Hindi – Part 3 Ses 2 Relationship and life lesson from Mahabharta – Chaitanya Charan
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Disclaimer: This transcript was generated using AI and may contain occasional errors or inaccuracies. भक्ति में संतुलन: इसका अर्थ है कि हमें अपनी सभी लौकिक चिंताओं को छोड़कर भगवत-इच्छा के अनुसार कार्य करना चाहिए। भक्ति हमेशा सीरियसली और सस्टेनेबली (गंभीरता और निरंतरता के साथ) करनी चाहिए, जिससे जीवन में संतुलन बना रहे। कर्तव्य और शरणागति: अर्जुन को युद्ध और कुलधर्म के मोह से उबारने के लिए भगवान ने ‘सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज’ का उपदेश दिया। पूर्वा जन्म से आते हैं और जो कंडिशिन्स होते हैं हमारे परिस्थिति में होते हैं क्या हमें कुछ ही कंजियंतरन हैं और क्या हम कंडिशिन्स और कंडिशनिंग को परिवर्तन कर सकते हैं? हाँ, ये, जरूर, अभी इसमें दो चीज़े हैं कि इसमें हम कितना परिवर्तन कर सकते हैं कि अभी कुछ कंडिशन ऐसे होता है कि उसको परिवर्तन करना बड़ा मुश्किल होता है। मैं कैनेडा में था तभी मैं एक व्यक्ति से मिला भक्त बन रहा था वो नॉर्थ कोरिया से छूट के आया था। नॉर्थ कोरिया में वहाँ पर ऐसा इतना डिक्टेटरशिप को बचता नहीं है तो जैसे पांडवों ने अंडर ग्राउंड टनल बनाया था उसने से अंडर ओशन टनल बनाया इंडिविजुअली और फिर वहाँ से वो छूट के आ गया था। तो अभी वो भी उन्होंने पांडवों ने अंडर डिक्टेटरशिप को बचता नहीं है तो जिसे पांडवों ने अंडर ग्राउंड टनल बनाया था उसने से वहाँ पर ऐसा इतना डिक्टेटरशिप को बचता नहीं है तो जिसे पांडवों ने अंडर डिक्टेटरशिप को बचता नहीं है तो हमारा जो इसमें क्या डिजायरेबल है और फिर क्या डुएबल है, क्या करना अच्छा है और क्या मैं कर सकता हूँ? तो ये प्रिंसिपल जो है वो दोनों के लिए अप्लाई होता है। हम में कुछ कंडिशनिंग होती है तो कभी-कभी अच्छा होते है कुछ कंडिशनिंग हम बदल ही नहीं सकते हैं, कुछ कंडिशनिंग हम बदल सकते हैं, कुछ हद तक बदल सकते हैं। तो किस हद तक बदल सकते हैं, वो हमें एक्सपेरिमेंट से प्रयास से ही पता चलता है। और अभी जो हमारी कंडिशनिंग्स भी है किस हद तक बदल सकते हैं? किसी को क्रोध आता है, वो क्रोध को रोक सकता है। अभी कोई भी जितना क्रोध आता है उतना नहीं कर सकता है, वो जीवित भी नहीं रह पाएगा अगर हर बार इतना क्रोध आएगा, उतना क्रोध करते रहेगा तो वो न केवल मोरली रॉन्ग है, लीगली रॉन्ग हो सकता है, वो व्यक्ति जेल में आ सकता है। तो सब कुछ हद तक तो नियंत्रण करते ही हैं, तो नियंत्रण हमें कुछ हद तक करना पड़ता है, कुछ हद कर सकते हैं। तो अभी किस हद तक कर सकते हैं? प्रेसिडेंट पीरियड में जो कंडीशंस हैं और कंडीशंस हैं, तो हमें पहले से पता नहीं है कितना हम परिवर्तन कर सकते हैं, हम ट्राय करके ही पता करते हैं, हम पता चलता है कितना हम कर सकते हैं। तो जनरली क्या है? पहले हमारे इंटेलिजेंस से हमें फैसला करना है किस दिशा में भी जाना है। फिर इंटेलिजेंस के बाद में क्या होता है? हमें एक्सपेरिमेंट करना होता है कि कितना मैं कर सकता हूँ। अगर मैं इतने घंटे सोता