कि शायद मेरा पुतर राजा बन जाएगा। और दुसरी ओर क्या था? Fear of the inevitable. जो होने वाला है, वो टालना चाहता था। क्या था? Inevitable क्या था? उनको पता था कि मेरा पुतर हरने वाला है। आशा थी उसको, पर यह जो भाव है, अभी जानता है क्या सही है। कमजोरी और क्रूरता में फ़रक क्या है? कमजोरी में व्यक्ति जानता है सही क्या है, पर कर नहीं पाता है। क्रूरता में व्यक्ति जानता ही नहीं सही क्या है। वास्तव में उसको गलत ही सही लगता है।
धृतराष्ट्र की दुविधाएँ पूछते हैं, जो नहीं होता है। धृतराष्ट्र की दुविधाएँ पूछती आती हैं, वह पूछता है, किम् अकुर्वत संजय। वहाँपे क्या हुआ?
धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः।
मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत संजय॥
तो अभी जीव को स्वाहीं बताते हैं, किसी ग्रंथ का अगर हमें सार क्या है, वो अगर समझना है, तो हमें क्या करना चाहिए? उस ग्रंथ के पाँच लक्षणों को हम देख सकते हैं। यह एक तरह से कॉमन स्थिनस है, पर यह वो मीमांसा में बताया गया है, कि किसी ग्रंथ का सार है, उसे समझना है, तो हम पाँच लक्षणों में समझ सकते हैं- अनुक्रम, उपसंहार।
तो उसके शुरुआत में क्या बताया गया है? उपसंहार उसके अंत में क्या बताया गया है? एक साधारण प्रवचन के बारे में हम देख सकते हैं, क्योंकि प्रवचन होता है, तो प्रवचन में शुरुआत में शायद वक्ता बोलेगा, तो शुरुआत में क्या बोलते हैं वो? फिर अंत में क्या बोलते हैं? और फिर अपूर्वता, यूनीकनेस, जो ऐसी चीज़ बताई है, जो और कहीं नहीं बताई है, ऐसी कोई चीज़ है क्या?
तो चौथा है अभ्यास। अभ्यास means repetition, क्या चीज़ बार-बार बताई गई? और पाँचवाँ है एम्फिसिस। अभी repetition और emphasis एक हो सकता है, पर कोई चीज़ बड़ी जोर से बताई जाती है, जोर से मतलब, वक्ता बोल रहे हैं, तो बड़ी भावना में आके बोलते हैं, हम बोलते हैं, हम जो बात कर रहे होते हैं, तो व्यक्ति कितनी शक्ति से बोल रहा है, वो हम आसानी से समझ सकते हैं। अभी पुस्तक पर, जब हम वचनों किताब में पढ़ते हैं, तो वो कैसे हम समझा सकते हैं, हम क्या शब्द इस्तेमाल कर रहे हैं, क्या भावनाओं का उल्लेख हो रहा है, तो इस प्रकार से, ये पाँच चीज़ों से हम, किसी भी ग्रंथ का उद्देश्य क्या है, वो समझ सकते हैं।
तो अभी इस में भी मीमांसा में बहस होती है, क्योंकि क्या कहते हैं, क्योंकि ये पाँच चीज़ें जो हैं, वो अलग-अलग दिग्दर्शन पर छिपाय बताती हैं, शुरुआत में शायद एक चीज़ बताई गई है, अन्त में दूसरी चीज़ बताई गई है, तो फिर यही हमारे मीमांसा शास्त्र, मीमांसा विचार अंतों में कभी-कभी बहस होती है, कि शुरुआत को ज़्यादा महत्व देना चाहिए, अंत को ज़्यादा महत्व देना चाहिए? तो साधारण अंत है, जो अंत में बताया गया है, उसको ज़्यादा महत्व हो जाता है, क्योंकि क्या है, कि शुरुआत में शायद इंट्रोडक्शन हो सकता है, ठीक है, परिचय में बड़ा, विस्तृत रूप से कुछ बोल रहे हैं, पर अंत में शायद स्पष्ट रूप से बोल रहे हैं, यह मैंने आज चर्चा किया है, इस विषय पर हमने बात किया है, तो इस तरह से।
भगवद्गीता की शुरुआत के तीन स्तर
