सूर्य की पूजा करो और फिर सूर्य की पूजा करके उनको अक्षय पात्र प्राप्त होता है और फिर अक्षय पात्र से वो जंगल में भी होते हैं, तो ब्राह्मणों का पालन करते हैं, ब्राह्मणों को देख-भाल करते हैं। तो दानम्—दान यह बहुत महत्वपूर्ण गुण है क्षत्रियों का। क्यों? क्योंकि क्या होता है? क्षत्रियों के पास नियंत्रण होता है कि समाज पे नियंत्रण होता है, प्रजा पे नियंत्रण होता है, उनसे कर वसूल करना होता है। तो क्या होता है? नियंत्रण जब आता है, तो उससे नशा हो सकता है, उन्मत हो सकता है, पर दान देते हैं, तो क्या होता है? उससे आसक्ति कम रहती है।
और एक यहाँ पे महत्वपूर्ण है—ईश्वरभावश्च। अभी हम कहेंगे तो हमें तो ईश्वरभाव नहीं होना चाहिए, कहते हैं जीवात्मा भौतिक जगत में क्यों दुखी है? क्योंकि वो ईश्वर बनना चाहता है। और भगवान ने बताया है सोलवे अध्याय में कि आसुरी प्रवृत्ति का होता है, मानसिकता होती है—‘ईश्वरोहम् अहम भोगी’ कि ईश्वरोहम्, मैं ईश्वर हूँ, ऐसे बताया था, आसुरी लोग बोलते हैं।
तो पर यहाँ पर क्षत्रियों का भाव बताया है—ईश्वरभावश्च, कि क्षत्रियों में ईश्वरभाव होना यह उनका अच्छा गुण है। तो अभी ईश्वरभाव होना यह अच्छा गुण कैसे हो सकता है? कि वास्तव में क्या है? इस जगत में भगवान कार्य नहीं करते हैं, क्या है? यहाँ पर भगवान कार्य करते हैं अपने प्रतिनिधियों में, तो भगवान परमेश्वर है। पर इस दुनिया में अगर कार्य होना है, तो उसके लिए किसी को तो ईश्वर बनना है। क्या है? भगवान परम सृष्टिकर्ता है, पर इस दुनिया में प्रजा उत्पन्न होती है, तो भगवान क्या करते हैं? वो एक माता-पिता वो इस्तेमाल करते हैं, उससे फिर लोगों उत्पन्न करते हैं।
तो माता-पिता भी अपने सृष्टिकर्ता हैं, वो प्रधान सृष्टिकर्ता नहीं है, पुरुष और सृष्टि साथ में आते हैं, तो कई बार संतानोत्पत्ति नहीं होती है, क्योंकि इच्छा होते हुए भी नहीं होती है। तो क्या है? वो परम सृष्टिकर्ता नहीं हैं, पर वो एक अधीन सृष्टिकर्ता है। तो क्या है? क्षत्रिय इस दुनिया में किसी न किसी तो राजा बनना चाहिए, तो कौन राजा बनेगा? जिसमें ईश्वरभाव है। ईश्वरभाव मतलब क्या? जिसमें दूसरों को नियंत्रण करके उनको सत्मार्ग में ले जाने की क्षमता है।
तो ईश्वरभाव, भगवान यह आख़िरी गुण बता रहे हैं, पहला गुण नहीं बता रहे हैं, क्या है? बाक़ी सब गुण नहीं होना चाहिए—युद्ध्ये चाप्यपलायनम्, दानम् होना चाहिए। इन सब गुणों से क्या होता है? वो ईश्वरभाव भी नियंत्रित रहता है। वो ईश्वरभाव जो होता है, वह शोषण का कारण नहीं बनता है।
ब्राह्मणों को बहुत समाज में आदर मिलता है, ईश्वर होता है, उनकी शक्ति होती है, पर ब्राह्मणों को ऐसे बताया जाता है कि आप भगवान के सामने, भगवान के भक्तों के सामने, ब्राह्मणों के सामने हमेशा आपको आदर दिखाना चाहिए। तो इसलिए इससे क्या होता है कि वो ईश्वरभाव, वो सत्मार्ग में लग जाता है, वो शोषण का कारण नहीं बनता है।
अब इसके बाद में भगवान वैश्य और शूद्र के गुणों के बारे में बताएंगे:
कृषिगोरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम्।
परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम्॥
कृषि, गोरक्षा, खेती करना, गायों की रक्षा करना और धंधा करना—वाणिज्यं वैश्य कर्म स्वभावजम्। जो गोवर्धन लीला होती है उसमें भगवान कृष्ण, जो बालक होते हैं, नंद महाराज से कहते हैं कि ये वैश्यों के कर्तव्य हैं। और उसके साथ-साथ, इनमें से गो रक्षा सबसे सर्वश्रेष्ठ है, कि गो रक्षा थोड़ा निस्वार्थ भाव से होता है।
