Hindi – Knowing the person behind the preacher: Chaitanya Charan and Shikshashtakam Prabhu
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Lecture Summary
इस विशेष ‘आत्ममंथन’ कार्यक्रम में श्रीमान चैतन्य चरण प्रभु ने अपने जीवन, संघर्षों और आध्यात्मिक यात्रा के कई अनछुए पहलुओं को साझा किया:
- रैपिड फ़ायर और जीवन दर्शन: सत्र के अंत में एक रोमांचक वर्ड गेम और रैपिड फ़ायर राउंड हुआ, जिसमें प्रभुजी ने अपने पसंदीदा आचार्य (भक्तिविनोद ठाकुर), भगवद्गीता के प्रिय श्लोक (18.58), और अपने लेखन कार्य (GeetaDaily.com पर 6,000 से अधिक लेख) के बारे में खुलकर बातें कीं।
- बचपन और पोलियो की चुनौती: प्रभुजी ने बताया कि कैसे एक वर्ष की आयु में वैक्सीन के गलत रखरखाव के कारण उन्हें पोलियो हो गया था। इसके बावजूद, माता-पिता के सकारात्मक और अनट्रबल्ड (तनावमुक्त) पालन-पोषण तथा लाइब्ररी के माहौल ने उनके जीवन की एक मजबूत नींव रखी।
- किताबों और शब्दों से प्रेम: बचपन से ही उन्हें पढ़ने का शौक था, विशेषकर डिक्शनरी मेमोराइज करने की उनकी अनूठी आदत थी। उन्होंने बताया कि कैसे वे शब्दों के चयन और उनके अर्थों (प्ले ऑफ़ वर्ड्स) पर विशेष ध्यान देते हैं, जिसे वे “शब्दासव” कहते हैं।
- इस्कॉन और कृष्णभक्ति की ओर झुकाव: इंजीनियरिंग पूरी करने के बाद, जब उन्होंने भगवद्गीता का अध्ययन और प्रचार शुरू किया, तो उन्हें अहसास हुआ कि सॉफ्टवेयर प्रोग्राम लिखने से कहीं अधिक बड़ा योगदान गीता का ज्ञान बाँटकर दिया जा सकता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि संस्था एक ‘रिसोर्स’ (साधन) है, जबकि भक्ति का ‘सोर्स’ (स्रोत) स्वयं भगवान हैं।
- संस्थागत मानक और संतुलन: संगठन के विस्तार (Expansion) और उसकी शुध्दि/मूल्यों (Integrity) के बीच संतुलन बनाने पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि जैसे नदी के प्रवाह के लिए ‘रिवर बेड’ (रास्ता) आवश्यक है, वैसे ही संस्थागत प्रणालियाँ भी ज़रूरी हैं, बशर्ते उसमें अहंकार या स्वार्थ रूपी ‘डैम’ न बन जाए।
Full Transcription
परिचय और चैतन्य चरण प्रभु का स्वागत
हरे कृष्णा सभी भक्तों का स्वागत है हमारे इस विशेष आत्ममन्थन कार्यक्रम में और जैसे कि हमारे जितने भी आत्ममन्थन ये कार्यक्रम हुए हैं वो अपने आप में विशेष ही रहे हैं और हर दफ़ा ये विशेष इसलिए हो जाते हैं क्योंकि भगवान की कृपा ऐसी हो जाती है कि जब भी हम ये आत्ममन्थन का कार्यक्रम ये प्लान करने जाते हैं और समय आ जाता है आत्ममन्थन कार्यक्रम करने का, तो श्री श्री राधा मदनगोपाल जी किसी विशेष अतिथि को बुला लेते हैं।
आज हमारे समक्ष हैं ऐसे ही एक दिग्गज महानुभाव हमारे अंतरास्थि कृष्णभावनामृत संघ के श्रीमान चैतन्य चरण प्रभु जी।
बचपन की घटना और माता-पिता का प्रभाव
प्रभु जी, आप थोड़ा सुनाइए आपके बचपन का वो वाकया और आपकी मां ने जो आपको इंस्पिरेशन दिया उस कठिन परिस्थिति में, आपकी बाल्यावस्था की परिस्थिति में, वो क्या था?
चैतन्य चरण प्रभु: देखिए ग्रुप्स, आपने जो परिचय दिया है, उससे जब कोई ग्लोरिफ़ाई करता है, तो मुझे पता होता है उनका उद्देश्य है कि ऑडियंस को मोह में डालना। पर अभी आपने ऐसे ग्लोरिफ़ाई किया कि मैं भी मोह में चला गया हूँ। तो वो आपकी जो वाक्शक्ति है… मोह में मतलब आप जो मुझमें गुण देख रहे हैं, शायद भविष्य में कभी आ जाएंगे मुझमें।
मैं भी गोवर्धनी विलेज में एक कोर्स कर रहा था, गीता सिखा रहा था वहाँ पे, तो परमपूज्य राधानाथ महाराज वहाँ पे आ गए। तो फिर उन्होंने मुझे आलिंगन किया, और फिर वो सारे अमेरिकन ऑडियंस, वो सब आए थे, तो उन्होंने बताया कि, मैंने थोड़ा गुणगान उनके सामने किया, और कि गीता मैं अच्छा सिखाता हूँ, और फिर उनको भी आया, सुबह इच्छा थी कि आप सब आध्यात्मिक प्रगति कर सके, फिर महाराज को मैंने बोला, महाराज कृपया मुझे आशीर्वाद दो आप, कि मैं अच्छा सिखा सकता हूँ, तो महाराज मुझे बोले कि, मैं प्रार्थना करूँगा कि तुम जो भी बोलो सत्य हो जाए।
तो महाराज, आज के बाद मुझे बहुत संभाल के बोलना पड़ेगा! अभी तो मैं कामना करता हूँ, प्रार्थना करता हूँ कि आप जो बोल रहे हो, सत्य हो जाए मेरे बारे में, तो एक शायद कुछ तो जो आप देख रहे हैं मुझमें, कभी आ जाए।
मेरे पिताजी आए हैं? मैंने पीछे देखा। मेरे पिताजी हुआ पड़े समुद्री… सूती के वेस्वेक हैं। अरेन्ज किया था पूरा तो Thank you for coming!
तो जब मैं लगभग एक साल का था, तभी हमें पोलियो का… तभी काफ़ी भय था, तो पोलियो का वैक्सीन भी था तभी, तो मेरी मां एक डॉक्टर के पास लेके गई मुझे, हम चंद्रपुर में थे तभी। और वैक्सीन दिया, तो चंद्रपुर थोड़ा छोटा गांव था वहाँ पे, तो शायद ऐसे हो गया कि जो जिस फ्रिज में वैक्सीन रखा था, वो फ्रिज का पावर सप्लाई पिछली रात को चला गया था। और डॉक्टर ने वो देखा नहीं, वैक्सीन दिया, तो पावर सप्लाई नहीं था, तो फ्रिज में टेम्परेचर बढ़ गया। तो क्या वैक्सीन में जर्म्स का परसेंटेज ज़्यादा हो गया वो, तो जो वैक्सीन पोलियो टालने के लिए होता है, उससे पोलियो हो गया मुझे।
तो अभी मुझे पता नहीं है, मैं चल रहा था, एकाएक गिर गया। उसके पहले मैं नॉर्मली चल नहीं पाया था, तब एक साल का था, तो चलना सीख रहा था एक तरह से। पर मेरी जो पहली स्मृति है, शायद मैं ढाई-तीन साल का था, तो तभी कोई हमारे दूर के रिश्तेदार आए थे हमसे मिलने, तो वो मेरी मां को सांत्वना दे रही थी कि मुझे बुरा हो गया है, तो मेरे बच्चे को पोलियो हो गया है। तो अभी मुझे मेरी मां का स्पष्ट आवाज़ याद है कि…
तो उनके ऑफिस के बाजू में एक लाइब्रेरी हुआ करता था, तो रोज़ एक छोटा किताब लाते थे, मैं पढ़ता था शाम तक, रात तक, अगले दिन सुबह लेकर आते दो किताब और फिर मैं अगला किताब लाते थे। तो आई थिंक उससे जो है, जो एक फाउंडेशन था, वो एक बहुत अच्छा सकारात्मक फाउंडेशन मेरे माता-पिता ने मुझे दिया और उसके लिए मैं बहुत कृतज्ञ हूँ।
जैसे मैं पाश्चात्य देशों में पिछले 10 सालों से जा रहा हूँ, तो वहाँ पे जो पेरेंटिंग होता है, पाश्चात्य देशों की निंदा नहीं करनी है, उसमें बहुत प्रकार के लोग होते हैं, पर कुछ हद तक ऐसे होते हैं कि काफ़ी पेरेंट्स बहुत नेग्लिजेंट होते हैं, तो काफ़ी बच्चों को अपने माता-पिता ने जो किया है, उससे कभी कोई ट्रबल्ड होते हैं, ट्रामाटाइज्ड होते हैं।
पर मेरा बचपन कितना अनट्रबल्ड था, एक तरह से ट्रबल्ड था, पर वो ट्रबल्ड होते हुए भी परेशानी नहीं थी, एक तरह से। तो इसके लिए मैं बहुत कृतज्ञ हूँ मेरे माता-पिता से और अंत में भगवान से कि भगवान ने मुझे इतने अच्छे माता-पिता दिए।
किताबों और डिक्शनरी से जुड़ाव
प्रभु जी: हरि बोल! प्रभु जी कह रहे थे कि बचपन से उनको पढ़ने में इतनी रुचि थी। आप लोग जानकर हैरान रह जाएंगे कि प्रभु जी बाकी पुस्तकें तो छोड़ दीजिए, प्रभु जी डिक्शनरी पढ़ते थे और पन्नों पे पन्ने डिक्शनरी के प्रभु जी पढ़ते थे। आप अगर प्रभु जी पढ़ने के लिए डिक्शनरी को खोलने… देखा था, ये मैं सही कहता हूँ, उसको बाकी पुस्तकों से बढ़कर… प्रतिदिन डिक्शनरी को पढ़ते थे, तो वहाँ पर वो डिक्शनरी में जो शब्द होते थे अलग, उसके मीनिंग्स… और ऐसा नहीं कि केवल कोई तकलीफदायक जो शब्द होते थे, केवल उनको ही पढ़कर प्रभु जी पन्ने-पन्ने पूरी डिक्शनरी को मेमोराइज कर लेते थे।
तो मतलब वो क्या था, प्रभु जी? वो प्रेरणा… ये किस प्रकार की प्रेरणा थी आपकी डिक्शनरी मेमोराइज करने की?
