Hindi – Chapter 15 Bhagavad Gita And Decision Making Bhagavad Gita Overview – Chaitanya Charan
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Lecture Summary
भगवान भगवद गीता के पंद्रहवें अध्याय के माध्यम से जीव को मोह रूपी संसार से निकालकर परम सत्य (आध्यात्मिक वास्तविकता) की ओर ले जाने का मार्गदर्शन करते हैं। इस पूरे व्याख्यान के मुख्य बिंदुओं को निम्नलिखित चार भागों में समझा जा सकता है:
1. मोह का स्वरूप और वृक्ष का मेटाफ़र (श्लोक 1 से 5)
- अस्वाभाविक अस्तित्व (अननेचुरल एक्ज़िस्टेंस): भौतिक जगत को एक उल्टे वृक्ष (ऊर्ध्वमूलमधःशाखम्) के रूप में दर्शाया गया है, जिसकी जड़ें ऊपर (परमेश्वर में) और शाखाएँ नीचे की ओर हैं। यह संसार वास्तविक वास्तविकता का एक प्रतिबिंब (Reflection) है।
- वेदों और भोग का स्थान: इस वृक्ष के पत्ते वेद हैं, और वेदों के विधि-विधानों से मिलने वाले भौतिक फल (धर्म, अर्थ, काम) भी इसी मोह का हिस्सा हैं। जो व्यक्ति केवल कर्मकांड में फँसा रहता है, वह इस मोह से बाहर नहीं निकल पाता।
- संसार रूपी वृक्ष का छेदन: इस अस्वाभाविक संसार रूपी वृक्ष की मूल जड़ें बहुत नीचे तक गई हैं, जिन्हें केवल असंग शस्त्र (आसक्ति का त्याग) के तीव्र अभ्यास द्वारा ही काटा जा सकता है।
2. मोह में फँसे जीव का दुःख और संसार का यथार्थ (श्लोक 6 से 11)
- जीव का कर्षण और शरीर परिवर्तन: जीव भगवान का सनातन अंश होते हुए भी मन और इंद्रियों के कारण इस भौतिक जगत में खिंचा चला जाता है (कष्ट और दुःख भुगतता है)।
- अस्वतंत्रता: हम कौन सा शरीर लेंगे, किस परिस्थिति में जन्म लेंगे, या हमारा सर्वस्व किसी भी क्षण छिन सकता है—इन पर हमारा कोई नियंत्रण नहीं होता।
- मोह का चक्र: मनुष्य इस जीवन को एक सुखद ‘रोमांटिक कॉमेडी’ या अच्छी फिल्म समझकर शुरू करता है, लेकिन अंततः वह एक दर्दनाक ‘हॉरर मूवी’ या त्रासदी (Tragedy) में बदल जाता है। इसके बावजूद, व्यक्ति उस मोह से बाहर नहीं निकल पाता और बार-बार उसी चक्र में फँसा रहता है।
3. ज्ञान चक्षु से संसार को देखना (श्लोक 12 से 15)
- अस्तित्व और भोग की निर्भरता: हमारी हर ज़रूरत (चाहे वह ब्रह्मांडीय स्तर पर सूर्य की रोशनी हो, प्रकृति द्वारा अन्न उत्पादन हो, या शरीर के भीतर भोजन का पचन हो) पूरी तरह से भगवान की व्यवस्था पर निर्भर है। हम स्वयं स्वतंत्र रूप से कुछ उत्पन्न नहीं कर सकते।
- ज्ञान चक्षु का विकास: जो व्यक्ति शांत और आत्मनियंत्रित होता है, वह यह देख पाता है कि इस भौतिक जगत और हमारे अस्तित्व के पीछे एक उच्चतर दिव्य योजना काम कर रही है।
- इच्छाओं के अनुसार फल: भगवान हमारी इच्छाओं के अनुरूप ही हमें स्मरण, ज्ञान और भूलने की शक्ति (स्मृति और अपोहन) प्रदान करते हैं—चाहे हम भौतिक भोग चाहें या भक्ति का आनंद।
4. परम सत्य और पुरुषोत्तम प्राप्ति (श्लोक 16 से 20)
मुक्ति: इस प्रकार के सबसे गोपनीय ज्ञान को प्राप्त करके मनुष्य सभी बंधनों और मोह से मुक्त हो जाता है तथा कृतकृत्य हो जाता है।
परम सत्य के तीन स्तर: आध्यात्मिक सत्य को तीन रूपों में समझा जाता है—ब्रह्म (सर्वव्यापक ज्योति), परमात्मा (मार्गदर्शक), और भगवान (परम पुरुषोत्तम, जो प्रेम और स्नेह के सागर हैं)।
पुरुषोत्तम योग: जो व्यक्ति बिना किसी संशय के यह समझ लेता है कि कृष्ण ही पुरुषोत्तम हैं, वह सब कुछ जानने वाला बन जाता है और पूर्ण भाव से भगवान की भक्ति में लग जाता है।
Full Transcription
हरे कृष्णा कृतज्ञों, आज आप सबके बीच में वापस आ पाया हूँ। जो भगवद गीता हमने चालू की थी, अगले दो-तीन दिनों में हम जो बाकी अध्याय बचे हैं, वो पूरा करने का प्रयास करेंगे। अभी तक हमने जो 14 अध्याय गीता के लिए थे, तो आज 15 वाँ अध्याय लेंगे और फिर शाम को, कल शाम को 16 वाँ अध्याय लूँगा, क्योंकि वो थोड़ा ज़्यादा सबके लिए रेलेवेंट है। आज 15 वाँ, फिर 17 वाँ, आज शाम को, कल सुबह 18 वें का एक पार्ट लेंगे और फिर कुछ प्रश्न-उत्तर होंगे या ज़रूरी होगा तो फिर थोड़े इवनिंग को भी एक क्लास रखेंगे और इस तरह से हम गीता पूरा करने का प्रयास करेंगे, गीता पूरी करने का।
गीता के अध्यायों का संरचनात्मक विश्लेषण
अभी थोड़ा बैकग्राउंड लेते हैं। जो गीता के अध्याय हैं, उनमें से जो पंद्रहवाँ अध्याय और बारहवाँ अध्याय, ये सबसे छोटे अध्याय हैं। जो पंद्रहवाँ और बारहवाँ हैं, वे दोनों जो हैं, बीस-बीस श्लोकों के हैं, 20 वर्सेज़ हैं और सबसे बड़े जो हैं, वो पहला और आख़री है। पहला जो है, 72 श्लोकों का है और जो आख़री है, वो 18 श्लोकों का है अध्याय।
अभी इसमें से जो आख़री सेक्शन है, जो एक तरह से जो गीता है, अर्जुन को मार्गदर्शन दे रही है कि आपको किस तरह से फ़ैसला करना है, क्या फ़ैसला करना है। तो जो गीता है, एक तरह से, मान लीजिए कोई टारगेट है, टारगेट पर कोई निशाना मारना है, तो सामने से एक तरह से मारना आसान है, पर कोई अगर साइड से मारता है और बराबर वहीं पर लगता है, तो फिर क्या है? वो बहुत एक्सपर्ट आर्चर है।
