History of ISKCON and HH Radhanath Maharaj contribution – Hindi
Podcast:
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Lecture Summary
इस्कॉन के इतिहास और राधानाथ महाराज के योगदान का सारांश
यह व्याख्यान इस्कॉन (ISKCON) की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और इसे विश्व स्तर, विशेषकर भारत और पाश्चात्य देशों में, विस्तारित करने में परम पूज्य राधानाथ महाराज के अभूतपूर्व योगदान पर प्रकाश डालता है।
1. इस्कॉन की शुरुआत और अमेरिका में सफलता
- 1965 में जब श्रील प्रभुपाद अमेरिका गए, तब वहाँ ‘काउंटर कल्चर’ (Hippie Movement) का दौर था। भौतिक समृद्धि से ऊब चुके अमेरिकी युवा शांति की तलाश में थे।
- प्रभुपाद जी ने उन्हें कृष्ण भक्ति का मार्ग दिखाया, जिससे हज़ारों युवाओं ने अपनी भौतिक जीवनशैली त्याग कर पूर्णकालिक (Full-time) रूप से मंदिर का जीवन अपना लिया।
- भारत में स्थिति अलग थी। यहाँ लोग आध्यात्मिक रूप से कम और ‘सांस्कृतिक गौरव’ के कारण अधिक जुड़े। इसलिए भारत में ज़्यादातर लोग ‘लाइफ मेंबर’ (Life Member) बने, पूर्णकालिक भक्त नहीं।
2. राधानाथ महाराज का योगदान (कम्युनिटी और प्रचार)
जब पूर्णकालिक भक्तों की संख्या कम होने लगी और ज़्यादातर भक्त ‘कांग्रेगेशन’ (Congregation – जो मंदिर के बाहर रहकर भक्ति करते हैं) का हिस्सा बनने लगे, तब राधानाथ महाराज ने उनके पोषण के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए:
- काउंसलर सिस्टम (Counselor System): भक्तों को व्यक्तिगत मार्गदर्शन देने के लिए लव (Love), ट्रस्ट (Trust) और एम्पावरमेंट (Empowerment) के आधार पर एक मजबूत समुदाय का निर्माण किया।
- भक्तिवेदांत हॉस्पिटल (Bhaktivedanta Hospital): व्यावसायिक पेशेवरों (जैसे डॉक्टरों) को उनकी आजीविका के साथ-साथ आध्यात्मिक सेवा (Spiritual Care) से जोड़ा। अध्ययनों से सिद्ध हुआ कि आध्यात्मिक देखभाल से मरीजों के ठीक होने की रफ़्तार बढ़ती है।
- ब्रह्मचारियों का प्रशिक्षण: महाराज ने इस बात पर ज़ोर दिया कि ब्रह्मचारियों का मुख्य कार्य केवल ‘फंड रेज़िंग’ (Fund raising) नहीं, बल्कि शास्त्रों का गहन अध्ययन करना और एक कुशल साधु व प्रचारक (Preacher) बनना होना चाहिए।
- पाश्चात्य देशों में प्रचार: जो पाश्चात्य लोग सीधे तौर पर किसी ‘धार्मिक संस्था’ से नहीं जुड़ना चाहते थे (Spiritual but not religious), उनके लिए महाराज ने अपनी आत्मकथा ‘द जर्नी होम’ (The Journey Home) लिखी।
- गोवर्धन इको विलेज (Govardhan Eco Village): पश्चिमी देशों के लोगों को भारत के आध्यात्मिक वातावरण का सकारात्मक और सुलभ अनुभव देने के लिए इसकी स्थापना की गई, ताकि उन्हें भारत की अस्वच्छता या अव्यवस्था के कारण कोई नकारात्मक अनुभव न हो।
3. महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (Q&A)
- प्रभुपाद जी को दलाई लामा जैसी वैश्विक मान्यता क्यों नहीं मिली? इसके तीन मुख्य कारण बताए गए हैं:
- अनुयायियों की ‘एक्सक्लूसिविस्ट’ (Exclusivist) मानसिकता।
- मीडिया और इतिहास की किताबों में हिंदू धर्म का बहुत सकारात्मक चित्रण न होना।
- दलाई लामा की शिक्षाएं (करुणा और क्षमा) लोगों से किसी विशेष नियम की मांग नहीं करतीं (Non-demanding), जबकि प्रभुपाद जी की भक्ति की शिक्षाएं विशिष्ट नियमों (जैसे जप करना, नियम मानना) की मांग करती हैं, जिसे अपनाना हर किसी के लिए आसान नहीं होता।
- प्रभुपाद जी के ग्रंथों का क्या महत्व है? प्रभुपाद जी ने अपने प्रचार और प्रबंधन के व्यस्त समय में से अपना बहुमूल्य समय ग्रंथ लिखने में लगाया क्योंकि उनके लिए यह सबसे महत्वपूर्ण था। उनके ग्रंथों का नियमित अध्ययन करना ही उनके प्रति वास्तविक सम्मान और कृतज्ञता प्रकट करना है।
Full Transcription
इस्कॉन की शुरुआत और अमेरिका में प्रचार
हरे कृष्णा नाम। प्रकृति के तीन गुण होते हैं: सत्त्व गुण, रजो गुण और तमो गुण। कुछ लोग काम करते हैं।
जो कृष्ण भावनामृत आंदोलन है, इसकी शुरुआत बहुत ही अद्वितीय, अनयूज़्वल (unusual), अनपैरेलल्ड (unparalleled) परिस्थितियों में हुई। प्रभुपाद जी कई सालों तक भारत में प्रचार करने का प्रयास कर रहे थे। 1922 से वो प्रयास कर रहे थे, थोड़ा बहुत 1940 से, और 1965 तक उनको ज़्यादा कोई यश नहीं मिला लोगों को भक्ति के लिए प्रवृत्त करने के लिए। गंभीरता से उन्होंने ग्रंथ लिखे, उनका भागवतम जो है, भारत के प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री, राष्ट्रपति डॉ. राधाकृष्णन, उन सबने उसकी सराहना की। उस तरह एक लेखक के रूप में उनको यश मिला पर एक प्रचारक के रूप में उनको इतना यश नहीं मिला।
तो प्रभुपाद जी अमेरिका गए और जब अमेरिका में गए तो वहाँ पे अमेरिका के इतिहास में एक ऐसा फेज़ (phase), एक ऐसा समय चल रहा था कि वो बहुत ही अद्वितीय था। वो ‘काउंटर कल्चर’ (counter culture) कहते हैं। क्या हुआ था कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका बहुत यशस्वी बन गया, बहुत धनवान बन गया क्योंकि अमेरिका चारों ओर—चारों ओर नहीं, पर दो ओर वो सागर से आवृत्त है और उसके ऊपर और नीचे जो देश हैं कनाडा और मेक्सिको, वो उसके खिलाफ नहीं हैं। तो इसलिए अमेरिका काफी सुरक्षित था। यूरोप में बड़ा विध्वंस हो गया, अमेरिका सुपर पावर (super power) बन गया और उसके कारण उस समय जो युवा जन्म हुए 1940-1945 सेकंड वर्ल्ड वॉर के बाद में, वो जन्म से ही ‘फ्लावर जनरेशन’ (flower generation) कहा करते थे। वो बचपन से ही उनके जीवन में जैसे फूल थे, मतलब बहुत प्रॉस्परस (prosperous) थे वो, बहुत समृद्ध थे वो।
और इसका परिणाम क्या हुआ? उनको लगा ये समृद्धि में कोई संतुष्टि नहीं है, जीवन में कुछ और चाहिए। और इसलिए वो अध्यात्म की खोज करने लगे। कई भारत से आध्यात्मिक नेता पाश्चात्य में जा चुके थे और उन्होंने भारतीय अध्यात्म के बारे में कौतूहल निर्माण किया था। केवल भारतीय अध्यात्म नहीं पर पूर्व का अध्यात्म, ईस्टर्न स्पिरिचुअलिटी (Eastern spirituality) बुद्धिज्म भी था उसमें, जो तिब्बत से आता है। आजकल के समय में आगम उसका भारत में नहीं हुआ है। पर जब प्रभुपाद जी गए, पहली बार भारतीय अध्यात्म में भक्ति अध्यात्म का उन्होंने प्रस्तुतीकरण किया और वो इतना यशस्वी हुआ कि सैकड़ों-हज़ारों की मात्रा में लोग भक्त बन गए।
पर ये जो लोग थे जब वो भक्त बने तो वो क्या था? इन लोगों ने, क्योंकि जो वो हिप्पी लोग थे, अधिकांश लोग हिप्पी थे, तभी उन्होंने जो संस्कृति थी उस समय उसको ठुकरा दिया था कि इसमें कुछ है नहीं। “ये आप एक नौकरी करो, आप कुछ पैसा कमाओ, आप फिर अपना घर बसाओ, फिर आप बड़ा घर लाओ”—ये सब जो है इसमें क्या रखा है? उनको लगता था कुछ और चाहिए हमको। और हम देखते हैं कि ऐसे लोग जब भक्ति में आए तो उन्होंने पहले ही सब कुछ छोड़ दिया था। प्रभुपाद जी एक लेक्चर में कहते हैं कि “आप सभी लोगों ने पहले से सर्वधर्मान्परित्यज्य कर दिया है, पर अभी मैं आपको सिखा रहा हूँ कि मामेकं शरणं व्रज कैसे करना है।” सब धर्मों का त्याग तो कर दिया है, पर उसके बाद क्या करना है?
