Hindi – How to look at our pasts darkness positively Bhagavatam 1102
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समोर निवश मना तो इस श्लोक में बताया जा रहा है कि कैसे जो गुरु वंश था वो एक जंगल में जब अग्नि होती है दावा अग्नि उससे उसका विनाश हो गया और उसके बाद में भगवान ने उसको पुनः स्थापित करने में युधिष्ठिर का मार्गदर्शन किया उनको शक्ति दी तो मैं तीन चीजों की चर्चा करूंगा जो चित्र जो हमारे जितना कैसे एक्सपेंड कर सकते हैं कॉन्टेक्स्ट क्या है फिर इनाइट क्या है उसपे और फिर टेक अवे क्या है तो अभी जो भागवतम है वह एक तरह से जहां पे महाभारत खत्म होता है वही पर शुरू होता है वही पर शुरू होता है। इसका मतलब ये है कि अभी जहां पे अह गुड महाभारत का युद्ध खत्म हो गया है। उसके बाद में भागवतम का कहानी शुरू होती है। और एक तरह से ये भागवतम यहां पे क्यों शुरू हो रहा है? कहानी जो है 1.7 शुरू हुई। अभी हम दसवे अध्याय में यहां पे और इसमें 19 अध्याय है। तो एक तरह से भागवतम का जो प्रधान संवाद है वो परीक्षित महाराज और सुखदेव गोस्वामी के बीच में है। तो अभी पहले ये जो संवाद है दूसरे स्कंध से शुरू होगा वास्तव में। तो पहले स्कंध में अगर हम कहते हैं ये दूसरे स्कंध से 11वें अध्याय के सॉरी 12व अध्याय के अह में आता है ये। पूरा भागवतम जो है उससे बड़ा है। तो जो पहला स्कंध जो है भागवतम का वो क्या कर रहा है? ये जो दो व्यक्ति है जो बात करने वाले हैं सुखदेव गोस्वामी और परीक्षित महाराज इनका इतिहास हमें बता रहे हैं। तो इनका इतिहास बताते हुए तो परीक्षित महाराज इतिहास बताने के लिए उनकी पूर्व जीवन जो हो रहा है वो बताते हैं। और जब वो बताते हैं यहां पे सातवें अध्याय से चालू होता है उनकी कहानी। तो 12 अध्याय जो है एक तरह से उनकी जीवन के पहले की कहानी है तो इतना विशेष व्यक्ति क्यों थे लोग? तो इतने इसीलिए शुरुआत कहां से होती है? कैसे अश्वत्थामा ने बाकी सारे पांडव के पुत्रों को मार डाला। तो मतलब परीक्षित महाराज इतने स्पेशल थे। इकलौते अपने वारिस है। तो उनका महत्व का सिग्निफिकेंस बताया जा रहा है। और अभी यहां पे वो कहानी आगे बढ़ रही है। अभीमा ने अपना शरीर त्यागा है और अभी युधिष्ठिर महाराज राजा बन के राज्य करने वाले हैं। और तभी कैसे काफी विस्तार बहुत कुछ प्रसन्न होते हैं पर यहां पर संक्षिप्त रूप से बताया गया है कि किस तरह से वो उन्होंने कई राजस्व यज्ञ पहले राज यज्ञ किए थे ऐसे कई विशाल यज्ञ भी किए उन्होंने और वो बहुत यशस्वी बन गए उसका संक्षिप्त में वर्णन हो रहा है उसका एक ऐसे प्रल उसके शुरुआत में बताया जा रहा है कि भगवान ने उनको पुनः सबको पुनस्थापित करने में मदद की तो यहां पे जो बताया गया है युद्ध हुआ। प्रभुपाद जी उस युद्ध के अपने तात्पर्य में जोर देते हैं। युद्ध की तुलना किससे की गई है? जैसे जंगल में जब अग्नि आती है तो सबका पूरा जंगल का विनाश हो सकता है। तो ये एक तरह से इंटरेस्टिंग है कि अगर हम जो वॉर है उसका कारण देखते हैं जो वॉर ये घटना हुई है तो ये हुआ क्यों? इसके लिए हम अनेक कारण देख सकते हैं। एक कारण देख सकते हैं कि दुर्योधन था कारण कि दुर्योधन इतना क्रूर उसका उतना क्रूर था वो इतना विकेट था एक और कारण देख सकते हैं कि धुतराष्ट्र जो था वो कमजोर था वो अगर वो स्ट्रांग होता था तो नहीं होता था एक और कारण देख सकते है कि भीष्म शांत रहे अगर अगर बोलते थे कि स्ट्रांग होते थे शायद वो साइलेंट या उसके पहले जा सकते थे महाभारत में कहानी शुरू होती है वो कैसे होती है? भीष्म के भाव से शुरू होती है।
और कोई कह सकता है कि अगर भीष्म ने वो वो शपथ ली नहीं होती तो शायद ये पूरा होता नहीं था। तो पूरी कहानी बदल बदल सकती है। तो कई बार क्या होता है इतिहास में कई बार वो व्हाट इफ ये उसको अल्टरनेटिव कहते हैं। कि इतिहास में अगर ऐसे नहीं होता वैसे होता तो क्या? क्या होता तो अगर जो शाहजहां था उसके दो पुत्र थे एक दारा शुको था दूसरा औरंगजेब था और दाराश जो था वो हिंदू संस्कृति के प्रति काफी वो उसको अप्रिसिएशन उसने कई वो पहला व्यक्ति था जिसने जो संस्कृत शास्त्र थे उनको परर्शियन में ट्रांसलेट भी किया था तो अगर दाराश को जीता था औरंगजेब में था उनका जो युद्ध हुआ उन दोनों में तो फिर भारत का इतिहास काफी अलग हो सकता था तो एक तरह से हम जब व्हाट इफ करना चाहते हैं तो उसको अलग-अलग चीजें देख सकते हैं। ये क्यों हुआ? हां