Hindi – Chapter 13 Bhagavad Gita And Decision Making Bhagavad Gita Overview – Chaitanya Charan
- Home
- Lecture Series
- Bhagavad Gita & decision making
- Hindi – Chapter 13 Bhagavad Gita And Decision Making Bhagavad Gita Overview – Chaitanya Charan
Disclaimer: This transcript was generated using AI and may contain occasional errors or inaccuracies.
संक्षिप्त सारांश
हरे कृषिणा आज हम भगवद गीटा का तेरावा अध्याय चालू कर रहे हैं अभी घीटा में अठरा अध्याय है और जो पहले छे अध्याय है, वो हमें देखा कैसे जो बादने के छे अध्याय है वो ग्यान योग पर जोर देते हैं तो अभी ऐसे नहीं है कि जैसे मैं पहले बता था कि एक तरह से गीता का जो सववांध है वो सर्कंस्टेंशियली हो रहा है जैसे सवाल अर्जुन पूछ रहे है उसके अनुसार जवाब दे रहे हैं वो तो अभी जो यहाँ पे चाय से बारा आध्याए हो रहे है साप्तेयों से बारा हमने अभी सीरीज में देखा तो उसमें जो भाव था कि अभि ऑर्जुन कुछ decide करना चाहरें कि।
मुख्य ट्रांसक्रिप्शन
हरे कृषिणा आज हम भगवद गीटा का तेरावा अध्याय चालू कर रहे हैं अभी घीटा में अठरा अध्याय है और जो पहले छे अध्याय है, वो हमें देखा कैसे जो बादने के छे अध्याय है वो ग्यान योग पर जोर देते हैं तो अभी ऐसे नहीं है कि जैसे मैं पहले बता था कि एक तरह से गीता का जो सववांध है वो सर्कंस्टेंशियली हो रहा है जैसे सवाल अर्जुन पूछ रहे है उसके अनुसार जवाब दे रहे हैं वो तो अभी जो यहाँ पे चाय से बारा आध्याए हो रहे है साप्तेयों से बारा हमने अभी सीरीज में देखा तो उसमें जो भाव था कि अभि ऑर्जुन कुछ decide करना चाहरें कि युद्ध करना है या नहीं कारणा है तो युद्ध करना है या नहीं करना वो कर्मयोग के दुश्टी से क्या था?
किवर आत्मा को आपको बंधन से मुक्ति करनी है, तो फिर आपको युद्ध करना चाहिए, क्योंंकि उसी से तुम कर्मयोग से धीरे धीरे प्रगती करोगे. और फिर बाद में जब बुचित समय आईगा, तो ध्यान्योग के लिए आर्जुन को कहते है, बगवान कि तुम सन्यास ले सकते हो, और फिर परमसिद्धी प्राब्द कर सकते हो. पर यहां पे, जो बीचे चह अध्याय में बता जाता है, आर्जुन ने कहा था, चह चहते अध्याय के बीच में लगबा, कि आंत में लगबा, कि आप जो बता रहे हैं बड़ा मुश्किल है. तो अभी हम देखा कि, जो 7, 8, 9, 10, 11, और जो 12 अध्याय हैं, उसमें कैसे है?
कि भक्ति योगा for decision making. पर एक नल्चस्म चीज़ देखते हैं हम ऐसे, कि जो गीता है, इससे सम्वाद आगे बढ़ जाता है, तो वो युद्ध का उल्लेक बहुत कम हो जाता है. बीच के 6 अध्यायों में, युद्ध का उल्लेक केवल 8 अध्याय में आता है, मा मनुस्पनु युद्धेच्य, और फिर 11 अध्याय में आता है, जो विराट रूप के दर्शन में, उसके अलावा कहीं आता ही नहीं है, और आकरी 6 अध्यायों में, युद्ध का उल्लेक लगबग होता ही नहीं है, एक ही जगपे आता है, कि जब आर्थुन अपना धनुर्शो उठाते है, और उसके बाद में, वो कहते है कि, मैं पार्थों को धनुर्शो बताये गया है, यहां पे ही विजय होगा, वगेरा, तो ऐसे उल्लेक बहुत कम हो जाता है, तो कैसे है कि जो कन्वर्सेशन है, गीता का एक कन्वर्सेशन है, एक सरकंस्टेंशियल लेवल पर, परिस्थिती के स्थर पर है, और, दूसरा है, एक युनिवर्सल स्थर पर, मतलब, वो परिस्थिती हो या नहो, उसमें हम कुछ सीख सकते हैं, तो कैसे है, कि जो गीता का समवाद है, वो अगर हम कर्मयोग के स्थर पर देखते है, तो क्या है, कि उसका समवाद, जो परिस्थिती से है, वो है, पर काफी कम है, फिर बक्तियोग का जो समवाद है, वो परिस्थिती से और भी कम हो जाता है, तो युद्ध का उल्लेक और कम आता है, अभी उसी तरह से, जो ग्यान्योग में भी है, परिस्थिती का उल्लेक बहुत कम होता है, इतनै से एक भक्तियोग में आता है उल्लेक, क्योंंकि क्या है कि विराट रुप का धर्शन है, उसमें भगवाण बता रहे था, अगर विराट रुप का, काल रुप का वरनान नहीं होता, तो युद्ध का वर्ण ग्यारवे अध्याय में भी नहीं होता था विल्कुल।
अभी जो युनिवर्शल स्थर्पे ये डिसकेशन हो रहा है, तो इसलिए बार-बार ये उल्लेक नहीं हो रहा है कि मैं तुम्हें मार्गात शुण कर रहा हूं कि तुम्हें युद्ध पे क्या करना है। तो वो हमको एक इंफिरेंस निकालना पड़ता है। यहाँ पे भगवान क्या बता रहे है?
