Hindi Fulfilling our desires through devata worship vs through Krishna devotion Bhagavad Gita 4 .12
- Home
- Practical Krishna Consciousness
- Hindi Fulfilling our desires through devata worship vs through Krishna devotion Bhagavad Gita 4 .12
Disclaimer: This transcript was generated using AI and may contain occasional errors or inaccuracies. यह हिंदी व्याख्यान श्रीमद्भगवद्गीता के चौथे अध्याय के 12वें श्लोक पर आधारित है, जिसमें भगवान कृष्ण समझाते हैं कि मनुष्य अपनी भौतिक इच्छाओं की पूर्ति के लिए देवताओं की शरण में जाते हैं, जबकि वास्तविक आध्यात्मिक प्रगति भगवान की भक्ति और आत्म-शुद्धि से होती है। इस सार को निम्नलिखित मुख्य बिंदुओं में समझा जा सकता है: कांक्षन्तः कांक्षन्तः कांक्षन्तः कांक्षन्तः कांक्षन्तः कांक्षन्तः कांक्षन्तः कांक्षन्तः कांक्षन्तः कांक्षन्तः कांक्षन्तः कांक्षन्तः कांक्षन्तः कांक्षन्तः कांक्षन्तः कांक्षन्तः कांक्षन्तः कांक्षन्तः कांक्ष कर्म से ही फल आ जाता है, पर कई बार ऐसे होता है कि हम कर्म करते हैं पर कर्म से फल नहीं आता है। तो जब ऐसे होता है, तो फिर सवाल आता है क्या हो रहा है? हम पढ़ाई कर रहे हैं पर अच्छे मार्क्स नहीं मिल रहे हैं एग्जाम में। हम नौकरी में अच्छा काम कर रहे हैं पर हमको कुछ प्रमोशन नहीं मिल रहा है, कुछ रेज नहीं मिल रहा है। हम हमारे परिवार में हमारी जिम्मेदारियां कर रहे हैं पर कोई हमारी सराहना नहीं कर रहा है, कोई हमारी कीमत ही नहीं दे रहा है। तो जब हम कर्म करते हैं और उसका फल नहीं मिलता है, तो फिर सवाल उठता है यह क्या हो रहा है? यह क्यों हो रहा है? तो उस समय जब हम किसी कर्म से फल की ओर जाना चाहते हैं पर उसके बीच में कुछ आ जाता है जिसके कारण हम जान ही पाते हैं क्या व्यक्तिय है? शायद हमें वो पता भी नहीं है, पर कुछ तो है जिससे कर्म का फल नहीं मिल रहा है। तो उस समय क्या होता है? उस समय मानव ऊपर देखने लगता है। साधारण टाइम आगे देखते हैं कि मुझे यह चाहिए, मैं इधर जाऊंगा, पर जहां मैं जाना चाहता हूं वहां पर अगर मैं जा नहीं पाता हूं, तो फिर हम देखते हैं कि इसके ऊपर कोई है। तो यह साधारण प्रवृत्ति है कि कोई दो बच्चे हैं वो स्कूल में खेल रहे हैं उनमें कोई झगड़ा हो जाता है, तो शायद वो आपस में ही अपनी बात हल करने का प्रयास करते हैं और जब आपस में हल नहीं होता है, तो फिर वो ऊपर देखते हैं भगवान क्यों नहीं देखते हैं या कोई वो टीचर के पास जाएंगे, अपने माता-पिता के पास जाएंगे। तो जब हमारे स्तर पे कुछ समस्या का हल नहीं होता है, इच्छा की पूर्ति नहीं होती है, तो हम ऊपर देखते हैं। तो अब जब ऊपर देखते हैं, तो यहां पे जो भगवान बताते हैं कि यहां पे देवता गण हैं। तो ऊपर बहुत कुछ है पर यहां पे देवता हैं। तो भगवान क्या बता रहे हैं यहां पे कि जब व्यक्ति अपनी इच्छाएं पूरी करना चाहता है और उस समय वो… हाँ, अच्छा, मैं कह रहा था कि ये दोनों दिखना चाहिए या आप यहां पे इस तरह से रखो ताकि स्पीकर और वो दोनों दिखे तो मैं भी इसको आप इधर बीच में कर सकते हैं, चाहिए तो क्या हुआ? आपको पूछा है तो आप इधर आ जाएंगे, मानते हैं, यह नहीं पूछा है, यह पूछा नहीं कर पा रहा हो तो ऐसे नहीं बता रहे हैं जिया कि भगवान, आप यह करो। मतलब शास्त्रों में दो चीजें होती हैं। कई चीजें ऐसी होती हैं कि जब शास्त्र होते हैं, गीता जो है, उसमें कुछ चीजें प्रिस्क्रिप्टिव होती हैं। प्रिस्क्रिप्टिव मतलब भगवान बोलते हैं कि आप ऐसा करो। और कुछ जो है वो डिस्क्रिप्टिव होती हैं। डिस्क्रिप्टिव मतलब क्या? लोग ऐसा करते हैं। तो अगर आप… अगर आप सिंगापुर में रह रहे हैं, भारत से हैं आप, तो सिंगापुर में लोग उनका विवाह होता है तो लोग ऐसे करते हैं। उनका विजुअल ऐसे होता है, उनका सेरेमनी ऐसे होता है। तो इसका मतलब यह नहीं है कि हम अगर सिंगापुर में होते हैं, तो हमें भी विवाह ऐसे करना है। तो डिस्क्रिप्टिव और प्रिस्क्रिप्टिव यह तो अलग चीजें हैं। तो शास्त्र में हर चीज़ जो बताई है, वो ऐसे नहीं है कि वो प्रिस्क्रिप्टिव है, वो हमें करनी है। कई चीजें ऐसी होती हैं कि उस समय ऐसे हुआ। उस समय लोग ऐसे करते थे। या ऐसे भी साधारणतया लोग इस तरह से कार्य करते हैं। तो भगवान यहाँ पर बता रहे हैं कि ऐसे लोग कार्य करते हैं कि जब उनको अपने कर्म में फल नहीं मिलता है, तो वो किसी को याचना करते हैं। तो अभी हमसे ऊपर जो है, अभी एक बाहर इस तरह पर होगा कि हम कुछ सोसाइटी में प्रॉब्लम है, तो सोसाइटी कोई चेयरमैन बने उसके पास जाएंगे। हमको हमारी कम्युनिटी में कुछ प्रॉब्लम होगा, उससे बड़ा कोई प्रॉब्लम होगा, तो फिर हम कोर्ट में जाएंगे। तो साधारणतया क्या है कि हमारे स्तर पे प्रॉब्लम सॉल्व नहीं होते हैं, तो हमारे स्तर पे जो इच्छा पूरी नहीं होती है, तो हम उसको एस्कलेत करते हैं। तो एस्कलेत जब करते हैं, उसको किसी और ऊपर के पास जाते हैं। तो उससे क्या है? ऐसी अपेक्षा है कि वो जो समस्या है, वो सॉल्व हो जाएगी। और भगवान यहाँ पर कहते हैं, हाँ, वो सॉल्व भी हो