How Kali’s weapons failed against Lord Chaitanya – Chaitanya Chandrodaya Nataka 1 Hindi
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Lecture Summary
इस पूरे प्रवचन में कवि कर्णपूर द्वारा रचित चैतन्य चंद्रोदय नाटक और श्री चैतन्य महाप्रभु के जीवन व सिद्धांतों पर विस्तृत चर्चा की गई है। मुख्य बिंदुओं का सारांश निम्नलिखित है:
- चैतन्य महाप्रभु का आविर्भाव: महाप्रभु का प्राकट्य मायापुर (गौड़ देश) में हुआ। शास्त्रों में उनकी तुलना उगते हुए चंद्रमा से की गई है, जो अज्ञान और तमोगुण रूपी अंधकार का नाश कर जीवों को परम शांति और शीतलता प्रदान करता है।
- प्रमुख ग्रंथ और साहित्य: चैतन्य महाप्रभु के जीवन पर आधारित अनेक बायोग्राफी लिखी गईं। कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा रचित चैतन्य चरितामृत एक ऐसा अनूठा ग्रंथ है जो मूलतः बंगाली में है और जिस पर विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर ने संस्कृत में प्रामाणिक भाष्य लिखा है। यह ग्रंथ तत्वज्ञान और लीलाओं का अद्भुत संगम है।
- प्रचार के मुख्य केंद्र: महाप्रभु के तिरोभाव के बाद गौड़ीय वैष्णव धर्म के प्रचार के मुख्य चार केंद्र बने—वृंदावन (जहाँ गोस्वामी गणों ने संस्कृत में ग्रंथ लिखे), बंगाल, उड़ीसा, और दक्षिण भारत।
- प्रताप रुद्र महाराज का विरह और कविकर्णपूर: जगन्नाथ पुरी में रथयात्रा के दौरान प्रताप रुद्र महाराज चैतन्य महाप्रभु के वियोग में अत्यंत व्याकुल हैं। वे अपनी इस वेदना को शांत करने के लिए महाप्रभु के पार्षद परमानंद कविकर्णपूर से नाटकीय रूप से महाप्रभु की लीलाओं का वर्णन करने का निवेदन करते हैं, जिससे आगे चलकर ‘चैतन्य चंद्रोदय नाटक’ की रचना होती है।
- कलिराज और अधर्म की योजनाएं: नाटक के कथानक में कलिराज और उसका सहयोगी ‘अधर्म’ इस बात से चिंतित हैं कि चैतन्य महाप्रभु और उनके संकीर्तन आंदोलन के कारण कलयुग में उनका राज्य नष्ट हो रहा है। कलिराज अपने अस्त्रों—काम, क्रोध, लोभ और मोह—के माध्यम से महाप्रभु और उनके भक्तों को परास्त करने की योजना बनाता है, किंतु महाप्रभु की अहैतुकी कृपा और संकीर्तन की शक्ति के आगे कलिराज के सभी प्रयास विफल हो जाते हैं।
- दिव्योनमाद और योगमाया का मोह: महाप्रभु और उनके भक्तों की स्थिति सामान्य भौतिक मोह जैसी नहीं, बल्कि योगमाया का दिव्य मोह है, जहाँ वे हर स्थान, वृक्ष, नदी और पर्वत में श्री कृष्ण और वृंदावन की लीलाओं के दर्शन करते हैं। उनका प्रेम और विरह इतना तीव्र है कि वे कभी-कभी ‘दिव्योनमाद’ (आध्यात्मिक पागलपन) की स्थिति में पहुंच जाते हैं।
- नित्यानंद प्रभु की कृपा और जगाइ-मदाइ का उद्धार: नित्यानंद प्रभु असीम दयालु हैं। जब जगाई-मदाइ द्वारा प्रहार किए जाने पर महाप्रभु क्रोधित होकर सुदर्शन चक्र प्रकट करते हैं, तब नित्यानंद प्रभु उन पतित जीवों के लिए महाप्रभु से क्षमादान मांग लेते हैं, जो महाप्रभु की अगाध कृपा का प्रतीक है।
- षड्विध प्रीति लक्षण और हृदय का संबंध: महाप्रभु ने संस्थाओं या वारिसों के पीछे पड़ने के बजाय षड्विधं प्रीति लक्षण (भेंट देना-लेना, अपने मन की बात कहना, सुनना, प्रसाद पाना और खिलाना) के माध्यम से भक्तों के हृदय में प्रेम का स्थाई संबंध स्थापित किया।
- श्रील प्रभुपाद का अनुकरणीय उदाहरण: जिस प्रकार चैतन्य महाप्रभु ने प्रेम की भेंट से पूरी दुनिया को बदला, उसी प्रकार श्रील प्रभुपाद ने अपने गुरु महाराज के आदेश के प्रति पूर्ण समर्पण और ‘दिव्य पागलपन’ (प्रभुपाद के शब्दों में: “Perfection of our life is to become mad for Krishna”) के बल पर संपूर्ण विश्व में कृष्णभावनामृत का विस्तार किया।
Full Transcription
चैतन्य महाप्रभु का आविर्भाव और चैतन्य चंद्रोदय नाटक
ये चैतन्य भागवत में आता है, और कई बार गोडिय वैश्णव ग्रंथों में आता है, ये चैतन्य महाप्रभू, नित्यानंद प्रभू को प्रनाम कर रहे हैं। वन्दे स्त्री कृष्ण चैतन्य नित्यानंद सहदितव। सह उदितौ। तो, साधारणतया, जब सूरज उकता है, तो, चांद दूकता है। और जब चांद उकता है, तो, सुरज दूकता है। पर, स्त्रीको, चैतन्यमहापरू निठयानंदध प्रभू, ये एक सूरज और एक चंद्रमा के समान हैं। और दोनों एक साथ में उगे हैं। इसलिए बड़ा अद्भूत है।
वन्दे स्त्री कृष्ण चैतन्या नित्यानन्द सहो दितव। गउडो दये पुष्पवन्तव। तो जिस इलाके में चेतन्यमहाप्रव का आविर्भाव हुआ, मायापूर का इलाका, उसको गउड कहते हैं। तो गउडो दये, और जैसे ही कोई बगीचा होता है, जैसे सूरज उग जाता है, तो फिर जो फूल होते हैं, सब फूल लगते हैं। तो गउडो दये पुष्पवन्तव। चित्रव शन्दव तमो नुदव। तमो नुदव मतलब सारा जो अंधकार है, अग्यान है, तमो गुण का प्रभाव है, नुदव, उसका नाश होता है। चित्रव शन्दव, चित्रव मतलब बड़ा, जैसे चित्रपथ होता है, सुन्दर, चित्रव शन्दव, बड़ी शान्ती, सन्तुष्टी प्रदान करता है वह।
तो ऐसा सुरज है, जो उकता है गवरांग महाप्रव का, वह अग्यान का अंधकार दूर करता है, और वह सरोच शान्ती और सन्तुष्टी है, वह उसकी च्छा प्रदान करता है। वन्दे श्री कृष्ण चैतन्या, नित्यानन्द सहोधितो, गोडो दै पुष्पवंतो, चित्रव शन्दव तमोनुदो, वन्दे श्री कृष्ण चैतन्या, नित्यानन्द सहोधितो, गोडो दै पुष्पवंतो, चित्रव शन्दव तमोनुदो, वन्दे श्री कृष्ण चैतन्या, नित्यानन्द सहोधितो, गोडो दै पुष्पवंतो, चित्रव शन्दव तमोनुदो, हरे कृष्ण पुर्णिमा महुत समय आपका स्वागत हैं, कृष्ण संद्व बता रहे थे तीन साल बाद, कई बार आने का योजना था, पर भगवान की कृपा चाहिए आप सब का संग प्राप्त करने के लिए, तो पुछ दो बार पिरेणा अधिकारेकरम के लिए आना था, पर किसने किसी कारण से आनी पाया, तो आनंद है कि आज आप आया हूँ, मदन गोपाल जी के विगरह बहुत सुन्दर हैं, और आप सब कृपा करने के लिए यहाँ पे आये हैं, तो इसलिए प्राभुपाज जी ने जब रंदावन मंदिर बनाया था, तो सब कह रहे थे कि ब्रंदावन में, आप राधा कृष्ण का मंदिर बनाओ, प्राभुपाज जी बोले थे कि बहुत से राधा कृष्ण के मंदिर हैं, हम कुछ विशेश बनाएगे, तो फिर उन्होंने कृष्ण बलराम मंदिर बनाया, जो नासिक हैं उसमें, पुरुषिराम चंडर के बहुत मंदिर हैं, यहाँ पे वक्ति का भाव वही है, पर यहाँ पे राधा मदन गोपाल का जो सुन्दर मंदिर है, यह नासिक के लिए भी एक आभूशन है।
चैतन्य महाप्रभु के जीवन ग्रंथ और इतिहास
तो आज मैं गौरपोर्णिमा के असर पे श्री चेतन्य महाप्रभू के बारे में जो अनेक ग्रंथ लिखे गए है, उनका थोड़ा संख्षिप में परिछे देकर, फिर चेतन्य चंद्रोदय नाटक नामका जो ग्रंथ परमानन्द कवी करणपूर ने लिखा है, उससे कुछ लिलाएं चर्चा करूँगा मैं।
चेतन्य महाप्रभू का जो आविर्भाव 1488 में हुआ, आज ही के दिन, और वो 48 साल तक हमारे बीच में थे, और वो 88 साल तक रहे, और 88 से अधिग उनके बारे में जीवन चरितर लिखे गए, बहुत से बायोग्राफीज उनके बारे में लिखे गए, पर दुरभाग्य वज़ से उनमें से अनेक जो, जीवन चरितर लिखे गए, तो दुरभाग्य वज़ उनमें से अनेक जो है, अभी नहीं है, लिप्ट हो गए है।
मेरे कई मित्र हैं, जो अभी गोड़िया वज़न में रिसेर्च कर रहे हैं, तो बेंगाल के परंपरा से, पीड़ियों से गोड़िया वज़न हैं, उनके घर्व के कोने में कोई गोड़िया व्रन्त पढ़े होगे, तो जो चेतने चरिताम्र, जो प्रधान ग्रंत है, जेतने महाप्रभु के जीवन के बारे में, वह बेंगाल साहित्यिक इतिहास में इकलोता ऐसा ग्रंत है, जो मूल ग्रंत बेंगाली में है, और उस पे भाष्य संस्कृत में लिखा गया है।
साधा रण्डा ऐसे होता है कि संस्कृत में मूल ग्रंथ होता है और जो इलाके की भाषा होती है उसमें उसपे भाष लिखा जाता है पर ये चेतनी चेतनाम वो इतना महत्वपूर्ण ग्रंथ था कि कृष्णदास की विराजगौसम में जो लिखा था तो उसपे विश्वनाच चक्रि ठाकुर ने एक संपूर्ण भाष लिखा और उन्होंने जो भाष लिखा वह संस्कृत में लिखा था।
प्रचार के मुख्य केंद्र और वृदांवन का योगदान
तो जो शिचतने महाप्रभू जब भोगतदाम लोड़ गए तो उन्होंने जो वैश्णाव, गोडिया वैश्णाव का सुध्धान था और जो प्रनाली थी सब जगह प्रचार की थी पर प्रधान रूप से चार जगह थी तो कवी कोरणपूर पताते है कि वो करनाटक के जो मलहट नाम के वहाँ पे राजमंत्री है वहाँ प्रताप रुद्र से मिलने आते हैं और जो चार प्रताप रुद्र जगह थी एक थी भृन्दावन, जहाँ पे गोस्वामी गण थे बेंगॉल, जहाँ पे चेतन महाप्रू के बाद इत्यानन प्रभू अद्वित आचारे और उनसे जो शिष्य और जो उम्शे आये थे वो थे फिर ओरिसा में प्रताप रुद्र के बाद वहाँ पे जो भक्त थे सारो मठताचारे आदी और चेतन महाप्रू दक्षिन भारत में जब प्रचार करने गए थे तो वहाँ पे अनेक भक्त थे।
तो जो खेतुरी ग्राम में पहला गौरपोर्णी का कमहचा हुआ तो हाँ पे लाखों की मातरा भक्त आये थे सब जगह से पर प्रधान ये चार जगह से भक्त आये थे दक्षिन भारत, ओरिसा, बेंगॉल और वृन्दावन और हरे जगह जो भगवान की भक्ति होती है वह भाव एक होता है और उसका जो प्रकटी करन होता है अलग-अलग होता है।
तो जो वृन्दावन था वह पारंपारिक रूप से एक पांडित्तक जगह थी तो इसलिए जो वृन्दावन में ग्रंथ लिखे गए गौडिया सद्धान्त के वारे में वे सब गरंथ जो थे वो संस्कृत में लिखे गए और बेंगौली में जो गरंथ लिखे गए थे बेंगौल में और ओरिसा में जो गरंथ लिखे गए थे वो सब बेंगौली में लिखे गए थे।
कृष्णदास कविराज गोस्वामी और चैतन्य चरितामृत
तो कृष्णदास के विराज गोस्वामी ये ऐसे इकलोते वेक्ती थे कई उस पीड़ी में चेतने महापुरु के बाद के पीड़ी में कि वो बेंगौल में जन्म हुआ था उनका बच्चपन से वो चेतने महापुरु की लिलाएं सुन रहे थे और बाद में उनको नित्यान प्रभु की प्रेरिणा मिली और फिर वे नावद्वीप से ब्रिंदावन चले गए और ब्रिंदावन में जाकर उन्होंने गोस्वामियों से परचिक्षन लिया और इसलिए जो बाकी सब ग्रंथ है चेतने भागवत है चेतने भागवत रिंदावन दास ठाकों ने लिखा है चेतने मांगल लोचन दास ठाकों ने लिखा है आधी ग्रंथ है वह अधिकान जो ग्रंथ है लिलाएं से भरी हुई है।
तो बेंगाल में जो ग्रंथ लिखे गए थे वह चेतने महाप्रो की जीवन के बारे में लिलाएं लिखे गए थी और रिंदावन में जो ग्रंथ लिखे गए थे जैसे बक्तिर सामर सिद्धू है या फिर जिव गोस्वामिन शट्संदर्ब लिखे थे जो उसपे दुर्गम संगम ने टिका लिखी थी बहुत से ग्रंथ लिखे थे वो अधिकांच ग्रंथ जो थे वो तत्वज्ञान के बारे में थे गौडिय तत्वज्ञान तो यहाँ पे बेंगाल में लिला लिखे गए तत्वज्ञान लिखा गया तो कृष्णदास कविराज गोस्वामी बेंगाल से व्रिंदावन ने गए और उन्होंने जो ग्रंथ लिखा उसमें लिला और तत्वज्ञान का संगम किया है।
