Hindi – Balaram as Guru tattva and as Duryodhana guru – Chaitanya Charan
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Disclaimer: This transcript was generated using AI and may contain occasional errors or inaccuracies. रामायण जो अधिकार से ज्योति की ओर ले जाते हैं, वो गुरु कहलाते हैं। तभी गुरु का भाव कि भौतिक चेतना नहीं होती है। तो जीव को संदर्भ बताते हैं कि जो गुरु होते हैं, वो तीन प्रकार के हो सकते हैं। आप क्या कहते हैं कि वो ऐसे है कि… उनके दोनों पैर आध्यात्मिक जगत में हैं, एक तरह से, पर क्या है कि उनका केवल देह भौतिक जगत में है। मतलब क्या है कि वो एक तरह से वो जीवन-मुक्त हो चुके हैं कि सारी इच्छाएँ, सारी आकांक्षाएँ, सारी भावनाएँ वो आध्यात्मिक जगत से संबंधित हैं। दूसरा है कि इसको कहते हैं—both feet in the spiritual world, मतलब वो कहते हैं कि वो तीन गुणों से परे हो चुके हैं, आध्यात्मिक साथ जाते हैं। मतलब क्या है कि आध्यात्मिक प्रगति में अगर हम spiritual growth देखते हैं, तो इसमें कई चीज़ें होती हैं कि तमो गुण होता है, तमस से हम रजस की ओर आते हैं, रजस से हम सत्त्व की ओर आते हैं, और सत्त्व से हम गुणातीत होते हैं। गुणातीत मतलब क्या है? गुणों के प्रभाव से परे जाते हैं। जो गुणातीत होते हैं, ये निर्विशेष ब्रह्म पर मुझे का प्रवचन होता है—माम च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते। स गुणान् समतीत्यैतान् ब्रह्मभूयाय कल्पते॥ तो हम ब्राह्मण के स्तर में भी आ सकते हैं, जो ब्राह्मण का स्तर है, वो पे भी आ सकते हैं। पर गुणातीत होने के बाद एक और स्तर क्या है? स्वरूपसिद्ध। स्वरूपसिद्ध मतलब वो व्यक्ति को मैं आध्यात्मिक जगत, मेरा क्या स्वरूप है? कोई गोपा है, कोई गोपी है, कोई मोर है, अलग-अलग हमारे रूप होते हैं आध्यात्मिक। अभी, वो स्वरूपसिद्ध भी हो चुका है। तो ये जो है, ये full devotional realization, पूर्णता या जो आध्यात्मिक स्तर पे पूर्णता प्राप्ति हो गई है। तो वो कहते हैं कि जो गुरु होते हैं, गुणों का कोई प्रभाव नहीं है, स्वरूप भी उनको सिद्ध हो चुका है। दूसरा है कि वो गुणातीत हैं, पर अभी स्वरूप सिद्धि नहीं हुई है। भौतिक गुणों का कोई प्रभाव नहीं है उन पे, पर अभी तक वो आध्यात्मिक स्तर पे वो कौन है आध्यात्मिक जगत में, यह अभी पता नहीं है। और तीसरा कहते हैं कि वो गुणातीत अभी तक नहीं हुए हैं, स्वरूप सिद्ध नहीं हैं, पर उनकी जो आँखें हैं, वो एक तरह से दोनों पैर भौतिक जगत में हैं, पर आँखें जो है, वो आध्यात्मिक जगत में हैं। यहाँ पे कैसे हैं? दोनों पैर आध्यात्मिक जगत में ही हैं, वो सिर्फ़ यहाँ पे अभी देह कर्म के मापदंड अब तक हैं, अब तक रहने वाले हैं। दूसरा है कि एक पैर आध्यात्मिक जगत में है, एक पैर भौतिक जगत में है। तीसरा है कि दोनों पैर भौतिक जगत में हैं, पर आँखें पूर्णतया आध्यात्मिक जगत में हैं। तो अभी ये हमें शास्त्र बताता है कि हमें इन्हें समझते हैं कि जो भी स्टैंडर्ड बताते हैं, “Standards are for evaluating our own growth, not judging or labeling others.” जब भी कोई स्टैंडर्ड होता है, उसका उद्देश्य क्या है कि मैं कितनी प्रगति कर रहा हूँ, दूसरों को जज करने के लिए नहीं है। तो पॉइंट यह है कि जब हम भौतिक जगत में होते हैं, भगवान के प्रतिनिधि जो होते हैं, गुरु, वो भौतिक और आध्यात्मिक जगत के बीच में होते हैं, और एक तरह से किस हद तक वो हैं, वो फ़र्क़ हो सकता है। वो हमारे से थोड़े ही ऊपर हैं, हम रजोगुण-तमोगुण के प्रभाव में हैं, वो अगर रजोगुण से थोड़े ऊपर सत्त्वगुण में हैं, तो वहाँ से उतना तो हमें उठा सकते हैं वो। और जब हम उठ रहे हैं, वो भी भक्ति कर रहे हैं, वो भी उठ रहे हैं, और इस तरह से वो आगे आते रहते हैं। तो अभी जो बलराम जी का इससे संबंध क्या है? हम बलराम पूर्णिमा पे चर्चा कर रहे हैं। तो आध्यात्मिक जगत में जब कृष्ण होते हैं, तो कृष्ण के पहले विस्तार होते हैं बलराम जी, और बलराम जी से फिर सारे विस्तार आते हैं, वो एक लंबी श्रृंखला है। और उसमें फिर जो है, जो तीन पुरुषवतार आते हैं—महाविष्णु, गर्भोदकशायी विष्णु, क्षीरोदकशायी विष्णु आते हैं। तो यह काफ़ी टेक्निकल है, इसकी मैं अभी चर्चा नहीं करूँगा, तो प्रश्नोत्तर समय में मिलेगा, तो हम चर्चा करेंगे। पर कहने का मतलब क्या है कि भगवान का जो लिंक होता है इस भौतिक जगत से—भगवान पूरा रमण करते हैं आध्यात्मिक जगत में और एक तरह से उनको भौतिक जगत से लेना-देना नहीं है; दूसरी तरह से भौतिक जगत में जो हैं, वो सब उनके ही संतान हैं। तो भगवान जो पहला विस्तार करते हैं, जिससे वो श्रृंखला चालू होती है, जिससे कि उनके अनेक एक्सपेंशन होते हैं, विस्तार होते हैं, जिससे कि बाद में… अब ये महाविष्णु, गर्भोदकशायी विष्णु जो हैं, ये तीनों आख़िरकार भौतिक जगत को सँभालने में संबंधित होते हैं। तो यह सारी श्रृंखला—बलराम जी जो हैं, उनके स्टार्टिंग पॉइंट हैं। तो बलराम जी शुरुआत होने के कारण क्या है कि वो भगवान और भौतिक जगत में लिंक जो होता है, उसकी शुरुआत है। और जब हमें आध्यात्मिक प्रगति करनी है, तो क्या है? हमें और जो भगवान आध्यात्मिक स्तर में हैं, उनमें लिंक जोड़ना है। तो वही भाव जो है बलराम जी दिखाते हैं। अब ये लिंक कैसे होता है? जो बलराम जी का नाम है, उसमें दो विभाग आते हैं। तो ये एक बलराम जी का नाम है—लीला के स्तर पे देख सकते हैं, तत्त्व के स्तर पे देख सकते हैं। तो वैसे क्या है? जब हम प्रगति करने का प्रयास करते हैं, जब हम आगे बढ़ने का प्रयास करते हैं हमारे जीवन में, तो जो भौतिक आसक्ति है, ये क्या है? ये ग्रेविटी है, गुरुत्वाकर्षण। गुरुत्वाकर्षण, ग्रेविटी क्या है? ये हमारी भौतिक आसक्ति है। हर व्यक्ति की अपनी-अपनी अलग आसक्ति हो सकती है, पर उससे क्या होता है? वो व्यक्ति नीचे चल जाता है, ये भौतिक आसक्ति है। तो इसके परे जाने के लिए जो हमें बल लगता है, वो बल बलराम जी देते हैं। बल क्या है? ये बल हमें भौतिक आसक्तियों के परे करना है—मुझे ये भोग करना है, ये खाना है, ये देखना है, ये सब आसक्तियाँ हैं, ये सब आकांक्षाएँ हैं, उससे हम खींचे जाते हैं नीचे, उससे संघर्ष करने के लिए बल चाहिए होता है। पर क्या है? बल पर्याप्त नहीं है, कब तक हम संघर्ष करते रहें? अभी क्या होता है कि मान लीजिए कोई सैटेलाइट है, वो पृथ्वी के जो गुरुत्वाकर्षण से बाहर भी निकल जाता है, उसके बाद में ब्रह्मांड बड़ा विशाल है, उसमें चलते रहता है, घूमते रहेगा। तो हमें केवल भौतिक आसक्तियों से मुक्त नहीं होना है, उसके साथ-साथ क्या है कि अगर ये भगवान हैं, ये कृष्ण हैं, तो एक कृष्ण का भी एक दिव्य आकर्षण होता है, कृष्ण का भी एक ग्रेविटी पुल होता है। यह से गोपियाँ कहती हैं—”हम चाहते हैं कि कृष्ण को भूलना, पर हम भूल नहीं सकते हैं।” जो कृष्ण का जो ग्रेविटी पुल होता है, मतलब क्या है कि जब हम कृष्ण का स्मरण करते हैं, कृष्ण की लीला की चर्चा करते हैं, तो उसमें एक आनंद होता है। तो वो जो आनंदित होता है, यह जो है कि यह कृष्ण की… कृष्णा का अट्रैक्टिव एन्स है, हम कहते हैं कि ऑल अट्रैक्टिव एन्स है, कृष्ण सर्वाकर्षक हैं। तो यह जो कृष्ण के आकर्षण में आनंद होता है, अभी वो कृष्ण के आकर्षण में जो आनंद होता है, उसको राम कहते हैं। तो बलराम जी जो हैं, हमें बल देते हैं, जिससे हम भौतिक चीज़ों के आसक्ति से नीचे खींचे न जाए; और बलराम जी हमें कृपा करते हैं, जिससे हम भक्ति में, कृष्ण के स्मरण में, कृष्ण की सेवा में हम रमण कर सकें। ‘राम’ का अर्थ है—रामचंद्र भगवान हैं। तत्त्व के अर्थ, तत्त्व के स्तर पर, ‘राम’ का अर्थ है कि जो, जो रमण करते हैं, जो रमण करते हैं, जो रमण दिलाते हैं—रमती, रमयति। तो बलराम जी की कृपा से यह दोनों होता है कि हमें भौतिक आसक्तियों से जो है, वो मुक्ति मिलती है, और जो आध्यात्मिक आसक्ति है, उसमें हमें और रुचि मिलने जाती है। अगर ये दोनों, अगर साथ में हो जाता है, तो फिर हम भवबंधन से काफ़ी आसानी से निकल सकते हैं। तो यह दोनों बलराम जी की कृपा होती है कि वो आध्यात्मिक जगत और भौतिक जगत में लिंक है। वो लिंक कैसे काम करता है? वो लिंक बल और राम है। तो बल किस लिए? बल to fight माया, अगेंस्ट माया; और राम क्या है? वो रमण जो है, इन कृष्णा। जब हमें कृष्णा में आनंद लेना है, तो यही पॉइंट है, हम अंत में इसी पॉइंट पर वापस आएँगे। पर यह गुरु तत्त्व का भाव है। अभी साधारणतया, जब हम गुरु की