How Balarama helps Krishna remember Vrindavana outside of Vrindavana (Hindi) – Balaram Jayanti Class
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Lecture Summary
यह व्याख्यान श्रीमद्भागवत और गोपालचम्पू जैसे ग्रंथों के आधार पर भगवान श्रीकृष्ण और बलराम जी की विभिन्न लीलाओं, विशेषकर वृंदावन से मथुरा प्रस्थान, द्वारका गमन और ब्रजवासियों के साथ उनके गाढ़ प्रेम एवं विरह भाव का विस्तृत वर्णन करता है।
मुख्य बिंदु:
- बलराम जी का जन्म और स्वरूप:
- बलराम जी भगवान श्रीकृष्ण के ही प्रथम आंशिक विस्तार और आदि गुरु हैं। योगमाया के द्वारा उनका गर्भ संकर्षण रोहिणी जी के गर्भ में हुआ, जिस कारण वे संकर्षण कहलाए।
- उनका शारीरिक सौंदर्य और बल अत्यंत अद्भुत है; उनका मुख चंद्रमा के समान और कांति सूर्य जैसी है। वे धर्म और भक्ति मार्ग पर चलने के लिए आवश्यक आध्यात्मिक बल प्रदान करते हैं।
- मथुरा प्रस्थान और कंस वध:
- कंस के आमंत्रण पर श्रीकृष्ण और बलराम अपने सखाओं के साथ मथुरा पहुंचे। वहां उन्होंने शिवजी के विशाल धनुष (शिवचाप) को तोड़कर और कुवलयापीट हाथी तथा मल्लों का वध करके कंस का अंत किया।
- वृंदावन और ब्रजवासियों का विरह:
- श्रीकृष्ण और बलराम के मथुरा चले जाने के बाद ब्रजवासी उनके विरह में व्याकुल हो गए। प्रेम और विरह की यह स्थिति भक्तों की भक्ति को और अधिक प्रगाढ़ बनाती है।
- उद्धव जी और स्वयं बलराम जी ने समय-समय पर वृंदावन जाकर ब्रजवासियों को सांत्वना दी और उनके प्रेम की गहराई को प्रकट किया।
- द्वारका लीला और शिक्षा:
- मथुरा के पश्चात सभी यदुवंशियों की सुरक्षा के लिए द्वारका की स्थापना की गई।
- श्रीकृष्ण और बलराम ने उज्जैन जाकर संदीपनी मुनि के आश्रम में मात्र 64 दिनों में समस्त कलाओं और वेदों की शिक्षा ग्रहण की।
- अंतिम संदेश:
- बलराम जी और श्रीकृष्ण के जीवन की हर लीला जीवमात्र को भगवान के प्रति अनन्य प्रेम, भक्ति और जीवन के प्रलोभनों से लड़ने की शक्ति प्रदान करती है।
Full Transcription
व्याख्यान का आरंभ और मंगलाचरण
नमस्ते, मेरे व्याख्यान में आपका स्वागत है। नमस्ते, तारत्र पिदे। शिमसन दिधरण, वासार enabled स्वारिष्न, श्रि श्रृ श्र engagement खरी सरी मार ट्रि नामत्रि नाम मणरी है प respected to be despised. Main Chatur Vasak beginning औमन बज़रामजी के आनने ने एक स्लोग मोचे पेंरेगे हैं मैं गुवलू दो आप स्क्रौन कर नक रांट लेगे मैं साथ से और देयेगयें।
राम राम महाबाहो न जाने तव विक्रमम्। यमणदेवी यह कह रहे हैं जब राम जी उसे तोड़ जाते हैं। न जाने तव विक्रमम्, यस्यैकांशेन विद्धृतो। यस्य एक अंश, राम जी जो हैं, उनके एक अंश के द्वारा धारण किया होगा। यस्यैकांशेन विद्धृतो जगती जगताम्पते। जगती मतलब धरती और जगत मतलब ब्रह्माण्ड। यस्यैकांशेन विद्धृतो धारण किया होगा जगती जगताम्पते। राम राम महाबाहो, न जाने तव विक्रमम्, यस्यैकांशेन विद्धृतो जगती जगताम्पते।
बलराम जी की महिमा और रहस्यमय जन्म
पहले जो लीला हुई है इसके बारे में चर्चा करेंगे और उससे बलराम जी इससे महत्वपूर्ण सेवा करते हैं। वृंदावन में आते हैं, आकर उहां सुनाने का प्रयास करेंगे। बलराम जी यह भगवान के सबसे घनिष्ठ पार्षद हैं। पार्षद में भगवान ही हैं, यही भगवान के काम बताते हैं, यह उनका विशिष्ट है। दसवें अध्याय के 42वें श्लोक में भगवान बताते हैं कि बहुत-बहुत लेते हैं वृंदावन में, “विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत्”। भगवान बताते हैं कि सारे ब्रह्मांड को धारण करने के द्वारा क्या है, एक अंश के द्वारा मैंने सारे ब्रह्मांड को संभाला है। तो कृष्ण और बलराम एक ही हैं, तो एक ही व्यक्ति हैं पर दो अलग भाव में हैं और अलग भाव में होते हुए वे अलग-अलग प्रकार से लीला में आदान-प्रदान करते हैं।
तो बलराम जी का जन्म, उनका संपूर्ण जीवन बहुत रहस्यमय है। तो वे जिस प्रकार से सेवा करते हैं भगवान की, वे सेवा का भाव कभी-कभी समझना मुश्किल हो जाता है क्योंकि वे कभी-कभी बाह्य रूप से प्रतिकूल भाव से भी सेवा करते हैं। पर बलराम जी का जन्म रहस्यमय क्यों है? क्योंकि बलराम जी भगवान से उम्र में एक साल बड़े हैं। बलराम जी एक साल बड़े हैं पर उनकी जन्म तिथि में केवल 7 दिन का अंतर है। तो इस 7 दिन का अंतर क्यों है? इसका जो वर्णन है, जीव गोस्वामी अपने गोपाल चम्पू नामक ग्रंथ में कर रहे हैं।
तो श्रीमद्भागवतम् के 335 अध्याय हैं बारह स्कंध में, उनमें से 90 अध्याय जो हैं, वो दशम स्कंध में हैं। दशम स्कंध यह संपूर्ण भागवतम् का सबसे महत्वपूर्ण भाग है। 50वें अध्याय के बाद में द्वारका लीला चालू होती है। तो ये जो 90 अध्याय हैं उसके आधार पर अनेक आचार्यों ने भाष्य लिखा है और ग्रंथ भी लिखे हैं। भाष्य क्या होता है कि वही श्लोक लिए हैं, श्लोक की विस्तार से व्याख्या की है। विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर नाम के महान आचार्य हैं, उन्होंने ‘सारार्थ दर्शिनी’ नाम का ग्रंथ लिखा है, उसमें उन्होंने भाष्य किया है। इसी तरह से विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर के पहले एक श्रीनाथ चक्रवर्ती नाम के महान आचार्य थे, उन्होंने ‘चैतन्य दर्शिनी’ नाम का ग्रंथ लिखा है। जीव गोस्वामी हमारे सम्प्रदाय के सिद्धांत आचार्य हैं, वह बहुत महान पंडित थे और उन्होंने अलग-अलग ग्रंथों से वर्णन किया है।
कंस का अत्याचार और रोहिणी का प्रस्थान
तो जो कंस था वह बहुत मनमानी करने वाला था। तो कभी-कभी जब वसुदेव और देवकी को कैद में रखा था, तभी वसुदेव की कई और पत्नियां भी थीं। तो कंस कभी इतना भयभीत हो जाता था, उसको लगता था कि यह विष्णु जन्म लेने वाला है अष्टम गर्भ। वसुदेव की बाकी पत्नियां थीं उनको भी कभी-कभी गिरफ्तार कर लेता था, परेशान कर लेता था। उनके गर्भ में बलराम जी थे, उन्हें परेशान कर लेता था और बाद में उनको छोड़ दिया।
तो तभी वसुदेव ने योजना बनाई कि कंस के कारण बार-बार उनको परेशानी हो रही है, तो गुप्त पद्धति से उनको केवल एक घोड़े पर बिठा कर वहां से वहां भेज दिया। साधारणतः रानी होती है, रानी रथ में या पालकी में अंदर जाती है। पर क्योंकि वहां पर खतरा था और वह ज्यादा ध्यान नहीं खींचना चाहते थे, इसलिए इस तरह से अकेले ही रोहिणी एक घोड़े में बैठकर चली गईं। और फिर उनका नंद महाराज ने बड़ा स्वागत किया और बड़े अच्छी तरह से उनके रहने की योजना कर दी।
और जब सात महीने की गर्भ की हो गई थीं, तभी उसी समय जो देवकी का गर्भ था वह रोहिणी के गर्भ में स्थानांतरित कर दिया गया। जो स्थानांतरित कर दिया, उसके बाद में बाहर से लगा कि देवकी का गर्भपात हो गया, पर वास्तव में जो गर्भ गिर गया है, वह वहां चला गया। और फिर बलराम जी जो थे उस समय रोहिणी लगभग 14 महीने के गर्भ में हैं। 14 महीने के गर्भ में रहने के बाद जब देवकी का अष्टम गर्भ 7 महीने का हो गया था, तभी तो एक साल का फर्क है। 14 महीने के जन्म के बीच में… पर इस सारी लीला को बलराम जी एक बल और आठ चीज…
कृष्ण-बलराम का बचपन और माता यशोदा की चिंता
इस खेल में बलराम जी का जन्म हुआ। नंद महाराज ने कहा कि ऐसे करेंगे हम यशोदा और रोहिणी दोनों साथ में ही रहेंगी। तो दोनों की देखभाल के लिए अलग-अलग योजना करने की जरूरत नहीं है, क्योंकि दोनों साथ में रहेंगी, तो दोनों की देखभाल एक साथ हो जाएगी। इस तरह से दोनों बालक साथ में रहा करते थे। तो पहले बालक कुछ भी समझते नहीं, सिर्फ रोते हैं और दूध पीते हैं और सोते हैं। लेकिन बलराम जी देखते थे यह कौन है। और फिर बाद में उनका नामकरण हुआ। तो फिर जब उनको बुलाते थे तो पहले तो दोनों पीछे-पीछे दौड़ते थे। समझते नहीं कि नाम क्या है। तो फिर जब राम बुलाते थे तो कृष्ण आते थे, कृष्ण बुलाते थे तो राम आते थे।
