Hindi – Chapter 17 – Bhagavad Gita And Decision Making || Chaitanya Charan
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Disclaimer: This transcript was generated using AI and may contain occasional errors or inaccuracies. अर्जुन का प्रश्न: सोलहवें अध्याय में दैवी और आसुरी प्रवृत्तियों के वर्णन के बाद, अर्जुन पूछते हैं कि जो लोग शास्त्रों की विधि का पालन नहीं करते, लेकिन फिर भी किसी अन्य वस्तु या देवता में श्रद्धा रखते हैं, उनकी निष्ठा और स्तर किस प्रकार का होता है? श्रद्धा का अर्थ और महत्व: श्रद्धा केवल धर्म तक सीमित नहीं है, बल्कि यह व्यक्ति की मूल वैल्यू सिस्टम (मूल्य प्रणाली) और अस्तित्व का प्रतीक है। जैसा हमारा अस्तित्व (सत्व) होता है, वैसे ही हमारी श्रद्धा बनती है, और जैसी हमारी श्रद्धा होती है, वैसा ही हमारा जीवन और व्यक्तित्व बनता है। चार प्रमुख श्रेणियां (आहार, यज्ञ, दान, तप): व्यक्ति की श्रद्धा और उसकी आंतरिक चेतना को समझने के लिए भगवान चार मुख्य आधारों का वर्णन करते हैं: ‘ॐ तत्सत्’ का रहस्य: यज्ञ, दान और तप के अंत में ‘ॐ तत्सत्’ का स्मरण यह सिखाता है कि समस्त कर्म और परमसत्य उस परमपिता परमात्मा से जुड़े हैं, और अहंकार से मुक्त होकर उनकी चेतना में किए गए कर्म ही जीवन को सार्थक बनाते हैं। स्वामिप्रभुपाद की, नन्दकोटी वैष्णव वृन्द की, श्रीमद्भगवद्गीता की जय। ॐ ज्ञानातिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जनशलाकया, चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः। नमः ॐ विष्णुपादाय कृष्णप्रेष्ठाय भूतले, श्रीमते भक्तिवेदान्तस्वामिनिति नामिने। नमस्ते सारस्वते देवे गौरवाणी प्रचारिणे, निर्विशेषशून्यवादी पाश्चात्यदेशतारिणे। वाञ्छाकल्पतरुभ्यश्च कृपासिंधुभ्य एव च, पतितानां पावनेभ्यो वैष्णवेभ्यो नमो नमः। जय श्री कृष्ण चैतन्य प्रभु नित्यानंद, श्री अद्वैत गदाधर श्रीवासादि गौर भक्तवृन्द। हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे, हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे। हरे कृष्ण! तो आज हम भगवद्गीता का सत्रहवां अध्याय देखेंगे, और आज शाम को सोलहवां अध्याय, और फिर कल सुबह अट्ठारहवां जो आखिरी भाग है, वो देखेंगे। तो जो सत्रहवां अध्याय चल रहा है, उसमें जो सोलहवें अध्याय में बताया है, उसके बाद में अर्जुन के मन में एक सवाल आ रहा है। यह सवाल यह है कि, आपने दैवी और असुरी प्रकृति के बारे में बताया, पर जो लोग बीच में हैं—कुछ लोग दैवी प्रकृति के होते हैं, और कुछ लोग असुरी प्रकृति के होते हैं—पर क्या सब लोग इन्हीं कैटेगरीज में फिट हो जाते हैं? और खास करके, भगवान बोलते हैं, दो ही प्रकृतियां हैं—दैवी, आसुरी च। पर खास करके उनके जो कैरेक्टरिस्टिक्स हैं, अभी एक है कि जो प्रकृति बोलते हैं, और फिर दूसरा है प्रकृति का जब वर्णन भगवान करते हैं, तो किस तरह से करते हैं? यहाँ पर गुण का अर्थ क्वालिटीज हैं। वो बोलते हैं कि कैसे जो सत्वगुणी होते हैं, जो दैवी प्रकृति के होते हैं—अभयं सत्त्वसंशुद्धिः—सत्वगुण होते हैं उनमें। जो आसुरी प्रकृति के होते हैं, उनमें दुर्गुण होते हैं—दम्भो दर्पः अभिमानश्च, क्रोधाः पारुष्यमेव च। तो अभी हम कह सकते हैं कि कुछ जो गुण हैं, अभी यह अगर दैवी प्रकृति है और यह आसुरी प्रकृति है, तो अभी कुछ-कुछ जो गुण हैं, जो दैवी प्रकृति के लोगों में हम देखते हैं, तो जो आसुरी प्रवृत्ति के गुण हैं, वो कुछ लोगों में हम देखते हैं। पर कुछ लोग ऐसे होते हैं, तो भगवान ने अंत में बताया कि जो शास्त्रों का पालन करते हैं श्रद्धा के साथ। जो अभी उनके गुणों के बारे में बताया है, पर उसके एंड में क्या बताया? कि दैवी प्रकृति के लोग जो हैं, उनके दो कैरेक्टरिस्टिक्स हैं कि शास्त्र का पालन करते हैं वो, और श्रद्धा है उनमें। और यहां शास्त्र… निजरोवरी सफे… वह कहते हैं—तस्मात् शास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ। तो श्रद्धा रखकर शास्त्र का पालन करो। पर यहाँ पर क्या है? जो आसुरी प्रकृति के लोग थे, क्या करेंगे? वो शास्त्र का पालन नहीं करते हैं। वो जो अपना जीवन करते हैं, वो क्या है?—शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः। तो काम के लिए कार्य करते हैं। काम मतलब यहाँ पे, वो अपनी जो स्वार्थी इच्छा है, उसके लिए कार्य करते हैं। तो अभी उनमें क्या है? इसका मतलब है, शास्त्र नहीं है तो श्रद्धा भी नहीं है। अगर आपको डॉक्टर बोलता है कि ऐसे-ऐसे चीजें आप खाओ, ये चीजें आप मत खाओ। तो अगर व्यक्ति बोलता है कि नहीं-नहीं, मैं ये खाने वाला हूँ, तो क्या है? उसके लिए वो डॉक्टर पर भी श्रद्धा नहीं है। अगर डॉक्टर बोल रहा है कि इसे खाने से परेशानी होगी, तो उसके लिए—नहीं, ये डॉक्टर सिर्फ मेरे जीवन से सुख ले जाना चाहता है, इसलिए बोल रहा है ये। तो अगर वो पालन नहीं करता है, केवल अपनी इच्छा के अनुसार खा रहा है, तो क्या है? उसमें श्रद्धा नहीं है या कम है। तो अभी ये दो एक्सट्रीम्स हैं। तो अर्जुन, ये सोलहवें अध्याय का वर्णन है (चैप्टर 16), पर जो बीच में लोग आते हैं, वो चैप्टर 17 हैं। तो जो सवाल क्या है? कि जिन लोगों में श्रद्धा है, बट नॉट इन शास्त्र। तो शास्त्र में जो बताया है, उसके अनुसार वो कार्य नहीं कर रहे हैं, किसी और चीज में श्रद्धा है। तो ऐसे लोगों का क्या स्तर होता है? आजकल लोग कहते हैं कि, आपकी जो भी भगवान की संकल्पना है, उसके अनुसार आप पूजा करो। आजकल लोग… एक आदमी पूजा करता है, हमें पृथ्वी ही भगवान है, पर वो भूमि देवी के रूप में उसको नहीं देख रहा है। तो लोगों की अलग-अलग चीजों में श्रद्धा हो सकती है। तो ऐसे लोगों का क्या स्तर है? यह अर्जुन का सवाल है सत्रहवें अध्याय में। अर्जुन उवाच: ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धया अन्विताः। तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्त्वमाहो रजस्तमः॥ अभी क्या है कि जो श्रद्धा होती है, व्यक्ति श्रद्धा के बिना रह ही सकता है? कोई जी नहीं सकता है। अभी हम सब यहां पे बैठे हैं, तो क्या है? हमें श्रद्धा है कि जो मंदिर का कंस्ट्रक्शन किया है, वो इतना अच्छा है कि हमारे सिर पे गिर के हमें क्रश नहीं करने वाला है, हम पे गिरने वाला नहीं है—यह श्रद्धा है। हम गाड़ी चलाते हैं, कार में चलते हैं, बाइक पे चलते हैं, रस्ते पे चलते हैं, तो हमें श्रद्धा है कि जो कार है, वो बाइक है, वो अच्छे से चलने वाला है, उसका अचानक ब्रेक फेल नहीं हो जाएगा, उसका अचानक कोई पेट्रोल टैंक एक्सपोज़ नहीं हो जाएगा। तो बिना श्रद्धा के हम कार्य ही नहीं कर सकते हैं। तो भगवान यहीं सबसे पहले श्रद्धा पे जोर देते हैं, वो बात कहते हैं कि तीन प्रकार की श्रद्धा होती है, और श्रद्धा के बारे में यहाँ पर जो श्लोक है, वो काफी महत्वपूर्ण और दिलचस्प श्लोक है। तो उसके श्रद्धा के तीन पहलू इसमें बताए गए हैं—सत्त्वानुरूपा सर्वस्य… तो अभी कभी-कभी भाषा में कन्फ्यूजन होता है, क्योंकि क्या होता है? एक शब्द के अनेक अर्थ होते हैं। तो इंडिया में हम जो बोलते हैं कि, मुझे देखे है, कोई हमारे कॉलेज से हमको भी मिलता है, तो हमको पूछते हैं… तो अभी इंडिया में ‘पास आउट’ मतलब ग्रेजुएट बोलते हैं। मैं ऑस्ट्रेलिया में पहली बार गया था, और वहाँ पर लेक्चर रहा था कि आई पास्ड आउट इन 1998। तो हमारे पाश्चात्य देश में ‘पास आउट’ मतलब बेहोश हो जाना होता है! तो 1998 में क्यों बेहोश हो गए? तो क्या हुआ था? तो क्या होता है? शब्दों के अलग-अलग अर्थ होते हैं। तो ‘सत्व’ यह शब्द है। सत्व का एक अर्थ है सत्वगुण, पर सत्व का एक और अर्थ है—क्या है? एक्झिस्टेंस (अस्तित्व)। सच्चिदानंद जो है, उसमें जो ‘सत्’ है, सत् का मतलब है अस्तित्व। तो यहाँ पर सत्व का जो अर्थ है—सत्त्वानुरूपा सर्वस्य—तो आपका जिस प्रकार का अस्तित्व है, आप जिस तरह से जी रहे हो, श्रद्धा भवति भारत। व्यक्ति का जिस तरह से अस्तित्व होगा, उसके अनुसार उसकी श्रद्धा होगी। और न केवल वो अस्तित्व (As you live so will be your belief)—जिस तरह से तुम जी रहे हो, उससे तुम्हारी श्रद्धा होगी, यह एक चीज़ बता रहे हैं। दूसरी चीज़ बताते हैं क्या? श्रद्धामयोऽयं पुरुषो व्यक्ति। वास्तव में अपनी श्रद्धा से ही बना हुआ है। ऐसे अपनी श्रद्धा में आता है कि हम चिन्मय हैं, मतलब हम चेतना से बने हैं, या आनंदमयोऽभियाता है, हम आनंद की चाहते हैं। तो यहाँ पर क्या बता रहे है? श्रद्धा मयो तो हम श्रद्धा से ही बने हैं। और तीसरी चीज़ भगवान बता रहे हैं—यो यच्छ्रद्धा स एव सः—जैसी तुम्हारी श्रद्धा है, वैसे तुम बनोगे। तो यहाँ पर भगवान जो है, एक बहुत इंटरेस्टिंग चीज़ बता रहे हैं श्रद्धा के बारे में कि अगर हम कहते हैं, यह किसी की श्रद्धा है, फेथ है किसी का… तो भगवान क्या बोल रहे हैं कि जैसे हमारा एक्झिस्टेंस होगा, जैसे हमारा सत्व है—सत्त्वानुरूपा सर्वस्य—जैसे हमारा अस्तित्व है, जैसे हमारा एक्झिस्टेंस है, वैसे हमारा फेथ बनेगा। तो हमारे अस्तित्व से हमारा जीवन बनता है, हमारी श्रद्धा बनती है, हमारी श्रद्धा से हमारा अस्तित्व बनता है। पर यहाँ पर क्या बता रहे हैं? एक तरह से तीन चीज़ें हैं—Our existence makes our faith, our faith makes our existence. पर यहाँ पर दूसरी चीज़ क्या बता रहे हैं? एक तरह से—Our faith, अगर मैं हूँ यहाँ पे (me), तो our faith makes us. तो वास्तव में हम और हमारी श्रद्धा इसमें ज्यादा फरक नहीं है, लगभग यह हमारी श्रद्धा ही हमारी पहचान है, एक तरह से बता रहे हैं। तो अभी यहाँ पर जो बता रहे हैं कि हमारी श्रद्धा ही हमारी पहचान है, इसका मतलब क्या है? कुछ लोग हिंदू होते हैं, कुछ लोग