How do we understand Prabhupada’s statement that most of my disciples will go to heaven – Hindi?
Answer Podcast
Disclaimer: This transcript was generated using AI and may contain occasional errors or inaccuracies.
Lecture Summary
प्रभुपादजी के उस कथन का संदर्भ (Context) समझना अत्यंत आवश्यक है, जिसमें उन्होंने कहा था कि उनके अधिकांश शिष्य स्वर्ग या बैकुंठ नहीं जाएंगे। इसके मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
- प्रभुपादजी के वचनों का संदर्भ (Context): प्रभुपादजी कभी-कभी किसी विशेष परिस्थिति में अपनी बात पर जोर देने के लिए (रेटॉरिकल तरीके से) तीव्र शब्दों का प्रयोग करते थे। उनके बयानों को केवल एक ही जगह के आधार पर सार्वभौमिक या अंतिम सत्य नहीं मान लेना चाहिए, क्योंकि वे अलग-अलग परिस्थितियों में अलग-अलग दृष्टिकोण से निर्देश देते थे।
- हर्मेन्यूटिक्स (अर्थ-मीमांसा) का सिद्धांत: इस्कॉन के शास्वत सलाहकार परिषद (Shastric Advisory Council) में इस बात पर चर्चा होती है कि प्रभुपादजी के वचनों का अध्ययन ‘हर्मेन्यूटिक्स’ के दृष्टिकोण से करना चाहिए। यानी किसी एक बयान को अंतिम सत्य मानने के बजाय उनके सभी वचनों और शास्त्रों के शाश्वत (Eternal) और प्रासंगिक (Situational) संदेशों को समझना चाहिए। इसका एक उदाहरण चैतन्य महाप्रभु द्वारा अलग-अलग भक्तों को उनकी स्थिति के अनुसार अलग-अलग उपदेश देना है।
- भक्ति में गंभीरता और शुद्ध इच्छा: प्रभुपादजी का ऐसा कहने का उद्देश्य भक्तों को भक्ति के प्रति गंभीर बनाना था। भगवतधाम प्राप्ति के लिए भगवान कृष्ण के प्रति हमारी इच्छा सबसे प्रबल होनी चाहिए। यदि हम पूरी गंभीरता से भक्ति नहीं करेंगे और भगवान के प्रति आकर्षण विकसित नहीं होगा, तो संसार के प्रति आकर्षण बना रहेगा।
- निष्कर्ष: इसका अर्थ यह नहीं है कि सभी भक्त भगवतधाम नहीं जाएंगे; बल्कि इसका उद्देश्य भक्तों को अपनी चेतना को उन्नत करने और अधिक निष्ठा व गंभीरता के साथ भक्ति करने के लिए प्रेरित करना था।
Full Transcription
प्रभुपादजी के कथनों का संदर्भ और हर्मेन्यूटिक्स
और फिर प्रहुपाज्जी ने कहा है कि मेरे अधिकान शीशे जो स्वागत में जायेगे। देखिए प्रहुपाज्जी ने कई चीजे एक संधर्व में कहते हैं वो। और वो उसको हमें संधर्व के बिनाओं नहीं देखना है। यह क्या है कि नहीं तो फिर हम एक परिस्थि में जो चीज बताएगे उसको हम उनिवर्सलाइज कर देखें। उसको हम एक परंसत्यक अस्थान देखें। तो कभी-कभी प्रहुपाज्जी ऐसे चीजे बोला करते थे जो की रेटॉरिकल थी, जो उस परिस्थि में जोर देने के लिए बता रहे थे। तो हमें ये संधर्व ज़रूर देखना है।
संदर्भ और उपदेशों की भिन्नता
तो नामें एक परभाद था ऐसे की, प्रभाजी को आखे बताया कि जो भक्त है, साब पूर्वाचायर की किताब पढ़ रहे हैं, रस्थिक किताब जो पढ़ रहे हैं, प्रभाजी नाराज हो गए। प्रभाजी मोले, ये ऐसे किताब पढ़ेगे तो उनका राधा-कृष्ण चंत्र-मेला की किताब पढ़ेगे तो उनका मनदुशी हो जाएगा, तो नहीं पढ़ना चाहिए। मैंने कहा, ऐसे किताबों को इसे दूर रखना चाहिए, ऐसे किताबों जला दो।
