Hindi – Chapter 09 Bhagavad Gita And Decision Making Bhagavad Gita Overview – Chaitanya Charan
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Lecture Summary
इस व्याख्यान में भगवद्गीता के सातवें से बारहवें अध्याय तक के मुख्य विषयों, विशेष रूप से नौवें अध्याय के दृष्टिकोण और जीवन में निर्णय लेने की प्रक्रिया पर चर्चा की गई है:
- सातवाँ और आठवाँ अध्याय (भगवान का स्मरण): सातवें अध्याय में भगवान मन को खुद में आसक्त करने (मय्यासक्तमनाः) की प्रेरणा देते हैं, और आठवें अध्याय में निरंतर उनके स्मरण (स्मरण करो) पर विशेष बल दिया गया है। ज्ञान और ध्यान योगियों का उद्देश्य ब्रह्म में लीन होना होता है, जबकि भक्ति ही अंतिम उद्देश्य है।
- नौवाँ अध्याय (भक्ति की महिमा और संसार चक्र): इस अध्याय में “बिकम माय डिवोटी” (मन्मना भव मद्भक्तो) के भाव के साथ भक्ति की सर्वोच्च महिमा बताई गई है। भक्ति न करने वाले लोग मृत्यु और संसार के चक्र (मृत्युसंसारवर्त्मनि) में घूमते रहते हैं।
- दसवाँ और ग्यारवां अध्याय (विभूतियाँ और भगवान की योजना):
- दसवें अध्याय में विभूतियों के माध्यम से भौतिक जगत में भगवान का स्मरण करना बताया गया है।
- ग्यारवें अध्याय में विराट रूप के दर्शन के द्वारा “गॉड्स प्लान” (भगवान की योजना) को समझकर अपनी भूमिका निभाने (“निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्”) की प्रेरणा दी गई है।
- बारहवां अध्याय (भक्ति के साथ कर्म के स्तर): भौतिक जगत में रहते हुए भक्ति के साथ कार्य करने के विभिन्न स्तर बताए गए हैं—यदि मन सीधे न लगे तो सेवा करें, और सेवा भी संभव न हो तो निष्काम भाव से कर्म करें। भगवान और जीव का संबंध शाश्वत है, अतः इसका फल भी शाश्वत (सुसुखम कर्तुम अव्ययम्) होता है।
Full Transcription
श्रद्धा केवल एक साधारण विश्वास नहीं है, बल्कि इसके कई गहरे स्तर होते हैं:
- गॉड्स एक्ज़िस्टेंस (God’s Existence): भगवान का अस्तित्व है।
- गॉड्स रिलेवेंस (God’s Relevance): भगवान का मेरी व्यक्तिगत जीवन से क्या संबंध और महत्त्व है, यह समझना।
- गॉड्स बेनेवोलेंस (God’s Benevolence): यह समझना कि भगवान केवल शासक नहीं, बल्कि हमारे परम हितचिंतक हैं।
- गॉड्स ऑल अट्रैक्टिवनेस (God’s All-Attractiveness): भगवान सर्वाकर्षक हैं और उनकी भक्ति ही जीवन का परफ़ेक्शन है।
ईश्वर का नियंत्रण और जीव की स्वतंत्रता
- प्रकृति पूरी तरह भगवान के नियंत्रण में है (“मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम्”)।
- भगवान का नियंत्रण आकाश के समान विशाल है, और जीव की स्वेच्छा (Free Will) उसमें बहने वाली वायु या केज (पिंजरे) में मौजूद पक्षी के समान है।
- व्यक्ति को अपने पूर्व कर्मों के अनुसार एक निश्चित क्षेत्र (क्षेत्रफल) प्राप्त होता है, जिसके अंतर्गत वह कार्य करता है, लेकिन कोई भी स्थिति या क्षेत्र शाश्वत नहीं रहता।
सभी का भगवान से संबंध
गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत्। प्रभवः प्रलयस्थानं निधानं बीजमव्ययम्॥
चाहे वे आस्तिक हों, भक्त हों, या भगवान के विरोधी, प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से सभी जीव भगवान के नियमों और व्यवस्था के अंतर्गत ही कार्य कर रहे हैं।
भक्ति योग की चार विशेषताएँ (EASy)
नवें अध्याय के अंतिम भाग में भक्ति योग को अपनाने के चार प्रमुख आधार बताए गए हैं:
- Everlasting (शाश्वत): भक्ति का फल और उसका प्रभाव शाश्वत होता है।
- Accessible (सुलभ): इसके लिए बड़े यज्ञों या धन-सामग्री की आवश्यकता नहीं है; पत्र, पुष्प, फल या हृदय के सच्चे भाव से भी भगवान को रिझाया जा सकता है (“पत्रं पुष्पं फलं तोयं”)।
- Safe (सुरक्षित): भक्ति का मार्ग अत्यंत सुरक्षित है। यदि कोई मनुष्य कभी गलती या दुराचार भी कर ले, तब भी भगवान उसकी भक्ति के भाव को देखकर उसका उद्धार कर लेते हैं (“अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्”)।
- Equal (सबके लिए समान अवसर): भक्ति के मार्ग में कोई भी व्यक्ति डिस्क्वालिफ़ाइड (अपात्र) नहीं है; हर पृष्ठभूमि और योनि के लोग इसके अधिकारी हैं।
अन्ततः भगवान का यही निर्देश है:
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु। मामेवैष्यसि युक्त्वैव आत्मानं मत्परāyaṇaः॥
मुख्य प्रवचन (Transcription)
तो सातवें अध्याय में हमने देखा कैसे भगवान बोल रहे हैं कि आप, आपका मन मुझमें आसक्त करो। माइंड अटैच टू मी, मय्यासक्तमनाः। तो उसी के सेंटर में सारा हमने देखा कैसे पॉइंट बढ़ रहा है। और फिर माइंड अटैच करने के लिए क्या ज़रूरी है? रिमेंबर मी, आप मेरा स्मरण करो। अभी स्मरण करो ये जो भाव है, उसका ज़ोर आठवें अध्याय में दिया है।
नवें अध्याय में भक्ति की महिमा
तो अभी नवें अध्याय में, क्या है कि बिकम माय डिवोटी। मन्मना भव मद्भक्तो। न केवल स्मरण करो, क्योंकि जैसे हमने कल देखा संक्षेप में, कि ज्ञान योगी और ध्यान योगी भी भगवान का स्मरण करते हैं। पर उनका उद्देश्य, ब्रह्म में लीन होना होता है। भक्ति उनके लिए माध्यम है, वो उद्देश्य नहीं है। तो अब भक्ति की महिमा कह करके क्या है, वो इस पर ज़ोर दिया जा रहा है नवें अध्याय में।
दसवें अध्याय में विभूतियों और भगवान की योजना के दर्शन
तो से दसवें अध्याय में जो है कि… डिवोशन, खास करके, अपनी योजना पर। कि जब हम भौतिक जगत में हैं, वहाँ पे हम भगवान का स्मरण कैसे कर सकते हैं? उसका वर्णन दसवें अध्याय में विभूतियोग के द्वारा होता है।