तो जब अमेरिका में लोगों को भक्त बनना था, भक्त बनने का मतलब क्या है कि उन्होंने पहले घर अपना छोड़ दिया है, तो मंदिर में आके रह लो और मंदिर में भक्ति करो आप। और यही साधारण भाव था तभी, कि भक्त बनने की परिभाषा क्या थी कि आप घर से आओ, आप मंदिर जॉइन कर लो। उस समय ऐसे था कि अगर आप मंदिर में नहीं आते हैं, तो फिर आप मंदिर छोड़कर अगर आप बाहर जाके भक्ति कर रहे हैं तो मतलब ‘ब्लूप’ (bloop) हो गए। ‘ब्लूप’ यह शब्द था उसका, मतलब था कि आप भक्ति से आपका पतन हो गया है।
भारत में इस्कॉन और लाइफ मेंबरशिप
तो अभी इस परिभाषा की जो भक्ति थी, इसके साथ फिर प्रभुपाद जी की इच्छा थी कि अगर पाश्चात्य देशों के भक्तों को भारत में लेकर आएँगे तो उससे भारतीय लोग भी प्रवृत्त हो जाएँगे। तो भारतीय लोग ज़रूर प्रवृत्त हो गए, पर जो प्रेरणा थी अधिकांश भारतवासियों की, उस समय वो आध्यात्मिक प्रेरणा नहीं थी, वो सांस्कृतिक और राष्ट्रीय प्रेरणा थी। सांस्कृतिक और राष्ट्रीय मतलब क्या कि ‘हमारी भारतीय संस्कृति इतनी महान है कि देखो ये परदेशी लोग भी संस्कृति को अपना रहे हैं।’ तो हम देखते हैं कि प्रभुपाद जी के समय काफी प्रभावशाली लोग, ज़्यादा लोग भारत में प्रभुपाद जी के शिष्य नहीं बनें, कि समर्पित भक्त नहीं बनें। फिर भी प्रभुपाद जी ने उन सब को एन्करेज (encourage) किया, उनको प्रोत्साहित किया और अनेक लोगों को लाइफ मेंबर (Life Member) बनाया।
उस समय जो लाइफ मेंबरशिप थी इस्कॉन की, वो इतनी प्रेस्टीजियस (prestigious) थी, इतने आदर की बात थी। मैं एक मित्र को बता रहा था कि उनके पिताजी लाइफ मेंबर थे। कई लोग जो बड़े अफसर होते हैं, तो उनके ऑफिस के बाहर लोग अपनी नेम प्लेट लिखते हैं, अपनी क्वालिफिकेशन (qualification) लिखते हैं ‘यहां पर यह किया है, यहां से किया है, किया है, किया है।’ अधिकांश लोगों को पता भी नहीं होता है कि वो अक्षरों का अर्थ क्या है, पर ‘अरे इतने सारे अक्षर हैं, बड़ा बुद्धिमान व्यक्ति है’—यह लोग सोचते हैं ऐसे। तो उनके पिताजी ने उनके ऑफिशियल नेम प्लेट (official name plate) पर लिखा था—’इस्कॉन लाइफ मेंबर’। तो उस समय चूँकि इस्कॉन परदेशी लोगों को भक्त बना के ला रहा था, तो इस्कॉन का मेंबर बनना बहुत ही प्रेस्टीज की बात थी। और प्रभुपाद जी ने वह जो आदर की, प्रेस्टीज की बात है, उसको इस्तेमाल करके बहुत से भारतवासियों को प्रवृत्त किया कि कृष्ण भावनामृत आंदोलन को मदद करें अलग-अलग पद्धति से, और उससे प्रभुपाद जी ने कई मंदिर बनाए यहाँ पे भारत में।
अब उसके बाद जब प्रभुपाद जी जगत छोड़ के चले गए, तो उस समय क्या हुआ था? लगभग कृष्ण भक्ति के दो एकदम विभिन्न स्तर थे इस्कॉन में। जो पाश्चात्य भक्त थे वो क्या थे? वो पूर्ण समर्पित थे, भक्त बनना मतलब क्या है, मंदिर में आ जाना। और जो लाइफ मेंबर थे वो क्या हैं? शायद अपनी संस्कृति के अनुसार वो नियमों का पालन करते थे कुछ, पर सब नियमों का पालन नहीं करते थे। वो कोई गंभीरता से सोलह माला जप नहीं करते थे। प्रभुपाद जी के समर्थक थे पर उनका दर्जा बहुत नीचे था। तो दो दर्जे थे भक्ति की प्रैक्टिस के—एक है कि आप मंदिर में आके फुल टाइम मेंबर बन जाओ, और दूसरा है—उस समय गृहस्थ भी फुल टाइम मेंबर बन जाते थे कुछ-कुछ—और दूसरा था कि आप लाइफ मेंबर बन जाओ।
पर क्या हुआ? उस समय ज़्यादा लोग पहले स्तर पर नहीं आये। बहुत से लोग लाइफ मेंबर बन गए पर बहुत लोग पहले स्तर पर नहीं आये। और जब प्रभुपाद जी यहां पे थे, उस समय अधिकांश इस्कॉन के मेंबर अमेरिकन्स थे। वास्तव में कई बार प्रभुपाद जी जब अमेरिका के मंदिरों में आते थे और ऑस्ट्रेलिया के मंदिरों में आते थे—मैं अभी ऑस्ट्रेलिया में था तो वहाँ पे एक भक्त मुझे मिले थे, वह बता रहे थे कि जब प्रभुपाद जी ऑस्ट्रेलिया में आये थे तो उन्होंने कहा, ऑस्ट्रेलिया के हर मंदिर में जाते थे कि “मैं आपके मंदिर में आऊँगा यदि आप मुझे पाँच भक्त दोगे मेरे वृन्दावन मंदिर के लिए।” तो भारतवासी मंदिर में सेवा करने के सहभागी नहीं थे, मंदिर में आके सेवा करना है। तो प्रभुपाद जी कहते थे “मैं मंदिर में आऊँगा, आप मुझे पाँच भक्त दो।” इस तरह से पाँच नहीं, कभी ज़्यादा, कभी कम जो भी है, पर प्रभुपाद जी पाश्चात्य देशों से भक्तों को लाके भारत के मंदिर चला रहे थे।
एक 1972 के लेक्चर में प्रभुपाद जी कहते हैं—थोड़ा उससे पहले हो सकता है, 73-74 में भी हो सकता है—पर प्रभुपाद जी कहते हैं कि “यह जो आंदोलन है, भारत से है, पर इसमें मैं अकेला भारतीय हूँ। मैं अकेला भारतीय हूँ।” यह ऐसी परिस्थिति थी जब प्रभुपाद जी भारत में थे। जब प्रभुपाद जी ने इसे स्थापित किया, अभी परिस्थिति ऐसी थी। अभी हम देखते हैं कि कृष्ण भावनामृत आंदोलन जो है, उसमें सबसे अधिक जो भक्त हैं, वो भारत से ही हैं। और उसके बाद में द्वितीय अधिक भक्त हैं, वो रशिया से हैं। अभी हम रशिया एक चीज़ कहते हैं पर रशिया में यूक्रेन वगैरह भी है, तो वहाँ से भी काफी भक्त हैं। और जो अमेरिका से भक्त हैं, वहाँ काफी कम हो गए हैं। उसके कई ऐतिहासिक कारण हैं।
राधानाथ महाराज का योगदान और कम्युनिटी बिल्डिंग
पर ये पृष्ठभूमि मैं इसलिए दे रहा हूँ कि हम समझें कि परम पूज्य राधानाथ महाराज जो हैं, वो किस तरह से प्रभुपाद जी की सेवा कर रहे हैं, किस तरह से उन्होंने सेवा की है, किस तरह से वो सेवा कर रहे हैं। तो जब प्रभुपाद जी 1977 में इस विश्व को छोड़ चले गए और फिर महाराज 1980 से यहाँ आने लग गए। और फिर 1987, 1988, 1989 से वो काफी समय तक यहां पर रहने लग गए। 1987 से लगभग वो रहने लग गए यहां पर।
तभी मैं कुछ समय पहले महाराज को शिकागो में मिला था। शिकागो में महाराज रहते हैं काफी समय तक, जब वो ट्रैवल (travel) करके, प्रचार करके थक जाते हैं, थोड़ा वहाँ पर विश्राम करते हैं। महाराज पहले भारत में आये थे, आप में से बहुत से भक्तों ने ‘द जर्नी होम’ (The Journey Home) पढ़ा होगा, आपको पता है कैसे महाराज भगवान की खोज में आये थे। पर जब महाराज यहाँ प्रचारक के रूप में आये थे, उसके पहले वो अमेरिका में पुजारी थे और उसके बाद में वो यूथ प्रीचिंग (youth preaching) कर रहे थे, विद्यापीठों में जाके वहाँ पर प्रचार करते थे। तो उनका एक वैन (van) था, अभी भी वो वैन है, वो एक भक्त के घर में है टेक्सास (Texas) में, डलास (Dallas) में। उसी वैन में महाराज रहा करते थे, वो उसी में ड्राइव करते थे, उसी में कुकिंग करते थे, उसी में रहते थे कई सालों तक। वह वैन ही उनका घर था, उसमें ही रहा करते थे महाराज। वो इसलिए क्योंकि वो प्रीचिंग कर रहे थे।
और जब वो भारत में आए, तो फिर क्या हुआ? महाराज ने धीरे-धीरे यहां पे न केवल प्रचार किया पर कम्युनिटी बिल्डिंग (community building) किया है। तो अभी हम देखते हैं कि भारत में जो प्रचार हुआ है, भारत लीडिंग (leading) है कृष्ण भक्तों के रूप में, इस्कॉन के भक्तों के रूप में। यह हम देखते हैं कि मुख्य रूप से अलग-अलग जगहों पर, बंगाल में जयपताका महाराज हैं, दिल्ली में गोपाल कृष्ण महाराज हैं, और मुंबई और महाराष्ट्र में राधानाथ महाराज हैं। इसके अलावा कई और सन्यासी हैं, पर इन तीन गुरुओं ने काफी प्रचार करके बहुत से लोगों को कृष्ण भावनामृत से दीक्षित किया है।