हूँ, बोलता हूँ कि नौ-दस घंटे सोने की आदत है मुझे, उसके बाद मैं काम नहीं कर सकता हूँ, तो छः घंटे सोना है मुझे, नौ घंटे से छः घंटे आना मुश्किल होगा किसी को शायद, तो फिर नौ घंटे से आठ घंटे पर आ सकता है और फिर कितना कर सकते हैं व्यक्ति? फिर एक्सपेरिमेंट करने के बाद फिर हम जो है सस्टेनेबल है, हमारे लिए क्या पॉसिबल है हम समझ गए? तो जो भगवान कहते हैं ‘युक्ताहार विहारस्य नात्य अश्नतस्तु’। अगला सवाल पर यह है “How to overcome self doubts?” तो इसमें क्या है कि हम कई बार हमारा दूसरों से संबंध कैसे है, यह देखते हैं कि हमारा दूसरों के साथ का संबंध हमें इंप्रूव करना है और यह महत्वपूर्ण है, पर उसके साथ-साथ कि मेरा संबंध मेरे साथ कैसे है? भगवान कहते हैं 6.5 में “उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत् आत्मैव ह्यात्मनो बंधुरआत्मैव रिपुरात्मनः”। यहाँ पर भगवान बताते हैं कि एक है हमारा हायर सेल्फ, उसको हम आत्मा कह सकते हैं, एक लोअर सेल्फ है, उसको हम मन कह सकते हैं। भगवद्गीता के इस श्लोक में भगवान आत्मा और मन का भेद नहीं कर रहे हैं, उसको आत्मा ही बोल रहे हैं दोनों को, कभी मन को भी बोलते हैं। तो हमें इस तरह से एंगेज करना है, क्या होगा? हमें “Elevate yourself with yourself”. हमें ऊपर खुद को उठाना है, न कि इसके द्वारा हम नीचे जा रहे हैं। तो हमारे अंदर ही कुछ ऐसा भाग होता है जो खुद को इंप्रूव करना चाहता है, हमारे अंदर ही कुछ ऐसा भाग होता है जो खुद को नीचे खींच रहा होता है। तो “उद्धरेदात्मनात्मानम्”, खुद को हमें उठाना है, न कि खुद को हमें नीचे गिराना है। तो अभी यह कैसे करना है? अभी हम में क्या होता है? कि जब भी हम कुछ कार्य करना चाहते हैं, तो हमारा खुद के साथ का रिलेशनशिप कैसे होता है? कि कभी-कभी हमें खुद को एन्करेजमेंट देना पड़ता है, और कभी-कभी खुद को चेस्टाइजमेंट देना पड़ता है। कि तुमने यह क्या मूर्खता की? अभी इसका परिणाम क्या हो रहा है? क्या हम इससे मोटिवेशन आ रहा है to improve? कि उससे डीमोटिवेशन हो रहा है? कि क्या होता है? कि हमारे अंदर से ही अलग-अलग आवाज़ आ सकते हैं। तो आप किसी एक के पास सब क्वेश्चंस दे दो, और ये क्वेश्चंस खत्म हो जाएंगे, फिर आप वो आगे ला सकते हैं। तो अभी जो एन्करेजमेंट, अभी हम खुद को डांटते हैं, हमारा बच्चा है, बच्चे भी हो गए, किसी को डांटते हैं कभी-कभी। तो डांटने से, अरे तुम साइकिल चला रहे थे, तुम गिर गए, लापरवाही मत करो, ध्यान दो, तो हाँ, लापरवाही नहीं कर रहे थे, तो उसको ध्यान देना चाहिए, अच्छी बात है, पर अगर उसको डांटते थे, तुम गिर रहे हो, तुम दो, नहीं, साइकिल मैं चला रहा हूँ है, नहीं और प्रोत्साहन देना है, उससे भी क्या होना चाहिए, कि मोटिवेशन टू इंप्रूव, ठीक है, तुम यह इस हद तक कर पाए, और तुम कर सकते हो। हमने कुछ न्यू ईयर रेज़ोल्यूशंस बनाया, और वो न्यू ईयर के रेज़ोल्यूशंस था, पर एक न्यू मंथ के लिए रहा, एक महीने के बाद छूट गया वो, ठीक है, खुद को डांट सकते हैं, क्या है तुम तो अगर इससे इतना होता है, तो मैं कभी कुछ कर ही नहीं पाऊंगा, तो एक भक्त मुझे बोल रहे थे कि मैंने “I have