Hindi – Radhanath Maharaj life story and lessons after The Journey Home Kolkata – Chaitanya Charan
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हरे कृष्णा आप सबके बीच में आने का मौका मिला है और आज मै ठीक है इसमें कुछ लिख रहा हूँ यहाँ पर कुछ लिख के कुछ एक्सप्लेन करूंगा तो लेट्स सी लेट मी नो इज दिस क्लियर क्लियर है ठीक है बस ये मेरे आंखों के बीच में आना है। हरे कृष्णा कुछ बोलने का मौका दिया है। मैं थोड़ा पार्श्वभूमि दूंगा मैं आज व्हाट आई एम नॉट टू स्पीक वाई टू स्पीक तो जब होम किताब लिखा गया था तभी लिखने के पहले महाराज ने मुझे किताब दिया था मुझे महाराज को पता था कि मुझे कभी कुछ किताबें लिखी थी आई वाज ऑफ तो महाराज ने कभी किताब लिखा था मुझे पढ़ने को दिया और फिर पढ़ने के बाद उन्होंने कहा थिंक अबाउट द बुक उन्होंने कहा महाराज यहां पे कहानियां बहुत रोचक है और सबसे स्ट्राइकिंग चीज बनी उस किताब का जो टोल है वो टोल है जिसमें आप एक गुरु अपने शिष्यों को इंस्ट्रक्ट कर रहे है ऐसे नहीं है आप वास्तव में एक सीकर जो खुद आपका कोई मित्र है अपने मित्रों को अपना अनुभव बता रहा है अनुभव से कुछ जो सीखना है वो बता आ रहा है तो ये जो टोन है ये बिल्कुल ऐसे इंस्ट्रक्टिव नहीं है वो इंस्ट्रक्टिव नहीं है शेयरिंग टोन है तो महाराज महाराज ग्रो हो गए थोड़े और उन्होंने कहा कि आई एप्रिशिएट योर अप्रिसिएशन उन्होंने कहा कि ये क्या है कि अगर आप पाश्चात्य देशों में प्रचार पाश्चात्य देश में प्रचार करने के लिए यही करना बहुत जरूरी है और अगर पेस्ट हो रहा है तो आप भी सीख लोगे तो तुम फिर और प्रचार कर सकते हो। तो मेरा वो एक इंटरेक्शन था। उसके बाद में जब जर्नी महाराज ने लिखा उसका पहले नाम योगा चेंज किया नाम। और जब वो किताब लिखा तो महाराज ने मुझे ईमेल करके वो किताब भेजा। और उन्होंने लिखा कि शेयर योर थॉट्स अबाउट इट। और महाराज ने मुझे बोला था कि जब आप ये किताब रिव्यु कर रहे हो, एडिट कर रहे हो तो डोंट थिंक दैट गुड डिसाइकल मेरे बाहर मत रखो बोले कि तुम एक लेखक हो, मैं एक लेखक हूं और तुम एक लेखक के रूप में मुझे अपने थॉट्स बोलो। तो फिर मैं थोड़ा शायद ओवर एनुजियास्टिक हो गया। और मैंने बहुत सजेशंस दे दिए। और फिर महाराज को मैंने लिखा और कुछ रिप्लाई महाराज गुस्सा हो गए हैं। और फिर उसने अपना नाम था ये 2006 की बात है उस समय की। फिर गया था महाराज संडे क्लास ले रहे थे तो उसके बाद में थोड़ा डरा हुआ था कि महाराज के सामने जाओगे नहीं क्योंकि अगर मैंने किया है कि महाराज क्या बोलोगे तो महाराज की कल तो महाराज बैठे थे आशा पे प्रणाम करने गया और फिर महाराज उन्होंने देखा सजेशंस और महाराज बहुत गंभीर हो गए थे और मैं थोड़ा डर गया था और फिर भाई बोले दे वैरी गुड और फिर भी महाराज हंसी नहीं और फिर बाहर बोले कि नाउ इट इज योर कर्मा टू इम्प्लीमेंट ऑल द सजेशंस की तुमने सुझाव दिया तुमको सबको करना पड़ेगा तो फिर महाराज ने कहा उन्हें की क्या तुम मुंबई में रह सकते हो कुछ दिन के लिए महाराज आपकी सेवा के लिए तो उस समय लगभग 15 मिनट काफी महाराज के संग मिला मुझे तो वहां पर आऊंगा उसके थोड़ा बताऊंगा पर कभी कई घंटों तक महाराज सुझाव था उसका कुछ कैसे करना है क्या करना है किस तरह से करना है तो महाराज किस तरह से विचार करते हैं कितनी संवेदनशीलता क्या मेरा था लॉजिकल लॉजिकली के लॉजिकल लॉजिकल यहां से फ्लो हो रहा है फ्लो हो रहा है। पर महाराज से महाराज के साथ जब मैं वहां पे एडिटिंग कर रहा था तो मेरा लॉजिकल साइड स्ट्रांग था पर महाराज का सेंसिटिविटी जो था कि हाउ विल पीपल पर्सिव दिस पॉइंट ये पॉइंट अगर हम इस तरह से बोलेंगे तो लोग किस तरह से विचार करने वाले तो वो एक पूरा नया पहलू मेरे लिए महसूस करने को मिला और फिर कभी काफी दिनों तक काफी सेवा कर रहे थे घंटों तक से बात कर रहे थे फिर एडिटिंग काउंट कर रहा था मैं। और फिर जब एडिटिंग हो गया, तो उसके एंड की ओर क्या हुआ एक रात को मैं मिला था महाराज से शाम को 9:10 बजे और कल मैं कभी बुक भरने वाला हूं। तो एक तुम आखिरी प्रूफ कर लो बुक। बुक लगा 250 300 का था। और कल सुबह मैं भेज दूंगा। क्लास के बाद तुम आ जाओ। हम फाइनल कर देंगे। तो तभी रात भर बैठा रहा मैं थोड़ा एडिटिंग करता रहा रात को काफी दिनों से बहुत सेवा चल रहा था सोने वाला तो वो रात को मैं सो गया और वो सो के कंप्यूटर के स्क्रीन लैपटॉप था उसे स्क्रीन पर क्रैश कर दिया उसका स्क्रीन क्रैक हो गया इधर और फिर स्क्रीन क्रैक हो गया फिर वो कंप्यूटर पढ़ के कर रहा था कुछ समय तक चलता रहा उसके बाद में कंप्यूटर बंद हो गया तो फिर दूसरे को खाली हमारा कंप्यूटर ले लिया काम कर रहा है और फिर महाराज बिजी हो गए थे तब दोपहर का समय मिल गया मुझे और फिर डॉक्टर को मिला उनसे कॉपी है तो तुम मुझे बताओ मैं टाइप करूंगा ठीक है तो फिर मैं सारा पढ़ने लग गया कभी और बताओ भक्ति सिद्धांत जो सिद्धांत में ऐसा आता है कि एकता तो भाई आपको इसमें नहीं करेक्ट करना है। बोले कांग्रेचुलेशन यू पास द टेस्ट बोला बोले क्या मतलब गोला से बाल देखा मैंने गलती रखी थी देखा तुम करते हो कि नहीं कुछ बोल नहीं पा रहा था जोकि तो अभी तो बता वास्तव में क्या हुआ था तो उसके बाद में पूछा महाराज जी आप कैसे कैसा लगा तुमको बोला कि 15 डेज ऑफ़ एक्सट्रेसी एंड एंग्जायटी बोला कि बहुत भाग्य एक्सट्रेसी था और तब बहुत एंग्जायटी भी था तो तुम 15 दिन से कर रहे हो मैं 15 साल से कर रहा हूं तो उस समय से जो है महाराज हाउ ही थिंक्स उसके बारे में मुझे काफी अह झलक आपको रीडिंग करते समय उस समय से जो मुझे उसके बाद में मैं अमेरिका जाने लग गया हूं 2014 से हर साल जब जाता हूं आता हूं उसके बाद महाराज को रिपोर्ट देता हूं कहां कहां गया हूं और कैसे हो रहा है तो मुझसे में काफी इंटेंशन था उस समय महाराज हाउ ही थिं हाउ ही हाउ ही एनालाइज ये जो है आई वास इसके बारे में कुछ बोलना चाहिए इसके बारे में कुछ लिखना चाहिए तो उस समय इच्छा थी हम क्लास को जाते उस समय के लिए मैंने ये किताब लिखा है तो ये किताब में मैंने तीन पार्ट किए है तो उसमें एक पार्ट होने वाला हूं लाइफ लेसन और लेगसी लाइफ में क्या है कि उनके जीवन का ओवरव्यू लिया है। हमें कई कई जीवन की घटनाएं पता है। पर एक तरह से और उनके जो जर्नी उनका जो सोच था उसके बारे में काफी पता है। अह विस्तार रूप से पता है उनको। पर उसके बाद में कि कहां-कहां हमारे सेवा की है, कैसे विस्तार किया प्रचार का, क्या-क्या प्रायोरिटी थी उनकी तो उसका मैं उनका एक लाइफ ओवरव्यू जो है, बायोग्राफी के रूप में तो दैट विल बी द फोकस ऑफ़ माय क्लास। तो जो सेकंड पार्ट है लेसंस उसमें जो मैंने उनके आदान प्रदान हुए हैं उसके आधार से क्या सिखाया मैंने वो बताया गया है तो इस तरह से कुछ लाइफ में डालूंगा और लेगसी है कि महाराज ने किस तरह से क्या प्रोजेक्ट्स किए हैं। एक तरह से क्या है कि जो भी कोई आचार्य होता है तो आचार्यता से जैसे माय अंडरस्टैंडिंग कि आचार्य में कंट्रीब्यूशन होता है तीन चीजें होती हैं। एक होता है कि उनका लाइफ आचार्य मतलब जो आचार्य से सिखाते हैं। पर तो वो जो अपने जीवन से दिखाते हैं कैसे जीना है, कैसे भक्ति करनी है, कैसे सेवा करनी है, कैसे प्रचार करना है, तो जो उसे जीवन से दिखाते हैं वो उसके लिए लेसंस भी देते हैं। कि तुम्हें इस तरह से हमें भक्ति करनी है, इस तरह से कार्य कर रहे हैं। और जो अभी ये लाइफ और लेसंस जो है एक है कि तुम ऐसी सेवा करो या ऐसे प्रायोरिटी दो। पर वो उस तरह से सेवा करने के लिए क्या सुविधाएं चाहिए? क्या इंफ़्रास्ट्रक्चर चाहिए, क्या सपोर्ट सिस्टम चाहिए? वह क्रिएट कर लो यह एक लेगसी है। प्रभुपाद जी बोलते हैं कई जगह पे कि दिस वर्ल्ड कृष्णा कॉन्शसनेस मोमेंट इज़ प्रैक्टिकली इन्वेंटेड। यह पूरा जो कृष्णा किया है। मुझे कहा है कि मैं तो पोस्ट में हूं। और मैंने कुछ भी नहीं है। जो मेरे का मैसेज है वो नहीं दिया है। तो इन्वेंट किया वो कि वो के लक्षण देते हैं आता है कि प्रकार कृष्ण किसी ना किसी तरह से भगवान का स्मरण कर तो कहते हैं कि ऐसे नहीं कि गुरु शिष्य को अगर और हम्म तो आई विल फोकस ऑन द लाइफ बट उसमें मैं लेसन और लेगसी के बारे में कहीं चर्चा भी करूंगा। तो जो लाइफ है तुम्हारी इसको महाराज के जीवन को कुछ स्टेजेस में डिवाइड किया हुआ है। और मैं नाम का एक इकोनमी इसके लिए तो हर स्टेज के जीवन से क्या क्या हम बहुत कुछ सीख सकते है पर मैंने एक एक एट्रिब्यूट लिया है। तो जो सेल्स है एंड फाइव स्टेज की 50 सर्च है। 71 71 है और फिर 80 टू 85 जो है वो अमेरिका में कॉलेज कॉलेज टीचिंग कर रहे थे और फिर ये जो है एच वहां पे कम्युनिटी मुंबई में और अलग-अलग वहां से अलग-अलग जगह पे वो कर रहे थे। दिस इज फ्रॉम 86 टू 2000 फोर तो 2006 में जो है सॉरी सिक्स में ये अगला आता है और फिर आखरी जो है एक चीज कैसे हो रहा है ये कम बैक टू दिस डायग्राम तो अभी जो आर है दैट इज रियलाइजेशन कि जो हम जो आध्यात्म की ओर बढ़ते हैं वो केवल ज्ञान से नहीं भरते हैं वो भावना से नहीं बढ़ते हैं। ज्ञान और भावना दोनों महत्वपूर्ण है। पर क्या है? वो उसके लिए महत्वपूर्ण सबसे ज्यादा रियलाइजेशन है। अभी अगर हम महाराज के जीवन को देखते हैं तो वो उन शास्त्र पढ़ने के पहले वैदिक शास्त्र को पढ़ने के पहले ही क्या है? उनको अनेक साक्षात्कार आते है। अभी शिकागो जो महाराज का जन्म हुआ था। पाश्चात्य देशों में जो नॉनवेज फ़ूड खाना एकदम स्वाभाविक चीज है। एक वक्त एक अह कोई टीवी सीरियल से टूट दिखा रहे थे। तो एक अमेरिकन पूछ रहा है। अमेरिकन तो मतलब क्या है? अगर आप अमेरिकन है तो ऐसा भाव है। तो ऐसी संस्कृति से बाहर जाते हैं अगर आप जरूर करते हैं तो उनको कुछ अनुभव होता है और उस अनुभव से शास्त्रों के बताए बिना ही किसी गुरु ने बताए बिना ही क्या होता है उनको ये अनेक जो बुरी आदतें हैं या बुरे कार्य है वो कैसे गलत है बचपन से ही किसी ने हमको वैराग्य सिखाया ही नहीं अंदर से वैराग्य आने लग गया तो रियलाइजेशन क्या है कि जो एक रियलिटी है वो हम रियलिटी के रूप में स्वीकार करेंगे करते हैं। शास्त्र कहते हैं कि क्या है कि हम जब आध्यात्मिक प्रगति कर रहे हैं तो आध्यात्मिक प्रगति की सिंपल परिभाषा क्या है? कि पहले हमारे लिए जगत बहुत बड़ा होता है और भगवान छोटे होते हैं। जगत बहुत बड़ा है। भगवान छोटे भगवान है या नहीं ज्यादा फर्क नहीं पड़ता है। तो पर जो स्पिरिचुअली स्पिरिचुअल ग्रोथ जब होता है जो प्रगतिशील होते उनके लिए क्या होता है? जगत छोटा होता है और भगवान बड़े होते हैं। तो वास्तव में ये जो स्पिरिचुअल ग्रोथ है एक तरह से इसको प्रयास करके प्रयत्न करके साधना करके ये होता है। पर जब कोई आध्यात्म में लगता है तो ठीक है इस जगत के परे और कुछ तो है और जो महत्वपूर्ण है यह समझ तो जरूरी होनी चाहिए होनी चाहिए। कुछ तो ओपननेस होना चाहिए। तो जब महाराज अमेरिका छोड़ के भगवान की खोज में निकले तो अमेरिका काफी उस समय कंफर्टेबल था प्रोस्पोरस था पर जो वर्ल्ड है दैट वास स्मॉल और उस समय और जो युवा अवस्था में महाराज अच्छे अच्छे परिवार में जन्म हुआ था उनका कल्चर भी था प्रोस्पेरिटी भी था बट फिर भी देर वास अ फॉर समथिंग मोर। तो, भगवता में बताया गया है कि साधारण को साक्षात्कार कैसे होता है? और जो बहुत प्रगतिशील लोग होते हैं, उनको साक्षात्कार कैसे होता है? तो जो यहां पे है वो स्पिरिचुअल स्पिरिचुअली है। और जो स्पिरिचुअली एडवांस्ड है। तो स्पिरिचुअली यू जो होते हैं उनके लिए एजुकेशन लगता है। कि पहले शास्त्र पढ़ो फिर शास्त्र पे चिंतन करो जो शास्त्र के अनुसार जीवन जी रहे हैं उनके साथ जियो और फिर साक्षात्कार होता है धीरे धीरे ज्ञान सिर्फ ज्ञान होता है पर जो एडवांस होते हैं उनको एजुकेशन की जरूरत होती है पर एजुकेशन के इंडिपेंडेंट ही क्या होता है अवश्य यते अवश्य कि एक तरह से वो हेल्पलेसली अट्रैक्ट हो जाते हैं। जब हम जैन में पढ़ते महाराज तो कई बड़े-बड़े आध्यात्मिक नेता आध्यात्मिक टीचर्स है उनसे मिलते हुए रिसर्च में भारत में भारत में भागने के पहले भी और जब उनसे मिलते भी है तो फिर महाराज को अंदर से लगा था समथिंग मोर। तो जो है कि दो प्रकार से लोग जो है आध्यात्म की ओर मुड़ते हैं। तो तो क्या है इस एक है कि मोस्ट लोग कहते हैं आई एम नॉट गुड इनफ फॉर द वर्ल्ड मतलब क्या है कि मैं इतना बुद्धिमान नहीं हूं मैं इतना धनवान नहीं हूं मैं इतना टैलेंटेड नहीं हूं तो क्या है उसे इनसिक्योरिटी होता है एंग्जायटी होता है और उससे स्ट्रेस होता है तो आई एम नॉट गुड इनफ फॉर द वर्ल्ड उसके कारण अधिकांश लोग जो है भगवान की गुण को ढूंढते हैं पर कुछ हैं रेयर लोग मनुष्य नाम सह उनके लिए क्या होता है द वर्ल्ड इज नॉट गुड इनफ फॉर मी कि जगत है द वर्ल्ड इज नॉट गुड इनफ फॉर मी ये अहंकार का भाव नहीं है पर क्या है जो जगत मुझे दे रहा है वो ख्याति देगा पैसा देगा ये सब जो है इसमें कुछ अर्थ नहीं इसके परे और कुछ होना चाहिए तो जो ऐसे चतुर विधा भजनते माना सुकृत जो अर्थात ज्ञानी च भरतवा जो ज्ञानी लोग होते हैं वो इस कैटेगरी में आते हैं। तो मतलब क्या है कि अंदर से ही देयर हैज़ टू बी समथिंग मोर और ऑब्जर्व करके लर्न करना। जैसे महाराज गंगा में बैठे थे और गंगा के बैठे थे तो वहां पे ही क्या गंगा की ध्वनि से उनको हरे कृष्ण महामंत्र की जो ध्वनि है वो सुनाई दी। तो गंगा के पास जाते हैं। गंगा की ध्वनि मधुर होती है पर ऐसे दिव्य जो ध्वनि है उसे जाना ये एक तरह से क्या है ये एक रियलाइजेशन जो हो रहा है तो दैट रियलाइजेशन हैज़ बीन द फाउंडेशन ऑफ स्पिरिचुअल जर्नी और फिर जब वो महाराज महाराज प्रभुपाद जी से मिले तो 1970 का जो सर्च है वो उनका था पहले सबसे पहले और उसमें अनेक प्रसंग ऐसे आते हैं जहां पे हम देखते हैं कैसे वो निस्ग से, व्यवहार से जो सीख रहे हैं तो साधारणता क्या होता है? जो हमारे स्पिरिचुअल ग्रोथ के लिए दो टीचर्स होते हैं। एक है स्क्रिप्चर और दूसरा है नेचर। नेचर मतलब क्या? जगत, निसर्ग स्वभाव। तो जो बिल्कुल नए है, जो न्यू होते है, उनके लिए 90% स्क्रिप्चर और 10% नेचर होता है। पहले स्क्रिप्चर से सीखना पड़ता है, फिर सर से कुछ सीख सकते हैं। पर जो ऑलरेडी एडवांस्ड है उनको स्क्रिप्चर पढ़ते भी पढ़ते हैं पर क्या है? उनके नेचुरली दुनिया को देखकर दुनिया का अनुभव करके उनको साक्षात्कार होते रहते हैं। तो ये महाराज का जो ऑब्जरवेशन से लड़नी है वो आगे भी मैं देखूंगा कैसे वो करते हैं। एंड हाउ दैट हैस शेप इसको जो सेवा की है जो प्रभुपाद जी की योगदान किया कैसे हुआ है। उसके बाद में जो है 1971 में प्रभुपाद जी से मिलते हैं। और उन्होंने फैसला किया होता की मुझे वृंदावन कभी नहीं छोड़ना वृंदावन से बड़ा आकर्ष आकर्षण हो जाता है पर अलग अलग चीजे हो जाती हैं Google कॉम्प्युटीशन होता है उनको छोड़ना पड़ता है तो जब छोड़ते हैं वह तभी वो क्या करते हैं वह सोचते है कि प्रभुपाद जी ने वृंदावन की एक रेप्लिका जो है अमेरिका में बनाया है तो वृंदावन में जाते हैं तो वहां पर जो है ए अनुराधा है अब्सॉर्ब तो दिस इज फ्रॉम 1970 टू टू 79 तो वहां पर जब महाराज जाते हैं तो वहां पे वो ड्यूटी वरशिप में लगते हैं। वहां पर वो गौ सेवा में लगते हैं और उसमें पूरी तरह से न्यू लव था। उस उस समय तो इंटरनेट में था नहीं। फोन भी ज्यादा यूज़ नहीं हुआ करते थे। ईमेल्स भी नहीं थे। तो महाराज वहां पे बिल्कुल पूरी दुनिया से डिस्कनेक्ट होकर एकाग्र रूप से विग्रहों की सेवा कर रहे थे। तो अभी तो ऐसा है कि एक विग्रह की सेवा करनी है तो अनेक पुजारी होते हैं। पुजारियों को मदद करने के लिए दासादास होते हैं जो सेवा करते हैं। तो पूरा एक्टिव पूरा डिपार्टमेंट हो जाता है। पर तभी महाराज अकेले सारे ऑफरिंग्स करते थे। सारे बैकअप करते थे। सारा कुकिंग भी करते थे। और जब हम वन मैन आर्मी कई बार विश करते हैं। जो विचार करते हो जाए और क्या है अगर हम बहुत मेहनत करके कोई सेवा कर रहे हैं तो कम से कम हमारी अपेक्षा होती है कि ठीक है कि मेरी सेवा मैं कितना कर रहा हूं ये कोई देखे उसको कोई अप्रिशिएट करे सराहना करे पर महाराज इतनी मेहनत करके सेवा कर रहे थे पर जो सेवा कर रहे थे वो भी मेन बेटी जो थी वृंदावन वृंदावन की मेन बेटी थी राधा वृंदावन चंद्र थी और महाराज जहां पर सेवा कर रहे थे वो राधा वृंदावन नाम तो उस समय प्रभुपाद जी का उद्देश्य था अभिजन था वास्तव में कि वहां पर वृंदा जैसे वृंदावन में अनेक मंदिर है वैसे न्यू वृंदावन में भी अनेक मंदिर हो जाए तो इसीलिए उन्होंने कई विग्रह