How can we act at the level that we are not our bodies – Hindi?
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Lecture Summary
आत्मा और शरीर का व्यावहारिक संतुलन: यह जानना कि “मैं शरीर नहीं, आत्मा हूँ” सैद्धांतिक रूप से सही है, लेकिन व्यावहारिक जीवन में हम शरीर की ज़रूरतों और सामाजिक ज़िम्मेदारियों को पूरी तरह नकार नहीं सकते। हमें शरीर और आत्मा, दोनों की ज़रूरतों का ध्यान रखना चाहिए।
भगवद् गीता का दृष्टांत: भगवान कृष्ण अर्जुन को आत्मा का ज्ञान देते हैं, लेकिन साथ ही उसे ‘कौन्तेय’ और ‘भारत’ (जो कि शारीरिक संबंध हैं) कहकर सम्बोधित करते हैं। इसका उद्देश्य अर्जुन को उसके सांसारिक और पारिवारिक कर्तव्यों का बोध कराकर उसे कर्म करने के लिए प्रेरित करना था।
भौतिक पहचान का भक्ति में उपयोग: श्रील प्रभुपाद जी ने अपने शिष्यों की भौतिक पहचान (जैसे- ‘अमेरिकी बड़े काम करते हैं’ या ‘भारतीयों को गीता सिखानी चाहिए’) का उपयोग उन्हें उत्साहपूर्वक भक्ति और बड़े कार्यों में लगाने के लिए किया।
अपनी प्रवृत्तियों का सदुपयोग: वर्णाश्रम व्यवस्था (ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि) और हमारी व्यक्तिगत रुचियाँ (जैसे संगीत, सजावट) आत्मा की नहीं, बल्कि शरीर और मन की प्रवृत्तियाँ हैं। हमें इन्हें त्यागने के बजाय भगवान की सेवा (भक्ति) में लगाना चाहिए।
निष्कर्ष: हमें शरीर की उन इच्छाओं और वासनाओं पर नियंत्रण करना है जो भक्ति के विरुद्ध हैं, लेकिन अपनी भौतिक पहचान और व्यावहारिक बुद्धि को पूरी तरह नहीं ठुकराना है। जैसे-जैसे आत्म-साक्षात्कार बढ़ता है, हम स्वाभाविक रूप से यह समझने लगते हैं कि हम वास्तव में शरीर नहीं, आत्मा हैं।
Full Transcription
तत्त्वज्ञान और व्यावहारिक जीवन का संतुलन
तो जब हम तत्त्वज्ञान जानते हैं कि मैं शरीर नहीं हूँ, आत्मा हूँ, पर उस पर अमल करना बड़ा मुश्किल होता है। सारे रिश्ते जो एक टेम्परेरी (अस्थायी) हैं, समझ सकते हैं। मैं शरीर नहीं हूँ, मैं आत्मा हूँ, ये तत्त्वज्ञान के रूप में महत्वपूर्ण है, पर व्यावहारिक रूप से कार्य हम इस पर नहीं कर सकते हैं। वास्तव में हम कार्य कर सकते हैं, मैं शरीर नहीं हूँ, मैं इस शरीर में हूँ, और मैं शरीर की ज़रूरतों को ठुकरा नहीं सकता। मेरे शरीर की ज़रूरतें हैं, पर मेरा सारा जीवन शरीर की ज़रूरतों को पूरा करने में नहीं लगा सकता। मेरा मन भी है, मेरी आत्मा भी है, आत्मा की ज़रूरतें हैं। तो उसके स्तर पर मुझे कार्य करना है, उसकी ज़रूरतों को भी पूरा करना है।
भगवद् गीता में शरीर और आत्मा का वर्णन
अभी देखिये, भगवद् गीता के दूसरे अध्याय के 13वें श्लोक में, भगवान बताते हैं अर्जुन को, कि तुम शरीर नहीं हो, आत्मा हो। पर उसके ही अगले श्लोक में, जब वो अर्जुन को सम्बोधित करते हैं:
“मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः।
आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत॥”