चैतन्य चरण प्रभु: पता नहीं क्या है, किताबी कीड़ा था मैं, पर मुझे लगता था ये स्पेशल है। पर मैं अमेरिका में एक भक्त से मिला, वो ऑथर है, उनकी मां की पहली याद है कि जब उनको नूडल्स बना के दिए, तो वो नूडल्स से लेटर्स बनाते थे खाने की जगह पे। तो कुछ-कुछ ऐसे होता है कि शायद जेनेटिक्स में आता है, पूर्व जन्मों से कुछ आता है, पता नहीं।
पूरी डिक्शनरी… पूरी डिक्शनरी… पूरी डिक्शनरी… तू भी इनके सामने फेल हो जाएगा कि ऐसे नॉर्मल कन्वर्सेशन में तो मैंने… अभी मुझे तो लिक्कर लाना पड़ा, ये मेरा लेवल है। तो मेरे जो कुछ फेवरेट इनके वन लाइनर्स जो मुझे बहुत पसंद आते हैं, तो मैं वो बोलना चाहूंगा। कुछ इस पर आपने क्या सोचा था जब ये वन लाइनर्स आपने आपके लेक्चर्स में या मैंने सुना है कि शायद कुछ इसमें से आप अपने जीवन का मोटो भी इसे मानते हैं?
जैसे कि इनका अब ये क्योंकि अधिकांश इंग्लिश में लेक्चर्स देते हैं, तो इनके वन लाइनर्स अभी वो हिंदी में भी शुरू किया है उन्होंने। वन लाइनर्स वो बहुत उसमें भी रुचि ले रहे हैं, तो हमारे लिए बहुत फायदेमंद है वो इंग्लिश… हम कुछ हैं… श्री कृष्णा के जबरदस्त… हम लोग लेगा… अगर हम कुछ जैसे की जवाब दे रहे हैं, तो हमें श्री कृष्णा के जवाब लेता है। आपको जिस पर बोलना चाहिए शब्दों को खेलना मेरी एक साथी… दुखती है…
प्लेजरिज़्म करते हैं तो प्लेजरिज़्म करते हैं। एक ऑथर से आप चोरी करते हैं, तो उसको चोरी बोलते हैं। शब्दों की चोरी, वाक्यों की चोरी। पर अगर आप हज़ार ऑथर से चोरी करते हैं, तो उसको क्रिएटिविटी बोलते हैं।
तो क्या है? पहले तो मुझे वर्ड्स और वर्ड्स के मीनिंग्स याद करने में बहुत आनंद आता था। पर अभी उतना नहीं है, अभी क्या? जब भी मैं कुछ पढ़ता हूँ, तो कोई अनयूजुअल टर्न्स और फ्रेज़ेज़ होते हैं, इस तरह से बोला है, अच्छा है। मैं जब लेक्चर सुन रहा होता हूँ, किताब पढ़ रहा होता हूँ, मैं वर्ड कॉम्बिनेशन देखता हूँ। ये दो शब्द कैसे यूज़ किए हैं यहाँ पे, ये कैसे आया है।
मुझे क्या कभी लगता है कि… कभी शायद कृष्ण कॉन्शसनेस से ज़्यादा वर्ड कॉन्शस हूँ। तो वर्ड कॉन्शस से क्या है कि… वर्डकवर… रॉन्ग होता हुआ… तो बचपन में मैं जब बड़ा हो रहा था… एक्सेसिबल और अट्रैक्टिव हैं। सब समझ सकते हैं और आकर्षक भी हो जाते हैं। वो मैं देखा और एक तरह से मेरे बचपन में मैं घर मराठी बोला करता था, पर इंटेलेक्चुअली इंग्लिश इस माय होम टेरिटरी। तो मैं इंग्लिश में विचार करता हूँ, इंग्लिश में लिखता हूँ, इंग्लिश में बोलता हूँ। अभी थोड़ा-थोड़ा मुझे इंग्लिश से हिंदी ट्रांसलेट किए बिना बोल पा रहा हूँ अभी। ये तो मन में पूरा ट्रांसलेट करता था मैं।
पर अभी थे तो क्या देखा मैंने कि जिस तरह से जो संस्कृत का भक्ति ट्रेडिशन था, वो हिंदी हो या, या मराठी हो या कन्नड़ हो, वो वर्नाक्युलर लैंग्वेजेज़ में बड़े आकर्षण से प्रस्तुत किया है। तो वैसे अभी तक वो इंग्लिश में प्रस्तुत नहीं किया गया है। बड़े ग्रंथ लिखे हुए हैं और ग्रंथों में जो अच्छे-अच्छे तत्वज्ञान दिया है, पर कैसे इंग्लिश राइटिंग एक क्राफ्ट होता है और एक आर्ट होता है। क्राफ्ट मतलब क्या है कि वो एक टूल है कम्युनिकेशन के लिए। मुझे संदेश देना है, मैं इंग्लिश में बोलूँगा। पर आर्ट मतलब क्या है, वो जो बोलते हैं, वो इस तरह से बोलते हैं कि उसमें ही बोलने में ही सौंदर्य होता है।
तो जो अभी जो भक्ति का संदेश है, शास्त्र का संदेश है, वो किस तरह से इंग्लिश में एक आर्ट के रूप में हम प्रस्तुत कर सकते हैं, तो वो मैं प्रयास कर रहा हूँ। तो इसलिए मैं जो गीता के श्लोक होते हैं, तो कई बार मैं अपने ही मन में गीता के श्लोक रिसाइट करता हूँ, तो इसको इंग्लिश में कैसे हम बोल सकते हैं, इसका पॉइंट कैसे बोल सकते हैं, तो वो सोचता हूँ, उससे फिर कुछ आगे… तो ऐसे ही मैं काफ़ी वर्ड्स का प्ले करता हूँ।
तो शुरुआत होती है गीता के श्लोकों से, फिर जो सारे शब्द मैंने चुराए हैं दुनिया भर से, जितने ज़िंदगी में चुराए हैं, वो सारे से तरह से प्रोसेसिंग होता है थोड़ा बहुत, फिर कुछ भगवान की कृपा होती है। तो अभी जो शुरुआत होती है, ममैवांशो जीवलोके, कि हम भगवान के अंश हैं, तो क्या है कि ये एक फिलोसॉफ़िकल स्तर पे ये सकते हैं कि हम भगवान के सनातन अंश हैं, पर उसका एक स्तर पे क्या मतलब है कि अगर हम भगवान के अंश हैं, तो उसका मतलब है कि हमें भगवान की योजना में हमारा भी अंश है। तो वो जो है, उसको एक और सिंपलीफाइड में होता हूँ, बी अ पार्ट ऑफ़ कृष्णा, बी नॉट अपार्ट फ्रॉम कृष्णा।
जीवन की चुनौतियों का सामना और सकारात्मकता
प्रभु जी: अपने प्ले ऑफ़ वर्ड्स के विषय में सोच रहा था अभी, जब आप इसका जवाब दे रहे थे। एक तो है, मैंने यह अनुभव किया है कि आपके बोलने में तो इतनी मिठास है, एकदम डीप फिलोसोफिकल पॉइंट साथ बोलते हैं, और ये प्ले ऑफ़ वर्ड्स से उसको और भी पोएटिक और मीठा भी बनाते हैं आप।
फिर, जैसे आपने अपने बचपन के विषय में कहा कि, किसी की गलती की वजह से, आप जो कुछ शारीरिक रूप से, बचपन से जो भुगत रहे हैं, होता है ना कि कोई और अगर होता तो हर समय उस रंज को, उस एक जिसको बोलते हैं ना कि मेरे जीवन में मैं डिज़र्व नहीं करता हूँ, क्यों मेरे साथ ऐसा, क्यों हुआ, व्हाई डू बैड थिंग्स हैपेन टू गुड पीपल, ये बहुत फेमस टॉपिक हम सुनाते भी हैं लोगों को। तो, आपके जीवन में ऐसे कभी कड़वाहट नहीं आई?
