Hindi – India or Bharat?: A Bhagavad-gita perspective
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Lecture Summary
- नाम और स्मृति का संबंध: यद्यपि शेक्सपियर के अनुसार नाम से किसी वस्तु के गुण नहीं बदलते, किंतु भगवद्गीता और भाषा दर्शन के दृष्टिकोण से नाम एक “पॉइंटर” या “रिमाइंडर” (स्मृति दिलाने वाला) होता है। नाम बदलने से वस्तु या स्थान के प्रति व्यक्ति की स्मृतियां और अनुभव बदल जाते हैं।
- भगवान के अनेक नाम: जिस प्रकार भगवान विष्णु के सहस्रनाम उनके अलग-अलग गुणों का स्मरण कराते हैं, उसी प्रकार किसी राष्ट्र या क्षेत्र का नाम भी उसके ऐतिहासिक और सांस्कृतिक मूल्यों को जीवंत रखता है।
- ‘इंडिया’ नाम का परिचय: ‘इंडिया’ एक बाहरी (extrinsic) और भौगोलिक नाम है, जो सिंधु (Indus) नदी के आधार पर बाहर से आए लोगों द्वारा दिया गया था।
- ‘भारत’ नाम की सार्थकता: ‘भारत’ नाम प्राचीन इतिहास, महाभारत काल और महान राजा भरत से जुड़ा हुआ है।
- आध्यात्मिक अर्थ: ‘भारत’ शब्द का अर्थ है—जो ‘भा’ (ज्योति, ज्ञान, दिव्यता) में ‘रत’ (एकाग्र या लीन) है। यह हमें अज्ञान से प्रकाश की ओर (“तमसो मा ज्योतिर्गमय”) बढ़ने और ज्ञान की खोज करने की प्रेरणा देता है।
- सांस्कृतिक पहचान और पसंद: अपनी प्राचीन ज्ञान परंपरा (इंडियन नॉलेज सिस्टम) और सांस्कृतिक पहचान को पुनर्जीवित करने के लिए ‘भारत’ नाम का उपयोग करना अत्यंत सार्थक और प्रेरणादायक है। संविधान में दोनों नाम होने के कारण, किसी की व्यक्तिगत पसंद (चाहे वह ‘भारत’ चुने या ‘इंडिया’) का सम्मान किया जाना चाहिए।
Full Transcription
भारत या इंडिया: एक भगवद्गीता परिप्रेक्ष्य
हरे कृष्णा! इंडिया या भारत—इस वाद पर भगवद्गीता का क्या दृष्टिकोण हो सकता है? कुछ लोग यह कहते हैं कि नाम से क्या फर्क पड़ने वाला है? भारत में लाखों गरीब लोग हैं, भारत की जो सत्य स्थिति है, वह तो नाम से बदलने वाली नहीं है।
तो क्या यह सही है और ऐसे विचार गलत नहीं हैं? पहले से भी आ चुका है, शेक्सपियर ने कहा था कि एक नाम से क्या फर्क पड़ने वाला है, जो गुलाब है वह उतना ही सुंदर, उसका सुगंध होगा, इसे कोई भी नाम से बुलाए तो।
यह पूर्णतया असत्य नहीं है। बात यह है कि अगर कोई वस्तु है और कोई व्यक्ति है, उन दोनों में एक संबंध जुड़ता है एक शब्द से। तो जब कोई व्यक्ति एक गुलाब का अनुभव कर रहा है, तो गुलाब को कोई नाम देंगे, तो उसके गुलाब के तो कोई गुण बदलने वाले नहीं हैं, पर उस व्यक्ति का अनुभव बदल सकता है—गुलाब इस शब्द से।
उस व्यक्ति के मन में जो स्मृतियां आती थीं, वो नए शब्द से नहीं आएंगी। जो भाषा का तत्वज्ञान होता है, फिलॉसफी ऑफ लैंग्वेज़, उसमें कहते हैं कि शब्द के दो भाग होते हैं, दो गुण होते हैं: एक है उसका डिनोटेशन (वह किसको संबोधित कर रहा है) और उसका कॉनोटेशन (मतलब वह किसकी याद दिलाता है, उससे क्या स्मृति होती है)।
तो शब्दों के द्वारा किस चीज़ की याद आती है, वहां वही महत्वपूर्ण है। यही तो कारण है कि कई बार, कई राष्ट्रों ने, कई लोग, कई जगहों पर नाम का बदलाव करना होता है। और वैदिक शास्त्रों में ऐसे बताया गया है कि नाम जो है, वहां महत्वपूर्ण है।