भूमिका को देखते हैं, तो हम उनको बहुत करुणा में मानते हैं, वो बहुत, जो कोई ग़लती करता है, उसको माफ़ कर देते हैं, वो हर बार गुरु… जो गुरु कृपा बहुत महत्वपूर्ण मानते हैं, असत्य है वो। पर कैसे है कि जब गुरु किसी शिष्य का उद्धार करने का प्रयास कर रहा है, तो वो शिष्य को भी सहयोगी होना ज़रूरी है। अगर शिष्य सहयोगी नहीं होता है, तो फिर गुरु भी उसका उद्धार नहीं कर पाएगा, क्योंकि भगवान किसी की स्वेच्छा के परे नहीं जाते हैं। तो भगवान की लीला है, उसको हम चार स्तर पर समझ सकते हैं। इसको इंग्लिश में हम कह सकते हैं, लीला का एक्रोनिम (ACRONYM) है। तो यह अलग-अलग स्तर पर भगवान की लीला समझ सकते हैं। यह भक्तिविनोद ठाकुर अपने चैतन्य शिक्षाामृत में बताते हैं: प्रभुपाद जी भी एक तरह से बता रहे थे गीता में, वो जो एथिकल स्तर पर बता रहे हैं कि अर्जुन आसक्त है, अर्जुन विचारवंत है, पर कभी-कभी प्रभुपाद जी जब गीता के बारे में डिवोशनल स्तर पर बोलते हैं, कहते हैं कि अर्जुन का जो सारा मोह था, वो कृष्ण की योजना से आया था, और कृष्ण की योजना से आया था, अर्जुन का जो मोह है, क्या है? वो Krishna’s plan, वो कृष्ण की योजना है। तो यह जो अर्थ है, दो अलग-अलग स्तर, प्रधान हमारे लिए क्या है? इसमें यह चार लेवल्स में से एथिकल और डिवोशनल, यह महत्वपूर्ण है। तो अभी मैं… जो बलराम, क्यों इंट्रोडक्शन दिया मैंने, कि मैं पहले मैं एक चीज़ बताई, गुरु तत्त्व बताई मैंने, फिर मैंने दो लेवल्स, चार लेवल्स बताई, क्योंकि वो देख रहे हैं कि आज हम बलराम जी की लीला, ये दो लेवल्स पर देखेंगे—नैतिक स्तर पर और भक्ति के स्तर पर। तो पहले नैतिक स्तर पर हम देखेंगे और फिर हम भक्ति के स्तर पर देखेंगे। तो नैतिक स्तर पर हम देखेंगे कि जो बलराम और दुर्योधन की जो मैत्री होती है, का जो संबंध होता है, वो क्यों होता है, और उससे क्या समझा जा सकता है? अभी अगर हम महाभारत की कहानी देखते हैं, महाभारत और रामायण, इनमें कई फ़र्क़ हैं। और इन फ़र्क़ों में क्या है कि एक तरह से, महाभारत और रामायण में, रामायण में क्या है कि जो असुर है, वो असुर, राक्षस हैं, आसुरी प्रवृत्ति की जो लोग हैं, वो राक्षस हैं। रावण राक्षस होता है, और राक्षस और मानव में युद्ध है। पर महाभारत में क्या है? वो मानव और मानव में युद्ध है। तो जो कुछ मानव हैं, जो दुर्योधन है, वो आसुरी प्रवृत्ति का है, आसुरी भाव है उसमें। पर रावण में, इसलिए रावण का आसुरी रूप था, वैसे दुर्योधन को आसुरी रूप नहीं थे, वो अभी मानव है। और वास्तव में इस युद्ध में, जो कौरव हैं और पांडव हैं, इसमें जो राक्षस थे, वो दोनों पक्ष में थे। एक राक्षस पांडव के पक्ष में था, वो कौन था? घटोत्कच था, वो भीम का पुत्र था, जो घटोत्कच था। और यहाँ पे एक अलंबुष नाम का राक्षस था काफ़ी शक्तिशाली था वो, और फिर अंत में उसको घटोत्कच मारता है। अलंबुश पहले अर्जुन के कुटर इर्वान का वध करता है, और इसके बाद में घटोत्कच अलंबुश का वध करता है। तो यहाँ पे, तो यह मानवों और राक्षसों का भी युद्ध नहीं होता है, यह मानवों और मानवों में ही होता है। और इसका महत्त्व क्या है कि जो मानव शरीर में है, मानव शरीर में किसी का भी उद्धार हो सकता है। साधारणतः हर जीव का उद्धार कहीं से भी हो सकता है, पर मानव शरीर में हर जीव का उद्धार हो सकता है। तो अभी, जब आज हम कहानी पढ़ते हैं, महाभारत कहानी पढ़ते हैं, तो उसमें ऐसा लगता है—हाँ, यह तो स्पष्ट है, दुर्योधन विलन है, वहाँ पे जो पांडव हैं, वो हीरो हैं। पर उसी कहानी के वृत्तांत में जाते हैं, जब कोई नया बच्चा जन्म लेता है, तो माँ के गर्भ से जन्म लेता है, तो उसके सिर्फ़ ‘डिफ़ेंडेंट’ का तो विलन है, ऐसे नहीं होता है। क्या होता है? हर एक जो व्यक्ति होता है, वह उसमें अच्छाई, बुराई, सब होती है। तो क्या, किस प्रकार से कार्य करता है, वह किस प्रकार से वह संग लेता है, उस सब से उस पे प्रभाव होता है। तो अभी जब ये पांडवों में, जो कुरुवंश जो होता है, उसमें कौरव और पांडव होते हैं, तो एक तरह से ये हस्तिनापुर जो है, ये एक प्राचीन राज्य है, प्राचीन राज्य नहीं, प्राचीन शहर है, काफ़ी समय से था वो। और वहाँ पे जो होते हैं, धृतराष्ट्र और फिर दुर्योधन होते हैं, उसके बाजु में ये नया राज्य आ जाता है। नया कौन सा होता है वो? वो खांडव होता है वहाँ पे, इंद्रप्रस्थ आ जाता है। तो ये एक इंसिडेंट, उस समय से भी काफ़ी समय चलने वाला है—हस्तिनापुर होता है, जब इंद्रप्रस्थ आ जाता है, तो उस समय ये एक जैसे नया राज्य हो, नया, कब समय शहर होता है। तो अभी जब ये नया शहर बनता है, ये पांडव बड़ी मेहनत से, भगवान की कृपा से, मयासुर के वरदान से, वो खांडव का जंगल जो होता है, उसको एक बहुत ही ऐश्वर्यशाली शहर बना लेते हैं। उसके पीछे राज्य बन जाता है, फिर वो राजसूय यज्ञ करते हैं। और फिर राजसूय यज्ञ में, जो दुर्योधन जो होता है, सब आते हैं, तो वहाँ पर दुर्योधन भी आता है, सब विदेशी लोग आते हैं, कृष्ण भी आते हैं। तो अभी हम यहाँ पर देख रहे हैं कि जो कृष्ण और अर्जुन का संबंध कैसे बनता है, और बलराम और दुर्योधन का संबंध कैसे बनता है, और इसमें कैसे दुर्योधन नीचे जाता है और अर्जुन ऊपर जाते हैं। तो साधारणतया हम, जब हम गुरु और शिष्य के बारे में बात करते हैं, तो क्या है? हम कई बार यह देखते हैं कि जो शिष्य गुरु से, गुरु के आदेश का पालन कर रहा है, गुरु की जो कृपा है, उसको स्वीकार कर रहा है, तो कई बार हम कहते हैं कि शिष्य का जो आफ़र्ट होता है, कि अरे मुझे इतना सारा जप करना है, इतने सारे नियम पालन करने हैं, यह नहीं करना है, वो नहीं करना है, तो यह सारे जो नियम होते हैं, हम शिष्य को कितना प्रयास करना होता है, उस पर ज़ोर देते हैं। और यह ज़रूरी है देना, हमें प्रयास करना है, पर एक तरह से इसमें गुरु की दृष्टि से भी एक रिस्क होता है। गुरु जब अपने शिष्य बनाते हैं, तो क्या वो व्यक्ति परिवर्तित होगा? क्या वो व्यक्ति प्रगति करेगा? प्रभुपाद जी अमेरिका में गए, तो उनके लिए केवल एक शारीरिक स्तर पर ख़तरा नहीं था कि उनको हार्ट अटैक आया था सतहत्तर साल की उम्र में, पर उससे आंतरे से बड़ा ख़तरा क्या था कि जो लोगों को वो उद्धार करने वाले हैं, क्या वो स्वीकार करेंगे या नहीं करेंगे, क्या वो परिवर्तित होंगे या नहीं होंगे? क्या वो अपने बल और राम हैं, क्या वो पूर्व आ सकते हैं, या उससे नीचे खींचे जाएँगे? तो यह बहुत बड़ा ख़तरा था। और शुरुआत में ही ऐसे हो गया कि प्रभुपाद जी जहाँ पर रह रहे थे, वहाँ पे एक अमेरिकन युवक था, डेविड, रह रहा था—डेविड एलन। और वो बोल रहा था, “स्वामी जी, मैं आपका शिष्य बनना चाहता हूँ।” और प्रभुपाद जी अपने भारत के ख़र्च में देखते हैं कि शायद वो पहला अमेरिकन शिष्य बन जाएगा। और वही व्यक्ति क्या करता है? वही उनके ख़िलाफ़ चला जाता है, वही ड्रग्स लेता है, प्रभुपाद जी को आक्रमण करने के लिए आ जाता है। तो अभी यह जो है, कि हम कहीं जाते हैं प्रचार करने के लिए, मान लीजिए वैसे, वो कोई हाई-क्राइम एरिया है, फिर भी हम थोड़ा रिस्क कर, थोड़ा रिस्क कर जाते हैं, बूढ़ा होता है वहाँ, कि कोई चोर हमको पकड़ लेगा वग़ैरह, फिर भी हम वो रिस्क करके वहाँ प्रचार करने के लिए जाते हैं। यह भक्त सिंसियर हैं, तो यह लोग हैं सिंसियर, उनको प्रचार करने जाते हैं। तो हम जब प्रचार करने जाते हैं, तब ही कोई जो हमसे चोरी करना चाहता है, हमसे मारपीट करता है, तो उससे भी हम सोचेंगे कि अरे, हमें प्रचार करने जाना है कि नहीं। पर हम जहाँ प्रचार करने जा रहे हैं, जिसको प्रचार कर रहे हैं, वही हमसे चोरी करने लगता है, वही मारपीट करने लगता है, तो हम बोले, यहाँ प्रचार करने नहीं आ रहे हैं कि उनमें से… तो एक, जब जो गुरु किसी का प्रचार करते हैं, किसी का उद्धार करते हैं, तो यह गुरु के लिए भी रिस्क होता है—क्या यह व्यक्ति परिवर्तित होगा कि नहीं है? और यह जो रिस्क लेना, यह उनके करुणा का लक्षण होता है, यह कम्फेशन का लक्षण होता है। तो जो बलराम हैं, उनका दुर्योधन के साथ जो संबंध है, वो क्या है? जो गुरु’s कम्पेसन है, वो गुरु की करुणा है, पर वो कैसी करुणा है? वो एक रिस्की कम्पेसन है। करुणा जब होती है, करुणा में भी ख़तरा होता है, कि क्या दुर्योधन भी परिवर्तित हो सकता था? अभी हमको, अभी वक्त नहीं होने वाला परिवर्तित, पर उस समय दुर्योधन ने क्या देखा कि जो… अगर मैं यह उत्तान पताऊँगा, दुर्योधन और बलराम के व्यक्ति से बताऊंगा थोड़ा, ताकि