Hindi QA_ Science, Spirituality, Oppenheimer movie, Bhagavad-Gita in daily life
Podcast:
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Lecture Summary
1. विज्ञान और अध्यात्म का संबंध विज्ञान भौतिक जगत के कारणों की खोज करता है, जबकि अध्यात्म जीवन के सर्वोच्च उद्देश्य को समझाता है। सृष्टि के नियम ‘बाय चांस’ (by chance) नहीं चलते। महान वैज्ञानिक सृष्टि के उन्हीं नियमों को समझने का प्रयास करते हैं, जो वास्तव में ईश्वर द्वारा बनाई गई पूर्ण व्यवस्था (ॐ पूर्णमदः) का ही हिस्सा हैं।
2. ओपेनहाइमर और भगवद्गीता परमाणु बम के विनाशकारी प्रभाव को देखकर वैज्ञानिक रॉबर्ट ओपेनहाइमर ने भगवद्गीता के 11वें अध्याय का श्लोक (“कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो” – मैं काल हूँ, लोकों का विनाश करने के लिए) उद्धृत किया था। उन्होंने उस अद्वितीय और भयंकर विनाशक शक्ति की तुलना भगवान के काल रूप (विश्वरूप) से की थी।
3. हॉलीवुड फिल्म में गीता का अनुचित दृश्य फिल्म के एक अंतरंग दृश्य में भगवद्गीता का उपयोग करना पूरी तरह से अनुचित, असंवेदनशील और भ्रामक था। यह संभवतः निर्देशकों के अज्ञान या अक्षमता (incompetence) का परिणाम है, न कि जानबूझकर की गई घृणा का। भारत में रिलीज़ होने से पहले भारतीय सेंसर बोर्ड को इस पर अधिक सतर्कता बरतनी चाहिए थी। भक्तों को इससे उत्तेजित होने के बजाय भगवद्गीता के सही ज्ञान का आचरण और प्रचार करना चाहिए।
4. नास्तिकता अवैज्ञानिक है कोई भी विज्ञान यह सिद्ध नहीं कर सकता कि भगवान का अस्तित्व नहीं है, क्योंकि ईश्वर विज्ञान की सीमा से परे हैं। ब्रह्मांड में मौजूद अचूक संतुलन, ऋतुचक्र और सटीक नियम (जैसे पृथ्वी और सूर्य की सटीक दूरी, ऑक्सीजन का स्तर आदि) यह स्पष्ट प्रमाणित करते हैं कि इस सृष्टि के पीछे किसी परम बुद्धिमान सत्ता (Creator) की योजना है।
5. व्यावहारिक जीवन में भक्ति (प्रश्नोत्तर)
- मानसिक शांति और जप: भगवान का नाम कभी ‘पेनकिलर’ (तुरंत शांति देने वाले कीर्तन) और कभी ‘एंटीबायोटिक’ (जड़ से एंग्जायटी मिटाने वाले निरंतर मंत्र जप) के रूप में कार्य करता है। दोनों ही आध्यात्मिक उपचार के लिए आवश्यक हैं।
- भक्ति में पारिवारिक विरोध: माता-पिता बच्चों की भलाई और भविष्य को लेकर चिंतित रहते हैं। यदि वे भक्ति का विरोध करते हैं, तो बहस न करें। अपनी पढ़ाई या सांसारिक जिम्मेदारियों को इतने अच्छे से निभाएं कि उनका भरोसा जीते जा सके और दूसरों को विचलित किए बिना शांतिपूर्ण ढंग से अपनी आध्यात्मिक यात्रा जारी रखें।
Full Transcription
अध्यात्म और विज्ञान का अंतर्संबंध
हरे कृष्णा, मेरा प्रिविलेज है कि मैं आप सब के साथ हूँ आज, और आप काफी समय से काफी कंटेंपरेरी (contemporary) टॉपिक्स पे आप चर्चा कर रहे हैं जो लोगों को प्रभावित करते हैं। जहाँ तक मैं प्रिविलेज पे प्रकाश डालना चाहता हूँ, तो कई प्रश्न करेंगे आज, अच्छा जो विषय है उस पे चर्चा करने के बाद। तो सबसे पहले तो ये चाहूंगा कि क्या जो अध्यात्म है, जो हम ज्ञान की बात करते हैं और विज्ञान की बात करते हैं, अध्यात्म और विज्ञान कितना जुड़ा हुआ है? और क्या इसमें इंटर-एलिमेंट्स (inter-elements) हैं? किस प्रकार से हम इसमें समानता देख सकते हैं और किस प्रकार से हम दोनों को जोड़ कर देख सकते हैं? उससे आज के कार्यक्रम की शुरुआत चाहूंगा।
प्रभु, अर्जुन जब विज्ञान और अध्यात्म की बात करते हैं, तो दोनों की एक जगह है और दोनों एक तरह से मानवों के लिए महत्वपूर्ण हैं। हमारी वैदिक संस्कृति में आयुर्वेद है। अब ये आयुर्वेद एक विज्ञान है और विज्ञान मतलब क्या है? अधिकांश रूप से वह ‘It looks for natural explanation’ है, ये आयुर्वेद में भी है। अगर किसी का पेट बिगड़ गया है, तो ऐसे नहीं कहते हैं कि भगवान तुम पर नाराज हैं इसलिए पेट बिगड़ गया है। आयुर्वेद में वैज्ञानिक कहते हैं कि भौतिक क्या समस्या है।
तो विज्ञान क्या करता है? जो जगत में हो रहा है उसका भौतिक कारण क्या है, ये खोजना जरूरी है, ये विज्ञान सोचता है। और हाँ, भौतिक कारण महत्वपूर्ण है, जहां तक ढूंढ सकते हैं ढूंढना चाहिए। पर इस जगत में भौतिक तत्व के अलावा और कुछ भी है? और क्या महत्वपूर्ण है? What matters? सबसे महत्वपूर्ण क्या है, उससे और कम महत्वपूर्ण क्या है, ये समझना अध्यात्म की जगह है। तो दोनों के लिए महत्वपूर्ण जगह है। विज्ञान प्रगति करते हैं, लेकिन अगर उसमें हम आध्यात्मिकता को जोड़ देते हैं, तो कहीं न कहीं वो जो संशोधन का जो एक क्रिएटिविटी (creativity), जो क्यूरियोसिटी (curiosity) होता है जानने का, वो कहीं न कहीं रुक जाता है। अगर हम यह सोच लें कि हाँ, यह तो सब भगवान की इच्छा से होता है और भगवान की रचना है और भगवान की प्रकृति जो अपने दृष्टि से यह सब संचालन करती है, तो वहाँ पे कहीं न कहीं रुकावट आती है। तो क्या आप समझते हैं कि उससे लाभ होगा या उसको थोड़ा सा दूर रखकर ही हम विज्ञान की तरफ आगे बढ़ सकते हैं?
