Hindi – Bhagavad Gita Overview Chapter 2 Part 2 || Chaitanya Charan
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Lecture Summary
यह अध्याय सांख्य योग (ज्ञान योग) और कर्म योग का सुंदर समन्वय प्रस्तुत करता है। इसमें अर्जुन के मोह, कर्तव्य, और जीवन के वास्तविक उद्देश्य का विस्तृत विश्लेषण किया गया है।
1. अर्जुन की दुविधा और कर्तव्य पथ
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युद्ध का अनिवार्य कर्तव्य: अर्जुन अपने कुल और गुरुओं के नाश की आशंका से ग्रसित होकर युद्ध से पीछे हटना चाहते हैं। भगवान कृष्ण उन्हें उनके क्षत्रिय धर्म की याद दिलाते हैं और समझाते हैं कि धर्म की रक्षा के लिए युद्ध करना उनका कर्तव्य है।
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कर्मकांड बनाम कर्मयोग: वैदिक संस्कृति में अधिकांश लोग कर्मकांड (पुण्य-कर्म) के माध्यम से स्वर्ग प्राप्ति की इच्छा रखते हैं, जो कि एक क्रमिक प्रगति है। परंतु वास्तविक मुक्ति ज्ञान और योग के माध्यम से ही संभव है।
2. फल और कर्तव्य (ध्येय) का अंतर
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फलों से अनासक्ति: भगवान कृष्ण प्रसिद्ध श्लोक के माध्यम से उपदेश देते हैं कि मनुष्य का अधिकार केवल कर्म करने पर है, उसके फलों पर कभी नहीं (कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन)।
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ध्येय (Goal) और फल (Result) में भेद:
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ध्येय रखना उचित है: किसी कार्य या लक्ष्य को सामने रखकर एकाग्रता और उत्साह से कार्य करना चाहिए (जैसे युद्ध में रणनीति बनाना)।
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फल की आसक्ति हानिकारक है: परिणाम या सफलता-असफलता की अत्यधिक चिंता व्यक्ति को उसके कर्तव्य से विचलित कर देती है।
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समदर्शिता: सुख-दुःख, लाभ-हानि और जय-पराजय में समान भाव (इक्वानिमिटी) रखना ही वास्तविक कर्मयोग है। गैर-जिम्मेदार होना और कर्तव्य से भागना अनासक्ति नहीं है।
3. स्थितप्रज्ञ के लक्षण (आत्मसत्कारी पुरुष)
अध्याय के अंत में अर्जुन के चार महत्वपूर्ण प्रश्नों के उत्तर में भगवान एक स्थितप्रज्ञ (स्थिर बुद्धि वाले व्यक्ति) के लक्षण बताते हैं:
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इंद्रियों पर नियंत्रण: जैसे कछुआ अपने अंगों को आवश्यकता पड़ने पर समेट लेता है, वैसे ही ज्ञानी पुरुष अपनी इंद्रियों को विषयों से नियंत्रित रखता है।
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बाह्य सुखों से असंगति: वह बाहरी सुख-सुविधाओं की लालसा नहीं करता, बल्कि आंतरिक शांति और संतोष में स्थित रहता है।
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द्वंदों से परे: जीवन में सुख या दुःख आने पर वह विचलित नहीं होता; न तो अति-प्रशंशा करता है और न ही निंदा से घबराता है।
4. निष्कर्ष
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भगवान का मुख्य उद्देश्य अर्जुन को युद्ध के माध्यम से उसके वास्तविक कर्तव्य का पालन करवाना है।
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भौतिक फलों की आसक्ति का त्याग करके, भगवद्भाव और कर्तव्यनिष्ठा के साथ जीवन जीने से ही मनुष्य जीवन के अंत में ब्रह्मानिर्वाण (परमसिद्धि/मुक्ति) को प्राप्त करता है।
Full Transcription
अर्जुन का समर्पण और धर्म की व्याख्या
हरे कृष्णा! पहला विभाग, 10 से 30 तक, अर्जुन सरेंडर करते हैं और जानना चाहते हैं कि धर्म क्या है। यहां से 30 तक आत्मज्ञान भगवान बताते हैं कि किस तरह से आप जो चिंता कर रहे हो, अपने कुल वाले लोगों, अपने लोगों का नाश करोगे, उनका नाश नहीं होने वाला है। यहां पर अर्जुन क्या कर रहे हैं, कुल धर्म कंसर्न जो है, एड्रेस कर रहे हैं। फिर उसके बाद में 37 तक वो क्या कर रहे हैं, वो यहां पे बता रहे हैं कि कैसे युद्ध करने से क्या होगा, आपको स्वर्ग मिलेगा और न करने से आपको पाप होगा। तो इस तरह से वो अर्जुन को बोल रहे हैं, अभी उनका जो क्षत्रिय धर्म है, वो करने को बोल रहे हैं।
भगवान का उपदेश और कर्म योग का मार्ग
तो अभी इसके बाद में भगवान क्या कर रहे हैं, यह अगला सेक्शन यहां से लगभग 54 तक आता है, फिर उसके बाद में एक प्रश्न उत्तर आता है। तो अभी एक तरह से यहां पे भगवान जो बता रहे हैं, वो, अगर मान लीजिए आप जानते हैं, यह इंग्लिश में बुलजाय कहते हैं, मतलब कोई तीर है वो बिल्कुल निशाने पे लगा। तो अगर यह बुलजाय शब्द है, वो बहुत खूंखार शब्द है, मतलब एक बैल की आंख को मारना, कितनी बेरहमी की बात है। पर वो उस समय क्या है कि जब हंटिंग होता था, जब शिकार होता था पाश्चात्य देशों में, तो जैसे जानवर की आंख को मारना, वह एक बहुत एक्युरेट तीर मारने का, बहुत अच्छा तीर मारने का लक्ष्य हुआ करता था।
तो एक तरह से भगवत गीता का एक बुलजाय, एक टारगेट है, और टारगेट क्या है, या उसको हम पर्पस कह सकते हैं, उद्देश्य क्या है, कि वो भगवान चाहते हैं कि अर्जुन अपना कर्तव्य करे, अर्जुन की फाइटिंग, कि अर्जुन युद्ध करे, ये भगवान का उद्देश्य है। अभी कोई व्यक्ति है, सामने टारगेट है कि वो अलग-अलग दिशाओं से उस जगह को तीर मारता है और बराबर हर तीर जो है, उसी निशाने पे लग रहा है। अगर ऐसे होता है, तो वो तीर मारने वाला है, उसको हम बड़ा ही एक्सपर्ट कहेंगे। तो भगवान क्या कर रहे हैं, ऐसे ही अलग-अलग दिशाओं से वो तीर मार रहे हैं—अर्जुन, तुम्हें युद्ध करना है।
तो वो एक स्तर से है, कर्मकांड के आधार पर। अगर आप कर्मकांड का विचार करोगे, तो भी आपको युद्ध करना चाहिए, यह जो है, 31 विभाग लिया उसमें बता रहे हैं। फिर उसके बाद में, कर्मयोग के आधार पर बताएंगे। अगर तुम्हें कर्मयोग करना है, तो भी आपको युद्ध करना चाहिए, और वो जो है, अगले सेक्शन में 53 तक बताएंगे। फिर बाद में, अगर आपको ध्यान योग करना है, तो भी आपको पहले, ध्यान योग के लिए सक्षम होने के लिए, पहले आपको अपना कर्तव्य करना चाहिए। और वो कर्तव्य करना है, मतलब आपको युद्ध करना चाहिए।
विभिन्न योग और भगवान का मुख्य उद्देश्य
तो ये जो है, खास करके भगवान, पहले से 9 श्लोक तक कहते हैं। फिर उसके बाद में है ध्यान योग। अब ध्यान योग जो है, इसका ज्यादा उल्लेख भगवान नहीं करते हैं भगवद गीता में, पर जहां तक उल्लेख होता है इसका, भगवान कहते हैं, ध्यान योग में संन्यास लेना है, पर उसके पहले भी क्या करना है, व्यक्ति को अपना कर्तव्य करना है। यह भगवद गीता के अंत में बताते हैं, लगभग अट्ठारह विश्वयोग तक। अब बता रहे हैं, इसके पहले भगवान तीन गुणों का विश्वयोग करते हैं, जो कि ध्यान योग के विश्वयोग में आता है, और कहते हैं कि हर व्यक्ति तीन गुणों में बंधा है, तो उससे मुक्त होने के पहले उसको अपना कर्तव्य करना चाहिए। फिर अनासक्ति आ जाएगी, फिर विराग ले सकता है, तो उसको अब युद्ध करना चाहिए।