फिर ग्यारवें अध्याय में, खास करके विश्वरूप का दर्शन है, पर उसमें भगवान बता रहे हैं, कि कैसे, जब हमें एक तरह से, जब हम इस दुनिया में कार्य करते हैं, तो दो चीजें हैं, दुनिया में हम कार्य करते हैं, तो हमारी ज्ञान इंद्रियां कार्यरत रहती हैं, और कैसे हमें भगवान की योजना में सहभागी होना है। जो कर्मेंद्रियां हमारी कर्मेंद्रियां के अनुसार हम कार्य करते हैं।
तो इसमें क्या ग्यारवें अध्याय में विराट रूप के दर्शन से भगवान बता रहे हैं? सी गॉड्स प्लान। सी गॉड्स प्लान। मेरा प्लान यहाँ पर अच्छा नहीं था सब कुछ लिखने के लिए। बारहवां चैप्टर यहाँ पर नहीं आ पाएगा। सी गॉड्स प्लान। जब सब कुछ अच्छा चल रहा है, तो भगवान की योजना है, ऐसे हम समझ सकते हैं। पर जब विनाश हो रहा है, विध्वंस हो रहा है, तो भगवान की योजना कैसे देखनी है? वो न केवल भगवान की योजना देखनी है, भगवान की योजना में हमारी क्या भूमिका है, वो भी देखनी है। निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्। विस्तृत वर्णन ग्यारहवें अध्याय में आता है।
बारहवें अध्याय में कर्म और भक्ति का स्तर
और फिर जो बारहवें अध्याय में आता है हम कैसे इस जगत में कार्य करें एक्टिंग इन डिवोशन, इन वैदिक स्टैंडर्ड, जब भक्ति के साथ में इस भौतिक जगत में कार्य करना है, तो कार्य कैसे करें? इसमें भगवान बोलते हैं अलग-अलग स्तर होते हैं, अगर आप यह नहीं कर सकते हैं तो यह करो, आपका मन मुझमें में लगा सकते हैं तो फिर सेवा करो, सेवा नहीं कर सकते हैं तो निष्काम भाव से कुछ आप कार्य करो।
और वो खास करके बोलते हैं कैसे? आपको सद्गुण भी इस जगत में रखना ज़रूरी है हमको सुसुखम कर्तुम अव्ययम्। हमको शाश्वत काल तक आनंद मिल जाएगा क्योंकि भगवान शाश्वत हैं, हम शाश्वत हैं अगर हम सम्बन्धों से स्थापित कर लेते हैं तो वो जो फल है वो भी शाश्वत होगा और ये नहीं करेंगे तो क्या होगा? अश्रद्धानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि।
श्रद्धा के अलग-अलग स्तर
अभी यहाँ भगवान बता रहे हैं श्रद्धा के बारे में पर श्रद्धा के भी अलग-अलग स्तर हो सकते हैं। अभी कोई श्रद्धा कहता है, हम फेथ की बात करते हैं तो फेथ के अलग लेवल्स हो सकते हैं कि सबसे पहले है गॉड्स एक्ज़िस्टेंस कि भगवान का अस्तित्व है, वो ही श्रद्धा हो सकती है बहुत लोगों को उसमें श्रद्धा नहीं होती है पर वो श्रद्धा हो गई उसके बाद में गॉड्स रिलेवेंस कि ठीक है भगवान है, उससे मुझे क्या फ़र्क पड़ता है वो वहाँ बना था, या मैं इनेबल बना था इन चीज़ों से क्या होता है तो भगवान का मेरी जीवन में क्या सम्बन्ध है मेरी जीवन में क्या महत्त्व है यहाँ जब कोई समझेगा नहीं तब तक भगवान से सम्बन्ध जोड़ने की कुछ शुरुआत नहीं है।
जैसे क्या होता है? कोई सरकार है, अभी नासिक में कोई MP है, MLA है, कोई गवर्नमेंट है। गवर्नमेंट अपना काम कर रहा है, मैं अपना काम कर रहा हूँ। तो वो गवर्नमेंट का मुझसे क्या लेना-देना है? अभी गवर्नमेंट ही तो हमको फैसिलिटी दे रहा है, गवर्नमेंट कुछ रूल्स बना सकता है, वो रिलेवेंस है। पर वो उसको थोड़ा, अभी यहाँ पर एक नया बच्चा जन्मा हुआ है, छः महीने का बच्चा है, तीन साल का बच्चा है, उसको गवर्नमेंट का क्या समझेगा नहीं होगा। तो थोड़ा हमको एबल होना पड़ता है समझने के लिए कि भगवान का केवल न केवल अस्तित्व है पर उसका मेरे से सम्बन्ध है, रिलेवेंस है, पर उसके बाद में श्रद्धा होती है गॉड्स बेनेवोलेंस, मतलब केवल भगवान जो है वो एक शासक नहीं है, वो हितचिंतक है, यहाँ पर रिलेवेंस मतलब क्या है कि इसको भगवान को हम गवर्नमेंट के समान समझ सकते हैं, या गवर्निंग ऑथॉरिटी के समान समझ सकते हैं, पर यहाँ पर बेनेवोलेंस मतलब वो क्या है, कि वो हमारे हितचिंतक है, वो हमारी भलाई चाहते हैं। केवल सिर्फ हमको सुविधा दे रहे हैं, नियम बना रहे हैं, नियम को पालन करने की अपेक्षा कर रहे हैं।
और फिर उसके बाद में, अभी भगवान हमारे हितचिंतक हैं, ये भाव हो सकता है, पर फिर भी व्यक्ति की चेतना जो हो सकती है, वो भौतिक हो सकती है। मतलब भगवान इस जगत में मेरा सुख चाहती है। और वो सत्य है। भगवान ऐसे नहीं कि इस जगत में हमारा दुःख चाहते हैं। पर उसके परे आती है, गॉड्स ऑल अट्रैक्टिवनेस, कि भगवान सर्वाकर्षक हैं। कि भगवान की भक्ति में ही सर्वोचानंद है। यही जीवन का परफ़ेक्शन है। तो यह जो है, अभी यहाँ पर इस अध्याय में चर्चा हो रही है, यह श्रद्धा बोली जा रही है, वो इस स्तर पे श्रद्धा, श्रद्धा हर एक स्तर पे हो सकती है।
नवें अध्याय में श्रद्धा और संसार चक्र
तो अभी जो नवें अध्याय में एक तीसरे श्लोक में श्रद्धा बताई जा रही है, कि अगर आप मुझमें श्रद्धा नहीं रखोगे, यहाँ पर भगवतगीता में ऐसे भगवान नहीं बोलते हैं, कि तुम मुझमें श्रद्धा नहीं रखोगे, तो मैं तुमको नरक में भेजने वाला हूँ। कुछ धर्मों में ऐसी संकल्पना होती है भगवान की, भगवान तुमसे इतना प्रेम करते हैं, कि तुम उनसे प्रेम नहीं करोगे, तो तुमको नरक में भेज देंगे, हमेशा के लिए। तो अब कैसे प्रेम है यह? वास्तव में भगवान ऐसे नहीं, अगर हम उनसे प्रेम नहीं करते हैं, इसके लिए वो नरक में किसी को नहीं भेजते, तुम कैसे कर्म कर रहे हो? उसके अनुसार, तुम इस संसार चक्र परिवर्तन यत्। हम इस संसार चक्र में उधर-उधर घूमते रहेंगे, सत्कर्म किए हैं तो ऊपर उठेंगे, दुष्कर्म किए हैं तो हम नीचे जाएंगे, पर भगवान क्या बोल रहे हैं?
