Hindi – Chapter 16 – Bhagavad Gita And Decision Making || Chaitanya Charan
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Disclaimer: This transcript was generated using AI and may contain occasional errors or inaccuracies. गीता के सोलहवें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण दैवी और आसुरी—इन दोनों प्रकार की मानव प्रवृत्तियों का विस्तार से वर्णन करते हैं। यह अध्याय हमें यह समझने में मदद करता है कि मनुष्य की मानसिकता और उसके गुण उसके जीवन को किस दिशा (मुक्ति या बंधन) में ले जाते हैं। पिछले अध्याय में भगवान, जो इसका पुरुषोत्तम योग जो बताया गया है, उसमें बताते हैं किस तरह से जो जगत है, ये एक वृक्ष के समान है। ऊर्ध्वमूलमधःशाखम। तो वह बताते हैं, अब ये वृक्ष के जो ऊपर का हिस्सा है नीचे का हिस्सा है, उसका वर्णन दे, मतलब इस जगत में जो उच्च श्रेणी के जीव हैं, तो क्या है भगवान बताते हैं कि इस जगत में दो प्रकार के लोग होते हैं, कुछ लोग होते हैं वाईज और कुछ लोग होते हैं अदर वाईज। कुछ लोग दैवी प्रकृति के होते हैं और कुछ होते हैं आसुरी प्रकृति के होते हैं। तो भगवान जब बताते हैं इनके बारे में, तो जब बताते हैं, वो गुणों के आधार पर बताते हैं। तो कोई कोई दैवी है, कोई आसुरी है, ये कैसे है? कुछ हम कल्पना होंगे कि जो असुर होते हैं, उनके कुछ सिर से सींग बाहर आते हैं, कुछ दृशदाद बाहर आते हैं। तो हाँ, वो भी होते हैं, पर क्या है? जो असुर है, ये दो चीज़े, ये एक योनि है, और ये एक वृत्ति भी है। ये एक स्पीशी है, और ये एक मेंटालिटी है, दोनों हैं ये। तो अभी अगर हम रामायण और महाभारत में भेद देखते हैं, तो रामायण में क्या है? एक पक्ष में मानव हैं, और दूसरे पक्ष में राक्षस हैं। तो ये जो है रामायण का युद्ध है। पर अगर हम महाभारत का युद्ध देखते हैं, तो क्या है? दोनों पक्ष में ही नहीं। यह पक्ष में क्या है? मानव ही हैं। जो दुर्योधन कोई राक्षस नहीं था, वो मानव ही था। पर दोनों मानव है, पर क्या है? उन में बहुत फ़रक है। क्या है? एक जो मानव है, वो दैवी प्रकृति cream ल्कéis क्या है? वो कौन है? पांडव है और जो कौरव हैं, वो कौन है? वो आसुरी प्रवृत्ति के हैं तो यहां समझना महत्वपूर्ण है कि जो भगवान बताते है, ये मानसिकता है ये विचार धारा है, ये वृत्ति है तो अभी कुछ लोगों को असुर का शरीर भी मिल सकता है पर इस अध्याय में, भगवान जो है वो वृत्ति के बारें विचार कर रहे है वो विस्टलेशन कर रहे है तो अभी जो विष्टलेशन करते है, उसको वो किस आधार पर करते हैं? वो गुणों के आधार पर करते हैं कौन से गुण ऐसे है? जो दैवी प्रकृति के लक्षण हैं और कौन से गुण ऐसे है? वो आसुरी प्रकृति के लक्षण है तो इस अध्याय में जो है चौबिस श्लोक है तो जो सोलहवें अध्याय में पहले तीन श्लोकों में भगवान दैवी प्रकृति के बारे में बताते हैं दैवी प्रकृति के बारे में जो गुण है वो बताते है और फिर उसके बाद में जो भगवान है चार से छह श्लोक तक वो आसुरी प्रकृति के लोग हैं यह ज़रूरी नहीं है कहते है कि वास्तव में जो दैवी प्रकृति के लोग हो या आसुरी प्रकृति के लोग हो वो जिस प्रकार से कार्य करते हैं तो जो नरक के द्वार है उसके बारे में बताते हैं गेट्स तु हल और हाँ तु अवॉइड उसके बारे में बढ़ना आता है तो जो आसुरी प्रकृति के लोग हैं एक तरह से वो नरक के लोग हैं तो यहाँ पे हम चर्चा कर रहे हैं कि किस तरह से यह सोलहवा अध्याय है यह वास्तव में मानव प्रकृति उसके बारे में वर्णन कर रहे हैं उसके बारे में चर्चा करेंगे। तो पहले वानवाचव वानवाचव भय का अर्था बहुत कुछ हो सकता है कि अभय मतलब कोई हमको मारने को आता है तो भय नहीं होता है उसको तो वो एक तरह का अभय है पर यहाँ पे जो भगवान बता रहे है कि उसके अभय के बाद तुरंत वो क्या बता रहे हैं सत्व संशुद्धीय साधायन तो लोग बोले ये बहुत वीर है ये मतलब क्या है वो युद्ध करने के लिए तैयार है किसी जो आक्रमण करने के लिए तैयार है आजकल जो मूवीज में वो दिखाते है अर्जुन योद्धा ही है पर भगवान बताते हैं अभय जो है उसके बाद में सत्व संशुद्धीय द फियरलेस फॉर प्यूरिफाइंग वन सेल्फ अभी अनेक गुण होते हैं। अभी जब भगवान कभी अनेक गुणों की लिस्टिंग करते है तो कभी कभी वो लिस्टिंग होता है जब उसमें वो लिस्ट में कौन सा पहले आता है कौन सा एंड में आता है उसका भी महत्व होता है तो ये सद्गुणों का लक्षण है और एक तरह से कह सकते हैं कि अगर ये सद्गुणों का महल है सद्गुणों का अगर है तो सद्गुणों का अगर है सद्गुणों का ये घर है तो उस घर का जो द्वार है जो द्वार है वो है अभय भी कोई भी सद्गुण किसी को दिखाना है तो उसके लिए दिखाना नहीं है डेवलप्ड करना है उसका भय होगा तो ईमानदार रहेगा सत्य बोलने से अगर किसी को खतरा होता है और वो उसको धमकी देता है उसका भय हो जाएगा तो सत्य नहीं बोलेगा तो यही नहीं अगर कोई विद्यार्थी है वो कॉलेज में जा रहा है वो व्यसनों में फंसना नहीं चाहता है पर क्या होता है कि बाक़ी जो विद्यार्थी है वो सब व्यसनों में हैं शराब पीते हैं नशा करते हैं ड्रग्स लेते हैं तो वो बोलता है कि यह मैं नहीं करता क्या तुम अभी माँ का दूध पीने वाला बच्चा हो कब बड़े होने वाले हो तुम कब मज़ा करते हैं उसको डांटते हैं अगर उससे वो डर जाता है अरे ये लोग मेरे बारे में क्या सोचेंगे तो लोग मेरे बारे में क्या सोचेंगे उसके बारे में हम बहुत सोचेंगे तो क्या होता है ख़ास करके अगर ऐसे लोग होंगे जिनमें सद्गुण नहीं है तो उनके निंदा के भय के कारण हम हमारा भी सद्गुण छोड़ देंगे तो इसलिए क्या है अभय जो है फेयरलेसनेस इज़ द फर्स्ट वर्च्यू कोई भी सद्गुण किसी को अगर लाना है तो उसको अभय ज़रूरी है। और कभी कभी भय दूसरों का हो सकता है कभी खुद का भय हो सकता है कि अगर मैं आज अच्छा बर्ताव कर रहा हूँ पर कल नहीं कर पाऊंगा इसलिए आज करने की ज़रूरत है आज ही छोड़ अभी ये व्यक्ति गुस्सा कर रहा है मुझसे मैं शांत रह रहा हूँ पर क्या है कल गुस्सा करेगा तो तभी तो उस पर चिल्लाने वाला हूँ तो अभी चिल्ला लेता हूँ तो क्या है कि अगर खुद का भय ज़रूरी है अहिंसा सत्यम अक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम् अपैशुनम् मतलब क्या है कि दूसरों में दोष देखने में कोई आनंद नहीं लेना तो कभी भी क्या होता है कि हम सब दूसरों में दोष देख सकते हैं अक्योटिक से दूसरों में दोष देखना बहुत आसान होता है खुद में दोष देखना मुश्किल होता है। अभी मैं लेखक हूँ तो लिखते हैं तो इसमें प्रूफ रीडिंग एक काम होता है तो अगर कोई और कुछ लिख के देता है उसमें देखने से क्या गलती दिख जाती हैं। पर जो मैं खुद करियर करता हूँ, उसको दोष के लिए देखना मुश्किल होता है। क्या कहें उसमें जो खुद दोष हो। क्या है क्रिएशन होता है, उसमें दोष देखना मुश्किल होता है। पर किसी को क्या होता है क्यों लोग सोचते हैं कि दूसरों में दोष देखना यह बुद्धि का लक्षण ही है। मैं कितना बुद्धिमान हूँ कि मैं सब में दोष देखता हूँ। इसमें भी दोष देखता हूँ बचपन से इंग्लिश में काफ़ी रुचि थी ना ये बाक़ी बच्चे भी थे तभी इंग्लिश की रुचि थी उनसे मेरी मैत्री हो गई मैं मैत्री करता था तो एक लड़का था वो क्या करता था? उसको बड़े-बड़े लेखक होते हैं और ये 1980’s, 90’s की बात है ये तो वो 1990’s के लगभग तो वो बड़े-बड़े लेखकों की बुक पढ़ता था और फिर उनके बुक्स में, उनके किताबों में स्पेलिंग मिस्टेक, ग्रामर मिस्टेक ढूँढता था और फिर वो अपने पैसे से वो बुक्स जो है उस लेखकों को पोस्ट करता था या उसके पब्लिशर को पोस्ट करता था कि ये मैंने सारे दोष देखे तो उसको उसमें बड़ा आनंद आता था ऐसे नहीं कि वो दोष देखने में उसको अच्छा करता था पर उसको अच्छा लगता था कि बड़े लेखकों को लिखने में भी