जाएगी और जल्दी हो जाएगी, भगवान कहते हैं। क्षिप्रं हि मानुषे लोके। जल्दी ही अगर कोई देवताओं की पूजा करेगा, तो उससे उनकी जो इच्छा है, कांक्षा है, वो पूरी हो जाएगी। और अभी हम यह देखते हैं कि विश्व भर में ऐसे नहीं है कि जो धार्मिकता है, वो खत्म हो गई है। कई ऐसे सोशल साइंटिस्ट थे, वो कहते थे कि जैसे विज्ञान बढ़ जाएगा, धार्मिकता कम हो जाएगी। पर वैसे नहीं हुआ है। हम अमेरिका में देखते हैं, तो अमेरिका पाश्चात्य देशों में सबसे रिलीजियस कंट्री है। हमारे लिए शायद कल्पना होता है कि अमेरिका मतलब हॉलीवुड वगैरह है, पर जो सदन पार्ट है, अमेरिका का मिडलैंड जो है, वो बहुत रिलीजियस है। भारत में भी धार्मिक चेतना बढ़ रही है। चाइना में भी जो ताविज्म पूरा डिलीट हो गया था, लगभग, इरेडिकेट हो गया था, नाम के वास्ते था, वो भी बहुत जागरूक हो रहा है। बुद्धिज्म तो बहुत फैल रहा है। तो जो धार्मिक इंस्टिंक्ट जो है, वो किसी को पूजना और उससे कुछ मुझे प्राप्त हो जाएगा, ये भाव अभी तक विश्व में है। कोई कह सकता है कि कितनी इच्छाएं पूरी होती है किसी की, पूरी होती है या नहीं होती है, वो सब हम चर्चा कर सकते हैं, पर इस तरह से विधी होती है। तो अभी यह इस श्लोक का अर्थ है। अभी इसके आगे हम इस श्लोक का अर्थ मिल गया था, इसके आगे हम देखें कि इसमें गीता में चल क्या रहा है। तो साधारणतया मैं किसी एक श्लोक पर कोई क्लास लेता हूँ, तो मैं ये थ्री पॉइंट फ्रेमवर्क लेता हूँ, CIT। CIT क्या है? सबसे पहले C का मतलब क्या है? हमारी चेतना को हम एक्सपैंड करते हैं, ताकि हम समझ सकें। सबसे पहले C क्या है? ये क्या चल रहा है इसमें? फिर A है उसका इम्प्लिकेशन। इम्प्लिकेशन मतलब उसका अर्थ क्या है? ये क्या बोला जा रहा है इसमें, उसका अर्थ क्या है? और यह T है टेकअवे, इसका हम सब के लिए क्या मतलब है? तो इस तरह से ये तीन चीज़ों को हम देखेंगे अभी। तो अभी यह गीता का चौथा अध्याय चल रहा है, और चौथे अध्याय में कितने श्लोक हैं? किसी को पता है? 42 श्लोक हैं। तो 42 श्लोक में जो भगवान बोल रहे हैं, भगवान चौथे श्लोक तक बोलते हैं कुछ, और जब वो कुछ बोलते हैं, वो कहते हैं कि कैसे, जो दिव्य ज्ञान है, जो मैंने सनातन काल से दिया है, मम विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्यम्। तो तभी पांचवें श्लोक में, अर्जुन के सवाल के जवाब में, चौथे श्लोक में अर्जुन एक सवाल पूछते हैं, कि आपने सूर्यदेव को कैसे ज्ञान दिया है, कि आप तो जूनियर हैं, सूर्यदेव तो अपने बहुत पहले से था, तो आपने ज्ञान कैसे दिया है? तो उस सवाल का जवाब है, वो भगवान यहाँ पर दे रहे हैं, और यहाँ से जो फिफ्टीन्थ श्लोक तक जो है, ये बेसिकली एक तरह से एक डिटूर है। डिटूर मतलब क्या है कि मान लीजिए कोई क्लास चल रहा है, तो क्लास के बीच में कोई सवाल पूछ रहता है, तो वो सवाल वैलिड सवाल है। वैलिड सवाल पूछ रहा है, पर क्या है? भगवान का पोजीशन क्या है, भगवान की मनोवृत्ति क्या है, भगवान की प्रवृत्ति क्या है, भगवान के गुण क्या है, यह दोनों के बारे में यहां पर वर्णन हो रहा है। और अभी इसके पहले जो श्लोक था, 4.11, ये था—ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्। मम वर्तमानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः। यह एक तरह से क्या है? यह एक शिफ्ट पॉइंट है। शिफ्ट पॉइंट का मतलब क्या है कि अगर मान लीजिए कोई मूवी चल रहा है, तो मूवी में प्लॉट ट्विस्ट कहते हैं। प्लॉट ट्विस्ट मतलब क्या है कि ये कोई व्यक्ति है, जो हीरो का मित्र लगता है, और वो मैंटीस है, मदद कर रहा है, पर बाद में ये चेहरे दिखाते हैं कि ये तो विलन के साथ बात कर रहा है, और वो जो विलन है, वास्तव में उसका आदमी है ये, जो हीरो के साथ विश्वासघात करने के लिए योजना बना रहा था। तो क्या, वो एक प्लॉट ट्विस्ट हो गया है, तो वो एक दिशा में जा रहे हैं, और अभी अलग दिशा में जा रहे हैं, तो कहानी बदल जाती है। तो वैसे ही क्या है, अभी तक ये 4.5 से 10 तक, भगवान बता रहे हैं, कि किस तरह से वो इस जगत में अवतार लेते हैं, और क्या करते हैं? पहले वो धर्म की स्थापना करते हैं, धर्म की स्थापना करते हैं, और उसके बाद में कहते हैं, कि वो हमें भक्ति में प्रेरित करते हैं, और उससे क्या होता है, व्यक्ति को मोक्ष, मुक्ति प्राप्त हो जाती है, वो भगवत प्राप्ति हो जाती है। पुता मद्भवा आगता—भगवान का अवतार होता है ताकि जीव का उद्धार हो सके। तो जब भगवान ऐसे बताते हैं दैट द डिवाइन डिसेंट इज मेंट फॉर द ह्यूमन असेंट। भगवान ऊपर से नीचे आते हैं ताकि हम नीचे से ऊपर जा सकें। तो यह आध्यात्मिक जगत है जो भगवान का धाम है और हम अभी भौतिक जगत में हैं। तो भगवान का अवतार इसलिए होता है। तो यहां पे फिर अर्जुन को सवाल आता है कि अगर आप इस विश्व का कल्याण चाहते हो, आप इस विश्व से सबका उद्धार चाहते हो, तो फिर आपको छोड़ कर आपको पूजा करने के लिए लोग भगवान का पूजा करते हैं। आपको पूजा करने के लिए लोग भगवान का पूजा करते हैं। वर्ण-आश्रम पूजा करते हैं। तो कृष्णा का जो मूड है कि ऐसे