भगवान के अनेक नाम और उनका महत्व
इसलिए तो परम सत्य के अनेक नाम हैं। विष्णु सहस्रनाम जो है, उसमें भगवान विष्णु के हजार नाम बताए गए हैं। क्यों हजार नाम? क्योंकि भगवान जो हैं, उनके अनेक गुण हैं।
और भगवान के जो अनेक गुण हैं, तो उनमें से उनके अलग-अलग नाम, अलग-अलग गुणों को हमारे स्मरण कराते हैं। तो इसलिए अभी जो शब्द है, जो नाम है, वह केवल एक प्लेसहोलडर नहीं है कि इस जगह यह नाम डाल दो, वह नाम डाल दो, कुछ फर्क नहीं पड़ने वाला है।
इसलिए कोई इलाका है, कोई जायदाद है, उसका आज यह मालिक है, उसका फर्क नहीं है, ऐसा नहीं है वह। जो नाम है, वह केवल प्लेसहोलडर नहीं है, वह पॉइंटर है, वह रिमाइंडर भी है।
इंडिया और भारत: ऐतिहासिक और दार्शनिक दृष्टिकोण
उसको हम व्यक्ति और इंडिया के दृष्टिकोण में कैसे अप्लाई कर सकते हैं कि अभी ये दो नाम हैं, किस चीज़ की याद दिलाते हैं हमको?
इंडिया जो है, यह एक एक्सट्रिंसिक और जियोग्राफिकल—यह बाहर वालों ने दिया हुआ नाम है, और यह एक भूगोल के आधार पर बताया जा रहा है। तो मतलब क्या है कि जब प्रदेश से लोग आए थे भारत में, तो उन्होंने यह नाम भारत को दिया था। प्राचीन काल से भारत ‘इंडिया’ नाम इस्तेमाल नहीं कर रहे थे।
और जो सिंधु नदी थी, उसके इस पार जो लोग रहते हैं, उनको ‘इंडिया’ नाम से पहले बताया गया। पहले सिंधु नदी थी, उसको ‘हिंदू’ बताया गया, फिर इंडस नदी का हो गया, तो फिर वह ‘इंडिया’ हो गया।
‘भारत’ यह नाम है, जो प्राचीन काल से यहां पे आ रहा है। इसका उल्लेख महाभारत में आता है, श्लोकों में आता है, खासकर कि अब भरतवंशी के, जो महान राजा थे भरत, उनको भी संबोधित करता है। तो भारत का जो रिच हिस्ट्री है, जो बड़ा ही महान इतिहास है, उसकी ओर संबोधित करता है।
‘भारत’ शब्द का आध्यात्मिक अर्थ
और इसके साथ-साथ, इसका एक तत्वज्ञानी और आध्यात्मिक महत्व भी है। ‘भारत’—इस शब्द का अर्थ क्या होता है? ‘भा’ मतलब जो भासकर, जो ज्योति, जो लाइट है; और ‘रत’ मतलब जो उसमें रत होना, उसमें एकाग्र होना।
तो भारत मतलब जो ज्योति में रत है, जो ज्ञान की ज्योति है, जो दिव्यता की ज्योति है, जो भक्ति की ज्योति है, जो अध्यात्म की ज्योति है, जो ज्योति मानव को अपनी पूर्णता तक ले जाती है, वैसे ज्योति की खोज में रहना, उसमें अपना जीवन जीना—यह भारत के प्राचीन संस्कृति और इतिहास को और भी अच्छी तरह संबोधित करता है।
क्या है इसमें? यह सूचित करता है, वो क्या करता है हमें? बताता है कि भारत में एक ऋषि-गण हुए, जिन्होंने ज्ञान की खोज में अपना सारा जीवन समर्पित किया है। न केवल खुद उन्होंने ज्ञान की ज्योति प्राप्त की है, पर उन्होंने दुनिया को भी ज्ञान की ज्योति दी है।
और भारत में ऐसे न केवल सब ज्योति में अपना जीवन जीने का प्रयास करते हैं, और जो उपनिषदों में बताया गया—तमसो मा ज्योतिर्गमय—कि आप अज्ञान से, अंधकार से आप ज्योति की ओर जाओ, वो उसका भाव यह है कि हम सब और ज्ञान के आधार पर, विद्या के आधार पर हमारा जीवन जिएं, विद्या के आधार की ओर की खोज करें, फिर उसके अनुसार हमारे जीवन को और अच्छा बनाएं।