मैं दोष ढूँढ रहा हूँ तो फिर जब मैं भक्ति में परिचर हो गया मेरा मैं प्रभुपादा जी के ग्रंथ पढ़े तो मैंने तो उसको दिया तो वो बोला कि उससे पूरी भगवद्गीता पढ़ी वो बोला यह इतना बड़ा ग्रंथ है मुझे एक भी गलती नहीं मिली इसमें तो मैंने बाद में जयद्वित महाराज जिन्होंने प्रभुपादा जी के ग्रंथों को प्रूफरीड किया वो बताया था तो उसके बहुत पसंद हो गए वो बोले कि उनका स्टैंडर्ड था कि अगर आप कोई किताब लिख रहे हो तो कम से कम उसको 25 बार प्रूफरीड करना चाहिए तो वो बोले हर एक किताब के लिए उस समय हम एक पूरा साक एक पूरा गोणी भर के उसके प्रूफरीड पेज होते थे मैन्युस्क्रिप्ट होते थे तो 25 मैन्युस्क्रिप्ट हम प्रिंट करते थे उसको क्लीन करते थे सब उसके दोष नहीं है को देते थे तो वो प्रिंट करते थे तो क्या है कुछ लोगों को दोष देखने में बड़ा आनंद आता है पर दोष देखना ख़ासकर कलयुग में अगर इसको कोई बुद्धि का लक्षण मानता है अरे मैंने इसमें दोष देखा उसमें दोष देखा तो वो उतना ही बुद्धि का लक्षण है जितना कोई सागर में पानी को देख पाए सागर में पानी देखने के लिए कितना बुद्धि लगता है बहुत बुद्धि लगता है क्यों? क्योंकि सब जगह पानी ही है तो जिसको लगता है इसके लिए बहुत बुद्धि चाहिए उसको बहुत बुद्धि और चाहिए क्या है? कलयुग जो है कलेर दोषनिधे राजने कलयुग में दोष यह है दोषों का सागर है तो इस कलयुग में अगर हम दोष देखने चाहेंगे तो क्या है? सब जगह दोष ही दिखेंगे हमको सागर में बुद्धि किस में है? अगर कोई सागर में घूम गया है घूमने नहीं गया है घूम रहा हो गया है, घूम गया है तो फिर, खो गया है तो फिर उसको बुद्धि क्या है? अगर कहीं हमको ज़मीन दिख जाए तो वैसे ही कलयुग में जो बुद्धि है वो बुद्धि इसमें है कि इसमें कोई सद्गुण दिखे तो अपैशुनम् दूसरों में दोष देखने में आनंद ही देना कभी कभी, ज़िम्मेदारी होती है तो दोष देखना पड़ता है क्यों कि कोच है, क्यों कि ट्रेनर है नाम पिता तो बैठा कुछ गलत कर रहा कुछ दोष देखना पड़ता है पर वो दोष देखने में आनंद नहीं लेना कृतव थलि कееवर दोष देखने में आनंद लेना। हम सबको पता है जब कोई दोष बताता है हमको, तो किस भाव से बता रहा है? बोलता है कि, आई एम वेरी सॉरी टू टेल यू। तो बोलते हैं, बोल रहे हैं, आई एम वेरी सॉरी, पर चेहरे में इतना आनंद दिख रहा है, कि वो सॉरी नहीं है बिल्कुल। बोल रहे हैं, उनको बड़ा आनंद हो रहा है, कि हम में दोष देखें। तो अपैशुनम्। दूसरों को दोष देखने में आनंद लेना। अभी इसको दैवी प्रकृति क्यों बताई गई है? क्योंकि इसका एक महत्वपूर्ण कारण है, कि हम सबके जीवन में कई बार क्या होता है, दुख आते हैं। अलग-अलग प्रकार से दुख आते हैं। तो एक बार, एक व्यक्ति, एक सागर के तट पर रहता था, तो शाम का समय था, तो अच्छा वातावरण था, कि वो बाजू को हो जाओ। यह मेरा जगह है। वो बोल रहा था, पर वो बोट वैसे ही आते रही। मैं बोला तुमको बाजू को हो जाओ। फिर भी बाजू को नहीं हो रहा था। तो वो बोट टकराया नहीं हो रहा था, मैं बोल रहा था, तुमको बाजू को हो जाओ। फिर भी बाजू को नहीं हो रहा था। फिर बाद में ख़ुद ही बाजू को हो गया, अरे चिल्ला नहीं सकता, कौन है यह बात थी सुन रहा है। और तभी उसने देखा, कि वो बोट ख़ाली थी। वो बोट में कोई था ही नहीं, वो नदी के प्रवाह के कारण हिल रही थी। तो कई बार क्या होता है, हमारे जीवन में दुख ऐसे ही आ जाते हैं, पर हम किसी को दोष देने के लिए ढूँढते हैं, कि ये दुख किसके कारण आ गया, उसके कारण आ गया। तो क्या होता है, जब दुख आते हैं, तो हमारा स्वभाव होता है, कि तुरंत वो दुख के लिए, मुझे आई नीड विलेन। कोई विलन है, उसके कारण दुख आया है। तो इसको कई बार क्या होता है, पॉलिटिक्स में स्केप गोटिंग होता है। स्केप गोटिंग मतलब किसी को प्रभुपाद बोलते हैं, किसी को बुरे कुत्ते को बुरा नाम दे दो, फिर उसको मार डालो। तो जब लोग होते हैं, हम सबके जीवन में दुख आता है, पर जब तक ये भाव रहता है, कि मुझे कोई विलन ढूँढना है, हमारे जीवन में, तो हम हीरो को कभी नहीं खोज पाएंगे। तो जो भगवान है, वो परम गुणवान है, वो परम हीरो है। तो जब तक हम हमारे जीवन के दुख के लिए कोई विलन देख रहे हैं, तो वही हमारे चेतना रहेगी। अरे इसके कारण मुझे दुख हो रहा है, इसके कारण मुझे दुख हो रहा है, इसके कारण मुझे दुख हो रहा है। तो जो अपैशुनम् है, वो उसको दैवी प्रकृति बोला गया है, क्योंकि जब तक हम दोष देख रहे हैं, दुखों के कारण के लिए किसी को जिम्मेदार देख रहे हैं, तब तक हम क्या है, हमारे जीवन का, हमारे जीवन की सारी कहानियां है, वो विलेन के आधार, अरे इसने ऐसे किया, इसने ऐसे किया, इसके लिए मैं ऐसे करूँगा, इसके लिए मैं ऐसे करूँगा, इसको मैं कुछ क्यों नहीं कर सकता, तो अपैशुनम्, यह दैवी प्रकृति का बड़ा महत्वपूर्ण लक्षण है, तो इस तरह से, यह दैवी प्रकृति के कई गुण भगवान बताते हैं, पर, यह इसमें महत्वपूर्ण चीज़ें होती हैं, भवन्ति संपदं दैवीम्, अभिजातस्य भारत, अभिजातस्य भारत, क्या ये आत्मा का लक्षण है? अगर जन्म से है, अगर कोई कोई बहुत शांत प्रवृत्ति का है, कोई बहुत क्रोधी प्रवृत्ति का है, और जन्म से ही वैसा है वो, तो क्या मतलब वो आत्मा का लक्षण है वो? नहीं, किसका लक्षण है वो? पर शरीर तो अभी जन्म बहुत है उसका, किस का लक्षण है वो? हाँ मन का लक्षण है वो, क्या है? कि जो आत्मा है यह हमेशा शुद्ध रहता है, अब जब हमारे जन्म होता है, मान लीजिए पिछला जन्म है, पिछले जन्म में शरीर है, मन और आत्मा है। तो बॉडी, माइंड और सोल। ये तीन चीज़े हैं। तो अभी जब मृत्यु होती है, तो मृत्यु के समय जो शरीर है वो नीचे गिर जाता है। यो शरीर है वो नीचे गिर जाता है और फिर मन और आत्मा जो है ये दोनों बाहर निकलते हैं और फिर जो मन और आत्मा है वो किसी नए शरीर जाते हैं या जो है न्यू बॉडी तो जब हम नए शरीर में जाते हैं तो आत्मा के साथ मन भी जाता है। और मन जो होता है, ये मन पे अलग-अलग प्रकार के इम्प्रेशंस होते हैं, उस पे अलग-अलग प्रकार के संस्कार होते हैं। तो कुछ संस्कार होते हैं, वो अच्छे होते हैं, कुछ बुरे होते हैं। तो सब लोगों में अच्छे बुरे संस्कार होते हैं पर कुछ लोगों में यह संस्कार होते हैं ज़्यादा बुरे हो सकते हैं कुछ लोगों में ज़्यादा अच्छे हो सकते हैं सब बच्चे जो छोटे होते हैं तो रोते हैं पर कुछ बच्चे ऐसे रोते हैं कि अगर उनको ध्यान नहीं दिया था अच्छे लगते हैं सारे घर को नीचे गिरा देंगे अभी वो तो क्या होता है उनमें शायद क्रोध थोड़ा ज़्यादा है तो अभी जो दैवी और आसुरी प्रकृति जो पहले जन्म से आ रही है मतलब क्या है हम सबके मन में उस प्रकार के कंडीशंस हैं उस प्रकार के छवियाँ हैं संस्कार हैं उसमें तो अभी भगवान बोलते है कि दो प्रकार जो है अभिजातस्य है पर उसके बाद में एक तरह से तीन श्लोकों में ही वो दैवी प्रकृति के बारे में वर्णन जो है अंत करते हैं और फिर जो आसुरी प्रवृत्ति है उसका वर्णन करते हैं। दम्भो दर्पोऽभिमानश्च क्रोधः पारुश्यमेव च अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ संपदमासुरीम् यह दम्भो दर्प और अभिमान है यह वास्तव में तीनों अहंकार के अलग-अलग प्रकार लक्षण हैं तो कैसे होता है कि पीपल हू डोंट रिस्पेक्ट देमसेल्वेस बिकम मोस्ट एजीटेटेड व्हेन अदर्स डोंट रिस्पेक्ट देम जिसमें खुद को आदर नहीं है, खुद का स्वाभिमान नहीं है, खुद के प्रति आदर नहीं है, अगर दूसरा कोई अनादर करता है तो उसको बहुत गुस्सा आ जाता है क्यों क्या है कि अंदर से कुछ आदर नहीं है जो इसको खुद का सिक्योर है, मैं कार्य कर रहा हूँ सही कर रहा हूँ, तो क्या होता है? दूसरे लोग निंदा भी करते हैं, तो ठीक है बहुत बाजी कहते है कि द डॉग मे बार्क, बट द कारवां रोल्स ऑन कि जो कुत्ते भोंकते रहते हैं, पर जो राजा का