और आखिरी है भक्ति योग। अगर आपको भक्ति योग भी करना है, तो आपको क्या करना है? आपको युद्ध ही करना है। और भक्ति योग का उल्लेख अनेक जगह पर आता है भगवत गीता में, पर अगर हम एक संदर्भ के लिए ले सकते हैं, तो यह है 8.4 से 7 तक, तो कहीं और जगह में भी आता है, उसकी चर्चा कर रहे हैं बाद में। तो पर क्या है, भगवान का एक उद्देश्य है, कि मतलब, ये सब क्या है, ये सब प्रोसेसेस हैं, ये सब विद्याएं हैं। तो एक तरह से, वन पर्पस, मेनी प्रोसेसेस, ऐसे भगवत गीता का उद्देश्य है, एक ऐसी भगवत गीता की शिक्षा है, कि एक उद्देश्य है, और अनेक विद्याएं हैं उसके लिए, अनेक पद्धतियां हैं वो उद्देश्य को पूर्ण करने के लिए।
कर्मकांड, योग और पुरुषार्थ की श्रेणियां
तो अभी तक जो भगवान ने बताया है, किस तरह से आप कर्मकांड करोगे, कर्मकांड के बारे में कुछ बताया है, कि साधारणतया, जो क्षत्रिय लोग होते हैं, वो कर्मकांड के स्तर पर कार्य करते हैं। इसको हम कह सकते हैं कि, इसका अगर हमें चित्रण करना है, तो कैसे होता है कि, अर्थ है, पृथ्वी का स्तर है ये। तो अगर व्यक्ति कर्मकांड करता है, तो वो स्वर्ग जाता है। अगर वो विकर्म करता है, विकर्म मतलब पाप करता है वो, तो वो नरक जाता है। और इसके अलावा एक चीज़ है, अगर वो व्यक्ति योग करता है, योग करता है तो उसको मुक्ति प्राप्त होती है।
तो साधारण लोग, वैदिक संस्कृति में जो होते थे, अधिकांश लोग पुण्य किया करते थे प्राचीन काल में। और योग में अगर हम आगे जाएंगे, तो एक और आएगा जो व्यक्ति करते हैं, वो और भी दुर्लभ है एक तरह से। इसको अगर हम यहां पर लिखते हैं, योग। और अनेक योग हैं, उनमें से तस्याहं सुलभः पार्थ, इत्युक्तस्य योग न करते हैं। यहां पे क्या है? मुक्ति ही नहीं केवल, इससे भगवान प्राप्त होते हैं व्यक्ति को। जो भगवान की प्राप्ति होती है किसी को, वो कैसे जो होती हैं, वो खास करके भक्ति योग के द्वारा है, भक्ति योग के द्वारा।
अभी अधिकांश लोग जो है वो कर्मकांड करते हैं, वो पुण्य करते हैं और पुण्य से वो स्वर्ग में जाते हैं। और अगर आप महाभारत भी पढ़ते हैं, महाभारत ये कर्मकांड की किताब है अधिकांश रूप से, सब लोग क्षत्रिय की योजना करते हैं कि वो स्वर्ग में जाएंगे। भक्ति का उल्लेख है, पर भक्ति पर ज्यादा जोर नहीं है। क्षत्रिय लोग हैं, जानते हैं उस संस्कृति में अनेक ऋषिगण हैं, जो मोक्ष ही प्राप्ति करना चाहते हैं। पर अधिकांश लोग क्या हैं? वो कर्मकांड का मार्ग ले रहे हैं। क्योंकि यह एक तरह से एक प्रोग्रेस है। यह भी एक तरह से एक प्रगती का ही लक्षण है।
मतलब, चार पुरुषार्थ हैं। कौन से चार पुरुषार्थ हैं? धर्म, अर्थ, काम, और मोक्ष। पहले तीन—धर्म, अर्थ, काम, ये कर्मकांड में आते हैं और जो मोक्ष है, वो ज्ञान-कांड में आता है। तो इसका मतलब क्या है कि अभी अधिकांश लोग जो है वो इसी स्तर में हैं। सो, हम कह सकते हैं यह यहां पे जो है Majority है। अधिकांश लोग यहाँ पे हैं। Majority ही नहीं हम कह सकते हैं Vast Majority यहाँ पे है। और यहाँ पे जो है जो काम के परे जाना करते हैं वो एक Tiny Minority हैं। बहुत छोटे से लोग, बहुत कम लोग ऐसे कर रहे हैं। यह वैदिक संस्कृति में पर ऐसे ही था।
वैदिक संस्कृति और उपदेश की शैली
इसलिए शास्त्र में बताता है, मुक्तानामपि सिद्धानाम्—जो यह धर्म, अर्थ, काम के परे कोई जाते हैं और उनमें से बहुत कम लोग हैं, तां मपि सिद्धानाम् कश्चिन्मां वेत्ति तत्वतः, जो मुझे जानते हैं, जो मुझे प्राप्त करते हैं। तो साधारणतया अधिकांश क्षत्रियों का जो स्तर होता है वो कर्मकांड का स्तर होता है। इसलिए ऐसी अपेक्षा होती है, भारत में भी ऐसे लिखते हैं कोई व्यक्ति गुजर गए तो स्वर्गवासी। वास्तव में वो स्वर्ग में गए हैं ये पता नहीं है, पर ऐसे साधारण वैदिक संस्कृति में ऐसी अपेक्षा होती है कि व्यक्ति ने पुण्यवान अगर जीवन जिया है तो वो स्वर्गवासी होगा।
तो बहुत कम लोग ऐसे इंद्र लोक में लिखते हैं बैकुंठवासी या कैलाशवासी। कैलाशवासी कम लिखते हैं, वैकुंठवासी कम लिखते हैं, अधिकांश लोग स्वर्गवासी लिखते हैं। वो ऐसी संस्कृति थी। तो अभी इसलिए सबसे पहले क्या करते हैं भगवान उस स्तर से चालू करते हैं जिस स्तर पे अधिकांश क्षत्रिय होते हैं। और एक तरह से अर्जुन ने भी इसी स्तर पे चर्चा की है। अर्जुन ने पहले कहा है कि भले ही मैं ये युद्ध जीत जाऊंगा और मैं स्वर्ग प्राप्त करूंगा, तो भी मुझे संतुष्टि नहीं मिलने वाली है।
तो जनरली कैसे होता है हमें? जब कोई discussion चालू करना होता है तो व्यक्ति जिस स्तर पर है उस स्तर से चालू करना चाहिए। नहीं तो क्या होता है व्यक्ति को कुछ link नहीं होता है, व्यक्ति कुछ समझ में नहीं आता है। अगर मान लीजिए व्यक्ति बहुत बीमार है और वो भी चाहता है कि किस तरह से मुझे राहत मिल जाए, मेरी दवाई से कुछ ठीक हो जाए, कुछ मुझे ठीक हो जाए, और तभी हम आपको बोलते हैं यह एक शरीर क्या है? एक शरीर की कुछ चिंता करते हो तो सिर्फ भक्ति करो। असली तभी व्यक्ति को जो है, क्या है तभी उसको, हां तत्वज्ञान दे सकते हैं कभी-कभी, पर महत्वपूर्ण क्या है, उस व्यक्ति को तभी हमें जिस स्तर पे दुःख है उस स्तर पे उसको मदद करना ज़रूर है। तो इसलिए वैदिक शास्त्र में आयुर्वेद है, वैदिक संस्कृति में आयुर्वेद है और वो भी ब्राह्मण लोग ही वैद्य हुआ करते थे।
प्लॉट ट्विस्ट और श्रोता की रुचि
तो वैसे ही हमें भगवान कर रहे हैं, क्योंकि अर्जुन ने जो शुरुआत की थी, वो किस स्तर से की थी? इसी स्तर से कर्मकांड से, इसलिए भगवान कर्मकांड के स्तर से चालू करते हैं। और उसके बाद में, जब कर्मयोग के स्तर पर जाते हैं वहां, तो अभी क्या होता है, कि ऐसे अगर कोई प्रवचन दे रहा है, तो ऐसे कहते हैं कि आपको, मान लीजिए ये रस्ता है, अगर कोई पर्वत पर चढ़ना चाहता है, ये माउंटेन ट्रेल है, तो अभी मुश्किल रास्ता है, तो क्या होता है, शायद लोग बोलेंगे, अरे ये तो बहुत चढ़ना है, बहुत मेहनत है, नहीं आएंगे।
तो कभी-कभी क्या होता है, खास करके बच्चों को किसी माउंटेन ट्रेल के लिए जाना है, तो क्या करते हैं, ऐसे बीच-बीच में, कुछ गुडीज़ रखते हैं, कुछ स्वीट या कुछ टॉस, बहुत रखते हैं, तो क्या होता है लोग समझते हैं, अरे यहाँ पे कुछ मिल गया मुझे? यहाँ पर कुछ मिल जाएगा मुझे। आगे कुछ मिलेगा। तो ऐसे क्या होता है? तो जो गुडीज़ होते हैं न, जो ऐसे गुडीज़ होते हैं, वो देखके लोग, क्या है यह, जाना चाहता हूँ मैं।
तो भगवान भी क्या करते हैं, तो अभी ऐसे ही, जब कोई प्रवचन दे रहा होता है, कोई भाषण दे रहा होता है, कोई वक्ता बोल रहा होता है, तो it is important, यह ज़रूरी है कि बीच-बीच में ऐसे कुछ बताएं, जिससे कि जो श्रोता है, उनका उनकी रुचि-पुनः जागर हो जाए। तो कभी-कभी कोई हास्य हो सकता है, कभी कोई कहानी हो सकती है, कभी-कभी कोई ऐसा विधान हो सकता है, जो बिल्कुल विरुद्धभास लगे। तो उससे क्या होता है, अभी तुमने यह बोला, अभी यह कैसे बोला, कुछ गड़बड़ हो रहा है, क्या मैंने कुछ गड़बड़ सुना है, या आपने कुछ गड़बड़ सुना है, क्या हो गया है?