तो अभी जैसे नवे अध्याय में आता है, अनित्यम असुखम लोकम इमं प्राप्पे भजस्वमाम। तो अभी अनित्यम असुखम लोकम जो बता रहे है, वो एक युनिवर्सल उल्लेक हो सकता है, कि यह जगत का यह सवभावी है, कि यहाँ पे अनित्य है, असुख है, पर वो एक परस्थिती को भी सम्भोधित करता है, कि अर्जुन के लिए जो युद्ध करना है, अपने वरिष्ठों से के साथ, वो असुख की बात है, पर यहाँ पे सब कुछ अनित्य है, उनकी भी तो मृत्य होने वाली, सबकी मृत्य होने वाली है, तो अभी क्या है, यह जगत अनित्य और असुख है, पर अभी जो उचित कार्य है, भजस्वमाम, वही दुख को आप टाल नहीं सकते हैं, मृत्यू को आप टाल नहीं सकते हैं, तो ऐसा कारे करो, जिससे कि तुम इनके पर जा सकते हो, तो इसलिए अभी भक्तियोग के अध्याय में, जो हम बता रहे थे, कि, भगवान जो अर्जुन को मागर्शन करने को बता रहे है, कि, कैसे है, कि कृष्णा’s plan, is the best basis for our decisions, कि, भगवान कृष्णा की योजना जो है, वो अगर हम समझेगे, तो उसके आधार पर हम फैसला करेगे, तो वो सबसे अच्छा बेसिस है, तो उसके समझे से बता रहे था, साथवी अध्याय में बता रहे है भगवान, कि अपने मन को मुझसे आसक्त कर लो, मन को आसक्त करने के लिए क्या करना है हमें, remember कृष्णा, वो अठ्वा अध्याय था, नव्य अध्याय में था कि, कैसे ग्लोरी और भक्ति, ये सबसे अच्छा मारग है, आपके सब मारगों में गलती हो सकती है, अजुन को बहुत लगता है कि, मैं युद्ध करना है मेरे अच्छारों के साथ पर, वो गलत है, तो आप ही जिये सुदरा अच्छारों, तो ये भक्ति सबसे, फिर कैसे है कि, उसके बाद में था कि, remember कृष्णा, in this world, वो भूती का भाव था, कि जब तुम युद्ध कर रहे हो, तभी भी तुम मेरा समर्ग कर सकते हो, तो, उसके बाद में, remember, कृष्णा’s plan for you, in this world, ना केवल हम ज्यानेंद्रियों से देखते हैं, कि भगवान क्या कर रहे हैं, कैसे भगवान की भूती यहाँ पर है, पर भगवान की भूती ही नहीं है, भगवान की योजणा यहाँ पर है, और योजणा में हमें सहभाग्य होना है, और फिर जो बारवा अध्याय था, उसमें भावता क्या, कि हमें सदाचार के साथ भगती करनी है, सदाचार प्लस भगती, यहाँ पर सदाचार का भाव क्या है, कि अभी अर्जुन को ऐसा कारे करना है, जो उनके येतु धर्मां अम्रुतमिदम, अर्जुन शत्रिय है, तो शत्रिय धर्म के नसां को कारे करना है, और भगती के एलग-एलग स्थर बताते हैं वो, तो क्या है कि, ऐसे नहीं कि आगर आप युद्ध कर रहे हो, तो आप भगती नहीं कर रहे हो, तो बिसिकली, भगवान की योजना के नसां युद्ध हो रहा है, तो उस योजना में, आप सहभागी हो जाओ, और फिर उसी से आपका कल्यान हो जाएगा, उसी से आपका परम कल्यान हो जाएगा, तो अभी, इसके पहले, एक तरह से में बता रहा था कि, दस वे अध्याय में गीता ख़तम हो जाती है, भगवान का उपदेश ख़तम हो जाता है, उसके आपने अर्जन सप्लिमेंटिक सवाल पूछ रहे हैं, तो अभी तेरावे अध्याय में, जो अर्जन सवाल पूछते हैं, वो एक तरह से ऐसे सवाल है, जो आउट अफ़ सिलाबस हैं, मतलब क्या है, कभी क्लास के बाद ऐसा सवाल होता है, इसका क्लास में कुछ उल्लेक ही नहीं है, तो वो क्या है, एक तरह से वो जो सुन रहे है, उनकी जिग्ञासा है, और उसके लिए वो जवाब चाह रहे है, उससे तरह से, अभी अर्जुनी शब्द इस्तमाल करते हैं, खास करके शेत्र, ख्षेत्र घ्या, अभी घ्यान, घ्यान, पुरुष्य, प्रकृति, ये एक तरह से कौमन शब्द हैं, बिल्कुल वैसे ही शब्द, पुरुष्य, प्रकृति यूज़ हुआ है, घ्यान तो कई बार यूज हुआ है, घ्यान जो है, वो इतना कसिस्टेंटली यूज नहीं किया है, पर ख्षेत्र और ख्षेत्र घ्या, इसके पहले कहीं भी यूज नहीं हुआ है, इसलिए ये जो सवाल है, ये सवाल भगवान ने जो पहले बोला है, उसके आधारत नहीं है वो एक, डारेक्टली, कि आपने ये पॉइंट क्लास में बोला था, या आपने अभी तक ये बोला था, ये पुरुष्य, प्रकृति यूज नहीं किया है, कैसे है, कि जब भी कोई मेसेज होता है, तो मेसेज के दो स्थर होते हैं, एक है कि, कोई भी संदिश होता है, वो एक एक्स्प्लिसिट संदिश होता है, एक्स्प्लिसिट मतलब जो शब्दों में बताय गया है, और उसके अलावा, उससे बड़कर जो होता है, वो एक एक्स्प्लिसिट संदिश होता है, एक्स्प्लिसिट मतलब क्या, जो बताया नहीं जा रहा है, पर वो समझ में आता है, तो भगवान ने न केवल कुछ, यहाँ पर क्या था, क्वैस्टिन आंसर्स हुए है, पर उसके आधार पर एक वर्ल्ड व्यू, एक दुनिया को देखने का एक दुष्टी बताया है, तो अभी क्या है, अभी कृष्णा ने, अगर हम यहाँ पर कृष्ण कहते हैं, कृष्णा ने यह सब अर्जुन को बताया है, तो अभी अर्जुन को क्या है, अर्जुन अग्जानी नहीं थे, अर्जुन ने इसके पहले बहुत कुछ सुना हुआ है, वो कई साल वनवास में रहे है, वहाँ पर रुशी मुणों से सुना है, तो अभी क्या होता है, जो पहले पता है और अभी सुना है, इन दोनों का सम्मंध क्या है, वो अर्जुन समझने का प्रयास कर रहे हैं, और जब अर्जुन छे शब्दों का जो अर्था जानना चाहते है, वो शब्द हम देखेगे, पर वास्तमें ऐसे नहीं है कि अर्जुन को अचानक अपनी वोकैबलरी एकस्पैन करने में रुची आ गई है, आप नए शब्दों का अर्था जानना है, यह शब्दों के द्वारा वास्तमें एक दुरिष्टिकोन है, एक वर्ल्ड भ्यू है, तो वो अर्जुन को समझना है, वो वर्ल्ड भ्यू क्या है बेसिकली, कि कैसे यह जो प्रिवेस नौलेज में, जो ग्यान का वर्ल्ड भ्यू है, जो ग्यान मार्ग के आधार पर, जो विश्व का देखने की दुष्टी है, वह अर्जुन को पहले से पता है, और अभी अर्जुन ने क्रिष्णस से जो सीखा है, इसका और उसका क्या सम्मंद है,।
वह समझनी का परयास कर रुए है। अभी एक तरह से हम कहा सकते हैं, कि अभी तक भगवान ने, भकती योग, एक तरह से भकती योग का ध्यान योग से कcemberन किया है। भकती योग का कर्म योग से कր्सन हुआ है।
ध्यानियोग से तुलिना जो थी वो अठ्वे अध्याय में हुई थी। कर्मयोग से तुलिना जो हुई थी, वो कहां हुई? वो एक तरह से कर्मकान, कर्मयोग नवे अध्याय में हुई थी और वो बारवे अध्याय में भी अगर हम वो ब्रामोचार जो और से बोलते हैं उसके अनुसार कल में देखा था वो ही है पर अभी तक जो अर्जुन को शुरुवात से जो संकल्पना थी क्या उसके संकल्पना थी कि साधारन तया जो कर्म है और वैराज्य है एक्शन है और रिनन्सियेशन है तो इन में जो वैराज्य है उसको उचा माना जाता है जो कर्म जो है उससे बंदन होता है से प्रयादा तो अभी हम देखा था कि भगवान ने कैसे बताया कि वास्तव में इतना सिंपल नहीं है रिनन्सियेशन में दो चीज़े होती है एक है कि मेच्यूर रिनन्सियेशन या रियल रिनन्सियेशन दूसरा है प्रिमेच्यूर रिनन्सियेशन अपरिपक्वा और उसी तरह से जो कार्य होता है वह क्या होता है वह डिटैज्ट हो सकता है वह अटैज्ट हो सकता है और वह कुलिटली इर्रिस्पॉंसिबल हो सकता है तो इतने से सात्विक राजस की तामसी बोल सकते हैं या ये कर्मयोग, कर्मकांड और वीकर्म इससे हो सकता है तो अलग अलग स्तर बताये भगवान ने मिलवास्तव में, मुझे लिए अपनी द्धियान योग को दियां योग में दियां, जिपी प्रावा रुक जार्क थाता है, कर्मयोग और भकतयोग में अपनी द्धियान योग. तो एक सरसे देखे गए इसको भगवान जो है अ कर्म बोलते हैं।