और फिर इस तरह से बलराम जी बड़े भाई थे इसलिए हमेशा यशोदा माई कहती थीं कि, “तुम्हें कृष्ण की देखभाल करनी है। कृष्ण बड़े नटखट हैं। तुम उनकी देखभाल करना।” तो जब भी कहीं बाहर जाते थे कृष्ण खेलने को, अगर बलराम जी साथ नहीं होते तो यशोदा माई जी की चिंता बहुत बढ़ जाती थी। बलराम जी नहीं हैं तो चिंता बहुत बढ़ जाती थी। तो इस तरह से कई साल तक वृंदावन में उन्होंने लीला की। इसके बाद में वृंदावन की लीला का यहां पर वर्णन नहीं करूँगा, मैं वृंदावन का जो भाव कृष्ण बलराम में वृंदावन के बाहर कैसे था, इसके बारे में ही चर्चा करेंगे।
वृंदावन से प्रस्थान और विरह की अग्नि
और फिर वे कृष्ण बलराम को लेके चले गए। कंस के दूत अक्रूर आए थे। ‘गोविंद दामोदर स्तोत्र’ में वर्णन आता है कि कैसे जब कृष्ण बलराम को लेके चले गए, तो सारा वृंदावन उद्विग्न हो गया। उद्विग्न हो गया था और ऐसे बताया गया है चैतन्य चरितामृत में कि व्रजवासियों का जो प्राण था वो चला गया था। कि कृष्ण चले गए। पर वो ऐसा था कि प्राण तो शरीर से चला गया है, पर प्राण अभी शरीर में है। मान लीजिए अगर घर में कोई व्यक्ति है वो जल रहा है, व्यक्ति सोचेगा कि मुझे घर से बाहर निकलना है, पर मान लीजिए वहां पर जो खिड़की है, दरवाजा है उसको बाहर से बंद कर दिया। तो जल तो रहा है अंदर से पर कोई बाहर नहीं निकल सकता है। तो वो जो “जरूर लौट के आऊंगा” यह वचन था, गोपियों का जो जीवन है वह जल रहा था कृष्ण के विरह में, पर क्योंकि कृष्ण ने वचन दिया था कि मैं वापस आऊंगा, तो वो मान लीजिए कमरे के दरवाजे को बंद करने के समान है।
पर अंतरंग से देखें तो इसमें बहुत ही बड़ा आनंद है क्योंकि कृष्ण की स्मृति बहुत ही तीव्र हो जाती है। जो विरह होता है वह प्रेम पे क्या प्रभाव करता है? प्रेम एक अग्नि के समान है। मान लीजिए अग्नि जल रही है और विरह जो है वह एक वायु के समान है। तो अगर बड़ी अग्नि जल रही है और वहां पर वायु लगती है तो क्या हो जाता है? अग्नि फैलने लगती है। तो उसी तरह से जब प्रेम बहुत विशाल होता है, तो विरह होता है तो अग्नि और बढ़ जाती है।
तो राधारानी कल्पना में कहती हैं, “कृष्ण अभी आप मुझे मेरे सामने दिखाई नहीं देते हैं, तो इसलिए मैं आपको हर जगह देख रही हूँ। जब आप होते थे तो एक जगह में दिखते थे पर आप नहीं हैं तो हर जगह।” तो वास्तव में यह विरह का प्रभाव तब होता है जब प्रेम विशाल है। हमें यह नहीं सोचना चाहिए कि मैं भक्तों से दूर चली जाऊँगी फिर मेरी भक्ति बढ़ जाएगी, वह नहीं होगा। क्योंकि अगर अग्नि छोटी सी है और तभी वायु आता है तो क्या होता है? वह बुझ जाएगी। अगर हम भक्तों से दूर चले जाएंगे तो वायु से बुझ जाएंगे। हमें भक्तों का संग करना बहुत जरूरी है। भगवान के सान्निध्य में आना बहुत जरूरी है। पर जो महान भक्त हैं, उनके लिए विरह जो होता है वह भक्ति का और विकास करता है।
बलराम जी की सर्वव्यापकता
भक्ति की विधि कैसी है? तो जब कृष्ण और बलराम वृंदावन छोड़के चले गए, तो बलराम जी की विशेषता क्या है? वह भगवान के ऐसे पार्षद हैं कि वे भगवान की हर लीला में हैं। अभी वृंदावन और वृंदावन के बाहर, मथुरा में जो लीला हुई है… आध्यात्मिक जगत में वृंदावन है और द्वारका है, आध्यात्मिक जगत में मथुरा नहीं है।
भगवान के जो पार्षद हैं, कुछ पार्षद वृंदावन में हैं, कुछ द्वारका में हैं। बहुत गिने-चुने पार्षद ऐसे हैं जो वृंदावन में भी हैं, द्वारका में भी हैं। कौन-कौन ऐसे पार्षद हैं? प्रधानतः दो ही हैं। एक हैं बलराम जी, और दूसरी हैं रोहिणी। रोहिणी भी वृंदावन में थीं, और वो भी द्वारका में हैं। और कुछ पार्षद हैं, उद्धव हैं, और एक नारद मुनि।
पर जो भगवान के पार्षद हर लीला में हमेशा रहते हैं, उनमें रोहिणी और बलराम जी बहुत महत्वपूर्ण हैं। बलराम जी भगवान की हर लीला में सहभागी होते थे। रोहिणी कुछ-कुछ लीला में हैं, पर बलराम जी अगर घर में हैं, जंगल में हैं, भगवान वृंदावन में हैं, द्वारका में हैं, राजमहल में हैं, तो उनके साथ हैं। भगवान बाहर युद्ध करने जा रहे हैं जरासंध से, तो उनके साथ बलराम जी हैं। तो बलराम जी लगभग हर लीला में हैं। राधा रानी भगवान की अंतरंग शक्ति हैं, पर वह भी भगवान की सभी लीलाओं में नहीं थीं, पर बलराम जी लगभग हर लीला में हैं।
कंस की योजना और शिव धनुष भंग
तो कंस योजना बनाता है। “आप वहां पे आओ और जो हमने एक प्रतियोगिता बनाई है, प्रतियोगिता में आप सहभागी हो जाओ।” प्रतियोगिता वो एक शिव यज्ञ होता है, उसका प्रदर्शन करना होता है और उसकी पूजा होती है। तो वह एक उत्सव होता है और उसमें मल्ल युद्ध की एक प्रतियोगिता होती है तो “उसको देखने आप आ जाओ।”
कंस का क्या भाव होता है? कंस सोचता है कि मैंने इतने सारे असुर थे, सबको मैंने भेजा, सबकी मृत्यु हो गई। किसी भी असुर को मारा था कैसे मारा था? बिना किसी अस्त्र के। पूतना को सिर्फ अपने चूसने से उसके प्राण निकाल लिए। अघासुर को बस क्या किया, Free ride ले लिया और उसको मार डाला। और उसी तरह से केशी के मुंह में हाथ डाल लिया। तो भगवान किसी अस्त्र का इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं। और इसलिए उद्धव ने भगवान की लीला का वर्णन करते हुए कहा, “बालक खेलता है उस तरह से वध किया।” बलराम जी वही करते हैं।
इस भाव से कंस सोचता है कि, “मेरे सारे असुरों का वध हो गया है। अभी कृष्ण को मारना है तो एक ही उपाय है कृष्ण को मेरे इलाके में लेके आएं। मेरे इलाके में लेके आएंगे तो वहां पे मेरी सेना होगी, मैं खुद होऊंगा, मेरे मल्ल योद्धा होंगे, साथ-साथ मैं मारूंगा।” तो ये अपने इलाके में लाने की योजना करता है।
जब कृष्ण आते हैं, तो नंद महाराज को ये बताना ही होता है कि कृष्ण ये वसुदेव के पुत्र हैं। गर्ग आचार्य जो आते हैं, वो कृष्ण का नामकरण करते हैं, नंद महाराज को पता है कि कृष्ण भगवान हैं, और दूसरा है कि कृष्ण वसुदेव के पुत्र हैं। गर्ग आचार्य भक्त हैं, और वो भगवान का गुणगान करना चाहते हैं, नंद महाराज को बताना चाहते हैं कि, “कितना तुम्हारा भाग्य है कि भगवान तुम्हारे आंगन में आये हैं।” पर नंद महाराज जिस प्रकार से भगवान की भक्ति करते हैं, वो भाव माधुर्य अधिक है, ऐश्वर्य नहीं है।
तो वृंदावन से मथुरा में प्रवेश करते हैं। मथुरा में कृष्ण और बलराम और उनके साथ सारे सखा भी हैं। वो मथुरा में जाके चीजों का दर्शन करते हैं और फिर वहां पर वो देखते हैं शिव चाप, शिव जी का धनुष है और उसका प्रदर्शन किया जा रहा है। भगवान और बलराम जी दोनों जाके उसको तोड़ देते हैं। एक टूटा हुआ हिस्सा वहां बलराम जी को देते हैं और फिर सारे कंस के सैनिक वहां भयभीत हो जाते हैं। वो धनुष शिव चाप है कि 300 लोगों को उठाने के लिए लगते हैं। उठाने के लिए नहीं हिलाने के लिए 300 लोग लगते हैं। पर कृष्ण आराम से उठाते हैं और उसको तोड़ भी देते हैं।
तो जब शिव धनुष टूटता है तो ऐसा आवाज आता है कि मानो पृथ्वी फट गई हो, बड़ा भूकंप आ गया हो और पहाड़ टूट कर गिर गए हों। कंस डर जाता है कि क्या हुआ।
मल्ल युद्ध का आयोजन
बाद में अगले दिन जब मल्ल युद्ध होने वाला होता है, तो उस समय कृष्ण और बलराम दोनों साथ में आते हैं और उनको पहले बताया नहीं जाता है कि आपको मल्ल युद्ध करना है। उनको बुलाया जाता है कि आप देखने को आ जाओ।
वहां पे जब आते हैं तो कुवलयापीड़ नाम का विशाल हाथी होता है, तो वह कृष्ण को मारने आता है। कृष्ण उसका उद्धार कर देते हैं। इसके बाद जब वह प्रवेश करते हैं, तो दूर से कंस अपने बड़े आसन से बैठा हुआ है और चाणूर, मुष्टिक आदि ये सब मल्ल योद्धा कृष्ण को बुलाते हैं, “कृष्ण आओ, आप तो बड़े पहलवान हो, हमसे युद्ध करो।”
कृष्ण बलराम इस तरह से लीला करते हैं, “हम तो बालक हैं। हम तो यहां पर आपका मल्ल युद्ध देखने आए हैं। हम क्या मल्ल युद्ध करेंगे?”