तो अगर हम भगवद्गीता की शुरुआत देखते हैं, तो भगवद्गीता की शुरुआत हम कहां से हो सकती है? इसकी है, कि भगवद्गीता की शुरुआत जो है, वो एक टेक्स्टुअल शुरुआत हो सकती है, वो एक 1.1 से होगी, पहले श्लोक से, ग्रंथ जो है, वहाँ से शुरुआत है।
पर दूसरी शुरुआत है, कि कंसेप्चुअल। कंसेप्चुअल मतलब जो मूल विषय पर बात करने वाले हैं, उसकी शुरुआत कहाँ से होती है, वो अर्जुन के प्रश्न से होती है, तो वो है प्रच्छामि त्वां धर्मसंमूढचेताः।
और अगर हम उससे कहते हैं, स्पीकर सेंटर्ड, जो मुख्य वक्ता हैं, जो बोलने वाले हैं, तो उनके पहले वचन जो होते हैं, दो-ग्यारह में आते हैं, उसके पहले भी अगर कृष्ण कुछ बोलते हैं, पर वो कोई सामान्य शब्द बोलते हैं, उसके बाद चर्चा करेंगे थोड़े, तो ये तीनों हम गीता की शुरुआत बोल सकते हैं, और तीनों के आधार पर गीता का सार क्या है, हम ये देख सकते हैं।
तो हम अभी पहला अध्याय चर्चा कर रहे हैं, तो इसलिए हम ये 1.1 जो है, पहला अध्याय का पहला श्लोक, उस पर चर्चा करते हैं अभी। धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे… तो अभी इसमें, कई चीज़ें बताई गई हैं, पर सबसे पहला शब्द जो है, धर्म। यद्यपि यहाँ पर धर्म जो है, वो क्षेत्र के रूप में आ रहा है, क्षेत्र की परिभाषा देते हुए आ रहा है वो, कि वो धर्म की जगह थी, तो भी आचार्यगण यहाँ पर बताते हैं, कि धृतराष्ट्र का ये बोलने के लिए एक उद्देश्य था, पर गीता के संदर्भ में उसका दूसरा उद्देश्य निकलता है।
कभी क्या होता है, हम कुछ प्रवचन सुन रहे होते हैं, तो वक्ता कोई एक पॉइंट बोल रहा है, और वो एक पॉइंट एक दूसरे से बोल रहा होता है, पर शायद हमारे जीवन में कुछ चल रहा है, तो पॉइंट हमको बड़ा खटक जाता है, यह अच्छा पॉइंट है, पॉइंट-माइंडेड पॉइंट है, क्या है, वो हमको लगता है कि हमारे जीवन में बहुत कुछ चल रहा है, तो प्रवचन सुन, एक पॉइंट बोल रहे है, cause of the speaker’s intention and sometimes wisdom manifests in spite of the speaker’s intention.
कमजोरी और क्रूरता का अंतर
कभी-कभी वक्ता के कारण कुछ अच्छे पॉइंट्स आते हैं, कुछ ज्ञान आता है और कभी-कभी वक्ता के बावजूद अच्छे पॉइंट्स आते हैं। जैसे हम सत्संग में आ रहे हैं, वहाँ हम भगवान परमात्मा के रूप में जब श्रवण कर रहे हैं, तो हमारी प्रमाणिकता देख रहे हैं। भगवान मुझे मार्गदर्शन है, वो वक्ता का उद्देश्य भी नहीं होगा बोलना, फिर भी वो वक्ता के द्वारा बोला जाता है।
तो अभी धृतराष्ट्र का उद्देश्य क्या था कि वो धर्म के प्रभाव का ख्याल कर रहे हैं। धृतराष्ट्र जानता था कि मेरा पुत्र जो है, वो अधार्मिक है। तो जब वीकनेस की बात कहते हैं, तो उसका मतलब क्या है? हम सब में दो चीज़ें होती हैं- Conscience, जो विवेक बुद्धि कहते हैं, और Will Power, दृढ़ संकल्प।
तो Conscience यानी विवेक बुद्धि हमको बताती है क्या करना है, और जो हमारा दृढ़ संकल्प है, वो हमें करने में मदद करता है। तो क्या होता है यहाँ पर, जो इसमें कमजोरी होती है, उसमें Conscience, विवेक बुद्धि होती है, पर Will Power कम होता है, जानते हैं सही क्या करना है पर कर नहीं पाते हैं। पर जो इसमें क्रूरता होती है, उसमें विवेक बुद्धि होती ही नहीं, या वहाँ कम होती है, पर ज्ञाता यहाँ पर धृतराष्ट्र को जानता था कि उसका पुत्र अधर्म कर रहा है, पर रोक नहीं पाता था, उसको भय था कि यह कुरुक्षेत्र धर्मक्षेत्र है, शायद उसके प्रभाव से दुर्योधन पर कुछ बुरा परिणाम हो जाएगा, शायद दुर्योधन उस पर युद्ध नहीं करेगा, समझौता कर लेगा या हार जाएगा, कुछ उससे अपशकुन हो जाएगा।