इसे ऐसे बोलते हैं ना, मैं भी थोड़ा प्ले ऑफ़ वर्ड्स का ट्राई करता हूँ, तो कहते हैं कि आजकल, आज का जो दौर है, आज के इस दौर में नीम के जो दरख्त हैं, उनकी कमी होते जा रही है, दरख्त अर्थात पेड़, नीम के जो दरख्त हैं, उनकी कमी होते जा रही है, परन्तु रिश्तों में कड़वाहट बढ़ती जा रही है, नीम के दरख्त कम हो रहे हैं, परन्तु रिश्तों में कड़वाहट बढ़ती जा रही है, जुबा पर मिठास कम होती जा रही है, बहुत मीठा लोग कम बोल रहे हैं आजकल, तो जुबा पर मिठास कम होती जा रही है, बॉडी की शुगर बढ़ती जा रही है।
तो ये सब कुछ जो आपके साथ हुआ, जहाँ पर हम देख सकते हैं कि आप ऐसे एक संत का जीवन जी रहे हैं, एक आदर्श संत का जीवन जी रहे हैं, तो अगर मैं यह कहूँ कि एक संत के साथ ऐसा क्यों हुआ, आपके अंदर कभी ऐसी कड़वाहट नहीं आई?
चैतन्य चरण प्रभु: पर मैंने भी सोचा है इसके बारे में, कई बार जब मैं कहीं जाता हूँ और ऐसे लोगों, ऐसे फोरम्स में लेक्चर दे रहा हूँ, कुछ स्पेशल नीड थे लोगों को, किसी की आँख नहीं है, किसी के हाथ नहीं है, तो मैं देखता हूँ बहुत चकाचौंध कि लोग ऐसे होते हैं कि वो… ऐसे आती है।
तो मुझे जहाँ तक याद रखता हूँ, मुझे ऐसे रेजेंटीमेंट जो होता है, कड़वाहट जब होले, वो मुझे तो याद नहीं आती है। और आई थिंक जितना मैंने भी थोड़ा, मुझे एक सब्जी में रुचि है साइकोलॉजी में, डेवलपमेंटल साइकोलॉजी में मुझे काफ़ी रुचि है कि बच्चे जब बड़े होते हैं, तो उनकी माता-पिता से कितना प्रभाव होता है। तो आई थिंक माता-पिता का अपब्रिंगिंग था, उसमें कभी उन्होंने मुझे कभी ऐसे दर्शाया नहीं कि मैं उनके लिए एक बोझ हूँ।
और हाँ, प्रैक्टिकल लिमिटेशंस थे, पर कैसे था कि भगवान की कृपा से, वो प्रैक्टिकल लिमिटेशंस के कारण, मैं कभी… इट वाज़ मोर लाइक माय प्रॉब्लम्स वर अदर्स प्रॉब्लम्स। अब सारे विश्व भर में मैं ट्रैवल करता हूँ, तो क्या है, व्हीलचेयर असिस्टेंस होता है, कोई और मेरा लगेज ले रहा है, तो इसलिए इससे प्रैक्टिकल लिमिटेशंस ज़्यादा कुछ नहीं हुआ है, और क्योंकि मेंटल इस स्तर पे, क्योंकि आई एम ऑलवेज मोर विथ माई थॉट्स, तो कैसे कि, एक वैज्ञानिक है, वैदिक संस्कृति को भी काफ़ी वेस्टर्न साइंटिस्ट है, वो कहते हैं, वैदिक संस्कृति को भी मानते हैं, वैदिक विज़डम को, संस्कृति को नहीं।
तो कैसे कि, आई हैव अ पर्टिकुलर फ्लेवर ऑफ़ रिलेशनशिप विथ माई बॉडी, आई डोंट इंटरफेयर विथ इट एंड इट डजंट इंटरफेयर विथ मी। तो वो कहते हैं कि मेरे शरीर का ऐसा संबंध है कि मैं मेरे शरीर के साथ हस्तक्षेप नहीं करता और शरीर मेरे साथ हस्तक्षेप नहीं करता।
तो अभी उस कहने का मतलब यह है कि एक तरह से कि जो शरीर के जो डिमांड्स हैं, शरीर के जो रिक्वायरमेंट्स हैं, आई हैव लर्न टू लिव विथ इट, और जो मेरे रिक्वायरमेंट्स हैं, वो शरीर के लिमिटेशंस के अनुसार कि मैं जो कर सकता हूँ, वो मैं कर पा रहा हूँ।
कैसे कि हम सबको, वी हैव टू डिसाइड कि कौन से युद्ध मुझे करने हैं, कौन से युद्ध नहीं करने हैं। तो कभी-कभी क्या होता है कि युद्ध तो सबको करना है, मतलब क्या है, हमें सबको कुछ अचीव करना है, कुछ योगदान करना है, कुछ बनना है, पर उसमें क्या है कि एटलिस फिजिकल एबिलिटी, इनएबिलिटी, डिसेबिलिटी जो भी हैं वो बैटल, वो कैसे लिव एंड लेट लिव का रिलेशनशिप हो गया है, वो ऐसा कुछ होने वाला नहीं है, तो इसको मुझे कुछ ज़्यादा वो कैसे कह सकते हैं कि अभी इंडिया और चाइना का रिलेशनशिप है, यह तो बॉउंड्री पर थोड़ा झगड़ा होता है, पर तुम चुप रहो, मैं चुप रहता हूँ, तो अभी तक अनइजी पीस है।
एयरपोर्ट पर अनूठा अनुभव
प्रभु जी: इस वाकया पर आपके साथ हुआ था, मैंने आपके एक लेक्चर में सुना था, अचानक से बॉम्ब स्कयर और अलार्म रेज़ हो गया था, आपके जो क्रचेज़ हैं उनको लेकर, वो आप सुनाइए, क्या हुआ था एयरपोर्ट पर?
चैतन्य चरण प्रभु: सबसे पहले आपकी मेरी बारे में जो अध्याय है, वो मेरी खुद की अध्याय से ज़्यादा है। मुझे ना कॉपी करना बहुत अच्छा लगता है, ऐसे ही पास हुआ हूँ मैं, मैं अच्छा लगता हूँ, ज़्यादा अध्याय से ज़्यादा हूँ, मैं भी कॉपी कर पाऊँगा।
तो मैं वृंदावन में गया था, फिर वहाँ से मैं दिल्ली से फ्लाइट करके अमेरिका गया था। तो अमेरिका में जब मैं आया, तो वहाँ पे इमिग्रेशन में जा रहा था अंदर, तो अचानक… तो मैं जब वह सिक्योरिटी से जा रहा था, वह से जा रहा था, मैं व्हीलचेयर में बैठा था मैं, और अचानक कोई अलार्म आगे बज गया।
और फिर क्या वो पता नहीं एकदम कहीं भी पुलिस आ गया, एक गन लेके सब मेरे वह गन पॉइंट कर रहे हैं, क्या हो गया? कहा कि तुम्हारे पास एक्स्प्लोसिव्स है, कुछ? कहा मेरे पास क्या एक्स्प्लोसिव्स है? और फिर वो देखा कि उन्होंने कि मेरे क्रचेज़ में कुछ एक्स्प्लोसिव्स है, मेरे जो कुप्रिया है, उसमें एक्स्प्लोसिव्स है। कहा कि क्रचेज़ में क्या है? कहा कि यह हमको तोड़ना पड़ेगा। मैं तोडूंगा तो मैं चल कैसे पाऊँगा इसको? पर बोले कि हम तोड़ेंगे तो हम यहाँ से जा नहीं सकते।
तो मैं उनको बोला कि मैं यह सोचा क्या करूँ? मैं बहुत घबरा जा रहा हूँ। मैं बोला कि ठीक है, मैं इसको खोल सकता हूँ।
तो फिर क्या किया जो क्रचेज़ होते हैं, यहाँ पर जो बेस होता है, कभी-कभी के बहुत चलने से यह बेस थोड़ा टूट जाता है, तो मैं कभी-कभी इस बेस से कुछ अंदर पत्थर होंगे, चल जाते हैं, मिट्टी चल जाती है। तो मैं जो यमुना में के वहाँ पर गया था, यमुना के तट पर हम जब कर रहे थे, तो तभी यमुना का जो डस्ट था, वो यहाँ पर लग गया था। तो मैं थोड़ा सेंटीमेंटल हो गया था, मैं सोचा कि इसको क्लीन नहीं करेंगे, तो यमुना का डस्ट फिर साथ रहेगा। तो पर क्या हो गया था वो यमुना का डस्ट अंदर चला गया था, और फिर उसके कारण जो, अब यमुना थोड़ी ज़्यादा पोल्यूटेड हो गयी है, तो उस डस्ट में कोई ऐसा मेटल था, जो उनके मेटल डिटेक्टर ने एक्सप्लोसिव डिटेक्टर लिया था।
तो फिर उन्होंने पूरा एक क्रच का टिप निकाला और फिर यहाँ पहले इसके अंदर क्या है? यहाँ पहले तो मिट्टी है। तो फिर वो काफ़ी अंदर चली गयी थी, तो उन्होंने कुछ पकड़ लाई और वो बोले, तो मैं निकाल रहा था, बोले कि थोड़ा निकालने लगे, तो काफ़ी मिट्टी थी, बोले कि क्लीनिंग योर क्रच इज़ नॉट माय जॉब, इसको साफ़ करना यह मेरा काम नहीं है। तो मैंने पूरा साफ़ किया, फिर उन्होंने कुछ ऐसा ट्रेल आया था, तो वो इसे डाल दिया।
और फिर ये पूरा साफ़ होने के… हाँ, हाथ बाद… बदला वापस निक्टालते, तो क्रच से कुछ आ ताले, वो सोचा सही है, इसके लिए मशीन क्रच के उनकी लिए होती है, राइट? और मुझे ना दूसरी क्रच में लगता है कि वो भी ऐसे के साथ हुआ था, और वो जैसी थी कि वो हमोंने फेंटर में दूसरा है कि हमको खतरा कोई मानना।
So, it was an unusual experience to be considered a threatening person.