ऐसा कर्म जिससे आपको बंधन में नहीं फसने वाले आप। तो अभी ये सारा जो विशलेशन हो रहा है, ये जो एक्स्प्लिसिट नहीं है, ये इंप्लिसिट है। पर इनomon इस्से चला है जो आपरीबो को होते साइवै विकर्म नहीं करना चहीं है, कर्मा कांड भारत नहीं करना चहीं है तो भगवान ने बैता आया हाँ है की कैसे तयोस्तु कर्म सन्याथवरतठ साथ कर्मयोगोत विशीषते क्याहै दोनों अच्छे है निष्रिय यस w डोनों अच्छे हैं भगवान कहते हैं कि ये भी अच्छे है चला है पर इन दोनों में भगवान बोलते है ये जो है भैतर है।
ये ग्रेटर देन साइन है ये। साइन को समझाना पढ़ता है तो साइन का मतलब नहीं होता है कुछ एक तरह से। पर ये जो है अभी जो बक्तियोग की तुलना कर्मयोग से हो चुकी है, बक्तियोग की तुलना जो है ओ घ्यानّयोग से अभीतक नहीं हँई ही है।
तो अभी ये जो है तेरा से अत् राअध्याए में ये होने वाला है। ये 6 से 8 अध्याए में ये होगया है, और फिर नौवे अध्याय में और कुछ अतक बारवे अध्याय में ये भी हो गया है। चेह से आठ नहीं अक्शली, चेह और आठ. अभी जो तुलना हुई है, अभी जब अर्जुन सवाल पूछते है, तो इसलिए वो जो छे शब्दों के बारे में सवाल पूछ रहे हैं।
और अभी कुछ गीता का वर्जन्स है, गीता ऐसा ग्रंत है, कि विश्व में आने ग्रंत होते हैं, जो भी कोई ग्रंत होता है, उसमें कभी-कभी इंटरपूलेशन हो जाता है, इंटरपूलेशन मतलब क्या? कोई कुछ डाल देता है, कुछ उससे निकाल देते है, तो ग्रंतों में थोड़ा बदल होते रहता है, तो उसको टेक्स्चूल स्कॉलरशिप या क्रिटिकल स्कॉलरशिप कहते हैं, देखने के लिए, कि ये शलोक किसे आड किया है क्या, ये शलोक पहले से था की नहीं, तो फिर विशेलेशन करते ह emanate करते ही, कि कए ही कुछ आड किया है, क्या हैच्यு हुआ होा है, तो अभी कुछ-कुछ गिताँके भर्जियन्ज से व्यक्रण्स करता है, अधि तो अर्जुन का सवाल नहीं है कुछ कुछ गीता के वर्जन्स में आर्जुन का सवाल है।
तो अभी सवाल हो या नहों, ये सवाल से क्या होता है एक तरसे, जो है एक transition जो हो रहा है, वो सपश्ट होता है. जो अभी नया विशे का विशलेशन जो हो रहा है, वो क्योंं हो रहा है? वो दो पद्धतिया हो सकती है। एक है दो कारण हो सकते हैं और दो पद्धतिया उसके अनुसार हो सकती हैं. एक है कि अर्जुन ने एक सवाल पूछा explicitly, और फिर भगवान ने उसका जवाब दिया।
दूसरा है कि भगवान अभी अर्जुन को अर्जुन को देख रहे हैं, अर्जुन को समज रहे हैं, तो वो दोनों में एक घनिष्ट संबन्द भी है, तो कभी कभी हम कुछ बोल रहे हैं किसी को, अगर उसके मन में कुछ सवाल है, अगर हम उनको जानते हैं, तो थोड़ा हम एंटिसिपेट कर सकते हैं, हम विचार कर सकते हैं कि इनके मन में क्या सवाल है, तो कई बार हम देखा है कि घीता में, भगवान जब एक अध्याय का आंत करके दूसरा अध्याय चालू करते हैं, तो तभी वो बीच में आर्जुन का सवाल नहीं होता है कभी कभी, तो भगवान खुद समझते है अभी आर्जुन को सुनने की जुरुवत है, और वो बताएं लगते हैं, तो ये प्रश्ण का सवाल हो या नहों, उससे बहुत जादा फरक नहीं पड़ता है, पर जो प्रश्ण है उससे फरक क्या पड़ता है, उससे क्या होता है एक तरह से, ये जो change of subject जो हो रहा है, वो क्यूं हो रहा है, वो transitions पश्च होता है, तो लेटस सी, आर्जुन क्या पूछ रहे है, आर्जुन वाच प्रक्रतिम् पुरुषम् चैव, क्षेतरं क्षेतर्ग्यं में वच्छ bubble एतद भेडितुनिच्छामि I उससे धे मुझे 6 शामत पूछ रहे है, प्रक्रति, पुरुश, क्षेतर्ग्य, ज्यान गेइनुálो पुछ है कभी कोई कुछ शामत है अपने शब्दा एक वर्ल्ड व्यू का विभाग होते हैं।
तो अभी कोई बोलेगा आपको कि अच्छा, हैपी का मतलब क्या है? इंग्ली शब्द जाना जाता है, हैपी सुक्की है। कोई पूछता है क्वांटॉम फिजिक्स का मतलब क्या है?
उसको क्वांटॉम फिजिक्स क्या है समझाने के लिए उसको फिजिक्स समझाना पड़ेगा। फिजिक्स समझाने के लिए उसको पहले सायन्स क्या है समझाना पड़ेगा। तो क्या है?
कुछ-कुछ शब्द वो एक वर्ल्ड व्यू के अंदर होते हैं। किसी को बोले ट्रिपल इंटिग्रल क्या है? तो ट्रिपल इंटिग्रल क्या है?
उसको पहले तो वो ट्रिपल क्या है पढ़ा है क्या? नहीं, वो भी पढ़ा नहीं मुझे। तो फिर क्या है?
कि उसके पहले का बहुत कुछ बताना पढ़ता है। तो हमको ट्रिपल इंटिग्रल क्या है बताना पढ़ेगा, तो उसको पहले गणित क्या है बताना पढ़ेगा, तिर गणित में क्या चीज नाम का क्या चीज होता है, इंटिग्रल क्या होता है, बहुत कुछ बताना पढ़ेगा। तो अभी अर्जुन एक तरह से ये शब्दों के बारे में पूच रहे हैं, मतलब उनको पहले से कुछ जानकारी हैं।
तो भगवान जो जवाब देते हैं, ये ये है, ये ये है, ये ये है। ऐसे नहीं करते हैं भगवान। भगवान उसके पिछे एक world view दे रहे हैं।
वो जो विचार धारा है, विश्व को देखने की पढ़ती है, वो बता रहे हैं। अभी इसमें जो भगवान का decision making कैसे होता है, कि भगवान कभी ध्यान योग या ज्यान योग का खंडन नहीं कर रहे हैं। पर वो बोल रहे है, कि जब हमें कुछ path चूज करना है, choose a path, तो इसमें दो considerations हैं, एक है personal, और दूसरा है impersonal, नहीं impersonal नहीं, social।
कि मिरा एक personal consideration है यो है, कि मैं यह करने में चाहिने में और नहीं आती है. तो यह personal consideration है कि ये हमारा सभाव होता है, disposition. और सोशल consideration है कि हमारा position क्या है. की हमारा समाज में भुमिका है, kita justी संगे में हमाग Mere samage me zimmedhari है, आज उसके पद्वी है, उसके अनुसार भी फैसला होते हैं, हमें क्या करना है, क्या नहीं करना है. तो अगर कोई व्यक्ती, पुलीस, कई की शहर में कोई रायट चल रहा है, अगर कहीं से, कोई चाहिए, इसे बताता है, लोस अंजल्स में फायर्स चल रहे हैं, तो अभी क्या है, कौई फायर में कोई बोलेगा कि मैं कुछ सरक्षित रहुंगा, वोम देख।
कोई रहेे हैं कि त слишком खतर, मैं फ confronted चला जाूगा। कोई बोलेगा मैं भूरांतर शाहत करता हुआ हूं तो जो व्यक्ति चुनाव करता है क्या करना है, वो उनकी वेक्तिगत प्रवृत्ति के नऊसार है और उनकी जो सामाजीक जिम्मेदारी उसके नुसार भी निर्भर है। तो एक तरह से जब भगवान अर्जुन से बात कर रहे है, तो अर्जुन को भगवान बोलते है कि किस तरह से?