साधारणतः धर्म से कभी अपशकुन नहीं होता है, पर उसके लिए, क्योंकि वो अधार्मिक था, धर्म से अपशकुन हो जाएगा। पर वास्तव में क्या हुआ? वो धर्मक्षेत्र क्यों था? ताकि पहले कुछ धार्मिक कार्य किए थे, यहाँ पर धर्म का प्रभाव हो जाएगा, यहाँ पर धर्म का जो सिगरेट रहस्य है, उस क्षेत्र पे उसका उजागर होता है, उसका प्रकट होता है।
धर्मक्षेत्रे पहला शब्द क्यों दिया गया है? धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे। कुरुक्षेत्र में गीता के माध्यम से गीता के वचनों के द्वारा धर्म क्या है, वह पहले बताया जाएगा और फिर धर्म कैसे पालन करना है, वह अर्जुन के कार्यों से दिखाया जाएगा।
धर्म एक रहस्य है- धर्मस्य तत्वं निहितं गुहायाम्, भागवतमतम्। यद्यपि हम सबको धर्म का पालन करना है, पर धर्म इतना आसान नहीं है पालन करना, तो इसलिए यहाँ पे जो है गीता, धर्मक्षेत्र का संदर्भ यह है कि यहाँ पे धर्म विल बी रिवील्ड और डेमोंस्ट्रेटेड, उसको सिखाया जाएगा और दर्शाया जाएगा, अर्जुन वो करेंगे। तो यह पहला श्लोक है।
दुर्योधन की मनोस्थिति और रणनीति
अभी यहाँ पर जो होता है, धृतराष्ट्र पूछते हैं, किम् अकुर्वत, क्या हुआ वहाँ पे? तो अभी यहाँ जो सवाल है, गीता में वास्तव में, एक टोटल बोलेंगे तो अर्जुन सत्ताईस सवाल पूछते हैं, और उसके अलावा धृतराष्ट्र एक सवाल पूछते हैं। तो हम देखें, जब धृतराष्ट्र पूछते हैं, जो पहले श्लोक में सवाल पूछा है, उसका जवाब अठारहवें अध्याय के आखिरी श्लोक में आएगा, किम् अकुर्वत, क्या हुआ? यह गीता की एक सिमिट्री है, काव्य के रूप में।
पर उसके बाद में जो है, जब संजय बोलने लगता है, तो अभी यह दिलचस्पी की बात है, इसे हम भगवद्गीता कह रहे हैं, और मान लीजिए यहाँ पे पाण्डव है, यहाँ पे कौरव है, तो संजय और धृतराष्ट्र यहाँ पे दूर कहीं तो हैं, तो इन दोनों में बात होती थी, संजय सबसे पहले जो है, शुरुआत यहाँ से करते हैं, और इस साइड में आते हैं, तो यहाँ पे जो है, पहले श्लोक से, लगभग ग्यारहवें श्लोक, बारहवें-तेरहवें श्लोक तक, खासे ग्यारहवें श्लोक तक क्या होता है, उधर से शुरुआत करते हैं।
क्योंकि क्या है, एक तरह से धृतराष्ट्र की रुचि क्या हुआ मतलब, दुर्योधन का क्या हो? क्योंकि दुर्योधन की बड़ी रुचि है। दुर्योधन शुरुआत में, अभी सबसे पहले जो धृतराष्ट्र का द्वंद्व था उसकी रुधि में, क्या होगा, क्या है मेरा बेटा जीतेगा या नहीं जीतेगा, वह द्वंद्व है।
अभी दुर्योधन का द्वंद्व जो है, वहाँ बड़े आत्मविश्वास, उसे कॉन्फिडेंस कहते हैं, पर एक होता है कॉन्फिडेंस, और दूसरा होता है ओवरकॉन्फिडेंस, ज़्यादा ही खुद में विश्वास होना, लगता है कि ये तो क्या है, ये फाइट भी नहीं होगा, हम आराम से जीतेंगे, क्रश कर देंगे, उसे लगता है।