इस्कॉन और कृष्णभक्ति की यात्रा
प्रभु जी: मेरे ख़्याल से जो हमारे शास्त्रों में कहते हैं ना तीर्थ कुर्वन्ति तीर्थानि, तो प्रभुजी ब्रजरज लेकर गए अमेरिका और वो जो भी सिक्योरिटी गार्ड होगा, क्या भाग्य उसके होंगे कि जमुना का रज उसको स्पर्श करने मिला।
तो हमारा शीर्षक जो आज का हमने चुना है कि कृष्णभक्ति और इस्कॉन संस्था में रहकर कृष्णभक्ति करना, कई बार ये दो महत्वपूर्ण आपस में एक ऐसे मुद्दे हो जाते हैं कि हम सब बचपन में पहले से भी कृष्णभक्ति के विषय में सुने होंगे, कई तो कर भी रहे होंगे अपने-अपने तरीके से, परंतु जैसे हम इस्कॉन से जुड़ते हैं, तो अब यहाँ पर कृष्णभक्ति के एक नए आयाम वो स्थापित होते हैं और कृष्णभक्ति का एक नए परिचय हमें प्राप्त होता है।
तो सबसे पहले प्रभुजी मैं आपसे जानना चाहूँगा कि आप पहले से ही इतने बुद्धिमान, इतने सफल और सबकुछ जो कोई उस समय कोई एक युवा हासिल करना चाहता था, आपने वो सबकुछ हासिल कर लिया था करियर वाइज़, एकेडमिकली सबकुछ, तो अब इस्कॉन आपको क्या आकर्षित… इस इंस्टीट्यूशन में आपको ऐसा लगा या इस संस्था ने आपको कैसे आकर्षित किया कि आपने वो सारा प्रोमिसिंग करियर छोड़कर आप एक ब्रह्मचारी, एक संत बन गए इस्कॉन में?
चैतन्य चरण प्रभु: सबसे पहले मैं मेरे दुनिया में मेरे विचारों के साथ अधिकांश जीता हूँ, तो मैंने कभी ऐसे सोचा नहीं कि मैं इस्कॉन ज्वाइन कर रहा हूँ। अभी भी मेरा जो सेल्फ आइडेंटिफिकेशन है, आपको इस्कॉन प्रीचर नहीं, तो मैं कुछ को भगवद्गीता स्टूडेंट और बहुत आकर्षण हो गया था, शायद बचपन से थोड़ी रुचि थी, पर खास करके प्रभुपाद जी की जब भगवद्गीता पढ़ी और जो भक्तों से मैंने गीता के सवालों का जवाब सुना, तो मुझे बहुत आश्चर्य हुआ। तो एक मैं मेरा ब्राह्मण कुल भी जन्म हुआ था… पोर में इस्कॉन ब्रह्मचर्य अपने के साथ में… सेल… कुरी ब्रह्मचर्य पेके मनुष्य हुआ जाता है… बच्चन मुझे अच्छी एक मिला हूँ।
कुछ बात किये हैं तो पहले जब वे ब्रह्मचारी से मिला तो पहले देखा कहा रही है, यह ब्रह्मचारी है और यह इंग्लिश में बोलते हैं। और तभी परमात्मप्रभु से मिला, तो परमात्मप्रभु की इंग्लिश भी काफ़ी अच्छी थी। तो उनके वो साधु होना, साफरन होना, इंग्लिश बोलना और भगवद्गीता जानना, यह ट्रिपल कॉम्बिनेशन बहुत पावरफुल था एक तरह से। तो फिर बहुत से जवाब मिले मुझे और फिर एक तरह से मेरा जो आकर्षण था वो फिलॉसॉफ़ी विज़डम से था।
और मैं जब भगवद्गीता सुना, पढ़ा, समझा, थोड़ा अप्लाई करने का प्रयास किया, तो उससे मैंने देखा कि मेरा जो… मुझे बचपन में थोड़ा गुस्सा आया करता था। तो फिर क्या था कि मैं पहले बता रहा था कि मेरा वोकैबुलरी काफ़ी अच्छा था, तो a good vocabulary and a bad temper यह एक डेडली कॉम्बिनेशन है। कुछ लोग होते हैं गुस्सा आता है उनको तो कुछ चिल्लाते हैं पर कुछ मतलब का बोलते नहीं उसमें, पर कुछ लोग गुस्सा आते हैं तो चुप बैठ जाते हैं, पर अगर किसी की बोलने की शक्ति अच्छी है और गुस्सा आता है, तो वो ऐसा काटेगा ना लोगों को, सरकास्टिकली बोलेगा, यह करेगा, वो करेगा।
तो मुझे पता था कि मेरा एंगल थोड़ा इशू है, तो भगवद्गीता को सीख के, मैं थोड़ा जप करने लग गया, शास्त्रों के लिए जीवन-जीवन का प्रयास करने लग गया, मैंने उससे काफ़ी कम हो गया। तो फिर मैं जब इंजीनियरिंग कंप्लीट किया, मैं सोचता था मुझे अमेरिका जाना है, पर मैं सोचता कि पहले थोड़ा और मैं भगवद्गीता को अच्छे से समझ लूँ और अनुशीलन करूँ उसके जीवन में, फिर मैं सोचता हूँ जाऊँगा या नहीं।
तो फिर उस समय मैं एक कंपनी में काम कर रहा था और तभी साथ-साथ मैं भगवद्गीता का एक छोटा स्टडी ग्रुप चालू किए थे, अलग-अलग कॉलेज में जाके शाम को, गीता छोटे-छोटे कुछ छोटे-छोटे ग्रुप से आपको काम करना है क्योंकि हमारा डेडलाइन है। तो फिर मैंने कहा कि आज आपको लेट नाइट काम करना पड़ेगा। मैं बोला कि मुझे आज शाम को जाना है, मैं कल सुबह आ जाऊँगा जल्दी का, आपको काम कर लूँगा। नहीं, आज आज रात को ही करना पड़ेगा।
तो मैं लगभग मिडनाइट तक था, ऑफिस में काम कर रहा था और फिर रात को जब जा रहा था, तो उसके पहले मैंने जो मेरा स्टडी ग्रुप था, वो जो देखा, कोई और भक्त है कि जो जा सकते हैं वहाँ पर? कोई और अवेलेबल नहीं था। तो फिर ये पुणे में सब कुछ हुआ था।
तो रात को जब मैं आ रहा था, थका हुआ था, पर विचार कर रहा था कि मैं अगर ये सॉफ्टवेयर प्रोग्राम नहीं लिखता हूँ, तो हज़ार लोग हैं जो ये लिख सकते हैं, कहीं हैं, शायद ऐसे हैं जो मुझसे काफ़ी अच्छा लिख सकते हैं। पर अगर मैं भगवद्गीता नहीं सिखा रहा हूँ, तो कितने लोग हैं ये सिखाने के लिए?