फिर देख सकते हैं कि ये अल्टीमेटली इशारा ये भगवान की योजना थी। कृष्णास प्लान पर यहां पे क्या बोल रहा है? इट्स ऑलमोस्ट लाइक अ जो भागवत में उसको उल्लेख किया है। इट्स लाइक अ नेचुरल इवेंट नॉट नेचुरल इवेंट बट अ नेचुरल डिजास्टर वह तुलना की गई है। कि ये क्या है? ये जगत का स्वभाव है। कैसे हो जाता है? और ये एक बहुत महत्वपूर्ण है ये। क्या यही कारण है? अगर यह कारण था तो फिर पांडवों ने कौरव से युद्ध क्यों किया? एकदम से कौरव को मारा उन्होंने। तो क्या है कि कोई भी घटना होती है उसके लिए अनेक कारण हो सकते हैं। पर हमें देखना है कि कौन सा कारण हमको आगे बढ़ने में मदद करता है क्योंकि लाइफ हमेशा जीवन जीवन आगे बढ़ने वाला है और जीवन में हमें उसके आगे जाना है तो क्या है जो पास्ट में हुआ है जो भूतकाल में हुआ है जो हम कॉज देखते हैं कि अगर मैं यहां पे हूं मेरे जीवन में और यहां पे कुछ बुरा हादसा हुआ है मेरे साथ पास्ट में तो अभी मैं यहां से देखता हूं कि इसका कारण क्या था कॉज क्या था तो मुझे जो कारण देखना है वो कारण इस तरह से देखना है कि उससे मैं एक पीछे में ही आई शुड नॉट गेट स्टक ओवर देयर कि इसी में अरे इसने मेरे साथ ऐसे किया उसने ऐसे किया मैंने ऐसे क्यों किया जो हम कारण देखते हैं वो कारण इस तरह से देखना है कि वो कारण समझ के हम आगे बढ़ सके क्योंकि हमारे आगे जो है फ्यूचर है और जो फ्यूचर है उसको को हमें सामना करने के लिए हमारे पास्ट से हमारे भूतकाल से क्या हम कुछ सीख सकते हैं? क्या हम कुछ उसमें आगे बढ़ सकते हैं? तो जो एनालिसिस कर रहे हैं हम पास्ट का उसका उद्देश्य होना चाहिए कि द पास्ट इज अ रिसोर्स फॉर द फ्यूचर। अगर पास्ट के बारे में कि इसने ऐसे किया था या मैंने वैसे किया था या उसने वो किया था। अगर वो सोचते रहेंगे तो शायद क्या होता है? कभी-कभी पास्ट में ये फंस जाते हैं। या कभी-कभी क्या होता है? पास्ट में ही हम लेकिन इतना फस जाते हैं कि पास्ट में भूतकाल में जो हुआ है उससे हमारे भविष्य को हम जानते हैं। कभी-कभी बदले के भावना में इतना लग जाता है कि उसके जीवन में कुछ रहता ही नहीं बदला। शायद मूवीस में अच्छा लगता है वो ड्रामेटिक एक्शन वगैरह हो जाता है। पर वास्तविक जीवन में क्या होता है वो बदला जो है भाव वह व्यक्ति को जला देता है। तो यहां पे जो पॉइंट है कि एक तरह से ये एक नैसर्गिक विपत्ति जैसे बताया जा रहा है। तो अभी दिस इज नॉट द कंप्लीट एक्सप्लेनेशन उसके अनेक कारण हो सकते है पर भागवतम में इस पथ पे यहां पे उल्लेख करके दौर दिया गया है तो रोज हम सब सुबह उठते हैं अगर मंगल आरती करते हैं हम तो संसार दावा कहते है तो अभी ये कहने का उद्देश्य क्या है कि अगर हमें सुबह साधना करनी है अगर मेरे मन भगवान में लगाना है तो अगर हम सोच रहे हैं अरे मैंने ये गलती कर दी अरे उसने वो ऐसे किया या ऐसे या इसने वैसे किया अगर हम भले ही खुद को दोष देते रहे या दूसरों को दोष देते रहे। तो फिर हम भगवान में एकाग्र नहीं हो पाएंगे। तो हां हो एक ऐसी जगह हो सकती है या देखा जाए ये व्यक्ति मुझे बार-बार परेशान कर रहा है मुझे दूर रहना है या कुछ कार्य करना खिलाफ या मैं ये गलती करता हूं तो मुझे इसके बारे में शायद मुझे मैं ये सेवा नहीं कर सकता। मुझे कोई और सेवा करनी है। वो जो प्रैक्टिकल एनालिसिस है वह भी जरूरी है। पर जब हम साधना कर रहे हैं तो साधना करते समय अगर हम जो हमारे जीवन में समस्याएं आ रही है उनका केवल प्रैक्टिकल कॉज देखते रहेंगे। अरे मैंने ऐसे किया इसने ऐसे किया। तो फिर क्या है? हमको लगेगा ये साधना करने का प्रैक्टिकली क्या फायदा है? अरे इसने इतना समस्या किया मेरे लिए। मैं उसके खिलाफ कुछ करने उसके खिलाफ कुछ करने की जगह मैं यहां पे जप करते बैठा हूं। क्या फायदा है उसका? तो अभी ऐसे नहीं है कि प्रैक्टिकल कार्य हमें नहीं करना है। जरूर करना है। पर जो सशंस होते हैं केवल प्रैक्टिकल स्तर पे नहीं होते। हमें हमारी चेतना को भी इंप्रूव करना है। हमें समझना है कि ठीक है। ये समस्या आई है उसके बाद में कोई और समस्या आएगी जगत में समस्याएं आते ही रहती है। तो मतलब क्या है कि जब हम कहते हैं एक तरह से जब हम प्रॉब्लम सॉल्विंग कर रहे हैं गोइंग टू सेकंड पॉइंट नाउ जो चेतना है यहां पे इनसाइड जो है उसको हम देख रहे हैं अभी कि प्रॉब्लम सॉल्विंग क्या है कि एक है कि हम सिर्फ ओनली प्रैक्टिकल करते हैं। दूसरा है ओनली ट्रांसेंटल करते