तो इसको, अगर आप मूवीज़ देखते हैं, तो मूवीज़ में इसको कहते हैं, एक प्लॉट ट्विस्ट। प्लॉट ट्विस्ट मतलब क्या, अगर एक व्यक्ति हीरो लगता है, दूसरा व्यक्ति विलेन लगता है, और दोनों चल रहे हैं, और अचानक, जो विलेन है, हीरो जैसे कारिगर लगता है, और हीरो विलेन जैसे कारिगर लगता है, यह क्या हो गया, यह कुछ अनपेक्षित हो गया। तो जितना कुछ अनपेक्षित होता है, उतनी रुचि रहती है, कैसे हैं कि, जब भी सब कुछ अपेक्षित होता है, तो व्यक्ति बोर हो जाता है, उसका रुचि चला जाता है, तो अनपेक्षित जितनी चीज़ें होती हैं, उससे रुचि बढ़ती है। सो, जनरली, Unexpected triggers interest.
श्लोकों में विरोधाभास और सांख्य-योग का मिलन
तो भगवान भी, एक तरह से, भगवत गीता ये भगवान का संदेश है, पर भगवत गीता का संदेश से, हम यह भी सीख सकते हैं कि, कैसे कृष्णा बड़ा ही उत्कृष्ट रूप से उपदेश भी देते हैं। तो अभी यहाँ पे, प्लॉट ट्विस्ट की बात क्यों कर रहा हूँ मैं? यहाँ पे भगवान, दो श्लोकों में, बिल्कुल जो है, अपोजिट चीज़ बोल देते हैं। सबसे पहले, 2.37 में कहते हैं वो,
हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम्। तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयః॥
अभी वो बोल रहे हैं, कि सुख-दुःख की बिल्कुल परवाह मत करो, जय-पराजय की बिल्कुल परवाह मत करो। तो यहाँ पे, क्या हो रहा है, यहाँ भगवान, क्या फायदा है, क्या नुकसान है? पर यहाँ पे बोल रहे हैं कि गो बियॉन्ड प्रॉफिट-लॉस कैलकुलेशन। ऐसे सुख-दुःख जो है, इसका चिंता मत करो। अरे आपने अभी ये बोला, अभी ये क्यों बोल रहे हैं आप? उससे रुचि जागृत हो जाती है, कि यह क्या चल रहा है यह।
मान लीजिए कोई हम प्रवचन सुन रहे हैं, प्रवचन में कहता है कि मैं आपको बताऊंगा, आप हरे कृष्ण का जप मत करो। अरे, यह क्या हो गया, तो आप उल्टा बोल रहे हैं। जब मैं प्रवचन दे रहा था, कि अगर आपका ड्राइविंग या प्लेन ड्राइविंग कर रहे हैं, तब हरे कृष्ण मंत्र का जप मत करो। तो थोड़ा क्लेरिफिकेशन करते हैं, तो क्या सरप्राइज जब रखते हैं, आश्चर्य होता है तो रुचि बढ़ती है।
तो इसके बाद में, फिर उन चालीसवें श्लोक में भगवान समझाते हैं, क्या कर रहा हूँ। एषा तेऽभिहिता सांख्या बुद्धिर योगे त्विमां शृणु। तो अभी मैं आपको बता रहा हूँ, अभी कर्मकांड शब्द भगवान इस्तेमाल नहीं करते, पर वो स्तर है। अभी बता रहे हैं, कि जो सांख्य, यहाँ बताते हैं, मैं सांख्य और योग को मिलन कर रहा हूँ। तो सांख्य जो है, यहाँ भगवान ने 11 से 30 में बताया है, कि सांख्य मतलब क्या, शरीर और आत्मा में कैसे फर्क है, वो सांख्य का ज्ञान है। और अभी योग का ज्ञान जो है, वो यहाँ से यहाँ तक भगवान देने वाले हैं।
तो जो मैंने उसका समरी जो है, उसका सबसे शुरुआत में दे दिया है, तो यह 38 जो है, यह एक तरह से लिंक है, 38 में भगवान क्या कर रहे हैं, उसका सार दे रहे हैं, और फिर इसको विस्तार कर रहे हैं। तो यह जो है, हम कह सकते हैं सार और विस्तार, समरी और इलेबोरेशन, इस तरह से भगवान कर रहे हैं। और इसमें वे क्या करते हैं अभी, फिर 40 से 50 श्लोक से बताने लगते हैं, सबसे पहले अभी एक विधि बताई है, दूसरी विधि बता रहे हैं, और अगर दूसरी विधि जो बता रही है, वो बिल्कुल पहली विधि के विपरीत है, तो फिर इस दूसरी विधि क्यों करनी है, वो समझाना बहुत ज़रूरी है।
कर्मकांड और कर्मयोग की तुलना
तो इसलिए यह जो सेक्शन है, हम कह सकते हैं 38 से 53, इसमें क्या हो रहा है, सबसे पहले, यह 40 है, तो लगभग 40 से 46, क्या है, ये जो है कर्मयोगा, कर्मकांड, कंपेरिजन, इनकी तुलना हो रही है, और फिर बाद में, कर्मयोगा एक्सप्लेनेशन है, कि कर्मयोगा कैसे करना है, कर्मयोग से क्या फल मिलता है, कैसे फल मिलता है, वो बता रहा है।
तो इसलिए अभी अर्जुन को वो फैसला वही करना है… तो युद्ध करना है। पर वो किस स्तर पर फैसला करना है? किस विचार धारा से वो कार्य करने… वो बता रहे हैं। तो अभी भगवान यहाँ पर क्या बताते हैं? कर्मकांड और कर्मयोग की तुलना में, प्रधान चीज़ बताते हैं कि कर्मकांड के जो फल हैं वो टेम्परेरी हैं, वो क्षणिक हैं। कर्मयोग के जो फल हैं वो शाश्वत हैं, वो इटरनल हैं।
तो इसका उल्लेख चालिस में आता है और जो अविपश्चिता, जो उल्लेख है 43-44 में आता है। और फिर उसके बाद में और नीचे भगवान बताते हैं कि किस तरह से तो कोई कहेगा कि पर या जो कर्मकांड है यह वेदों में ही बताया है। हे! हां सही है। पर ये क्यों है? This is यह पार्ट है, ये वेदों का एक अंश हैं और यह जो है, यह जो है एक तरह से यह एसेंस है।