तो अभी जब महाराज मुंबई में आये, तो मैं बता रहा था कि दो स्तर कृष्ण भक्ति के थे—एक है कि मंदिर में आके आप ब्रह्मचारी बन जाओ, और दूसरा है कि आप लाइफ मेंबर बनो। अभी लाइफ मेंबर जो थे, प्रभुपाद जी की इच्छा थी कि वो लाइफ मेंबर धीरे-धीरे मंदिर में आयें, रहें कुछ समय, सुबह का कार्यक्रम देखें, उससे धीरे-धीरे वो गंभीर बन जाएँ। पर बहुत कम लाइफ मेंबर हैं जो वहाँ से आगे बढ़े। और जब कृष्ण भावना का भी प्रचार हो रहा है, तो अधिकांश कृष्ण भावना के जो सदस्य हैं वो लाइफ मेंबर नहीं हैं, और वो मंदिर में रहने वाले ब्रह्मचारी भी नहीं हैं। हाँ, काफी ब्रह्मचारी हैं, एक्चुअल में (actually) मैं जब पहली बार अमेरिका गया था तो मैं एक भक्त को बता रहा था कि मैं मुंबई से आता हूँ, उसके पहले मैं पुणे में था, तो लगभग इन दोनों मंदिरों में डेढ़ सौ ब्रह्मचारी हैं। तो वो भक्त हँसने लग गया, बोला कि “पूरे अमेरिका में डेढ़ सौ ब्रह्मचारी नहीं हैं! पूरे अमेरिका और यूरोप में मिला के डेढ़ सौ ब्रह्मचारी नहीं हैं।” तो अधिकांश जो अभी मंदिर में रहने वाले भक्त हैं, वो बहुत कम हो गए हैं। तो लाइफ मेंबर्स नहीं हैं, मंदिर में रहने वाले भक्त नहीं हैं, तो अधिकांश जो भक्त हैं हमारे वो इन दोनों के बीच में हैं, वो क्या हैं? कांग्रेगेशन डिवोटीज़ (Congregation devotees)।
तो यह काफी समर्पित भक्त हैं। तो जो इस तरह से भक्त हैं, जो मंदिर में भी नहीं हैं पर लाइफ मेंबर्स भी नहीं हैं, तो उनका पोषण कैसे करना है? उनको भक्ति में बढ़ने के लिए कैसे सुविधा देनी है? इसका जो पायनियरिंग (pioneering) है, इसमें जो प्रधान योगदान है, प्रधान प्रयास जो है, वो राधानाथ महाराज ने किया है। वो क्या है कि किस तरह से भक्त, चैतन्य महाप्रभु बताते हैं: “स्थाने स्थिताः श्रुतिगतां तनुवाङ्मनोभिः”, तुम जहां पे रहते हो वहीं पे रहो, पर वहां से रह के आप भक्ति करो। उसकी सुविधा महाराज ने निर्मित की।
और ये किस तरह से निर्मित की? कई जो चीज़ें हैं जो अभी बिल्कुल स्वाभाविक हैं, हम देखते हैं कि हर मंदिर में आ गया है, तो हम अपेक्षा करते हैं। पर ये अगर हमारे पास एक टाइम मशीन होता और हम अगर 40 साल पहले इस्कॉन में आते 1980 में, 1985 में, तो ये कोई भी चीजें नहीं थीं। तब क्या नहीं था? अभी कांग्रेगेशन प्रोग्राम्स (congregation programs) जो होते हैं, मतलब क्या है, मंदिर से प्रचारक जाते हैं, हर हफ़्ते जाते हैं और कुछ भक्तों के घर में कार्यक्रम करते हैं। तो ऐसे कार्यक्रम इस्कॉन में थे ही नहीं! क्योंकि उस समय अधिकांश लोगों की परिभाषा थी कि प्रचार करना है, मतलब क्या है, प्रचार का यश है कि आप मंदिर में आके, मंदिर में भक्त बन जाओ। और जो लाइफ मेंबर थे, वो इतने गंभीर तो नहीं थे कि वो हर हफ्ते उनके घर में कार्यक्रम करें, शायद साल में एक बार उनके घर में जाते, उनके कुछ जन्मदिन हो या कुछ त्योहार हो, उनके घर में उत्सव हो, तो फिर जाया करते थे।
तो ये पूरा जो भक्त जहां भी रह रहे हैं, उनको कैसे नरिश (nourish) करना है, उनको कैसे पोषण करना है, उनको कैसे मदद करना है बढ़ने के लिए, यहाँ महाराज ने इसके लिए कई सुविधाएं निर्मित कीं। सबसे पहले है काउंसलर सिस्टम (Counselor system) जो है, कि भक्तों को जो मार्ग दर्शन देने के लिए वरिष्ठ भक्त चाहिए। तो ये वरिष्ठ भक्तों को जो प्रेरणा देनी थी, जो प्रशिक्षण और प्रेरणा देनी थी… महाराज मुझे बता रहे थे कई बार, कई भक्तों की ऐसी इच्छा है कि महाराज ने ये किताब लिखा है, ‘द जर्नी होम’, जो कैसे वो भक्ति के मार्ग में आये, कैसे उन्होंने प्रभुपाद जी को अपने गुरु स्वीकार किया, भक्ति का मार्ग अनुशीलन किया। उसके बाद में ‘द जर्नी विदिन’ (The Journey Within) किताब लिखा है, पर जर्नी विदिन जो है, वो भक्ति के तत्वज्ञान के बारे में है।
तो महाराज के उसके बाद में, जैसे उन्होंने कृष्ण भावना में, इस्कॉन में प्रवेश किया, किस तरह से सेवा की है, क्या-क्या किया है, और कैसे राधा गोपीनाथ का जो मंदिर है, यह प्रोजेक्ट है, उसके बाद में वहाँ से प्रचार हुआ है, इसका इतिहास कोई लिखे। तो इसका इतिहास कैसे लिखा जाए? इसके बारे में अगर लिखना है, तो इसके बारे में महाराज से मैं चर्चा कर रहा था। तो फिर कुछ भी नहीं था यहाँ, तो यह क्यों करना चाहिए? क्योंकि ऐसे करने की कोई ज़रूरत ही किसी को नहीं लगती थी। जो आएगा भक्ति करेगा। पर व्यावहारिक जीवन में जो समस्याएँ आती हैं, कि वास्तव में कि भक्तों के समाज में एक तरह से मैत्री हो, एक आंदोलन का विस्तार किया जाए… इसका वर्णन लीलामृत में आता है, कई अलग प्रभुपाद जी के ग्रंथों में आता है।
पर अगर हम उसको किस तरह से वास्तव में उन्होंने किया, ये देखना है, तो क्या है? हम कह सकते हैं तीन चीज़ें हैं: लव (Love), ट्रस्ट (Trust), एम्पावरमेंट (Empowerment)। कि भक्तों के प्रति स्नेह करना, फिर उन पर विश्वास करना कि आप ये सेवा कर सकते हैं, और उसके बाद में वो सेवा करने के लिए सुविधा देना—तो एम्पावरमेंट। तो वही महाराज ने किया। महाराज बहुत वरिष्ठ भक्तों से मिलते थे, उनको बहुत स्नेह से आदान-प्रदान हुआ करता था। एक वरिष्ठ भक्त बता रहे थे मुझे कि वो पहली बार जब सत्संग कार्यक्रम हुआ करते थे, उसमें ज़्यादा लोग नहीं हुआ करते थे, 20-25 लोग हुआ करते थे। तो उसके बाद में जो भी गृहस्थ थे, महाराज सभी जो प्रभु जी थे उनको आलिंगन करते थे। तो एक कपल (couple) जो था, वो वरिष्ठ काउंसलर हैं राधा गोपीनाथ मंदिर में, वो जब आये, तो वो पहली बार आये थे, उनको ज़्यादा कुछ सन्यासी से कैसे बातचीत करना है, पता नहीं था। तो कहने का मतलब है कि तभी महाराज बहुत करीब से सब से बातचीत करते थे।
तो लव, और फिर ट्रस्ट। हमें भी अगर प्रचार करना है, न केवल प्रचार करना है पर किसी को पोषण देना है, तो क्या है ये तीन चीज़ें—लव, ट्रस्ट, एम्पावरमेंट। कि हम विश्वास करते हैं किसी में कि हाँ, आप ये सेवा कर सकते हैं, आप ये प्रचार कर सकते हैं, आप ये काउंसलिंग कर सकते हैं। और फिर सिर्फ ‘अगर आप कर सकते हैं’ बोलने से पर्याप्त नहीं है, फिर एम्पावरमेंट है। एम्पावरमेंट मतलब वो शक्ति देना है। शक्ति मतलब ये कोई जादू नहीं है कि आपके सर पे हाथ रख दें और फिर आपको कोई जादुई शक्ति आ जाए। एम्पावरमेंट मतलब वरिष्ठ भक्तों का आशीर्वाद महत्वपूर्ण है, वो एक प्रकार का एम्पावरमेंट है, और उसके साथ ट्रेनिंग (training) होता है। तो काउंसलिंग कैसे करना है, मार्ग दर्शन कैसे देना है, तो महाराज खुद अपने उदाहरण से बताते थे। और धीरे-धीरे क्या हुआ, इससे भक्तों को एक समुदाय का अनुभव होने लग गया, और इस तरह से यह बढ़ने लग गया। लव, ट्रस्ट, एम्पावरमेंट।
भक्त वेदान्त हॉस्पिटल और आध्यात्मिक देखभाल
और फिर महाराज ने बहुत से अलग-अलग प्रकल्प किये हैं। जैसे कि भक्तिवेदान्त हॉस्पिटल है। कई चीज़ें थीं इसके लिए कुछ लोग कहते हैं कि “प्रभुपाद जी ने हॉस्पिटल नहीं चालू किया, आपको क्या चालू करने की ज़रूरत है?” तो वास्तव में प्रभुपाद जी कृष्ण भावनामृत चालू करने के बाद 11 साल ही थे हमारे साथ। अगर प्रभुपाद जी 20-25 साल थे और बहुत कुछ करते थे। अभी बहुत से डॉक्टर लोग भक्त बन गए, और फिर पहले तो वो मंदिर में ही रह रहे थे। पहले क्लियर था, उनका “आप डॉक्टर हो कुछ भी हो आप मंदिर में ब्रह्मचारी बन जाओ।” पर बाद में वो सबके लिए प्रैक्टिकल (practical) नहीं था।