लाए थे तो अभी जो राधा वृंदावन नाथ जो थे उनका मंदिर एक हिल के ऊपर था और वहां पर महाराज लगभग अकेले रहा करते थे अकेले ही सारी पूजा करते हुए गए थे तो अभी उदय से हिल के ऊपर उतना इनसेसिबल नहीं थे वो पर उस समय वहां पर कोई गाड़ियां वगैरह बहुत कम थी तो महाराज अकेले सब कुछ करते थे और फिर इतना ही नहीं साथ जो गायें थी गायों के गोर सेवा उनको बताई गई थी और वहां पे ऐसा प्लान था कि वो कई बार ऐसे कहे जाते थे कि 24 आवर्स वो कीर्तन करना था। तो बाकी डिवोटीस कंस्ट्रक्शन में वगैरह हुआ करते थे। तो वो और थोड़ा फिजिकल लेबर कर रहे थे तो वहां के ने भी कहा कि इनको रेस्ट चाहिए। तुम कुछ फिजिकल लेवल नहीं कर रहे हो तो तुम रात को कीर्तन करो। तो महाराज वो माउंटेन के ऊपर जाकर दिन भर वृंदावन की सेवा करते थे। और फिर वहां पर नीचे आकर रात भर नीचे वृंदावन चंद्र कीर्तन करते थे। और फिर सुबह अंधेरे में ही ऊपर जाकर मंगल आरती से वो इधर सेवा शुरू करते थे इसकी। तो आजकल हम ये शब्द बोलते हैं पॉवर नैप। पॉवर नैप मतलब क्या? दिन में आप 10 15 20 मिनट सोलो उसे आपका जाते हैं। पर क्या है कि नॉर्मली हम पावर नैप बोलते हैं। पावर नैप इज इन एडिशन टू द नाइट स्लीप। पर महाराज ओनली स्लीप वास पावर नैप्स। जब महाराज को इतना सेवा होता था तभी कि उनको सोने का समय कब मिलता था? इतना ही कि जब विग्रहों को ऑफरिंग किया है। और ऑफरिंग करने के बाद ऑफरिंग निकालने के बीच में वो 15 10 15 मिनट सो लेते थे। और बिना किसी अलार्म के उठ जाते थे। और क्या है कि हम थोड़ी सी कभी जन्माष्टमी का बड़ा उत्सव आ गया तो हम कम सो सकते हैं एक दिन नहीं सोए तो भी एक दो दिन कर सकते हैं ऐसे पर अगर रोज ऐसे करना है तो ये बड़ा मुश्किल हो जाता है तो तभी के जो लीडर थे उन्होंने उनको बताया था कि यही तुम्हारे जीवन भर की सेवा है कि तुम इनहीं विद्रोह की सेवा करो यू लुक यू डाई और महाराज उसके लिए पूरा रेडी थे तो क्या है कि अभी किसी व्यक्ति को हायर टेस्ट हम कहते हैं रियल टेस्ट का मतलब क्या है कि भगवान के स्मरण में भगवान की सेवा में भगवान के प्रेम में आनंद है या नहीं। वो कैसे पता चलता है हमको? तो क्या होता है कि हम इस जगत में जब कुछ सेवा करते हैं। किसी की सेवा करते हैं तो हम उनसे कुछ एक्सपेक्ट करते हैं। तो नॉर्मली कुछ भी है अगर हम क्लास दे रहे है तो वी एक्सपेक्ट पीपल टू अप्रिशिएट या टू कमिट ग्रो कोई भी सेवा करते हैं तो हमको कुछ रेसिप्रोकेशन होता है। हम जानते हैं कि इसके अलावा भगवान भी है और हम जो सेवा कर रहे हैं उनके द्वारा भगवान की सेवा कर रहे हैं और जब हम क्या कर रहे हैं माध्यम से भगवान की सेवा कर रहे हैं और वो व्यक्ति रेसोकेट कर रहे हैं पर जो भगवान भी रेसिप्रोकेट कर रहे हैं तो क्या होता है कि कभी नॉर्मली हमें एक प्रैक्टिकल रेसिप्रोकेशन होता है और एक डिवाइन रेसिप्रोकेशन होता अभी महाराज की ऐसी परिस्थिति थी कि कुछ प्रैक्टिकल रेसिप्रोकेशन था ही नहीं उनके इतनी ड्यूटी वरशिप कर रहे हैं श्रृंगार कर रहे हैं भोग लगा रहे हैं कोई दर्शन करने के लिए भी नहीं आता तो जब कोई इस जगत से रेसिप्रोकेशन है ही नहीं तो डे आफ्टर डे मंथ आफ्टर मंथ ईयर आफ्टर ईयर कोई सेवा कैसे कर सकता है उनको वो हायर टेस्ट जो है इनर रेसिप्रोकेशन है वह जरूर मिल रहा था तो बोथ इन ह सर्च फॉर गॉड एंड इन ह सर्विस टू गॉड यू नो महाराज फॉर महाराज द वर्ल्ड वास स्मॉल इट वास कृष्णा हु वास बिग दुनिया को उनको छोड़ छोड़ दिया था भगवान की खोज में और जब भगवान मिल भी गए तो ऐसे नहीं कि उनको भगवान दिखाना है कि मैं भगवान कितना महान भक्त हूं भगवान की सेवा कर रहे हैं वो और डीटी कंप्लीटली सेटिस्फाइड थे उसमें तो एक बार प्रभुपाद जी ने वृंदावन आए थे तो वह भी यह इतने सारे वो वृंदावन चंद्र का दर्शन करने आए थे वो यहा पर आते ही नहीं थे तो फिर किसी प्रभुपाद जी ने वहां के कमेटी को कहा कि आप ये डीटीस का राधा वृंदावन का चित्र तो आप उनको दिखा दीजिए फोटो आता तभी तो उन्होंने दिखाया तो जब उनको दिखाया प्रभुपाद जी को पहुंचे डीटीस कहां है मुझे उनको देखना है तो अभी वो प्रभुपाद जी का पूरा स्केेड्यूल प्लैक था तो बोले कि समय नहीं है प्रभु जी नहीं मुझे उनका दर्शन करना है तो फिर प्रभुपाद जी चले और वो वो जो हिल था उसके ऊपर जाना था तो रास्ता था बड़ा खराब असा हुआ था उसको आघात स्वरूप कहा गया कभी गासुर खा लेता है तो फिर वो वो व्हीकल्स को खा लेता था। तो क्या होता था प्रभुपाद जी जा रहे थे ऊपर वो गाड़ी खराब हो गई। तो फिर भक्त बोले प्रभुपाद जी बड़ा मुश्किल जाना पड़ा मैं नहीं जाऊंगा। तो फिर क्या हुआ था कि महाराज को पता ही नहीं था कि प्रभुपाद आने वाले है। तो महाराज अपनी पूजा कर रहे थे और जब पूजा कर रहे थे एकाएक उन्हों ने देखा कि कोई मंदिर में आया देखा तो प्रभुपाद जी आ गए। तो एक दो महाराज जी बाहर आ गए प्रणाम किया हृदय को अपना किया प्रभुपा दर्शन किया प्रभुपाद जी बहुत प्रसन्न हो गए तो प्रभुपाद जी कुछ चलते हुए पर आ गए थे सो दैट वास वन रिवॉर्ड पर महाराज पूरी तरह से अब्जॉर्ब थे तो अब्सॉर्प्शन का मतलब क्या है अनेक अर्थ हो सकते हैं पर एक अर्थ ये है कि वी आर सेटिस्फाइड इन कृष्णा अलोन और हमें और कुछ नहीं है। महाराज के वरिष्ठ गुरु भाई है उन्होंने बाद में कई सालों के बाद महाराज को पूछा की कि कृष्ण भावना में हमें सक्सेस है, स्टेबिलिटी है, सेफ्टी है। इसका सीक्रेट क्या है? महाराज ने कहा अब्सॉर्पेशन। उन्होंने खुद अपने जीवन में दर्शाया है कैसे हमें अब्सॉर्ब रहना है। फिर उसके बाद में जो है थर्ड आता है। जो है हमें अभी व्हाट इज द एक्रोनियम? हम देख रहे हैं। आंसर डी आता है। तो डी है डेकी। तो उस समय लगभग लेट 90 70 नहीं 80 से 80 से लगभग 85 तक क्या हो गया तब एकाएक महाराज को बताया गया कि अगला आप कॉलेज में जाकर टीचिंग करो तो अभी महाराज भले ही वहन में मैनेजमेंट में नहीं थे पर क्या था उनका स्पिरिचुअल डेडिकेशन इतना था उनका वो कम्युनिटी में नेचुरली वो रिस्पेक्ट हो गए थे और ऐसे हुआ था कि ही वो कंप्लीटली वो कंप्लीटली वो नितीश के सेवा के लिए समर्पित थे। पर अचानक उनको बताया गया कि कि आप जाके कॉलेज टीचिंग करो। तो वहां पे हुआ क्या था कि वहां पे दूसरे एक लीडर आने वाले थे। ही वांटेड टू कम एंड स्टे इन यू वृंदावन। और वो दूसरे लीडर जो आने वाले थे उनकी इच्छा थी कि जो भी वहां के नियोजन के लीडर थे। उनका मैं सेकंड बनूं। फिर बाद में आफ्टर हिम आई विल बिकम द फर्स्ट। तो पर उनका भाव क्या था कि जब तक राधा वहां पे है कि ही विल बी रिस्पेक्टेड मोर। उन्होंने कंडीशन रखा कि इफ आई एम गोइंग टू कम ही शुड लीव। तो महाराज सरेंडर थे। उन्होंने एक्सेप्ट कर लिया। जब उनको बोला गया कि आप जाके कॉलेज टीचिंग करो। तो वो कुछ भी नहीं दिया। उनको सिर्फ एक व्हीकल दिया और वो व्हीकल में ही महाराज रहते थे। वहीं पे अपना मंगल ज्ञानी प्राणायाम करते थे वहीं पर कुकिंग करते थे वहीं पर सोते थे और उसको आर्मी कहते व्हीकल तो उसमें महाराज भी वृंदावन से अनेक जगह पर ट्रेवल करते थे तो अभी वही जो व्हीकल है या उसका अगला अवतार कह सकते हैं पर वही व्हीकल डालस में एक भक्त के घर में है तो जो महाराज जैसे ड्राइव करते थे अलग जगह पे तो उन्होंने उस समय से चालू किया कॉलेज पर और क्या था कि वो पहले भगवान की खोज में निकले थे और फिर बाद में न्यू वृंदावन में थे। तो न्यू वृंदावन में पूरा वो बाकी दुनिया से डिस्कनेक्ट हुए थे। तो एक तरह से अभी क्या होता है कि हमारी सेवा होती है सेवा बदल जाती है। तो थोड़ा मुश्किल होता है। और हमारी इच्छा के विपरीत बदल जाती है तो और मुश्किल हो जाता है। पर क्या है? एक सेवा बदल गई। दूसरी सेवा थोड़ी सिमिलर है। ठीक है? आप यहां पे प्रचार कर रहे हैं वहां पे कमेंट बना रहे हैं। फिर यहां पे प्रचार तो वहां पे जाके प्रचार करो। पर क्या है दूसरी जगह जा रहे पर क्या है फिर भी प्रचार ही कर। सेवा सिमिलर है जगह अलग है। पर अभी यहां पे क्या हो गया? महाराज का जो केवल सेवा बदल गया पूरा जो सिचुएशन था वही बदल गया। क्योंकि क्या था जब वो ड्यूटी वरशिप कर रहे थे और साहू गोवा कर रहे थे। तो मोस्टली वो सेक्लूज़न में थे। अकेले थे। और न्यू वृंदावन में ज्यादा लोग नहीं आते थे। और कोई लोग आते भी थे तो वो तो नीचे आते थे। महाराज हिल के ऊपर थे। तो महाराज प्रैक्टिकली नेवर प्रीचिंग टू एनीवन। तो इसके जब कॉलेज प्रीचिंग में जाने को उनको बोला उसके पहले महाराज ने कभी प्रीचिंग किया ही नहीं क्लासेस थोड़ी बहुत वैसे नए लोगों को जाकर प्रचार करना तो अभी वो पूरे आइसोलेशन में रहते थे या भक्तों के संग में रहा करते थे मोस्टली आइसोलेशन में थे अकेले सेवा कर रहे थे अभी दुनिया में जाओ बिल्कुल शहरों में जाओ कॉलेज में जाओ अभी तक महाराज निस्ग में रहा करते थे और निसर्ग में रहना उनको पहले से बहुत प्रिय था इसलिए हिमालय में जाकर गुफा में रहे थे वृंदावन में मिश्र के पास गए थे। वृंदावन मिश्र के पास थे। पर अभी क्या है कॉलेजेस मतलब क्या है? वो भले ही शहरों में होते हैं, कभी-कभी अमेरिका में क्या है? कुछ यूनिवर्सिटी टाउन होते हैं। मतलब क्या है पूरा टाउन वो यूनिवर्सिटी के अराउंड बिल्ड होता है पूरा। पर फिर भी क्या है यह अर्बन है तो वहां पर मटेरियलिजम है, वहां पे इंद्रिय तृप्ति है। तो पूरा जो वातावरण है, बिल्कुल बदल गया। और किसी को भी इतना सेवा बदल जाएगा। तो कोई पुजारी वरशिप कर रहा है तो पुजारी पूरा बंद कर दो और आप प्रीचिंग करो। तो क्या है ये बिल्कुल अलग है एक तरह से। जब कोई प्रीचिंग कर रहा है उनको बोला पूरा ब्रीचिंग बंद कर दो आप सिर्फ वीडियो कर दे वेरी रेडिकली डिफरेंट सर्विसेस बट महाराज एक्सेप्टेड दैट तो क्या था कि एक तरह से महाराज वास अनक् भी सपोर्ट नहीं था। उनका विचार अलग था ही अनक्क बट ही वास नेवर अनविली। वो कभी अनविली नहीं थे। तो इतना उस समय क्या हुआ था कि जब महाराज 1966 में जब वो कॉलेज के यूथ से कनेक्टेड थे उसके बाद में वो इंडिया पर चले गए आध्यात्मिक खोज के लिए तो उस समय अमेरिका में वियतनाम वॉर चल रहा था और जब वियतनाम वॉर हो रहा था तभी क्या हुआ था कि अमेरिका ने कॉन्स्क्रिप्शन चालू कर दिया कॉनक्रिप्शन मतलब क्या है जबरदस्ती मिलिट्री में भर्ती होना है जो भी युवक है जो पुरुष है जो मेल्स है एक अबव पर्टिकुलर एज हमको जबरदस्ती वो जॉइ करना है मिलिट्री में तो बहुत बहुत लोग वहां पर मारे गए और उसे उसे यू यू में बहुत रिजेंटमेंट आ गया था तो महाराज जब 79 80 में प्रचार करने गए तो महाराज ने बताया कि देखिए कैसे है कि अगर तभी क्या होता था कुछ लोग होते थे वो वो ड्राफ्ट ना हो मंत्री में जबरदस्ती ना जाए इसीलिए वो ब्रह्मचारी बन जाते थे। तभी ब्रह्मचारी नहीं थे। इस नहीं था तभी पर वो क्रिश्चियन चर्च में कैप्सूल बन जाते थे। तो क्या अगर आप रिलीजियस डिनोमिनेशन चले गए हो तो फिर क्या होता है अगर आप रिलीज जाते हो तो आपके रिलीजन अगर आपका कहता है कि आपको वायलेंस नहीं करना चाहिए। तो फिर आपको एक्सक्यूज मिल रहा था वो। तो महाराज ने मेंशन किया और एक विद्यार्थी उनको विचित्र रूप से देख रहा था कि अगर आप ड्राफ्ट पे जाके वियतनाम चले जाओगे तो वो विधि महाराज को बोला कि 10 साल पहले ड्राफ्टिंग का बंद हो गया तो क्या था महाराज पूरे अनकनेक्टेड थे इतने भगवान में इमर्स थे भगवान की सेवा में इमर्ज थे कि उनको बिल्कुल पता नहीं था पर फिर भी महाराज जो है वो प्रचार करते गए और उस समय प्रचार बहुत मुश्किल हो गया था 1960 में युवको में काफी ओपननेस था तो प्रभुपाद जी जब गए तो उस समय क्या बहुत युवकों में ईस्टर्न कल्चर जो था ईस्टर्न स्पिरिचुअलिटी के बारे में रुचि थी पर उस समय क्या हो गया कई लोग आए कुछ कई्स आ गए उन्होंने लोगों को मिसलीड किया ब्रेन वाशिंग का फियर हो गया तो उसके बाद में बाय द टाइम ऑफ द 80 जो यूको में जो स्पिरिचुअल क्यूरियोसिटी था वो कम हो गया था और सोसाइटी में स्पिरिचुअलिटी स्पिरिचुअलिटी में सस्पिशन बढ़ गया था तो क्या था जब महाराज जाते थे प्रचार करने को तो फिर खासकर कॉलेज में उस समय काफी कोल्ड रिसेप्शन था। हमारी दृष्टि से हम भारत में है तो हमको लगता है अमेरिका मतलब बहुत भौतिकवादी है। अमेरिका मतलब वो हॉलीवुड है। अह हां वो सही है। बट दैट्स ओनली वन पार्ट ऑफ़ अमेरिका। जो पाश्चात्य देश है। पाश्चात्य देशों में सबसे रिलीजियस कंट्री जो है अमेरिका है। जो बाकी सारे पाश्चात्य देश है जो अगर हम यूके देखते हैं, फ्रांस देखते हैं। फ्रांस इस प्रॉब्ली द वर्ल्ड लीडर इन एथिज्म। तो पर यूके, फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड ये सभी काफी एथिस्टिक है। पर अमेरिका में जो है एक साउथ और मिडिल स्टेट मिडिल है। जो है जो कोस्टर्न रीजंस है वो काफी मटेरियलिअस्टिक है। साउथ और जो मिडिल है। वो काफी रिलीजियस है। तो न्यू वृंदावन जो है उसके आजू-बाजू में सारे इलाके हैं। देर कंजर्वेटिव क्रिश्चियंस। तो कॉलेज एंड क्रिश्चियन का बहुत इन्फ्लुएंस था। तो बोले ये क्या तुम ये व्यक्ति कहां से आ रहा है? कई से कोई प्रचार कर रहा है। रहा है या कोई अलाव ही नहीं करेगी। तो तभी अभी प्रचार का सेवा दिया गया है और प्रचार करने का मौका नहीं मिल रहा है। का परमिशन नहीं मिल रहा है तो तभी क्या करें? तो जो कैसे होता है कि भागवत में बताते हैं कि भक्त जो होते हैं गंगेम उद्वती ऐसे गंगा हमेशा सागर को जाती रहती है। ऐसे भक्त चेतना हमेशा भगवान की जाती है। गंगा को अगर कुछ रास्ता ब्लॉक हो गया तो ऐसे नहीं जा पा रहे तो ऐसे जाएगा ऐसे जाएगा। कहीं से कहीं ना कहीं कभी जो है वो गंगा जो है सागर की ओर जाती ही रहेगी। तो सीधे जा सकती है सीधा जाएगी जाएगी तो टेढ़े जाएगी। नहीं तो फिर पूरा मुड़के भी जा सकती है। तो कहीं ना कहीं तो मार्ग निकालना ही है। तो अभी क्या है? तो जब डायरेक्टली कुछ प्रीचिंग नहीं हो रहा था तो फिर महाराज जी तभी इनडायरेक्ट प्लेऑ चालू कर दिया तो क्या है कुकिंग क्लासेस चालू कर दिया उन्होंने तो जो अभी वहां पर कुकिंग सिखाते थे तो थोड़ा ईस्टर्न कल्चर में रुचि है तो वो कुकिंग सिखाने तो महाराज हलवा बनाते थे और वो जो हलवा सिखाते थे लोगों को और लोग खाते थे और बहुत अच्छा लगा उनको तो पर क्या हुआ तभी कुछ क्रिश्चियन प्रीस्ट आते थे और वो कहते थे वो सुपरवाइज करते थे वाच करते थे तुम कुछ भी प्रचार नहीं करना है तो सिर्फ कुकिंग प्रीचिंग तो एक बार एक क्रिश्चियन प्रीस्ट आ गया था। उसने क्या आया था वो? अभी अभी क्रिश्चियनिटी हमारे हमारे धर्म संकल्पना क्या होती है? अनेक धर्म है। सब भगवान के मार्ग भगवान की ओर लोगों को अलग-अलग पर्व से लेकर जा रहे हैं। ये हमारी संकल्पना है। पर कई क्रिश्चियन होते हैं उनकी संकल्पना ऐसी होती है। कोई भी दूसरा धर्म है। वो क्या है? वो भगवान की ओर मार्ग नहीं है। वो नरक की ओर मार्ग है। और ये बाकी सारे धर्म जो है वो शैतान से आए। तो वो अभी क्या हुआ जो आया था। वो जब आया था यह क्या कर रहे देखने के लिए। तो एक बड़ा बाइबल और एक बड़ा क्रॉस लेकर आया। यह शैतान का अड्डा है। मेरे साथ फोन के लिए साथ लेके आया उसमें। और फिर पूरा देख रहा था सस्पिशियसली। और फिर बाहर आया कुकिंग किया। कुछ भी प्रचार नहीं किया। सिर्फ वेरी कैसे की वेरी प्लेज़ेंटली बात करना। और लोगों से एक संबंध जोड़ना। हम्म ये करते थे। और फिर बाद में जब हलवा बन गया तो प्रोफेसर को भी ऑफर किया वो टीचर को भी ऑफर किया बोला नहीं क्रिश्चियन पीस था वो नहीं बोला नहीं लूंगा फिर बाकी सब लोग प्रसाद ले रहे थे सब विद्यार्थी थे बड़े आनंद से खा रहे थे वाह वाह कितना अच्छा है तो उसको महाराज ने देखा कि वो भी सुन रहा है देख रहा है थोड़ा सा ले लो आप महाराज ने दिया उसने लिया उसको स्वाद इतना अच्छा लगा कि और दो आप और दो फिर अगले हफ्ते तो महाराज जैसे थे उस समय उनके छह सात कॉलेज थे और और रोज शाम को वो एक कॉलेज में आया करते थे। फिर अपने वैन में ट्रेवल करके एक दो दिन घंटा ट्रेवल करके अगले दिन अगले ट्रेवल में। फिर बाद में उन्होंने चेंज किया कि दो-तीन दिन वो एक जगह पे अपने वैन में रहते थे और कॉलेज में प्रीचिंग करते थे। और वैसे उन्होंने ट्रेवलिंग सर्किट बनाया था। तो जो अगली बार जो महाराज उस कॉलेज में आए तो प्रोफ़ेसर जो प्रीचर था और क्या वो वो प्रीचर भी था। उसका चर्च वो कॉलेज में चर्च भी था उनका। तो जब वो आया तो इस बार आया था तो वह बाइबल और क्रॉस दोनों थोड़ा छोटा बन गया था। तो ऐसे ही कई हफ्ते गए हर बार जो आना था उसका बाइबलों में छोड़ो थोड़ा बच्चे और फिर बाद में फिर अभी महाराज बताने की