हैं। कि मतलब क्या है कि सिर्फ प्रैक्टिकल करते हैं तो क्या आपको पूरा बेस क्या टाइप पास कर रहा हूं। पर ये प्रैक्टिकल प्रॉब्लम सॉल्विंग क्या है? ये एक तरफ से है। क्योंकि इस जगत में प्रैक्टिकली एक के बाद एक प्रॉब्लम आने वाली है। हम एक प्रॉब्लम को सॉल्व करते हैं दूसरा प्रॉब्लम आता है। तो एकदम वैज्ञानिक प्रगति का इतिहास हम देखते हैं। क्या होता है कि हर प्रॉब्लम का जो हम सलूशन निकालते हैं वो सॉल्यूशन से कुछ प्रॉब्लम आते हैं। और फिर वो सॉल्यूशन का जो प्रॉब्लम को सॉल्व करने के लिए हम नए सशन लाते हैं। तो अभी इससे हम कह सकते हैं कि ऐसे नहीं कह रहे कि वैज्ञानिक प्रगति है। बट इसलिए दैट इज द हिस्ट्री। तो इसी में अगर हमारा मन फस जाएगा तो हम इसके पर कुछ कर ही नहीं पाएंगे। और अगर हम सिर्फ ट्रांजेंडेंटल देखेंगे तो फिर क्या होगा? एक तरह से हम पावरलेस हो जाएंगे प्रैक्टिकली। हम वीक हो जाएंगे। माम अनुस्मरण युद्धच दोनों बताया है। माम अनुसर युद्धच तो फिर हमें क्या क्या करना है इन दोनों में कौन सा देखना है इधर से दोनों देखना है बट प्रैक्टिकली लेवल दैट इज एक्शननेबल कि कौन सा कौन से स्तर पे मैं कुछ कर सकता हूं तो अगर प्रभुपाद जी जब प्रचार कर रहे थे भारत में और जब प्रभुपाद प्रचार कर रहे थे और भारत में उनको यश नहीं मिला बच्चा तो प्रभुपाद जी कह सकते थे कि शायद यही भगवान की योजना है क्या ये भगवान की योजना है कि कैसे अगर मैं शायद मेरे गुरुदेव ने कहा है कि अगर कोई प्रचार करने कोई आता नहीं है तो फिर आप दीवारों को प्रचार करो यदि भगवान सुन रहे है भगवान प्रसन्न हो जाएंगे अब प्रपा शायद यही मेरी नियति है कि मुझे दीवारों को प्रचार करना है पर नहीं प्रभुपाद जी ठीक है भारत में प्रचार नहीं हो रहा है मैं अमेरिका जाऊंगा तो क्या है अगर प्रभुपाद जी ने केवल ट्रांसल दृष्टि से देखा होता ठीक है ये नहीं हो रहा है भगवान की योजना है पर प्रपा जी प्रैक्टिकल दृष्टि से क्या देखा कि ठीक है भारतीय लोग पाश्चात देश हो गए हैं तो फिर मुझे अगर पाश्चात देशों को प्रचार करूंगा तो वहां से वो अग्र कभी-कभी क्या होता है ऐसे सोचा जाता है कल कल शाम को मैं यहां पे यही पर क्लास का फ्रॉम अचीवमेंट टू फुलफिलमेंट कंसलटेंस के लिए कभी तो उसके बाद में एक सवाल आया था कि कैसे कई बार ऐसे होता है कि जब हम भक्त बन जाते हैं तो डिवोशन से व्यक्ति का एंबिशन चला जाता है। कि भक्ति करनी है तो क्या हो गया? हां हमें सब भगवान की योजना है। हमें संतुष्ट होना है उसमें। तो एंबिशन चला जाता है। तो संभव है ये पर ये जरूरी नहीं है। कैसे है? कि जब हम भक्ति कहते हैं जो डिवोशन है। तो एक तरह से और एंबिशन जो है। तो कोई कह सकता है कि अगर आप डिवोशन है तो आप महत्वाकांक्षा छोड़ दो। आपके भक्ति पर हां ये पॉसिबल है पर ऐसे भी हो सकता है कि जो एंबिशन है वह इट कैन कम विन डिमोशन महाराज राज महाराज युधिष्ठिर ने इसके पहले राजकीय यज्ञ किया था अभी इसके बारे में अश्वमेद यज्ञ करेंगे तो ये एक महत्वाकांक्षा है वो नहीं होता तो नहीं कर पाते अर्जुन की महत्वाकांक्षा थी कि मुझे सर्वोच्च योद्धा बनना है ये अगर महत्वाकांक्षा नहीं होती तो सर्वच योद्धा नहीं बनते धनु आर्चर नहीं बनते तो अभी ऐसे नहीं है कि जो एंबिशन है इट इज ऑलवेज भक्ति के इट इज विद इन डिवोशन और इट्स ऑलवेज आउटसाइड डिवोशन। इट डिपेंड्स कि वो किस प्रकार की इच्छा है। किस प्रकार की महत्वाकांक्षा है और किस तरह से हम उस महत्वकांक्षा के पीछे जाते हैं। एक तरह से प्रभुपाद जी का इतना बड़ा महत्वकांक्षा था कि 70 साल की उम्र में उन्होंने सोचा कि विश्व भर में प्रचार करूंगा। हम कह सकते हैं ये आध्यात्मिक है। हां सत्य है। पर फिर भी जो उसका कार्य करना था वो भौतिक जीवन में ही करना था और जैसे अगर हमें हमें कोई अपना घर बनाना है तो उसमें जो समस्या आती है प्रपा जी को मंदिर बना था उसमें वैसे समस्या आती थी तो इस भौतिक जगत में हम किस कारण से कार्य कर रहे हैं वो महत्वपूर्ण है पर इस भौतिक जगत की दृष्टि से कोई भी कार्य अगर करना है तो उसमें संघर्ष होता ही है हम भौतिक दृष्टि से कर रहे हैं भौतिक इच्छा से कर रहे हैं या आध्यात्मिक इच्छा से कर सततम कीर्त यत दृढ़ प्रो आचार्य बताते हैं यहां पे कि जब हमें कीर्तन करना है कीर्तन मतलब केवल हरि नाम कीर्तन कीर्तन या जप नहीं है पर भगवान का गुणगान करना है तो अगर गुणगान करना है भगवान का इस जगत