तो इसलिए यह बहुत ही महतुपूर्ण ग्रंथ है और यह ऐसा ग्रंथ है वास्तव में कि जिसमें वो केवल एक जीवन चरित्र नहीं है वह वास्तव में एक तत्वज्ञान का ग्रंथ है जो एक जीवन चरित्र के रूप में लिखा गया है तो जो पहले तेरा अध्या है चेतन चरित आमरत के पहले बारा अध्या है वास्तव में वो पूरा तत्वज्ञान ही प्रस्थापित कर रहे हैं माँपे तत्वज्ञान प्रस्थापित करने के बाद फिर तेरवे अध्याएं से चेतन महाप्रोग का अविर्भाव चालू होता है।
चैतन्य चंद्रोदय नाटक की पृष्ठभूमि
जैसे कभी किसी को कुछ रूम का फोटो देखना है तो उपर से कैमेरा से फोटो देख रहे है और अगर कोई चीज अच्छा दिग गया कुछ इंट्रेस्टिंग दिग गया तो उसके क्लोज अप करते हैं तो फोकस करते हैं तो वैसे ही शिरी तृशिनदास तो इसलिए कही बहुत महत्वपूर्ण वार्टालाब जो हुए थे चेतने महाप्रो और उनके भक्तों में तो उसको बहुत विस्तार रूप से शिरी तुशिनदास कविराज गोस्वामि बताया है और यह जो तत्वग्यान के सम्वांध थे उस कोशल प्रभुपात ने एक विशेश किताब बनाई टीचिंग्स अफ लॉर्ड चेतने नाम के तो इसमें जो चेतने महाप्रो के जीवने प्रधान सम्वांध थे वो रूप और सनातन गोस्वामि के साथ वो शिक्षाय दी तो वो जो मद्दिलिला का तो यह जो पाँच सम्वांध है यह सम्पूर्ण गाउडिया सद्धानत का विस्तारित रूप से वढनन्द करते हैं और फिर इसको कृषिनदास के राज गोस्वामि बड़े विस्तारित रूप से वढनन्द किया है।
उसके अलावा जो चैतन्या भागवत है उसमें रंदावनदास ठाकुर अधिकांश रूप से लिलाएं बताते हैं और बड़े भक्ति भाव से वो भरी हुई लिलाएं तस्थाकुर कहते थे कि अगर किसे चैतन्य महापरू के परती आकरशन जागरत करना है तो रंदावनदास ठाकुर का चैतन्य भागवत पढ़ना चाहिए चैतन्य मंगल जो है बहुत सुन्दर ग्रंथ है तो उनमें से जो एक ग्रंथ है जिससे मैं कुछ चर्चा करूँगा वह है चैतन्य चंद्रोदे नाटक चैतन्य चरितामृत वो एक तत्वग्यान जीवनी ग्रंथ है पर तत्वग्यान पे केंद्रित जीवनी है जीवन चरितर है।
तो कवी करणपूर जो थे वो एक महान वक्त और पंडित थे और उन्हें कई ग्रंथ लिखे है कृष्ण लिला के बारे में कृष्ण लिला के बारे में ग्रंथ लिखा है बहुत विख्याद ग्रंथ है और जो कवी काव्यात्मा कालंकारों से भरा हुआ है इसका नाम है आनन्द व्रिंदावन चम्पू वो व्रिंदावन लिलाओं पे आधारित है और जो उन्होंने चेतने महाप्रो के जीवन पर कई ग्रंथ लिखे है तो उसमें तो दो प्रधान है तो उनमें से ये जो है चेतने चंद्रोदाय नाटक ये एक नाटक के रूप में है तो नाटक के रूप में लिखना यह एक वैश्णो सहित्य का एक बहुत महतरपूर्ण अंग है।
नाटक का आरंभ और प्रताप महाराज का विरह
तो श्रिराधा कृष्ण के लिलाओं के वारे में रूपो सनातन गोत स्वामि ने ललित माधव और विदग्द माधव ये नाटक लिखे है और ये नाटक के वारे में जो चेतने महाप्रो सुनते है तो उससे बहुत प्रसन हो जाते हैं और वो कहते है रूपो को स्वामि को पूर्ण आशिरवात देते थे उसका वर्णम चेतन चरिता अमृति में आता है तो ये जो चेतन शंद्रोदे नाटक है उसकी शुरुवात ऐसे होती है कि अभी चेतन महाप्रभू अपनी ला खतम करके भगवधाम लोड गए है और खेंद्र जो है यहाँ पे जगनाथ पूरी में है और जगनाथ पूरी में प्रतापुरुद्र महराज जो बहुत पराक्रमी राजा थे और वह भी चेतन महाप्रभू के महान भक्त बन गए है अभी रत्यात्रा का उत्साव चालू हो रहा है और प्रतापुरुद्र महराज विलाप कर रहे है कि देखिए यही वह जगनाथ है यही रत्यात्रा है यही जगनाथ का मंदिर है वही सब भीड है वही गुंडिचा मंदिर है वही मारग है पर वह रस नहीं है पर वह रस नहीं है क्योंकि अभी शी चैतन्य महा प्रभु नहीं है तो मैं यह कैसे विरह सेहन कर सकता हूँ।
जगनाथ जी यहाँ पर प्रकट हो गए है इससे धिव्या आनन्ध होना चाहिए पर जितने जगनाथ जी परकट हो रहे है जगनाथ जी का दर्शन करके मुझे चैतन्य महा प्रभु का समर्ण हो रहा है और उनसे जो विरह है वह असहनिय हो रहा है तो मैं यह विरह के बीच में कैसे मेरा जीवन जी सकता हूँ और तो उस समय वह चैतने महा प्रभु के साहरे पार्शदों को याद करते हैं और सोचते हैं किस पारशद से मैं शु चैतने महा प्रभु की लिलाओं का श्रवन कर सकता हूँ वह याद करते है प्रतापुरुतर महाराज कैसे वही जगनाथ यतियात्रा के समय में जब चैतने महा प्रभु क्योंकि वे राजा थे प्रतापुरुतर इसलिए उनसे मिलना नहीं चाहते थे तो तभी प्रतापुरुतर महाराज ने एक साधारन वेश पहन लिया एक साधारन नागरी का वेश पहन के जब चैतने महा प्रभु रत्यात्रा में नुत्य करके ठक गए थे वहाँ पे जगनाथ वल्डम वाटिका में थोड़ा विश्राम कर रहे थे तो वहाँ पे चैतने महा प्रभु के चरण कमलों में जाके गिर गए प्रतापुरुतर महाराज उनको प्रणाम किया और फिर वे जो गोपी गीत है वे गाने लगे।
गोपी गीत और कृष्ण वियोग की भावना
और जब वे जो विख्याद शलोक आता है गोपी गीत जो है शम्पूर्ण श्रिमत भागवतम के पराकार्ष्ठा के समान है इक्ति स्वार्ध है दशंसकंद का और उसमें जो शलोक आता है बारावा शलोक तव कथाम्रितम् तप्तजीवनम् कविभिरीडितम् कल्मशापहम् श्रवणमंगलम् श्रीमदाततम् भुमिग्रिनल्तिये भूरिदाजनः तो यहाँ पे जो गोपीया है वो भगवान कृष्ण के विरह में आतूर हो गई है बगवान कृष्ण ने रास लिला के लिए उनको बुलाया है और वे चले गए है भगवान जब भगवान चले जाते है तो गोपीया आतूर होके प्रातना करने लगती है और जिविगोस्वामी अपने गोपाल चेंपु में बताते है कि यह जो श्लोक है हरे एक श्लोक कौन से गोपी ने लिखा है कौन से गोपी ने लिखा है लिटाल गिविने ये श्लोक गाया है विशाखा देविने ये श्लोक गाया है तुंगविद्याने ये श्लोक गाया है चित्रा ने ये श्लोक गाया हाई कि वो हरे गौपी का भाव जानते है और किस परकार की भावना, उश्लोक से वर्णद हो रहि वो बताते है तो विशाखा में गौपी गित्रव बता हरे है बहाग्वदण में यह सब गोपियों का विस्तायत वर्णम नहीं है, वहाँ पर श्री गोप्यः उच्चु बताया गया है कि यह गोपियां गा रही हैं तो यह शलोक बता रहे है कि हे प्रभो आपकथा जो है तबकथामरतम तप्तजीवनम यह जीवन है भावतिक जगत के वासनाएं और चिन्ताएं इन से पीड़त है हमारे जगत में हमारे जीवन में जितनी हमारी वासनाएं हैं जितनी कामणाएं, जितनी इच्छाएं वो इच्छाओं के पूर्थी के लिए चिन्ताएं आ जाती हैं और इन दोनों से हम विचलित हो जाते हैं तो उससे राहत प्राप करने का मार क्या है कवी भीरीडितम कल्मशापहम तो जो महान कवी है वो आपकी लिलाओं का वर्णन करते हैं और उससे जो कल्मश है रुदे में जागरुत होते हैं बगवान की लिलाई शरून करने से श्रीमदाततम और ये बड़ी शक्ती, दिव्य शक्ती से भरी है, दिव्य भाग्य से भरी है और जो महान भक्त है वो सारे पुरुथ्वी पर धर्मन करते हैं भुमी गिरिनन्तिये भूरिदाजनह तो यहांपे जो गोपिया वरन कर रही है वह कह रही है कि ये प्रभो आपके विरह में भी जल रहे है तो अभी अगर आप नहीं आएगे तो किसी को आप भेजो जो आप अपकी लिलाये सुनाएगा और हमें आपके विरह से राहत दिलाएगा और कोई जब आता नहीं देखते हैं तो गोपिया क्या करती है खुदी भगवान की लिला का वरन करती है और एक दुसरों को राहत देती है।
कविकर्णपूर का आगमन और चैतन्य चंद्रोदय का सार
तो यहांपे अभी हैं मैं तीन स्तर पर यह बोल रहा हूँ यह मूल प्रसंग जो है वह तीसरे स्तर पर है वह क्या है अभी प्रताप रुद्र महराज वह विचलित हो गए है कि गवरांग महा प्रभु के विरह को मैं सहन कैसे करूँगा और वो सहन करने के लिए वह भगवान की कथा सुनना चाहते है और वह सुनने के लिए स्मर्ण करते हैं कैसे चेतन्य महा प्रभु जब भगवान के विरह में थे तभी मैंने गोपी गीत गाया और उससे उनको राहत मिल गई और फिर वह तभी स्मर्ण करते है कैसे गोपियां जब भगवान के विरह में थी तो उन्होंने गोपी गीत गाकर सुनाकर राहत प्राप्त की तो वह स्मर्ण करते हैं कि जो भगवान के पारशद है उनमें से बहुती उत्कृष्ट पारशद जो अभी है वह है परमाननद कविकरनपूर तो वे उनको बुलाते है और उनको आदर सतकार करते है निवेधन करते है क्रुपया आप श्री गवरांग महा प्रभु की लीलाओं के बारे में वरनन कीजिये और न केवल वरनन कीजिये आप उनके बारे में वरनन एक नाट्यात्मक रूप से कीजिये नाट्यात्मक रूप से मैंने सिर्फ भावि भोर होके बताना नहीं है पर आप इस तरह से वरनन कीजिये कि उसके आधार पर एक नाटक लिखा जा सके तो फिर कवी कुर्णपूर देखते हैं कि उनके कितनी जुलंद इच्छा है श्री जतने महा प्रो की लीलाओं का और फिर उसके बाद में चैतन्य चंद्रोदय नाटक।
मायापुर इस्कॉन मंदिर और चंद्रमा की तुलना
हमारा जो मायापूर में जो इस कौन का मंदिर है उसको शिले प्रवपाजी नहीं क्या नाम दिया है चैतन्य चंद्रोदय मंदिर चंद्र उदए तो साधारन ते जब धूप होती है सूरज उकता है तो सूरज उकता है तो रॉष्णी आती है पर जो रॉष्णी कभी-कभी काफी हो जाती है तो गर्मी लगने लगती है तो इसलिए जब भगवान के क्रुपामे भाव का वरन होता है तो भगवान की तुलना जो होती है सूरज से नहीं की जाती है चंद्रमा से की जाती है भगवान के ही दो ही रूप है जिनकी तुलना सूरज से की गई है शास्तरों में एक है नरसिमदेव और दूसरे है विराट रूप जो नरसिमदेव क्रोध में थे और विराट रूप भी जो है वह भी दिवि सूर्य सहसरस्य अर्जुन कहते है कि ये जो जोती है वो सहसरस्योरज भी आ जाएगे तो वो भी कम पर जाएगे इतनी जोती है यह तो इसके विपरी भगवान का चेहरा है जब वो क्रोधित भाव में नहीं है तो उसको चंदर सदमना की जाती है।
तो इसलिए चैतन्य चंदर उदय नाटक कि चैतन चंदर चैतन चंदर कैसे उनका आगमन किया उन्होंने और कैसे उन्होंने लिलाय की तो उदय तो एक समय हुआ जो आज के दिन आज की शाम को हुआ पर जैसे चैतन महापुर ने अपने लिला विस्तारिद की सारे भारत बर प्रवास किया तो जहाँ भी गए वहाँ पे उनके लिला का उदय होते गया इस तरह से जो नाटक है चैतन महापुर ने अपने कैसे कृपा सब जग़ा फैलाई उसका वरनम करते है तो इस नाटक में जो नाटक ज़व होता है तो उसमें एक डारेक्टर होता है और फिर उसमें कई आक्टर होते है तो जो संस्कृत में डारेक्टर होता है उसको जो नाटक में मुख्य सारे वो आयोजन कर रहा है उसको सुत्रधार कहते है जो सुत्रधार है वो परकट होते है और वो कहते है उनके साथ उनके एक परिपराशिक है उनका एक सहयोगी है तो वो कहते है कि ये अहो मंगल की बात है कि आज मैं सारे जन समाज के कल्यान के लिए चैतने महाप्रभू के जीवन पर एक तो उनका सहयोगी कहता है कि ये चैतने महाप्रभू कौन है?