और यहां जो भाव है, यह तो न केवल भारत के लिए पर सारे विश्व के लिए कल्याण का भाव है। तो अगर यह जो नाम बदलते हैं, ‘भारत’ यह नाम उससे जो स्मृति होती है, वह बहुत प्रोफाउंड है, बहुत गूढ़ है, व्यावहारिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है।
नाम परिवर्तन और सांस्कृतिक पहचान
तो जो नाम होते हैं, उससे जो हिस्टोरिकल नैरेटिव होता है, जिस प्रकार की कहानी बताई गई है इतिहास में, वो आती है। और नाम बदलने से लोगों की स्मृति बदलती है।
तो अगर ‘भारत’ यह नाम लेने से भारतवासियों को प्रेरणा मिलती है कि जो हमारी प्राचीन ज्ञान की परंपरा है, पद्धति है, ज्ञान की संस्कृति है, उसका और अन्वेषण करें, खुद को ज्ञान में, भारत ज्ञान में रत करें, और फिर ऐसा जो ज्ञान है, वह विश्व को और बांटे, तो फिर उससे ‘भारत’ यह नाम सार्थक हो जाएगा।
फिर तीसरा आता है प्रेफरेंस (पसंद)। तो जो लोगों को इतिहास पता है, वह बहुत मायने नहीं रख सकता है, क्योंकि उससे जो कल्चरल आइडेंटिटी है, कि हमारी संस्कृति दृष्टि से कौन है, क्या हमें बाहर वालों ने नाम दिया है, वह हम सुधार कर रहे हैं? क्या हम हमारे इतिहास के आधार पर हमारे नाम ले रहे हैं? तो उससे बहुत फर्क पड़ता है उनके लिए।
और आज जैसे भारत और जागृत हो रहा है, विश्व के मंच पर और असर्टिव हो रहा है, अपना प्रभाव दिखा रहा है, और साथ-साथ अंदर भी अपनी जो प्राचीन संस्कृति, उसकी विद्या है, उसके जो रिसोर्सेज हैं, उससे जो प्राप्त होता है—इंडियन नॉलेज सिस्टम्स—उसकी ओर और खोज कर रहा है।
तो ऐसे समय में, ऐसे देश में, उसका नाम बदलना यह बहुत अच्छा हो सकता है—वही खोज को आगे बढ़ाने के लिए, आध्यात्मिक ज्ञान की खोज को आगे बढ़ाने के लिए। तो इसलिए अगर कुछ लोगों को यह प्रेफरेंस है, तो उसे रोकना नहीं चाहिए।
निष्कर्ष और समन्वय
और ‘इंडिया’ तो भारत के संविधान में ही है, तो इसलिए कोई अगर ‘भारत’ नाम इस्तेमाल करता है, तो उस पर इतना विवाद करने की क्या जरूरत है? और साथ-साथ अगर कोई ‘इंडिया’ नाम प्रेफर करता है, तो ऐसे लोगों को हमें बुरा बोलने की जरूरत नहीं है, जो ‘इंडिया’ प्रेफर करता है, पर जो ‘भारत’ प्रेफर करता है, उन्हें भी वह करने देना चाहिए।
इस तरह से भगवद्गीता के लिए देखा हमने प्रिंसिपल कि नाम मैटर करते हैं, वस्तु के गुणों को नहीं बदलते हैं, पर लोग जो नाम इस्तेमाल कर रहे हैं, उनकी स्मृति को बदलते हैं। और प्रैक्टिस में, भारत का नाम जो है, वह अंतरंग भारत की संस्कृति में ही इस्तेमाल किया गया, और वह न केवल ऐतिहासिक दृष्टि से, वरन् तत्वज्ञानी और आध्यात्मिक दृष्टि से भी वह महत्व रखता है।
और यह जो है, सबका चुनाव होना चाहिए कि वह अगर जो लोग ‘भारत’ नाम इस्तेमाल कर रहे हैं, उसे जरूर करना चाहिए। इससे जो भारत की नाम की सार्थकता है, उसे पूर्ति होने में हमें प्रेरणा और गति मिल सकती है।
हरे कृष्णा!