वैष्णव होते हैं, कुछ लोग शैवाइट होते हैं, कुछ लोग मुस्लिम होते हैं, कुछ लोग क्रिश्चियन होते हैं। तो वो उनकी श्रद्धा है, यह एक तरह से कह सकते हैं। पर हम देखते हैं कि वास्तव में क्या एक धर्म के सब लोग समान होते हैं? नहीं। अभी कुछ लोग वृंदावन में जाते हैं, अभी कुंभ में हजारों लोग, करोड़ों लोग गए थे, क्या सब लोग बिल्कुल समान थे? नहीं। तो कैसे है कि अगर हम श्रद्धा… जो फेथ… ट्रेडिशनली फेथ इज असोसिएटेड विद रिलीजन। तो अभी इंग्लिश में थोड़ा ‘रिलीजन’ शब्द को नकारात्मक भाव आता है, तो कई बार लोग कहते हैं कि मैं रिलीजियस नहीं हूँ, मैं स्पिरिचुअल हूँ। तो पर साधारणतया श्रद्धा को रिलीजन से जोड़ा जाता है—Which faith do you belong to? or What is your religion? आपके धर्म कौन सा है, बोलते हैं। तो अभी देखिए, शब्दों का कितना कॉम्प्लिकेशन होता है कभी-कभी। अभी हम श्रद्धा को रिलीजन से असोसिएट करते हैं, पर रिलीजन को हम हिंदी में ‘धर्म’ बोलते हैं। अभी भगवत गीता में जो धर्म का अर्थ है, और हमारा जो धर्म का अर्थ है, वो भी अलग है। तो अभी श्रद्धा, धर्म का जो अर्थ है, वो अलग-अलग होता है। तो अभी मैं पहले अभी श्रद्धा के बारे में चर्चा करने वाला हूँ, तो इसका अर्थ क्या है और क्या नहीं है, यह समझने का प्रयास करेंगे। तो अभी श्रद्धा को रिलीजन से असोसिएट कर सकते हैं हम, पर वास्तव में यह ट्रू है कुछ हद तक, पर वास्तव में गीता में जो बताया जा रहा है, श्रद्धा है, यह व्यक्ति की वैल्यू सिस्टम है। कि किसी की पहचान क्या है, अगर हमको जानना है, तो हमें किसी के वैल्यूज से देख सकते हैं। पर वैल्यू सिस्टम का मतलब क्या है कि हर एक व्यक्ति के वैल्यूज हो सकते हैं, पर वैल्यूज का भी एक हायरार्की होता है। वैल्यूज इन हायरार्की। हायरार्की मतलब—अभी सबको पैसा जरूरी है, पैसे के बिना कोई जी नहीं सकता है, पर पैसा कितना महत्वपूर्ण है? क्या पैसा प्राप्त करने के लिए आप झूठ बोलोगे? क्या पैसा प्राप्त करने के लिए किसी का विश्वास घात करोगे? तो क्या है? पैसा सबको चाहिए, पर वो पैसा जो अर्थ है, वो महत्वपूर्ण है, पर उसका वैल्यू कितना है? किसके जीवन में वो हमारे वैल्यूज में एक वैल्यू सिस्टम होता है। तो क्या होता है? ये सब अर्थ हो सकते हैं, पर उसमें कुछ परमार्थ होता है। तो साधारणतया परमार्थ है मतलब भगवान को बोलते हैं या आध्यात्म को बोलते हैं कि ये हमारा परमार्थ है। कुछ लोग प्रपंच को छोड़ के परमार्थ के ओर जाते हैं, अर्थ को छोड़ के परमार्थ के ओर जाते हैं। तो साधारणतया परमार्थ का अर्थ होता है नॉर्मली इसको भगवान से जोड़ते हैं या आध्यात्म से जोड़ते हैं, पर अगर वो शब्दशः अर्थ देखते हैं, परमार्थ का मतलब क्या है? जिसको हम परम अर्थ मानते हैं, जिसको हम सबसे महत्वपूर्ण अर्थ मानते हैं। तो अभी रावण जो किस चीज का प्रतिनिधित्व करता है? वो कामवासना का। तो अभी उसके रावण के लिए जो उसकी कामवासना की पूर्ति थी, वो उसका परमार्थ था। मतलब वो अपनी कामवासना की पूर्ति के लिए अपने राज्य को खतरे में डालने को तैयार था, वो अपने परिवार वालों को खतरे में डालने के लिए तैयार था। तो अनेक अर्थ हो सकते हैं, पर अगर कोई साधारण अर्थ है, वो अगर किसी का परमार्थ बन जाता है, तो जब पैसा परमार्थ बन जाता है, तो फिर उससे क्या होता है? उससे अनर्थ होता है। तो अगर अर्थ परमार्थ बन जाता है, तो वो अनर्थ हो जाता है। अभी जो स्त्री का आकर्षण है, ये स्वाभाविक आकर्षण है जगत में, और ये जगत के आगे चलाने के लिए भी ये आकर्षण जरूरी है एक तरह से, पर अगर वही आकर्षण व्यक्ति के सारे जीवन के सारे फैसलों का वही एक सुप्रीम बेसिस बन जाता है, तो फिर वो व्यक्ति, वो कामवासना का एक तरह से शिकार बन गया, और कामवासना के लिए शिकारी बन जाता है, दोनों बन जाता है वो, तो वो अनर्थ बन जाता है। तो अभी जो भगवान बता रहे हैं, श्रद्धा जिस तरह से बता रहे हैं, हमारी वैल्यू सिस्टम क्या है? तो किसी व्यक्ति के बारे में जानना है, अगर हम किसी के लिए प्रेडिक्ट करना चाहते हैं, किसी के लिए कुछ प्रोजेक्ट्स साथ में करना चाहते हैं, तो हम जानना चाहते हैं कि उसकी वैल्यू सिस्टम क्या है? कि उसकी वास्तव में हर व्यक्ति की अनेक इच्छाएं होती हैं, पर कौन इच्छाएं ज्यादा महत्वपूर्ण है? What is their driving desire? तो अभी एक से हम कह सकते हैं कि हमारे डिजायर्स होते हैं, और अनेक डिजायर्स होते हैं। अभी कोई व्यक्ति होगा, सामान्यतः प्रामाणिक होगा वो, पर अगर वो किसी धनवान घर, किसी व्यक्ति के घर में जाएगा, और वहाँ पर कुछ जेवर, कुछ ज्वैलरी बाहर ही पड़ा होगा, शायद उसके मन में इच्छा आ सकती है, जो पता नहीं चलेगा, यहाँ पर कोई कैमरा नहीं है। शायद इच्छा आ सकती है, पर अचानक इच्छा साधारण करती है… थोड़ा इच्छा, इच्छा अनेक प्रकार की मन में आ सकती है, हमारे