अभी यहाँ पे कुछ आचार्यों गण हैं थोड़ा सा, चक्रवर्ती पाद डिवोशन में थोड़ा सा अलग उत्तर देते हैं, कि वो बता रहे हैं कि अभी यह जो है, इन दोनों में कौन सा, यह जो कर्मयोग है या भक्तियोग है। क्योंकि एक तरह से यहाँ पे कर्मयोग बता रहे हैं, भक्तियोग में भगवान का स्वाईम उल्लेख होना चाहिए, वो उल्लेख नहीं है, इसलिए साधारणतया के डिस्ट्रीब्यूशन अधिकांश कॉमेंटरीज़ कर्मयोग कहते हैं, पर यह जो श्लोक है, वो भक्तियोग के लिए भी अप्लिकेबल है।
अभी यह, अगर हम कहें, शास्त्रों का सार क्या कर्मयोग है? नहीं, कर्मयोग यह सार नहीं है, पर इस भावबंधन से परे जाना वह सार है। अभी उस भावबंधन से परे कैसे जाना है, उसके लिए अलग-अलग मार्ग हैं, और उनमें से वो चर्म मार्ग कौन सा है, वो अलग है। तो यहाँ पर जो एसेंस जो है, यह क्या है, यावानर्थ उदपाने सर्वतः संप्लुतोदके, यह श्लोक में बताया गया है, 46वें श्लोक में जो बता रहे हैं भगवान, यह जो सार किसके बारे में उल्लेख हो रहा है यहाँ पर, यह पर्पस नॉट प्रोसेस है, कौन सी विधि सर्वश्रेष्ठ है, यह उल्लेख यहाँ पर नहीं हो रहा है, यहाँ पर कौन सा उद्देश्य सर्वश्रेष्ठ है, वो बताया गया है।
योग और दुखों से मुक्ति
इसलिए इसके बाद में, बाद में भगवान बताते हैं, यही जन्म में, अगर आप भक्ति करोगे, तो क्या होगा, अगर आप योगी प्रैक्टिस करोगे, तो आपको मुक्ति प्राप्त हो जाएगी, कर्म जन्म बंध विनिर्मुक्तां पदं गच्छन्त्यनामयम्। भगवान कहते हैं, अनामयं, जो सारे दुखों से परे गति है, वो आपको प्राप्त होगी, तो वहाँ पर बता रहे हैं, और फिर इसके बाद में, भगवान विस्तार करते हैं, भगवान, क्योंकि पहले तो, अभी तक उन्होंने बताया है कि, अच्छा, यह मैं अभी दूसरी विधियां आपको बता रहा हूँ, पर फिर इसमें, जो सुखे दुखे समे कृत्वा, यह आप समान ऐसे क्यों रहो?
अभी कोई रणभूमि में है, रणभूमि में कोई युद्ध नहीं करेगा, युद्ध करने का कोई, फल की तो अपेक्षा होती ही है, मुझे युद्ध करना है, जीतना इसलिए, तो अगर भगवान बोलते हैं, आप हार-जीत की परवाह मत करो, उसका मतलब क्या है, एक्चुअली यह जो है, यह थोड़ी जटिल है, और उसको कभी-कभी ओवरसिंप्लीफाई कर देते हैं, उसको बहुत सरल कर देते हैं, तो क्या होता है, उसका कुछ समझ भी नहीं आता है, अर्थहीन हो जाता है।
जैसे आइंस्टीन ने कहा था, Science should be made as simple as possible, not more simple than is possible, कि विज्ञान को जितना सरल है, उसको सरल बनाना चाहिए, पर जितना सरल है, उससे ज़्यादा सरल बना देते हैं न, तो फिर क्या है, वो गलत समझवाती है। तो भगवान यहाँ पर वास्तव में यह नहीं कि कहीं भी नहीं कहते हैं, कि आप सुख, दुःख, यश, अपयश की परवाह मत करो, यह नहीं बता रहे हैं भगवान, उन दोनों से आसक्त मत हो, उन दोनों में समान रहो। और इन दोनों में फर्क है एक्चुअली, इन दोनों में फर्क है एक्चुअली, इन दोनों में फर्क है एक्चुअली, यह दोनों एक समान नहीं है।
कर्म, कर्तव्य और फलों की अनासक्ति
जो नहीं परवाह करता है, यह जो है, यह एक तरह से हम कह सकते हैं, इससे इक्वानिमिटी, इक्वानिमिटी मतलब समदर्शिता, समान भाव आता है, पर परवाह न करना, यह जो है गैर-जिम्मेदारी है, इरिस्पॉसिबिलिटी है।
अगर मान लीजिए, कोई बच्चा है, उसके एग्जाम आ रहे हैं, और वो वीडियो गेम खेल रहा है, टीवी देख रहा है, और उसकी मां बोलती है, पढ़ाई करो, तुम पढ़ाई नहीं करेंगे, तुमको, तुम्हारे एग्जाम में फेल हो जाओगे। तो मान लीजिए, माता-बच्चे दोनों, वक्त, मंदिर में आते हैं, दोनों भक्ति करते हैं, तो बच्चा कहता है, माता, तुम किससे आसक्त हो मार्क्स से, मैं आसक्त नहीं हूँ, मैं अनासक्त हूँ। नहीं, तुम अनासक्त नहीं हो, तुम गैर-जिम्मेदार हो।
So, not caring for fruits, जो फलों की परवाह न करना, इसके भगवान नहीं बताते कभी। भगवान का कहने का उद्देश्य क्या है? कि आप फल से आसक्त मत रहो। आपकी अपनी दी गई व्यवस्था, कर्तव्य करने के लिए विचार कर रहे हैं, कि आपका कर्तव्य है, आपको करना है। पर मुझे फल नहीं मिलेगा तो यह क्यों करता हूँ? कर्तव्य करना है और कर्तव्य इस तरह से करना है कि फल मिले, पर कभी-कभी ऐसे लगेगा कि कर्तव्य करने से फल मिलने वाला नहीं तो क्यों फल का कार्य करें?