तो फिर ये जो डॉक्टर थे, उनमें मिशनरी (missionary) का भाव भी था, उनको सेवा भी करनी थी, पर साथ-साथ उनको अपने जातियों में या चार वर्णों में भेद करना… यही नहीं है, वर्णाश्रम का मूल भाव यह है कि आपको अपने ऑक्यूपेशन (occupation) के लिए, स्पिरिचुअल एस्पिरेशन (spiritual aspiration) के लिए हार्मोनाइज़ (harmonize) करने के लिए, कि हमारा जो भौतिक नौकरी जो है, भौतिक पेशा जो है, जो भी है, उसको कैसे हमारे आध्यात्मिक उद्देश्य के साथ समन्वय में ला सकें, उसके साथ उसका संगम कर सकें। तो डॉक्टर जो हैं, उनको मेडिसिन (medicine) तो करना ही है, पर अगर वो सब दूसरे भक्तों के साथ आध्यात्मिक वातावरण रख सकते हैं और उसमें न केवल प्रोफेशनली अपना काम कर रहे हैं पर आध्यात्मिक भी प्रगति कर रहे हैं।
तो अभी ये हॉस्पिटल एक पूरे विश्व में मिसाल बन गया है, न केवल इस्कॉन के विश्व में पर बाहर के विश्व में भी। स्पिरिचुअल केयर (spiritual care) कैसे हम ले सकते हैं, रख सकते हैं, और उससे न केवल भक्त सेवा कर सकते हैं पर दूसरों का भी कल्याण कर सकते हैं। अभी मैं यहाँ पर हॉस्पिटल के भक्तों के साथ कुछ ग्रंथ लिख रहा हूँ। तो इन्होंने कई ऐसे मेडिकल जर्नल (medical journal) में पेपर छापे हैं, कि जो भक्त स्पिरिचुअल केयर लेते हैं और जो स्पिरिचुअल केयर नहीं लेते हैं। तो कोई बीमार है, स्पिरिचुअल केयर लेना मतलब क्या? कोई भक्त आते हैं, उनसे बातचीत करते हैं, उनको सांत्वना देते हैं, भगवद्गीता बताते हैं, उनको कुछ बताते हैं, जप करने के लिए प्रेरणा देते हैं, और उनको आध्यात्मिक और भावनात्मक स्तर पे कुछ शक्ति देते हैं। कुछ भक्त उसको स्वीकार करते हैं, कुछ लोग—कोई रुग्ण होते हैं—उसको स्वीकार करते हैं, कुछ उसको स्वीकार नहीं करते हैं। उन्होंने तुलना की। कुछ लोग तुरंत और आसानी से और तेज़ी से रिकवर (recover) होते हैं, ठीक हो जाते हैं। तो जो लोग आध्यात्मिक केयर स्वीकार करते हैं, उनके बीमारी से ठीक होने की जो रफ़्तार है वो काफी ज़्यादा होती है।
और शायद ही कोई रुग्ण हॉस्पिटल में आता है, हॉस्पिटल में अगर एडमिट होता है उसके बाद जाता है, तो सिर्फ वो हॉस्पिटल में किसी से मिलने वापस नहीं जाता है, बीमार होने के सिवाय। पर वही जो भक्त हॉस्पिटल में एडमिट होते हैं, उसके बाद जब ठीक होकर जाते हैं, तो वो बार-बार हॉस्पिटल वापस आते हैं सेवा करने के लिए या संकीर्तन में भाग लेने के लिए।
ब्रह्मचारियों का प्रशिक्षण और शिक्षा
अभी मैं बुक डिस्ट्रीब्यूशन कर रहा हूँ पर जब मैं 40-50 का हो जाऊँगा, मेरा शरीर किताब को उठा नहीं पाएगा, तो अब मैं क्या करूँगा? तो क्या हुआ कि बहुत से भक्त जो अलग-अलग प्रकार से सेवा कर रहे थे, जिनमें बहुत सी प्रतिभा थी, उनको लगा कि हम मंदिर में रहेंगे तो हम कुछ सेवा कर ही नहीं पाएँगे। तो इसलिए बहुत से लोग मंदिर में आके जॉइन (join) करते थे पर छोड़ के चले जाते थे। पर महाराज थे पहले, उन्होंने बताया कि जो मंदिर के ब्रह्मचारी हैं, उनको सबसे पहले क्या बनना है? एक साधु बनना है। साधु मतलब आप शास्त्रों को पढ़ो, शास्त्रों को सिखाओ, और शास्त्रों को कैसे जीना है ये सिखाओ, ये अपने जीवन से दर्शाओ।
तो महाराज ने कहा कि जो भी मंदिर में ब्रह्मचारी आएँगे, उनसे हम बिल्कुल फण्ड रेज़िंग (fund raising) की सेवा नहीं करवाएँगे, बिल्कुल नहीं करवाएँगे। पहले था पर क्या है, वो अपेक्षा नहीं रहेगी, और शास्त्रों का अध्ययन करो। और ये एक रेडिकल (radical) प्रस्ताव था उस समय! मंदिर में ब्रह्मचारी आएँ तो क्या है, आप बड़ा मंदिर बनाओ, आप बहुत से बुक्स डिस्ट्रीब्यूट (books distribute) करो। ये बहुत अच्छी चीज़ है, पर क्या है? प्रशिक्षण जो था, वो सबसे पहले प्रशिक्षण दो जिससे कि प्रचार हो सके। ये जो है राधानाथ महाराज ने पायनियर किया है, पुना में और फिर बहुत से बुद्धिमान सुशिक्षित युवा ब्रह्मचारी बनने के लिए उत्सुक हो गए।
अभी जब एक मंदिर है, बड़ा मंदिर है वहाँ पर, उसके बारे में जब हम बता रहे थे कि मंदिर में एक समय कुल भक्त थे ही नहीं, तो हमने क्या किया था? हम बॉम्बे रेलवे स्टेशन पे गए और हमने बताया लोगों को कि “आप यहाँ भूखे रह रहे हो, आप यहाँ ठंडी में सो रहे हो, आप मंदिर में आओ, कुछ सेवा करो, हम आपको रहने के लिए, खाने के लिए, सोने के लिए देंगे।” महाराज ने प्रशिक्षण दिया कि किस तरह से जो ब्रह्मचारी हैं वो प्रचारक बन सकते हैं। और जो महाराज ने चालू किया 1983 से, अभी उसका फल है। यह हम मिथ्या अहंकार के भाव से नहीं कह रहे हैं, अच्छा कह सकते हैं कि यह भी इस्कॉन के सेकंड जनरेशन (second generation) के प्रचारक हैं, उनमें से राधानाथ महाराज के शिष्य प्रधान हैं। इसलिए ऐसे नहीं है कि बाकी संन्यासी हैं, गुरु हैं, उनके शिष्य प्रचार नहीं कर रहे हैं, वो भी कर रहे हैं और बहुत प्रचार कर रहे हैं। पर एक तरह से राधानाथ महाराज ने ये चालू किया है।
और फिर उसका जो यश देखा कि ‘अच्छा, इस तरह से हम सुशिक्षित लोगों को ला सकते हैं, वो प्रचार… वो उनको अगर शास्त्रों का अध्ययन करने का मौका मिलता है, शास्त्रों को सिखाने का मौका मिलता है, तो फिर वो आएँगे और फिर वो प्रचार करेंगे।’ यह मुंबई में हुआ, फिर पुणे में हुआ, और फिर उसके बाद में अनेक दूसरे मंदिरों ने इसको अपनाया है। यह जो है कि प्रभुपाद जी कहा करते थे कि हमें ब्राह्मण जाति नहीं चाहिए, पर जो ब्राह्मण शास्त्रों में निपुण हैं और शास्त्रों का ज्ञान जो दे सकते हैं, उनके लिए किस तरह से हम सुविधा दे सकते हैं। तो यह जो है एक बहुत बड़ा योगदान है महाराज का।
तो पहला था बिल्डिंग कम्युनिटी (building community)। सेकंड करने के लिए एक बड़ा योगदान है अ टीचिंग एंड लर्निंग कम्युनिटी (a teaching and learning community) बनाना। यह न केवल ब्रह्मचारियों के लिए है, तो यह ब्रह्मचारी जो हैं वो सीखते हैं, पढ़ते हैं। सभी लोग पढ़ सकते हैं, पर ब्रह्मचारियों के पास एक तरह से समय ज़्यादा होता है, गृहस्थों की बहुत सी अगर जिम्मेदारियां होती हैं, तो ब्रह्मचारी पढ़ सकते हैं और फिर वो सिखा सकते हैं। तो यह दूसरा बड़ा योगदान है।
और तीसरा जो है कि अभी महाराज मुंबई में क्लास देते हैं, तो एक भी क्लास देखें तो लगभग 2000-3000 लोग होते हैं, कभी-कभी उस से ज़्यादा लोग होते हैं। तो अभी महाराज ने पूरा जीवन 87 से अभी 40 साल जो हैं, तीस साल उन्होंने यहां पे बड़ा अच्छा प्रकल्प बनाया है। पर अभी कैसे है कि महाराज यहां पे रह के जो उन्होंने प्रोजेक्ट बनाये उसका केवल आनंद लेना नहीं चाह रहे हैं। पर अभी महाराज की जो इच्छा है कि पाश्चात्य देशों में पुनः प्रचार हो सके, तो उसके बारे में मैं थोड़ा कुछ बोलके फिर हम प्रश्न उत्तर लेंगे।
पाश्चात्य देशों में प्रचार और ‘द जर्नी होम’
पिछले कई सालों से मैं भी पाश्चात्य देशों में जाता हूँ, लगभग साल के बारह महीनों में लगभग नौ महीने मैं भारत से बाहर रहता हूँ। उसमें से छह महीने लगभग अमेरिका में होता हूँ। और पाश्चात्य देशों में भी कई भारतीय लोग भक्त बन रहे हैं। पर उसके साथ-साथ जो भक्त हैं, वो पाश्चात्य लोगों को भी प्रचार करने का प्रयास कर रहे हैं। तो वो नहीं हो रहा है। उसके अनेक कारण हैं।
पर एक भक्त हैं, वेस्टर्न अमेरिकन भक्त, वो कुछ समय पहले एक एस्से (essay) लिखा था कि “अगर इस्कॉन में ऐसा ही चलता रहेगा, तो 2050 जब आ जाएगा, तो तब शायद हम इस्कॉन के आखिरी पाश्चात्य भक्त की पुष्पांजली या श्रद्धांजलि लिखने का मौका मिलेगा।”