अगर तुम्हें चैतने महाप्रभू पता नहीं है तो लगता है अभी तक तुम अपने माँ के गर्ब में ही जी रहे हूँ तो चैतने महाप्रभू उन्होंने परकट होके ये कल्यूग का जो अंधकार था उसमें रोषनी से साचारी दिशाओं को उजागर कर दिया है और ये चैतने महाप्रभू कल्यूग के अंधकार में एक मारग है इसके अलावा उध्धार का कोई आसरल मारग नहीं है तो ये सुत्यार होता है कल्यूग तो कल्यूग तो अज्ञान, अन्याए, मोह इन सब का युग है इसमें धर्म का ज्ञान धर्म की रोषनी का प्रचार कैसे हो सकता है तो कहते हैं यही तो शी गवरांग महाप्रभू के विश्मे पूर्ण लिलाख के महीमा है वहाँ तो जो सईयोग्य होते हो आश्चरिकत हो जाते हैं कुर्पया मुझे इसके वारे में बताओ।
कलिराज और अधर्म का संवाद
लेकि वास्तो में जो कली, यह इतना क्रूर है इतना निष्ठूर है और वह तो सारे विश्मों पर अभी राज्य कर रहा है उसके सामराज्य को तो जब ऐसे वापचारता हो रही है तभी किसने मुझे क्रूर और निष्ठूर कहा? किसके ऐसे आउकाद हुई? कि मैं जो राज्य हूँ उसको क्रूर और निष्ठूर कह रहे हैं?
तो जब ऐसे सुनते हैं तो जो सुत्रधार है और सःयोगी है वह दीकते है कि वहांसे कलीराज्य आ रहा है और कलीराज्य के साथ कलीराज्य की सहयोगिctor कल्राज का संजनापती है। और जब सुत्रदार देखते हैं, वोलते हैं कि अभी कल्राज यहाँ पे आ रहे हैं, अभी हम यहाँ से अधरुश्य होके सब कुछ देखेंगे। तो फिर वो अधुरुश्य हो जाते हैं।
अगर कल्राज और अहाँ पे अधर्मा उनका सहयोगी आता है, और वो कहते है, कौन है वो विक्ति जो कह रहा, कि मैं क्रूर निष्ठूर, मैं यहाँ का राजा हूँ। तो जब कल्राज वो ऐसे कह रहे है, तो उनका जो चेला है अधर्म, वो कहता है, यहाँ, आपने तो सारे दिशाओं में, जो धर्म था, उसका नाश कर दिया है, और अपना राज यह पर स्थापित कर दिया है, तो जब यह कल्राज सुन रहे है, सोच रहे है, कि वो जो विक्ति था, वो कोई, जो यह बता रहा था, वो साधारा निक्ति नहीं है, वो चेतन्य महाप्रिभु का भक्त है, और चेतन्य महाप्रिभु जो है, वहाँ, मेरे राज को उध्वस्थ कर रहे है, मेरे राज को उध्वस्थ कर रहे है, कैसे संभव हो सकता है, यह तुमारा राज है, कौन है चेतन्य महाप्रभु, बताओ, वह तो बोले, वह वास्तव में एक बालक है, बालक, तो वो कुमारक यह शब्द उस्थमाल करते है, तो कुमारक, तो कुमारक का पहला अर्थ है बालक, पर यह अधर्म सोचता है, कि बालक और कलिराज से कैसे, उनके राज्यों कैसे विनाज कर सकता है, सोचते हैं कुमारक का अर्थ है, क्या हो सकता है, कुमारक, जो बुरी तरह से मारता है, तो सोचते हैं, कि यह कौन है, सबसे क्रूर तो आप हो, तो आप से क्रूरता से और मारने वाला और कौन है यहाँ पर, कुमारक कौन है यहाँ पर, बोलते हैं कि यह कुमारक नहीं है, यह कुमार है, तो कुमार है, तो कुमार से आपको भय किस बात गया है, बोलते हैं कि यह साधारन कुमार नहीं है, यह जो कुमार है, वह सारे देवताओं का, सारे ब्रह्मानों का स्रोत है।
कलयुग में भगवान का अवतार और आचार्य गर्भ का उपदेश
कहते हैं, वह जो परम भगवान है, वह तो कल्यूग में आते ही नहीं है, तो इसलिए उनको शास्म में बताया गया त्रियूगी है वह, कि वह कल्यूग में आते ही नहीं है, उनको इसलिए त्रियूगी नाम से बताया गया है, तो आचारे गर्म बताते है, श्राधामदन गोपाल दे भगवान ही, कि ऐसे, शहर में कभी कोई एलाका होता है, जहांपे गुनेगार इतने होते हैं, माफिया का अड्डा होता है वहां पे, तो वहां पे एगर कोई व्यक्ति जाता है, वो चोरी हो जाता है, उससे कुछ, उसका पर्स, उसका वैलेट, और वाद में पुलिस के पाँच जाता है, कहता है, कि मैं वहां पे गया था, मेरा पैसा चोरी हो गया, तो पुलिस बोलते है, जान बज़ गया, अच्छा हो गया, तो वहां पे गया क्यों थे, वहां पे हम भी नहीं जाते, तो, ये जैसे, शहर में माफिया का एलाका जैसे होता है, वैसे विश्व के इतिहास में, कल्यूग ये माफिया का एलाका है, तो इसलिए जैसे पुलिस भी माफिया के एलाके जाते नहीं है, वैसे भगवान इस कल्यूग में अवतार भी नहीं लेते है, वह भाव है, पर यह जो भाव है, यह एक नियम के सद्धान से, नियम के दृष्टी से है, पर भगवान केवल एक नियंत्रिन करने वाले शास्ता नहीं है, भगवान एक प्रेम प्रदान करने वाले, सबसे प्रेम करने वाले पिता भी है, और कोई नागरिग अगर गुने के एलाके में होगा, वहाँ पे चाहिए पुलिस नहीं जाएगे, इस प्रस्थापित करने के लिए नहीं आते, कल्यूग जो है, वह अधर्म का राज्य है, पर फिर भी जो बचना चाहते है, उनको बचाने के लिए भगवान स्वयम आते है, और एक अद्भूत अवतार में आते है, वहाँ अवतार क्या है?
वहाँ, श्रिमद भागोतम के साथवे स्कंद में, नौवे अध्याय में, प्रलाग महाराज, जब प्रातनाय कर रहे हैं नरसमदेव से, वह भगवान के अलग-अलग लिल अवतारों के वारे बोलते हैं, और वह कहते है, चन्नखलव यद भवस त्री उगो थ सत्वम वह कहते हैं अपको त्री उगी बताय गया है, क्यूं साधायन टा लोग कहते है ledge, त्री उगी बताय गया है, क्यूंकि आप तीन उगोी में आते, वोलते हैं नहीं, चन्ण हखलो यद भवस त्रियुगो थ सत्वम् आप कल्युग में एक चन्न अवतार के रूप में आतें इसलिए यद अभवस इसलीयहाँ क्योंकि कल्युग में आँपरकट रूप में नहीं आते हैं इसोलीये आपको ठीहुग्य बतायेगा थी पर आप आती है हमेशा आप सबका कल्यान करते हुआ तो कल्यूग भी आप कल्यान करते थे एकचन्न अवतार में आते हैं और वास्तव में कल्यूग में आप सबसे अधिक कृपा प्रदान करते हैं क्यों?
क्योंकि जो मान लिए कोई बड़ा धन्वान व्यक्ति है और वो दानशील भी है तो साधार हैं तो यह दान देगा वो पर अगर किसी जगह पर कोई भुकम हो जाता है और साब कुछ उद्वस्थ हो जाता है तो जो दानशीलता का प्रवर्ति है वो और वुद्धित हो जाती है और इसलिए व्यक्ति और दान देता है तो ठीक उसी तरह से कल्यूग जो है वो एक आध्यात्मिक आपत्ति के समान है यहाँ पर जो भी धर्म के संयोजना थी धर्म के प्रणली थी वह साब इस अधर्म के भुकम से उद्वस्थ हो गई है तो उसके कारण भगवान एक पिता होने के लिए त्याग नहीं करते हैं उनकी करुणा और जागरत होती है और जागरत होती है और इसलिए वे प्रकथ होते है एक बहुती करुणाम है रूप में वो रूप है शुचेतन्य महाप्रभु यह बगवान के करुणाम के वारे में है हम चर्चा और करेंगे शाम को पर अभी हम जो यह चेतनी चंद्रोदनाटक के वारे में चर्चा कर रहे है।
संकीर्तन की ध्वनि और अधर्म की चिंता
तो वो कहते है अधर्म जो है वो कहते है यह कौन ऐसे बालक है जिसके वारे में आप इसके कारण आप चिंतित हो गए हैं तो वो बोलते है कि यह बालक सारे ब्रह्माणों का स्रोत है और यह कल्यूग में शुचेतन्य प्रभु के रूप में प्रकट हुए हैं तो वो सोचते है कि सुनते हैं तो दोनों को साब पीछे से कि हरनाम संकीरतन का आवास सुनने लगता है हरनाम संकीरतन का आवास सुनने लगता है तो साब जगद दिव्य आनन्द और एक दिव्य उनमाद होने लगता है तो यह सुनके जो धर्म है अधर्म जो है चिंत्त हो जाता है पुछते है कि ये संकीरतन की द्वनी सुनके ही मेरी सारी शक्ति चली जा रही है मैं बिलकुल शक्ति हीन धैरे हीन हो जा रहा हूँ क्या करूँ मैं?