तो मुझे ऐसे लगा, तभी विचार था पहले से, पर तभी एक तरह से जो विचार था वो एक कन्विक्शन में बदल गया कि मैं ज़्यादा समाज में योगदान कर सकता हूँ भगवद्गीता सिखाकर, न कि सीख कर… और सिखा कर… सिखा कर नहीं, अभी तक मैं सीख रहा हूँ गीता को, तो सीख कर और सिखा कर, न कि सॉफ्टवेयर प्रोग्राम लिख के।
तो ऐसे I don’t think मैंने कभी सोचा मैं एक संस्था ज्वाइन कर रहा हूँ, मैं भगवद्गीता सीख रहा हूँ और सिखा रहा हूँ। वो भगवान ही सोर्स है, संस्था जो है हमारे भक्ति के लिए एक रिसोर्स हो सकती है। सोर्स और रिसोर्स में फ़र्क है। सोर्स मतलब वहीं से सब कुछ आ रहा है, रिसोर्स मतलब वो प्राप्त करने के लिए मदद करती है।
जहाँ तक मैंने देखा है, मैं विश्व भर में कुछ हद तक प्रचार किया है, बाकी संस्थाओं में भी मैं थोड़े इंटरफेथ प्रोग्राम्स में जाता हूँ, कभी-कभी अलग-अलग हिंदुओं बहुत से लोग विद्या सीखने का प्रयास कर रहे हैं, पर मैंने देखा है कि the transformative study of the Gita कि गीता का पठन करके लोगों के जीवन में एक क्वालिटेटिव परिवर्तन आना, यहाँ प्रभुपाद जी की गीता से और प्रभुपाद जी की संस्था से हुआ है, सबसे ज़्यादा मात्रा में जहाँ तक मैंने देखा है।
तो इसलिए जो है, भक्ति की प्रगति हमें करनी है, वो हमारी ज़िम्मेदारी है, वो किसी संस्था की ज़िम्मेदारी नहीं है और किसी संस्था के मेंबर बनने से हमारी भक्ति की प्रगति नहीं होने वाली, पर संस्था से हमें सुविधा… ज़िर… मिल सकती है… आ… रिसोर्स… अलग दिशा में month to month को… ते… शिक्षा की ख्रव है… मिल सकती है, पर जो रिसोर्सेज हैं, वो ज़िम्मेदारी हमारी रहती है।
तो मेरा फेवरेट उदाहरण जो इसके लिए है कि अगर कोई पहाड़ पे… अभी हम यहाँ पे त्र्यंबकेश्वर के वहाँ पे गए थे, तो वहाँ पे गोदावरी नदी का उगम स्थान है ब्रह्मगिरी में। तो अभी कई पहाड़ में, हिमालय में कोई नदी उत्पन्न होती है। तो वहाँ से, अभी एक तरह से हम देखते हैं कि जो नदियाँ उत्पन्न होती हैं, उनके पीछे बड़ी कहानियाँ होती हैं। तो उससे एक थोड़ा फ्लो बनता है। फिर वो बड़ा होके उसका नदी बनता है। और फिर नदी साथ में सागर तक आसानी से जा सकती है।
तो उसी तरह से हम सब में जो भक्ति की प्रवाहित है, वो हम सब पहाड़ में थोड़े पानी के बूँद दे, पर जब हम भक्तों के संग में आते हैं, और संग में जब हम भक्ति करते हैं, तो फिर क्या? एक सामूहिक प्रवाह बनता है। और वो जो प्रवाह है, हमें भगवान तक पहुँचने में मदद करता है।
तो जब ऐसी नदी काफ़ी समय तक जाते रहती है, तो फिर नदी का एक रास्ता बन जाता है, एक रिवर बेड बन जाता है। तो जो रिवर बेड है, एक तरह से संस्था है। और जो रिवर है, वो भक्ति है। तो जब… बॉडी क्या है संस्था? वो रिवर बेड होने से… कैसे नहीं हैं कि रिवर अपनेआप सागर तक जाने वाले हैं? वो पानी है और पानी खुद फ्लो होना है और फ्लो होके वो सागर तक जाएगा, पर अगर रिवर बेड होगा तो पानी कम एफ़र्ट के साथ और आसानी से जा सकता है।
पर अगर रिवर होती है, नदी होती है, तो क्या कोई आके उस पर डैम भी बना सकता है? फिर डैम बन जाएगा, तो क्या? वो पानी जाएगा नहीं।
तो वैसे संस्था में भी ऐसा हो सकता है, कुछ स्वार्थी लोग आ जाते हैं। और वो संस्था में आते इसलिए हैं कि वो खुद का आदर-सम्मान बढ़ाना चाहते हैं, कुछ शक्ति प्राप्त करना चाहते हैं। तो वैसे लोग आ जाते हैं, तो फिर वो संस्था करप्ट हो जाती है।
प्रभुपाद जी भी कहते थे कि अगर आप इस्कॉन में आते हो, प्रभुपाद जी का प्रवाह हो रहा है, उसमें खुद डैम बना लेता है कि मुझे सारा पानी मिल जाएगा वो। तो मतलब जो भगवान के प्रति भक्ति जानी है, कोई व्यक्ति खुद भक्ति ले लेता है वो, मेरे लिए, स्वाद खुद के लिए।
तो फिर वैसे संस्था में वो बहुत समस्या आ जाती है। पर मेरी अंडरस्टैंडिंग है कि अगर हम देखते हैं कि कृष्णभावनामृत आंदोलन जो है, क्या इसके परे कोई भक्ति कर सकता है? कृष्णभावनामृत आंदोलन में बहुत से रिसोर्सेज हैं। तो यह एक बहुत चीज़ के लिए बहुत चीज़ है।
हरी बोल!
इस्कॉन और संस्थागत पृष्ठभूमि
इस्कॉन ख्याल की भी मैं समय… मेरा एक से प्रश्न में बात कर रही हूँ, मैं इस्कॉन के लिए अगला प्रश्न यह है कि, जिन्होंने मुझे फिलासफी सुनाया है जैसे कि भक्ति चारु महाराज, राधानाथ महाराज, मैंने भी यही जवाब दिया था कि, प्रभुजी मेरा अगला प्रश्न ये है कि ये बहुत साल पहले एक हो सकता है कि बहुत थॉटफुल क्वेश्चन मेरे समक्ष किसी ने प्रस्तुत किया कि ठीक है, भक्ति सिद्धांत सरस्वती ठाकुर उन्होंने कृष्णा कॉन्शसनेस और प्रस्तुत के लिए प्रश्न, ये जो गौड़िया संप्रदाय की जो हमारी भक्ति है, उसको एक इंस्टीट्यूशनल रूप दिया, किस रूप में? गौड़िया मठ के रूप में।
भक्ति सिद्धांत सरस्वती ठाकुर ने, जो कि प्रभुपाद के गुरु थे, तो अब उनके डायरेक्ट डिसाइपल हैं, शिला प्रभुपाद, उनके गुरु महाराज के द्वारा शुरू की गई संस्था को भी आगे बढ़ाएगा ना? उसी नाम से, उसी तर्ज पर?
तो फिर ये प्रश्न उठता है कि यदि भक्ति सिद्धांत सरस्वती ठाकुर उन्होंने गौड़िया मठ इंस्टीट्यूशन की स्थापना की और तुरंत उनके डायरेक्ट डिसाइपल हमारे शील प्रभुपाद, उन्होंने उसको कंटिन्यू क्यों नहीं किया? उन्होंने ये एक ऐसी संस्था जिसको उन्होंने ऐसा नाम दिया जो की इंटरनेशनल सोसायटी फ़ोर कृष्णा कॉन्शसनेस, तो कईयों का ऐसा प्रश्न है कि फिर क्या उन्होंने अपने गुरु महाराज से हट कर कुछ अपना आंदोलन शुरू किया? आपका क्या कहना है इस विषय में?
अगर ऐतिहासिक विषय देखते हैं हम, तो कहीं प्रभुपाद जी ने ऐसा उल्लेख नहीं किया है कि वो कोई अलग संस्था चालू करना चाहते थे। पर क्या हो गया, जब प्रभुपाद जी का परिचय उनके गुरुदेव से 1922 में हुआ, पहली मुलाकात, हम सब जानते हैं। फिर बीच-बीच में मिलते थे, ज़्यादा मिले नहीं। 1937 में, जहाँ तक मुझे याद है, एक्ज़ैक्टली 1937 में, उनके गुरुदेव भगवधाम चले गए हैं। तो अधिकांश समय से गौड़िया मठ के हिस्ट्री में जो प्रभुपाद जी थे, वो एक तरह से आउटसाइडर थे। वो गृहस्थ थे, उनका अपना बिज़नेस था, तो वो कभी गौड़िया मठ के इंस्टीट्यूशनल स्ट्रक्चर में कभी उनका कोई पावर था नहीं, उनका कोई पोजीशन था नहीं।
तो जब अगर हम गौड़िया मठ के साधारण भक्त, उनके स्टैंडर्ड से देखे गए, तो लोग शायद बोलते थे, प्रभुपाद जी ज़्यादा सीरियस डिवोटी नहीं है, यह क्योंकि ज़्यादा मंदिर में आते नहीं है, मंदिर में सेवा नहीं करते थे। काफ़ी सेवा प्रभुपाद जी का गौड़िया मठ के… साधारण नहीं था एक तरह से।
और जब गौड़िया मठ के साधारण को चले गए, तो गौड़िया मठ के साधारण में थोड़ा मतभेद हो गया… मायापुर धाम को बचाने के लिए प्रयास हो रहा है, तो भविष्य में शायद हो सकता है कि गौड़िया आंदोलन जो, गौड़िया ट्रेडिशन जो है, उसकी जो भी अभी प्रतिनिधि हैं, जो भी उसको आगे बढ़ा रहे हैं, वो शायद साथ में आ सकते हैं।
पर अगर वो प्रतिनिधि है… प्रतिनिधि के लिए… प्रतिनिधि के लिए… प्रतिनिधि के लिए… प्रतिनिधि के लिए… प्रतिनिधि के लिए… प्रतिनिधि के लिए… प्रतिनिधि के लिए… प्रतिनिधि के लिए… प्रतिनिधि के लिए… प्रतिनिधि के लिए… प्रतिनिधि के लिए… प्रतिनिधि के लिए… प्रतिनिधि के लिए… प्रतिनिधि के लिए… प्रतिनिधि के लिए… प्रतिनिधि के लिए… प्रतिनिधि के लिए… प्रतिनिधि के लिए… प्रतिनिधि के लिए… प्रतिनिधि के लिए… प्रतिनिधि के लिए… प्रतिनिधि… बोलते हैं वैसे कि कृष्णा आश्रय मिल कि इस बेरी देखिंग्स, वे स्थायी के, वे करेंगे, वे आप…
शिवात्त्वं ऑथोरिटी है, होता है कि ये हम वही भगवद्गीता, वही भगवान का नाम, रूप, को वो सब कुछ हम संस्था के बाहर हमारे तरीके से करें, तो वो ज़्यादा नेचुरल तरीके से हम भगवान तक उसको पहुँचा पाएंगे, बनिस्बत एक संस्था में आकर और जो आपके नियम-कायदे होते हैं कि तिलक ऐसा ही होना चाहिए, कि वेशभूषा ऐसी होनी चाहिए…
तटस्थ रह जाते हैं, “बिन फेरे तुम मेरे” प्रभु वाक्य हुआ है, जो मुझे याद आ गया। प्लीज़ कंटिन्यू!