तो अभी महाराज, जब भारत में उनको बहुत यशस्वी प्रचार हो रहा है और लोग आ रहे हैं, पर तभी कैसे है कि महाराज ने देखा कि पाश्चात्य देशों में प्रचार इतना नहीं हो रहा है। और फिर अलग-अलग परिस्थितियां हुईं, उससे एक मार्ग मिल गया महाराज को। अभी पाश्चात्य देशों में कैसे है कि लोग नास्तिक नहीं हैं, अध्यात्म में थोड़ा बहुत रुचि है, पर वो आध्यात्मिक संस्थाओं से बहुत उनको संशय लगता है। “हम आध्यात्मिक हैं पर हम धर्म को नहीं मानते हैं। स्पिरिचुअल बट नॉट रिलिजियस (spiritual but not religious)।” और कई बार क्या होता है, हम कहते हैं कि हम आध्यात्मिक संस्था हैं पर लोगों को हम बहुत धार्मिक लगते हैं। हम एक प्रकार का पोशाक पहनते हैं, हम जप माला लेके घुमते हैं, हम तिलक लगाते हैं। यह सब देख कर उन्हें लगता है, “मैं तो आध्यात्मिक हूँ और मुझे धर्म से कुछ लेना-देना नहीं रखना है।”
तो अध्यात्मिक जो है, किसको वो आध्यात्मिक मानते हैं? आध्यात्मिक मतलब जिस व्यक्ति को खुद आध्यात्मिक साक्षात्कार है, जो इस जगत के परे कुछ और अनुभव किया है उसने, और उस अनुभव को वो खुद और अनुभव कर रहा है, और वो अनुभव दूसरों को दे रहा है। अध्यात्म और रिलिजन (Religion) में क्या फ़र्क है, यह बड़ा एक विषय है पर यहां पर सारांश में बता रहा हूँ क्या हुआ। चूँकि पाश्चात्य देशों के लोग खुद को स्पिरिचुअल मानते हैं, तो तभी महाराज ने ‘द जर्नी होम’ लिखा। और जर्नी होम किताब जो है वो महाराज के लिए एक अस्त्र बन गया, एक औज़ार, एक टूल (tool) बन गया। जिससे कि वो जो लोग कृष्ण भावनामृत आंदोलन में, इस्कॉन के लिए कभी मुड़के भी नहीं देखते थे, वो भी उसकी ओर आकर्षित हुए।
खास करके पाश्चात्य देशों में। क्योंकि क्या है कि महाराज ने किताब लिखा है ‘द जर्नी होम’, उसमें उन्होंने क्या किया है? खुद के अनुभव बताए हैं। किस तरह से वो खुद खोज में गए और किस तरह से वो अपनी खोज में, उनको क्या यश मिला, क्या उसका अंत हुआ। तो इस तरह का खुद के अनुभव का ग्रंथ होता है। और खास करके जब मैं महाराज का ‘द जर्नी होम’ बुक एडिट (edit) कर रहा था, फिर बाद में ‘द जर्नी विदिन’ भी एडिट करने की सेवा मिली थी मुझे, तो महाराज ने बताया मुझे कि उनके कई गुरुभाई हैं जिनको प्रभुपाद जी का काफी संग मिला था, और उन्होंने प्रभुपाद जी के बारे में कई किताबें लिखी हुई हैं। और वो बहुत सुन्दर किताबें हैं जिनसे बहुत प्रेरणा मिलती है।
पर साथ-साथ में क्या है कि ये जो किताबें हैं, अधिकांश किताबें जो प्रभुपाद जी के बारे में लिखी हैं, वो उन लोगों के लिए सूटेबल (suitable) हैं, उन लोगों के लिए उपयुक्त हैं जिनको पहले से प्रभुपाद में श्रद्धा है। अभी जो प्रभुपाद जी को एक गुरु के रूप में नहीं मानते हैं, उनके लिए बहुत कम किताबें हैं, दो तीन किताबें हैं। पर जो अधिकांश किताबें हैं वो भक्तों ने भक्तों के लिए लिखी हैं। और उसमें कैसे है कि प्रभुपाद जी का गुणगान है। और जो प्रभुपाद जी के गुणगान के लिए ही लिखा है, वो इस तरह से लिखा था कि जो लोग प्रभुपाद जी को स्वीकार नहीं करते हैं, वे भी प्रभुपाद जी की महानता को समझें।
इसे कहते हैं एक्सक्लूसिविस्ट (Exclusivist) और इंक्लूसिविस्ट (Inclusivist)। एक्सक्लूसिविस्ट मतलब जो बहुत सी किताबें हैं: “प्रभुपाद जी सब कुछ हैं, और प्रभुपाद जी इतने महान थे।” तो लोग कहते हैं “ठीक है, तुम… ये तुम्हारे गुरु हैं, तुम मानते हो उसको, महान हैं, मैं मानता हूँ उसको। मुझे क्या लेना इससे?” पर महाराज ने कैसे किया? अपनी खोज बताई है और उसमें कैसे अलग-अलग आध्यात्मिक नेताओं से वो मिले और उन सब से उनको कुछ सीखने को मिला।
अभी महाराज कभी ऐसे नहीं कहते हैं कि वो सब गलत थे। पर महाराज कहते हैं कि मेरे जीवन की कथा से ही, मैं उन सब गुरुओं से मिला, पर मैंने प्रभुपाद जी को समर्पित किया। मतलब क्या है कि उनके अनुभव में प्रभुपाद जी सबसे श्रेष्ठ हैं। तो यह क्या है, थोड़ा यह सूक्ष्म है लेकिन बहुत मज़बूत और दूरगामी है (It’s a subtle but much stronger and much more far reaching)। बहुत ज़्यादा लोगों के पास जाता है। लाखों-लाखों की मात्रा में लोगों ने इस किताब को पढ़ा है। और अलग-अलग स्तर पे उनको आध्यात्मिक प्रेरणा मिली है। कुछ महाराज से इतने प्रेरित हो गए हैं कि वो भक्त बन गए हैं, शिष्य बन गए हैं, भक्ति कर रहे हैं। कुछ यहाँ पर भौतिकवाद से कम से कम आध्यात्मिकता की ओर प्रवृत्त तो हो गए हैं। वो आध्यात्मिक खोज में तो निकले हुए बहुत से लोगों को उन्होंने प्रेरित किया है।
इस तरह से क्या है, जो लोग ‘स्पिरिचुअल बट नॉट रिलिजियस’ हैं, जो किसी धार्मिक संस्था से कुछ लेन-देन नहीं चाहते हैं, उन तक कैसे पहुँचें? इसके लिए जो ‘द जर्नी होम’ किताब है वह बहुत ही दक्ष अस्त्र है, बहुत ही उचित है। क्यों क्या है कि इसमें किसी एक धार्मिक संस्था के बारे में नहीं बताया जा रहा है, उसके धार्मिक संस्था की शिक्षा के बारे में नहीं बताया जा रहा है, एक मानवीय अनुभव है, उसके आधार पर लोगों को सिखाया जा रहा है, लोगों को आध्यात्मिक शिक्षा दी जा रही है। एक पाश्चात्य प्रचार के लिए एक बहुत बड़ा दरवाज़ा खुल गया है महाराज पे।
और फिर महाराज अभी कहते हैं, महाराज मुझे बता रहे थे कि “मैं अगर भारत में एक प्रोग्राम करता हूँ, तो एक प्रोग्राम के लिए 10,000 लोग आएँगे। मैं लन्दन में एक प्रोग्राम करूँगा, तो एक प्रोग्राम के लिए 1,000 लोग आएँगे या 2,000 लोग आएँगे। मैं न्यूयॉर्क में प्रोग्राम करूँगा, तो वहाँ पे 200 लोग आएँगे।” अभी ये 3-4 साल पहले की बात है, 3 साल पहले की बात है ये, अभी और बढ़ सकते हैं सब जगह पर। पर महाराज बोल रहे थे कि “पर प्रभुपाद जी मेरे हृदय में मुझे बता रहे हैं कि तुम न्यूयॉर्क में प्रचार करो।” प्रभुपाद जी के कई खत हैं, प्रभुपाद जी बोलते हैं कि न्यूयॉर्क में प्रचार बढ़ सकता है। क्यों बता रहे थे वो? कि न्यूयॉर्क में बढ़ सकता है, पर वहां पर प्रचार होगा तो सारे विश्व भर में प्रचार वहां से हो सकता है। सारे अमेरिका में और सारे विश्व में प्रचार हो सकता है।
तो मतलब महाराज को अगर सिर्फ बहुत से ‘कितने लोग मेरे प्रवचन के लिए आते हैं’ देखना है, तो हज़ारों की संख्या में भारत में आ जाएँगे। पर ये उनका… महाराज ने बताया था कि भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर कहते हैं कि जहां पे सबसे ज़्यादा ज़रूरत है, वहां पे अगर आप प्रचार करोगे, वहां पे अगर आप सेवा करते हो, तो आपको उससे बहुत कृपा मिलती है। तो वो उदाहरण लेते हैं कि कैसे अगर किसी को पानी चाहिए, आप पानी लेके आते हैं, तो हम कृतज्ञ होंगे उससे। पर मान लीजिए कोई योद्धा है, वो रणभूमि में युद्ध कर रहा है, और वो अपने पॉइंट (point) पे बैठ के युद्ध कर रहा है, पर उसको बहुत प्यास लगी है। वो छोड़ के वहाँ से जा नहीं सकता है। पर वहाँ पे कोई उसको पानी लाकर देता है, तो वो भूखा है, प्यासा है, युद्ध कर रहा है वहाँ पे, कोई पानी देता है, तो वह बहुत बड़ी सेवा है।
तो कहते हैं पूरे अमेरिका में कई केंद्र हैं हमारे और बहुत से भक्त हैं। पर अधिकांश भारतीय हैं। तो केवल तीन-चार जगहों पे अमेरिका में पाश्चात्य लोगों के लिए एक सिस्टमैटिक प्रीचिंग (systematic preaching) हो रहा है और उसमें महाराज का योगदान प्रधान है। तो ये एक तरह से महाराज का निस्वार्थ सेवा भाव है।
गोवर्धन इको विलेज और आध्यात्मिक अनुभव
और वही पाश्चात्य लोगों के लिए जो प्रचार है, उसको कैसे भारत से जोड़ा जाए, तो उसके लिए उन्होंने गोवर्धन इको विलेज (Govardhan Eco Village) बनाया है। गोवर्धन इको विलेज क्या है? ये बड़ा विषय है, पर संक्षेप में बोलके मैं इसको विराम दूँगा।