अगर आप भक्ति नहीं करोगे, आपको भक्ति में श्रद्धा नहीं है, अश्रद्धानाः पुरुषाः, तो क्या होगा? मृत्युसंसारवर्त्मनि, इस भौतिक जगत में तुम घूमते रहोगे, अब यह मृत्युसंसार जो है, इसमें यह ऐसा सागर है, जहाँ पर कई, कुछ ऐसी जगह है, जो बहुत शांत होती है, अच्छी लगती, पानी शांत लगता है, कहीं पानी बहुत तूफानी होता है, तो इस जगत में, कभी खुशी, कभी गम होता है, पर वो इस जगत में ही फंसा रहता है। तो इसलिए जब ये बोल रहे हैं, ये नरक और स्वर्ग की बात नहीं है। यह मोक्ष और बंधन का चॉइस है। तो भी ये पहले बोलते हैं भगवान, कि यह जो ध्यान है, यह बहुत महत्वपूर्ण है।
भगवान का संपूर्ण नियंत्रण और भौतिक जगत की वास्तविकता
और फिर दूसरा श्लोक के बाद में बॉर्डर टू ईट हिम अभी भगवान की भक्ति क्यों करें? क्योंकि भक्ति के न करने या न करने का बहुत परिणाम है। उसके बाद में, जो चार से दस, इसमें बोल रहे हैं कि क्योंकि भौतिक प्रकृति कुछ न लगता अच्छा कर दूँगी। सारी चीज़ें जो हैं वो भगवान के ही नियंत्रण में हैं। मयाध्यक्षेण प्रकृतिः। तो यहाँ कोई समझेगा कि सारी चीज़ें जो हैं अंत में वक्र भगवान के ही नियंत्रण में हैं। अगर वो व्यक्ति सब कुछ नियंत्रण कर सकते हैं, तो वो क्या चाहते हैं? उनके अनुसार कैसे कार्य करना है समझना ज़रूरी है।
इसलिए ही सवाल आता है अगर भगवान सब कुछ नियंत्रण करते हैं, तो जब जगत में जगत होती है, तो क्या पराजागत? जो बुरी चीज़ें होती हैं इस जगत में, वो कैसे होती हैं? तो इसके लिए इस अध्याय में एक बहुत सुंदर उदाहरण दिया जाता है। वो श्लोक हम देखते हैं। मैं पहले अर्थ बताता हूँ, फिर इसको हम दोहराते हैं।
यथा आकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान्।
तथा सर्वाणि भूताणि मत्स्थानीत्युपधारय॥
जैसे आकाश जो होता है, आकाश के अंदर वायु रहती है। सर्वत्रगो महान्। वायु हर जगह जाती है, पर हमेशा आकाश के अंदर रहती है। उसी तरह से तथा सर्वाणि भूताणि। उससे सारे जीव जो हैं, भगवान कहते हैं, मत्स्थानी त्य उपधारय। वो सारे मेरे अधीन मेरे स्थान में रह रहे हैं। यथा आकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान्। तथा सर्वाणि भूताणि। मत्स्थानी त्य उपधारय।
प्राकृतिक और नैतिक बुराई (Natural and Moral Evil)
अभी यह महत्वपूर्ण है समझना, यहाँ पर क्या बता रहे हैं भगवान। अभी इंग्लिश में, बुरी चीज़ों को जो हो जाया है, उसको इविल बोला जाता है। अभी जो इविल की संकल्पना है, यह हम कुछ हद तक पाप से वैदिक शास्त्रों में तुलना कर सकते हैं, पर पाप का एग्ज़ैक्ट इक्विवेलेंट है सिन। पाप मतलब कोई व्यक्ति पाप करता है, पर इविल का जो इंग्लिश में अर्थ होता है, जो बुरी चीज़ों का अस्तित्व है, जो बिल्कुल बुरा है, उसका जो अस्तित्व को सिग्निफाई इविल कहा जाता है।
आभी जो इविल में दो कैटेगरीज पायी जाती हैं, एक है नेचुरल इविल, और दूसरा है मोरल इविल। अगर भगवान अच्छे हैं तो फिर निसर्ग के द्वारा बुरी चीज़ें क्यों होती हैं? निसर्ग में भूकंप होता है निसर्ग में तूफान आता है निसर्ग में बाढ़ आ जाती है तो नैसर्गिक रूप पे बुरी चीज़ें क्यों होती हैं? यह एक समस्या है।
और मोरल इविल मतलब, कि अगर भगवान ने ही सब लोगों को बनाया है, तो फिर जीव बुरा कार्य क्यों करते हैं? और छोटी-मोटी गलती हम समझ जाते हैं, पर ऐसे गुणास्पद कार्य करते हैं कभी-कभी। और ऐसे कार्य करते हैं, कि वो करते हुए उनको कुछ हिचकिचाहट भी नहीं होती है। उनको साधारण व्यक्ति जो होते हैं, बुरा कार्य करते हैं, तो उनको कुछ बुरा लगता है, कि ऐसे हम डाँट देते हैं, तो गुस्से में कुछ बोलते हैं, बाद में हमको देखते हैं कि उनको कितना बुरा लगा है, हमको भी बुरा लगती है कि ऐसे हमें नहीं बोलना था। तो क्या होता है, कि ये नेचुरल और मोरल इविल ये दोनों हैं। यह अभी कैसे आते हैं।
भगवान की अध्यक्षता और जीव की स्वतंत्र इच्छा (Free Will)
तो अभी भगवान बताते हैं कि सारी जो प्रकृति है वो मेरे अधीन कार्य करती है। मयाध्यक्षेण प्रकृतिः। वो ये गॉड का अल्टीमेट कंट्रोल स्पष्ट है। पर अगर आप वो देखते हैं उसी श्लोक में हम साधारणतया वो पहली पंक्ति को बोलते हैं मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम् उसके द्वारा सारे चर और अचर चीज़ें निर्मित होती हैं पर उसके बाद में भगवान क्या बोल रहे हैं हेतुनानेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते सेकंड पार्ट है वो काफी अलग है उस श्लोक का सबको हम एक ही चीज़ बोल रहे हैं कभी-कभी भगवान क्या बोल रहे हैं कि मेरे अध्यक्षता में ये जगत की निर्मिती होती है पर इसके कारण उस जगत के निर्मिती के बाद हेतु अनेन अनेन मतलब इस हेतु से जगद्विपरिवर्तते है तो जगत में जो कारण हो रहा है भगवान यह कहती है कि मैं ही कर रहा हूँ मेरे अधीनता