हम बलराम जी और दुर्योधन क्या किया, उसको भी समझने का प्रयास कर सकते हैं। कि अभी जब कोई राज परिवार होता है, तो उसमें अगर राजा होता है, तो उसको अपने बच्चा चाहिए होता है, क्योंकि अगला राजा कौन बनेगा, राजकुमार कौन है? तो उसको इंग्लिश में ‘एयर’ (Heir) कहते हैं। जो एयर मतलब क्या? अगला राजकुमार है, जो भी है बच्चा है, अगला राजा बनेगा। तो अब एक बच्चा हो गया, उसके बाद में राजा-रानी को चिंता होती है—अगर इस बच्चे को कुछ हो गया, ये बीमार हो गया, इसकी मृत्यु हो गई, हमें कोई और चाहिए। तो पहला जो बच्चा होता है, उसको एयर बोलते हैं, उसके बाद में जो होता है, उसको ‘स्पेयर’ (Spare) बोलते हैं। तो पहले एयर आता है, फिर स्पेयर आता है। अभी जो स्पेयर है, उसकी परिस्थिति बड़ी नीचे तरह होती है। साधारणतया कोई भाई चाहेगा नहीं कि मेरे बड़े भाई के लिए कुछ बुरा हो जाए, पर जब तक उसके बड़े भाई के लिए कुछ बुरा नहीं होगा, ये कभी राजा नहीं बनने वाला। तो अभी क्या होता है? जब बचपन में दुर्योधन जो होता है, सोचता है कि मैं एयर हूँ, मैं राजकुमार हूँ, क्योंकि पांडव जंगल में चले… पांडव जंगल में चले गए हैं, उनको ऐसे शाप भी मिले थे, उनको बच्चे होने वाले नहीं है। अगर वो वापस आएँगे कि नहीं पता नहीं, जब पता भी चल जाता है कि बच्चे हो गए उनको, तो शायद वो वापस आने वाले हैं, कुछ पता नहीं है। तो जो आँखों के सामने है, वो राजकुमार कौन है अभी? वो जो दुर्योधन ही है। तो उसको लगता है मैं राजकुमार बनने वाला हूँ। और जब इस तरह से होता है, वो बड़ा हो रहा होता है, थोड़ा उसको एंटाइटल्ड भी होता है, तो गर्व होता है, अहंकार होता है—”मैं यहाँ पर राजकुमार हूँ, यहाँ मेरा सब कुछ चलता है।” उसकी पता तो आसक्त होते-होते, थोड़े अंधे होते-होते… तो फिर पांडव वापस आते होते हैं। तो जब पांडव वापस आते होते हैं, तो युधिष्ठिर क्या होता है? जब ये पहले युधिष्ठिर जब आ जाते हैं, तो क्या होता है? अभी शायद युधिष्ठिर राजा बनने वाले हैं। तो दुर्योधन को लगता है कि पहले मैं एयर था, पर अचानक फिर वो दुर्योधन क्या होता है? वो स्पेयर बन जाता है। तो अभी मान लीजिए किसी कोई कम्यूनिटी है, उसमें एक बहुत अच्छा कीर्तनकार है। और जब कोई बड़ा कीर्तन करना है, उस व्यक्ति को सब बोलते हैं, “तुम कीर्तन करो।” पर उसी कम्यूनिटी में कोई नया भक्त आ जाता है और वो उनसे अच्छा कीर्तन करता है, और अभी जब कीर्तन गाता है, लोग उनके सामने आते हैं, उसके बाजू जो होते हैं, तो, “तुम कीर्तन करो…” तो अभी ऐसे होगा, तो क्या होगा? उस व्यक्ति को नेचुरली इनसेक्योरिटी होगी—”अरे, यह क्या हो गया? ऐसे क्यों हो रहा है? अरे, मुझे लगता था मैं राजा बनने वाला हूँ, पर मेरा सब कुछ भी चला गया है!” तो ऐसे घर में भी होता है कि घर में अगर एक बच्चा होता है, तो माता-पिता के जीवन का केंद्र होता है, फिर नया बच्चा आ जाता है, छोटा बच्चा, तो बड़े बच्चे को लगता है—”अरे, मुझे कुछ ध्यान ही नहीं दे रहा है!” तो यह माता-पिता की बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी है कि वो छोटा बच्चा है, बड़ा बच्चा जो है, छोटे बच्चे को कंपीटिटर के रूप में न देखे, इसके भी प्रति क्या देखे कि इसकी देखभाल भी तुम्हारी ज़िम्मेदारी है। अभी तुम एक तरह से… हम तुम्हारी देखभाल कर रहे थे, अभी तुम बड़े हो गए हो, और छोटा बच्चा बड़ा हो गया है, बहुत अच्छा लगता है। बड़े हो गए मतलब, तुम भी देखभाल कर रहे हो। तो क्या है? कहीं भी, हम एक केंद्र होता है और वो चला जाता है, तो क्या होता है? तो थोड़ा इनसेक्योर हो जाता है, यह स्वाभाविक है। पॉइंट यह है कि इनसेक्योरिटी जो होती है, यह सबको होती है और यह स्वाभाविक है। पर इनसेक्योरिटी से एक अगला स्टेप आता है—एनवी (Envy/ईर्ष्या)। इनसेक्योरिटी का मतलब क्या है? क्या मेरी अभी कुछ कीमत रही है? मुझे कोई पूछेगा कि नहीं? कि मुझे कोई कीमत है? मेरी कोई कीमत है? यह सवाल आना सब में स्वाभाविक है। सब में यह सवाल आएगा, क्यों? क्या होता है? जगत में तुलना होती है। हम बोलें तुलना मत करो, पर तुलना तो होती ही है जगत में। हमसे अच्छा कोई दिखेगा तो हमको थोड़ा इनसेक्योरिटी होता है। पर इनसेक्योरिटी… ईर्ष्या मतलब क्या है? मैं कोई अच्छा होता है, मैं कोई अच्छा होता है, कि मेरे कुछ अच्छा है या नहीं है उससे? उससे एन्वी क्या है? क्यों आप अच्छे होते हो? तुम इतने अच्छे क्यों हो? तो कोई बहुत अच्छा कीर्तन करता है, तो, “अरे, यह कितना अच्छा कीर्तन करता है!” हमारे मन से आता है—”कितना प्रसाद खाता है, दिखाया तुमने…” तो क्या है? वो व्यक्ति को हम नीचे दिखाने का प्रयास करते हैं। तो एक तरह से एनवी और आदर एक ही हैं? क्या एक है एनवी और आदर? ईर्ष्या और आदर एक ही हैं? नहीं, अलग हैं। हम कहेंगे एक तरह से अलग ही है, सही है, एक है और अलग भी है। क्या है? आदर जो होता है, वो हम आनंद से देते हैं। जो ईर्ष्या होती है, वो दुःख से—”तुम इतने अच्छे क्यों हो? मैं इतना अच्छा क्यों नहीं हूँ? यह मुझ से अच्छा क्यों है?” तो जो respect होता है, वो willingly, वो हम स्वेच्छा से और हैप्पिली देते हैं—”अरे, तुम इतना अच्छा गाते हो, तुम इतना अच्छा प्रवचन करते हो, तुम इतना अच्छा डिशेज़ का डेकोरेशन करते हो, तुम इतना अच्छा करते हो।” आदर होता है तो हम आनंद से बोलते हैं। पर ईर्ष्या होती है तो क्या होता है? वो अनिच्छा से और दुःख से बोलते हैं कि unhappy—”यह इतना अच्छा क्यों है?” तो अभी जो इनसेक्योरिटी, असुरक्षितता महसूस करना, यह स्वाभाविक है, यह एक तरह से अनिवार्य है। पर उससे ईर्ष्या होना, वो भी एक स्वाभाविक है, पर वो इतना अच्छा नहीं है। तो यह स्टेज 1 है, यह स्टेज 2 है। पर यहाँ से तीसरा स्टेज जो आता है, वो है—शत्रुत्व (Enmity)। ईर्ष्या जो होती है, यह मानसिक संघर्ष होती है, पर जब हम ईर्ष्या पर कार्य करने लगते हैं, तो तभी क्या होता है? वो शत्रुत्व बन जाता है। तो क्या है? “तुम इतना अच्छा गाते हो…” कोई, कोई दो टेनिस प्लेयर हैं, इंडिया-क्रिकेट, इंडिया-पाकिस्तान, इंडिया-इंग्लैंड… उस टाइम में क्रिकेट मैच चलता है, दोनों प्रतिस्पर्धी हैं, तो उसमें क्षमता है—”यह इतना अच्छा बॉलर है, यह इतना अच्छा बैट्समैन है, यह इतना अच्छा फील्डर है।” तो क्या है? वो इतना अच्छा है, तो हमें भी और अच्छा बनना चाहिए। तो प्रतिस्पर्धी होना एक अच्छी बात है, दोनों उससे अच्छा होने की प्रेरणा मिलती है। पर मान लीजिए कोई दो प्लेयर्स में टेनिस मैच है और टेनिस मैच के पहले एक प्लेयर क्या करता है? दूसरे प्लेयर के खाने में कुछ ज़हर मिला देता है, जिससे वो मैच के पहले बीमार हो जाता है, खेल नहीं पाता है और वो बिना खेले जीत जाता है। उससे बड़ी क्या है कि वो दूसरे प्लेयर को मारने के लिए गुंडे लाता है… तो पहले क्या है? इनसेक्योरिटी—ये सब में आती है, अगर सब में आएगी। फिर उससे एन्वी—वो इतना अच्छा नहीं है, पर वो भी आ सकती है। पर जो एनमिटी (शत्रुत्व) है, वो नहीं आनी चाहिए। तो अभी दुर्योधन में क्या इनसेक्योरिटी थी, ईर्ष्या थी या शत्रुत्व था पांडवों के प्रति? तीनों था, पर क्या? शत्रुत्व दिख गया। तो अभी किसी में अगर अभी हम देखते हैं—”तुम तो इतने बुरे हो, तुमने इतना घृणास्पद कार्य किया है…” तो कभी-कभी करना पड़ता है, वो क्या है? वो कार्य ऐसे होता है। तो हमारी जो परिस्थिति होती है, हमारा जो सिचुएशनल होता है, अगर हम समझते हैं, तो our situation, it explains our emotions—कि तुम्हें ऐसे क्यों लगा? एक कोई भाई-बहनों में कभी-कभी झगड़ा हो जाता है, तो एक भाई दूसरे भाई के बारे में, एक भाई-बहन दूसरे बहन के बारे में इसके बारे में बुरा बोल देती है, इसके बारे में बोल देती है, इसके हाल ऐसे हुआ, बहन उसको बदनाम कर देती है। तो भी तुम्हें अपने बहन के बारे में क्यों किया? तो क्या है? कि उसको इनसेक्योरिटी होती है, आपको इनसेक्योरिटी होती है, तो आपका अपने बारे में क्यों किया? पर जो भी हमारे इनसेक्योरिटी को न हो, अगर हमारी मनस्थिति, परिस्थिति में समझ सकते हैं, हमारी भावनाएँ हम समझ सकते हैं, पर जो तुम्हारे कार्य हैं, उसको तुम माफ़ नहीं कर सकते हैं। अभी दुर्योधन को लगेगा कि अरे, मैं तो सबसे शक्तिशाली था, ये भीम कहाँ से आ गया, मुझसे बाल-शक्तिशाली बन लिया है? तो उसको असुरक्षित्ता लगना ही स्वाभाविक है। पर उससे वो भीम को ज़हर देके मार डालना क्या ये असुरक्षित्ता है? क्या ये ईर्ष्या है? ये क्या हो गया? शत्रुत्व हो गया है। तो जो कोई