तो हमें जो भक्तों को प्रचार करते हैं, तो एक तरह से पुशिंग करते हैं हम, तो हमें देखना है उसका प्रभाव क्या हो रहा है, उससे अगर लोग दूर जा रहे हैं, तो हमें पुशिंग नहीं करना चाहिए। क्या है, प्रभुपाद जी के ऐसे शिष्य थे जो लाइफ मेंबर्स बन गए, पर भारत में ऐसे अनुयायी थे जो शिष्य थे, तो फुल टाइम डिवोटीज़ बन गए। प्रभुपाद जी के ऐसे अनुयायी भी थे जो लाइफ मेंबर्स थे, और वो कुछ सेवा कर रहे थे, प्रभुपाद जी ने उनको भी स्वीकार किया। तो यह हमें प्रिंसिपल स्वीकार करना ज़रूरी है, समझाना ज़रूरी है कि केवल भक्ति, हाँ, भक्ति स्वाभाविक है, पर भक्ति स्वाभाविक तरह से वो भाव के लिए भगवान के प्रति आकर्षण होना, उसको समय लगता है।
और वो समय आने तक हमें जब नियम पालन करते हैं, तो उससे क्या होता है? वो सेंटीमेंट जो होता है, वो सेंटीमेंट जो भाव होता है, वो स्टेडी हो जाता है। कई बार क्या होता है कि अगर हम बोलते हैं भाव से जप करो, तो क्या होगा? फिर जब भाव आएगा, तब ही जप करेंगे और फिर जब भाव का अभाव होगा, तो फिर क्या? माया का प्रभाव होगा।
तो इसलिए, सबसे पहले, प्रिंसिपल समझना चाहिए और समझाना चाहिए। पर बाद में किस हद तक आप फॉलो कर सकते हैं, वो व्यक्ति पर छोड़ना चाहिए। उन्हें ज़्यादा पुश नहीं करना चाहिए कि ठीक है, आप ये नियम है, ये इस तरह से जप करते हैं, ये जो आदतें हैं, उनको त्यागते हैं हम। पर अगर आप त्याग सकते हैं, नहीं त्याग सकते हैं, वो व्यक्ति पर छोड़ना चाहिए। फिर व्यक्ति अपने-अपने रफ़्तार के अनुसार आगे बढ़ सकते हैं।
जो भगवान कहते हैं, “ये यथा मां प्रपद्यंते तांस्तथैव भजाम्यहम्” – सब लोग मेरे ही मार्ग में हैं। इसको मैं इंग्लिश में कहता हूँ कि From your place at your pace, access Krishna’s grace.
हरी बोल!
शब्द खेल (Word Game)
इस बार के आत्ममंथन में मैं एक बहुत स्पेशल गेम खेलना चाहूँगा प्रभुजी के साथ और क्योंकि इनके विषय में हमने इतना सुना की जो इनका जो इंटेलेक्चुअल स्टैमिना है, इंटेलेक्चुअल पेस है, वो एक अलग ही लेवल का है। तो मैं चाहता हूँ कि हम थोड़ा उनका वो इंटेलेक्चुअल लेवल और उनका इंटेलेक्चुअल प्रोसेसर जो है, वो किस दरजे का है, तो मैं थोड़ा टेस्ट करना चाहूँगा। तो आप लोग रेडी हैं?
एक बहुत स्पेशल गेम खेलते हैं प्रभुजी के साथ और ये स्पेशल गेम है वर्ड गेम। तो वर्ड गेम क्या? कि प्रभुजी, मैं कोई भी वर्ड आपके सामने प्रस्तुत करूँगा, कोई भी शब्द, कोई भी नाम, और आपको तुरंत उस नाम से संबंधित रामायण से, महाभारत से और श्रीमद्भागवत से तुरंत कुछ वाक्य बोलते हैं ना, सेंटेंस बनाकर कुछ वाक्य बनाकर प्रस्तुत करना है। कैसा लगा आपको ये?
तो इसका एक next level भी होगा, जैसे वीडियो गेम में होता है ना level 1, level 2। तो शुरुआत मैं करूँगा, फिर next level हमने ये सोचा है कि ऑडियंस में से आप प्रभुजी एक शब्द बोलेंगे कोई भी शब्द, माताजी एक शब्द बोलेंगे और उन दोनों शब्दों के कॉम्बिनेशन में प्रभुजी को क्या करना है? रामायण, महाभारत और श्रीमद्भागवत से कुछ सेंटेंस बना कर हमको सुनाना है।
तो आप लोग भी रेडी रहिए कि next level आप लोग का पार्टिसिपेशन चाहिए उसके अंदर। तैयार हैं? हाँ की ना?
चैतन्य चरण प्रभु: सॉरी, मैं तैयारी कर के नहीं आया हूँ, क्योंकि मेरा प्रोसेसर इनके जैसा नहीं है!
प्रभु जी: तो सबसे पहला वर्ड प्रभुजी आपके लिए: संशयात्मा। जब कैकेयी ने मंथरा के वचन सुने कि किस तरह से राम जी का जो कोरोनेशन होने वाला है, तो वो सुन कर उसके मन में संशय इतने आ गए कि वो एक संशयात्मा बन गई।
चैतन्य चरण प्रभु:
- महाभारत: हस्तिनापुर के राजा धृतराष्ट्र भी कई अवसरों पर पुत्रमोह और भविष्य की अनिश्चितता के कारण एक संशयात्मा की भाँति निर्णय लेने में असमर्थ रहे।
- श्रीमद्भागवत: उद्धवजी को भगवान श्रीकृष्ण ने उपदेश देकर अर्जुन और अन्य भक्तों के मन के संशयों को दूर किया, क्योंकि संशयात्मा मनुष्य का पतन निश्चित है।
प्रभु जी: हरी बोल! अगला शब्द: हिन्दुत्व।
चैतन्य चरण प्रभु:
- रामायण: आधुनिक हिन्दुत्व के लिए रामायण में मर्यादा पुरुषोत्तम राम द्वारा धर्म की स्थापना और असुरी वृत्तियों का नाश करना एक बहुत ही प्रेरणादायक प्रतीक बन गया है, जिससे कि हम भी अपने धर्म और संस्कृति की रक्षा कर सकें।
- श्रीमद्भागवत: आज की तारीख, आप लोगों को याद है, 22 जनवरी, एक साल हो गया हमारे राम लला जी की प्रतिष्ठापना के लिए, उसके विषय में सोच रहा था कि एक वो दौर था जब सरयू नदी अयोध्या में लाल हो गयी थी राम भक्तों के खून की वजह से, और पिछले साल 22 जनवरी को सरयू नदी लाल हुई थी राम भक्तों के ऊपर पुष्प वर्षा जब हुई थी, उसकी वजह से।
प्रभु जी: महाभारत! हिन्दुत्व! श्रीमद्भागवत! महाकुंभ!
चैतन्य चरण प्रभु: अरे! जो प्रभुजी, अभी जो महाकुंभ चल रहा है, दोनों साथ में हो सकता है कि हम ऐसे नहीं कि हम पूर्णतया शुद्ध हो गए हैं, हमें भी तो शुद्ध होना है, और वहाँ पे दिव्य संगम है, वहाँ पे जो परिस्थिति है, उससे हमारे भी शुद्धिकरण का हमें बहुत अच्छा मौका है। पर प्रभुपाद जी बोला करते थे कि जब हम सेवा भाव से प्रचार करते हैं, तो उससे से शुद्धिकरण हो जाता है।
तो इसलिए हम जब वहाँ पे जाते हैं, तो हमें कैलकुलेटिव नहीं होना है, हमें कंपैशनेट रहना है। कैलकुलेटिव नहीं होना है, हमें कर्मा कॉन्शियस नहीं होना है, हमें कृष्णा कॉन्शियस रहना है।
प्रभु जी: पश्चाताप और सेल्फ रिस्पेक्ट, आत्मसम्मान!
चैतन्य चरण प्रभु: पश्चाताप, प्रायश्चित्त… रमणमहर्षि… कलियुग और शक्ति (पावर)! भागवत में वर्णन जो आता है कि किस तरह से जब श्रिंगी ने परीक्षित महाराज को शाप दिया, तो एक ब्राह्मण ने अपने ब्राह्मण की शक्ति का दुरुपयोग किया और उस दुरुपयोग से कलियुग की शुरुआत हो गई।
प्रभु जी: संतुष्टि, विवेक!