वैसी ही भगवान जो अर्जुन को बोल रहे हैं, फ़ाइट, आपको युद्ध करना ज़रूरी है, पर वह युद्ध करने का संदेश है, वो पहले कर्म योग की दृष्टि से देते हैं पहले से 6 अध्यायों में, फिर भक्ति योग की दृष्टि से देते हैं 7 से 12 के अध्यायों में, और फिर ज्ञान योग की दृष्टि से देते हैं 13 से 18 अध्यायों में।
तो एक तरह से जो कॉल फ़ॉर एक्शन है, वो हर जगह सेम है, जो उसके पीछे जो फ़िलॉसफ़ीकल एनालिसिस है, तत्वज्ञान के स्तर पर जो एनालिसिस हो रहा है, वो अलग है। तो विज्ञान की दृष्टि से जब भगवान बता रहे हैं, तो बताने की ज़रूरत क्या है उनको? क्योंकि तेरहवें अध्याय में गीता में कुछ ऐसे अध्याय हैं जो कृष्ण-अर्जुन का कोई जवाब दे रहे हैं, इसलिए शुरू हो रहा है वो।
तो जो तेरहवें अध्याय में शुरुआत होती है, अर्जुन जो सवाल पूछते हैं, छः शब्दों के बारे में पूछते हैं, वो पूछते हैं कि ज्ञान क्या है, ज्ञेय क्या है, पुरुष क्या है, प्रकृति क्या है, क्षेत्र, क्षेत्रज्ञ एवं? तो बोलते हैं कि ये सब मैं जानना चाहता हूँ। तो अभी वो शब्दों के बारे में जानना चाहते हैं, उसके पीछे संकल्पना जो है, वो जो वर्ल्ड व्यू है, जो विचारधारा है, वो जानना चाहते हैं। तो उसका जवाब भगवान देते हैं।
तो ये अर्जुन के सिक्स टर्म्स के क्वेश्चन्स हैं। ये दीज़ आर अबाउट कैसे जो पुरुष है, प्रकृति में फँसता है, उसका वर्णन है। पुरुष-प्रकृति बॉंडेज, कैसे बंधन होता है, कैसे मुक्ति होती है, उसका वर्णन वहाँ पे 13 वें अध्याय में था। और जो 14 वें अध्याय में था कि जो गुण जो है, तो ये है पुरुष और ये है प्रकृति। पुरुष-प्रकृति में क्यों फँस गया है? क्योंकि भुंगते-भुंगते, मतलब वो भोग करना चाहता है। और ये प्रकृति में क्या आ रहा है? प्रकृति में जो दिख रहा है वो क्या है? प्रकृतिजान गुणान्, जो गुण है, गुण से जो मोह आ रहा है, वो दिख रहा है।
तो अभी इसमें व्यक्ति फँसा हुआ है। तो अभी ये जो मोह होता है, जैसे टीवी पे अनेक चैनल होते हैं, कुछ अच्छे सात्विक हो सकते हैं, कुछ भक्ति के बारे में हो सकते हैं, कुछ बहुत तामसिक हो सकते हैं, वैसे जो भौतिक जगत में मोह होता है, वहाँ भी अलग-अलग प्रकार का होता है। तो अभी जो 13.28 जो है, इसको कभी-कभी ये बीज श्लोक कहते हैं, जैसे किसी बीज से वृक्ष आता है, तो जो बीज श्लोक है, इससे जो वृक्ष आया है, वो वृक्ष का वर्णन भी 15 वें अध्याय में है। 15 वें अध्याय में क्या है? जो पुरुष इस जगत में फँसा है, तो कैसे फँसा है? उसका वर्णन यहाँ पे हो रहा है।
पंद्रहवें अध्याय का परिचय और वृक्ष का मेटाफ़र
अभी इसका मतलब क्या है कि इस अध्याय में अभी भगवान बताएंगे कि कैसे जो व्यक्ति मोह में फँसा है, तो वो मोह क्या है? तो जो ऊर्ध्वमूलमधःशाखम् है, तो अभी इसका मैं जस्ट गो ओवर द चैप्टर्स इसमें क्या है कि जो मोह है, द इल्युजन, इल्युजन को एक तरीक़े के मेटाफ़र से, वृक्ष की उपमा से समझाया जा रहा है।
फिर उसके बाद में 16 वें अध्याय में क्या है? इसके टू एक्सट्रीमिटीज़ ऑफ़ द ट्री कि जो वृक्ष होता है कि उसके ऊपर क्या है, उसके नीचे क्या है, बिल्कुल ऑपोज़िट डायरेक्शन। तो दैवी और आसुरी प्रवृत्ति है। 17 वें अध्याय में क्या है? जो उनके बिटवीन है, जो दैवी नहीं लगते हैं, जो पूरी तरह से आसुरी नहीं लगते हैं, उनके बारे में क्या वर्णन दें, क्या स्तर हैं, वर्णन दें। 18 वें अध्याय में फिर वर्णन आता है कि यह सारा ज्ञान प्राप्त करके कैसे, हाउ टू ऐक्ट, कैसे हमें कार्य करना चाहिए जिससे कि बंधन में न फँसे, नो बॉन्डेज, जिससे कि बंधन न हो, यह वर्णन इस आख़री अध्याय में हो रहा है।
तो अभी हम पंद्रहवें अध्याय में देखें, तो पंद्रहवें अध्याय में जो मोह व्याप्त है, उसका अभी वर्णन हो रहा है। तो जो वर्णन हो रहा है कि वो पहले प्रसिद्ध श्लोक है, उससे हम शुरू करते हैं। भव औषधाछ्रोत्र मनोभिरामा, हरी नाम हरी कथा। एक औषध है, अलग-अलग उपमाएँ दी जाती हैं, हमारी जो इस जगत में परिस्थिति है, उसे समझ सके और उससे बाहर निकल सकते हैं। हर एक उपमा का अलग उद्देश्य होता है।
तो अभी यहाँ पे जो उपमा दी बताई है, क्या है? एक वृक्ष की उपमा दी है। पर कैसा वृक्ष है वो? वो एक ऊर्ध्वमूलमधःशाखम् ऐसा वृक्ष है जो उल्टा है। तो अभी ये उल्टा बताया जा रहा है कि जो परिस्थिति है, ये अननेचुरल है, ये निसर्ग के विपरीत है। हर जो उदाहरण होता है, उससे कोई एक पॉइंट बताया जाता है, क्योंकि हॉस्पिटल का उदाहरण होगा तो क्या है? अगर हॉस्पिटल में है तो दवाई लेनी है। अगर जेल में है तो क्या? आपको अच्छा बर्ताव करना है, फिर आपको जेल से कोई छोड़ देगा। अगर आप सागर में हो तो क्या है? आपको नाव से बाहर निकलना है। अगर आप सपने में हो तो क्या है? आपको उठना है, किसी ना आपको उठाना है, धूप लगेगी आपको।
तो अलग-अलग उदाहरणों का क्या है? अलग-अलग उद्देश्य होता है। तो यह उससे अलग-अलग पॉइंट करने के जाता है। तो यहाँ पे यह जो गीता का अध्याय है, उसका एक उद्देश्य है कि यह अननेचुरल एक्ज़िस्टेंस, अननेचुरल एक्ज़िस्टेंस, जो हमारी परिस्थिति जो अभी है, वो अस्वाभाविक है। अस्वाभाविक से स्वाभाविक परिस्थिति में कैसे जाए, इसका वर्णन यहाँ पे हो रहा है।