विलन होता है, उसकी भी अगर हम भावनाएँ समझते हैं… इससे यह नहीं कह रहा हूँ कि यह विलन अच्छा व्यक्ति है, पर वो उस प्रकार से एक भाई, दूसरे भाई को… एक चचेरा भाई क्यों बुलाऊँगा? चचेरा भाई, चिंता भाई, जो भी है, कजिन अपने भाई को जो मार रहा है, वो क्यों मारने पर आता है? तो उसकी जो कार्य है, वो थोड़ा समझ सकती है। तो अभी क्या होता है कि जब कोई नौजवान हो जाता है, उसके बाद में जो शारीरिक वृद्धि है, वो कम हो जाती है। वो क्या है? आपका हाइट जितना है, वो 8, 17, 18, 20 साल तक बढ़ता है, उसके बाद में कितने भी एक्सरसाइज करो, आपका हाइट नहीं बढ़ने वाला है। और कुछ मूवीज़ में दिखाते हैं कि आप बहुत एक्सरसाइज कर लो, आप बहुत पहलवान बन जाओगे, पर वो शरीर की वृद्धि कितनी होती है, उसका थोड़ा लिमिटेशन होता है। तो अभी क्या होता है? भीम और दुर्योधन में भीम शारीरिक स्तर पर दुर्योधन से इतना आगे होता है कि दुर्योधन को कोई आशा है नहीं है कि भीम का वो सामना कर सके, कि वो एक तरह से उससे बहुत ज़्यादा स्ट्रॉन्ग है। अभी दोनों गदा में युद्ध करते हैं और दोनों गदा युद्ध में बहुत प्रवीण हो जाते हैं। तो द्रोणाचार्य के गुरुकुल में जब जाते हैं, वो दोनों सीखते हैं, दोनों में टैलेंट होता है, दोनों में कमिटमेंट होता है, दोनों बहुत अच्छा बन जाते हैं। अभी गदा युद्ध जो होता है, वो एक तरह से वो प्रवीणता महत्त्व होना है उसमें, पर अगर प्रवीणता equal है, एक्सपर्टीज़ equal है, तो फिर वो स्ट्रेंथ की बात आती है जो ज़्यादा शक्तिशाली है, वही क्या करेगा? वो जीतेगा। तो अभी दुर्योधन को बहुत इनसेक्योरिटी रहती है। तो अभी किसी ने बहुत बुरा कार्य किया है, तो वो बुरा कार्य क्यों किया उसने? क्या अभी जो कोई बुरा कार्य करता है, दो कारण हो सकते हैं—या तो वो हमारा बुरा चाहता है, या वो ख़ुद इनसेक्योर है—”तुम रहोगे तो मेरे जीवन की कोई कीमत नहीं रहेगी,” और इसलिए तुम्हारे साथ तुम्हारे बारे में ऐसे बोला, तुम्हारे साथ ऐसे किया। जो किया बुरा है, पर क्या है? जो bad action होता है, वो किसके कारण किया है? महत्त्वपूर्ण है। वो जो इनसेक्योरिटी से शत्रुत्व आता है, पर किसी ने इनसेक्योरिटी के कारण कार्य किया है और किसी ने एनमिटी के कारण कार्य किया है। तो—”तुम मेरा बुरा चाहते हो इसलिए तुमने ऐसे कार्य किया,” या “तुम्हें लगा कि तुम्हारी कोई कीमत नहीं है और ऐसा करने से तुम्हें कुछ तुम्हें की कीमत मिल जाएगी,” यह फ़र्क समझ रहे हैं आप? कि मानिए कि स्कूल में एक बहुत लोकप्रिय विद्यार्थी है और दूसरा कोई इतना लोकप्रिय नहीं है। तो यह जो लोकप्रिय विद्यार्थी नहीं है, वो लोकप्रिय विद्यार्थी के बारे में कुछ अफ़वाह फैलाता है—”अरे, इसने ऐसे किया, उसने वैसे किया, उसने वैसे किया,” और उससे क्या होता है? वो लोकप्रिय विद्यार्थी बदनाम हो जाता है। तो अब यह जो किया, बुरा किया। तो यह क्यों किया? एक था सिफ़ा कि मुझे तुम्हारा विनाश करना था; दूसरा था कि अरे, सब तुमको ही देखते हैं, मुझे कोई देखता ही नहीं है, मुझे भी कोई देखना चाहिए। तो यह दोनों भाव अलग होते हैं। कैसे है? इनसेक्योरिटी है एक तरह से, इसको यह रिफ़ॉर्मेबल है। रिफ़ॉर्मेबल मतलब, “अरे, तुम भी अपना कुछ टैलेंट देखो, तुम भी अपना कुछ खुद डेवलप करो, तुम्हारी भी अपनी जगह है, तुम्हारी भी अपनी कीमत है, तुम्हें मेरे विनाश करने की ज़रूरत नहीं है।” शत्रुत्व है, यह भी रिफ़ॉर्मेबल है, पर यह इट इज़ मच टौफ़र, फ़ार लेस रिफ़ॉर्मेबल है। तो साधारणतया, यहाँ जब हमारे साथ कोई बुरा करता है, तो यह बुरा क्यों कर रहा है मेरे साथ? मेरी इतनी निंदा कर रहा है, मुझे इतना परेशान कर रहा है, क्यों कर रहा है? अगर वो व्यक्ति हमको अच्छा नहीं लगता है, तो हम कहेंगे यह मेरा शत्रुत्व है। अगर हमको अच्छा लगता है, तो हम कोई और कारण… नहीं है क्या है कि अगर हमने कुछ खाना बनाया है, कुछ केक बनाया है, और दस लोगों के लिए केक बनाया है और दस पीसेस हैं, एक व्यक्ति पाँच पीसेस खा लेता है, तो अगर हमें उस व्यक्ति के प्रति नकारात्मक भाव पहले से है… कुछ इंद्रियों पे नियंत्रण नहीं हो गए। पर अगर हमको व्यक्ति अच्छा लगता है, तो हम बोलेंगे—”क्या अच्छा है, उनको पता नहीं था, लिमिट है कि उनको बहुत भूख लगी होगी, क्या उनको अच्छा लगा, इतना अच्छा लगा, तो उनको खा लिया, बाक़ी ध्यान नहीं रहा होगा।” तो हम किस प्रकार से उस व्यक्ति को देखते हैं, उससे हम एक्सप्लेनेशन देखते हैं। तो अभी जो बलराम जी हैं, तो दुर्योधन ने कार्य ही किया है। तो दुर्योधन ने पांडवों के हाथ कुछ बुरा किया है। अभी किस हद तक बुरा किया है? किस हद तक वो ज़िम्मेदार था? यह पहले स्पष्ट नहीं था। अभी अगर हम दुर्योधन के बुरे कार्य देखते हैं—दुर्योधन’s misdeeds, कौन-कौन से बुरे कार्य किए हैं, उसे देखते हैं—सबसे पहले विषान महाग्ने, भीम को ज़हर दिया। उसके बाद में लाक्षागृह—लाक्षागृह (House of fire, House of clay बोल सकते हैं), सारे पांडवों को जलाया है प्रयास। उसके बाद में… विषान महाग्ने उसके बाद में विवादास्पद सभा आया है, जो गैंबलिंग मैच है। तो अभी जो अधिकांश बलराम और दुर्योधन का संबंध जो बना, वो इस परिस्थिति में बना। बलराम और दुर्योधन का कब? अभी जब भीम को ज़हर दिया गया, वो पांडवों ने ख़ुद बताया नहीं किसी को कि ये दुर्योधन ने किया था। पहले तो भीम की इच्छा थी—जाके दुर्योधन को पीटूंगा, दुर्योधन को सबक सिखाऊँगा। युधिष्ठिर ने कहा कि हम नए यहाँ पे आए हैं, यहाँ पे नए आए हैं और हमारी बात कौन मानेंगे? और कोई नहीं मानेंगे, पता नहीं है, ये क्या, मैंने कहा, तुमने कहा, ऐसे हो जाएगा। केवल तुम्हारा वचन और दुर्योधन का वचन उसके खिलाफ़ हो जाएगा, यह तो अभी तुम कुछ मत करो, इसके बारे में शांत रहे गए, चौकन्ना नहीं रहे गए, शायद दुर्योधन भी शांत हो जाएगा। पर वैसे हुआ नहीं। तो जो भीम को ज़हर देने का प्रयास किया था, यह सारे विश्वविख्यात बात नहीं थी। और जो लाक्षागृह में जो जल के… जल गया था, वो क्या एक हादसा था? वो क्या एक एक्सीडेंट था? क्यों ऐसे हुआ था? वो क्या, उसमें दुर्योधन का कितना योगदान था? कि कह सकते हैं कि इतना बड़ा लाक्षागृह बनाना, पांडवों को वहाँ भेजना, ये सब उनकी योजना के बिना नहीं हो सकता है। पांडवों को वहाँ भेजने की योजना के बिना नहीं हो सकता है, पर इस किसी को पता नहीं था, सब स्पष्ट रूप से। तो बलराम जी वो क्या देखा? जब बलराम दुर्योधन से मिले, तो उन्होंने देखा कि इसमें कुछ इनसेक्योरिटी है और देखा कि इसको पांडवों की ईर्ष्या है। पर ये तो साधारण, सब में होता ही है, ये ईर्ष्या जो है, एक मानवीय भाव है, मानवीय कमज़ोरी है, पर ये मानवीय भाव है, सब में होता है। तो उन्होंने क्या सोचा कि अगर इसको लगता है कि अगर भीम से मैं कमज़ोर हूँ, भीम इससे ज़्यादा शक्तिशाली है, उससे उसकी इनसेक्योरिटी है, तो अगर उसकी इनसेक्योरिटी को निकाल देंगे, तो फिर क्या होगा? उसको लगा मेरी कीमत है, कौरव-पांडवों की कीमत है, इन दोनों में झगड़ा करने की क्या ज़रूरत है? तो ऐसे हो सकता है कि जो बलराम जी ने दुर्योधन के साथ किया, वो न केवल… ऐसा नहीं कि दुर्योधन इतना बुरा व्यक्ति है, उसको क्यों सिखाया आपने? नहीं, वो बुरा व्यक्ति है, तो पता नहीं था। अभी हम ये भक्ति के स्तर पर नहीं देख रहे हैं, हमने चार लेवल देखे—एथिकल स्तर पर हम देख रहे हैं। भक्ति के स्तर पर देखते हैं, भगवान को सब कुछ पता है, सब कुछ भगवान की लीला है, तो उससे हमें सीखने के लिए कुछ नहीं है। पर यहाँ पर क्या है? जो दुर्योधन में इनसेक्योरिटी है, उस इनसेक्योरिटी को शायद रिमूव कर सकते हैं, तो फिर शायद उसको लगा कि अरे, ठीक है, वो तो अपना अच्छा कीर्तन करता है, पर यहाँ पर तुम्हारे यहाँ पर एक बड़ा मंदिर है, यहाँ पर सत्संग है, यहाँ पर तुम जाके कीर्तन करो, वो वहाँ पर कीर्तन करेगा, दोनों को अपनी-अपनी जगह मिल जाती है। तो क्या है? वो इनसेक्योरिटी चल जाती है। फिर इनसेक्योरिटी से ईर्ष्या इतनी आएगी, ईर्ष्या से एक शत्रुत्व तो होगा नहीं। तो जो बलराम ने दुर्योधन के साथ किया, वो दुर्योधन के कल्याण के लिए था, वो सारे वंश के कल्याण के लिए था कि उनमें झगड़ा कम हो जाए। पर इसमें एक समस्या थी। क्या होता है कि किसी को आप शक्ति देते हो, वो शक्ति का क्या करता है? वो उस पर निर्भर है। वो अभी उसको जो इनसेक्योरिटी है, क्या भाव था उसको? अभी जब इनसेक्योरिटी है, उसको एबिलिटी दी। एबिलिटी क्या? उसको गदा युद्ध में और इंप्रूव