“नहीं नहीं, आप तो बड़े शक्तिशाली हो, आपने बड़े-बड़े असुरों का वध किया है, आप हमसे जरूर युद्ध कर सकते हैं।”
कृष्ण अंदर से सोचते हैं, “हमने किसी को मारा नहीं। वो पूतना जब आई थी तो उसका काल का समय आ गया था। तृणावर्त जब मुझे हवा में लेके जा रहा था तभी उसका काल आ गया। वास्तव में मैंने किसी को नहीं मारा था। मैं तो शक्तिशाली नहीं हूँ, मैं तो आपका युद्ध देखने आया हूँ। मल्ल युद्ध जानता भी नहीं हूँ।”
तो मुष्टिक कहने लगा कि, “नहीं नहीं, वास्तव में हम जानते हैं कि तुम तुम्हारे गोपों के साथ जब वृंदावन में बाहर जंगल में आते हो, दही खा रहे होते हो तभी तुम मल्ल युद्ध करते हो।”
“वो तो हम बच्चों का खेल है, वो तो हम जैसे महारथियों के मल्ल युद्ध के समान नहीं है। तो हम आपसे युद्ध नहीं करेंगे।”
“यह राजा का आदेश है!”
कृष्ण बलराम कंस की ओर देखते हैं। कंस बड़े गर्व से बैठा हुआ है अपने आसन में और सारे वहां प्रेक्षकगण कहने लगते हैं कि यह तो बड़ा अन्याय है। कृष्ण बलराम छोटे से बालक हैं, इनका इतने बड़े मल्ल योद्धाओं से युद्ध कैसे हो सकता है? और कृष्ण बलराम युद्ध करने लगते हैं।
नंद महाराज को सांत्वना और अज्ञान का किला
तभी वसुदेव ने कहा था कि कृष्ण मेरे पुत्र हैं। नंद महाराज सोचते हैं कि हमारे पुत्र को अपने पुत्र के रूप में कह रहे हैं, यह तो हमारे भाग्य की बात है। “अगर तुम मथुरा में नहीं रहोगे, तो मथुरा वासियों के जीवन को खतरा है, यहां पे शत्रुओं के आक्रमण से खतरा है, वहां पे तुम्हारे विरह के दुःख से खतरा है।”
नंद महाराज कृष्ण से कहते हैं कि, “आप वृंदावन चले जाओ और कुछ समय में आ जाओगे, मैं नहीं रह सकता हूँ। और यशोदा माई भी नहीं रह सकती है। यशोदा माई को मैं यहां पर लेके आऊंगा। अगर मैं तुम्हें छोड़ कर आ गया हूँ तो वो जी नहीं पाएंगी।”
कृष्ण कहते हैं कि, “यशोदा माई को आप यहां पर लेके आओगे, वृंदावन को आप लेके आओगे, पर वृंदावन के सारे व्रजवासी यह तो गइयों के सेवक हैं, तो गइयों को क्या करेंगे? गइयों को भी हम यहां पर लेके आएंगे। पर आपकी गइयां जो असंख्य मात्रा में हैं, इतनी विशाल मात्रा में हैं कि मथुरा के आस-पास गइयों को घास खाने के लिए जगह कम पड़ जाएगी।”
कृष्ण कहते हैं, “वास्तव में जरासंध को पता है कि कंस के वध का बदला लेने के लिए आक्रमण करने आ जायेगा। यदुवंशियों का संरक्षण करने के लिए मैं एक किला बनाऊंगा। पर हमारी वृंदावन की गइयां तो इतनी हैं, कि सारे व्रजवासियों का संरक्षण करना है तो इतना बड़ा किला बनाना संभव नहीं है। तो अलग प्रकार का किला चाहिए। वो किला क्या है? वो किला है अज्ञान का किला। किसी को पता नहीं चलना चाहिए कि आपका और मेरा कोई संबंध है। तो इसलिए जो मेरे शत्रु हैं वह आप पे आक्रमण करने कभी नहीं आएंगे। अगर उनको लगेगा कि आप में और मुझ में प्रेम का संबंध है, तो मुझ पे बदला लेने के लिए वह आप पे आक्रमण करने आ जाएंगे और वृंदावन को उध्वस्त कर देंगे।”
सबसे पहले वचन क्या है कि कृष्ण हमारा पुत्र नहीं है, ये वसुदेव का पुत्र है। दूसरा है कि कृष्ण छोड़ के जा रहे हैं। तीसरा है कि कृष्ण को बोलना भी नहीं चाहिए, सारी दुनिया को ऐसा लगना चाहिए कि कृष्ण वसुदेव के बेटे हैं। कृष्ण कहते हैं कि मैं स्मृति के रूप में आपके साथ आ जाऊंगा और बलराम जी मेरा स्मरण करेंगे।
कृष्ण कहते हैं कि मैं उनके लिए खत लिखूंगा। कृष्ण खत लिखते हैं, “पहले दिन क्या था, दूसरे दिन अलग-अलग प्रकार के व्यंजन थे… जिस दिन से मुझे स्मृति है कि मैं खा रहा हूँ, आपने मुझे जो व्यंजन खिलाए हैं वो सब मुझे आज तक याद हैं। आपने बड़े प्रेम से अन्न पकाया, मैं इसे कभी भूल नहीं सकता हूँ। मैं यहां पर बड़े ऐश्वर्य से बनाया हुआ व्यंजन खा रहा हूँ, पर मुझे आपका प्रेम से बनाया हुआ ही याद आ रहा है। आप ही मेरे असली पिता हैं।”
बलराम जी का आलिंगन करते हैं और नंद महाराज कहते हैं, “बलराम अभी कृष्ण नहीं है तो मेरे शरीर से मेरी जान ही चली गई है। मैं जानता हूँ कृष्ण हमसे कितना प्रेम करते हैं। कृष्ण हमसे विरह हो जाएगा तो वो सहन नहीं कर पाएगा। कृष्ण तुम्हारे साथ रहे, तुम ही सांत्वना देना।” बलराम जी और कृष्ण दौड़ते-दौड़ते जाते हैं और आलिंगन करते हैं। राज महल के अकेले कोने में जाते हैं और व्रजवासियों का स्मरण करते हैं।
रोहिणी और यशोदा का प्रेम
वसुदेव फिर एक संदेश भेजते हैं नंद महाराज को। तो जब यह संदेश रोहिणी को बताया जाता है तो रोहिणी कहती हैं, “यशोदा तुम ये विरह सहन नहीं कर पाओगी। वास्तव में हम दोनों एक के समान ही हैं।” यशोदा माई रोहिणी को आलिंगन करती हैं। रोहिणी कहती है कि, “मेरा दुर्भाग्य है कि मैं अभी कृष्ण को मेरी गोद में नहीं बिठा सकती हूँ। पर अगर तुम कृष्ण को तुम्हारी गोद में बिठा लोगी तो हम वास्तव में एक तरह से एक ही आत्मा हैं जो दो शरीर में जीती हैं।”
10 साल तक वो साथ में रहे हैं, उन्होंने कृष्ण बलराम की सेवा की है। उम्र में रोहिणी यशोदा माई से बड़ी थीं, वरिष्ठ थीं। बलराम जो रोहिणी के पुत्र थे वह कृष्ण से बड़े थे। यशोदा माई कहती हैं, “मैं तो कृष्ण का दर्शन नहीं कर सकती, कृष्ण की बात नहीं सुन सकती, मैं तो चाहती हूँ कि कृपया आप जाओ।” कृष्ण और बलराम के लिए उनके मनपसंद व्यंजन बहुत-बहुत बनाती हैं, नये-नये वस्त्र बनाती हैं। और बहुत सामग्री रोहिणी के साथ भेजती हैं।
एक तरह से क्या है, दो व्यक्ति एक शरीर में हैं। एक तो वो अभी राजा के सलाहकार के रूप में कार्य कर रहे हैं, उग्रसेन राजा हैं। तो यहां तो उनकी शक्ति और सामर्थ्य के भाव में हैं। और उसके साथ-साथ, जो वो छोटे बालक के रूप में हैं, 10 साल के बालक का जो भाव है, वो अभी कर ही रहे हैं। पहले रोहिणी को देखते हैं, तो छोटे बालक जैसी माँ को देखते हैं, तो दौड़ते-दौड़ते जाते हैं। रोहिणी के पैर जाके आलिंगन करते हैं। साड़ी को पकड़ लेते हैं। और वो कहते हैं, “आप आ गए, माँ आ गए।” रोहिणी कृष्ण बलराम को देखती हैं, उनके आँखों से आँसू आने लगते हैं।
मथुरावासियों को हमेशा भय होता है कि कृष्ण हमको छोड़कर वृंदावन वापस न चले जाएं। बाकी यदुवंश की जो रानियां होती हैं, वो कहती हैं, “ये रोहिणी ऐसे लगता है कि जब तुम वृंदावन में रह रही थी, तो वृंदावन वालों ने तुम्हें वृंदावन का माखन और दही खिला के अपने पक्ष का बना लिया है, इसलिए तुम अभी सब उनके पक्ष की बातें कर रही हो!”
