Hindi – New year resolutions 4 principles for greater self transformation
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Lecture Summary
यह व्याख्यान भगवद्गीता के मार्गदशन पर आधारित है कि कैसे हम नए साल के संकल्पों (New Year Resolutions) को अधिक सुदृढ़ और स्थायी बना सकते हैं। इसके लिए ‘CARD’ एक्रोनियम (Acronym) के चार सिद्धांतों को समझाया गया है:
- D – Devotion (भक्ति): हम केवल अकेले संघर्ष नहीं कर रहे हैं, बल्कि भगवान की दी हुई क्षमताओं और उनकी सेवा के भाव से कार्य करते हैं। भगवान से जुड़ने (Divine Grace) से हमें ऊंची दृष्टि और आंतरिक स्थिरता मिलती है, जिससे हमारे संकल्प मजबूत होते हैं और हम दुनिया में सकारात्मक बदलाव ला पाते हैं।
- C – Contemplation (चिंतन): मन बहुत चंचल है। बुद्धि का उपयोग करके भविष्य में सकारात्मक आदतों के प्रभाव और समय के सदुपयोग का चिंतन करना चाहिए, जिससे मन में स्थिरता आए।
- A – Association (संग): आंतरिक बुद्धि के साथ-साथ बाहरी सकारात्मक प्रभाव (सत्संग, समान विचारधारा वाले मित्र, अकाउंटेबिलिटी पार्टनर्स और मेंटर्स) की आवश्यकता होती है, जो हमें सही दिशा में आगे बढ़ने और प्रेरणा देने में मदद करते हैं।
- R – Retrospection (सिंहावलोकन): असफलता से हताश होने के बजाय, एक जिज्ञासा की दृष्टि से यह समझना चाहिए कि कौन सा कार्य क्यों हुआ या क्यों नहीं हुआ। इससे आत्म-सुधार (Self-improvement) और आत्म-समझ (Self-understanding) दोनों बढ़ती हैं।
Full Transcription
हरे कृष्णा! नववर्ष के हार्दिक शुभकामनाएं है आप सबको। जब नववर्ष शुरू होता है, तो हम सब चाहते हैं कि नए वर्ष में हमारा जीवन और अच्छा हो और उसके लिए हम खुद अच्छे बनें। इसलिए हम कई बार New Year Resolutions लेते हैं। तो आज हम भगवद्गीता के आधार पर देखेंगे कि किस तरह से हम Resolutions लेते हैं, संकल्प लेते हैं, वो और सुदृढ़ बना सकें। जिससे कि हम वास्तव में स्थायी रूप से कुछ को परिवर्धित कर सकें, सकारात्मक रूप से। तो जिससे New Year के समय हम दूसरों को कार्ड भेजते हैं, New Year विशेज का, तो हम देखेंगे हम खुद को कैसे एक कार्ड भेज सकते हैं।
एक कार्ड जो है, ये एक Acronym है—CARD। चार चीजें भगवद्गीता के माध्यम के मार्गदर्शन के अनुसार अगर हम करेंगे, तो हमारा संकल्प और सुदृढ़ बन सकता है।
1. C – Contemplation (चिंतन)
तो पहला C है, Contemplation। Contemplation मतलब चिंतन। तो भगवद्गीता में बताया गया है कि हमारा जो मन है, बड़ा चंचल है। अगर मन को स्थिर करना है, तो हम हमारे बुद्धि का इस्तेमाल करके चिंतन करना चाहिए। तीसरे अध्याय के 43वें श्लोक में भगवान कहते हैं:
एवं बुद्धेः परं बुद्ध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना
कि हम हमारे बुद्धि का इस्तेमाल करके खुद को अपने आत्मा के स्तर पर स्थिर कर सकें। ऐसे करेंगे तो क्या होता है, तो हम चिंतन कर सकते हैं कि भविष्य में मेरे लिए क्या आने वाला है? अगर कोई सकारात्मक आदत मैं अपने जीवन में अमल करता हूं, तो उससे मेरा जीवन कैसे इंप्रूव होगा? और क्या मैं देख पा रहा हूं कि समय किधर जा रहा है? भविष्य को देखती है, भविष्य में क्या अच्छा हुआ, क्या बुरा हुआ?