न्यूटन का सेब और सृष्टि के नियम
मैं अभी कुछ समय पहले चार महीना वेस्ट (West) में था, तो एक महीना इंग्लैंड में था। एक दिन जब कैम्ब्रिज (Cambridge) में मैं गया था, वहाँ पे We passed by the tree, उसी ट्री के बाजू से गए जो कहते हैं कि उस पेड़ के नीचे बैठकर न्यूटन बैठा था, तब उसके सिर पे एक एप्पल (Apple) गिर गया। और तभी उसने विचार करते हुए गुरुत्वाकर्षण का प्रस्ताव निकाला, थ्योरी प्रपोज (Theory propose) किया, डिस्कवर किया प्रिंसिपल। अभी वो जो पेड़ है, उसको वैज्ञानिक वालों के लिए एक तीर्थ क्षेत्र मानते हैं और फिर वो वहाँ पे न्यूटन का गुणगान करते हैं।
अभी जब न्यूटन के सिर के ऊपर वो पेड़ से फल पड़ा, न्यूटन ये मानते थे कि भगवान का अस्तित्व है। और जब पेड़ पे फल गिरा, ये फल क्यों गिरा? तभी वो ये नहीं सोचते थे कि ये भगवान की इच्छा से गिरा। ठीक है, भगवान की इच्छा से गिरा है, पर क्या पद्धति है, क्या प्रक्रिया है, क्या मटेरियल मैकेनिज्म (material mechanism) है जिससे वो गिरा? अगर वो भगवान को नहीं मानते थे, तो कहते, ‘ये तो अपने आप यहां पर गिर गया, ये by chance गिर गया, ये कुछ आर्डर (order) नहीं है इसमें।’ विज्ञान जो है, वो देखता है कि ये निसर्ग किस नियम से चल रहा है।
अब हम सोच रहे हैं, निसर्ग किस नियम से चल रहा है, इस खोज के लिए क्या ज़रूरी है? यह मानना कि निसर्ग किन्हीं नियमों से चलता है। और निसर्ग अगर chance से चल रहा होता, तो नियम को खोजने की कोई संभावना ही नहीं होती, विचार ही नहीं आता। तो इसलिए: “ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदम्” जब हम समझते हैं कि भगवान पूर्ण हैं और भगवान ने जो सृष्टि बनाई है वह भी पूर्ण है। जब पूर्ण है मतलब क्या है, कि इसमें अपनी अंतरचना है, जिससे इसमें अपनी प्रक्रिया है, इसके अपने-अपने सिस्टम्स (systems) हैं, मैकेनिज्म्स (mechanisms) हैं, जिससे ये कार्य करती है। और वो मैकेनिज्म्स को खोजने की उत्सुकता और बढ़ जाती है हमारी।
मान लीजिए एक सिंपल उदाहरण है कि, अगर कोई क्रॉसवर्ड पजल (crossword puzzle) है, अगर हमको क्रॉसवर्ड पजल सॉल्व (solve) करना है, तो सबसे पहले हमें यह विश्वास होना चाहिए, कि यह सिर्फ कुछ ऐसे ही यहाँ पर कुछ लेटर्स (letters) नहीं लिखे हुए हैं, किसी ने दिमाग से लेटर्स लिखे हैं, और उसमें से कौन से शब्द निकलते हैं, मुझे वो अक्षरों से शब्द ढूंढना है। मतलब क्या है, अगर मुझे सॉल्व करने की इच्छा ही नहीं होगी, विचार भी नहीं आएगा, अगर मुझे लग रहा है कि इसमें बिना किसी गुण की… कोई योजना ही नहीं है। तो विज्ञान, एक तरह से वादी जीत की पड़ताल… यह जीत की पड़ताल के लिए प्रयास कर रहा है। इस प्रकार योजनाएं हैं, सिद्धांत हैं, उसके नियम बनाए हैं। तो उसके नियम के लिए हमें प्रयास करना है।
तो विज्ञान, जैसे आपने उदाहरण दिया एप्पल का, तो वो एप्पल इसके पहले भी अगर गिरता तो वो जमीन पर ही गिरता। मतलब वो गुरुत्वाकर्षण का जो सिद्धांत था, जो प्रिंसिपल्स हैं, वो पहले भी था। तो आप जो सही बता रहे हैं, कि किस प्रकार से जो वैज्ञानिक होते हैं, वो उसमें संशोधन करके ये जानने का प्रयास करते हैं, कि किस प्रकार से कार्य कर रहा है। उसमें कोई नई खोज नहीं की जाती है, बल्कि जो भगवान ने ऑलरेडी (already) बनाया हुआ है, उनके संचालन की जो योजना है, उसको समझने का प्रयास किया जाता है विज्ञान की दृष्टि से। जैसे वैज्ञानिक की बात आती है, तो वास्तव में, अभी आपने जो बताया, उसके हिसाब से हम यह समझ पाए कि वैज्ञानिक वही है जो उसमें संशोधन करे और भगवान के बनाए हुए नियमों को समझने का प्रयास करे।
ओपेनहाइमर (Oppenheimer) और भगवद्गीता
तो जैसे अब हम लोग आज का जो टॉपिक है उसके बारे में थोड़ा सा चर्चा करेंगे कि आज का जो टॉपिक है उसमें ओपेनहाइमर (Oppenheimer) जो मूवीज आया है उसमें भगवद्गीता को कोट (quote) किया गया है। तो पहले तो मैं जानना चाहूंगा कि जो साइंटिस्ट है जो एटम बॉम्ब (Atom Bomb) जिसको बनाया और जिसके बारे में ये प्रचलित है कि हाँ, उनके कारण ही बनाया फिर उनको टेस्ट (test) किया। तो वास्तव में व्यक्ति कौन है, उसके बारे में छोटा सा परिचय देंगे, तो फिर उसके बारे में हम उससे जुड़े हुए प्रश्नों पे जाएंगे।
एक पॉइंट मैं बोलना चाहूँगा सबसे पहले। तीन चीजें हैं – थीस्टिक (Theistic – आस्तिक), दूसरा है नास्तिक (Atheistic), और बीच में है नॉन-थीस्टिक (Non-theistic)। नॉन-थीस्टिक मतलब वो भगवान के बारे में विचार नहीं करते हैं। तो टेक्निकली (Technically) जब विज्ञान फंक्शन (function) करते हैं तो साइंटिस्ट्स आर फंक्शनली नॉन-थीस्टिक (Scientists are functionally non-theistic)। जो व्यवहारिक करते हैं, तो भगवान हैं या नहीं हैं, ये उनके लिए तभी रेलेवेंट (relevant) नहीं है। जब एक डॉक्टर है, वो किसी को इन्वेस्टिगेट (investigate) कर रहा है कि आपको क्या खराबी है, अगर कोई मैकेनिक है वो देखे कार में क्या प्रॉब्लम है, कोई इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियर अगर कंप्यूटर को देख रहा है, कोई नहीं सोचा कि मटेरियल मैकेनिज्म क्या है। अगर भगवान की इच्छा से ये कंप्यूटर खराब हो गया, तो भगवान से प्रार्थना करो कंप्यूटर ठीक हो जाएगा, ऐसा भाव नहीं है।
शास्त्रों में भी कैसे बताया है कि भगवान ने सृष्टि बनाई है। ‘ॐ पूर्णमदः’ तो हर चीज में ऐसा नहीं है कि हम भगवान का स्मरण कर सकते हैं। पर हम जब पहली बार लंदन में रथयात्रा हुई थी, तो वो लंदन के भक्तों ने बहुत बड़ा रथ बना दिया पर रथ के पहिये उतने बड़े नहीं बनाये और फिर क्या हो गया? रथ कोलैप्स (collapse) हो गया, गिर गया। वो बड़े नाराज हो गए वो भक्त, और उन्होंने प्रभुपाद जी को खत लिखा कि प्रभुपाद जी, क्या हमारी भौतिक भक्ति के कारण, पुअर डिवोशन (Poor devotion) हमारी बहुत कम दर्जे की थी, क्या उसके कारण रथ गिर गया? प्रभुपाद जी ने कहा, “रथ गिरा नॉट बिकॉज़ ऑफ़ पुअर डिवोशन (Not because of poor devotion), बट बिकॉज़ ऑफ़ पुअर इंजीनियरिंग (But because of poor engineering)। कि आपने इंजीनियरिंग सही नहीं किया है।”
तो क्या है कि वैज्ञानिक उनके संशोधन में अगर भगवान को नहीं लाते हैं तो वो गलत नहीं हैं। एक है भगवान का उल्लेख न करना, दूसरा है भगवान के अस्तित्व को ही नकारना। तो इसलिए एथीस्टिक और नॉन-एथीस्टिक इसमें अलग है। तो कुछ लोग विज्ञान इस तरह से कर सकते हैं कि विज्ञान से वो भगवान का निष्कर्ष निकाल सकते हैं। कुछ लोग ऐसे हैं कि भगवान का मुझे पता नहीं, पर मुझे क्या करना है, मुझे इसके भौतिक तत्व पर इसका विश्लेषण करना है। पर जब वो एथीस्टिक हो जाते हैं, तो तभी क्या होता है कि जो प्रमाण (evidence) नहीं है, जो पुरावा नहीं है, ऐसा निष्कर्ष वो निकाल रहे हैं। तो इसलिए वैज्ञानिक Science is a tool. अब वैज्ञानिक चश्मे के समान है। चश्मे से मैं कोई भगवान का दर्शन कर सकता हूं, चश्मे से कोई व्यक्ति कुछ और चीज को देख सकता है। कोई व्यक्ति अपने चश्मे से कुछ अचिंत्य चीज देख सकता है।
भगवद्गीता का श्लोक और विनाश का भय
अगर विध्वंस कोई मानव कर सकता है… जब ओपेनहाइमर ने यह पर्टिकुलर श्लोक कोट किया था: “कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो” उसके पास कोई और ट्रांसलेशन (translation) था: “Now I am become Death, the destroyer of worlds” (मैं काल हूँ, लोकों का विनाश करने के लिए)।
अभी ये भाव क्या है उसमें? कि एक तरह से जब अर्जुन, हम देखते हैं शुरुआत में युद्ध करने के लिए तैयार नहीं थे, क्योंकि अर्जुन सोचते थे युद्ध करेंगे तो इतना सारा विनाश होगा। भगवद्गीता, एक ऐसी परिस्थिति में बताई गई है, कि अच्छे लोगों के पास कुछ अच्छा पर्याय है ही नहीं, दो पर्याय हैं और दोनों एक तरह से बुरे ही हैं। अभी कौन सा कम बुरा है वो देखना है। युद्ध करेंगे तो उससे नुकसान होगा, पर युद्ध नहीं करेंगे, तो क्या नुकसान होगा? दुर्योधन जैसे राजा… तो राजा… कितना विनाश करेगा, कितना विध्वंस करेगा, इसकी मन कल्पना भी नहीं कर सकता है। तो युद्ध जिससे कि ऐसी हिंसा जिससे कि और हिंसा को रोक सकें।