सांदीपनि मुनि के आश्रम में शिक्षा
नंद महाराज अपने जासूस, संदेशवाहक भेजा करते हैं कि कृष्ण बलराम क्या कर रहे हैं, ठीक हैं या नहीं हैं। कृष्ण बलराम सोचते हैं कि अगर हम यहां पे वृंदावन से इतना पास में रहेंगे तो बार-बार वृंदावन जाने की इच्छा होगी। कृष्ण बलराम बातचीत करते हैं कि अगर हमें शिक्षा लेनी है तो हमारे गुरु कौन होने चाहिए? गर्ग मुनि बड़े महान पंडित हैं। पर सोचते हैं कि वास्तव में अगर हम उनके पास जाएंगे तो वो जानते हैं कि वास्तव में हम कौन हैं। इसलिए हम ऐसे गुरु के पास जाएंगे जो जानते नहीं हैं कि वास्तव में हम कौन हैं।
सांदीपनि मुनि शिव जी की बहुत अच्छी भक्ति करते हैं। तो जाएंगे हम वहां पे बाह्य रूप से हम उनकी शिक्षा लेंगे और अंतरंग रूप से सांदीपनि मुनि की शिव भक्ति का गान करेंगे।
वसुदेव देवकी कहते हैं, “हम बड़ा रथ आपके लिए बनाएंगे। रथ से आपको लेके जाएंगे। उनका आश्रम उज्जैन में है, मथुरा से उज्जैन काफी दूर है।” कृष्ण कहते हैं, “अभी हम ब्रह्मचारी का व्रत स्वीकार कर रहे हैं तो उसमें ब्रह्मचारी को तपस्या करनी चाहिए, इसलिए हम पैदल जाएंगे। अगर आप रथ में लेके जाएंगे हमें तो उनको पता चल जाएगा कि हम यदु वंश के हैं, वसुदेव के पुत्र हैं, तो वो हमको बहुत आदर देंगे, हमें ऐसा आदर नहीं चाहिए।”
वसुदेव को चिंता होती है कि अकेले जाओगे कोई खतरा आ जाएगा। कृष्ण कहते हैं कि, “अगर हमारे साथ में आप सैनिक भेजोगे तो उससे खतरा ज्यादा होगा, क्योंकि जरासंध को पता चल जाएगा, उसको बदला लेना है तो शायद वो सांदीपनि मुनि के आश्रम में आके आक्रमण कर देगा। अगर बलराम जी मेरे साथ में हैं, तो मेरे साथ दस लाख सैनिक हैं। हम दोनों की शक्ति जो है साथ में होगी, कोई हमारा सामना नहीं कर सकता है।”
सुदामा से मैत्री और वृंदावन की स्मृति
कृष्ण की वेणु का प्रवाह इतना अद्भुत है कि वेणु का प्रवाह जिस दिशा में होता है, सब लोग उसके विपरीत दिशा में आपकी ओर खिंचे आते हैं। बलराम जी का रूप क्या था? उनका मुखमंडल चंद्रमा के समान था, आँखें बिजली के समान थीं, बाल घने बादल के समान थे और शरीर से कांति सूर्य के समान निकल रही थी।
चलते-चलते यह पहुँचते हैं सांदीपनि के आश्रम में। सब ब्राह्मण देखते हैं कि इनके शरीर से इतनी ज्योतियां आ रही हैं। बचपन से यह मक्खन से खेल रहे हैं पर इनका शरीर कोमल है और साथ-साथ बड़े बलवान लगते हैं। आके प्रणाम करते हैं। कृष्ण कहते हैं कि यदुवंश का एक व्यक्ति है उसके हम संतान हैं। सांदीपनि मुनि सब समझ जाते हैं कौन हैं ये। कृष्ण बलराम 64 दिनों में सारी अलग-अलग प्रकार की कलाएं सीख लेते हैं।
जीव गोस्वामी बताते हैं कि वहां पर बहुत सब विद्यार्थी थे, तो सुदामा से कृष्ण की मैत्री क्यों बढ़ गई? क्योंकि वृंदावन में कृष्ण के एक सखा का नाम सुदामा है। ब्राह्मण बालक सुदामा के नाम से कृष्ण को वृंदावन के सुदामा की याद आती थी, इसलिए इस सुदामा से बहुत स्नेह करते थे।
शिक्षा ग्रहण करने के बाद अपने गुरु की सेवा करते थे और शाम को आश्रम में कृष्ण बलराम एक दूसरे को आलिंगन करते थे और व्रजवासियों का स्मरण करते थे। कृष्ण ने कहा था रोहिणी को कि आप व्रजवासियों को बताओ मत कि मैं इतना दूर जा रहा हूँ, क्योंकि व्रजवासियों की चिंता और बढ़ जाएगी। बलराम जी उस रोहिणी की चिंता को देखते हैं। कृष्ण बलराम बोलते हैं रोहिणी से कि, “मेरा एक विचार है, हम छुपके से वृंदावन जाके आ जाएं, हम छुपके से वृंदावन जायेंगे और किसी को पता भी नहीं चलेगा।”
वृंदावन से प्रस्थान और सांदीपनि मुनि के आश्रम की ओर
वो भी पर इच्छा होती है कि वृंदावन को पूरा बूझ जाएं। तो इसलिए वो जो संदेश वहाँ आते हैं, वो और कोई पूछते भी नहीं हैं, क्या पूछत कर रहे हैं। कृष्ण पुरू विश्वामित्र ये कृष्ण पुरू देते हैं, कृष्ण पुरू वासित करते चल जाते हैं और कृष्ण बलराम सोचते हैं कि अगर हम यहाँ पे वृंदावन से इतना पास में रहेंगे तो बार-बार वृंदावन जाने की इच्छा होगी है और सोचते हैं अब हम मथ्थुरा में रहते हैं तो मथ्थुरा में मेरे कर्तव्य हैं, पूरा करना चाहिए मथ्थुरा में उनके पास तालीम लेने की व्यवस्था होती है। कृष्ण बलराम जी बातचीत करते हैं कि अगर हमें शिक्षा लेनी है तो हमारे गुरु कौन होने चाहिए? तो गुरु कौन होने चाहिए? इसके बाद चर्चा कर रहे होते हैं श्रीकृष्ण तो बोलते हैं गर्गाचार्य बड़े महान वो बड़े पंडित हैं, वहाँ हमारे गुरु बन सकते हैं।
तो सोचते हैं कि वास्तव में बहुत नहीं सोचें, ये हम ही भगवान हैं तो हम अच्छे से समझ देख नहीं जाएंगे। तो इसलिए हम ऐसे गुरु के पास जाएंगे जो जानते नहीं हैं कि वास्तव में हम कौन हैं, जानते नहीं हैं।
पहुंचने हमें अच्छी दीक्षा देंगे। अगर तो सोचते हैं कि वैसे वैसे भी एक वैष्णव है। तो वैष्णव सिद्धांत पूरा जो वहाँ से शिव जी की भक्ति करता है, तो शिव जी उनको कृष्ण के ओर ले आते हैं। इसलिए ये संदीपनी मुनि ने शिव जी की बहुत अच्छी भक्ति की है। तो इसलिए जाएंगे हम वहाँ पे भाव रूप से हम उनका शिक्षण लेंगे और हम अंतरंग रूप से संदीपनी मुनि को शिव भक्ति का गान करते हैं। तो ऐसे भाव से बोलते हैं और वहाँ से दूर-दूर चले जाते हैं। और तो जाते हैं, हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे, हरे कृष्णा हरे कृष्णा कृष्णा कृष्णा हरे हरे, हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे, कृष्णा हरे कृष्णा हरे राम राम राम हरे हरे, कृष्णा हरे कृष्णा हरे राम राम…
हम सोचते हैं कि संदीपनी मुनि जो हैं, हम उन्हीं के पास जाएंगे। वासुदेव देव जी कहते हैं कि हम बड़ा रथ आपके लिए बनाएंगे। रथ से आपको लेके जाएंगे।
उज्जैन की यात्रा और सांदीपनी मुनि के आश्रम में प्रवेश
तो जो उन्हीं का आश्रम है, वो उज्जैन भाग है वहाँ पे, तो मथुरा से उज्जैन काफ़ी दूर है। अच्छा रथ बनाएंगे, अभी हम ब्रह्मचारी का व्रत स्वीकार कर रहे हैं तो उसमें ब्रह्मचारी का तपस्या करना चाहिए, इसलिए हम पैदल जाएंगे। और वो कहते हैं कि इतना ही नहीं हम नहीं चाहते कि अगर आप रथ में लेके जाएंगे हमें तो उनको पता चल जाएगा कि हम ये दूर अंश पे आए हैं, नाम के पुत्र हैं, तो वो हमको बहुत आदर देंगे, हमें ऐसा आदर नहीं चाहिए, हम अपने एक शिष्य के रूप में नहीं चाहते हैं, तो इसलिए हम पैदल जाएंगे, तो उसे जो चिंता होती है कि अगर आप पैदल जाओगे तो इतना तो पैदल जाओगे, वो कहते हैं कि नहीं-नहीं हम ड्रम में से थो हम खेल से थो हम बहुत जाते हैं, आप चिंता मत करो। अगर आप अकेले जाओगे कोई खतरा आ जाएगा, लेकिन वास्तव में कहते हैं कि अब कृष्णा कहते हैं कि अगर हमारे साथ में अगर आप गार्ड भेजोगे, सैनिक भेजोगे तो उससे खतरा आ जाएगा, क्यों? उससे पता चल जाएगा, और फिर जरासंध है उनको पता चल जाएगा, उसको पता चल जाएगा तो शायद वो संदीपनी मुनि के आश्रम में आके आक्रमण कर देगा, तो इसलिए चाहते हैं कि हम अकेले जाएंगे, तो तुम्हारा संरक्षण कौन करेगा? कृष्णा कहते हैं कि अगर बलराम जी मेरे साथ में हैं, तो मेरे साथ दस लाख सैनिक हैं, और अगर बलराम जी मेरे साथ में हैं, तो मेरे साथ वो एक करोड़ सैनिक है। तुम्हारा कृष्णा कहते हैं कि हम दोनों की शक्ति जो है साथ में होगी, कोई हमारा सामना नहीं कर सकता है, और बलराम जी इस चक्कर से वो बलराम जी के साथ चलने लगते हैं, और जो जा रहे होते हैं बलराम जी के साथ, तो फिर वो वृंदावन से अभी दूर जा रहे हैं, तो इतना दूर जा रहे हैं, वृंदावन की स्थिति और दूर हो रही है।