पर जब उसने देखा कि किस तरह से पाण्डवों ने अपनी रचना की है, तो थोड़ा विचलित हो गया वो- दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा आचार्यम उपसंगम्य राजा वचनमब्रवीत्।
तो अभी क्रिकेट मैच होने वाली है, अभी एक टीम को लगता है हमारी बॉलिंग बहुत अच्छी है, पिच बॉलिंग के लिए बहुत अच्छा है, और हम सब फील्डर और एस फील्डर से करेंगे क्या, वो बैट्समैन को सारे बैट्समैन के चारों ओर घेर देंगे, उसको कैच लेंगे, आउट कर देंगे।
और जब वो आते हैं, देखते हैं, जो बैट्समैन आए हैं एक ओपनिंग के लिए पूरे, वैसे कोई भयभीत होकर या सतर्क तो अगर बैट्समैन, बॉलर ने पूरा स्ट्रेटजी, कैप्टन ने स्ट्रेटजी बनाया है, यह क्या है, कि हम पूरा अटैक करने वाले हैं, और यह तो डिफेंड करने वाले हैं, यह तो, यह तो अपना, what is defence, सुरक्षा करने वाले हैं, पर वो देखते हैं कि यार, यह बैट्समैन लोग तो इतना खेला, इतना आक्रामक रन करने वाले हैं, तो फिर क्या होता है कैप्टन का? तो फिर नेचुरल दुर्योधन भीष्म के पास नहीं जाते हैं, यद्यपि भीष्म उनके सेनापति हैं।
वो भीष्म के पास नहीं जाते हैं। वो द्रोण के पास जाते हैं। तो अभी क्या है? दुर्योधन राजनैतिक है, वो दक्ष है। अभी वो जानता था कि भीष्म और द्रोण इन दोनों की कितनी इच्छा है युद्ध करने की। वो युद्ध करना नहीं चाहते हैं। पर वो एक तरह से मजबूर हो गए इसलिए युद्ध कर रहे हैं। और तब मजबूर हो के युद्ध कर रहे हैं तो इसलिए मजबूर हो गए युद्ध करते हैं तो उनको उकसाना ज़रूरी होता है। उकसाएँगे नहीं तो उनकी भावनाएँ नहीं आएँगी।
अभी दुर्योधन के पास भीष्म को उकसाने के लिए कुछ नहीं था, पर द्रोण को उकसाने के लिए कुछ था। क्या था? द्रोण की और द्रुपद की जो राइवल दुश्मनी थी। तो इसलिए उसने क्या बोला? तव शिष्येन द्रुपदपुत्रेण। उसको उकसा रहा है वो। तो यहाँ पे क्या है? कि इस तरह से यहाँ पे दिखाया जा रहा है यह पहले जो श्लोक हैं, इतने से उसकी ज़रूरत क्या है? कि इसकी ज़रूरत कई ज़रूरत हैं।
पर यह मेन है, एक कांट्रास्ट है कि दुर्योधन’s people persuasion, जब लोगों को मनाना है, लोगों को कार्य में लगाना है, तो दुर्योधन किस तरह से लगाता है? और किस तरह से कृष्ण लगाते हैं? अगर दुर्योधन को लग रहा है, कि शायद धृतराष्ट्र, सॉरी, द्रोण और भीष्म की मन की रुचि नहीं है इस युद्ध में, तो दुर्योधन किस तरह से उनको उकसाता है? और उसके विपरीत क्या है कि संजय-अर्जुन पूरी तरह से बोल देते हैं, मुझे युद्ध में रुचि नहीं है, मैं युद्ध नहीं करना चाहता हूँ। तभी कृष्ण क्या करते हैं? तो गीता डेमोंस्ट्रेट्स, दुर्योधन किस तरह से उनको उकसाता है, दुर्योधन भौतिकवादी है, तो भौतिक दृष्टि से क्या करता है? उकसाता है। हम देखेंगे कि इसके विपरीत कृष्ण एक भी बार अर्जुन को उकसाते नहीं हैं। यह पहले श्लोकों का ये महत्व है, किस तरह से एक भौतिक दृष्टि से लोगों को मैनिपुलेट कर सकते हैं या आध्यात्मिक दृष्टि से लोगों को इंस्पायर कर सकते हैं, मोटिवेट कर सकते हैं।
शंखनाद और भगवान कृष्ण की नाटकीय प्रविष्टि