given up”, मैंने त्याग कर दिया है, अच्छा क्या त्याग कर दिया है? “I have given up the desire to give up”, मैंने त्याग करने की इच्छा को त्याग कर दिया है, अभी अब नहीं कर पाई, इसलिए ऐसे नहीं करना है। हमें खुद को डांटने से डिस्करेज नहीं हो जाए, और खुद को एन्करेज करने से, कभी कोई क्या होता है, हमने गलती किया है, ठीक है, कोई बड़ी बात नहीं है, नहीं है, बार-बार ऐसे ही बोलते हैं, तो बड़ी बात हो जाएगी, मैं कर, मैं करूंगा ये, या आप सोचे नहीं कर, नहीं कर पाऊंगा, तो क्या फायदा है, करना नहीं चाहिए, नहीं, तो जो डाउट्स आते हैं, हम में हमारे मन में, जो हमारा गलती नहीं होता है, तो उसका कारण क्या है, कि हमारे अंदर से कोई आवाज़ आती है, तुम नहीं कर पाओगे ये, शायद कोई क्रिटिकल व्यक्ति होगी पहले, तुम ये नहीं कर सकते कभी, वो हमको डांटते हैं, अगर बोलते हैं, तो उनकी आवाज़ हम कभी-कभी इंटरनलाइज कर लेते हैं। तो अभी शायद उनका उद्देश्य हमें डिस्करेज करने के लिए नहीं हो, अगर वैसे हो रहा है, तो फिर जो मैंने पहले बताया था कि वैल्यू दोज़ हू वैल्यू अस, डोंट ओवर वैल्यू दोज़ हू डिवैल्यू अस, तो जो हमें, जो आवाज़ हमें एन्करेज करते हैं, वो आवाज़ों को हमें स्ट्रेंथड करना है। तो परिस्थिति के अनुसार देखना है कि कोई, हम गलती करने के बाद बिंदास रह रहे हैं, अरे कुछ नहीं हुआ, तभी खुद को डांटना ज़रूरी है, पर गलती करने के बाद हम उदास हो गए हैं, हताश हो गए हैं, और उस पर से हम डांटने लगते हैं, तो क्या होगा हमें सोचना चाहिए, जैसे हम दूसरों के साथ बर्ताव करते हैं, किसी की हम परवाह करते हैं, हम किसी से स्नेह करते हैं, और उसको हम मदद करना चाहते हैं सुधारने के लिए, तो क्या हम उसको डांटेंगे या उसको प्रोत्साहन देंगे? वो उसकी मनस्थिति के अनुसार देखेंगे। तो कभी क्या करना है खुद के साथ? तो जब हमारे मन में संशय बढ़ जाता है, या हमारे सेल्फ डाउट आता है, उसका कारण क्या है, कि हमारे अंदर जो क्रिटिकल आवाज़ है, भले ये मेरे लिए संभव नहीं है, पर भगवान के लिए संभव होती है, तो उस तरफ से देखेंगे, तो ये सेल्फ डाउट है, इसको हम ओवरकम कर सकते हैं। तो कॉन्फिडेंस किसी भी फील्ड में हो, हमारे प्रोफेशनल फील्ड में भी हो, ऐसे ज़्यादा भेद कर नहीं है, कि हम जिस भी भूमिका में हैं, वो भगवान की योजना के अनुसार ही है, जिस जॉब में है, तो ठीक है, जो मुझे भूमिका करनी है, वो जो भगवान ने टैलेंट्स दिए हैं, जो भगवान ने क्षमताएं दी हैं, उसको पूर्ण मुझे यूज़ करना है, तो शक्तियां, हमारे पूर्वकर्म, ये भगवान से इंडिपेंडेंटली कार्य नहीं कर रही है, मैं यहां अध्यक्षेण प्रकृति बोल रहा है, हम किसी नौकरी में है, किसी परिवार में है, किसी कॉलेज में है, तो वो भगवान की योजना के अनुसार ही है, तो उसमें जो हम बेस्ट कर सकते हैं, तो हमें सोचते हैं कि गॉड इज़ विद मी, भगवान मेरे साथ हैं, जैसे अर्जुन के साथ कृष्ण थे, तो वैसे ही भगवान हम सबके साथ हैं, और जब हम भगवान की चेतना में रहते हैं, “मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि”, तो हम भगवान की चेतना में रहते हैं, कि भगवान की योजना से यहाँ पे आया