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
कर्तव्य करते हैं, वो एक तरह से फल के बिना कर्तव्य करने का कोई मतलब ही नहीं है। पर दूसरा यहाँ पर क्या है कि कर्तव्य जो है वो करना हमारे लिए हमारी यह ज़िम्मेदारी है। कभी फल मिले या नहीं मिले, हम कर्तव्य करते हैं कि फल मिले, पर हम कर्तव्य इसलिए नहीं कर रहे हैं कि फल मिले।
मतलब माता-पिता हैं वो अपने बच्चों का अच्छे देखभाल करना चाहते हैं ताकि वो अच्छे नागरिक बनें, अच्छे भक्त बनें, अच्छे चरित्र हो। पर भगवान भी सबकी इच्छा को नियंत्रण नहीं करते हैं, तो माता-पिता कैसे को नियंत्रण कर सकते हैं? तो वो चाहते हैं, पर अगर मान लीजिए बच्चा अच्छे से कार्य नहीं कर रहा है, तो क्या माता-पिता बच्चे को ठुकरा देंगे? मैं तुम्हारे बच्चे के लिए नहीं, वो फिर भी कर्तव्य करने का प्रयास करें जितना हो सके। तो ये समझने के लिए एक और चीज़ हम देख सकते हैं कि एक है गोल, गोल है उद्देश्य, लक्ष्य और दूसरा है फल। तो ध्येय या लक्ष्य और फल ये दोनों एक समान नहीं हैं।
ध्येय, लक्ष्य और कर्मयोग का यथार्थ
अभी, अभी भगवत गीता बोलने के बाद भगवान के उपदेश के अनुसार अर्जुन ने कुरुक्षेत्र में युद्ध किया और हर दिन जब युद्ध हो रहा था तभी वो स्ट्रेटेजी बनाते थे, योजना बनाते थे और हर योजना का एक उद्देश्य हुआ करता था कि आज मैं इस शत्रु को हराऊंगा, आज मैं ये जो उनकी सेना के भाग है उसका विनाश करूँगा। और सबसे हम प्रसिद्ध है कि क्या हुआ? चौदहवें दिन में क्या हुआ? अर्जुन ने व्रत लिया कि आज शाम तक मैं जयद्रथ का वध करूँगा।
तो जब अर्जुन ने यह व्रत लिया तो भगवान ने नहीं कहा अर्जुन से, अरे अर्जुन, तुम कर्मण्येवाधिकारस्ते भूल गए क्या? नहीं, क्योंकि कर्मयोग में ऐसे नहीं है कि लक्ष्य नहीं रखना है। अंदर में फर्क क्या है? कि जो हमारा ध्येय है, हम हमारा कर्म, कर्तव्य, करने के पहले ध्येय रखते हैं और वो रखना ज़रूरी है, पर जो फल है, वो कर्म करने के बाद आता है। तो ध्येय रखना ज़रूरी है, पर इससे क्या होता है? इससे हमारा कर्म है, उसमें हमारा फोकस बढ़ता है। ठीक है, मुझे यह फल प्राप्त करना है, मुझे इस फल के लिए कार्य करना है, तो उससे हमारा उत्साह बढ़ता है।
पर अगर हम गोल करने जाने के लिए, ज़रूरी के लिए आता है, जब हम फल से आसक्त होते हैं, तो उससे क्या होता है? उससे डिस्ट्रेक्ट करता है क्योंकि यह प्राप्त करता है। अगर व्यक्ति फल से बहुत आसक्त होता है, तो क्या होता है, यह फल मिलेगा कि नहीं, यह मिलेगा कि नहीं, यह माल मिलेगा कि नहीं।
अचुअली यह जो है एक तरह से भौतिक चीज़ों में हम देख सकते हैं। क्रिकेट मैच चल रही है, और क्रिकेट मैच में सब खेलते हैं जीतने के लिए, पर वो खेलते हैं जीतने के लिए, पर मान लीजिए कोई अभी कोई टीम है, उसके साथ आठ विकेट आउट हो गए, और सौ-डेढ़ सौ रन चाहिए, दो ही विकेट बचे। तो फिर अगर ये आखिरी बैट्समैन है, वो हर बार सोचेगा, कहे, नहीं, आप एक बॉल खेलो, आपको वो जीतना है, पर क्या है, अगर आप पूछेगा, मैंने तो अब सौ रन बनाया नहीं है, कैसे बनाने वाला हूँ।
अगर फल के बारे में भी विचार करेंगे, तब क्या होगा, वो व्यक्ति, जो कर्म है, करने से, जब फल की गुंजाइश नहीं है, जब फल बहुत इम्प्रोबेबल लगता है, फल मिलने की संभावना बहुत कम लगती है, वो व्यक्ति हताश हो जाएगा और कार्य नहीं कर पाएगा। पर अगर सोचता है कि ठीक है, मुझे भी, मैं टीम का, टीम में सहभागी हूँ मैं, और मुझे मेरे टीम, जो रोल है, वो करना है, जितना अच्छा कर सकता हूँ, मैं करने का प्रयास करूँगा, तो करते रहो।
तो इससे क्या है, मतलब हम ध्येय रखना, ऐसे अनुचित नहीं है, एक तरह से ध्येय रखना अच्छा है, पर उसका उद्देश्य क्या है, कि हम हमारा कर्म अच्छी तरह से कर सकें, हमारा कर्तव्य ज़िम्मेदारी से कर सकें। पर जब हम फल से आसक्त हो जाते हैं, तो फिर हमारे कर्तव्य से हम कभी-कभी प्रष्ट हो सकते हैं, कि अगर यह फल मिलने वाला है नहीं है, तो क्यों कर्तव्य करें।
अर्जुन का परिप्रेक्ष्य और भगवान का मार्गदर्शन
तो अभी अर्जुन के संदर्भ में क्या है? अर्जुन को लग रहा है कि ये जो फल है युद्ध का, कि जो फल है युद्ध का, कि मैं भले ही मैं जीत जाऊंगा, जीतने से राज्य मिल जाएगा मुझे, पर राज्य प्राप्त करने के लिए मुझे मेरे वरिष्ठों का वध करना पड़ेगा। तो क्या वो वर्थ है? क्या उसका कुछ फायदा है उसका?
तो ऐसे सोचें तो अर्जुन को बोल रहा है कि अभी आप इस समय पर, आप प्रॉफिट-लॉस मत देखो।
सुखे दुखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ।
तो क्या है? अर्जुन के दृश्य से देखें तो क्या है यहाँ पर? अर्जुन की perspektive जो है, उसमें अगर हम देखते हैं, तो अर्जुन के लाभ क्या है? राज्य है, The Kingdom। अर्जुन के लाभ, अलाभ क्या है उनके लिए? जो लॉस होने वाला है उनको, जो हानि होने वाला है, वो क्या है? वो death of elders, उनकी जो आदरणीय वेल्डर्स हैं, जो वरिष्ठ हैं, उनका वो वध होने वाला है। तो अर्जुन सोचता है कि यह लाभ बड़ा है तो लाभ बड़ा है तो युद्ध करना चाहिए, अलाभ बड़ा है तो युद्ध नहीं करना चाहिए। पर भगवान बोल रहे हैं, तुम लाभ-अलाभ की परवाह मत करो तुम।
तो अभी यहाँ पर क्या है, कौन सा बड़ा है इसके बारे में, इसके बारे में कोई विरोध हो सकता है। पर यहाँ पर भगवान बोल रहे हैं, तुम इसकी परवाह मत करो। तुम क्या करो, यह बड़ा है, वो बड़ा है, उसकी परवाह मत करो। तुम क्या करो, तुम अपना कर्तव्य करो। और फिर उस कर्तव्य से क्या होगा, एक तरह से हरेक कार्य जो होता है, उसके अलग-अलग स्तर पे उसके फल होते हैं, या उसके परिणाम होते हैं।
अभी मान लीजिए, कोई व्यक्ति, अभी मैं यहाँ पर यह प्रवचन दे रहा हूँ, कोई कार्य ले सकते हैं, कि अलग-अलग स्तर पे किसी भी कार्य के फल होते हैं। अभी, मैं एक बार, एक बार वरिष्ठ भक्त से पूछ रहा था, संन्यासी गुरु महाराज से, कभी-कभी मैं कहीं जाता हूँ, तो, मैं प्रवचन दे रहा हूँ, तो वो ऑडियंस है, जो लगता है, कि जब वो प्रवचन देंगे, ऐसे ऑडियंस को जो उत्साह है, तो क्या है, यह आपका प्रैक्टिस है, उनकी रूप है, मतलब क्या है, ठीक है, ये ऑडियंस को रुचि नहीं है, इनको, शायद इसमें कोई फायदा नहीं होने वाला है, शायद मुझे, इनको ज्ञान देने में कोई चेष्टा नहीं मिलने वाला है।