में। वो मेरे ओवरसाइट में तो इसका फ़र्क है, इसको समझना थोड़ा सकते है, कि गॉड, जो है, अभी ब्रह्मसंहिता को कोट करते हैं, प्रभुपादा जी बोला करते थे, सर्वकारणकारणम्, कॉज़ ऑफ़ ऑल कॉज़ेज़, सब कारणों के कारण हैं भगवान, ये सही है, पर इसका मतलब ये नहीं है, भगवान एक कॉज़ ऑफ़ ऑल इफ़ेक्ट्स है, वो सारे कारणों के कारण है, सारे फलों के कारण नहीं है, अब इन दोनों में फ़र्क क्या है, कॉज़ ऑफ़ ऑल कॉज़ेज़, एंड कॉज़ ऑफ़ ऑल इफ़ेक्ट्स, तो अगर हम कह सकते हैं, कॉज़ ऑफ़ ऑल कॉज़ेज़ का उदाहरण क्या है, कि अगर बारिश है, ये वेदांत सूत्र में उदाहरण दिया गया है, कि बारिश हर प्रकार की हरियाली का कारण है। बारिश के बिना कोई हरियाली कहीं उगेगी नहीं। पर कहाँ कौन सी हरियाली उगती है? यहाँ बारिश नहीं निर्धारित कर रही है। वहाँ कौन निर्धारित कर रहा है? वहाँ पे किस प्रकार के बीज हैं वो निर्धारित कर रही है। तो बारिश नहीं निर्धारित कर रही है।
तो जो पहला पॉइंट है, यहाँ पे बता रहे हैं भगवान कि 9.10 अगर हम श्लोक को बोलते हैं कि चार पंक्तियाँ हैं तो ए और बी इसमें मेरे अधीनता में सब कुछ हो रहा है। मैंने चर-अचर जीव निर्मित किए हैं पर हेतु अनेन कौन्तेय वो हेतु है और उसके अनुसार जगत का परिवर्तन हो रहा है। इसका मतलब क्या है? कि भगवान ने हम सबको स्वेच्छा दी है और जब कोई जीव बुरा कार्य करता है उसका परिणाम जब होता है वो परिणाम वो भगवान नहीं कर रहे है वो जीव कर रहा है इसलिए भगवान जीव की शक्ति भगवान से आ रही है पर वो शक्ति का उपयोग कैसे करना है? वो भगवान निर्धारित नहीं कर रहे हैं। वो जीव निर्धारित कर रहा है।
आकाश और वायु का उदाहरण: ईश्वर का नियंत्रण और जीव की स्वतंत्रता
तो अभी जो श्लोक हमने दोहराया, इसमें थोड़ा समझ में आता है, कैसे वो बता रहे हैं, कि मान लीजिए जो आकाश है, उसको हम एक अपसाइड बाउल के समझ समझते हैं। तो अभी इसमें जो है, अगर मान लीजिए कोई पक्षी है, एक बड़ा कभी-कभी ऐसा होता है, कि पक्षियों के लिए जाली बनाते हैं, पर वो जाली होता है, अगर काफी बड़ा है, तो अभी पक्षी के जाली बड़ा होगा, तो क्या होगा अच्छा है बड़ा भी है, तो उसमें जो है अगर कोई पक्षी है यहाँ पर, वो नीचे उड़ सकता, बाजू में उड़ सकता, ऊपर उड़ सकता, हर जगह पे उड़ सकता है तो पर जितना भी उड़ेगा, क्या है? उस जाली के अंदर रहेगा वो।
तो अभी ये जो केज है… केज जो हो सकता है, कभी-कभी कोई पक्षी होते हैं, उनको पक्षियों को प्रेम करने वाला कोई होता है, तो केज नहीं होगा, कभी-कभी वैसे एक ग्रीन हाउस जैसे हो जाएगा। बड़ा है वो, ग्रीन हाउस मतलब क्या? कि वहाँ पर टेम्परेचर रेगुलेशन है पर वह एक बड़े शेड के समान है वह पर उसमें वह उड़ रहा है उसके बाहर नहीं जा सकता है वह। तो अभी ये जो है हम जो है अभी उदाहरण जो आपको दिया गया था कि वो जो आकाश है वो भगवान की योजना है भगवान का कंट्रोलरशिप है और जो वायु है वो वायु का हिलना जो है वो जीव की स्वेच्छा है तो इसको और गहराई से हम जानेंगे कैसे है कि गॉड्स कंट्रोलरशिप भगवान जो नियंत्रण कर रहे हैं और ऑवर फ्रीडम हमारी जो इंडिपेंडेंस है कई बार यह तत्वज्ञान में सवाल आता है कि अगर भगवान सब कुछ कर सकते हैं तो फिर क्या हमारे पास स्वेच्छा वास्तव में है तो भगवान का कंट्रोलरशिप कैसे है वो एक आकाश के समान है और हमारी स्वेच्छा है वो विंड के समान है यह एक केज के समान है और उसमें पक्षी है कोई पक्षी का केज बहुत बड़ा होता है कोई पक्षी का केज बहुत छोटा होता है तो अभी इसको समझने का प्रयास करेंगे हम तो क्या है अलग-अलग लोगों को अपने-अपने प्रकार का केज होता है केज मतलब क्या? कि अभी किसी व्यक्ति ने अच्छा कर्म किया है पहले। तो फिर किसी का क्षेत्र बड़ा हो सकता है।
कर्म और क्षेत्र (क्षेत्रफल) का विस्तार
अभी सबको गुस्सा आता है। अगर छोटे बच्चे को गुस्सा हो कि तीन महीने का बच्चा है तो इतना तो बुरा नहीं होगा उसका पैर भी इतना छोटा है, वो किसी को लाथ मारेगा तो उसके पैर को ही लगेगा। किसी और को कुछ लगने वाला नहीं है वो। तो उसका क्षेत्र बहुत छोटा है। पर जैसे वो बच्चा बड़ा हो जाता है। तो अगर वही जो तीन महीने का बच्चा लाथ मारता है और तीन साल का बच्चा लाथ मारता है तो उसका क्षेत्र भी बढ़ गया है वही तीस साल का व्यक्ति लाथ मारता है तो क्या उसका क्षेत्र और बढ़ गया है अभी सबको गुस्सा आता है पर अगर हमको गुस्सा आ जाएगा तो शायद हम किसीको थोड़ा बहुत बुरा बोल देंगे अगर अमेरिका के राष्ट्रपति या रशिया के राष्ट्रपति को गुस्सा आ जाता है वो एक बटन दबा देंगे और एक विश्व को न्यूक, एक विश्व के राष्ट्र को न्यूक कर सकते हैं पूरा वो। तो क्या है? अभी उनका क्षेत्र बड़ा है।