वो बाद में हरे कृष्ण जप भी करने लग गए और अपने थे वो और भक्ति भी करने लग गए। तो क्या है कि यहां पे हम जो प्रीचिंग बोलते हैं। सो प्रीचिंग इज नॉट जस्ट थ्रू आवर वर्ड्स। तो अभी क्या होता है कि वहां पे केवल अपने एक्शन से बाहर जब वो अट्रैक्ट करते थे और फिर क्या होता था वो लोग पूछते थे कि कि अच्छा आपकी फिलोसोफी क्या है आपके आप क्या प्रैक्टिस करते हो तो मैं जब अमेरिका में प्रचार करने लग गया था तो मैंने महाराज से कुछ मार्गदर्शन पूछा कि आप कुछ गाइडेंस दो आप महाराज तो व्हाट शुड आई बी केयरफुल अबाउट तो महाराज ने बताया कि बी वेरी केयरफुल अबाउट प्लांटेड क्वेश्चन यह प्लांटेड क्वेश्चन का मतलब क्या है? कोई व्यक्ति जो हमारा हित चिंतक नहीं है, वह जानबूझ के कौन कोई कंट्रोवर्सल सवाल पूछ लेता है। और फिर उसके जवाब में हम कुछ बोल देते हैं और वो रिकॉर्ड कर लेगा और दुनिया बोलेगा इस व्यक्ति ने ऐसे कहा, इस व्यक्ति ने ऐसे कहा, इस व्यक्ति ने ऐसे कहा। तो फिर तभी मैं आई वास वेरी सरप्राइज। इतना अलग अलग इंस्ट्रक्शन दे सकते थे महाराज। तब भाई ने इंस्ट्रक्शन क्यों दिया? तो ये हुआ क्या था? बाद में पता चला। कि तभी जब महाराज वहां पे कॉलेज जाते थे कॉलेज में कुकिंग करते थे। तो वो वो क्रिश्चियन प्रीस्ट जो थे वो वो अपने क्रिश्चियन लोगों को भेजते थे। कि तुम सवाल पूछो और अगर तुम उनसे फिलॉसफी के बारे में पूछो और वो फिलॉसोफी के बारे में कुछ बोलेंगे। तो फिर हम पकड़ लेंगे। ये फिलोसोफी प्रीचिंग कर रहे हैं। और इसको हम निकाल देंगे उन कॉलेज से। तो क्या था महाराज इतने शुरू थे वो प्लांटेड क्वेश्चन और नहीं। तो क्या है महाराज बिल्कुल कुछ फिलोसफी के बारे में नहीं बोलते। पूछ भी रहे तो नहीं बोलना है। तो एक तरह से क्या है चैतन्य महाप्रभु ने कहा 11 देखो तारे कहो कृष्ण उपदेश। जिसको मिले आप कृष्ण उपदेश बोलो। पर क्या है महाराज वास डूइंग अ ही वाज इन द फॉर अ लॉन्ग गेम। तो क्या हुआ लोगों में बहुत उत्साह हो गया और फिर बाद में महाराज वो जब लोग और इंटरेस्टेड हो गए और और बहुत क्यूरियस हो गए। तो फिर कॉलेज प्रिमाइससेस के बाहर वो अपने आर्मी में वहां पे जो इंटरेस्टेड बच्चे थे उनको बुलाते थे। और वहां पर उनको कृष्णा सिखाते हैं। तो क्या है ही वास नॉट प्रीचिंग इन द कॉलेज। ही वास नॉट प्रीचिंग इन द कॉलेज। ऑलदो ही वास प्रीचिंग टू द कॉलेज। क्या है? वो कॉलेज में प्रचार नहीं कर रहे हैं। जैसे वो कहते हैं कि बी इन द वर्ल्ड बट नॉट आउट द वर्ल्ड। उसी तरह से महाराज जो है स्ट्रेटेजिकली वहां पे प्रचार करते हैं। उनका प्रचार इतना यशस्वी हो गया था। अभी इस समय अभी राधा महाराज जो है पूरे इस्ॉन के विश्व में ही प्रोब्ली मोस्ट अमोंग दम प्रोमिनेंट लीडर्स दो तीन प्रोमिनेंट लीडर्स में से वो टॉप है अभी पर उस समय ही वास जस्ट वन ब्रह्मचारी और उस समय क्या था जो प्रभुपाद जी के शिष्य थे अभी गुरु बने थे वो उनके शिष्य थे महाराज तो अभी गुरु भी नहीं थे उस समय तक तो ही वास अननोन ही लाइक अननोन ब्रह्मचारी थे उस समय हम अननोन कॉलेज टीचर थे बेसिकली तब तक तो अभी फिर भी इनका कॉलेज इतना सक्सेसफुल हो गया तभी इसके एक बहुत ही विख्यात साइंटिस्ट थे थॉमसन सदाबुत्र प्रभु उनको पता चला और उन्होंने कहा कि आई विल ट्रेवल विद यू और कई महीनों तक वो दोनों साथ में ट्रेवल करते थे और सदापुत्र साइंटिफिक टॉक देते थे और फिर महाराज जो है वो एक डिवोशनल टॉक देते थे और अभी कई जगहों पर उन्होंने वो जो अनेक लोग अनेक व्यक्ति भक्त बन गए और जो कॉलेज टाउन है उनमें वहां से धीरे-धीरे वहां पर मंदिर बन गए तो मैं जब पहली बार मैं जहां गया था तो मैं महाराज ने पूछा कहां गए थे तुम? तो मैंने बताया कि मैं कोलंबस वहां गया था। तो महाराज ने बताया कि मुझे कोलंबस आया जो डीटीज है वो मैं ही मेरे वैन में ड्राइव करके लेके आया था और मैंने स्टार्ट किया वो टाइम तो अभी वहां पर जो भक्त हैं अब एक नया मंदिर बनाने वाले हैं। वो बन चुका है। तो महाराज ने बताया भक्तों को कि जब आप नए मंदिर में आप एलईडी लेके जाओगे तो आई ड्रॉ द डीटी टू दिस टेंपल एंड आई विल ड्राइव द डीटी टू द नेक्स्ट टेंपल। तो अभी महाराज को प्रॉमिस किया कि मैं ड्राइव करूंगा। तो अभी भी महाराज अमेरिका में होते हैं वो खुद को ड्राइव करते हैं। नॉट ऑलवेज शिकागो में होते हैं ही प्रेफर्स टू ड्राइव बट जो है महाराज से उनके कॉलेज प्रीचिंग से बहुत से ऐसे यूनिवर्सिटी टाउन में जो सेंटर्स है वो बन गए मेनी ऑफ़ देम आर सम ऑफ़ देम आर कंटिन्यू इवन नाउ। पर यहां पर भी कैसे हो गया? जैसे ही अभी उनका प्रीचिंग था जो फाउंडेशन ले हो गया था और अभी बहुत एक्स पहले ऑलरेडी रिजल्ट आने लग गए थे पर और रिजल्ट्स आने ही वाले थे क्या हो गया था वो अकेले थे पर उन्होंने कल्टीवेट करके लोगों को लाया और वो लोग विभक्त बन गए थे और वो उनको असिस्ट करने के लिए कुछ टीम बन गया था पर जैसे ही पांच छ सालों में ये मर गया तभी क्या हो गया उनके जो कम्युनिटी थे उन्होंने बोला कि आप भारत चले जाओ और उन्होंने कहा कि मैं जब भारत जाऊंगा तो कॉलेज टीचिंग घर चलेगा। दैट इज वो कृष्णा देख लेंगे। तो वास्तव में हमने हमने खुद स्क्रैच से अगर कोई प्रोजेक्ट चालू किया है और पूरा डेडीकेशन से अगर वो किया है और फिर अचानक बोल तुम चले जाओ यहां से। और कोई कोई सक्सेशन प्लान भी नहीं है एक तरह से। ऐसे कंस्ट्रक्टर तो कि उसके लिए जो नॉन डूअरशिप है कि मैं करता नहीं हूं। ये भाव आसान नहीं है। तो वो महाराज का भाव था। तो जब वो इंडिया में आए तो तभी भारत में अभी क्या हुआ था? इंडिया वास इन अ वेरी क्यूरियस फेस एट दैट टाइम। तो ये हमारे लिए काफी रेलेवेंट है। जब प्रभुपाद जी जो थे तो प्रभुपाद जी के समय दो प्रकार के भक्त थे। एक है उनके वेस्टर्न डिसाइपल्स थे। हम्म यह फुल टाइम डिवोटीस थे। यह पूरे डेडिकेटेड थे। पर प्रभुपाद जी जब भारत में आए तो बहुत कम लोग प्रभुपाद जी दीक्षा ली। तो क्या हुआ? तभी इंडिया में प्रभुपाद जी के बहुत लाइफ मेंबर्स बन गए। लाइफ मेंबर्स मतलब क्या थे? वो कोई डोनेशन देते थे। कभी मंदिर में आके रहते थे। और थोड़ा कनेक्शन था उनका थोड़ा अप्रिसिएशन था तो प्रभुपाद जी का ऐसे योजना थी या होप था कि वो लाइफ में धीरे-धीरे शिष्य बन जाएंगे डिवोटी बन जाएगी पर वो हुआ नहीं तो ये जो थे ये डेडिकेटेड थे और ये जो थे एक तरह से सपोर्टिव थे पर ये जो आए थे यहां पे लाइफ मेंबर जो बने थे वो अधिकांश रूप से प्रभुपाद जी के अह देर मोर अट्रैक्टेड टू प्रभुपाद अचीवमेंट्स देन टू हिज टीचिंग्स। वो जो आए थे प्रभुपाद जी ने ये स्वामी ने परदेश में जाकर प्रचार किया और परदेशियों को भक्त बनाया। परदेशियों को ही नहीं क्या है जो सफेद लोग थे। अमेरिकन ब्रिटिश लोगों को भक्त बनाया। तो इससे बहुत इंप्रेस लोग इंप्रेस हो गए थे। और क्या प्रभुपाद जी के पहले भी कुछ और भारतीय आध्यात्मिक टीचर्स गए हैं। उन्होंने भी पाषाण देशों में इंपैक्ट किया है। पर प्रभुपाद जी का एक डिस्ट्रिक्टिव चीज क्या था? प्रभुपाद ने केवल एक फिलॉसोफिकल टीचिंग नहीं दिया। उन्होंने एक कल्चरल ट्रांसफॉर्मेशन भी किया। प्रभुपाद जी के पहले जो भी स्पिरिचुअल टीचर गए थे उन्होंने अपने उनके जो अनुयायी लोग जो भी थे उनको नहीं बताया कि तुम धोती गुप्ता पहनो तुम साड़ी पहनो। तो क्या है जब भारतवासियों ने देखा कि परदेसी लोग न केवल हमारी शिक्षाएं हम कोशन कर रहे हैं पर हमारी संस्कृति का स्वीकार कर रहे हैं। तो दैट क्रिएटेड अ सेंसेशन। और फिर बहुत से लोग प्रभुपाद जी से कि ये स्वामी जो है दे केम नॉट सो मच फ्रॉम स्पिरिचुअल इंटरेस्ट एस फ्रॉम कल्चरल प्राइड कैसे स्पिरिचुअल उनको इंटरेस्ट ये स्वामी जी क्या सिखा रहे हैं कि मुझे ये स्वामी जी का शिष्य बनना है क्या है ये स्वामी जी ने हमारे भारतीय संस्कृति को इतना बड़ा बनाया है तो उनको सपोर्ट करना चाहिए और प्रभुपाद जी इतना एक्सपर्ट थे कि जो भी जैसे आता है उनको प्रभुपाद जी ने स्वीकार किया और उनको लाइक मेंबरशिप का प्रोग्राम लिया और हजारों हजारों के लोग लोग में संख्या में लोग लाइफ मेंबर बन गए। पर ये जो लाइफ मेंबर्स थे वो अधिकांश रूप से बने थे किस लिए? वो प्रभुपाद जी से बहुत प्रेरित हुए थे। और फिर प्रभुपाद जी भगवत धाम चले गए। उसके बाद में एक तरह से क्राइसिस हो गया। तो प्रभुपाद जी के पाश्चात्य शिष्य थे। वो पाश्चात्य देशों में बहुत प्रचार में सक्सेसफुल हो रहे थे। और एक समय यूरोप में हमारे 300 मंदिर हम तो बहुत से भक्त पाश्चाता देशों में लोग भक्त बन रहे थे। पर जो प्रभुपाद जी के पाश्चात्य शिष्य थे तो कैसे था कि जो प्रपा जी के वेस्टर्न डिसाइपल थे दे यंग गोइंग टुवर्ड्स मिडिल एज और वो यंग यंग लोगों को प्रीच करके पाश्चात्य देश में बहुत से लोगों को भक्त बना रहे थे पर जब वो भारत में आए और भारत में प्रचार कर रहे थे भारत में मंदिर बन गए थे पर क्या हुआ था वो प्रचार में भारतीय लोगों को भक्त बनाने में नहीं हो रहे थे तो इसीलिए अभी हां प्रचार हो रहा था पर इतना नहीं हो रहा था और प्रचार भी कभी कैसा था कि उस समय तो व्हाट आई ट्राइंग टू से महाराज ने बता रहा हूं कि महाराज ने किस तरह से जो विजन से भारत में प्रचार किया है क्या उन्होंने योगदान किया आई एम ट्राइंग टू बिल्ड द बैकग्राउंड फॉर दैट तो उस समय क्या था जो लाइफ मेंबर्स थे वो लोग अभी भी जो कुछ प्रभुपाद जी के शिष्य थे जो बाकी लोग थे वो जाते थे लाइफ मेंबर बना रहे थे पर प्रभुपाद जी नहीं थे तो इतना इंप्रेसिव नहीं था उनके लिए वो नहीं बन रहे थे वह तब बन रहे थे कुछ पर क्या हुआ था कोई फुल टाइम डिवोटीज नहीं थे कोई भारतीय तभी मंदिर में ही आए थे एक भक्त बता रहे थे मुझे तभी हम क्या करते थे कि मंदिर में सेवा करना है मंदिर सेवा करने के लिए कोई नहीं है तो बॉम्बे के लिए बता रहे थे कि हम बॉम्बे रेलवे स्टेशन में जाते थे और जो लोग वहां पे बॉम्बे रेलवे स्टेशन में सो रहे हैं बोले तुम मंदिर में आकर सो थोड़ी सेवा कर हमको प्रसाद दे दे और वैसे मंदिर भी लोग आया करते कोई रिक्रूटमेंट पॉलिसी था स्ट्रेटजी था ही नहीं उसमें और फिर जब महाराज यहां पे आए हैं तो उस समय तो यहां पे आई एम गोइंग टू टॉक अबाउट दिस इज़ द बिगेस्ट सर्विस ऑफ़ महाराज आर एन एच ए एन जो है महाराज क्रिएटेड अ स्पिरिचुअल होम थ्रू ह एप्रिशिएटिवनेस सॉरी थ्रू हड अप्टेबिलिटी और थ्रू ह नॉन जजमेंटल एटीट्यूड तो नॉन जजमेंट लैटीट्यूड आई विल एक्सप्लेन व्हाट दिस मीन्स तो वी आर डिस्कसिंग द एक्रोनिम आर ए डी एच ए ए टी एच तो अभी यहां पे क्या हो गया जब उस समय इस्कॉन में जो प्रचार हो रहा था बहुत प्रचार हो रहा था पर इस तरह से प्रचार हो रहा था कि लोग भक्त बनते थे कुछ समय भक्ति करते थे कुछ प्रॉब्लम आता था भक्ति छोड़ के चले जाते थे तो एक तरह से रिवॉल्विंग डोर था तो 1977 से 1987 प्रभुपाद जाने के 10 साल बाद लगभग प्रभुपाद जी के 90% जो डिसाइपल्स थे वो इस छोड़ के चले गए कुछ भक्ति अभी कर रहे थे पर वो इसकी भावना नहीं थी और फिर जो प्रभुपाद जी के डिसाइपल्स थे जो गुरु बन गए थे वो प्रचार कर रहे थे पर कभी उनको समस्या आ गई वो भी छोड़ के चले गए सारे शिष्य भी चले गए तो कुछ शिष्य चले गए कुछ शिष्य रहे उसने एक तरह से काफी केस था और ये एक तरह से स्वाभाविक है। क्योंकि क्या है कि एक महान आचार्य जब आते हैं प्रभुपाद जी खुद लिखते हैं कि महान आचार्य आते हैं तो आचार्य ब्रिंग्स ऑर्डर अमीर केओस। और जब आचार्य आते हैं तो वापस के पा जाता है। तो प्रभुपाद जी इतने शक्तिशाली थे तो प्रभुपाद जी ने एक बड़ी संस्था स्थापित कर दी। पर उसके बाद में प्रॉब्लम्स एकदम स्वाभाविक थी। तो जब महाराज भारत में आए तो उस समय उन्होंने क्या देखा कि अभी उन्होंने अमेरिका में देखा था। न्यू वृंदावन में रहे थे वो तभी कॉलेज आउटच में अलग सेंटर में ट्रेवल कर रहे थे। तो उस समय भी महाराज क्रिएटेड अ होम इन राधा गोपीनाथ टेंपल। होम का मतलब क्या है? कि कैसे हैं? उस समय ऐसा भाव था कि अगर कोई भक्त जो है भक्ति छोड़कर चला जाता है। तो उस समय क्या होता है? उस समय ऐसा भाव था कि आपको भक्त बनना है मतलब मंदिर में आना है। मंदिर में जो फुल टाइम होते हैं वो भक्त हैं। और जो मंदिर में नहीं है वो माया में है। तो कहते हैं कि जो मंदिर छोड़ने जाता है तो वो द ट्रांजेंडेंटल वास रिड्यूस टू द ज्योग्राफिक। मंदिर में है तो आप भक्त हो मंदिर के बाहर है तो माया में हूं। और इतना नहीं था। सुधार क्या था? कोई अगर भक्त छोड़ के जाता था तो सारे मंदिर के भक्त साथ में आते थे और सारे भक्त वो भक्त जो जो चला गया भक्त छोड़कर उसको दोष ढूंढते थे। अरे देखा हमेशा सोया करता था। मुझे पता है कि महाप्रसाद चोरी करता था। मुझे पता है कि ये बहुत प्रचलित करता था या अपराध करता था। तो इस तरह से जो भी भक्त चला गया है उसमें दोष देख के सारी उसकी ही गलती है। और हम परफेक्ट है। हमारी कम्युनिटी परफेक्ट है। यही माया में चला गया। ऐसा भाव करके खुद ऐसा अपने आपको सांत्वना कर देते थे। पर प्रभुपाद जी ने बताया था। बाद में तमाम शिवाजी उसको कोट करते थे काफी। कि अगर कोई भक्त चला जाता है। भक्ति छोड़ के तो प्रभुपाद जी बोलते इट इज 50% देयर हिज रिस्पांसिबिलिटी और देयर रिस्पांसिबिलिटी या 50% आवर रिस्पांसिबिलिटी छोड़ के चला गया है तो या उनकी भी कुछ गलती है पर हमारी भी कुछ गलती है। हमें भी उनका देखभाल करना है। तो महाराज ने फोकस किया क्या कि जो भक्त छोड़ के जा रहे हैं उनको दोष नहीं देना है। हमें क्या करना है जिससे कि भक्त बने रहे। हमें क्या करना है जिससे कि भक्त जीवन भर भक्ति कर सके और इसी में जो है महाराज ने बोथ फॉर द ब्रह्मचारी एंड फॉर द गृहस्थास दोनों के लिए उन्होंने एक स्पिरिचुअल होम बनाया। पहली चीज अभी इसी में तो इसी को बिल्ड करते हुए क्या है? महाराज का जो एडप्टेबिलिटी है। एडप्टेबिलिटी मतलब क्या है? कि जिस परिस्थिति की क्या जरूरत है, उसके अनुसार कार्य करना। तो वैसे महाराज जो है, वो फ्लेक्सिबल थे जैसे हमने देखा कि से कॉलेज टीचिंग कर रहे थे तो क्या कर रहे थे वो डायरेक्ट स्पिचिंग नहीं करते कुकिंग करो पर हमें प्रचार करना है इस तरह से करना है पर अभी क्या था अभी क्या करना है तो महाराज ने क्या किया जब वो राधा गोपालनाथ मंदिर में आए तो 98 पहली बार आए 87 से वो वहां पर लीडर बनने लग गए 93 से पुण्य लीडर बन गए थे वहां पे वो तो उन्होंने क्या किया तभी उन्होंने कहा कि जो मंदिर में ब्रह्मचारी हैं वो बिल्कुल फंड रेजिंग नहीं करेगी हम टेंपल एक्सपेंशन नहीं करेगी। लेकिन जो ब्रह्मचारी है वो दे विल फोकस ऑन बिकमिंग अ जेनुइन साधु। जो जो साधु होते हैं वो कैसे जीवते? तो महाराज वो साधना है क्लासेस है। महाराज उस समय लगभग रोज भागवतम क्लास लिया करते थे और रोज ब्रह्मचारी के लिए चैतन्य चिरतामृत क्लास लेते थे। और क्लास थे उसमें क्या था? भाव था कि किस तरह से जो भक्त ये जो शीला है जो काउंटर है वो कैसे डेमोंस्ट्रेट करें और जैसे ये एजुकेशनल एफसिस आ गई ट्रेनिंग एम्फेसिस आ गया इसके पहले क्या था जो मंदिर में रहा करते थे दे वेर ट्रीटेड एस फ्री लेबर कि जो भी ये सेवा है ये सेवा करो ये सेवा करो ये सेवा करो पर क्या वो भक्त क्या ये भक्त का कुछ ग्रोथ हो रहा है या भक्त कुछ सीख रहे हैं क्या क्या है कि हमें ना केवल भक्तों से अभी सेवा लेनी है हमें इस तरह से भक्तों को प्रेरणा देंगे महाराज ने होता है कि माय विज़न जब विज़न ऐसा इस्तेमाल हो जाता है, इस्तेमाल नहीं करते, पर जब मैंने उनको पूछा था, तो महाराज सेड कि आई वाज़ थिंकिंग व्हाट डू वी नीड टू डू? टू इंश्योर दैट डिवोटीस कैन प्रैक्टिस कृष्णा कॉन्शसनेस थ्रू आउट देयर लाइफ। कि हमें क्या करना चाहिए? जिससे कि भक्त जीवन भर भक्ति प्रैक्टिस कर सके। तो महाराज ने क्या किया जो ब्रह्मचारी थे उनको बोला कि आप शास्त्र सीखो एंड योर प्राइमरी लोन विल नोट बी फन कलेक्टर्स। योर प्राइमरी रोल विल बी टीचर्स। अभी उस समय यह बहुत रेडिकल था। तो जो भी मंदिर में है वो सब जाके फंड रेजिंग करते थे। पर महाराज बोले नहीं नो प्रेशर ऑफ़ बिल्डिंग टेंपल। महाराज यहां तक बोला कि हम अभी कुछ बुक डिस्ट्रीब्यूशन पे भी प्रेशर नहीं। तो उस समय तो ऐसे एजुकेशनल एम्फेसिस उन्होंने किया। शास्त्रों सीखो कल्चर सीखो। तो धीरे-धीरे क्या हुआ? एजुकेटेड लोग आने लग गए। तो जैसे बताया था उसके पहले बहुत कम एजुकेटेड लोग आ रहे थे। तो जैसे धीरे एजुकेट लोग आने लग गए तो फिर वो जो है ब्रह्मचारी आश्रम में एक ब्राह्मणिकल कल्चर कि वे द फोकस इज ऑन प्रैक्टिसिंग एंड देन नॉट ऑन फंड रेिंग वो जो