वेणु की मधुरता और बलराम का स्वरूप
जी को सब रखाते हैं, कि भगवान कृष्ण की बारे में सब चीज़ जो होती है, वो भी लक्षण होती है, कि भगवान कृष्ण की वेणु जो है, उसकी क्या मधुरता है, उसकी विशिष्टता क्या है? वेणु से ध्वनि आती है, ध्वनि की ध्वनि होती है, वह ध्वनि का प्रवाह उसकी विशिष्टता होता है जैसे नदी का प्रवाह होता है, पर आधार अंध्या कोई नदी का प्रवाह हो रहा है और नदी इस तरह से बह रही है, नदी का प्रवाह जिस दिशा में जा रहा है, उस दिशा में सब चीज़ सूची जा रही है, फल, फूल, डाली घिर गए, जिस दिशा में प्रवाह हो रहा है, उस दिशा में नदी के प्रवाह के दिशा में तो प्रवाह खुल, फूल डाली जाएंगे, पर कृष्णी, आपकी जो वेणु हैं, वेणु का प्रवाह इतना अद्भुत है, कि वेणु का प्रवाह जो दिशा में होता है, सब लोग उसके विपरीत दिशा में भित्तिघा देते हैं। वेणु एक दिशा में जाते थे प्रवाह पर सब लोग वेणु की प्रवाह आप से दूर जा रहा है और सब लोग उस प्रवाह से आप से उठु लगे हैं।
तो कृष्ण वृंदावन से दूर जा रहे हैं, और वृंदावन उनके और परिवार है, वृंदावन की स्थिति और बढ़ रहे हैं। बलदाऊ जी का रूप क्या था? बलराम जी का जो चेहरा था, वो एक बहुत बहुत चंद्रमा के समान था, उनकी जो आँखें थी, वो बिजली के समान थीं, उनके जो बाल थे, वो एक घने बादल के समान थे और कृष्ण का जो वर्ण का रंग है, वह बलराम जी के बालों के रंग है मतलब सावला और बलराम जी की शरीर थी पूर्ण, वो फसल के समान थे और बलराम जी की जो सारे शरीर से कांति निकल रही थी, वो एक सूर्य के समान थी यह। तो उनका चेहरा चंद्रमा के समान था और उनकी शरीर से कांति जो निकल रही थी, वह एक सूर्य के समान कांति निकल रही थी।
सांदीपनी मुनि की शिक्षा और सुदामा से मैत्री
और इस तरह से कृष्ण बलराम गाओ-गाओ चलते-चलते जाते हैं और ये पहुँचते हैं संदीपनी मुनि के आश्रम में। पहुँचते हैं तो संदीपनी मुनि अपने सारे शिष्यों के साथ बैठे हुए और सब ब्राह्मण यहाँ पहुँचते हैं और वो देखते हैं कि इनके शरीर से इतनी जोतियाँ आ रही हैं, कौन हैं यह दो व्यक्ति? और वो देखते हैं कि यह तो बड़े अजीब लग रहे हैं क्योंकि शरीर से जोतियाँ आ रही हैं, लगता है कि वे तो बड़े भावती महान हस्ती हैं और अगर देखते हैं तो इनका शरीर इतना कोमल लग रहा है तो लगता है कि बचपन से यह मक्खन से खेल रहे हैं पर इनका शरीर कोमल है और साथ-साथ कोमल होते ही बड़ा बलवान लगता है इनका शरीर और यह सफेद वर्ण का जो लिखती है इसका फांदर है देखके तो मेरा मन पूरा आपके शरीर कोमल नहीं है और फिर आखेल को प्रणाम करते हैं कि आप कौन हो?
प्रणाम लीला कृष्ण लीला करते हैं बलराम जी उनके सहयोगी के रूप में हैं पर कई बार कि बलराम जी बड़े लगती हैं तो कृष्ण बलराम जी को कई बार बोलने देते हैं तो जब ऐसे कोई औपचारिक भाव होता है तो सभी कृष्ण बलराम जी को हमेशा आदर देते हैं और उनको बोलने का मौका है तो कृष्ण भी आप कृष्ण बलराम जी साथ में आए हैं तो वो कहते हैं कि यदुवंश का एक व्यक्ति है उसके हम संतान हैं तो कौन है वो बताते नहीं हैं और फिर वो कहते हैं कि उसके पास एक बहुत बड़ा खजाना है वसु का अर्थ है खजाना, वसुदेव मतलब जो खजाने के समान दान देते हैं, नहीं का अर्थ है वसुदेव के पर एक अर्थ है वसु मतलब खजाना वसु वसु मना सच्य विष्णु पशु नाम में वसु ये एक विष्णु का भी नाम है तो वसुदेव तो फिर संदीपनी मुनि प्रसन्न हो जाते हैं कहते हैं आप सब समझ जाते हैं कौन है ये पर फिर वो होते हैं अभी आप विद्यार्थी हैं तो विद्यार्थी के रूप में आपको रहना चाहिए और फिर रहते हैं और कृष्ण बलराम कहते हैं कि तुम्हें अभी दीक्षा लेने जाएंगे नहाँ से यह दीक्षा लेने जाते हैं तो वो क्या होता है? बाकी सब विद्यार्थी के रूप में दीक्षा मांगते हैं तो थोड़ी-थोड़ी दीक्षा लेने जाएंगे और कृष्ण बलराम जाते हैं ताकि वो जीप लेते हैं और फिर 64 दिनों में सारी अलग-अलग प्रकार की कलाएँ सीख लेते हैं और फिर वहीं पर कृष्ण बलराम अनेक और संदीपनी संबंध बनाते हैं और इसकी बहुत लीलाएँ हैं और एक और संबंध नहाँ पर होता है गोपाल चंपू में सारी कृष्ण लीला है वो ब्रज भावों से बताई गई है तो जीव गोस्वामी बताते हैं कि वहाँ पर बहुत सब विद्यार्थी थे तो सुदामा से कृष्णा की मैत्री इसमें क्यों बढ़ गई? बाकी सब विद्यार्थियों से इसमें इसमें बृंदावन के भाव में थी बृजवासी को स्मरण करते थे और वहाँ पर उनको बृंदावन का स्मरण देने वाला एक ही व्यक्ति थे बलराम जी और कोई था ही नहीं पर एक और व्यक्ति था अभी कृष्णा का एक सखा है वृंदावन उसका नाम सुदामा तो कहते हैं ये जो ब्राह्मण बालक था सुदामा इसके नाम से कृष्णा को वृंदावन की याद आती थी, वृंदावन की याद आती थी इसलिए क्या होता है? सुदामा को बहुत स्नेह करते थे, उसका संबंध बहुत विशेष हो गए उसे कहते हैं कि पांडव जो पांडव थे उनमें से अगर हम धर्मनिष्ठता देखनी हैं तो युधिष्ठिर बहुत धर्मनिष्ठ थे तो कृष्णा को सबसे प्रिय अर्जुन क्यों थे? अर्जुन की सबसे प्रिय थे तो कहते हैं क्योंकि वृंदावन में कृष्णा के एक तक वृंदावन में कृष्णा के तक नाम युधिष्ठिर भी नकुल सहदेव नहीं है कि तक अर्जुन कृष्णा को ब्रजवासी है अर्जुन का रथ…
उद्धव का आगमन और वृंदावन की व्याकुलता
और शिक्षा ग्रहण करने के बाद अपने गुरु की सेवा करते हैं और शाम को आश्रम में आ गए वृंदावन हैं तो आश्रम में आ गए कृष्ण बलराम और कृष्ण बलराम एक दूसरे को आलिंगन करते हैं और ब्रजवासियों के प्रश्न करते हैं और इस तरह से अपने गुरु की पुत्र रोपना प्राप्ति करते हैं और वो लौट के आते हैं बिना मधुल्यारी पर ये लौट के आते हैं ये डिध्यवदेवभि मुखवरी से जा के रहते हैंथा थेreatinghesivedevdev yn डिध्यव ढिध्यार से लन रवूनी को पूछते हैं पर वो आपको देखते थे, आपको उन्हें भूलते थे, पर आप वहीं नहीं मिलते थे तो वो विश्मी जाते थे और चले जाते थे। वो बोलते थे क्या होगा। रुजवासियों को चिंता नहीं जाते थे, मैं कहाँ चला गया। कृष्णा ने कहा था रोहिणी को कि आप रुजवासियों को बताओ मत कि मैं इतना दूर जा रहा हूँ। क्योंकि अगर मैं इतना दूर जा रहा हूँ तो उस से क्या होगा? रुजवासियों की चिंता और बढ़ जा जाएँ। मैं कहता हूँ कहाँ करो, क्या कर रहा होगा।