हूँ मैं, तो मुझे जो करना है, मैं मेरी पूर्ण क्षमता से करने का प्रयास करूंगा, वो भाव रखोगे, तो बेसिकली क्या है, “प्रसादात्तरिष्यसि”, तुमको एग्री नहीं करना चाहिए, लेकिन जितना फोर्सफुली अपना आर्ग्यूमेंट प्रेजेंट करेगा वो करो। तो क्या होता है अगर वो प्रेजेंट करते हैं, नॉर्मली क्या होता है कि हम, दूसरा कोई हमारे खिलाफ कुछ बोल रहा है, तो हम उसको रिफ्यूट करने की बात देखते हैं, उसके आर्ग्यूमेंट में जो मेरिट्स हैं, वो न देखकर उसमें डीमेरिट्स वो देखते हैं, कह होने के बदले कि, वो कहते हैं जिसके ग्रीवेंस लिए भी बोला नहीं। कुछ हो नहीं रहा है। आर्ग्यूमेंट के लिए आर्ग्यूमेंट के लिए आर्ग्यूमेंट के लिए आर्ग्यूमेंट के लिए आर्ग्यूमेंट के लिए आर्ग्यूमेंट के लिए आर्ग्यूमेंट के लिए आर्ग्यूमेंट के लिए आर्ग्यूमेंट के लिए आर्ग्यूमेंट के लिए… पहले कुछ नास्तिक लोग कहते थे कि जीजीज नाम कोई व्यक्ति था ही नहीं इसलिए वो कहते हैं कि कृष्ण नाम कोई व्यक्ति था नहीं, पर अभी मोर ऑर लेस स्वीकार करते हैं जीजीज वाज़ देयर, कृष्ण नाम कोई व्यक्ति थे, फिर भी अभी तक एक्जेक्टली क्या हिस्ट्री है, क्या मिथ है, उसको सेपरेट करना इतना आसान नहीं है, पर एक मेजर फर्क है उसमें, कि जो भी मेरे जो वर्जन थी, अगर हम उसको मिथ नहीं बोलते हैं, उसको हिस्ट्री भी बोलते हैं, उसमें एक मेजर फर्क है कि शी वाज़ ऑलरेडी मैरिड एंड हर हस्बैंड सपोर्टेड हर, तो इसलिए कुंती की परिस्थिति और मेरी की परिस्थिति बहुत अलग है, you cannot compare them, she was single, she was not married at all, और जो उसने बताया तभी उसके हस्बैंड ने उसको स्वीकार कर लिया, यह ऐसे हुआ है और उस समय क्या था, एक मियाैनिक रिलीजन था, मियाैनिक मतलब क्या, एक मसीहा आने वाला है भविष्य में कोई, तो उसके पिता ने भी स्वीकार कर लिया, यह ऐसे हो सकता है तो इसलिए उसको उसके हस्बैंड का सपोर्ट था। जैसे मैं बताया था कि क्रिकेट मैच हो जाने के बाद, रियर व्यू में क्या होता है, हमेशा सबका विजन हाई इनसाइट में 2020 होता है, अरे इसने इसको बॉलिंग नहीं चाहिए था, इसने इसको बैटिंग ऐसे करना चाहिए था, क्या होता है, उस परिस्थिति में she did her best that she could. कैसे हम अपने स्वाभिमान के संरक्षण कर सकते हैं, पर हम गर्वित नहीं हो सकते होना है, जिससे कि हम लोगों को हमारे ऊपर चलने दें, हम पर हमारा दमन करें वो, तो कैसे है कि ह्यूमिलिटी जो है, it is not about devaluing ourselves, अरे मैं पूरा, मेरा कुछ कीमत है ही नहीं, मैं पूरा, मैं कुछ कीमत है ही नहीं, ह्यूमिलिटी इज़ नॉट दैट, इट इज़ अबाउट वैल्युइंग समथिंग बिगर देन ऑवरसेल्वेस, कि मुझसे, मेरा, मुझसे बड़ी कोई चीज़ है, और वो महत्वपूर्ण है, और वो जो मेरी ज़िम्मेदारी है, मेरी सेवा है, जो भी है, वो मुझसे ज़्यादा महत्वपूर्ण है, तो अगर मेरी सेवा के लिए कुछ ज़रूरी है, जैसे मैं कौन सा बिग थिंग है, और कौन सा थिंग है। तो, नम्रता मतलब क्या है, कि मुझसे बड़ी मेरी सेवा सेंटिमेंट्स वर्क फॉर मी, मुझसे बड़ी मेरी सेवा रहा है, मुझसे मेरी गोल्स है। सेवा है, अभी प्रभुपाद जी जो थे भारत में थे, भारत से अमेरिका