रथ है, वो आगे चलते रहता है, कुत्ते के भौंकने से रुकता नहीं है, तो जो आसुरी प्रवृत्ति के लोग होते हैं, उनमें ये जो गुण होते हैं, दंभ, दर्प और अभिमान, ये काफ़ी है, फिर क्रोध पारुश्यमेव च, एक या व्याख्या एक यज्ञ पवित्रता है, और क्रोध के लिए उंडेान है व्यक्ति में, जीवन का उद्देश्य क्या है, कैसे जीवन जीना है जिसके बारे में कोई ज़्यादा वर्णन है ही नहीं, तो अभी तुरंत अर्जुन के मन में विचार आता है, अर्जुन सब सुन रहा है, तो अभी मैं युद्ध कर रहा हूँ। सच्चे क्या है? दैवी संपद होंगे तो आप मोक्ष के ओर जाओगे, मुक्ति के ओर जाओगे, और आसुरी प्रवृत्ति होगी तो क्या होगा? निबंध, आप बंधन में फ़स जाओगे, माशुचः संपदं दैवीम् माशुचः संपदम् दैवीम् माशुचः दैवीम् माशुचः अपने कहा आता है ये? गीता के अंत में आता है सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः मा शुचः अर्जुन तुम शोक मत करो तुम भय मत करो तुम संशय मत करो तुम चिंता मत करो तो मा शुचः संपदम् दैवीम् अर्जुन तुम्हारी संपदा जो है तुम्हारी जो स्वभाव प्रकृति है अभिजातोऽसि पाण्डव यह तो सिपात्री करो तो सिपात्री करो अर्जुन तुम्हारा स्वभाव है वर्टियन तुम्हारा जो स्वभाव है वो दैवी स्वभाव है वो दैवी स्वभाव है अभी दैवी तो ऐसे नहीं है कि तुम्हारी, तो ऐसी नहीं है कि जो दैवी स्वभाव है वो कभी युद्ध नहीं करेगा वो कभी युद्ध नहीं करेगा शायद युद्ध करना पड़ सकता है कर्तव्य के लिए कोई संरक्षण के लिए युद्ध करना पड़ सकता है तो स्वार्थ के लिए युद्ध कर रहा है या संरक्षण के लिए युद्ध कर रहा है तो उससे बहुत फ़रक होता है। अभी अगले श्लोक में भगवान बोलते है कि ये दो प्रकार के गुण प्रवृत्तियाँ होती है दैवो विस्तरशः प्रोक्तो दैवो के बारे में मैंने विस्तार से बोला हुआ हुआ है तो कोई बोले विस्तार से कहाँ बोला है तो दैवो के बारे में बहुत कुछ बताया हुआ है तो इसलिए बोलते है मैं आसुरी प्रवृत्तियों के बारे में भी तुमको बताऊँगा तो अभी जब कोई मूवी देखने जाता है तो अभी कई मूवी ऐसे होते है क्या कंटेंट अच्छा नहीं होता है तो जब मूवी फ़्लॉप की होते हैं क्योंकि उनका जो मोह होता है वो अच्छा नहीं होता है तो इल्यूजन इज़ नॉट गुड इनवज्ञा तो बोले कौन सा कॉलेज है बोले इसका नाम है अमेरिकन इंस्टीट्यूट ऑफ़ इल्यूजन कि क्या है कि अमेरिका का मोह का इंस्टिट्यूट तो उसका मतलब क्या था वहाँ पे वो लोगों का मूवीज़ कैसे बनाना है मोह कैसे निर्माण करना है वो सिखाते तो इसलिए वहाँ से बहुत प्रकार के मोह आते हैं ऐसे सत्य नहीं है वहाँ पे भी बहुत कुछ संस्कृति वग़ैरह है पर एक तरह से है बहुत एकाद हैं वहाँ पे ज़्यादा पर तो अभी क्या है कि जब हम कोई मूवी देखते हैं साधारणतया हम उसके हीरो के साथ आइडेंटिफ़ाई करते हैं या हीरोइन के साथ आइडेंटिफ़ाई करते हैं पर अभी जो विलन होता है उसको हम बुरा मानते हैं और विलन जब पीटा जाता है उसको मारा जाता है तो उसके लोगों को आनंद होता है तो एक है कि विलन को बुरा मानना वो अच्छा है पर कभी कभी जो विलन को बुरा मान लेते हैं तो फिर क्या है वो विलन की मानसिकता है यह विलन विलन क्यों बना क्या पहले से ऐसा ही है कि कुछ परसे से बना है तो जो विलन के बारे में थोड़ा विचार करते हैं तो क्या होता है कि हमें थोड़ा समझ में आता है कि शायद ऐसी वृत्ति मुझ में भी हो सकती है उस डिग्री तक उस हद तक नहीं होगी पर वृत्ति मुझ में भी है तो बेसिकली जब हम लोगों को देखते हैं तो लोगों का चरित्र कैसे दिखता है उनके एक्शन से दिखता है व्यक्ति किस प्रकार कार्य… व्यक्ति का चरित्र क्या है वो हम आसानी से देख सकते हैं हम सबसे पहले क्या देखते हैं व्यक्ति का अगर मैं यहाँ पे हूँ किसी और व्यक्ति को देख रहा हूँ तो मैं सबसे पहले उसके एक्शन से देखता हूँ और फिर एक्शन से के बाद मैं उनका मोटिवेशन देखता हूँ और फिर साधारणतया किस हद तक हमको व्यक्ति का मोटिवेशन पता है और जितना तक करने का कारण क्या है विचार धारा क्या है वो समझ में आता है तो फिर अच्छा यह ऐसे विचार करता है तो ऐसे विचार करना रखता है तो अच्छा व्यक्ति है कोई बुरा कार्य किया हो सकता है पर उसने सही इरादे से किया हो सकता है कभी कभी सही उद्देश्य से किया हो सकता है पर कई अच्छा कार्य भी करता है पर उसका उद्देश्य बुरा हो सकता है तो अभी भगवान जो आसुरी प्रवृत्ति के लोग हैं उनके लक्षण बताते हैं तो उसके कई लक्षण बताते हैं पर हम उनमें से कुछ लक्षणों पर ज़ोर देंगे कुछ हम देखेंगे इसके बारे में। तो सबसे पहले बताते हैं वो प्रवृत्तिम्च निवृत्तिम्च तो प्रवृत्ति निवृत्ति मतलब क्या कार्य करना है क्या कार्य नहीं करना है जनान विदुरासुरः तो जो आसुरी प्रवृत्ति के लोग हैं वो क्या करना है क्या नहीं करना है इसके बारे में उसकी परवाह नहीं करते हैं जो ऐसी इच्छा होगी जो करना है वो कर लेते हैं तो अभी क्या होता है कि हर समाज में कुछ प्रकार का स्टैंडर्ड होता है बिहेवियर का उसको कल्चर कह सकते हैं उसको नॉर्म्स कह सकते हैं जो भी नाम लेंगे कि कुछ अपेक्षा होती है कहीं अगर हम जाते हैं तो किस प्रकार का हम व्यवहार करने वाले हैं वहाँ पे तो अगर कोई ऑफ़िस में जाता है तो ऑफ़िस में अगर जा रहा है तो थोड़ा फ़ॉर्मल ड्रेस पहन के जाता है अगर कोई ऑफ़िस में शॉट्स पहन के जाता है तो फिर उसका ऑफ़िस में जो नौकरी होगा वो भी शॉर्ट रहेगा अभी कुछ कुछ ऑफ़िस में थोड़ा इनफ़ॉर्मल होता है पर साधारणतया कैसे होता है कि हर जगह पे एक कुछ अपेक्षा होती है तो जो व्यक्ति है मुझे जहाँ पे हूँ वहाँ पे कैसे कार्य कर रहा है और कैसा कार्य नहीं करना है यहाँ समझना बहुत महत्वपूर्ण है। तो अभी आप सब यहाँ पे बैठ के एक प्रोशन सुन रहे हैं अभी थोड़ा क्राउड है आप सब पास-पास बैठे हुए हैं तो अभी आप सबको पूरा आत्मविश्वास है कि आपके बाजू में जो बैठे हुए व्यक्ति है वो अचानक आपको मुड़ के चेहरे में थप्पड़ नहीं मारने वाला है क्या आपके बाजू में व्यक्ति मार सकता है आपको थप्पड़? नहीं मार सकता है? अभी कोई कर सकता है, संभावना कुछ भी हो सकता है, इंग्लिश में तो यह नहीं होता है, पॉसिबिलिटी और प्रॉबेबिलिटी, कुछ कर सकता है, पर कोई अगर इस प्रकार के सत्संग के लिए आया है, कोई भगवद्गीता जानना चाहता है, तो हमारी अपेक्षा होती है, कि प्रवृत्ति और निवृत्ति से विदुर होना चाहिए। वे पता होना चाहिए जा क्या कार्य करना है। नहीं कार्य करना है। पर जो परवाह नहीं करते हैं, जहाँ पे है, एक हर जगह अपेक्षा होती है, उस जगह में किस प्रकार का कार्य करना है, उसकी अपेक्षा होती है कोई रास्ते पे अगर ड्राइव कर रहा है, तो ट्रैफ़िक के नियम को पालन करना ये अपेक्षा बोलती है। अगर वो पालन नहीं करता है तो क्या है, वो खुद को ख़तरे में डालेगा, दूसरों को ख़तरे में डालेगा। तो जो प्रवृत्ति और निवृत्ति रहा है वो समझना क्या करना है, क्या नहीं करना है। ये वास्तव में कोई धरती देवी का लक्षण है। अभी क्यों वो परवाह करता है यदि आसुरी प्रवृत्ति के लोग हैं हम कुछ सुप्मिकतका वालांस से देखते हैं। हम जो है हम शायद एक घर में होते हैं, एक परिवार में होते हैं, किसी परिवार में होते हैं, किसी राष्ट्र में होते हैं, किसी कॉम्प्लेक्स में होते हैं, किसी ऑफ़िस में होते हैं तो ऐसे अनेक किसी दायरे में हम अतिथि होते हैं मुझे किसी साहतों में होंगे हर बात आरड्रिवन हेल्पलेस किस वजह से हमारे विचारों से सिर्फ़स होते हैं अगर हम किसी ट्रेन, प्लेन में जा रहे हैं, तो अगर प्लेन में जा रहे हैं, तो अगर वो बोलते हैं कि अब आपको सीट बेल्ट लगाना है, तो वो सीट बेल्ट हमको लगाना है, अगर नहीं लगाएंगे, तो क्या होगा, तो उपद्रव हो जाएगा, अगर वहाँ पर सीट बेल्ट नहीं लगाएंगे, तो बाद में बाहर आने के बाद कुछ और बेल्ट लग जाएगा हमको, कोई