तो वो दौड़े कि रुजवासियों की क्या दशा होगी यह पता नहीं है अभी। एक तो उनको पता नहीं है तो आप कहीं और गए हो, और तो आप मसुरां कहीं दिख ही नहीं रहे हो। तो क्या हुआ उनको पता नहीं है। प्रेकृष्णा खरीष्न पुछव कृष्ण अस्पाल मुल्द. ललिया कृष्णा अस्पल बलराम जी उस रोहिणी की चिंता को लेते हैं, उनकी चिंता और बढ़ जाती है। कृष्णा बलराम बोलते हैं रोहिणी से कि मेरा एक विचार है, हम दोनों चुपके से वृंदावन जाके आ जाएँ, हम चुपके वृंदावन जाएंगे और किसी को पता भी नहीं चलेंगे।
रोहिणी बोलते हैं मैं भी यही सोच रही हूँ, पर समस्या है, क्या समस्या है वो देखे वसुदेव और हमेशा आपको देखने के लिए आपको पता हो ना पता हो जाति आप क्यों देख रहे हैं और अगर आप रुम्रावन चले जाएंगे तो उससे दो बड़ी समस्या आ जाएगी एक तो वसुदेवदेव की भैवी जाएगी कि आप लौट के आएंगे कि नहीं और आप लौट के लिए आपको पता हो जाति आप…
उद्धव को दूत बनाकर भेजना और द्वारका की स्थापना
यह कोई व्यक्ति है जिसके पास अपने ही गले में चिंतामणी है पर वह भूल गया चिंतामणी को और सोचता है कुछ पैसा है कहीं मेरे पास पैसा है कहीं पैसा है कहीं मेरे पास पैसा है कहीं… तो कहते हैं मेरा एक पर्सन है क्यों समझता है, मेरा भाव समझता है और मैं इससे कैसे भूल गया है वो पर्सन को है, वो मेरे ऐश्वर्य को समझता है, मेरे माधुर्य को समझता है, मुझे अगर जंडान में किसी को भेजना है तो ऐसे पर्सन को भेजना चाहिए जो मेरे ऐश्वर्य और मेरे माधुरी को समझते हैं अगर वह फिर मेरे माधुरी को समझता है तो वह वाजवासियों के प्रेम को देखकर इतना उठ जाएगा कि वह वाजवासियों को सांत्वना भी दे पाएगा और अगर वह मेरे ऐश्वर्य को समझता है तो वो मेरे माधुरी को समझता है और ऐसा पर्सन कौन है और कृष्ण बलराम दोनों बात पर जाओगे आहा वह बहुनी बाच वो जाएगा थे यह बहुनी बाच और उद्धव को मानते हैं तो उद्धव से बात आ जाते हैं कृष्ण बलराम के एक उद्धव व विद्यां…
अंत्री जाखन करना आता जाता है तो कृष्णा क्या करते हैं? कृष्णा बलराम द्वारका में किला बना लेते हैं और सारे ब्रजवासियों को द्वारका में स्थानांतरित कर देंगे। पुर इसके बाद में जब वो द्वारका में रह रहे होते हैं तो नंदद्वारका में चले गए हैं कि वो द्वारका तो इतना दूर है। अभी हमें तो यहाँ पर आसान संदेश मिलता था कि उससे कहते हैं पर द्वारका में चले गए संदेश कैसे मिलेगा, इससे क्या करेंगे।
इससे जब उत्तर आ गए तो कहते हैं कि हम ऐसे करेंगे कि मैं दो हजार संदेश वाहक रखूंगा और वो हमेशा दो हजार संदेश वाहक रखे हैं, तो कहते हैं कि जिसमें संदेश वाहक होंगे, तो कि अंतर इतना दूर है, समय लग जाएगा, तो कहते हैं कि मैं आपको जिसमें संदेश वाहक है उसमें घोड़े लगाऊंगा। और घोड़े से आप जा सकते हैं। तो फिर जाओगे आप और संदेश जितने लंडान का संदेश लेगा और रुज्ञासी को मेरा संदेश लेगा।
रेवती का प्रसंग और बलराम विवाह
तो लगभग हर रोज द्वारका से तो संदेश वाहक आ रहा होता है, लंडान की द्वारका से संदेश वाहक आ रहा होता है, और संदेश हमें चल रहे हैं और एक बार तो उद्धारका, उद्धारका से इंतजार कर रहे हैं और वो देखते हैं तो संदेश वाहक आ ही नहीं रहा है, आ ही नहीं रहा है, आ ही नहीं रहा है, क्योंकि मेरे की समस्या तो नहीं आ गए, किसी ने आक्रमण तो नहीं कर दिया, क्या हो गई, तो अं देखिए, जब हम द्वारका में थे, तो वहाँ तो उत्सव चल रहा था, और उत्सव में हम देख रहे थे, सहभावियों और सभी, कुछ लोग दौड़ते-दौड़ते आ गए, और दौड़ते देखे, कृष्णा बलराम जी बहुत कृष्णा के पास आ गए, तो अगर वृक्ष है, इतना ऊंचा है, इतना ऊंचा है, एक पुरुष और एक स्त्री है, और ओरे कि वो कृष्णा आप से मिलना चाहते हैं, तो इससे सोचते हैं, तो ये जो समाचार होता है सारे द्वारकावासियों पर जाता है, सारे द्वारकावासियों उससे दौड़-दौड़ जाते हैं देखने के लिए और देखते हैं कौन देखते हैं देखते हैं उससे इतना ऊंचा लेती हैं संदेश वहाँ पढ़ा रहे हैं, हम भी वहाँ पढ़ा रहे हैं उनके पिछले जीवियों और हमने देखा कि इतना ऊंचा लेते हैं, हम सोचने लगते हैं इतना बड़ा होने कि इतने साल तभी जीविये होंगे हम सोचने लगते हैं बालक होता है बड़ा होता है बड़ा होता तुम्हें क्या होई, अभी जो ब्रजवासी है, उनको पढ़ा नहीं नहीं क्या चाहता है इतने ऊंचे-ऊंचे का लेक्टी है, तो वो नीचे झुकता है नीचे झुकता है आप कृष्णा के सामने प्रणाम करते हैं, कृष्णा के सामने के सामने प्रणाम करते हैं, कृष्ण मैंने यह पत्री थी रेवती नाम थी, वह इतनी कुलचामुपरंद ही तो मैंने देखा कि उसके लिए उचित कोई वर है ही नहीं, तो बारे राजाओं में कोई वर मिला उचित तो इसलिए मैं सोचा, उचित वर कैसे संनाथ है? तो इसलिए मैं सोचा कि मैं सीधा इस ब्रह्मांड में सबसे विद्वान व्यक्ति जो है वो है ब्रह्मांड। मैं ब्रह्मांड जी बाद जाऊंगा और उनको पूछूंगा कि मेरी पत्री है तो सोरिवाख किस्से करें। राजकुमारी के लिखे तो राजकुमार कौन है? तो मैं जो ब्रह्मांड जी के बाद जाया तो ब्रह्मांड जी वहाँ पे एक उत्तर उत्तर चल रहा था उत्तर देख रहे थे।
और उत्तर देख रहे थे वो मगन हो गया मैं उत्तर मगन हो गया। कुछी पलों तो वो उत्तर चला तो उत्तर चल खत्म हो गया। मैंने मेरा लिखे कि जिस समय में आप यहाँ पे आये, मेरा इंतजार कर रहे थे तो इस समय में आप चल जाओगे।
तो बुर्निया, पुत्री समय में इसमें किसने सारे पीरे चले गए। जो भी उचित बात थे वो सब चले गए। कोई है ही।
तो अभी तो पुत्री तो कलियुग आ गया है। कलियुग के पास ही आ गया है। बोलते अगर ऐसा है, तो फिर मैं क्या करूँ? बोलते हैं कि फिर भी तुम्हारी पुत्री है, उसके लिए एक वर बड़ा उचित है।
वो है बलराम जी। उनके पास जाओगा। बलराम जी, कलियुग की जो व्यक्ति है वो बहुत च वहाँ तो विष्णु ही है इस प्रथम में।
और उनकी शक्ति बहुत है, अब बड़ी अद्भुत है। तो जो छोटे कद के व्यक्ति है, एक भाई ने छोटे कद के व्यक्ति को बड़ा कर दिया। दूसरा भाई बड़े कद के व्यक्ति को छोटा कर दिया।