पहले कर्मयोग में जो बात कर रहे है, उसमें जो होता है, वो अधिकान शुरुपे भगवान, अर्जुन को उनकी शत्रिय जो position है, शत्रिय का जो, शत्रिय जो position है, कि वो एक लीडर है समाज में. जब भगवान को बोलते हैं यद्यदाचरति स्रिष्टस। लोक संग्रहम एवापी। कि आपको लोक संग्रह करना है, लोक को, आपको समाज को संभाल के रखना है, यह ज़रूरी है।
तो वो भी ज़रूरी है, तो उसमें जो ये डिस्पोजिशन का भी उल्लेक करते हैं थोड़ा भोत। अजुन को कहते हैं तीसरे अध्याय में कि कैसे? कि तुम ख्षत्रिय हो और परधर्मो भयावः।
उसका उल्लेक आता है। तो अभी जब भगवान, जो कर्मयोग पे आधार पर अनलिसस है, तो उसमें पोजिशन को ज़्यादा इंपोर्टन देते हैं भगवान। कि तुमारा पोजिशन समाज में यह है, और तुमारा सवभाव भी कि तुम युद्ध करना है।
पर तुमारा सवभाव हो या नहों, तुम्हें समाज में एक भुमिका तुमने स्विखार की है। युद्ध करना ज़रूरी है। अभी घ्यान योग के सेक्शन में भगवान डिसपोजिशन पे ज़्यादा जोर देगे।
भगवान ज़्यादा इस पे जोर नहीं देते है कि इसमें कि तुम शत्रिय हो, तुमें समाज का समाज में एक उधारन प्रसुत करना है। पर भगवान बोलते है कि हम तीन गुणों से नियंत्रित हैं। और तीन गुणों से नियंत्रित होने के कारण हमें हम ऐसे ही उनकी नियंत्रित के बाहर नहीं जा सकते हैं।
हम इस जगत में मोह में फसे हैं और मोह से बाहर निकलने के एक पद्धती है। तो यहां पे भी भगवान बोलते हैं ज्यान योग में सबको सन्यास लेना ज़रूरी है पर वो अंत में सन्यास है। ऐसे नहीं कि सन्यास लेके कोई यश्यस्य हो जाएगा।
विक्ति को परिपक्व होना ज़रूरी है। और परिपक्व होने तक तुम्हें कर्म करना ज़रूरी है। और तो कर्म तुम्हें युद्ध करना है।
तो वो इसका बिगर पिक्चर है। पर अभी यहां पे हम इस अध्याय में क्या हो रहा है यह देखते हैं। तो इस अध्याय में जब भगवान को जवाब देते हैं।
तो अर्जुन के जो स्पेसिफिक सवाल है वो सवाल महतुपूर्ण है। पर उससे महतुपूर्ण है यह क्या है। कि भगवाने एक वर्ल्ड व्यू बिल्ड कर रहे हैं।
तो देखते हैं सुरात्में जवाब क्या है उनका। श्री भगवान वाचव इदम शरीरं कौन्तेय शेत्रं इत्यभिधियते कि यह जो शरीर है इसको शेत्र कहा जाता है। एतद्योवित्ति जो इसको जानता है तम्प्राहू उसको क्या बोलते हैं शेत्रग्यम इति तदविधा उसको शेत्र ग्यन बोलते हैं।
एतद्ि योवित्ति, तं पराहू! शेत्रग्यम इति तद्विधा! तो stinks सम्छिप word view spiders अभी क्या है तो सिंकथिय जेवाब एक है जो तास्यादर था, जो सच्तय था, जो परत्माद था।
स्च्तय था plainser, शुम्प्या, चैसूर्णा, प्रवांज्रत्रत्रत्रण्ण, शौलीय and science कंग़माना दे बब्कार तिरी मारायदि निन्ही है। तो अपका, रहिन में प्रसुतों वाले.. चीन आगर कुवराख्य आ릴게요… ज्याान बरकास है गृपनेस्स साख्या 까ी बच्चा। अभी प्रकृति और पुरुष जो है, ये दोनों हैं, अभी पुरुष में, भगवान आगे बताएगे, कि दो होते हैं, एक है जो हम आत्मा है, वो भी पुरुष है, और एक है परमात्मा है, इनका ओलेख खास करके, तेरवे अध्याय के बाईसवे और तेरीशवे शलोक में आएगा, जब हम सर्चा करेंगे, कि दो प्रकार के जीव हैं, दो प्रकार के, जो कॉंशियस बींग्ज हैं, वो दो प्रकार के हैं, फिर अभी प्रकृति जो है, एक ऐसे थे, प्रकृति, सारे विश्वों को प्रकृति बोल सकते हैं, प्रकृति के अंदर होता है कि शेत्र, अभीझेसटर क्या है?
वो प्रकृति का जो विभाग है, जिसपे किसी एक जीव का नियन्स्रण है, अभीझेस पूरा जो कम्रा है, कोलणम हॉल है, ये प्रकृति कहे सकते है, पर हम एक जग पर बेटे हैं और जहांमें हम बेटे हैं वहांपे हम हाथ-पएर भैला की कुछ कर सकते हैं तो वह मेरे क्षेट्र है तो क्षेट्र is that portion of परकृति which में ज़ित्द हाँ सुपर में जो प्रकृति का जो विभाग है, जिसमें हमें थोड़ा नियंतरन है, उसको ख्षेत्र कहते हैं। तो वो ख्षेत्र को जो इसके अंदर आत्मा होता है, वो जानता है। ख्षेत्रज्य होगे।
तो हम जानते हैं, पर हमें साथ परमात्मा भी है। ख्षेत्र जो है, ख्षेत्र मतलब इसको एक तरह से शरीर बोल सकते है। It is body, but केवल शरीर नहीं है।
It is बोडी से बोडिली जो influence होता है। शरीर के आधार पर व्यक्ति का influence होता है। तो वो ख्षेत्र है।
और इसमें जो आत्मा होता है, और साथ साथ परमात्मा भी होते है। हम ओते हैं, और भगलाहिन भी होते हैं। तो अभी जो ज्यान मारग में जो परधान प्रेक् स्टा होता है कि जो सक्रेत पोरूष है, वो अक्रेत प्रकृती में फसा हुआ है।
हम शाश्वत जीव हैं पर हम इस अशाश्वत सर्चरीर में बंदे हुए हैं। तो इससे बाहर कैसे निकलना है। तो इससे बाहर निकलने की जो विधी है, उसको ज्यान बताते हैं।
अभी यहां पे, मतलब क्या है कि, अगर सोई समझता है कि, मैं, अब देखा था, आदे मैंने बोला था, जेल का उधारन। कैसे कोई जेल में है, तो जेल से कैसे बाहर निकलना है। तो अभी अगर यह भोतिक जगत, material world, यह एक जेल है, तो जेल से बाहर निकलने का exit, exit जो है, वो दो है, एक है, dutyfulness, जेल के पूरे नियमों का पालन करो आप, फिर क्या है, आपका term खता हो जाएगा, आपको जेल से बाहर निकल जाएगा, अभी यह dutyfulness में कैसे है, कि एक तरह से वो, it’s dutiful, it is to some extent, it is, जो है, वो detached dutyfulness है, आप नियम पालन कर रहे हो, पर क्या है, आपको उस जेल में और बड़ा नहीं बनना है, जेल में भी ऐसे होते है कि, कोई, कोई जेल के नियम अच्छे से पालन करता है, तो जेल में सब कुछ जो जेलर संभालते नहीं है, वो जेल में ही बोलते थे, तुम कैदी हो, तुम इस विंग को संभाल लो, तुम इसे करो, व्यक्ति को उसी में बड़ा बनने में रुची नहीं है, डिटाज्ज द्यूटिफुलनस है, तो दूसरा पद्धति है, कि किसी को जेल से बाहर निकलना है, तो एक है पूरा डिटाज्ज्मेंट, पर इसके लिए जो है, ये material world जेल कैसे है, इस कर्मयोग जो हम करते है, तो it is ऐसे बतायाता है, कि हम समझते है, कि it’s a physical jail, physical reality को हम महत्व देते हैं, कि आपको याद है, मैंने चार quadrant बताया थे, ये जगत सत्य है, दूसरा जगत सत्य है, तो अभी क्या है, जो ग्यान मार्ग, ये कर्मयोग का मार्ग है, ग्यान योग के मार्ग में क्या होता है, महत्व इसपे जा जाता है, कि ये जगत एक सपने के समान है, एक ऐसा सपना है, जिससे हम उठ नहीं सक रहे हैं, तो उठने के लिए क्या करना है, वो सपना देखना ही नहीं है हमें, कोई ऐसे मूवी थेटर में गया है, वो मूवी देख रहा है, और अभी वो जाता है मूवी देखने, उसको लगता है कि अच्छा, ये कुछ रोमेंटिक कॉमेडी है, और चलता है, निकलता है, वो हॉरर मूवी है, मैं ऐसे मूवी देखने के लिए नहीं आया था, पर अभी उसको बैट के वहाँ पर देखना भड़ रहा है, पर जब वो दिखाएगा अपने कारियों से, कि मुझे इस मूवी में कुछ भी रुची नहीं है, बिल्कुल रुची नहीं है, मूवी भुज़ भी हो रहा है वहाँ पर, मैं उसके लिए देखनी बादाला नहीं हूँ, जब पूरा डिस-इंट्रेस दिखा देगा, तो वो लेगा कि, ठीक है, अभी तुम कोई मूवी देख रहा है, तो ग्यान का मारग क्या है, कि यद्यपी हम इस जगत के सपने में है, पर हमें इसमें कुछ भी रुची नहीं है, जब हम दिखाते हैं, तो हम उससे बाहर निकल सकते हैं, इसमें जो है, अभी घ्यान के बारे में भगवान बोलते है, कि घ्यान के अनेक लखण बताते हैं, सोर्ी, इन क्या हो गई?