नहीं है कि आपको पूजा करने के लिए लोग भगवान का पूजा करते हैं। कुछ धर्मों में सब बताता है कि गॉड पूजा करते हैं। गॉड पूजा करते हैं कि तुम मेरी पूजा नहीं करोगे तो… भगवान पजेसिव नहीं हैं, भगवान क्या है? जेलस है? जेलस नहीं, जेलस, जेलस मतलब क्या है? वो हमारा उद्धार चाहते हैं। भगवान पजेसिव नहीं हैं, वो प्रोटेक्टिव हैं। प्रोटेक्टिव मतलब क्या है कि वो हमारा संरक्षण करना चाहते हैं। इसलिए भले ही हम उनकी भक्ति नहीं कर रहे हैं, तो वो हमें ठुकरा नहीं देते हैं। वो दूसरी आज्ञा में आते हैं। कोई माता-पिता की अगर इच्छा होगी कि उनका बच्चा इस स्कूल में पढ़े या ये फील्ड में पढ़े, और वो बोले कि इससे तुम्हारा बहुत अच्छा हो जाएगा, तुमको अच्छी नौकरी मिलेगी, तुमको अच्छा पैसा मिलेगा, तुमको अच्छी जीवन में सेटल हो जाओगे। तो अगर बच्चा बोलते हैं, तो अगर माता-पिता बोलते हैं कि तुम अगर ये नहीं पढ़ने वाले हो, तो तुम जो भी पढ़ने वाले हो, तुमको पैसे नहीं दूंगा, तुम खुद पैसे कमाओ, तुम खुद अपनी, ऐसे हो सकता है तुम यह नहीं करना चाहते हो, तुम क्या करना चाहते हो? फिर वो थोड़ा बातचीत होगा, थोड़ा डिस्कशन होगा, तो वो लेकर तुम यह नहीं कर सकते हो, तुम यह करना चाहते हो। तुम यह क्यों होता है? पूर्वकर्म पर कंट्रोल नहीं है। तो जो पूर्वकर्म को एडजस्ट करने के लिए लोग अलग-अलग चीजें करते हैं। तो पूर्वकर्म को एडजस्ट करने के लिए कोई शनि पूजा करेगा, कोई मंगल यह करेगा, कोई यह करेगा। अलग-अलग ज्योतिषी के पास जाते हैं, यह नहीं हो रहा है, तो क्या करें? ज्योतिषी बोलेगा, आप यह यज्ञ करो, यह पूजा करो, यह मंत्र जपो। तो क्या है? तो वो जो इस तरह से हमारे जो नॉर्मल एफर्ट्स हैं, नॉर्मल एफर्ट्स के परे जो है, वो कुछ करते हैं, हमारी प्रेजेंट शक्ति से जो हम नहीं कर पा रहे हैं, वो करने के लिए हम कभी-कभी देवताओं के पास, तो कभी-कभी हम हमसे शक्तिशाली जो हैं, उनके पास जाते हैं, तो उनमें कौन है? देवता होते हैं। तो अभी जो वैदिक शास्त्र में बताएगा कि अभी हम यह पृथ्वी पर है, तो क्या है कि हमारे ऊपर यह मान लीजिए, यहाँ पे स्वर्ग लोक है। हमारे ऊपर जो है, देवताओं का लोक है, यहाँ पे मानव है। पर देवताओं के ऊपर जो है, वो भगवान है, जो भगवान है, भगवत धाम है। तो अभी हमको यहाँ पे कुछ फल चाहिए, तो डायरेक्टली ऐसे नहीं हो रहा है, तो क्या कहते हैं कि आप देवताओं की पूजा करो और देवताओं की पूजा से आपको फल मिलेगा। कुछ लोग ऐसी धारणा करते हैं, इसलिए वो देवताओं के पास जाते हैं। भगवान के पास जाने के लिए अपने देवताओं के पास तुम्हें लाते हैं, उसका कारण बताते हैं कि ये जो है, क्षिप्रेम, ये क्विक होता है, जो क्विक होता है, जल्दी हो रहा है। तो जो अगर भगवान के पास जाएंगे, तो उसको कभी समय लग सकता है। इसलिए नहीं कि हर बार टाइम लेगा, कि जो अभी मैंने कर्म किया है, तो अभी फल क्यों नहीं मिलता है मुझे, या फिर अगर पूर्व कर्म किया है, तो अभी फल क्यों नहीं मिल गया? पूर्व कर्म का फल अभी क्यों आता है? और कभी-कभी अभी कर्म का फल बाद में क्यों आता है? तो ये डिले क्यों होता है? तो अभी ये डिले के अनेक कारण हैं जो कर्म के फल में, कर्मा और उसके फल में जो अंतर आता है, उसके अनेक कारण हैं। और उसको अलग-अलग स्तर पे हम कारण दे सकते हैं, पर क्या है कि जो डिले है एक्शन और रिजल्ट, उससे क्या होता है कि इसमें जो डिले होता है, ये डिले के कारण क्या होता है कि हम विचार करते हैं इस जगत में क्या चल रहा है। तो अगर हम जब कर्म करेंगे, तुरंत फल मिल जाएगा, तो जनरली लोग फिलॉसफी जो होती है, जो आध्यात्म है, जो तत्वज्ञान है, तब कम विचार करते हैं। जनरली लोग फिलॉसफी की एक सिंपल डेफिनेशन है, फिलॉसफी जो होती है, कि जब कर्म करेंगे, तुरंत फल मिल जाएगा, कि जो साधारण बुद्धि से समझ में नहीं होता है, वो समझने के लिए नहीं तत्वज्ञान चूछे। तो अगर हम सीधा कर्म करेंगे, फल मिल जाएगा, तो क्या होगा कि हम कभी हमसे ऊपर कोई है, हमसे ऊपर कोई शक्ति है, कोई भगवान है, कोई परम सत्य है, इसका विचार ही नहीं करेंगे। तो भी कर्मा और फल के डिस्टेंस में अनेक कारण होते हैं, पर यह एक मुख्य कारण है। दूसरा भी कारण है कि कैसे कि अलग-अलग कर्म के फल की प्राप्ति के लिए अलग-अलग परिस्थितियां लगती हैं। तो अगर मान लीजिए मैं बहुत शक्तिशाली हूं और मैंने किसी को, जब मेरे पावर को एब्यूज करते हैं, उसको दुख पहुंचाया है, तो अगर मुझे उसका फल मिलना है, तो क्या होना चाहिए? तो अगर मान लीजिए मैंने कोई व्यक्ति है, कोई बड़ा डिक्टेटर है, उसको उसका फल मिलना चाहिए, तो क्या होगा कि कोई और, या तो वो व्यक्ति जिसका उसने एब्यूज किया है, कोई और व्यक्ति उतना पावरफुल होता है, कि उसको उसका फल दे सके, और वो होने के लिए कभी समय लग सकता है। तो कोई व्यक्ति जो है, जो दूसरों के बुरा कर्म करता है, उसका फल देने के लिए, फल मिलने के लिए परिस्थिति बदलनी चाहिए, और परिस्थिति बदलने के लिए कभी समय लगता है। तो अलग-अलग, हर कर्म जो है, वो एक बीज के समान है और अलग-अलग बीज जो है, वो बढ़ने