अगर मान लीजिए हम रोज पंद्रह मिनट भगवद्गीता पढ़ने लगते हैं या ऐसा कोई शास्त्र अच्छा ग्रंथ पढ़ने लगते हैं हम, तो क्या होगा? पंद्रह मिनट ज्यादा समय नहीं है, पर रोज पढ़ेंगे, तो एक साल में शायद हम दो बार पूरी भगवद्गीता पढ़ सकते हैं। कितनी सारी चीजें जो हम पढ़ना चाहते हैं, हम पढ़ सकते हैं। अगर हम रोज आधा घंटा सोशल मीडिया पे, टीवी पे, गॉसिप में, प्रजल्प में वक्त गवा रहे हैं, तो आधा घंटा ज्यादा समय नहीं लगेगा, पर आधा घंटा अगर 300 पैसे दिन हो जाते हैं, वो लगभग 180 घंटे होते हैं। तो इतने सारे समय में क्या-क्या नहीं कर सकते हैं हम?
इस तरह से चिंतन करने से हम क्या करते हैं—हमारा मन चंचल है, पर अंदर से बुद्धि के द्वारा मन पे हम स्थिरता ला सकते हैं।
2. A – Association (संग)
पर दूसरा है, Acronym में A, तो हमारे मन को स्थिर करने के लिए ना, क्योंकि हमको अंदर से थोड़ा जोर लगाना है, पर बाहर से भी एक सकारात्मक प्रभाव लगाना है, वो है संग से आता है। सत्संग से जो है, वो तीन तरह से हमें मदद कर सकता है। अगर वो हमारे समान जैसे ही लोग हैं, जो भी हमारे साथ आदत डालना चाहते हैं, या आदत छोड़ने का प्रयास कर रहे हैं, तो फिर वो हमारे मित्र, वो हमारे पीयर, वो हमारे अकाउंटेबिलिटी पार्टनर्स बन सकते हैं।
तो कभी हम कुछ नहीं कर पा रहे हैं, तो उनको करते हुए देखकर हमें प्रेरणा मिल सकती है, वो थोड़ा हमें पुष्ट कर सकते हैं। और कभी वो कमजोर पड़ रहे हैं, तो हम उनको शक्ति दे सकते हैं। उसके साथ-साथ अगर हमारे कोई मेंटर्स हैं, हमारे कोई वरिष्ठ हैं, तो उनको अगर हम बोलते हैं, तो वो कभी-कभी हमें मार्गदर्शन दे सकते हैं, कभी-कभी हमें पुष्ट कर सकते हैं। और इस तरह से संग से एक बौद्ध प्रभाव होता है। और कभी-कभी अगर हम कुछ सकारात्मक कार्य करने का प्रयास कर रहे हैं, तो हमारे कुछ उदाहरण प्रस्तुत करना है, तो वो भी एक तरह से एसोसिएशन का सकारात्मक प्रभाव हो सकता है।
दूसरे अध्याय के 62वें श्लोक में भगवान बताते हैं:
संगात् संजायते कामः
तो साधारण तौर पर यहां पे संग अर्थ होता है कि आसक्ति से तृष्णा आती है। पर संग का अर्थ अच्छा है, वो भी सुदृढ़ बनाना है। तो Internally intellectual steadiness, बाहर से social steadiness, सत्संग से हम बढ़ा सकते हैं।
3. R – Retrospection (सिंहावलोकन)
फिर तीसरा जो अक्षर CARD एक्रोनियम में है, वो है Retrospection। Retrospection मतलब इसको सिंहावलोकन कह सकते हैं। और अक्सर ऐसा होता है कि हम बिल्कुल हताश हो जाते हैं—”मैं निकम्मा हूं, मैं कभी सुधरूंगा ही नहीं।” पर ऐसे द्वंद्वों में जाने की जगह पर हम खुद को ही एक जिज्ञासा की दृष्टि से देख सकते हैं—काम कर पाया तो कैसे कर पाया? काम नहीं कर पाया तो क्यों नहीं हो पाया? क्या हुआ? ये समझने का प्रयास कर सकते हैं।
तो भगवद्गीता में भगवान कहते हैं छठे अध्याय के पांचवें श्लोक में:
उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमअवसादयेत्
कि हमें खुद का उद्धार करना है, हमें खुद की जिम्मेदारी लेनी है, जिससे कि हम खुद का उद्धार कर सकते हैं, न कि खुद का पतन करें। तो मतलब क्या है कि हम जब खुद की ओर देखते हैं, तो हम खुद को समझ सकते हैं—क्या कर सकता हूं मैं, क्या नहीं कर सकता हूं? और हमें एक तरह से देखना है कि हमारा मन थोड़ा नादान बालक के समान है। तो माता-पिता सब बच्चों के साथ एक समान पद्धति से आपको डिसिप्लिन नहीं कर सकते हैं, हर बच्चा अलग व्यक्ति है। तो हमें समझना है कि मेरे मन को मैं कैसे समझा सकता हूं? कैसे मैं इसको स्थिर बना सकता हूं?