डिजायर्स होते हैं, पर साधारण ऐसे डिजायर्स से बड़े हमारे वैल्यूज होते हैं। तो अनेक डिजायर्स आते हैं और जाते हैं। तो एक तरह से… व्यक्ति के लिए डिसिप्लिन को कहते हैं… व्यक्ति के लिए सेल्फस्क्राइब के लिए… उसका मतलब क्या है कि वो व्यक्ति के जो वैल्यूज हैं, वो उसके डिजायर से ज्यादा महत्वपूर्ण है। अनेक प्रकार की इच्छाएं आएगी, पर हमारे वैल्यूज के अनुसार हम हमारी इच्छाओं को नियंत्रण करते हैं। तो श्रद्धा का मतलब यह है कि अभी व्यक्ति के वो डिफाइनिंग कैरेक्टरिस्टिक है भगवान बता रहे हैं, कि व्यक्ति श्रद्धामयोऽयं पुरुषः। वही हमारे किसी व्यक्ति का पहचान है, जो बताते हैं। तो मान लीजिए कोई ऐसे बचपन में है, तो हमारी श्रद्धा है, वास्तव में क्या हमारी श्रद्धा फिक्स्ड होती है या चेंजिंग होती है? आपको क्या लगता है? कि श्रद्धा फिक्स्ड होती है या बदलती है? बदलती है। और कुछ हद तक बदलना भी चाहिए। पर वो बदलाव जो है, वो अधिकांश रूप से कॉन्शियसली होना चाहिए। हम विचार करके होना चाहिए। तो अभी मान लीजिए कोई ऐसे घर में बड़ा हुआ है, कि उसमें कभी शराब माता-पिता बोलते हैं और वो नहीं पीता है, पर वो ऐसे कई प्रदेश में जाता है, कहीं दूर जाता है, और वहाँ पे ऑफिस में, वहाँ पे बाकी सब जगह पे लोग शराब पीते हैं। तो फिर क्या होता है? उसको बोलते हैं—तुम भी पियो, एक बार पियो, क्या फर्क पड़ता है? तो एक बार पीता है, फिर दूसरी बार पीता है, तीसरी बार पीता है, तो क्या है? अभी उसका जो जीवन है, वो बदल रहा है, उसका अस्तित्व बदल रहा है, तो उससे क्या होगा? उसका वैल्यू सिस्टम बदल जाएगा। तो पहले बोलेगा शराब नहीं पीना चाहिए, फिर बोलेगा शराब पीना इतनी बड़ी बात क्या है? कुछ बड़ी बात नहीं है इसमें। पर उससे क्या होगा? धीरे-धीरे हर व्यक्ति शराब पीने से शराबी ही बन जाएगा? तो क्या है कि उसकी बाकी वैल्यू सिस्टम क्या है? वो महत्वपूर्ण है। कुछ लोगों को बाकी वैल्यू सिस्टम कुछ है ही नहीं, तो शराब सीधा उनका टॉप मोस्ट वैल्यू बन जाता है, वो एल्कोहलिक बन जाते हैं। पर कुछ लोग होते हैं, वो शराब पीते हैं, इतना तुरंत वो शराबी नहीं बनेंगे, पर क्या है? धीरे-धीरे वो वैल्यू सिस्टम बदलते जाता है। तो भगवान ही हमें बता रहे हैं कि हमारा जो जीवन है, उससे हमारी, जिस तरह से हमारा अस्तित्व है, जिस तरह से हम जी रहे हैं, उससे हमारी श्रद्धा उससे डेवलप होती है, और जिस तरह से हमारा श्रद्धा है, उससे हमारा जीवन भी डेवलप होता है। तो यह एक सिम्बायोटिक साइकिल है, एक दूसरे चीज को नर्चर करती है, दूसरे पहले चीज को पोषण करती है। तो यह श्रद्धा का भाव है। श्रद्धा क्या है? यह हमारी वैल्यू सिस्टम है। और अनेक लोग, अभी एक ही धर्म में लोग होंगे, उनकी काफी अलग… कुछ लोग होते हैं, वो थोड़े ब्रॉड माइंडेड होते हैं—ठीक है, तुम्हें तो यह विचार आ रहा है, यह तुम्हें नहीं विचार आ रहा है, तो वो ऐसे लोग अलग-अलग तरह से भाव से कार्य करते हैं। पर कुछ लोग क्या होते हैं? वो बहुत फेनेटिक परस्पेक्टिव… यही हमारी पर्फेक्ट है… यही हमारी पर्फेक्ट… जीतने पर करें… जैसे कि क्रिकेट टूर्नामेंट चल रहा हो। तो एक्स्क्लूसिवली लिए… एक्जेक्टली यही हमारे पास सत्य है। तो एक्स्क्लूसिव्स के अलावा दूसरे पास के लोग होते हैं—एक्सट्रीमिस्ट्स होते हैं। एक्सट्रीमिस्ट्स वो विचार में ही वो कार्य भी करते हैं। एक तरह से एक्सट्रीमिस्ट्स वो क्या कहते हैं? वो एक्स्क्लूसिव्स से ज्यादा करुणा में होते हैं? एक्स्क्लूसिव्स कहते हैं कि तुम हमारे-हमारे धर्म का पालन नहीं करोगे, हमारे भगवान के लिए पूजा करोगे, तुम नरक में जाओगे। तो जो एक्सट्रीमिस्ट्स होते हैं—अरे, तुम तो नरक में जाने वाले हो, तो अभी तुमको भेज देते हैं! तो क्या है? तो ये एक्सट्रीमिस्ट्स होते हैं। तो अभी किसी धर्म में श्रद्धा के नाम पे कुछ लोग बहुत संकीर्णवादी बन जाते हैं, फेनेटिक बन जाते हैं, कुछ फेनेटिक नहीं होते हैं। तो क्या है? श्रद्धा जो है, जो अगर हम उसको धर्म बोलते हैं, तो बहुत नैरो है, कि व्यक्ति जिस धर्म को कहता है कि मैं इस धर्म में हूँ, रिलीजन में हूँ, उसमें उसकी रिलीजन से उसकी वैल्यू सिस्टम कितनी बदली है, कितनी एफेक्ट हुई है, कितनी एफेक्ट नहीं हुई है? कुछ लोग धार्मिक संस्था में भी जुड़ते हैं, धर्म में जुड़ते हैं, क्यों जुड़ते हैं? क्यों? क्या है कि वहाँ पे अगर वो समाज धार्मिक है, तो उनको वहाँ पे थोड़ा उसमें आदर मिल जाएगा। कोई अगर पाश्चात्य देशों में पचास सौ साल पहले ऐसा होता था कि, अभी इतना नहीं है, पर कम हो गया है कि अगर आपको कुछ… आप किसी नए जगह में गए हो और आपको बिजनेस करना है, तो सबसे पहले क्या करो? वहाँ पे सबसे बड़ा चर्च कौन सा है देखो और चर्च में जाओ और चर्च के मेंबर बन जाओगे, तो क्या होगा? फिर बाकी सारा चर्च का कॉन्ग्रेशन है, उनको पता चल