के लिए उनको अलग-अलग समय लगता है। कुछ बीज हो जाते हैं, वो तीन महीने में हो जाएंगे, उग जाएंगे। कुछ बीज हो जाएंगे, उग जाएंगे। क्या हो रहा है मेरे जीवन में? तो ये उसका उद्देश्य है, उससे क्या होता है कि हम फिर और विचार करते हैं, उससे शायद हम भगवान के बारे में और जिज्ञासा करने लगेंगे, तथा ब्रह्म जिज्ञासा। यह ब्रह्म जिज्ञासा क्यों करेगा मानव? क्यों क्या होता है? हम कर्म करते हैं, ये फल नहीं मिलता है, तो ये जीवन में क्या चल रहा है, ये वो हम सवाल पूछते हैं। तो अगर हम देवताओं के पास जाते हैं, देवता हमें हल कर सकते हैं, पर क्या है? देवता भौतिक हैं, वो आध्यात्मिक नहीं हैं। देवताओं के पोजीशन भौतिक हैं, तो जब हम उनके पास जाते हैं, तो हम स्पिरिचुअल ग्रोथ नहीं कर रहे हैं, जैसे कोई यहां पे पॉलिटिशियन के पास जाएगा, कोई बड़े अमीर व्यक्ति के पास जाएगा, तो उससे मदद करेगा, वैसे देवताओं से मदद करेगा। अभी अच्छा है, उनसे लेना मदद बुरा नहीं है, पर क्या उससे आध्यात्मिक प्रगति नहीं होती है? तो क्या है कि इसमें जब हमारे डिजायर्स हैं, तो इच्छा पूरी करेगा, एक है कि पावर—मतलब मेरे पास शक्ति नहीं है, तो मैं मुझसे शक्तिशाली जो है, उनके पास जाऊंगा और उसकी मदद से मैं इच्छा पूरी करूंगा। गेट द पावर, तो इच्छा पूरी करेगा। यह एक ऑप्शन है और यह जो ऑप्शन जो करते हैं, वो देवताओं की पूजा करते हैं। पर दूसरा ऑप्शन जो भगवान रिकमेंड करते हैं, क्या है वो? गेट द विजडम। आप शक्ति प्राप्त करो, इच्छा पूरी करने के लिए। उसके अलावा क्या करते हैं? गेट द विजडम टू इवैल्यूएट द डिजायर। क्या यह इच्छा पूरा करना इतना महत्वपूर्ण है? क्या यह इच्छा पूरा करने से वास्तव में मुझे हृदय संतुष्टि मिलने वाली है? यह विचार करो। तो यह जब कोई करता है, तो तभी व्यक्ति भगवत भक्ति की ओर आता है। तो यह एक बहुत महत्वपूर्ण सत्य है जीवन में कि हर व्यक्ति को समझना जरूरी है कि कई बार हम चाहते हैं, सोचते हैं कि मेरी यह इच्छा पूरी नहीं हुई, यह इच्छा पूरी नहीं हुई, इसलिए मैं संतुष्ट हूं, यह सत्य है। पर क्या है? एक, वन दैट फुलफिलिंग डिजायर्स—और इंग्लिश में बोल सकते हैं कि फुलफिलमेंट ऑफ डिजायर्स जब हमारी इच्छा पूरी होती है, फुलफिलमेंट ऑफ डिजायर्स डज नॉट लीड टू फुलफिलमेंट ऑफ हार्ट। कि हमारी इच्छा पूरी होती है, पर इच्छा पूरी होने से हृदय संतुष्ट नहीं होता है। हम सोचते हैं कि मुझे बड़ा घर चाहिए, मुझे नए कपड़े चाहिए, मुझे यह इच्छा चाहिए, मुझे यह चाहिए, वो चाहिए। तो अभी इच्छाएं स्वाभाविक होती हैं हमारे जन्मों में, पर इच्छाओं की पूर्ति से हमारे हृदय को संतुष्टि, हृदय को तृप्ति नहीं मिलती है। तो हमें दूसरी इच्छाएं हैं। मैं यह पूर्ति करना चाहता हूँ और मैं यह पूर्ति करना चाहता हूँ। या से पूर्ति कर देता हूँ जो पूर्ति करना चाहते हैं। कौन सी इच्छाएं हैं जो पूर्ति से वास्तव में मुझे हृदय में संतुष्टि मिलेगी? तो जब हम वो सवाल पूछते हैं, तो वास्तव में भगवान हमें वो सवाल के जवाब देने के लिए प्रवर्त करता है। जब हम भगवान के पास आते हैं, तो क्या भगवान हमारी इच्छाएं पूरी कर सकते हैं? हाँ, अफकोर्स कर सकते हैं, पर भगवान यह नहीं चाहते केवल कि हम इच्छाएं पूरी करें। अगर हमारी इच्छा बहुत प्रबल होगी तो भगवान हम पूरी कर सकते हैं, पर भगवान चाहते हैं कि हम यह विचार करें, क्या यह इच्छा पूरे करना जरूरी है, क्या कोई और चीज़ से ज़्यादा महत्वपूर्ण है? तो मान लीजिए कोई माता-पिता है, वो अपने बच्चों को कुछ खिलौना चाहिए, देते हैं, पर अगर बच्चा एक खिलौना मांगता है, देते हैं, दूसरा खिलौना मांगता है, तो बोलते हैं, थोड़ी देर के बाद देंगे। तो अभी वो तुरंत खिलौना क्यों नहीं दे रहे हैं? माता-पिता चाहते हैं कि ठीक है, तुम पढ़ाई करो, तुम इतनी पढ़ाई करोगे, तुम इस तरह की किताब पढ़ लोगे, तो मैं तुमको कोई स्वीट दे दूंगा, चॉकलेट दे दूंगा। तो क्या है कि वो ऐसे नहीं है कि वो माता-पिता देना नहीं चाहते हैं, पर माता-पिता क्या चाहते हैं? कि तुम सिर्फ ये चॉकलेट खाने में, ये खिलौना से खेलने में, उतना ही तुम्हारा जीवन नहीं है, आपका जीवन का खिलौना से खेलने के लिए बड़ा, तुम बड़े हो जाओ। तो जब मैं बोला था कर्म का जो फल होता है, उसमें डिले क्यों होता है? तुरंत हम चाहते हैं, वो मिलता क्यों नहीं है? ऐसे हम मांगते हैं, माता-पिता को कुछ देते नहीं हैं, हम हमारे डिजायर्स को सेलेक्ट करें, प्यूरिफाई करें, कि व्हिच डिजायर्स आर वर्थफुल, नहीं है। तो यह जो है, यह देवता गण लोग नहीं करते हैं, देवता गण होते हैं कि अगर हमने उचित रूप से पूजा कर दी, तो वो हमें जो मांगते हैं, वो दे देते हैं, पर भगवान भी दे सकते हैं। तो मैं अभी दो उदाहरण लूंगा, इस पर चर्चा करूंगा कैसे कि हम देखते हैं कि ध्रुव महाराज, वो चाह रहे हैं कि मुझे एक राज्य चाहिए, और क्या राज्य चाहिए? मेरे पिता का जो राज्य है, उससे बड़ा मुझे राज्य चाहिए, और फिर इसलिए उन्होंने क्या किया? उन्होंने विष्णु की पूजा की, नारद मुनि ने मार्गदर्शन दिया, विष्णु की मैं पूजा