में वो करना है तो उसके लिए बहुत संकल्प होता है क्योंकि इस जगत में ऑब्सकल समस्याएं जरूर आती है भक्त हो भक्त ना हो क्योंकि आते ही है तो इसलिए जब हमें आगे बढ़ना है हमारे जीवन तो हमारे पास्ट को हम देखते हैं जो हुआ ये क्यों हुआ वो उसके अनेक कारण हो सकते हैं पर कौन सा कारण जो है वो सबसे अधिक कंस्ट्रक्टिव है हमारे लिए आगे बढ़ने के लिए कि कौन से कारण से मैं आगे बढ़ के कुछ सीख सकता हूं। उसके कुछ पास्ट से कुछ सीख के भी आगे बढ़ने में मदद होती है। सो बेसिकली हमारा पास्ट है। हमारा भूत है, हमारा भविष्य है। और हमारा वर्तमान है पास्ट, प्रेजेंट और फ्यूचर। तो अभी पास्ट का हमें अगर हमें अभी हम यहां पे है अभी। सो हाउ मच शुड वी स्टडी द पास्ट? कितना हम पास्ट को पढ़े, समझे ताकि किस हद तक समझना है? तो मेन क्या है कि हमें आगे बढ़ना है। सो द पास्ट थ्री पॉसिबिलिटी है कि द पास्ट कैन एक है कि वो हमें द पास्ट कैन एम्पॉवर अस। कि हम भविष्य से जो आपको आत्मविश्वास आता है बुद्धि वृद्धि होती है। उससे पास्ट को हमें एम्पॉवर करके दूसरा है कि पास्ट में बर्डन कर सकता है। कि पास्ट से एक बड़ा बोझा आ जाता है। और तीसरा है कि पास्ट जो इरिलेवेंट है। ठीक है? तो जानकारी है इंटरेस्टिंग इन है उससे और कुछ फर्क नहीं पड़ता है। तो अभी तीनों संभावनाएं हैं। तो अभी हमें देखना है कि किस तरह से क्या पास्ट के नॉलेज से मैं एमावर हो रहा हूं। तो जो अगर भूतकाल बर्डन हो रहा है तो फिर क्या है हमें उसको एक इस तरह से देखना है कि एक क्लोजर देना है। मुझे इसमें आगे नहीं बढ़ना है। इसको आगे नहीं देखना है। ज्यादा इसमें घुसने की घुसने की जरूरत नहीं है। अभी इरेलेवेंट है तो किसी को इंटरेस्ट है कुछ लोगों को इतिहास में ज्यादा इंटरेस्ट होता है। कुछ लोगों को इतिहास में ज्यादा इंटरेस्ट नहीं होता है। तो व्यक्तिगत टेंडेंसी के ऊपर है। तो जो प्रभुपाद जी को एक बार पूछा गया था कि जो साइकोलॉजी में कई बार थेरेपी होता है तो लोगों के पास्ट हिस्ट्री के बारे में पूछते हैं। तो सिगमंड फ्रॉयड जो था साइकोथरेपी का वो पाइनियर है। कि हमारे जो जीवन में हम जो कार्य करते हैं जैसे हम होता है वो दैट इज शेप्ड बाय द चाइल्डहुड शॉक्स दैट वी हैव तो कितना क्या हमें हमारे भूतकाल में जाके वो शक्स को इन्वेस्टिगेट करना है समझना है तो प्रभुपाद जी ने कहा सिंपल जवाब दिया था उन्होंने कि इवन इफ यू अंडरस्टैंड द शॉक्स ऑफ द पास्ट दे शॉक्स इन द फ्यूचर वास द वर्ल्ड शॉकिंग प्लेस कि भूत में क्या हुआ ये ऐसे हुआ वैसे हुआ वैसे हुआ ये समझ सकते हैं पर क्या है जगत में जो विपत्तियां है शक्स है वो आने वाले है इसका मतलब ये नहीं है कि हमें किसी को थेरेपी जरूरत है थेरेपी नहीं होनी चाहिए आई डोंट थिंक प्रपा जी का जो मतलब था कि वो पूरा उसको डिसमिस कर प्रभुपाद जी का भाव था क्या कि आप पास्ट में कितना जाने वाले हैं और किस हद तक आप तो अगर किसी को कोई ट्रॉमा है जिससे वो पास्ट में अभी बर्डन हो रहा है पहले से तो फिर ठीक है कुछ समझना है और फिर ठीक है मुझे कुछ करना है इसलिए ये समझिए कि ये ये घाव क्यों हुआ है? ये ट्रॉमा क्यों हुआ है? क्या करना है? पर कहते हैं कि हमें पास्ट के बारे में ही हम कभी-कभी इतना पास में फंस जाते हैं कि उसी में फंसे रहते हैं। तो अभी यहां पे भागवत में कैसे पता चल रहा है? युधिष्ठिर महाराज भी आगे बढ़ रहे हैं। जो हुआ बहुत बुरा हुआ पर अभी क्या है कि एक तरह से जितना युधिष्ठिर महाराज पास्ट में फंसे थे उनको उतना गिल्ट हो। था ये मेरे कारण हुआ मैंने मैंने मुझे राज्य की कामना थी इसीलिए मैंने युद्ध करवाया और इतनी सारी तो क्या है प्रभुपाद तो वहां पे विष्णु पिता ने क्या बताया उनको एक तरह से क्लोज देते हुए बताया कि तस्या राज जो हुआ वो भगवान की योजना में हुआ है तो अभी जो हुआ है वो पास्ट में जो हुआ भगवान की योजना थी अभी भगवान की योजना तुम्हारी नहीं क्या है? क्या है? अनाथ पाही नाथ प्रभु। अभी जो लोग अनाथ हो गए हैं उनके लिए तुम नाथ बन जाओ। अभी तुम राज्य की जिम्मेदारी है। तो इसीलिए जो पास्ट में हुआ है तो हमारे लिए ओवर आर्चिंग क्या है कि तीनों में हमें एक कृष्णा कॉन्शियस विज़ कि वेदां समितानी वर्तमान अर्जुन भविष्य भूतानी कि भगवान जो है पास्ट प्रेजेंट फ्यूचर तीनों के वो इंचार्ज है और जिस हद तक प्रैक्टिकली कुछ हम कुछ सीख सकते हैं वो सीखना है पर उसके बाद में हमें आगे बढ़ना