तो जब अर्जुन ने विश्वरूप देखा, तो दो प्रकार के अर्जुन के मन में विचार आते हैं। पहले जब देखते हैं वो, अभी विश्वरूप दर्शन जो है ग्यारहवें अध्याय में बताया गया है, पर ग्यारहवें अध्याय में पंद्रहवें श्लोक से लगभग 31-32 श्लोक तक अर्जुन अपना वर्णन करते हैं। तो जब पहले विश्वरूप दिखाते हैं उनको, तो अर्जुन का भाव होता है: “विस्मितोऽस्मि” (यह क्या अद्भुत दृश्य है)। पर विस्मय से धीरे-धीरे जब अर्जुन देखते हैं, तो क्या होते हैं, कि इस विश्वरूप के मुँह से अग्नि आ रही है, सारे योद्धा उसके मुँह में जा रहे हैं, तो वो विस्मय से भय होने लगता है। इंग्लिश में ऑ (Awe) एक शब्द होता है, मतलब हमसे कोई बड़ी शक्ति दिख जाती है, तो उससे हम एक अनुभव करते हैं। ऑ (Awe) से दो शब्द आते हैं, एक है ऑसम (Awesome), और दूसरा है ऑफुल (Awful)। तो अर्जुन का स्थायी भाव होता है, कि ये विश्वरूप कितना विशाल है, कितना महान है, ये विस्मय की बात है। और जो विश्वरूप जो विध्वंस कर रहा है, वो इतना भयावह है, कि अर्जुन भी कांपने लगते हैं।
तो उस अच्छी तरह सवाल है एक तरह से, क्योंकि अर्जुन ने पहले ही बोला है कि आप विश्वरूप हो। अभी साधारणतः ऐसा होता है कि जब कृष्ण और अर्जुन बात कर रहे हैं, तो अर्जुन के सामने कृष्ण हैं। पर जब कृष्ण कहते हैं, “अभी मैं दिखाता हूँ, मैं तुमको आंखें देता हूँ विश्वरूप दिखाने के लिए”, तभी क्या होता है कृष्ण अदृश्य हो जाते हैं। तो अर्जुन को सिर्फ विश्वरूप दिख रहा है, तो ऐसे में अर्जुन के पास कृष्ण नहीं हैं पूछने के लिए वो कौन हैं। वो विश्वरूप, उसके पहले भगवान ने काल रूप नहीं दिखाया है। भगवान ने दुर्योधन को दिखाया था, यशोदा माई को दिखाया था, पर काल रूप मतलब क्या, वो भगवान का वो रूप जो विध्वंस करता है। तो ऐसा रूप भगवान ने पहले कभी नहीं दिखाया है।
मान लीजिए हमारा कोई मित्र है, बचपन से हमें जानता है, बड़ा मधुर स्वभाव का है, बड़ा मधुर बोलता है, बड़े अच्छे कार्य करता है। और एक सालों के बाद हम उससे मिलते हैं, हम टहलने के लिए मॉर्निंग वॉक पर जा रहे हैं, बातचीत चल रही है, और अचानक कोई दस गुंडे हम पर हमला कर देते हैं। और एकाएक हमारा जो मित्र है कोई मार्शल आर्ट्स मूव्स (Martial arts moves) दिखाते हैं। वो ग्यारहवें अध्याय के 31वें श्लोक में पूछते हैं कि, “मैं तो विश्वरूप जानता हूँ, विश्वरूप बड़ा दिव्य है, पर यहां तो भयावह है, तो यह भयावह रूप जो है यह क्या है?”
तो उसके जवाब में भगवान कहते हैं कि: “कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो” कि मैं काल हूँ, तो मैं यहां पे जो सारे लोक हैं उनका विनाश करने के लिए आया हूँ। तो यह भगवद्गीता का संदर्भ है श्लोक का।
तो अभी जब ‘कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो’ ओपेनहाइमर बताते हैं, तो एक तरह से ओपेनहाइमर का भी वही द्वंद्व था। ओपेनहाइमर जानते थे कि सारे वैज्ञानिक उस समय जो थे, काफी लोगों में एक तरह से द्वंद्व था कि अगर यह हम अस्त्र बनाएंगे तो ऐसा विनाश होगा जो कभी हुआ नहीं है। तो क्या यह अस्त्र बनाना चाहिए, नहीं बनाना चाहिए? और फिर अगर यह हम अस्त्र बनाते हैं तो उसका कैसे उपयोग होगा? क्या उसके लिए हम जिम्मेदार हैं, हम जिम्मेदार नहीं हैं? तो यह जो सवाल थे, तो एक तरह से जब यह टेस्ट सही हो गया कि अरे बाप रे! इससे क्या होने वाला है अभी! तो जब वो एटम बॉम्ब की शक्ति को देखा, उसके विनाश करने की क्षमता को देखा, तभी एक तरह से जो अर्जुन ने वचन बोले थे कि ‘अभी यह भगवान ही यहाँ पर आए हैं यह विश्व का संहार करने के लिए’, तो यह एटम बॉम्ब की शक्ति है, वहाँ एक तरह से भगवान जैसी अद्वितीय शक्ति की स्मरण देती है। तो इसलिए ओपेनहाइमर ने तभी वो कोट किया था कि यह जो शक्ति सूझ रही है, गॉड-लाइक पावर (God-like power), यह भगवान जैसी शक्ति है। तो इसलिए उस समय वो विचार था, भगवान ही मृत्यु बन के आए हैं विनाश करने के लिए।
जी जी, तो इस कॉन्टेक्स्ट में उनका नाम श्लोक को कोट करने की वजह से भगवद्गीता से उनका नाम जुड़ा है। और जैसे आपने पहले बताया था कि उनको भगवद्गीता पढ़ना अच्छा लगता था इसलिए वो संस्कृत सीखे ताकि वो ग्रंथों का अध्ययन कर सकें। बाद में भगवद्गीता से कनेक्शन काफी ज्यादा था। अगले प्रेसिडेंट थे अमेरिका के, आइजनहावर (Eisenhower), बाद में उनकी मृत्यु हुई तो उसके मेमोरियल सर्विस में ओपेनहाइमर ने अपने मित्रों को भगवद्गीता बांटी और जब उसके बाद में सिक्स्टीज (Sixties) में उनको पूछा गया था…
अपूर्ण ज्ञान और भगवद्गीता
दो पद्धति से देख सकते हैं। एक है कि किसी भी तरह से लोग भगवद्गीता के बारे में सुनते हैं तो अच्छा ही है क्योंकि उससे उनकी जिज्ञासा बढ़ती है। भगवद्गीता में ही बताया गया है कि चार प्रकार के लोग आध्यात्मिक होते हैं, एक है जिज्ञासु। जिज्ञासा किसी भी पद्धति से क्यों ना आ जाये वो अच्छी है। एक तरह से देखी जाये तो कई बार अगर कोई बड़े विचारवान हैं, कोई अपने-अपने कॉन्टेक्स्ट में गीता को कोट करते हैं, तो उससे लोगों में कुछ उत्साह आता है, “अच्छा ये गीता क्या है, मैं जानना चाहता हूँ”। एक तरह से वो अच्छा है।
अब प्रॉब्लम कब आता है? कि जब वही गीता का इमेज बन जाता है। अभी ‘कर्म ही पूजा है’, ये भगवद्गीता में बताया है: “स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य” (कर्म के द्वारा उनकी पूजा करो) अपने कर्म के द्वारा उस परम भगवान की पूजा करो। ‘कर्म ही पूजा है’, ये बहुत ही ओवर-सिंप्लिफाइड (over-simplified) और डिस्टॉर्टेड ट्रांसलेशन (distorted translation) है। पर अगर कोई सोचता है कि यही भगवद्गीता की शिक्षा है और इसके अलावा कुछ और नहीं है भगवद्गीता, तो बहुत प्रॉब्लम है ना। “नान्यदस्तीति वादिनः” (इसके अलावा और कुछ नहीं है) तो वो प्रॉब्लम है। अपूर्ण ज्ञान यह प्रॉब्लम नहीं है, सबको अपूर्ण ज्ञान है क्योंकि भगवद्गीता का ज्ञान तो इतना बड़ा है किसी को पूर्ण नहीं होगा। पर अगर अपूर्ण ज्ञान को पूर्ण मान लेते हैं तब वो न केवल अपूर्ण रहता है पर वो गलत हो जाता है। तो वही समस्या है कि अगर कोई गीता के एक श्लोक को लेता है और उसी को उसका सार मान लेता है, तो तभी वो समस्या आ जाती है। “मुझे और गीता पढ़ने की ज़रूरत नहीं है क्योंकि मुझे गीता पहले से पता है, गीता कहती है कर्म ही पूजा है।” वो समस्या आती है।
जैसे हम इसकी बात करते हैं, जहां पर भगवद्गीता की बात की हो, मेरे हाथ-पैर हिलना, ये आपत्ति करना नहीं है, ये अलाउड नहीं है। तो कैसे है कि जो क्रिएटिविटी (creativity) है, उसके लिमिट्स (limits) होते हैं, बाउंड्रीज (boundaries) होते हैं। तो ये बहुत डिसअपॉइंटिंग (disappointing) है एक तरह से, कि इस तरह से भगवद्गीता को जो डिपिक्ट (depict) करने की कोई जरूरत थी नहीं। आर्टिस्टिक दृष्टि से अगर उसको दिखाना है, क्या दिखाना है? एक तरह से कितना विद्वान था वो, कि ऐसा भौतिक कार्य करते हैं, मैं भी भगवद्गीता पढ़ता था। तो कहीं और दिखा सकते हैं। क्या दिखाना था? कि वो एक ऐसा व्यक्ति था कि अपने ज्ञान का बहुत अहंकार था उसको और वो ज्ञान का अहंकार का दिखावा करके वो स्त्रियों को आकर्षित कर रहा था। जो भी दिखाना है, उसको भगवद्गीता इस्तेमाल करने की क्या जरूरत थी? ये एक दृष्टिकोण है। आर्टिस्टिक पॉइंट के लिए जो गीता का जो उस मूवी में पॉइंट है, जो सार है, वो दिखाने के लिए बिल्कुल इसकी जरूरत नहीं थी।
तो अगर मान लीजिये वो एंटरटेनमेंट (entertainment) की दृष्टि से देखते हैं, कि उनको एंटरटेनमेंट के लिए थोड़े आइडल सीन जैसे कुछ डालना है, वो किसी और कॉन्टेक्स्ट में भी डाल सकते थे, वो यहाँ पर भगवद्गीता क्यों डालना है?