की। पर जब विष्णु की उन्होंने पूजा की, तो क्या हो गया? ऐसे बताते हैं, कि जब विष्णु का दर्शन हो गया उनको, तो काचं विचिन्वन् पिदिद्विरत्नम् स्थानाभिलाषी तपसी स्थितोऽहम्। वो कहते थे कि मैं एक राज्य के लिए आपके पास आ गया, पर अब जब आप मिल गए, तो क्या है? देव मुनेन्द्र गुह्यम्, कि आप तो एक मणि के समान हो, और जब राज्य यह है, टूटे हुए कांच के समान हो, यह नहीं चाहिए, इसकी कोई जरूरत नहीं है। तो वास्तव में अगर हम देखते हैं, तो हमारे जो डिजायर्स होती हैं, हमारे डिजायर्स के नीचे कुछ नीड्स होती हैं हमारे। तो ध्रुव महाराज के लिए क्या था? एक तरह से ध्रुव महाराज के लिए ताना था, क्या था कि मुझे किंगडम चाहिए, पर वास्तव में उनको क्या चाहिए था? वो अच्छा जाना चाहते थे, वो फादर का जाना चाहते थे, वो उनके पिता ने तो उनको अपनी गोदी पे बैठने नहीं दिया था। तो उनको दोस्त कि तुम मुझे पात्र नहीं मानते और मेरी सौतेली मां ने कहा कि तुम योग्य नहीं हो। तो मैं इतना योग्य बन के दिखाऊंगा कि तुम्हारे पास है, उससे ज्यादा मेरे पास हो जाएगा। तो वो क्यों जा रहे थे एक तरह से? वो एक छोटे बच्चे के अपने पिता के प्रेम के लिए पुकार था। पर जब उन्होंने विष्णु का दर्शन किया, विष्णु का दर्शन के बाद क्या हो गया? केवल वो दर्शन बहुत सुंदर था, जरूर सुंदर था बहुत, पर वो दर्शन से उनको एक अनुभूति हुई कि जो भगवान विष्णु मुझे प्रेम करते हैं—त्वमेव माता च पिता त्वमेव—कि तुम, वो जो प्रेम करते हैं, वो इतना विशाल है, और वो विष्णु के प्रेम को प्राप्त करने के लिए मुझे कोई राज्य की जरूरत नहीं है। दैट कृष्णा लव्स अस फॉर हू वी आर, नॉट फॉर वॉट वी आर। कि हम कौन हैं? हम आत्मा हैं, भगवान के अंश हैं, इसलिए भगवान हमें प्रेम करते हैं। नहीं कि हम अब इतने पॉपुलर हैं, हम इतने फेमस हैं, हम इतने शक्तिशाली हैं, उसके लिए नहीं यह प्रेम करते हैं। तो जब वो कहते हैं, भगवान में, भगवान जी इतना प्रेम करते हैं, तो यह राज्य की जरूरत क्या है? पर भगवान ने कहा, तुम्हें इच्छा थी, तुम्हें यह राज्य लोगे, पर तुम इस स्वार्थ से, स्वयं के भोग के लिए राज्य के अनुशासन मत करो, तुम्हें एक सेवा के भाव से करो। तो अभी क्या हो गया मतलब कि जब भगवान के पास गए, तो वो इच्छा पूरी हो गई, पर उस इच्छा को पूरी होते हुए, वो इच्छा पूरी हो गया, पर भगवान ने इच्छा पूरी कर दी, पर उस समय वो इच्छा की शुद्धि करण हो गया। तो भागवतम में एक प्रसंग आता है, एक राजा होता है पुरूरवा नाम का, और जब पुरूरवा राजा होता है, वो एक अप्सरा होती है, स्वर्ग से आई उर्वशी नाम की, उससे बहुत आकृष्ट हो जाता है, और वो कुछ शाप के कारण स्वर्ग से पृथ्वी पर आ, स्वर्ग में चली जाती है। तो अभी जो पुरूरवा होता है, बहुत इच्छा करता है, कि मुझे उर्वशी चाहिए, और यहां तक इसे बताया गया है, जो पुरूरवा की कहानी है, तो भागवत में पहले नौवें स्कंध में आती है, और तो ग्यारहवें स्कंध में आती है, तो नौवें स्कंध में बताया है कैसे, कि नौवें स्कंध और ग्यारहवें स्कंध में बीच में क्या है? दसवें स्कंध में क्या है? कृष्ण लीला है। तो भागवत में क्या बताया है कि वो नौवें स्कंध में बड़ा हताश होके उदास होगा, ऐसे बताया जाता है, कि तभी वहां पे भगवान स्वयं आ जाते हैं, और जैसे ध्रुव को विष्णु का दर्शन जाता है, वैसे पुरूरवा को भी विष्णु का दर्शन जाता है, पर यहां पे पुरूरवा क्या कहता है कि विष्णु का दर्शन जाता है, मुझे कृपया उर्वशी ले दो। तो भगवान स्वयं का कल्याण चाहते हैं, पर भगवान स्वयं का दर्शन नहीं करते हैं, तो क्योंकि कभी क्या होता है कि हमारे कुछ बिलीफ होते हैं, कि विष्णु का दर्शन जाते हैं, और जैसे विष्णु का दर्शन जाते हैं, यह जब आएगा मेरे जीवन में, तभी मैं तो उससे अच्छा कुछ मिल जाता है, तो भी क्या होता है, वो हम उसको, उसको हम कीमत देते ही नहीं हैं। मान लीजिए हम किसी, हम, हम किसी कहीं जाते हैं, और वहां पर कोई फीस्ट, कोई प्रोग्राम पर फीस्ट है, हमने अपेक्षा कर रहे हैं, कि वहां पर गुलाब जामुन हो जाएं, और तभी वहां पर, मान लीजिए कोई सोन पापड़ी है, कोई, उससे, मान लीजिए उससे भी अच्छा स्वादिस्टी, वहां पर स्वादिष्ट व्यंजन है, पर अगर हमारी अपेक्षा इतनी गुलाब जामुन मिलना चाहिए, तो सोन पापड़ी इतने भी स्वादिष्ट हो, गुलाब जामुन नहीं है, उससे से हम मायूस हो जाएगा, क्रोधित हो जाएगा। तो पर मान लीजिए वो खाते रहे सोन पापड़ी, खाते रहे सोन पापड़ी, खाते रहे सोन पापड़ी इतने भी अच्छा है, धीरे-धीरे वो जाग्रत हो जाएगा। तो वैसे ही क्या होता है, जो पुरूरवा के लिए उसके मन में उर्वशी जो होती है, वो इतनी उसके पर जाएगा अच्छा होती है, भगवान विष्णु भी आ जाते हैं, तो फिर उसकी अच्छा परिवर्तित नहीं होती है, पर उसको उर्वशी मिल जाती है वापस, और फिर उसे कुछ संग करता है वापस, फिर भी क्या होता है, उसके बाद में, जो भगवान का दर्शन हुआ है, उससे जो मन पे छबी हुई है, वो अब व्यर्थ नहीं जाती है। तो उसके बाद में उसको लगता है, मैं इसकी इतनी आकांक्षा कर रहा था, पर इससे नहीं बहुत-बहुत