है। तो यही है कर्म के तत्व ज्ञान भी है। उसका भी भाव यही है कि हां अरे मैंने क्या कर्म किया था जिसके कारण समस्या आ गई है। वो जो है उस तरह से उसप ज्यादा फोकस शास्त्रों में हां कुछ कर्म होगा जिसके कारण हमारे में समस्या आई है पर उसप फिक्सेट नहीं करना है कृष्ण अर्जुन के साथ ही होते हैं और कृष्ण कहते हैं मुझे सारे पूर्व जन्म याद है जन्म त वेद सर्वा मुझे सब याद है तुम भूल गए हो पर फिर भी कृष्णा हमको याद नहीं दिलाते थे कि पूर्व जन्म में भीष्म ये व्यक्ति थे तुम ये व्यक्ति थे तुमने ऐसे किया था उन्होंने ऐसे किया था उसके लिए तुम्हें अभी युद्ध करना पड़ रहा है नहीं जो प्रेजेंट है उससे अभी आप आगे बढ़ो। तो इसलिए अभी हमारा टेक अवे क्या है इसमें कि जैसे यहां पे युधिष्ठिर महाराज ने यज्ञ किया और क्या है अभी उन्होंने वो जिम्मेदारी ली है कि राजा बने हैं तो अभी राज्य का कल्याण कैसे करना है उस पे उन्होंने जोर दिया है। तो बेसिकली क्या है कि फिलोसोफी जब हम देखते हैं तो फिलॉसफी में दो अप्रोचेस होते हैं। एक है कि एक्सप्लेन व्हाई थिंग्स आर द वे दे आर कि अभी जहां पे ऐसी परिस्थिति है कि वो क्यों हुई व्हाई द प्रेजेंट इज जो अभी वर्तमान में जैसे हुआ है वो क्यों अभी यहां पे ऐसे है ये एक अप्रोच है फिलॉसफी का और दूसरा अप्रोच क्या है फिलोसफी एक्सप्लेन हाउ टू मूव विद द प्रेजेंट। अभी मैं वर्तमान में हूं। यहां पर मैं क्या कर सकता हूं? और शास्त्रों में अधिकांश रूप से ये अप्रोच लिखा जाता है। यद्यपि हम तत्व ज्ञान के स्तर पर कहते हैं कि कर्म के नियम से हम कहते हैं व्हाई डू बैड थिंग्स हैपन टू गुड पीपल? वो हम समझाते हैं। पर शास्त्रों में जो एम्फेसिस है ये एम्फेसिस नहीं है कि व्हाई डू बैड थिंग्स हैपन टू गुड पीपल? अच्छे लोगों के साथ बुरा क्यों होता है? है शास्त्रों का एफसिस क्या है कि व्हेन बैड थिंग्स हैपन टू गुड पीपल व्हाट डू गुड पीपल डू हाउ डू गुड पीपल एक्ट जब अच्छे लोगों के साथ बुरा होता है तो अच्छे लोग कैसा कार्य करते हैं भागवत में जो 12 महाजन बताए गए हैं एक तरह से हर एक महाजन के जीवन में एक समानता देखते हैं हम कि उन सबके जीवन में विपत्तियां आती है उन सबके जीवन में दुर्घटनाएं होती है उन सबके जीवन में समस्याएं आती है और वो उनका सामना कैसे करते हैं और उनका जो आदर्श चरित्र किस बारे में है कि समस्याओं का सामना करते हुए कैसे वो भगवान में श्रद्धा रखते हैं भगवान में सेवा भाव रखते हैं। कैसे भक्ति और धर्म के साथ वो आगे बढ़ते हैं। दैट इज व्हाट मेक्स देम महाजन। उसके कारण वो महाजन कहलाए जाते हैं। तो धर्मस तत्व महाजनो की जो धर्म का तत्व जो है वो गुहिय है यहां पे गुहिय का लेट अस प्रूव दिस पॉइंट की गुह का मतलब क्या है इसके दो अलग अर्थ होते हैं इंग्लिश में थोड़े अलग शब्द है गुह का एक अर्थ है सीक्रेट और दूसरा है प्राइवेट अभी सीक्रेट और प्राइवेट इन दोनों का शायद बहुत सिमिलर लगता है पर सीक्रेट मतलब क्या है कोई कुछ जान मुझ से छिपाया गया है। बट प्राइवेट मतलब क्या कि अगर हमारे घर में कोई इवेंट है और हमें किसी हमारे फैमिली मेंबर से बात करना है वो किसी और से बात कर तो हम क्या कैन आई टॉक प्राइवेटली यू? तो प्राइवेटली मतलब ऐसा नहीं कि दूसरों से छुपा के रखना है। बट इट इज़ नॉट रेवेंट। क्या है कि ये कुछ वो प्रोग्राम के बारे में कुछ सेम उत्सव कुछ बोलना है कुछ प्रोग्राम कुछ बात तो दूसरों को उसे बताने की जरूरत नहीं है। तो जब भगवान नहीं बताते एक गुय है कि कुिय का मतलब ये नहीं कि भगवान जानबूझ के वो छिपा के रखते हैं। तो प्रपा कॉन्फिडेंशियल के रूप में स्टार्ट करते ट्रांसलेट करते हैं। तो कॉन्फिडेंशियल नॉलेज तो कॉन्फिडेंशियल का अर्थ क्या है? कि जिसमें एक अर्थ है उसका कि जिसमें हमें कॉन्फिडेंस है उनको बताया जाता है। तो कॉन्फिडेंशियल मतलब क्या है? जिसमें हमें विश्वास है उस व्यक्ति को बदल। इट इज़ इट इज़ नॉट सो मच सीक्रेट एज इट इज प्राइवेट। तो अभी क्या है? तो कि किसी की कभी किसी का पता चल सकता है कि ये क्यों ऐसे हो रहा है। हम कॉज समझ सकते हैं पर कभी-कभी जो है कॉज नहीं समझ पाते। तो धर्मस तत्वम नितम कि एक तरह से वो गुह का एक और अर्थ है कि गुफा में छिपा हुआ है। तो गुह का अर्थ है तो महाजनो ये तो जो महाजन है उन्होंने क्या मार्ग दिया है? उन्होंने कैसे कार्य किया है? तो में अगर हम देखते हैं चाहे तो वो बलि महाराज हो या