तो अब इसमें जो अभी कोई वृक्ष होता है, मान लीजिए कोई वृक्ष है, तो अगर कोई वृक्ष किसी को उल्टा दिख रहा है, तो उसका मतलब क्या है कि वो जो है, ये एक रिफ़्लेक्शन है, ये एक प्रतिबिंब है। तो प्रतिबिंब इस शब्द का शब्द रूप से उल्लेख नहीं किया गया है गीता में, पर वो एक तरह से उसके संकेत किया गया है उसके बारे में। तो आपको वृक्ष उल्टा दिखेगा, तो कहाँ दिखेगा? किसी प्रतिबिंब में दिखेगा। तो अगर प्रतिबिंब है, तो एक तरह से जो व्यक्ति अगर यहाँ पर है, उसको अभी प्रतिबिंब को देख रहा है, तो क्या करना है? उसकी दृष्टि जो है, प्रतिबिंब से सत्य की ओर ले जानी है और यह जो जर्नी है, वही पंद्रहवें अध्याय की जर्नी है।
पंद्रहवें अध्याय में ये श्लोक बताए जा रहे हैं कि यह प्रतिबिंब क्या है? यह प्रतिबिंब अभी यह क्या है? जर्नी टू एनलाइटनमेंट और लिबरेशन कि इस मोह में अगर फँसा हुआ है कोई, प्रतिबिंब देख रहा है और प्रतिबिंब कोई आम का वृक्ष है, तो वो नदी में। तो अभी जो गीता में जो वर्णन है, जो इस पंद्रहवें की पहले जो पाँच श्लोक हैं, दुःख झेल रहा है, तो यहाँ से जो ये जो कैसे ये ये रिफ़्लेक्शन है, इस प्रतिबिंब है, इसके परे भी और कुछ है क्या? तुम कल्पना कर रहे हैं ऐसा कुछ है। तो अगले पाँच जो डिस्क्राइबिंग ऐंड अटैनिंग रियालिटी, यह सत्य क्या है? यह प्रतिबिंब है, जो प्रतिबिंब से सत्य की ओर जाना है, वो कैसे जाना है, उसके लिए क्या करना है, उसका वर्णन है।
तो अभी एक तरह से देखेंगे तो यह जो है इसमें जो पहला, अगर इसको चार सेक्शन्स बोलते हैं, वन, टू, थ्री और फ़ोर, तो यहाँ पे पहला क्या है? यह इसका वर्णन है। फिर दूसरा क्या है? कि इसमें हम कैसे धूल भुगत रहे हैं, हम कैसे इसका नेचर है, यह। फिर इसके बाद में हम कैसे दुःख भुगत रहे हैं? फिर जो तीसरा है, ये क्या है? पॉइंटर्स हैं, ये क्या है? ज्ञान चक्षु है, कैसे हम देख सकते हैं कि इस जगत में ही इसके परे कुछ है? और आख़री है कि कैसे इसको हम प्राप्त कर सकते हैं? कि अटैनिंग, प्रतिबिंब क्या है? समझ लिया हमने, पर उसके बाद में उसको हमें सत्य जो है प्राप्त करना है। तो इस तरह से इस अध्याय में ये चार विभाग हैं।
वैदिक और ट्रांसवैदिक ज्ञान का स्वरूप
और पहले विभाग में, जो पाँच श्लोक हैं, उसमें भगवान वर्णन करते हैं कि कैसे जो इस जगत में वेद है, तो एक तरह से भगवद गीता, यह एक वैदिक ग्रंथ है, पर भगवद गीता अधिकांश रूप से जो वेद शब्द के दो अर्थ होते हैं, वेद है जो चतुर वेद होते हैं, और वेद मतलब जो सारा सनातन धर्म में ज्ञान आया, उसको वैदिक ज्ञान बोलते हैं, वैदिक-वैदिक संस्कृति बोल सकते हैं।
तो क्या है, गीता जो है, इट इज़ बोथ वैदिक एंड ट्रांस वैदिक। ट्रांस वैदिक मतलब क्या है? गीता कई बार बोलते हैं कि त्रैगुण्यविषया वेदा, तो जो वेद ये शब्द का अर्थ है, अगर उसका एक छोटा अर्थ होता है, क्या है? चतुरवेद। तो अगर ये अर्थ लिया, तो क्या है? यह अधिकांश रूप से कर्मकांड के बारे में है, और भगवद्गीता बोलती है कि गीता जो है, फिर क्या होगा? गीता इज़ ट्रांस-वेदिक। और फिर गीता, अगर वेदा का, गीता का, वेद यह शब्द का अर्थ बोलते हैं कि ऑल नॉलेज, वेद का अर्थ, सो भी ज्ञान है, तो फिर जो गीता क्या है? गीता ज़रूर वैदिक है, और गीता समिष्ठ है वेदिका। तो इसमें क्या है या परमार्थिक ज्ञान जो है, आध्यात्मिक ज्ञान जो है, उसके बारे में वर्णन आता है, परमार्थ के बारे में।
तो अभी यहाँ पे क्या बताया जा रहा है कि इसी वृक्ष में जो पन्ने हैं, जो पर्ण है, जो वृक्ष के पत्ते हैं, वो क्या है? वो वेद है। तो अभी इसका मतलब क्या है कि अभी वृक्ष के पत्तों से क्या आता है? फूल आते हैं, फल आते हैं। तो वेदों में जो विधि-विधान बताये हैं, वेदों के विधि-विधानों से इस जगत में भौतिक फल मिलते हैं, धर्मा-अर्थ-काम मिलता है, पर क्या है? वो फल मिलेंगे भी, किसी को ऐश्वर्य मिल जाएगा, किसी को ख्याति मिल जाएगी, वो सब भी भौतिक ही है। वो जो है, वो वास्तव में आध्यात्मिक नहीं है। इसलिए जो वेद है, वो भी इस जगत के मोह का ही एक विभाग है, इसलिए यहाँ पर ऐसे बताया जा रहा है।
तो इसलिए अभी इसी श्लोक में आगे बताते हैं कि यस्तं वेद स वेदवित। जो यह वेदों को जानेगा, उसको वेदवित नहीं बता रहे हैं, जो इस वृक्ष को समझेगा, वह वेदवित है। सिर्फ वेदों के श्लोक जान के क्या होता है? भगवान बताते हैं दूसरे अध्याय में, वेदवादारतः पार्थ, जो कर्मकांड में फँस जाता है कभी-कोई। तो इसलिए हमें यह समझना कि सारा जो वृक्ष है, वो एक तरह से मोह है, और वृक्ष के हमें परे जाना है।
संसार रूपी वृक्ष का छेदन और असंग शस्त्र
तो भगवान बताते हैं आगे, इसका रूप है, इसको समझना बड़ा मुश्किल है। इसका अंत कहाँ, उसकी शुरुआत कहाँ, इसका मूल कहाँ है, यह बहुत मुश्किल समझना है। तो किसी वृक्ष को तोड़ना है तो क्या है? उसको मूल को तोड़ना है, तो मूल कहाँ है? पता करना पड़ेगा उसको।
तो अभी यहाँ पे क्या बताते हैं कि हमें, वास्तव में, तो इसकी जो मूल है, वो बहुत, बहुत नीचे गए हैं, तो उसको हमें तोड़ना लगभग नामुमकिन है। पर कैसे हम तोड़ सकते हैं? असंगशस्त्रेण दृढेन छित्वा। तो असंग, असंग, संग मतलब आसक्ति है। वे तेरहवें अध्याय के बाइसवें श्लोक में बताया था, पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान्गुणान्, कारणं गुणसङ्गोऽस्य। असंगशस्त्रेण दृढेन छित्वा।