पर, अगर मैं, अगर हम स्पीकिंग कर रहे हैं, ये एक कार्य है, तो, इसका एक फल ये है कि, ऑडियंस को रुचि नहीं होने वाला है, कि जो श्रोतागण हैं वो समझते हैं, और उसका एक और फल हो सकता है, कि Speaker becomes expert, वो स्पीकर का प्रैक्टिस हो रहा है, वो और एक्सपर्ट हो रहा है, और ऐसे अगर हम जाएंगे, आगे और एक हो सकता है, और एक फल हो सकता है कि, कि कृष्ण is glorified, कि भगवान का गुणगान हो रहा है, और भगवान का गुणगान हो रहा है, इससे क्या हो रहा है, इससे व्यक्ति का शुद्धिकरण हो रहा है। तो हम कह सकते हैं इससे Purification।
तो हर एक कार्य के अलग-अलग फल हो सकते हैं। जब हम कोई भी कार्य करते हैं, तो कभी-कभी क्या होता है, जब हम तुरंत अगला का फल देखते हैं, और वो फल को ही देखते हैं, तो हमारी दृष्टि सीमित हो जाती है। कई बार ऐसे होता है, मैं इंजीनियरिंग पढ़ रहा था, मेरे सारे मित्र जो हैं, वो बड़े-बड़े पोस्ट में हैं अभी। और कई बार मैंने देखा, कि ऐसे नहीं है, कि जो इंजीनियरिंग कॉलेज में उस समय जब टॉपर्स थे, वही अभी बड़े-बड़े पोस्ट में हैं। कई बार ऐसे होता है, कि जो ओके थे, ऐसे नहीं कि बिल्कुल फेल हो रहे थे, पर जो वहाँ पर एवरेज थे, शायद अभी वो बहुत अच्छे बन गए, अच्छे पोस्ट में चले गए।
भौतिक और आध्यात्मिक इच्छाओं का भेद
तो अगर कोई सोचता है, कि मुझे पढ़ाई का एक ही लक्ष्य है, कि मुझे मार्क्स प्राप्त करते हैं। कुछ लोग ऐसे होते हैं, शायद उनको इतना पूरा याद नहीं रहता, कि मार्क्स प्राप्त करते हैं अच्छे थे। पर शायद उन्होंने प्रैक्टिकल अच्छे किए हैं। तभी जो विषय है, वो अच्छे से समझा है। विषय के बारे में जो जो व्यावहारिक ज्ञान है, वो हमें अच्छे प्राप्त किया है। उससे उसका फायदा हो सकता है उनको। तो कभी-कभी हमको क्या होता है, जो तुरंत फल मिलने वाला है, वो नहीं मिलता है, पर उससे कोई बड़ा फल है, वो मिल सकता है।
तो जब हम कहते हैं कर्मयोग करो, कर्मयोग में फल से आसक्त मत रहो। तो साधारणतया शास्त्रों में कैसे होता है, कि जब भी कोई बोलते हैं फल, जैसे हम बोलते हैं, कि आपको इच्छाओं को त्यागना है। इससे, डिज़ायर जब बोलते हैं, तो ऐसे वो इंप्लाइड है, कि उसका मतलब क्या है? Material desires, आप इच्छाओं को त्यागो, मतलब क्या? आप भौतिक इच्छाओं को त्यागो।
अगर आप आसक्तियों को त्यागो, तो क्या मतलब हो उसका? भौतिक आसक्तियों को त्यागो। क्योंकि भगवान आगे बताते हैं, क्योंकि भगवान बताते हैं कि Spiritual desires जो हैं, वो अच्छी हैं। आध्यात्मिक इच्छा जो है, वो अच्छी है। For example, बारहवें अध्याय के नौवें श्लोक में बोलते हैं, मामेच्छा आप्तुम् मय्येव निवसिष्यसि। आप मेरी इच्छा प्राप्त करो। तेरी जो आध्यात्मिक आसक्ति है वो भी अच्छी है।
भगवान कहते हैं कि, इसके बारे में बताते हैं कि, फल से अनासक्त होओ इसका मतलब क्या है? भौतिक फलों से अनासक्त दूर हो जाओ। कि जो आध्यात्मिक फल हैं, उनका कई बार भगवान गुणगान करते हैं, कि इस तरह से ये मुझे प्राप्त होते हैं और वो परम गति में, वो सर्वश्रेष्ठ गति है।
या गतिम् मामुपेत्युं कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते।
कि ये परम गति है, ये सर्वोच्च प्राप्ति है। तो कई बार भगवान बोलते हैं कि आध्यात्मिक फल है, वो अच्छे हैं और उसको प्राप्त करना अच्छा है। तो जब भगवान कहते हैं, मा फलेषु कदाचन, कि आप फल से आसक्त मत रहो, मतलब क्या है, जो भौतिक फल है, उससे आसक्त मत रहो। तुम युद्ध कर रहे हो, युद्ध से तुम जीतोगे या नहीं, तुम्हें क्या मिलने वाला है, तुम क्या खोने वाले हो, इसकी परवाह मत करो।
युद्ध और मुक्ति की सर्वोच्च प्राप्ति
तो अब युद्ध कोई कर रहा है, तो युद्ध का एक फल होता है, कि विक्ट्री, जीत या हार। तो भगवान कह रहे हैं, इस फल से आप अनासक्त हो जाओ। पर वो यह भी बताते हैं, कि इसी से आपको एक और फल मिलेगा, और वो है मुक्ति। और ये भगवान बहुत अच्छा है, बोलते हैं। अब हम भक्ति शास्त्रों में बोलते हैं, कि मुक्ति तुच्छ है, एक तरह से, भक्ति या प्रेम है, वो सर्वोश्रेष्ठ है, पर यह भी सही है, कि जो प्रेम है, जो भगवत प्रेम की प्राप्ति है, वो भी एक प्रकार की मुक्ति ही है, पांच प्रकार की मुक्ति होने में से एक है।
तो इसलिए कहा ये सही है, कि मुक्ति को बुरा मानना है, भगवान का भगवत गीता में भी मुक्ति का उल्लेख है, तो मुक्ति आपको प्राप्त हो सकती है। तो इसलिए भगवान बता रहे हैं कि आप अभी युद्ध करने वाले हो, कर्मयोग में युद्ध करना मतलब क्या है, कि आप फल के अपेक्षा, फल की आसक्ति मत रखो, आप कर्तव्य करो, और कर्तव्य करोगे तो यहाँ पर ये फल मिले, वो फल मिले, तुम हारो या जीतो, तुम्हारे ये हानि हो या तुम्हारे ये फायदा हो, उसके परे तुम क्या होगे, तुम मुक्ति की ओर जाओगे, और वह सर्वोच्च प्राप्ति है।
स्थितप्रज्ञ के लक्षण और काव्यात्मक रूप
अभी ये बताते हैं जब भगवान, तो तभी भगवान कई बार,
यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः।
कई बार जब हम बातचीत करते हैं, तो हम मुहावरे या इडिएम्स, इससे इंग्लिश में मुहावरे इस्तेमाल करते हैं, तो इनका जो अर्थ होता है वो नॉन-लिटरल होता है। नॉन-लिटरल मतलब वो जो शब्दशः अर्थ नहीं होता है उसका। कई बार जब मुहावरे होते हैं, उनका शब्दशः अर्थ लेंगे, तो कुछ अर्थ ही नहीं आएगा उसका। लातों के भूत बातों से नहीं मानते हैं। जो लिटरल होता है, कई बार जो शब्दशः अर्थ लेते हैं, तो उससे कभी-कभी अर्थ नहीं आता है।
साधारण बातचीत में क्या होता है? शब्दशः आता है वो सब तरफ से पर कोड नहीं होता है। आज हम समझ जाते हैं संदर्भ से। ये literal अर्थ लियाता है? ये non-literal अर्थ लियाता है? शब्दशः अर्थ लिया जाता है? क्या कहते हैं शब्दार्थ और भावार्थ कहते हैं? और खास करके भगवत गीता तो एक कविता है, काव्यात्मक रूप बताया गया है और काव्यात्मक रूप में कई जगह पे जो शब्दशार्थ नहीं लिया जाता है, भावार्थ होता है।
इसलिए अर्जुन जो सवाल भी पूछ रहे हैं, इसलिए तो चार सवाल पूछते हैं—इत प्रज्ञस्य का भाषा? भाषा मतलब क्या है, क्या सारे सिद्ध प्रज्ञ लोग कोई विशेष भाषा में बोलते हैं, संस्कृत में बोलते हैं, या कोई सिगरेट भाषा है उनकी? कुछ पहले जासूस, एस्पियोनाज करने वो जासूस होते थे, वो एक दूसरे से ऐसी भाषा में बोलते थे, कोई समझ नहीं पाए क्या बोल रहे हैं, इसलिए क्या उनकी कोई सिगरेट लैंग्वेज है, भाषा?