और वो तो सोचते है कि मेरा स्वामी जो कली है उननोंने पहले ही हार मान लिये अगर मैं अभी हार मान होगा तो क्या होगा? आ! एक योजना आ गई क्या है? यह बालक कितना भी शक्ति शाली हो इस भौती जगत में जो है सबसे शक्ति शाली काम, करोध, लोब, मोह, मध, माथ, सर्य हमारा जो बहुत शक्ति शाली सेनापती है काम हम क्या करेंगे? काम से इस श्री चैतन्य पे आकरवन कर देंगे और फिर वह जब पर्यास्थ हो जाएगा तो फिर वह पर्यास्थ होजाएगा तो सारा धर्म बंद हो जाएगा तो जो कलिराज कहते है यह तो किताप का सबसे पुराना ट्रिक है मैं पहले कर चुका हूँ यह, पहले ही मैं कर चुका हूँ।
काम और क्रोध की विफलता
तो क्या हुआ? अधर्म कहते है, क्या हो गया? तो कहते हैं की वास्तव में भगवान आते है तो भगवान उनके किसी वह इस भौतिक जगत के नाश्वर, नाश्वर रूप से वह आकर्षित नहीं होते हूं वह उन्के साथ ही उनकी भार्या को लेके आते है और उनकी जो तो जो लख्षमी देवी है…उनके साथ आती है और वो लख्षमी प्रियाए खेरूपर ने आई थी तो मेरे जो सात्ि थे उनिहें कहा…कि आब ये बालक है बाल लीला कर रहा है जब नंजवान हो जाएगा तो लक्ष्मी प्रिया से मिलन कर लेगा और सारा धर्म के वारे में भूल जाएगा और खुदी लिला करते रहेगा तो मैं उनपर विश्वास करके मैं इंतजार कर रहा था पर जब लक्ष्मी प्रिया देवी आ गई तो उनने उनके साथ कुछ लिलाय की पर फिर बाद में वे जानते थे कि वे सन्यास लेने वाले हैं इसलिए उनने अपनी योजना से लक्ष्मी प्रिया को भगवधाम भेज दिया जब भगवधाम भेज दिया तो मैं बड़ा हताश हो गया पर फिर मैंने सोचा कि मैं तो इसलिए मैंने सची माता पर प्रभाओ करके बाकी सब मायापूर वासियों के प्रभाओ करके शुचेतन महापूर का विवा विश्णुप्रिया से कर दिया।
तो वास्तव में तो वास्तव में यह क्या होता है एक गाउ में एक बार बड़ा अलसी व्यक्ति था तो वो अपने घर से भी नहीं निकलता था अपने ऐशे पड़े रहता था तो एक बार देखा कि अपने घोड़े पे बहुत तेसिज दौट जा रहा है तो वोले अच क्या हो गया आप तो इतना अलसी इतना तेज़े कैसे जा रहे है आप? मुझे मत पूछो, गोड़े को पूछो तो वास्ता में यह जो हो रहा है यहाँ सब भगवान अपने अंतरंग लिला कर रहे हैं पर कलियुगा सोच रहा है कि कलिराज सोच रहा है कि मैं यह सब कर रहा हूँ तो भगवान अपनी स्वेच्छा आते, वो लख्षीपिरीयास हे विवा करते फिर विषाझनुपरीयास हे विवा करते पर जिसे मह realised बगवान बताते है वो सोचता है जो जिवात्मा प्रकरृती के गुणों से मूहित हो गया है वो सोचता है कि मैं करता हो गया हूँ।
तो उसी तरह से कलिराज सोच रहे है कि मैं करता हूँ मैंने ये सारा किया। चेतन महाबुगावियों इनसे करवाया, फिर इनसे करवाया पर वास्तव में भगवान के अपनी लिला चल रही है। अफिर वो जो विश्णी प्रिया देवी है उनके सॉंदर उनके सद्गुणों का सब वर्वन करते हैं और तभी तो मुझे पूरा विश्वास हो गया था। अभी मुझे चेतन महाबुगावियों उनका नाम था विश्वं भर था विश्वं भर से भी कोई चिंटा नहीं है मुझे पर चेतन महाबुगावियों अचानक वो अपने घर में थे और एक दिन उनको क्या विचार आ गया वो चले गए वो चले गए गाया में और उनने घर में कहा कि मैं जा रहा हूँ मेरे पिताजी का शाद्ध का उसर था उसके लिए पिंड दान करने के जा रहा हूँ पर जब वहाँ पे गए तो उनने क्या किया वहाँ पे इश्वर पूरी से मिल गए जब इश्वर पूरी से मिले तो इश्वर पूरी ने क्या जादू किया उनके मुझे बता नहीं वो पूरे ऐसे परिवर्थित हो गए कि ये अपने पत्नीज अपने घरवाले सबको भूल गये और सिर भगवान कृष्ण का कीरतन कीरतन करते रहे और तब से जो उनका पागलपन है वह दुसरे उनके लोग उनसे मिलने आया उनका पागलपन करने पर उन्हें अपना पागलपन सबको फैला दिया है अभी तो अभी वास्तो में मैंने सारा प्रयास कर लिया है जो तुम बोल रहे पहले ही कर चुका कुछ फायदा नहीं होता है इसका।
तो फिर कोई बात नहीं है हम जानते हैं तो आधरम ने कहा कि कोई बात नहीं है अगर काम काम नहीं करता है तो हमारे बास उससे दूसरा बड़ा आस्तर है क्रोध तो आप जानते हैं कि पहले हमने विश्वा मित्रमुणी को काम से गिरा दिया फिर पहले पहले कौन आई थी मिन्क आई थी फिर बात में राम भाई और फिर उसको क्रोध से गिर गए तो हम काम नहीं जलेगा तो हम क्रोध लगेगे तो वोले वो भी मैंने प्रयास कर चुका हूँ कुछ नहीं हुआ, क्या ऐसे कैसे हो सकता है बताये क्या हुआ वोलते हैं कि वास्तव में जब शी चैतन्य महाप्रभू अपनी लिलाय कर रहे थे तो उनकी लिलाँ से सब प्रभावित हो गए, सब आकरशित हो गए, यहां तक कि न खेवल जो भक्ति के प्रवुत्ति के थे पर जो ब्रामन थे वो भी आकरशित हो गए, जो नीच जाती के लोग थे, वो भी आकरशित हो गए मलेच्छ भी आकरशित हो गए तो मैं सोच रहा था कि जो भक्ति के लोग आकरशित नहीं हो रहे है, वो अभक्ति का कारे करेगे, तो उस से यह जो चैतन्य है, वो क्रुद हो जाएगे पर जो भी उनके संपर्क में आदे थे, वो भी भक्ति का परभाव हो जाता था।
तो एक बार एक बहुत नशा करने वाला एक मलेच्छ था और वो चेतन महाप्रू के वहाँ से गुजर रहा था और उसको तभी नशा मिल नहीं रहा था तो अगर कोई नशापान से आसक्त है, बद्ध है उसको नशा नहीं मिलता है, तो बहुत क्रुद हो जाता है कहीं न कहीं से तो भी शराप चाहिए अभी, तो मैं सोचा था कि वो अभी, मैंने ऐसी योजना की कि वो चेतने महाप्रो से मिलेगा और चेतने महाप्रो भी क्रुद हो जाएगा और फिर चेतने महाप्रो क्रुद हो जाएगे और फिर वो क्रुद से मेरे पकड़ में आ जाएगे पर वो उसने जैसे ही वो चेतने महाप्रो को देखा तो चेतने महाप्रो क्या जादू क्या पता नहीं उसको अपने जीवन का सबसे बड़ा नशा मिल गया और उस नशे से वो ऐसा उन्मत हो गया कि आज तक अभी तक उन्मत है वो और अभी किसी नशा की सुरूद्धी नहीं है उसको तबी से हरे नाम में लग गया है और उसके जो सहवा आगी थे उसके जो बाके लेच्चे धर्म के लोग थे वो ये पागल हो गया है उसको पागल पन से बचाने के लिए वो पीटने लग गया है पर जो उसको सपर्श कर रहा था वो भी पागल गया था तो इसलिए बाकी सब लोग उसको पीटना भी छोड़ दिया और वो अभी भक्तों के संग में आके भक्ति कर रहा है तो यहां देखकर तो मैं भैवित हो गया और फिर मैं विचार करने लग गया अभी क्या करूँ।
जगइ-मदाइ का उद्धार और सुदर्शन चक्र का प्रगतीकरण
तब्तबी मैंने सोचा कि ये जो चेतने महा प्रभू है वो सब पे कुरपा कर रहे है पर नवधिप में दो व्यक्ती है वह बहुती धर्मशील परिवार में जन्म हुआ था पर अभी वे अधर्म के मुर्तिमान रूप बन गये हैं कौन है वो? जगाई और मदाई तो मैं उनका और चेतने महा प्रभू को आमने सामने ला दूँगा तो फिर क्या होगा? तो फिर चेतने महा प्रभू बड़े क्रोध हो जाएगे और मैं ऐसी योजना करूँगा कि चेतने महा प्रभू साधार एंटेया जो पतीत लोग है उन पे क्रोधित नहीं होते उन पे कृपा करते हैं पर वो अपने भक्तों पे बहुत प्रेम करते हैं और अगर कोई अपने उनके भक्तों पे आक्रमन करेगा तो फिर वो सही में If you are truthful, you will accept what we are teaching.
तरवंति सर्फो लिखते है कि वहाँ पर जो रपोर्टर आया था वो अपनी एक कहानी लिखना चाहता था और उस कहानी में वो सोच रहा था कि प्रभुपायजी को मैं एक भूमिका दे दूँगा. एक स्वामी है वो भारत से आये है तो वो क्या सिखा रहे है, बुद्ध क्या सिखाते हैं उनके समानता क्या है, फलक क्या है उससे मैं एक कहानी बना दूँगा प्रभुपायजी ये आध्यात्मी जगत से आये है और वो सब बद्धजीवात्माव को बगवान के उद्धार की कहाणी में एक भुमिका दे रहे है तो इसलिए वो क्या देख रहे थे वो इस रिपोर्टर को एक रिपोर्टर के रूप में नहीं देख रहे थे वो इसको एक आत्मा के रूप में देख रहे थे और ये रिपोर्टर क्या ये धर्म क्या है, वो धर्म क्या है, वो धर्म क्या है इसके इसके टेकनिकालिटी, इसके छोड़ी-छोड़ी बातों में फसकर, जो परम सत्य के बारे में प्रगती करनी है वो भूल जा रहे थे, परवपाद जी बोले, हम सत्य सिखार रहे हैं, और अगर आप सत्यवान हों सत्यशिलों, आप सकार करोंगे इसको तरीक उसी तरह से, कलिराज सोच रहे थे, कि मैं अभी सारे जगाई-मदाए की लिला कर रहा हूं, पर चेतने महाप्रो अपनी लिला कर रहे है चेतने महाप्रो जब लिला कर रहे थे, तो फेर उन्होंने कहा नित्यानन्प्रभू से, हे नित्यानन्प्रभू आप घर-घर भी जाके उपदार करो सबका, और जब इस तरह से लिला कर रहे थे, तो वो जगाई-मदाए की लिला आप सबको पता है, मैं उसमें इस तारत में नहीं आओंगा अभी, पर पहले बार जगाई-मदाए का जब मुलाकात होती है, तो वो लिला में और रस लाने के लिए क्या करते हैं नित्यानन्प्रभू और तो वास्तमें जब जगाई-मदाए को पहली बार देखते हैं नित्यानन्प्रभू, तो वो सोचते है, वो सोचते है कि उनकी जो आखे है, वो एक्साइटमेंट से चमक्र लगती है, वो उत्सहास से चमक्र लगती है, वो सोचते है कि इनका उद्धार हो जाएगा, तो फिर चेतने महाप्रू की महिमा है तीनों लोकों में फैल जाएगे, जैसे शास्त्रों में वर्ण किया गया है कि जो बगवान नारायन है, उन्होंने अपने नाम के द्वारा ही अजामिल का उद्धार कर दिया, तो वैसे ही चेतने महाप्रू की महिमा फैल जाएगे, कि उन्होंने भी जगाई मदाई का उद्धार गया, इसलिए वो फैसला कर लेते हैं, कि मैं इनका उद्धार करके रहूंगा, और फिर इसलिए दूसरी बार जाते हैं, जब जा रहे है, तो हरिदास ठाकूर कहते है, इस लाके में पहले ही हम खत्रे में गए थे, वापस क्यों जा रहे हैं यहाँ पे, तो नहीं, हम यहीं पे जाना है, और जब जाते है, तो कहते है, कि कृपया आप कृपया हरिनाम लिजे, जो मदाई होता है, शराप का मठका होता है, जोर से ठेकता है इन त्यानपरोग के सिर्फे, जब सिर्फे लगता है, तो खून बहने लगता है, सारा खून उनके चेहरे पे आ जाता है, तो जब ये हरिदास ठाकूर डड जाते हैं, बाकिस सब जो लोग होते हैं, अभी तभी वापस प्रहार करने आ जाता है, जगाएं उनको रोप देता है, और जब जेतने महापरोग के समाशार पहुँचता है, जेतने महापरोग ख्रोधित हो जाते हैं, और ख्रोधित होकर तेज़ी से वहां पे आ जाते हैं, और जब वहां पे ख्रोधित होकर आ रहे हैं, तो वह चिल्लाते हैं, चक्रा, चक्रा, और उनके हाथों में उनका सुदर्शन चक्रा आ जाता है, और जो आस्मान में बिज्ड़ी चमकने लगती है, जो गड़गड़ारत होने लगती है, और यह देखके कलीरा सोच रहे है, अभी मैं यश्यस्वी हो गया, अभी मैं यश्यस्वी हो गया, अभी यह ख्रोध के पकड़ में आ गये हैं, और सोचते हैं, अभी मान लिजे विजे होने ही वाला है, और जब विजे होने ही वाला है, आखरी मुमेंट में कुछ बिल्कुल उल्टा हो जाता है।
नित्यानंद प्रभु की कृपा और योगमाया का मोह
जैसे जैदरत की लिला होती है, तो सूर्य जो होता है, धंग जाता है, तो जैदरत और कौरों को लगता है कि अस्त हो गया है, तो इसलिए जैदरत सब के सामने प्रकड़ जाता है, और कहते हैं अर्जुन, तुम चिता में जलने वाले हो, तुम्हारे लिए आग लगाओं मैं अभी, तो आगे बच्चो, उनको उक्सा रहा हो, चिला रहा होता है, तो भगवार क्या कहते हैं, अर्जुन से कहते हैं, कि अभी तक समय है, और तुम ब्रह्मास से अपने तीर पे लगाओं, ब्रह्मास तीर पे लगाओं, और फिर क्या करते हैं, वो चक्रों को बाजु कर देते हैं, और वो कहते हैं अर्जुन से, वो देखो सूर्या, वो देखो जैदरत, और आखरी समय में, जब कौरों को लग रहे हैं, जब जीत गए, तभी हार जाते हैं, तो कैसे है, कोई क्रिकेट मैच में, एक टीम पूरा जीत रहा है, जीत रहा है, और आखरी एवर में भी 36 रन चाहिए है, और कोई मैटसों, 6 चक्के माड़ते हैं, जीजाते हैं, कुंसर टिप्यो, क्या हो गया ये?