आगे बताते हैं कि हम वास्तव में इस वृक्ष को नहीं तोड़ सकते हैं। क्या है? वो वृक्ष को बता रहे हैं, अव्यय, यह हमेशा से रहता है, भौतिक जगत हमेशा से रहेगा, पर क्या होगा? हम जो बँधे हैं इस वृक्ष से, उससे हम निकल सकते हैं। जैसे वो कोई मूवी थियेटर है, उसमें मूवी के शो चलते रहेंगे, पर हम फ़ैसला कर सकते हैं कि मुझे अभी नहीं देखना इसको, तो हम वो टीवी को बंद नहीं कर सकते हैं, मूवी चलते रहेगा, पर हम जो ख़ुद देख रहे हैं, उसको बंद कर सकते हैं। तो इसलिए हर एक व्यक्ति को जो असंग है, वो कल्टीवेट करना है, उसको विकसित करना है।
परम धाम का वर्णन और जीवलोक का यथार्थ
और उसके बाद में क्या बोलते हैं भगवान? ततः पदं तत्परिमार्गितव्यं, यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः, तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये, यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी। उस परम पुरुष को समझो। अश्वत्थ उदाहरण, यह उपनिषदों में दिया गया है। उपनिषदों में कई बार थोड़ा वो इंपर्सनलरिस्ट दृष्टि बताएगा, पर भगवान यहाँ पे बताएंगे, अश्वत्थ उदाहरण ले रहे हैं और इसके साथ साथ उनका कर रहे हैं? उसके परे एक पुरुष है, बोल रहे हैं, और उसके परे मतलब पुरुष को प्राप्त करना है।
तो अभी यह बताने के बाद, पहले भगवान थोड़ा उल्लेख करते हैं कि कैसे है कि अभी मैं पता है कि यह जगत का मोह है, यह इसमें बहुत फँसे हुए हैं हम। तो भगवान बोलते हैं कि इसके परे क्या है? पहले एक बताते नहीं थे कि यह रिफ़्लेक्शन है, यह रियालिटी है। वो रियालिटी क्या है? बोलते हैं कि यह वो उनका धाम है, न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः। तो बताते हैं कि उस धाम का लक्षण क्या है? कि उसको सूर्य की ज़रूरत नहीं पड़ती है, उसको अग्नि की, न तो अग्नि, न तो चंद्र की ज़रूरत पड़ती है रोशनी के लिए। तो उसका मतलब क्या है? वो स्वयं रोशनी देने वाला है, वो सेल्फ़-एफ़ल्ज़ेंट है।
तो यह जो उपनिषद् में व्याख्या के लोग आता है, तमसो मा ज्योतिर्गमय, तो वही भाव है कि जगत जो है, वो तमस की जगह है और वो जो भगवद्धाम है, वो रोशनी की जगह है, ज्योति की जगह है वो। और जो ज्योति है मतलब क्या है? उसमें बाहर किसी ज्योति की ज़रूरत नहीं है। और इसका वर्णन आता है, पर भगवद्धाम बताते हैं कि वहाँ पे जाओगे तो आप वापस नहीं आओगे, यद्गत्वा न निवर्तन्ते, तो आप वापस नहीं आओगे, पर वो क्या है? तद्धाम परमं मम।
तो इस जगत के परे वो जगत है, वो मेरा धाम है, वो सेल्फ़-एफ़ल्ज़ेंट है, वो स्वयं रोशनी देने वाला है, स्वयं प्रभा आती है उससे। तो अभी ठीक है, अभी कोई भारत में रह रहा है, उससे पता चलता है कि यह अमेरिका नाम की जगह है और वहाँ पर ऐसे लोग रहते हैं, यह करते हैं। तो अभी सिर्फ किसी जगत के बारे में सुनने से वहाँ पर जाने की इच्छा जागृत नहीं होती है, वह जगह कितनी अच्छी है या यह जगह कितनी बुरी है। तो जो तुलना होती है, ठीक है, यहाँ से मुझे यहाँ पर जाना है।
तो अभी पहले भगवान बताते हैं कि कैसे इस जगत के मोह में हम बसे हुए हैं। तो जो अगला श्लोक आता है, उसमें विख्यात श्लोक है, हम साथ में इसको रिस्पॉन्स करते हैं, साथ में ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः, मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति।
यहाँ पे बहुत कुछ बताया गया है श्लोक में, पर यह संदर्भ में सबसे महत्वपूर्ण क्या है? दो चीज़ें हैं। बोलते हैं कि हर जीव मेरा ममैवांश है, सनातन के लिए है, पर क्या होता है जब वो डिस्कनेक्ट हो जाता है तो क्या होता है? कर्षति। कर्षति मतलब वो दुःख भुगत रहा है। तो अभी पहले यह इस जगत का मोह बताया, क्या है मोह, और मोह में दुःख क्यों है, वो बताया जा रहा है।
तो अभी क्या बोलते हैं कर्षति? अभी जो इस जगत में कर्षण हो रहा है, वो कर्षण अलग-अलग। तो यहाँ पे भगवान जो कर्षति बता रहे हैं, वो किसी दुःख से बता रहे हैं। कर्षति क्या दुःख है इस जगत में? वो बोलते हैं कि हमारा सारा जो अस्तित्व है, वो किसी भी क्षण पर हमसे छीना जा सकता है। तो जो पुनर्जन्म का वर्णन यह दूसरे अध्याय में आया था संक्षिप्त में, वासांसि जीर्णानि यथा। अब यहाँ आया, कैसे कि हमारा शरीर जो है, वो एक वस्त्र के समान है और वस्त्र को हम त्याग देते हैं जब वो ख़राब हो जाता है। पर यहाँ पे क्या वर्णन आता है? वो बोलते हैं कि केवल एक वस्त्र नहीं है, हमारी सारी जीने की संकल्पना होती है, वो सब कुछ छीनी जाती है।
और भगवान देते हैं, यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः, हाँ, वो ईश्वर बोल रहे हैं जीव को, पर वो बोलते हैं कि कैसा ईश्वर है जो उसकी इच्छा के बिना, उसकी जानकारी के बिना, एक शरीर में आता है, कुछ समय तक रहता है, और फिर उस शरीर से बाहर के लिए आता है। अभी हमें मृत्यु कब आने वाली है, हमको पता नहीं है और हम इस जगत में जब जी भी रहे हैं, तो किस हद तक हम स्वतंत्र हैं? किस हद तक वास्तव में हम स्वतंत्रता से सुख प्राप्त कर सकते हैं?