में गए, तो भारत में ये दीपें उनको अनुयायी नहीं मिल रहे थे, पर बहुत लोग एक साधु के रूप में उनका आदर करते थे, किसी भी वो दिल्ली में जब आते थे, तो कोई बड़े-बड़े वैस्ट लोग देते थे, रहने की जगह देते थे, आदर करते थे। प्रभुपाद जी यहां से अमेरिका में गए, तो अमेरिका में कोई उनका आदर नहीं करता था, जो हिप्पी लोग थे उनको तो क्या अजीब व्यक्ति आ गया है कोई, प्रभुपाद जी के साथ कुछ अनुयायी भी बन गए, पर क्या देखा प्रभुपाद जी नहीं, यहां पे अमेरिका में जो लोग हैं, वो सेवा के में इंटरेस्टेड हैं, वो शास्त्र सुनना चाहते हैं, शास्त्र समझना चाहते हैं, तो प्रभुपाद जी एक तरह से जहां पे उनको एक कल्चरल रिस्पेक्ट था, वो जगह को छोड़… प्रभुपाद जी नहीं, यहां पे अमेरिका में जो लोग हैं, वो सेवा के में इंटरेस्टेड हैं, वो शास्त्र सुनना चाहते हैं, शास्त्र समझना चाहते हैं तो उनको आदर मिलेगा, तो लोग उनके संदेश को और गंभीरता से लेंगे, तो सर्विस के लिए प्रभुपाद जी डिसरिस्पेक्ट भी स्वीकार कर रहे थे, और सर्विस के लिए प्रभुपाद जी रिस्पेक्ट भी मांग रहे थे, तो क्या है, bigger than us is our service, तो हमें जो सेवा है, हमारी जो ज़िम्मेदारी है, तो वो हमें करने के लिए स्पेस मिलना चाहिए, जो हमारे लिए बिग थिंग है, अगर वो हमें करने के लिए स्पेस नहीं मिल रहा है, तो उसका मतलब, तो वो स्वीकार करना ये नम्रता नहीं है, that is not humility, that is जो महान भक्त होते हैं, कोई पैसिव नहीं होते हैं। हमारी सेवा पर ज़ोर देंगे। तो फिर क्या करना है, क्या नहीं करना है, हम उसका फैसला कर सकते हैं। हम किसी अथॉरिटी होते हैं, लीडर होते हैं, किस तरह पर फॉलोवर होते हैं, तो क्या हम कभी अपनी अथॉरिटी को क्वेश्चन कर सकते हैं? कोई टेंपल काउंसिल होता है, फिर टेंपल मैनेजमेंट काउंसिल होता है वैसे वो गवर्निंग बॉडी GBC होता है। तो क्या हम अपनी GBC को as what they are daily स्थायी कुछ कार्य कर रहे हैं, क्या हम क्वेश्चन कर सकते हैं? तो कभी-कभी क्या होता है? वो समझेंगे, हमारे कंसर्न समझेंगे, वो समझाएंगे, कभी-कभी हमें नहीं समझाएंगे, तो हमें डिसाइड करना है कि ये मेरे लिए कितना महत्वपूर्ण है, इसके बारे में मैं क्या कर सकता हूँ? सो, आस्किंग क्लेरिफिकेशन ये एक चीज़ है, पर पब्लिकली तो वो करना अच्छा नहीं है, सो, अब इसके लिए मेडिएशन और अल्टरनेटिव कॉन्फ्लिक्ट रेसोल्यूशन के फोरम्स बनाए जा रहे हैं, कुछ बारे में ओंबड्समैन भी हैं, उनको हम बोल सकते हैं, तो ट्राई कर सकते हैं कि जितना हो सके we try to bring about change as non-disruptively as possible, कि बिना किसी डिसरप्शन के हम परिवर्तन बनाने का प्रयास कर सकते हैं। तो अभी जो इंस्टीट्यूशनल डायनेमिक्स होते हैं, कभी किसी ने कुछ गलत किया है, फिर भी वो पावर में है, उसको निकाला नहीं गया है, कुछ हो नहीं रहा है, वो सिर्फ एक ऐसा स्टेटमेंट आ रहा है कि कमेटी में है, हमें प्रभुपाद जी से पूछा गया था, प्रभुपाद जी बोले don’t expect utopia, कि जगत जो है या आदर्श नहीं है, तो अगर कुछ हुआ है जो गलत हुआ है, हमको लगता है गलत हुआ है, अगर हमें चेंज करने की