तो, वैसे ही, वैसे ही, अभी कलीराज सोच रहा है, कि अभी चक्र भी प्रखट हो गया है, चेहतने महाप्रू क्रोईध हो गया है, यह चक्र है, यहाँ पर जगाई मदय का गला है, जाएगा, और अभी क्रोध से, कोध के पकड़ में आ जाएगे, और वो सोच रहा है, अभी खुश हो रहा है, तभी क्या होता है? उसको पता नहीं है, कि चेहतने महाप्रू, कृपा के परम्मूर्ति है, पर उनसे भी बड़े कृपाशील कौन है? नित्यानन्प्रभू, तो नित्यानन्प्रभू, बीच में अच्छानक आ जाते हैं, और वो क्या करते हैं? चेहतने महाप्रू के पैरों में गर जाते हैं, और वो देव, अगर आज तक, मैंने कुछ पुन्य किया है, मैंने कुछ भक्ति किया है, मैंने कभी आप कुछ प्रसंद न किया है, मैंने आज तक आपसे कुछ मांगा नहीं है, मैं आज आपको सिर्फ एक दान मांगता हूँ, तो चेहतने महाप्रू कोईद हो गए, पर फिर भक्त का निवेधन है, उसको वो दुरलक्ष नहीं कर सकते हैं, क्या चाहिए, ते ये जो दो व्यक्ती हैं, इनका देहा आप मुझे दान में देदो, और कलिराज सुनता है, सत्या नाश, तो इस तरह से, कलिराज जो है, वहाँ अधर्मों से चर्षा कर रहा है, कि मैंने इतने सारी योजनाएं बनाएं, किसी का भी कुछ भी फायदा नहीं है, काम भी कुछ काम नहीं करता है, क्रोध भी काम नहीं करता है, वह बोलता है कि, हाँ, काम और क्रोध काम नहीं करता है, तो लोब काम कर सकता है, तो हम प्रलोबित कर देगें, वह बोलता है, ये जो लोब है, चेतन महा पुरू ने तो, लोब की बात छोड़ो, ने सन्यास ले लिया, अभी तुम क्या करोगे, किसी भी भौतिक चीज से, वह आकरशिप नहीं है, और सब कुछ त्याग करके, अभी भ्रहमन कर रहे हैं, सारे, देश भर में, सब लोग का उद्धार कर रहे हैं, फिर वह धूर से देख रहे है, तो ये जो कलिरा आज भी, चेतन महा पुरू विद्यमाने, अभी नाटक में जो चिलाय बता रहे है, नाटक की रच्छना, चेतन महा पुरू जाने के बाद हो रहे है, पर नाटक में जो वरन हो रहा है, चेतन महा पुरू अभी चल रही है, तो बोलते हैं कि वास्तो में जो व्यक्ति जिस तरह से नाच रहा है, गिर रहा है, रो रहा है, ये तो पागल लगता है मुझे, तो यह हमारा जो काम, क्रोध, लोब, मोह जो है, मोह पहले से इनको गरस्ट कर रहा है, आप क्यों चिंदा करें उसके, तो वास्तो कहते है, यह मोह जो है, यह महा माया का मोह नहीं, योग माया का मोह है, क्या बतलब, पर यह ऐसा मोह है, जो दो मोह तुम डालते हो लोगों पे, उससे वो बंधन में पर यह मोह ऐसा है, कि जिससे बंधन से मुक्त हो जाते हैं, तुम्हारा जो मोह है, उसका पागलपन क्या है, कि भगवान जहां है भी, वहां भगवान दिखते नहीं हो, वह मोह ऐसा है, पर योग माया का, वो महा माया का मोह जैसे, कि मंदिल में भी आये गए, तो बोली यह बथ्थर है, भगवान थोड़ी है, जहां भगवान है, वहां पर दिखेंगे नहीं, पर योग माया का मोह ऐसा है, कि जहां भगवान नहीं भी है, वहां भगवान दिख जाएगे, वो जो मोह है, वास्तों में भगवान सब जगव पे है पर हमारे दुष्टे दिखते नहीं योगमाया के दुष्टे से स्थावर जंगम ना देखी ना देखी तारमूर्ती सर्वत्रहय निज्य इश्ठ देवस्पूर्ती जेति महाप्रू के बारे में स्थावर जंगम ना देखी यहाँ कोई चल या अचल चीस यहाँ कोई वत्थर है यहाँ कोई हीरन है यहाँ कोई पक्षी है कुछ देखी नहीं रहते स्थावर जंगम ना देखी देखी तारमूर्ती देखी तारमूर्ती वह सब जगह भगवान को ही देख रहे थे सर्वत्र हय निजव इश्ट देवस पूर्ती सर्वत्र हय सब जगह क्या होता था उनको इश्ट देवस पूर्ती इश्ट देवन के कृष्ण भगवान के उनकी पूर्ती हो रही थी।
तो वास्तो में जब चेतने महा प्रवु प्रवास कर रहे थे तो जबीवी उनको कोई चोटी से चोटा सा जंगल भी देख रहा था कोई वंद देख रहा था तो उनको क्या समान होता था प्रिंदावन का समान होता था कोई भी नदी देख जाती थी तो उनको किसका समान होता था यमुना का समान होता था कोई भी चोटा सा कोई परवात या पहार देख रहा था कोवर्धन का समान होता था तो अभी यह मात पूर्ण है अगर चेतने महा प्रवु कोई जंगल को देख रहे है सोच रहे है वह रंदावन है
अध्यात्मिक जीवन में प्रश्न और रस का स्तर
तो क्या वह जंगल वृन्दाबन है क्या वह जंगल वृन्दाबन है? अगर हां कहेंगे तो फिर अगर नहीं कहेंगे तो क्या होता है? उसका मतलब है चैतन्य महाप्रभु गलती कर रहे हैं और अगर हां कहेंगे तो फिर चैतन्य महाप्रभु उससे जंगल में क्यों नहीं रुकते वृन्दाबन क्यों जाते रहते हैं? आगे तो चैतन्य महाप्रभु जो भी जंगल देखते है, वह जंगल देखते जरूर है, पर फिर भी उस जंगल में रुकते नहीं है, वो आगे जाते हैं वृन्दाबन की ओर। तो क्या होता है, आध्यात्मिक जीवन में हम हां या ना से जवाब प्राप्त नहीं कर सकते हैं। कई बार जो होता है, वो ही एक भावना का सवाल है। वो कभी-कभी ऐसे सवाल अगर हम पूछते हैं, तो वो सवाल क्या होता है? वो हमें फंसा देते हैं। मान लीजिए कोई व्यक्ति को आप जाकर पूछते हैं, क्या आपने आपकी पत्नी को पीटना बंद कर दिया है? तो अगर नहीं बोला, तो बेचारा अभी तक पीटते हो। तो अगर हां बोल दिया, देखो तुमने ही मान लिया कि पहले तुम पीटते थे। तो क्या है, हां या ना जो भी बोले, फंस जाते हैं वो।
तो फिर उसका जवाब क्या है? किसने बोला कि ऐसे कुछ करता हूँ? तो जो मूल, जो उसका जो assumption है, what is assumption? जो उसका अनुमान जो है, वह गलत है वहां। तो ठीक उसी तरह से क्या भगवान गलती कर रहे है, यह सवाल ही गलत है। क्योंकि जो भगवान करते हैं, वो परम सत्य है। पर यहाँ पर भाव क्या है, चैतन्य महाप्रभु क्या कर रहे हैं, वहाँ पर वो आध्यात्मिक जगत में एक तत्व है और एक रस है। तो तत्व के स्तर पे हर एक जो जगह है, वो वृन्दाबन नहीं है, पर रस के स्तर पे वास्तव में जो भी चीज़ हमें भगवान का स्मरण दिलाती है, वह हमारे चेतना को और कृष्ण भावनामृत को आकृष्ट करती है और जितना व्यक्ति हर एक चीज़ का संबंध भगवान से जोड़ सकता है, हर एक चीज़ के द्वारा भगवान का स्मरण कर सकता है, उतना उस व्यक्ति का रस और उच्च उतना उस व्यक्ति की जो प्रगति आध्यात्मिक चेतना है, वो और उच्च है।
नंदा महाराज का भाव और कृष्ण के प्रति वात्सल्य रस
तो इसलिए यह जो है, हम भौतिक स्तर पर सही और गलत जो बोल रहे हैं, वह आध्यात्मिक स्तर पर लगता नहीं है। आध्यात्मिक स्तर पर अगर नंदा महाराज जो है, वहां सोचते हैं कि ये कृष्ण को इतने ख़तरे आते हैं, अभी मैं मेरे वेबसाइट पर कई बार सवाल-जवाब करता हूँ, तो मुझे कृष्णों पर सवाल पूछा गया कि अगर कोई साधारण घर में है और कोई बालक को बहुत ख़तरा होता है, तो माता-पिता कहते हैं कि तुम घर में बाहर मत जाओ, हम तुम्हारा संरक्षण करेंगे। तो यशोदा मई नंदा महाराज जो है, वह देखते हैं कि इतने सारे असुर आते हैं, कृष्ण को ख़तरा होता है, तो वह कृष्ण को फिर बाहर जाना ही क्यों देते हैं, कि तुम घर में ही रहो, हम तुम्हारा संरक्षण करेंगे। तो वह यह तो विश्वास नहीं कर रहे हैं कि कृष्ण भगवान हैं, वो सोचते हैं कृष्ण हमारा बालक है। तो नंदा महाराज क्या सोचते हैं, कई कारण है इसके लिए। वह सोचते हैं कि मैं नारायण की पूजा कर रहा हूँ, नारायण अपनी चमत्कारी शक्ति से कृष्ण का संरक्षण कर रहे हैं। तो यह उनका भाव होता है।
तो अभी क्या यह गलत है? तत्व के स्तर पे यह गलत है, पर वास्तव में यह एक भक्त के भगवान की सेवा की तीव्रता का लक्षण है कि हर तरह से भगवान की सेवा करना चाहते हैं। तो जो वात्सल्य रस में वो सेवा कैसे करना चाहते हैं? संरक्षण के द्वारा। इसलिए वे भगवान की प्रार्थना करते हैं और संरक्षण कराते हैं। तो रस के स्तर पे हर तरह से भगवान का स्मरण करना यह कोई गलती नहीं है, यह परम सत्य है। तो चैतन्य महाप्रभु का जो मोह है, वो वास्तव में सर्वोच्च रस का लक्षण है, उससे ऊंचा कोई रस नहीं है। हर जगह, हर चीज़ के द्वारा सिर्फ भगवान का स्मरण होना, वो जो कृष्ण भावना का सर्वोच्च स्तर है।
चैतन्य महाप्रभु का दिव्योनमाद और अंत्य लीला
चैतन्य महाप्रभु का जो उनका मोह होता था, वो तीन स्तर पे होता था। तीन स्तर पे मतलब वो भक्तों के साथ ही है, पर वो कुछ और चीज़ देख लेते हैं, जो और कोई देखता नहीं है। जैसे कि चैतन्य चरितामृत के अंत में बताया गया है कि चैतन्य महाप्रभु अपने भक्तों के साथ जा रहे थे और वो जगन्नाथ मंदिर की ओर जा रहे थे, उधर से आ रहे थे और अचानक वो भक्तों से बात कर रहे थे, अचानक गायब हो गए, कहाँ चले गए? और देखे कि चैतन्य महाप्रभु दौड़ रहे हैं और वो दौड़ते-दौड़ते एक पेड़ की ओर जा रहे थे, हर साथ भक्त उनके पीछे दौड़ रहे थे। चैतन्य महाप्रभु उच्च भी थे और जब कोई व्यक्ति भावनाओं से विभूषित हो जाता है, तो ऐसी शक्ति आ जाती है कि जब भक्त चिल्ला रहे थे, प्रभु-प्रभु रुकिए।