अभी हर एक व्यक्ति को अपने पूर्व कर्म के अनुसार एक क्षेत्र मिलता है। मतलब क्या है कि हम कह सकते हैं कि अगर किसी का लाइफस्पान है, किसी का जीवन की आयु है, साधारणतया कैसे होता है? जीवन की शुरुआत में जो उसका क्षेत्र होता है, बहुत छोटा होता है। फिर वो क्षेत्र बड़ा होने लगता है। अगर जब बूढ़ा हो जाता है, तो फिर क्या होता है? उसका क्षेत्र वापस कम हो जाता है। अभी यूरोप में, क्या यूरोप का पॉपुलेशन बहुत एज्ड हो रहा है? तो यूरोप में अभी ऐसे है कि वहाँ पे… अगर वृद्ध लोग हैं, उनको डायपर्स लगते हैं। उसका सेल ज़्यादा हो रहा है। तो मेडिकल टेक्नोलॉजी थोड़ा अच्छा हो गया है। तो क्या है? कि लोग लाइफस्पान थोड़ा लंबा हो गया है। और कृत्रिम रूप से भी लोग लाइफस्पान बढ़ाने का प्रयास करते हैं। तो क्या है? कि जो ओल्डएज है, उसको एक सेकंड चाइल्डहुड बोला जाता है। क्षेत्र बहुत कम हो जाता है, व्यक्ति असह्य हो जाता है।
इससे भिन्न क्या हो सकता है? तीन मित्र हैं, वो तीनों कॉलेज में जाते हैं, तीनों नौकरी पे लगते हैं। पर एक को बहुत पैसा मिलता है। बहुत प्रभावशाली बन जाता है, दूसरा भी बार-बार नौकरी से उसको फायर होता है, वो बार-बार नौकरी ढूँढ रहा है, कैसे तो भी अपना घर चलाने का प्रयास कर रहा है। तो व्यक्ति के क्षेत्र अलग-अलग हो सकते हैं।
हिटलर का उदाहरण और ऐतिहासिक अत्याचार
तो अभी यहाँ पर महत्वपूर्ण क्या है, कि मान लीजिए किसी एक व्यक्ति का क्षेत्र बहुत बड़ा है, और उस व्यक्ति के क्षेत्र में कोई दूसरा व्यक्ति आ जाता है। तो फिर जब यह पहले व्यक्ति के क्षेत्र में दूसरा व्यक्ति आ गया है, तो वो पहला व्यक्ति दूसरे व्यक्ति के साथ जो अच्छा व्यवहार कर सकता है, बुरा व्यवहार कर सकता है। और जब तक उसका क्षेत्र चलेगा, तब तक वो जो दूसरा व्यक्ति है, उस पे वो नियंत्रण कर पाएगा।
अभी हिटलर अपने पूर्व कर्म के अनुसार, शक्तिशाली राजा बनने का कर्म था उसका, पर वो क्या हो गया है, बहुत ही विनाशक राजा बन गया। ऐसा राजा बन गया कि, अभी बहुत सी जगहें जेनोसाइड, लोग, हज़ारों, लाखों के लोगों में मारा गया है, पर हिटलर का जो राजा है, उसका मॉडर्न हिस्ट्री में, करंट रिकॉर्डेड हिस्ट्री में, सबसे बहुत ही गुणास्पद है, क्या-क्या किया उसने, ही ब्राउट इंडस्ट्रियल एफ़िशिएंसी टू मास मर्डर, कि हज़ारों लोगों को मारना है, पर किसे गोली से भी मारना है, तो क्या होता है, समय लगता है, गोली स्पेंड होती है उसके लिए, बॉलीवुड का एक मूवी आया था उसमें, वो बोल रहा था, ये भारतीय लोग इतने नगण्य हैं, कि उन पे एक गोली भी वेस्ट नहीं करनी चाहिए, गोली बहुत कीमती है, तो मारना भी है, तो गोली से मत मारो, गोली मत वेस्ट करो, उनको मारने के लिए, तो गोली में पैसा लगता है, पर उसने क्या कर दिया, गैस चैंबर्स बना दिए, ताकि लोगों को बिना कम से कम खर्चे के मार सके, और हज़ारों को मार सके, तो अभी उस समय जो व्यक्ति, जो लोग, अभी खास करके यहूदियों को उसने टारगेट किया, तो किसी का बड़ा क्षेत्र है, और उस समय कोई व्यक्ति, दूसरा व्यक्ति उसके क्षेत्र में आ जाता है, तो फिर वो व्यक्ति उसके पर अत्याचार कर सकता है, गुणास्पद कार्य कर सकता है, तो इसका मतलब ये नहीं है कि भगवान का कोई नियंत्रण नहीं है, भगवान ने अपने सूयते सचराचरम्, हेतुनानेन कौन्तेय, भगवान ने कर्म के नियम के अनुसार, उस व्यक्ति को जो अच्छा कर्म पहले किया है, उसके अनुसार उसको भी एक क्षेत्र दिया है, पर ये क्षेत्र हमेशा के लिए नहीं रहने वाला है, वही हिटलर जो इतना अत्याचार कर रहा था, वो बाद में उसने खुद को ही आत्महत्या कर ली, उसका क्षेत्र कम होने लग गया, तो वो असह्य हो गया।
संकट के समय दृष्टिकोण और स्वीकार
जब हमारे जीवन में हमें कोई परेशान करता है, और हम प्रार्थना करते हैं राहत के लिए, पर राहत नहीं मिलती है, तो हमें समझना है कि अभी इस व्यक्ति का ये क्षेत्र है, या इस व्यक्ति का या इस राजा का ये क्षेत्र चल रहा है, तो उस समय ऐसे नहीं करना है कि हमें प्रतिकार नहीं करना है, जो हमारी क्षमता के अनुसार प्रतिकार करना है। पर अगर कुछ हो रहा है और उसका प्रतिकार नहीं कर सकते हैं, तो हमें स्वीकार करना है कि कभी-कभी ऐसे हो जाता है।
तो अभी बांग्लादेश में जो ऐसे है कि जो एक्सट्रीमिस्ट लोग हैं, तो जो राष्ट्रपति थी, उसका क्षेत्र एक पल में ख़त्म हो गया। इस राष्ट्र के राजा हो जैसे हो, अगले पल में दफ़ा हो जाओ यहाँ से। और फिर क्या हो, किसी अगर क्षेत्र आ गया, और उस क्षेत्र में, हिंदू धर्म के प्रति काफी हिंसा हो रही है। हिंदू धर्म ही नहीं, ईसाईयों के लोगों के प्रति भी और हिंदू माजॉरिटी में हैं। हिंदू का नंबर ज़्यादा है, और हिंदुओं को ज़्यादा टारगेट कर रहे हैं। पर क्या होता है कि अभी कुछ समय तक ऐसे क्षेत्र रहता है तो अभी जब कौरवों का क्षेत्र बड़ा बन गया था पांडवों का कम हो गया था तो तभी क्या हुआ था तभी कौरवों ने पांडवों के प्रति अत्याचार किया.. द्रौपदी के प्रति दुर्व्यवहार किया.. और उनका सारा राज्य जो है छीन लिया.. तो ऐसे होता है.. पर ये जो है.. जो क्षेत्र जो होता है किसी का भी हमेशा के लिए नहीं रहता है.. इसलिए व्यक्ति को ये नहीं कि तो जनता है कि ये ऐसे हो रहा है? इसका मतलब कि भगवान अभी नियंत्रण में नहीं हैं भगवान का नियंत्रण हमेशा रहता है अभी अगर भगवान का नियंत्रण रहता है, तो फिर हमें क्या करना चाहिए? तो कृष्णा में अगला सेक्शन करते हैं।