प्रहलाद महाराज हो या वो भीष्म पितामह हो सबके जीवन में बड़ी-बड़ी चुनौतियां आती है। पर सब क्या है? वो भगवान पे श्रद्धा रख के सेवा भाव रख के आगे बढ़ते हैं। तो अभी ये मेरी परिस्थिति है। इस परिस्थिति में मैं सेवा कैसे कर सकता हूं? मैं कुछ कंस्ट्रक्टिव क्रिएटिव कैसे कार्य कर सकता हूं? वो भाव रखेंगे तो फिर क्या होगा? हम महाजन के अनुयाई बन रहे हैं। उनके उनके उनके जो उदाहरण है उसके अनुसार हम कार्य कर रहे हैं। सो हाउ टू मूव वि द प्रेजेंट जो अभी वर्तमान है उसमें मैं आगे कैसे बढ़ सकता हूं। दिस इस वेयर आवर सर्विस एटीट्यूड सेवा भाव आता है। अब सेवा भाव के रूप में हम ये भी जानना सकते हैं कि ये हम सोच सकते हैं। मैं जानना चाहता हूं कि ऐसे क्यों हुआ मेरे जीवन में हां तो जरूर है समझाने का प्रयास कर सकते हैं बट मोरेंट देन नोइंग इज डूइंग जो है कि हमें अल्टीमेटली हम भगवान के सेवक है तो हमें सेवा करना है तो इस परिस्थिति में जो मुझे पता है उसके अनुसार मैं अभी सेवा कैसे कर सकता मैं अभी आगे कैसे बढ़ सकता हूं तो और लास्ट पॉइंट कि मैं अभी राधा महाराज से कुछ दिन पहले बात कर रहा था और मैं इंग्लैंड में था वहां भक्तों से बात कर रहा था कि हमारे कुछ लोग कहते हैं कि इस के इतिहास में क्या हुआ था? हम जानना चाहते हैं यहां पे कैसे ये हुआ था वो हुआ था वो हुआ था। तो अभी क्या है कि इस के इतिहास में प्रोपा से प्रचार किया बहुत ग्लोरियस है। तो कोई भी इतिहास देखते हैं उसमें ग्लोरियस चैप्टर्स होते हैं। उसमें कुछ लेसन ग्लोरियस चैप्टर्स भी होते हैं। कंट्रोवर्सी हो गया वो हो गया वो हो गया। तो भक्तों में अलग दो अलग प्रकार के बातें हैं। कुछ कहते हैं कि जो हुआ वो हो गया। उसके बारे में बात करने की क्या जरूरत है? अभी हमें आगे बढ़ना है। भक्ति करनी है। कुछ लोग कहते हैं जो हुआ था उसे हमें सीखना चाहिए। दूसरों को बताना चाहिए। क्योंकि होगा कि दूसरे जो है वो कहीं पढ़ेंगे कंट्रोवर्सी यहां पे हुआ था। वो कंट्रोवर्सी यहां पे हुआ था। वो पढ़ेंगे तो क्या होगा? अभी इंटरनेट पे किसी को कहीं से पता चल जाता है तो उनका मन विचित हो जाएगा। तो मैंने जब महाराज मैंने अलग-अलग भक्तों से इसके बारे में बात की है तो ये दोनों प्रकार के भक्त है कि हां वी शुड एजुकेट डिवोटीस। और दूसरा है कि व्हाट इज द पॉइंट ऑफ डिस्कसिंग? तो इसमें मेन चीज क्या है कि हमें कृष्णा कॉन्शियस में आगे बढ़ना है। तो जहां तक हिस्ट्री की बात करनी है तो हिस्ट्री में जो है जो विपत्तियां है जो एडवर्सिटीज है जो मिस है जो कंट्रोवर्सी है वो होते रहते हैं। तो महाराज जी बताए थे कि हमारी जो हिस्ट्री है हमारी हिस्ट्री में हम क्या पढ़ते हैं कि किस तरह शास्त्रों में जो इतिहास बताया गया है कि उस उसमें सक्सेस स्टोरीज है और उसमें फेलियर स्टोरीज भी है। पर वो क्या है फेलियर स्टोरी से सक्सेस स्टोरी ऑफ आती है जो अजामिल एक तरह से फेल हो जाते हैं पर उसके बाद में वो सक्सेसफुल जाते भरत महाराज एक तरह से फेल हो जाते हैं। उसके बाद में सक्सेसफुल हो जाते हैं। तो कहते हैं कि कि हमें क्या देखना है कि जो पास से हमको जो प्रेरणा मिलती है वो प्रेरणा लेके हमें आगे बढ़ना है। तो उनका उनका कहना था कि जो रिसेंट हिस्ट्री है या डिस्टेंट हिस्ट्री है वो प्रिंसिपल सब सेम ही है। पर क्या जो रिसेंट हिस्ट्री में जो नेगेटिव हुआ है वो अगर हम सुनेंगे तो उससे डिरेजमेंट ज्यादा हो जाता है। तो जो अगर कोई कोई प्रॉब्लम्स आते हैं वो प्रॉब्लम्स किसके कारण आते हैं? वही प्रिंसिपल है। इस जगत में माया है, हम गलतियां करते हैं। तो जो सीखना है हम पास्ट से भी सीख सकते हैं। डिस्टेंस पास्ट से भी सीख सकते हैं। रीसेंट पास्ट से भी सीख सकते हैं। पर रीसेंट पास्ट से क्या होता है? ज्यादा डिसरेजमेंट होता है। की संभावना है। पर अगर हम डिस्टेंस पास से सीखते हैं तो क्या डिस्टेंस के कारण क्या होता है? हम इतना इमोशनल नहीं फसते इसमें तो वी कैन बी मोर एंग्रेजी। तो इसीलिए जो पॉइंट ये है कैसे महाराज कहते जो कहते हैं कि हमको पास्ट के पास सीखना है जो सिखाना चाहते हैं आई इज़ नॉट सेइंग आई एम नॉट सेइंग दे आर रोंग। दैट इज नॉट द मेथड आई प्रेफर। वो कहते हैं कि हमें क्या करना है? भूतकाल से किस तरह से हमें देखना है जिसे प्रेरणा मिल सकती है ताकि हम आगे बढ़ सकते हैं। तो दिया क्या है कि वी हैव कम हियर टू बी कृष्णा कॉनशस कृष्णा भावना है