जाएगा अब आप ये बिजनेस करते हो, तो उससे आती है। पर हमारे बचपन में जैसे हमारी परवरिश हुई है, उससे आती है, जिस प्रकार के समाज में रह रहे हैं, उससे आती है, अनेक चीजों से आती है। तो अभी ट्रेडिशनल सोसाइटी था, उसमें जो बच्चों की परवरिश होती थी, समाज की संस्कृति होती थी, वो सब शास्त्रों पर अधिकांश रूप से आधारित हुआ करती थी। पर अभी तो ये जो प्रश्न है अर्जुन का, तो अधिकांश लोग जो है, आजकल के समाज में इसी बीच में आएंगे। उनकी श्रद्धा जो है, वो डायरेक्टली शास्त्रों से नहीं आती है, अलग-अलग प्रकार की श्रद्धा होती है। तो कुछ लोग डेमी गॉड्स की पूजा करते हैं। तो अभी जो डेमी गॉड्स की पूजा करते हैं, देवताओं की पूजा करते हैं, वो शास्त्रीय श्रद्धा है। पर कुछ लोग क्या है? सेमी गॉड्स की पूजा करते हैं। सेमी गॉड्स का मतलब क्या है? तो क्या है कि मैं भगवान हूँ। तो अभी ये कोई श्रद्धा है? ये अशास्त्रीय श्रद्धा है, कि ये कोई बाबा है, कोई गुरु है, उसकी पूजा करने लग जाते हैं, तो वो श्रद्धा शास्त्रों में कुछ बताया नहीं है। अभी शायद उस श्रद्धा से भी कभी-कभी ऐसे हो सकता है कि कोई-कोई किसी बाबा को पूछता है और उसके कारण वो मांस खाना छोड़ देता है, उसके कारण वो थोड़ा दान देने लगता है, तो उससे भी शायद उनका चरित्र में कुछ सकारात्मक परिवर्तन हो सकता है। तो अभी वो अच्छा है, सकारात्मक परिवर्तन हुआ था, वो शास्त्रों पर आधारित नहीं है। किस तरह के कपड़े पहन रहा है, किस लोकेलिटी में रहता है, किस तरह से बात करता है, तो उससे हम उस व्यक्ति के बारे में कुछ जान सकते हैं। तो डायरेक्टली हम किसी के वैल्यू सिस्टम के बारे में पूछते नहीं हैं, और पूछेंगे भी तो भी अधिकांश लोग बताएंगे नहीं। तो वैल्यू सिस्टम कैसे हम समझ सकते हैं किसी का? तो भगवान बोलते हैं कि उनके अस्तित्व को देखो, वो किस तरह से जी रहे हैं। और जो हमारा एक्झिस्टेंस है, जो हमारा अस्तित्व है, जिससे हमारा जैसा अर्जुन ने कहा है कि, वहाँ ने कहा है कि एक्झिस्टेंस है—सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत। तो एक्झिस्टेंस से हमारी श्रद्धा होती है और श्रद्धा से हमारा एक्झिस्टेंस भी होता है। तो इनको देखने के लिए भगवान चार चीजें बोलते हैं—देखो, वो बोलते हैं कि अपना आहार देखो, किसी का आहार क्या है, क्या खाते हैं वो। फिर उसके बाद में वो तीन चीजें बोलते हैं कि वो व्यक्ति किस प्रकार का यज्ञ करता है, किस प्रकार का दान देता है, और किस प्रकार का तप करता है। तो यज्ञ, दान, तप के बारे में ये वर्णन करते हैं और इस तरह से कहते हैं कि व्यक्ति की श्रद्धा क्या है, उसकी वैल्यू सिस्टम क्या है, हम यह समझ सकते हैं। कुछ यज्ञ करता ही नहीं हो, ऐसे बहुत से लोगों के लिए कुछ दान देते ही नहीं है, तो क्या उनकी कोई वैल्यू सिस्टम नहीं है? वो इतना सिंपल नहीं है। हम थोड़ी चर्चा करते हैं इसके बारे में। तो अभी जो आहार है, भगवान कहते हैं कि अभी अर्जुन ने पूछा था कि कैसे किसी की श्रद्धा समझें हम? वो सत्व में है, रजस में है, तमस में है। तो भगवान क्या करते हैं? ये तीनों को सत्व, रजस, तमस में हो सकता है। वैसे ही यज्ञ जो है, वो सत्व, रजस, तमस में हो सकता है। दान सत्व, रजस और तमस में हो सकता है। जो तपः है, वो भी सत्व, रजस और तमस में हो सकता है। तो भगवान कहते हैं कि किसी की श्रद्धा कहां है, देखना है तो उनका आहार, यज्ञ, दान और तपः यह आप देखो। तो अभी सात्त्विक आहार करता है, तो भगवान कुछ लक्षण बताते हैं अन्न के, उसके बारे में हम चर्चा कर सकते हैं, पर उसके जो प्रिंसिपल हैं, वहाँ हम देखने का प्रयास करेंगे। तो अभी यहाँ पर जो श्लोक आते हैं, हम केवल एक-एक श्लोक देखें हैं—आयुःसत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः। रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्या आहाराः सात्त्विकप्रियाः॥ और हेल्दी फूड काफी एक्सपेंसिव है। और जो अनहेल्दी, मतलब ऐसा नहीं कि पोषण नहीं करता है, वो ऐसा अन्न है जो एक व्यक्ति को उसका जो कैलोरीज है, बहुत बढ़ा देता है। इसलिए कि अमेरिका में बहुत बढ़ा देता है, जो सबसे ज्यादा लोगों का वजन है। जो लोग के पास नौकरी भी नहीं है, जो लोग बहुत गरीब होते हैं, उनका वजन सबसे ज्यादा होता है कई बार। क्यों? क्या होता है कि अमेरिका में ऐसे कोई आपको सरकार फूड कूपन देता है… पूरा सिस्टम हमने बनाया है। सिस्टम को आपको थोड़ा दे देंगे, कितने लोग भूखे मर जाएंगे, नए सिस्टम कब बनाने वाले हैं? तो एक सिंपल वो बोल देंगे, जो नास्तिक है… अभी—अभिसंधाय तु फलं दंभार्थमपि चैव यत्। दंभार्थमपि चैव यत् अमानित्तुम अदम्भित्तुम… अमानित्वम अदम्भित्वम… पर जिसके पास धन है ही नहीं, पर फिर भी वो धन का दिखावा करता है। अभी क्या? अमेरिका में अगर आप अमेज़न से कुछ खरीदते हैं, तो उनका पॉलिसी