है मैं फंड रेिंग के बारे में बात बाद में बात करूंगा जो आएगा हम आखरी पॉइंट में इससे क्या हो गया एक तरह से इस्कॉन का पूरा जो डेमोग्राफिक है इस्कॉन की जो अंदर भक्त जो आ रहे थे वो चेंज हो गया अभी अभी के वहां पे नहीं है पुणे में है पूरे जो पूरे भारत में हम वी आर एबल टू अट्रैक्ट एजुकेटेड पीपल। पर ये क्या है? वो महाराज का एक विज़न था। पर अभी भी अभी काफी जो लीडिंग टीचर्स है हमारे संस्था में मेनी ऑफ़ देम आर फ्रॉम मुंबई। और वो कैसे हैं? मुंबई पुणे से है। तो महाराज इन्वेस्ट इन डिवोटीज़। डिवोटीज़ को ट्रेन करो। और ब्रह्मचारी के लिए क्या था? देयर इज़ नो फोकस ऑन फंड रेिंग। इट इज़ मोर एजुकेशन एंड कल्चर। नॉट फंड रेिंग इस तरह से ही बम वेरी सक्सेसफुली अट्रैक्टिंग हाई क्वालिटी पीपल उसके साथ-साथ जो कांग्रेस है महाराज ने उनको बताया कि हमें क्या करना है उनके लिए तो इस तरह से जो ब्रह्मचारी टीचर बनते हैं तो उसमें क्या है टीचिंग जो है वास्तव में इट्स अ सर्विस व्हिच कैन बी डन लाइफ लोंग कोई बुक डिसिशन कर रहा है तो बुक में क्या है बड़े-बड़े दाग उठा के जाते हैं। अगर वही इकलौती सेवा है आपकी तो आप जब 20 साल के 30 साल के 40 साल के तो नहीं कर सकते। आप 50 साल 50 साल के हो गए, 60 साल के हो गए क्या सेवा करेंगे आप? और अगर कुछ और सेवा सीखनी नहीं है तो फिर बड़ी समस्या आ जाएगी। तो महाराज कि वी शुड ट्रेन डिवोटीस। तो महाराज का भाव क्या था? कि अगर भक्तों को हमें जीवन भर भक्ति करने में मदद करनी है तो वी शुड ट्रेन देम इन सर्विसेस दैट वी कैन डू लाइफ लोंग। क्या सेवा है जीवन भर कर सकते हैं। तो महाराज को मैंने पूछा एक बात की महाराज शुड वी ट्राई टू सर्व अकॉर्डिंग टू आवर नेचर या शुड वी डू व्हाट सर्विस वी आर टोल्ड जो हमारे स्वभाव में सेवा करना है जो भी सेवा हमको दी वो करना चाहिए। तो महाराज ने बताया कि हमारी शरणागति ये है कि हमें जो भी सेवा दी गई वो हमें करनी चाहिए। पर वी डोंट बट अलोंग बीइंग सरेंडर वी वांट टू बी कंसिस्टेंट लाइफ लॉन्ग और आपको लोंगेविटी और स्टेबिलिटी चाहिए भक्ति में आजीवन सेवा करनी है तो जो आपके नेचुरल टैलेंट्स है जो आपके नेचुरल है उसके अनुसार सेवा करना चाहिए तो वो कहते है कि वो कोऑपरेटिवली लीडर्स और डिवोटी दोनों है वो एक दूसरे को समझ के ग्रेजुअली टू फाइंड सर्व अकॉर्डिंग टू योर नेचर तो ये जो है अभी जो है राधा महाराज बहुत बड़े-बड़े प्रोजेक्ट्स कर रहे हैं। निको विलेज बड़ा प्रोजेक्ट है। अभी यहां पर कोलकाता में काफी बड़े प्रोजेक्ट्स हो रहे हैं। उसमें महाराज काफी नेचुरल योगदान दे रहे हैं। वहां प्रेरणा दे रहे हैं। वहां पे काफी कुछ भी कर रहे हैं। आचार्य बता रहे थे मुझे। तो अभी कैसे है कि एक भक्त ने महाराज पूछा महाराज पहले हमारा फोकस इट सी पीपल ओवर प्रोजेक्ट्स। कि पहले हमारा पीपल पे फोकस था। लोगों पे फोकस था प्रोजेक्ट पे नहीं था। पर क्या अभी हमने फोकस शिफ्ट कर दिया है आर फोकसिंग प्रोजेक्ट्स तो महाराज ने बताया नो पीपल नीड प्रोजेक्ट्स महाराज ने क्या कहा कि लोगों को प्रोजेक्ट्स की जरूरत है तो मेरे कई वरिष्ठ गुरु भाई हैं तो कैसे हैं कि अभी महाराज देखते हैं कि हर एक हर एक भक्त का क्या नेचर है तो कैसे दो प्रकार के भक्त होते हैं एक तरह से कहते हैं प्रोजेक्ट बिल्डर्स और दूसरे हैं कम्युनिटी बिल्डर्स। अभी दो एक तरह से हम कह सकते हैं प्रोजेक्ट कह सकते हैं। प्रोजेक्ट का मतलब क्या था वो हमने इंफ्रास्ट्रक्चर बिल्डर्स। तो अभी क्या है? मैं अगर गोविंद प्रभु या श्यामानंद प्रभु या गोपीनाथ से बात करूंगा। तो महाराज उनसे उन्हें पता है कि महाराज ने कभी हमको पूछा नहीं कि आपने रे किया है। कितने लोग आपके प्रोग्राम में आपके डॉक्टर बने हैं। महाराज विल नेवर आस्क देम दैट। तो उनका रोल क्या है कम्युनिटी में? दे आर देयर फॉर डिवोटीज। वो जाके उनसे बात कर सकते हैं। उनसे डिस्कशन कर सकते हैं। जो भी कंसर्न्स है उसको एड्रेस कर सकते हैं। पर जो डिवोटीज में वो क्षमता है जो नेचर है उनका मैच्योरिटी है। तो गौरांग बताया कि महाराज जो है प्रोजेक्ट के अलावा कुछ बात ही नहीं करते। तो गौरांग प्रभु है राधेश्याम प्रभु है। चीकर्स तो महाराज जो है एंगेज पीपल ऐसा नहीं है कि जो कम्युनिटी बिल्डर्स है वो प्रोजेक्ट नहीं कर रहे हैं। ऐसा नहीं प्रोजेक्ट है वो कम्युनिटी बिल्डिंग नहीं कर रहे। पर क्या है महाराज नोट फोर्स अ डिवोटी टू डू समथिंग डिफरेंट फ्रॉम देयर नेचर तो जैसे ही भक्त परिपक्व हो गए भक्ति में तो महाराज का भाव था क्या जो कुछ भक्त हैं जिनको जिनका एबिलिटी है जिनका एंबिशन है जो बड़ी-बड़ी चीजें कर सकते हैं उनको अगर नहीं करने देंगे तो क्या होगा? वो भी उचित नहीं है। तो इसीलिए महाराज जो है ही वो सबको अपने-अपने चेयर के अनुसार इंगेज करते हैं। तो जब मैं थोड़ा तीन चार साल अमेरिका जाके पास बीच में प्रचार कर रहा करके आया। तो एक बार मैं महाराज से मिला था। महाराज 2019 की बात है पेंडेमिक के पहले 1920 महाराज से पूछा मैंने कि महाराज भक्त बोलते हैं कि मेरे क्लासेस बहुत इंटेलेक्चुअल होते हैं। तो तो बोलते कि जो लोग होते हैं तुम्हारे क्लासेस समझ नहीं पाते। उन्होंने महाराज से कहा कि महाराज मैं तो इंटेंशनली इंटेलेक्चुअल नहीं होता हूं। मैं जानबूझ के कुछ इंटेलेक्चुअल बातें नहीं करता हूं। मैं स्वाभाविक तरह से उसी तरह सोचता हूं। उसी तरह से कार्य करता हूं। उसी तरह से मैं बोलता हूं। उसी तरह से कार्य करता हूं। इट्स वेरी डिफिकल्ट टू चेंज माय सिस्टम। तो महाराज ने कहा कि आपको चेंज करने की जरूरत नहीं खुद को। महाराज बोले कि अगर तुम प्रयास करोगे तो गौर गोपाल तुम जैसे ह्यूमरस बनो तो वो संभव नहीं है। वो नहीं हो पाएगा। और गौर गोपाल तो तुम्हारे जैसे इंटेलेक्चुअल बनेंगे तो वो वो नहीं हो पाएगा। फिर महाराज बोले जहां तक मैं हूं मैं ना तो तुम्हारे जैसे इंटेलेक्चुअल हूं ना गौरव गोपाल जैसे ही हूं। तो मैं महाराज को हमने बोला महाराज कि जो भी हमारे पास क्षमता है वो सब आपकी कृपा से है। तो महाराज गंभीर है बोले कि महाराज बोले कि कृष्णा हैज़ गिफ्टेड मी विथ अ डीप कंस र्न फॉर अदर्स एंड विथ दैट कंसर्न इन माय हार्ट व्हाटएवर आई स्पीक इट सीम्स टू इंस्पायर अदर्स। भगवान ने मुझे बहुत दूसरों के कंसर्न दिया है। और फिर तुम्हारे बोले कि डोंट चेंज योरसेल्फ बट इंक्रीस योर कंसर्न फॉर अदर्स। खुद को परिवर्तन करने की जरूरत नहीं है। पर तुम क्या है? दूसरों के बारे में और उनकी परवाह करो। उनके बारे में और कंसर्न रहो। तो विचार करने में इसका मतलब क्या है? ये कैसे कंसर्न कैसे दिखाना है? तो फिर तभी मैंने विचार किया और फिर जो मैं 96 में इंट्रोड्यूस 199 में ब्रह्मचारी बन गया। तो मैं लगभग 15 साल के बाद में फिर 2014 से मैं अमेरिका जाने लग गया था। पांच-चार देशों में अभी लगभग 6 महीने भारत से बाहर ही रहता हूं। तो तभी मैं जब गया था पहली बार गया था तो फिर जो मैंने उस समय तक ब्रह्मचारी जी सारे बेस्ट क्लासेस जो थे वो मैंने पहले टूर में दिए थे। तो फिर मैंने सोचा कि मैं वो थोड़े क्लासेस सुने और मेरे ही क्लासेस थे पर उनको समझने के लिए मुझे पूरा 100% कंसंट्रेशन लग रहा था। तो ये पॉइंट इसके बाद क्यों आ रहा है? एग्जाम पर्पस के लिए है। तो फिर तभी मुझे लगा कि अगर मुझे इतना मेहनत करना पड़ रहा है तो मेरे ऑडियंस को कितना मेहनत करना पड़ेगा? तो ऐसे राइटिंग में एक कहावत होती है कोट होता है कि व्हाट इज रिटेन विदाउट एफर्ट? इज रेड विदाउट प्लेजर। तो अगर जो लेखक लिखते समय मेहनत नहीं करता है अब जो बोल रहा है स्पष्ट से बोलने के लिए तो क्या है वो पढ़ने वाला होता है उसको कोई आनंद नहीं होता उसको हर वाक्य क्या लाया है क्या बोला है उसको फिगर करने में बहुत समय रहता है तो एक लेखक था वो बहुत बहुत कॉम्प्लिकेटेड चीजें लिखता था तो उसका किताब बहुत अच्छा था तो एक अवार्ड कमी थी उसको अवार्ड देना था उसको पर बोले कि तुम्हें किताब लिखा है पर यह जो पैसेज है इसका अर्थ क्या है तो उसने वो पढ़ा एक बार पढ़ा दूसरी बार पढ़ा, तीसरी बार पढ़ा तो उसने कहा कि जब यह लिखा मैंने तो मुझे और भगवान को इसका अर्थ पता था। अभी सिर्फ भगवान को पता है। तो कभी-कभी क्या होता है कि प्रेरणा में कुछ इंटेलेक्चुअल उसमें होता है उस बोल देते हैं। पर क्या बोला है? उनको भी समझ में नहीं आता है। तो फिर तभी मैंने तभी मैंने फिर सोचा क्या करूं तो तभी मैं मेरे सारे क्लासेस के पावर पॉइंट बनाने लग गया। उस समय मैं लगभग एक एक डेढ़ साल में लगभग 2000 पावर पॉइंट बनाए हुए तभी। पर क्या हुआ वो पावर पॉइंट से वो मुझे देखा कि वो जो पावर पॉइंट में बोला है वही मुझे बोलना पड़ा था क्लास में। फ्लेक्सिबिलिटी नहीं था मेरे लिए कुछ कि जो मुझे तभी कुछ तभी कुछ क्लास एक दिशा में ले आना है। तभी इंस्पिरेशन आ गया। तो फिर बहुत कुछ बहुत कुछ थोड़ा रिसर्च करने के बाद फिर मैंने ये जो है टेबलेट कैसे लिख के ड्रॉ करके एक्सप्लेन करना ये जो टेक्निक हुई है पहले पता चला मुझे और फिर इससे कई भक्त ये बोलते हैं कि अब ये क्लास आपका थोड़ा समझ में आता है तो फिर महाराज को मैंने बताया कि महाराज जैसे आपने जो बाग अध्ययन दिया था मुझे वो उसके आधार पर मैंने ऐसे किया है और इट है इसी वेरी हेल्पफुल फॉर मी मिस्टर व्हिच इज़ वेरी हेल्पफुल। तो महाराज मॉडेड है। मैंने कहा स्टिल सेस डोंट गेट अटैच टू टेक्निक। रिमेंबर द प्रिंसिपल हैव कंसर्न फॉर योर ऑडियंसेस। क्या है? कभी-कभी टेक्निक काम करने लग जाता है। तो वहां बोले कि नहीं। आपको तो कभी-कभी ऐसा होता है कि मेरे पास ये पावर पॉइंट ये लिख के ड्रॉ करने का फैसिलिटी नहीं होता है। कभी-कभी होता है मिचरा हो जाता है। महाराज जी बोले कि ये हमें ऑडियंस के लिए स्टोन होना बहुत जरूरी है। तो जब मैं पावर पॉइंट बना रहा था तो मैंने महाराज के एक परिचित शिष्य अमेरिका में उनको पूछा कि क्या महाराज ने कभी पावर पॉइंट यूज़ किया है? तो महाराज महाराज को कैसे पूछा था? तो महाराज ने जो बोला था हंसे बाय कृष्णा बाय प्रभुपाद मर्स आई कैन मेक पावरफुल पॉइंट्स विद आई पावर पॉइंट्स। तो अभी जब यहां पे कैसे है कि ये तो महाराज जब इंस्ट्रक्शन देते हैं तो कभी-कभी जो गुरु के इंस्ट्रक्शन होते हैं वो डायरेक्ट होते हैं। ये करो यह मत करो। बट मेरा जो अनुभव है वो इंस्ट्रक्शन महाराज देते हैं। दो इंस्ट्रक्शंस आर लाइक सीड्स वो महाराज प्रिंसिपल बोलते हैं। और जो प्रिंसिपल बोल के फिर क्या होता है कि उसको कैसे अप्लाई करना है। तो आप अपने ऑडियंस के लिए कंसर्न इनक्रीस करो। तो इसका प्रैक्टिकल मतलब क्या है? जो गुरु का जो इंस्ट्रक्शन होता है, एक सीड होता है। वो सीड अगर होगा वो बीज है। उसको हमें बुद्धि करनी है। उसको हमें पानी देना है। हमारी बुद्धि का इस्तेमाल करना है। और फिर उसको कैसे हमारे जीवन में अप्लाई करना है। वो हमें पता करना है। तो ये जो है कि सब भक्तों को अपने-अपने नेचर के अनुसार वो एंगेज करने में एनकरेज करते हैं। ऑफकोर्स कुछ महाराज की खुद सेवाएं हैं। तो वो सेवाओं में अगर कोई लगता है तो से उनको समय ज्यादा मिलेगा कि महाराज के लिए प्रोजेक्ट्स इंपॉर्टेंट है। तो ऐसे नहीं कि जो उनके प्रोजेक्ट्स में डायरेक्टली सेवा नहीं कर रहे आज उनको अनें्ट बोलते हैं। वो भी इंपॉर्टेंट है। पर जो डायरेक्टली उनके प्रोजेक्ट में सेवा कर रहे हैं दे विल गेट मच मोर टाइम विथ महाराज। तो क्या है यदा प्रपदते वो और महाराज अप्रिशिएट्स एवरीवन। तो इसमें यहां पर बताता क्या है? पॉइंट मीनिंग क्रिएटिंग होम। तो होम कैसे क्रिएट होता है? इट इज बाय डिवोटीस को ट्रेन करो जिससे कि वह लाइफ लोंग कुछ सेवा कर सके और जो अपने स्वभाव के अनुसार सेवा होगी तो कंफर्टेबली लाइफ लोंग भी कर सकते हैं। तो उसी तरह से अभी जो होम बनाने के लिए यह ब्रह्मचारी की बात कर रहा था मैं ऑफ कोर्स अपने स्वभाव के अनुसार सेवा करना सबके लिए उचित है। सबके लिए एप्रोप्रियेट है। यह पर अभी गृहस्थ के लिए महाराज ने क्या किया सबसे बड़ा कंट्रीब्यूशन उस समय था कि काउंसिल सिस्टम बनाया महाराज। यह क्या है कि काउंसिल सिस्टम मतलब क्या है कि जो भक्त मंदिर में आ रहे हैं उनको बाकी भक्तों से संबंध जोड़ना है और वो एक तरह से एक एक बड़ा एक्सटेंडेड फैमिली का एटमॉस्फेयर क्रिएट करना है। तो कई बार लोग मंदिर में आते हैं हां लोगों को ग्रीट करते हैं तो उसके बारे में कुछ बात ही नहीं करते। तो काउंसिल ने बनाया तो उसका मूड क्या था कि सीनियर जो डिवोटी है वो यंगर डिवोटीज़ के लिए रिस्पांसिबल लेंगे। उनसे वो फिलॉसोफर फ्रेंड गाइड बनेंगे। द आईडिया इज़ दैट रिलेशनशिप्स डेवलप करने हैं। और जो रिलेशनशिप डेवलप होते हैं तो उसमें उससे होता क्या है? उससे वास्तव में जो एक फीलिंग ऑफ़ होम कम्स और जो कम्युनिटी है प्रभुपाद जी ने केवल क्या है प्रभुपाद जी ने एक इंटरनेशनल ऑर्गेनाइजेशन फॉर कृष्णा कॉन्शियस नहीं बनाया उन्होंने। इंटरनेशनल सोसाइटी बोला है। इट इज नॉट जस्ट सोसाइटी मतलब क्या है? सोसाइटी में लोग होते हैं लोगों में संबंध होते हैं। तो प्रभुपाद जी भी बोलते हैं किस उपदेशामृत में जो शब्दम प्रीति लक्षण है ये द कृष्णा कॉन्शियस मूवमेंट इज नरिश्ड बाय दी सिक्स एक्सचेंजेस। कि जो आख्या प्रचति जो है इसके द्वारा जो भक्तों जो हमारी संस्था है वो पोषित होती है। तो ये जो है एक तरह से सुविधा है कि भक्तों के बीच में बहुत सुंदरता से आदान प्रदान हो जाए। तो अभी यहां पे जो होम क्रिएट करते हैं एक है अप्टेबिलिटी और दूसरा है नॉन जजमेंट लैटीट्यूड। तुम्हें एडप्टेबिलिटी के बारे में बताया कैसे महाराज ने बोले कि हम मंदिर में वो नहीं रहेंगे। तभी नहीं बाद में जब भक्त कंपटेंट हो गए तो फिर हम पीपल नीड फॉर कभी नॉन जजमेंटल एटीट्यूड जो है ये एक महाराज का बहुत ही रिमारकेबल लक्षण है। तो मैं कुछ प्रसंग बोलूंगा फिर उसके बाद में प्रिंसिपल के बारे में बात करूंगा। तो जब राधाकृष्ण मंदिर कम्युनिटी बढ़ रहा था। तभी वहां पर एक भक्त आ रहे थे और वो भक्त का पूरा परिवार जो था वो वहां पर महाराष्ट्र में एक काफी प्रसिद्ध गुरु है। उनके उनसे कनेक्टेड थे। उनके फैमिली गुरु जैसे तो कई जनरेशन से काफी समय से उनके पूरे फैमिली जो था दो-तीन जनरेशन का वो सब उसी उनसे उन्हीं गुरु से उन्होंने दीक्षा लिया था। उनके साथी थे। तो ये मंदिर में आ रहे थे ये भक्त। और फिर उस समय क्या हुआ कि वो जो गुरु थे उनके ऊपर कुछ आरोप आ गए। और वो अखबारों में छप गया। तो जब ऐसे हुआ तो महाराज ने महाराज को महाराज ने तो साधारण भक्तों का स्वभाव होता था प्रभुपाद जी असली गुरु है। बाकी सब बाकी सब बाकी सब बोगस है। तुम प्रभुपाद जी की शरण में आ जाओ। महाराज ने बताया कि महाराज ने वहां पर मंदिर के भक्तों को बुलाया उन्होंने बताया कि इसके बारे में कोई भी उनसे बात नहीं करेगा। जस्ट मेक हिम फील वेलकम एंड कम्फर्टेबल। तो जब वो आए तो उनको जब किसी ने कुछ उनको जज नहीं किया, उनको क्रिटिसाइज नहीं किया, उनके गुरु को क्रिटिसाइज नहीं किया, उनको बड़ा अच्छा लगा और बाद में उनको प्रेरणा और मिल गई। और बोले कि मुझे महाराज से दीक्षा लेनी है। तो तभी महाराज ने उन्हें बताया कि तुम्हारी जो फैमिली है। तो वो गुरु से संबंधित है। तुम भी उनसे संबंधित है। अगर तुम्हें दीक्षा लेनी है, तब उनसे जाके आशीर्वाद लेके आओ। तो, अभी। जब वो उनके फैमिली के जो गुरु हैं, उनके पास गए। तो, वह काफी वहां पर नहीं जा रहे थे। अभी मंदिर नहीं आ रहे थे, इस्ॉन के मंदिर में आ रहे थे, तो जब वहां पे गए वो तो फिर उनके गुरु ने बताया कि हां तुम्हारे परिवार बता वहां पर जा रहे हो। मुझे ये इसके बारे में थोड़े अच्छा सुना है, बुरा सुना है। मुझे थोड़ी डाउट तुम्हारे बारे में थोड़ी चिंता थी पर जब मैंने देखा है कि तुम्हारे गुरु ने तुम चलना चाहते हो उन्होंने मेरे पास भेजे मेरे आशीर्वाद लेने के लिए तो इससे मुझे आश्वासन हो गया है यू आर इन सेफेंस गो वि माय ब्लेसिंग्स आप मेरे आशीर्वाद के साथ जाओ तो महाराज का ये भाव नहीं था कि अरे अगर उनके गुरु उसका आशीर्वाद नहीं देंगे ब्लेसिंग नहीं देंगे तो मुझे मुझे शिष्य नहीं मिलेगा तो महाराज का भाव क्या है इन जनरल श्री कृष्णा कॉन्शियसनेस के बारे में दो संकल्पनाएं हैं। एक है कि रिजेक्शन ऑफ द पास्ट जो मेरे कृष्ण भावना में आने के पहले क्या था? वो सारा मेरा जीवन माया था और वो सारे माया को छोड़कर मुझे कृष्ण के पास आना है। और दूसरा है कृष्णा कॉन्शियस कंसोलिडेशन ऑफ द पास्ट। कि जो मैंने भूतकाल में सीखा है उसके आधार पर वो मैं आगे बढ़ता हूं। तो अभी एक