भगवान का सभी जीवों से संबंध
ये एक पॉइंट था। उसके बाद में, अगला सेक्शन जो है, सारे लोग जो हैं, अभी शायद उनको पता नहीं है, सारे लोग जो हैं, अभी शायद उनको पता नहीं है, वो भगवान की भक्ति नहीं कर रहे हैं, पर यद्यपि वो भक्ति नहीं कर रहे हैं, इसका मतलब नहीं कि भगवान का उनसे कुछ सम्बन्ध नहीं है। अभी भगवान से सब रिलेटेड हैं, और सब रिलेटेड हैं, उसके अनुसार सब लोग कार्य कर रहे हैं।
अभी इसका जो भाव है, वो अट्ठारहवें श्लोक में आता है।
गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत्।
प्रभवः प्रलयस्थानं निधानं बीजमव्ययम्॥
यहाँ पर बताया जा रहा है, कि भगवान ही सारे सृष्टि के गति हैं। हम सबको अंत में भगवान के पास जाना है, भर्ता हैं। कोई अच्छा कर्म कर रहा है, बुरा कर्म कर रहा है। सबका अंत में पालन-पोषण भगवान ही कर रहे हैं। प्रभु, वो हमेशा नाथ हैं, वो प्रभु हैं, नियंत्रण में रहते हैं, साक्षी हैं। सब कुछ वो देख रहे हैं। तो यह जो है, जब भी कोई व्यक्ति भगवान की भक्ति नहीं कर रहा है, इसका यह मतलब नहीं है कि उसका भगवान से कोई सम्बन्ध नहीं है।
अभी यह एक तरह से स्पेक्ट्रम है। जो भगवान के बहुत करीब है, उनका वर्णन आता है ग्यारहवें और बारहवें श्लोक में। जो भगवान के बहुत करीब है, उनका वर्णन तेरहवें और चौदहवें श्लोक में आता है। जो मेरे खिलाफ जाते हैं, वो बोलते हैं, वो क्या है? राक्षसीमासुरिम् चैव प्रकृतिम् मोहिनीम् श्रिताः। तो अभी यह जो बताया जा रहा है, यह वर्णन पूरा नास्तिकों के प्रति हो सकता है, पर यह मायावादियों के प्रति भी हो सकता है। जो भगवान के रूप की निंदा करते हैं, जो भगवान की निंदा करते हैं, भगवान की भर्त्सला करते हैं, जो भगवान के केवल एथिस्ट नहीं हैं, अच्छा आप कह सकते हैं, यह एंटीथिस्ट्स हैं। कोई भगवान को नहीं मानता है, वो ठीक है, अच्छा नहीं है, पर जो भगवान के खिलाफ होता है, एक नास्तिक है, वो हो रहे हैं, जीवन का उद्देश्य है, कि जो गॉड वायरस है, इसको सारे विश्व से इराडिकेट करते हैं। भगवान का तो अस्तित्व है नहीं, पर मानवों में भगवान का विश्वास यह एक वायरस के समान है। और जैसे हमने पहले स्मॉलपॉक्स को निकाल दिया, पोलियो को निकाल दिया, अभी हम मानवों ने इतनी प्रगति कर ली, कि यह गॉड वायरस को इराडिकेट करना चाहिए। तो उसका विचार है कि इससे जो विश्व का कल्याण होगा, उतना कल्याण किसी और से नहीं होने वाला है। तो अभी ऐसे विचार से अपशकुने पूरा।
ब्रह्मवादी और मायावादी और सबका भगवान से संबंध
पर क्या है, ऐसे जो लोग हैं, राक्षसीम् आसुरीम् चैव। जो मायावादी वग़ैरा हैं, उनका वर्णन है इसमें। मायावादी भी क्या होते हैं, वो एक तरह से आध्यात्मिक कार्य कर रहे हैं, वो मुक्ति चाहते हैं। मुक्ति में कुछ समस्या नहीं है, मुक्ति चाहने में। और फिर बताते हैं, तो एक तरह से, जो पहला श्लोक है, वो उनके थॉट्स के बारे में है, कैसे विचार करते हैं वो, इटरनल है। और दूसरा श्लोक जो है, वो एक्सटर्नल, कैसे उनका मन स्थित है, और कैसे वो बाहर से कार्य कर रहे हैं।
और फिर बीच में जो है, वो पंद्रहवें श्लोक में बताया गया है। तो यहाँ पे ब्रह्मवादी लोगों का वर्णन है, जो एकत्वेन, उनका भगवान के रूप के प्रति कोई अपराध का भाव नहीं है, पर वो चाहते हैं कि, मुझे एक होना है। पृथकत्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम्। ब्रह्मवादी एक्ज़ैक्ट्ली कौन हैं, मायावादी कौन हैं, उनका फ़र्क क्या है, उसके लिए हमारे पास समय नहीं है, पर यहाँ पर भगवान बता रहे हैं कि सब लोग जो हैं, वो मेरे सम्बन्ध में कार्य कर रहे हैं, जैसे पहले बता रहा था भगवान नहीं, मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना। मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः। सब मेरे रास्ते पे ही हैं, पर कुछ रास्ते में मेरे पास आ रहे हैं, कुछ रास्ते में दूर जा रहे हैं, पर सब मेरे रास्ते में ही हैं, और इस तरह से, सब कुछ मेरे नियंत्रण में हैं, सब मेरे सम्बन्ध में कार्य कर रहे हैं, पर किनका कल्याण होगा, जो मेरे नियंत्रण को समझते हैं, और मेरे सम्बन्ध में अनुकूल रूप से कार्य करते हैं, तो जो आखरी पार्ट है इस चैप्टर का, उसमें क्या हो रहा है? उसमें भगवान अभी बता रहे हैं कैसे हमें भक्ति करनी चाहिए?