होता है कि आप तीस दिन तक रख के वापस कर सकते हैं। तो इंडिया में उन्होंने पहले चालू किया था, पर वो एक महीने में उन्होंने बंद कर दिया वो। तो क्या होता है? कई बार ऐसे होता है, किसी को किसी सोशल फंक्शन में जाना है, किसी को किसी शादी में जाना है, वैसे ही किसी में किसी को ज्ञान नहीं है, कुछ लोगों में ज्ञान होता है, और ज्ञान का गर्व होता है, पर कुछ लोगों में ज्ञान नहीं होता है, फिर भी ज्ञान का गर्व होता है, मतलब क्या है? वो ज्ञान नहीं है, पर किसी को मानेंगे, इंग्लिश आता नहीं है, पर इंग्लिश के चार-पांच कुछ बड़े-बड़े शब्द बताए, बड़े-बड़े शब्द बोल रहा है, सबको लगता है कि इसका इंग्लिश बहुत अच्छा है, पर वो क्या बोल रहा है, उसको भी समझ में नहीं आता है, किसी और को भी समझ में नहीं आता है, और कई बार कलयुग का लक्षण होता है कि अगर कोई ऐसे बोलता है, जो समझ में नहीं आता है, तो उसको लगता है, इसको बड़ा बुद्धिमान है, तो शब्द चापल्य जो होता है, उसको बुद्धि का लक्षण मानते हैं कई बार, तो… तो अभी यज्ञ जो है—दंभार्थमपि चैव यत्, इज्यते भरतश्रेष्ठ, तं यज्ञं विद्धि राजसम्। तो अभी यज्ञ अगर कोई कर रहा है, पर वो यज्ञ में कुछ आध्यात्म में क्या, धर्म में क्या, दैवी, कुछ चेतना है ही नहीं, उसकी चेतना क्या है कि मुझे ये दिखावे के लिए करना है। तो फिर दिखावा क्या है? अभी महाभारत में वर्णन आता है, दुर्योधन ने भी जब दुर्योधन को राज्य मिल गया, पहले पांडवों ने राजसूय यज्ञ किया था, उसमें उसको बड़ी ईर्ष्या हो गई, तो उसने कहा कि मुझे भी अभी राजसूय यज्ञ करना है। तो फिर वो ब्राह्मणों ने कहा कि अभी पिछला जो व्यक्ति जिसने राजसूय यज्ञ किया है, जब तक वो जीवित है, तभी तुम नहीं कर सकते। तो दुर्योधन के पहला विचार आएगा, तो वो जीवित नहीं रहेगा, पर फिर वो कहा, ऐसे नहीं कर सकता मैं, उसे धृतराष्ट्र अलाउ नहीं करेंगे, और अगर युधिष्ठिर को कुछ करेंगे, तो भीम और अर्जुन उसका विनाश कर देंगे, तो फिर वो नहीं कर सकता। तो वो कहा, कुछ नहीं करना चाहिए, कि दूसरा यज्ञ है, वो जो है, वो राजसूय के समान ही मानते हैं, और वो भी बहुत मुश्किल है करना, जो करता है, वो भी महान हो जाता है, तो क्या है वो? वैष्णव यज्ञ है, बोलते हैं। अभी दुर्योधन को विष्णु में कोई रुचि नहीं थी, विष्णु में कोई श्रद्धा नहीं थी, विष्णु के प्रसन्नता की कोई इच्छा नहीं थी। उसके लिए क्या? वो यज्ञ इसलिए करना था कि दुनिया को दिखाना है कि मैं कितना धनवान हूँ, मैं कितना ऐश्वर्यशाली हूँ, मैं कितना शक्तिशाली हूँ। तो दंभार्थमपि चैव यत्। तो आजकल अभी भारत में कुछ हद तक पैसा आ गया है, तो जो सॉफ्टवेयर में है, अलग-अलग बिजनेस में, तो अभी जो लोग विवाह करते हैं, शादी करते हैं, तो इतना पैसा खर्च करते हैं, अभी डेस्टिनेशन वेडिंग्स होते हैं, तो उसमें पैसा ऐसे पानी के समान दिखाते हैं, वेस्ट करते हैं। और तो विवाह यज्ञ होता है, पर यज्ञ जो होता है, जो प्रीस्ट आता है, भटजी आता है, पुजारी आता है, उसका रोल जल्दी खत्म कर दो आप, उसमें किसी को रुचि है या नहीं, विवाह में इतनी और चीजें होती है, वो एक अपना दिखावा करना है कि मैंने कितना किया। तो क्या वो विवाह यज्ञ—दंभार्थमपि चैव यत्—वो दुनिया को दिखाने के लिए है एक तरह से। तो यज्ञ जो होता है, इस तरह से करते हैं, तो वो यज्ञ राजसिक कहते हैं, उससे व्यक्ति की चेतना आगे नहीं बढ़ रही है। तो वैसे ही तामसिक यज्ञ होता है, जो बिल्कुल किसी भी नियम का पालन नहीं कर रहे हैं, वो कुछ भी नहीं करते हैं, सिर्फ दिखावे के लिए कुछ तो… वहाँ पर पिछली समय दिखावे के लिए करेंगे, पर वो सही करेंगे कुछ सत्र। दुर्योधन ने ब्राह्मणों को बुलाया, पर ब्राह्मणों को… ब्राह्मणों की श्रद्धा थी इसने नहीं बुलाया, ब्राह्मण आएंगे तो क्या? लोग बोलेगा, अच्छा, बहुत अच्छा यज्ञ किया है, तो उसे उनका गुणगान होगा। तो बिल्कुल कुछ भी पालन नहीं करते हैं, तो वो जो है, वो विधिहीनमसृष्टान्नम्… तो एक भक्त बता रहे थे, वो पहले कुछ समय तक नास्तिक बन गए थे, फिर बाद में अब भक्ति में आ गए थे, वो बता रहे थे कि वो नास्तिक कैसे बने? तो वो नॉर्थ इंडिया में रहते थे, कहीं बाहर से ऐसे जगह में, कभी धार्मिक जगह में, वहाँ पे कुछ देखे थे, कुछ तो भी था, प्रीस्ट था, वो यज्ञ कर रहा था, और वो यज्ञ कर रहा था, मंत्र बोल रहा था, और फिर बाद में, अपने पॉकेट से उसने एक बीड़ी निकाल ली, और यज्ञ के अग्नि से ही बीड़ी जलाने लग गया, और तो पीने लग गया! तो बोला, ये तो पूरा पाखंड है, ऐसे इसमें मुझे फंसना ही नहीं है। तो फिर वो बोला, ये एक तरह से यज्ञ के बारे में हो गया। तो अभी बाद में भगवान क्या करते हैं? अभी तप के बारे में बोलते हैं। पर तप बोलते हैं, वो क्या तीन स्तर पर हो सकता है? वो हमारे शरीर से तप कर सकते हैं, वो जिह्वा से तप कर सकते