कैसे है कि अभी महाराज स्वयं वृंदावन आये और जब वे वृंदावन आये तो उनको वृंदावन बहुत आकर्षक लगा और वृंदावन में उनकी अध्यात्मिक खोज इस तरह से अंत हुई। पर क्या है, महाराज की दृष्टि बहुत दिव्य और आध्यात्मिक थी। बहुत से लोग जब वृंदावन में आते हैं पाश्चात्य देश से, तो उनको वो काफी बुरा अनुभव होता है। अभी पीछे 2-3 सालों से कुछ अमेरिकन्स, उनको हम भारत लेके आते हैं, भारत, वृंदावन का टूर (tour) वगैरह कराते हैं। तो कैसे है कि जब वो भारत में आते हैं तो उनको पहले बहुत सी चेतावनियां दी जाती हैं कि “तुम ये मत करो भारत में, ये मत करो, कैसी-कैसी स्थितियां हैं तो अकेले आप कहीं मत जाओ”, और बहुत कुछ बोलना पड़ता है।
और जब वृंदावन में आते हैं, तो हाँ वृंदावन में दिव्यता है, पर बहुत सा कमर्शियलाइज़ेशन (commercialization) भी है। और बहुत सी ऐसी चीज़ें हैं वहाँ पर, एक दृश्य से डिसॉर्डरलीनेस (disorderliness) है, अनक्लीनलीनेस (uncleanliness) है, अनियोजकता है, अस्वच्छता है। तो उसके परे देखना आसान नहीं है। संभव है पर आसान नहीं है। तो जो गोवर्धन इको विलेज है…
महाराज कई सालों तक वहाँ न्यू वृंदावन पे थे पर वहाँ पे नहीं बढ़ा। तो जो प्रभुपाद जी की इच्छा थी कि न्यू वृन्दावन में जो हो, एक ऐसी जगह जहाँ पे पाश्चात्य देश के लोग कुछ तो कम्फर्टेबल (comfortable) लगें उनको और फिर वहाँ पे वो भक्ति की अध्यात्मिक तरह, भक्ति का अनुभव कर सकें। तो वो जो न्यू वृन्दावन में नहीं हो सका, वो महाराज ने गोवर्धन इको विलेज में किया है। और वहाँ पे पाश्चात्य… अब गोवर्धन इको विलेज बहुत कुछ कर रहा है। वहाँ पे इको-फ्रेंडली लिविंग (eco-friendly living) है, वहाँ पे रूरल डेवलपमेंट (rural development) है, आजू-बाजू के लोगों को, ग्रामवासियों को भी मदद हो रही है, बहुत कुछ हो रहा है वहाँ पे। पर मैं केवल यहाँ पे पाश्चात्य प्रचार के बारे में जो विजन (vision) है, जो दृष्टिकोण है उसके बारे में बता रहा हूँ।
तो यह जो है, एक कॉम्बिनेशन (combination) है कि भक्ति सेंटर (Bhakti Center) में, वहाँ से लोगों को प्रचार हो रहा है जो कि न्यूयॉर्क में है। और वहाँ से जो लोग प्रेरित होते हैं, तो पहले गोवर्धन इको विलेज आते हैं वहाँ पे, और प्रेरणा लेते हैं। और फिर उसके बाद में जब वह भारत की बाकी संस्कृति का, अध्यात्म का अनुभव करते हैं, तो उनको पहले ही सकारात्मक अनुभव आ चुका है। और उसके बाद में वह वृन्दावन जाएँगे, मायापुर जाएँगे, ऋषिकेश जाएँगे, तो क्या है, उनको नकारात्मक अनुभव इतने नहीं आते क्योंकि पहले ही सकारात्मक अनुभव आ गया है।
तो दो बार हम अमेरिकन लोगों को लेके आ गए। वृन्दावन लेके गए, ऋषिकेश लेके गए, फिर गोवर्धन इको विलेज लेके आए। ये सब को गोवर्धन इको विलेज इतना अच्छा लगा है! तो अभी कई प्रिंसटन और बड़ी-बड़ी यूनिवर्सिटीज़ (universities) हैं अमेरिका में, वहाँ से भी विद्यार्थी आ रहे हैं कि “एक इंडिया का फील्ड ट्रिप (field trip) हमको चाहिए।” वो धार्मिक अध्ययन कर रहे हैं, रिलिजियस स्टडीज़ (religious studies) में, तो वहाँ पर लेके आके कर रहे हैं, अनुभव कर रहे हैं। तो अभी वहाँ पर बहुत कुछ हो रहा है। पर यह कहने का भाव यह है कि जहां पे कृष्ण भावना पहले पहुँच नहीं रही थी और हमारी साधारण पद्धतियों से जहां पे पहुँच नहीं सकती थी, वहाँ पर महाराज इसको ले जा रहे हैं। और यह उनका अथक प्रयास है कि लोग कृष्ण न केवल सिर्फ वो मंदिर में आयें या भक्त बन जायें, दीक्षित हो जायें, पर वहाँ पहुँचें।
बहुत से भक्तों को आजकल महाराज का संग नहीं मिलता है। पर जो गुरु का संग होता है वो अलग-अलग पद्धति से हमें मिल सकता है। वास्तव में हमें अगर हमारे गुरुदेव हैं, उनके मिशन (mission) को हम अच्छे समझ सकते हैं और उसमें हम सहभागी होने का प्रयास करते हैं, तो उससे वास्तव में हमें उनसे जो समीपता महसूस होती है—रियल इंटिमेसी कम्स नॉट बाय फिजिकल प्रोक्सिमिटी, बट बाय सिमिलैरिटी ऑफ़ पर्पस (Real intimacy comes not by physical proximity, but by similarity of purpose)। कि वास्तविक जो हम समीपता महसूस करते हैं वो केवल शारीरिक समीपता से नहीं है कि हम महाराज को देखें, महाराज का लेक्चर सुनें, महाराज से बातचीत कर सकें, पर जो भाव है, उनका सेवा का भाव है, जो उद्देश्य है, उसको अगर हम स्वीकार करते हैं तो फिर हम वो समीपता महसूस कर सकते हैं।
तो प्रभुपाद जी को ज़्यादा संग नहीं मिला था व्यावहारिक, शारीरिक स्तर पे। पर उन्होंने उनका उद्देश्य जो है वो स्वीकार किया है। तो जिस भी परिस्थिति में हैं, तो ये तीन चीज़ें हैं—लव, ट्रस्ट, एम्पावरमेंट। ये किस तरह से आप वहां पे एक दूसरे के बीच में अमल कर सकते हैं और हम सब कृष्ण भावनामृत खुद अंदर बढ़ा सकते हैं और बाहर भी बढ़ा सकते हैं।
पर सारांश में, मैंने आज चर्चा की किस तरह से कृष्ण भावनामृत आंदोलन का इतिहास और राधानाथ महाराज का योगदान, इसके बारे में आज मैंने चर्चा की। मैंने पहले बताया कि कैसे प्रभुपाद जी ने आंदोलन चालू किया तो दो प्रकार के प्रचार हो रहे थे। एक हैं जो मंदिर में आके भक्त बन रहे थे, दूसरे जो थे लाइफ मेंबर बन रहे थे। और भारतीय लोग जो थे लाइफ मेंबर बन रहे थे, पाश्चात्य लोग जो थे वो फुल टाइम आ रहे थे। पर अभी जो समय है इस्कॉन में, तो यह दोनों में ज़्यादा कोई नहीं हैं। ज़्यादा लाइफ मेंबर नहीं हैं, ज़्यादा फुल टाइम डिवोटीज़ (full time devotees) नहीं हैं। जो बीच में हैं, कांग्रेगेशन डिवोटीज़ (congregation devotees), तो वो ही प्रधान हैं। तो अभी उनको कैसे पोषण करना है, इसके लिए जो ज़रूरी है करना, उसमें एक प्रधान योगदान महाराज का है। काउंसलर सिस्टम है, या अलग-अलग कांग्रेगेशन प्रोग्राम्स हैं, भक्तिवेदान्त हॉस्पिटल है, अलग-अलग योजना है। ‘स्थाने स्थिताः’ जहां पे हो, वहाँ पर आपको भक्ति करने के लिए क्या-क्या सुविधाएँ दी जाएँ, उसके बारे में महाराज ने बहुत कुछ किया है।
और फिर दूसरा था कैसे अ कल्चर ऑफ़ लर्निंग एंड टीचिंग (a culture of learning and teaching) कैसे जो मंदिर में आ रहे हैं, जो ब्रह्मचारी बनने के लिए और दूसरे भी जो भी चाहते हैं वो। पर कैसे है कि केवल फण्ड रेज़िंग पर ज़ोर न रखें, पर हम कैसे वी क्रिएट अ कल्चर ऑफ़ प्रीचर्स (we create a culture of preachers), एक प्रचारकों को ट्रेनिंग देके उनको प्रचारकों को प्रचार करने की सुविधा दें।
और तीसरा था कैसे पाश्चात्य प्रचार। खास कर कि पाश्चात्य देशों में हमारी संख्या बहुत कम हो गई पाश्चात्य भक्तों की, तो उन तक कैसे पहुँचें? वो एक संस्था से जुड़ना नहीं चाहते हैं, वो आध्यात्मिक अनुभव चाहते हैं। तो ‘द जर्नी होम’ जो किताब है, महाराज के अनुभव का है, उससे वो आकर्षित हुए। फिर उसके बाद में जब आगे आ रहे हैं, तो उनको कैसी सुविधाएं दी जाएँ, तो भक्ति सेंटर है, और फिर गोवर्धन इको विलेज है। तो यह निस्वार्थ सेवा भाव है। भारत में हज़ारों लोग एक प्रवचन के लिए आएँगे, पाश्चात्य देशों में शायद 100-200 आएँगे, कभी 20-50 भी आएँगे, पर वहाँ पर जा रहे हैं, क्योंकि प्रभुपाद जी के लिए न्यूयॉर्क महत्वपूर्ण था। तो यह एक उद्देश्य की समानता से है। तो अगर हम भी हमारे गुरुदेव का भाव समझ के उनके मिशन का प्रयास करेंगे, तो हम भी उनके प्रति करीबी महसूस कर सकते हैं।
हरे कृष्णा, धन्यवाद है। किसी के कोई सवाल हैं?