सामर्थ्य है कि हम चेंज कर सकते हैं, चेंज करने की सामर्थ्य है, नहीं है हमें, तो don’t get your mind into that, कि we have come to the International Society for Krishna Consciousness, किस लिए आये हम? किस लिए आये हम? सुन्दर मंदिर होता है सत्संग होता है कीर्तन होता है, तो हमें व्यवसायात्मिका बुद्धिम एकै कुरु नंदन रहना है, हमारा उद्देश्य क्या है? स्पष्ट है। तो अगर इस्कॉन में ये हुआ, वो हुआ, तो वो लेकिन हम बोल सकते हैं कि मैं यहाँ पे कृष्ण भावना करने आया हूँ और यह करने में मुझे यहाँ पे सपोर्ट मिल रहा है, सुविधा मिल रहा है इसलिए मैं यह कर रहा हूँ, तो बाकी सब कुछ जो हो रहा है, ऐसे नहीं है कि हमको इस्कॉन का एक अनक्रिटिकल डिफेंडर बनना है, वो ब्लाइंड फॉलोइंग हो जाएगा, पर जब ब्लाइंड फॉलोइंग नहीं करना है, क्या इस्कॉन में कुछ गलत हो सकता है, दुरुस्त हो सकता है, हम सबबद्ध जीव हैं औरबद्ध जीव हम हमारे अनर्थों से डील करते हुए भक्ति करने का प्रयास कर रहे हैं, तो समस्या आती है, समस्या का हल भी निकलता है, कभी जल्दी होता है, कभी-कभी समय लगता है, पर don’t let जो इंस्टीट्यूशन में हो रहा है उससे हमारे कृष्ण भावना में व्यत्यय नहीं आना चाहिए। कृष्ण कहते हैं पर कृष्ण ने राधारानी से प्रॉपर्ली विवाह नहीं किया, आता है वृंदावन एक लीला का सेंटर है, उसमें भी जीवों को समय बताते हैं कि कृष्ण वापस जाते हैं वृंदावन में और फिर वो विवाह करते हैं, अलग-अलग कहानियां हैं, कैसे राधारानी का कृष्ण के लिए विवाह हुआ है, वृंदावन में विवाह हुआ है, ब्रह्मा जी ने किया है कहानियां हैं, पर जो यदाचरति श्रेष्ठ है, वो द्वारका कृष्ण के लिए है, वृंदावन कृष्ण के लिए नहीं है, तो अगर हमारे जीव के सीमित दुश्चिंत देखेंगे, तो कभी-कभी हमें अनुचित कार्य करने पड़ते हैं धर्म की स्थापना करने के लिए, पर भगवान तो सर्वशक्तिमान हैं, उन्हें अनुचित मार्ग का इस्तेमाल क्यों करना पड़ता है? धर्म के सर्वशक्तिमान के लिए कैसे है कि जब भगवान इस जगत में आते हैं, तो वो अधिकांश रूप से अपना जो दिव्यत्व है, अपना जो ओमनीपोटेंस है, वो नहीं दिखाते हैं, कभी-कभी दिखाते हैं, कभी-कभी नहीं दिखाते हैं। अभी जब मुझे राम लीला एक बार बता रहा था तो एक भक्त सवाल पूछा कि जब मारीच ने चिल्लाया हे लक्ष्मण हे सीता, तो पूरी राम ने क्यों नहीं चिल्लाया, तो भी मैं, मैं नहीं हूँ, ये मारीच का आवाज़ है, सारी समस्या हल हो जाता था, तो तभी क्या हुआ था? वास्तव में अगर हम देखते हैं कि भगवान जो है वो पूरे दिव्य स्तर पे हैं, भगवान जो है राम है वो ओमनीपोटेंट है, पर राम जो है वो नर लीला कर रहे हैं, वो मानव के रूप में है, तो अभी क्या होता है, जो मानवों से देवता और असुर दोनों मानवों से उनका स्ट्रेंथ ज़्यादा होता है, तो शारीरिक स्ट्रेंथ पर स्ट्रेंथ ज़्यादा होता है, तो इसलिए जो मारीच का आवाज़ था वो पूरे जी राम के आवाज़ से बहुत ज़्यादा था, तो अभी कह सकते हैं, परोक्षे राम तो सर्वज्ञ हैं, तो तो फिर भगवान हमेशा अपना ओमनीपोटेंसी शेयर कर नहीं हैं, और फिर एक और महत्वपूर्ण कार्य है, कब भगवान अपने भगवत्त्व का दे सकते हैं और कब भगवान