पाश्चात्य देशों में भारतीय ग्रंथों की धारणा
मैं 2014 से लगभग हर साल अमेरिका जाता हूँ, पाश्चात्य देशों में 6-9 महीने रहता हूँ, वहाँ पर प्रचार करता हूँ। जहां तक वहाँ की संस्कृति है, वहां के लोगों में कुछ धारणा है भारत के बारे में, और यह बड़ी दुख की बात है। योग सूत्र नहीं है, भगवद्गीता नहीं है। जो लोग योगा करते हैं वो पढ़ते हैं, भगवद्गीता जो आध्यात्मिक हैं वो पढ़ते हैं। कामसूत्र पॉपुलर है। अभी कुछ हद तक वो लोगों की धारणा है कि ‘ईस्टर्न इंडियन बुक्स जो हैं, इंडियन बुक्स आर अबाउट सेक्शुअलिटी (Eastern Indian books are about sexuality)’। अभी भारत से इतनी सारी किताबें आई हैं, उनमें से कामसूत्र एक किताब है और अगर हम हमारी ट्रेडिशन में देखते हैं, हमारे सकल वैष्णव ट्रेडिशन में, ब्रॉड वेदिक ट्रेडिशन (Broad Vedic tradition) में, कामसूत्र यह इतना महत्वपूर्ण किताब कभी नहीं रहा है।
पर कैसे है कि हर व्यक्ति की अपनी चेतना होती है, उस चेतना के अनुसार वो उस प्रकार की किताबों के लिए आकर्षित होता है। अगर किसी की बड़ी लाइब्रेरी होगी, किसी को स्पोर्ट्स में रूचि है तो लाइब्रेरी में हजारों बुक्स होंगे, वो स्पोर्ट्स मैगजीन की ओर जाएगा। किसी के मन में बहुत काम वासना है तो फिर वो ऐसे मैगजीन, ऐसे किताब देखेगा जहां पे वो उस प्रकार की इच्छाओं की पूर्ति हो सकती है। तो जिन लोग के मन में वही विचार अधिक होते हैं तो उन्होंने ईस्टर्न भारतीय ग्रंथों की लाइब्रेरी से कामसूत्र को ज़्यादा प्रोमिनेंट (prominent) किया है एक तरह से। तो इसलिए जब ये अमेरिका में दिखाया गया तो अमेरिका में किसी ने ऑब्जेक्ट (object) नहीं किया है। अधिकार स्वरूप से अमेरिका में ये जो मूवी पहले रिलीज हुई, अमेरिका में हिंदुज (Hindus) ने भी इसको ज़्यादा ऑब्जेक्ट नहीं किया है। पर जब इंडिया में आ गया तो ये एक तरह से ज़रूर ऑब्जेक्शनेबल (objectionable) है।
पर जहां तक जब भी कोई कार्य होता है गलत, तो हमें एक रेंज ऑफ़ एक्सप्लेनेशन (range of explanation) देखना चाहिए कि ये कार्य क्यों हुआ? तो तीन रीज़न्स हो सकते हैं: इग्नोरेंस (Ignorance), इनकम्पिटेंस (Incompetence) और मेलोवेलेंस (Malevolence)। इग्नोरेंस मतलब वो व्यक्ति को ज्ञान ही नहीं था। इनकम्पिटेंस मतलब वो सक्षम नहीं है, जैसे ज्ञान प्राप्त करने का प्रयास नहीं था। और मेलोवेलेंस मतलब वो व्यक्ति जान बूझके कुछ हिंसा करना चाहता था। गाड़ी का एक्सीडेंट हो गया। गाड़ी का एक्सीडेंट क्यों हो गया? क्योंकि वो गाड़ी ड्राइविंग जानता ही नहीं था (अज्ञान)। गाड़ी का एक्सीडेंट क्यों हो गया? क्योंकि वास्तव में अच्छा ड्राइवर नहीं है या उसने नशा किया है (असक्षमता)। गाड़ी का एक्सीडेंट क्यों हो गया? जान बूझके जो गाड़ी में थे उनको मारना चाहता था (घृणा)।
तीन एक्सप्लेनेशन हो सकते हैं – अज्ञान, असक्षमता और घृणा (घृणा या तिरस्कार या नफरत)। तो साधारणतया हमारे मानसिक स्वास्थ्य (mental health) के लिए, it is best to start with the least negative explanations। कि जब भी कोई गलत कार्य करता है तो सीधा हम ‘ये मुझसे नफरत करता है, ये नफरत पूर्ण व्यक्ति है’, वैसे एक्सप्लेनेशन की ओर हम जाएंगे, वैसे अर्थ की ओर जाएंगे, तो सारी दुनिया को हम बड़े ही नकारात्मक दृश्य देखने लगेंगे। तो शुरुआत कैसे करेंगे? The least offensive explanation कि ये व्यक्ति ऐसा क्यों किया? शायद अज्ञान के कारण है, शायद असक्षमता के कारण है, या वो घृणा के कारण है।
तो जहां तक ये रिसर्च हुआ है, जहां तक मैंने देखा है कि जो ये डायरेक्टर है ऐसा कोई उसका एजेंडा (agenda) है हिन्दूइज्म (Hinduism) के खिलाफ, ऐसे पिछले मूवीज से ऐसा कुछ नहीं आया है जहां तक मैंने देखा है। और फिर अभी हॉलीवुड में या बॉलीवुड में एक तरह से डिपिक्शन (depiction) हुआ करता है, तो this is to my understanding this is incompetence जो असक्षमता है, ignorance नहीं है। कोई भी ऐसे ओपेनहाइमर ने भगवद्गीता कोट किया है, तो भगवद्गीता is a book of wisdom. कैसे है कि यह भगवद्गीता की एक प्रकार से दो भूमिकाएं हैं – one is a book of wisdom, the other is a book of religion. यह दोनों अलग हैं।
Book of wisdom मतलब यह एक ज्ञान का ग्रंथ है और दूसरा है यह एक धार्मिक ग्रंथ है। अभी पाश्चात्य संस्कृति में देखेंगे तो कैसे है कि बाइबल जो है उसको Book of religion कहते हैं। पर अगर हम सुकरात (Socrates) की राइटिंग्स (writings) देखते हैं या प्लेटो (Plato) या ऐसे फिलोसोफर्स (philosophers) हैं उनकी राइटिंग्स देखते हैं तो उसको book of wisdom कहते हैं, वो holy books नहीं कहते हैं उनको, wisdom है वो, books of wisdom and books of religion (holy books)।
तो अभी पाश्चात्य देशों में जो भगवद्गीता पढ़ी जाती है अधिकांश लोग उसको more people see it as a book of wisdom than book of religion। कि वो उसको एक ज्ञान की किताब देखते हैं, धर्म की किताब नहीं देखते हैं। इसलिए अगर मान लीजिये कोई फिलोसोफिकल ग्रंथ था, कोई सुकरात की किताब है, या कोई अगर वो उस समय पढ़ रहा है और उस समय फिजिकल (physical) रिलेशनशिप कर रहा है तो वो अजीब है पर वो एक तरह से ग्रोथ डायरेक्ट (growth direct) नहीं है। तो क्या है एक तरह से इसलिए it’s incompetence. भगवद्गीता अगर वो डायरेक्टर थोड़ा रिसर्च किया होता, तो वो केवल एक ज्ञान की किताब नहीं है वो एक धर्म की किताब है। धर्म मतलब क्या है? लोगों की धार्मिक भावनाएं होती हैं उसमें। और वह काफी हर्ट (hurt) हुई हैं। और हमारे दृष्टिकोण से it’s outrageous, ये ऐसा करने की कोई जरूरत नहीं थी, बिल्कुल जरूरत नहीं थी और ये बहुत गलत किया है।