प्रश्न और उत्तर
भक्त: धन्यवाद प्रभुजी, बहुत सुन्दर आपने इस्कॉन के इतिहास और महाराज का उसमें योगदान के बारे में आपने चर्चा की। मेरे कुछ प्रश्न हैं। पहला प्रश्न यह था कि प्रभुपाद ने अपने जीवन काल में इतना धुआँधार उन्होंने प्रचार करके, कृष्ण भावनामृत को एक अंतर्राष्ट्रीय संस्था के रूप में, आध्यात्मिक संस्था के रूप में उन्होंने स्थापित किया, और वो स्वयं एक जगत गुरु के रूप में भी स्थापित हुए। मगर क्या कारण है कि उनकी पूरे संसार में उनकी जो स्थिति है, उनकी जो मान्यता पोप या दलाई लामा की तरह अभी तक प्राप्त नहीं हो पाई है? प्रभुपाद जी ने इतना प्रचार किया है, पर फिर भी दलाई लामा जैसे यूनिवर्सल लीडर (universal leader) हैं, प्रभुपाद जी को क्यों मान्यता नहीं मिली है?
वक्ता: कई कारण हैं, तीन कारण प्रधान हैं।
हमारा भी एक तरह से दोष है, पहली चीज़ है। इस्कॉन की ‘एक्सक्लूसिविस्ट इलीटिस्ट मेंटालिटी’ (exclusivist elitist mentality)। दूसरी चीज़ ये है कि जो भारत का इतिहास किताबों में सिखाया जाता है, वह जो है, मोस्टली इंडिपेंडेंस (independence) तक बताया जाता है और उसके बाद में बहुत स्केची (sketchy) है, ज़्यादा स्पष्ट नहीं है, ज़्यादा उसका विस्तार नहीं है। तो जो कई आध्यात्मिक लीडर जो हैं भारत के, स्वतंत्रता के पहले उनके नाम आते हैं किताबों में, उसके बाद में उनके नाम ज़्यादा आते नहीं हैं। वो एक समस्या है, इसलिए ज़्यादा परिचित नहीं हैं वो।
और मीडिया में कैसे है, जो बुद्ध धर्म है वह बहुत सकारात्मक रूप से उसका दर्शाया जाता है। हॉलीवुड में बुद्धिज्म है। हॉलीवुड स्टार्स (Hollywood stars) जो हैं, वो खुद बुद्धा फॉलो (follow) नहीं करते हैं पर कुछ माइंडफुलनेस (mindfulness) करते हैं वो। तो फिर ‘लिटल बुद्धा’ जैसे जो मूवीज़ हैं, उसके आगे बुद्धिज्म जो है, उसके बारे में बहुत सकारात्मक भाव है। उसके आगे दलाई लामा जो लीडर थे, वो भी उनके बारे में सकारात्मक भाव है। ये दूसरा कारण है कि मीडिया है हमारे भारत में, किताब हो या जनरली जो मीडिया है, उसमें क्या है कि अधिकांश रूप से हिन्दुइज़्म का ज़्यादा सकारात्मक पिक्चर (picture) नहीं बताया जा पाता है। और ऊपर से क्या है, क्या इस्कॉन हिन्दू है या नहीं है, इसके बारे में भी कई वाद-विवाद होते रहता है, उसके कारण भी।
तो हम प्रभुपाद जी का गुणगान करेंगे कैसे? तो प्रभुपाद जी ने बहुत से विषयों पर बातचीत की है। पर कई बार उनकी जो टीचिंग्स (teachings) हैं, वह काफी डायरेक्टली डिवोशनल (directly devotional) लगती हैं लोगों को। अभी दलाई लामा फेमस हैं, वो बुद्धिज्म के प्रचार के लिए फेमस नहीं हैं, वो एक जनरल स्पिरिचुअल लीडर (general spiritual leader) हैं। तो अगर आप उनके लेक्चर सुनेंगे तो आपको ऐसा लगेगा नहीं कि आपको बुद्धिज्म स्वीकार करना ज़रूरी है। अच्छा जी, कुछ अच्छा संदेश दे रहे हैं। तो क्या है कि उनकी जो स्पिरिचुअलिटी (spirituality) है वो नॉन-डिमांडिंग (non-demanding) है। उनको पूछा गया था दलाई लामा को कि ‘व्हाट इज स्पिरिचुअलिटी (what is spirituality)?’ वो बोले ‘कम्पैशन एंड फॉरगिवनेस (compassion and forgiveness)’। अध्यात्म का मतलब क्या है? करुणा और माफ़ करना। कोई सुनने को बहुत अच्छा लगता है।
प्रभुपाद जी भी भक्ति जो सिखाते हैं उसमें करुणा है, पर प्रभुपाद जी की शिक्षा वो काफी स्पेसिफिक (specific) है: कृष्ण की पूजा करो, आप ये जप करो, नियम का पालन करो। तो क्या है, ये लोकप्रिय होना थोड़ा मुश्किल हो सकता है। पर इस तरह से जो स्पिरिचुअलिटी थोड़ा डिमांडिंग होती है, जो लोगों से कुछ मांग करती है कि ‘आपको ये छोड़ना पड़ेगा, ये लेना पड़ेगा’, उसको स्वीकार करना थोड़ा मुश्किल होता है लोगों के लिए। पर फिर भी अगर हम सकारात्मक प्रचार करते हैं, कई हमारे प्रचारक हैं, प्रभुपाद जी की शिक्षा है, सेकंड जनरेशन लीडर्स भी हैं, बहुत अच्छा प्रचार कर रहे हैं और धीरे-धीरे प्रभुपाद जी की जो महिमा है वहाँ प्रस्थापित हो रही है, पर उसके लिए समय लगेगा।
कई और कारण भी हो सकते हैं, पर ये तीन प्रधान कारण हैं: हमारी ही एक्सक्लूसिविस्ट मेंटालिटी, दूसरा कि टेक्स्ट बुक्स और मीडिया में जो है पोस्ट-इंडिपेंडेंस (post-independence) बताया नहीं है और हिन्दुइज़्म के बारे में ज़्यादा सकारात्मक नहीं आता है। तीसरा जो है कि प्रभुपाद जी के प्रवचन वगैरह हैं, वह जो एक सीरियस स्पिरिचुअलिटी (serious spirituality) नहीं फॉलो करना चाहता है, जो सिर्फ एक ‘फील गुड’ (feel good) चाहता है, उनके लिए नहीं हैं।
भक्तिः परेशानुभवो विरक्तिरन्यत्र च। कोई भक्ति का अनुभव कर रहा है, भक्ति में प्रगति कर रहा है तो उसके दो लक्षण होते हैं कि हमें भगवान का अनुभव होता है। भगवान का अनुभव होता है तो बाकी सब अनुभवों से हम विरक्त हो जाते हैं, उन सब से हमें उतनी तृष्णा नहीं रहती है। तो मतलब क्या है कि अगर कोई पर्वत के ऊपर जा रहा है, तो क्या होगा? अगर मान लीजिए उसके पास कोई डिस्टेंस मीटर (distance meter) है, पर्वत के नीचे की जगह थी, उससे मेरी हाइट (height) अभी ऊपर जा रही है। पहले मैं ग्राउंड लेवल (ground level) पे था, सी लेवल (sea level) पे था, पर अभी मैं 500 मीटर ऊपर आ गया हूँ, मैं एक किलोमीटर ऊपर आ गया हूँ। और फिर अगर आपके पास कोई मीटर है जिससे ऊपर का पर्वत का टॉप (top) है, वो पहले इतना दूर था अभी वो करीब आ गया है, दूरी कम हो गयी है। तो मतलब भौतिक खास करके ऐसे भौतिकवादी भोग जो अनैतिक हैं, जो आध्यात्मिकता के खिलाफ हैं, उनसे अगर विरक्ति आ रही है और भगवान के प्रति आसक्ति बढ़ रही है, परम सत्य आध्यात्मिक सत्य के प्रति आसक्ति बढ़ रही है, तो वो मार्ग हमारे लिए सही है।