भक्तिरसामृतसिंधु जो है, वो रसों का एक प्राथमिक ग्रंथ है और उसका ख़ास करके श्रृंगार माधुर्य रस का जो विस्तारित वर्णन है, वो उज्ज्वल नीलमणि में किया है। तो उज्ज्वल नीलमणि में अलग-अलग रसों का वर्णन है। तो बताते हैं कि एक स्तर क्या है, वो सब भक्तों के साथ ही है, पर वो ऐसी चीज़ देखते हैं जो और कोई देखता ही नहीं है। वह दिव्योनमाद का एक स्तर है। उन्माद मतलब पागलपन, दिव्यो मतलब एक वो भौतिक पागलपन नहीं, वो आध्यात्मिक पागलपन है।
तो दूसरा स्तर क्या है दिव्योनमाद का कि वो न केवल कुछ और चीज़ देखते हैं, पर वो एक अंतरंग स्तर से उस लीला में प्रवेश कर लेते हैं। मतलब बाह्य स्तर से वे बेहोश हो जाते हैं और फिर वो उनका चेतना है, कहीं और चल जाते हैं। तो एक बार चैतन्य महाप्रभु, ख़ास करके चैतन्य महाप्रभु जो अंत्य लीला जो थी उनकी, अंत्य लीला जो जगन्नाथ पुरी में कर रहे थे, तो उन्होंने जो आदि लीला में वो कैसे भक्ति शुरुआत की, उसका वर्णन आता है, थोड़ा बहुत नदिया पर प्रचार किया, उसका वर्णन आता है। मध्य लीला में सारे भारत भर में कैसे जाके उन्होंने प्रचार किया, उसका वर्णन आता है। और अंत्य लीला में अभी जो प्रचार है, उसके दो भी भाग होते हैं, एक प्रचार होता है बाहर प्रचार करना, दूसरा है अंदर प्रचार करना। बाहर प्रचार करना मतलब दूसरों को भगवान और भक्ति की ओर आकृष्ट करना। अंदर प्रचार करना मतलब कि हम स्वयं भगवान की ओर आकृष्ट जाते हैं और हम भगवान की ओर आकृष्ट कैसे होते हैं? प्रधान रूप से हम भक्तों से जब आकृष्ट होते हैं, तो भक्तों के द्वारा जो आकृष्ट होता है, उसके द्वारा हम भगवान की ओर आकृष्ट होते हैं।
भक्तों के साथ संबंध और षड्विध प्रीति लक्षणम्
प्रसंगमजरं पाशमात्मनः कवयो विदुः सहेव साधुनुकृत्तो मोक्षद्वारमपावृत्तम। भागवतम के तीसरे स्कंध में बताया गया है कि जब हमारी आस्ति किसी भौतिक चीज़ से होती है, तो उससे हम बंधन में फंस जाते हैं। पर वही आस्ति जब हम भगवान की ओर लगाते हैं या भगवान के महान भक्तों की ओर लगाते हैं, प्रसंगमजरं पाशम्, जो आस्ति का पाश है, वो कैसा है? अजर है। जरा मतलब बुढ़ापा, हमारा शरीर बूढ़ा हो जाता है, पर हमारी आस्तियां बूढ़ी नहीं होती हैं, वो वैसे की वैसे रहती हैं। तो इस दुनिया में सब चीज़ें जो हैं, जो पुरानी हो जाती हैं, तो कमज़ोर हो जाती हैं, पर आस्तियां जो पुरानी हो जाती हैं, तो और शक्तिशाली हो जाती हैं। प्रसंगमजरं पाशमात्मनः कवयो विदुः, जो विदु, विद्वान लोग जानते हैं कि आत्मा को बंधन में डालती है, वही अगर जो साधु है, भक्त है और भक्तों के द्वारा भगवान की ओर ही आकृष्ट हो जाती है, मोक्ष का दरवाज़ा खुल जाता है।
चैतन्य महाप्रभु वास्तव में प्रचार सिर्फ़ 6 साल प्रचार करते हैं, 24 साल में संन्यास लेते हैं। उसके पहले 2-3-4 साल मायापुर में ही प्रचार कर रहे होते हैं। फिर 6 साल विश्व भर में प्रचार करते हैं और फिर 30 साल से 48 साल तक वे जगन्नाथ पुरी में रहते हैं। ऐसे लगता है कोई प्रचार करते हैं नहीं, पर वास्तव में तभी क्या कर रहे हैं, वे अपने सब जो उनको मिलने आते हैं भक्त, उन सब के हृदय में और प्रवेश कर रहे हैं। तो भक्तों के साथ का आदान-प्रदान है, उससे क्या होता है? उससे हमारा भगवान से अंतरंग संबंध है, वो और बढ़ जाता है।
प्रभुपाद जी उपदेशामृत में लिखते हैं जो 6 प्रेम के आदान-प्रदान होते हैं—ददाति प्रतिगृह्णाति गुह्यमाख्याति पृच्छति। भुङ्क्ते भोजयते चैव षद्विधं प्रीतिलक्षणम्। तो यदाति प्रतिगृह्णाति, कि हम किसी को यह भेंट देते हैं, वह हमें कोई भेंट देते हैं। प्रतिगृह्णाति, भेंट लेना, भेंट स्वीकार करना। गुह्यमाख्याति पृच्छति, हम किसी और से कुछ शास्त्र श्रवण करते हैं और हम किसी और को हमारा उद्देश्य सुनाते हैं, कैसे भक्ति में प्रगति करने का प्रयास समार कर रहे हैं। भक्तों के प्रति प्रीति और भगवान के प्रति प्रीति और बढ़ जाती है। यह षड्विध प्रीति लक्षण है, उससे पछता और छटा करने के लिए हम बहुत उत्साही रहते हैं। और उसमें छटा क्या है? प्रसाद खाना, प्रसाद खिलाना। तो प्रसाद खाने के लिए बहुत ऊंचा होता है, तो वास्तव में अच्छा है, प्रसाद भी भगवान का एक रूप है, पर वो भगवान का इकलोता रूप नहीं है। इसलिए प्रसाद के लिए आकृष्ट होना अच्छा है, प्रसाद के लिए और बाकि भगवान का एक रूप है, कीर्तन है, प्रवचन है, वे ग्रोव उन सबकी सेवा है, उन सबके लिए आकृष्ट होना है।
तो भगवान अंत्य लीला जो है, उसमें क्या दिखाते हैं? अंत्य लीला में कैसे भक्तों के समूह में रहकर ये षड्विधं प्रीति लक्षण—ये छे प्रेम के आदान-प्रदान कैसे करने हैं, इसका वो हमें प्रदर्शन करते हैं, स्वयं के उदाहरण के द्वारा और जो कृष्णभावनामृत संघ है, उसके विकास के लिए ये बड़ा महत्वपूर्ण है कि भक्तों में प्रेम का आदान-प्रदान हो। और चैतन्य महाप्रभु अपने जीवन के अठारह साल में यह दिखाते हैं, आख़िर अठारह साल में। तो इसके द्वारा यह कितना महत्वपूर्ण है कि भक्तों में आदान-प्रदान स्नेह और आदर से भरा हुआ हो।
चैतन्य महाप्रभु का तिरोभाव और हृदय का संबंध
उसके द्वारा जो चैतन्य महाप्रभु जब धाम लौट जाते हैं, तो वास्तव में केवल 48 साल रहते हैं वो और साधारणतया कैसे होता है कि अगर कोई बड़ा रईस व्यक्ति है, बड़ा जागीरदार है, बहुत अमीर व्यक्ति है और वह जब उसकी मृत्यु होती है, तो फिर उसके पुत्र होते हैं, पुत्रियां होती हैं, रिश्तेदार होते हैं, वो सब में अभी झगड़ा होने लगता है कि ये जायदाद मेरी है, ये मेरा है, ये मेरा है। और कई बार उन्होंने जो भी चालू किया होता है, वो सब ध्वंस हो जाता है झगड़ों के कारण। झगड़े भी नहीं होए, तो भी क्या होता है? वो चालू रखने वाला कोई रहता नहीं है, सब वो भाव में ही रहता है। तो इसलिए क्या करते हैं, लोग अपना विल लिखते हैं, वारिस लिखते हैं कि ये हिस्सा इसके लिए, ये हिस्सा इसके लिए, ये हिस्सा इसके लिए और बड़े ध्यान-पूर्वक सब कुछ लिखते हैं और कई बार उसके बावजूद भी बहुत सारे झगड़े होते हैं।
पर चैतन्य महाप्रभु जो थे, वो केवल 48 साल तक रहे और जब उन्होंने अपनी लीला उन्होंने अंत की, तो एकाएक लीला अंत कर दी उन्होंने। तो ऐसे भक्तों को थोड़ा इंतज़ार आता, पर किसी को पता नहीं था, अचानक भगवान ने अपनी लीला अंत कर दी और साधारण अंत है। अगर किसी ने कोई संस्था चालू की है, कोई संघ चालू किया है, तो उसको आगे बरकरार रखने के लिए कई चीज़ें करनी पड़ती हैं। एक तो वो संस्था अच्छी तरह से बनानी चाहिए, कोई ओर्गनाइज़ेशन होना चाहिए, फिर अपनी जो इच्छा है, वो स्पष्ट रूप से लिखने के लिए कोई ग्रंथ लिखने चाहिए, अपना विल होना चाहिए और फिर साथ-साथ जो उनके बाद जो नेता बनने वाले हैं, वो नाम लिखने चाहिए, इनहेरिटर्स जो कहते हैं, वारिस जो थे। तो जो संस्था होनी चाहिए, ग्रंथ होने चाहिए और फिर वारिस होने चाहिए।
चैतन्य महाप्रभु ने इन तीनों में से कुछ भी नहीं किया, न ग्रंथ लिखे, न उन्होंने कोई मेरे बाद कौन नेता बनने वाले ऐसा कुछ लिखा और नहीं, जब चैतन्य महाप्रभु थे, तो तभी कोई संघ नहीं था, जो भी आते थे, प्रेरित होते थे, भक्ति करते जाते थे। चैतन्य महाप्रभु कुछ संघ नहीं किया, तो फिर भी जो गौड़िय वैष्णव भक्ति है, वो कैसे बरकरार रही? क्योंकि ये सब जो है, ग्रंथ लिखना, वारिस नेमना, संस्था बनाना, ये सब बाह्य है। असली जो जोड़ होता है, वो हृदय का जोड़ होता है और वो जो हृदय का जोड़ होता है, वह चैतन्य महाप्रभु ने षड्विधं प्रीति लक्षणम्—छह प्रकार के प्रीति जो थे, वो बहुत प्रचुर मात्रा में अपने भक्तों के साथ की थी और उसके द्वारा वो अपने भक्तों के हृदय में वो स्थापित हो गए थे और उसके कारण वे सब भक्ति करते रहे और यह एक ऐतिहासिक रूप से चमत्कार है।
और चमत्कार क्यों हुआ? क्योंकि वह हृदय का बंधन था। श्रील प्रभुपाद जी को कई बार पूछा जाता था कि आपके बाद आपकी संस्था को कौन चलाएगा? तो प्रभुपाद जी ने क्या जवाब दिया? जो इच्छा होंगे वो चलाएंगे, जो चाहेंगे वो चलाएंगे। क्या मतलब? प्रभुपाद जी बोले कि जो चाहेंगे चलाएंगे मतलब क्या? कि प्रभुपाद जी ने स्पष्टीकरण नहीं किया, पर उनकी जीवन से किया। एक बार जब वो मायापुर आए थे, तो उनके कुछ गुरु भाई थे, वो थोड़ी उनकी निंदा कर रहे थे। वो कह रहे थे कि इनको कुछ प्रभुपाद जी का संग नहीं मिला था, भक्तिसिद्धान्त ठाकुर का संग नहीं मिला था, वो उनको भक्तिसिद्धान्त से करना था, ऐसे करना था, उनको पता नहीं है। थोड़ी निंदा कर रहे थे कि कई भक्तिसिद्धान्त ठाकुर जब मिला कर रहे थे, तो प्रभुपाद जी उनके इतने घनिष्ठ शिष्य नहीं थे कि प्रभुपाद जी गृहस्थ थे, अपने पेशे में थे। वो हमें भक्तिसिद्धान्त ठाकुर की इच्छा है और पता है, पर इनको इतना पता नहीं है। तो भक्तिसिद्धान्त ठाकुर ने कहा, प्रभुपाद जी ने कहा कि जो ऐसे कह रहे हैं, उनको आप जाकर पूछिए कि मुझसे अधिक किसने ग्रंथ लिखे? मुझसे अधिक किसने मंदिर बनाए? मुझसे अधिक किसने और शिष्य बनाए? तो कह सकता है कि ये तो बड़े गर्व की बात कर रही है, मेरे इतना किसने किया है? पर प्रभुपाद जी बोले, गंभीर हो गए, प्रभुपाद जी बोले कि I have inherited the legacy of my spiritual master, कि मेरे गुरुदेव की वारिस मुझे मिली है।