पर जैसे मैं बता रहा हूँ कि हर जगह पर किसी ने कोई गलत किया है तो ऐसे डिस्कशन निकालने की जरूरत नहीं है कि वो व्यक्ति ने हमारे प्रति नफरत था इसलिए किया है। कई लोग हो सकते हैं ऐसे नफरत के कारण कर सकते हैं पर ऐसे उस व्यक्ति के ट्रैक रिकॉर्ड (track record) में ऐसा कुछ नहीं है। तो better to not jump to that conclusions. At least क्या हुआ है कि अवेयरनेस (awareness) तो बढ़ रहा है, कि भगवद्गीता के महत्व क्या है दोनों दृष्टि से देख सकते हैं। क्योंकि उस मूवी में भगवद्गीता के बारे में बताया गया है, कुछ और जो लोग कभी भगवद्गीता पढ़ते भी नहीं थे, वो लोग अभी भगवद्गीता के बारे में जानेंगे, वो अच्छा है। और कितने लोग वो भगवद्गीता उस समय बताया गया है उसको देखके क्रोधित हो रहे हैं, अच्छा है उससे भगवद्गीता की सैंक्टिटी (sanctity) के बारे में, भगवद्गीता की पवित्रता के बारे में भी और जान बढ़ सकती है।
पर कैसे है कि basically we should not… रादर वो क्रिस्टोफर नोलन (Christopher Nolan) को दोष देने से बेहतर है, अगर दोष देना है तो भारतीय सेंसर बोर्ड (Censor Board) को दोष देना चाहिए हमको कि उन्होंने क्यों नहीं देखा ये। कि वो दो तो इंडियंस हैं उसमें, भारत में क्या अहमियत रखती है भगवद्गीता वो उनको पता है। तो उन्होंने सेंसर बोर्ड में सेंसर करना चाहिए था। तो it is unfortunate, बहुत दुर्भाग्यशाली जो हुआ है। पर हर चीज पे हमें गुस्से से जलने की जरूरत नहीं है, संदर्भ समझ के हम अगर हम रैशनली कम्युनिकेट (rationally communicate) करते हैं तो क्या है कि वो आसान है एक तरह से, तो संभव है कि हम समझा सकते हैं।
फॉल्स इक्विवेलेंस और भारतीय प्रतिक्रिया
अमेरिका में कैसे है कि एक फॉल्स इक्विवेलेंस (false equivalence) किया गया है। अमेरिका में ऐसा है कि भारत और पाकिस्तान हमेशा युद्ध करते रहते हैं और हिन्दू, मुस्लिम हमेशा युद्ध करते रहते हैं। तो मुस्लिमों का कुरान है वो युद्ध करने को बोलता है, हिन्दुओं की भगवद्गीता है वो भी युद्ध करने को बोलती है। तो क्या होता है कि अगर हम इतिहास देखते हैं, तो हिंदुइज्म युद्ध करने के लिए… भारत युद्ध करते हैं? हिंदुइज्म ने कितने हिन्दू राज्यों और दूसरे राज्यों पर आक्रमण करके उनका विनाश किया है? बहुत बहुत कम है ऐसे। पर क्या है ये फॉल्स इक्विवेलेंस है, गलत समानता की गई है। और अगर हम कहते हैं कि कुरान पे कोई कैसे करेंगे? हिम्मत नहीं करता था। अगर आप कुरान पे नहीं कर सकते हैं, अगर हम भगवद्गीता पे करेंगे तो हम भी प्रतिकार करेंगे। तो क्या कर रहे हैं हम? प्रतिकार कर रहे हैं। जो प्रतिकार कर रहे हैं तो वो लोग कहते हैं कि ये जो लोग हैं भारत, पाकिस्तान, हिन्दू, मुस्लिम वो सब फैनेटिकल (fanatical) हैं, वो सब इंटॉलरेंट (intolerant) हैं, वो सब संकीर्णवादी हैं। तो सब हर चीज़ पर हिंसा करने पर आ जाते हैं।
तो बेहतर है कि हम रैशनली बुद्धिमत्ता के स्तर पे समझाएं। और भारत में जो हैं, भारतीय अभी काफी इन्फ्लुएंशियल (influential) हैं अमेरिका में। Indians are the wealthiest minority. अमेरिका में अलग-अलग देश के लोग आये हैं, चाइना से लोग आये हैं, जापान से लोग आये हैं, पाकिस्तान से आये हैं, अलग-अलग देशों से आये हैं, सारे देशों से लोग अमेरिका में। अमेरिका में सबसे अमीर जो लोग हैं भारतीय हैं। तो काफी इन्फ्लुएंशियल हैं भारतीय। तो अगर हम प्रॉपर्ली एक्सप्लेन (properly explain) करते हैं, हमारा इंटरेस्ट कन्वे (interest convey) करते हैं, तो ऐसे प्रसंगों को टाला जा सकता है भविष्य में कम से कम।
जी जी बहुत बहुत धन्यवाद प्रभुजी। जिस कॉन्टेक्स्ट में आपने समझाया है प्रभुजी यहाँ पर जब बात आती है तो यह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है और बहुत ही दुख की बात है कि जो भी निर्माता होते हैं निर्देशक होते हैं इतनी संवेदनशीलता तो होनी चाहिए कि जब किसी से किसी कॉन्टेक्स्ट में हम किसी रिलीजियस बुक (religious book) को और कोई धर्म का जो भी रेफरेंस देते हैं तो अच्छा उसके बारे में पहले पता करें। क्योंकि अभी ये भी बात नहीं है उसके पहले भी बहुत सारी मूवीज ऐसे आई हैं। मेरा ऐसा पर्सनल व्यू (personal view) रहा है प्रभुजी कि अगर आपको जिस सब्जेक्ट में… तो आप बहुत सारे डायरेक्टर होंगे, जो भी आप होंगे आपका स्किल्स होगा पर जिस विषय में आपको ज्ञान नहीं है उस ज्ञान को पहले अर्जित कर लीजिये और उसको समझने के बाद तथ्य क्या हैं उसको जानने के बाद उसको प्रेजेंट कीजिए।
आफ्टर ऑल इट इज रिक्वायर्ड (After all it is required), जैसा आपने बताया कि भगवद्गीता का अगर रेफरेंस दिखाना था ओपेनहाइमर के साथ उसका कुछ दिखाना था कि कनेक्शन (connection) था, तो there were many opportunities, उसको एक अलग तरीके से प्रेजेंट किया जा सकता था और बताया जा सकता था कि यहां उनका कॉन्टेक्स्ट (context) था समझते थे और इस पर बहुत रुची थी। पर उस पर्टिकुलर जगह दिखाना और यह कंट्रोवर्सी (controversy) क्रिएट करना वैसे सीन्स के साथ में उसको जोड़ कर दिखाना, वो थोड़ी सी असंवेदनशीलता है और निर्देशक निर्माता उनको दिखता है थोड़ी सी काफी असंवेदनशीलता है। जैसा आपने कहा कि हो सकता है उनको ज्ञान ना हो, पर मेरा प्रश्न वही आता है कि जिस चीज़ का आपको ज्ञान नहीं है उस चीज़ में आप हाथ क्यों डालते हैं? मतलब उसको आपको पहले समझना चाहिए कि उसको कॉन्टेक्स्ट में है, उसके पीछे का बैकग्राउंड (background) क्या है वो समझ के फिर उसको डाला जाये। तो बहुत अच्छा आपने कहा कि इसका पूर्ण मतलब जो उत्तरदायित्व है वो सेंसर बोर्ड का भी है specifically when it is released in India. तो वहाँ पर तो हो सकता है उधर अज्ञान हो पर यहाँ पर तो ज्ञान जानबूझ के अंधे बनने वाली बात आती है कि आपको पता है और उसके बाद भी इस चीज को रिलीज़ कर रहे हैं तो वो कहीं ना कहीं कंट्रोवर्सी क्रिएट करेगा और उससे लोगों की आस्था और उसकी श्रद्धा पे क्वेश्चंस (questions) आता है।
तो लोग इसमें एक मत और भी आता है प्रभुजी कि यहाँ पर बोलते हैं कि जैसा मैंने पहले भी बताया कि भगवान जो हैं या उनसे जुड़े हुए जो भी लिटरेचर हैं, चरित्र हैं वो सूर्य के समान हैं और वो अपने आप में पूर्ण हैं। तो उसको ऐसी छोटी-छोटी जैसा आपने कहा कि भगवद्गीता के बारे में लोग सोचेंगे तो इसके बारे में सोचेंगे पढ़ने का प्रयास करेंगे। पर वो लोग ऐसा भी कोट करते हैं कि भगवद्गीता अगर पूर्ण है और उसकी पवित्रता इंटेक्ट (intact) है तो फिर कैसे भी दिखाओ क्या फ़रक पड़ता है? तो इसको कैसे आप समझाने का प्रयास करेंगे, कैसे समझ सकते हैं ऐसे?
भगवद्गीता की पवित्रता और कॉन्टेक्स्टुअल एप्रोप्रियेटनेस
देखिए भगवद्गीता शुद्ध है और भगवद्गीता कभी अपवित्र नहीं होती है और भगवद्गीता के संपर्क आने से व्यक्ति पवित्र होता है, दोनों चीजे सही हैं। पर क्या है हर चीज के लिए एक कॉन्टेक्स्टुअल एप्रोप्रियेटनेस (contextual appropriateness) होता है, परिस्थिति में क्या औचित्य है। अभी मान लीजिये किसी को आइसक्रीम खाना अच्छा लगता है, आइसक्रीम खा सकते हैं। तो अगर मान लीजिये किसी के परिवार में कोई मृत्यु हो गई है तो आप मेमोरियल सर्विस (memorial service) में जाते हैं उनके, तभी गंभीर होते हैं, तभी कुछ आप यूलॉजी (eulogy) देते हैं जब उनके बारे में कुछ मेमोरियल कुछ बात कहते हैं, तो तभी एक भाव होता है। मान लीजिये कोई व्यक्ति की मृत्यु हो गयी है और उस समय आपको उनके बारे में कुछ बोलना है, उस समय आप आइसक्रीम खा रहे हो तो वो क्या है? आइसक्रीम खाना एक चीज है और ये मेमोरियल वो अलग चीज है। तो हर परिस्थिति में कुछ उचित है कुछ अनुचित है।
तो क्या है यहाँ पे it is not a question of rights. मेरा अधिकार है स्वतंत्र देश है मैं जाऊंगा तो कहीं भी आइसक्रीम खाऊंगा। हाँ वो राइट्स का बात नहीं है यह कॉमन सेंस (common sense) का बात है, सेंसिटिविटी (sensitivity) का बात है, एप्रोप्रियेटनेस औचित्य का बात है, संवेदनशीलता का बात है, यह बात है यह। तो यह जो है भगवद्गीता, it is… भगवद्गीता अशुद्ध नहीं होती है, भगवद्गीता के बारे में विचार करने से कोई अशुद्ध नहीं होता है। पर जब व्यक्ति भगवद्गीता आपको देखता है उस परिस्थिति में, तो व्यक्ति के मन में मेंटल इमेजेज (mental images) फॉर्म होती हैं। तो अभी जो व्यक्ति भगवद्गीता के बारे में कुछ जानता नहीं है और वह उसका पहला परिचय भगवद्गीता से इस तरह से होता है, तो उसके मन में क्या आएगा? शायद उसको कामसूत्र के बारे में पहला आता है, भगवद्गीता और कामसूत्र एक जैसे ही कुछ शास्त्र हैं, तो ऐसे हो जाएगा।
तो क्या हो जाएगा कि प्रॉब्लम क्या है हमें समझना चाहिए कि हमारा मन एसोसिएशन फॉर्म (association form) करता है, हमारा मन संबंध जोड़ता है, इसका और इसका। जब हरे कृष्ण भक्त पहली बार भारत में आये थे तो एक बॉलीवुड के डायरेक्टर ने मूवी बनाया था ‘दम मारो दम, हरे कृष्ण हरे राम’। अभी क्या था ये सत्य था कि उस समय पाश्चात्य देश में कई लोग ड्रग्स लिया करते थे और जो ड्रग्स लिया करते थे वो भारत में भारत में आया करते थे। और कुछ हद तक भारत में लोग आध्यात्मिक खोज करते थे, कुछ ड्रग्स लिया करते थे, कुछ भांग वगैरह लिया करते थे, उससे उनको थोड़ा जस्टिफिकेशन (justification) मिलता था करने की संभावना मिलती था, ये सत्य है सबको सत्य है। और प्रभुपाद जी ने पाश्चात्य लोगों को भारत में लेकर आये थे। पर क्या है कि जब हरे कृष्ण हरे राम ये कहीं भी आये वो शुद्धि ही करता है, उसमें कोई संभावना नहीं है। पर जब ऐसे दिखाया कि ये नशा करने वाले लोग हरे कृष्ण हरे राम बोलते हैं तो उससे क्या होता है वो उल्टा कोरिलेशन (correlation) होता है। नशा करने वाले लोग हरे कृष्ण हरे राम बोलते हैं, उससे क्या लोग सोचते हैं कि हरे कृष्ण हरे राम बोलने वाले लोग नशा करते हैं। तो ये रांग कोरिलेशन (wrong correlation) हो जाता है।
तो जब वो ऐसे भौतिकवादी कार्य करते समय भगवद्गीता रेसाइटेशन (recitation) किया जाता है तो ये लोगों के मन में क्या जाता है, भगवद्गीता ऐसे कार्य करने को आपको बोलती है। तो इसलिए भगवद्गीता कामसूत्र जैसी किताब है। तो इसलिए जो मेंटल इमेज लोग फॉर्म कर रहे हैं वो प्रॉब्लेमैटिक (problematic) होता है, उससे समस्या आती है। तो वो आपको प्राइमरिली अगेंस्ट (primarily against) है। भगवद्गीता बहुत शुद्ध है और ये अशुद्ध कभी नहीं होती है पर लोगों के मन में जो विचार बैठते हैं जो चित्र बैठते हैं, चित्र प्रवृत्त होते हैं वो उनको भगवद्गीता के बारे में गुमराह कर सकते हैं।
जी बहुत धन्यवाद प्रभु, अंतिम में एक प्रश्न पूछूंगा और फिर हमारे कार्यक्रम के अगले पड़ाव में जाएंगे। तो जैसा हमने समझा आप से कि भगवद्गीता तो पवित्र ही है पर उसको जिस कॉन्टेक्स्ट में देखा जाये तो हो सकता है उसकी एक गलत छवि एक गलत रूपांतरण व्यक्ति के मस्तिष्क में जा सकता है और उसकी चेतना में थोड़ा सा दूषितपन आ सकता है। तो भगवद्गीता जब हम पढ़ने की बात करते हैं प्रभुजी तो क्वेश्चन मेरा ये है कि ऐसे जगहों पर जैसा हमने चर्चा की तो इसका हम लोग निषेध कर सकते हैं जो भी वो कर सकते हैं पर अपनी आस्था, अपनी विश्वास, अपनी स्क्रिप्चर और हमारा धर्म उसके प्रति हमारी आस्था ना डगे हमारा विश्वास ना डगे उसके लिए हमें क्या प्रिकॉशन (precaution) लेना चाहिए?