चैतन्य चरण प्रभु: दुर्योधन में पहले से इतना धन होते हुए भी संतुष्टि नहीं थी और फिर जितना उसको शकुनि का संग हो गया, उसका विवेक भी विनाश हो गया।
प्रभु जी: तप, गर्व!
चैतन्य चरण प्रभु: विदुर नीति में बताया जाता है, विदुर बताते हैं कि दुर्योधन और धृतराष्ट्र को पांडवों और कौरवों का संघर्ष रोकने के लिए पहले अपने ही आसक्तियों से संघर्ष करना चाहिए।
प्रभु जी: गुड वर्ड! और कोई?
सेवा और चुनौती
प्रभु जी: सेवा भय… बहुत लोग भयभीत रहते हैं सेवा से। जब मारीच के पास रावण गए और उन्होंने बताया कि उन्हें उनकी सेवा करनी है, पर जैसे ही रावण ने राम का नाम लिया, तो मारीच पूरा भय से कापने लग गया!
हरी बोल!
नेक्स्ट… नहीं, आपका हो गया टाइम। क्रोध… वो हो गया, आत्मसम्मान हो गया, भ्रष्टाचार… क्रोध और भ्रष्टाचार, दुर्योधन को जब क्रोध हुआ था, ये इसलिए नहीं था कि उसने कुछ भ्रष्टाचार करके जो वारणावत का जो द्वारपाल था पुरोचन, उसको पांडवों को जलाने के लिए पैसे दिए थे, उनको गुस्सा इसलिए हुआ था कि वो पुरोचन भ्रष्टाचार करने के बावजूद पांडवों को जलाने के लिए खुद जल गया था! हाँ, वो छोटी लड़की कुछ पूछना चाहती है।
भक्ति… द्रौपदी में भक्ति का भाव हमेशा कृष्ण के प्रति था, पर जब वो पांडव… जब कृष्ण वनवास में पांडवों से मिलने आए, तो जब कृष्ण ने उनको आश्वासन दिया कि उनके अपमान का ज़रूर बदला लिया जाएगा और उनका गुणगान होगा, कैसे वो धर्म के प्रति तत्पर रहे, तो यह वचन सुनकर उनकी भक्ति द्रौपदी के हृदय से बाहर एक पूरे प्रेम के रूप में ओवरफ़्लो होने लग गई, फैलने लग गई।
तो अभी हमारा लास्ट सेगमेंट, एक रैपिड फ़ायर कृष्ण रहेगा प्रभुजी के लिए। लेकिन उससे पहले अगर किसी के कुछ प्रश्न हैं, तो हम ले सकते हैं, और फिर हमारा लास्ट सेगमेंट रहेगा रैपिड फ़ायर कृष्ण। तो किसी का कोई प्रश्न है?
मंगल आरती और संस्थागत मानक
भक्त: हाँ, सवाल हूँ कि कृष्ण… प्रभुपाद जी मंगल आरती क्वांड करना कि अच्छे से करना है, वो भी चाहिए और कौन से है, जिनको हम थोड़ा निग्लेक्ट करते हैं, प्रभुपाद उसको बहुत इम्पोर्टेंस देते थे? और उसके बाद भी अगर कुछ आप जैसे व्यवहार करते हैं, इतना काफ़ी है।
चैतन्य चरण प्रभु: जहाँ तक मुझे पता है, प्रभुपाद जी ने जो मंगल आरती है, वो 1966 में ही, जब पहले 26 सेकंड एवेन्यू हुआ था, वहाँ पे जब कुछ भक्त साथ में आके रहने लग गए, तो उन्होंने मंगल आरती चालू कर दी थी। तो पहले वो खुद गाया करते थे, कोई गा नहीं पाता था, पर तभी डीटीज़ भी नहीं थे, तो पिक्चर था, तो फिर आरती बहुत सिंपल हुआ करती थी। आई थिंक, वो मॉर्निंग प्रोग्राम पहले से शुरू हुआ, और प्रभुपाद जी की गुरु भक्ति थी कि उन्होंने गुरु वंदना से ही पहले मॉर्निंग प्रोग्राम चालू किया था।
पर जैसे संस्था बढ़ती गई, उसमें अलग-अलग चीज़ें आते गए। कैसे… विग्रह आ गए, फिर विग्रहों की प्रॉपर पूजा आ गई, फिर अलग-अलग इंस्ट्रूमेंट्स आ गए। पहले प्रभुपाद जी सिर्फ़ करताल लेके गए थे, मृदंग बाद में आया अमेरिका में।
प्रभु जी: प्रभुजी, ये प्रश्न है, हम देखते हैं, इस्कॉन का जब प्रचार हो रहा है… आप इस्कॉन के प्रचार के लिए एक प्रश्न देखते हैं? नहीं-नहीं, प्रश्न करने के लिए एक प्रश्न देखते हैं। हम देखते हैं, इतने सारे भक्त बन रहे हैं, मंदिर बड़े-बड़े बन रहे हैं, अभी खारघर में इतना बड़ा प्रोजेक्ट हुआ हमारा, और उसमें इस्कॉन का ग्लोरीज़ भी मिल रहे हैं, जैसे अभी कुंभमेला किचन चल रहा है, सो मेगा किचन, उसका पब्लिसिटी ऑल ओवर वर्ल्ड हो रहा है।
सो यस, अचीवमेंट के पॉइंट से देखा जाए, तो एज़ अ ऑर्गनाइज़ेशन, हम काफ़ी पब्लिक में, अभी हमारा एक फ़ेस बनता जा रहा है। लेकिन हम पूछेंगे प्रोजेक्ट की, जैसे हम भक्तों की संख्या बढ़ाते हैं, इतने सारे लोग आते हैं यहाँ पे, तो कई बार ऐसा देखा जा रहा है, कि इंटीग्रिटी और वैल्यू सिस्टम कॉम्प्रोमाइज होने लगता है। लेकिन अगर उसको हम पकड़ के रखेंगे, तो फिर यह जो ग्लोबल एक्सपेंशन की बात करते हैं हम, उसको कॉम्प्रोमाइज होना पड़ेगा।
तो यह कैसे, कितना उसको महत्त्व देना चाहिए? इंटीग्रिटी, वैल्यू सिस्टम और एथिक्स की हम बात करेंगे, भक्ति में उसका क्या स्थान है, और ऑर्गनाइज़ेशन लेवल पे भी उसको हम कैसे देखना चाहिए, और किस प्रकार से उस पिक्चर को हम अपने सामने रखें?
चैतन्य चरण प्रभु: अथर्ववेद में भगवान बोलते हैं कि ‘सर्वारंभा हि दोषेन धूमेनाग्निरिवावृता’, कि हर जो कर्म है जगत में, वो दोषों से आवृत है। मतलब क्या है, दोषों से भरा हुआ नहीं है, दोषों से आवृत है। दोष बाहर से होते हैं, अंदर से वो जिम्म… दवा होगा ही नहीं। तो वो होने वाला नहीं है। पर जब दवा हो रहा है, किसी-کسی ने तो प्रयास करना चाहिए दवा कम हो और अग्नि बढ़े।
तो दोष होंगे। कोई-भी कोई बड़ी चीज़ करने का प्रयास करे, तो दोष ज़रूर होंगे। तो क्या है कि हमें दो एक्सट्रीम हो सकते हैं कि हम अपेक्षा करें कि दोष हो ही नहीं, सब कुछ जो करें फ़्लॉलेस ही हो जाए, बिना किसी गलती के। वो होने वाला नहीं है। कोई बोलेगा कि मुझे ऐसे आइडियल भक्तों के… मैं केवल आइडियल भक्तों की सोसाइटी में ज्वाइन करूँगा। तो अगर ऐसी सोसाइटी ढूँढने होगे, तो ज़िंदगी भर ढूँढते रहेंगे और ढूँढ के मिल भी जाएगी, तो तुमको एडमिशन नहीं मिलेगी वहाँ पर! क्योंकि हम खुद आइडियल हैं एक तरह से।
तो इसलिए ये एक एक्सट्रीम करना है कि कुछ दोष हो ही नहीं। पर दूसरा है कि दोष ही हो। कि क्या है? आवृत भगवान बोल रहे हैं कि दोष है, पर दोष के नीचे सब्सटेंस भी है।
तो जो भी ऐसे है कि हम नया प्रोजेक्ट कर रहे हैं, हम कुछ एक्सपेंशन कर रहे हैं, तो उसमें एक एक्साइटमेंट होता है, उसमें एक आनंद होता है। पर उसके साथ-साथ वो भक्तों को या किसी और भक्त को चौकन्ना रहना ज़रूरी है कि जो दोष इतना बढ़ ना जाए कि अंदर कोई सब्सटेंस रहे ही नहीं, केवल दोष है।
जैसे मैं बता रहा था कि हम नदी जो बनाते हैं, नदी के लिए एक रिवर बेड होता है, पर वो रिवर बेड इतना बड़ा हो जाएगा कि नदी का प्रवाह ही बंद हो जाएगा। तो हमें देखना है कि दोनों अवॉइड करना है। तो इसलिए एक है कि जो एक्साइटमेंट, एडवेंचर जो है, बहुत ज़रूरी है एक्सपेंशन के लिए, पर जो स्ट्रक्चर है, जो सिस्टम्स हैं सेफ़गार्डिंग के लिए, वो भी इम्प्लीमेंट करना ज़रूरी है। तो दोनों साथ में होगा, तो ये संभव है कि हम एक्सपेंड भी होते रहे हैं और उसके हमारे स्टैंडर्ड्स हैं, वो भी ज़्यादा उससे दूर नहीं जाएंगे।
Thank you!