तेरव यद्यांे में जाना हैं qualité। तो घ्यान के 20 लख्ण बताते हैं, तो उसमें जो अंतिम लख्ण बताते हैं, उसको हम देखते हैं भी. आध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्वज्ञानार्थदर्शनम् एतज्ज्ञानमितिप्रोक्तम् अज्ञानम् यत अतो अन्यता। तो यहांपे जो ज्ञान है उसके बारे में क्या बता जा रहा है?
आध्यात्मज्ञाननित्यत्वं बहुत परकार के ज्ञान हो सकते हैं पर उसमें जो आध्यात्मिक ज्ञान सबसे महतुपूर्ण है एक प्रहुपा जी कैनेडा में एक प्रोफेसर के साथ वाणिंग वाक पे गए थे तो प्रोफेसर उनसे कह रहा था कि प्रउपाजीन से पूचा कि आजकल आत्मा के लिए क्या। वह वज्ञानी ज्ञान आुपको पता है। तो वो घरते।
हमें, आत्मा के लिए कोईवज्ञान की ज्ञान नहीन.. तो प्रोपाजी बोले तुम्हारे पास कोई घ्यान है नहीं। फिर तुम्हारे पास कोई घ्यान है नहीं। नहीं नहीं स्वामेजी, आत्मा एक अलग प्रकार का घ्यान है।
विज्ञान ये अलग प्रकार का घ्यान है। तो वो महानी वोक पर जा रहे थे, तो वह बर्कार था, तो वह घास था। प्रोपाजी बोले, नह।
सकॉलर बोले, हमारे पास दो बड़े किताबे हैं, इसमें हमने लिखा है, कैसे समझा जाता है, ग़ास कैसे ग्रो करती है। प्रोपाजी बोले, तुम्हारे किताबों के नावई, तो भी ग्रास ग्रो करती थी पहले भी. फिर वह बोले, पर अगर भगवान नहीं जाते थे कि हम यह ग्रास को समझे, तो फिर भगवान ने यहां पर ग्रास क्योंं रखा है वो? तो प्रहुपा जी बोले कि मेरा पॉइंट ये है कि जिस भगवान ने इस घास को रखा है, तुम अज घास को स्टडी करते हो और वो भगवान को स्टडी नहीं करते हो तुम।
तो क्या है कि किस तरह से अगर कोई जेल में है, अभी जेल में बहुत कुछ चीज़े आप स्टडी कर सकते हैं, कोई जेल में रहके जेल की दिवारों पे पीजडी कर सकता है वो, पर क्या है जेल में अगर है तो सबसे महत्रपूर्ण घ्यान क्या है, जेल से कैसे बाहर निकलन है, वो घ्यान को छोड़ के व्यक्ति हजार दुसरे परकार का घ्यान ला सकता है, ठीक है वो पर उसका इतना क्या फाइदा है, कि घ्यान में भी एक तरह से, प्रसे जो नौलेज्ज होता है, नौलेज्ज को जानने के लिए भी हमें एक तरह से इंटेलिजन्स चाहिए, न तो हम बाहर से घ्यान इंद्रियों से ले रहे हैं।
तो अभी यहाँ पे आप बैठे हैं, आप सुन रहे हैं मैं क्या बोल रहा हूं, तो आप एक दरसेग्ञान ले रहे हैं यहां पे. पर अभी यहां पे बैठके, आप शायद ये छित्र देख सकते हैं, कितना सुन्दर छित्र हैं, और छित्र का ध्यान कर सकते हैं. या फिर कोई आता है यहाँ पे, शैंडिलियर को देख सकता है. मैं एक मेरे इस्तार को हमारे मंबए के जुहु मंदिर में बुला आया था. उनको आध्यातमे कोई कुछ रुची नहीं थी. मैं थोड़ा उनको समझाने का प्रयास कर रहा था, कुछ रुची नहीं थी. मंदिर में तर्शन में जाने के लिए उनको रुची नहीं थी. पर थोड़ा बातचीत हुआ, फिर उनको प्रसाद हो गया दिया. तो इसके बाद में जब वो घहर गये तो उन्हें बुला की, मैं फोन किया उनसे बोले की, तुम्हार जो मंदिर में आया था, मैं तुम्हार जो मंदिर में आया था, मैं तब जुहु मंदिर में था, गैस्ट रूम में रहा था वहाँ पे, कि वो जो मंदिर में आया हमको बहुत प्रड़क्टिव विजिट था. बोले, अच्छा, क्या प्रड़क्टिव था?
हम अमारे घर में कुछ फर्णीचर लेना चाहते थे, वो तुम्हार जुहु मंदिर के गैस्ट रूम में जो फर्णीचर था, वो तह हमको बहुत अच्छा लगा, तो हमने वो फर्णीचर ले लिया है भी. अभी क्या हो गया? आप मंदिर में फर्णीजर देखने के लिए नहीं आ रहे हो। वो कहीं भी देख सकते हैं आप।
तो क्या है कि जब हम knowledge प्राप्त करते हैं, तो knowledge में भी क्या है? तेरे कोई lot of knowledge, और कुछ है more important knowledge, और कुछ है less important knowledge. तो कोई अभी वक्ता है, वो बाव को देखता है, और क्या बोलता है, सुनता है निएं। तो तुम्हारे expressions, तुम्हारा चेहरा, तुम्हारे expressions जो अच्छे लगते हैं।
कोई बोलता है कि कोई वक्ता है, वो joke करते हैं। humour करते हैं। और उसके बाद है क्या होता है?
आपको क्या याद है? मुझे सारे जोक्स याद है उसके लिए। जोक्स क्यूं बोले थे?
वो याद नहीं है। तो क्या है कि ठीक है जोक्स बोले हो गए, वो अच्छा है, आज से हो न, पर हम अगर जोक्स ही सुनना है, तो हम घर में बेड़के एक कॉमडी शो देख सकते हैं। क्या है?
जो जोक्स होते हैं, उनका कोई उद्देश है, और क्या पॉइंट बता जा रहा है वो जोक्स है, वो समझना ज़रूरी है। तो क्या है? कि जगत में, बहत Kuch ग्यां में हम प्राप कर सकते हैं पर वो जो ग्यां प्राप कर सकते हैं, उसमें क्या महत्वापूरन है और क्या महतवापूरन नहीं है?