किया। तो अभी इनसेक्योरिटी से क्या होना चाहिए? वो इनसेक्योरिटी क्या है? “तुम भी एक एक्सपर्ट हो, भीम एक जगह पर एक एक्सपर्ट है, तुम एक एक्सपर्ट हो।” अभी भीम भी स्वीकार किया था कि वास्तव में जहाँ तक युद्ध करना है, उसमें वास्तव में दुर्योधन उससे आधा थोड़ा सा क्षत्रिय है एबिलिटी में। तो यह उद्देश्य था इस वास्तविकता, इंटेंशन कि ऐसे हो जाए, यह इंटेंशन था। पर जब हम कार्य करते हैं किसी के लिए, पर उसका क्या परिणाम होने वाला है, उसको पता नहीं है। तो क्या होगा? वो एबिलिटी ने क्या किया? वो एबिलिटी से उसने और एनमिटी को बढ़ा दिया। यह जो है, उसको जो शक्ति मिली, उसका अपने शत्रु, ईर्ष्या को छोड़ने के लिए उपयोग नहीं किया, शत्रुता और बढ़ाने के लिए कर रहे हैं। मतलब क्या है? “तुम यहाँ पर कीर्तन करो, तुम यहाँ पर आ के कीर्तन करो, मैं यहाँ पर कीर्तन करूँगा, यहाँ पर अनुयायी बनाऊँगा और यहाँ के अनुयायियों को वहाँ पर भेजकर वो प्रोजेक्ट को प्रोजेक्ट कर दूँगा मैं।” तो क्या है? यह जो है, यह आपको कुछ एबिलिटी भी मिला है, वो एबिलिटी का दुरुपयोग भी व्यक्ति कर सकता है। तो यह नैतिक स्तर पर, दुर्भाग्यवश, यह हो गया। तो अभी आगे कैसे हो गया? इसके बारे में जब वो घटना घटी, जहाँ पे दुर्योधन कितना क्रूर था, कितना अधार्मिक था, यह पूरा स्पष्ट हो गया। क्या हो गया? जब द्रौपदी का वस्त्रहरण करने का प्रयास किया, उसके बारे में जब पांडव वनवास में गए थे, वहाँ पे कृष्ण और बलराम उनसे मिलने आए थे। कल मैं बताया था कैसे कि द्वारका बहुत सुरक्षित था, इसलिए कृष्ण को द्वारका की तरफ़ की चिंता नहीं थी, हमेशा वो पांडवों के साथ थे। पर क्या? जो असुर प्रवृत्ति के लोग होते हैं, वो कहीं भी आके ख़तरा कर सकते हैं। तो एक शाल्व नाम का असुर था, उसने शिवजी से वर प्राप्त करके एक हवाई जहाज़ ले लिया, उससे वो द्वारका पर आक्रमण करने लगे। तो क्या हुआ? यह थोड़ा टाइम सीक्वेंस हम देखते हैं इसमें कि जो राजसूय यज्ञ हुआ और उसके कुछ समय के बाद वो गैंबलिंग, जुआ का खेल हुआ, और ये सब कहाँ हो रहा है? ये सब देश के एक भाग में हो रहा है, यह हम कहते हैं नॉर्दर्न इंडिया में हो रहा है। राजसूय यज्ञ इंद्रप्रस्थ में हुआ, गैंबलिंग मैच कहाँ हुआ? हस्तिनापुर में हुआ। पर इसके बीच में ये शाल्व जो है, इसने द्वारका पे अटैक किया। तो इसलिए जब कृष्ण राजसूय यज्ञ में थे, तो अभी दुर्योधन वहाँ पे इंद्रप्रस्थ में रहा, कृष्ण भी रहने की योजना थे, उनके कृष्ण और पांडवों में बहुत प्यारा संबंध था, पर कृष्ण को छोड़कर जाना पड़ा और फिर उन्होंने शाल्व को हराया। और जब शाल्व को हराया, तो अभी यह जो… यह अटैक काफ़ी समय तक चला, इसके बाद में क्या हो गया? पांडव वनवास में चले गए। पांडव वनवास में चले गए, तो यह युद्ध है, यहाँ पे काफ़ी समय तक चला। और जैसे ही वो युद्ध ख़त्म हो गया, तो तभी कृष्ण को पता चला कि पांडवों के लिए ऐसा हो गया है, पांडव वनवास में हैं। और जब कृष्ण-बलराम जी ने सुना, क्या हुआ है? कृष्ण… कृष्ण… कृष्ण… कृष्ण… कृष्ण… कृष्ण… और फिर इसके बाद में जो 14 साल ख़त्म होते हैं, तो जो उत्तरा का विवाह होता है, विराट युद्ध में, तो इसके बीच में बलराम और दुर्योधन में कई मीटिंग होती हैं। पर अभी पांडव तो बाहर हैं, पांडव वहाँ पर हैं नहीं। और फिर जब विराट में मिलते हैं, उत्तरा का विवाह अभिमन्यु के साथ होने वाला होता है, तो तभी कृष्ण-बलराम वहाँ पर आते हैं, और अभी वो विचार कर रहे हैं क्या करना है, कैसे अभी आगे बढ़ना है। तो बलराम युधिष्ठिर से कहते हैं कि “युधिष्ठिर, तुम्हें थोड़ा नम्र रहना चाहिए कि तुम्हारा सारा वनवास जो हुआ था, तुम्हारी ही ग़लती थी, किसे तुम्हें तुम्हारे भाइयों ने बड़ी मेहनत करके तुम्हें पूरा राज्य दिलाया था और तुम्हें जुआ खेल के सारा राज्य गँवा दिया। तो तुम्हें राज्य गँवाया है, तुम दुर्योधन के पास जाओगे तो नम्रता से जाओ।” तो यह सुनके पांडव पूरा शॉक हो गए—”यह क्या हो गया भाई? यह क्या हो गया? यह कैसे हो गया?” तो क्या हो गया? कि जब बलराम दुर्योधन से मिलने गए, तो दुर्योधन ने अपनी ही कहानी को भी बताई। दुर्योधन ने क्या बताया? “मैं जब राजसूय यज्ञ में गया था, मैंने पांडवों की इतनी सेवा की, मैंने उनके शहर में जो भेंट थे, वो स्वीकार किए। मैं सोचता था…” अभी सब अपनी ही कहानी बताता है—”मैं सोचता था कि इतना बड़ा उत्सव हुआ है, पांडव थक गए होंगे, तो मैं उनकी मदद करने के लिए स्वयं वहाँ पे रहा। वो पांडवों की मदद करने के लिए रहा था वो!” पर कहा कि “मैं उनकी मदद करने के लिए वहाँ पे रहा, पर जब मैं उनकी मदद करने के लिए वहाँ पे रहा था, वहाँ पे उन्होंने मेरा अपमान किया!” हम जानते हैं कि वो जब गिर जाता है पानी में, तो उस पे लोग हँसते हैं, तो उसको उन्होंने मेरा अपमान किया। और फिर उसके बाद में जुए के मैच के बारे में क्या होगी? कोई भी घटना होती है, वो किसी तरह से हम बोल सकते हैं और कैसे उसको स्पिन देते हैं। कि अभी मान लीजिए किसी को दीक्षा के लिए हम रेकमेंड करना है, तो अभी वो उसको पहले प्रॉब्लम थे, अभी वो स्टेबल है—दो बातें हैं, दो पॉइंट ही बोलेंगे, पर किस तरह से बोलेंगे, उससे पूरी कहानी बदल सकती है। “उसको पहले प्रॉब्लम थे, पर अभी वो स्टेबल है” मतलब क्या है? दीक्षा के लिए रेकमेंड कर सकते हैं। पर वो अभी स्टेबल है, पहले इसको प्रॉब्लम थे। अभी क्या है? वही दो चीज़ें बोल रहे हैं, पर दूसरे का मतलब क्या होता है? “प्रॉब्लम थे, अब जो आपसे प्रॉब्लम आ सकते हैं, बेटर रेकमेंड बंद कर सकते हैं!” तो वही फ़ैक्ट को हम पूरा उल्टा स्पिन दे सकते हैं। तो अभी जो हम देख रहे थे क्या? कि कैसे दुर्योधन ने द्रौपदी का इतना अपमान किया। दुर्योधन ने बलराम को क्या बताया? “युधिष्ठिर है, इसको लोग धर्मराज बोलते हैं, पर किस प्रकार का गैरज़िम्मेदार व्यक्ति है ये कि अपना सारी धन संपत्ति वो जुए में लगा देगा! सारी धन संपत्ति ही नहीं, अपने भाइयों को जुए पे लगा देगा! अपने भाइयों को नहीं, अपनी पत्नी को जुए पे लगा देगा! जो व्यक्ति अपनी पत्नी को जुए पे लगा सकता है, वो अपने घर का संरक्षण नहीं कर पाएगा, वो राज्य का संरक्षण कैसे करेगा? क्या ऐसा व्यक्ति कभी राजा बनना चाहिए? एक बार हमने देख लिया है कि यह व्यक्ति किस हद तक गिर सकता है, तो अभी उसको वापस राजा क्यों बनना चाहिए?” क्या यह सत्य है? अभी दुर्योधन वास्तव में उन्होंने युधिष्ठिर को मैनिपुलेट किया था। युधिष्ठिर जुआ नहीं खेलना चाहते थे, जुआ क्यों खेला? क्योंकि उनके वरिष्ठ धृतराष्ट्र उनको बोला था—”मेरे वरिष्ठ… पिता नहीं है, मेरे चाचा है, चाचा के आदेश को पालन करना चाहते हैं।” और जुआ चल रहा था युधिष्ठिर की अपेक्षा कि दुर्योधन, धृतराष्ट्र ने पहले बोलते हैं, “ये तो हम एक केवल गेम खेल रहे हैं…” यह क्या होता है? कभी कोई बड़ा फेस्टिवल होता है, कोई तो धृतराष्ट्र की ग़लती नहीं थी, पर क्या है? वो पूरा उसको स्पिनिंग डॉक्टरिंग कहते हैं, पूरी कहानी उल्टी बता दी थी। इसलिए नैतिक दृष्टि से क्या सही है, क्या ग़लत है, यह समझना मुश्किल है। इतना मुश्किल नहीं कि समझ नहीं सकते, पांडव थे ही नहीं वहाँ पर, क्योंकि वो एक वनवास में थे। और दुर्योधन दृष्टि से हर जगह पर जाता था, वहाँ पर बड़े-बड़े महायज्ञ उत्सव हुआ करते थे, किसी की किसी की राजकुमारी का विवाह है, किसी का कोई यज्ञ है, और हर जगह पर वो बराबर युधिष्ठिर की बदनामी करता था—”किस प्रकार का व्यक्ति है, जो सब कुछ गँवा देगा! ऐसे व्यक्ति कैसे राजा बन सकता है? क्या ऐसे गँवा देता है?” और इसके कारण क्या हो गया? जब वो संधि, जब युद्ध का समय आ गया, तो ग्यारह अक्षौहिणी लोग, ज़्यादा लोग कौरवों के साथ गए, कम लोग पांडवों के साथ गए। ऐसे नहीं कि जो कौरवों के साथ लोग गए, वो सारे लोग जो थे, वो बुरे लोग ही थे, वो दुर्योधन की कहानी बताई, उससे वो नैरेटिव से वो इंफ़्लुएंस हो गए। मान लीजिए कि कोई व्यक्ति है कि इसका जो आजकल के समाज पर रेलेवेंस है एक तरह से, मान लीजिए कि कोई सोशल मीडिया पर है ही नहीं, सोशल मीडिया से बहुत सारे डिस्ट्रेक्शन होता है, पर मान लीजिए सोशल मीडिया पर किसी के बारे में बहुत बुरा बताया जा रहा है और एक नैरेटिव बन रहा है—”ये लोग बहुत बुरे हैं, ये लोग बुरे हैं, बुरे हैं,” और उसका कोई अल्टरनेटिव देखने वाला कोई है ही नहीं। तो एक बुरा बोलता है, दूसरा बुरा बोलता है, तीसरा बुरा बोलता है, तीसरा को फैलाता है और पूरा जो एक पक्ष से ही सब कुछ बोला जा