यहाँ बता रहे हैं कि जीव है, वो ख़ुद को समझता है कि मैं ईश्वर हूँ, पर वास्तव में ईश्वर नहीं है। अगर मान लीजिए हम किसी घर में रह रहे हैं और वो जो घर का मालिक है, वो कभी भी हमें घर से निकाल सकता है, तो फिर किस हद तक हम उस घर में संतुष्ट, शांत रह सकते हैं? संतुष्ट हो सकते हैं? किस हद तक हम कह सकते हैं कि मैं इस घर का स्वामी हूँ?
तो यह जो है, इस श्लोक में जो दुःख का वर्णन है, वो एक बिग पिक्चर एनालिसिस है, कह रही है, यह मेरी बात नहीं सुन रहा है, यहाँ पे यह गर्मी हो गई, यहाँ पे यह आवाज़ आ रहा है, तो छोटी-छोटी समस्याएँ हैं, पर जो बहुत बड़ी समस्या क्या है कि हमारा जो सर्वस्व है, हमसे छीना जाता है।
तो बोलते हैं कि कैसे जीव जो है, हर जीवन में, एक हर लाइफ़टाइम में, एक नया ही संकल्पना लेके एक नया जीवन शुरू कर देता है। तो इससे क्या है? कि कैसे अगर वो देख रहे हैं, तो एक टीवी शो ख़त्म हो जाता है। हर टीवी शो इस जगत में जो होता है, इस जगत के मोह में वो ट्राजडी होता है।
कोई अगर मूवी देख रहा होता है, कुछ लोगों को ट्राजिक मूवी देखने में अच्छा लगता है, पर क्या साधा है? तो लोग जो मूवी देखने जाते हैं, थोड़ा कुछ जीवन वैसे दुखी है, थोड़ा कुछ सुख चाहिए, मुझे राहत चाहिए, रिलीफ चाहिए। पर अभी हर एक जो जिस जगत का मूवी होता है, वो लगता है कि यह एक अच्छा मूवी है, कोई देखने जाता है, उसको लगता है कि यह एक रोमांटिक कॉमेडी है, पर निकलता है वो ट्राजडी है।
और तो ट्राजडी ऐसे ही नहीं है कि वो हीरो-हीरोइन का ट्राजडी हो रहा है, वो ट्राजडी हमारे साथ हो रहा है। तो क्या है? हर बार होता है, पर क्या होता है? ऐसे नहीं है कि वो ठीक है, अभी एक ट्राजडी हो गया, तो क्या ठीक है? अभी बंद कर, तो अभी मैं बाहर निकल जाऊँगा।
अभी कुछ समय पहले पाकिस्तान भारत से हार गया क्रिकेट में, तो बहुत से पाकिस्तानी के, पाकिस्तानी के जो फ़ैन्स का भी सोशल मीडिया से रिएक्शन आता है, तो टीवी तोड़ दिया, वो कोस रहे हैं, बोल रहे हैं कि क्रिकेट कभी देखूँगा ही नहीं। अब जो भारत-पाकिस्तान का राइवलरी था, यह राइवलरी रहा ही नहीं है, अभी कभी पाकिस्तान-भारत का मैच नहीं खेलता है, तो क्या लोग फ़्रस्ट्रेट हो जाते हैं, मैं अभी कुछ इसमें रुचि नहीं रखूँगा। पर क्या होता है? अगली बार राइज़ हो जाएंगे, सब आपस देखने लग जाएंगे।
तो यह है कि हम इस जो मोह है, इससे बाहर नहीं निकलते हैं, एक हॉरर मूवी ख़त्म हो गया, तुरंत दूसरा हॉरर मूवी चालू हो जाता है और शुरुआत में लगता नहीं है वो हॉरर मूवी है। तो भगवान कह रहे हैं यहाँ पे कैसे कि हर जीवन में हमको एक स्रोत चक्षु-स्पर्शनम् चाल है, हमको अलग-अलग इंद्रियाँ मिलती हैं, और इंद्रियों से हम जीवन जीने का उत्क्रामन्तं स्थितं वापि।
अगर हम अमेरिका में जाएंगे, अभी थोड़े भारतीय लोग अमेरिका में ज़्यादा हो गए, पर दस साल पहले ज़्यादा था अमेरिका, वो देख, वहाँ पर लोगों को क्रिकेट यह शब्द सुनता है, तो उनको एक इंसेक्ट याद आता है, उनको गेम याद आता ही नहीं है। क्रिकेट ज़्यादा पता नहीं, वहाँ पर लोग बेसबॉल खेलते हैं। अगर आप कनाडा में जाएंगे तो आइस हॉकी खेलते हैं। भुञ्जानं वा गुणान्वितम्।
ज्ञान चक्षु से संसार को देखना और भगवान की व्यवस्था
तो अभी उस जगत में जो जीव फँसा हुआ है, पर ये कहाँ है? विमूढा नानुपश्यन्ति। जो मूरख व्यक्ति है, वहाँ जो मोहित हो गया है, पश्यन्ति नाओ, वो देख नहीं पाता है और बोलते हैं कि है, आ रहा है, मैं तो सुखी हूँ, मैं भोग कर रहा हूँ, क्या समस्या है? विमूढा नानुपश्यन्ति।
तो कौन देख सकता है? पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः। तो कुछ मोह ऐसे होता है कि वो अभी उस मोह में दुःख भी हो रहा है, पर वो दुःख से बाहर निकलने की पश्यन्ती नहीं होता है। सोशल मीडिया में एल्गोरिदम्स ऐसे होते हैं कि लोग सर्फ़िंग करते हैं, तो क्या होता है? वो दस रील देखेंगे, दस शॉर्ट्स देखेंगे, यह देखेंगे, पर उसके हाथ में एक ऐसे आता है, तो यह अच्छा है लगता है।