हैंडकफ़्स लग जाएंगे, अरेस्ट भी हो सकता है व्यक्ति, कि आप यहाँ क्या कर रहे हैं, आप डिसरप्ट कर रहे हैं, तो हर जगह जहाँ पे होते हैं, वहाँ पे उचित व्यवहार होता है, और अगर उचित व्यवहार नहीं कर रहा है, तो वह नहीं कर रहा है, तो क्यों है, क्योंकि वह बहुत सेल्फ सेंटर्ड है, मुझे मैं कहाँ हूँ उसकी परवाह नहीं है, तो आसुरी प्रवृत्ति का एक लक्षण होता है कि वह बहुत सेल्फ सेंटर्ड है, ऐसे लोग होते हैं, वह सब अलग-अलग प्रकार के डॉक्टर होते हैं, कुछ डॉक्टर होते हैं, वह हार्ट स्पेशलिस्ट होते हैं, कुछ एंटी थ्रोट स्पेशलिस्ट होते हैं, तो कुछ आई स्पेशलिस्ट होते हैं, तो जो आसुरी प्रवृत्ति के लोग होते हैं, वह भी आई स्पेशलिस्ट होते हैं, पर वह कुछ आई स्पेशलिस्ट है, वह आई स्पेशलिस्ट नहीं है, वह आई स्पेशलिस्ट है, तो वह मुझे जो चाहिए, वही मैं करूँगा, दूसरे किसी के परवाह नहीं करूँगा, जो आसुरी प्रवृत्ति होती है, उसको, उसके आजकल के साइकोलॉजी की टर्मिनोलॉजी में, भाषा में उसको एक पूरा स्पेक्ट्रम होता है, कुछ होता है, एक नार्सिसिज़्म, और उसके दूसरा एक स्ट्रिम होता है, सोशियोपैथी, नार्सिसिज़्म मतलब क्या है, उसको केवल खुद की परवाह है, और किसी की परवाह नहीं है, पर जो सोशियोपैथ होता है, जो साइकोपैथ होता है, उसको, दूसरों को दुख देने में आनंद आता है, कुछ लोग होते हैं, खुद की परवाह है, दूसरों को सुख हो, दुख हो, फ़र्क नहीं पड़ता है, अगर कुछ थोड़ा कम खाना बचा हुआ है, और दो व्यक्ति खाने वाले हैं, जो नार्सिसिस्ट होगा, वो खुद ही खा लेगा, किसी और के लिए है, उसको विचार भी नहीं आएगा उसके मन में, पर कोई साइकोपैथ होगा, उसका पेट भर गया है, अच्छा वो आने वाले उसने खाया नहीं है, तो उसको खाना नहीं मिले, इसलिए मैं और खा लूँगा, वो क्या है, दूसरों को दुख देने में आनंद लेता है, तो ये दोनों हैं, ये आसुरी प्रवृत्ति हैं, पर इसमें से कौन से ज़्यादा आसुरी हैं, तो सोशियोपैथी जो है, तो सोशियोपैथ ये साइकोपैथ जो है, वो क्या है, वो और ज़्यादा है, एक है दूसरों की परवाह न करना, पर दूसरों को दुख देना, वो और ज़्यादा है, तो जनान विदुरासुरः। तो अभी ऐसा व्यक्ति क्यों करता है, तो प्रवृत्तिम्च निवृत्तिम्च, क्यों करता है से, भगवान बोलते हैं, अगले श्लोक पे, अगर कार्य है, तो एक्शन है, उसके लिए मोटिवेशन है, तो उसकी विचारधारा क्या है, असत्यम अप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम्। तो क्या बोलता है, इस जगत में कोई ईश्वर नहीं है, इस जगत में कोई परमसत्य नहीं है, इस जगत की कोई प्रतिष्ठा, इसकायों कोई आधार नहीं है, तो क्योंकि मेरे ऊपर कोई नहीं है अगर कोई है ऊपर तो मुझे सिर्फ शक्तिशाली बनना इसे बताया था कि भगवान का भय यह बुद्धि की शुरुआत है। और अगर किसी को भगवान का भय नहीं है, तो हमें ऐसे व्यक्ति का भय होना चाहिए। यह क्या है उस व्यक्ति के बर्ताव में कुछ सीमाएँ नहीं होंगी। सीमाओं की कुछ ज़रूरत नहीं है उसको उसको गिरते तो क्या एक्सप्लॉइट है मैं जो कर सकता हूँ, करूँगा और जितना करना चाहूँगा वो करूँगा तो यह जो है आसुरी प्रवृत्ति के एक कारियाँ है और उसके पीछे एक विचार धारा है। विचारधारा क्या है? कि असत्यम प्रतिष्ठन्ते। तो विश्व में अभी नास्तिक वाद फैल रहा है। जब नास्तिक वाद जो फैल रहा है, मैं ऑस्ट्रेलिया में गया था, तो वहाँ पे उन्होंने एक इंटर फ़ेथ डिबेट था। अलग और धर्म के प्रतिनिधि आये थे। और वह डिबेट कर रहे थे। डिबेट नहीं था। पर वह टॉपिक क्या था? बड़ा दिलचस्प टॉपिक था। वह टॉपिक था, वाई हैस गॉड नॉट डेड टिल नाउ। भगवान मर क्यों नहीं गए? भगवान मर क्यों नहीं गए? तो बहुत क्या टॉपिक है। तो भाव क्या था कि पाश्चात्य देशों में काफ़ी समय से विचार धारा थी कि जैसे विज्ञान की प्रगति होगी तो उससे क्या होगा? लोग समझ जाएँगे कि भगवान को मानना कितना इरेशनल है कितना अनसाइंसिफ़िक है यह वैज्ञानिक है, जैसे वैज्ञानिक प्रगति होगी वैसे जो है नास्तिक वाद स्वाभाविक आ जाएगा तो इसलिए लगभग अठारहवीं सदी के उन्नीसवीं सदी के बीच से ही एटीन फ़िफ़्टीज़ से ही लगभग ऐसे लोग विचारों थे वो प्रचार कर रहे थे कि यह भगवान भी मरने वाले हैं गॉड इज़ डेड का भाव था कि भगवान जो है पर पहले जो कई नास्तिक लोग थे वो रुजो नास्तिक लोग ये थे वो क्या बोलते थे कि जो नास्तिक वाद है यह बुद्धिमान लोगों के लिए वो नास्तिक वाद के बारे में बात करते थे पर उनका पाखंड ऐसे था कि वो बात करते थे नास्तिक वाद के बारे में मीटिंग करते थे कि हमारे कोई सर्वेंट्स से हमारे घर में कोई काम करने वाले है उनको नास्तिक वाद के बारे में सुनना नहीं चाहिए क्यों अगर वो नास्तिक वाद के बारे में सुनेगे तो हमारे घर में सुनना चाहिए वो चोरी करने लग जाएँगे तो उनका भाव क्या था कि आस्तिक वाद है तो लोग नियम पालन करेंगे नास्तिक हो जाएँगे तो नियम पालन नहीं करेंगे तो इसलिए उनका भाव था कि जो धर्म है यह केवल कम बुद्धिमान लोगों के लिए है ताकि वो कुछ नियम पालन कर सके नियम पालन करे इसलिए है पर समाज में हुआ क्या कि धर्म के नास्तिक वाद वास्तव में बढ़ा नहीं है कुछ हद तक बढ़ा है पर जिस हद तक जो धर्म का धर्म का विनाश होगा भगवान के श्रद्धा का विनाश होगा वैसे हुआ नहीं है क्यों नहीं हुआ है? क्योंकि यह जो है यहाँ पर भगवान बताते है कि जब परस्पर सम्भूतम परस्पर सम्भूतम कि मन्यत काम है तुकम कि मन्यत काम है तुकम तो दोनों के जीवन में दुख आने वाला है। यहाँ अनिवार्य है। क्योंकि ये निसर करता है, सब होगा, सब बूढ़े होगा, सबको बीमारी होगा, सबको आध्यात्मिक, आधिदैविक क्लेश है। पर जो आस्तिक है, उसके लिए क्या है? उसके जीवन में कुछ आशा है। क्या आशा है? कि जब दुख है, वो दुख का कुछ उद्देश्य है। कि द पेन हैज़ ए पर्पस। कि मैं जो भी दुख आ रहा है, उसका कोई उद्देश्य है। शायद इस जगत के परे कोई और जगत है, वहाँ पर मैं जाऊँगा, वहाँ पर दुख नहीं है। या इन दुखों से मैं आगे बढूँगा, तो उससे मैं कुछ इंप्रूवमेंट होगा। भगवान मुझे बाद में कुछ सही कार्य करूंगा, तो भगवान मुझे कुछ आशीर्वाद देंगे। तो जो नास्तिक वाद है, वो दुख नहीं निकालता है किसके जीवन से। दुख तो सब कोई रहने वाला है। वो क्या करता है? कि दुख का कुछ अर्थ है, वो निकाल देता है। तो इसलिए ये बहुत निराशावादी है। और ये पाश्चात्य देशों में इतने लोग नास्तिक बनते जाते हैं, उतना उनका डिप्रेशन ज़्यादा हो जाता है, स्ट्रेस ज़्यादा हो जाता है, नकारात्मक भाव ज़्यादा हो जाता है। तो अनेक ऐसे वैज्ञानिकों ने रिसर्च किया है, कि तुलना करने में अगर मैं गैटरी कराई ynabidi hai kitne log dharmik hote hain, उतना उनका मेंटल हेल्थ और अच्छा रहता है। उतना उनका मेंटल हेल्थ और अच्छा रहता है। जो धर्म है एक सादमस से मिलते हैं, मानसल से मिलते हैं एक सादमस से मिलते हैं, कैसे एक वैज्ञानिक था, एक थिंकर था, उसने कहा कार्ल मार्क्स उसने कहा तो कहा तो कि रिलीजन इज़ द ओपियम ऑफ़ द मासेस, की ये एक ऐसे अफ़ू जैसे नशा है ये। तो अभी ये बड़े वैज्ञानिक उसने कहा कि अगर रिलीजन ओपियम है, तो ये ऐसा ओपियम है, जिससे सबका स्वास्थ्य और अच्छा होता है। तो अगर ये मोह है, ये वास्तव में सबके लिए बहुत अच्छा मोह है। तो ये विज्ञान का बहुत सरप्राइज़िंग फ़ाइंडिंग है। पर ये क्यों है, क्योंकि हम सबको जीवन में कुछ अर्थ चाहिए। और नास्तिक वाद से कुछ अर्थ नहीं मिलता है। इसके बाद में जो भगवान आसुरी प्रवृत्ति के लोग के लक्षण बताने लगते हैं। तो जो कार्य किस प्रकार से करते हैं, वो बताने लगते हैं। तो जब वो बताते हैं, तो मान लीजिए ये दो लोग बात कर रहे हैं। तो क्या होता है, वो दोनों लोग कुछ बात कर रहे हैं। वो किसी तीसरी व्यक्ति के बारे में बात कर रहे हैं। और दोनों को पता है किसके