पर अभी ये जो कर्तव्य है, ये समाज में करना है किसी न किसी, किसी से, हो। पर गो रक्षा जो क्या होती है? इसमें यह नहीं बताया गया है कि गायों का धंधा करना, गो वाणिज्य नहीं बताया है, गो रक्षा बताया है। तो इसका, पहली बार प्रभुपाद जी जब भगवद्गीता लिख रहे थे, तो उसका भाषांतर, उनके इंग्लिश एडिटर थे, वो बोले कि प्रभुपाद जी, इसको… गया, प्रभुपाद जी भारतीय थे, तो कभी-कभी इंग्लिश उनका इतना उचित नहीं था, तो कभी-कभी उनके एडिटर थे, उनको मदद करते हैं कि आप इसको बदल सकते हैं, ऐसे बोलेंगे तो समझ में आ जाएगा। तो उनके एडिटर ने बोला कि इसको इंग्लिश में ‘कैटल रियरिंग’ बोलते हैं। कैटल रियरिंग मतलब कि जो गाय जानवर थे, उनको बड़ा करना। प्रभुपाद जी बोले—नहीं, कैटल रियरिंग का मतलब इस्तेमाल करो। कैटल रियरिंग का मतलब क्या होता है? वो जानवर को बड़ा करते हैं ताकि वो कसाई के पास लेके फिर उसका मांस खा लें। तो वो नहीं बता रहे हैं, भगवान ने बोले—वो काउ प्रोटेक्शन, गो रक्षा।
गो रक्षा क्यों बता रहे हैं? क्योंकि क्या होता है? साधारण जो कोई धंधा कर रहा होता है, तो उसको क्या देखता है वो कि अगर ये धंधा से मुझे कुछ फ़ायदा हो रहा है, तो मैं धंधा करूँगा, धंधा से नुक्सान हो रहा है, तो मैं धंधा छोड़ दूंगा। तो अगर वही भाव रहेगा, तो क्या होता है? कोई वैश्य होगा, वो लेगा, अब गाय में दूध दे रहे हैं, तो मैं उसको संभाल कर रहूँगा, गाय दूध देना छोड़ दे रहे हैं, अब उसको मारूँगा… तो ऐसे नहीं, वो गायों का जीवन भर रक्षा करने चाहिए, इसलिए गो रक्षा।
तो वास्तव में गाय ऐसी है कि अगर उचित संस्कृति है, तो गाय के गोमूत्र और जो गोबर है, उससे ही काफ़ी आर्थिक से फ़ायदा हो सकता है और वो गाय का पालन करने का उससे ही आर्थिक से बराबर इसका आप निकल सकता है। पर क्या है? वैसे नहीं भी हो रहा है, तो भी गो रक्षा, यह क्या होता है? जब व्यक्ति पैसा कमाता है, तो स्वाभाविक है कि पैसे कमाने समय लालच आ सकता है और उससे स्वार्थी रहने के लिए क्या होता है? कि आप गायों की रक्षा करना है, गायों से धंधा नहीं करना है—गो रक्षा, यह बताया गया है।
फिर परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम्—शूद्र के बारे में क्या होता है? बाक़ी लोगों को मदद करना होगा, बाक़ी सब समाज में जो भी कार्य हैं, उनका तो अपने अपनी पद्धति से सहयोग करना, यह शूद्रस्यापि स्वभावजम्।
तो अभी यही जो है, समाज में जो विभाजन है, इसका उद्देश्य क्या है? इसका उद्देश्य भेदभाव नहीं है। इसका उद्देश्य क्या है? यह डिस्क्रिमिनेशन नहीं है, यह कोऑपरेशन है। भेदभाव नहीं है, सहयोग है। क्या? हर एक व्यक्ति को अपने स्वभाव के अनुसार कार्य करने का मौक़ा मिलता है, तो फिर व्यक्ति प्रगति कर सकता है।
अभी यह दुर्भाग्य का सत्य है कि भारत के इतिहास में जाति के आधार पर बहुत भेदभाव हुआ है और काफ़ी अन्याय भी हुआ है। पर यह जाति पद्धति के कारण नहीं हुआ है, उसके दुरुपयोग के कारण हुआ है। दुरुपयोग मतलब क्या? जो व्यक्ति उच्च शक्ति थे, उन्होंने अपने ऐसे बोलने लग गया कि ये जन्म से ही सब कुछ हैं, जन्म से ही वर्ण हैं और फिर जो जन्म से नीचे हैं, उनका शोषण करने लगे। तो इस तरह से बता के शोषण किया है। तो क्या है? यह जो जाति पद्धति की अपनी समस्या आई है, वो वैदिक जो वर्णाश्रम पद्धति है, उसका दूषण है। वो उस पद्धति में ग़लत समस्या नहीं है।