दो भगवान बोलते है, आध्यात्म यान नित्यत्वों यह जो है वो नित्य ज्यान है। तत्व इसलिए तत्व असली सत्य क्या है वो समझें तत्व ज्यानार्थदर्शनम् तो अभी हम knowledge मतलब क्या है वो एक input हो रहा है पर knowledge को समझने के लिए कि which knowledge किस प्रकार का ज्यान मुझे प्राप्त करना है, कनसा महतुपूर्ण है उसके लिए बुद्धी लगती है मैंने बताय था पिछते धिआयों में कैसे intelligence मतलब क्या कि समझना क्या चीज़ी ज़ियादा महतुपूर्ण है क्या चीज़ का हमहतुपूर्ण है अतमसी सक्षाण का बतना है कि, काओं से बग आई है उनकि लिए, और काओं से बग आई ही है।
बग जाएं जेंगी जिस्से भी जोरूरा है। कौण जीज़ बदलाया भी बदलाय। कौन जीज़ नहीं बदलाया भी बदलाया।
तो इसलिए इस अध्याय में, जब भगवान घ्यान के बारे में बता रहे हैं, वो घ्यान यह नहीं बता रहे है कि तुम्हें फिजिक्स का घ्यान होना चाहिए, तुम्हें लैंग्वज का घ्यान होना चाहिए, तुम्हें गणित का घ्यान होना चाहिए, यह सब ठीक है, इस जगत में हमें कारे करने के लिए सब सीखना पड़ता हैं, पर जब ग्ञोळज़ बता रहे हैं भगवान, जो समय रास्तिस्व हैं, यह समय रास्तिस्व हो सकता है, कोई स्किल्स हो सकता है, यह सब ज़रूरी है, पर भगवान जो knowledge बता रहे है, वो values के बारे में बता रहे हैं। इसलिए ये ज्यान के लिस्ट जो सालू करते हैं, अहिम्सास, जो सौरी, आमानित्वमदंभित्वम, अहिम्सास्शान्तिरार्ज्यवम्, वो बता रहे है, ये सब ज्यान के लक्षन हैं।
अब ये सब क्योंं ज्यान के लक्षन बताये गए हैं? क्यूं से knowledge को जोर दिया हैं that knowledge that helps us to differentiate illusion from reality. क्या सत्य है, क्या मिठ्य हैं? वो जो बहेत करने के लिए अगर जो में नमरता होगी तो फेर वो अपने घ्यान के घममंड में नहीं रहेगा।
तो क्या होगा? उनके द्वारा वो तत्वदर्शी बन पाएगा। गुरु तत्वदर्शी है, वो कुछ तत्वदर्शी बन पाएगा।
जन्ममृत्यु जराव्याधि दुखदोशानु दर्शनम्। तो इसलिए यहाँ पे वैल्यूज क्या है? बहुत से वैल्यूज हो सकते हैं।
वैल्यूज तो डिफरंशियेट। ऐसे वैल्यूज जिनके द्वारा हम सत्य और असत्य, या इलूजन, डिफरंशियेट, इलूजन और तुझुद। उसके बारे में याँ पे, भगवान बता रहे है।
तो ये ज्यान की लक्ष याँ पे ब्ताते हैं। अभी उ्सके बाद में आरिजॅनिय स्टे, चार सवाल पुछे है। तो jest ज्यान मतलब।
एक तरह से यहाँ पे knowledge नहीं बता रहे हैं भगवान, knowledge कह सकते हैं हम, पर ज्यान is the means to keep getting knowledge. ज्यान प्राप करते रहो उसके लिए जो क्या पद्धती है, और वो पद्धती क्या है? हमें कुछ values चाहिए हमारे जीवन में. जैसे science भी बतायते हैं, science एक तरह से knowledge है, पर science is also a way of knowing. Science में कहते है, scientific method होता है. Scientific method मतलब क्या है? एक पद्धती है, कि आप observe करो, कुछ theory बनाओ, कुछ experiments करो, फिर उसके आदमें सत्य क्या है, समझो. तो यह जो है, ज्यान जो है, उस अधिस्यासे भगवान knowledge पे जोर नहीं दे रहे हैं यहाँ पे, the means to keep getting knowledge, उस में जोर दे रहे हैं. अब इसके बाद में, जो गेयों पे जोर दे रहे हो, तो गेयों क्या है?
गेयों मतलब, आप क्या जानना चाहते हो? तो, जैसे मैं बताया था, कि जब हम ग्यान प्राप्त कर सकते हैं, तो बहुत कुछ ग्यान प्राप्त कर सकते हैं. तो, किस विशे का ग्यान महतुपूर्ण है, और उस ग्यान को प्राप्त करने की पद्धति क्या है? तो भगवान बोलते है, वो ग्यान आप प्राप्त करो, जिससे की क्या होगा?
ग्येंयं यत्तत् प्रवक्षामी। जो ग्येंयं जो है, मैं उसके बारे में बता रहा हूँ, क्या है? यत् घ्यान्त्वा अमृतम अश्णुते।
यह जानने से आपको अमृत प्राप्त होगा. अमृत मतलब यह स्वर्ग के अमृत के बारे मात नहीं हो रही है, यहाँ पर अमृत का मतलब क्या है? अमृतत्वा। आप शाश्वत जीवन प्राप्त करोगें।
और फिर उसके बारे में भगवान बता रहे लगते है आगे, अनाधिमत परंब्रम्ह नसत्तनासत उच्छते। यहाँ पर बता रहे हैं कि मैं अभी उस गियंग के बारे में बताऊंगा, क्या है कि जिसके द्वारा आप अमृत को प्राप्ती कर पाऊगे। इसको एक बुदार नेता हूँ, यहाँ पर ग्यान, अगर मैं यहाँ पर हूँ, और यहाँ पर अनेक वस्तु हैं, जो मैं देख सकता हूँ मेरे सामने, अलग-अलग वस्तु हैं, तो अभी कौन से वस्तु को मैं देखना है, और किस तरह से देखना है, क्या है कि अगर मुझे कोई तारे देखना है, तो आगों से देख सकता हूँ, पर अगर टेलिस्कोप होगा तो, अच्चे से देख सकता हूँ, मुझे कैसे जन्तु देखना है, तो माइकरोष्कॉप था उसके लिए, तो किसे देखना है, और कैसे देखना है, तो भगवान बोलते है, कि जो गेयं आपको देखना है, वो क्या है?