तरह से दोनों सत्य हैं। कि एक तरह से हमारे पूर्व जीवन में हमने बहुत कुछ हमने शायद कुछ बुरी आदतें सीखी है। कुछ भ्रांत धारणाएं प्रकाश सी की है। तो वो हमको रिजेक्ट करना है। ये जरूरी है। रिजेक्शन ऑफ़ द पास्ट भी जरूरी है। पर क्या है? हमने भक्ति में आने के पहले हमारे हमारे घर में कुछ सीखा है। कुछ संस्कार मिले अच्छे कर्म में कुछ अच्छी आदतें हैं, कुछ ज्ञान प्राप्त किया है। तो कंसोलिडेशन ऑफ द पास्ट दोनों सत्य हैं। अभी इस्कॉन के पहले जनरेशन में क्या हुआ था? कि जो अधिकांश प्रभुपाद जी के शिष्य थे। जो आए थे वो मोस्टली। ऐसे संस्कृति से आए थे कि वो स्पिरिचुअलिटी भक्ति से बहुत अपोज था। वहां पर ऐसा कहा कि द ओनली रेगुलेटिव प्रिंसिपल वास टू ब्रेक ऑल रेगुलेटिव प्रिंसिपल्स। तो इस तरह के संस्कृत इसीलिए उनके लिए अधिकांश रूप से जो रिजेक्शन मॉडल था रिजेक्शन का सब कुछ पहले जो छोड़ दो वह सूटेबल था पर फिर भी प्रभुपाद जी ने बिल्कुल ब्लैंकेट रिजेक्शन नहीं बोला जब अपने शिष्यों के माता पिता आते थे तो प्रभुपाद जी ने माता पिता को आदर करो तुम उनको प्रणाम करो तो क्या है हमारे पास्ट को भी हमको रिस्पेक्ट करना है | तो अभी जो रिजेक्शन मॉडल जो जो वेस्टर्न वर्ल्ड में काफी काम करता था वही जब भारत ने अप्लाई किया तो वह काम नहीं कर रहा था। क्या है कि भारतीय संस्कृति जो है चाहे वो शुद्ध भक्ति पर दो नहीं दे रही है तो उसे बहुत कुछ भक्ति के अनुकूल है। और जो भक्त जो रिजेक्शन मॉडल इस्तेमाल करके प्रचार कर रहे थे। उससे वी वर मेकिंग मोर एनिमीज़ देन। काफी शत्रु बना रहे थे उससे। तो महाराज का भाव क्या है? कि जो हमने भूत में सीखा है उस पर हमें कंसोलिडेट करना है। तो तुम्हारे तुम पहले तुम्हारे परिवार गुरु थे तुम उनको सुना है तो उनसे भी तुम सीखे हो कुछ तो उसका आशीर्वाद लो। तो अभी कैसे है कि हम जब भक्ति कर रहे हैं तो महाराज का भाव है। उन्होंने जर्नी होम में उन्होंने जर्नी होम लिखा तो कुछ भक्तों को उन्होंने आलोचना की किस तरह से तुमने कुछ और गुरु है, वो मायावादी गुरु है। उनके चित्र अपनी किताब में लिखे हैं। फिर उनका किताब में छापे है। बड़े-बड़े चित्र हैं। ऐसे कैसे किया तुमने? तो महाराज का भाव क्या था? दो चीजें थी महाराज बोले कि आई वांटेड टू ग्लोरिफाई प्रभुपाद। मुझे प्रभुपाद जी का इस तरह से गुणगान करना था कि जो लोगों ने प्रभुपाद जी को अपना गुरु के रूप में स्वीकार नहीं किया है। वो भी प्रभुपाद जी की महिमा समझ सके। तो प्रभुपाद जी के गुणगान करने के लिए उनके गुरु प्रभुपाद जी के शिष्यों ने अनेक किताबें लिखी है। बहुत सुंदर किताबें हैं। वो क्या है? वो कैसे जो मोक्ष प्रभुपाद लीला की जो किताबें हैं जिन्होंने प्रभुपाद जी को स्वीकार किया उनके लिए बड़े मनोहर है वो पर अभी महाराज का भाव क्या था कि ऐसे अनेक स्पिरिचुअल सीकर थे जो खोज में है और उनकी दृष्टि से जो बाकी महाराज ने जो अलग-अलग आध्यात्मिक शिक्षक से मिले थे उनसे मिले वो एक तरह से प्रभुपाद जी से कुछ ज्यादा फेमस भी हो सकते हैं। तो महाराज का एक सटल प्रीचिंग है कि महाराज पर्सनली इन बड़े-बड़े गुरुओं से मिले बड़े-बड़े से मिले पर फिर भी उन्होंने प्रभुपाद को चुना तो क्या है वो एक तरह से ही इज नॉट रिजेक्टिंग देम बट स्टिल ही शोइंग निकाल कि प्रभुपाद भी कुछ स्पेशल है और महाराज जब उनके बाकी गुरुओं के बारे में बात भी करते हैं मायावादी गुरु भी कह रहा हूं महाराज उनके मायावाद को नहीं पुष्टि दे रहे महाराज जब उनके बारे में उनका आदान-प्रदान करते बोलते बोलते कि मैं इस गुरु से सत्संग का महत्व सीखा इस गुरु से साधना का महत्व सीखा। इस गुरु से सदाचार का महत्व सीखा। तो जो उनकी शिक्षाएं हैं जो भक्ति से कंपैटिबल है वही बताई है। तो हमारे जीवन में जो भूतकाल में हुआ है उससे भी हम सीखते हैं। और वो सीख के उससे हम आगे बढ़ते। तो अभी कई बार ऐसे हो रहा था कि कोई भक्त ब्रह्मचारी बन जाते थे तो अपने माता-पिता को पूरा छोड़ के आ जाते थे। तो फिर महाराज का भाव है कि माता-पिता भी है उनको भी आप हिम्मत करो उनको प्रैक्टिकली कुछ मदद करो जरूरत है तो तो उससे क्या है कि अभी अनेक ब्रह्मचारियों के माता पिता भी जो है भले ही वो कभी भक्त बन जाते हैं थोड़े पहले फेवरेबल होते हैं पर बाद में क्या है वो भी फेवरेबल बन जाते हैं। कई जो ब्रह्मचारी बन गए उनके माता पिता भी भक्त बन गए उन्हें दीक्षा दी है। तो महाराज का भाव है कि ऑलवेज बी रिस्पेक्टफुल। बी रिस्पेक्टफुल बी ग्रेटफुल। टू एनीवन हु हैज़ हेल्प यू। तो ये क्या है? यह एक नॉन जजमेंटल एटीट्यूड है। नॉन जजमेंटल मतलब क्या है? कि ऐसे नहीं कि जजमेंट नहीं करना है। पर जो सब कुछ को जजमेंट करके रिजेक्ट नहीं करना है आपको। उसमें जैसे प्रपा कोट करते थे कि हमें एक गंदी जगह से भी सोना निकाल सकते हैं। तो अभी 1980 में जब महाराज मुंबई में थे तो वह प्रीचिंग करते थे। तो रोज शाम को एक प्रोग्राम हुआ करता था। अलग-अलग जगह पर और उस समय ज्यादा ज्यादा 20 30 लोग आते थे हर एक प्रोग्राम को और फिर उस प्रोग्राम के बाद में क्या होता था कि जब भी वो गृहस्थ आते थे सब महाराज से इंडिविजुअली मिलते थे प्रोग्राम के बाद सब क्यू खड़े होते थे और तो जो जो प्रभु थे उनसे महाराज उनको एम्ब्रेस करते थे तो फिर एक बार एक नया कपल आया था और फिर वो भी देखा क्यों में खड़े तो भी खड़े हो गए और फिर महाराज ने वह प्रभु को एम्ब्रेस किया माता जी तो उनको पता नहीं वो भी महाराज के पास आ गए तो वो महाराज बड़ा दोनों से हाथ जोड़ा माता जी आई एम नॉट सो एडवांस्ड तो प्रभु अभी महाराज डांट सकते थे ये क्या है तुमको पता नहीं है संस्कृति नहीं है कुछ ऐसा जैसे वैसे बर्ताव करते थे नहीं आज व्हाट कुड हैव बीन ऑकवर्ड और हारश महाराज इट वेरी स्वीट बाय ह्यूमबिलिटी बाय स्वीटनेस तो क्या है ये जो नॉन जजमेंटल एटीट्यूड है उससे हम बहुत से लोगों को अट्रैक्ट कर सकते हैं। तो महाराज का भाव क्या है कि अभी प्रभुपाद जी प्रपाद जी ने कहा है कि एक चंद्र समो अंतिम तार सहस्त्र कि हमें एक चंद्र महत्वपूर्ण है एक चंद्र हजार तारों से ज्यादा गोपी देता है और वो सत्य है पर हम प्रभुपाद जी के पुत्र उदाहरण देखते हैं तो प्रभुपाद जी के जो शिष्य थे पाश्चाता से वो चंद्र के समान और प्रभुपाद जी ने लाइफ नंबर्स भारत में बनाए। वो क्या है? वो तारों की समाधि है। तो कई बार प्रभुपाद जी के जाने के बाद जब हम प्रचार कर रहे थे हम चंद्र के ढूंढने के लिए चंद्र को ढूंढ रहे हैं। मतलब जो सीरियस भक्त है। उनको ढूंढ रहे हैं पर उनको ढूंढते-ढूंढते क्या कर रहे हैं? हम तारों को दुश्मन बना रहे हैं। तो क्या है इंस्टेड ऑफ़ क्रिएटिंग डिवोटीज़ वी आर क्रिएटिंग एनिमीज़। तो ये अच्छा नहीं है। तो कैसे है कि हमारा हम जो आउटरीच कर रहे हैं एक है कि उसे स्टार्स आते हैं यस और नो। और जो मूनस है यस और नो। तो मून मतलब क्या है? एकदम सीरियस डिवोटीज़। हम तो सीरियस डिवोटीज और जो स्टार्स है वो क्या है? वेलविशर्स है। वो सपोर्टर्स है। तो क्या है कि अगर हम फोर क्वाड्रेंट्स देखते हैं। एक में क्या है? सिर्फ सपोर्टर्स है। कोई डिवोटीज नहीं है। जुड़े नहीं है। दूसरा है कुछ भी नहीं है। तीसरा है कि सीरियस है पर कोई सपोर्टर्स नहीं है। और चौथा है कि डिवोटीज है और सपोर्टर्स भी है। तो इनमें से सबसे अच्छा कौन सा है? फोर्थ। क्या है कि किस तरह से हमें एक समाज में रहना है तो ऐसे नहीं कि हम सीरियसली भक्त कर रहे हैं और बाकी सारा समाज हमारा शत्रु है। तो दिस इज द बेस्ट सिचुएशन। ऑफ कोर्स अगर चॉइस करना है तो हमें क्या करना है? केवल हम पॉपुलर बन के कोई सीरियस नहीं बन रहा है तो अच्छा नहीं है। ये जो है दिस इज़ पॉपुलरिस्ट। पॉपुलिस्ट मतलब क्या है? फिर कोई सिर्फ कोई हंसीज़ाक बोलता है, कोई कहानी बोलता है, कुछ इंस्ट्रक्शन कुछ बोलता ही नहीं, कुछ ट्रांसफॉर्मेशन होता ही नहीं है। तो ये अच्छा नहीं है। बट दिस इज़ सेकंड बेस्ट। अगर कोई गविशर भी नहीं बन रहा है, कोई भक्त भी नहीं बन रहा है तो तो वर्स्ट है वो। हम्म। तो क्या है कि महाराज का जनरली भाव है, प्रभुपाद जी का जैसे भाव था कि हमें क्या करना है? हमें चंद्र भी चाहिए और तारे भी चाहिए। जो लोग सीरियसली भक्त बन रहे हैं उनको भक्त बनने का बहुत मौका देना है। उनको पर जो अभी सीरियस भक्ति के लिए तैयार नहीं है उनको पुकराना नहीं है। उनको क्या करना है? उनको भी सुविधा देना है। जिस हद तक वो वो कनेक्ट होना चाहते हैं। उनको कनेक्ट कर लेते हैं। तो महाराज के कुछ शिष्य हैं जो अभी जो सेल्फ हेल्प मोटिवेशन उसमें बहुत अम्म बहुत पॉपुलर हो गए वो। तो अभी मैंने महाराज से उनसे बात किया महाराज के बारे में बात किया महाराज बोले कि जब हम प्रीचिंग करते हैं तो दो प्रकार के परिस्थितियां आती है। एक है कि हम दरवाजे खोल रहे हैं। जिससे कि लोग कृष्ण के पास आते हैं। और दूसरे हैं तो कुछ लोगों के लिए हम दरवाजा खोलते हैं। जिससे के लिए जिससे कि वो कृष्ण के पास आते हैं। पर कुछ लोग ऐसे होते हैं जो हमारे लिए दरवाजा खोलते हैं। जिससे कि हम लोग हम कृष्ण लोगों के पास नहीं जा सकते तो यह जो दूसरी कैटेगरी के लोग हैं जो हमारे दरवाजा खोलते हैं अगर हम उनको खींचे तुम कृष्ण के पास आओ वो कृष्ण के पास नहीं आएंगे दरवाजा बंद ही कर लो हम समझ रहे हो क्या बोल रहा हूं यहां पे कुछ लोग ऐसे हैं वो खुद भक्त बनने के लिए भक्त बनने के लिए भक्ति का भाव होगा साध साधना भक्ति है उसका सारा फुल पैकेज है वह लेने के लिए तैयार नहीं है पर क्या है? वह हमारे लिए बड़े-बड़े दरवाजे खोल सकते हैं। और जो ऐसे दरवाजे खोलेंगे उससे हम हजारों लाखों लोगों के पास वक्त को लेकर आ जा सकते हैं। तो अभी जो इस प्रकार के जो मोटिवेशनल टॉक्स है या फिर हम कुछ फिलथ्रोपी करते हैं जैसे कि हम या फ़ूड डिस्टिंशन करते हैं या हम हॉस्पिटल होता है। अभी ऑफ कोर्स हॉस्पिटल में डायरेक्टली प्रीचिंग भी हो रहा है। तो उससे क्या होता है? एक और चीज होती है कि जो हमारे वेल बनते हैं वो हमारे लिए बड़े-बड़े दरवाजे खोल सकते हैं। तो ऐसे लोगों को प्रभुपाद जी ने कैसे किया? जॉर्ज हरिसन को प्रभुपाद जबरदस्ती नहीं कि तुम पीछा करने वाले तुमला मारा करते हो कि नहीं? जॉर्ज हरिसन ने सारे जो प्रभुपाद जी का जो संदेश था मंत्र वो विश्व भर में फैलाने के लिए बड़ा दरवाजा खोल दिया उसने। तो ये जो है मूल्स जो है क्या दे एंटर द डोर। वो दरवाजा हम खोलते हैं। वह उससे अंदर आकर वह खुद बंद बन जाते हैं। जो स्टार्स होते हैं, वह क्या करते हैं? दे कैन ओपन द डोर फॉर अस। जहां पे ऐसे अनेक लोग हैं जो मंदिर में कभी आने वाले नहीं है। पर अगर वो फेवरेबल बनते हैं वो हमें कुछ सपोर्ट करते हैं। तो उससे क्या होता है? उसे बहुत बड़े दरवाजे खुल जाते हैं। तो इसमें पॉलिटिशियंस हो सकते हैं। इसमें साइंटिस्ट हो सकते हैं। इसमें इसमें मूवी स्टार्स हो सकते हैं। इसमें अलग-अलग सेलिब्रिटीज हो सकते हैं। तो यह जो है इस भारत में था 1980 में जब हो रहा था तो ये क्या था काफी हद तक 1970 और 80 में इस्कॉन वास इन दिस क्वाड्रेंट कुछ लोग बन रहे थे पर बहुत लोग हमारे हम उनको अपना शत्रु बना रहे थे पर खास करके 1990 ऑनवर्ड्स और खास करके अभी 2010 के बाद में जो है 2010 ऑनवर्ड्स क्या है कि वी आर कम हियर वी आर मेकिंग वेलविशर एंड वी आर मेकिंग डिवोटीज। तो अभी महाराज के शिष्यों में कुछ है जो मोटिवेशनल टॉक्स देते हैं। पर ऐसे नहीं कि सब वही मोटिवेशनल टॉक दे रहे हैं। कोई भागवतम क्लास मोटिवेशनल टॉक है। भागवतम क्लास है ही नहीं। ये महाराज ऐसे शिष्य है जिन्होंने भागवतम पे स्टडी भागवतम सिस्टम स्टडी के लिए किताब लिखी है। जो भागवतम ने बहुत एजुकेशनल स्ट्रक्चर है। जो एक मल्टी फैसिटेटिव लेगसी बनाया है। तो कैसे है कि सबके लिए अपनी-अपनी क्षमता के अनुसार गर्दी है। दिस इज़ एट अह क्या है? एडप्टेबिलिटी और मोहन जजमेंटल एटीट्यूड। अगर तुम कैसे होता है कि जस्ट स्पीक दिस वेरी इंपॉर्टेंट पॉइंट। मैंने जब भी महाराज से बात की है इसके बारे में। कई बार महाराज ने यह बताया है। एंड आई विल स्टेट दिस। कई बार कैसे होता है कि हम चाहते हैं कि लोग यहां से ऊपर उठ जाए। ये 3.26 के आधार पर गीता बुद्धि वेदमत। कि तुम ऊपर आ जाओ। पर कभी क्या होता है लोग ऊपर नहीं आ पाते हैं। वो कूद लेते हैं ऊपर नहीं आते तो और नीचे चला जाता है तो वो और दूर चले जाते हैं। तो कैसे हैं कि अगर वो ऊपर नहीं आ पा रहे हैं तो ये हमारी जिम्मेदारी है कि हम उनके लिए कुछ स्टेयर केस बनाएं। ये तुम सीधा कूद नहीं सकते हो धीरे-धीरे आ जाओ। और जो स्टेयर केस है वो कुछ-कुछ ऐसा होता है कि जो सीढ़ियां के स्टेप्स है वो बड़े-बड़े हैं। कुछ स्टेप छोटे-छोटे भी हो सकते हैं। तो अगर तिरुपति बाबा जी आप जाते हैं तो दो मार्ग अगर आप पैदल जाते हैं तो एक है कि कि छोटा है तो उसे बहुत स्टीप है। दूसरा है लंबा है पर इतना स्टीप नहीं है। तो कहते हैं कि अलग-अलग हम मार्ग क्रिएट कर सकते हैं। जिससे कि लोग जिस क्षमता से वो आगे बढ़ सकते हैं वो पढ़ने का उनको मौका मिलता है। तो फ्रॉम योर प्लेस हम एट योर प्लेस एक्सेस कृष्णास ग्रेस। कि आप जहां पे हो आप जिस रफ्तार से आगे बढ़ना चाहते हो आप कृष्ण की ओर बढ़ते रहो तो महाराज ने जो अलग-अलग प्रोजेक्ट बनाया अभी गोवर्धन को बनाया उसमें क्या है कि जो लोग भक्ति की ओर रुचि योगा में रुचि है उनकी आयुर्वेद में रुचि है निसर्ग एनवायरमेंटल एक्टिविज्म में रुचि है उनको भी मौका दें कि भक्ति का अनुभव कर सके वो भक्तों के संग में आ सके महाराज बताए थे कि मुझे कि वी शुड प्रोवाइड एस मेनी अपॉर्चुनिटीज एस पॉसिबल फॉर पीपल टू एसोसिएट विद डिवोटीज इन नॉन प्रीचिंग सेटिंग कि प्रचार के प्रचार के माध्यम संग देते हैं उनको पर कुछ लोग हैं जो क्या करेंगे एक लेक्चर के लिए आएंगे पर बहुत से लोग लेक्चर के लिए आएंगे पर कोई कोई गौ सेवा के लिए आ जाएगा कोई कोई टेंपल क्लीन के लिए आ जाएगा कोई एनवायरमेंट के लिए आ जाएगा अलग-अलग चीजों के लिए आएंगे लोग तो यह ना कही ना प्रकार में जो भाव है महाराज ने बड़ा एक्स्ट्राऑर्डिनरी इसको डिस्प्ले किया है। तो क्विकली कंप्लीट द लास्ट पार्ट्स नाउ तो अभी जो है उसके बाद में एच प्राधान हम ले रहे हैं। एन ए टी हो गया अभी। सॉरी क्या लिया हमने? एच ए एन हो गया है। तो अभी ए जो है ये है अप्रिशिएटिव्स। ये विशेष करके जो है महाराज की जो पत्रपती महाराज के साथ जो आदान प्रधान था वो दिखता है उसमें अभी भक्ति महाराज और अनाथ महाराज दोनों ही वृंदावन में थे काफी समय तक फिर वो से वो वहां पर कॉन्फ्लिक्ट हो गए या उनको कुछ नहीं रहे तो भक्ति महाराज अफ्रीका में प्रचार करने गए अमेरिका में थोड़ा प्रचार कर रहे थे वो काफी हद तक तो महाराज भारत में आ गए तो अभी भक्तिदेत महाराज को जब मेलानुमा कैंसर हो गया था तो महाराज उनसे मिलने गए थे उन्होंने कहा महाराज कि आप मेरे साथ यहां पर रहो टिल माय रिपा तो महाराज ने तुरंत अपने सारे प्रोग्राम्स कैंसिल कर दिए और सारा ट्रेवलिंग प्रोग्राम था उनका मैनेजर की टीम से सब कुछ कैंसिल कर दिए और वहीं पे अभी कितने समय तक रहना पड़ेगा पता नहीं था पर महाराज इस रेडी टू बी देर ऑल द टाइम और फिर उसके बाद में जब महाराज जब महाराज चले गए उसके बाद महाराज ने काला गोपिया टेबल में एक लेक्चर दिया था छह सात घंटों का लेक्चर रहे वो वो अपने गुरु भाई के इतना इतना गुणगान कर रहे हैं किस तरह से ना कि ऐसे नहीं कि इतने महान भक्त है पूरे उनके जीवन की कहानी विस्तार रूप से बता रहे हैं किस तरह से तो उनका जो हार्ट है वो बहुत अप्रिशिएटिव है किसी ने भी किसी तरह से भी अगर भगवान की सेवा की है प्रभुपाद जी की सेवा की है तो उसकी जरूर सराहना करते हैं तो अप्रिशिएटिव है कि भले ही अलग-अलग हमारे डिफरेंसेस है पर फिर भी क्या है हमारा भाव यह है कि जिस जो भी की सेवा कर रहा है जो कृष्ण की सेवा कर रहा है उनको अप्रिशिएट करना है और कभी एक योग प्रसंग नहीं है महाराज कई बार जो ऐसे है कि अपने गुरु भाइयों के लिए वो बहुत एक्सटेंड करते हैं। जब भी कोई सिटी में जाते हैं वो अमेरिका में कहीं उनके गुरु भाई होते तो ही विल स्पेंड मोर टाइम विथ ह गॉड ब्रदर्स एंड ह डिसाइपल्स डिसाइल कई कई उनके गुरु भाई है चार पांच शहर है अमेरिका में उनके गुरु भाई उनका छोटा सा घर है महाराज के डिसाइपल उनके बड़े-बड़े घर है पर महाराज अपने गुरु भाइयों के साथ रहेगी और वो कई सालों से वहां पे रहते हैं महाराज स्पेंड मोर टाइम विद देम और वो उनका भाव क्या है कि उन्होंने प्रभुपाद जी की इतनी सेवा की है आई शुड रेप्रोकेट विथ दैट और महाराज कहते हैं कि जिन्होंने भी प्रभुपाद जी की सेवा की है अपने खास करके उनके गुरु भाई का बोलते हैं कि अगर इफ यू रिस्पेक्ट माय गॉड ब्रदर लाइक आई विल बी वेरी प्लीज। महाराज का भाव क्या होता है कि अगर हम आके बोले कि अरे मैंने ये सेवा की है। मैंने ये सेवा की है। ठीक है महाराज सुनेंगे। पर अगर महाराज के गुरु भाई अगर बोलते हैं कि आपका ये शिष्य बहुत अच्छी सेवा कर रहा है। महाराज बी वेरी प्लीज बाय दैट। तो कोई एक प्रोजेक्ट मुंबई में ऐसे हुआ था कि प्रभुपाद जी के ऊपर से शिष्य थे। वो वो ही डिपार्टेड तो उनकी जो थी वो प्रपा जी के डिसाइपल है तो उनको ये रहने का जगह नहीं था तो महाराज बोले कि हाउ यू टेक केयर ऑफ़ हर विल बी द टेस्ट ऑफ वेदर वी कैन डेमोंस्ट्रेट वेदर वी कैन प्रैक्टिस वाराणसी प्रिंसिपल्स टुडे तो जो माताजी है प्रभुपाद जी के शिष्य है वो कहीं वो बड़े प्रचारक नहीं है वो कोई बड़े बड़े सेवा नहीं की है पर महाराज बोले कि उन्होंने अपना जीवन प्रभुपाद जी को दिया है हमें उनके उनकी सेवा उनका उनका हमें देखभाल करनी चाहिए। तो जो ये अप्रिशिएटिवनेस है वो इट इज़ अ वेरी डीप एथिक विद इन महाराज। तो महाराज जब मेरे भाई और मेरे पिताजी से मिले थे। तो पहली चीज उन्होंने बोले कि मेरे पिताजी से मिले तो बोले कि आई एम सो ग्रेटफुल फॉर योर सन। दैट यू आर गिवन योर सन एंड ही इज़ डूइंग सो मच सर्विस। तो तो मेरे भाई से मिले तो मेरे भाई से कोई बोले कि क्या है कि अभी महाराज उनको प्रीचिंग कर सकते थे तो ही फोकस ऑन प्रीचिंग तो ये जो एप्रिसिएशन है कि दिस इज़ सच अ डीप क्वालिटी जो महाराज में है कि हर हर परिस्थिति में उनके अप्रिशिएटिवनेस से वो वो वो जो सिचुएशन है 10 सिचुएशन में उसको डिफ्यूज कर देते हैं। एक बार जगह थे उनकी निंदा कर रहे थे। तो किसी कारण के महाराज बोले महाराज के शिष्यों ने पूछा कि इज ही एनवियस ऑफ यू? महाराज बोले नो ही इज़ नॉट एनवियस ही नैरो माइंडेड। लेकिन उनकी एक संकल्पना है कि प्रभुपाद जी की सेवा कैसे करनी है। और अगर वो संकल्पना के परे कोई सेवा कर रहा है प्रभुपाद जी के तो उनको फिट नहीं होता है। वो भाई बोले कि मैं उनको पूछा था कि उनको कैसे करना है। तो बोले महाराज बोले कि प्रभुपाद जी ने जैसे मैं सेवा कर रहा हूं मैं प्रचार कर रहा हूं। प्रभुपाद जी ने ऐसे प्रचार किया है। जैसे वो प्रचार कर रहे हैं वैसे भी प्रभुपाद जी ने प्रचार किया है। जैसे भक्ति महाराज प्रचार करते हैं वैसे ही प्रचार किया है। तो कैसे प्रचार कर रहे हैं ये महत्वपूर्ण नहीं है। प्रचार का प्रभाव क्या हो रहा है ये महत्वपूर्ण है। तो अभी हमें देखना है क्या इफेक्टिव है। तो किससे कृष्ण भावना बढ़ रहा है। तो महाराज इस ऑलवेज अप्रिशिएटिव एवरीवन। और इसके बाद में आता हैं। जो है यह खास करके महादेश में दिखा और उसके बाद में आयरलेसनेस यह जो है खास करके 2006 से लगभग अब तक चल रहा है ये क्या है कि अभी जब महाराज के अभी शिष्य महाराज भारत में शिष्य है और वो काफी प्रचार करने में यशस्वी हो रहे हैं। और महाराज यहां पे अगर भारत में ही रहते थे तो महाराज इट वास वेरी इजी महाराज कड़े बिकम प्रॉब्ली वन ऑफ़ द टॉप स्पिरिचुअल लीडर्स ऑफ़ इंडिया। ऑलरेडी है वो टॉप में। पर महाराज भारत में अगर एक प्रोग्राम देते हैं तो हजारों लोग आएंगे प्रोग्राम के लिए। पर महाराज ने जब उनको भक्ति महाराज ने कहा तुम जर्नी होम लिखो। तो जब जर्नी होम महाराज ने लिखा तो उन्होंने देखा कि इसके द्वारा मैं पाश्चात्य देशों में प्रचार कर सकता हूं। तो अभी क्या हो गया है। हम भारत में पाश्चात्य देशों में अभी ज्यादा पाश्चात्य लोग हमारे भक्ति में नहीं आ रहे। भारतीय बहुत आ रहे हैं। अभी काफी भारतीय पांच देशों में गए हैं। तो प्रभुपाद जी बता रहे थे कि अभी वी आर नो लगर इंटरनेशनल सोसाइटी फॉर कृष्णा कॉन्शियसनेस। हम क्या है? इंडियन सोसाइटी फॉर कृष्णा कॉन्शियसनेस विद इंटरनेशनल ब्रांचेस है। तो हम भारतीय सोसाइटी बन गए हैं कि पाश्चात्य देशों के लोग नहीं आ रहे हैं। अभी भारतीय लोग भी आ रहे हैं। बहुत महत्वपूर्ण है वो आना चाहिए। और क्या है कि पाश्चात्य देशों को प्रचार करना पाश्चात्य देशों के लोगों को प्रचार करना। इतना आसान नहीं हूं। तो महा बता रहे थे कि मैं जब 214 से मैं अमेरिका जाने लग गया तो 2016 में अमेरिका के एक जगह से तो वहां के कमेटी ने मुझे बताया कि तुम यू कैन सेटल ओवर हियर एंड यू कैन हेल्प अस विद ओवर हियर। तो मैंने महाराज से बात की। महाराज बोले कि हां वो बहुत महत्वपूर्ण सेवा कर रहे हैं। यू वांट यू हैव माय फुल ब्लेसिंग्स। महाराज ने बताया फिर कि हां प्रभुपाद जी जब अमेरिका में आए तो उन्होंने कहा न्यूयॉर्क इज द मोस्ट इंपोर्टेंट सिटी इन द वर्ल्ड और लिखिए प्रभुपाद वांटेड बीम इन न्यूयॉर्क। महाराज बोले कि मैं अगर न्यूयॉर्क में जितना समय प्रचार करूंगा लंदन में जितना समय प्रचार करूंगा या बॉम्बे में जितना समय प्रचार करूंगा आप कोलकाता नहीं कह सकते। महाराज बोलेंगे कि अगर मैं बॉम्बे में उतना रहूंगा तो आप वहां पे बड़े-बड़े प्रोग्राम ऑर्गेनाइज कर सकते हैं। पर न्यूयॉर्क में लंदन में थोड़े बड़े कर सकते हैं। इतना बड़ा नहीं था बॉम्बे में और न्यूयॉर्क में इतना बड़ा नहीं होता है। पर फिर भी बोले कि प्रभुपाद ने बोला कि न्यूयॉर्क सबसे बड़ा इंपॉर्टेंट सिटी है। तो इसीलिए मैं न्यूयॉर्क पे कुछ सेवा करना चाहता हूं। तो अभी पाश्चात्य देशों के लिए प्रचार करना ये महाराज भारत में एक प्रोग्राम में तो हजारों लोग आ गए। पांच देशों का प्रजा में 20 लोग आ गए। 40 लोग आ गए 100 पर महाराज उतने ही उत्साह से कर रहे हैं। ये महाराज का भाव ये है कि प्रभुपाद जी का जो विज़न है उसको कैसे पूरा करना। प्रभुपाद जी का विज़न था कि न्यू वृंदावन अनेक मंदिर बन जाए तो न्यू वृंदावन में तो नहीं हो पाया वो महाराज नेता से गोवर्धन को में जो न्यू वृंदावन का रेप्लिका बनाया और उद्देश्य क्या है प्रभुपाद जी का भाव था कि कि जो लोग पाश्च भक्त बन रहे हैं वो अगर वृंदावन नहीं आ पाएंगे तो न्यू वृंदावन आ सकते हैं पहले तो उसी तरह से गोवर्धन को क्या किया एक सॉफ्ट लैंडिंग बनाया है कोई वृंदावन डायरेक्टली जाता है तो वृंदावन में बहुत कुछ होता है वो लोई बाजार में बहुत कुछ एग्रेसिव मार्केटिंग होता है। बहुत कुछ होता है कि लोगों को कल्चर शौक हो जाता है। वो क्षमता नहीं है। तो क्या है महाराज बोले कि हमको गोवर्धन इको कैसे चाहिए? नेचुरल कंफर्टेबल और स्पिरिचुअल हमें नैसर्गिक है वो सुविधा होना चाहिए और वहां पर आध्यात्मिक भाव होना चाहिए। तो आई वोंट गो मच में जाऊंगा। पर ये जो भाव ऐसे नहीं कि महाराज भारत को नेगलेक्ट कर रहे हैं। कई भक्तों को लगता है कि हमें हमें महाराज का संग नहीं मिल रहा है। हमें महाराज से कहीं बात करने का मौका नहीं मिलता है। कुछ उनका मार्गदर्शन नहीं मिलता है। तो महाराज का ये एक्सपर्टीज क्या है कि उन्होंने 1990 से ही एक तरह से सक्सेशन प्लानिंग कर दिया है। चाहे उन्होंने जो काउंसिल क्रिएट किए हैं, उन्होंने जो लोकल लीडर्स क्रिएट किए हैं। महाराज का भाव क्या है? कि द केयर ऑफ द डिवोटीज शुड नॉट डिपेंड ओनली ऑन द गुरु। ऐसे नहीं है कि कि जो भक्त के देखभाल है उसके लिए केवल गुरु ही महत्वपूर्ण है। गुरु के अलावा कुछ देखभाल होगी नहीं। महाराज ने कैसे एक तरह से लेगसी क्रिएट किया है जिससे कि डिवोटीज़ आर ट्रेंड एंड डिवोटीज़ कैन टेक केयर ऑफ मोर डिवोटीज़। तो इस तरह से महाराज देखते हैं कि प्रभुपाद जी की सेवा के लिए सबसे महत्वपूर्ण क्या है? सबसे महत्वपूर्ण अभी सबसे जरूरत क्या है? तो व्यवसाय का बुद्धि एक ही है। जब महाराज अभी वेस्टर्न आउटच कर रहे हैं तो वेस्टर्न आउटच में लगे हुए हैं। पर अभी तो उन्होंने लगभग 20 साल तक वो किया और काफी काफी हद तक जो योग मार्ग से जो योगायोग जो करते वहां से भक्ति में आने लगे बहुत हजारों की मात्रा में लोग आए हैं। और फिर इन सब में जो फाइनल है महाराज का राइट फ्रॉम द बिगनिंग टू एंड दैट इज ह्यूमिलिटी। आई विल कंक्लूड विथ दिस दो पॉइंट्स जैसे बोलूंगा ह्यूमिलिटी के बारे में क्या है कि जब मैं जर्नी होम जर्नी विद इन बुक लिख रहे थे तो वहां पे कुछ महाराज ने कुछ प्रसंग कुछ पॉइंट लिखे थे तो मैंने महाराज से कहा कि ये जो पॉइंट के लिए है ये कहानी हम लिख सकते हैं तो हनुमान जी की एक लीला थी तो मैंने वो कहानी लिख के दी महाराज अचानक बोले तुम एक घंटे के बाद आ जाओ उसको कंप्लीट करिए तो काफी टाइम पर खत्म बोले एक घंटे के बाद क्या कोई मेरा फोन कॉल आया कि महाराज का कुछ नहीं था तो मैं एक घंटे के बाद आया और फिर महाराज ने बताया कि तो महाराज ने पूरा मैंने जो लिखा था उसको रीराइट किया था वो महाराज रीराइट करने लग गए थे और फिर महाराज ने बताया कि यू नो क्या करा था पता है देखिए अगर आप राधा गोपीनाथ मंदिर में जाते हो तो वहां पे मेन ड्यूटी राधा गोपीनाथ है दूसरी साइड में गरुड़ जी है हनुमान जी तो महाराज बोले कि आई वेंट एंड प्रेड टू हनुमान जी कि ही गिव मी द वर्ड्स कि आप हनुमान जी मुझे वचन दें जिससे कि जो हनुमान जी की भक्ति हनुमान जी का भाव है वो ये किताब में आ जाए जिससे कि लोगों का कल्याण हो कंप्लीटली मोड कि मेरे लिए राइटिंग मतलब क्या है ये इंटेलेक्चुअल एक्टिविटी है क्रिएटिव एक्टिविटी है और महाराज के लिए राइटिंग सबसे पहले क्या है तो लेकिन मैं हनुमान जी से प्रार्थना की है और फिर जो महाराज जी ने लिखा तो लिखा है व्हाट डू यू थिंक अबाउट दिस तो मैंने बोला महाराज मैंने जो लिखा था वो एक तरह से एक डॉक्यूमेंट्री है आपने लिखा वो मूवी है तो महाराज भाव थे जो बहुत ब्यूटीफुली इन्फ्लुएंस कर रहे थे तो एंड में बाकी कैसे हनुमान जी सेवा करके आते हैं तो हनुमान जी सीता को खोज के आते हैं और जब कोई जानकारी लेते हैं तो राम जी को तो प्रभु श्री राम क्या करते हैं? हनुमान जी का आलिंगन करते हैं। तो वो बड़ा बड़ा मधुर वर्णन था। महाराज सच अ स्वीट एंड टचिंग डिस्क्रिप्शन। द एम्ब्रेस ने दिस इट्स अ डिवोशनल क्लाइमेक्स। इट्स वंडरफुल महाराज। तो महाराज वंडरफुल ही आई विल एम्ब्रेस यू नाउ। सो ह्यूमिलिटी ह्यूमिलिटी का मतलब यही नहीं है कि सबके सबको प्रणाम कर रहा है। सबके सामने हाथ जोड़ो वो महत्वपूर्ण है। बट ह्यूमिलिटी का मतलब ये है एटलीस्ट इट्स व्हाट आई अंडरस्टुड दैट आई नीड कृष्णा टू बी एबल टू सर्व। कि कृष्णा के प्रभाव के बिना मैं कार्य कर लूंगा पर वो कार्य का प्रभाव नहीं होगा। मैं क्लास दे दूंगा अच्छी तरह से पर वो क्लास से हृदय परिवर्तित नहीं होगा। तो ह्यूमिलिटी का मतलब मतलब सिर्फ खुद को नीचे दिखाना नहीं है। ह्यूमिलिटी का मतलब क्या है? कि मुझे कृष्ण की जरूरत है। और ये एक भाव है ह्यूमिनिटी का कि आई ची कृष्णा। और महाराज के जहां तक मैंने देखा है दूसरा है ह्यूमिलिटी मतलब क्या है? जो अमानीना मान देना। तो एक तरह से अमानी ये थोड़ा मुश्किल जाता है। तो मान क्यों ना दें? पर मान देना। ये एक तरह से आसान है पर ये बहुत महत्वपूर्ण है। कि ह्यूमिलिटी मींस ग्लोरिफाई अदर्स। तो महाराज कई बार बोलते हैं कि अगर दूसरे भक्त कुछ सेवा कर रहे हैं और उनकी सेवा अच्छी हो रही है आपसे अच्छी हो रही है तो फिर भी ईर्ष्या हो सकती है। पर अगर हम उन भक्त का सराहना करेंगे। उन भक्त का गुणगान करेंगे तो अगर हम वो शुद्ध हृदय से गुणगान करेंगे तो जितनी प्रगति वो भक्तों का सेवा करके कर रहे हैं। उतनी प्रगति हम वो भक्त का गुणगान करके भी कर सकते हैं। तो क्या है कि यह कम्युनिटी बिल्ड भक्तों में अच्छा संबंध रहने के लिए यह बहुत महत्वपूर्ण है कि भक्तों में जो कंपटीशन है डिस्ट्रक्टिव ना हो जाए और ह्यूमिलिटी इन द मोड ऑफ़ ग्लोरिफाइंग ईच अदर। यह जो है यह डिस्ट्रक्टिव कंपटीशन का पूरा विनाश कर देता है। एंड अप्रूव कंप्लीटली और यह बहुत महत्वपूर्ण है। तो महाराज बताए थे मुझे कि इसके बारे में एक बार एक प्रसंग है। एक भक्त महाराज से पूछे थे महाराज हमें बताया था कि आप नम्र रहो हमेशा पर जब भक्तों के संगत में आते हैं तो सारे भक्त हमारे गुणगान करते हैं तो भक्त अगर गुणगान कर रहे हैं तो नम्र कैसे रहे तो महाराज ने बताया भक्त बता रहे थे कि तुम तो इतने महान भक्त हो इतनी अच्छी सेवा कर रहे हो अगर तुम्हारा गुणगान नहीं करेंगे हम तो हमारा खत्म हो जाएगा और महाराज हसने लगे महाराज की और अगर तुम्हारा जब गुणगान होता है अगर तुम सोचते हो यह तुम्हारा गुणगान है तो तुम्हारा पतन हो जाएगा। क्या है कृष्ण तुम्हारे द्वारा कार्य कर रहे हैं। एक बार महाराज चौपाटी में थे तभी वो व्यास पूजा पहले फेस्टिवल था तभी तो महाराज ये बता रहे थे कि इस तरह से जो है चौपाटी में जो भी हुआ है जो प्रचार हो रहा है। बोले कि वी आर नॉट द कॉज ऑफ इट। महारा वी आर द विटनेस टू इट। तो अगर हम खुद को कारण समझते हैं तो हम हम गर्भित हो जाएंगे। पर अगर हम उसको विटनेस के रूप में ये हो रहा है भगवान कर रहे हैं। प्रभुपाद जी कर रहे हैं तो हम ग्रेटफुल रहेंगे। तो महाराज बोले व्हाट इज आवर ऑफरिंग टू प्रभुपाद? हमारे प्रभुपाद जी का ऑफरिंग क्या है? ये पूरा कम्युनिटी है। भक्त साथ में आके संकीर्तन कर रहे हैं। भक्तों में अच्छे संबंध है। भक्त साथ में एक दूसरे का गुणगान कर रहे हैं। भगवान का गुणगान कर रहे हैं। यह जो है हमारा ऑफरिंग है प्रभुपाद जी के लिए और कृष्ण के लिए तो ह्यूमिलिटी यह जो है यह केवल हमें भगवान को पसंद करने के लिए नहीं है और के द्वारा भक्तों में जो संबंध है वो भी अच्छे रहने के लिए बहुत बहुत महत्वपूर्ण है। कोई भी श्लोक महाराज कोट करते हैं तो सबसे ज्यादा क्या है? पीस है। तो उसमें क्या है? दिस इज़ एक्चुअली फाउंडेशन जो है महाराज का जो मूड है राइट फ्रॉम द बिगनिंग ह्यूमिलिटी ऐसे ऐसे एक दशा एक स्टेज में नहीं दिखती है। पता कैसे उनका एक सेवा लेनी है, दूसरी सेवा लेने स्वीकार कर लिया। जो वो परदेश से भारत आए थे तो कोई अनजान साधु है उनको खिचड़ी दे रहा है और बड़ी तीखी खिचड़ी है। वहां क्या करते हैं? उसकी भावनाओं का बुरा लगे इसलिए तीखी खिचड़ी खा लेते। तो जो नम्रता है दिस इज अ डिफाइनिंग क्वालिटी लाइफ। समराइज जो महाराज का जीवन की चर्चा की आज हमें मेनली। महाराज के अलग-अलग सीरियस पर आर क्या था रियलाइजेशन तो हमने देखा कैसे एक तरह से अगर इसको हम स्टेयरकेस के रूप में देखते हैं तो ये 19 जन्म से ही 50 से 71 तक था फिर दूसरा क्या था अब्सॉर्प्शन की खास करके उन्होंने महाराज जो 72 से 79 विग्रहों की सेवा कर रहे थे और बिल्कुल वो किसी भी चीज की जगत से कोई भी अपेक्षा नहीं कर रहे थे। फिर उसके बाद में जो डी है डेडीिकेशन जो डेडीकेशन था वो उन्होंने जो कॉलेज आउटपुट था 80 से 85 तक लगभग फिर उसके बाद में जो हम तीन चीजें एज क्या था? होम एक तरह से उन्होंने एक स्पिरिचुअल होम क्रिएट किया। वो करने के लिए क्या था? उनका अप्टेबिलिटी था। जो इस था कई बार एक ऑफिस जैसे बन गया था। ये लोग आते हैं सेवा करते हैं। अगर नहीं सेवा कर पाते हैं माया आने के लिए तो उनको दोष देके निकाल दो। क्या वो चले जाते हैं। तो माया ने कहा कि हमें भक्तों को एक घर कैसे बनाएं वो दिखाया उन्होंने। तो और उसके लिए क्या है? ब्रह्मचारियों को आजीवन कैसे टीचर बनना, साधु बनना कैसे? स्वभाव के अनुसार वो सेवा में इंगेज करना उनके लिए विज़न लेना कैसे सेवा कर सकते हैं। जो गृहस्थ है उनके के लिए काउंसिल सिस्टम बनाना उनके लिए संबंध जोड़ना जो सिमिलर बैकग्राउंड से है उससे क्या होगा सिमिलर आश्रम में है जिससे कि वो एक होम का फीलिंग होगा एडप्टेबिलिटी और क्या था नॉन जजमेंटल एटीट्यूड एडप्टेबिलिटी हमने देखा कैसे की महाराज पहले बोले कि हम मंदिर बनाने की चेंज आएगी हम क्या करेंगे हम पहले ट्रेनिंग करेंगे डिवोटीस का नॉन जजमेंटल मतलब क्या है कि पास्ट को रिजेक्ट नहीं करना है हमें पास्ट पे बिल्ड करना है तो ये सारा जो है 86 से 2005 तक है ये फिर उसके बाद में ये क्या था ये अप्रिशिएटिवनेस ये खास करके जो भक्ति तीर्थ महाराज के संग था उसमें था वो फिर उसके बाद में जो टी है टायरलेसनेस वो उन्होंने जब भारत में रह के सारा उन्होंने विचार किया उस पर बिल्ड कर सकते थे ऐसे वो ऐसे नहीं कि मैं राजा आसन पे बैठ के सब मुझे अभिवादन कर रहे हैं। आज खुद नए इलाके में जाके खुद वो ऑन द फ्रंट वो खुद प्रचार कर रहे हैं। वो 2006 से लगभग 24 25 तक है। 25 तक हम कह सकते हैं पर इन सब में जो है डिफाइनिंग क्वालिटी जो है महाराज की जो है ह्यूमैनिटी तो। इस तरह से जो परम पूज्य राधा स्वामी महाराज है इन्होंने। प्रभुपाद जी के आंदोलन ने प्रभुपाद जी के लिए बहुत विजनरी सेवा की है और हम सबको एक भले ही हमको उनका व्यक्तिगत संग नहीं मिल रहा है इतना पर क्या है वह कृष्ण भावना में पोषण के लिए जो जरूरी है वो हमें प्रचुर मात्रा में दे रहे हैं। तो मैंने कुछ प्रसंग मेरे महाराज के साथ बताएं। मैंने जो किताब भी लिखा है उसके बताया कि अगर सिर्फ हम महाराज की जो इंसिडेंट है जीवन में क्या-क्या हुआ है? क्या पास्ट टाइम उसपे जोर देते हैं तो उससे क्या होता है पर एक स्कारफिटी मेंटालिटी आ जाता है। अरे वैष्ण भक्तों को इतना संग मिला है। मुझे कभी संग मिला ही नहीं। मुझे मिलने वाला नहीं है। पर क्या है? महाराज जी ने जो क्या किया है और जो क्या दिया है वो समझते हैं। वैसे तो क्या है उससे एक अबंडेंस मेंटालिटी आता है। कि महाराज ने मुझे प्रचुर मात्रा में कृष्ण भावना का कैसे लाइफ जो है लाइफ लेसेंस और लेगसी जो है एक ट्रायंगल है। तो उन्होंने कैसे कृष्ण भक्ति फ्रॉम की है? कैसे कृष्ण भक्ति करना है। है वह सिखाया है और उसके लिए सुविधाएं निर्मित की है तो जो इसके द्वारा हम सब जहां भी है हम प्रचार करके हम खुद भक्ति कर सकते हैं प्रचार कर सकते हैं और प्रभुपाद जी कृष्ण को प्रसन्न करके महाराज को प्रसन्न करके भगवत धाम जा सकते हैं। बोल साधनाथ स्वामी महाराज की