तो फिर वो भक्त ने क्या किया, तो प्रभाजी नाराज हो गये थे, नाराज नहीं मैं उन्हें बोता, तो फिर वो भक्त ने क्या किया, साथ भक्त ने किया, इसके बाद ये किताबे तो सब ले के आए, और विंदान मंदर के बाहर में एक होली जैसे अगरी बना दी, और सब वो ग्रंत उसमें ढालने लगे। तो दूसरे बक्त आ गया, प्रभुपाद जी, ये सब आचार के किताब जिला नहीं हो, क्या बखवास है, क्यों जला रहे हो, मैंने कब कहा प्रभुपाद जी, तो क्या है, यहांपे प्रभुपाद जी का भाव था, आचार, प्रभुपाद जी बोले, आचार के जो ग्रंत है, उसमें तो पूझा कर दिया है, उसमें जला नहीं है आपको, तो क्या है, क्या प्रभापाद की बोलने की पढ़ना थी थी, प्रभुपाद जी, जब एक point बोलते थे, तो वो बहुत जोर से बोलते थे, तो अभी उसी चीज का एक दुसरा दुष्टी कों भी हो सकता है, और प्रभुपाद जी ने दुसरा दुष्टी कों भी दिया है, पर वो दुसरे जगह पर देते है।
प्रभुपाद हर्मेन्यूटिक्स और शाश्वत संदेश
तो प्रभुपाद जी, तो इसलिए, अभी मैं स्क्वान के शास्त्रिक गडवाजरी काउनल्सल का एक member हूँ, तो हम अभी एक विशय भी जर्चा कर रहे है, कि प्रभुपाद जी, प्रभुपाद हर्मेन्यूटिक्स, हर्मेन्यूटिक्स मतलब प्रभुपाद जी के वच सिर्फ एक विधान नहीं देखना चाहिए, एक विधान देखे गए, तो हम क्या होगा, हमको लगे यही सत्य है, पर प्रभुपाद जी ने कई जगबाई अलग-अलग शीजे कही है, तो जो शास्तर का सिद्धान होता है, जो एक स्थाई शाश्वत संदेश है, और एक पारस्थतिक संदेश है, तो वही स्थाई संदेश है।
जैसे अच्छा उधारान आता है कि चेतनि महाप्रों के तीन अलग-अलग शीजे थे, तो तीन अलग-अलग भक्ते को तीनों को अलग-अलग बुनों ने उपदेश दिया, एक को बोला कि तुम सन्यासी बन जाओ, तुसरे को बोला कि तुम एक ब्रह्मचारी रहो, वे ग्रहों के पुजा करो, पुजारी बना वे ग्रहों के पुजा करो, तुसरे को बताए, तुम जाकर घर जाओ, विवहा करो और परिवार, परिवार के ज़ंबिदारी संभारों, तो तीनों पुरावानिक भक्ते, पर तीनों को अलग-अलग ब…
भक्ति में गंभीरता और भगवान की इच्छा
वो हम इस अंदर-बदर देखेंगे, तो हम पढ़ा लेगा कि शायद भक्ते बहुत दिली बदल से भक्ती कर रहे होगे, गंभीरता से भक्ती नहीं कर रहे होगे, तो पुरावाजी बदा रहे है कि अगर इस तरह से आप भक्ती करोगे, तो फिर आप, आप भगवतधाम नहीं प्राप्त होगे, अगर भगवतधाम प्राप्त करने के लिए हमें कम से कम इस दहूरत है कि भगवान, कृष्णा शुट बिकॉज़ आर स्ट्रॉंगेस डिजायर, हमारी सबसे शक्तिशाली शायद, इच्छा जो हैं भगवान मुझे, शुद्ध भगत तो मतलब भगवान के अलावा कोई और इच्छा ही नहीं है, भले हम उस तरपे नहीं पहुंचे कि भगवान के अलावा कोई और इच्छा नहीं हैं, पर कम से कम भगवान के परती जो इच्छा है, वो बाकी सब चीजों से और संदुर्ध होनी चाहिए।
पर अगर वैसे नहीं हो रहा है, अगर हम धीर धीर भक्ति करते हैं तो क्या होगा, भगवान के परती उतना आकरशन जागरत नहीं होगा, और फिर दूसरे चीजों के परती आकरशन होगा, दूसरे चीजों का भोग करने के लिए हमें पुर्ण हना पड़ेगा, तो ऐसा जाता है कि विधान प्रभाजी ने कहा है, उसका उद्देश है कि हमें भक्ति में धीर बनाने के लिए हैं, ऐसे नहीं है कि इसका मतलब है कि सब भक्त वहीं जाएगे, हरे भक्त अपनी चीतना के लिए उसाराकी गति प्राप्त करने करना है, तुम्हें?