वो है स्पिरिच्वल रियालिटी. बहुत कुछ आप ज्ञान प्राप्प कर सकते हो, पर यह जो material reality जो है, भोतिक सत्य जो है, उनका ज्ञान आपको महतपूर्ण नहीं है, जो क्या महतपूर्ण है? आध्यात्मिक ज्ञान महतपूर्ण है. और इस गेयं को प्राप्प करने के लिए जो ज्ञान है, जो आपको ज्ञान लगेगा, वो क्या है? वो values है. अभी किसी को मैकरोसकोप के लिए देखना है, तो वो व्यक्ति अगर short tempered हो, गुस्ते वाला हो, काम हो, उसमें वो English काम बोल रहा हूँ, मैं संस्कृत काम नहीं, वो short tempered हो या शांत परुत्ति का हो, उसे यादा फ़रक नहीं बढ़ने लगे, तो गुस्ता आ गया तो उसको देखनी पाएगा, पर क्या है, वो उसके अलावा, जो एक तरह से material knowledge है, वो value neutral है, अगर कोई व्यक्ति, शाराब पीता होगा, शाराब नहीं पीता होगा, अगर आपको कार फिक्स करना है, उसने कार को mechanical काम कर लिया, काम हो जाएगा, क्या है कि, बहुत से स्किल्स होते हैं इस जगत में, स्किल्स में, हमारे चेतना का जो स्थर है, उससे ज़्यादा प्रभाव नहीं पड़ता है, अगर हमारे चेतना से distract हो गए, तो अलग बात है, पर क्या है कि, जो आध्यात्मिक तत्व समझना है, उसके लिए चेतना के शुद्धता बहुत सरूरी होती है, उसके लिए values बहुत महत्तपूर्न होते हैं, values एकता से हर जग़ा महत्तपूर्न है, पर, क्या है कि, values इतने महत्तपूर्ण उसमें नहीं है, जहाँ पर अधिकाण शुबसे skill लगते है, जहाँ पे सिर्फ स्किल्स अधिकान शुरुप से लगते हैं, पर जहाँ पे अध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करना हैं, तो तभी हमें वैल्यूज बहुत महत्रपूर्ण होती हैं।
तो ज्ञान और गेयं भगवान बता रहे हैं। तो इसा जहाँ गिरदे पर धियारी, त्यवंदाष्या ध्यीरी, चदखाथी. एक प्रम सत्य भगवान हैं, एक आत्मा हैं, दुसरा है परमात्मा। तो अब ये सेक्षन अंगुल, अे गीता का संकेत तूद्र में से एक हैं।
तो कुछ जगह पर भगवान परमात्मा का उल्लेक कर रहे हैं, कुछ जगह आत्मा का उल्लेक कर रहे हैं. तो कब किसका उल्लेक कर रहे हैं, भगवान इसका उल्लेक नहीं करते हैं. तो क्या है, वो कभी कभी क्या होता है, वो व्यक्ति के बुद्धी पे रख देते हैं। अभी कैसे होता है? कि अभी हम भगवजीता पे क्लास दे रहे हैं।
अगर मैं बोलूंगा शुरुआत में, भगवजीता का लंबा चोड़ा इंटरडक्शन देने लगूगा, कि भगवजीता का लंबा चोड़ा इंटरडक्शन देने लगूगा, प्रण करुख शेतर में युद्ध हुआ था बोली है। यह सब तो उनको पता है। अगर मैं अभी ऐसे आओडियन्स को जो सब पता है वो बोलने लगूगा, तो वो आडियन्स के लेवल के बिलो हो गदा है।
तो जो गणित कोई पीजडी मैथ्स कर रहा है, उसको सिखाने वाला है, उसको वो जुनियर केजी में जो मैथ्स सिखा रहे था, उसको सिखाने के जुरूरत नहीं है। तो अभी अर्जुनी जो सवाल पूछा है, उससे ही समझता है कि अर्जुन को ग्यान है। तो इसलिए जब भगवान जवाब दे रहे है, ये जो चेप्टर है, ये चेप्टर, तेरावा अध्याय, वो उपनिशदिक चेप्टर मेंसे बहुत सिमिलर है।
अभी उपनिशद क्या होता है, वो बहुत बुद्धिमान लोगों के लिए होता है। जो ग्यानी होते हैं, जिनको अपने बुद्धी को एक्सरसाइस करने में बड़ा आनंद मिलता है। कुछ लोग होते हैं, क्या क्रॉसवर्ड पजल सॉल करते हैं।
तो उनको क्या है, वो बुद्धी का एक्सरसाइस करने में बद़ा आता है। यहाँ पे कौन सो शब्दा आ रहा है, यहाँ पे क्या आ रहा है। तो लोगों के लिए क्या है, तुमको कुछ काम नहीं क्योंं करते बैट रहे हैं।
कुछ लोगों को बाहर जाकर खेलने में बद़ा आता है। तो क्या होता है, जो लोगों को बुद्धी का एक्सरसाइस करने में बद़ा आता है, उनको अगर पुराना और इतिहास पढ़ाते हैं, तो उनको लगता है, यहाँ पे सब कुछ इतना सिम्पल है। कुछ करने के लिए है ही नहीं।
मुझे एक भग बता रहे थे, कि मैं जब कथा सुनता हूँ, तो मुझे लगता है कि मैं इंटेलेक्शोली अनेम्प्लॉइड हो गया हूँ। कुछ कथा सुनना है, बुद्धी के लिए कुछ करने के लिए है ही नहीं। तो अभी ये सत्य है।
जो लोगों की प्रवृत्ति है कि उनको बुद्धी को इस्तमाल करना है। तो उनको अगर बहुत सिम्पल सब कुछ करके देगे ना, तो उनको कुछ करने के लिए ही नहीं है इसमें। रुची है ही नहीं।
तो उनके लिए उपनिशद है। सवाल ही पूछा है वो एक बुद्धिमान व्यक्ति का सवाल है। अगर कोई व्यक्ति आखे पूछता है, जब मैं पता रहा था, कि आप मुझे स्क्रॉडिंगर एक्विशन क्या है समझा।
अभी अधिकान लोगों एक्विशन ही पता नहीं होता है, अधिकान लोगों एक्विशन क्या है समझा। इतिक्षेत्रं तथा ज्ञानं गेहं चूकतं समासथः तो मेंने आपको ज्ञान में बताया है और गेहं rain वताया है, समासथः, guerre में बताया है, यह समझना है तो, मद भक्त ऐथद वज़्यायं कि आपको मेरी भक्ति का नुषीनन करना है, यह समझना भी है तो क्या है? केवल तरक्वितर नहीं करना है, भक्ति करनी है. और मद्भावयो पपद्यते इससे आप, मेरा भाव जो है, जो आध्यात्मिक सत्य है, spiritual nature, मद्भाव, उसको आप प्राप्त करोगे. अभी मद्भाव जो है, यह चोथे अध्याय में भी आया था. वीतराग भयक्रोदम अन्मयामामुपाशुता, बहवो घ्यान तपसा पूता, मद्भावम आगतः. तो मेरा भाव, मेरे भाव को प्राप्त करोगे, वही भाव यहां पर बता रहे, वही विषय यहां पर हो रहा है. तो अभी इसके बाद में, जो भगवान, जो ख्षेत्र ख्षेत्र, अभी घ्यान घ्यान हो गया, अभी पुरुष्य प्रकृति के वारे भगवान बोलते हैं. तो इसमें जो है, हम दो शलोगों पे एम्फ़िसिस करेगे, पिर हम अंत करेगे, कि पुरुष्य जो है, प्रकृती में स्थित हो गया है. और क्योंं स्थित हो गया है?
ॐ६ं भुुहो ते प्रकृति जान गुणन वो भोग करना चाहता है कि इसका प्रकृति के द्वार जो गुण उठपंन हुए है वो उनके उसके द्वारा जो वजह उठपन पं, उनका भोग करना चाहता है और इससे क्या होता है? कारनम गुण संगोष्य तो ये गुणों के संगों में जब फ़स जाता है उससे क्या होता है? सद असध योनी जन्मसू तो अलग-अलग योनियों में वेकति का जन्म हो रहा है तो अभी ये जो उधारान है, जब मैं कहा था कैसे?
कि मोह के बारे में एलग-एलग उप्माए हैं। तो मान लिजे कोई एक जायन्ट टीवी स्क्रीन है। कुछ-कुछ लोग होते होंगे घर में एक होम थीयेटर होता है।
वो ऐसा घर बनाया होता है कि उसमें वो थीयेटर जैसे अनुभो करते। तो वहांपे मान लेजे एक चोटा बच्चा बेटने मिंदे की खुर्शी मुखे देखा है? और यहांपे वो बेटके क्या करना है?
वो एक टीवी देखने की जौनित पूरा है। तो जब टीवी देखना है, तो यह क्या है? ये पुरुश हैं।
और ये प्रकृति है। पुरुशः प्रकृति स्थोही। और इसके ऊपर अभी जो मूवी चल रहा है, यह जो मूवी है, वो क्या है?