हैं, और मन से तप कर सकते हैं। अभी शरीर से तप मतलब क्या है कि वास्तव में जो हमारी इंद्रियां हैं, उससे हम क्या कार्य कर रहे हैं? तो यहाँ पर बताते हैं, भगवान कैसे हम—ब्रह्मचर्यम अहिंसा च—ये जो है, शारीरं तपः होगी। कई चीजें बोलते हैं, पर ब्रह्मचर्यमहहिंसा च। तो क्या है? पिछली चीजें भगवान ने बताया कि काम और क्रोध ये साधारणतया मानव में व्यक्त होते हैं—शक्नोतीहैव यः सोढुं प्राक् शरीरविमोक्षणात्। कामक्रोधोद्भवं वेगं—कि काम और क्रोध से जो वेग आता है, उसको सहन करना जरूरी है। तो काम से ब्रह्मचर्य का उल्लंघन होता है, क्रोध से अहिंसा का उल्लंघन होता है। तो उन दोनों को नियंत्रण करना, ये शरीर की तपस्या है। इस दिखावे से भगवान बोलते हैं, जो जिह्वा की तपस्या क्या है? कि हम बहुत कुछ बोल सकते हैं, पर वो बोलने को नियंत्रण करना। अमेरिका में गन्स लीगल है सब जगह पे, कोई भी व्यक्ति गन लेकर ही घूम सकता है, और वो वहाँ पे ऐसे गन्स रखते हैं, वो कि वो ऐसे क्या, उसको मिलिट्री लेवल वेपन्स साधारण नागरिक भी रख सकते हैं, मशीन गन वगैरह। उनका भाव क्या है कि वो जो नागरिक है, नागरिक के पास उसी ये अधिकार है, वही स्तर के वेपन्स गन्स रखे जो सरकार के पास है। क्योंकि क्या है? अगर सरकार अत्याचारी बन जाएगी, तो फिर क्या है? नागरिकों के पास शक्ति होने चाहिए सरकार का विनाश कर सके। तो इसलिए उनका भाव है कि हम सबके पास गन्स होने चाहिए, हर व्यक्ति को चाहिए, हर व्यक्ति को एक फंडामेंटल राइट कहते हैं, फंडामेंटल राइट हर व्यक्ति का गन्स रखने का। पर अगर किसी के पास गन है और वो गलती से किसी को गोली मार दिया, या गुस्से में किसी को गोली मार दिया, सिर्फ या गन कहीं अपने घर में ही ब्लॉक कर खेलने लगा, या कोई बच्चा खेलने लगा, या बच्चा किसी को गोली मार दिया, तो बहुत खतरनाक हो जाएगा वो। तो वास्तव में… वास्तव में किसी को गोली मार दिया, सिर्फ… तो भगवान यहाँ पर बोलते हैं कि सैटिस्फैक्शन, संतुष्टि है, यह केवल एक इमोशन नहीं है कि मुझे संतुष्ट लग रही है, संतुष्ट लग रही है, मुझे संतुष्ट नहीं लग रही है। भगवान बोलते हैं, यह एक डिसीजन है कि यह एक भावना है, पर उससे महत्वपूर्ण है यह एक फैसला है। कैसे फैसला है यह? कि अगर हमारे पास जो नहीं है, वो हम बार-बार देखेंगे, तो असंतुष्ट हो जाएंगे। जो हमारे पास है, वो देखेंगे, तो हम संतुष्ट रहेंगे। इसलिए जो चीजें हमें संतुष्ट करती है, उसके बारे में विचार करना, उसको देखना, उसका चिंतन करना, यह एक मन की तपस्या है। किसी ने हमारा अपमान किया है, तो बार-बार हम सोचते रहते हैं—अरे, उसने ऐसे कैसे बोला? उसने ऐसे कैसे बोला? फिर उसे रिवेंज फैंटेसी आ जाती है—मैं इसका ऐसे बदला लूँगा। और वो बदला ले या न ले, तो क्या होता है उससे? वास्तव में हमारा ही मन बहुत विचलित रहता है। वो बिना रेंट दिए वो व्यक्ति हमारे ही दिमाग में रह रहा है। तो इसलिए उससे मैं विचलित हो रहा हूँ, तो उसके बारे में विचार नहीं करूँगा। जो मुझे असंतुष्ट करता है, तो यह मन की तपस्या है। तो अब यह तपस्या है, भगवान बोलते हैं, तपस्या भी हम व्यक्ति सत्व, रजस, तमस में कर सकता है। और जो तपस्या सत्व, रजस, तमस में करता है, वो भाव यह है कि आप तपस्या कर रहे हो, पर तपस्या किसके लिए कर रहे हो? अगर जैसे कोई भस्मासुर था, उसने बड़ी तपस्या की, पर तपस्या का उद्देश्य क्या था? एक शास्त्र में एक प्रिंसिपल है कि जो तप करता है, तप से बल आता है। तपस्या करने से शक्ति आती है। पर आप वो बल का उद्देश्य किस लिए कर रहे हैं? भस्मासुर क्या कर रहा था? बड़ी तपस्या कर रहा था जिससे कि वो विश्व का विनाश कर सके। अभी कोई वैज्ञानिक है… तो अभी दान देना तो अच्छा है, पर क्या सही में हमेशा अच्छा है दान देना? कोई कोई शराबी है, शराब पी रहा है, और दूसरा शराब के बार के बाहर कोई व्यक्ति है वो बोलता है कि अरे, मैंने पिछली बार शराब पिया था, तो मैं ऐसे हो गया था, यह हो गया था… उसके बाद उसको शराब पीना मना है, कभी-कभी वो बार के शराब के बार में जाने का भी बार फेलिसिटेट नहीं होता है, वो दान अच्छा बोल सकते हैं, पर वो दान तामसिक हो सकता है। तो अभी अमेरिका में जो भी सरकार चेंज हुई है, तो पिछली सरकार बहुत लिबरल थी। तो वो सारे विश्व भर में ऐसे अलग-अलग प्रोजेक्ट्स कर रहे थे। तो कई सारे विश्व के बारे में डोनेशन करने के लिए… खून साल के लिबरल डॉलर्स के लोगों को दे रहे थे… तो किसे कहां तक अफ्रीका में स्प्रेड करने के लिए… तो वहाँ लोग इसको ऐसे लोग बुरा मानते हैं। तो वास्तव में ऐसे लोग नहीं कि अच्छे हैं, बाकी लोगों से और अच्छे हैं वो, ऐसे दिखाने के लिए वो ड्रामास करो, या फिर ऐसे बहुत से चीजें हैं कि वो ऐसे गए थे कि थर्ड वर्ल्ड में एबॉर्शन फ्री कराने के लिए आप क्या करो? आप वहाँ पे अमेरिका डोनेशन दे देंगे। तो अभी