तो अगर इन चारों शब्दशः अर्थ जो है न, अगर हम देखते हैं, question, literal meaning, जो शब्दशः अर्थ है, और essential meaning, तो इन चारों सवाल जो है, इन चारों सवाल का अगर हम शब्दशः अर्थ देखेंगे, तो कुछ अर्थ होगा ही नहीं उसका। तो वो पूछते हैं, भाषा, तो भाषा का अर्थ होता है, language, पर भाषयते इति भाषा, मतलब क्या इसका अर्थ है, कि जिससे हम किसी का भाषण, किसी का लक्षण बताते हैं, तो हम भाषा से क्या करते हैं, ये जो वस्तु ऐसी है, ये चीज़ ऐसी है, भाषा से हम किसी का लक्षण बताते हैं, तो शास्त्रों में भाषा का अर्थ यहाँ पे है, characteristics, लक्षण—स्थितप्रज्ञस्य का भाषा, समाधिस्थस्य केशव, स्थितधीः कि प्रभाषेत।
अर्जुन के चारों प्रश्न और भगवान के उत्तर
अभी यह जो बोलता है यह थोड़ा अजीब सवाल लगेगा, और कोई कहता है कि प्रभाषेत, मतलब एक तो भाषा हो गई, दूसरा हो गया है speech, मतलब जैसे आप किसी भाषा में बोल सकते हैं, और उस भाषा में कभी-कभी मधुर बात कर सकते हैं, कभी-कभी आप कट्टू बात कर सकते हैं, तो उनकी वाणी कैसी है? अगर वाणी की भाषा है, अगर आपकी यह इंगित वाणी कैसी से सकते बोलते हैं? प्रभाषेत, तो उनकी वाणी कैसी है?
मतलब है यह सारे आत्मसाक्षत्कारी व्यक्ति में उनकी मधुर वाणी होता है एक प्रकार की वाणी होती है? नहीं, यहाँ पर speech का मतलब यह है, It’s more of tone of speech. Tone of speech मतलब कि जब वो जीवन में अप-डाउन होते हैं, अभी अर्जुन को भगवान ने बताया है, कि सुखे दुखे समे कृत्वा, आप इन सब में समान रहो। तो फिर जो स्थितप्रज्ञ व्यक्ति है, वो जब उनके जीवन में सुख और दुःख आता है, तो उसका सामना कैसे करते हैं? तो speech की जीवन, कैसे मना है? सामना के ड्युलिटीज़ के बारे में।
कि जब व्यक्ति के जीवन में, ऊपर-नीचे जब आता है, तो फिर वो किस तरह से उसका सामना करता है? तो कोई व्यक्ति होते हैं, कैसे साधारणतया बड़े मधुर बात करते हैं, पर जो उनकी बात कोई मानता नहीं है, उनके खिलाफ हो जाता है, तो फिर ऐसे वचन बोलने लगते हैं, अरे बाप रे, ये तो ऐसे गालियां देने लगा है, करने लगते हैं, कौन व्यक्ति है यह? है, हमको ऐसे लगता है, कैसे पूरा बदल गया है यह? क्या ऐसे जब उनके मन के लिए चीज़ें नहीं होती हैं, क्या पूरे उनके वचन बदल जाता है, या वो समान रहता है? यह भाष, प्रभाषेत है, इसका अर्थ है।
और सिद्धेः किम् आसीत? व्रजेत किम्? तो अभी यह बैठना है, कैसे तरह से बैठते हैं वो, अभी यह क्या है, इसका क्या मतलब है, क्या सारे आत्मसाक्षत्कारी व्यक्ति, कि किसी वीरासन में बैठते हमेशा, कोई योगिक आसन में हमेशा बैठे रहते हैं? तुम इस आसन में नहीं बैठे हो, तुम सिद्ध प्रज्ञ नहीं हो, खत्म, क्या है, ऐसे मतलब है इसका?
नहीं, जो किम् आसीत, सॉरी, आसीत, आसीत, किम् आसीत व्रजेत किम्, तो आसीत का मतलब क्या है, अभी बैठने का लक्षण यह है, कि, किस तरह से वे अपने इंद्रियों को नियंत्रित करते हैं, तो, restraining senses, किस तरह से वे अपने, मतलब क्या है, जब हम बैठते हैं, तो क्या है हमें सारी इंद्रियों को नियंत्रित कर रहे हैं, हमारे हाथ, पैर खेलना चाहते हैं, पैर हिलाना चाहते हैं, कुछ थोड़े बच्चे होते हैं, वो बैठते हैं तो वो बिल्कुल चंचल होते हैं, एक जगह पर बैठ नहीं पाते हैं। तो कैसे वो अपने इंद्रिय को नियंत्रित करते हैं।
और व्रजेत किम्? तो व्रजेत मतलब क्या? इस किस तरह से चलते हैं? तो क्या भगवान को अर्जुन पूछ रहे हैं, क्या इस स्थितप्रज्ञ लोग कुछ? फैशन परेड में लोग रैंप पर चलते हैं, वैसे चलने वाले कुछ उनका स्पेशल कुछ चलने की पद्धति होती है क्या? नहीं, ऐसे नहीं है। वो भी इसमें भी क्या है? इस क्या कहते हैं? Walking style, गेट, इंग्लिश में गेट शब्द को कहते हैं। गेट मतलब किस तरह चलते हैं? इसके सिंह जैसे चलना है, क्या कहते हैं न? कोई कहते हैं, सिंह जैसे चलता है, शान से चलता है। तो ये नहीं पूछ रहे हैं, क्या पूछ रहे हैं? वो किस तरह से अपने इंद्रियों को कार्य में लगाते हैं। तो ये चारों सवाल जो हैं नॉन-लिटरल हैं, वो लिटरल नहीं हैं, नॉन-लिटरल हैं।
भगवान द्वारा चारों प्रश्नों के उत्तर और निष्कर्ष
और इनकी जवाब है, भगवान हर एक सवाल का जवाब देते हैं। अब इसका सवाल जो जवाब है, एक ही श्लोक में देते हैं, तो कहते हैं, उनका प्रधान लक्षण है, कि वो बाह्य सुख की कामना नहीं करते हैं, वो अंदर में सुख की प्राप्ति करते हैं।
फिर जो अगला है, उसका जवाब दो श्लोक में भगवान देते हैं। वो कहते हैं, कि इस जवाब में सुख या दुःख आता है, वो तो आते ही रहता है, उसमें अंतरंग रूप से वो शांत रहते हैं, और बाह्य रूप से वो नहीं तो सुख की प्रशंसा करते हैं, नहीं दुःख की निंदा करते हैं, अच्छी चीज़ की प्रशंसा नहीं करते हैं, बुरी चीज़ की निंदा नहीं करते हैं, जो आता है, वो स्वीकार कर लेते हैं।
और फिर वो इंद्रियों को किस तरह से नियंत्रित करते हैं, इसका वर्णन जो है, वह 58 से 61 तक है, कि वो अपने इंद्रियों को जैसे कछुआ, नहीं कछुआ नहीं, खरगोश, जैसे खरगोश, नहीं सॉरी, कछुआ, कछुआ, जैसे कूर्म, जैसे कछुआ जो है अपने सारे हाथ, पैरों को अंदर ले लेता है, वैसे ही वो अपने इंद्रियों को ये अंदर कर लेते हैं। और फिर ऐसे करके, सिर्फ ऐसे नहीं बैठते हैं, वो निष्क्रिय नहीं क्या करते हैं, वो भगवान पे चिंतन करते हैं, मद्भरा, वो लिखाता है।
और फिर बाद में 62 से 71, वो किस तरह से अपने इंद्रियों को कार्य में लगाते हैं, बताते हैं। अभी कुछ आचार्य बताते हैं कि ये जो है, ये 63 तक जाता है, और ये 64 से चालू होता है, वो अलग हो सकता है आइसोलेशन। मतलब वो कहते हैं कि आप, 63 तक बताते हैं, क्योंकि आप, ठीक है, आप सारे इंद्रियों को नियंत्रित कर रहे हैं, पर आपका मन कहां है वो महत्वपूर्ण है।
अगर ध्यायतो विषयान पुंसः कर रहे हैं, तो सारे इंद्रियाँ नियंत्रित हो, पर अगर मन आपका इंद्रियों में लग रहा है, इंद्रियों के विषयों में लग रहा है, तो उससे आपका पतन हो जाएगा। और फिर यह 64वां श्लोक जो है, वर्जेत और चरती एक समान शब्द हैं, तो इसलिए 64वें श्लोक से उसका उत्तर चालू होता है। और जो 72वां श्लोक है, वो एक समरी है।