हम देखते हैं विश्व के इतिहास में इतनी सारी संस्कृतियाँ थीं। अगर आप इतिहास पढ़ते हो, तो कोई ग्रीक संस्कृति थी, रोमन संस्कृति थी, मेसोपोटामियन थी, ईरानीयन थी। अब ये संस्कृतियों में से आज एक भी नहीं है, वो सिर्फ़ पढ़ते हैं इतिहास में। विश्व की प्राचीन संस्कृतियाँ देखते हैं, तो उसमें से एक ही संस्कृति अभी चल रही है, वो है भारतीय संस्कृति।
क्यों? अगर यह भारतीय संस्कृति, अगर ये लोगों के शोषण पर आधारित होती है, मतलब उच्च वर्ण के लोग, नीचे लोग के वर्ण का शोषण कर रहे हैं, उस पर आधारित होती है, तो जो शोषण पर आधारित होती है संस्कृति, वो ज़्यादा समय तक टिक नहीं पाती। कभी ना कभी क्रांति होती है, पर भारत पर इतने, अगर एलेक्जेंडर के समय से हम देखते हैं कि कितने सारे लोगों ने इस पर आक्रमान किया, फिर भी भारतीय संस्कृति चलते रहा है, क्यों? क्योंकि यह वर्णाश्रम की पद्धति…
अभी भगवान बताएंगे कि यह संस्कृति… अभी यह तो समाज का विभाजन हो गया, अपने-अपने कर्म के बारे में बताएंगे, पर सिर्फ़ ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र अपने कर्मों से, अपने-अपने कर्मों से वो आध्यात्मिक प्रगति नहीं करते, इसलिए क्या करना है? अपने कर्म जो हैं, वो भगवान की भक्ति में अर्पण करने हैं, भक्ति के भाव से करने हैं। तो वो जो अभी अगले पंद्रह श्लोकों में भगवान बताएंगे:
स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः।
स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विंदति तच्छृणु॥
सुनो अर्जुन, क्या सुनो? तच्छृणु। स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः—अपने-अपने कर्म में लगते हुए संसिद्धिं लभते नरः, व्यक्ति संसिद्धि प्राप्त कर सकता है। वो कैसे प्राप्त कर सकता है? यथा विंदति स्वकर्मनिरतः सिद्धिं—स्वयं कर्म करते हुए सिद्धि कैसे प्राप्त कर सकता है, उसका वर्णन अभी मैं करता हूँ, भगवान कह रहे हैं।
यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततं।
स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विंदति मानवः॥
यहाँ महत्वपूर्ण है—स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य—अपने कर्म से, तम—तम मतलब परम पुरुषोत्तम भगवान हैं, उनकी पूजा करो, उनकी आराधना करो। स्वकर्म से उनकी आराधना करो। और वो कौन है? तम यतः प्रवृत्तिर्भूतानां, जिनसे सब कुछ आया है, जो परमसत्य है (भगवान ने बताया—अहं सर्वस्य प्रभवो, मत्तः सर्वं प्रवर्तते)। येन सर्वं इदं ततं, जिनसे सब कुछ व्याप्त है, वो परम पुरुषोत्तम भगवान हैं, उनकी आप पूजा करो—स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य।
अगर ऐसे करोगे, सिद्धिं विंदति मानवः, जो मानव है, उसको सिद्धि प्राप्त होगी। स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य, अपने कर्म से उनकी पूजा करो, बताया है। इसका ग़लत भाषांतर करके कई लोग बोलते हैं—कर्म ही पूजा है। भगवान यह नहीं बोल रहे हैं कर्म ही पूजा है। बोलते हैं तो क्या? स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य—कर्म के द्वारा उनकी पूजा करो, कर्म ही पूजा नहीं है। अगर कर्म ही पूजा होती, तो गधा सबसे बड़ा पुजारी बन जाता है, सबसे बड़ा काम करता है!