प्रभु जी: तो और भी जिनके प्रश्न है, कल सुबह प्रभुजी क्लास देने वाले हैं, वहाँ पर आप आ जाइए आपके प्रश्न लेकर। प्रभुजी की सुबह…
रैपिड फ़ायर प्रश्न (Rapid Fire)
अब क्योंकि हमारा जो लास्ट सेगमेंट है, हम चाहते हैं कि रैपिड फ़ायर क्वेश्चन, जो हमने आत्ममंथन में अभी तक किया नहीं है, प्रभुजी के साथ करेंगे। जैसे कि क्योंकि रैपिड फ़ायर इसलिए रखा है क्योंकि प्रभुजी का जो प्रोसेसर हमने कहा है… प्रभुजी की पुस्तक के लिए हम अनाउंसमेंट करेंगे, वैसे इन्होंने अभी तक 27 पुस्तक, 30 पुस्तकें शर्मी-शर्मी में बोल रहे हैं, लेकर 30 पुस्तकें उन्होंने लिखी हैं, और मैंने सुना है कि 6 पुस्तकें में हैं, 30 पुस्तकें में लिखी हैं, 6 पुस्तकें में हैं, तो उसका भी अनाउंसमेंट हम करने वाले हैं।
प्रभुजी, यह जो हमारा लास्ट सेगमेंट है:
- इस्कॉन संस्था की सबसे प्रिय क्या आपको चीज़ लगती है?
- चैतन्य चरण प्रभु: प्रभुजी, उन्होंने लिखा है कि तत्वज्ञान पे, एजुकेशन पे ज़ोर देते हैं। बहुत से मंदिर हैं वहाँ पे संस्कृति है, पर जो शिक्षण पे ज़ोर बिल्कुल नहीं दिया जाता है। हरी बोल!
- कोई ऐसा श्लोक जो कि आपका ऑल टाइम फ़ेवरिट है?
- चैतन्य चरण प्रभु: 18.58 – “मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात् तरिष्यसि” कि आप मेरी चेतना में आ जाओगे, तो आप सारी समस्याओं के पार जा सकते हैं।
- कौन है जो आपके सबसे फ़ेवरिट आचार्य हैं और क्यों?
- चैतन्य चरण प्रभु: भक्तिविनोद ठाकुर, क्योंकि वो पहले आचार्य हैं जो ट्रेडिशन और मॉडर्निटी, इनका इंटरेक्शन कैसे करना है, वो उसके बारे में विचार किया है। प्रभुपाद जी भी बोलते हैं कि जो मॉडर्न कृष्ण कॉन्शसनेस मूवमेंट है, उसके फ़ादर, उसके फ़ाउंडर हैं… फ़ादर बोलते हैं, जो पिताजी हैं, भक्तिविनोद ठाकुर को बोलते हैं। तो कैसे अलग-अलग विचार, वन फ़िलोसोफ़ी से विज़ुअलाइज़ेशन करना है, कैसे गौड़िया सिद्धांत को प्रेजेंट करना है, यह भक्तिविनोद ठाकुर ने बहुत एक्सेम्प्लीफ़ाई करके दिया है वो।
- अगर आपको टाइम मशीन में बिठाकर, आपके अतीत में कोई ले जाए, और आपको ये अवसर प्रदान करें कोई, कि आप आपके अतीत को बदल सकते हैं, यू कैन रीराइट योर पास्ट, तो अभी जो आप हैं, उसके अतिरिक्त आप कुछ बदलना चाहेंगे?
- चैतन्य चरण प्रभु: अगर मैं ब्रह्मचारी बना, तो जिस तरह से मैंने मेरे पिताजी को बताया, वो बहुत फ़ैनेटिकल था। तो मैं थोड़ा और संवेदनशीलता से और चीजें समझाने का प्रयास करता था। I think lot of pain would have been avoided by that.
- Is there a non-devotional hobby which you like?
- चैतन्य चरण प्रभु: मुझे भाषा बहुत अच्छी लगती है, कहीं भी किसी ने कुछ अच्छा लिखा है, तो फिर मैं वेजिटेरियन से ओमनिहिवोर बन जाता हूँ! यह प्रभुजी का नॉन-डिवोशनल है। मतलब कहीं भी कोई कोट्स की वेबसाइट वग़ैरे है, तो वो कोट्स पढ़ना एक विषय पे, जब भी मुझे थोड़ा टाइम मिल जाता है, तो I go to some websites और अलग-अलग जो कोट्स हैं वहाँ पे, अलग-अलग विचारों पे, अगर विषय नहीं होंगे तो भी… तो प्रभुजी का जो अलग-अलग लेखकों ने किस तरह से उनके विचार प्रकट किए हैं।
- आपका फ़ेवरिट धाम कौन सा है?
- चैतन्य चरण प्रभु: श्रीधाम वृंदावन।
- विष्णु अवतार? कोई आपका विष्णु अवतार है?
- चैतन्य चरण प्रभु: परशुरामचन्द्र है। हरी बोल! बोलो सियावर रामचंद्र भगवान की जय! प्रभुपाद जब रथ यात्रा में जा रहे हैं, और उनके हृदय में वो तब भी कृष्ण-राम जी का स्मरण कर रहे हैं। तो वो बचपन से मुझे अभी तक से एक छवि हृदय में हो गई थी।
- आप पब्लिक में ज़्यादा उठना-बैठना पसंद करते हैं या एकांत ज़्यादा पसंद करते हैं?
- चैतन्य चरण प्रभु: मेरे विचारों के साथ मैं रहना चाहता हूँ। हीरो-हिरोइन में केमिस्ट्री होती है, तो वैसे मैं देखता हूँ, कौन भक्तों के साथ मेरी एक इंटेलेक्चुअल केमिस्ट्री है। तो उठने के संग में बड़ा आनंद आता है, पर अदरवाइज़, भक्तों का संग बहुत महत्वपूर्ण है और जब प्रचार करते हैं या प्रचार के बाद पहले भक्तों से मिलते हैं, तो उसमें आपके प्रति मैं बहुत संवेदनशील हूँ। हरी बोल!
प्रभु जी: आख़िरी प्रश्न, जो हमने अभी गेम खेला, ये जब मैं कहीं किसी अमेरिका में जाता हूँ, हम कार में ट्रैवल कर रहे होते हैं, जो जिनके हाँपे मैं रह रहा हूँ, वो शायद उनको लेके जाते हैं, तो हम सब ऐसे गेम खेलते हैं ये। तो वो बच्चों को बोलता हूँ, यह कोई माता-पिता होंगे, उनकी बच्चों रे… थका है, तुम कोई शब्द बोलो, कला है, तुम कोई शब्द बच्चों, मैं उस पर…
चैतन्य चरण प्रभु: हर एक व्यक्ति की चेतना में कुछ प्रॉमिनेंट होता है। अगर कोई आर्किटेक्ट है, कोई मंदिर बनाना चाहता है भगवान के लिए, तो क्या है, वो कोई भी बिल्डिंग देखेगा, अच्छा ये बिल्डिंग के आर्किटेक्चर कैसे है, शायद हमारे मंदिर में ऐसे बनाना चाहें हम। कोई भगवान के आर्किटेक्चर को ही देख रहा है, तो वो देखता है कहीं क्या… फूलों को चुने और वो फूलों को हम भगवान को सुशोभित करें।
तो मेरे लिए जो शब्द है वो एक फूल के समान है। और वो शब्द रूपी फूलों के साथ कैसे भगवान का गुणगान कर सकते हैं, तो वो मैं चाहने देखने का प्रयास करता था। तो पूरी समय पर संबंध बनाने का, बारे में सोचने का प्रयास करते हैं, यह मेरी बढ़िया सी हॉबी कहा जा सकता है। हर शब्द शब्दों के साथ का प्रयास है जो भगवान के साथ हमारे अस्पूर्ण के खेल करें।
प्रभु जी: आपको आपमें शामिल करना चाहूँगा, हमारा भी ये सेंस ग्रैटीफ़िकेशन हुआ कि नहीं आज! तो इसलिए हम चाहते हैं कि ये तो विन-विन सॉल्यूशन है कि आपका भी ये इस्कॉन फ़्रेंडली सेंस ग्रैटीफ़िकेशन है, हमारा भी है। तो आप आते रहिए, हम ऐसे बहुत से शब्द यहाँ पर सब भरे बैठे हैं शब्दों से, तो बहुत से ऐसे शब्द आपके सामने हम दागते रहेंगे और आप उन शब्दों को आपकी तरीक़े से उसको खेल कर वाक्यों में परिणत कर कर हमारे सामने…
प्रभु जी, मैं पूरा परिचय इनका दे नहीं सका। प्रभु जी, गीता डेली डॉट कॉम करके इनकी वेबसाइट है, जहाँ पर रोज़ आर्टिकल्स लिखते हैं, छः हज़ार से ज़्यादा गीता के ऊपर इन्होंने आर्टिकल्स लिख दिए हैं।