है, और कुछ है इसमें। और फिर बाद में फिर वो भगवान की भक्ति कर लेता है। तो जैसे मैं आता था, कर्म के फल में भी कभी-कभी डिले हो सकता है, वैसे भक्ति के फल में भी कभी-कभी डिले हो सकता है। हम भक्ति करते हैं, उससे जो फल मिलता है, उससे भगवान का दर्शन करते हैं, भगवान की पूजा करते हैं, उससे जो परिवर्तन होता है, उसमें डिले क्यों होता है? क्योंकि कभी-कभी हमारी दूसरी इच्छा जो होती है, वो और स्ट्रांग होती है। तो अभी ध्रुवा और पुरूरवा में हम फर्क देखते हैं, तो क्या हो गया? दोनों को क्या था? हम देख सकते हैं, सिमिलरिटी, दोनों के बोथ केम बिकॉज़ अदर डिजायर्स, भगवान की भक्ति के लिए भगवान के पास नहीं आए थे, वो अदर डिजायर से आए थे भगवान के पास, पर जब वो भगवान, उन्होंने भगवान का दर्शन किया, कृष्ण के पास, कृष्ण-विष्णु का उन्होंने दर्शन किया, तो क्या हो गया? वो कृष्ण की ओर आ गए, और उन्होंने जो अपना डिजायर था, ये छोड़ दिया उन्होंने अदर डिजायर था। वहीं पुरूरवा जो थे, वो कृष्ण के पास आए, और फिर वापस अपने डिजायर के पास चले गए, पर उसके बाद में क्या हुआ? क्योंकि कृष्ण के पास आए थे, तो इसलिए कभी-कभी भगवान हमारी इच्छा पूरी करते हैं, पर उसमें वो चाहते हैं कि हम प्यूरीफाई हो जाएं, इसलिए। तो क्योंकि जो चाहते हैं कि हम प्यूरीफाई हो जाएं, इसलिए कभी-कभी वो इच्छा की पूर्ति में डिले होता है। इसलिए पेरेंट होते हैं और चाइल्ड होते हैं, तो चाइल्ड का जो डिजायर है, वो कभी-कभी डिले जब होता है, तो वो क्यों है? क्योंकि पेरेंट्स वांट द चाइल्ड टू ग्रो अप, तुम सोचो क्या, तुम्हें खिलौना ही खिलौना जीवन भर, कि और कुछ भी करना है तुम्हें? तुम और बहुत कुछ चीजें कर सकते हो, तो इसलिए इसके पीछे जो तुम लगे हैं, उसके पीछे मत लगे रहो, तुम और विचार करो। तो जो ही विचार करने के तैयार रहते हैं, वो भगवान की भक्ति में एकाग्र हो सकते हैं। जो इसलिए विचार करने के तैयार नहीं है, वो बोलेंगे भगवान के पास आने की जरूरत भी क्या है? बाद में भगवान बोलेंगे, वो और लोगों के पास चले जाएंगे, और वहां पर ही भक्ति करेंगे। तो हम भगवान से प्रार्थना कर सकते हैं, मेरे जो भी इच्छाएं हैं, जो भी मेरी इच्छाएं हैं, कभी मेरी आपके पर जो इच्छाएं उससे और बड़ी नहीं हो जाए। मैं इच्छाएं छोड़ नहीं सकता अभी, पर इच्छाओं के लिए मैं आपको कभी नहीं छोड़ूं, मैं आपको पकड़ते रखूं, और अगर आपकी इच्छा है, तो मेरी इच्छा है, आप भी पूरी कर दोगे, तो हम आपके पाने के लिए नहीं पूरी कर सकते हैं, तो धीरे-धीरे हमारा हृदय भी परिवर्तित हो जाएगा। तो आज किस तरह से हम जब भगवान की भक्ति करते हैं, तो हम भक्ति, जो इस श्लोक में बताया जा रहा है, कि हमने जैसे पहले कहा, इस श्लोक का फुलफिलिंग डिजायर्स एंड भक्ति, इच्छाओं की पूर्ति करना और भक्ति करना, इस अर्थ में क्या जा सकता है, इसके बारे में हम चर्चा करेंगे आज। पहले हम देखा कि क्या है, यह जो 4.12 श्लोक है, इसमें भगवान बता रहे हैं कि जब कर्म का फल चाहिए होता है, तो लोग देवताओं के पास जाते हैं, तो हम देखा इसके कॉनटेक्स्ट क्या है। कॉनटेक्स्ट में हम देखा क्या है कि भगवान, वो यहां पे, ही इज़ गिविंग, वो डायरेक्ट भक्ति के बारे में बोलते हैं, और फिर उसके बाद में वो अल्टरनेटिव्स दे रहे हैं। देखा 5 टू 10 जो वर्सेज हैं, उसमें डायरेक्ट भक्ति के बारे में बोल रहे हैं, और फिर 12 और 13 में वो अल्टरनेटिव्स दे रहे हैं, पहले वो देवताओं की पूजा बोलते हैं। तो यहाँ पे क्या है कि हम कृष्णा देखते हैं, कृष्णा इज नॉट पजेसिव, वो जेलस नहीं है, वो क्या है? प्रोटेक्टिव है। प्रोटेक्टिव है मतलब क्या है कि तुम यह नहीं कर सकते हैं, तो यह करो आप। तो यह बात था, यह कॉनटेक्स्ट था, और यह उसका इम्प्लिकेशन, इम्प्लिकेशन क्या है कि कृष्णा चाहते हैं कि हम जो भक्ति कर रहे हैं, हम जो कर रहे हैं, उससे हमारा, कृष्णा हमको ऑप्शंस देते हैं, तुम यह नहीं कर सकते हैं, तो यह करो। और फिर उसके बाद में हम देखा कि, दो पॉइंट देखेंगे, कि हमने जो डिले जो होता है, डिले मतलब क्या है कि अगर मैंने यह एक्शन किया, कि मैंने एक्शन किया, तो मुझे तुरंत फल मिलना चाहिए, क्योंकि मैं एक्शन करता हूं, और उसके बहुत समय बाद फल मिलता है, तो, या फिर उसका फल नहीं मिलता है, इतनी मात्रा में नहीं मिलता है, तो ऐसे क्यों होता है? जब ऐसे होता है, तो इट मेक्स अस आस्क बिग क्वेश्चन्स, कि ऐसे क्यों हो रहा है, जीवन में क्या चल रहा है? फिलॉसफी के वहां हम कब जाते हैं? व्हेन थिंग्स डोन्ट मेक सेंस। तो कैसे है कि चाइल्ड को टॉय चाहिए, मांगता है और टॉय मिल जाते हैं, पर अगर टॉय मिलने के लिए समय लगता है, तो फिलॉसफी लगा कि क्या मेरे माता-पिता उससे प्रेम नहीं करते हैं? माता-पिता अगर प्रेम करते हैं, तो फिर वो क्यों नहीं दे रहे हैं? वो क्या चाहते हैं मुझे? वो चाहते हैं, वो क्यों चाह रहे हैं मुझे? तो उससे क्या होता है कि वो डिले के साथ थिंकिंग और ग्रोइंग अप। तो सिमिलरली, क्या है कि अगर हम देवताओं के पास जाते हैं, तो देवता क्या करते