बारे में बात कर रहे हैं। पर उसका नाम नहीं लेते वो। कुछ लोग ऐसा सोचते हैं। तो कुछ लोग कौन हैं, दोनों को पता है। पर क्या है, उसका नाम नहीं ले जाता है। तो वैसे ही, अभी अर्जुन सबसे पहले सोचते हैं कि शायद मैं आसुरी प्रवृत्ति का हूँ क्या, मैं युद्ध कर रहा हूँ। भगवान बोलते हैं नहीं, तुम नहीं हो। तो जब भगवान वर्णन करते हैं, आसुरी प्रवृत्ति के लोग कैसा वर्णन होता है, तो यहाँ पर जो श्लोक है, जो ग्यारह और बारह श्लोक है, वो कुछ हद तक वो धृतराष्ट्र का वर्णन कर रहे हैं, और तेरह से पंद्रह श्लोक है, वो दुर्योधन का वर्णन कर रहे हैं। तो अभी देखते हैं किस तरह से वर्णन हो रहा है, तो अभी चिंता सबको होती है जगत में। जगत में बहुत चीज़ें अस्थायी होती हैं, बहुत अनसर्टेन होती हैं, तो सुनिश्चित नहीं होती है, अगर हमको कहीं जाना है, हमको ट्रेन या प्लेन पकड़ना है, और हम ट्रैफ़िक में फ़स गए, तो पहुँच पाएँगे क्या नहीं होती है, उसकी चिंता होती है, यह स्वाभाविक है। पर यह भगवान अच्छी है, चिंतामपरिमेयांच, यह अच्छी चिंता है, उसका अंत नहीं होता है, प्रलयांतामुपाश्रितः, अभी प्रलय का एक अर्थ है मृत्यु, यह मृत्यु तो चिंता रहती है, प्रलय का एक अर्थ क्या है, वो विश्व के संहार का समय होता है, उसका प्रलय कहते हैं, तो यह ऐसे जो लोग होते हैं, आसुरी प्रवृत्ति के, उनकी चिंता, मृत्यु के बाद भी ख़त्म नहीं होती है, अगले जन्म में चलती रहेगी, प्रलयांत, क्यों ऐसे है, कामोपभोगपरमा एतावद इति निश्चिताः वास्तव में पहले जब उसका जन्म हुआ, तो अंधा था तब से, इसके लिए राजा नहीं बन पाया, तो तभी उसके लिए पांडु का जन्म हुआ, पांडु राजा बन गया, तो महाभारत में ऐसे कुछ विशेष वर्णन नहीं है, स्पष्ट रूप से कि तभी धृतराष्ट्र के मन में पांडु के प्रति ईर्ष्या थी, इस पांडु उसका आदर करता था, यह मेरा बड़ा भाई है, उसको भाग्य से एक अच्छी पत्नी भी मिल गई थी, तो गांधारी के साथ वो संतुष्ट था, पर जैसे ही उसको पुत्र हो गया, तो फिर क्या हो, उसकी इच्छा हो गई कि, मैं राजा नहीं बन पाया, पर मेरा पुत्र राजा बनना चाहिए, और उसके बाद में, राज्य मिलेगा, नहीं मिलेगा, राज्य मिलेगा, नहीं मिलेगा, उसके बारे में उसको हमेशा चिंता रहती थी, राज्य मिलेगा, तो रहेगा कि नहीं, रहेगा, तो कब तक रहेगा, छीना जाएगा, तो मेरा क्या होगा, तो यह जो है, यहाँ पे, भगवान बता रहे हैं, कि जो फियर और डिज़ायर है, तो डिज़ायर, यह उसी कॉइन का एक साइड है, डिज़ायर मतलब इच्छा, ख़ास करते है वासना, और वही सिक्का जो है, उसका दूसरा साइड जो है, वो है फ़ियर, तो जितना काम होगा, उतना भय होगा, जितनी किसी की इच्छा होगी, जो चिंतामपरिमेयांच, और वो क्यों है, कामोपभोगपरमा, जितना काम का, काम का उपभोग की इच्छा है, उतनी उस व्यक्ति में चिंता रहेगी, अगर धृतराष्ट्र को जो था, कि मुझे राज चाहिए, तो कब मिलेगा, कैसे मिलेगा, क्या करने से रहेगा मेरे पास, वो क्या कर रहा है, ये क्या कर रहा है, बहुत चिंता रहती है, तो जितना हमारी इच्छाएँ बढ़ती हैं, ख़ास करके भौतिक चीज़ों के लिए इच्छाएँ बढ़ती हैं, उतनी हमारी चिंता बढ़ती है, अभी सबको पैसा कमाना है, वो अर्थ ज़रूर है, धर्म अर्थ काम मोक्ष, वो एक चीज़ है हमारी जीवन में, पर मान लीजिए कोई, बहुत स्टॉक मार्केट में जाता है यार, ऐसे कि लॉन्ग टर्म शेयर नहीं, वो क्या है, अरे यहाँ पर ये शेयर बढ़ गया, ये कम हो गया, ये कम हो गया, ये कम हो गया, तो क्या होता है, जितना उसको पैसा कमाने का जो नशा है, रहेगा, तो उसका उतना स्ट्रेस बढ़ जाएगी, उतना चिंता बढ़ जाएगी, तो इतना काम है, उतनी चिंता रहेगी, तो अभी, जो आसुरी प्रवृत्ति के लोग होते हैं, उनको लगता है कि उनके जीवन में काम के अलावा और क्या काम हो सकता है, जो काम वासना है, वही जीवन का लक्षण है, तो क्या होता है, जितना काम ज़्यादा होता है, जितना संस्कृत काम ज़्यादा हो जाता है, काम वासना बढ़ जाती है, तो शांति चली जाती है, तो अभी, अभी हम कह सकते हैं कि जो चिंता है, एक तरह से इनसिक्योरिटी है, या डेंजर है, ख़तरा है, यह बहुत एक जीवन में हमेशा से होता है, हमेशा से रहा है, अभी, अभी कोई साल पहले जाएँगे, हज़ार साल पहले जाएँगे, वहाँ पे भी ख़तरे हुआ करते थे, वहाँ पे कोई शेर आके आपको मार डालेगा, कोई, कोई आक्रमण करने वाला, राजा आ जाएगा और आक्रमण करेगा, वो ख़तरे हमेशा हुआ करते थे, पर, पाश्चात्य पूर्वों के समय में, लोगों को पैनिक अटैक आ रहा है, लोगों को स्ट्रेस के कारण ब्रेकडाउन हो रहा है, उनको एंग्ज़ायटी के कारण, वो कुछ काम नहीं कर पा रहे हैं, ऐसे इसका कोई ज़्यादा वर्णन नहीं है, तो अभी कोई, कोई युद्ध में जाता है, अमेरिका में, जो लोग युद्ध में जाते हैं, जो आ जाते हैं, तो वो वेटरन्स को, कोई पीटीएसडी होता है, कोई ट्रॉमा होता है, तो अभी पहले युद्ध में लोग जाते हैं, ऐसे कोई ज़्यादा वर्णन नहीं है उसका, क्योंकि क्या है, कि उस समय थोड़ा, अध्यात्म के बारे में ज़्यादा ज्ञान था, तो अगर हमारे जीवन में काम ही सबसे बड़ी चीज़ है, काम ही जीवन का काम है, तो वो कभी भी काम तमाम हो सकता है, तो क्या होता है, उसके कारण चिंता बहुत बढ़ जाती है, तो विदुर धृतराष्ट्र कहते हैं, तुम राज्य के लिए इतनी कामवासना कर रहे हो, पर उस राज्य ने तुमको कब सुख दिया है, तो वो तीन दशा बोलते हैं, कि यो राज्य है, वो राज्य ने तुमको कब सुख दिया है, तो जब डिंट हैव, जब तुम्हारे पास नहीं था, तो उसके कारण कहता है, क्रेनिंग था, तृष्णा थी, कि कब मिलेगा, कब मिलेगा, कब मिलेगा, और जब तृष्णा होती है, वो बड़ी बेचैन रखती है व्यक्ति को। और जब हैव, जब था, तो क्या था? तभी भय था। राज्य तो मिल गया है, जब पांडवों को वनवास में भेज दिया था उसने, तो उसको हमेशा भय लगा जाता था, वो पांडवों में व्रत लिया है, वे दुर्योधन का क्या होने वाला है अभी, क्या दुर्योधन संभल पाएगा। और फिर जब लॉस्ट, जब चला गया, तो तभी क्या था? तभी लैमेंटेशन था, चला गया। तो वो पूछे, तुम्हें कब सुख मिला? सुख मिला कभी? नहीं मिला। वैसे लगता है सुख मिलने वाला है, पर कभी सुख मिलता नहीं है। तो इसका मतलब ये नहीं है, कि किसी को धन कामना ही नहीं करनी है। दो चीज़ें बहुत अलग हैं इसमें, कि एक है पैसा और पैसा यह अर्थ है। यह स्वभाव है कि ज़रूरी है। पर कामोपभोगपरमा, उसमें क्या होता है? पैसा जो अर्था नहीं रहता है, वो उसका परमार्थ बन जाता है। जीवन का एक उद्देश्य है पैसा। पर जीवन का इकलौता उद्देश्य जब पैसा बन जाता है, तो जब पैसा इसका परमार्थ बन जाता है, तो वो एक अनर्थ बन जाता है। जब किसी अर्थ को हम परमार्थ मान लेते हैं, तो वो अनर्थ बन जाता है। तो अभी जो दुर्योधन था वो एक तरह से पैसिव विलन था, वो बहुत चिंता करने के लिए था। पर अभी जो दुर्योधन था वो उससे भी बड़ा था। उससे क्या भाव था? यहाँ पे भगवान बताते है, कामोपभोगपरम अन्यैनार्थसंचयान्। अन्याय मतलब क्या है? कि वो अनैतिक कार्य करेगा, बुरे कार्य करेगा। कौन? अर्थसंचयान्। धृतराष्ट्र जो कल्पना करता था, वो दुर्योधन कार्य करने लगता है। तो अभी यहाँ पे हम देखते हैं, क्या विचार है? इदम अद्य मया लब्धं इमं प्राप्स्ये मनोरथम्। इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनरधनम्। तो यहाँ पे बताया है कि मैंने इतना पैसा प्राप्त कर लिया है इदम अद्य मया लब्धं यह मैं बाद में प्राप्त करूँगा तो बहुत पैसे का सपने देख रहा है सब देखते हैं ऐसे क्या यह आसुरी प्रवृत्ति हो गई है? इन तरह से कह सकते हैं, पर यह जो है भगवान इसके बारे में बोल रहे हैं पहले पैसे के बारे में सपने देखना वो एक चीज़ है पर वो सपने देखने के लिए उसके बाद में क्या करता है व्यक्ति? तो हर सब माता-पिता चाहते हैं कि मेरा बच्चा पढ़ाई में अच्छा है पहला में पहला आए तो अगर वो बच्चा बिल्कुल पास होने में बहुत संघर्ष करता है और एक दिन घर में आता है बोलता है मम्मी-डैडी मैं पहला आ गया हूँ क्लास में बहुत अच्छा कैसे तुम्हारे पहला? क्या किया तुमने? कि तुम्हारे इतनी इच्छा थी कि मैं पहला आ गया हूँ तो मैंने क्या किया? मैंने टीचर के घर में चोरी करके क्वेश्चन पेपर पहले चुरा लिया और फिर पहले से सारे आंसर लर्न करते थे पहला आ गया मैं तो भी हम बोलेंगे कि इस तरह से पहला आना जो है वो वास्तव में पहले हम सोचते हैं कि तुम कैसे व्यक्ति हो कि तुम ऐसा करने से सुखी हो रहे हैं ऐसे करने से गर्व कर रहे हो तुम और तुम कैसे सोचते हो कि मैं किस प्रकार का व्यक्ति हूँ कि इससे मैं सुखी हो जाऊँगा तो एक है इच्छा होना कोई भी इच्छा होना पर वो इच्छा के लिए जो सीमाएँ हैं वो जब व्यक्ति कौन सीमाएँ है जो है? एथिकल बॉउंड्रीज़ है लीगल बॉउंड्रीज़ है वो सीमाओं का उल्लंघन जब करने लगता है असौ मया हतः शत्रुर्रहं हनिष्ये चापरानपि। ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवानसुखी। तो अभी यहाँ पे क्या है पैसा चाहना यह एक चीज़ है पर पैसे के लिए किसी की जान ले लेना यह जो है बहुत ही घातक है और न केवल जान ले रहा है, एक की जान ले लिया है उसके बाद दूसरों की जान लेने की योजना भी बना रहा है और न केवल योजना बना रहा है, उसे बड़ा आनंद ले रहा है, देखो मैं कितना बलवान हूँ, मैं कितना सिद्ध हूँ, मैं कितना सुखी हूँ तो एक है ग्रीडी, पर दूसरा है मर्डरस तो पैसा चाहना, यह एक चीज़ है, पर पैसे जब चाहता है, तो अभी मैंने इसको मार दिया, मैंने उसको मार दिया, मैं उसको भी मार डालूँगा, यह क्या था, यह दुर्योधन का सपना था और जो इस प्रकार की वृत्ति है, तो जो आसुरी प्रवृत्ति क्या है, दैवी और आसुरी, दोनों जो प्रवृत्ति के लोग होते हैं, उनके इच्छाएँ होती हैं अभी देवता भी स्वर्ग में भोग करते हैं, उनका ऐश्वर्य होता है, वहाँ पे धनसंपत्ति होती है, वहाँ पे भी अप्सराएँ होती हैं, पर जो है, देवता जो कार्य करते हैं, वो धर्म की सीमा के में कार्य करते हैं, जो असुर होते हैं, वो सीमाओं के परे जाते हैं, सीमा की परवाह नहीं करते हैं, तो क्या है? कि डिज़ायर जो है, वह बीबी में होता है, देवी हो या आसुरी हो, दोनों में यह इच्छा इसके अंदर रहती है। यहाँ तक जाएगा पर इसके परे नहीं जाएगी। पर यह जो इच्छा है, उसके बहुत परे जाती है। धर्म के नियमों का उल्लंघन करने में उसको कोई हिचकिचाहट भी नहीं होती है। जब रावण को पता चला कि सीता विवाहित है तो उसके लिए वो सीता विवाहित है यह केवल एक इनकन्वीनियंस था। ठीक है, राम को बाजू करना चाहिए ताकि मैं सीता का अपहरण कर सकूँ। तो अगर पुरुष-स्त्री में आकर्षण है वो स्वाभाविक हो सकता है। पर अगर कोई व्यक्ति पहले विवाह हो गया है तो हाँ, मुझे में आकर्षण है पर किसी आकर्षण के लिए मैं किसी का घर तोड़ नहीं हूँ किसी का आकर्षण के कारण मैं किसी पे ज़बर्दस्ती नहीं करने वाला हूँ तो वो क्या है? इच्छा होना ये आसुरी प्रवृत्ति का लक्षण नहीं है। पर इच्छाओं की इतनी परवाह करना कि जो साधारण नीति, धर्म, कानून की सीमाएँ हैं, उसकी परवाह न करना। ये जो है वहाँ आसुरी प्रवृत्ति का लक्षण है। मैं बोला आई स्पेशलिस्ट। आई स्पेशलिस्ट मतलब क्या? कि मैं और मेरी इच्छाएँ, मेरी जो इच्छाएँ हैं, वही सबसे महत्वपूर्ण हैं। और समाज की सीमा है, उसकी कोई परवाह ही नहीं है। तो ये जो है, ये आसुरी प्रवृत्ति का लक्षण है। और जो आसुरी प्रवृत्ति के लोग होते हैं, कुछ लोग होते हैं वो आसुरी होते हैं, पर और वो अपना आसुरी का जो भाव है, वो दिखाने में आनंद लेते हैं। कुछ ऐसे होते हैं, गुंडे होते हैं, गुंडे जैसे उनका वेश भी होता है, वो दिखने में ख़तरनाक दिखते हैं। पर कुछ ऐसे होते हैं, उनका प्रवृत्ति आसुरी होता है, पर वो दिखाना है जैसे कि मैं आसुरी हूँ। तो ऐसे जो आसुरी प्रवृत्ति के लोग होते हैं, वो सबसे ख़तरनाक होते हैं। तो वो कहते हैं, आढ्योऽभिजनवानस्मी। तो जो आसुरी प्रवृत्ति के लोग होते हैं, वो कोई गैंगस्टर है, कोई अंडरवर्ल्ड डॉन है, तो उसको सब भयकर, उससे डरते हैं सब कुछ। तो उसको लगता है कि मुझे आदर चाहिए। भाई से थोड़ा आदर मिलता है, पर क्या, उससे संतुष्ट चाहिए। तो क्या होता है, फिर ऐसे लोग होते हैं, वो किसी हॉलीवुड के स्टार्स से संबंध जोड़ते हैं, या फिर क्या होता है, जो कोई बड़े-बड़े सेलिब्रिटीज़ होते हैं, मेरे जैसे कौन है, और फिर क्या करते हैं, यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्ये, तो मैं अभी यज्ञ करूँगा, मैं दान दूँगा, और उससे मैं आनंद लूँगा, क्या आनंद लूँगा, कि अगर मैं दान दूँगा, मैं यज्ञ करूँगा, तो लोग सोचेंगे कि यह बड़ा अच्छा व्यक्ति है, तो यहाँ पर यह आसुरी प्रवृत्ति का, एक तरह से सबसे आसुरी लक्षण क्या है, कि वो आसुरी गुण रखना, और दैवी आदर की अपेक्षा करना, एक है आसुरी गुण होना, दूसरा है आसुरी गुण को पूरे एक दैवी नकाब में फँसा के रखना, और उससे क्या है, वहाँ आदर प्राप्त करना, रावण जब सीता का अपहरण करने आया, तो उसने कौन सा नकाब लिया था, उसने एक संत का नकाब लिया था, उसने एक सेज का नकाब लिया था, तो यह क्या है, यह असुरत्व की भी पराकाष्ठा, यह बहुत ही नीचे स्तर है इसका, तो कुछ लोग दान भी देते हैं, दुर्योधन ने एक वैष्णव यज्ञ किया, दुर्योधन ने ब्राह्मणों को बहुत दान दिया, उसको विष्णु में बिल्कुल श्रद्धा नहीं थी, विष्णु की परवाह भी नहीं थी, पर क्या था, लोग से देखे, मैं कितना ऐश्वर्यशाली हूँ, मैं कितना दानवीर हूँ, वो दिखाने के लिए वैसे करता था, तो आसुरी प्रवृत्ति का लक्षण क्या है, कि जो इंटरनल और एक्सटर्नल हैं, पूरा अपोजिट हैं, जैसे है, उसका बिल्कुल विपरीत दिखाना, कुछ लोग होते हैं, वो बाहर से दिखाते हैं, कि मैं तभी बहुत परवाह करता हूँ, पर बाद में वो स्टैप कर देते हैं, चाक़ू मार देते हैं, विश्वासघात कर देते हैं, तो यहाँ कि एक दिखाना और बिल्कुल उल्टा करना जो है, यह बहुत ही आसुरी प्रवृत्ति है, तो अभी इसके बारे में आगे वर्णन करते रहते हैं, तो सारे श्लोकों में नहीं जाएँगे, पर एक चीज़ बोलते हैं भगवान, अनेकचित्तविभ्रान्ता, क्या बोलते हैं, अनेकचित्तविभ्रान्ता, अनेकचित्तविभ्रान्ता, तो जो आसुरी प्रवृत्ति का लक्षण क्या है, कि किसी एक चीज़ से व्यक्ति संतुष्ट नहीं होता है, ये एक चीज़ मिल भी गई, तो देश और चीज़ चाहिए, ये चाहिए, वो चाहिए, वो चाहिए, वो चाहिए, तो उसका जो चित्तविभ्रान्त रहता है, वो कभी शांत नहीं सकता है, अब भगवान बोलते हैं, तो कुछ लोग नाम का यज्ञ करते हैं, कुछ लोग नाम के लिए यज्ञ करते हैं, नाम के लिए मतलब, सिर्फ नाम के वास्ते नहीं, नाम ख्याति प्राप्त करने के लिए, तो ये आसुरी प्रवृत्ति के लोग क्या है, यजन्ते नामयज्ञैस्ते, दिखाने के लिए वो यज्ञ करते हैं, और फिर इसको आगे बोलते हैं, इनमें अनेक दुर्गुण हैं, और भगवान कहते हैं, कि ऐसे लोग जो है, वो नरक में जाएँगे, तो ऐसे जो द्वेषी लोग हैं, वो कहते हैं, तो अभी अर्जुन का स्वभाव ऐसे है, कि तुरंत वो भी चाहता है, कि अरे, नरक में तो बहुत दुख है, तो ये नरक में नहीं जाना चाहिए, तो कैसे रोक सकते हैं, तो नरक में अगर नहीं जाना है, तो इसके लिए भगवान बोलते हैं आगे कि नरक के तीन द्वार हैं। त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः अब यहाँ पे बड़ा दिलचस्प है ये नाशनमात्मनः बता रहे हैं कि आत्मा का नाश करते हैं पर भगवान बोलते हैं कि दूसरे अध्याय में बताता है कि अविनाशी तु तद्विद्धि आत्मा का कभी नाश नहीं होता है तो फिर यहाँ पे नाशनमात्मनः कैसे बढ़ा जा रहा है तो इसका मतलब है लिटरली नहीं है कि आत्मा का नाश होने वाला है पर आत्मा की जो आध्यात्मिक प्रवृत्ति है उसका पूरा