हमें हिस्ट्री कॉन्शियस नहीं होना है हमें कंट्रोवर्सी कॉन्शियस नहीं होना है अभी हिस्ट्री कॉन्शियस या कंट्रोवर्सी कॉन्शियस होने से अगर कृष्णा कॉन्शियस होने में मदद हुई है तो ठीक है नहीं तो फिर क्या होता है उसी में हमारी चेतना फस जाती है और फिर वो कृष्णा कॉन्शियस नहीं होते तो वही व्यवसायत्म बुद्धि एक हमारा एक ही है कि हमें कृष्ण कॉन्शियस होना है बहुकारता बुद्ध व्यवसायना तो हम ये टॉपिक आ जाएगा कि हाउ टू सी आवर पास्ट कि हमारे भूतकाल में जो हुआ है उसे किस तरह से देखना है जिससे कि हम आगे बढ़ सकते हैं। तो कॉन्टेक्स्ट में हमने देखा कि जो वॉर हुआ युद्ध हुआ उसके अनेक कारण हो सकते थे। तो भागवतम यहां पे अभी युद्ध खत्म हो गया है। तो उस पर जोर दिया जा रहा है। कि एक उसको एक नैसर्गिक विपत्ति है। उस रूप में यहां पर देखा जा रहा है। तो नेचर जो है नेचुरल डिजास्टर तो अभी इसी इसी लेवल पे जोर क्यों दिया जा रहा है? तो उसको हम देखा इनसाइड कि हमें जो पास्ट है हमारे पास्ट का हम पे क्या प्रभाव हो रहा है? कितनी तरह से प्रभाव हो सकता है। कि पास्ट कैन एमवर अस हमें उसे प्रेर मिल सकती है, शक्ति मिल सकती है। द पास्ट कैन बर्डन अस और द पास्ट कैन बी इरिलेवेंट टू अस। तो हमें देखना है कि हमें वो पास्ट से एम्पवर होना है। हमें डिसे डिरेज हो के वो पास्ट हमारे लिए ओझा नहीं बनना चाहिए। तो अगर वो भाव रखते हैं कि हमें आगे बढ़ना है हमारे जीवन में तो उस भाव से किस पास्ट में जो भी हुआ है हर एक घटना के अनेक कारण हो सकते हैं। तो अगर हम आगे बढ़ना है तो वि रीजन हेल्प्स अस टू मूव अहेड मोस्ट पपसली इन द मोस्ट कृष्णा कॉन्शियस तो सकारात्मक होते द मोस्ट एक्शननेबल कॉज ऑफ़ एक्शन कि एक्शननेबल मतलब उसके बारे में हम कुछ कर सकते हैं। कॉज ऑफ द पास्ट वह देख के हमें आगे बढ़ना है। तो यही भाव भागवतम में भी है अनेक जगहों पे बड़े महान आचार्य भी है उनके समस्याएं आती है पर हमें उनको इस तरह से देखना है एक अभी क्या है फिर जब हम फिलोसोफी से समझना चाहते हैं कि व्हाई द प्रेजेंट कि ये भविष्य अभी मेरा वर्तमान जो आया है यहां पे ऐसे क्यों आई है परिस्थिति वो एक परिस्थिति हम देख सकते हैं और दूसरा है कि हाउ टू फेस द प्रेसिडेंट अभी जो वर्तमान आ गया है वो वर्तमान में हमें सामना कैसे करना है वह महत्वपूर्ण है तो देखा किस तरह से हमें क्या करना है? हमें कृष्णा कॉन्शियस बनना है और हर एक व्यक्ति को देखना है कि जो मेरा हिस्ट्री है इतिहास है। मेरा इंडिविजुअल इतिहास है, संस्था का इतिहास है, राष्ट्र का इतिहास है। वो हिस्ट्री कॉन्शियस जो है वो मुझे कृष्णा कॉन्शियस बनाने में मदद कर रहा है या उसके बाहर लेने जा रहा है। तो उस तरह से हमें वी कैन बी एम्पॉवर्ड टू फेस द प्रेजेंट। थैंक यू वेरी मच। हरे कृष्णा क्वेश्चन और कमेंट्स
माइक टू माइक
हरे कृष्णा गुरु जी आपने कहा कि जो भी कार्य हम करते हैं जो भी समस्या आती है जो भी समस्या आती है तो उसके उसके लिए हमेशा हम लोग जूझते रहते हैं उससे बाहर निकलने के लिए तो कितना हमें संघर्ष करना चाहिए और कहां रुकना चाहिए हाउ टू डिसाइड दैट अभी जैसे आपने कहा कि एक समय आता है जब भी आपको समझ लेना चाहिए कि ऐसा ही होने वाला था तो कहां रुकना चाहिए या कितना संघर्ष करना चाहिए हाउ टू ड्रा द लाइन हाउ मच टू पुट एफर्ट्स जब कोई समस्या आती है तो कहां भी तक कोई समस्या का सामना करने का प्रयास करना चाहिए। कैसे है कि एक तरह से महाभारत और भागवतम ये दो घटना को बता रहे हैं पर उनको अलग-अलगों से उनका सामना कर रहे हैं। अभी जब परीक्षित महाराज को श्राप मिलता है तो वो मैं इस जगत से मैं अभी आई विल टर्न अवे फ्रॉम आई रंस दर्श सन्यास नहीं लेते हैं सन्यास जैसे ही कार्य अर्जुन के पास समस्या जब आती है तो भगवान कहते हैं तुम सन्यास मत लो तुम युद्ध करो तो क्या है कि दोनों अप्रोचेस जो है वो वैलिड है जब समस्या आती है मेरे जीवन हमारे जीवन में इस जगत में है एक है कि जब हमारे हम वी ट्राई टू ट्रांजेंट द वर्ल्ड और वी ट्राई टू ट्रांसफॉर्म द वर्ल्ड। तो दोनों जो है ये वैलिड अप्रोचेस है। ट्रांजेंट और ट्रांसफॉर्म। तो कब कौन सा अप्रोच लेना है वो बेसिकली वो देश काल पात्र पे है। अभी प्रभुपाद जी की जब झांसी में थे और वहां पर मंदिर बनाने का प्रयास कर रहे थे और नहीं बन रहा था मंदिर तो प्रभुपाद ने क्या किया ठीक है नहीं हो रहा है चल जाओ यहां से ही डिड नॉट