क्या छोटे कद के व्यक्ति को बड़ा कर दिया, कुप जाती, वो वक्रती, तो वो छोटे कद के व्यक्ति को बड़ा कर दिया, तो क्या कर दिया कृष्ण ने, क्योंकि तो व्यक्ति को बड़ा कर दिया। और दूसरा भाई बड़ा कर दिया, तो व्यक्ति को बड़ा कर दिया कि बलराम जी भी तो यहाँ पे आये नहीं है, तो फिर बड़े आदर-सम्मान के साथ कृष्णा ने उनको स्वागत करते हैं, रेवता रेवती को, और फिर वासुदेव देवती से बात करते हैं, और वासुदेव देवती से बात करते हैं, तो वो बोलते हैं हाँ ये उचित है, वो फ्यम प्रस्थाव लेके आए, तो वो स्वीकार करना चाहिए, तुर बलराम जी से कहते हैं लोग, कि आप विवाह करते हैं, अभी बलराम जी और कृष्णा इनकी योजना होती है, कि वास्तव में हम विवाह नहीं करने वाले, तो ब्रह्मचारी नहीं रहना चाहते हैं पर क्या होता है, अफलोते बहुत से अफलोते होते हैं, सब का वाद करने में बहुत समय लगने होते हैं, और वासुदेवा देवी कहते हैं कि आपको जरूर विवाह करना चाहिए, तो इसलिए आभी सोचते हैं कि बलराम जी आपके तो पुत्र कौन हैं, आप किसके पुत्र प्रि विवाह होने आतो उस दिन रात में यह ब्रेवत और रेवती जहाँ पर सोय होते हैं, वहाँ पर जाते हैं बलराम जी अपने जीव्वशक्ति से रेवती को चौड़ा करने हैं, तो उसके वाले द्वा हो जाता है, पर द्वा होने के पहले और सोचते हैं कि वास् तो अगर हमें द्वा करना है तो उनसे भी जात नहीं देते हैं, तो इसलिए पर इस संदेश वाग को भेज रहे होते हैं द्वारका से वृंदावन, और इस संदेश वाग को बता रहे होते हैं कि उन्होंने पुछा के लिए कृष्णा अभी बलराम जी द्वा करना जाते हैं तो नंदा महाराज सुनते हैं, नंदा महाराज कहते हैं, वो विचार में लग जाते हैं, तो सोचते हैं कि बलराम तो क्षत्रिय है, बहुतों जो क्षत्रिय स्वीदवाह करेंगे, अगर कृष्णा की स्वीदवाह करेंगे, जो सोचते हैं, अगर कृष्णा की वैश्य… बड़े भाई या बड़े भाई का जवाब तो पहले होना चाहिए, तो इस तरह से वो अपने-अपने जवाब करेंगे, तो कृष्णा की स्वीदवाह करेंगे, नंदा महाराज, नंदा महाराज, बलराम जी ने, जो कृष्णा, बलराम जी ने सोचते हैं, अपने जवाब करेंगे, बलराम जी ने जवाब करेंगे, बलराम जी ने जवाब ज़रूर हो जाते हैं, और फिर बलराम जी का इस तरह से बाद में जवाब हो जाता है, और फिर इस तरह से अनेक असुर का वाल होता है, पर बहुत से असुर और रहते हैं, तो बाद में बिला तो कृष्ण कहते हैं बाद समहा मैं हर पल में जवाब करेगा जब भाल्या की आ दाती है, और अगर संभव हो था तो बहुत पहले मैं जवाब करेगा जब भाला था, पर वास्तव है जब Bond ने जानबूझ कर पा रहा हूँ, क्योंकि वासुदेव देव की मुझे इजाजत नहीं ले रहे हैं तो नंदशोला ने बताया है कि वासुदेव के आदेश में आपको कुछ करना नहीं चाहिए।
उद्धव का वृंदावन जाना और ब्रजवासियों को सांत्वना
पर कृष्णा कहते हैं कि शायद वासुदेव आपको यरदे ले रहे हैं क्योंकि उनको आपके वृंदावन जाने का भाय नहीं जानते कि आप लौट के आ जाएं आप उन्हीं के पुत्र हैं और वो ये भी जानते हैं कि हम दोनों ज़्यादा बिरह में ले सकते हैं तो अगर आप में हो गया और मैं यहाँ पर हो गया है तो आप ज़रूर मेरे पास आपको आ जाएं जाते हैं तो इसलिए शायद वो आपको यरदे ले रहे हैं तो आप पूछ लो तो बलराम जी जाते हैं तो उससे कहते हैं कि मुझे वृंदावन की बहुत जाना है तो उससे कहते हैं कि अगर आपकी इच्छा है तो आप जा सकते हैं बलराम जी कहते हैं कि मैं कृष्ण को उड़ गया जाते हैं तो बलराम जी कहते हैं कि मैं कृष्ण को उड़ गया जाते हैं कि ऐसे करो आप जाओ वृंदावन और आप जाके क्या करो ब्रजवासियों के भाव की जानते हैं और आप उनको बताओ कि मैं जल्दी ही आने वाला हूँ जब आप जाओगे तो आपके हृदय में मैं आपके साथ जाओगे और आप मेरी सुती करो उनको लोगे तो उससे उ जानता नहीं मिलेगी तो मैं स्वयं वहाँ पर जाओगे और आप जब जा रहे हो तो आप ऐसे करो आप एक क्षत्रिय के लेख की मिलते हैं आप एक शिष्य की लेख की मिलते हैं जाओगे और फिरिश्न बलराम दोनों निकलते हैं और बारकार से बाहर लेते हैं फिर शमाशारी आप चली जा रहे हैं तो फिर वो शमाशारी कह लयवाराडं में आते हैं और कृष्ण बलराम जी के रथ को जाते हैं और किसार कृष्ण का रखे गेते हैं यह नहीं चाहते हैं।
ऐ बलगैराद हाम जी किसारण करते हैं अगर ब्रजवार्चित प्रस्मान करते हैं तो उनको आनंद होता है और उनका रथ इतना देख जी आता है विमान जिदे भी जो हवा की रफ्तार उस पे भी अधिक रफ्तार थी। और कुछी समय में द्वारका से वृंदावन पहुँच जाते हैं और वृंदावन के बाहर अपना रथ रखते हैं और फिर वहाँ पे जो एक गोपाल का गुरु का वेश धारण करते हैं और फिर वृंदावन में प्रवेश करते हैं। तो सभी जो बच्चन अनुसार इल्ला के उधर सारा स्परंज होता है एक नदी जब बार आ गई तो इतना तेज़ी से प्रवाह से जल पहुँच जाते हैं और सारी सुतियाँ उनके के इतना पहुँच जाते हैं। और वो दौर चलते बलराम जी आते हैं तो सारे ब्रजवासी देखते हैं बलराम जी आते हैं बलराम जी आते हैं बड़े आहाँ जी आते हैं और वो जाके दौर चलते बलराम महाराज विश्णा भाई को हंडिज देते हैं बलराम महाराज विश्णा भाई दौर आप ही हमारे पिता हो आप ही हमारी माता हो और मैं माता-पिता के विधर में इतना समय गुजार रहा हूँ आज मैं विधर को अलिजन करता हूँ और वो अलिजन करते हैं और अपनी आँखों से आश्व परमानों बार आयाती हूँ महाराज विश्णा महाराज वो पूछते ये कृष्ण कहते हैं ये दो अंश कहते हैं और सारा जो उत्माचारी में देखते हैं तो महाराज कहते हैं कि एकी दिन जो है कृष्ण के विधर में हम सहें नहीं करता हो रहे हैं कहते हैं अभी और कितने असुर बच्चे हैं तब कृष्ण आएंगे कहते हैं बहुत असुर को कृष्ण महाराज आएँ फिर भी अभितर छह असुर बच्चे हैं शाल्व हैं जरासंद हैं शिशुपाल हैं तंतवक्र हैं पलिनदराजा हैं इसे छह असुर बच्चे हैं कृष्णा ज़रूर आ जाएंगे।
फिर दो महीने के लिए जो वृंदावन में बलराम जी रहते हैं इसके लिए बलराम जी रहते हैं यह सारे ब्रजवासियों को अपने सुभे अपने महारे शमाले धर्मे रहते हैं और दिल में वो अलग अलग ज़रूर के लि तो इन सबको जो विरह की अग्नि है सांत्वना देते हैं और कृष्णा ज़रूर बलराम जी की बताते हैं जिसकासे ब्रजवासी हैं वो मेरे ब्रजवासियों के लिए बहुत विश्मित हैं पुरुपया आप उनको सांत्वना देते हैं और कृष्णा ज़रूर के लि वैसे गोपियों के साथ आप ब्रजवासियों चाहिएँ जिससे उनकी जो विरह की अग्नि है कम हो जा जा जा जा जा जा जा जा जा जा जा जा जा जा जा जा जा जा जा क्योंकि वास्तव में मैं तो तुम्हारी स्तुति है उसकी किमराबुति तो मैं नहीं कर सकता और तुम नहीं जा सकते तो जो मैं कर सकता हूँ अपने जन्दरी में तो भी गोपिया कहती है ना आ गए बहुत अच्छा है तो बोलते हैं कि कृष्णा क्या तो याद करते हैं तो भी हमें याद करते हैं तो गोपिया कहने लगते हैं वास्तव में कृष्णा में क्या याद करते हैं तो वो भी शेहर के लिए बन गया है हमको हम पता है कृष्णा कहने लगते हैं तो वास्तव में नहीं आएंगे तो जानते हैं कि हे गोपिया तुम मुझे जानते हैं और मैं कृष्णा को जानता हूँ मैं तुम्हारे विरह में जानता हूँ मैं कृष्णा के विरह में जानता हूँ और मैं जानता हूँ कि कृष्णा आप के बारे में बात की बिना रहते हैं तो हमें विश्व कृष्णों को छोड़ते हैं और इसलिए कृष्णा में भी आपको सौलता जाने के विश्व को छोड़ते हैं और वास्तव में भी इसलिए कृष्णा में मुझे भी देखना है वास्तव में मैं कृ प्रपार्छ कृष्ण आप जानते हैं कि तुम किए किस pacematics में विश्व को कोड़े हैं और इसस्त वास्तव में तुम किरस्टिक विश्वास को कुढेते हैं कृष्णा आएगी आने, तो तुम दिश्वास कर किरें, मुझे भन्देशवास करें के लिए जाया है, कृष्णा ज़रूरी आएगी आएगी।