तो कर्म ही पूजा नहीं है, कर्म यह हमारा कर्तव्य है, पर यह कर्तव्य जो है, वास्तव में भौतिक है। तो हमें उसको आध्यात्मिक कैसे बनाना है? भगवान की भक्ति में लग के। तो हमारा कर्म जो है, वो हमारे शरीर के लिए हम कर रहे हैं, शास्त्रों में उसके बारे में बताया है, पर उसके साथ-साथ हमें भगवान की भक्ति करनी है। तो क्या है? जब हम भगवान की भक्ति करते हैं, तो फिर उसके द्वारा हम भगवान के क़रीब जाते हैं। सिर्फ़ हमारे कर्तव्य में से हम भगवान के क़रीब जाएँगे, ऐसे नहीं होता है।
क्या होता है? हम कर्तव्य करते रहते हैं, तो कर्तव्य करते-करते बहुत चेतना ही रहती है हमारे आध्यात्मिक चेतना नहीं होता है। इसलिए क्या है? हमारी भक्ति के लिए हमें समय रखना होता है। हम सुबह साधना करते हैं, जप करते हैं, श्रवण करते हैं, उससे क्या होता है? हमारी चेतना, हमारा हृदय भगवान से संबंध हो जाता है। तो जब हमारा हृदय भगवान से संबंध हो गया है, फिर हम जो कार्य करते हैं, वो भी भगवान से संबंधित कर सकते हैं। अगर हमारा हृदय भगवान से संबंधित नहीं है, तो हम जो कार्य करेंगे, उनका सिर्फ़ हमारा उनसे संबंध रहेगा और भौतिक जगत में हम रहेंगे।
इसलिए स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य, अपने कर्तव्यों को पूर्ति करते हुए जब हम समझते हैं कि यह जो कर्तव्य मुझे भगवान ने दिए, भगवान की सेवा के लिए मैं कर रहा हूँ और भगवान ही मेरे स्वामी हैं, तो फिर क्या होता है? उच्च चेतना में करते हैं, तो सिद्धिं विंदति, तो हमारा हृदय भगवान से हम संबंध करते हैं।
तो जब हम इस तरह से अर्पण नहीं कर सकते हैं, हमारा हृदय सदा ही वह हम भगवान को अर्पण नहीं कर सकते हैं, तो क्या बताया जाता है कि अगर आप, आपको जो भगवान के लिए अर्पण नहीं कर सकते हैं, तो यह जो हमारा प्रवृत्ति है, वह स्वाभाविक रूप से हमारा हृदय में है। ब्राह्मण है तो यह ग्रंथ पढ़ना है, यह करना है, पढ़ना है, तो फिर वो क्या है? वो सब भगवान को अर्पण कर सकते हैं।
तो अपने आप सिर्फ़ ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य का कर्म करने से भक्त या प्रगति नहीं करेगा, वो जो है, वो भगवान को अर्पण करना है। और वो भगवान को अर्पण करने के लिए एक विशेष रूप से भगवान की भक्ति भी करनी है, तो उससे क्या होता है? हमारे भगवान से संबंध होता है—स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य।
और फिर भगवान बताते हैं यहाँ पर जो होते हैं कि स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य, परकर्मणा तमभ्यर्च्य नहीं—दूसरे का कर्म नहीं करो, खुद का ही कर्म करो। वो भगवान यहाँ पर बताते हैं:
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्॥
तो यह जो श्लोक के पहले दो पंक्तियाँ हैं—श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्। स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः। वही भाव बताया है, पर यहाँ पर ज़ोर थोड़ा अलग है। यहाँ पहले क्या बताया है? खुद का धर्म करना अच्छा है, दूसरों का धर्म मत करो आप। परधर्मात्स्वनुष्ठितात्, यहाँ पर कहने का भाव क्या है कि अर्जुन सोच रहे हैं कि मैं हिंसा इस तरह से क्यों करूँ कि दूसरों को मारना है, उससे बेहतर है कि मैं जंगल में जाऊँगा और एक ब्राह्मण के समान तपस्या करूँगा और वैसे मैं जीवन जिऊँगा। तो बोले कि तुम्हारा कर्तव्य जो है, क्षत्रिय कर्तव्य है, तुम ब्राह्मण का कर्तव्य से स्वीकार मत करो। तुम अभी गृहस्थ हो, तुम एक संन्यासी का कर्तव्य स्वीकार मत करो। स्वधर्म जो है, उसके अनुसार कार्य करो।