तो माया का मोह ऐसे होता है कि यह जो मोह में हमारा दुःख होता है, यह इल्युजन ऐसे है कि कभी हम होपलेसली फ़्रस्ट्रेटेड नहीं होते हैं, फ़्रस्ट्रेट कई बार हो जाते हैं, पर क्या होता है? वो हमेशा होपलेसली फ़्रस्ट्रेटेड होते हैं, मतलब क्या है? कि ऐसे नहीं है कि हम हज़ार बार भोग करेंगे और हज़ार बार पूरा दुखी मिलने वाला है। जितनी अपेक्षा होती है, उतना सुख कभी नहीं मिलता है। पर अगर हज़ार बार भोग करते हैं, तो क्या होता है कि होपलेसली फ़्रस्ट्रेटेड, मतलब थाउज़ेंड टाइम्स, हज़ार बार, हर बार क्या है? सफ़रिंग ही है, दुखी है, पर क्या होता है? जब यह होपलेसली फ़्रस्ट्रेटेड, मतलब क्या होता है? जब भोग करते हैं, तो शायद 900 बार दुःख होगा, 90 बार थोड़ा कम दुःख होगा, 9 बार थोड़ा सा लिटिल हैप्पीनेस होगा, थोड़ा सा सुख होगा, एक बार कुछ लॉट ऑफ़ हैप्पीनेस होगा।
तो क्या होता है? इसके कारण अगर टोटली देखेंगे तो क्या है? वो दुखी है, उसने पार वो एक बार जो सुख मिलेगा, उससे क्या होता है कि अगली बार मिल जाएगा। माया का मुझां ऐसे है, अच्छा, अभी नहीं मिला, पर अभी मिल जाएगा, अभी मिल जाएगा।
और जो पूरा… जो पूरी तरह से ऐसे नहीं है कि जगत में सुख नहीं है। प्रह्लाद महाराज दो उदाहरण देते हैं, एक उदाहरण देते हैं कि वो मृगतृष्णि रूपा बोलते हैं, कहते हैं कि मृगतृष्णि मतलब क्या है? उसमें कोई पानी है ही नहीं। पर उसी श्लोक में कुत्र शिशशुति सुखामृगतृष्णि रूपा क्वेदं कलेवरम अशेष रुजामिरोह। वो बोलते हैं कि यह शरीर जो है, यह आपको लगता है सुख मिलेगा, अशेष रुजामिरोह, अनेक दुःखों का कारण है, निर्वध्यते न तु जनोऽपि तीवद्द्विमान।
फिर भी क्या है? इतनी बीमारी है इस शरीर में, इतने प्रकार से दुखाते हैं, फिर भी जो बुद्धिमान लोग भी छोड़ नहीं पाते क्योंकि क्या है? मधु लवैः शमयन्तु दुरापैः। क्या है? थोड़ा सा मधु का एक लव है उसमें। तो ऐसे नहीं है कि मूर्ख दृष्टि में कोई भी पानी नहीं है, पर जगत में अधिकांश रूप से कुछ भी सुख नहीं है और बीच में क्या है? न केवल मधु जैसे स्वाद आता है, बहुत आनंद आता है, तो लगता है, अरे, अभी अगली बार मुझे मिल जाएगा। हम जो होते हैं, ये होपलेसली फ़्रस्ट्रेटेड नहीं होते हैं। इसलिए क्या है? जिसमें ज्ञान चक्षु नहीं है, ज्ञान चक्षु मतलब क्या है? एक बड़ा पिक्चर देखना। मैं इतने समय से कर रहा हूँ, क्या मिला है मुझे इसमें? पर जो स्मॉल पिक्चर देखता है, अभी नहीं मिला, अगली बार मिल जाएगा, अगली बार मिल जाएगा।
तो अभी यह ज्ञान चक्षु क्या है? इसको हम प्राप्त कर सकते हैं, वो अभी अगली सेक्शन बताते हैं भगवान। भगवान बोलते हैं कि यह ज्ञान चक्षु समझने के लिए भी क्या है? तो इसे थोड़ा सत्त्व चाहिए। अगली सेक्शन बोलते हैं, यतन्तो योगिनश्चैनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम्, यतन्तोऽप्यकृतात्मानो नैनं पश्यन्त्यचेतसः।
तो जो थोड़ा शांत है, जो थोड़ा आत्मनियंत्रण किया है, वह क्या है? वह समझ सकता है कि वास्तव में मैं जो भोग कर रहा हूँ, मैं जो आनंद प्राप्त करने का प्रयास कर रहा हूँ, उसकी योजना किसी और ने की है। नहीं तो फिर इसके बाल भोग में फँसा हुआ है व्यक्ति और कुछ इसके परे है, यह समझ में नहीं आता है उसको।
तो अगले चार श्लोकों में बारह, तेरह, चौदह में भगवान बताते हैं कि अभी हम क्या चाह रहे हैं? हम इंजॉयमेंट चाह रहे हैं। तो जो इंजॉयमेंट है, दिस इज़ अवर डिज़ायर, हम चाहते हैं कि मुझे इंजॉयमेंट मिले, पर इंजॉयमेंट के पहले क्या है? एक्ज़िस्टेंस, हमारा अस्तित्व होना यह ज़रूरी है। जैसे क्या है कि हम चाहते हैं कि मुझे स्वादिष्ट अन्न मिले, स्वादिष्ट अन्न है, यह इच्छा है, हमको भोग मिलेगा, पर उससे पहले क्या? अन्न तो ज़रूरी है, अन्न ही नहीं है तो फिर अस्तित्व ही नहीं रहेगा, स्वादिष्ट अन्न की छोड़ो तो।
भगवान बोलते हैं कि कैसे जो एक्ज़िस्टेंस है, इसके लिए ही हम, वी आर, देयर इज़ डिपेंडेंस, हम निर्भर है किसी और की कुछ ऐसी चीज़, जो हमारे परे है, उस पर निर्भर है। और भगवान यह तीन स्तर पर बोलते हैं।
अभी जो जीव है, हम जहाँ पे जी रहे हैं, तो हम एक ब्रह्मांड में जी रहे हैं, तो एक कॉस्मिक स्तर पर, एक ब्रह्मांड के स्तर पर भगवान बोलते हैं, यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम्, यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम्। दुनिया में बहुत से यह फूड इंडस्ट्री होता है, पर सारी जो इंडस्ट्री है, वो फूड प्रोसेसिंग इंडस्ट्री है, कोई फूड प्रोड्यूसिंग इंडस्ट्री नहीं है। जो फूड इंडस्ट्री है, कोई अन्न बना नहीं सकता है, जो फूड प्रोड्यूसिंग है, ओनली नेचर, निसर्ग बनाता है, और फिर निसर्ग के साथ हम कुछ कर सकते हैं। और निसर्ग में अगर अनाज नहीं आएंगे, निसर्ग में वृक्ष नहीं आएंगे, तो हम कुछ नहीं कर सकते हैं। तो भगवान क्या बताते हैं कि जो हमें खाने के लिए ज़रूरी है, हम कह सकते हैं ना, आई हैव मेहनत कर रहा हूँ, मैंने मेहनत करके पैसा कमाया और आई हैव अर्नड मनी, मैंने खाना लाया है। सही है वो, पर फिर भी वास्तव में हम कितना भी मेहनत क्यों न करें, अगर निसर्ग से ही अन्न नहीं आएगा तो हम कुछ भी नहीं कर सकते हैं। तो हमारा जो एफ़र्ट है वो सेकंडरी है, भगवान का जो प्रोविज़न है वो प्राइमरी है।