तो इसमें क्या कर रहे हैं, भगवान अभी यह चारों सवाल में आखिरी जो सवाल हैं, उन पे भगवान ज्यादा ज़ोर दे रहे हैं, उसमें से भी आखिरी जो सवाल हैं, उस पे ज्यादा ज़ोर दे रहे हैं। तो अभी क्या है, मान लीजिए कोई व्यक्ति प्रवचन देते हैं, उसके अपने कोई सवाल पूछता है, तो शायद दो, तीन, चार सवाल पूछते हैं, तो अभी जो वक्ता है, वो सारे सवालों को जवाब देने का प्रयास करेंगे, पर अगर वक्ता को कोई एक पॉइंट देना है क्लास में, तो उससे संबंध में कोई सवाल पूछेगा, तो उसका जवाब वो विस्तार से देंगे।
तो इसी तरह से अभी अर्जुन को क्या करना है, अर्जुन को एक तरह से कर्मयोग किस तरह से करना है, युद्ध करना है उसके लिए, और युद्ध करना है मतलब क्या है? कि उसको अपने इंद्रियों को नियंत्रित करना है। अगर आप जानते हैं, अगर हम पहले अध्याय में देखा युद्ध करना है, अगर हम वाचिक देने के पर जीतते हैं, अर्जुना उसको अपने इंद्रियों को नियंत्रित करना है। किस तरह से करना है? अगर वो अर्जुन युद्ध करते साथ भीष्म के बारे में सोचेगा, द्रोण के बारे में सोचेगा, तो क्या हो गया? ध्यायतो विषयान पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते, वो चिंतन करेगा तो क्या होगा? अरे ये तो मेरे इतने आदर के बारे में, तो इतने करीब के हैं, उनके खिलाफ मैं कैसे युद्ध कर सकता हूँ? कौन कहता है मुझे युद्ध करना चाहिए? ऐसा युद्ध कभी नहीं करना चाहिए। अरे युद्ध नहीं करेगा तो क्या हो जाएगा? स्मृतभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति।
अंतिम उपसंहार और युद्ध का कर्तव्य
तो अभी अगर आप पहला अध्याय याद करते हैं तो क्या होता है? जब भगवान दोनों सेनाओं के बीच में अर्जुन को लाते हैं, तो क्या कहते हैं? भीष्मद्रोणप्रमुक्ताः सर्वेषां च महीक्षिताम्। सारी सेना में जब बीच में आते हैं, तो अर्जुन, दो अर्थ हो सकते हैं उसके, कि एक तरह से भगवान जानबूझ के बीच में लाते हैं, पर बीच में कहीं में ला सकते थे वो, भीष्म-द्रोण के सामने लाते हैं। क्या दूसरा है, कि बीच में से सब देख रहे हैं, पर अर्जुन की दृष्टि में, उनको भीष्म-द्रोण पर दृष्टि दिखते हैं।
तो अभी, अभी अर्जुन को क्या करना है, वो अगर भीष्म-द्रोण को देखते रहे हैं, उनका जो दृढ़ संकल्प है, चला जाएगा। तो Restraining senses मतलब, Don’t focus on Bhishma-Drona. तो जब आपको उस समय में युद्ध करना है, तो क्या करना है, ये मेरे रिश्तेदार हैं, मत देखो, अपनी इंद्रियों को अंदर ले लो। और एकाग्र करो, कि मुझे कर्तव्य करना है, युद्ध करना है, उसके लिए इंद्रियों को अंदर ले लो।
और फिर Engaging Senses, इंद्रियों को अभी कार्य में लगाना है, तो उसके लिए क्या करना है, भगवान बताते हैं, कि आपको युद्ध करना है। युद्ध करने के लिए बताते हैं, कि आप अगर आप जो युद्ध करोगे, लोग सोचेंगे, कि तुम एक राज्य प्राप्ति के लिए युद्ध कर रहे हो, पर तुम राज्य प्राप्ति के लिए युद्ध नहीं कर रहे हो। तुम्हारा उद्देश्य क्या है, तुम कुछ और प्राप्त करना चाहते हो, तुम मोक्ष प्राप्त करना चाहते हो, तुम आध्यात्मिक प्रगति करना चाहते हो, तो दुनिया यह नहीं समझेगी, पर तुम एकाग्रता से कार्य करो।
इसलिए भगवान क्या करते हैं, या निशा सर्वभूतानाम् श्लोक का वहाँ पे क्या संदर्भ है, कि भौतिकवादी लोग, जो कर्मकांड के स्तर पे जो युद्ध कर रहे हैं, वो सोचेंगे तुम युद्ध तो अपने एक याज्ञिक की प्राप्ति के लिए कर रहे हो। और ऐसे लोग नहीं समझेंगे कि तुम किस लिए युद्ध कर रहे हो। पर तुम उसकी चिंता मत करो। तुम क्या करो? तुम एकाग्रता से युद्ध करो।
और आपूर्यमाणमचलপ্রতিষ্ঠम्। जो भी चाहिए दुनिया कुछ कह रही है, लोग कुछ कहने वाले हैं, वो सारे जो विचार आएंगे तुम्हारे मन में, तुम्हारे चाय के कानों से तुम्हारे मन में आएंगे, पर मन में उनको बैठने मत दो। तुम अपना मन जो है, पूरा जो उद्देश्य है, जो कर्तव्य है, उससे भरने दो। और उससे तुम उनके द्वारा विचलित नहीं होगे।
और भगवान अंत में कहते हैं, यह पहली बार जो अंतकाल के महत्व के बारे में भगवान उल्लेख करते हैं, वो कहते हैं… जो ब्रह्मानिर्वाण जो है, मतलब यह है, मुक्ति है, जो परमप्राप्ति है। इस तरह से भगवान कहते हैं, इस तरह से अगर आप रहोगे, जीवन में जिओगे, और अंतकाल तक भी इस तरह से रहोगे, तो ज़रूर तुम परमसिद्धि प्राप्त कर पाओगे।
और इस तरह से जो भगवान का पॉइंट था, अभी अर्जुन ने एक सवाल पूछा, तो कोई की क्या होता है, एंड, मैं इस पॉइंट से एंड करता हूँ, ज़्यादा हो गया टाइम, तो की मान लेंगे ऐसे प्रवचन चल रहा है, और कोई सवाल पूछता है तभी, इस सवाल का जवाब में कोई-कोई इधर चला जाता है, कोई-कोई इधर चला जाता है, तो पर जो एक्सपर्ट क्या है, एक्सपर्ट चारों सवाल भी इधर जा रहा होगा, तो सवाल से वापस अपने पॉइंट पर आ जाए जाएं। सवाल का जवाब देते हैं, पर वापस से आ जाए जाएं।
तो क्या होता है, अर्जुन की सवाल पूछते हैं, तो एक तरह से, जो ये 54 में क्वेश्चन है, तो 55 to लगभग 58, जो है 55 से 57, जो है थोड़ा टायन्जेंट है, पर उसके बाद में 58 से 72, वो जो है बराबर, जो संदर्भ में उसका क्या मतलब है, संदर्भ में क्या है, अर्जुन को अपना कर्तव्य करना है, युद्ध करना है, उस पर बराबर भगवान एक्सपर्टली, उसी पॉइंट पर बराबर अंत में आ जाते हैं।
तो इस तरह से ये दूसरे अध्याय का हमने, जो आखिरी दो विभाग आज देखें, तो जो पहला विभाग था, जो हमने देखा कि 38 से 72 तक हमने देखा, तो इसमें जो है पहला विभाग, जो आता है 53 तक, इसमें क्या है, दो चीज़ें हैं, कर्मकांड कर्मयोगा का तुलना है, और कर्मकांड कर्मयोगा का explanation है, और इसमें हम देखा कि ऐसे भगवान वही उद्देश्य है, अर्जुन को युद्ध कराना, पर उसको अलग-अलग पद्धतियों से ला रहे हैं, तो पहले कर्मकांड से, फिर कर्मयोग से, और आगे अगले योग से आएगा।
और इसमें हम देखा कि, एक चीज़ महत्वपूर्ण देखा कि, फल और ध्येय इनमें फर्क है, गोल और ये एक नहीं है, तो उद्देश्य रखना अच्छी बात है, पर फल से आसक्त होना, उससे हम हमारे कर्तव्य से भ्रमित हो सकते हैं, और फिर उसके बाद में, भगवान ने जो है, अर्जुन सवाल पूछते हैं, तो स्थितप्रज्ञ के लक्षण जो है…
गौर भक्त वृंद की! जय! गौर प्रेमानन्दे