भक्ति योग की चार विशेषताएँ (EASy)
तो अभी जो है 19 से 34 है पर इसमें एक तरह से चार विभाग हैं, उसका थीम क्या है? प्रैक्टिस भक्ति योगा करना चाहिए? उसके चार कारण भगवान देते हैं, ये चार श्लोक हैं, इसका मैं एक्रोनिम यूज़ करता हूँ EASy, क्या है ई मतलब? प्रैक्टिस भक्ति योगा करना चाहिए… भक्ति का जो फल है शाश्वत है फिर उसके बाद में बताते हैं एसेसिबिलिटी एसेसिबिलिटी जो है बता रहे हैं पत्रं पुष्पं फलं तोयं कि आप केवल आपको कोई बड़ा यज्ञ करने की ज़रूरत नहीं है आपको कोई बहुत धन सामग्री की ज़रूरत नहीं है आपको कोई अलग-अलग रीति-रिवाजों में निपुण होना ज़रूरी नहीं है वास्तव में क्या करना है आपको अपने हृदय का जो भाव है वो व्यक्त करना है वो जब व्यक्त करेंगे तो उससे क्या होता है भगवान प्रसन्न हो जाते हैं इसका मतलब रीति-रिवाज महत्वपूर्ण नहीं है कोई महत्वपूर्ण नहीं है ऐसे नहीं है पर जो नहीं कर सकता है उनके लिए भी भगवान एसेसिबल हैं तो भगवान सबके लिए जो है जो भी आपके पास है उसके साथ आप कर सकते हैं और वही भाव के लिए वो श्लोक बोलते हैं यत्करोषि यदश्नासि वो यहाँ तक बता रहे हैं कि अगर आप भक्ति भी नहीं है कोई बोलता है तो ठीक है पर एक बुद्धि के स्तर पर आप समझ लो कि मुझे भगवान की भक्ति करनी है इसलिए आप बुद्धि के स्तर पर वो अर्पण करो भगवान को चाहे जब कार्य करते थे तो याद नहीं रहता है फिर रीढ़ मुझे करना है भगवान के लिए संकल्प प्रस्मरा नारायणायेति समर्पयामी तो ये एसेसिबल है।
फिर उसके बाद में बताते हैं भगवान की जो भक्ति है वो सेफ़ है सेफ़ है क्या है तो बता रहे हैं भगवान अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्। साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः। बताते हैं कि भले ही कोई बुरा कर्म कर लेता है फिर भी अगर वो मेरी भक्ति में सुदृढ़ रहता है तो उसको अच्छा व्यक्ति मानना चाहिए यहाँ पर भी साधु शब्द है कभी-कभी उसका भाषांतर सेंटली होता है कोई संत है पर साधु का एक भाषांतर होता है अच्छा मुनय साधु पृष्टोऽहम् हे मुनि आपके प्रश्न बहुत अच्छे हैं तो आचार्यगण कई जगहों पर इसका अर्थ है कि आप फिर भी वो अच्छी तरह से सिचुएटेड हैं वो क्यों अच्छी तरह से सिचुएटेड हैं क्योंकि क्या है कि वो भक्ति कर रहा है उससे उसका शुद्धिकरण हो जाएगा मतलब कोई और मार्ग में ऐसे होता है कि कोई बुरा कार्य कर लेता है तो फिर क्या उसका ऐसे पतन हो जाता है कि एक मंत्र उच्चारण में उल्टा कुछ बोल दिया तो जो इंद्र को मारने वाला होता है इंद्र उसका मारने वाला बन जाता है तो उसमें ख़तरे बहुत होते हैं बाकी मार्गों में ख़तरे होते हैं पर यहाँ पर क्या है भगवान भावग्राही है भगवान भाव देखते हैं और वो भाव देखके व्यक्ति का उद्धार कर लेते हैं।
अभी इसका मतलब ये नहीं है… कि कोई कुछ भी पाप करने है और इसका फ़र्क नहीं पड़ेगा वो अर्थ नहीं है इसका पर इसका अर्थ क्या है कई भगवान की भक्ति कभी उसका विनाश नहीं होता है भगवान भक्ति को देखते हैं और भक्ति के आधार पर उस व्यक्ति का उद्धार करते हैं। यह सारे जो विषय हैं उन पे और चर्चा हो सकती है कि भक्ति का अपि चेत् सुदुराचारो इसका मतलब क्या है वास्तव में? कि कैसे क्या कौन दुराचार कर रहा है? तो किस हद तक उसको भक्त मानना चाहिए। वो बड़ा विषय है। पर महत्वपूर्ण यहाँ पे कहा है कि किसी ने दुराचार भी कर लिया, अगर वो भक्ति का भाव रख रहा है, और भक्ति करने का प्रयास कर रहा है, तो भगवान वो देखते हैं, उसका उद्धार कर लेते हैं। तो इसके नए एक उदाहरण शास्त्रों में, अजामिल का उदाहरण है, पूतना का भी उदाहरण है, अहो बकी यं स्तनकालकूटम्।
समता और अजामिल का उदाहरण
और फिर आख़िर यह 32, 33 जो है, इसको थोड़ा इंग्लिश थोड़ा कॉम्प्लिकेटेड शब्द है, इगैलिटेरियन। इगैलिटेरियन मतलब क्या, यह इक्वल है सबके लिए, इक्वल है, आसान शब्द है, पर इक्वल से, इक्वल से क्या पिछला अर्थ आता है, क्योंकि मैं इक्वल शब्द इस्तेमाल नहीं करना चाहता हूँ, पर यहाँ पर क्या है, सम क्या है, 9.29 में जो आता है, समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः, वो वहाँ पे आता है, पर यहाँ पर क्या है, भगवान सबको सम देखते है, इसका मतलब यहाँ पे है, कि भगवान किसी को अपात्र नहीं मानते हैं भक्ति के लिए, सब जीव हैं, मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः। किसी का कोई बुरा जन्म भी क्यों न हुआ हो, तो भी वो भक्ति के लिए पात्र है, तो आचार्यगण बताते हैं, कि ये दोनों में फ़र्क क्या है, कि एक तरह से, ये दोनों जो है, दुष्कर्म के बारे में हैं, पर ये जो है, ये प्रेजेंट बैड कर्म है, कि इस जीवन में कोई बुरा कर्म करता है, तो उसको भगवान ओवरलुक कर लेते हैं, और ये जो है, ये पास्ट बैड कर्म हैं, किसी ने पूर्व जन्म से कुछ बुरा कर्म किया है, उसकी कारण क्या हो गया, उसका ऐसे कुल में जन्म हो गया है कि वहाँ पे उस कुल में पुण्यई बहुत कम है, उसका ऐसे अधम जन्म हुआ है, तो फिर भी भगवान कहते हैं उससे भी आप डिस्क्वालिफ़ाइड नहीं होते हो।