या है, वो चैरिटी दे रहा है, पर वो चैरिटी पूरा लेफ्ट विंग कॉजस के लिए थे और वो तामसिक कॉजस है। तो दान दे रहा है, पर दान किस उद्देश्य दे रहा है, किस चीज के लिए दान दे रहा है वो महत्वपूर्ण है। तो अभी आजकल के समाज में एक बहुत चीज उल्टी हो गई है कि साधारणतया जो ब्राह्मण होते हैं, वो दान लेते हैं, क्षत्रिय दान नहीं लेते हैं, क्षत्रिय वो कर लेते हैं, टैक्सेस लेते हैं, पर आजकल क्या है? पॉलिटिशियंस भी कैन्वसिंग करते हैं फंड्स के लिए, और उससे क्या होता है कि उनके फंड्स करके फिर वो अपना-अपना पॉलिटिकल कैंपेनिंग करते हैं। तो अगर ये इलेक्ट हो जाएगा, अभी मैं इसके पॉलिटिकल कैंपेन के लिए मैं मैं पैसा दूंगा, उसके बाद में वो मुझे परमिशन दे देगा, मेरा जो कॉन्ट्रैक्ट आगे बढ़ा देगा। तो जब दान जो है, वो एक बिजनेस का एक अलग पद्धति बन जा… तो दान जो है, वो एक सेवा के रूप में देते हैं, वो सात्विक है, भगवान के लिए देते हैं, तो वो और भी अच्छा है, पर वो एक एक तरह से डिलेड या कन्सील्ड बिजनेस है वो, कन्सील्ड डील है वो, तो वो राजसिक हो जाता है। और जो दान होता है, कुछ डिस्ट्रक्टिव कॉज के लिए होता है, कोई विनाश करने के लिए होता है, तो जो दान क्या होता है? वो तामस में होता है। तो अभी इस प्रकार से दान भी अलग-अलग पद्धति से हो सकता है। और बाद में भगवान बताते हैं, आखिरी जो है, उसका ज्यादा वर्णन नहीं है, वो थोड़ा टेक्निकल है, पर मैं आखिरी में बताता हूँ कि वो कहते हैं—ॐ तत्सत्—यह श्लोक है, यह ॐ तत्सत् के बारे में वर्णन करते हैं आखिरी सेक्शन में। और वहाँ पर वो क्या बताते हैं कि जो व्यक्ति ॐ तत्सत् यह तीन शब्द है, यह न केवल तीन शब्द को बोलता है, पर उसकी भाव को समझता है, तो क्या होता है कि वो व्यक्ति जो यज्ञ, दान, तप करता है, वो वास्तव में सही में अर्थपूर्ण होता है। तो अभी ॐ तत्सत् इसके अनेक अर्थ हैं, पर इसका एक सिंपल अर्थ है, इसके संदर्भ में हम बोल के अंत करते हैं। ॐ जो है, ॐ जो है… ॐ तत्सत् में एक भाव आता है कि मैं वो परमसत्य नहीं हूँ, कि हमारे उस परमसत्य से संबंध है, पर मैं वो परमसत्य नहीं हूँ। जैसे मैं अमेरिका में था, वहाँ पे एक व्यक्ति के टी-शर्ट पे स्लोगन था—मैं बहुत वर्ड कॉन्शियस हूँ, मैं हमेशा शब्द देखता हूँ। कोई बड़ा बिलबोर्ड भी होगा, तो मैं पहले उसका कैप्शन देखूँगा, फिर कैप्शन में इंटरेस्ट नहीं होगा, तो उसका पिक्चर देखूँगा मैं। तो पर कितने लोग होते हैं, वो टी-शर्ट पहनते हैं, टी-शर्ट पर क्या लिखा है, उनको खुद को भी ध्यान नहीं होता है। तो युवा प्रोग्राम में आया था, उसको टी-शर्ट पर लिखा था कि मैं एथीस्ट हुआ था, मैं तब तक नास्तिक था, जब तक मैंने नहीं देखा कि मैं भगवान हूँ! तो अभी क्या होता है? ‘तत्’ का मतलब है कि वो जो परमसत्य है, मैं नहीं हूँ। और ‘सत्’ का मतलब है एक्झिस्टेंस। तो वास्तव में क्या है? ॐ तत्सत्, इसका एक सिंपल अर्थ है कि वो जो सत्य है, मुझसे परे है, जो सत्य, जिसका अस्तित्व से, मास्टर मेरा अस्तित्व है, मैं उसको याद कर रहा हूँ। तो एक तरह से हम कहते हैं कि हमेशा भगवान का स्मरण करो, तो ॐ तत्सत् भी है, ये एक तरह से भगवत स्मरण ही है, थोड़ा इनडायरेक्ट है वो, पर जो वो परम चीज है, जिसका अस्तित्व है, और उसके अस्तित्व के कारण मेरा अस्तित्व है, तो कोई भी अगर अन्न ग्रहण कर रहा है, यज्ञ, दान, तप कर रहा है, उस समय उसको अगर ये याद है, तो फिर वो चेतना से अगर कार्य करेगा, तो शास्त्र का मतलब ये नहीं है कि आपको शास्त्र का ये श्लोक याद होना चाहिए, और वो श्लोक याद होना चाहिए। शास्त्र का उद्देश्य पंद्रहवें अध्याय में भगवान ने बताया—वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो—तो अगर हम वो परमसत्य को याद रखे, परमसत्य की चेतना में रहते हुए अगर यज्ञ, दान, तप करते हैं, तो वो जो है, वो यशस्वी होगा, और ऐसे नहीं करेंगे, तो उसका जो परम यश है, वो तो नहीं मिलने वाला है। किस हद तक उसको कुछ फायदा होगा? वो सत्व, रजस, तमस में कर रहे हैं, उसके अनुसार उसका फैसला निर्धारित होगा। तो सारांश में, सत्रहवें अध्याय में हमने यह श्रद्धा के विभाग देखें—श्रद्धात्रय विभाग होगा। तो इसमें चार चीजें देखें हमने: तो भगवान बोलते हैं कि उनका आहार, यज्ञ, दान, तप देखो, किस गुण में है, कि उससे आप की श्रद्धा समझ पाएंगे। बहुत-बहुत धन्यवाद। हरे कृष्ण। एक प्रभुपाद शिक्षाक्षर प्रभु? एक प्रभुपाद शिक्षाक्षर प्रभु? यज्ञ, दान, तप। यज्ञ, दान, तप।Lecture Summary
सारांश: श्रीमद्भगवद्गीता (सत्रहवां अध्याय) – श्रद्धा और जीवन शैली
Full Transcription
भूमिका: अर्जुन का प्रश्न और श्रद्धा का अर्थश्रद्धा और वैल्यू सिस्टम (मूल्य प्रणाली)
श्रद्धा का परिवर्तन और अस्तित्व का प्रभाव
आहार, यज्ञ, दान और तप के प्रकार
‘ॐ तत्सत्’ का रहस्य और निष्कर्ष