हैं? वो जो है, वो केवल हमें, जो हमारा, जो हम, हमारा जो एफ़र्ट होता है, वो हमारा प्रेज़ेंट कर्मा है, या पूर्व कर्मा है, वो उसको अड्रेस करने के लिए हम देवता के पास जा सकते हैं। पर क्या होता है? देवताओं से हमारा कुछ, वो केवल एक ट्रांजैक्शनल रहता है, तुमने यह कर दिया पूजा, तुमको यह मिल जाएगा। पर हम भगवान के पास जाते हैं, तो भगवान के पास ट्रांजैक्शनल नहीं चाहते हैं वो, वो चाहते हैं कि वो ट्रांसफॉर्मेश्नल चाहते हैं, कि वो हमारा परिवर्तन हो जाए चाहते हैं। तो इसलिए भगवान की हमारी इच्छा पूरी कर सकते हैं, पर यह ट्रांजैक्शनल जो होता है, एलिवेटिंग अवर डिजायर्स, कि हमारी इच्छा जो है, वो एलिवेटिंग अवर डिजायर्स, कृष्ण के लिए ज़्यादा इम्पोर्टेन्ट है। हमारे लिए क्या इम्पोर्टेन्ट हो सकता है? फुलफिलिंग अवर डिजायर्स। तो ऐसे नहीं कि भगवान हमारी इच्छा पूरी नहीं करना चाहते हैं, पर वो पहले चाहते हैं कि हमारी इच्छा जीवे और अच्छी हो जाए। तो लास्ट में हम देखा कैसे है, डिजायर्स, क्या करना है हमें? वी डोन्ट वांट, इफ वी कैन गिव अप डिजायर्स फॉर कृष्णा, तो वो अच्छा हो सकता है, पर वो शायद अनसस्टेनेबल है हमारे लिए, हम ज्यादा करना। पर दूसरा है कि वी गिव अप कृष्णा फॉर डिजायर्स, तो अगर वो करेंगे तो क्या होगा? वो अनवाइज हो जाएगा, कुछ क्षणिक चीज़ के लिए हम जो शाश्वत चीज़ है भगवान, उसको खो दें, उसमें क्या है? बेटर है, सबसे पहले वी होल्ड ऑन टू कृष्णा फर्स्ट, एंड दैन डिजायर्स लेटर, कि अगर आपकी इच्छा होगी, आपको लगता है कि मेरा हित है, तो फिर मैं, आप मेरी इच्छा पूरी करोगे, तो नहीं होगा, तो गई मैं उसको स्वीकार कर लूंगा। बहुत-बहुत धन्यवाद, हरे कृष्ण। कुछ सवाल है? तो कैसे है, मतलब आप कहते हैं, तो हाँ, वो स्वाभाविक है, क्योंकि क्या है कि यह जगत इस तरह से बनाया गया है, कि जो लोग भगवान से दूर रहना चाहते, भगवान को भूल के या भगवान के सेपरेट रहना चाहते, उनको यह जगत एक सुविधा के रूप नहीं है, पर अगर जो भगवान को याद करना चाहता है, अगर भगवान इस जगत में दिखा देते, तो फिर हमें भगवान की ओर जाने के अलावा कोई और अल्टरनेटिव रहता ही नहीं था। पर हम चाहते हैं कि हमारा जो फ्रीविल हम यूज़ करके, भगवान चाहते हैं कि हम अपनी स्वेच्छा से उनकी ओर मुड़ें। उनको हम प्रेम करें। तो अगर मान लीजिए कि कोई कोई व्यक्ति है जो कुछ गैरकानूनी चीज़ करना चाहता है, पर अगर पुलिस वहाँ पर हर जगह पे है और कहीं भी गैरकानूनी चीज़ करने का उसको मौका ही नहीं है, तो अगर वह लीगली कुछ लॉ-अमाइडिंग रह रहा है, तो वह लॉ-अमाइडिंग क्यों रह रहा है? क्योंकि उसको रिस्पेक्ट फॉर लॉ है, कि उसको केवल फियर आफ़ पनिश्मेंट है? तो दोनों हो सकता है वो, पर अगर ऐसे है, पता नहीं चलेगा हमको, तो क्या है कि हमें वॉलेंटरीली हमें भगवान की ओर मुड़ना है। भगवान वो चाहते हैं। नहीं तो क्या, अगर भगवान को केवल कोई उनका आदेश पालन करने वाला चाहिए होता, तो भगवान रोबोट बना देते हैं। भगवान ने हमें क्यों बनाया? क्यों हमारा प्रेम चाहते हैं? कई बार ऐसे होता है कि मैं अमेरिका में जाता हूँ, तो माता इंडियंस होते हैं, इंडियंस अपने चिल्ड्रेन के लिए बहुत कंसर्न हैं। तो कहते हैं कि हमारे बच्चे हमारी बात सुनते नहीं हैं और वो इस पाश्चात्य संस्कृति से प्रभावित हो रहे हैं। सत्य है अपनी तरह से, पर वो एक खतरा है। कभी-कभी मैं उनको बोलता हूँ, क्या आप चाहते हो कि आपके माता-पिता आपके बच्चे आपकी बात नहीं सुन रहे हैं, तो आप क्या आप ठीक से आपके बच्चे का परफेक्ट ओबीडिएंट रोबोट के पर्पेक्टिव बनाना देंगे? तो मैं क्लास میں बोला था, तो एक माताजी बोली थी, अपने माताजी के लिए एक रोबोट करता हूँ। अपनी अपोजिट रोबोट। क्या है कि हम चाहते हैं कि हमारे बच्चे हमारी बात सुनें, पर हम नहीं चाहते हैं कि उनकी स्वेच्छा उनसे ले लें। हम चाहते हैं कि वो उनकी बुद्धि विकसित हो, वो समझे कि कैसे हम जो बोल रहे हैं, उनके कल्याण के लिए हैं, और अपनी स्वेच्छा से वो करें। तो कैसे है? वैसे भगवान वो ही चाहते हैं, इसलिए भगवान ने हमको स्वेच्छा दी है, और हम भूल जाते हैं। पर क्या होता है? धीरे-धीरे अगर जगत में हम रहते हैं, जगत का स्वभाव देखते हैं, तो उससे फिर जो स्वभाव मन में आ रहते हैं, उससे हम धीरे-धीरे भगवान की ओर मुड़ सकते हैं। नहीं, विल कृष्णा ने दिया है, पर डिसीजन हम लेते हैं, डिसीजन कृष्णा नहीं ले रहे हैं, क्योंकि ऐसे अभी जो दुर्योधन, कृष्णा आते हैं हस्तिनापुर में, शांति के प्रस्तावों के साथ हैं, जब दुर्योधन वो ठुकरा देता है, तो वो क्यों ठुकरा रहा है? ऐसे नहीं कि कृष्णा वो चाहते हैं, दुर्योधन वो चाहता है, और कृष्णा वो अलाउ करते हैं। तो अभी कोई डिसीजन जो लेता है, वो अपनी सो-इच्छा से ले रहे हैं, वो भगवान कंट्रोल नहीं करते हैं कि अगर भगवान को कंट्रोल करने लग जाएंगे, तो वो फिर वो भगवान नहीं रह जाएंगे, वो शैतान बन जाएंगे। क्या है? इसका मतलब क्या होगा? मान लीजिए अगर कोई गुनाह हो गया है और किसी का मर्डर हो गया है, पुलिस को पता नहीं किसने किया