जब पक्षी होते हैं, रोज़ सुबह उठते हैं, ची-ची-ची-ची करके वो अभी ढूँढने लगते हैं, कहाँ मुझे, कहाँ अनाज मिल जाएगा, कहाँ मुझे खाने की चीज़ मिल जाएगी, तो उनको प्रयास करना पड़ता है, उनको इधर-उधर ढूँढना पड़ता है, देखना पड़ता है, फ़्लाय करना, उड़ना पड़ता है, तो उनका प्रयास है, पर उनके प्रयास के द्वारा अनाज निर्मित नहीं हो रहा है, वो अनाज किसी और, किसी और की ऊर्जा से हो गया है। वैसे क्या है? हमारे लिए भगवान बता रहे हैं कि हम जो जिससे जी रहे हैं, ज्ञान चक्षु मतलब देखना कि मैं सारा इस जगत में जी रहा हूँ, कुछ भोग करने का प्रयास कर रहा हूँ, पर ये सब मुझसे परे किसी और चीज़ पर निर्धारित है, निर्भर है वो।
और फिर अर्थली स्तर पे और फिर आख़री है जो फ़िजिकल स्तर पे, भगवान बोलते हैं, अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः, प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम्। वो बताते हैं कि किस तरह से मैं जो है, न केवल तुमको बाहर से अन्न देता हूँ, पर अंदर से अन्न का पचन भी मैं करवाता हूँ। हम पचन की प्रक्रिया को कभी याद नहीं करते हैं, जब ठीक से नहीं हो रही होती है, तब हम याद करते हैं, तो कैसे है कि पर यह जो पचन है, वास्तव में हम नहीं कर रहे हैं, वो जो भगवान ने एक अंतररचना बनाई है, उसके अनुसार वो हो रहा है।
तो इस तरह से ज्ञान चक्षुओं से हम देख सकते हैं कि हम वास्तव में हमारे अस्तित्व के लिए ही किसी और पे निर्धारित हैं। तो अभी अस्तित्व तो बेसिक है, उसके बाद में भोग है, हम भोग भी करना चाहते हैं, कोई आम खाना चाहता है, तो आम हम तो नहीं बना रहे हैं। तो क्या है कि इसे जब रावण सीता को देखता है, तो वो बोलता है कि तुम्हें बनाकर ब्रह्मा जी, जो सृष्टि करता है, वो रिटायर हो गए होंगे, क्योंकि तुम्हारा सौंदर्य ऐसे है कि इसके परे और कोई सौंदर्य बना ही नहीं सकता है। तो जब मैंने पढ़ा वो, तभी मुझे बचपन में एक मूवी का सॉन्ग था वो याद आ गया था, वो क्या था कि तारीफ़ करूँ क्या उसकी जिसने तुम्हें बनाया। तो अभी क्या है? वो भाव उसमें क्या है कि किसी ने इस जगत में जो आकर्षक चीज़ें हैं, वो बनाई है, पर हम उसको भूल जाते हैं, हम भोग के लिए वस्तुओं को लेते हैं। तो हमारा अस्तित्व और हमारा भोग जो है, वो सब जो है, किसी और चीज़ पे निर्भर है, कोई और सत्य है जिससे निर्भर है वो।
और भगवान बताते हैं कि मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोह्नं च। वो कहते हैं कि अगर तुम मेरा स्मरण करना चाहोगे, तो मैं स्मरण करना दिला दूँगा तुमको, अगर तुम किसी और चीज़ का स्मरण चाहते हो, तो तुमको उस चीज़ का स्मरण होगा।
तो अभी यह ज्ञान चक्षु है, उससे हम देख सकते हैं, पर देखना चाहते हैं क्या हम? तो जो है, हमारा जो एक तरह से हमारा जो डिज़ायर है, जो डिज़ायर अगर हमारा मटीरियल इंजॉयमेंट के लिए है, भोग के लिए, तो क्या होगा? तो फिर भगवान क्या करेंगे? हमको रिमेंब्रेंस देंगे कि कैसे उसमें इतना सारा भोग है, मेमोरी ऑफ़ इंजॉयमेंट, हाउ इंजॉयबल इट इज़। और यह फ़ॉरगेटनेस जो है, जो अपोहनम् क्या देंगे कि वो कितना मिज़रेबल है, उसमें भोग है थोड़ा सा, पर भोग के बाद में दुःख है। तो भगवान हमें यह जो है, किस चीज़ का स्मरण देंगे? वो है हमारी इच्छा के अनुसार है।
अगर हमारी इच्छा है कि हमें भक्ति करनी है, तो फिर भगवान क्या करेंगे? हमें यह याद दिलाएँगे कि भक्ति में कितना आनंद है, कितना एक्सटसी है, कितना ब्लिस है। और जो फ़ॉरगेट है कि ठीक है, उसके तपस्या करनी पड़ती है, भक्ति की ओर देखेंगे तो भक्ति में कितना आनंद है, उसकी भी स्मृति हो जाएगी, भक्ति में कितनी तपस्या है, उसकी स्मृति हो जाएगी। और अगर है कितनी तपस्या करनी है, यह करना है, वो करना है, तो फिर क्या होगा? फिर हम करने की इच्छा ही नहीं रहेगी हमको, हमारी इच्छा के अनुसार भगवान हमें ज्ञान, स्मरण और स्मृति देते हैं। तो इसलिए हमारी इच्छा महत्वपूर्ण है।