तो क्या कहते हैं? क्यों इससे बताया है कि हमारे स्वभाव के अनुसार हम कार्य करेंगे, तो हम कार्य वो शाश्वत काल तक कर सकते हैं। अगर स्वभाव के अनुसार कार्य नहीं करते हैं, तो फिर क्या होता है? कुछ समय तक कर सकते हैं वो, पर उसमें संतुष्ट नहीं रहते, बहुत मन में विचलित रहते हैं और फिर बहुत समय तक कर नहीं सकते हैं। तो अगर अर्जुन किसी ब्राह्मण के समान रहेगा, अभी क्या होता है कि क्षत्रिय जो ब्राह्मण होते हैं, वो दान लेते हैं, तो दान मतलब स्वीकार करते हैं, क्षत्रिय जो होते हैं, वो कर लेते हैं, वो क्या होता है? टैक्स लेते हैं, वो शक्ति भी इस्तेमाल करते हैं अगर ज़रूरत है उसके तो। उन दोनों में फ़र्क है।
तो अभी अर्जुन अगर ब्राह्मण जैसे बनेगा, दान माँगने जाएगा और क्या होगा? कोई बोलेगा—मैं दान नहीं दूँगा, तो क्या होगा? नहीं, बोलेगा तो तुरंत उनका तलवार उठ जाएगा, तो क्या होगा? वो क्षत्रिय के समान भाव है, वो क्षत्रिय के समान भाव जाएगा नहीं उनसे। तो इसलिए वो बोलते हैं कि आप श्रेयान् स्वधर्मो विगुणः…
अभी यह श्लोक है, क्या होता है? कई बार लोग भगवद्गीता का श्लोक—परधर्मो भयावहः… निष्ठा ज्ञानस्य परा… इसमें ज्ञान मार्ग में निष्ठा होती है और उसके द्वारा व्यक्ति प्रगति कर सकता है।
बुद्ध्या विशुद्धया युक्तो धृत्यात्मानं नियम्य च।
शब्दादीन्विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च॥
विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः।
ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः॥
तो विविक्तसेवी, जो ज्ञान मार्ग में होते हैं, वो संघ में रहते हैं, हर व्यक्ति अपना-अपना अलग रहता है। विविक्तसेवी, जो अकेले में रह रहे हैं। और फिर लघ्वाशी—खाना बहुत कम खाना, इतनी शरीर की ज़रूरत है, उतना ही खाना। फिर यतवाक्कायमानसः—कि अपने शरीर, वाणी और मन, इन सबको नियंत्रण करना। और फिर ध्यान योग में लग जाना।
और इस तरह से वैराग्य को पूर्ण तरह से आश्रय ग्रहण करना। तो वैराग्य क्या है? ऐसे नहीं है कि वैराग्य के दुनिया को दिखाना है कि कितना बड़ा वैराग्य होगा, नहीं, वैराग्य का आश्रय ग्रहण है—ब्रह्मभूयाय कल्पते।
तो अभी अहंकारं बलंदर्पं—ये सारे जो भौतिक भावनाएँ हैं, उनको त्यागना है। कामं क्रोधं परिग्रहं—इन सब को त्यागना है। कभी क्या होता है? कभी वैरागी बन जाता है, तो वैरागी बनने के बाद अहंकार आता है—क्या, ये सब लोग आ सकता है, मैं विरक्त हूँ! तो उसका अहंकार नहीं आना चाहिए। वैराग्य के बाद अहंकार को त्यागना है, सबसे पहले भगवान बोलते हैं। अहंकारं बलंदर्पं, इनको भी त्याग दिया। और फिर क्या हो गए? इसके द्वारा व्यक्ति ब्रह्म स्तर पे आता है—ब्रह्मभूयाय कल्पते।
तो बहुत सूक्ष्म होती है, कामी शक्ति को त्यागने पर व्यक्ति ब्रह्म स्तर पे आता है, फिर क्या होता है? मद्वक्तिं लभते पराम।
ब्रह्मभूयः कल्पते प्रसन्नआत्मा न शोचति न काङ्क्षति।
समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम्॥
यहाँ पर बता रहे हैं—ब्रह्मभूयः कल्पते प्रसन्नआत्मा। आत्मा का स्वभाव क्या है? सच्चिदानंद। जब आत्मा का स्वभाव क्या होता है? तो प्रसन्न हो जाता है। और फिर क्या होता है? हमें यह चाहिए, वो क्यों हो रहा है? शोचति और काङ्क्षति है। हरदा हमारे मन में हमें जो कि मुझे यह चाहिए, क्यों नहीं मिल रहा है, और यह होना चाहिए है, क्यों नहीं हुआ ऐसे… तो उससे मुक्त हो जाता है, क्योंकि वो समझ जाता है कि मैं आत्मा हूँ और मुझे यह भौतिक चीज़ों से कुछ सुख नहीं मिल रहा है। न शोचति न काङ्क्षति है, और न केवल सारी भौतिक चीज़ों को समान रूप से देखता है, वो सब लोगों को भी समान रूप से देखता है—समः सर्वेषु भूतेषु।
और यहाँ पर महत्वपूर्ण भाव क्या है? उस समय उसको परा भक्ति प्राप्त होती है—मद्भक्तिं लभते पराम्। मतलब क्या है? अभी यहाँ पर भगवान मार्ग बता रहे हैं कि धीरे-धीरे कर्म योग करता है, फिर ज्ञान योग करता है, फिर ब्रह्म स्तर पर आता है, उसके बाद में शुद्ध भक्ति प्राप्त होती है।