बहुत तुलना बताई जा रही हैं। और पहले बोलता है कि अलग-अलग लोग की वो दोनों सेनाओं की तुलना करता है और वो बोलना चाहता है कि वास्तव में हमारी सेना अच्छी है और जो पर्याप्तम् शब्द आता है, उसके मन में मेरी सेना बहुत असीमित है या कमजोर है? बहुत समझ भी नहीं आता है। दोनों अर्थ हो सकते हैं। बाद में इससे मैनिपुलेट कर रहा होता है वो लोगों को, तो भीष्म जो होते हैं वो कितना मैनिपुलेट करते रहे हैं, तो वो बोल रहा है पर वो बोल रहा है ऐसे नहीं कि उसका बोलना खत्म हो गया, पर अचानक ततः शंखं च भृतापः प्रतापान्निधमात्यप्रतापः… सहसैवाभ्यहन्यत स शब्दस्तुमुलोऽभवत्।
उसको उकसा रहा है, ये बोल रहा है वो बोल रहा है, भीष्म बहुत हो गया अभी चलो, तो भीष्म जो है वो अपना शंख बजा देते हैं, ऐसे मान लीजिए कोई फुटबॉल में वगैरह होता है ये जो कैप्टन है अपनी टीम से तुम ये करो वो करो वो करो ये करो बात कर रहे हैं, तो सीट भी आ जाता है चलो बहुत हो गया चालू करना है आपको, तो उस तरह से ही हो जाता है।
तो फिर इसके बाद में जब ये हो जाता है, तो फिर कौरवों के पक्ष में सारे लोग जो है अपने शंख बजाते हैं और उसके बाद में पाण्डवों के पक्ष में शंख बजाते हैं, और तभी यहाँ पे भगवद्गीता में भगवान की एंट्री होती है, तो 14वें श्लोक में होती है। तो मान लीजिए कैसे होता है कि कोई ऐसे कोई बड़े वक्ता का प्रवचन है, तो शायद पहले से वक्ता ऊपर आसन पर नहीं बैठे हैं, तो शायद उनका परिचय होता है, फिर उनको इनवाइट करते हैं कि आप आपका डाइस पर आ जाइए, तो वैसे पहली बार जो है, अगर आप दूसरा बार मुजी का उधार लेते हैं, तो वो मुजी में हीरो की एंट्री होती है, तो यहाँ पर यह एंट्री 1.14वें श्लोक में कृष्ण की पहली बार एंट्री है।
बाहर यह एंट्री कैसे है? बड़ी विचित्र है। यहाँ पर साधारणतः कैसे होता है? हीरो की एंट्री होती है, कोई हीरोइन है, बड़ी परेशानी में है, कोई गुंडे उसको परेशान करते हैं, तो हीरो आता है, अपनी बाइक पर आता है, यहाँ कहीं से उड़ते हुए कहीं आ जाता है, गिर जाता है, कूदता है, कहीं से कार से आता है, दौड़ते हुए आता है, और फिर वो उसको बचाता है, तो एक ड्रमैटिक एंट्री होती है, हीरो को हीरो दिखाया जाता है।
तभी पर यहाँ पर कैसे होता है? और कृष्ण जो आते हैं, वो एक तरह से हीरो के रूप में नहीं है, वो हीरो के चैरिटियर के रूप में, हीरो के सारथी के रूप में- ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ। माधवः पाण्डवश्चैव दिव्यौ शंखौ प्रदध्मतुः॥
तो कौरवों के पक्ष में सब लोगों ने शंख बजा दिया है, तो यहाँ पे दूसरे पक्ष में शंख बजा रहे हैं, तो वहाँ पे कृष्ण और अर्जुन का जो इंट्रोडक्शन है, वो बताया गया है, तो यहाँ पे जो है, एक भी और किसी सारथी का उल्लेख नहीं आता है, सारे सेनापतियों का, महान योद्धाओं का उल्लेख आता है, उसमें कृष्ण एक ही है, जो वहाँ पे योद्धा नहीं है, योद्धा है, पर युद्ध नहीं करने वाले हैं, पर उनका उल्लेख आता है, क्योंकि कृष्ण इतने महत्वपूर्ण है।
और अभी भागवतम या गीता में कई बार योद्धाओं की लिस्ट बताई जाती है, तो एक बार लिस्ट बताते हैं दुर्योधन, और फिर उसके हमें चौदह, अट्ठारह तक लगभग वापस एक बार लिस्ट बताई जाती है, अच्छे लिए चौदह से नहीं, बारह से कह सकते हैं, पर यहाँ पर लिस्ट इतनी स्पष्ट नहीं है, पर जो लिस्ट बताई जा रही है, तो जब अर्जुन लिस्ट बताते हैं सॉरी, जो दुर्योधन लिस्ट बताते हैं, उसमें दुर्योधन जो है, वो कृष्ण को भूल जाते हैं, कृष्ण का उल्लेख नहीं करता है दुर्योधन।