रहा है और दूसरे पक्ष से कोई बोली नहीं है, तो क्या हो जाएगा? तो वो व्यक्ति उसको पूरा बुरा ही मान लेगा। यह राम मंदिर जब बना था, उसके बाद मैं अमेरिका के दौर में गया था और कई बार मुझे अमेरिकन यूनिवर्सिटीज़ में, अमेरिका के विद्यार्थी पूछते थे जो आध्यात्म में रुचि रख रहे थे—”भारत के साथ क्या हो रहा है कि एक मस्जिद को तोड़ दिया और मस्जिद को तोड़ने के बाद वहाँ पे भी मंदिर बनाया है और जो मंदिर बनाया है, उसमें सारा राष्ट्र मस्जिद को तोड़ के मंदिर बनाया है और राष्ट्र के प्रधानमंत्री भी वहाँ पे आ रहे हैं? तो क्या यह सारा राष्ट्र जो है, यह अभी इंटॉलरेंट बन गया है? यह जो है एक्सट्रीमिज़्म का सपोर्ट कर रहा है और यह क्या है? वो भारत का आध्यात्म अच्छा लगता है मुझे, पर भारत जो है, मुझे कुछ बिल्कुल अच्छा नहीं लग रहा है।” तो अगर उनको बताएंगे अभी कि वो जो मस्जिद, मंदिर को तोड़ के बनाई थीं, वो तो 300-400 मेडिवल टाइम्स में हुआ था, पहले तो बहुत कुछ ऐसे होते ही रहता था। अभी जो पहले जो हुआ है, वही अगर हम, “तुमने ऐसे मेरे साथ किया, इसलिए मैं तुम्हें ऐसे करूँगा,” तो कितने आप पहले जो हुआ, उसका बदला लेते रहोगे, हमें आगे बढ़ना चाहिए होगी। अभी यह क्या है कि अमेरिका में मेनस्ट्रीम नैरेटिव, मेनस्ट्रीम नैरेटिव काफ़ी लेफ्टिस्ट होता है। तो मेनस्ट्रीम नैरेटिव में पूरा संकीर्णवादी था, तो मैं एक प्रॉपर आन्सर करना चाहिए होगा कि वो कोई मस्जिद पे आक्रमण की बात नहीं है, यहाँ वो अयोध्या में ही उसी एरिया में कहीं और मस्जिद है और जो बड़ा एजीटेशन होता है, तभी उसके लिए एक भी मस्जिद पे कोई अटैक नहीं होता है कि यह, यह एक धर्म के लिए बहुत ही महत्त्वपूर्ण जगह है। तो मानो, या न मानो, यह उसके लिए बहुत महान एमेत रखता है और दूसरे धर्म के लिए उसके लिए कोई हिस्टोरिकल सिर्निफ़िकन्स नहीं है। आप बोलते हैं कि तुम्हारे धर्म की जगह है, उसको तोड़ के हमने मस्जिद बनाया है, यह हमारे लिए महत्त्वपूर्ण है। अगर वो बात मान लेते, तो तुम सिर्फ़ सिर्निफ़िकन्स का ही सपोर्ट कर रहे हैं। तो पॉइंट यह है कि एक नैरेटिव बन जाता है और अमेरिका में ऐसा नैरेटिव बन गया था कि इंडिया पूरा इंटॉलरेंट हो रहा है। तो मेनस्ट्रीम मीडिया में नैरेटिव था, पर फ़ैंकफ़ुली जो सोशल मीडिया से एक अल्टरनेटिव आ रहा है और सोशल मीडिया में अच्छा है, बुरा नहीं की कर रहा हूँ, पर क्या है? मेनस्ट्रीम मीडिया पर पूरा लेफ्ट का पकड़ था, अगर उसका कोई अल्टरनेटिव देता ही नहीं था, तो क्या होता है? तो लोग सोचते हैं ये सारे संकीर्णवादी चीज़ में लोग हैं भारत में। तो जो कहानी किसी के बारे में बता रहे हैं, उसका प्रतिकार करना बहुत ज़रूरी है। अगर वो प्रतिकार नहीं होता है, तो वही कहानी प्रतिकार जाती है। तो पांडव वनवास में थे, दुर्योधन उनके बारे में क्या बोल रहा है, उसका प्रतिकार करने वाला कोई नहीं था। तो बलराम जी, तो हम कह सकते हैं भगवान हैं, सर्वज्ञ हैं, पर वो लीला में नैतिक दृष्टि से यह नैरेटिव की पावर क्या होती है, वो दिखता है। और फिर इसके बाद में, तो अभी इसके कारण, अभी बलराम जो होते हैं, वो दुर्योधन के पक्ष में होते हैं, पहले से, कृष्ण अर्जुन के पक्ष में होते हैं। तो फिर भी, यह तो भी फ़ैसला कर लेते हैं हम, इस युद्ध में सहभागी नहीं होते हैं। तो कृष्ण जो होते हैं, वो सारथी बन जाते हैं अर्जुन के, बलराम जो हैं, तीर्थयात्रा पे चले जाते हैं। बलराम की तीर्थयात्रा पे चले जाते हैं। तो यह बड़ी विचित्र चीज़ है—विश्व का सबसे बड़ा युद्ध होने वाला है और बलराम सबसे बड़े योद्धाओं में से एक है। तो जैसे क्रिकेट का वर्ल्ड कप होने वाला है और जो बड़ा क्रिकेटर है, वो कहता है कि “मैं दुनिया के साइटसीइंग टूर पर जा रहा हूँ!” अरे, आप वर्ल्ड कप खेलने कुछ नहीं आ रहे हैं? तो क्या होता है कि वो जो युद्धों में कौरव-पांडवों में युद्ध हो रहा है, वो युद्ध में नहीं होने वाला है कि साइटसीइंग टूर पर जा रहा हूँ। तो बलराम और कृष्ण, वो उनमें युद्ध नहीं होना होता है, पर उसके अंत में कुछ हो जाता है। अंत में जब तीर्थयात्रा से बलराम जी वापस आते हैं, तो भागवतम में क्या उसका वर्णन आता है? भागवतम में वो महाभारत के युद्ध का वर्णन नहीं है। भागवतम की क्या है? उसमें जब महाभारत का युद्ध चल रहा है, तब बलराम कहाँ का जाते हैं? इलवल, बाक़ी सब जो असुर हैं, उनको मारते हैं, उसका वर्णन आता है। अगर ऐसे क्यों है? अगर मान लीजिए कोई अख़बार है, वो न्यूज़ देता है …उसको पर, अगर भागवत पक्ष में युद्ध चल रहा है, तो उसका कुछ न्यूज़ ही नहीं है उस पे। यूक्रेन और रूस में युद्ध चल रहा है, उसका दो पेज का न्यूज़ है और भागवत पक्ष में युद्ध चल रहा है, उसका ज़िक्र भी नहीं है! यह क्या है? यह न्यूज़ पेपर है? यह क्या है? तो भागवत में अभी जो पांडव और कौरवों में युद्ध हुआ, बड़ा विश्व युद्ध हुआ, उस समय में ये बलराम जी कोई छोटे-मोटे असुर हैं—इल्वल और उनको मार… छोटे-مोटे, बड़े असुर हैं, छोटे नहीं हैं वो, पर विश्व में तो उसका प्रभाव नहीं था, तो उनकी कहानी क्यों बता रहे हैं वहाँ पर? क्या है कि शुकदेव गोस्वामी नहीं चाहते हैं कि परीक्षित महाराज का मन भगवान की स्मृति से विचलित हो और कुरुक्षेत्र के युद्ध में परीक्षित के पिता हैं—अभिमंडू का बड़े बेरहमी से अन्याय से वध हुआ है। तो वो याद दिला कर परीक्षित महाराज तो परिपक्व हैं, वो गंभीर हैं, पर फिर भी भावनाओं से तो घाव रहता है। वो भी युद्ध है। और क्या है? उन्होंने अपने पिता को कभी देखा भी नहीं है, पर वो कहानी सुनें कि कितने वीर थे और कितनी बेरहमी से उनको मारा गया है। तो क्या है कि अभी हम सबको जो कुछ चीज़ें होती हैं, वो विचलित कर देती हैं। हम सबको ऐसे प्रमाद होता है। प्रमाद मतलब क्या? कि कोई हमारे साथ कुछ बुरा हुआ है, किसी ने किसी बहुत, किसी एक कम्युनिटी के व्यक्ति ने, मान लीजिए किसी का हमारे साथ जो व्यवहार किया है, तो उस कम्युनिटी का कोई व्यक्ति आपस देखा, तो वो ही आ जाता है। एक देश का व्यक्ति हो सकता है, एक प्रकार का व्यक्ति हो सकता है। तो अभी क्या है? परीक्षित महाराज को एक तरह से लग सकता है कि मैंने छोटी सी ग़लती की थी—एक मरा हुआ साँप मैंने एक ऋषि के चेहरे पे डाला, उसके अब मृत्यु का दंड हो गया! अभी वो ख़ुद राजा है, न्याय और अन्याय क्या है, उनको पता है। और छोटी सी ग़लती के करें इतना बड़ा न्याय जो है, वो जो अनफेयर कह सकता है, तो मेरे साथ इतना बुरा हुआ। तो इसलिए भागवत में पूरे कुरुक्षेत्र के युद्ध का एक वर्णन नहीं है। अधिकांश शुरुआत का देखते हैं, अभिमन्यु का भी ज़्यादा उल्लेख नहीं है भागवत में, बहुत कम उल्लेख आता है। इनडायरेक्टली कुछ उल्लेख आता है, ज़्यादा उल्लेख नहीं है। तो क्या है कि जो उनको प्रेरणा दे भगवान की स्मृति में, वो बताया जा रहा है। अर्जुन की महिमा, अर्जुन के से कैसे महान व्यक्ति थी, वो सब बताया जा रहा है। तो जो इल्वल की कहानी होती है, पर भीम और दुर्योधन में युद्ध होने वाला है। और भीम और दुर्योधन में जब युद्ध होता है, तो उस समय क्या हो रहा है? तो भी जो युद्ध होने लगता है, तो दोनों काफ़ि समय से युद्ध कर रहे हैं। भीम को भी युद्ध कर रहे हैं, दुर्योधन ने इतना अपमान किया था, द्रौपदी का उसका अपमान किया था, उसका बदला लेना है। दुर्योधन को बहुत ग़ुस्सा आ रहा है कि ये मेरा राज्य था, पांडवों ने मुझसे छीन लिया और फिर उन्होंने क्या है कि भीष्म को, द्रोण को, कर्ण को, सबको क्या है, अनैतिकता से मारा है, तो मुझे इनका बदला लेना है। तो अभी दोनों बहुत युद्ध करते हैं। और तो भी दुर्योधन शुरुआत में बोलता है कि तुम अनैतिकता से अभी जीते हो, अभी अनैतिकता होता है, तो अनैतिकता से युद्ध करो। तो भीम की योजना होती है, भीम ने व्रत लिया होता है—क्या है? कि जिस जाँघ पर उसने द्रौपदी को बुलाया था, “तुम तो दासी बन गए, तुम यहाँ पे आ के बैठा होगी,” मैं इस जाँघ को तोड़ने वाला हूँ! पर भीम की योजना होती है कि वो दुर्योधन को हराएँगे और फिर हराने के बाद उसकी जाँघ को तोड़ेंगे, हराएँगे प्रॉपर फाइट में, एक फेयर फाइट में। बारो, भीम और दुर्योधन युद्ध करने रहते हैं। घमासान युद्ध होता है, बाक़ी सब बलराम जी भी हैं, कृष्ण भी हैं, वो सब देख रहे हैं वहाँ पे। भीम बहुत अच्छे युद्ध करते हैं, पर क्या होता है कि वो दुर्योधन को हराना नामुमकिन हो गया होता है। क्यों? क्योंकि गांधारी का उनको वर मिल गया है। तो एक बार, दो, अष्टर्मी