धर्म, आस्था और भगवद्गीता का वास्तविक संदेश
सबसे अच्छा है कि हम खुद भगवद्गीता को पढ़ें, भगवद्गीता को समझें और भगवद्गीता को समझाएं। कैसे है कि ये भगवद्गीता के प्रति अपराध आपने किया है आप बोल देंगे तो ये सही है। पर लोगों को क्या लगता है, अधिकांश लोगों को लगता है कि ये धर्म जो है, ये साधारणतः लोगों को उकसा देता है। और जब लोग धर्म के कारण से वो बचने से आते हैं तो उसका कोई कारण नहीं होता है, उसका कोई रीजन नहीं होता है, उसका कोई लॉजिक (logic) नहीं होता है, उसका कोई दिमाग नहीं होता है, केवल भावनाएं होती हैं।
तो एक तरह से भगवद्गीता के संदेश हैं वो अर्जुन को भावनाओं को संयमित करके जो धर्म क्या है उसका विचार करके कार्य करने को बताया जाता है। कई बार भगवान को बताया जाता है कि: “न प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम्” कोई अप्रिय चीज होती है तो उससे ज़्यादा हताश मत हो जा, कोई प्रिय चीज हो जाए तो उससे बहुत उछलो मत। आप खुशी में, आप धर्मनिष्ठ हो, तो उस तरह से। अगर सही में हम भगवद्गीता का पालन कर रहे हैं, तो अभी यह जो हुआ है, इससे ज़्यादा उत्तेजित होने की जरुरत नहीं है। हमारा धर्म क्या है, हमें देखना है। हमारा धर्म यह है कि भगवद्गीता समझें और भगवद्गीता समझाएं, और अगर वो हम करेंगे, तो फिर उससे और लोग समझेंगे, और लोग भगवद्गीता को और सकारात्मक रूप से दिखाएंगे।
प्रभुपाद जी ने, अगर हम देखेंगे तो प्रभुपाद जी ने 1960s में हमारी भगवद्गीता की कमेंट्री लिखी, तो उसके पहले 1940-1950s में भारत का पार्टीशन हुआ था, और प्रभुपाद जी बंगाल में थे, बंगाल में काफी रायट्स (riots) हो गए थे, पर उन्होंने भगवद्गीता का जो संदेश है, वह दिया है, और उस पे जोर दिया है। उससे क्या हुआ है कि प्रभुपाद जी, जो सर्कमस्टेंस (circumstance) हैं, सर्कमस्टेंस से ऊपर उठके उन्होंने एक यूनिवर्सल मैसेज (universal message) दिया है, परिस्थिति से ऊपर उठके, परिस्थिति के परे जो हमेशा लागू होने वाला ऐसा मैसेज दिया है, तो उस पे जोर देना ज़रूरी है। अभी क्या है कि जब ऐसे कोई प्रोवोकेशन (provocation) होता है, ऐसे कोई चीज़ होती है, जिससे कि हम उत्तेजित हो जाते हैं, तब ही हम काफी आ जाती है, कि ये करना है, वो करना है, वो करना है, वो अच्छा है, तभी कविताओं को शक्ती आ गई है।
पर कैसे है, इंग्लिश में कहते हैं कि The sacrifice of life is good, but the life of sacrifice is glorious. अगर आप जीवन का त्याग करते हो तो बड़ी बात है, पर त्याग का जीवन जीते हो, वो उत्कृष्ट है। हम भगवद्गीता के लिए चिल्लाएंगे। वो बोलना आसान है। पर रोज भगवद्गीता का अध्ययन करना, भगवद्गीता के लिए हमारा जीवन मोल्ड (mold) करना, जीवन परिवर्तित करना, वह और ज़्यादा महत्वपूर्ण है। अगर वो हम करेंगे, तो जो हमारे जीवन में परिवर्तित होगा, तो वो भगवद्गीता का गुणगान हमें करना है। अगर हमारा जीवन भगवद्गीता से परिवर्तित हो रहा है, और वो दुनिया देखेगी, वो लोग देखेंगे, तो उससे भगवद्गीता का गुणगान सबसे अधिक परिवर्तित हो सकता है।
नास्तिकता और विज्ञान (Atheism vs Science)
मितेश जी का प्रश्न है, प्रभुजी, कुछ लोगों का ऐसा मानना है कि भगवान का अस्तित्व है ही नहीं, भगवान विद्यमान ही नहीं हैं, तो ऐसे लोगों के लिए हम क्या प्रति उत्तर दे सकते हैं उनको? भगवान का अस्तित्व नहीं है यह कहने का अधिकार जो भी जाता है उसका अधिकार तो है, पर कैसे है कि आपका मत है और सत्य है। अभी सत्य क्या है वो जानना है तो हमें निष्कर्ष देखना है। तो सबसे पहले लॉजिक के स्तर पे यह है कि जो भगवान का अस्तित्व नकार सकता है, कोई भी ऐसा वैज्ञानिक प्रयोग नहीं है, कोई भी वैज्ञानिक तर्क नहीं है, जिससे हम साबित कर सकते हैं कि भगवान का अस्तित्व नहीं है। तो इसलिए एथीज्म (Atheism) एक प्रयोग नहीं है, कि विज्ञान से कभी यह स्थापित नहीं हो सकता है कि भगवान का अस्तित्व नहीं है। अगर कोई कहता है मैं नास्तिक हूँ तो वो अवैज्ञानिक है, सबसे पहली बात है। विज्ञान से आप कह सकते हैं कि स्थापित नहीं है, कि भगवान का अस्तित्व है या नहीं है, इसके बारे में पता नहीं कर सकते हैं, क्योंकि भगवान विज्ञान के स्टडी के स्कोप के बाहर हैं।
तो अगर मैं मेरी आंखों से देख रहा हूँ, और मुझे कोई पूछता है ये गुलाब, इसमें सुगंध कैसी है, तो मैं कितने भी मेरी आंखें 20 x 20 विजन (vision) हो, फिर भी मुझे उससे पता नहीं चलने वाला है। तो विज्ञान आध्यात्म के बारे में बात नहीं कर सकता है, क्योंकि विज्ञान भौतिक चीज़ों के बारे में बात करता है। तो सबसे पहली चीज़ है, कोई कहता है नास्तिक है, तो आप नास्तिक नहीं हैं, आप साइंस के आधार पर नहीं बोल रहे हैं, आपके खुद का मत बोल रहे हैं।
और फिर दूसरी चीज़ है कि अगर हम हमारे जगत को देखते हैं, तो हम देखते हैं कि इस जगत में आर्डर (order) है, और अभी सवाल आता है कि आर्डर आया कहां से? जो नियम हैं, रूल्स (rules) हैं, पैटर्न्स (patterns) हैं, ये आये कहां से? तो अगर मान लीजिये कोई जुआ खेल रहा है, और इसमें क्या है, कि गैम्बलिंग (gambling) चल रहा है, और कहा गया, ये अगर 6 गिरेगा, तो आप जिओगे, 6 नहीं गिरेगा तो आप मर जाओगे, आपको मार डाला जाएगा। तो पहली बार फेंकते हैं, 6 गिरता है, तो ओके, तुम तो लकी हो। दूसरी बार फेंकते हैं, फिर 6 गिरता है, अरे, बहुत लकी हो तुम। दूसरी बार भी 6 गिरता है, दस बार 6 गिरता है, पचास बार 6 गिरता है, लोगों ने कहा सब जगह 6 ही है क्या? क्या चल रहा है ये सब? अगर इतनी बार अगर 6 गिर रहा है, तो फिर वो चांस (chance) से संभव नहीं है।
तो अगर हम हमारे ब्रह्माण्ड को देखते हैं, तो ऐसी हजारों चीजे हैं, जो बिल्कुल वैसी ही हैं जो मानव जीवन के लिए ज़रूरी हैं। अगर हमारी पृथ्वी सूरज से थोड़ी और दूर होती, तो फिर इतनी ठंडी होती कि हमारा जीवन मुश्किल हो जाता था। पृथ्वी थोड़ी और पास में होती सूरज के, तो वापस हम इतने गरम होते कि जीवन मुश्किल हो जाता था। अगर पृथ्वी में जितना ऑक्सीजन है, वो अगर थोड़ा कम होता, तो फिर हमारा जीवन मुश्किल हो जाता था। अगर पृथ्वी है, उसका जो वर्टिकल एंगल है, मैग्नेटिक पोल जो 23 और हाफ डिग्रीज है, उसके कारण जो होता है, वह सीजन होते हैं, उसके कारण नहीं है, तो फिर जो पोर्शन है, वो नहीं होता, हम वापस जीवन नहीं होता। अगर पृथ्वी जो है, वो गोल घूमती है, और वो जिस रेट पर घूमती है, और उनमें से एक भी चीज थोड़ी सी भी अलग होती है, तो जीवन नहीं होता है, जीवन नहीं होता है। तो ये एक बार नहीं, दो बार नहीं, दो सौ बार, वो जो है, आपने जुआ का डाइस फेंका है, हर बार वो छह गिरा है। तो ये अपने आप संभव नहीं है।