तो यह जो श्लोक है, यह मायावाद का बहुत स्पष्ट खंडन है। मायावादी क्या कहते हैं? आप भक्ति करो, फिर भक्ति करने से मुक्ति हो जाएगी, तो आप भक्ति छोड़ दो। फिर ब्रह्म स्तर पर पहुँचने के लिए… ब्रह्म स्तर पर पहुँचने के लिए भक्ति त्यागनी है? यहाँ पर बोलते हैं भगवान कि ब्रह्म स्तर पर पहुँचने के लिए वास्तव में भक्ति शुरू होती है, परा भक्ति शुरू होती है! यह बहुत महत्वपूर्ण श्लोक है कि भक्ति जो है, सदैव करनी है। भक्ति का जो दिव्य स्तर है, वो यहाँ पर स्पष्ट बताया गया है। तो हम जो अभी भक्ति कर रहे हैं, वो मिश्र भक्ति है, कुछ कर्म की इच्छा है हम में, कुछ ज्ञान की इच्छा है।
भक्त्या मामभिजानाति यावान्यस्मी च तत्त्वतः।
ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम्॥
तो भक्त्या मामभिजानाति, यह बहुत स्पष्ट बताया गया है। मुझे जानना कैसे आता है? भक्त्या मामभिजानाति—भक्ति से आप जान सकते हैं। तो इसके पहले भगवान ने 11वें अध्याय के 53 और 54वें अध्याय के श्लोकों को बताया है कि और कोई मार्ग से आप नहीं समझ दे सकते हैं—नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया। शक्य एवंविधो द्रष्टुं दृष्टवानसि मामृषाम्। भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन। ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परंतप॥ भगवान बोलते हैं और किसी मार्ग से आप समझ दे सकते हैं? यह भक्ति से ही समझ सकते हैं।
तो वही यहाँ पर दोहरा रहा है, कैसे समझ पाऊँगे आप? जैसे मैं अभी हूँ यहाँ पे, जैसे मैं वास्तव में हूँ, तत्त्वतः वो समझ पाऊँगे ना आपको। और भगवान ने पहले बताया चौथे अर्जुन के नौवें श्लोक में कि अगर आपनी तत्त्वतः समझ पाओगे, तो क्या होगा? आप मेरे धाम आ जाओगे—जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं वेत्ति तत्त्वतः। त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन।
तो वहाँ पर दो शब्द इस्तेमाल के लिए यहाँ पे आते हैं—अभी जानाति और तत्त्वतः। हाँ, तो आप ब्रह्म में लीन हो जाओगे, तो यह अर्था यहाँ पर उचित नहीं है, क्योंकि ब्रह्म में की प्राप्ति पहले ही हो गई है 54वें श्लोक में, ब्रह्म की प्राप्ति हो गई है। तो अभी वहाँ पे इसके बाद में भगवत की प्राप्ति हो गई है, तो भगवान की प्राप्ति के बाद में फिर ‘विशते’ का मतलब क्या है? और दूसरे जगह पर भगवद्गीता में देखते हैं, हम क्या बताते हैं कि मेरी प्राप्ति होते हैं भगवान ने सब स्थूल से बताया है।
तो इसलिए यहाँ पर ‘विशते’ का अर्था क्या है? आचार्यगण बताते हैं कि वो जो शाश्वत आध्यात्मिक जगत है, उसमें प्रवेश होता है। भगवान क्या बोल रहे हैं? वो उसमें प्रवेश कर रहे हैं। तो कैसे आचार्यगण समझाते हैं इसमें? कि कोई हरा पंछी अगर हरे पेड़ में जाता है, तो बाह्य रूप से ऐसे लगेगा कि लीन हो गया है वो, पर क्या है? वो हरा पंछी और हरा पेड़ अलग है, सिर्फ़ हमारी दृष्टि को दिखाई नहीं दे रहा है।
तो इस तरह से क्या होता है? आत्मा जो है सच्चिदानंद है और सारा जो परव्योम है, सारा आध्यात्मिक जगत है, वो भी सच्चिदानंद है। तो यहाँ से ऐसे लगता है कि वो लीन हो रहा है, पर वो लीन नहीं हो रहा है, आत्मा का जो व्यक्तित्व है, वो सदैव बना रहता है और वो भगवान के धाम में जा के वहाँ पे सदा भगवान की भक्ति करता है।