नाश हो जाता है कुछ लोग ऐसे होते हैं उनको कुछ आत्मा नाम की कोई चीज़ है अध्यात्म नाम की कोई चीज़ है वो उनको समझ में ही नहीं आती है पूरी जो आध्यात्मिक प्रवृत्ति है उसका पूरा विनाश हो जाता है कोई बहुत लोभी व्यक्ति है कोई बहुत कामुक व्यक्ति है वो मंदिर में भी आएगा तो उसको मंदिर में भगवान दिखेंगे पर उसको भगवान में कोई रुचि नहीं हो कि यहाँ पैसा कहाँ मिलेगा तो चोरी कर सकता हूँ क्या मैं यह कर सकता हूँ क्या, वो कर सकता हूँ क्या तो वही भाव रहता है तो जो आत्मा के आत्मा के आध्यात्मिक प्रवृत्ति का विनाश करते हैं वो तीन चीज़ें हैं, क्या है कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत् तो इसलिए ये तीन चीज़ें हैं ये नरक के द्वार हैं, ये आत्मा का विनाश करते हैं इसलिए तो इनको तीनों को त्याग दो तो अब इसके एक तरह से दो अर्थ है कि अगर ये पृथ्वी है और यहाँ पे नीचे नरक है तो कोई व्यक्ति यहाँ पे है तो यहाँ से, ऐसे कभी कोई रस्ता होता है कोई रस्ते में जा रहा है तो कभी रस्ते में खड़ा होता है तो क्या होता है, रस्ते में खड़ा होगा तो व्यक्ति नीचे गिर जाएगा तो क्या है कि मान लीजिए रस्ते में कोई दरवाज़ा है यह दरवाज़ा खुलेगा तो आँखें जाएगा हो तो यह रस्ते में यह जो डोर्स हैं यह हमको खोलने है पर यहाँ पे मान लीजिए कुछ ट्रैप डोर्स हैं ट्रैप डोर्स मतलब क्या कि ज़मीन में कोई दरवाज़ा होते हैं अगर गटर होती है तो गटर का कोई दरवाज़ा होता है नीचे तो वो बंद होता है तो मैनहोल कहते हैं इंग्लिश में उसको खुला रहा तो उसके अंदर गिर जाएगा व्यक्ति तो क्या है? मुझे जीवन के मार्ग में हम चाहते कोई दिशा दीयों पूँलें के ये कोई अच्छा शिक्षण हो जाएगा तो यार उस से शिक्षण गैव पूल्दा अगर कोई अच्छा कॉन्टैक्ट हो जाएगा किसी से, तो उससे कुछ नए दरवाज़े खुलेगे मेरे जीवन में तो हम सब चाहते हैं कि हमारे जीवन में हम दरवाज़े खोलें, ताकि हमारा जीवन अच्छा हो और यह महत्वपूर्ण है, ज़रूर इसके आवश्यकता है, आवश्यकता है इसकी पर जो अभी टेक्नोलॉजी है, तंत्रज्ञान से हम दरवाज़े खोलते हैं पर जितना यह ज़रूरी है कि यह दरवाज़े हम खोलें, उतना ज़रूरी है, या उससे ज़रूरी है कि जो ट्रैप डोर्स हैं, वो बंद करें तो क्या होगा? किसी के पास बहुत धनबली आ जाएगा पर अगर उसमें लोभ है, उसमें क्रोध है तो क्या करेगा वो? उस धन से दूसरों का विनाश करेगा। उस क्रोध के कारण उसका या दूसरों का विनाश कर देगा। जिसे जीवन अच्छा बने, कुछ दरवाज़ा खुलना चाहते हैं। यहाँ पे पैसे डालूँगा, तो पैसे बढ़ जाएँगे, तो मैं पैसों से ये करूँगा, वो करूँगा। वो सब ठीक है, पर उससे ज़्यादा महत्वपूर्ण है कि हम सब में कुछ ऐसी वृत्तियाँ हैं जो आघातक हैं। गुस्सा हो सकता है, लोभ हो सकता है, ईर्ष्या हो सकती है। और ये जो आघातक वृत्तियाँ जो होती है, वो उसका दरवाज़ा अगर हम बंद नहीं कर पाएंगे, तो क्या होगा? हम खुद ही विनाश के ओर चलने जाएँगे। तो एक है कि नरक नाम के दूसरे जगह है, दूसरा जगत है वो। और एक जगत में भी ऐसे नरक नाम के जगह है। पर इस जीवन में भी व्यक्ति नरक जैसे प्रतीत में जा सकता है। मान लीजिए कोई शराबी है। अभी थोड़ा शराब पी रहा है, पर क्या है कि उसके लिए कभी भी शराब छोड़ दूँगा मैं। ऐसा भाव है उसका। एक ब्रिटिश लेखक है वो कहता है कि सिगरेट छोड़ना ये दुनिया की सबसे आसान चीज़ है। मैंने अगर सौ बार छोड़ दिया है उसको। सौ बार छोड़ दिया मतलब क्या। मैंने छोड़ दिया पर उसने थी छोड़ा, उसने पकड़ लिया अभी वापस। तो क्या है, हम सब देख सकते हैं कि हमारे जीवन में कुछ ऐसी आदतें हो सकती हैं, कुछ बर्ताव ऐसे हैं, अगर वो बर्ताव का नियंत्रण नहीं करेंगे, तो क्या है, वो हम किसी खड्डे में गिर सकते हैं। अभी तक कुछ नहीं हुआ है, मैं बोला है, चलता है सब कुछ। कुछ तो क्या है, कभी-कभी ऐसे हो सकता है, कि हाँ वो खड्डे में जब गिरते हैं, वो खड्डे ज़्यादा बड़े नहीं है। कोई शराबी है, वो बोलता है, अभी शराब पीना इतने क्या पाब वो ब्रेक बनाने नहीं जाता है, किसी की हत्या भी हो सकती है। तो क्या है, हम सब में ऐसे आघातक वृत्तियाँ है, और दुर्भाग्यवश ऐसे हो सकता है, कि हम में जो वृत्ति जब ऊपर आ जाएगी, उसी समय बाहर से कुछ समस्या आ जाएगी, अगर वैसे हो जाएगा, तो बड़ा विनाश हो सकता है, तो अगर वैसे नहीं हुआ है, तो इसका मतलब नहीं है कि हमें क्रोध है या लोभ है या काम-वासना है, ज़्यादा समस्या नहीं है, यह समस्या ज़रूर है, पर क्या है, अभी उसका हमारा भाग्य है कि वो किसी बड़े खड्डे में हम नहीं गिरे हैं, पर वो जो खड्डा है, वो दरवाज़ा है, उसको खड्डे के दरवाज़ा को बंद करना, यह हमारी ज़िम्मेदारी है, तो अगर कुछ हो जाता है ऐसे, अगर मान लीजिए कि उसके गुस्सा आता है, और गुस्से को नियंत्रण करने की आदत नहीं है उसकी, ठीक है उसके आदत नहीं है, पर जब गुस्सा आता है, उसी समय उसके सामने कोई बड़ा चाक़ू है, और जब गुस्सा आता है, गुस्से के नियंत्रण करने की आदत नहीं है उसकी समय चाक़ू मिल जाता है, चाक़ू से किसी को मार आता है, तो अभी बड़ा घातक हो जाएगा, तो अगर एस, अभी मौलिक है मैं कभी ऐसे नहीं करने हाँ ज़रूर हम ऐसे नहीं करेंगे, ऐसे हम आशा कर सकते हैं पर क्या है कि हमारे अंदर कोई आसुरी प्रवृत्तियाँ होती हैं और उनका एक तरह से भय जो है वो अच्छा है तो मेरे अंदर कौन सी प्रवृत्तियाँ ऐसी है जो मुझे किसी खड्डे में गिरा सकती है तो अभी खड्डों को बंद करना जो है यह मेरी ज़िम्मेदारी है और जितनी हम आध्यात्मिक प्रगति करते है उससे क्या होता है जो आघातक प्रवृत्तियाँ है उनका विनाश हो जाता है नहीं तो वो हमारा विनाश करते गए तो इसके परे कैसे जाना है इसका एक आख़िरी पॉइंट देख के हम अंत करते हैं कि भगवान बोलते हैं इनसे अगर आप मुक्त हो जाओगे तो फिर तुम आत्म कल्याण कर सकते हैं तुम आत्म साक्षात्कार कर सकते हैं तो आचरत्यात्मनः श्रेयस्ततो याति परां गतिम् और वो बोलते है कि जो आसुरी प्रवृत्ति के लोग होते हैं वो ऐसे जो सीमाएँ हैं उनकी बिल्कुल परवाह नहीं करते हैं यह शास्त्रविधिमुत्सृज्य शास्त्र के नियम हैं उनका बिल्कुल पालन नहीं करते हैं उनकी बिल्कुल परवाह नहीं करते हैं केवल काम के आधार पर वो कार्य करे है क्यों होता है… क्या? राज्य भी था पर राज्य से कुछ संतुष्टि नहीं थी तो अपना प्रॉफिट करती। दूसरों के सुख और दुख पर निर्भर था, कई मुझे सुख मिलेगा कहीं नहीं? तो जीकी जो लोग ग्रीडी होते हैं, जीकी जो ग्रीडी होते हैं, वो हमेशा नीरी होते हैं, कितना भी है, वह कम ही है उनके लिए, कभी भी संतुष्ट रहेंगे। न स सुखं न परां गतिम्। तो इसलिए क्या करना है? भगवान बोलते हैं? आख़िरी श्लोक में तस्माच्छशास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ। शास्त्र पढ़ना है और से कार्य और अकार्य कार्य और अकार्य कैसे है जब पहले बताया था प्रवर्तिम्च निवृत्तिम््च वैसे ही क्या कार्य करना है क्या कार्य नहीं करना है व्यवस्थितौ प्रचित समझना है ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि इयसरी काम यवकेपु शत्र का शत्र समझने के बाद कर्म कर्तुमिहार्हसि कर्म करने के लिए बॉन्ड्स मतलब क्या कि उसकी कोई किसी कोई ज़िम्मेदारी, कोई कोई कमिटमेंट, कोई रिस्पॉन्सिबिलिटी, किसी ऊंची महत्वपूर्ण चीज़ से एक संबंध होना चाहिए और व्यक्ति को बॉउंड्रीज़ होने चाहिए तो शास्त्रों के द्वारा हमें दोनों मिलते हैं। कि क्या नहीं करना है और क्या करना है। तो बॉन्ड्स मतलब मुझे ये करना है। बॉउंड्रीज़ मतलब मुझे ये नहीं करना है। तो अगर किसी में बॉन्ड्स भी नहीं है और बॉउंड्रीज़ भी नहीं है। तो क्या होगा, वो व्यक्ति ऐसे बोलेगा किसी के जीवन में कुछ भी महत्वपूर्ण नहीं है। इफ़ वी डोंट हैव एनीथिंग टु फ़ाइट फ़ॉर, देन वी विल फ़ाइट फ़ॉर एनीथिंग। ऐसे