युद्ध में, तीन बार ऐसे होता है कि भीम इतना ज़ोर से प्रहार होता है, वो युद्ध कर रहा है, तो व्यक्ति दूसरा आप पे आक्रमण कर रहा है, आपको उससे बचना है और उससे आक्रमण करना है। तो आक्रमण करना आसान नहीं है, क्योंकि दूसरा भी अगर नक्ष है, पर तीन बार भी होते हैं, वो दुर्योधन पे हावी होते हैं और दुर्योधन को इतना ज़ोर से प्रहार करते हैं कि वो शक्ति ऐसी होती है कि कोई पहाड़ हो जाएगा, वो टूट जाएगा। और वो जो बोलो होता है, फटका होता है, उससे वो प्रहार से दुर्योधन ऊपर उड़ के फेंका जाता है और काफ़ि दूर जा के गिर जाता है। पर वो दूर जा के गिर जाता है और सभी सबको लगता है कि दुर्योधन की अभी पूरा हड्डी-हड्डी टूट गई होगा और दुर्योधन गिर जाता है महाँ पे। और फिर बसते वो जाता है, कुछ नहीं हुआ है उसको। और केवल अभी भीम मार नहीं रहे हैं, दुर्योधन भी शक्तिशाली है, दुर्योधन भी प्रवीण है, तो वो मार भी कर रहे हैं। तो दो बार ऐसे होता है कि दुर्योधन भीम पे बहुत प्रहार करते हैं और खासते हैं। दूसरी बार वो ऐसा प्रहार करते हैं कि भीम उससे काफ़ि घायल हो जाता है। और तभी अगर भीम में थोड़ी भी कमज़ोरी दिखाई होती है, कि मान लीजिए कोई हमको मारता है, तो अगर हम डर जाते हैं, सहम गए, दर्द हुआ, ऐसे दिखाते हैं, तो क्या होता है? कोई बॉक्सिंग खेल रहा है, एक पंच मारता है, तो अगर पंच मारता है, तो क्या वो देखता है क्या पंच का प्रभाव हुआ है? अगर प्रभाव हुआ दिखाता है, तो तुरंत वो आएगा—कम इन फॉर किल, उसको कहते हैं—”मार डालो उसको!” पर अगर उसको लगता है कि मैंने इतना शक्ति से प्रहार हुआ, उसको प्रभाव नहीं रहा है कुछ, तो मैं आगे जाऊँगा मारने को, वो ही मुझे मार देगा। तो तभी वो दोनों बार, जब भीम पर दुर्योधन आक्रमण करते हैं, तो दुर्योधन अपनी पूरी भावना को कंट्रोल रखता है, कुछ भी दर्द नहीं दिखाता है। तो उससे क्या होता है? दुर्योधन से है जाता है—”मुझे पता है कि मुझे कोई वर मिला है, क्या भीम को भी कोई वर मिला है? मैं प्रहार कर रहा हूँ, कुछ हो ही नहीं रहा है!” पर वास्तव में क्या हो रहा है? भीम कमज़ोर हो रहे हैं, भीम घायल हो रहे हैं। वो ख़ासतौर पर अगर दूसरी बार, जो पहला प्रहार करता है और अगर भीम थोड़ी भी कमज़ोरी दिखाते हैं, तो अगर वो दूसरा प्रहार तभी कर देता था, तो भीम की मृत्यु हो जाती थी। और भीम भी समझ जाते हैं कि अगर तीसरी बार प्रहार होगा, तो मैं… मैं जो स्टॉइक भाव है, कुछ भी कमज़ोरी दिखाना, वो नहीं कर पाऊँगा, क्योंकि दर्द अंदर से इतना हो रहा है, वो ज़ख्म है इतनी। तो तभी कृष्ण कहते हैं कि तुम्हें मारने का भी एक ही पर्याय है—वो जाँघ की ओर दिखाते हैं। तो अभी जब भी मौका देख के, उसकी जाँघ पर मारते हैं, पूरी शक्ति से मारते हैं, तो वो सब को… उसकी जो कमर है, वो टूटने की आवाज़ आती है, दुर्योधन चिल्लाता है और वहीं पे उस एक ब्लो से वो फाइट ख़त्म हो जाती है। और जब यह फाइट ख़त्म हो जाती है, तो वहाँ पे बलराम बहुत क्रोधित हो जाते हैं! ये तो दुर्योधन उनका शिष्य है, दुर्योधन इतनी अच्छी तरह से युद्ध कर रहा है, दुर्योधन जीतने वाला है, ऐसे लग रहा है। और तभी क्या होता है? तभी भीम इस तरह से एक अनएथिकल ब्लो मार के वो भीम को मार रहा होता है। तो भीम अपनी गदा लेकर आते हैं… सॉरी, दुर्योधन, सॉरी, बलराम अपनी गदा लेकर आते हैं भीम को मारने के लिए। और जब यह देखते हैं, तो भीम जानते हैं कि बलराम से कोई युद्ध नहीं कर सकता है इस भावना में, तो भीम अपने हाथ जोड़ लेते हैं और बलराम से प्रहार करने वाले कैसी आने के लिए—”मैं तुम्हें मार डालूँगा अभी!” तो तभी कृष्ण बीच में जाते हैं और कृष्ण कहते हैं, एक ही तर्क देते हैं कि भीम को जीतने का यही एक मार्ग था और जो जीत के लिए ज़रूरी है, वो भीम ने किया है। कहते हैं कृष्ण, कहते हैं बलराम से कि तुम्हें पता है कि ये दुर्योधन ने कितने साथ अत्याचार किया है? द्रौपदी के साथ क्या किया है? जो अभिमन्यु के साथ क्या किया है? जो पांडवों के साथ आज जीवन इसने… अहो कष्टम्, अहो अन्याय! ये इतने साथ अत्याचार किए हैं, ये अधर्म के पक्ष में हैं, धर्म की जीत केवल इसी पद्धति से हो सकती थी। तो अभी कृष्ण बलराम को पकड़ लेते हैं, तो बलराम जी कहते हैं, “तुम अपनी बातों से किसी को भी मना लेते हो, पर मुझे तुम्हारी बात नहीं स्वीकार है। मैं अभी भी कहता हूँ कि जो दुर्योधन को मारा गया, वो अनैतिकता से मारा गया है।” और बलराम जी वहाँ से चले जाते हैं। तो अभी यहाँ भी क्या हो रहा है? कि कोई भी चीज़ को हमें देखना है, वो संदर्भ में देखना है, अलग-अलग संदर्भ में देखना है। और मान लीजिए कि मैं आपसे बात कर रहा हूँ और मैं अच्छी तरह से आपसे बात कर रहा हूँ, पर अगर उसके पहले दस बार मैं आप पे चिल्लाया हूँ और आप दस बार शांत रहे हैं, तो क्या है? यह एक बार की दृष्टि से जो आप कर रहे हैं, ग़लत है, पर बड़ी दृष्टि से कहते हैं कि मैंने बहुत कुछ गुस्सा हो रहा हूँ। तो कोई भी प्रसंग को देखना है, तो हमें क्या करना है? कोई प्रसंग है, कोई इंसिडेंट है, इवेंट जो है, उसको किस संदर्भ में देखना है? एक संदर्भ में, एक कॉन्टेक्स्ट में देख सकते हैं (Context one), उसके बड़े संदर्भ में देख सकते हैं, उसके और बड़े संदर्भ में देख सकते हैं। तो अनेक संदर्भ हो सकते हैं। तो भीम का जो… अगर भीम का वो ब्लो देखते हैं, भीम का जो अटैक किया, वो देखते हैं, वो अनफ़ेयर है, उसमें कोई संशय नहीं है कि वो नियम के ख़िलाफ़ था। पर एक उदाहरण देखते हैं, आजकल के निश्चित से—क्रिकेट मैच में कोई अलग-अलग प्रकार के नियम होते हैं। अभी आज T20 आ गया है, इंग्लैंड में 100 चल रहा है, अलग-अलग प्रकार के नियम होते हैं। तो अभी मान लीजिए ये क्रिकेट मैच ऐसी तरह से खेला जा रहा है कि वो नियम ऐसे बदल गए हैं कि वो बैट्समैन कभी आउट नहीं होगा! वो बैट्समैन क्लीन बोल्ड हो जाए, कॉट बिहाइंड हो जाए, रन आउट हो जाए, अनबिडब्यो हो जाए, कुछ भी हिट हो जाए, कुछ भी आउट नहीं होगा बैट्समैन! कुछ भी हो जाए, तो बेचारा बॉलर आँखें बॉलिंग करते जा रहा है, करते जा रहा है। क्रिकेट में कैसे है? जो मेहनत बॉलर को, बैट्समैन से ज़्यादा करना पड़ता है। बैट्समैन जो… बॉलर, बैट्समैन को थोड़ा दौड़ना पड़ता है इंदा बीच में, तो क्या है? बॉलर को बहुत मेहनत करना पड़ता है। तो बॉलर बॉलिंग करते जा रहा है, करते जा रहा है और बॉलर भी अच्छा है, बैट्समैन भी अच्छा है, तो कभी बैट्समैन बॉलर को पीटता है, कभी बॉलर बैट्समैन को चकमा देता है, आउट करता है। पर बॉलर बैट्समैन को आउट करता है, तो आउट नहीं है, बैट्समैन सिक्स मारता है, तो वो सिक्स है। तो अभी क्या होगा? अगर ऐसा कोई मैच बोलेगा, यह तो अनफ़ेयर है, बोलेगा, कैसे मैच चल रहा है? अगर ऐसा कोई नियम बदल जाता है, तो ऐसी परिस्थिति भीम और दुर्योधन के लिए थी कि भीम कुछ ना भी मारे दुर्योधन को, दुर्योधन को कुछ नहीं होने वाला था। दुर्योधन भीम को मारे, उसको प्रभाव होने वाला था। तो एक तरह से यह जो गांधारी ने भीम-दुर्योधन को मार दिया था, उससे पूरा मैच है वो फ़िक्स हो गया था—दुर्योधन हारने का संभावना ही नहीं था! अभी इसमें भीम क्या करते? क्या है? अगर मैं उसको हरा नहीं सकता, मैं उसको मार नहीं सकता, तो क्या मैं पिटते रहूँ और मर जाऊँ? यह कहाँ का न्याय होने है? यह कहाँ का न्याय होने है? तो अगर कोई बॉलर है, क्रिकेट का ऐसा रूल बन गया है कि वो बैट्समैन को आउट नहीं कर सकते, तो बॉलर क्या फैसला करेगा? एक ही मार—”क्या है? वो बॉल मैं स्टंप पर क्यों नहीं डालूँगा, वो बैट्समैन के मुँह पे डालूँगा! और वो बैट्समैन अगर आउट नहीं होता, तो बैट्समैन को वो रिटायर्ड हर्ट कर दूँगा।” तो अभी क्या है? सब लोग इस जगत में अपने-अपने लिमिटेशन्स में कार्य करते हैं। तो हमें अपने लिमिटेशन्स में कार्य करते हैं कि जिस लिमिटेशन, जिस सीमावर्जित मर्यादाओं में हम कार्य कर रहे हैं, उन मर्यादाओं से हमको सही मार्ग वो निकालना है। तो कृष्ण का लॉजिक क्या था? कि तिस वो अच्छा वाला था, दीमा वो अच्छा वाला था, इसलिए उन्होंने वही किया। तो कौरव अधर्म के पक्ष में थे, पांडव धर्म के पक्ष में थे। तो यह अनैतिक था? हाँ, यह पहले कॉन्टेक्स्ट में, गोलो में अनैतिक था, पर वो अगर मैच, पूरे मैच के कॉन्टेक्स्ट में देखते थे, तो it was the only way! तो क्या यह नैतिक है? यह डिपेंड्स, आपके संदर्भ में देख रहे हैं। तो भीम ने वो किया जो ज़रूरी था, उसके बिना कोई पद्धति ही नहीं बची थी। इसलिए जो नैतिकता