हमारे लिए एक आदर्श प्रस्तावित कर रहे हैं। तो वाल्मीकि रामायण जो है उसमें पुरुषोत्तम रामचंद्र जो है उनके भगवत्त्व पे ज़्यादा ज़ोर नहीं दिया गया है, वाल्मीकि जो बाकी रामायण बाद में आई है, उसमें राम कैसे भगवान हैं, उसमें ज़ोर दिया गया है, वाल्मीकि रामायण दर्शाया गया है इसे आदर्श कार्य क्या है, व्यवहार क्या है। किवल भगवान दे है, शैली या कीज़र वेछे में जडबना तो बोलते हैं कि मेरे पास स्मार्ट फोन नहीं हो… तो मैं बना सकता हूँ उन्हें, मैं स्मार्ट फोन नहीं होता हो, उतने सिफरताद जीवाग मैं स्मार्ट फोन होता है, तो फिर क्या क्या है, बुब्बा कुछ खेलने की वक्त न बीच वो बेचने की। कृष्ण लीला के बाड़ियों पे महाभारत नहीं है, पांडव हीरो है। जो कृष्णा व्रज लीला में हीरो है। यहाँ पे ऑफकोर्स कृष्णा अल्टीमेट हीरो ही है, पर महाभारत में कृष्णा क्या कर रहे हैं? पांडव जो हीरो है, उनकी मदद कर रहे हैं। तो जो पांडव हैं, वो भगवान नहीं हैं। पूरी भगवत गीता जो है भगवान ने विश्वरूप दर्शन दिखा रहा है, कैसे कौरवों का विनाश हुआ दिखा रहा है, उसके बारे में अर्जुन ने कहा तुमने दिखा दिया, वो तुम भी कर दो ना अभी मुझे क्यों कुछ बोल रहे हो? नहीं, वो चाहती थी कि अर्जुन करे वो कार्य। तो अभी भगवद्गीता की बताने की इच्छा जो है कि हम ज़िम्मेदारी लें और हमें जो लिमिटेशन्स में ही कार्य करना पड़ता है हम सबको, तो सर्वधर्मान् परित्यज्य का अर्थ क्या है? इसके लगभग बारह अर्थ हैं, तो अभी मैं दो अर्थ सिम्पली बता देता हूँ, जो हमारे संदर्भ में है कि अर्जुन जो था, उसको कुलधर्म और क्षत्रिय धर्म इन दोनों में उसको कन्फ्यूज़ हो रहा था, तो भगवान ने बड़े विस्तार रूप से विष्टीरशन किया और फिर भी अर्जुन स्पष्ट नहीं था, तो भगवान ने कहा सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज, तो मेरा यह धर्म है, वो धर्म है, मेरा यह कर्तव्य यह है, कर्तव्य यह है, तुम इससे चिंता मत करो, जो मैं बोल रहा हूँ, वो तुम करो। तो अभी कैसे है कि अगर कोई सॉफ्टवेयर कंपनी में काम करता है और दो टीम्स में है वो, इस टीम में भी इस टीम में है, अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः… करिष्ये वचनं तव। बोल नहीं रहे हैं, करिष्ये वचनं तव। वहाँ पर अर्जुन का युद्ध करना यह वचन है, वो सत्य है, पर वो ऐसे नहीं है कि वो उसका ही ज़ोर था, उसका क्या है कि वो, मतलब भगवद्गीता का संदेश युद्ध करना नहीं है, भगवान के संदेश क्या है, कि भगवान के इच्छा के अनुसार हमें कार्य करना है। तो अभी हमारे परिस्थिति, तो सर्वधर्मान् परित्यज्य क्या है कि अर्जुन क्षत्रिय के रूप में कार्य करते हैं, पर वो खुद को क्षत्रिय आइडेंटिफ़ाई कर नहीं कार्य करते हैं, वो आइडेंटिफ़ाई करते हैं कि मैं भगवान का अंश हूँ, भगवान चाहते हैं धर्म स्थापना करनी है, इसलिए मैं युद्ध करूँ उनके लिए, पराधर्म का पालन करना है, उस परिस्थिति में पराधर्म क्या है, वो क्षत्रिय धर्म के द्वारा होता है, तो ये एक अर्थ है, ये एक तरह से कॉन्टेक्चुअल अर्थ है अर्जुन के लिए। अब हमारे लिए क्या अर्थ है कि जब हमें धर्म संमोह होता है, जैसे बताया था कि ये करना