अभी वारिस क्या मिली थी? जो गौड़िय मठ, बड़ा विशाल संस्था थी, पर जो विशाल संस्था जो थी, वो लगभग ध्वंस हो गई भक्तिसिद्धान्त ठाकुर जब चले गए, तो उसके बाद में क्या मिला? पर भक्तिसिद्धान्त ठाकुर ने प्रभुपाद को नहीं, तो उनको कुछ धन सामग्री मिली प्रचार करने के लिए, न कोई मंदिर मिला, न कोई सहयोगी मिले, प्रभुपाद तो अकेले अमेरिका गए, तो फिर क्या वारिस थी? वो वारिस जो थी, वह प्रचार करने की इच्छा। गुरु शिष्यों को क्या प्रदान करते हैं? वो सेवा करने की इच्छा। और हमें हमारे गुरुदेव का संग मिले न मिले, अगर व्यक्तिगत रूप से संग मिले न मिले, पर अगर हमें उनकी सेवा करने की… तो कई बार प्रभुपाद जी का कहने का भाव क्या था कि जैसे मुझे मेरे गुरुदेव से भौतिक कुछ भी नहीं मिला, पर जो उनकी सेवा का भाव, प्रचार का भाव उनसे मिल गया और उससे मैं सब कुछ किया। ठीक उसी तरह से प्रभुपाद जी बीबीसी वगैरह बनाए हैं, महत्वपूर्ण हैं।
पर कहते हैं कौन आपके बाद संस्था चलाएगा? जो मेरे जो सेवा का, प्रचार का इच्छा है, जो उसको बरकरार रखेगा, वो चलाएगा उसको। तो कई बार हमें भी हमारे जीवन में लग सकता है, जो भक्ति करने की इच्छा है, सेवा करने की इच्छा है, जो सुविधाएं नहीं मिल रही हैं, पर सबसे महत्वपूर्ण जो भक्ति के लिए ज़रूरत है, वो सुविधा नहीं है, वो है इच्छा। अगर हमें सेवा करने की इच्छा है, प्रचार करने की इच्छा है, तो उस इच्छा से बाकि सब कुछ प्रकट हो जाएगा।
सेवा की इच्छा और बाधाओं का सामना
कई बार क्या होता है? हम जब प्रचार करने की या सेवा करने की इच्छा होती है, उसमें कोई समस्याएं आ जाती हैं। तो वो समस्या से हम इतने… हम प्रचार करने की इच्छा हो जाती है, प्रचार करने की इच्छा हो जाती है। तो हम क्या करते हैं? यह समस्या क्यों आ रही है? तो क्या इधर से राम एक तीर मार रहे है, रावण एक तीर मार रहे है? तो इधर से एक तीर आता है, इधर से एक तीर आता है। जिसका तीर यहां शक्तिशाली है, वो तीर वैसे का वैसे रहता है, दूसरा तीर नीचे गिर जाता है। तो वैसे ही क्या होता है? तो इधर से हमारी सेवा करने की इच्छा आती है, और उधर से समस्या आ जाती है। तो क्या होते हैं, दोनों का टक्कर जाते हैं, तो हमारी इच्छा गिर जाती है। पर प्रभुपाद जी का सेवा करने का इच्छा इतना सुदृढ़ था कि कितनी बड़ी समस्या क्यों नहीं आए, वो समस्या गिर जाती थी और प्रभुपाद जी आगे चलते रहते थे।
तो ठीक उसी तरह से समस्या इस जीवन में सबकी जीवन में आएंगे, पर क्या है, समस्या आएंगे तो कभी-कभी सेवा सकता है, समस्या करने के लिए हमारी सेवा कम हो जाए, सेवा में थोड़ी व्यस्तता आ जाए, पर हमारी सेवा का इच्छा अगर हम बरकरार रखें, तो भगवान बराबर योजना बना देंगे, सेवा करते भी, सेवा हमको नया-नया मौका मिल जाएगा सेवा करने के लिए, कोई और बड़ी सेवा मिल जाएगी और आध्यात्मिक प्रगति किसी भौतिक परिस्थिति से रुक नहीं सकती है। सेवा करने का स्वरूप बदल सकता है, पर आध्यात्मिक प्रगति किसी भी परिस्थिति में चलती रहेगी।
तो यहां पे, मैं ये कहने का संदर्भ यह था कि चैतन्य महाप्रभु, अंत्य लीला में क्या किया? षड्विधं प्रीति लक्षणम्। वो जो उन्मत्त हो जाते थे, उन्मत्त होकर, वो ऐसी लीलाएं करते थे कि सब भक्त उनसे पूरा आकृष्ट हो जाते थे। प्रताप रुद्र महाराज, चैतन्य महाप्रभु उन्मत्त होकर जगन्नाथ रथयात्रा में नृत्य करते थे, तो वह क्या हो रहा था? जगन्नाथ रथयात्रा का लीला है, वो बहुत दिव्य लीला है।
मैं यह सब क्यों बता रहा हूँ? हम चैतन्य चंद्रोदय नाटक में अलग-अलग स्तर कैसे निष्फल हो रहे हैं, बता रहे हैं। तो मोह के बारे में चर्चा कर रहे हैं, तो मोह में भौतिक मोह और आध्यात्मिक मोह, उसके हम चर्चा कर रहे हैं। तो आध्यात्मिक मोह में अलग-अलग प्रकार के मोह में कि व्यक्ति यहीं पे है, पर दूसरा कुछ देख रहा है। दूसरा भाव जो है, चैतन्य महाप्रभु वहीं पे है, पर वो न केवल दूसरा कुछ देखते हैं, पर इस भौतिक स्तर पे वे यहां पे रहते ही नहीं है, क्योंकि वे बेहोश हो जाते हैं। तो ऐसे कई बार होता था कि वो जब लीला कर रहे हैं और एकाएक वो जब जा रहे थे और जब जा रहे थे तो उनको भगवान कृष्ण की वेणु सुनाई दी और वो एक दिन गायब हो गए और भक्त देख रहे हैं, कहाँ है चैतन्य महाप्रभु? तो एक कहीं कोने में बेहोश होकर गिरे हुए हैं और वो बेहोश होकर गिरे हुए हैं और भक्त अभी चैतन्य महाप्रभु पर पानी डाल रहे हैं, उनको होश में लाने का प्रयास कर रहे हैं। उनको लगा कि चैतन्य महाप्रभु अभी हमेशा के लिए चले गए क्या हो रहा है? वो चिंतित हो गए, पर उन्होंने देखा कि थोड़ा सा सांस आ रहा है और फिर तो सोचे कि ये चैतन्य महाप्रभु साधारण भौतिक स्तर पर अगर कोई बेहोश हो जाता है, तो भौतिक उपाय काम करेगा, क्या है? भौतिक स्तर से बेहोश हो गए, तो पानी वग़ैरह डालो, वो होश में आ जाएगा। पर आध्यात्मिक स्तर से बेहोश हो गए, पानी डालने से कुछ नहीं होने वाला है, तो हमें क्या करना पड़ेगा? आध्यात्मिक उपाय करना पड़ेगा। आध्यात्मिक उपाय क्या है? हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे, हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।
दिव्योनमाद और महाप्रभु का भाव
तो ऐसे ज़ोर से कीर्तन करने लग गए और वो भक्त देख रहे थे, कीर्तन कर रहे थे और चैतन्य महाप्रभु क्या देख रहे थे? चैतन्य महाप्रभु कृष्ण कृष्ण कृष्ण… या तो स्वयं कृष्ण खुद को दिखाते हैं, अपनी बुद्धूति दिखाते हैं, या अधिकांश रूप से एक कृष्ण एक भक्त के रूप में आए हैं। पर जब वो रामानंद राय से मिलते हैं, जो मध्य लीला का आठवां अध्याय है, वो रामानंद राय के संग से क्या होता है? जो चैतन्य महाप्रभु के अंदर जो राधारानी हैं, वो प्रकट होने लगती हैं, क्योंकि रामानंद राय कौन है? वो विशाखा देवी हैं, चैतन्य महाप्रभु के लीला में जो राधारानी की लीला में गोपियां हैं।
अगर हम देखते हैं श्रीवास्ता, अद्वैत आचार्य, ये नित्यानंद प्रभु, ये इनमें से कोई भी डायरेक्टली गोपी नहीं है। वो सब जो नदिया में आते हैं, जीवों का उद्धार करने के लिए आए हैं, दक्षिण भारत में प्रचार कर रहे हैं, तो भी वो जीवों का उद्धार कर रहे हैं, वो कृष्ण एक भक्त के रूप में आए हैं। पर जब उनको अपनी जो बहुत घनिष्ठ गोपिका जो है, रामानंद राय, जो विशाखा देवी, उनका संग मिलता है, तो वो राधा भाव प्रकट होने लगता है उनसे। और फिर जब उनसे कहते हैं विशाखा देवी से, कृपया रामानंद राय से, कृपया आप पुरी में आ जाओ और पुरी में हम साथ में रहेंगे।
तो जब साथ में हम आते हैं, तो उनकी जो पुरी की लीला है, पुरी की जो लीला है, वो राधारानी के भाव में है। तो उसमें चैतन्य महाप्रभु अधिकांश रूप से वो प्रेम में उन्मत्त रहते हैं। और जब राधारानी प्रेम में उन्मत्त होती हैं, तो वहां सिर्फ़ दुनिया का कोई और सुधि-बुधि ही नहीं है, वो सिर्फ़ कृष्ण के स्मरण में है। पहले भी चैतन्य महाप्रभु कृष्ण के स्मरण में रहते हैं, पर तभी वो इस तरह से कृष्ण का स्मरण करते हैं, प्रचार करते हैं, कीर्तन करते हैं और दुनिया का उद्धार भी करते हैं। पर यहां पे वो जो है पुरी में, वो राधारानी का भाव पूरी तरह से स्वीकार कर लेते हैं और वो ख़ास करके राधारानी का कृष्ण भाव, जब कृष्ण वृन्दाबन छोड़ के चले गए और राधारानी अकेली हैं वृन्दाबन में और कृष्ण का स्मरण करें।
ऐ दीनदयार्द्रनाथ हे मथुरानाथ कदा नु लोक्ष्ये हृदयं त्वदलोककातर्म्। दयित भ्राम्यति किं वने बतेति। ब्रह्म में हम वो कहते हैं, ऐ दीनदयार्द्रनाथ हे, यह राधारानी का भाव है। हम सब दीन हैं, पर आप आपके नाम के अनुसार दीनों का नाथ बनने के छोड़कर क्या किया आपने? मथुरानाथ, कदा नु लोक्ष्ये, आप मथुरा चले गए हैं और मथुरा के नाथ बन गए हैं। हम सब आपके वियोग में दीन हो गए हैं, हमें छोड़कर आप मथुरा में चले गए हैं, मथुरा के नाथ बन गए हैं। कदा नु लोक्ष्ये, हम कैसे और कब आपको देख पाएंगे? हृदयं त्वदलोककातर्म्, कि जब हम आपको देख नहीं पा रहे हैं, अलोककातर्म् हृदय जो है, अलोक मतलब न देखना, आपको न देखने के कारण जो हृदय है, वो कंपन हो रहे हैं। अभी मैं क्या करूँ? राधारानी को बिल्कुल पता नहीं है कि मैं क्या करूँ। वो जो विरह का भाव है, वो इतना इस तरह से अंदर से जलाता है कि कृष्ण का संग मुझे कैसे मिलेगा?