नहीं कि कोई व्यक्ति को कोई चीज़ उसके लिए महत्वपूर्ण नहीं है तो कभी कोई झगड़ा नहीं करेगा। क्या हो गए? कोई छोटी चीज़ भी बड़ी बन जाएगी उसके लिए छोटी-छोटी चीज़ पर झगड़ा कर लेंगे तो अगर बॉन्ड्स भी नहीं है, बॉउंड्रीज़ भी नहीं है तो ये बहुत ही डिस्ट्रक्टिव है ये बहुत घातक है अगर किसी में बॉन्ड्स हैं पर बॉउंड्रीज़ नहीं है, किसी को लगता है कि मुझे ज़िम्मेदार जीवन जीना है, मुझे कोई व्यसन में नहीं फँसना है, पर वो बॉन्ड्स है, मुझे परिवार के देखभाल करनी है, मुझे भक्ति करनी है, पर अगर वो सीमाएँ नहीं रखता है पर क्या है, उसका जो घर है, वो बिल्कुल शराब के दुकान के बाजू है तो क्या, उसकी बॉउंड्री नहीं रहने वाली है? उसको, बार में जब उसका वर्णन इस अध्याय में आता है। ख़ास करके सोलहवें अध्याय के श्लोक है, ग्यारह से अठारह, उसमें आसुरी प्रवृत्ति जो है, बॉन्ड्स हैं पर बॉउंड्रीज़ नहीं हैं। अगर किसी में बॉन्ड्स हैं, किसी को चाहता है कि वो कुछ अच्छा कार्य करे, पर उसमें बॉउंड्रीज़ नहीं हैं, तो फिर क्या होगा, वो व्यक्ति कभी भी फेंका जाएगा, इसका दो सौ सात में वर्णन आता है, तो मान लीजिए कोई अच्छे नाव में है, पर वो चौकन्ना नहीं है कि इससे तूफ़ान आ रहा है, नाव से तूफ़ान से बच सकता है, पर अगर तूफ़ान के बाद चौकन्ना नहीं है तो क्या होगा, कभी भी तूफ़ान आ जाएगा, और नाव से फेंका जाएगा, यह नाव के साथ फेंका जाएगा, तो इसलिए हमको सीमाओं में रखना हमारी जीवन में ज़रूरी है, तो प्रभुपाद जी ने हमको जप करने को बोला है, पर उसके साथ चार नियम भी दिए, जो जप है, वो क्या है, हमारे बॉन्ड्स हैं, और जो चार नियम जो है, वो बॉउंड्रीज़ हैं, अगर केवल बॉउंड्रीज़ हैं, और बॉन्ड्स नहीं हैं, तो क्या होगा, उससे सफोकेशन हो जाएगा, यह नहीं करना है, यह नहीं करना है, क्यों नहीं करना है, वो भाव आ जाएगा, और जो व्यक्ति नहीं करना है, नहीं करना है, बोल देगा, और बाद में वही चीज़ कर देगा, यह दो सौ उनसठ और दो सौ साठ में वर्णन आता है, कि व्यक्ति बड़ा प्रयास कर रहा है, यह तो यह पिकांत है, यह पुरुषस्य विपश्चित है, प्रयास कर रहा है, पर इंद्रियाणि प्रमाथीनी हरन्ति प्रसह्य मनः, तो अगर कोई बॉन्ड्स और बॉउंड्रीज़ दोनों रखता है, तो क्या होगा, उसमें प्रोटेक्शन रहेगा, प्रोटेक्शन ही नहीं रहेगा, उससे उसके ऊपर से प्यूरिफ़िकेशन हो जाएगा, कि वो व्यक्ति सुरक्षित रहेगा, और धीरे से शुद्ध भी हो जाएगा, इसका वर्णन आता है दो सौ इकसठ, दो सौ इकसठ से ख़ास करके, दो सौ पैंसठ तक, भगवान कहते हैं, तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः। संयम्य रखना है, वो बॉउंड्रीज़ सीमाएँ रखनी है, पर उसके साथ-साथ मत्परः, आपको मेरी भक्ति करनी है। तो जो, बॉन्ड्स और बॉउंड्रीज़ दोनों हम रखते हैं, तो हर एक व्यक्ति जो है वो परिवर्तित हो सकता है। तो मतलब क्या है कि जो मैं बता था ट्रैप डोर जो है वो बंद करने हैं हमको। पर हमेशा मुझे अरे यहाँ पर खड़ा है गिर जाऊँगा। उसके भय में नहीं रहना है। खड्डों को बंद करना है पर कहाँ जाना है वो भी देखना है। तो अगर हम यह दोनों रखते हैं शास्त्र मतलब कि सत्संग में रखो और दुस्संग से दूर रहो। तो वो दोनों अगर हम करते हैं, बॉन्ड्स और बॉउंड्रीज़ रखते हैं तो हरेक व्यक्ति ज़रूर जिस भी परिस्थिति में हो उससे वो परिवर्तित हो सकता है। यही शास्त्रों का यही भगवान का आश्वासन है। और यही भगवान का इस सोलहवें अध्याय है उसका निष्कर्ष है। तो सारांश में हमने आज सोलहवें अध्याय के बारे में चर्चा की। तो उसमें चैप्टर १६ का जो ऑवरव्यू देखा। में सबसे पहला पॉइंट में देखा कि किस तरह से कैसे जो आसुरी प्रवृत्ति और दैवी प्रवृत्ति के लक्षण हैं। तो दैवी प्रवृत्ति के लक्षण में हमने देखा पहला अभय देखा। अभय क्यों महत्वपूर्ण है कि इट इज़ द डोर टू ऑल वर्चुअस। अगर भय होगा तो कोई भी सद्गुण हम जो सद्गुण के लिए करने के लिए कोई विरोध करेगा तो हम सद्गुण छोड़ देंगे। और फिर हमने देखा अपैशुनम्। अपैशुनम् मतलब दुर्गुण नहीं देखना दूसरों में। हमें हमारे जीवन में किसको देखना है? हमें विलन को देखना है। तो हमें दोष नहीं देखना है। जो समस्या है उसका सामना करना है। और फिर आसुरी प्रवृत्ति के जो लक्षण थे उसमें हमने देखा क्या है? कि सबसे पहले बताते हैं कि क्या करना है क्या नहीं करना है उसके वो सब आई स्पेशलिस्ट हैं। आई स्पेशलिस्ट मतलब मेरी इच्छा यही महत्वपूर्ण है। और कुछ और महत्वपूर्ण नहीं है। १६.७ बताते हैं कि तो वृत्ति निवृत्ति उसका कोई भाव नहीं है। कोई परवाह नहीं है। और क्यों? हम देखा कि हम सब जो है कि कोई भगवान नहीं है। कोई भगवान का भय नहीं है। तो ऐसे व्यक्ति का भय बहुत ज़रूरी है। तो क्या है? कि वो व्यक्ति बड़ा विनाश कर सकता है। फिर उसके बाद में हमने उसके अनस्पोकन एग्ज़ाम्पल्स देखे। भगवान नाम लिए बिना उदाहरण देते हैं। तो मैं देखा कि कैसे होता है कि जो आसुरी प्रवृत्ति के लोग होते हैं आई स्पेशलिस्ट में दो प्रकार के होते हैं कुछ होते हैं जो नार्सिसिस्ट होते हैं और कुछ सोशियोपैथ और साइकोपैथ होते हैं तो दूसरों का परवाह ना करना और दूसरों का दुख देने में आनंद लेना। तो हमने देखा सोलहवें अध्याय के पहले धृतराष्ट्र का वर्णन क्या था कि उसको काम था और उसके कारण चिंता थी। तो चिंतामपरिमेयांच। तो हमने देखा है कि संस्कृत में काम बढ़ जाएगा तो इंग्लिश में जो काम है वो दूर चला जाएगा। तो ये धृतराष्ट्र का वर्णन था, ये सोलहवें अध्याय के और फिर दुर्योधन का वर्णन था। दुर्योधन क्या? न केवल वो अलग-अलग प्रकार से अर्थ की कामना कर रहा था पर उसके लिए सब सीमाओं का उल्लंघन कर रहा था। क्या था? कि वो मर्डर करने के लिए तैयार था। और उसके लिए अकेले मर्डर कर रहा था मर्डर से उसको बड़ा आनंद था कि मैं कितना बुद्धिमान हूँ। और फिर उसके बाद में शो ऑफ़ पायिटी दिखावा कर रहा था कि मैं कितना अच्छा व्यक्ति हूँ। अगर आपके लिए करूँगा, दान करूँगा, उससे लोग सोचेंगे कि मैं बहुत अच्छा हूँ। तो ये १३-१५ का वर्णन है। तो ये जो है, ये एक मानसिकता है। ये केवल योनि नहीं है। वो मानव था, पर आसुरी प्रवृत्ति थी उसमें। और फिर अंत में हमने देखा कि हम सबके जीवन में हमें आगे बढ़ना है। तो क्या है, हमारे जीवन में दरवाज़े हैं, जो हम खोलना चाहते हैं। पर उसके साथ-साथ कुछ ऐसे दरवाज़े हैं, उससे हम नीचे गिर सकते हैं। तो ये डोर्स उसको ओपन करना है, पर ये जो डोर्स हैं, इनको ट्रैप डोर्स हैं। इनको क्या करना है, हमें क्लोज़ करना है। यह है काम, क्रोध और लोभ के दरवाज़े हैं वो। वो बंद नहीं करेंगे, तो हमें एक बड़े खड्डे में गिर जाएँगे। वो बंद नहीं करेंगे, तो हमें एक बड़े खड्डे में गिर जाएँगे। तो ये हमारा भाग्य है, पर कभी भी वे गिर सकते हैं। तो इससे बचने के लिए क्या करना है, हमें हमारे जीवन में बॉन्ड्स और बॉउंड्रीज़। शास्त्रों से हमको पता चलता है। अगर दोनों नहीं हैं, तो डिस्टर्बशन ज़रूर होने वाला है। तो अगर सिर्फ बॉन्ड्स हैं, बॉउंड्रीज़ नहीं हैं, तो हमेशा डेंजर में रहते हैं। अगर दोनों नहीं हैं, तो हमेशा डेंजर में रहते हैं। अगर दोनों नहीं हैं, तो हमेशा डेंजर में रहते हैं। अगर दोनों नहीं हैं, तो हमेशा डेंजर में रहते हैं। गीता की? श्रील प्रभुपाद की? गौर प्रेमानन्दे।Lecture Summary
Full Transcription
परिचय और भगवद्गीता के सोलहवें अध्याय की पृष्ठभूमिदैवी प्रकृति के गुण और अभय का महत्व
दोष देखने की प्रवृत्ति और अपैशुनम्
आत्मा, मन और जन्मजात संस्कार
आसुरी प्रकृति और अहंकार के लक्षण
प्रवृत्तिम्च निवृत्तिम्च और आसुरी मानसिकता
नास्तिकता और जीवन का दृष्टिकोण
धृतराष्ट्र और दुर्योधन का चरित्र-चित्रण
नरक के तीन द्वार: काम, क्रोध और लोभ
शास्त्र प्रमाण और जीवन में नियंत्रण