है, ये करना है, क्या करना है, क्या नहीं करना है, तो जब ऐसे धर्म संमोह होता है, तो हमें क्या करना है? हमें देखना है कि इस परिस्थिति में मैं भगवान की सेवा कैसे कर सकता हूँ? तो हमें ऑफिस में काम करना है, हमारे घर में कुछ ज़िम्मेदारी है, मंदिर में कुछ सेवा है, तो हमें क्या करना है उस समय में, तो “अनुकूलस्य क्रेन संकल्पः प्रतिकूलस्य वर्जनम्”, तो हमें कृष्णा के लिए करना है और कृष्णा की सेवा मैं कैसे कर सकता हूँ? कभी मंदिर में आके सेवा कर सकता हूँ, कभी ऐसे है कि मेरा जॉब में है, जॉब में ज़िम्मेदार रहूँगा, तो उससे मेरा पोजीशन होगा, मेरा फाइनेंशियल सिक्योरिटी ज़्यादा होगा, तो उससे मैं सेवा कर सकता हूँ। तो अभी हम भक्तों का मार्गदर्शन ले सकते हैं, पर उसके साथ-साथ हमारी बुद्धि का विकास करना है कि किस तरह से भक्ति जो हमें करनी है, दो चीज़ें हैं, भक्ति कई बार हमें सीरियसली करनी हैं बोलते हैं, सत्य है, पर भक्ति हमें सीरियसली और सस्टेनेबली करनी है। सीरियसली मैं कर सकता हूँ, आज कर सकता हूँ, पर मुझे भक्ति करनी है, इसलिए मैं जॉब छोड़ के चला आता हूँ, तो मैं आज जॉब छोड़ता हूँ, कल जॉब मुझे छोड़ देता है, फिर मैं भक्ति कैसे कर पाँगा? तो हमें सीरियसली और सस्टेनेबली भक्ति करनी है, तो उसके लिए हमें भक्तों का मार्गदर्शन ले सकते हैं, उसके बाद में, पर गीता का उद्देश्य क्या है कि हमारी सद्बुद्धि जो है उसको विकसित करें, ताकि हम जो फैसला है कर सकें। तो भगवान जब सर्वधर्मान् परित्यज्य कहते हैं अर्जुन से, तो हम कह रहे हैं कि धर्म अर्जुन का जो मोह था, मैं कहा था, मैं बोस्टन में था, वहाँ पे एक गीता जयंती के साथ एक प्रोग्राम था, और वहाँ पे ये हिंदू प्रोग्राम था, भक्तों का नहीं था, अर्जुन का जो मोह था, मैं कहा था, मैं बोस्टन में था, वहाँ पे एक गीता जयंती, इसकॉन के भक्तों का नहीं था, वहाँ पे जो बुलाया था, तो वहाँ पे जो बच्चे गीता, कुछ बच्चे गीता के श्लोक के साथ कर रहे थे, जब वे 18.66 पे आ गए, वे साथ कर रहे लगे, सर्वधर्मान् परित्यज्य, मामेकं शरणं व्रज, मैं उनसे लेकर कोई और लोग भी अपनी भगवद्गीता पॉपुलैरिटी करना चाहते हैं, तो इसे एक व्यक्ति ने भगवद्गीता लिखी है, उसका नाम है ‘भगवद्गीता एज इट इज़’, उसका क्या तर्क है, कि कृष्ण धर्म को स्थापना के लिए आए हैं, कि कृष्ण कैसे बोल सकते हैं, धर्म को स्थापना के लिए आए हैं, कि कृष्ण धर्म को स्थापना के लिए आए हैं, कि कृष्ण धर्म को स्थापना के लिए आए हैं, कि कृष्ण कैसे बोल सकते हैं, धर्म को स्थापना के लिए आए हैं, कृष्ण कैसे बोल सकते हैं, धर्म को स्थापना के लिए आए हैंLecture Summary
पूर्वा जन्म और परिस्थितिजन्य स्थितियाँ (Conditioning)
सेल्फ डाउट्स (Self-Doubts) से कैसे उबरें?
ह्यूमिलिटी (नम्रता) और सेवा का वास्तविक अर्थ
संस्थागत जीवन और चुनौतियाँ
महाभारत, राम लीला और भगवान की लीलाएँ
‘सर्वधर्मान् परित्यज्य’ का वास्तविक संदेश
Full Transcription
जन्मजात और परिस्थितिजन्य स्थितियाँसेल्फ डाउट्स से कैसे उबरें?
दृष्टिकोण और सेवा का महत्व
संस्थागत गतिशीलता और संस्थागत जीवन
महाभारत और भगवद्गीता का मूल संदेश