चैतन्य महाप्रभु वो भाव स्वीकार कर रहे हैं और यहां पे जब ये भक्त उनको लेकर आते हैं, वापस वो राधारानी के भाव में थे और राधारानी के भाव में वो विरिंदार में पहुँच जाते हैं और कृष्ण का दर्शन करते हैं और कृष्ण का दर्शन करते हैं, कृष्ण से मिलन करने वाले हैं और तभी भक्त कीर्तन करते हैं और भक्त कीर्तन करते हैं, तो जैसे ही कृष्ण से मिलन होने ही वाला है और उनको खींच के लेकर आते हैं, तो वैसे चैतन्य महाप्रभु डूब जाते हैं, कृष्ण से मिलन करने ही वाले हैं, तो उनको खींच के लेकर आते हैं। तो बेर तभी रामानंद राय और जो बाक़ी पार्षद थे, स्वरूप दामोदर, वो ललिता और विशाखा के रूप में सांत्वना देते हैं, वो अलग-अलग से श्रीमद्भागवतम् से बहुत सुंदर श्लोक हैं, गाते हैं, हरिनाम संकीर्तन करते हैं और फिर चैतन्य महाप्रभु को भले ही कृष्ण का संग नहीं हो रहा है, कृष्ण के ध्वनि के रूप में संग होता है और उससे उनको सांत्वना मिलती है।
कूर्म अवतार रूप और दिव्य पागलपन का सार
और जो तीसरा पर, उसके साथ-साथ उनका शरीर बहुत विस्मय रूप से परिवर्तित हो जाता है। तो कभी-कभी क्या होता है? चैतन्य महाप्रभु जो थे, वो ऐसे दिव्योनमाद के कारण उनका सारे शरीर के जो अंग हैं, उनका शरीर के परिवर्तित हो जाता है। हम बाक़ी, हम जितना एकाग्र होते हैं, तो बाक़ी सब चीज़ों से हमारा ध्यान पीछे होने लगता है। हमारा ध्यान के लिए केवल आँखों से देखते हैं, पर हमारे हाथों से कुछ स्पर्श करते हैं, पैरों से कुछ स्पर्श करते हैं, तो जितनी एकाग्रता चाहिए, उतनी क्या है? बाक़ी जो भी एकाग्रता से व्यक्ति लाता है, उससे हम दूर होते हैं।
जैसे लोगों को अगर पिक्चर देखना है, तो क्या करते हैं? पहले लाइट बंद करते हैं, क्या होता है वहाँ पे? मोहों में जाना है, तो सत्य को भूलना चाहिए पहले। तो यहाँ एक विकृत प्रतिबिंब है, पर वास्तव में क्या है? जब भक्त भगवान की लीला में एकाग्र होना चाहते हैं, तो फिर वो क्या चाहते हैं? कि सब जो व्यक्ति हैं, वो निकल जाएं। तो इसलिए गोपियां कहती हैं कि जो आँखें हैं, हमारी, ब्रह्मा जी कितने मूर्ख हैं, उन्होंने ऐसी आँखें बनाई हैं कि वो बंद होते रहते हैं बीच-बीच में और वो बंद होते रहते हैं, हमको भगवान को दिखाई नहीं रहता है। तो अनु नौन जपक में बताते हैं कि जब हमारी एक पलक झपकती है और आँखें बंद हो जाती हैं, तो एक बार जब पलक झपकती है, तो उस एक पलक के झपक में मान लीजिए हमारे हृदय में हज़ारों भूकंप हो जाते हैं कि कृष्ण का दर्शन हमें नहीं हो रहा है। तो क्या जब ध्यान होता है, तो तभी क्या, जब ध्यान होता है, तो किसी भी और चीज़ का दर्शन, किसी और चीज़ के ओर ध्यान में व्यवधान नहीं होना चाहिए?
तो इसलिए उसके कारण क्या होता है? सारे शरीर के अंग हैं, वो सब अंदर आ जाते हैं। तो क्या हाथ भी किसी को स्पर्श नहीं करे, पैर भी किसी को स्पर्श नहीं करे, सिर्फ़ और जगन्नाथ बलदेव सुभद्र आप देखें, तो आँखें जो हैं, एकदम बड़ी हो गई हैं, एकदम बड़ी आँखें हो गई क्यों? और बड़ी आँखों से वो भगवान का जो रूप है, वो जगन्नाथ बलदेव सुभद्र है, वो व्रजवासियों की लीला का श्रवण कर रहे हैं, व्रजवासियों का दर्शन कर रहे हैं और बाक़ी सब भूल गए। तो वैसे ही चैतन्य महाप्रभु जब लीला करते हैं, तो क्या होता है? वो कभी-कभी न केवल वृन्दाबन लीला में प्रवेश कर लेते हैं, पर साथ-साथ उनका जो शरीर है, परिवर्तित हो जाता है।
तो एक बार जब देखते हैं भक्त, सब जब चैतन्य महाप्रभु अपने कमरे में होते हैं, अचानक रात को गायब हो जाते हैं। इसलिए कहाँ गए चैतन्य महाप्रभु? सब जब ढूंढ रहे हैं-ढूंढ रहे हैं, कहीं भी नहीं मिलते हैं और अंत में वो देखते हैं कि एक गोशाला में चैतन्य महाप्रभु हैं और वो एक कूर्म के रूप में हो गए हैं। जो कूर्म होता है, कूर्मो अङ्गानीव सर्वशः, भगवद्गीता में कहते हैं, सारे कूर्मों के जो हाथ-पैर होते हैं, वो अपने शरीर के अंदर लेता है, चैतन्य महाप्रभु के सारे शरीर अंदर चला जाता है। असल क्यों होता है? क्योंकि वो जो दिव्य लीला का दर्शन कर रहे हैं, स्मरण कर रहे हैं, उसमें सहभागी हो रहे हैं, पूरी तरह से उसमें सहभागी होना चाहते हैं और इसलिए कोई भी व्यक्ति नहीं चाहते हैं।
तो क्या हुआ? तो कुछ बोले कृष्ण-कृष्ण-कृष्ण बोलते जा रहे हैं, क्या हुआ? कृष्ण-कृष्ण-कृष्ण… तो क्या हुआ? तो फिर वो थोड़ा शांत हो जाते हैं। मैं जब यहां पे मछली पकड़ने जाता हूँ, तो मुझे लोगों ने बताया कि इस इलाके में कुछ भूत रहते हैं, तो इसलिए जब मैं मछली पकड़ता हूँ, तो मैं क्या करता हूँ? मेरे हाथ में वो मछली पकड़ने का जाला होता है, मुझे नरसिंह का मंत्र होता है, तो नरसिंह का मंत्र सुनके जो भूत चल जाते हैं, पर आज पता नहीं मुझे ऐसा भूत लग गया है, जितना मैं नरसिंह का मंत्र बोलता हूँ, भूत और चल जाता है। तो मैंने सुना था कि जो कृष्ण मंत्र है, नरसिंह से अधिक है शक्तिशाली, इसलिए मैं कृष्ण मंत्र बोल रहा हूँ, पर ये भूत का पकड़ते और जा रहा है और बढ़ते जा रहा है। तो फिर सर्वधामों सुनके हैं सुचारु लगते हैं, तो कब से चालू हो गया ये? कि वो मैं जो मछली पकड़ने गया था, तो ठीक था, मैं सुचारु बोल रहा हूँ, पर वो जो मछुआरा बोल रहा होता है, वो बीच में ही कृष्ण का कृष्ण बोलते जा रहा है और फिर कुछ बोल रहा है, शांति से भी नहीं आ गया है, शांति नहीं है, वो नशा चढ़ गया उसको। कब से चालू हो गया है? कि मैं जब गया सागर में, मेरे नाव में, तो सब कुछ ठीक था, पर बाद में मैं जब जाला फेका था, तो तभी मैं देखा कि अचानक जाला बहुत वज़नदार हो गया, तो मैं सोचा कि एक बहुत बड़ी मछली पकड़ ली मैंने आज और फिर जब मैं मछली को खींच रहा था, मैं बाहर देखा कि एक बहुत विचित्र रूप था वो और जैसे ही मैंने वो रूप को बाहर निकाला और स्पर्श किया, तो वो भूत मुझे लग गया, तो लगता है वो व्यक्ति मर गया था, उसकी लाश से भूत निकला और मुझ में आ गया है।
तो क्या करूँ? मुझे लगता है जो भूत निकालने वाला कोई व्यक्ति होता है, उसके पास जाना पड़ेगा मुझे। तो सर्वदामोदर मुझे समझ गया क्या हो गया है? बोलते हैं कि मैं भूतों को निकाल सकता हूँ। अच्छा, कैसे निकालते हैं? मुझे थप्पड़ मारते हैं। तो उससे क्या हो गया? कि तुम ये कृष्ण मंत्र है, शांति से कृष्ण मंत्र तुम बोलते रहो और वो जो व्यक्ति है, उसको पकड़ा था, वो कहां है, मुझे बताओ तुम। पहले नहीं-नहीं-नहीं, वो तुमको भी लग जाएगा, तुमको नहीं बताओ को, मेरा नाश हो गया, तुमको नाश हो जाएगा। नहीं-नहीं बोलते, कुछ कोई बात नहीं, तुम बताओ। कोई मूर्त व्यक्ति नहीं है, वो महाप्रभु है। तो है कि नहीं? मैं महाप्रभु को बहुत बार दर्शन किया है, यह व्यक्ति महाप्रभु नहीं है, बिल्कुल आदरणीय व्यक्ति है, यह जो व्यक्ति है, जब दिव्योनमाद हो जाता है, तो इस तरह से शरीर परिवर्तन हो जाता है, नहीं, यह महाप्रभु हो ही नहीं सकते, तुम जो महाप्रभु लेके जाओ।
बोले जब तुम महाप्रभु लेके जाओगे, महाप्रभु जब पुनः बाहरी चेतना में आएंगे, तब तुम्हारा यह भूत चल जाएगा। लेके जाओगे नहीं, तो फिर जब लेके जाते हैं, तो वहाँ पर चैतन्य महाप्रभु देखते हैं, तो उनका जो शरीर का रंग पूरा बदल गया है, अभी तक वो जो मछली का जाला है, उसके अंदर चैतन्य महाप्रभु है और फिर भक्त ज़ोर से कीर्तन करते हैं और फिर अंत में चैतन्य महाप्रभु, जो भगवान की जो रास लीला है, रास लीला में जलक्रीडा समासक्त गोपवस्त्रापहृत कहा, जलक्रीडा जो कर रहे होते हैं, कृष्ण और गोपियां, चैतन्य महाप्रभु उस लीला का स्मरण कर रहे हैं, उस लीला में अंतरंग हो गए हैं वो और वो उस लीला से बाहर आ जाते हैं और जब वो देखते हैं भक्त, सब भक्तों को देखते हैं और सब भक्त बहुत चिंतित हैं और चैतन्य महाप्रभु पहले क्रोध हो जाते हैं, पर वहाँ पे वो देखते हैं कि उनकी जो वरिष्ठ हैं, परमानंद पुरी, परमानंद पुरी जो है, ईश्वर पुरी के ही स्तर पर हैं, उनकी गुरु के समान हैं, तो पहले तो क्रोध हो जाते हैं, पर परमानंद पुरी को देखते हैं, तो वो देखते हैं, आचार्य, आप यहां पे क्यों आए हैं?
चैतन्य महाप्रभु परमानंद पुरी हँसते हैं। उसका एक ज्वलंत उदाहरण प्रस्तुत किया है और जो कवि कर्णपूर चैतन्य से बताते हैं कि यह जो उन्मत्तता है, यह जो पागलपन है, भौतिक पागलपन व्यक्ति को भवबंधन में फंसाता है, चैतन्य महाप्रभु का जो उन्मत्तता जो पागलपन है, वह भवबंधन से निकाल देता है व्यक्ति को। और कहते हैं कि वास्तव में वही जो पागलपन था, वही एक तरह से शील प्रभुपाद जी के पास था। भौतिक दृश्य से देखेंगे तो कोई व्यक्ति सत्तर साल की उम्र में अकेला परदेश, ऐसे देश में जो कभी गया भी नहीं है, बिना किसी पैसे के जाना, यह कोई बुद्धिमान व्यक्ति का लक्षण नहीं है, व्यक्ति को हम पागल कहेंगे, पर वह जो पागलपन है, वो दिव्य पागलपन है और इस दिव्य पागलपन में भगवान की सारी शक्ति सम्मिलित होती है।
प्रभुपाद जी कहते थे कि perfection of our life is to become mad for Krishna, कि हमारे जीवन का परिपूर्णता क्या है कि हम भगवान के कृष्णा के पागल हो जाएं। प्रभुपाद जी का जो पागलपन था, वो अलग प्रकार का था। प्रभुपाद जी कभी-कभी अपने ही भावना में विभोर होकर उनके आँखों से आंसू आते थे और वो दिव्य चेतना में चले जाते थे, पर अधिकांश रूप से प्रभुपाद जी हमारे साथ रहा करते थे और इसी भौतिक स्तर पर रहकर कैसे हमेशा कृष्ण में रहना, कृष्ण के स्मरण में रहना, उसका उन्होंने उदाहरण दिया और उससे प्रेरित होकर विश्व भर में अभी कृष्ण भावनामृत उन्होंने फैलाया और उनके शिष्यों, उनके अनुयायी, वही चैतन्य महाप्रभु की जो जो भेंट है, जो कृष्ण प्रेम की भेंट हमें प्रदान कर रहे हैं।
तो चैतन्य प्रभुपाद’s madness was a total commitment to the instruction of a spiritual master. प्रभुपाद जी का पागलपन क्या था? वैसे ही कि कृष्ण के स्मरण में लीन होकर सब कुछ भूल जाना था, उनका पागलपन था कि टोटल पूरी तरह से वो अपने गुरुदेव के आदेश के लिए समर्पित हो गए थे। तो वो उदाहरण हम भी स्वीकार कर सकते हैं और हम जब जाप करते हैं, कीर्तन करते हैं, सेवा करते हैं, श्रवण करते हैं, उसमें अगर हम भी हमारा मन लगाने का प्रयास करेंगे, तो धीरे-धीरे हम भी चैतन्य महाप्रभु की कृपा से कृष्ण भावना भावित हो जाएंगे और फिर हमारे इस जीवन के अंत में हम उसी दिव्य कृष्ण लीला में प्रवेश कर लेंगे। इसका ज्वलंत चैतन्य महाप्रभु ने हम सबको दिया है।