है, तो क्या करते हैं? पुलिस किसी मासूम व्यक्ति के बाद में, इनोसेंट व्यक्ति के हां पे गन डाल देते हैं और वो गन उसके हां पे प्रेस करके, उसके जबर्दस्ती गोली दबा देते हैं—तुमने गोली मारी, तुमको सजा कर दे देगी, तुमको फांसी दे देगी। अगर कोई ऐसे करेगा, मतलब कि पुलिस को पता नहीं किया है, पुलिस तो शैतान बन जाएगा। वो तो अगर भगवान ही हमें अगर बुरे कर्म करने के लिए प्रवर्त कर रहे हैं, और फिर भगवान हमें सजा दे रहे हैं, तो फिर भगवान शैतान बन जाएगा। भगवान कहते हैं कि जो हम अच्छे कर्म करते हैं, उन दोनों की जिम्मेदारी हमारी है। भगवान जरूर हम चाहते हैं कि हम अच्छे कर्म करें और भगवान हमें उसके नजर बुद्धि देते हैं, पर वो जो फैसला करते हैं, वो हम कर रहे हैं। वो क्या होता है? वो व्यक्ति के पूर्व कर्म के अनुसार निर्भर होता है। मान लीजिए अगर कोई एक फर्स्ट फ्लोर पर जाता है और वहां से नीचे कूदता है, तो थोड़ा उसको इंजरी होगा, पर तुरंत उसको वो नीचे गिर जाएगा। पर कोई टेंथ फ्लोर पर जा नीचे कूदता है, तो उसको थोड़ा समय लगेगा। एक्चुअली इंजरी ज्यादा होगा, पर वो इंजरी होने के लिए समय लगेगा। कोई हवाई जहाज से कूदता है, तो अभी अगर वो नीचे देखेगा, यहीं नहीं, अरे, अच्छा मुझे अच्छा का राइड मिल रहा है, मुझे पूरा सीनरी दिख रहा है। तो क्या, जितना ऊपर व्यक्ति जाएगा, उतना नीचे गिरने में समय लगता है। तो वैसे ही क्या है? जिन व्यक्ति ने जितना अच्छा कर्म किया है, पहले उतना गुड कर्मा हैज़ वन रिजल्ट, दैट गुड कर्मा ऑफटेन कॉसेस ए डिले इन द रिजल्ट्स ऑफ बैड कर्मा। तो मान लीजिए किसी ने बहुत पैसा कमा कर लिया है पहले, मेहनत करके बहुत पैसा कमा लिया है, पर अभी बहुत अयाशी करने लगता है, बहुत पैसे खर्च कर रहा है, तो पैसे व्यर्थ खर्च करना यह बुरी बात है, पर अगर पहले बहुत पैसे कमाए हैं, तो अभी जो पैसे व्यर्थ कमा रहा है, उसका परिणाम तुरंत नहीं आएगा, आएगा, पर उसको समय लगता है। इसलिए हम कहते हैं पाप का घड़ा भर गया है, या कभी भरने करने के लिए समय लगता है। तो किसी का पाप का घड़ा बहुत बड़ा होगा, तो जब भरेगा तो बहुत पहाड़ उसका फैलाएगा, और वो भरने के लिए कभी कोई-कोई समय लग सकता है। एक फाइनल लाइन, नीड्स और डिज़ायर्स। और वह बहुत रिलेटिव है। मुझे करने के लिए कोई समय में कोई डिज़ायर नहीं है। तो इतने कोई समय में करने के लिए कोई-कोई समय में करने के लिए कोई डिज़ायर नहीं है? क्या होगा? उसका बेसिक कम्फर्ट चाहिए। हमारा मन जो है, कि अगर हमारा फूड है, हमारा कम्फर्ट्स है, तो अगर इफ़ समबडी स्टार्ट्स थिंकिंग टू मच आऊट फूड, देन देयर माइंड वोंट बी फ्री फॉर थिंकिंग आऊट हायर थिंग्स। बट इफ़ दे ट्राई टु डिक्रीज़ फूड टू मच, देन ऑल्सो वॉट विल हैपन इज़ देयर माइंड वोंट बी फ्री—फूड, फूड, फूड। तो ऐसे अगर स्टूडेंट्स हॉस्टल में हैं, पढ़ाई करने गए हैं कॉलेज में, तो अभी यू कैनोट एक्पेक्ट कि कॉलेज के हॉस्टल के मेस में किसी फाइव स्टार होटल का जैसे फूड मिलने वाला, आपको। पर अगर फूड इतना वहां पर खराब है, कि विद्यार्थी उस फूड के कारण ही, उनको फूड पॉइज़निंग हो रहा है, वो बहुत फ्रस्ट्रेटेड हो गए, वो पढ़ाई नहीं कर पा रहे हैं, तो भी बच्चा नहीं है, तो फूड इतना वादा है कि विद्यार्थी उस फूड के कारण हैं। तो ऐसे ही क्या है कि हमारे मैटेरियल नीड्स हैं, अभी किसके लिए कितना नीड है, वो उस इंडिविजुअल को फैसला करना पड़ेगा। तो मतलब कि व्हेन आइ ऍम पर्श्युइंग समथिंग, मैं किसी चीज़ चाह रहा हूँ, प्राप्त कर रहा हूँ, उससे हाउ मच मेंटल स्पेस इज़ ऑक्यूपाइड, उसका पीछा करने से क्या उसका मेंटल स्पेस मेरे मन में ले रहा है, वो बढ़ रहा है, या उसको छोड़ने से वो बढ़ रहा है? मान लीजिए कोई एकादशी को फास्टिंग करता है, तो आइडिया क्या है? हम फास्टिंग क्यों करते हैं एकादशी को? कि जो फूड जो है, हमारे मन में जो जगह ले रहा है, वो कम हो जाए उसके, ताकि हम हमारे मन में कृष्ण को और ला सके। तो अगर एकादशी के समय व्यक्ति सोचने लगता है कि मैं यह व्यंजन मांग सकता हूँ, यह व्यंजन मांग सकता हूँ, अच्छा इसमें भी नहीं है, अन्न नहीं है, उसमें अन्न नहीं है, तो वो अगर बहुत एकादशी के रूल्स के अंदर, मैं क्या स्वादिष्ट बना सकता हूँ, उससे में फंस जाएगा, तो क्या होगा? इसलिए हर एक व्यक्ति को अपना अप्रोप्रिएट बैलेंस होगा। कुछ लोग मैं जमीन पर बैठ सकता हूँ, कुछ लोग कहें, कुछ लोग कहें कि मुझे एक कुर्सी चाहिए, कुछ लोग मैं जमीन पर बैठ सकता हूँ, मैं जैसे बन सकता हूँ। कुछ लोग मैं जमीन पर बॉसिद्ता करता है, हैं? हम जो लोग को गिए करता है न? हम जो लोग को गियते ही कर कमीशन का? अच्छा उस नीका एक बोन सिर्फ… इसे ही कहा हूँ, अगर जो जोड़ा की खेला है, यह जोड़ा नहीं है।Lecture Summary
Full Transcription
इच्छाओं की पूर्ति और भगवद्गीताCIT फ्रेमवर्क
भगवान का अवतार और मानव का उद्धार
देवता, कर्म और समय का अंतर
इच्छाओं की पूर्ति बनाम भगवान की बुद्धि
ध्रुव महाराज और पुरूरवा की कथा
भक्ति में विलंब और शरणागति
प्रश्नोत्तर
आवश्यकता और इच्छा का संतुलन