वो है प्रकृति जान गुणान। प्रकृति के जो गुण है, उसके अनुसार यहाँ पे कुछ मूवी चल रहा है। और वो मूवी देखने में पूरा फस जाता है।
अगले सद असद जोनी जन्मस में बतायते हैं, तो यहां तक बतायें कि मूवी देखने में क्या होगा? अगले सद असद जन्मस में पूरा फस जाता है। और चोर को रोखने के जगपे वो टीवी हिल रहा है, तो उसके हाथ वो भी चल रहा जाता है।
और टीवी देखते रहता है वो. तो जैसे होता है, जीव होता है ऐसे है, कि हमारा मन है, हम शरीर को तो तयाग देते हैं, पर जब यमदूत आते है, वो हमारे मन को खीचते हैं। और मन जो है हमारा इंटरनल स्क्रीन है वो, उससे हम सारे दुनिया को देख रहे हैं। तो वो मन को खीचते हैं, और आत्मा जो अचल है, वो चंचल मन के साथ चला जाता है।
तो अभी जो है, यहाँ पे सद असद यूनि जन्मस जो बता जा रहा है। क्योंं हो रहा है? क्योंंकि ये भूँते, भोग करने का जो भाव है, वो मन में, पुर्वसंसकारों के अनुसार, वो बहुती सुद्रुड है।
तो फिर भगवान बोलते हैं अगले श्लोक में, कि ये जो हैं, हम यहाँ पे हैं, पर हमारे बाजु में कोँ हैं? परमात्मा हैं। ये सारा हम शो देख रहे हैं, और हमारा शो भगवान देख रहई हैं।
कि हम कैसे उसमें फसे हैं अगला श्लोक जो है, उपद्रिष्टा अनुमंताच, भर्ता भोकता महेश्वर उपद्रिष्टा मतलब उपर से देख रहे हैं वो जो टीवी पर चल रहा है उस पर फसे होई नहीं है पर वो देख रहे हैं हम कैसे देख रहे हैं हम पर क्या प्रभाव हो रहे हैं अनुमन्ताच कैसे एक चिस प्राकाश करता है? कैसे एक चीस प्राकाश करता है? रविज्ञसूर्य है।
साडरे लोग को जोति देता है. उसही दरसे क्षेतरि तथा कृच्नम। तुझव क्षेतर को क्षेतृ जो है। क्षेतरी मतलब ख्येतर ज्याथं।
शरीर को ातमा क्या करता है। पूर्णतया प्रकाष्य यती भारत। तो अभी ये जो उधारन है, ये उधारन का एक मह्तव है है कि अभी प्रुत्वी पे युद्ध हो रहा हो सकता हैं, प्रुद्वी पे… हैंसे लोग ज में जगडा कर रहें हो सकते हैं, प्रुत्वी बाहूत कुछ हो रहे सकता है, उसका सूर्य पे प्रभाव नहीं होता है।
So the earth does not affect the sun but the sun affects the earth. यह सूर्य है, सूर्य के कारण儿 यहाँ पेड पौदे उखते हैं, सुर्य के कारणर्ण यहां पे जीव जीवित रहते हैं। तो उसी तरह से शरीर और आत्मा का संभवन्ध है वासतों में आत्मा शरीर को प्रभावित नहीं करता है। शरीर आत्मा को प्रभावित करता है।
सही है? नहीं। उल्टा है।
क्या है? कि वास्तव में शरीर आत्मा को प्रभावित नहीं करता है। जैसे पुर्थ्वी सुरी को प्रभावित नहीं करती है।
पर जो आत्मा शरीर को प्रभावित करता है। आत्मा के कारण शरीर चल रहा है। पर अभी क्या हो गया है?
कि जो आत्मा जब आसक्त हो जाता है शरीर से तो आत्मा की चेतना जो है वो शरीर से बहुत प्रभावित हो जाती है। पर वास्तव में सम्मन क्या है? जो जीवन मुक्त के स्थर पर जो लोग होते हैं उनके लिए क्या है?
शरीर और आत्मा अलग हो जाता है। मतलब हैं साथ में पर समझ जाते हैं कि इन दोनों अलग हैं। तो वो उससे प्रभावित नहीं होते हैं।
तो भगवान कह रहे है कि जब आप ये ग्यान का world view समझ जाओगे, जो ग्यान अनुशीलन हो जाएगा तुम्हारा, तो उससे क्या होगा? तुम समझ जाओगे कि आत्मा और शरीर पूर्णते आलगे। पहले बोलते हैं, इसके पहले बोलते हैं, कि प्रकृटिस्व कुछ कर रही है, यपश्यति तथा आत्मानं आकरतारंस पश्यती।
कि जब देखते हैं कि आत्मा कुछ नहीं कर रहा है वास्तो में। कुछ नहीं कर रहा है मतलब, आत्मा शरीर में चेतना बैच करवा रहा है। अभी कैसे है कि मूवी का उधान देते हैं अगर कोई आडियन्स ही नहीं होगा तो मूवी चलना बंद हो जाएगा को थीयेटर वाला जो उदार है क्योंं मूवी रखेगा वहां भी तो अभी आडियन्स के कारण मूवी चल रहा है पर एक तरह से AUDIENCE के काल मुवी चल रहा है पर मुवीमे जो हो रहा है, वो AUDIENCE निर्मांत नहीं कर रही है वो क्या है, वो मुवी के प्लढॄ से अनिसार Happening वे४ थब कुछ हो रहते है इससे भगवान बोलते हैं कि तुम मोहन से मुक्त हो सकते हो।
तो अगले अध्याय में भगवान बताएगे कि किस तरह से यह तीन गुण होते हैं प्रकृती के जो मोर्ड होते हैं, गुण, वो मोह का कारण है. पुरुष्य प्रकृती के क्रोही, बुंग्ते प्रकृती जान गुणान. तो यह मोह कैसे निर्मित होता है, उसका वर्णन भगवान 14 अध्याय में करेंगे. और वो हम कल आखरी अध्याय में चर्चा करेंगे. और फिर मैं आपस जब आओंगा तो बाकी चार अध्याय हम करके, गिता को हम कम्प्लीट करेंगे. तो सारांश में, आज हमने 13 अध्याय में देखा, कि किस तरह से जो ज्यान का वर्ल्ड व्यू था, उसको हमने समझने का प्रयास किया है आज. तो उसके पहले हमने एक ओवर व्यू लिया. यह ओवर व्यू में कैसे था?
कि भक्ति योग का एक तरसे भगवान decision making के लिए आरजुन को बोल रहे है, तुम्हें क्या करना है? कार्य करना है. तो कार्य कैसे करना है? भक्ति योग में से किजिए. वालियो सब्भाये दिख्यान योगा से छारणी तेरी का विश्य बदल करता है तो वो सवाल है वो शाएद अरुजुनने कहाँ चूरदे होगा या भगुवानने कुछ चूरू किया होगा अगर सवाल पुछे उससे ज़्यादा महतूर्ण नहीं है, पर भी विशे बदल रहा है. तो जो विशे है, इसमें हम देखा कैसे?
कि जो question जो है, वह केवल terms के बारे में नहीं है, terms के आधार पर पूरा एक world view है, जो मैं पहले जानता हूँ और जो आपने सिखाया, इन दोनों का मैं कैसे मिलन करा सकता हूँ, वो पूछ रहे हैं अर्चिन. तो इसलिए क्योंंकि ये क्या है? It is a informed question. Informed मतलब, जो पूछ रहा है सवाल, वो जानता है बहुत कुछ, तो इसलिए जो answer जो है, जो answer भी थोड़ा intricate है वो, थोड़ा complicated answer है, जिसको कुछ पता ही नहीं है, उसको नता सवाल समझेगा, तो जवाब समझेगा. तो इसलिए तेरावा अध्याय थोड़ा complicated लगता है कभी कभी. तो भगवान यहाँ पे, जो ख्षेत्रक ख्षेत्रक जो है, उसके बारे में बताते हैं पहले, खी खेान मतलब क्योंहैं, ग्यान क्या न गेया के बारे मज़ें गेया क्या है, बहोत चीज़ें में जान सकते हैं, पर इस का्या ही गारता है, कि जो spiritual knowledge है, कि इस जेल से बाहर कैसे निकलना है, वो सबसे महत्वपूर्ण हैं और जान के लिए क्या नहीं करने के लिए क्या है वैल्यूज महत्वपूर्ण हैं क्योंंकि हमारे चेतना जो है वो हमें समझनी है तो स्पिरिजौल नौलेज़ से क्या होता है इस में एक मूवी चल रहा है वो विशय है और यह पुरुष है वो उसको देख रहा है तो इससे यह इसमें फसा हुआ जो वेक्ति है इससे फ्रीडम के लिए क्या है हमें समझना है कि किस एसे सन और जो अर्थ है वैसे ही आत्मा और शरीर है कि वास्तव में ये दोनों अलग हैं।
और अगर वो दोनों एक बनद में भस गया है, वो क्योंं हुआ है? वो कैसे है? कोई व्यूवर है, दिखने वाला है और टीवी है।
वो अलग है, टीवी में जो भी हो रहा है, पर उसमें वो इच्छा के कारण, भूंगते के कारण फस गया है। तो वो भूंगते, जो भोक करने की इच्छा है, उससे कैसे बाहर निकलना है, उसका वर्णन अगे के अध्यायों में होगा। बहुत-बहुत धन्यवाद, हरे कृष्णा।