पर यहाँ पर जो लिस्ट बता रहे हैं, वो संजय बता रहे हैं, संजय की लिस्ट में जब वो उल्लेख कर रहे हैं संजय, तो क्या होता है? कृष्ण इस फर्स्ट, कम से कम पाण्डवों के पक्ष में, कौरवों के पक्ष में तो बता दिया उन्होंने, पाण्डवों के पक्ष में उन्होंने कृष्ण पहले बताते हैं, तो यही संजय की सामाजिक, दुर्योधन की किसी जगह की भेद बनता है, दुर्योधन सोच रहा है कि कृष्ण युद्ध नहीं करने वाले, क्या हो उससे होने का फायदा भी कुछ नहीं है, वो उल्लेख करने की क्या ज़रूरत है? ऐसे नहीं है कि कृष्ण को भी नहीं देखा नहीं है कि जब पहले ही उल्लेख करते हैं… सारे कौरव, पाण्डवों के पक्ष में जो योद्धाओं के पहला तक आते होने, तो पहला बोलते हैं वो भीष्म, अर्जुन सम युद्धे। तो भीम-अर्जुन जैसे कई आने का योद्धा है यहाँ पे।
तो भीम-अर्जुन जब बोल रहे हैं, तो दुर्योधन का, तो खुद का अंदर भीम थे। बहुत है, इससे भीम का नाम पहले आता है। और वहाँ पर तो ये क्या हो रहा है कि ये भगवद्गीता के पहले अध्याय में ऐसे मान लीजिए क्रिकेट मैच में चल रही है, कोई मैच चल रही है, और एक टीम बहुत अच्छे से बैट कर रही है, बैटिंग टीम बहुत अच्छे से बैट कर रही है कि वो ऐसे शॉट्स मार रहे हैं कि चौके जा रहे हैं, छक्के जा रहे हैं, और जो बॉलर्स हैं वो हताश हो रहे हैं, फील्डर्स कैच ड्रॉप कर रहे हैं, बॉलर अच्छे से बॉलिंग भी नहीं कर पा रहे हैं, और जब इस तरह से सारा खेल चल रहा है, और एकाएक जो बड़ा एग्रेसिव बैट्समैन है, जो अच्छे फॉर्म में है, वो अचानक आउट हो जाता है, ये क्या हो गया? इसको इंग्लिश में कहते हैं अगेंस्ट द रन ऑफ द प्ले, जो होना अपेक्षित है, उसके बिल्कुल विपरीत जाता है।
तो भगवद्गीता में दिखा रहे है कि किस तरह से जो अर्जुन की जो दुविधा थी, वो बिल्कुल अनपेक्षित थी। सबसे पहले गीता में पहले क्या है? धृतराष्ट्र की इनसिक्योरिटी, सबको उकसाने का या आश्वासन देने का प्रयास कर रहा है, और फिर उसके बाद में शायद ये सत्रहवाँ श्लोक है, रुदयानि व्यदारयत्, अट्ठारह, चौदह, पन्द्रह, सोलह, उन्नीस… तो यहाँ पर उन्नीसवें श्लोक में बताया है कि वहाँ पर फर्दर कौरवों का डीमोरेलाइजेशन, उनका हताश होना बताया जा रहा है, जब वो यहाँ से इस तरह से शंख बजाते हैं पाण्डव, तो इस तरह से शंख बजाते हैं, पर पाण्डवों का शंख जो जोर से बजाता है- तुमुलोऽभ्यनुनादयन्… तो तुमुलो होता है कि यह क्या होता है? उससे नभश्च पृथिवीं चैव, चारों ओर वो आवाज़ आ रही है, दोनों की ध्वनि बहुत ज़्यादा है।
पर क्या होता है? पाण्डव की ध्वनि इस तरह से रुदयानि व्यदारयत्, उनका हृदय तोड़ जाता है। तो यह कैसे है कि क्रिकेट मैच होती है, उसके पहले हमें क्रिकेट एक स्पोर्ट्स नहीं है, वो एक फिजिकल गेम है, पर वो एक मेंटल गेम भी है। तो क्या होता है? दोनों मैच के कैप्टन का पहले प्री-मैच इंटरव्यू होता है, और दोनों इंटरव्यू में कौन कितना आत्मविश्वास है, वो दिखता है, और एक व्यक्ति में इतना आत्मविश्वास होगा कि दूसरे व्यक्ति से मैं पाण्डव शक्तिशाली है, उत्साह ज़्यादा है, और कौरवों का उत्साह कम है।