तो इस तरह से भगवान ने यहाँ पे धीरे-धीरे जो है, एक सीढ़ी है जिससे कि व्यक्ति भगवान की भक्ति तक पहुँच सकता है और परम सिद्धि प्राप्त कर सकता है। पर अभी अगले श्लोक में भगवान बताएंगे कि तुम्हें यह करने की ज़रूरत नहीं है, क्या है? कर्म योग करके, ज्ञान योग करके, भक्ति करने की ज़रूरत नहीं है। वो मार्ग है, उससे हम समझ सकते हैं कि भक्ति सर्वश्रेष्ठ है, पर भक्ति की महिमा क्या है? दो प्रकार से भक्ति की एक महिमा है कि जो आध्यात्म में सर्वोच्च सिद्धि है, वो प्राप्त करा सकती है भक्ति। पर भक्ति की दूसरी महिमा यह है कि हम जिस स्तर पर हैं, उस स्तर से हमें वो ऊपर उठा सकती है। मतलब भक्ति ऐसी एक सीढ़ी है, जो सबसे ऊँचाई तक जाती है, पर वो ऐसी भी सीढ़ी है कि सबसे नीचे तक भी आती है, मतलब जो नीचे के स्तर में हैं, वहाँ से भी उठा सकती है।
तो इसलिए भगवान की सुरमत आगे है:
सर्वकर्मान्यपि सदा कुर्वाणो मद्भपाश्रयः।
मप्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम्॥
तो क्या है? ताते हैं भी सर्वकर्मान्यपि सदा। आप ब्राह्मण हो, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, कोई फ़र्क नहीं पड़ता है, आप जिस स्तर पे हो, उस स्तर से आप भक्ति कर सकते हैं। अभी ज्ञान योग करना है, तो सबसे पहले संन्यास लेना है, सारे कर्मों को त्यागना है, उसके बाद में सिद्धि प्राप्त कर सकते हैं। और भक्ति की महिमा यह है कि जिस कर्म में स्थिति थे, वहीं से आप शुरू कर सकते हैं—कुर्वाणो मद्भपाश्रयः, आप मेरा आश्रय ग्रहण कर लो और क्या होगा? आप मेरे प्रसाद से, मेरी कृपा से शाश्वत पद प्राप्त कर लो।
और यह कैसे होगा? उसका वर्णन की भगवान करते हैं:
चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य मत्परः।
बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्तः सततं भव॥
तो चेतसा सर्वकर्माणि, आप कर्म तो अपना कर रहे हो, सर्वकर्माणि, पर क्या कर रहा है? चेतसा सर्वकर्माणि, मयि संन्यस्य मत्परः, आपके जीवन का उद्देश्य मैं हूँ, वो कर्म योग नहीं कर रहा है, वो भक्ति योग ही कर रहा है। और बुद्धियोगमुपाश्रित्य, इस तरह से आश्रय ग्रहण करके सदैव मेरी चेतना में रहो—मच्चित्तः सततं भव।
और अगर ऐसे करेंगे, तो क्या होगा? भगवान कहते हैं सारी समस्याओं से आप परे चल जाओ—मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि। अथ चेत्त्वमहंकारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि।
तो अगर आप इस तरह से करोगे—मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि, मेरी कृपा से आप उनके परे चल जाओगे, आप इस समस्याओं में फँसोगे नहीं, समस्याओं के परे चल जाओगे। यहाँ पर भगवान आश्वासन दे रहे हैं कि भले यह अभी आपके कोई कंडीशनिंग हो, आपके परे बद्धवस्था, उसके अपने समस्या आए, पर आप मेरी प्रसाद से, मेरी कृपा से आप उनके परे चल जाओगे।
इसके विपरीत, अगर आप मेरी इच्छा के साथ कार्य नहीं करोगे, अपने अहंकार से चल जाओगे—‘मैं ऐसे कार्य करना, मैं ऐसे कार्य करना है’—तो फिर क्या होगा? आप, आप बंधन में पड़ जाओगे—विनङ्क्ष्यसि।
तो कई बार लोग पूछते हैं कि यह कृष्ण भावनामृत, यह शब्द कहाँ से आया? कृष्ण कॉन्शसनेस, यह शब्द कहाँ से आया? तो वास्तव में यह श्लोक है, काफ़ी लोग सब स्पेस्टर, सब स्पेस्टर, मच्चित्तः, मेरी चेतना में आ जाओ… सब स्पेस्टर से भगवतो… तो क्या होगा? उसका परिणाम वो 57वें और 58वें श्लोक में बताएंगे, मतलब दो पर्याय हैं, दोनों पर्यायों का फल बताएंगे भगवान अर्जुन को, फिर उसको चुनाव करने को बोलेगे:
यदहंकारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे।
मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वाम् नियोक्ष्यति॥
स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वकर्मणा।
कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात्करिष्यस्यवशोऽपि तत्॥