और फिर अभी क्या यही मार्ग सही है? दूसरे लोग दूसरे मार्ग से भी ऊपर जा सकते हैं। और अगर वो वास्तव में प्रगति कर रहे हैं तो अच्छी बात है। हमें ऐसे नहीं करना है कि दूसरा कोई किसी और मार्ग से पर्वत के ऊपर चढ़ रहा है, उसको हम खींचें, नीचे लाएं और फिर तुम बोलो “इसी मार्ग से मुझे चढ़ना है।” न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङ्गिनाम्। जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान्युक्तः समाचरन् (३.२६)। भगवद्गीता में बताते हैं भगवान कि दूसरों के मन को आप विचलित मत करो। भले वो अज्ञानी क्यों नहीं हैं, आपको लगता है वो अज्ञानी हैं, वो आसक्त हैं, पर ‘जोषयेत्सर्वकर्माणि’, जिस स्तर पे हैं वहाँ से आप उनको आगे बढ़ाओ। जिस स्तर पे हैं वहाँ पे उनको आगे बढ़ाओ।
तो महाराज जब कुंभ मेला में थे एक बार, तो वहाँ पे एक प्रश्न उत्तर बूथ (booth) में थे। वहाँ पे कोई हिन्दू नेशनलिस्ट (Hindu Nationalist) जो था वो आ गया।
तो वहाँ पे एक प्रभुपाद जी के शिष्य रोचन प्रभु, उनके बारे में मैंने पढ़ा था और जो प्रसंग मैंने पढ़ा था उन्होंने खुद भी मुझे बताया वो प्रसंग के बारे में। तो क्या है, वे लन्दन में थे उस समय। प्रभुपाद जी वहाँ पे आये थे और लन्दन तभी प्रभुपाद जी का यूरोप का हेडक्वार्टर (headquarter) था। वो जर्मनी से, फ्रांस से, अदर (other) जगहों से भक्त आ रहे थे और प्रभुपाद जी को रिपोर्ट (report) दे रहे थे। तो तभी रोचन प्रभु ने कहा सबके पास कुछ सेवा है प्रभुपाद जी के लिए करने को। तो बाद में सब भक्तों ने अपना रिपोर्ट दे के चले गए, तो वो प्रभुपाद जी के पास गए और उन्होंने कहा “प्रभुपाद जी सबको कुछ सेवा है आपके प्रति, मुझे भी आप कुछ सेवा दे दो।”
तो प्रभुपाद जी ने उनसे कहा कि “आप क्या करना चाहते हो कृष्ण के लिए?” तो रोचन प्रभु ने कहा “आप जो बोलेंगे वो ही करूँगा मैं।” प्रभुपाद जी बोले कि “नहीं ठीक है, आप क्या करना चाहते हो कृष्ण के लिए?” प्रभुपाद जी मेरी परीक्षा ले रहे हैं ‘मैं कितना शरणागत हूँ’। “प्रभुपाद जी आप जो भी बोलेंगे मैं करूँगा!” तो प्रभुपाद जी गंभीर हो गए। “हमारा तत्वज्ञान समझने का प्रयास करो। तुम अन्वेषण करो कि तुम कृष्ण के लिए क्या करना चाहते हो और फिर वो तुम करो।” तो फिर उन्होंने कभी ऐसा सोचा ही नहीं। “अच्छा तुम्हें सोचना पड़ेगा, तुम्हें सोचना होगा।”
तो इन दोनों का जहां पे इंटरसेक्शन (intersection) होता है, जहां पे मिलते हैं, वो क्या चीज़ें हैं, हमें देख सकते हैं वो देखेंगे तो क्या होगा? उसमें हम प्रेरणा से भक्ति कर सकते हैं, उससे हम तेज़ी से आगे बढ़ सकते हैं। कोई हमको बोलने के लिए नहीं भी होगा, तो भी हम वो सेवा करते रहेंगे और यहाँ सर्वोत्कृष्ट (best) कुछ नहीं है।
भक्त: मैंने एक और प्रश्न है, आप एक इतने फेमस राइटर (famous writer) हैं, जो आप इतने सारे ग्रंथ लिखे हैं, दूसरे वरिष्ठ प्रभुपाद ने भी इतने सारे ग्रंथ लिखे हैं, तो आप अपने कुछ अनुभव से बता सकते हैं कि प्रभुपाद ने कितने परिश्रम करके जो ग्रंथ हमें दिये हैं, उसका उनके अनुयायियों के लिए कितना महत्व है उनका?
वक्ता: तो प्रभुपाद जी के ग्रंथों में वो क्या महत्व है? क्योंकि प्रभुपाद जी ने जो लिखा है वो हमारे सारे शिक्षण का एक मूल है, एक फाउंडेशन (foundation) है। कि एक लेखक के रूप में मैं देखता हूँ कि एक छोटी सी चीज लिखने के लिए कितनी मेहनत लगती है और कितनी सारी और चीज़ें कर सकते हैं। मैं रोज़ ‘गीता डेली’ (Gita Daily) लिखता हूँ, तो एक 300 शब्द का एक लेख होता है, उसको लिखने के लिए मुझे एक घंटा लग जाता है। और प्रभुपाद जी ने तो हज़ारों लाखों शब्द लिखे हैं! मैं एक घंटे में लिखता हूँ और जो लोग पढ़ने वाले हैं उसको 3-4 मिनट में पढ़ लेंगे। तो उस एक घंटे में मैं लेक्चर भी दे सकता हूँ। अगर मैं चुनूँ… लेख लिखने के लिए कई लोग सुनते नहीं हैं, पढ़ते हैं। पर पॉइंट (point) यह है कि लिखने के लिए बहुत समय लगता है।
और प्रभुपाद जी प्रचार कर सकते थे, मैनेजमेंट कर सकते थे, भक्तों को व्यक्तिगत रूप से ट्रेनिंग कर सकते थे। पर वो सब छोड़ के प्रभुपाद जी ने अपने ग्रंथ लिखे हुए हैं। तो उन्होंने इतना समय इसमें इन्वेस्ट (invest) किया हुआ है क्योंकि उनके लिए वो महत्वपूर्ण था। और एक तरह से, ‘रेस्पेक्ट इस शोन टू समवन बाय रेस्पेक्टिंग व्हाट दे रेस्पेक्ट’ (respect is shown to someone by respecting what they respect), कि हम किसी के प्रति आदर कैसे दिखाते हैं? हम किसी के प्रति आदर दिखाते हैं उन चीज़ों का आदर करके जिन्हें वो आदर देते हैं।
तो अगर कोई कहता है कि जब कोई अमेरिका का या भारत का गाना चल रहा है, ऐसा कोई अमेरिका भारत में जाता है, तो नेशनल एंथम (National Anthem) चल रहा है, सब लोग खड़े होंगे भारत का एंथम गा रहे हैं या झंडे को प्रणाम कर रहे हैं। अगर वो कहता है “मैं भारत का आदर करता हूँ”, तो उसको भी खड़ा होना चाहिए। अभी प्रभुपाद जी के ग्रंथों के बारे में, वो गुणगान बहुत कर सकते हैं, उसके लिए सेपरेट क्लास (separate class) भी हो सकता है, पर एट अ बेसिक लेवल (at a basic level) मैं कह रहा हूँ कि अगर हमें प्रभुपाद जी के प्रति आदर है, उनके प्रति कुछ कृतज्ञता है, तो जिन चीज़ों को उन्होंने महत्व दिया है उन्हें हमें भी महत्व देना चाहिए। और वह महत्व देकर हम उस तरह से आगे बढ़ सकते हैं। तो प्रभुपाद जी के ग्रंथ पढ़ के हम उनकी सेवा कर रहे हैं, हम उनके प्रति कृतज्ञता अर्पण कर रहे हैं और फिर हम उनके करीब जा रहे हैं। और उनका जो संदेश है, मार्गदर्शन है उससे हम करीब जा सकते हैं, उससे हम दुसरों को कैसे करीब जाना है, समझ सकते हैं और वह दुसरों को समझा भी सकते हैं।
भक्त: बहुत बहुत धन्यवाद आपका। हम सभी बहुत आभारी हैं आपके इतने सुन्दर संग के लिए, इतने सुन्दर अध्यात्मिक मार्गदर्शन के लिए। और हम आपसे प्रार्थना भी करते हैं कि आगे कभी ऐसा अवसर आए तो आप हमें ज़रूर अपना संग दीजियेगा। हम सभी भक्त आपका बहुत कृतज्ञतापूर्वक धन्यवाद देते हैं। हरी बोल, हरी बोल, हरी बोल। इसके लिए चैतन्य चरण प्रभु की जय! प्रभुपाद की जय! समस्त भक्त वृंद की जय!