तर्क के स्तर पे जितना हम देखते हैं कि जो मिलता है, वो हमको इस सब के पीछे कुछ योजना है, और योजना करने वाली बुद्धि है, उसी निष्कर्ष के लिए आते हैं। केल्विन (Kelvin) ने कहा था कि A little science takes you away from God, विज्ञान में ज्ञान के लिए अपने पैर बढ़ाते हैं, थोड़े से विज्ञान से व्यक्ति को लगता है, ‘अरे हमें सब कुछ समझ गया हूं, अब भगवान की क्या जरुरत है?’ और सही में अगर विज्ञान में गहराई में आते हैं तो Immersion in science brings us right back to God. वापस भगवान के पास आते हैं।
जी बहुत बहुत धन्यवाद प्रभुजी उत्तर के लिए। अगले प्रश्न की ओर। देवांशी जी का प्रश्न है… किस प्रकार से युद्ध का विवरण दिया गया है शास्त्रों में उसको कैसे समझ सकते हैं जहां पे जैसे हम अर्जुन की बात करते हैं तो एक ओर से बहुत सारे तीर निकलते हैं। अगला प्रश्न पूछा जा रहा है प्रभुजी समय की मर्यादा को ध्यान में रखते मैं आपसे कुछ फटाफट कुछ पूछूंगा और उसके आपके संक्षेप में आंसर चाहूंगा।
जप, मानसिक शांति और भक्ति
तो सबसे पहला जो कुछ आ रहा है अगला प्रश्न वो है ईशा पुरोहित का प्रश्न। हरे कृष्णा प्रभुजी गीता में कृष्ण कहते हैं हमारे मन को हम भक्ती में लगाएं तो मन शांत होगा। मैं नाम जप कर रही हूँ और फिर भी मैं अपने एंग्जायटी और फियर (Anxiety and fear) को कम नहीं कर पा रही हूँ।
मन जो है, जो भगवान का स्मरण है, भगवान का नाम है, कभी कभी ये एक पेनकिलर (painkiller) के रूप में काम करता है और कभी कभी एंटीबायोटिक (antibiotic) के रूप में काम करता है। अगर एंटीबायोटिक होता है उसका परिणाम तुरंत नहीं आता है, कुछ समय लगता है, पूरा कोर्स कम्पलीट करना पड़ता है। जो पेनकिलर होता है उससे तुरंत राहत मिल जाती है। कभी कभी जप जो होता है, अगर आपको एंटीबायोटिक में समय लग रहा है, भक्ति में अलग विधाएं हैं कीर्तन भी है। कई बार पेनकिलर जैसे लगता है आप कीर्तन में लग जाओ मन शांत हो जाता है। अगर आप कीर्तन से जप करना है, आधा घंटा जप करना चाहते हो, फिर पाँच मिनट से कीर्तन से शुरू करो मन शांत हो जाएगा उससे। और फिर आप जप में लग सकते हैं। पेनकिलर और एंटीबायोटिक दोनों काम हमको जब बीमार हैं और दर्द हो रहा होता है तो दोनों ज़रूरी है। हम एंटीबायोटिक से पेनकिलर की अपेक्षा नहीं कर सकते हैं। और पेनकिलर जो है उसके लिए जो आप भक्ति का जो अंग आपको अच्छा लगता है उससे आप शुरुआत कर सकते हैं और जप की ओर आगे आ सकते हैं उसके बाद में आप।
जी बहुत-बहुत धन्यवाद उत्तर के लिए। अगला प्रश्न है भरत जी का, भक्ति करना भारत में आसान है?
भक्ति करना हर जगह मुश्किल है। सांस्कृतिक दृष्टि से भारत में बहुत अच्छा है। पर अगर पाश्चात्य देशों में जाओगे तो सांस्कृतिक दृष्टि से बहुत प्रलोभन ज्यादा हैं, डिस्ट्रैक्शन्स (Distractions) ज्यादा हैं और वहाँ पे वो मुश्किल है। पर एक तरह से वहाँ पे अगर कोई भक्ति करना चाहता है तो मंदिर में इतने सारे भक्त नहीं होते तो सेवा का और मौका मिलता है। आप जिम्मेदारी ले सकते हो और वहाँ पे भी सेवा करने का मौका काफी है। पाश्चात्य देशों में क्या होता है जब भारतीय इंडियन पेरेंटिंग बहुत संस्कार देते हैं, अपने बच्चों का पालन पोषण करना वह बहुत अच्छे से जिम्मेदारी से लेते हैं। और जब बच्चे हो जाते हैं तभी सोचते हैं कि अभी मेरे बच्चों को तो मेरे संस्कार देने हैं। हमारी संस्कृति है वह एक तरह से हमारे खून के समान होती है। खून जब शरीर के अंदर बहते रहता है तो हमको पता भी नहीं चलता है। और जब खून बाहर निकलता है और खून की कमी लगने लगता है तो हमको पता चलता है। तो संस्कृति की कीमत जब हमारे पास संस्कृति होती है तो पता नहीं चलती है, जब संस्कृति नहीं होती है तो संस्कृति चली जाने लगती है तो पता चलती है। तो पाश्चात्य देशों में भी अगर कोई जिम्मेदारी लेना चाहता है, कोई गंभीर लेता है तो बहुत सा मौका है प्रगति करने के लिए भी। पर भारत में सपोर्टिव कल्चर (Supportive culture) भारत में ज्यादा है।
परिवार में भक्ति का विरोध
जी जी बहुत बहुत धन्यवाद, बढ़ेंगे अगले प्रश्न की ओर। सरें जी का प्रश्न है, हरे कृष्णा प्रभुजी, मेरे माँ पापा भक्ती करने नहीं देते हैं तो मैं क्या करूँ? फैमिली (family) से थोड़ा सा अपोजीशन (opposition) होता है कभी कभी शुरुआत में भक्ती करते हैं तो उसके लिए आप क्या मत है क्या कर सकते हैं इसके लिए?
देखिए हमारे माता पिता साधारणतः हमारे चिंतक ही होते हैं। तो अगर वो भक्ती का विरोध कर रहे हैं तो क्यों विरोध कर रहे हैं? उनको शायद भय होता है कि शायद हम पढ़ाई नहीं करेंगे, हम जिम्मेदारियां छोड़ देंगे, सिर्फ भक्ती करने लगेंगे। तो फिर जो उनके रिजर्वेशन्स (reservations) हैं, जो उनके भय हैं उनको समझने का प्रयास करो। इसे कि अगर आपके भक्ती का एक सर्कल (circle) है और आपके माता पिता का इंटरेस्ट का दूसरा सर्कल है, तो अगर ये दूसरा सर्कल कहीं इंटरेक्ट होते हैं वो उस पर जोर दो। अगर मान लीजिये अगर कोई विद्यार्थी है और यहाँ भक्ती करने में काफी समय लगता है, पर भक्ती करने से काफी समय बच भी जाता है। जब भक्ती में लगता है तो बहुत सारे समय खाने वाले चीज़ें हैं उनको छोड़ देते हैं। तो फिर क्या होता है उनको छोड़ जाते हैं वास्तव में। तो अगर कोई भक्ती करता है उससे वास्तव में उसको अच्छी से पढ़ाई कर रहा है उसके अंक इम्प्रूव (improve) हो रहे हैं, अपना अपना स्पेस होता है कि आप अपनी भक्ती थोड़ी डिस्क्रीटली (discreetly) करते रहो।
भगवद्गीता में कहते हैं कि आप दूसरों का मन विचलित मत करो और दूसरों के द्वारा खुद के मन को विचलित मत करो: “यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः” तो इस तरह से आप अपनी भक्ती का प्रयास करो जिससे कि वो विचलित ना हों, और जिन चीज़ों से वो विचलित हो रहे हैं उसको शांत करने का प्रयास करो, धीरे-धीरे उनका विरोध कम हो जाएगा।
जी जी जी बहुत बहुत धन्यवाद प्रभुजी हमसे जुड़ने के लिए और समय की मर्यादा है हमें यहीं पे विराम लेना होगा। और मैं आपका फिर से धन्यवाद करता हूँ कि आपने समय निकाला हमसे जुड़े और जिस प्रकार से आपने तर्क की दृष्टि पे, दार्शनिकता की दृष्टि पे, व्यवहार की दृष्टि पे जिस तरह से संदर्भ देखे, आज का जो एक विचलित विषय था और जो चर्चा में रहा है वैसे विषय एक सकारात्मक रूप से आध्यात्मिकता से जोड़ सके। जो आपका स्पिरिचुअलिटी (spirituality) और जो साइंस का जो कनेक्शन है मैंने दर्शकों को बताया था कि ऐसा अनोखा मेल ऐसा सम्मेल आपको कहीं देखने नहीं मिलेगा, तो वो आपने प्रमाणित किया फिर से। तो बस भगवान से वही प्रार्थना है कि आप इसी प्रकार से सेवा करते रहें और आपकी कभी कुछ सेवा करने का हमें अवसर मिले बहुत बहुत धन्यवाद प्रभुजी।
थैंक्यू बहुत सवाल पूछे आपने थैंक्यू सो मच फॉर अपॉर्चुनिटी हरे कृष्णा।