उद्धव का संदेश और द्वारका की ओर वापसी
प्रणदेश में क्या ज्या हुई? कि मैंने ये तुम्हें जरूर संशय हो रहा हो एकि मैं आउगा कुछ नहीं है, पर मैं जरूर जूर जूर से हूँगा।
मैं, मेरे वचेंदे कभी जूते नहीं रुषते हैं पर भले ही मेरे वचेंदे जूते हो जाएंगे, पर मेरे यह महान भक्त है उद्धव, उद्धव के वचेंदे को पड़ में जूता होने नहीं हैं। उद्धव मेरे इतने घनिष्ठ भक्त हैं, उन्होंने आपको संदेश दिया है, उन्होंने देहोर आया है कि तुम्हें ज़रूर लोक्षे आये हैं। और फिर भी जड़ाको सांत्वना नहीं मिल रही है, तो मैं आपको बताता हूँ, कि बलराम जी जो है, बलराम जी है तो म आप रुपया होता मत खोले, शुधा मत खोले, इंतजार के लिए ज़रूर आऊंगा, तभी हमें नहीं वीशा आपके आज करता हूँ। आपको संशय हो रहा होगा कि मैंने यहाँ पे द्वारका की रानियों से विवाह क्यों कर लिया है? मैं रानियों से विवाह कर लिया इसलिए आप सोचते हैं कि जाएं मैं यहीं पर रहने वाला हूँ। पर नहीं। पर अस्तो मैं एक बार्काफ की रानियों से इसलिए विवाह किया क्योंकि वो मुझे आपकी आग दिलाती है। कि आपका जो जुती इतनी जुती होती है कि हर जड़ों के आप ही देखते हैं। जब बार्काफ की रानियों से विवाह कर लो तो मैं वो रानियों को नहीं देख रहा हूँ। मैं आप ही तो देख रहा हूँ। और ज़रूर मैं आपके हाँ पिलाव के आऊंगा भी दे कुछ गोपिया हैं बलराम जी की गोपिया हैं।
और फिर बलराम जी का करते हैं जो इस तरह से भूलिक क्षेत्र में जो कृष्ण बलराम ने रासलीला की थी। कृष्ण ने रासलीला की थी जो बलवानी में रासलीला की थी। कृष्ण की गोपिया है कुछ बलराम ने रासलीला की थी। और वहाँ देखकर जो कृष्ण की गोपिया हैं इससे देखकर जो कृष्ण की गोपिया हैं। और वहाँ बलराम जी की कृष्ण ने रासलीला की थी। और फिर कृष्ण जी बलराम जी ने कहा होता है कि वास्तव में आपकी जो गोपिया हैं और अभी आपने उनको भी विरह में वो आपसे फिरिथ है अभी आपसे पुनः मिलन हो रहा है तो फिर आप उनको पुनः विरह में मत डालें तो इसलिए आप उन गोपियों को सुखाने करें। तो फिर बलराम जी कहता है कि ये संदेश भिन्दमहराज के परिश् बलराम जी का उनकी गोपियों से विवाह हो जाता है तो फिर बलराम जी कहते हैं कि कृष्ण नहीं है इसलिए वे ज्यादा कुछ बड़ा उत्सव नहीं करने थोड़ा सा उत्सव नहीं करते हैं तो फिर बलराम जी अपनी गोपियों से विवाह करते हैं और फिर इसके बाद में कृष्ण जो होते हैं शिशुपाल का वध करते हैं फिर बंतवक्र सा वध करने के लिए बंतवक्र जो होता है मथुरा के पास में आया होते हैं और फिर महाकुमर बंतवक्र के सा वध करने के लिए मथुरा के पास में आते हैं और बंतवक्र वध करने के बाद वही रखने के कृष्ण जो होते हैं वृंदावन में आते हैं और उनका जो पुनर्मिलन जो है ब्रजवासियों का वृंदावन में पुराना एक प्रस्ताव के लिए वृंदावन में आते हैं तो यह भक्ति के भाव है जोहाँ इतना दिव्य है तभी कृष्ण का वपासिद्वान आता है कृष्ण का सारे ब्रजवासी पुनः मुझसे बिरा सहन नहीं कर पाएगे तो उन्हें क्या करेंगे दारुक होता है दारुक तो उनका सारथी होता है उसकी साथ वो रथ में आये हैं तो ब्रजवासी कहते हैं हमेशा उनको डर लगा रहता है कि दारुक को देखते हैं रथ को देखते कुछ ब्रजवासी को सेखी हम क्या करेंगे…
और यमुना के तट पर रथ का विशाल होना और भगवान का धाम प्रस्थान
विजवासी की धो्रे, उनको इतना प्रेम करेंगे, धोड़य हम को सोचना जाएगे तो तो गोड़ने जाएगे तो आया वीको दारोम देखते हैं कि ही वुजवाकि है, कि ये मेरे गोरे हैं, मेरे खांगे हैं, कि राजा का मतलब values के मेरे ghore hain, mere cuttings gare Fei, और मैं के गोरेमे के सेवा नहीं करता कभी दोनों द्वारका इसे भिल्डा हो जाते हैं, और वे साथ जो इसी रथ पे लेते हैं, और जो रथ होता है बहुत विशाल बन जाता है, इतना विशाल बन जाता है कि न केवल इसी रथ में कृष्ण, बलराम उद्धव बहुत जाते हैं, कि सारे ब्रजवासी जाते हैं, सारे गोपी आ जाते हैं, सारे गहीं आ जाते हैं, और विशाल बन जाते हैं, फिर वो रथ जो होता है, रथ के दारुक, कहते हैं कि दारुक, रथ को अपने जेलें, वो रथ निकलता है विशाल बन जाता है, यमुना के तट पे आता है, और ये लोग देख रहे होते हैं, कि मान लीजिए एक समय वो यमुना के तट पे था, और दूसरे समय यमुना को पार करते हैं, तो विशाल बन जाते हैं, और ये रथ के साथ, और ये ब्रजवासी के साथ, कृष्ण, बलराम, उद्धव, पीछे, आध्यातिं जो अपने बोलो धाम नहीं हो जाते हैं तो इस तरहते विश्ण भगवुद्धाम के लिए आते हैं, और फिरिष्ण और बलराम अपने एक इस्तार करते हैं, फिरिष्ण बलराम उद्धव और दारुक जो हैं वखोना द्वारका लोके आते हैं, अपने अभीले में आते हैं, इस तरह से बलराम भगव भगवान ही है तो भगवान के सल मिलाओं भावसे अनपरंद भी प्रहबाभी होते हैं, और भगवान का जो वृंदावन का श्वर्ज वृंदावन का धभाव है, इसमें वो हमेशा भगवान पिछना था जैसे जो बलराम जी है वहाँ जुरू करती हैं, वहाँ वास्तव हैं जीवात्मा हैं उनको भगवान के पिना में दाते हैं, तो श्रिया प्रहुपात जी जो हमारे गुरु हैं वह बलराम जी के पिना में दाते हैं, और जिस तरह से बलराम जी ब्रजवासियों और कृष्ण जी जी…
इसमें बढ़िया आ सकती है, पर भौतिक परलोभनों को संघर्ष करने के लिए हमें बल चाहिए, तो वो जो बल है वो बलराम जी परलोभना करती है, और सिर्फ हम संघर्ष जिंदगी बढ़ नहीं कर सकती है, हम नहीं नहीं नहीं परलोभनों किस्मां बल, भौतिक आ सकती है, बलराम जी क्या करते हैं, हमारे भौतिक परलोभनों के संघर्ष करने के लिए हमें बल देते हैं, और भक्ती कार्यों में आनंद उठाने में राम लेते हैं, बलराम जी की दो आशीर्वाद हैं, तो बलराम जी की आशीर्वाद के हम भौतिक परलोभनों के लिए अन राम राम महा बाहो मा जाने तव विक्रमं मा जाने तव विक्रमं इथाईक एकामशेन विजुत्या जगती जगता पते शुबर्गाम जी की शुबर्गाम जी आवेधा महा महसुत्र की शुबर्गाम जी आवेधा महा महसुत्र की शुबर्गाम जी आवेधा महा महसुत्र की शुबर्गाम जी आवेधा महा महसुत्र की शुबर्गाम जी आवेधा महसुत्र की शुबर्गाम जी आवेधा महसुत्र की