और ये क्यों बताए जा रहे हैं? ये इसी मतलब, अगर गीता का जो हम प्रभाव देखते हैं, 1 से 19 जो है कि ये दिखाया जा रहा है कि पाण्डवों का जो भाव है, वो एक तरह से बढ़ रहा है। और ये सारा ड्रामा किस लिए बताया जा रहा है? इसलिए कि अर्जुन ऐसे नहीं थे कि उनको लग रहा था कि शायद हम जीत नहीं पाएँगे, इसलिए शांति कर लेना चाहिए, उनको भय बिल्कुल नहीं बताया जा रहा है, जब वो शंख बजा रहे हैं, वास्तव में जो अगर किसी में भय है, तो उनके शत्रु में भय है, तो इसलिए जब अर्जुन सवाल करते हैं, अर्जुन को हिचकिचाहट होती है, तो वो इतनी-इतनी अजीब है, इतने अनपेक्षित है, वो यह दर्शाया जा रहा है यहाँ।
अर्जुन की विषादपूर्ण मनोदशा और एथिकल डायलेमा
तो इसके बाद में अभी अर्जुन क्या कहते हैं? कि जब उन्होंने अपना धनुष उठाया हुआ है, पर वो कहते हैं कृष्ण से कि हे कृष्ण! मैं देखना चाहता हूँ कौन युद्ध करने आया है, कौन युद्ध करने आया है यहाँ, मैं अपनी आँखों से देखना चाहता हूँ।
तो अभी जब वो बोलते हैं- सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत।
अभी भी ये भाव है कि शायद युद्ध टल जाए, कि शायद युद्ध टल जाए, शायद युद्ध न हो। हम देखते हैं कि पाण्डव जो थे, जब कृष्ण शांति दूत के रूप में आते हैं, तो तभी भीम भी कृष्ण से कहते हैं कि आप जहाँ तक हो सके ये शांति से सुलझाने का प्रयास करो, और तभी कृष्ण हसने लगते हैं, यार एक भीम ऐसे लगता है कि अब युद्ध का प्रस्ताव आ गया है और तुम भी भयभीत हो गए हो, पहले तो तुमने बड़े-बड़े वचन लिए थे, शपथ लिए थे कि मैं इसको ये करूँगा, उसको वो करूँगा, क्या होगा इतना शपथ का?
भीम बोलता है कि अगर युद्ध होगा तो मैं ज़रूर पूरे करूँगा उसको, पर युद्ध नहीं चाहता हूँ मैं, वास्तव में हमारा ही कुल है ये, तो पाण्डव पूरा प्रयास कर रहे होते हैं कि युद्ध नहीं हो। तो एक तरह से दुर्योधन के मन में अभी तक एक तरह से कोने में आशा है कि शायद युद्ध नहीं हो, और हो भी तो फिर वो इतना भीषण युद्ध नहीं हो, पर जब अर्जुन दोनों के बीच में आ जाता है और देखने लगता है, तो क्या होता है?
तभी उसको रजिस्टर होता है, बाप रे! ये क्या हो रहा है? ये इतना भीषण युद्ध है, ये इतना भयानक युद्ध है, ये इसमें तो वास्तव में क्या होने वाला है? ये बहुत डेंजरस है, और तभी उसको एकदम करना है, नहीं करना है… मान लीजिए कोई दो परिवारों में दो भाइयों में कोई प्रॉपर्टी पे युद्ध हो रहा है, पिताजी गुजर गए, पिताजी की प्रॉपर्टी किसको मिलेगी, किसको मिलेगी, उसमें कोई झगड़ा हो रहा है, तो शायद दोनों में झगड़ा चल रहा है, झगड़ा सुलझाया नहीं जा रहा है, बाद में बोलते हैं कि मैं तुमको कोर्ट में आकर श्यू करूँगा, कोई भाई देता है धमकी, शायद उसको लगता है कि मेरे साथ बेईमानी हुई है, तो जब वो देता है धमकी, तो ठीक है, तो उसको फिर भी आशा होती है कि ऐसे नहीं होगा, पर जब कोर्ट में जाते हैं वो और कोर्ट में देखते हैं वास्तव में कि दूसरे पक्ष में वो मेरा ही भाई बैठा है, मेरा ही परिवार वाले बैठे हुए हैं, और वो कितने-कितने नफरत से मेरी ओर देख रहे हैं, तो यार ये सही में होने वाला है अभी!