श्रील प्रभुपाद की श्री ब्रह्मा गौरी वैष्णव संप्रदाय की
श्री कृष्ण भगवान की जय जय गौर प्रेम की हरि हरि बोल किसी को कोई प्रश्न है तो वी कैन टेक सम क्वेश्चन हरे कृष्णा जी मेरा दो क्वेश्चन था पहला क्वेश्चन जो अब्जॉर्प्शन वाला पॉइंट था ना उसमें आपको बताया था कि जो कृष्ण राधानाथ महाराज वहां वृंदावन में अकेले बीटीज का सोया करते थे बिल्कुल अब्जॉर्ब जाते थे उस समय तो अपने बताया था कि वहां पे उस समय कोई लोग भी नहीं आते थे उन उस मंदिर में फिर भी महाराज बिल्कुल डेडिकेशन के साथ अब्सॉर्प्शन के साथ सॉरी केवल महाराज एंड कृष्ण एंड दे डीटीज़ एंड महाराज बोथ आर सो सेटिस्फाइड। तो समटाइम्स हम लोग ऐसा सोचते हैं कि लाइक आई एम फॉलोविंग ऑल द स्टैंडर्ड्स इन आई लेवर्स इन वॉइस एंड एवरीथिंग। बट अह अह बहुत चीजें हैं जो हो नहीं पाती है कभी यह ना कि भगवान पर डिपेंड होकर भगवान में अब्सॉर्ब रहने कि आई एम नॉट अ डूअर तब तो भगवान ही कर रहा है बट स्टिल बहुत चीजें हैं जो मन को हेजिटेट कर देती है लाइक ऑपोजिट इंडस्ट्री अट्रैक्शन या फ़ूड के प्रति एंड मेनी थिंग मटेरियल ग्लैमर तो महाराज जो है क्या है महाराज इस तरह का अब्सॉर्प्शन दिखाया है तो हमारे लिए बड़ा मुश्किल है वो। हां बिल्कुल सही है कि महाराज ने इस प्रकार का ऑर्प्शन दर्शाया है। एक बार एक भक्त ने महाराज से पूछा कि आपने जो अधिगम लिखा है, क्या ये किताब क्या आपके जीवन में जो आपने आपके टाइम का क्या उसके बाद में किताब लिखने वाले हैं आप? तो महाराज बोले कि अगर जो लोग पहला किताब पढ़ करके आएंगे तो दूसरा किताब पढ़ के चले जाएंगे वो। तो महाराज वो एक्सप्लोर सैक्रिफाइस किया है। है बट महाराज डज नॉट एक्सपेक्ट वो स्टैंडर्ड नहीं होना चाहिए कि ऐसे वो एक बहुत ही इमरजेंसी का फेस था एक फेस था वो उस समय भक्तों ने एक्स्ट्राऑर्डिनरी एडिकेशन दिखाया पर वहां पे ये भी हुआ है कि बहुत कैजुअल्टीज भी हुए हैं वृंदावन के समय के बहुत कम भक्त में रहे हैं तो मैं जो काउंसिल सिस्टम सर्वे अकॉर्डिंग टू नेचर ये सारी सुविधाएं जो है आईडिया इतनी डिफिकल्ट नहीं होनी चाहिए चाहिए। तो इसीलिए हम सब एक दूसरे को इनकरेज करना है, एक दूसरे को एप्रिशिएट करना है। सो डोंट बी सो हार्ड ऑन योरसेल्फ। तो जहां कई भक्त बोलते हैं कि अगर हम हमें कुछ सेवा में बड़ी मुश्किल हो रही है। तो हमें बहुत अनकंफर्टेबल हो रहा है। बहुत समय परेशानी हो रही है। तो मैं एक जगह मंदिर में था। वहां पे ऐसे बताया जाता था कि जैसे महाराज जी वृंदावन में सेवा कर रहे थे वैसे हम जहां भी वहां पे हमको सेवा करनी चाहिए। महाभार महाराज ने अपने को फॉलो किया था। ऐसे हमें यहां अपने अथॉरिटी को फॉलो करना चाहिए। तो मैंने महाराज के हमारे स्कॉटर को बोला है पूछा है महाराज नेवर सेड कि जो मैंने किया वो तुम्हारे लिए स्टैंडर्ड है। मैं तुमसे अपेक्षा करता हूं ऐसे। नहीं है ऐसे। कि अभी इसका मतलब नहीं है कि हम हमारे प्रॉपर्टी को रिजेक्ट कर दें या हम कोई भी डिसकम स्वीकार ना करें। पर हम सब की अपनी क्षमता है। और अगर वो क्षमता अभी नहीं है हम में तो हमें खुद को वी डोंट हैव टू बीट आवरसेल्स विद गिल्ट कि मैं इतना इतना पतित भक्त हूं नहीं जो क्षमता है उसके अनुसार आप सेवा कीजिए और वो सेवा करते हुए हम आगे बढ़ते रहेंगे तो महाराज जो है कि एक तरह से वो बहुत अकोमोडेटिंग है कि जो इंडिविजुअल डिवोटीज की जो नीड्स है उसको कैसे हम स्पेस दे सकते हैं कैसे उनको अकोमोडेट कर सकते हैं इसके लिए महाराज देखते हैं उसके अनुसार वो ही सेट हम सेवा कर सकते हैं तो एक भक्त है कि मैं अमेरिका में था एक मंदिर में तो वहां पर दो भक्त है वो बड़ा बहुत वेस्टर्न टीचिंग कर रहे हैं और वो वहां पे जो लोकल मंदिर है वो लोकल मंदिर के लीडर जो थे उनको इस बहुत कंप्लेंट्स थे उनके तो महाराज मैं महाराज को मैंने बताया उनके बारे में ऐसे-ऐसे मैंने सुना तो महाराज बोले कि ये जो भक्त है वो वो इतने डेडिकेटेड है कि अगर प्रभुपाद जी यहां पे होते तो प्रभुपाद जी बोलते थे उनको तुम अपना टेंपल चालू करो तुम प्रेसिडेंट बन जाओ सिंपल के। चाहे बोले कि हमारे मन हमारे संस्था में बड़े बहुत एम्पॉवर्ड डिवोटीज़ हैं। बट वी डू नॉट हैव एनफ एम्पॉवर्ड लीडर्स टू एंगेज एम्पॉवर्ड डिवोटीज़। क्या होता है कि जो बहुत ही टैलेंटेड डिवोटीस है या बहुत ही स्पिरिटेड डिवोटीज़ हैं। वो एकदम यस मैन नहीं बन सकते। तो उनको अपना-अपना स्पेस देना जरूरी है। तो ऐसे हुआ कि भारत में जैसे हिंदुत्व बढ़ रहा है। तो ऐसे हो गया कि कुछ भक्त भी है मुंबई में जगह पर जिनको ये भाव बहुत हो गया कि हमें राष्ट्र के लिए कुछ करना चाहिए। सनातन धर्म के लिए कुछ करना चाहिए। हम कृष्ण भावना का प्रचार जो कर रहे हैं। वो कुछ ही लोगों तक जाएगा। वो जो 16माला जी आपके साइने में बहुत लोग नहीं आएंगे। पर कुछ लोग हैं जो यहां तक नहीं आ पाएंगे। पर वो क्या होता है क्रिश्चियन में कन्वर्ट हो जा रहे हैं। इस्लाम में कन्वर्ट हो जा रहे हैं। ये हो रहा है, वो हो रहा है। तो कुछ लोगों को प्रभाव था कि ये हम बहुत हाई लेवल का प्रीचिंग कर रहे हैं और हम समाज में रेलेवेंट नहीं रह रहे। तो जब महाराज को बताया महाराज ने बताया कि ऐसे नहीं है। उन्होंने बोला कि हम जो हमारा कृष्ण भावना है वो एक त्रिवेणी संगम हो सकती है। गंगा जमुना सरस्वती बोले क्या है कि जो जमुना है वो भक्ति प्रदान करती है। जो गंगा है वो वो वो पानी देता है। जीवन प्रदान करती है। और जो सरस्वती है वो ज्ञान प्रदान करते हैं। बोले कि तीनों जो है त्रिवेणी तीनों सीक्रेट है। तीनों मिलते हैं। वैसे बोले कि कुछ भक्तों को प्रेरणा मिल रहा है ये कि वो कुछ गंगा जैसे वो थोड़ा हूं वर्क करे जिससे कि पावर्टी है लोगों में उसको निकाल सके ताकि लोग यूरोप पे जाए। कुछ लोग जो है स्कूल चालू करना चाहते हैं। कुछ एजुकेशन देना चाहते हैं। तो मैं एक भक्त से मिला था। अभी वो ओसा में डीप कहीं गए थे। बोले वहां पर गीता डिस्ट्रीब्यूट किया। और बोले कि वहां पर वो स्कूल के पूरे लाइब्रेरी में जो गीता लेकर गए एक ही किताब है। बोले अगर हम गीता नहीं भेजते तो वहां पर कोई क्रिश्चियन जाके बाइबल भेज रहा था। और वो इंग्लिश और सारे लैंग्वेजेस जो है वो इंग्लिश लैंग्वेज बाइबल से सीखते थे। तो वहां पर प्रचार नहीं कर रहे पर वी आर रीचिंग ओवर। तो पॉइंट ये है कि ऐसे नहीं है कि जो मेन सिस्टम है वो चेंज कर सकते हैं हम। वो वैसे ही रहेगा। पर अगर भक्त वो उस सिस्टम में फिट नहीं हो रहे हैं तो भक्तों को स्पेस देना है कि वो किस तरह से अपनी क्षमता के अनुसार भक्ति कर सकते हैं। तो महाराज का ऐसे भाव है कि बेसिकली कोई भी परिस्थिति है कुछ भक्तों को फैसिलिटी बहुत जरूरी है। कुछ भक्तों को फ्रीडम बहुत जरूरी है। तो किसी को भी कोई भी परिस्थिति में दोनों नहीं मिलने वाला है। अगर आपको फैसिलिटी चाहिए तो आपको फ्रीडम छोड़ना पड़ेगा। तो मतलब अगर मैं किसी मंदिर में भागवतम क्लास दो बोलता है नहीं वेदांत वेदांत क्लास नहीं वेदांत को रेफर कर सकते हो और ये ये फोरम भागवतम क्लास के लिए तो क्या है अगर मुझे भागवतम क्लास की फैसिलिटी चाहिए तो मुझे जो बोलना है वो फ्रीडम पढ़ना पड़ेगा पर अगर मुझे फ्रीडम चाहिए मुझे सूत्र सिखाना तो फिर मुझे संस्था की फैसिलिटी को डिमांड नहीं कर सकता मैं ऑनलाइन क्लासेस दूंगा मैं कुछ कोर्स चालू करूंगा लोग आएंगे वो आएंगे। तो ऐसे नहीं कि जिनको कुछ लोगों को फ्रीडम की ज्यादा जरूरत होती है। कुछ लोगों को फैसिलिटी की ज्यादा जरूरत होती है। तो बोथ कैन मूव टुवर्ड्स कृष्णा। तो अनरीजनेबल क्या होता है? भक्त बोलता है मुझे फैसिलिटी भी चाहिए और फ्रीडम भी चाहिए। वो नहीं होने वाला। तो इसलिए अगर हम जैसे बताया था कुछ लोग डिफरेंट पीपल कैन ग्रो इन डिफरेंट वेज़ इन भक्ति। तो वी शुड फाइंड आउट हेल्थ माइंडेड एसोसिएशन। जातीय संगना है। उसमें हम प्रगति कर सकते हैं। ओके ओके सर आफ्टर लिसनिंग योर एंटायर स्पीच टुडे आई हैव जस्ट टू डाउट्स इन माय माइंड नंबर वन इज इज कृष्णा कॉन्शियसनेस स्पेसिफिक और रिलीजियस स्पेसिफिक दैट इस क्वेश्चन नंबर वन
व्हाट डू यू मीन ह्यूमैनिटीज इन दिस कांटेक्ट
सर व्हाट आई मीन टू से इस दिस लॉर्ड कृष्णा व्हाटएवर आई हैव रेड इन माय वैल्यू डजंट टू बिलीव इन
ओके ओके आई गॉट योर क्वेश्चन ठीक है लेट्स टेक वन एट अ टाइम तो कृष्ण भावना जो है वो यूनिवर्सल है वो भगवान भगवान जो है वो सबको पिता जगतो माता धाता पिताम सबके वो माता पिता है और सबके लिए कृष्ण भावना है अभी कृष्ण भावना के जो स्पेसिफिक एक्सप्रेशंस है किस तरह से कृष्ण भावना को प्रैक्टिस करना है वो अलग-अलग देश काल पात्र के अनुसार निर्धारित होता है। तो उसके अनुसार कुछ कल्चर बनता है, कुछ सिस्टम्स बनती है, कुछ सोशल स्ट्रक्चर बनते हैं और वो भक्ति के लिए अनुकूल है तो उसको हम अडॉप करते हैं। वो अगर भक्ति के लिए अनुकूल नहीं है तो उस पे इंसिस्ट नहीं करते हैं। तो जो भक्ति है वो ट्रांजेंडेंटल है पर ऐसे नहीं कि भक्ति के लिए वो सिस्टम को रिजेक्ट करना है या वो सिस्टम से ही भक्ति करना है। तो जो वर्णाश्रम था वो एक सिस्टम था। उससे भक्ति हो रही थी। से ऐसा नहीं कि वर्णाश्रम नहीं तो भक्ति नहीं होगी। भक्ति हम उसको बिना नहीं कर सकते। तो भक्ति महत्वपूर्ण है और वो हर व्यक्ति हर परिस्थिति कर सकता है। विल कम बैक टू यू लेटर। डोंट माइंड कोई और किसी का सवाल है कोई? यस प्लीज। हरे कृष्णा प्रभु जी। थैंक यू फॉर द क्लास। जी माय क्वेश्चन वाज़ दैट दिस महाराज ोनिम व्हिच यू क्रिएटेड दैट दिस राधानाथ। सो ही हैज़ सच अ वंडरफुल क्वालिटी। सो इफ माय इफ वी वांट टू फॉलो हिम दैट हाउ बेस्ट वी कैन फॉलो हिम इन दी क्वालिटीज़ बाय हियरिंग लेक्चर और फॉलोइंग ह इंस्ट्रक्शंस और रीडिंग ह पास्ट टाइम्स विद डिवोटीज़ एंड ऑल दिस। तो हाउ बेस्ट वी कैन फॉलो हिम। महाराज के हम को फॉलो करना है तो कैसे फॉलो कर सकते हैं हम? आई थिंक ऑल थ्री चीज़ लव लेसंस लेगसी जो है तीनों है। तो लाइफ जो है उनके बारे में हम सुनते हैं क्या कर रहे हैं उनका उनको हम अगर हम वी कैन कम टू नो मोर अबाउट व्हाट ही इज डूइंग व्हाट ही हैज़ डन लाइफ क्या जान सकते हैं तो उससे क्या है जो भक्त से संग मिला है जो जानते उसे सुन सकते हैं लेसंस है वो हम सुन सकते हैं क्लासेस से उनके बुक्स से जो उनकी लेगसी है मतलब क्या है कि जहां पे जो जो ऐसे प्रोजेक्ट है जहां पे महाराज के वरिष्ठ शिष्य है जो सेवा कर रहे हैं वहां पे जो भक्त जो है वो वहां पे हम उनका संग कर सकते हैं। वहां पे कैसा एटमॉस्फियर है। बेसिकली ऑल थ्री लाइफ लेसंस लेगसी ऑल थ्री आर मीन्स इन तीनों के माध्यम से हम वो जो हमारे गुरुदेव है उनके और जो महाराज के करीब आ सकते हैं। उनका अनुयाई बन सकते हैं। तो अलग-अलग परिस्थिति में अलग-अलग चीजें हमारे ज्यादा एक्सेसबल हो सकती है। कुछ ऐसी परिस्थिति हो सकती है कि हमको लेसन एक्सेबल है पर लाइफ एक्सेसबल नहीं है। ऐसा हो सकता है कि लेगसी है एक्सेसबल पर लाइट एक्सेसबल तो जो है ये किन प्रकार मना कृष्ण निवेश तो जो भी हमें अभी जो एक्सेसिबल है हमें वो लेना है तो लेसंस हमेशा एक्सेसिबल रहते हैं उससे प्रेरणा मिलती है बट वी शुड आल्सो सीक अदर थिंग्स थैंक यू हरे कृष्णा प्रभु जी थैंक यू वेरी मच फॉर सच नाइस ग्लोरिफिकेशन ऑफ गुरु महाराज प्रभु जी माइक क्वेश्चन इज़ दैट द महाराज इज़ वी हैव हर्ड दैट महाराज वेरी मच डज़ नॉट लाइक पॉलिटिक्स अमों्स डिवोटीज़। सो बट इट इज़ इनविटेबल समटाइम्स वी सी सिचुएशंस आर क्रिएट इन सच अ वे दैट देयर इज़ पॉलिटिक्स। सो कैन यू टेल फ्रॉम महाराज लाइफ लेसंस और टीचिंग्स लाइक हाउ टू महाराज हैज़ टैकल दी सिचुएशंस और फेस एंड फाउंड सोशंस। एंड इंप्रूव द सिचुएशन ओके तो महाराज को पॉलिटिक्स पसंद नहीं है पर पॉलिटिक्स एक तरह से अनिवार्य हो जाता है तो कैसे महाराज ने बताया है या कैसे महाराज ने सामना करने को बताया है थ्री मेन थिंग्स कैसे है कि महाराज अप्रिशिएट्स ऑल डिवोटीज कोई भी भक्त है वो हर एक भक्त को महाराज िशिएट करते हैं। प्रभुपाद जी को एक बार पूछा गया था कि डू यू लव ऑल योर डिसाइपल्स इक्वल? और सारे शिष्यों को आप समान रूप से प्रेम करते हैं। प्रभुपाद जी कह हां पर बट दोज़ हु कम फॉरवर्ड टू रेंबर सर्विस आई रेसिप्रोकेट वि तो इन जनरल महाराज का मूड कैसे है कि जिन्होंने मैनेजमेंट या लीडरशिप का रिस्पांसिबिलिटी लिया है वो आसान नहीं है। हमें शायद दिखता है इनके पास इतना पावर है, इतना प्रेस्टीज है। बस इतना और पैसे उतना प्रेशर भी होता है, उतना बर्डन भी होता है। तो जिन्होंने वो रिस्पांसिबिलिटी लिया है महाराज एप्रिशिएट्स देम। तो इसीलिए इन जनरल कई कई लोग भक्तों पूछते हैं कि महाराज क्या लिबरल है या कंजर्वेटिव है? मैंने कई भक्तों से बात की इसके बारे में। मेरा अंडरस्टैंड है कि महाराज जो है वो नॉन डिसरप्टर है। नॉन डिसेरप्टर मतलब क्या है? अगर कोई जगह का इथोस कंजर्वेटिव है। तो महाराज उस कंजर्वेटिव इथोस में आप कैसे भक्ति कर सकते हो वो देखेंगे। कुछ जगह का इथॉस्ट लिबरल है। वहां का वातावरण लिबरल है तो उस लिबरल इथॉस्ट में आप भक्ति कैसे कर सकते हो वो देखेंगे। तो महाराज जिस तरह के क्लास न्यूयॉर्क में देंगे। वैसे मुंबई में नहीं देंगे वो। जैसे गोवर्धन कॉलेज में क्लासेस देते हैं। राधा गोपाल भागवत वो भी अलग होते हैं। तो क्या है कि अलग-अलग जगह पर अलग-अलग जिस प्रकार से मतलब क्या है? यह थोड़ा थोड़ा सा करो भैया। यह ऐसी संकल्पना है अगर यह भक्ति है यह कृष्णा कॉन्शसनेस है तो बेसिकली इस्लाम में ही दो संकल्पना है कि यह अगर मान लीजिए इंडियन या वैदिक कल्चर जो भी बोल रहे हैं हम अ पर्टिकुलर वे ऑफ डूइंग थिंग्स तो एक है कि दुनिया में अलग-अलग प्रकार की संस्कृतियां है और एक संकल्पना है कि जो भी संस्कृति है उससे हमें यहां पर आना है कम टू इंडियन कल्चर एंड देन वी गो टू कृष्णा। हम् और दूसरा है कि कृष्णा कॉन्शसनेस इज़ इंडिपेंडेंट ऑफ़ कल्चर। कि जो भी कल्चर है वहां से आप कृष्ण कॉन्शियस हो सकते हैं। तो, यह जो है दिस इज़ कंजर्वेटिव। कंजर्वेटिव मतलब आपको इस प्रकार के कपड़े पहनने हैं। इस प्रकार से ही बात करना है। इस प्रकार से ही आपको भाषा बोलनी है। ये भी है। और ये जो है लिबरल तो जेंडर रोल्स हो सकते हैं। बहुत कुछ हो सकता है। हायरार्किकल स्ट्रक्चर होता है। तो अभी जो महाराज का भाव है कि जिस जिस जगह पे कंजर्वेटिव इथॉस्ट है महाराज वहां पे कंजर्वेटिवली काम करें। जिस जगह लिबरल थॉर्स है वहां पे महाराज लिबरली काम करें। सो इन जनरल कृष्णा वी शुड नॉट मेक कृष्णा कॉन्शियस मोर डिफिकल्ट देन व्हाट इट मीन्स टू बी। तो कोई कंजर्वेटिव जगह पर वहां पर अगर आप लिबरल वैल्यूज लेकर आ जाएंगे। तो लोगों का मन चल जाएगा। कोई लिबरल है वहां पर कंजर्वेटिव वैल्यू लेकर आ जाएंगे तो वहां पर प्रॉब्लम हो जाएगा। तो कैसे है कि महाराज नॉन डिसररप्टर है। इसका मतलब क्या है कि इन जनरल अगर किसी डिवोटी और लीडर में टेंशन होता है कुछ तो महाराज जनरली लीडर को सपोर्ट करते हैं। ऐसे नहीं कि डिवोटी को रिजेक्ट करते हैं। तो महाराज का भाव क्या है कि इन्होंने समर्पण किया है इस पर्सन सरेंडर। इन्होंने जिम्मेदारी है तो महाराज वो जनरली वो सिस्टम को डिसरप्ट नहीं करते हम पर ऐसे नहीं