तो जब हम यह retrospection यह भाव रखते हैं कि मुझे खुद की ओर देखना है और समझना है, तो self improvement ही नहीं होगा, हमारा self understanding भी बढ़ेगा। हम खुद को समझ पाएंगे और फिर उसके द्वारा हम भी समझ पाएंगे कि ठीक है, यह जो संकल्प है, मेरे लिए करना मुश्किल है या आसान है।
4. D – Devotion (भक्ति)
और आखिरी D जो है, वो है Devotion। भगवद्गीता में भगवान बताते हैं कि हम सब उनके अंश हैं:
ममैवांशो जीवलोके
तो इसका मतलब क्या है कि केवल हम ऐसे नहीं कि हम अकेले इस बड़े-बड़े बुरे जगत में जूझ रहे हैं, युद्ध कर रहे हैं परिस्थितियों से। इसका मतलब है कि भगवान की योजना में हमारा भी एक अंश था। और इस भाव से करते हैं कि न केवल मैं खुद का परिवर्तन करना चाहता हूं क्योंकि मुझे अच्छा बनना है, पर मुझे भगवान की सेवा करनी है। भगवान ने मुझे जो क्षमताएं दी हैं, उनको मुझे अच्छी तरह से इस्तेमाल करना है—”I want to do justice to my God-given gifts.”
ऐसा भाव जब हम रखते हैं, तो फिर उससे हमें और प्रेरणा मिलती है। और न केवल हमें एक ऐसा bigger vision मिलता है, पर deeper foundation भी मिलता है। मतलब क्या है कि अगर कोई इमारत है, उसकी जो नींव है, तो फिर तूफान भी आ जाएंगे, तो भी वो टूटेगी नहीं आसानी से। वैसे हम एक इमारत बनाना चाहते हैं हमारे संकल्पों का, हमारे आंतरिक जीवन का, बेहतर जीवन का।
हमारे अंदर जब हम जाते हैं, हमारे अंदर हमारा मन है, उसके परे बुद्धि है, उसके परे आत्मा है, उसके परे परमात्मा है। तो जितना हम अंदर जाएंगे, उतनी हमारी स्थिरता बढ़ जाएगी और फिर भले कुछ भी आंधी आ जाए, उससे हम ज्यादा हताश नहीं होंगे। और उसके साथ-साथ हम समझते हैं कि जब हम भगवान की सेवा करने का प्रयास कर रहे हैं, तो भगवान के लिए हम निमित्त बन सकते हैं। जैसा भगवद्गीता में बताते हैं, भगवान:
निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्
अर्जुन को बताते हैं, 11वें अध्याय के 33वें श्लोक में। तो उसका मतलब क्या है कि अगर हम खुद को और अच्छी तरह से परिवर्तित करते हैं, तो उससे न केवल हमारा कल्याण होगा, पर भगवान हमारा इस्तेमाल करके दूसरों का कल्याण करने में हमें उपयुक्त कर सकते हैं। हमारे परिवर्तन से हम दुनिया का भले नहीं, पर हमारी दुनिया है, तो दुनिया का हमारा कोना है, उसको और अच्छा बना सकते हैं। और यहां सब है हमारा empowerment, हम और ज्यादा सुदृढ़ होते हैं।
और दूसरा यह भी है divine grace। जब भगवान बताते हैं:
परं दृष्ट्वा निवर्तते
दूसरे अध्याय के 59वें श्लोक में। हम जब भक्ति से उनसे जुड़ जाते हैं, तो हमें एक ऊंची दृष्टि मिलती है, जिससे कि हम स्थिर हो जाते हैं। और इतना ही नहीं, वो कहते हैं:
युक्त आसीत मत्परः
दूसरे अध्याय के 61वें श्लोक में। कि जब आप अपना मन मुझमें लगाते हो, आपको मेरी एक कृपा मिलती है:
प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते
जब भगवान से हमें कृपा मिलती है, तो भगवान हमारे मन को न केवल नियंत्रित कर देते हैं, पर वो परिवर्धित कर देते हैं। इसे Devotion जो है, एक magical step है।
भक्ति के द्वारा हम समझते हैं कि हम अकेले नहीं हैं, भगवान हमारे साथ हैं। भगवान चाहते हैं कि उन्होंने जो हमको भेंट दी हैं, क्षमताएं दी हैं, उसका हम अच्छी तरह से उपयोग करें। भगवान से हम जब मन जोड़ते हैं, तो अंदर से बहुत स्थिरता आ जाती है और भगवान से जब जोड़ते हैं, तो हम हमारे द्वारा दुनिया का हित कर सकते हैं, दुनिया को सार्थक कर सकते हैं और परिवर्तित कर सकते हैं। इस तरह से ये चारों चीजें अगर हम अपनाते हैं, तो हमारा जीवन बहुत अच्छा हो सकता है।