तो भक्ति का भाव क्या है? हम जो हैं भक्ति में, हम कभी भक्ति के पात्र नहीं हैं, हम बहुत अशुद्ध हैं। हम अनक्वालिफ़ाइड हैं। हमें गुरु की कृपा चाहिए, हमें भगवान की कृपा चाहिए, यह ज़रूरी है। हम अनक्वालिफ़ाइड हैं पर हम कभी डिस्क्वालिफ़ाइड नहीं हैं। डिस्क्वालिफ़ाइड मतलब क्या? आपको पार्टिसिपेट करने का मौका ही नहीं है। किसी को कॉम्पिटिशन से डिस्क्वालिफ़ाइड कर दिया मतलब क्या है कि उसको अलाउ ही नहीं करते ऐसे कोई भी भक्ति में डिस्क्वालिफ़ाइड नहीं है हर व्यक्ति जो है वो शुद्ध हो अशुद्ध हो वो भगवान की भक्ति कर सकता है और उसके द्वारा उनका उद्धार हो सकता है इसलिए भगवान कहते है तो उसमें बड़ा पाप हो जाएगा पर वो अर्जुन को बता रहे है कि तुम्हारा जो हृदय है जो सही स्थान पर है तो अब ये अपि चेत् सुदुराचारो इस श्लोक का अर्थ गीता के संदर्भ में क्या है इसका बड़ा विश्लेषण है पर अगर अर्जुन सोचता भी है कि मैं भीष्म को तीर मारता हूँ मैं द्रोण को तीर मारता हूँ उसको वो दुराचार भी मान लेता है फिर भी अगर भगवान कह रहे है कि तुम मेरी भक्ति के भाव में सुदृढ़ हो तो क्या होगा क्षिप्रं भवति धर्मात्मा आप तुरंत धर्म में आ जाओगे और इसके द्वारा तुमको शाश्वत शांति निगच्छति आपको शाश्वत रूप में शांति मिलेगी तुमको कर्तव्य नहीं करोगे तुम हमेशा अशांत रहोगे तो भगवान उसको आश्वासन दे रहे हैं कि सब लोग भक्ति से उद्धार हो सकता है, तो फिर किम्पुनर्ब्राह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा तुम तो राजकुल में जन्म हो आए, तुम्हारा उद्धार ज़रूर होगा इसलिए अनित्यम असुखम लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम् यह जगत नित्य नहीं है, जगत में सुख नहीं है यह 9.33 में वही दोहराया है जो 8.15 में बताया था दुःखालयम अशाश्वतम् फिर हम बता रहे, भजस्व माम्, आप मेरा भजन करो और अंत में बोलते हैं, विदग्धस्य लोक है जो साथ में दोहराते हैं:
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।
मामेवैष्यसि युक्त्वैव आत्मानं मत्परāyaṇaः॥
तो भगवान बोलते हैं कि आप मेरी भक्ति करो, आप अवश्य माम् एवैष्यसि आप ज़रूर आओगे मेरे पास युक्त्वैव आप इससे से युक्तर होगे, तो ज़रूर मेरे पास आप पहुँच जाओगे।
सारांश
तो हमने सारांश में नवें अध्याय का भाव क्या था? किस तरह से? बिकम माय डिवोटी भाव है कि आप मेरी भक्ति करो और इसी का जो गुणगान है चैप्टर नाइन में तीन पद्धतियाँ जो होती हैं, सबसे पहले कैसे है कि? चार पद्धति से होता है सबसे पहले जो था जो 1 से 3 कि इसका कंसीक्वेंस जो है भक्ति करोगे तो क्या होगा? आपकी मुक्ति हो जाएगी नहीं तो फिर आप बंधन में फंसे रहोगे फिर उसके बाद में क्या है?
जो दूसरा पॉइंट था, कृष्णास कंट्रोलरशिप कैसे भगवान हमेशा नियंत्रण में है और उसके लिए हमने उदाहरण देखा कैसे एक क्षेत्र होता है किसी एक व्यक्ति का क्षेत्र होता है और उसमें किसी और कोई व्यक्ति अपने क्षेत्र में आ जाता है तो परिणाम होता है पर जो भगवान का कंट्रोलरशिप जो है, वो कैसे है? वो आकाश के समान है और जो जीव की इच्छा है वो क्या है? वो एक वायु के समान है जो उसमें फंसी हुई है फ़्रीडम जो है, उनका जो आज़ादी है, जो स्वतंत्रता है तो भगवान सब कुछ नियंत्रण में है वो भाव आश्वस्त कर रहे हैं भले इससे लग रहा है कि कोई और व्यक्ति नियंत्रण में है, दुष्कर्म कर रहा है पर फिर भी भगवान नियंत्रण में हैं।
फिर कृष्णास रिलेशनशिप कि सब कृष्णा से संबंधित है उसमें हमने देखा कैसे? कि सारे जो लोग हैं, वो भले नास्तिक हो या आस्तिक हो सारे भगवान से सम्बन्ध में ही है तो जो शुद्ध भक्त पॉज़िटिव साइड में एकदम जो नास्तिक हैं जो भगवान के रूप को निंदा करते हैं वो एक एक्सट्रीम है और बीच में बाकी सब लोग हैं जो देवताओं के पूजक वग़ैरा आख़िर में जो भाव था कि प्रैक्टिस भक्ति आप भक्ति ज़रूर करो उसके लिए आख़िर सेक्शन में आख़िर हाफ़ है चैप्टर का उसमें भगवान बताते हैं चार दृष्टियों से कैसे है ये एवरलास्टिंग है इसके फल बाक़ी किसी प्रक्रिया का प्रक्रिया का फल जो है वो एवरलास्टिंग नहीं है ये 4 से 10 है ये 11 से 18 है और ये 19 से 34 है तो 19 से 25 एसेसिबल किसी के लिए कोई धनसंपत्ति नहीं है तो भी वो भक्ति कर सकता है फिर जो है ये उसके साथ साथ जो है ये सेफ़ है ये कि सेफ़ मतलब कोई पतन भी हो जाता है तो वो पतन हमेशा के लिए नहीं रहेगा उस व्यक्ति का और फिर जो है ये इक्वल है ये सबको करने का मौका है ये 32 से 33 इसलिए अंत में भगवान बोलते हैं इसलिए आप ज़रूर मेरी भक्ति करो तो हम भगवान से प्रार्थना कर सकते हैं कि जो श्रद्धा है हमारी भगवान की भक्ति में जो श्रद्धा है वो श्रद्धा अलग-अलग पद्धति की होती है जो भगवान का जो फ़ैथ है भगवान का अस्तित्व ही हो सकता है वो एग्ज़िस्ट करते हैं वो रिलेवेंट है वो बेनेवोलेंट है और फिर वो अट्रैक्टिव तो हमें जो है जो भगवान कैसे आकर्षक हैं उस पे हमें अगर श्रद्धा जागृत हो जाएगी तो भगवान की भक्ति करने में ज़रूर में प्रेरणा बहुत अच्छी हो जाएगी सुदृढ़ हो जाएगी।
बहुत-बहुत धन्यवाद हरे कृष्णा।