तो जो अभी कोई टीवी का उदाहरण देखते हैं, जो टीवी में कोई देख रहा है, क्या वो प्रोग्राम कुछ उसके एक नया प्रोग्राम देख जाता है, कि वो टीवी देखना छोड़ना चाहता है? उसकी इच्छा क्या है? तो भगवान हमारी इच्छा के अनुसार वो रेसिप्रोकेट करते हैं।
परम सत्य की प्राप्ति और निष्कर्ष
और फिर आख़री सेक्शन है, उसमें परम सत्य हम समझें कि इस प्रतिबिंब में हम देख सकते हैं कि इस प्रतिबिंब के परे कुछ है जो मुझे यहाँ पर दर्शा रहा है, जो मुझे मेरा इसकी झलक में देख सकता हूँ कि वो मुझे मेरा पालन-पोषण कर रहा है।
तो अभी वो परम सत्य क्या है? तो वो थोड़ा टेक्निकल सेक्शन है, पर उसमें कैसे है? 16, 17, 18 श्लोक जो है, इसमें भगवान ब्रह्म, परमात्मा और भगवान का वर्णन करते हैं, मतलब कि किस तरह से जो परम सत्य है, वो सर्वव्यापक एक आध्यात्मिक रोशनी है, उसमें एक मार्गदर्शक है और उसमें एक परात्पर, पुरुषोत्तम, प्रेमपूर्ण व्यक्ति है, उसका धीरे-धीरे साक्षात्कार होता है।
यः मामेव असमूढो जानाति पुरुषोत्तमम्, स सर्ववित् भजति मां सर्वभावेन भारत। जो वास्तव समझेगा कि क्या है कि यह पुरुषोत्तम है, वही वास्तव में मेरे हितचिंतक हैं, वही मेरा कल्याण कर रहे हैं, मैं उनको भूल जाता हूँ, तो भी वो मेरा पालन-पोषण करते हैं, तो मैं अगर उनका स्मरण करूँगा, तो क्यों मेरा देखभाल नहीं करेंगे, मेरा संरक्षण नहीं करेंगे? कृतकृत्यश्च भारत, उसको मिल जाएगा यह जो ज्ञान है, गुह्यतमम् शास्त्रम्। शास्त्र में बड़ा गुह्य ज्ञान है और इसको प्राप्त करने से मुक्ति, उसको इस जगत के मोह से मिल जाएगी।
तो सारांश में चार पॉइंट देखे हैं हमने, किस तरह से पंद्रहवाँ अध्याय क्या था कि सबसे पहले, बेसिकली इट इज़ फ़्रॉम इल्युजन टू रियालिटी, जो मोह से सत्य की ओर कैसे जाना है, उसके बारे में वर्णन है। तो उसके चार विभाग थे, जो एक से पाँच श्लोक हैं, उसमें क्या है? कैसा मोह है, नेचर ऑफ़ इल्युजन, उसका वर्णन है। तो उसके लिए क्या था, जो एक वृक्ष है, अपसाइड डाउन ट्री। तो अपसाइड डाउन ट्री का मतलब क्या है कि यह एक प्रतिबिंब है और प्रतिबिंब का क्या उदाहरण देखा? कैसे कोई है, यह प्रतिबिंब या मोह जो है, कोई बच्चा है वो टीवी देख रहा है बड़े स्क्रीन पे और उसमें ही वो फँसा हुआ है, जो भुंजते हैं, जो भोग है, उसके कारण व्यक्ति फँसा हुआ है। तो यह पूरा जगत कैसे योजना है, जिसमें हम इस मोह में फँसे हुए हैं।
फिर दूसरा जो है, छः से दस, वो क्या था? सफ़रिंग इन इल्युजन, किस तरह से हम इस जगत में दुःख भुगत रहे हैं। तो दुःख क्या है कि यहाँ पर अलग रगभा कैसे दुःख बोला जा सकता है? यहाँ पर तीन चीज़ें बताए जाते हैं कि व्हिच बॉडी, हम कौन से शरीर में जाएंगे, हम चुनते नहीं हैं कि हम मैं पुरुष बनना है, स्त्री बनना है, मुझे सफ़ेद वर्ण होना चाहिए, मुझे काला वर्ण होना चाहिए, हम कुछ चुनते नहीं हैं। क्या भोग करने के योग्य है, वह भी वास्तव में हम निर्धारित नहीं करते हैं, जो परिस्थिति है, जो मनस्थिति है, उसके पीछे हम लग जाते हैं, अलग-अलग खाद्य अच्छे लगते हैं, अलग-अलग गेम्स अच्छे लगते हैं। तो इस तरह से हम, हमारे नियंत्रण में कुछ भी नहीं है।
और एक जगत से, एक जीवन से जीवन में जा रहे हैं, हर एक जीवन में क्या लगता है कि यह जो है एक रोम-कॉम है, पर वो निकल जाता है, क्या है? वो हॉरर मूवी बन जाता है और सब कुछ जो है, हम से चला जाता है और फिर तुरंत एक नया आ जाता है। तो फिर उसमें, उससे गए निकलना है तो क्या है? ज्ञान चक्षु है। ज्ञान चक्षु से मतलब क्या देखना है, हमसे की चोलूर करिएन, वालित डे पार्ट्स, समिर्यादना है, हमसे सब के भी क्या, उरे मोह तों के मिक उरे मोह तों को इन्वेस्टेड करा है जाता है अपना चवल अर्जीन दिखा है, कोई ब्रह्मांड के स्तर पे, पृथ्वी के स्तर पे और शरीर के स्तर पे, कैसे? जो अगर भगवान की योजना नहीं होगी तो हम जीवित भी नहीं रह सकते, तो इसलिए जो बुद्धिमान व्यक्ति है, वो देख सकता है कि इस मोह के परे कुछ ज़रूर होना चाहिए।
और फिर आख़िर जो था, फिर वो जो मोह के परे क्या है? उसका जो वर्णन है, वहाँ पे ब्रह्म है, सर्वव्यापक ज्योति है, वहाँ पे भगवान एक मार्गदर्शक के रूप में हैं और भगवान जो है, परम सत्य जो है, वो एक प्रेम के वास्तव होते हैं, मोक्ष उसको मिल जाएगा इस भौतिक जगत के मोह से।
बहुत-बहुत धन्यवाद, हरे कृष्णा! किसी को कोई सवाल है? Thank you very much! श्रीमद् भगवद गीता की, शील प्रभुपाद की, गौर भक्तवृंद की जय! गौर प्रेमानंदे!