कि सिस्टम को डिसरप्ट नहीं करना है मतलब वो डिवोटी को सफोकेट होना है नहीं वो डिवोटी को महाराज अकोमोडेट करने को बोलते तो अभी अकोमोडेट वो डिवोटी को अकोमोडेट करना है उसी प्रोजेक्ट में होगा कहीं और होगा तो महाराज ने कहा है कि कोई भी काउंसिलर सिस्टम जो हुआ था उसमें आज कई बार बोलते हैं ये बोले कि द काउंसिलर शुड नॉट बी पोज़ेसिव ऑफ़ देयर काउंसिल इज बोले पज़ेसिवनेस जाएगा अ काउंसिल सिस्टम विल बिकम अ मॉन्सर दैट विल डिवोर आवर कम्युनिटी तो अगर एक भक्त है उनको अपने अथॉरिटी से जमता नहीं है तो ऐसे नहीं है कि वो अथॉरिटी गलत है या वक्त गलत है महाराज मुझे बताते हैं मैंने किताब में लिखा है कि सम पीपल गेट अलोंग विथ सम पीपल सम पीपल जस्ट डोंट गेट अलोंग विथ सम पीपल बट इवन इफ यू कांट गेट अलोंग विथ समवन डोंट स्पॉइल योर रिलेशनशिप तो मतलब क्या है कि अगर एक सिस्टम में कोई नहीं होता है तो दे कैन फाइंड प्लेस समवेयर एल्स। तो पॉलिटिक्स का मतलब क्या है? एक तरह से देखिए कि आप उसी जगह पर रह रहे हो और वहां पे जो अथॉरिटी है उसको अंडरमाइन कर रहे हो बार-बार। हम तो अगर उस तरह से पॉलिटिक्स देखते हैं तो महाराज डस नॉट लाइक दैट एट ऑल। अगर आप किसी किसी सिस्टम में हो तो उस सिस्टम में यू हैव टू पिक द सिस्टम। बट महाराज ये नहीं कहेंगे यू अगर आपको इसी सिस्टम में रहना है। यहीं पे जीना है यहां पे मरना है। ऐसे नहीं बोलेंगे महाराज। इफ यू कांट फिट इन दैट यू कैन मूव समवेयर एल्स। ऐसे नहीं कि महाराज जो मुंह करते हैं उनको उनको गिल्टी बनाते वगैरह कुछ नहीं है। तो एक तरह से तो महाराज नॉन डिरप्टर है तो इन जनरल अगर उनके भक्त डिसिशन डिसरप्टिव बनते हैं तो दैट इज नॉट गुड। सो देन कैन ऑलवेज द वर्ल्ड इज़ अ बिग प्लेस। यू कैन गो समवेयर एल्स एंड यू कैन डू योर सर्विस दे। ऑफ कोर्स ऐसा नहीं कि यू वांट टू बिकम लाइक अ रोलिंग स्टोन दैट गैदर्स नो मदर। हर जगह पे समस्या आती है। हम जाते दूसरी समस्या तो कहीं भी हर जगह पर होगी तो यह पहला पॉइंट है नॉन डिस्टरप्टिवनेस महाराज का भाव है। दूसरा है कि महाराज का मूड है कि जहां तक मैं समझता हूं कि वो है कि स्पेस फॉर एवरीवन। कि एक जगह पे स्पेस नहीं हो सकता है। पर आपको आपका स्पेस ढूंढना है या आपको आपका स्पेस क्रिएट करना है। तो अगर कोई अपने लिए स्पेस क्रिएट करना चाहता है तो एज़ लॉन्ग एज़ इट नॉट डिसरप्टिंग द एकज़िस्टिंग सिस्टम महाराज डज़ नॉट गेट अपसेट। जैसे मैंने बताया कि ऐसे से कुछ लोगों को थोड़ा धर्म का प्रचार करना है भक्ति की जगह पे सनातन धर्म का तो महाराज ने उनके लिए स्पेस क्रिएट कर उनको कॉनसेप्चुअली स्पेस दे दिया उन्होंने। तो महाराज क्रिएट स्पेस फॉर डिवोटीज़ या ही एनकरेजेस देम टू क्रिएट स्पेस फॉर देमसेल्व्स विदाउट डिसररप्टिंग द सिस्टम। तो वो जो है ऐसे आपको सफोकेट होना ये जरूरी। नहीं है। और तीसरा जो मेन प्रिंसिपल है आई विल कम टू दैट दैट जो है रिलेशनशिप जो है वो ट्राई टू कीप इट पॉजिटिव। कभी-कभी क्या होता है कि लोग भक्त बहुत पास में होते हैं तो फिर बहुत टेंशन होता है। पर अगर पास में नहीं होगे तो थोड़ा स्पेस आ जाता है। तो फिर क्या होता है? लाइक समटाइम्स तो कोऑपरेट हम बट समटाइम्स यू कैन नॉट कोऑपरेट यू कैन कोऑपरेट कोऑपरेट का मतलब क्या है मैं यहां पे ऑपरेट करता हूं आप वहां पे ऑपरेट करो व्हाट महाराज अब्सोलुटली डज़ नॉट लाइक इज़ डिवोटी इज़ कॉन्स्टेंटली क्रिटिसाइजिंग ईच अदर इसने ऐसे किया उसने वैसे किया उसने वैसे किया तो एक बार मैं विटनेस कर रहा था तो दो भक्तों में बहुत कंफ्ट था तो महाराज ये इस तरह ऐसे किया उसने ऐसे किया महाराज बोले कि यू नो आई डोंट वांट टू बिक यूटलिस्टिक अप्रोच टू दिस। मतलब क्या कोर्ट कैसे जाके आप क्या आप सुनाई दे रहे हो क्या? इसने ऐसे किया, उसने वैसे किया। बाहर से बोला कि कि व्हाट इज योर नीड? आपकी जरूरत क्या है? एंड हाउ कैन इट बी फुलफिल्ड? तो क्या है कि इन जनरल पॉलिटिक्स इन द सेंस ऑफ़ ऑर्गेनाइजेशन में टेंशन होना यह अनिवार्य है। पर वो उसको हम कोई माजी क्वांट नहीं है। इसे हम टाल सकते हैं। पर जब वह होता है तो उसको हम कैसे डील करते हैं? वो जो है उसके लिए वी कैन वी कैन डील विथ इन द वे दैट वोंट बी डिसररप्टिव फॉर द लार्जर होल बट इट इज़ आल्सो नॉट सफोकेटिंग फॉर अस। तो उसको थोड़ा एक्सपर्टली करना पड़ता है। पर इन जनरल अभी महाराज जी वृंदावन में थे। वहां से बॉम्बे में आ गए। तो अभी बॉम्बे में जब प्रचार कर रहे थे वो तो अभी क्या हुआ कि महाराज को अपना स्पेस था पर वृंदा के जो लीडर थे वो एक समय बहुत लिबरल बन गए थे वो तो उनका भाव क्या था कि हमको प्रचार करना है तो प्रचार करने के लिए हमको जो पाश्चात्य देश में प्रचार करना है तो वी शुड बी मोर अप्रोचेबल टू देम तो उन्होंने क्या किया वो बोले कि जो क्रिश्चियन प्रीस्ट जो है जैसे वो रोप्स पहनते हैं ऐसे हम सब रोग्स पहनने लगेंगे फिर बोले कि हमारे नाम जो है बहुत कॉम्प्लिकेटेड नाम होते हैं वो बोले कि हम जो दीक्षा देंगे तो क्या है हम वेस्टर्न नाम दे देंगे तो एक वहां पर अमेरिका में तीन बहनें हैं वो तीनों का दिशा हो गया था तो उनका नाम लिया था लिली जैस्मिन और डेपोडिनल दीक्षित डॉक का तो जब वो लीडर यहां पर भारत में आए थे वो बोले कि वो बोले थे कि भारत में भी जो सारे भक्त है वो रोग पहनना चाहिए तो महाराज बिल्कुल महाराज प्रभुपाद गिव मी दिस क्लोज आई वांट टू वियर दिस तो फिर तो बोले कि नहीं यू आर जस्ट अटैच टू योर मंडे इन इंडियन बेल्ट दिस इज द प्रिंसिपल प्रिंसिपल यू डू व्हाटवर रिक्वायर्ड फॉर मी तो महाराज बोले वी वा फॉर्म ही सेड दिस इज़ योर प्रोजेक्ट एंड इफ यू वांट आई विल लीव फ्रॉम हियर बट इफ यू वांट मी टू बी हियर एंड सर ओवर हियर वी विल डू इट दिस वे तो महाराज तो भी फॉर्म थे एक तरह से तो मेरा पॉइंट यह है कि सम टाइम्स यू हैव टू टेक अ स्ट्रांग रोल अगर आप मुझसे यह जिम्मेदारी एक्सपेक्ट कर रहे हैं तो दिस इज हाउ आई विल डू इट। बट इफ यू डोंट वांट मी हियर एंड आई वुड फाइट अगेंस्ट मैं यहां चला जाऊंगा। दैट्स व्हाई द नॉन डिरप्टिव दैट्स द की वर्ड आई वुड से आंसर क्वेश्चन। थैंक यू। अच्छा यू वांट टू ऐड समथिंग इसके बारे में। अमेजिंग वर्ड यू हैव यूज़ यस ट्रू महाराज इज़ एक्चुअली ही कैन नॉट टॉलट पीपल जस्ट डिसाइजिंग एंड यू नो एववरीथिंग बिकमिंग लिटिल अगली ही वांट्स मूव टू बी अप्रिशिएटिव एंड ऑल द थिंग्स एंड फोकस ऑन सर्विस इफ यू आर नॉट एबल टू सर्व हियर समवेयर एंड बी हैप्पी हम सो ऑल कैन सर्व बेस्ट इन एव्री सिचुएशन मैंने कहीं अभी यूरोप में कई जगह पे ऐसे भक्त हैं जहां पे महाराज जाते नहीं है वहां पे तो वहां पे दो तीन भक्तों से मैं बात किया उन्होंने महाराज से पूछा कि महाराज व्हाट इज योर इंस्ट्रक्शन फॉर अस कि वहां पे महाराज से कोई प्रोजेक्ट्स नहीं है डायरेक्टली तो महाराज ने बोला बी कृष्णा कॉन्शियस बी हैप्पी एंड व्हाट वि द लोकल अथॉरिटी ये भक्त वहां पे है तो महाराज बोले कि आपका कृष्ण भावना महत्वपूर्ण है आप सब चाहिए और वो विद द लोकल अथॉरिटी एक भक्त ने पूछा कि महाराज कैन यू गिव मी वन इंस्ट्रक्शन फॉर लाइफ तो महाराज बोले लाइफ इज टू कॉम्प्लिकेट फॉर वन इंस्ट्रक्शन तो एक भक्त महाराज के पास आए थे कपल आया था महाराज के पास कहा महाराज हमने फैसला किया है कि हम हम बच्चे नहीं करने वाले तो कृपया आप हमें आशीर्वाद दे दीजिए तो महाराज ने कहा जब भी आपको बच्चे करने की इच्छा है तभी मेरा आशीर्वाद आपके खाते हैं। तो मैंने तो मैंने वरिष्ठ भक्तों से पूछा तो महाराज का भाव क्या था? कि महाराज डज नोट महाराज वांट्स द इंस्ट्रक्शन टू एम्पॉवर डिवोटीज़। नोट टू बर्डन डिवोटीज़। कि महाराज महाराज ने मुझे इंस्ट्रक्शन दिया है और जिंदगी भर मैं नहीं कर पाया तो मुझे गिल्टी रहूंगा। रहेगा नहीं तो महाराज ऐसे वैसे इंस्ट्रक्शन नहीं देते वो तो इसीलिए इंस्ट्रक्शन से हमें जैसे मैंने बताया कि मेरा एक्सपीरियंस है महाराज इंस्ट्रक्शन जो है वो एक सीड है तो सीड से हम बीज उसे डेवलप कर सकते हैं ठीक सो यस वन टेल मी हार्ड टाइम टिल टिल हाउ मच टाइम आई हैव टू डू डू शुड वी गो ऑन कैन टेक वन लास्ट क्वेश्चन देन दोज हु वांट बुक्स मे बी यू कैन साइन द बुक्स एंड देन भी हम तो इसमें जैसे बताया लाइफ लेसन लेगसी तीन पार्ट इसमें छोटा सा किताब है ये तो बेसिकली जो लाइफ में जो मैंने एट थिंग्स बताए हैं राधा मंज वो सारा लाइफ में आता है। आफ्टर द सम पॉइंट्स व्हिच आर नॉट स्पोकन हिअर जो मैंने बोला है काफी कुछ है किताब में एंड देन लेगसी में लेसंस में मैंने मेरे जो इंटरेक्शन महाराजा कुछ पता है कुछ और है और फिर लेगसी में महाराजा प्रोजेक्ट्स जो किए हैं उसके बारे में क्या किया है कैसे वो प्रोजेक्ट मैनिफेस्ट हुए उसके बारे में द स्माल बुक यू कैन रीड इन अबाउट कपल ऑफ आवर्स आल्सो तो आई विल बी हियर आफ्टर सम टाइम यू कैन साइन द बुक्स और आंसर फॉर द क्वेश्चन द क्लास थैंक यू वेरी मच इट्स लास्ट क्वेश्चन हुस नॉट आस्क्ड टिल नाउ लेट्स कंप्लीट विद देम बिकॉज यू ऑलरेडी आस्क आपने पूछा नहीं है हरे कृष्णा प्रभु। सो दिस इज अराउंड दी थर्ड ए दैट वी डिस्कस इन महाराज एप्रिशिएटिवनेस। तो हम ये देखते हैं कि व्हेन महाराज व्हेन इट कम्स टू ग्लोरिफाइंग महाराज क्लब ऑल द गेट्स। ही डज़ इट विद एक्सट्रीम जेन्युइन हार्ट। मतलब दिखता है कि व्हाटएवर महाराज इस स्पीकिंग समथिंग दैट ही इज़ स्पीकिंग विह फीलिंग इट इज़ इट्स नॉट दैट। स्टार्टिंग माय वर्क इट्स नॉट दैट ही इज़ मेकिंग दैट और जस्ट मेक इट गुड ही लाइक दैट। इट इज़ समथिंग वेरी मच जेन्युइन। सो इन टुडेस कांटेक्ट वी नॉट हैव जस्ट गॉड ब्रदर्स विल हेव गॉट प्रेजेंस एंड एक्सटेंडेड स्पिरिचुअल रिलेशनशिप्स। सो टेकिंग इंस्पिरेशन फ्रॉम महाराज हाउ डू वी यू नो इन कल्लक सेम यू नो हैबिट ऑफ़ बीइंग एप्रिशिएटेड अबाउट आउट ऑफ द डिवोटिस इन अ वे दैट इट इज़ जर्मिन। बाय तो जैसे कभी-कभी होता है कि ग्लोरिफाई करना होता है। सो यू नो वी एट टाइम्स टू बी वेरी ऑनेस्ट टू मेक इट अप टू मेक इट साइल गुड। हमें गुणगान करना है। तो गुणगान करते समय कैसे हमें ऐसे मेकअप नहीं करना है। वो काल्पनिक नहीं है। आई थिंक ऐसा है कि इसमें दो चीजें हैं। एक एप्रिसिएशन के वर्ड्स है दूसरा एप्रिशिएटिव एटीट्यूड है। तो अगर अप्रिशिएटिव एटीट्यूड होता है तो जेन्युइनली क्या एप्रिशिएट करने के लिए हम देख सकते हैं वो पर अगर अंदर से एप्रिशिएट एटीट्यूड नहीं है और एप्रिसिएशन एक रिवाज बन जाता है तो फिर क्या होगा वो खोखला रहेगा तो फिर हम ऐसी चीजें बोलेंगे जिसप हम खुद विश्वास नहीं करते हैं हम भी जानते हैं वो सत्य नहीं है उसे भी जानते हो सत्य नहीं है वो क्या है वैसे भी ह्यूमैलिटी भी जो है ना ह्यूमैलिटी शुड नॉट बी एट द कॉस्ट ऑफ ऑनेस्टी कोई बहुत अच्छा सिंगर है और वो बोलते है कि आई एम अ टेरेबल सिंगर देयर इज़ नॉट ह्यूमिलिटी। यानी कि व्हाट को कह सकते हैं जो मेरी सिंगल एबिलिटी है वह भगवान की कृपा से है। दैट विल बी ह्यूमिलिटी। तो, जैसे ह्यूमिलिटी शुड नॉट बी एट द कॉस्ट ऑफ़ ऑनेस्टी लाइक दैट अल्सो। जो एप्रिसिएशन है, शुड नॉट बी एट द कॉस्ट ऑफ़ ऑनेस्टी। ऐसे हो सकता है कि जो मैग्नीट्यूड है, किसी में थोड़ा टैलेंट है, और वो टैलेंट को हम ग्लोरिफाई कर सकते हैं। जो अभी तक मैनिफेस्ट नहीं हुआ है, तो उसको मैनिफेस्ट करने में उसको प्रेरणा मिल सकती हैं। सो, देयर हैस टू बी अ सीड ऑफ ट्रुथ। जो हम ग्लोरिफाई करेंगे उसका डिग्री थोड़ा ट्रुथ से थोड़ा ज्यादा हो सकता है। दैट इज नॉट कंसीडर्ड रोंग। दैट इज़ एनकरेजमेंट। तो जो बताया गया चैतन्य महाप्रभु कहते हैं कि जो बड़े-बड़े कवि है उन्होंने अतिशयक्ति से कृष्ण के गुणगान किया है। चेतन चरित्र में कहते हैं। अतिशयक्ति मतलब हम कहते हैं हाइपर। इन द फॉर्म ऑफ डिस्टॉशन। तो दैट इज अ वे ऑफ़ ग्लोरिफिकेशन। दैट्स नॉट रोंग। बट देयर शुड बी अ बेसिस ऑफ ट्रुथ। यह पहला पॉइंट है कि हैव एप्रिशिएट एटीट्यूड। और दूसरा है कि अगर एप्रिशिएट बढ़ाना है। दिस इज़ वन थिंग व्हिच गुड यू आस्क दिस क्वेश्चन। कि हम कई बार कहते हैं कृष्णा कॉन्शियस में हमको वी वांट टू गो डीपर इन कृष्णा कॉन्शियस। वी आर कृष्णा कॉन्शियस डीपर। और जरूरी है पर माय अंडरस्टैंडिंग है कि उतना ही महत्वपूर्ण है कि हमारा कृष्णा कॉन्शियस ब्रॉडर बना। आया डीपर मतलब क्या है कि अगर यह कृष्णा है और मैं यहां पर हूं तो आई वांट टू गो डीपर इनू कृष्णा कॉन्शसनेस ये डीपर हो गया पर डीपलिंग और कृष्णा इतना इंपॉर्टेंट है तो ब्रॉड मतलब क्या है कि मैं जो कृष्ण भावना दूसरा कोई व्यक्ति कर रहा है दे विल बी डूइंग इट इन अ वे कंप्लीटली ऑपोजिट टू व्हाट आई डूइंग इट तो ये समझना कि | कृष्णा इज़ ऑलवेज गोइंग टु बी बिगर देन माय कन्सेप्शन ऑफ़ कृष्णा। कि मेरी धारणा से कृष्णा और बड़े हैं। कृष्णा की कैसे सेवा करनी है? प्रभुपाद जी की सेवा कैसे करनी है? वो मैं जो समझता हूं उससे और बड़ा विशाल है वह। तो क्या होगा? हम दूसरे भक्तों से बात करते हैं। उनको समझते हैं। तो फिर वो गुणगान कैसे करना है वो स्वाभाविक रूप से आ जाएगा। तो जेन्युइनली मैं अंडरस्टैंड दिस एप्रिसिएशन के लिए बेसिस है। है यूरियोसिटी हम कहते हैं अथातो ब्रह्म जिज्ञासा ये केवल एक स्टार्टिंग प्रिंसिपल नहीं है कि अगर हम वास्तव में समझते हैं वो भक्त क्या कर रहे हैं कोई भी सेवा जो भी कर रहा है उसमें संघर्ष होता है उसमें समस्याएं होती है और समस्याओं का सामना करके वो भक्त सेवा कर रहे हैं कि अगर वो क्यूरियोसिटी रखेंगे तो अप्रिसिएशन आसान हो जाएगा कभी क्या होता है हम भक्त से मिलते हैं वो भक्त को कुछ बोलने ही नहीं हम इसका गुणगान करते हैं। तो क्या होता है वो बहुत सुपरफिशियल रहेगा। वो भक्ति जानते ही नहीं है तो फिर गुणगान करने वाले। पर एक्चुअली वन ऑफ़ द बेस्ट वेज़ वी कैन अप्रिशिएट एनी डिवोटी इज़ जस्ट बाय केयरिंग दैट डिवोटी। कि वो क्या कर रहे हैं। क्या संघर्ष में जा रहे हैं। और यह जो है मैं एक्चुअली एक तरह से सिंस आई स्टार्टेड ट्रेवलिंग अक्रॉस द वर्ल्ड 10 12 साल से ट्रेवल कर रहा हूं। अभी तो उसके पहले मैं शास्त्रों में बहुत डीप जा रहा था। एंड आई एम स्टिल ट्राइंग टू डू दैट। बट ट्रेवलिंग हैज़ रियली ब्रॉड माय कन्सेप्शन ऑफ कृष्णा कॉन्शसनेस कि अलग-अलग जगहों पे क्या-क्या क्या क्या-क्या चैलेंजेस होते हैं और किस-किस प्रकार से भक्त तो चैलेंजेस का सामना कर रहे हैं। तो यह समझते हैं तो यू नो देअर इज समथिंग क्यूरियोसिटी रहेगा तो कृष्णा विल रिवील देयर इज समथिंग वास अप्रिशिएट इन एव्री डिवोटी भजता प्रीति पूर्वकम होगा बुद्धि योग आ जाएगा तो प्रीति पूर्वक मतलब अफेक्शन का बेसिस है अफेक्शन बिगिंस विद क्यूरियोसिटी किसी के प्रति अफेक्शन है तो क्या कहते हैं आपके जीवन में कहां से ले जाना चाहता हूं मैं तो मैं जब भक्तों से मिलता हूं तो एक बार सात साल में एक बार ट्रेवल करता हूं तो लिमिट हाउ आर यू तो थोड़ा समय है मेरे पास उनका समय है तो आई डोंट आस्क दैट क्वेश्चन हां तो हाउ वास योर लास्ट ईयर उनको भी सोचना पड़ता है हाउ वास माय लास्ट ईयर व्हाट आर द बेस्ट थिंग दैट हैपन बेस्ट से वो अलग ही सवाल पूछते कि सो व्हाट इज योर स्टोरी पहला विचित्र लगा वो पर व्हाट इज योर स्टोरी? जब पूछते हैं तो एक तरह से हमारा क्यूसिटी दिखा रहे हैं। पर उनको पूरा ऑटोनॉमी है वो क्या बोलना चाहते हैं। तो तो एक तरह से ओके व्हाट व्हाट इज योर स्टोरी मींस? वेयर आर यू कम व्हाट इज़ गोइंग ऑन योर लाइफ? व्हाट इज योर बैकग्राउंड? जैसे पाश्च में थोड़ा सेंसिटिव रहना पड़ता है। कोई बच्चे होते हैं कोई बच्चा होता है ना? तो किसी को आप स्कूल में पूछते हैं तो आपकी मां क्या करती है? आपके पिताजी क्या करते हैं? तो व्हेयर डू योर पेरेंट्स स्टे? तो ये सारे सेंस ये सारे सवाल होते हैं वेस्ट में थोड़े पॉलिटिकल इनकरेक्ट बोल के। क्या होता है कि वेस्ट में भारत में अगर कोई स्कूल में जाएगा तो बच्चे पूछेंगे तुम्हारे तुम्हारे पेरेंट्स कहां रहते हैं? तुम कहां रहते हैं? तुम्हारे पेरेंट्स कहां रहते हैं? तो पाश्चात देश में होता है तुम कौन से पेरेंट्स के साथ रह रहे हो? मां के साथ रह रहे हो या पिता के साथ रह रहे हो? तो क्या है? तो हमारे जो नॉर्मल क्यूरियस क्वेश्चन होते थे वो वेस्ट को कभी इंट्रूसिव लग सकते थे। तो इसलिए व्हाट इज योर स्टोरी? माय पॉइंट इज जस्ट हैव क्यूरियोसिटी और फिर कैसे रख सकते हैं वो भगवान दिखा देंगे। ओके थैंक यू वेरी मच साधनाथ स्वामी महाराज की
जय
प्रभुपाद की
जय
गौर प्रेम
हरी हरि बोल ग्रेस