दूसरे श्लोक में ही, भगवान अर्जुन को दो नामों से सम्बोधित कर रहे हैं, एक है ‘भारत’, और दूसरा है ‘कौन्तेय’, और दोनों नाम शरीर से संबंधित हैं। अगर अर्जुन शरीर नहीं है, आत्मा है, तो फिर वो कुन्ती के पुत्र कैसे हो सकते हैं? वो शरीर का सम्बन्ध है। भरत वंश में आया है, तो वो भी शरीर का ही सम्बन्ध है। तो इसका मतलब क्या है? प्रभुपाद जी तात्पर्य में लिखते हैं, कि जो हमारे भौतिक सम्बन्ध हैं, उसी के लिए हमारी ज़िम्मेदारी होती है, और उस ज़िम्मेदारी के अनुसार हम कार्य कर सकते हैं। तो भगवान अर्जुन से कह रहे हैं, कि अर्जुन, शरीर पर ऊपर-नीचे होता रहता है, उसको सहन करना मुश्किल है, पर तू एक महान कुन्ती के पुत्र हो, इसीलिए तुम ये कर सकते हो। तुम एक महान वंश में जन्मे हो, इसीलिए तुम ये कर सकते हो। तो इसका मतलब क्या है? उसको व्यावहारिक रूप से हम ठुकरा नहीं देते हैं, उसको हम व्यावहारिक रूप से इस्तेमाल करते हैं आध्यात्मिक प्रगति करने के लिए।
व्यावहारिक पहचान का भक्ति में उपयोग
प्रभुपाद जी जब भारत में आये थे, अमेरिकी भक्तों को लेके, शिष्यों को लेके, तो वो प्रभुपाद जी, अभी तत्त्वज्ञान में हर बार बताते थे कि आप शरीर नहीं हैं, आत्मा हैं। पर जब उनको दिल्ली में, बॉम्बे में एक बड़ा प्रोग्राम करना था, बहुत विशाल प्रोग्राम था, तो भक्तों को लगा, “हमारे पास तो हम इसमें कम हैं, हमारे कुछ resources नहीं हैं, हम कैसे करेंगे?” प्रभुपाद जी बोले, “आप सब अमेरिकी लोग हो, सारी दुनिया के लोग बोलते हैं अमेरिकी बहुत बड़े हैं, तो तुम दिखाओ कैसे अमेरिकी लोग बड़े हैं, तुम कुछ बड़ा करके दिखाओ।”
तो अगर हम शरीर नहीं हैं, आत्मा हैं, तो वह अमेरिकी कहाँ है? पर क्या है, ये व्यावहारिक स्तर पर अमेरिकी, ये तो शारीरिक पहचान है। तो प्रभुपाद जी क्या कर रहे हैं? वह अमेरिकी की पहचान के द्वारा उनको भक्ति में लगा रहे हैं।
वर्णाश्रम और शारीरिक प्रवृत्तियों का सदुपयोग
उसके बाद मैं जुहू मंदिर के वहां पर, जब बन रहा था, तो वहां पर कुछ लोग आये थे। भारतीय लोगों को प्रभुपाद जी कह रहे थे, “आप यह सीखो, आप यह सिखाओ।” अभी भगवद् गीता का संदेश है कि हम शरीर नहीं, आत्मा हैं, तो हम भारतीय भी नहीं हैं। पर अगर मैं भारतीय हूँ, यह पहचान मुझे भक्ति के मार्ग में लगने के लिए, भगवद् गीता का अध्ययन करने के लिए अनुकूल है, तो मैं उसको स्वीकार करता हूँ।
तो इसलिए हमारी पूरी वर्णाश्रम की पद्धति है – ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र। अभी कौन? आत्मा, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र नहीं है। पर यह शरीर की पहचान, हम हमारी भक्ति के अनुकूल बनाते हैं। तो अभी मेरे शरीर की यह प्रवृत्ति है, कि मुझे यह चीज़ अच्छी लगती है, तो यह मुझे गाना अच्छा लगता है, तो मैं संगीत सीखके, कीर्तन करके, मुझे डेकोरेशन अच्छा लगता है, तो मैं डेकोरेशन… यह किसकी प्रवृत्ति है? शरीर और मन की प्रवृत्ति है। पर मैं इसको भगवान की सेवा में इस्तेमाल करता हूँ।
आत्म-साक्षात्कार और व्यावहारिक बुद्धि
तो हमारे मन और शरीर में, शरीर की कुछ ऐसी माँगें होती हैं, जो भक्ति के प्रतिकूल होती हैं, कुछ वासनाएँ होती हैं, तो उसको हमें नियंत्रण करना है। पर पूरे शरीर को हमें, शरीर की पहचान को, उसको ठुकरा नहीं देना है व्यावहारिक बुद्धि में। तो कुछ चीज़ें हैं, जो हम इस तरह से करने लगते हैं धीरे-धीरे। तो आध्यात्मिक साक्षात्कार जब बढ़ता है, तो फिर हम “मैं शरीर नहीं, आत्मा हूँ”, इस साक्षात्कार के साथ रहते हैं।