ट्राई टू चेंज द सिचुएशन ठीक है क्या युद्ध करना है संघर्ष करना है पर जुहू में वैसी समस्या आई तो प्रभुपाद व्हाट अगेन सिचुएशन तो अभी क्या फर्क थासी और जुहू में हम सर कॉन्टेक्स्ट जो अलग था झांसी में प्रभुपाद जी अकेले थे झांसी ये इतना कोई बड़ा बहुत बड़ा महत्वपूर्ण शहर नहीं था जहू क्या था प्रपाद जी के पास भी शिष्य थे बहुत से उनके पास इंटरनेशनल सपोर्ट था लोकल भी थे उनके और बॉम्बे बहुत महत्वपूर्ण जगह थी शहर है वो वो जगह भी बहुत प्रॉमिसिंग थी तो एक जगह दिस विल फाइट अंदर दिस नॉट फाइट तो ऐसे नहीं है कि एक ही अप्रोच हमेशा स्टैंडर्ड है। इन जनरल क्या है कि हमारा कोई भी बैटल है हमारे जीवन का जो उद्देश्य है उसमें ये कितना कंट्रीब्यूट कर रहा है। दैट इज द लाइन व्हिच यू हैव से। तो अभी हमारे जीवन का क्या होता है कि एक तरह से हमारा लाइफ हम देखते हैं। तो हमारे लिए एक अल्टीमेट पर्पस है कि हमें कृष्ण के पास जाना है। देन हमारे पास प्रभु एक इमिट होता है। कि हमारे जीवन में एक अल्टीमेट पर्पस है कि भगवान के पास जाना है और हमें रोज कुछ इमीडिएट टू होते हैं कि हमको मुझे मुझे जप करना है मुझे सेवा करनी है मुझे ये कार्य करना है तो अभी हम भक्तों को एक तरह से अपने अपने गुरु अपने वरिष्ठ भक्त काउंसिलर बालक अपने खुद की बुद्धि से हमें एक इंटरमीडिएट कुछ जो है गोल्स या इंटरमीडिएट डायरेक्शन जो है हम सब हर एक को ये फैसला करना है। अभी भक्तिवाद हॉस्पिटल बना है। ये कैसे बना कि हमें भगवान की सेवा करनी थी। तो जहां पर वरिष्ठ भक्त है, महाराज है उन सब ने एक विशेष बनाया कि हमें ये सेवा करनी है। इस तरह से सेवा करनी है। तो क्या है? वी नीड टू हैव सम इंटरमीडिएट गोल्स। तो जो डेली बैटल्स है ये बैटल कितना फाइट करना है? तो हाउ मच इज इट कंट्रीब्यूटिंग टू माय इंटरव्यू? गोल और माय अल्टीमेट कि उसके आधार पर हमें फैसला करना है कि ये जो ये जो कार्य करना है उसमें कितना इंपॉर्टेंट है मुझे यहां पे ये इस समस्या का संघर्ष करना सो एक और उदाहरण दे सकते है जो गंगा होती है वो हमेशा सागर की ओर जाती है पर वो सागर में जाती है किस मार्ग से जाती है इसी मार्ग से जाना है या किसी मार्ग से जाना है वो फैसला कैसे करते है डिपेंड्स कि अगर वही मार्ग से जाना संभव है तो कुछ करते रहेंगे कुछ करते रहेंगे पर संभव नहीं है तो कुछ और मांग ले लेंगे तो हमें देखना है कि हमारे बेसिकली कुछ टू टू फैक्टर्स आर देयर भागवत महाभारत में महाभारत और भागवत में फर्क ये है कि महाभारत में मोस्टली ट्रांज भागवत में उसे ट्रांज में बताया गया है तो अभी भाग भागवत सॉरी महाभारत में धर्म का जोर दिया गया है और धर्म में हमारे हमारा कर्म क्या है? यह समझने के लिए उसमें दो चीजें बताई। एक है कि हमारा जो अ पुरुषचर्य है, पुरुषत्व है हमारा हमारा जो एबिलिटी या हमारा टैलेंट है क्या हम कर सकते हैं? और दूसरा है हमारा एनवायरमेंट। प्रकृति और पुरुषत्व। ये दोनों से हम फैसला कर सकते हैं कि मुझे ये समस्या का सामना करना। करना है या नहीं करना है। कभी-कभी क्या होता है टैलेंट है और एनवायरमेंट भी सपोर्टिव है। तो फिर जरूर हम एक वहां पे चेंज कर सकते हैं। पर कोई टैलेंट है पर एनवायरमेंट बिल्कुल ऑोजिट है। तो मान लीजिए अभी पूरा हम किसी काम कर रहे हैं। कोई किसी गवर्नमेंट ऑफिस में काम कर रहे हैं। वहां पे सब हर जगह पे करप्शन है। और वो एक व्यक्ति कहता है कि मुझे करप्शन नहीं करनी है। तो अभी वो कहता है मुझे एंटी करप्शन में पड़ना है। ठीक है? अगर वही आप का जीवन का मिशन है तो आप कर सकते हैं। पर अगर व्यक्ति को लगता है कि ठीक है मुझे पूरा सिस्टम बदलना मुश्किल है तो मैं मेरा काम कर लूंगा। मतलब नॉट दैट आई विल बी करप्टेड वन मनी बट जो मेरा कर्तव्य है मैं करूंगा। आई मे नॉट फाइट अगेन द सिस्टम। पर अगर किसी को क्षमता है, किसी के पास रोल है, रिस्पसिबिलिटी है तो फाइट कर सकते हैं। बेसिकली टैलेंट और एनवायरमेंट में दोनों देख के फैसला करना है कि मुझे उसमें कितना कमिटमेंट है। कि शुड आई कमिट टू दिस कॉज मैं इस मार्ग में कमिट करूं या किसी और मार्ग में कमिट कर तो जो देखिए मतलब जो नदी का प्रवाह है नदी का प्रवाह कितना शक्तिशाली है और उसके रास्ते में जो जो व्यक्ति आ रहा है वो कितना शक्तिशाली है टैलेंट और एनवायरमेंट ये दोनों को देख के फिर फैसला करना है कि यहीं से जाना है कहीं थैंक यू वेरी मच पंतराज भागवत की
जय।