और तभी लगता है कि ये कोर्ट केस करना है कि नहीं, तो वैसे ही है ये। तो वैसे ही है ये, ब्लडबाथ होने वाला था बिटवीन रिलेटिव्स, ब्लडबाथ मतलब ये खून की नदी बहने वाली थी, खून की नदी बहने वाली थी, और ये किसमें होनी थी? ये रिश्तेदारों में होनी थी, इसको कहते हैं टेक्निकली इंग्लिश में कहते हैं फ्रैटरीसाइड। फ्रैटरीसाइड मतलब भाई-भाई एक-दूसरे को मार डालते हैं। तो ऐसा युद्ध होने वाला था, तो अर्जुन को एक तरह से पता था, अर्जुन योद्धा था, पर फिर भी जब वहाँ पर जाता है, वो देखता है ये कितना गंभीर सत्य है, ये अनिवार्य हो गया है, तभी उसको लगता है, वो युद्ध करना है या नहीं करना है, और तभी अर्जुन बोलने लगते हैं कृपविष्टम्…
एक तरह से, एक तरह से अर्जुन पूरी भावनाओं के वश में आवेश पर चल जाते हैं कि ये युद्ध कैसे करें? कैसे युद्ध कर सकते हैं इसके बारे में? तो तभी अर्जुन कारण लेने लगते हैं, युद्ध नहीं करना चाहिए। अभी वास्तव में कई तरह से ये जो कारण है, उसका विश्लेषण दिया जाता है कि ये करुणा थी, ये असक्ति थी, ये भाव, मोह, वासना थी, पर वास्तव में इस तरह से विश्लेषण करने से क्या होता है कि अर्जुन का जो द्वंद्व था, वो अच्छी तरह समझ में नहीं आता है।
अगर हम उस डिसीजन को देखना चाहते हैं कि मुझे फैसला करना है, तो अर्जुन के लिए ये फैसला इतना मुश्किल क्यों था? क्यों क्या होता है जब हमारी दुविधा होती है, confusion, तो अलग-अलग प्रकार के… जैसे मान लीजिए कोविड के समय, पूरे देश में लॉकडाउन लगा दिया था, तो तभी क्या था? एक तरह से लोगों का जीवन बचाना, दूसरी ओर से जीवन लोगों के जीवन ही बचाना, Like, should we save people’s lives or people’s livelihoods? तो ये सवाल था एक तरह से। अभी उसमें क्या, कोई आसान उत्तर नहीं है, क्योंकि इस प्रकार का जो महामारी है, वो शायद इतिहास में, इतिहास में नहीं हुई है, तो कोई ऐसे प्लेबुक, कोई मैप नहीं था क्या करना चाहिए, तो तभी फैसला करना बड़ा मुश्किल होता है।
तो अर्जुन का जो अभी, जो confusion था, सबसे मुश्किल जो फैसले करने होते हैं, हमारे जीवन में, वो कौन से आते हैं, वो एथिकल confusion में आते हैं। एथिकल confusion मतलब क्या है कि मुझे कौन सी चीज़ ज़्यादा महत्वपूर्ण है, कौन सी चीज़ ज़्यादा मायने रखती है। तो मान लीजिए किसी को नौकरी, उनको नौकरी कहीं और मिलती है, पर उनके परिवार को वहाँ पर शिफ्ट करना possible नहीं है, क्योंकि अलग कारण है, तो उनके परिवार से दूर जाना पड़ेगा। तो अभी परिवार के साथ रहना महत्वपूर्ण है, या ज़्यादा पैसा कमाना महत्वपूर्ण है? तो परिवार के साथ रहना गया, करना है, शायद पैसे कोई, हमारा कोई चरण है, ये करना है, वो करना है, तो क्या है, तभी ज़्यादा महत्वपूर्ण है, वो समझना बड़ा मुश्किल होता है।
तो अभी अर्जुन का जो डिलेमा था, अर्जुन की जो दुविधा थी, वो एथिकल टौंसिंग था। ये क्या एथिकल टौंसिंग था उनका? एक तरफ था उनका क्षत्रिय धर्म, और दूसरी तरफ था उनका कुलधर्म। क्षत्रिय धर्म मतलब क्या? कि वो एक क्षत्रिय है और क्षत्रिय को युद्ध करना ज़रूरी है, कुछ भी हो जाए युद्ध करना चाहिए उसको, पर जहाँ पर जो जिससे युद्ध कर रहे हैं, वो कौन है? वो उनके ही…