है जो मुरालिटी है, वो क्या है? कुछ लोग कहते हैं वो एब्सोल्यूट है—यही सही है और यही ग़लत है। सच बोलना सही है, झूठ बोलना ग़लत है। हाँ, यह अच्छा है। पर मान लीजिए कोई आतंकवादी आए हैं, वो हमारे मित्रों को मारना चाहते हैं और हमारे मित्रों, हमारे घर में आते हैं, मुझे छुपा… बोलते हैं, हम उसको किसी बेसमेंट में भी छुपा लेते हैं और आतंकवादी हमारे घर में आते हैं, पूछते हैं—”यह है क्या है, हम्म?” तो क्या सत्य बोलना चाहिए तो? असत्य बोलते हैं। तो सत्य का अर्थ क्या है? इसका सत्य हमें पता ही नहीं है, है ना? तो क्या है? कि मुरालिटी यह एब्सोल्यूट नहीं होता है। कुछ लोग कहते हैं, यह पूरा रिलेटिव है—यह तुम्हारे लिए सही है, मेरे लिए सही है। नहीं, यह पूरा है, यह क्या है? यह संदर्भ पर निर्भर है। ऐसे नहीं है कि सत्य बोलना, असत्य बोलना अच्छा है, असत्य बोलना बुरा है। यह रिलेटिव नहीं है। रिलेटिव मतलब क्या है? यह तुम्हारे मनमानी पे है। तो रिलेटिव मतलब क्या है? जस्ट इंडिविजुअल लाइकिंग हो जाता है। पर सब-कॉन्टेक्चुअल मतलब क्या है? सिचुएशनल मीनिंग—वो परिस्थिति में क्या ज़रूरी है? वो हम भी तो पूर्ण हैं। अब एक क्षत्रिय का युद्ध करने का भाव क्या है? एक दूसरे के सामने आ के तुम युद्ध करो। पर मान लीजिए अगर एक सेना में 10,000 लोग हैं, दूसरे सेना के पास 100 लोग हैं, तो सामने आ के युद्ध करेंगे, तो क्या होगा? आप पूरे मारे जाओगे! तो अभी शिवाजी महाराज ने जो औरंगजेब से, शाइस्ता खान से, अज़ल खान से युद्ध किया, वो क्या था? वो गुरिल्ला वारफ़ेयर था, आजकल असिमेट्रिकल वारफ़ेयर कहते हैं। क्यों? क्या है? वो सीधा सामना करते थे, तो वो पूरा मारे जाते थे। इसलिए यहाँ पर पॉइंट क्या है कि जो… हाँ, नॉर्मली क्या है? दोनों को सामना करके, युद्ध करके जीतना है। पर अगर दूसरे के पास इतनी शक्ति है, मेरे पास कोई शक्ति ही नहीं है, मान लीजिए असली युद्ध करना है, मतलब क्या है? सामने-सामने आ के युद्ध करो। कोई चोर है और कोई अच्छा पुलिस है, चोर के पास बंदूक है, पुलिस के पास बंदूक नहीं है, हम सामने-सामने आ के युद्ध करते हैं, चोर क्या करने वाला है? वो युद्ध करने का मौक़ा ही नहीं देगा, वो गोली मार देगा। तो क्या है कि अगर वो गोली मारने वाला है, तो पुलिस को अगर कुछ करना है, तो चुप के रहना है, पीछे से उस पे कूदना है, तो इसको हरा… मारा। तो क्या है? साधारणतया, जो अगर स्पोर्ट्स होता है, स्पोर्ट्स में एक रेफ़री होता है, एक रूल्स होते हैं, रूल्स के अनुसार युद्ध होता है। पर अगर रूल्स ही नहीं है, रूल्स फ़ॉलो नहीं कर रहा है, अगर दूसरी व्यक्ति के पास गन है, हमारे पास गन नहीं है और बोलता है—”जब आपको फेयर फाइट करना है, तो आप गन नीचे रखो, अगर फेयर फाइटिंग करते हैं,” पर वो गन से युद्ध करने वाला है, तो फिर क्या फेयर है उसमें? वो उसको संदर्भ के अनुसार होता है। आप यह समझ रहे हैं, नैतिकता जो है, एथिक्स जो है, वो कॉन्टेक्चुअल होते हैं। तो यहाँ पर जो बलराम जी कर रहे हैं, तो आ… यह नहीं करता था कि एथिक्स कैसे, नैतिकता जो होती है, कॉन्टेक्चुअल होती है। वो बलराम और कृष्ण की मतभेद से होता है। मैं बोला था कि मैं एथिकल और डिवोशनल… डिवोशनल तो चीज़ है, मैं इसको और कॉन्टेक्चुअल पर एक चीज़ बताता हूँ कि क्या है? कृष्ण और बलराम, ये दोनों भगवान ही हैं, तो इनमें डिफ़रेंस क्यों है? इसका एक नैतिक स्तर पर हमने देखा कि कैसे बलराम ने कृष्ण को… पर इसका एक और बड़ा कारण क्या है कि भगवान को इस चीज़ में भी रस मिलता है—Krishna likes play, oppositions क्या है कि अगर मान लीजिए कोई मूवी है, कोई हीरो है, हीरोइन है और पहले मिलते हैं, दूसरी बार मिलते हैं और फिर हैप्पिली एवर आफ़्टरवर्थ है, अगर कोई विलन नहीं है, तो फिर क्या है? कुछ मज़ा ही नहीं होता है! तो… इसलिए क्या है? कुछ ना कुछ प्रॉब्लम, कुछ ना कुछ संघर्ष होना चाहिए। अब आगे क्या होने वाला है? पता है, नहीं… कुछ मेंशन तो… कृष्णो प्रीति-लव में भी क्या होता है? कृष्ण कभी-कभी अपने भक्तों को ही उनके विरोध में भूमिका दे देते हैं। तो जो कृष्ण का अपोज़िशन होता है, वो अलग-अलग स्तर पर होता है। तो एक अपोज़िशन है कि जैसे जय-विजय जो होते हैं, वो असुर बन जाते हैं, वो हिरण्याक्ष-हिरण्यकशिपु बनते हैं, रावण-कुंभकर्ण बनते हैं, शिशुपाल-दंतवक्त्र बनते हैं, त्रिधा-शिशुपाल बनते हैं। ये भौतिक जगत में हैं। पर वो डायरेक्टली क्या है? उनके शत्रु बनते हैं। अभी आध्यात्मिक जगत में क्या होता है? जटिला-कुटिला जैसे लोग होते हैं। जटिला-कुटिला क्या करते हैं वो? राधा-कृष्ण मिलना चाहते हैं और उनके मिलने में व्यतिक्रम लाते हैं। अभी वो भी भक्त हैं, पर वो क्या कर रहे हैं? भगवान की लीला में थोड़ा रस लाते हैं वो—राधा-कृष्ण मिल पाएँगे कि नहीं, मिलने में समस्या होगी कि नहीं। और जो बलराम जी हैं, वो बीच में हैं, कि बलराम क्या कर रहे हैं? वहाँ कृष्ण को आपोज़ करते हैं। और जो कृष्ण को आपोज़ करके वो क्या दिखाते हैं? कि कृष्ण की ही लीला में और रस लाते हैं। तो यह बलराम का अपोज़िशन की लीला में कृष्ण की योजना के अनुसार है कि यह लीला को स्पाइस अप करते हैं। स्पाइस क्या करते हैं? और रस और मसाला उस लीला में आता है कि अरे, कृष्ण ने यह बोला, बलराम ने यह बोला, उन दोनों में मतभेद हुआ। तो यह जो है, एक तरह से हम एक और इसमें देखते हैं, बलराम नहीं है, एक और कैरेक्टर ऐसे जो है, वो भीष्म हैं। भीष्म वैष्णव होते हैं, महान भक्त होते हैं, पर वो कृष्ण के विरोध में युद्ध करते हैं। तो कृष्ण ही कभी अपने भक्तों को विरोध करने के लिए बताते हैं और यहाँ पर बलराम जी कभी-कभी विरोध का भाव लेते हैं। वो क्या है? यह भक्ति के स्तर पर, एक स्तर पर… हाँ, जो दुर्योधन के पक्ष में क्यों रहते हैं? वो दुर्योधन का भी कल्याण चाहते हैं, पर दुर्योधन वो उनकी कृपा को स्वीकार नहीं करता है, उसका दुरुपयोग करता है, इसके कारण उसका अंत में विनाश हो जाता है। और दूसरी चीज़ हम देखें कैसे कि ये भौतिक जगत में हम हैं, आध्यात्मिक जगत यहाँ पे है, तो यहाँ से अगर ऊपर जाना है हमें, तो जाने के लिए हमें किसी का मार्ग चाहिए। तो ये जो गुरु होते हैं, हमने तीन तरह के गुरु देखे—जो स्वरूप सिद्ध और गुणातीत हैं, जो गुणातीत हैं पर स्वरूप सिद्ध नहीं हैं, जो गुणातीत हैं, स्वरूप सिद्ध नहीं हैं, पर फिर भी वो पूरी तरह से भगवान की भक्ति में स्थिर हैं। तो उसके बाद में हमने एक चार स्तर देखे—जो लिटरल, उसमें हम ड्रामा देखें; जो एथिकल, उसमें हमने नैतिक स्तर पर देखा; क्या एलिगोरिकल, उसमें प्रतीकात्मक रूप से क्या अर्थ है; और फिर डिवोशनल और विस्तार रूप से हमने बलराम जी और दुर्योधन का संबंध, उसको नैतिक स्तर पर देखा, एथिकल स्तर पर देखा। इसमें हमने मेनली तीन चीज़ें देखी हैं: और आख़िरी में देखा कि जो उनका जो अगर देखते हैं, तो क्या है कि यह एक तरह से—इज़ दैट कृष्ण? कृष्ण गेट्स जॉय। कृष्ण को आनंद मिलता है इन बीइंग अपोज्ड, जब उनके विरोध कोई जाता है, तो उससे उनको आनंद मिलता है। आध्यात्मिक जगत में जटिला-कुटिला हैं, इस भौतिक जगत में जय-विजय आते हैं, तो उसी जो यह है, उसमें भीष्म जैसे भक्त भी उनका विरोध करते हैं, तो उसमें कभी बलराम भी एक जगह लेते हैं कि वो विरोध करते हैं। बलराम जी जो हैं, वो इस तरह से सेवा करते हैं कि भले ही लोगों को लगे कि बलराम जो हैं, जो इस रस में स्वीकार करते हैं सेवा, वो क्या है—दे आर रेडी टू बी मिसअंडरस्टूड! यह बहुत बड़ा त्याग है—टू बी मिसअंडरस्टूड, कि अरे, तुमने भगवान का विरोध क्यों किया? क्या तुम भक्त नहीं हो? क्या तुममें भगवान का सेवा भाव नहीं है? पर रेडी टू बी मिसअंडरस्टूड जो है, वो उनकी सेवा भाव की महानता है कि वो इस तरह से स्वीकार करने के लिए तैयार हैं, भले कि तुम मुझे ग़लत समझो, दुनिया मुझे ग़लत समझे, फिर भी अगर भगवान का… मिसअंडरस्टूड कहते हैं कि जी, ये भूमिका लेनी है, तो वो लेने के लिए तैयार होते हैं। बलराम जी की… बलरामार्भा महामहिम सर्वस्य दायि गौर प्रेमानंदे!Lecture Summary
Full Transcription
गुरुओं के तीन स्तर
बलराम पूर्णिमा और बलराम तत्त्व
भगवान की लीलाओं को समझने के चार स्तर
दुर्योधन की असुरक्षा (Insecurity) और ईर्ष्या
इनसेक्योरिटी, एनवी और एनमिटी (Insecurity, Envy & Enmity)
बलराम जी की करुणा और दुर्योधन का संदर्भ
दुर्योधन के कुकर्म और बलराम जी का दृष्टिकोण
दुर्योधन का दुष्प्रचार और बलराम जी की तीर्थयात्रा