क्या बता रहे हैं? कि अगर मेरा आश्रय ग्रहण करने के लिए आप अहंकार का आश्रय ग्रहण कर लेते हैं सोच कि—‘मैं ऐसे करूँगा, ऐसे करूँगा, मेरे मनोहरण चारों से क्या होगा’—न योत्स्यति, अभी तुम करेंगे युद्ध नहीं करूँगा, पर बाद में क्या है? प्रकृतिस्त्वाम् नियोक्ष्यति, प्रकृति मतलब भौतिक प्रकृति, तुम्हें नियोक्ष्यति में लगा देंगे, तुम्हारा जो दृढ़ संकल्प है वो टिकेगा नहीं, मिथ्या में चला जाएगा। अभी तुम बोले युद्ध नहीं करोगे, पर बाद में कोई नियोक्ष्यति करेंगे, तो तुम क्षत्रिय के समान प्रभाव करेंगे लोग, तो इसलिए ऐसे मत करेंगे…
कि पाश्चात्य देश के भक्त होंगे, तो उनको बहुत कुछ ऐसे अनडिसिप्लिन कार्य करने की इच्छा थी, तो नया कुछ करना है, तो प्रभुपाद जी बोले—आप अलग-अलग देशों में जाओ, प्रचार करो। और फिर क्या, उन्होंने ऐसे नहीं बोला कि आप चौसर-माला जप करो रोज़, नहीं, आप जप करो और उसके बाद अपनी प्रिय सेवा करो और अपने-अपने स्वभाव के अनुसार सेवा करो।
तो इस तरह से कहा स्वभाव चयन कौन देता है? गुरु की दीक्षा क्या होती है? अपने शिष्य को वो अपने स्वभाव के अनुसार वो कार्य करने को मार्गदर्शन देते हैं। और साथ-साथ जब व्यक्ति करता है, तो धीरे-धीरे शुद्ध हो जाता है। सत्वगुण में जब आता है व्यक्ति, तो प्रभुपाद जी उपदेशामृत के परिचय में लिखते हैं कि व्यक्ति को अंतरंग से समझ में आता है कि मुझे यह करना चाहिए, मार्गदर्शन मिल जाता है। तो इसलिए अपने स्वभाव के अनुसार कार्य करना है।
तो अब भगवान बताएंगे अगले तीन श्लोकों में, इससे तीन श्लोकों में लेके हम प्रवचन को विराम देंगे। क्या होगा? भगवान बोलते हैं कि अगर हमको प्रकृति के अनुसार कार्य करना है, तो फिर हम प्रकृति के गुलाम बने रहेंगे। यहाँ पर भगवान कहते हैं कि आप आपके प्रकृति से निबद्ध हो। प्रकृति से निबद्ध हो मतलब क्या है? पक्षी आसमान में उड़ सकता है, मानव आसमान में उड़ नहीं सकता है, क्योंकि शरीर की लिमिटेशन, मर्यादा है। यहाँ तो हम आसानी से समझ सकते हैं, पर क्या है? शरीर की अलग-अलग मर्यादा भी है।
अभी कोई है, कोई चैंपियन एथलीट है, वो बहुत तेज़ी से दौड़ सकता है, बाक़ी के लोग उतना तेज़ी से दौड़ नहीं सकते। किसी का बहुत मधुर वाणी, बहुत बड़ा संगीतकार बनता है, बाक़ी लोग वैसे… तो हरेक को अपने शरीर के अनुसार मर्यादा है। तो फिर क्या इसका मतलब है कि हम अपने शरीर से हमेशाबद्ध रहेंगे, वो मर्यादा के परे कभी जा ही नहीं सकते? और भगवान कहते हैं कि तुम शरीर से मर्यादित हो, वैसे ही तुम मर्यादा में रहो।
नहीं, यहाँ पर भगवान को भूल जाते हैं, तो क्या होता है? फिर जो जगत है, वो जीव का नियंत्रक बन जाता है। जगत जो है, वो जीव को नियंत्रण करने लगता है। इससे क्या होता है? अभी अगर हम भगवान का स्मरण नहीं करते हैं, तो हमारी इंद्रियाँ हमको इधर-उधर घुमाती हैं—ये खाओ, वो करो, वो करो… जीवेर दया लालसा, ये इति-उति धाई, इति-उति धाई।
तो जो जीवात्मा भगवान से स्मरण नहीं करता है, वो प्रकृति के नियंत्रण में आ जाता है, प्रकृति का गुलाम बन जाता है। तो साधारणतया कैसे है? प्रकृति जो है जगत है, वो अचेतन है, जीव जो है चेतन है, इसलिए जीव जगत का नियंत्रण कर सकता है कुछ हद तक। पर जीव जगत का नियंत्रण साधारणतया कर सकता है, पर क्या है? जब वो भगवान को भूल जाता है, तो उल्टा हो जाता है, मतलब क्या है? जीव जगत के नियंत्रण में आ जाता है।
तो अभी क्या है? अगर हमको प्रकृति को नियंत्रण करना है, हमारे मन और इंद्रिय को नियंत्रण करना है, तो भगवान बोलते हैं कि ये स्वभाव जो है, प्रकृति है, उसके परे एक नियंत्रक है, उनको समझो और उनके शरण में जाओ:
ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।
भ्रामयन्सर्वभूतानि यंत्रारूढानि मायाय॥
तो जीव है सर्वभूतानां, सब जीव जो है वो यंत्रारूढ है। शरीर है एक यंत्र, उस पे वो रूढ़ हो गए हैं और वो इस पे घूम रहे हैं। कोई पक्षी है, वो हवा में उड़ रहा है, कोई हिरण है, ज़मीन पर चल रहा है, कोई मछली है, वो पानी में जा रही है।